NCERT Solutions Class 12 History Chapter 09 Colonialism and the Countryside (उपनिवेशवाद और देहात) in Hindi

NCERT Solutions for Class 12 History: Chapter 09 उपनिवेशवाद और देहात

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Practice Class 12 History Solutions: Chapter 09 उपनिवेशवाद और देहात

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Question 1: ग्रामीण बंगाल के बहुत से इलाकों में जोतदार एक ताकतवर हस्ती क्यों थे?

Answer:

धनवान किसानों के समूह को जोतदार कहा जाता था जो अठारहवीं शताब्दी के अंत में जमींदारों की बड़ी मुसीबतों का फायदा उठाकर अपनी शक्ति बढ़ाने में लगे हुए थे। ग्रामीण बंगाल के बहुत से इलाकों में जोतदार एक ताकतवर हस्ती था। स्थानीय व्यापार और साहूकार के कारोबार पर इनका नियंत्रण था। वे क्षेत्र के गरीब काश्तकारों पर शक्ति प्रयोग करते थे। ये लोग गाँवों में रहते थे तथा गरीब ग्रामीणों के बड़े वर्ग पर नियंत्रण रखते थे। बंगाल के दिनाजपुर जिले के धनी किसानों को जोतदार कहा जाता था। 19वीं शताब्दी के शूरू के वर्षों के आते-आते इन जोतदारों ने जमीन के बड़े-बड़े भूखंडों को प्राप्त कर लिया था। जमींदार द्वारा लगान बढ़ाने की कोशिश करने पर ये जोतदार उन जमींदारों का घोर विरोध करते थे तथा रैयत जोतदारों के पक्ष में होते थे। जोतदार जमींदारों द्वारा गाँव की लगान को बढ़ाने के लिए गए प्रयासों का विरोध करते थे।

मुख्य बिंदु:

• जोतदार ग्रामीण बंगाल में प्रभावशाली धनी किसान थे जिनका स्थानीय व्यापार और साहूकारी पर नियंत्रण था।
• इन्होंने संकटग्रस्त जमींदारों की जमीन और अधिकार हथियाकर अपनी स्थिति मजबूत की थी।
• वे रैयतों को जमींदार के विरुद्ध उकसाते थे और लगान वृद्धि का कड़ा विरोध करते थे।
• जोतदारों का गाँवों में प्रत्यक्ष नियंत्रण होने के कारण वे जमींदारों से अधिक शक्तिशाली थे।

आम गलतियाँ:

• छात्र जोतदारों को जमींदार का ही एक रूप समझ लेते हैं, जबकि वे जमींदारों के प्रतिद्वंद्वी थे।
• यह भूल जाते हैं कि जोतदार गाँवों में रहते थे और साहूकारी का काम भी करते थे।
• उत्तर में उनके आर्थिक प्रभाव और स्थानीय शक्ति का सही उल्लेख न करना।

Exam Tips:

a) जोतदारों की शक्ति के दो मुख्य आधार (स्थानीय व्यापार और साहूकारी) का स्पष्ट उल्लेख करें।
b) जमींदारों के साथ उनके संघर्ष और रैयतों पर उनके प्रभाव को तर्कों के साथ समझाएं।
c) उत्तर को पैराग्राफ या बिंदुओं के रूप में सुव्यवस्थित लिखें।

 

Question 2: जमींदार लोग अपनी जमीदारियों पर किस प्रकार नियंत्रण बनाए रखने थे?

Answer:

जमींदार लोग अपनी जमीदारियों पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए कई उपाय करते थे:
जब कोई नया खरीदार जमींदारी खरीद लेता था, तब पुराने जमींदार के लठ्याल मारपीट कर उसे भगा देते थे।
कभी-कभी स्वयं रैयत नए खरीददार को जमीन में नहीं घुसने देते थे।
फर्जी बिक्री के कारण जमींदारों को बार-बार बेचना पड़ता था। बार-बार बोली लगाने से सरकार तथा बोली लगाने वाले दोनों ही थक जाते थे। जब कोई भी बोली नहीं लगाता था, तो सरकार को वह जमींदारी पुराने जमींदार को ही कम कीमत पर बेचनी पड़ती थी।
नीलामी की प्रक्रिया में एजेंटों और नौकरों को शामिल किया जाता था। इस प्रकार संपदा पर जमींदार का अधिकार बना रहता था।
जमींदार कंपनी को राजस्व समय पर नहीं देते थे और इस प्रकार बकाया राजस्व राशि का बोझ बढ़ता था।
राजस्व की अत्यधिक माँग और अपनी भूसम्पदा की नीलामी से जमींदार तंग आ गये थे। इससे बचने के लिए जमींदारों ने नया षड्यंत्र सोच लिया। संपदा की फर्जी बिक्री ऐसी ही एक रणनीति थी।
बर्द्धमान के राजा ने पहले तो अपनी जमीदारी का कुछ भाग अपनी माँ के नाम कर दिया क्योंकि कंपनी ने नियम बनाया था कि स्त्रीयों की सम्पत्ति को छीना नहीं जायेगा।
कुछ दिनों के बाद लोगों ने बोली लगाना बंद कर दिया। कंपनी को कम दाम पर जमीन जमींदार को बेचनी पड़ी।

मुख्य बिंदु:

• जमींदारों ने लठ्यालों का प्रयोग करके नए खरीदारों को अपनी संपत्ति से दूर रखा।
• फर्जी बिक्री और बेनामी लेनदेन के जरिए नीलामी को असफल बनाया गया।
• महिलाओं के नाम संपदाएं करके कंपनी के नियमों का लाभ उठाया गया।

आम गलतियाँ:

• छात्र केवल कानूनी तरीकों का उल्लेख करते हैं, जबकि जमींदारों ने बल और चालाकी का भी सहारा लिया था।
• 'फर्जी बिक्री' की अवधारणा को ठीक से स्पष्ट न करना।
• उत्तर में ऐतिहासिक घटनाओं (जैसे बर्द्धमान के राजा का उदाहरण) को छोड़ देना।

Exam Tips:

a) लठ्यालों के प्रयोग और फर्जी नीलामी जैसे बिंदुओं को अलग-अलग स्पष्ट करें।
b) बर्द्धमान के राजा के उदाहरण का उल्लेख करना न भूलें।
c) भाषा को औपचारिक और इतिहास के अनुकूल रखें।

 

Question 3: पहाड़िया लोगों ने बाहरी लोगों के आगमन पर कैसी प्रतिक्रिया दर्शाई?

Answer:

अठारहवीं शताब्दी में पहाड़ी लोगों को पहाड़िया कहा जाता था। वे राजमहल की पहाड़िया के आस-पास रहते थे। पहाड़िया लोग बाहर से आने वाले लोगों को संदेह और विश्वास की दृष्टि से देखते थे। जब संथाल राजमहल की पहाड़ियों पर बसे तो पहले पहाड़िया लोगों ने इसका प्रतिरोध किया। परंतु धीरे-धीरे उन्हें पहाड़ियों में भीतर की ओर चले जाने के लिए मजबूर कर दिया गया। उन्हें निचली पहाड़ियों तथा घाटियों में नीचे की ओर आने से रोक दिया गया। अतः वे ऊपरी पहाड़ियों के बढ़नों एवं अधिक बंजर प्रदेशों तथा भीतरी शुष्क भागों तक सीमित होकर रह गए। इसका उनके रहन-सहन पर तथा जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ा। स्थायी कृषि विस्तार के साथ बाहरी लोगों their बीच संघर्ष तेज हो गया था। वे ग्रामवासियों का अनाज और पशु झपटने लगे। पहाड़ियाों के लिए एक नया खतरा इनके क्षेत्रों में संथालों का प्रवेश बन गया। जहाँ कुदाल पहाड़ियों की रक्ष क थीं, वहीं हल संथालों का सुदृढ़ अस्त्र बन गया। अब इन दोनों के बीच संघर्ष शुरू हो गया।

मुख्य बिंदु:

• पहाड़ियों ने बाहरी लोगों के आगमन को अपनी जीवनशैली और आजीविका पर खतरे के रूप में देखा।
• शुरुआत में उन्होंने बाहरी लोगों का कड़ा प्रतिरोध किया और उन पर हमले किए।
• बाद में अंग्रेजों और संथालों के दबाव के कारण उन्हें भीतरी शुष्क पहाड़ियों तक सीमित होना पड़ा।

आम गलतियाँ:

• पहाड़िया और संथालों के बीच के संघर्ष को स्पष्ट रूप से अलग न करना।
• पहाड़िया लोगों के शुरुआती प्रतिरोध के कारणों को न समझाना।
• उनके भौगोलिक विस्थापन (निचले इलाकों से ऊपरी पहाड़ियों तक) का सही वर्णन न करना।

Exam Tips:

a) पहाड़िया लोगों के संदेह और प्रतिरोध के भाव को प्रमुखता से लिखें।
b) उनके विस्थापन और जीवन पर पड़े प्रभाव का वर्णन करें।
c) 'कुदाल' और 'हल' के प्रतीक का अंतर स्पष्ट करें।

 

Question 4: संतालों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह क्यों किया?

Answer:

संथाल 1780 के दशक के आस-पास बंगाल में आने लगे थे। जमींदार लोग खेती के लिए नयी भूमि तैयार करने तथा खेती का विस्तार करने के लिए उन्हें किराए पर रखते थे और ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें जंगल महालों में बसने का निमंत्रण दिया। जब ब्रिटिश लोग पहाड़ियों को अपने बस में करने के कृषि के लिए एक स्थान पर बसाने में असफल रहे तो उनका ध्यान संथालों की ओर गया। पहाड़िया लोग जंगल काटने के लिए हल को हाथ लगाने को तैयार नहीं थे। संथालों को जमीनें देकर राजमहल की तलहटी में बसने के लिए तैयार कर लिया गया। 1832 तक जमीन के एक बड़े इलाके को दामिन-इ-कोह के रूप में सीमांकित कर दिया गया। इसे संथालों की भूमि घोषित कर दिया गया। जब संथाल राजमहल की पहाड़ियों पर बसे तो पहले पहाड़िया लोगों ने इसका प्रतिरोध किया तथा इन पहाड़ियों में अंदर की ओर चले जाने के लिए मजबूर कर दिया गया। उन्हें निचली पहाड़ियों तथा घाटियों में नीचे की ओर आने से रोक दिया गया। ऊपरी पहाड़ियों के चट्टानी और अधिक बंजर इलाकों तथा भीतरी शुष्क भागों तक सीमित कर दिया गया। इससे उनके रहन-सहन तथा जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ा तथा आगे चलकर वे गरीब हो गए। झूम खेती नयी से नयी जमीने खोजने तथा भूमि की प्राकृतिक उर्वरता का उपयोग करने की क्षमता पर निर्भर रहती है। अब सर्वाधिक उर्वर जमीनें उनके लिए दुर्लभ हो गये क्योंकि वे अब दामिन का हिस्सा बन चुकी थीं। जब इस क्षेत्र के जंगल खेती के लिए साफ कर दिए तो पहाड़िया शिकारियों को भी समस्या का सामना करना पड़ा। इसके विपरीत संथाल लोगों ने अपनी पहले वाली खानाबदोश जिंदगी को छोड़ दिया था। संथालों ने बहुत ही जल्दी यह समझ लिया कि उन्होंने जिस भूमि पर खेती करनी शुरू की थी वह उनके हाथों से निकलती जा रही थी। 1850 ई. के दशक संथाल लोग स्वायत्त शासन चाहते थे परंतु ब्रिटिश सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी। परिणामस्वरूप संथालों ने विद्रोह कर दिया। 1855-56 के संथाल विद्रोह के बाद संथाल परगने का निर्माण कर किया गया। इस प्रकार उनका क्षेत्र सीमित कर दिया गया।

मुख्य बिंदु:

• संथालों को बंगाल में लाकर दामिन-इ-कोह क्षेत्र में बसाया गया था ताकि वे खेती करें।
• साहूकारों, व्यापारियों (दिकू) और ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा उनका अत्यधिक शोषण किया जाने लगा।
• भारी कर, ऋण जाल और उनकी स्वायत्तता पर हमले ने उन्हें 1855-56 के विद्रोह के लिए विवश किया।

आम गलतियाँ:

• केवल बाहरी लोगों (दिकुओं) को कारण बताना और ब्रिटिश नीतियों की अनदेखी करना।
• दामिन-इ-कोह क्षेत्र के गठन और उसके प्रभावों को भूल जाना।
• विद्रोह के वर्ष (1855-56) और उसके परिणाम (संथाल परगना का निर्माण) का उल्लेख न करना।

Exam Tips:

a) संथालों के बंगाल में बसने से लेकर विद्रोह तक की क्रमिक कहानी स्पष्ट लिखें।
b) साहूकारों और अंग्रेजों के शोषणकारी रवैये को बिंदुओं में दर्शाएं।
c) विद्रोह के परिणाम (संथाल परगना) का उल्लेख अवश्य करें।

 

Question 5: दक्खन के रैयत ऋणदाताओं के प्रति क्रुद्ध क्यों थे?

Answer:

ऋणदाता किसानों को कई प्रकार से ठगते थे। 1870 ई. में दक्खन के रैयत ऋणदाताओं के प्रति बहुत क्रुद्ध थे। ऋणदाता देहात के प्रथागत मानकों अर्थात रूढ़ि रिवाजों का भी उल्लंघन कर रहे थे। जैसे कि ब्याज मूलधन से अधिक नहीं लिया जा सकता था फिर भी ऋणदाता इन मानकों को नहीं मानते थे। ऋणदाता 100 रु. के मूलधन पर 200 रु. से अधिक ब्याज लगा रखा था। यदि ऋणदाता, ऋण देने से इंकार कर देते थे तो रैयत समुदाय बहुत क्रुद्ध हुआ। किसानों को यह लगता था कि ऋणदाता इतना संवेदनशील हो गए हैं कि उनकी हालत पर तरस नहीं खाता। ऋण का भुगतान किए जाने के समय वे रैयत को उसकी रसीद नहीं देते थे। जब भारत से इंग्लैण्ड में कपास का निर्यात हो रहा था। महाराष्ट्र के निर्यात व्यापारी और साहूकार बहुत ऋण दे रहे थे। अमेरिका में गृहयुद्ध समाप्त होने से और इंग्लैण्ड में कपास का निर्यात पुनः होने से ऋणदाता ऋण देने में उत्सुक नहीं रहे। इसलिए दक्खन के रैयत क्रुद्ध हो गए।

मुख्य बिंदु:

• साहूकार और ऋणदाता पारंपरिक नियमों और ब्याज की सीमाओं का उल्लंघन कर रहे थे।
• किसानों को ऋण चुकाने के बाद भी रसीद नहीं दी जाती थी और ऋण जाल में फंसाया जाता था।
• अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद कपास का निर्यात घटने से साहूकारों ने और अधिक ऋण देने से मना कर दिया।

आम गलतियाँ:

• केवल अधिक ब्याज को कारण बताना, जबकि धोखेबाजी और रसीद न देना भी मुख्य कारण था।
• अमेरिकी गृहयुद्ध के प्रभाव को कृषि ऋणों से न जोड़ पाना।
• रैयतों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का गलत आकलन करना।

Exam Tips:

a) ऋणदाताओं द्वारा पारंपरिक मानकों के उल्लंघन के उदाहरण दें।
b) अमेरिकी गृहयुद्ध और कपास के व्यापार के पतन के संबंध को स्पष्ट करें।
c) किसानों के असंतोष के आर्थिक कारणों को बिंदुवार लिखें।

 

Question 6: इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद बहुत-सी जमीदारियाँ क्यों नीलाम कर दी गई?

Answer:

लार्ड कार्नवालिस द्वारा 22 मार्च 1793 ई. में इस्तमरारी बंदोबस्त लागू की गई थी। भूराजस्व की इस पद्धति को स्थायी बंदोबस्त तथा जमीदारी प्रथा या इस्तमरारी बंदोबस्त भी कहा जाता था। स्थयी बंदोबस्त अथवा इस्तमरारी बंदोबस्त ईस्ट इंडिया कंपनी और बंगाल के जमींदारों के बीच कर वसूलने से संबंधित एक स्थायी व्यवस्था हेतु सहमति समझौता था। इस व्यवस्था के अंतर्गत जमींदारों को एक निश्चित राशि पर भूमि दी गई थी।
जमींदारों को यह निश्चित राशि एक निश्चित समय को सूर्यास्त के पहले से चुका देनी पड़ती थी नहीं तो उनकी जमीन नीलाम कर दी जाती थी। नीलामी के समय अधिक भूमि शहर के धनी वर्ग के लोगों ने ले लिया जिन्हें कृषि का कोई अनुभव ही नहीं था। यह लोग किसानों से बहुत अधिक राजस्व लेते थे। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष यह था कि किसान पूर्ण रूप से जमींदारों से दया पर आश्रित हो गया।
किसानों का जमीन पर से सभी मालिकाना हक छीन लिया गया। इसके बुरे परिणाम यह हुआ कि कृषि उपज कम हो गई। राजस्व वसूली के समय जमींदार का अधिकारी जिसे सामान्य रूप से अमला कहा जाता था वह ग्राम में जाता था। जमींदारों को खेती करने वाले किसानों से कर वसूलने का अधिकार था। लेकिन बहुत से जमींदार रैयतों से समय पर कर वसूल कर पाने के कारण पूरी राजस्व राशि नहीं चुका पाते थे। कुछ जमींदार जान-बुध्कर भी राजस्व नहीं देते थे। इसलिए, उन पर बकाया राशि लगातार बढ़ती रहती। कंपनी को लंबे समय तक यह सहन नहीं हुआ तथा राजस्व घाटे को पूरा करने के लिए अधिकतर जमींदारियाँ नीलाम कर दी गईं।

मुख्य बिंदु:

• इस्तमरारी बंदोबस्त (स्थाई बंदोबस्त) के तहत राजस्व की मांग बहुत अधिक थी जिसे चुकाना कठिन था।
• 'सूर्यास्त कानून' के तहत निश्चित समय पर कर न चुकाने पर जमींदारियां तुरंत नीलाम कर दी जाती थीं।
• शुरुआती वर्षों में कृषि उपज की कीमतें कम होने के कारण रैयत जमींदारों को समय पर लगान नहीं दे पाते थे।

आम गलतियाँ:

• सूर्यास्त कानून के नियमों और उसके प्रभाव को ठीक से न समझाना।
• जमींदारों की विफलता के आर्थिक कारणों की उपेक्षा करना।
• बंदोबस्त लागू करने वाले गवर्नर-जनरल (लॉर्ड कार्नवालिस) या वर्ष (1793) का गलत उल्लेख करना।

Exam Tips:

a) लॉर्ड कार्नवालिस और वर्ष 1793 का स्पष्ट उल्लेख करें।
b) 'सूर्यास्त कानून' की परिभाषा और उसके प्रभावों को रेखांकित करें।
c) जमींदारों के राजस्व चुकाने में असफल रहने के कारणों को स्पष्ट करें।

 

Question 7: पहाड़िया लोगों की आजीविका संथालों की आजीविका से किस रूप में भिन्न थी?

Answer:

पहाड़िया लोगों की आजीविका संथालों की आजीविका से निम्न प्रकार से भिन्न थी:
पहाड़िया लोग गुजारे वाली तथा खाद्य पदार्थों की खेती ज्यादा करते थे। इसके विपरीत संथाल लोग व्यावसायिक तथा नकदी फसलों की खेती करते थे।
पहाड़िया लोग जंगल साफ करने और खेती करने के लिए कुदाल का प्रयोग करते थे। वे जंगल काटने के लिए हल का प्रयोग नहीं करते थे तथा उपद्रवी थे। जबकि संथाल आदर्शन आदर्श बाशिंदे थे, क्योंकि उन्हें जंगलों का सफ़रनामा करने में कोई हिचक नहीं थी और वे भूमि की गहरी जुताई करते थे।
अठारहवीं शताब्दी के परवर्ती दशकों के राजस्व अभिलेखों से ज्ञात होता है कि पहाड़िया जंगल की उपज से अपनी जीविका चलाते थे तथा झूमकर खेती करते थे। जंगल को साफ करके बनाई गई जमीन पर लोग खाने प्रकार की दालें तथा ज्वार-बाजरा उगा लेते थे। संथाल लोग स्थायी खेती करते थे। वे परिश्रम से जंगल को साफ करके खेतों की जुताई करते थे। इनकी जमीन चट्टानी थी लेकिन उपजाऊ थी। बुकानन के अनुसार वहाँ तंबाकू और सरसों की अच्छी खेती होती थी।

मुख्य बिंदु:

• पहाड़िया लोग मुख्य रूप से झूम कृषि और जंगल के उत्पादों पर निर्भर थे तथा 'कुदाल' का प्रयोग करते थे।
• संथाल लोग स्थायी कृषि करते थे और भूमि की गहरी जुताई के लिए 'हल' का प्रयोग करते थे।
• पहाड़िया खाद्य फसलों को प्राथमिकता देते थे जबकि संथालों ने नकदी फसलों का भी उत्पादन किया।

आम गलतियाँ:

• कुदाल और हल के प्रतीकात्मक अंतर को स्पष्ट रूप से न बताना।
• दोनों समुदायों की कृषि पद्धतियों (झूम बनाम स्थायी) में अंतर न स्पष्ट करना।
• केवल भौगोलिक स्थिति लिखकर आजीविका के अंतर की उपेक्षा करना।

Exam Tips:

a) दोनों की कृषि तकनीकों (कुदाल और हल) की तुलना स्पष्ट करें।
b) झूम खेती और स्थायी खेती के अंतर को बिंदुओं में बताएं।
c) दोनों के खान-पान और फसल उत्पादन की भिन्नता का उल्लेख करें।

 

Question 8: अमरीकी गृहयुद्ध ने भारत में रैयत समुदाय के जीवन को कैसे प्रभावित किया?

Answer:

अमेरिकी गृहयुद्ध शुरू होने से कपास की कीमतों में वृद्धि हुई, जिससे कारण कपास की माँग भारत में भी बढ़ गई। कपास में तेजी आने से मुंबई के व्यापारियों द्वारा ज्यादा लाभ कमाने के लिए तथा कपास की खेती के लिए रैयतों को बढ़ावा दिया जाने लगा, इससे किसानों को भारी मात्र में ऋण मिलने लगा। इन ऋणों में ज्यादातर ऋण दीर्घकालीन था। ऋणों के मिलने से रैयतों की खेती के सामान जैसे- हल, बीज, बैल इत्यादि खरीदने में आसानी हो गई। सामानों का अधिक मात्रा में उत्पादन होने लगा। इसका लाभ किसानों के साथ-साथ सभी व्यापारियों को भी प्राप्त हुआ।
ब्रिटेन के सूती वस्त्र निर्माता अमरीका कपास पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए काफी समय से कपास आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत की खोज कर रहे थे। भारत की भूमि तथा जलवायु दोनों ही कपास की खेती हेतु उपयुक्त थी। 1861 ई. में अमरीकी गृहयुद्ध शुरू हो जाने की वजह से ब्रिटेन ने भारत को आधिकारिक कपास निर्यात का संदेश भेजा। जब बाजार में तेजी आती है तो ऋण सरलता से मिल जाता है, क्योंकि ऋणदाता अपनी उधार दी गई राशियों के वसूली के बारे में ज्यादा आश्वस्त रहता है।
दक्खन के गाँवों के रैयतों को अचानक असीमित ऋण उपलब्ध होने लगा। साहूकार भी लंबे समय तक ऋण देने के लिए एकदम तैयार हो गए। जब अमरीका में संकट की स्थिति बनी रही तब तक बंबई दक्खन में कपास का उत्पादन बढ़ता गया।

मुख्य बिंदु:

• अमेरिकी गृहयुद्ध के कारण ब्रिटेन में अमेरिकी कपास का आयात बंद हो गया और भारतीय कपास की मांग अचानक बढ़ गई।
• भारतीय किसानों और रैयतों को कपास उगाने के लिए आसानी से बड़े पैमाने पर ऋण मिलने लगे।
• शुरुआती दौर में किसानों को भारी मुनाफा हुआ, लेकिन युद्ध समाप्त होने पर ऋण का संकट गहरा गया।

आम गलतियाँ:

• केवल ऋण मिलने की बात लिखना और अमेरिकी गृहयुद्ध के वैश्विक प्रभाव को छोड़ देना।
• यह भूल जाना कि शुरुआती दौर में किसानों और साहूकारों दोनों को इससे भारी आर्थिक लाभ हुआ था।
• कपास बाजार की अनिश्चितता और उसके बाद के परिणामों का उल्लेख न करना।

Exam Tips:

a) अमेरिकी गृहयुद्ध (1861) के कारण भारतीय कपास की मांग में वृद्धि को स्पष्ट करें।
b) ऋणों की उपलब्धता और किसानों की स्थिति में आए बदलाव का वर्णन करें।
c) उत्तर को कारण और प्रभाव के रूप में तार्किक ढंग से प्रस्तुत करें।

 

Question 9: किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के बारे में क्या समस्याएँ आती है?

Answer:

किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के बारे में आने वाली समस्याएँ:
सरकारी स्रोत सरकार के कार्यों से सम्बद्ध होते हैं। किसानों के बारे में इनसे विस्तृत और सही रिपोर्ट नहीं मिलती है। सरकारी स्रोत घटनाओं के बारे में में सरकारी सरोकार तथा अर्थ प्रतिबिंबित करते हैं।
उदाहरण के लिए दक्खन दंगा आयोग से विशिष्ट रूप से यह जाँच करने के लिए कहा गया था कि सरकारी राजस्व की माँग का स्तर विद्रोह का कारण था। सरकारी स्रोत वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष वर्णन नहीं करते अतः उनके द्वारा प्रस्तुत विवरणों को पूरी तरह सत्य नहीं माना जा सकता। सरकारी स्रोतों की सहानुभूति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के प्रति ही उत्तरदायी होते थे। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से यह कहा गया कि सरकारी माँग किसानों का क्रोध का कारण बिल्कुल नहीं था। परंतु आयोग इस प्रकार की टिप्पणी करते हुए यह भूल गया कि आखिर किसान साहूकारों की शरण में जाते क्यों थे? वास्तव में, सरकार द्वारा निर्धारित भू-राजस्व की दर इतनी अधिक थी और वसूली के तरीके इतने कठोर थे कि किसान को मजबूरीवश साहूकार की शरण में जाना ही पड़ता था। इससे यह स्पष्ट होता है कि किसान इतिहास लेखन में सरकारी स्रोतों का उपयोग करते हुए कुछ बातों का विशेष रूप से ध्यान रखा जाना चाहिए।

मुख्य बिंदु:

• सरकारी रिपोर्टें हमेशा औपनिवेशिक दृष्टिकोण से लिखी जाती थीं और अधिकारियों के हितों को दर्शाती थीं।
• दक्खन दंगा आयोग जैसी रिपोर्टों ने राजस्व की अधिकता को विद्रोह का कारण मानने से इंकार कर दिया था।
• ये स्रोत किसानों की वास्तविक पीड़ा, आक्रोश और उनकी समस्याओं के मूल कारणों को छुपाते थे।

आम गलतियाँ:

• सरकारी स्रोतों को पूर्णतः सत्य मान लेना और उनकी आलोचनात्मक समीक्षा न करना।
• दक्खन दंगा आयोग के निष्कर्षों और उसके पूर्वाग्रहों को स्पष्ट न करना।
• किसानों के दृष्टिकोण को सरकारी दस्तावेजों में न खोज पाने की सीमा का उल्लेख न करना।

Exam Tips:

a) सरकारी स्रोतों के पक्षपातपूर्ण रवैये (औपनिवेशिक हित) को स्पष्ट रूप से समझाएं।
b) दक्खन दंगा आयोग के उदाहरण का उपयोग करके इतिहासकार की सतर्कता को दर्शाएं।
c) निष्कर्ष में यह बताएं कि इतिहासकारों को अन्य स्रोतों (मौखिक, लोकगाथा, स्थानीय खाते) पर भी क्यों निर्भर रहना चाहिए।

 

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