Download NCERT Solutions for Class 12 History Chapter 06 भक्ति सूफी परंपराएँ
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Question 1: उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए कि संप्रदाय के समन्वय से इतिहासकार क्या अर्थ निकालते हैं?
Answer:
संप्रदाय के समन्वय से इतिहासकार यह अर्थ निकालते हैं कि अलग-अलग पूजा प्रणालियों का एक-दूसरे के प्रति सम्मान व सहिष्णुता की भावना।
पौराणिक ग्रंथों का संकलन, रचना तथा संरक्षण से ब्राह्मणीय विचारधारा के प्रभाव की थी।
इतिहासकारों का विचार है कि पूरे महाद्वीप में धार्मिक विचारधाराएँ एक-दूसरे के साथ संवाद की ही परिणाम हैं।
समन्वय की इस प्रक्रिया का सबसे अच्छा उदाहरण आधुनिक उड़ीसा में स्थित पुरी में मिलता है।
बारहवीं शताब्दी तक आते-आते यहाँ के प्रमुख देवता जगन्नाथ को विष्णु का रूप मान लिया गया था।
इतिहासकारों के अनुसार यहाँ दो प्रक्रियाएँ चल रही थीं।
पहली परंपरा के ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में थे जो वैदिक विद्या से विहीन स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी ग्राह्य थे।
दूसरी परंपरा, स्त्रियाँ व अन्य सामाजिक वर्गों के बीच स्थानीय स्तर पर विकसित हुई विश्वास प्रणालियों पर आधारित थी।
समन्वय के ऐसे उदाहरण देवी संप्रदायों में भी मिलते हैं।
देवी की पूजा तथा उपासना अधिकतर सिंदूर से पोते गए पत्थर के रूप में की जाती थी।
इन स्थानीय देवियों को पौराणिक परंपरा के अंतर प्रमुख देवताओं की पत्नी के रूप में मान्यता दी गई - कभी शिव की पत्नी पार्वती के रूप में प्रकट हुईं।
मुख्य बिंदु:
• संप्रदाय समन्वय का अर्थ अलग-अलग पूजा प्रणालियों में आपसी सम्मान व सहिष्णुता है।
• पुरी में जगन्नाथ की उपासना इसका प्रमुख ऐतिहासिक उदाहरण है।
• वैदिक परंपरा और स्थानीय मान्यताओं का मिश्रण समन्वय को दर्शाता है।
आम गलतियाँ:
• छात्र समन्वय को केवल धर्मों का विलय मान लेते हैं, जबकि यह परस्पर सम्मान व संवाद है।
• जगन्नाथ मंदिर के ऐतिहासिक संदर्भ को स्पष्ट नहीं करते।
• स्थानीय और पौराणिक परंपराओं के अंतर को भूल जाते हैं।
Exam Tips:
a) उत्तर में पुरी के जगन्नाथ मंदिर और देवी संप्रदाय के उदाहरण अवश्य दें।
b) 'सहिष्णुता' और 'संवाद' जैसे मुख्य ऐतिहासिक शब्दों का प्रयोग करें।
c) उत्तर को छोटे बिंदुओं या स्पष्ट पैराग्राफ में विभाजित करें ताकि जाँचने में आसानी हो।
Question 2: किस हद तक उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली मस्जिदों का स्थापत्य स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक आदर्शों का सम्मिश्रण है?
Answer:
एक ही समाज में रहते हुए हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे के रीति-रिवाजों तथा सांस्कृतिक परंपराओं की ओर ध्यान आकर्षित करने लगते हैं।
भारत में इस्लाम के उदय के साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप में नई स्थापत्य कला देखने को मिली है।
इस स्थापत्य कला जैसे - इमारतों, मस्जिदों को देखने से यह जानकारी मिलती है कि इनका निर्माण स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक इस्लाम स्थापत्य कला से जुड़े आदर्शों का सम्मिश्रण था।
उदाहरण:
बांग्लादेश (भारतीय उपमहाद्वीप का हिस्सा) में बनाई गईं 17वीं शताब्दी के प्रारंभ की अतिया नामक मस्जिद ईंटों की बनी है।
इसके छत के तीनों उलटें कटोरे के आकार जैसी बहुत सारी भारतीय और अन्य देशों में निर्मित मस्जिदों के नमूनों से मिलती हैं।
खोज़ा इस्माइली समुदाय के लोगों द्वारा कुरान के विचारों को बताने के लिए देशी साहित्यिक विधा का सहारा लिया गया था।
केरल (मालाबार तट) में निवास करने वाले मुस्लिम व्यापारियों ने स्थानीय मलयालम भाषा को अपनाने के साथ-साथ मातृकुलीनता जैसे स्थानीय आचारों को भी अपनाया था।
मुख्य बिंदु:
• भारतीय मस्जिदों में स्थानीय वास्तुकला और इस्लामी आदर्शों का अनूठा मेल है।
• अतिया मस्जिद (बांग्लादेश) और केरल की मस्जिदों में स्थानीय संस्कृतियों की झलक मिलती है।
• भाषा और पारिवारिक आचार-विचार में भी स्थानीयता को अपनाया गया।
आम गलतियाँ:
• छात्र केवल विदेशी इस्लामी प्रभाव को ही लिख देते हैं, स्थानीय परिपाटी को छोड़ देते हैं।
• विशिष्ट उदाहरणों (जैसे अतिया मस्जिद या केरल के व्यापारी) का उल्लेख नहीं करते।
• स्थापत्य कला के मूल उद्देश्यों को स्पष्ट नहीं कर पाते।
Exam Tips:
a) स्थापत्य कला में स्थानीय और सार्वभौमिक दोनों पक्षों को समान महत्व दें।
b) बांग्लादेश की अतिया मस्जिद और केरल का उदाहरण अवश्य शामिल करें।
c) उत्तर में 'सम्मिश्रण' शब्द पर विशेष बल दें।
Question 3: बेरिया और बारिया सफी परंपरा के बीच एकरूपता और अंतर, दोनों को स्पष्ट कीजिए।
Answer:
बे शरिया और बा शरिया सूफी परंपरा के बीच एकरूपता:
बे शरिया तथा बा शरिया दोनों ही इस्लाम धर्म से संबंधित थे।
बे शरिया तथा बा शरिया दोनों ही इबादत पर अधिक बल देते थे।
दोनों के अनुसार - सर्वोच्च शक्ति केवल एक है - 'अल्लाह'।
बे शरिया और बा शरिया परंपरा में अंतर:
बे शरिया इस्लामी कानून (शरिया) का पालन नहीं करते थे। इसके विपरीत बा शरिया इस्लामी कानून (शरिया) का पालन करते थे।
बे शरिया सफी संत खानकाह (आश्रम) का अपमान (तिरस्कार) करके फ़कीर की जिंदगी व्यतीत करते थे। इसके विपरीत बा शरिया सूफी संत खानकाहों में रहते थे। खानकाहों में पीर अपने शिष्यों (मुरीदों) के साथ रहता था।
मुख्य बिंदु:
• दोनों ही सूफी परंपराएँ इस्लाम और इबादत में विश्वास रखती थीं।
• बा शरिया सूफी संत शरिया कानून का पालन करते थे और खानकाह में रहते थे।
• बे शरिया फकीर शरिया का पालन नहीं करते थे और समाज से अलग जीवन जीते थे।
आम गलतियाँ:
• दोनों शब्दों (बा शरिया और बे शरिया) के अर्थ में भ्रमित हो जाना।
• शरिया कानून के पालन संबंधी अंतर को स्पष्ट न करना।
• खानकाह की भूमिका को गलत लिखना।
Exam Tips:
a) अंतर स्पष्ट करने के लिए तालिका या स्पष्ट बिंदुओं का प्रयोग करें।
b) 'बा' (शरिया के साथ) और 'बे' (शरिया के बिना) के मूल अर्थ को समझकर लिखें।
c) एकरूपता और अंतर दोनों शीर्षकों को अलग-अलग दर्शाएँ।
Question 4: चर्चा कीजिए कि अलवर, नयनार और वीरशैवों ने किस प्रकार जाति प्रथा की आलोचना प्रस्तुत की?
Answer:
अलवार तथा नयनार संतों की रचनाओं को वेद जितना प्रमुख बताया गया है। वीर शैव कर्नाटक से संबंधित थे। वे बासवन्ना के अनुयायी थे। उन्होंने जाति समुदायों के दूषित होने की ब्राह्मणीय अवधारणा का विरोध किया।
अलवार और नयनार तमिलनाडु के भक्ति संत थे। कई इतिहासकारों का मानना है कि अलवार, नयनार संतों ने जाति-प्रथा और ब्राह्मणों के प्रभुत्व के विरोध में भी आवाज उठाई।
अलवार संतों के मुख्य संकलन नलदिरदिवप्रबन्धम का वर्णन तमिल वेद के रूप में किया जाता था।
उन्होंने पुनर्जन्म के सिद्धांत को अस्वीकार किया। ब्राह्मण धर्मशास्त्रों के आचारों जैसे - विधवा पुनर्विवाह, वयस्क विवाह को अस्वीकार किया। इन आकारों को वीरशैवों ने मान्यता दी।
मुख्य बिंदु:
• अलवार, नयनार और वीरशैव संतों ने ब्राह्मणीय जाति व्यवस्था को चुनौती दी।
• तमिल वेदों (नलदिरदिवप्रबन्धम) के माध्यम से स्थानीय भाषाओं को महत्व दिया गया।
• वीरशैवों (बासवन्ना के अनुयायी) ने पुनर्जन्म और सामाजिक कुप्रथाओं का विरोध किया।
आम गलतियाँ:
• संतों के क्षेत्रों (जैसे कर्नाटक और तमिलनाडु) को आपस में मिला देना।
• जाति व्यवस्था के विरोध के ठोस तर्कों को न लिखना।
• वीरशैव आंदोलन के विशेष योगदान को छोड़ देना।
Exam Tips:
a) अलवार-नयनार (दक्षिण भारत) और वीरशैव (कर्नाटक) के संदर्भ को स्पष्ट रखें।
b) सामाजिक असमानता और जाति प्रथा के विरुद्ध उनके दृष्टिकोण को बिंदुवार समझाएँ।
c) बासवन्ना और वीरशैव परंपरा का विशेष उल्लेख करें।
Question 5: कबीर अथवा बाबा गुरु नानक के मुख्य उपदेशों का वर्णन कीजिए। इन उपदेशों का किस तरह संप्रेषण हुआ?
Answer:
कबीर के मुख्य उपदेश:
कबीर ने अंधविश्वासों का घोर विरोध किया।
कबीर ने भक्ति भावना का पूर्ण समर्थन किया।
कबीर ने निर्गुण विचारधारा का समर्थन किया। उन्होंने मूर्ति पूजा का खंडन किया।
उनके अनुसार परमात्मा एक है और वही सत्य है। कबीर के अनुसार भक्ति के माध्यम से ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। कभी-कभी बीज व्यंजन की भाषा का प्रयोग भी किया है। कबीर ने अपने विचारों तथा उपदेशों को काव्य की भाषा में अभिव्यक्त किये जिसे सरलता से समझा जा सकता था।
बाबा गुरुनानक के मुख्य उपदेश:
गुरुनानक देव जी का जन्म पंजाब के ननकाना गाँव में हुआ था। उनका जन्म व्यापारी परिवार में हुआ था।
गुरुनानकदेव जी निर्गुण भक्ति का प्रचार किया।
गुरुनानक देव ने ही इक ओंकार का नारा दिया और कहा था कि सबका पिता एक ही है इसलिए सभी से प्रेम करना चाहिए।
ईमानदारी से मेहनत कर उदरपूर्ति करनी चाहिए। सदैव प्रसन्न रहना चाहिए।
गुरुनानक देव ने अपने विचारों तथा उपदेशों को पंजाबी भाषा में अभिव्यक्त किया। वे शब्द अलग-अलग रागों में गाते थे तथा उनका सेवक मरदाना रबाइ बजाकर उनका सहयोग करता था।
मुख्य बिंदु:
• कबीर और गुरुनानक दोनों ने निर्गुण भक्ति और एकता पर जोर दिया।
• मूर्ति पूजा, जातिभेद और अंधविश्वासों का खंडन किया।
• आम लोगों की बोलचाल की भाषा में अपने उपदेशों का संप्रेषण किया।
आम गलतियाँ:
• सगुण और निर्गुण भक्ति में अंतर स्पष्ट न करना।
• संप्रेषण के माध्यम (जैसे कबीर की साखियाँ या गुरुनानक के पद) का उल्लेख न करना।
• दोनों संतों के उपदेशों को मिला देना।
Exam Tips:
a) किसी एक संत (कबीर या गुरुनानक) के उपदेशों को उसके संप्रेषण के तरीकों के साथ विस्तार से लिखें।
b) 'निर्गुण भक्ति' और 'इक ओंकार' जैसे मुख्य शब्दों का प्रयोग करें।
c) भाषा शैली (जैसे कबीर की उलटबाँतियाँ या गुरुनानक के पद) का जिक्र अवश्य करें।
Question 6: सूफी मत के मुख्य धार्मिक विश्वासों और आचारों की व्याख्या कीजिए।
Answer:
सूफी मत के मुख्य धार्मिक विश्वास और आचारों की व्याख्या इस प्रकार है -
सूफी मत के अनुसार ईश्वर अथवा अल्लाह के अस्तित्व पर ध्यान केंद्रित करके उसके नाम का जाप करने के द्वारा उसकी अराधना करना शामिल है।
सूफियों ने कुरान की व्याख्या अपने निजी अनुभवों के आधार पर की तथा 11वीं शताब्दी तक पहुँचते-पहुँचते सूफीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन था।
सूफी मतानुसार आत्मा शरीर में कैद है। उनके अनुसार परमात्मा की बिना कृपा के आत्मा का मिलन ईश्वर से नहीं हो सकता।
सूफी संत सभी जीवों में मानव को श्रेष्ठ मानते थे।
परमात्मा के साथ एकल प्राप्त करना सूफी का चरम लक्ष्य है।
सूफी मत के अनुसार अपने अच्छे कर्मों के माध्यम से ही उच्च स्थान प्राप्त कर सकता है।
सभी मनुष्यों को भोग-विलास से दूर रहना चाहिए तथा सादा जीवन व्यतीत करना चाहिए।
सूफियों ने अपने आपको जंजीर अथवा सिलसिलों में संगठित किया। हर सिलसिले पर नियंत्रण पीर तथा शेख का होता था।
सूफी मानवतावाद में विश्वास रखते थे।
मुख्य बिंदु:
• सूफी मत ईश्वर के साथ व्यक्तिगत आध्यात्मिक प्रेम और जikr (स्मरण) पर बल देता है।
• पीर-मुरीद (गुरु-शिष्य) परंपरा और खानकाह जीवन प्रणाली इसकी मुख्य विशेषता है।
• सादा जीवन, मानवतावाद और सभी जीवों में ईश्वर का वास मानना इनके प्रमुख आचार हैं.
आम गलतियाँ:
• सूफी मत और रूढ़िवादी इस्लाम के अंतर को ठीक से न समझाना।
• सिलसिलों और पीर-मुरीद संबंध की चर्चा न करना।
• दार्शनिक पक्षों (जैसे आत्मा और परमात्मा का मिलन) को छोड़ देना।
Exam Tips:
a) विश्वास और आचारों को अलग-अलग बिंदुओं में स्पष्ट करें।
b) 'खानकाह', 'सिलसिला' और 'पीर' जैसे तकनीकी शब्दों का प्रयोग करें।
c) सूफियों के उदार और मानवतावादी दृष्टिकोण को उभारें।
Question 7: क्यों और किस तरह शासकों ने नयनार और सूफी संतों से अपने संबंध बनाने का प्रयास किया?
Answer:
शासकों ने नयनार तथा सूफी संतों को अनेक प्रकार से संरक्षण दिया। चिदंबरम्, तंजावुर तथा गंगैकोंडा चोलापुरम के शिव मंदिर चोल सम्राटों के सहयोग से बनाए गए थे। अपने राजस के पद को दैवीय स्वरूप प्रदान करने के लिए चोल शासकों ने नयनार संतों के साथ संबंध बनाने पर बल दिया था चोल और ने उनका समर्थन प्राप्त किया। चोल शासकों ने तमिल भाषा के सेव भजनों का गायन मंदिरों में प्रचलित किया। चोल शासकों ने पत्थर तथा धातु से बनी मूर्तियाँ स्थापित करवाएं। जब दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई तो उलेमा द्वारा शरिया लागू किए जाने की माँग को ठुकरा दिया गया था। सुल्तान जानते थे कि उनकी अधिकांश प्रजा गैर-इस्लामी है। ऐसे समय में सुल्तानों ने सूफी संतों का सहारा लिया जो अपनी आध्यात्मिक सत्ता को अल्लाह के रूप में मानते थे। शासक वर्ग इन संतों की लोकप्रियता तथा विद्वता के कारण उनको समर्थन हासिल करना चाहते थे।
मुख्य बिंदु:
• शासक अपनी राजनीतिक सत्ता को वैध (Legitimate) बनाने के लिए संतों से संबंध बनाते थे।
• चोल शासकों ने शिव मंदिरों के निर्माण और नयनार संतों के संरक्षण से अपनी स्थिति मजबूत की।
• दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों ने सूफियों की लोकप्रियता का लाभ उठाने के लिए उनका समर्थन किया।
आम गलतियाँ:
• दक्षिण भारतीय (चोल-नयनार) और उत्तर भारतीय/सल्तनत (सूफी) संदर्भों को मिला देना।
• शासकों के उद्देश्य (राजनीतिक वैधता) को स्पष्ट न करना।
• ऐतिहासिक उदाहरणों (जैसे चोल मंदिर) का अभाव।
Exam Tips:
a) चोल राजाओं और सूफी संतों के साथ सुल्तानों के संबंधों के अलग-अलग उदाहरण दें।
b) 'राजनीतिक वैधता' और 'आध्यात्मिक सत्ता' जैसे शब्दों का प्रयोग करें।
c) उत्तर को कालक्रम के अनुसार व्यवस्थित करें।
Question 8: उदाहरण सहित विश्लेषण कीजिए कि क्यों भक्ति और सूफी चिंतकों ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया?
Answer:
भक्ति और सूफी चिंतकों ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया। वे अपने विचारों और उपदेशों को लोगों तक अपनी भाषाओं में पहुँचाना चाहते थे। वे जनसामान्य तक अपने विचारों के पहुँचने के लिए स्थानीय भाषा का प्रयोग करते थे। विभिन्न भाषाओं में अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के कारण उनकी रचनाओं को वेदों के समान महत्वपूर्ण स्थान मिला। उत्तरप्रदेश में भक्ति आंदोलन के प्रमुख विचारकों ने अपने विचारों को प्रकट करने के लिए विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया और विशेषकर अपने विचारों को जनसामान्य की भाषा में ही प्रकट किया। जैसे कि कबीर ने अपने पदों में ब्रज, अवधी, हिंदी तथा स्थानीय बोलियों के बहुत से शब्दों का प्रयोग किया। 'कबीर बीजक' वाराणसी तथा उत्तरप्रदेश के स्थानों से संबंधित है और 'कबीर ग्रंथावली' राजस्थान से संबंधित है। पवित्र ग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब में विभिन्न भाषाओँ और बोलियों का प्रयोग किया गया है। वे किसी भी भाषा-विशेष को पवित्र नहीं मानते थे। सामान्यतया जनसामान्य को शांति प्रदान करना चाहते थे।
मुख्य बिंदु:
• संतों ने आम जनता की भाषा (लोकभाषा) को अपनाया ताकि संदेश दूर-दूर तक पहुँचे।
• ब्रज, अवधी, तमिल, पंजाबी जैसी स्थानीय भाषाओं का व्यापक प्रयोग हुआ।
• किसी एक भाषा को विशिष्ठ या पवित्र न मानकर सभी भाषाओं का सम्मान किया गया।
आम गलतियाँ:
• क्षेत्रीय भाषाओं के महत्व को नजरअंदाज करना।
• कबीर या गुरु ग्रंथ साहिब जैसे उदाहरणों का प्रयोग न करना।
• केवल संस्कृत या फारसी तक उत्तर सीमित रखना।
Exam Tips:
a) स्थानीय भाषा अपनाने के पीछे के लोक-कल्याण और संप्रेषण के उद्देश्य को स्पष्ट करें।
b) कबीर की साखियों और गुरु ग्रंथ साहिब का उदाहरण दें।
c) उत्तर में 'जनसामान्य' शब्द का प्रभावी प्रयोग करें।
Question 9: इस अध्याय में प्रयुक्त किन्हीं पाँच स्रोतों का अध्ययन कीजिए और उनमें निहित सामाजिक व धार्मिक विचारों पर चर्चा कीजिए।
Answer:
इस अध्याय में प्रयुक्त पाँच स्रोत निम्नलिखित हैं और उनमें निहित सामाजिक व धार्मिक विचार इस प्रकार हैं -
खम्बात का गिरजाघर - यह स्रोत उस फरमान का अंश है जिसे मुगल सम्राट अकबर ने 1598 ई में जारी किया। इससे इस बात की जानकारी मिलती है कि अकबर धर्मनिरपेक्ष सम्राट था। अकबर ने बलपूर्वक किए जाने वाले धर्मपरिवर्तन पर रोक लगा दी थी।
चतुर्वेदी तथा अस्पृश्य - इस स्रोत से यह पता चलता है कि अलवार संत जाति व्यवस्था को गलत मानते थे अर्थात वे किसी भी प्रकार के भेदभावों में विश्वास नहीं करते थे।
शास्त्र तथा भक्ति - शास्त्र तथा भक्ति के स्रोत के अनुसार अलवार संत विष्णु उपासक थे इस स्रोत से यह स्पष्ट होता है कि अलवार संत दोनों ने ही ब्राह्मणों की जन्म आधारित श्रेष्ठता को अस्वीकार किया।
एक राक्षसी - इस स्रोत से पता चलता है कि तत्कालीन समय में घर के अंदर रहना, मधुर वचन बोलना तथा शांत रहना स्त्री के स्वाभाविक गुण माने जाते थे। अम्माइयार ने स्त्री की पारंपरिक जीवन-शैली को ग्रहण नहीं किया। वह शिव को आराध्य देव मानती थी। स्त्री भक्तों ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को अस्वीकार किया।
अनुष्ठाने और यथार्थ संसार - बासवन्ना जाति से ब्राह्मण थे। वे चालुक्य के दरबार में एक मंत्री थे। बासवन्ना वीरशैव परंपरा के संस्थापक थे। उन्होंने जाति को लेकर होने वाले भेदभावों की कड़ी आलोचना की। उनके अनुसार मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार जन्म नहीं अपितु कर्म होना चाहिए।
मुख्य बिंदु:
• अकबर का गिरजाघर फरमान धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाता है।
• चतुर्वेदी तथा अस्पृश्य स्रोत जातिगत भेदभाव के विरोध को उजागर करता है।
• अम्माइयार और बासवन्ना के उदाहरण पितृसत्ता और जन्म-आधारित श्रेष्ठता को चुनौती देते हैं।
आम गलतियाँ:
• स्रोतों के नाम और उनके ऐतिहासिक निहितार्थों को सही से न लिख पाना।
• सामाजिक और धार्मिक विचारों को अलग-अलग स्पष्ट न करना।
• पाँच स्रोतों के स्थान पर कम स्रोतों की चर्चा करना।
Exam Tips:
a) पाठ्यपुस्तक के बॉक्स/स्रोतों में से स्पष्ट रूप से पाँच अलग-अलग स्रोतों को चुनें।
b) प्रत्येक स्रोत के नीचे उसके सामाजिक और धार्मिक निष्कर्ष को संक्षेप में लिखें।
c) अकबर, अलवार, अम्माइयार और बासवन्ना से जुड़े स्रोतों का चयन करना सबसे आसान रहेगा।
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