Download NCERT Solutions for Class 12 History Chapter 03 बंधुत्व जाति तथा वर्ग
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Question 1: स्पष्ट कीजिए कि विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता क्यों महत्वपूर्ण रही होगी?
Answer:
पितृवंशिकता का तात्पर्य उस वंश परंपरा से है जो पिता के पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि से आगे बढ़ती है। अधिकांश राजवंश पितृवंशिकता प्रणाली का अनुसरण करते थे। विशिष्ट परिवारों में शासक परिवार तथा धनी लोग शामिल थे। विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता महत्वपूर्ण रही जिसके कारण निम्नलिखित हैं:
• धर्मग्रंथों के अनुसार वंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र का होना आवश्यक है। इसी कारण सभी परिवारों में उत्तम पुत्रों की कामना की जाती थी।
• ऋग्वेद के एक मंत्र में यह वर्णित है कि पुत्री के विवाह के समय पिता कामना करता है कि इंद्र के अनुग्रह से उसकी पुत्री को उत्तम पुत्रों की प्राप्ति हो।
• विशिष्ट परिवारों में उत्तराधिकार संबंधी झगड़ों से बचने के लिए भी पितृवंशिकता महत्वपूर्ण रही होगी। पितृवंशिकता के अनुसार पिता की मृत्यु के बाद उसके पुत्र उसके संसाधनों पर अधिकार जमा सकते थे। कभी-कभी पुत्र के न होने पर एक भाई दूसरे भाई का उत्तराधिकारी बन जाता था।
मुख्य बिंदु:
• पितृवंशिकता में वंश पिता से पुत्र और पौत्र के माध्यम से आगे बढ़ता है।
• उत्तराधिकार के विवादों को सुलझाने में यह व्यवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
• पुत्र प्राप्ति की कामना वैदिक काल से ही समाज का प्रमुख हिस्सा रही है।
आम गलतियाँ:
• छात्र पितृवंशिकता और मातृवंशिकता में अंतर स्पष्ट नहीं कर पाते।
• केवल राजाओं तक इसे सीमित मान लेते हैं, जबकि यह विशिष्ट और धनी परिवारों में भी प्रचलित थी।
Exam Tips:
a) उत्तर को बिंदुओं में लिखें ताकि परीक्षक को मुख्य बिंदु स्पष्ट दिख सकें।
b) धर्मग्रंथों और ऋग्वेद का संदर्भ देना उत्तर को और अधिक प्रभावशाली बनाता है।
c) वंश परंपरा के अर्थ को संक्षिप्त रूप में अवश्य परिभाषित करें।
Question 2: क्या आरंभिक राज्यों में शासक निश्चित रूप से क्षत्रिय ही होते थे? चर्चा कीजिए।
Answer:
आरंभिक राज्यों में शासक निश्चित रूप से क्षत्रिय नहीं होते थे। आरंभिक राज्यों में शासक अन्य वर्गों से भी संबंधित होते थे। शासकों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे। परंतु अनेक महत्वपूर्ण राजवंशों की उत्पत्ति अन्य वर्णों से भी हुई थी। मौर्यवंश एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की परंतु उनकी उत्पत्ति के विषय में विवाद है। बौद्ध ग्रंथ उन्हें क्षत्रिय बताते हैं परंतु ब्राह्मणीय ग्रंथ उन्हें निम्न कुल का मानते हैं। मौर्यों के उत्तराधिकारी शुंग और कण्व ब्राह्मण थे। गुप्त राजवंश को लेकर भी मतभेद था। मध्य एशिया से आने वाले शकों को म्लेच्छ, बर्बर अथवा अन्य देशीय कहा गया है। सातवाहन कुल का संबंध भी ब्राह्मणों से था। अतः यह बात स्पष्ट है कि कई राजवंशों का उल्लेख क्षत्रिय वर्ग से नहीं था। प्रसिद्ध सातवाहन शासक गौतमी पुत्र सातकर्णि ने स्वयं को अनूठा ब्राह्मण बताने के साथ-साथ अपने आप को क्षत्रिय के अभिमान का हनन करने वाला भी बताया था। उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि आरंभिक राज्यों में शासक के लिए जन्म से क्षत्रिय होना अनिवार्य नहीं था।
मुख्य बिंदु:
• शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय ही शासक बन सकते थे।
• मौर्य, शुंग, कण्व, गुप्त और सातवाहन राजवंशों की उत्पत्ति क्षत्रिय वर्ण से नहीं थी।
• सातवाहन शासक गौतमीपुत्र सातकर्णि ने स्वयं को अनूठा ब्राह्मण बताया था।
आम गलतियाँ:
• छात्र यह मान लेते हैं कि प्राचीन काल में सभी राजा क्षत्रिय ही होते थे।
• विभिन्न राजवंशों के वर्णों के बारे में भ्रमित हो जाते हैं।
Exam Tips:
a) मौर्य और सातवाहन राजवंशों के उदाहरण अवश्य दें।
b) शासकों की उत्पत्ति को लेकर शास्त्रों और वास्तविक इतिहास के अंतर को समझाएं।
c) तर्कों को क्रमिक रूप से प्रस्तुत करें।
Question 3: द्रोण, हिडिम्बा और मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना कीजिए व उनके अंतर को स्पष्ट कीजिए।
Answer:
द्रोण, हिडिम्बा और मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना इस प्रकार है:
• द्रोण की कथाओं में धर्म के मानदंड - निषाद वर्ग के एकलव्य ने द्रोण को अपना गुरु बनाना चाहते थे परंतु गुरु द्रोण ने इंकार कर दिया। गुरु द्रोण क्षत्रिय राजकुमारों को युद्ध विद्या सिखाते थे। गुरु द्रोण ने एकलव्य को अपना शिष्य मानने से मना कर दिया परंतु एकलव्य से गुरुदक्षिणा में उसके दाहिने हाथ का अंगूठा माँग लेना धर्म के विपरीत था। गुरु द्रोण ने अपने शिष्य अर्जुन के सामने यह प्रण किया कि वह विश्व के अद्वितीय तीरंदाज बनाएँगे। इसी कारण द्रोण ने एकलव्य से गुरुदक्षिणा में उसके दाएँ हाथ का अंगूठा माँग लिया। हालांकि गुरु को ऐसा नहीं करना चाहिए। इससे स्पष्ट है कि द्रोण एक ब्राह्मण थे। उनका काम शिक्षा देना था और वर्ण-व्यवस्था के अनुसार सैनिक दायित्व का निर्वाह क्षत्रिय ही करते थे। दूसरी ओर निषादों को यह संदेश दिया जा रहा था कि वे कभी भी वर्ण-व्यवस्था के अनुसार उच्च वर्गों की बराबरी नहीं कर सकते।
• हिडिम्बा की कथा में धर्म के मानदंड - जब पांडव वन चले गये थे तो जिस समय घटकर सो रहे थे द्वितीय पांडव भीम उनकी रखवाली कर रहे थे। हिडिम्बा एक राक्षसी थी और एक नरभक्षी राक्षस की बहन थी। हिडिम्बा के भाई ने उसे उन पांडवों को पकड़कर लाने को कहा था। हिडिम्बा भीम को देखकर मोहित हो गई तथा सुंदर स्त्री की वेशभूषा में भीम के सामने गई और विवाह का प्रस्ताव रखा परंतु उसने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। बाद में उसने भीम से विवाह कर लिया। तत्पश्चात हिडिम्बा ने एक पुत्र को जन्म दिया। यह कार्य धर्म के मानदंडों के प्रतिकूल था।
• मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंड - मातंग बोधिसत्व का नाम था। उन्होंने चांडाल के रूप में जन्म लिया था। चांडाल भी अपने आप को समाज का महत्वपूर्ण अंग मानते थे। इसकी पुष्टि मातंग की कथा से होती है। उनका विवाह व्यापारी की पुत्री दंत्य मांगलिक नामक कन्या से हुआ और मांडव्य नामक पुत्र का जन्म हुआ। एक बार भिखारी के रूप में मातंग ने मांडव्य से उसके दरवाजे पर भोजन माँगा लेकिन उसने उसकी उपेक्षा की।
मुख्य बिंदु:
• द्रोण की कथा वर्ण-व्यवस्था की कठोरता को दर्शाती है।
• हिडिम्बा की कथा राक्षस समाज और मानवीय समाज के मेल को दिखाती है।
• मातंग की कथा बोधिसत्व के चांडाल रूप और सामाजिक भेदभाव से जुड़ी है।
आम गलतियाँ:
• तीनों पात्रों की कथाओं को आपस में मिला देना।
• धर्म के मानदंडों के वास्तविक अर्थ को न समझ पाना।
Exam Tips:
a) तीनों पात्रों (द्रोण, हिडिम्बा, मातंग) की अलग-अलग हेडिंग बनाकर उत्तर लिखें।
b) सामाजिक मानदंडों और वर्ण-व्यवस्था के संदर्भ को स्पष्ट करें।
c) कथा के निष्कर्ष को धर्म से जोड़कर लिखें।
Question 4: किन मायनों में सामाजिक अनुबंध की बौद्ध अवधारणा समाज के उस ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से भिन्न थी जो पुरुषसूक्त पर आधारित था?
Answer:
बौद्धों ने समाज में फैली विषमताओं के संदर्भ में एक अलग अवधारणा प्रस्तुत की। साथ ही समाज में फैले अंतरविरोध को नियमित करने के लिए जिन संस्थाओं की आवश्यकता थी, उस पर भी अपना दृष्टिकोण सामने रखा। सुत्तपिटक नामक ग्रंथ के अनुसार यद्यपि मनुष्य और वनस्पति अविकसित थी परंतु सर्वत्र शांति का माहौल था। सभी जीव जाति के एक निर्धन लोक में रहते थे और प्रकृति से उतना ही ग्रहण करते थे جتनी एक समय के भोजन की आवश्यकता होती है। इन्होंने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को भी अस्वीकार कर दिया।
ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के अनुसार समाज में चार वर्णों की उत्पत्ति आदि मानव 'पुरुष की बलि से हुई थी। ये वर्ण थे- ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र तथा वैश्य। ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। क्षत्रिय योद्धा थे। शूद्रों का कार्य अन्य तीन वर्गों की सेवा करते थे। वैश्य व्यापार करते थे। इस व्यवस्था में सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार जन्म था।
मुख्य बिंदु:
• बौद्ध दृष्टिकोण सामाजिक अनुबंध पर आधारित था और जन्म आधारित प्रतिष्ठा को नकारता था।
• ब्राह्मणीय दृष्टिकोण पुरुषसूक्त पर आधारित था जो जन्म को वर्ण का आधार मानता था।
• सुत्तपिटक में समाज के विकास की प्राकृतिक और शांतिपूर्ण अवस्था का वर्णन है।
आम गलतियाँ:
• बौद्ध और ब्राह्मणीय सामाजिक व्यवस्थाओं के मूल अंतर को स्पष्ट न करना।
• पुरुषसूक्त के सिद्धांतों को गलत लिखना।
Exam Tips:
a) बौद्ध अवधारणा और पुरुषसूक्त की तुलना स्पष्ट रूप से करें।
b) सुत्तपिटक का संदर्भ अवश्य दें।
c) जन्म आधारित बनाम अनुबंध आधारित व्यवस्था का अंतर समझाएं।
Question 5: निम्नलिखित अवतरण महाभारत से है जिसमें ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर दूत संजय को संबोधित कर रहे हैं: संजय गृह के सभी ब्राह्मणों और मुख्य पुरोहित को मेरा विनीत अभिवादन दीजिएगा। मैं गुरु द्रोण के सामने नतमस्तक होता हूँ... मैं कृपचार्य के चरण स्पर्श करता हूँ... ओर कुरु वंश के प्रधान भीष्म से। मैं वृद्ध राजा धृतराष्ट्र को नमन करता हूँ। मैं उनके पुत्र दुर्योधन और उनके अनुजों के स्वास्थ्य के बारे में पूछता हूँ तथा उनको शुभकामनाएं देता हूँ... मैं सब युवा कुरुयोद्धाओं का अभिनंदन करता हूँ जो हमारे भाई, पुत्र और पौत्र हैं... सर्वोपरी मैं उन महामति विदुर को (जिनका जन्म दासी से हुआ था) नमस्कार करता हूँ जो हमारे पिता और माता के सहस्र हैं... मैं उन सभी वृद्ध स्त्रीयों को प्रणाम करता हूँ जो हमारी माताओं के रूप में जानी जाती हैं। जो हमारी पत्नियों हैं उनसे यह कहिएगा कि, 'मैं आशा करता हूँ कि वे सुरक्षित हैं'...मेरी ओर से उन कुलवधुओं को जो उत्तम परिवारों से जन्मी हैं और बच्चों की माताएं हैं, अभिनंदन कीजिएगा तथा हमारी पुत्रियों का आलिंगन कीजिएगा... सुंदर, सुगंधित, सुवेशित गणिकाओं को शुभकामनाएं दीजिएका। दासियों और उनकी संतानों तथा वृद्ध, विकलांग और असहाय जन को मेरी ओर से नमस्कार कीजिएगा... इस सूची को बनाने के आधारों की पहचान कीजिए - उम्र, लिंग, भेद व बंधुत्व के संदर्भ में। क्या कोई अन्य आधार है? प्रत्येक श्रेणी के लिए स्पष्ट कीजिए कि सूची में क्यों एक विशेष स्थान पर क्यों रखा गया है।
Answer:
1. उम्र - इस सूची में विभिन्न उम्र के लोग जैसे- वृद्ध, युवक, युवतियाँ, पुत्र-पुत्रियों तथा वर-वधु सम्मिलित थे।
2. लिंग - इस सूची में स्त्रीलिंग व पुल्लिंग दोनों है।
3. भेद - इस सूची में अलग- अलग प्रकार के रिश्ते तथा संबंध हैं।
4. बंधुत्व - यहाँ बंधुत्व का आधार था - युधिष्ठिर के भाई और दुर्योधन के भाई।
5. सर्वप्रथम समाज में प्रतिष्ठित ब्राह्मणों, पुरोहित तथा गुरुओं को सम्मान दिया गया।
6. दूसरे स्थान पर माता-पिता समान वृद्धों को स्थान दिया गया।
7. इसके बाद अपने से छोटे अथवा एकसमान आयु के बांधवों को स्थान दिया गया।
8. इसके बाद युवा गुरुः योद्धाओं को स्थान दिया गया।
9. इसके बाद नारी वर्ग को स्थान दिया गया। नारी वर्ग में अंतिम स्थान पर सुंदर-गणिकाओं, दासियों तथा उनकी संतानों को स्थान दिया गया।
10. विकलांगों की भी उपेक्षा नहीं की गई। युधिष्ठिर उन्हें भी नमस्कार करते हैं।
मुख्य बिंदु:
• यह सूची महाभारत कालीन समाज की पदानुक्रमित व्यवस्था को दर्शाती है।
• इसमें उम्र, लिंग और सामाजिक स्थिति के आधार पर सम्मान दिया गया है।
• ब्राह्मणों और गुरुओं को सर्वोच्च स्थान तथा दासों और गणिकाओं को अंत में रखा गया है।
आम गलतियाँ:
• सूची के विभिन्न आधारों (उम्र, लिंग, बंधुत्व) को सही से वर्गीकृत न करना।
• पाठ के मर्म को समझे बिना उत्तर लिखना।
Exam Tips:
a) अवतरण में दिए गए क्रम को बिंदुओं में व्यवस्थित रूप से लिखें।
b) सामाजिक पदानुक्रम के नियमों को स्पष्ट करें।
c) युधिष्ठिर की उदारता और शिष्टाचार के दृष्टिकोण को समझाएं।
Question 6: भारतीय साहित्य के प्रसिद्ध इतिहासकार मोरिस विंटरविज ने महाभारत के बारे में लिखा था कि "चूंकि महाभारत संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है... बहुत सारी और अनेक प्रकार की चीजें इसमें निहित हैं... (वह) भारतीयों की आभा की अगाध गहराई को एक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।" चर्चा कीजिए।
Answer:
महाभारत संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है। इस ग्रंथ ने भारतीयों की आभा पर बहुत गहरी छाप छोड़ी है। महाभारत एक महाकाव्य है। महाभारत चंद्रवंशियों के दो परिवारों कौरव तथा पाण्डव के बीच हुए युद्ध का वृत्त है। 100 कौरव भाइयों और 5 पांडव भाइयों के बीच भूमि के लिए जो संघर्ष चला उससे अंततः महाभारत युद्ध का सृजन हुआ। महाभारत लंबी अवधि में रचा और लिखा गया है, इसी कारण इसमें भारतीय समाज के अनेक पक्ष शामिल हो गये। आर्यों के उत्तर भारत में विस्तार के बाद मध्य और दक्षिणी भारत में उनका फैलाव हुआ तो उनके इस ग्रंथ में भी अनेक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा धार्मिक पक्ष जुड़ते गए। इस ग्रंथ का महत्वपूर्ण भाग है श्रीमद् भगवद्गीता जिसमें संपूर्ण भारतीय दर्शन का वर्णन है। इसमें मोक्ष की प्राप्ति के लिए तीन मार्ग बताए गए हैं - ज्ञान, भक्ति तथा कर्म। पांडवों के मध्य धर्म तथा अधर्म का संघर्ष था। इस संदर्भ में पांडवों की विजय हुई, अर्थांत यह पांडवों की कौरवों पर विजय धर्म की अधर्म पर विजय है। महाभारत में भारतीय शिष्टाचार का आदर्श रूप देखने को मिलता है। महाभारत का मूल उद्देश्य भारतीय समाज और संस्कृति को जीवन की कुछ मूल मान्यताओं की ओर ध्यान आकर्षित करना है।
मुख्य बिंदु:
• महाभारत को 'महाकाव्य' और संपूर्ण भारतीय साहित्य का प्रतिनिधि माना जाता है।
• इसमें कौरव और पांडवों के बीच संघर्ष के माध्यम से धर्म की विजय को दिखाया गया है।
• भगवद्गीता के माध्यम से भारतीय दर्शन और मोक्ष के तीन मार्ग बताए गए हैं।
आम गलतियाँ:
• केवल युद्ध की कथा तक महाभारत को सीमित मान लेना।
• इसके दार्शनिक और सामाजिक महत्व की उपेक्षा करना।
Exam Tips:
a) विंटरविज के कथन के आलोक में महाभारत के बहुआयामी स्वरूप की चर्चा करें।
b) इसमें वर्णित सामाजिक, राजनीतिक और दार्शनिक पक्षों का उल्लेख करें।
c) भगवद्गीता और मोक्ष के मार्गों का संक्षिप्त वर्णन दें।
Question 7: क्या यह संभव है कि महाभारत का एक ही रचयिता था? चर्चा कीजिए।
Answer:
हिंदू मान्यताओं तथा पौराणिक संदर्भों के अनुसार महाभारत के रचनाकार वेदव्यास को माना जाता है। महाभारत के रचनाकार के विषय में भी इतिहासकार एकमत नहीं हैं। जनश्रुतियों के अनुसार महर्षि व्यास ने इस ग्रंथ को श्रीगणेश जी से लिखवाया था। किंतु आधुनिक विद्वानों का विचार है कि इसकी रचना किसी एक लेखक द्वारा नहीं हुई। इतिहासकार मानते हैं कि इसकी मूल गधा के रचयिता भाट सारथी थे। धर्म, दर्शन और उपदेश आदि अंश मूल कथा के साथ जुड़कर महाभारत एक बृहद् ग्रंथ बनता गया। लगभग 200 ई.पू. से 200 ई. के बीच हम इस ग्रंथ के रचनाकाल का एक और स्तर देखते हैं। हालांकि साहित्यिक परंपरा में इस बृहद् रचना के रचयिता ऋषि व्यास माने जाते हैं।
मुख्य बिंदु:
• पौराणिक परंपरा के अनुसार वेदव्यास इसके एकमात्र रचयिता हैं।
• आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार इसकी रचना कई चरणों में विभिन्न लेखकों द्वारा हुई है।
• मूल कथा भाट सारथियों द्वारा रची गई और बाद में इसमें दार्शनिक अंश जोड़े गए।
आम गलतियाँ:
• केवल पौराणिक मान्यता को ही ऐतिहासिक सत्य मान लेना।
• इतिहासकारों के तर्कों को नजरअंदाज करना।
Exam Tips:
a) पारंपरिक दृष्टिकोण (वेदव्यास) और ऐतिहासिक दृष्टिकोण (विभिन्न रचयिता) दोनों को स्पष्ट करें।
b) रचना के विभिन्न चरणों (जैसे भाट सारथी और उपदेशात्मक अंश) का उल्लेख करें।
c) उत्तर को संतुलित रूप में प्रस्तुत करें।
Question 8: आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष के संबंधों की विषमताएं कितनी महत्वपूर्ण रही होंगी? कारण सहित उत्तर दीजिए।
Answer:
आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष की विषमताओं के कुछ कारण इस प्रकार हैं:
• आरंभिक समाज पुरुष प्रधान था। यह पितृवंशीय परंपरा के अनुसार चलता था।
• धर्मग्रंथों के अनुसार वंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र का होना आवश्यक है। इसी कारण सभी परिवारों में उत्तम पुत्रों की कामना की जाती थी।
• पितृवंशीय व्यवस्था में पैतृक संसाधनों पर पुत्री का कोई अधिकार नहीं था। यही अपेक्षा की थी कि वे अपने गोत्र से बाहर उसका विवाह कर दिया जाए। इस प्रथा को बहिर्विवाह पद्धति कहते हैं।
• स्त्री का गोत्र - लगभग 1000 ई. पू. के बाद ब्राह्मणों ने (विशेष रूप से ब्राह्मणों को) गोत्रों में वर्गीकृत किया। प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था। गोत्रों के दो नियम महत्वपूर्ण थे:
• विवाह के बाद स्त्रियों को पिता के स्थान पर अपने पति के गोत्र का माना जाता था।
• एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे।
• कुछ सातवाहन राजाओं की एक से अधिक पत्नियां थीं। इन राजाओं से विवाह करने वाली रानियों के नामों से पता चलता है कि उनके नाम 'गौतम और वशिष्ठ गौत्रों से लिए गए थे। स्त्रियां पैतृक संसाधन में भागीदारी की माँग नहीं कर सकती थीं।
• विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्रियों का स्वामित्व होता था। इसे स्त्रीधन कहा जाता था।
• मनुस्मृति स्त्रियों को पति की अनुमति के बिना पारिवारिक संपत्ति या स्वयं अपनी बहुमूल्य वस्तुओं को गुप्त रूप से एकत्रित करने से भी रोकती थी।
• राजपरिवारों में स्त्रियाँ दरबार में उपस्थित होती थीं। कुछ स्त्रीयों ने स्वयं भी राज किया या संरक्षिका भी बनीं।
मुख्य बिंदु:
• आरंभिक समाज पितृसत्तात्मक था जहाँ पुरुषों का प्रभाव अधिक था।
• स्त्रियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं था, केवल 'स्त्रीधन' पर उनका अधिकार होता था।
• गोत्र व्यवस्था और बहिर्विवाह पद्धति ने स्त्रियों की स्थिति को काफी हद तक नियंत्रित किया।
आम गलतियाँ:
• स्त्रियों की स्थिति को केवल एक पक्षीय (पूरी तरह अच्छी या पूरी तरह बुरी) मान लेना।
• गोत्र और बहिर्विवाह के नियमों को ठीक से न समझ पाना।
Exam Tips:
a) पितृसत्तात्मक व्यवस्था और संपत्ति अधिकारों की चर्चा अवश्य करें।
b) गोत्र नियमों और स्त्रीधन के प्रावधानों को स्पष्ट रूप से समझाएं।
c) अपवादों (जैसे कुछ रानियों का प्रभाव) का भी उल्लेख करें।
Question 9: उन साक्ष्यों की चर्चा कीजिए जो यह दर्शाते हैं कि बंधुत्व और विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियमों का सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था।
Answer:
बंधुत्व संबंधी ब्राह्मणीय नियम:
बहुधा अपने पारिवारिक जीवन को सहज ही स्वीकार कर लेते हैं, पर परिवार में एक-दूसरे के साथ रिश्तों और क्रियाकलापों में भी भिन्नता है। कुछ शब्द परिवार के लिए तथा जाति शब्द किसी बड़े समूह के लिए प्रयोग किया जाता है। कई बार एक ही परिवार के लोग भोजन आपस में मिल-बाँटकर इस्तेमाल करते हैं। एकसाथ रहते थे और काम करते थे। पारिवारिक रिश्ते नैसर्गिक और रक्त संबद्ध माने जाते हैं। इतिहासकार परिवार और बंधुता संबंधी विचारों में बदलाव आया होगा। महाभारत काल में राज्य परिवारों में बंधुत्व संबंधों में भारी परिवर्तन आया। एक स्तर पर महाभारत की कहानी है। पितृवंशिकता में पुत्र पिता की मृत्यु के बाद उनके संसाधनों पर अधिकार जमा सकते थे। कभी पुत्र के न होने पर एक भाई दूसरे पर उत्तराधिकारी हो जाता था तो कभी बंधुबांघवा सिंहासन पर अपना अधिकार जमाते थे。
विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियम:
अपने गोत्र से बाहर स्त्रियों का विवाह कर देना वांछित था। इस प्रथा को बहिर्विवाह पद्धति कहते हैं और इसका अर्थ था कि ऊँची प्रतिष्ठा वाले परिवारों की कम उम्र की कन्याओं और स्त्रियों का जीवन बहुत सावधानी से नियमित किया जाता था जिससे उचित समय और 'उचित व्यक्ति से उनका विवाह किया जा सके। इसका प्रभाव यह हुआ कि कन्यादान अर्थात विवाह में कन्या की भेट को पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया। धर्मशास्त्र तथा धर्मसूत्र में विवाह के आठ प्रकार मान्य हैं:
• ब्रह्म विवाह - वेद जानने वाले शीलवान वर को आमन्त्रित कर उपहार आदि के साथ कन्या का विवाह करना।
• दैव विवाह - सफलतापूर्वक पूर्ण अनुष्ठानिक यज्ञ पूर्ण करने वाले पुरोहित के साथ कन्या का विवाह करना।
• आर्ष विवाह - इस विवाह में कन्या ka पिता वर को कन्या प्रदान करने के साथ एक जोड़ी बैल प्रदान करता है।
• प्रजापत्य विवाह - इस विवाह के अंतर्गत कन्या के पिता वर को कन्या प्रदान करते समय आदेश देता है कि दोनों साथ-साथ मिलकर सामाजिक कार्यों का पालन करें।
• गान्धर्व विवाह - यह प्रेम विवाह होता है।
• असुर विवाह - कन्या का पिता धन लेकर कन्या प्रदान करता है।
• राक्षस विवाह - बलपूर्वक कन्या का अपहरण कर उससे विवाह करना।
• पिशाच विवाह - यह सबसे निम्न विवाह माना गया है।
मुख्य बिंदु:
• ब्राह्मणीय नियमों के अनुसार गोत्र के भीतर विवाह वर्जित था और बहिर्विवाह अनिवार्य था।
• विवाह के आठ प्रकारों (ब्रह्म से पिशाच तक) का उल्लेख धर्मशास्त्रों में मिलता है।
• सातवाहन और अन्य राजवंशों में इन नियमों के उल्लंघन के कई उदाहरण मिलते हैं (जैसे अंतर्जातीय विवाह या अंतर्गोत्र विवाह)।
आम गलतियाँ:
• विवाह के आठों प्रकारों के नाम और उनके अर्थ में भ्रमित होना।
• केवल आदर्श नियमों को ही वास्तविकता मान लेना और उनके उल्लंघनों की उपेक्षा करना।
Exam Tips:
a) बंधुत्व और विवाह संबंधी नियमों को अलग-अलग शीर्षकों के तहत लिखें।
b) विवाह के आठ प्रकारों का संक्षिप्त विवरण दें।
c) यह स्पष्ट करें कि समाज में इन नियमों का पालन हमेशा कठोरता से नहीं होता था।
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