NCERT Solutions for Class 12 History: Chapter 04 विचारक विश्वास और इमारतें
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Practice Class 12 History Solutions: Chapter 04 विचारक विश्वास और इमारतें
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Question 1: पक्ष में तर्क दीजिए।
Answer:
हाँ, उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे।
नियतिवादियों का मानना था कि मनुष्य के सुख-दुःख पहले से ही निर्धारित हैं और उनमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।
भौतिकवादियों का मानना था कि मनुष्य का शरीर केवल चार तत्वों से बना है और मृत्यु के बाद सब कुछ समाप्त हो जाता है, आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है।
इसके विपरीत, उपनिषदों के विचारकों का मानना था कि कर्म, ज्ञान और तपस्या के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन की दिशा बदल सकता है और आत्मा को परमात्मा मेंलीन कर सकता है।
मुख्य बिंदु:
• उपनिषदिक विचारकों ने कर्म और आत्मा के अस्तित्व पर जोर दिया।
• नियतिवाद सब कुछ भाग्य के अधीन मानता था।
• भौतिकवाद केवल भौतिक शरीर और तत्वों को ही सत्य मानता था।
आम गलतियाँ:
• छात्रों द्वारा तीनों दर्शनों के मुख्य अंतर को स्पष्ट रूप से न लिख पाना।
• उपनिषदों के विचारों को भौतिकवाद के साथ मिला देना।
• नियतिवाद की सही परिभाषा न लिखना।
Exam Tips:
a) तीनों दार्शनिकधाराओं के नाम लिखकर उनके मुख्य विचारों को बिंदुओं में स्पष्ट करें।
b) तुलनात्मक दृष्टिकोण अपनाकर उत्तर को अधिक प्रभावशाली बनाएं।
c) मुख्य शब्दावली जैसे 'नियतिवाद', 'भौतिकवाद' और 'उपनिषद' का सही प्रयोग करें।
Question 2: जैन धर्म की महत्वपूर्ण शिक्षाओं को संक्षेप में लिखिए।
Answer:
जैन धर्म की महत्वपूर्ण शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं:
संपूर्ण विश्व प्राणवान (सजीव) है, अर्थात् पत्थर, चट्टान और पौधों में भी जीवन होता है।
अहिंसा जैन धर्म का मूल मंत्र है, जिसके अंतर्गत किसी भी जीव, पौधे या कीट-कोड़े को न सताना शामिल है।
कर्म के चक्र से मुक्ति पाने के लिए तपस्या और त्याग की आवश्यकता होती है।
जैन साधू-साध्वियों को पाँच महाव्रतों का पालन करना अनिवार्य होता है: अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह (धन-संग्रह न करना) और ब्रह्मचर्य।
जैन धर्म ने भारतीय चिंतन परंपरा को अहिंसा के सिद्धांत से गहराई से प्रभावित किया है।
मुख्य बिंदु:
• अहिंसा को परम धर्म माना गया है।
• संसार के हर कण में जीव का वास है।
• पाँच महाव्रतों का कड़ाई से पालन करना होता है।
आम गलतियाँ:
• पाँच महाव्रतों के नाम गलत या अधूरे लिखना।
• जैन धर्म के दार्शनिक पक्षों को स्पष्ट न करना।
• अहिंसा के व्यापक अर्थ को केवल मनुष्यों तक सीमित समझना।
Exam Tips:
a) शिक्षाओं को शीर्षकों या बुलेट पॉइंट्स के रूप में लिखें।
b) पाँच महाव्रतों का उल्लेख अवश्य करें क्योंकि यह परीक्षा की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है।
c) उत्तर लिखते समय जैन धर्म की शब्दावली जैसे 'अपरिग्रह' और 'अस्तेय' का सही प्रयोग करें।
Question 3: सांची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका की चर्चा कीजिए।
Answer:
सांची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल के शासकों, विशेषकर बेगमों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है:
शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने इस प्राचीन स्थल के रखरखाव और संरक्षण के लिए उदारतापूर्वक आर्थिक अनुदान दिया।
बेगमों ने यहाँ एक संग्रहालय और अतिथि शाला बनाने के लिए भी धन दिया, जिससे पर्यटकों और शोधकर्ताओं को सुविधा मिली।
प्रसिद्ध पुरातत्वविद् जॉन मार्शल द्वारा लिखी गई सांची पर प्रख्यात पुस्तकों के प्रकाशन के लिए भी सुल्तानजहाँ बेगम ने वित्तीय सहायता प्रदान की।
बेगमों के विवेकपूर्ण और दूरदर्शी निर्णयों के कारण ही सांची का यह महान बौद्ध स्मारक आज सुरक्षित अवस्था में बचा हुआ है।
मुख्य बिंदु:
• शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम का योगदान।
• संग्रहालय और अतिथि शाला का निर्माण।
• जॉन मार्शल की पुस्तकों के प्रकाशन में आर्थिक सहायता।
आम गलतियाँ:
• बेगमों के नाम लिखने में भ्रमित होना।
• संरक्षण के कार्यों (संग्रहालय, अतिथि शाला) का उल्लेख न करना।
• फ्रांसीसी और अंग्रेजों की भूमिका को बेगमों की भूमिका से मिला देना।
Exam Tips:
a) दोनों बेगमों के नाम और उनके द्वारा किए गए विशिष्ट कार्यों को अलग-अलग बिंदुओं में दर्शाएं।
b) जॉन मार्शल के साथ उनके सहयोग का उल्लेख अवश्य करें।
c) उत्तर को ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर तथ्यात्मक रूप से सही लिखें।
Question 4: निम्नलिखित संक्षिप्त अभिलेख को पढ़िए और जवाब दीजिए:
महाराजा हुविष्क (एक कुषाण शासक) के तैंतीसवें साल में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु बल की शिक्षा, त्रिपिटक जानने वाली बुद्धिमता की बहन की बेटी भिक्षुणी धनवती ने अपने माता-पिता के साथ मधुकनक में बोधिसत्व की मूर्ति स्थापित की।
Answer:
धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख तत्कालीन कुषाण शासक हुविष्क के शासनकाल के तैंतीसवें वर्ष में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन के रूप में निश्चित की है।
धनवती ने स्वयं को बौद्ध भिक्षुणी सिद्ध करने हेतु मधुकनक में बोधिसत्व की मूर्ति की स्थापना की।
धनवती अपनी मौसी बुद्धिमता तथा अपने माता-पिता का नाम लेती है।
वे त्रिपिटक नामक बौद्ध ग्रंथ को जानती थीं।
यह पाठ उन्होंने अपने गुरु तथा भिक्षु 'बल' से सीखा था। यह भी कहा जा सकता है कि उन्होंने यह ग्रंथ अपनी मौसी बुद्धिमता से सीखा था।
मुख्य बिंदु:
• अभिलेख से कुषाण शासक हुविष्क के समय की जानकारी मिलती है।
• भिक्षुणी धनवती द्वारा बोधिसत्व की मूर्ति स्थापित की गई।
• पारिवारिक और गुरु-शिष्य संबंधों की जानकारी प्राप्त होती है।
आम गलतियाँ:
• गद्यांश को ठीक से पढ़े बिना प्रश्नों के उत्तर देना।
• शासक का नाम या वर्ष गलत लिखना।
• भिक्षुणी और उसके गुरु के संबंधों को स्पष्ट न करना।
Exam Tips:
a) स्रोत आधारित प्रश्नों के उत्तर हमेशा गद्यांश के भीतर से ही ढूंढकर लिखें।
b) प्रत्येक उप-प्रश्न का उत्तर अलग-अलग बिंदुओं में दें।
c) व्यक्तियों के नाम (जैसे हुविष्क, धनवती, बल) सही वर्तनी के साथ लिखें।
Question 5: आपके अनुसार स्त्री-पुरुष संघ में क्यों जाते थे?
Answer:
स्त्री-पुरुष संघों (मठों) में इसलिए जाते थे क्योंकि वहाँ वे धर्म का नियमित ढंग से अध्ययन, मनन, उपासना तथा विचार-विमर्श कर सकते थे।
वे सांसारिक विषयों और मोह-माया से दूर रहकर आध्यात्मिक शांति प्राप्त करना चाहते थे।
कुछ लोग बौद्ध धर्म की गहराई का अध्ययन करके समाज में इसके संदेश का प्रचार करना चाहते थे और धर्म के उपदेशक बनना चाहते थे।
संघ का जीवन अनुशासित था, जो उन्हें एक निश्चित नैतिक और आध्यात्मिक मार्ग प्रदान करता था।
मुख्य बिंदु:
• धार्मिक अध्ययन और मनन के लिए।
• सांसारिक बंधनों और दुखों से मुक्ति पाने के लिए।
• बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार और उपदेशक बनने की इच्छा।
आम गलतियाँ:
• केवल एक ही कारण लिखकर उत्तर समाप्त कर देना।
• संघ के अनुशासित जीवन और उसके उद्देश्यों का वर्णन न करना।
• उत्तर को सामान्य भाषा में लिखना, ऐतिहासिक संदर्भ न देना।
Exam Tips:
a) संघ में प्रवेश के सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों कारणों को स्पष्ट करें।
b) उत्तर को तार्किक और क्रमबद्ध तरीके से बिंदुओं में लिखें।
c) 'धम्म' और 'संघ' की अवधारणा को ध्यान में रखकर उत्तर दें।
Question 6: सांची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से कहाँ तक सहायता मिलती है?
Answer:
सांची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य (विशेषकर जातक कथाओं) से बहुत अधिक सहायता मिलती है।
बौद्ध ग्रंथों के अध्ययन से सांची की मूर्तियों में उल्लिखित सामाजिक और मानव जीवन की अनेक घटनाओं को समझने में मदद मिलती है।
उदाहरण के लिए, सांची के एक तोरणद्वार पर वसंतर जातक कथा का चित्रण है, जिसे बौद्ध साहित्य के ज्ञान के बिना समझ पाना असंभव है।
मूर्तिकला में कई पशुओं (जैसे हाथी, घोड़ा, बैल) का सुंदर अंकन मिलता है, जो जातक कथाओं के अध्ययन से पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है।
इस प्रकार, साहित्य और कला एक-दूसरे के पूरक के रूप में सांची के इतिहास को उजागर करते हैं।
मुख्य बिंदु:
• बौद्ध साहित्य और मूर्तिकला का गहरा संबंध है।
• जातक कथाओं (जैसे वसंतर जातक) की कहानियाँ मूर्तियों में उकेरी गई हैं।
• पशु-पक्षियों और मानव जीवन के दृश्यों को समझने में ग्रंथ सहायक हैं।
आम गलतियाँ:
• जातक कथाओं का सांची कला से संबंध स्पष्ट न करना।
• केवल मूर्तियों की सुंदरता का वर्णन करना, उनके पीछे की कथाओं का नहीं।
• ऐतिहासिक साक्ष्यों के बजाय केवल कल्पना के आधार पर उत्तर लिखना।
Exam Tips:
a) वसंतर जातक कथा का उदाहरण देकर उत्तर को प्रामाणिक बनाएँ।
b) यह स्पष्ट करें कि कैसे लिखित साहित्य मूर्तिकला के प्रतीकों को समझने की कुंजी है।
c) उत्तर में 'जातक कथाओं' और 'तोरणद्वार' जैसे महत्वपूर्ण शब्दों का प्रयोग करें।
Question 7: चित्र 4.32 और 4.33 में सांची से लिए गए दो परिदृश्य दिए गए है? अथवा वास्तुकला, पेड़-पौधों, और जानवरों को ध्यान से देखकर तथा लोगों के काम-धंधों को पहचान कर यह बताइए कि इनमें से कौन सा ग्रामीण और कौन सा शहरी परिदृश्य है।
Answer:
चित्र 4.32 में झोपड़ी, जानवर तथा पेड़-पौधे दिखाई दे रहे हैं, इसलिए इस दृश्य को ग्रामीण दृश्य कहा जा सकता है।
चित्र 4.33 में महल का दृश्य दर्शाया गया है जहाँ एक व्यक्ति की सेवा में कई दास लगे हैं, जो किसी राजा के महल की कहानी को दर्शाता है और यह एक शहरी या राजसी दृश्य है।
मुख्य बिंदु:
• चित्र 4.32 ग्रामीण जीवन (झोपड़ी, प्रकृति) को दर्शाता है।
• चित्र 4.33 शहरी/राजसी जीवन (महल, दास) को दर्शाता है।
• दृश्य विश्लेषण से तत्कालीन समाज की आर्थिक स्थिति का पता चलता है।
आम गलतियाँ:
• दोनों चित्रों के दृश्यों को आपस में मिला देना।
• केवल चित्रों को देखकर बिना कारणों के उत्तर लिखना।
• ग्रामीण और शहरी परिवेश के अंतर को स्पष्ट न करना।
Exam Tips:
a) दोनों चित्रों का अलग-अलग विश्लेषण करके स्पष्ट अंतर बताएँ।
b) वास्तुकला और दासों की उपस्थिति जैसे साक्ष्यों का उल्लेख करें।
c) उत्तर को संक्षिप्त और सटीक रखें।
Question 8: वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला के विकास की चर्चा कीजिए।
Answer:
वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला का विकास निम्नलिखित रूप में हुआ:
वैष्णव परंपरा में विष्णु भगवान को तथा शैव परंपरा में शिव भगवान को महत्वपूर्ण देवता माना गया। लगभग 600 ई. पू. से लेकर 600 ई. तक के काल में वैष्णववाद और शैववाद का तेजी से विस्तार हुआ।
मूर्तिकला का विकास: देवी-देवताओं की विशेषताओं एवं उनके प्रतीकों का चित्रांकन उनके वस्त्र, आभूषण और बैठने की मुद्रा के आधार पर किया जाता था। विष्णु के विभिन्न अवतारों और अन्य देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियाँ बनाई गईं।
वास्तुकला का विकास: मंदिर निर्माण की शुरुआत हुई। प्रारंभिक मंदिरों में एक चौकोर कमरा होता था जिसे 'गर्भगृह' कहा जाता था। धीरे-धीरे इसके ऊपर एक ऊँची संरचना बनाई जाने लगी जिसे 'शिखर' कहा गया। मंदिरों में विशाल सभास्थली और ऊँचे द्वार (तोरणद्वार) भी बनाए जाने लगे।
मुख्य बिंदु:
• पौराणिक हिंदू धर्म (वैष्णव और शैव) का उदय और विकास।
• देवी-देवताओं की मूर्तिकला और उनके प्रतीकों का अंकन।
• प्रारंभिक मंदिरों (गर्भगृह, शिखर, तोरणद्वार) की वास्तुकला का विकास।
आम गलतियाँ:
• वास्तुकला और मूर्तिकला के विकास को अलग-अलग स्पष्ट न करना।
• गर्भगृह और शिखर जैसे वास्तुशिल्प शब्दों का गलत प्रयोग करना।
• कालिक काल (600 ई. पू. से 600 ई.) का उल्लेख न करना।
Exam Tips:
a) उत्तर को दो भागों (मूर्तिकला का विकास और वास्तुकला का विकास) में विभाजित करके लिखें।
b) वास्तुकला के मुख्य अंगों जैसे गर्भगृह, शिखर और तोरणद्वार का वर्णन अवश्य करें।
c) वैष्णव और शैव परंपराओं के मुख्य देवताओं के नाम स्पष्ट रूप से लिखें।
Question 9: स्तूप क्यों और कैसे बनाए जाते थे? चर्चा कीजिए।
Answer:
स्तूप बनाए जाने के कारण: बुद्ध से जुड़े पवित्र अवशेष जैसे उनकी अस्थियाँ या उनके द्वारा प्रयुक्त सामान जहाँ गाड़े जाते थे, उन जगहों को पवित्र माना जाता था और उन टीलों को 'स्तूप' कहा जाता था। स्तूप बनाने की परंपरा बुद्ध से पूर्व की भी थी, किंतु यह बौद्ध धर्म से विशेष रूप से जुड़ गई।
स्तूप निर्माण की विधियाँ:
• स्तूप की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेखों से इन्हें बनाने के लिए दान का पता चलता है।
• स्तूप का जन्म एक गोलार्ध लिए हुए मिट्टी के टीले से हुआ, जिसे बाद में 'अंड' कहा गया।
• अंड के ऊपर 'हर्मिका' होती थी जो छज्जे जैसा ढांचा होती थी।
• हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था जिसे 'यष्टि' कहते थे।
• पवित्र स्थान को संसारिक स्थान से अलग करने के लिए इसके चारों ओर एक 'वेधिका' (रेलिंग) बना दी जाती थी।
• बाद में स्तूप के टीले को भी मूर्तियों से सजाया जाने लगा (जैसे अमरावती का स्तूप)।
मुख्य बिंदु:
• स्तूप बौद्ध धर्म के पवित्र अवशेषों पर बनाए जाने वाले स्मारक थे।
• स्तूप की संरचना में अंड, हर्मिका, यष्टि और वेधिका प्रमुख भाग होते थे।
• इनके निर्माण में राजाओं, व्यापारियों और आम जनता द्वारा दान दिया जाता था.
आम गलतियाँ:
• स्तूप के विभिन्न भागों (अंड, हर्मिका, वेधिका) के नाम और उनके अर्थ में भ्रमित होना।
• केवल निर्माण के कारण लिखना और निर्माण की प्रक्रिया छोड़ देना।
• दानदाताओं की भूमिका का उल्लेख न करना।
Exam Tips:
a) प्रश्न के दोनों भागों (क्यों और कैसे) का उत्तर स्पष्ट रूप से अलग-अलग headings के तहत दें।
b) स्तूप की संरचना के प्रमुख अंगों (अंड, हर्मिका आदि) का क्रमानुसार वर्णन करें।
c) चित्र या आरेख के रूप में संरचना को मानसिक रूप से समझकर सटीक शब्दावली का प्रयोग करें।
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History Class 12 Curriculum Solutions: Chapter 04 विचारक विश्वास और इमारतें
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