NCERT Solutions Class 12 Political Science Politics in India since Independence Chapter 04 Indias External Relations (भारत के विदेश संबंध) in Hindi

Official NCERT Solutions for Class 12 Political Science: Chapter 04 भारत के विदेश संबंध

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Chapter-wise Solutions for Political Science: Chapter 04 भारत के विदेश संबंध

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Question 1: इन बयानों के आगे सही या गलत का निशान लगाएँ:
(क) गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के कारण भारत, सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमरीका, दोनों को सहायता हासिल कर सका।
(ख) अपने पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंध शुरूआत से ही तनावपूर्ण रहे।
(ग) शीतयुद्ध का असर भारत-पाक संबंधों पर भी पड़ा।
(घ) 1971 की शांति और मैत्री की संधि संयुक्त राज्य अमरीका से भारत की निकटता का परिणाम थी।

Answer:

(क) सही
(ख) गलत
(ग) सही
(घ) गलत

मुख्य बिंदु:

• भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई जिससे दोनों महाशक्तियों (सोवियत संघ और अमरीका) से आर्थिक व तकनीकी सहायता प्राप्त की जा सकी।
• शुरुआत में भारत के अपने पड़ोसियों के साथ संबंध सामान्य और सहयोगपूर्ण थे, बाद में कुछ विवाद उत्पन्न हुए।
• शीतयुद्ध के दौरान वैश्विक राजनीति का प्रभाव भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों पर भी स्पष्ट रूप से देखा गया।

आम गलतियाँ:

• छात्रों को लगता है कि गुटनिरपेक्षता का अर्थ दोनों महाशक्तियों से संबंध तोड़ना है, जबकि इसका अर्थ स्वतंत्र विदेश नीति अपनाना है।
• 1971 की संधि को अमरीका के साथ जोड़ देना, जबकि यह सोवियत संघ के साथ हुई थी।
• सभी बयानों को बिना गहराई से पढ़े गलत या सही मान लेना।

Exam Tips:

a) ऐसे बहुविकल्पीय या सत्य/असत्य प्रश्नों को हल करने से पहले अध्याय के मुख्य सिद्धांतों को समझें।
b) प्रत्येक कथन को ऐतिहासिक संदर्भ (जैसे शीतयुद्ध और भारत-सोवियत संबंध) के साथ जाँचें।
c) उत्तर पुस्तिका में स्पष्ट रूप से (क), (ख) लिखकर उनके आगे सही या गलत दर्ज करें।

 

Question 2: निम्नलिखित का सही जोड़ा मिलाएँ:
(क) 1950-64 के दौरान भारत की विदेश नीति का लक्ष्य
(ख) पंचशील
(ग) बांडुंग सम्मेलन
(घ) दलाई लामा
(i) तिब्बत के धार्मिक नेता जो सीमा पार करके भारत चले आए।
(ii) क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा तथा आर्थिक विकास।
(iii) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत
(iv) इसकी परिणति गुटनिरपेक्ष आंदोलन में हुई।

Answer:

(क) - (ii) क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा तथा आर्थिक विकास।
(ख) - (iii) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत
(ग) - (iv) इसकी परिणति गुटनिरपेक्ष आंदोलन में हुई।
(घ) - (i) तिब्बत के धार्मिक नेता जो सीमा पार करके भारत चले आए।

मुख्य बिंदु:

• नेहरू जी के शुरुआती दौर में देश की संप्रभुता और आर्थिक आत्मनिर्भरता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी।
• पंचशील समझौते के तहत देशों के बीच आपसी संबंधों के पाँच बुनियादी सिद्धांतों को अपनाया गया।
• 1955 का बांडुंग सम्मेलन आगे चलकर वर्ष 1961 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के गठन का आधार बना।

आम गलतियाँ:

• मिलान करते समय रेखाओं को आपस में उलझा देना, जिससे जाँचने वाले को भ्रम हो।
• बांडुंग सम्मेलन और पंचशील के सिद्धांतों को आपस में मिला देना।
• ऐतिहासिक घटनाओं के क्रम को सही से न समझ पाना।

Exam Tips:

a) मिलान वाले प्रश्नों में उत्तर हमेशा आमने-सामने लिखकर स्पष्ट करें।
b) प्रत्येक जोड़े के संबंध को वैचारिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर परखें।
c) परीक्षा में तीर के निशान बनाने की बजाय सही विकल्प के सामने उसका सही उत्तर लिखकर दिखाएँ।

 

Question 3: नेहरू विदेश नीति के संचालन को स्वतंत्रता का एक अनिवार्य संकेतक क्यों मानते थे? अपने उत्तर में दो कारण बताएँ और उनके पक्ष में उदाहरण भी दें।

Answer:

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू देश की विदेश नीति को स्वतंत्रता का एक अनिवार्य संकेतक मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि कोई भी देश तभी वास्तव में स्वतंत्र है जब वह अपनी विदेश नीति का निर्धारण स्वयं करे। इसके दो मुख्य कारण और उदाहरण निम्नलिखित हैं:
1. स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता: नेहरू जी के अनुसार यदि कोई देश अपनी विदेश नीति के लिए किसी अन्य शक्तिशाली राष्ट्र पर निर्भर रहता है, तो उसकी स्वतंत्रता अधूरी है। उदाहरण के लिए, 1947 से पहले भारत की विदेश नीति का संचालन ब्रिटिश सरकार करती थी, न कि भारतीय स्वयं।
2. राष्ट्रीय हितों की प्राथमिकता: स्वतंत्र विदेश नीति के माध्यम से देश अपने राष्ट्रीय हितों, क्षेत्रीय अखंडता और आर्थिक विकास को प्राथमिकता दे सकता है। उदाहरण के लिए, गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाकर भारत ने दोनों महाशक्तियों के दबाव से बचते हुए स्वतंत्र रूप से अपने विकास पर ध्यान केंद्रित किया।

मुख्य बिंदु:

• विदेश नीति का स्वतंत्र होना संप्रभु राष्ट्र की पहचान है।
• औपवेशिक शासन के प्रभाव से मुक्त होकर अपने निर्णय लेना।
• महाशक्तियों के सैन्य गुटों से दूरी बनाए रखना।

आम गलतियाँ:

• केवल परिभाषा लिखकर छोड़ देना और उपयुक्त ऐतिहासिक उदाहरण न देना।
• नेहरू जी के दृष्टिकोण को केवल वैचारिक मानकर उसके व्यावहारिक पक्ष की उपेक्षा करना।
• उत्तर को बहुत अधिक लंबा या अप्रासंगिक कर देना।

Exam Tips:

a) उत्तर को बिंदुओं में विभाजित करके लिखें ताकि परीक्षक को पढ़ने में आसानी हो।
b) प्रत्येक तर्क के समर्थन में एक ठोस ऐतिहासिक या तथ्यात्मक उदाहरण अवश्य दें।
c) मुख्य शब्दों जैसे 'संप्रभुता', 'राष्ट्रीय हित' और 'गुटनिरपेक्षता' का सही प्रयोग करें।

 

Question 4: "विदेश नीति का निर्धारण घरेलू जरूरत और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव में होता है।" 1960 के दशक में भारत द्वारा अपनाई गई विदेश नीति से एक उदाहरण देते हुए इस कथन की पुष्टि करें।

Answer:

यह कथन बिल्कुल सत्य है क्योंकि प्रत्येक देश अपनी विदेश नीति तय करते समय घरेलू प्राथमिकताओं और वैश्विक माहौल दोनों को ध्यान में रखता है। 1960 के दशक में भारत को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा जिससे यह कथन पूरी तरह सिद्ध होता है:
1. घरेलू और बाहरी दबाव: इस दशक में भारत को गंभीर आर्थिक संकट, खाद्यान्न की कमी और चीन (1962) तथा पाकिस्तान (1965) के साथ युद्धों का सामना करना पड़ा।
2. रक्षा और विदेश नीति में बदलाव: युद्धों के कारण भारत को अपनी सुरक्षा नीति, उत्तर-पूर्व के क्षेत्रों के प्रति अपनी नीति और सैन्य ढांचे के आधुनिकीकरण पर पुनर्विचार करना पड़ा। साथ ही, अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए हथियारों के आयात और अंतरराष्ट्रीय समर्थन पर ध्यान देना पड़ा।

मुख्य बिंदु:

• घरेलू जरूरतें (आर्थिक विकास, भुखमरी और गरीबी उन्मूलन) विदेश नीति को प्रभावित करती हैं।
• अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ (जैसे शीतयुद्ध और पड़ोसी देशों से संघर्ष) रक्षा नीतियों को बदलती हैं।
• 1960 का दशक भारतीय विदेश नीति के लिए एक कठिन और परिवर्तनकारी दौर था।

आम गलतियाँ:

• केवल घरेलू कारणों का उल्लेख करना और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों को नजरअंदाज करना।
• 1962 के चीन युद्ध या 1965 के पाकिस्तान युद्ध के प्रभाव का स्पष्ट जिक्र न करना।
• उत्तर में कालक्रम (1960 का दशक) की अनदेखी करना।

Exam Tips:

a) प्रश्न में दिए गए उद्धरण को शुरुआत में समझाते हुए अपना उत्तर शुरू करें।
b) 1960 के दशक की प्रमुख घटनाओं (जैसे युद्ध और आर्थिक संकट) को अपने उत्तर का आधार बनाएँ।
c) घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कारकों को अलग-अलग बिंदुओं के रूप में स्पष्ट करें।

 

Question 5: अगर आपको भारत की विदेश नीति के बारे में फैसला लेने को कहा जाए तो आप इसकी किन दो बातों को बदलना चाहेंगे? ठीक इसी तरह यह भी बताएँ कि भारत की विदेश नीति के किन दो पहलुओं को आप बरकरार रखना चाहेंगे। अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए।

Answer:

यदि हमें भारत की विदेश नीति के संदर्भ में निर्णय लेने का अवसर मिले, तो हम निम्नलिखित बदलाव और निरंतरता चाहते हैं:
बदलाव के पहलू:
1. पड़ोसी देशों के साथ नीति में अधिक दृढ़ता और कूटनीतिक सक्रियता: चीन और पाकिस्तान के साथ जिस प्रकार की नीति अपनाई जा रही है, उसमें अधिक प्रभावी और ठोस परिणामों की आवश्यकता है ताकि शत्रुतापूर्ण गतिविधियों पर रोक लग सके।
2. आर्थिक कूटनीति को प्राथमिकता: वैश्विक मंचों पर केवल कूटनीतिक बयानों के बजाय आर्थिक और तकनीकी साझेदारी को अपनी विदेश नीति का मुख्य केंद्र बनाना चाहिए।
बरकरार रखने वाले पहलू:
1. गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत: भारत को स्वतंत्र विदेश नीति और गुटनिरपेक्षता के अपने मूल सिद्धांत को बनाए रखना चाहिए ताकि वह किसी भी महाशक्ति के दबाव में न आए।
2. अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का समर्थन: संयुक्त राष्ट्र के साथ सहयोग जारी रखना और वैश्विक शांति, मानवाधिकारों तथा निशस्त्रीकरण का समर्थन करना भारत की पुरानी परंपरा है जिसे बनाए रखना चाहिए।

मुख्य बिंदु:

• विदेश नीति समय के साथ बदलने और प्रासंगिक रहने की मांग करती है।
• पड़ोसियों के साथ संबंधों को सुधारना आज की सबसे बड़ी कूटनीतिक जरूरत है।
• गुटनिरपेक्षता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व भारत की विदेश नीति की आत्मा हैं।

आम गलतियाँ:

• केवल अपनी पसंद या नापसंद के आधार पर उत्तर लिखना, बिना किसी तार्किक आधार के।
• भारत की वास्तविक विदेश नीति के इतिहास और सीमाओं को नजरअंदाज करना।
• बदलाव और निरंतरता दोनों भागों को स्पष्ट रूप से अलग-अलग न दर्शाना.

Exam Tips:

a) अपने उत्तर को दो स्पष्ट भागों में विभाजित करें: 'क्या बदलना चाहेंगे' और 'क्या बरकरार रखना चाहेंगे'।
b) प्रत्येक बिंदु के पक्ष में मजबूत तार्किक और वैचारिक कारण प्रस्तुत करें।
c) संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए यथार्थवादी सुझाव दें।

 

Question 6: निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:
(क) भारत की परमाणु नीति
(ख) विदेश नीति के मामलों पर सर्व-सहमति

Answer:

(क) भारत की परमाणु नीति: भारत की परमाणु नीति शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल पर आधारित है। नेहरू जी हमेशा से परमाणु हथियारों के खिलाफ थे। भारत ने 1974 में मई के महीने में पहला परमाणु परीक्षण किया जिसे 'शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण' कहा गया। इसके बाद मई 1998 में पोखरण में सिलसिलेवार परमाणु परीक्षण किए गए। भारत की आधिकारिक परमाणु नीति 'पहले उपयोग नहीं' (No First Use) की नीति पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि भारत परमाणु हथियारों का प्रयोग केवल आत्मरक्षा के लिए करेगा।
(ख) विदेश नीति के मामलों पर सर्व-सहमति: भारत में लोकतंत्र की स्थापना के बाद से ही विदेश नीति के बुनियादी मामलों पर देश के प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच एक व्यापक सहमति रही है। भले ही घरेलू राजनीति में दल आपस में तीखी प्रतिस्पर्धा करते हों, लेकिन जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय अखंडता और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश के हितों की आती है, तो लगभग सभी दल एक ही दिशा में सोचते और समर्थन करते हैं।

मुख्य बिंदु:

• भारत की परमाणु नीति शांति और 'पहले उपयोग नहीं' के सिद्धांत पर टिकी है।
• 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षण भारत की तकनीकी और सामरिक क्षमता को दर्शाते हैं।
• राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मुद्दों पर भारत के राजनीतिक दलों में आम सहमति रहती है।

आम गलतियाँ:

• परमाणु नीति को केवल हथियारों की होड़ से जोड़कर देखना और शांतिपूर्ण पक्ष को भूल जाना।
• 'सर्व-सहमति' का अर्थ यह समझ लेना कि दलों में कभी कोई मतभेद ही नहीं होता।
• महत्वपूर्ण वर्षों (जैसे 1974 और 1998) का सही उल्लेख न करना।

Exam Tips:

a) दोनों भागों पर अलग-अलग पैराग्राफ या शीर्षकों के अंतर्गत संक्षिप्त और सटीक टिप्पणियाँ लिखें।
b) परमाणु नीति लिखते समय 'पहले उपयोग नहीं' (No First Use) शब्द का विशेष रूप से प्रयोग करें।
c) सर्व-सहमति के महत्व को समझाते हुए लोकतंत्र और राष्ट्रीय हित के संबंध को स्पष्ट करें।

 

Question 7: भारत की विदेश नीति का निर्माण शांति और सहयोग के सिद्धांतों को आधार मानकर हुआ। लेकिन, 1962-1971 की अवधि यानी महज दस साल में भारत को तीन युद्धों का सामना करना पड़ा। क्या आपको लगता है कि यह भारत की विदेश नीति की असफलता है अथवा इसे अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम मानेंगे? अपने मत के पक्ष में तर्क दीजिए।

Answer:

1962 से 1971 के बीच तीन युद्धों (1962 भारत-चीन युद्ध, 1965 भारत-पाकिस्तान युद्ध और 1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध) का सामना करना पड़ा, लेकिन इसे पूरी तरह से भारत की विदेश नीति की असफलता नहीं माना जा सकता। यह मुख्य रूप से उस दौर की जटिल अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों और क्षेत्रीय भू-राजनीति का परिणाम था। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क हैं:
1. बाहरी आक्रामकता और भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ: 1962 में चीन द्वारा भारत पर किया गया आक्रमण विश्वासघात था, क्योंकि भारत ने हमेशा चीन के साथ मित्रता चाही थी। इसी प्रकार, कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान की आक्रामक नीतियों के कारण युद्ध अनिवार्य हो गए थे।
2. कूटनीतिक सफलता का प्रमाण: 1971 के युद्ध में भारत ने न केवल पाकिस्तान को हराया बल्कि बांग्लादेश के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई। इसके अलावा, सोवियत संघ के साथ 1971 की शांति और मैत्री संधि ने यह साबित किया कि भारत की कूटनीति संकट के समय अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में सक्षम थी।

मुख्य बिंदु:

• शांति और सहयोग के सिद्धांतों के बावजूद पड़ोसी देशों से युद्ध होना कूटनीति की असफलता नहीं बल्कि बाहरी दबाव था।
• शीतयुद्ध के दौर में वैश्विक महाशक्तियों की नीतियों का भारतीय उपमहाद्वीप पर गहरा प्रभाव पड़ा था।
• 1971 का युद्ध भारत की मजबूत होती सैन्य और कूटनीतिक स्थिति का परिचायक था।

आम गलतियाँ:

• युद्धों को केवल भारत की शांति नीतियों की विफलता मान लेना।
• अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों और शीतयुद्ध के प्रभाव की उपेक्षा करना।
• 1971 की सफलता और 1962 की कठिनाई के बीच का अंतर स्पष्ट न करना।

Exam Tips:

a) प्रश्न के दोनों पहलुओं (असफलता बनाम अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति) का मूल्यांकन करते हुए एक संतुलित निष्कर्ष दें।
b) तीनों युद्धों (1962, 1965, 1971) का संक्षेप में संदर्भ देते हुए अपने उत्तर को प्रमाणित करें।
c) तर्कों को स्पष्ट बिंदुओं में प्रस्तुत करें ताकि परीक्षक पर अच्छा प्रभाव पड़े।

 

Question 8: क्या भारत की विदेश नीति से यह झलकता है कि भारत क्षेत्रीय स्तर पर महाशक्ति बनना चाहता है? 1971 के बांग्लादेश युद्ध के संदर्भ में इस प्रश्न पर विचार करें।

Answer:

भारत की विदेश नीति का उद्देश्य कभी भी किसी अन्य देश पर वर्चस्व स्थापित करना या साम्राज्यवादी महाशक्ति बनना नहीं रहा है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय शांति, संप्रभुता और आत्मनिर्भरता रहा है। हालांकि, 1971 के बांग्लादेश युद्ध के संदर्भ में भारत का प्रभाव एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में अवश्य उभरा, जिसे इस प्रकार समझा जा सकता है:
1. मानवीय और नैतिक दायित्व: पाकिस्तान की सेना द्वारा पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के लोगों पर किए जा रहे अत्याचारों और शरणार्थियों के संकट के कारण भारत को हस्तक्षेप करना पड़ा।
2. क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा: भारत ने पाकिस्तान को परास्त कर और बांग्लादेश की मुक्ति में सहायता कर यह साबित कर दिया कि वह दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता बनाए रखने में सक्षम है। यह क्षेत्रीय प्रभुत्व की इच्छा से अधिक उपमहाद्वीप में सुरक्षा और न्याय स्थापित करने का कदम था।

मुख्य बिंदु:

• भारत की विदेश नीति कभी भी आक्रामक महाशक्ति बनने की आकांक्षा नहीं रखती।
• 1971 का युद्ध क्षेत्रीय न्याय, मानवाधिकारों की रक्षा और सुरक्षा का परिणाम था।
• इस युद्ध के बाद दक्षिण एशिया में भारत की रणनीतिक स्थिति काफी मजबूत हुई।

आम गलतियाँ:

• 1971 की सैन्य सफलता को भारत की साम्राज्यवादी या महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा मान लेना।
• पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थी संकट और मानवीय पहलुओं को नजरअंदाज करना।
• क्षेत्रीय शक्ति होने और महाशक्ति बनने के बीच के अंतर को न समझना।

Exam Tips:

a) उत्तर की शुरुआत स्पष्ट रूप से यह बताते हुए करें कि भारत की नीति वर्चस्ववादी नहीं बल्कि शांति और सुरक्षा आधारित है।
b) 1971 के युद्ध के वास्तविक कारणों (शरणार्थी संकट और मानवाधिकार) का विशेष उल्लेख करें।
c) निष्कर्ष में यह स्पष्ट करें कि भारत का प्रभाव उसकी रक्षात्मक और न्यायसंगत नीतियों का परिणाम था।

 

Question 9: किसी राष्ट्र का राजनीतिक नेतृत्व किस तरह उस राष्ट्र की विदेश नीति पर असर डालता है?

Answer:

किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति के निर्धारण और संचालन में वहाँ के राजनीतिक नेतृत्व की विचारधारा, दृष्टिकोण और दूरदर्शिता का बहुत गहरा असर होता है। राजनीतिक नेतृत्व यह तय करता है कि देश वैश्विक मंच पर किस प्रकार की भूमिका निभाएगा। इसके प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं:
1. वैचारिक दृष्टिकोण: नेतृत्व की अपनी राजनीतिक और दार्शनिक सोच विदेश नीति की दिशा तय करती है। उदाहरण के लिए, पंडित जवाहरलाल नेहरू के विचारों ने भारत की विदेश नीति को उपनिवेशवाद विरोध, शांति, और गुटनिरपेक्षता की राह दिखाई।
2. संकट के समय निर्णय क्षमता: नेतृत्व की दृढ़ इच्छाशक्ति अंतरराष्ट्रीय संकटों के समय देश को सुरक्षित रखती है। नेतृत्व के निर्णय ही यह तय करते हैं कि देश कूटनीति के माध्यम से समस्याओं का शांतिपूर्ण समाधान खोजेगा या सैन्य संघर्ष का मार्ग चुनेगा।

मुख्य बिंदु:

• राजनीतिक नेतृत्व की विचारधारा विदेश नीति की रीढ़ होती है।
• नेहरू जी का प्रभाव भारत की शुरुआती विदेश नीति पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
• नेतृत्व की दूरदर्शिता देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मित्र बनाने और संकट से उबरने में मदद करती है।

आम गलतियाँ:

• केवल संस्थाओं और प्रशासनिक तंत्र को विदेश नीति के लिए जिम्मेदार मानना और नेतृत्व की भूमिका को भूल जाना।
• वैचारिक प्रभाव को स्पष्ट रूप से उदाहरण सहित न समझाना।
• उत्तर को बहुत अधिक सैद्धांतिक बना देना।

Exam Tips:

a) नेतृत्व के प्रभाव को समझाने के लिए नेहरू जी का विशिष्ट उदाहरण दें।
b) उत्तर को तार्किक और स्पष्ट बिंदुओं में लिखें।
c) राष्ट्र की संप्रभुता और नेतृत्व के निर्णयों के आपसी संबंध को संक्षेप में स्पष्ट करें।

 

Question 10: निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
गुटनिरपेक्षता का व्यापक अर्थ है। अपने को किसी भी सैन्य गुट में शामिल नहीं करना। इसका अर्थ होता है चीजों को यथासंभव सैन्य दृष्टिकोण से न देखना। अगर कभी इसकी जरूरत पड़े तब भी किसी सैन्य गुट के नजरए को अपनाने की जगह स्वतंत्र रूप से पर विचार करना तथा सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना। - जवाहरलाल नेहरू
(क) नेहरू सैन्य गुटों से दूरी क्यों बनाना चाहते थे?
(ख) क्या आप मानते हैं कि भारत-सोवियत मैत्री की संधि में गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए।
(ग) अगर सैन्य-गुट न होते तो क्या गुटनिरपेक्षता की नीति बेमानी होती?

Answer:

(क) नेहरू सैन्य गुटों से दूरी क्यों बनाना चाहते थे?: नेहरू सैन्य गुटों से दूरी इसलिए बनाना चाहते थे क्योंकि उनका मानना था कि सैन्य गुटों में शामिल होने से देश अपनी स्वतंत्र नीति खो बैठता है और महाशक्तियों का पिछलग्गू बन जाता है। इससे देश की संप्रभुता खतरे में पड़ जाती है और अंतरराष्ट्रीय शांति प्रभावित होती है।
(ख) क्या आप मानते हैं कि भारत-सोवियत मैत्री की संधि में गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए: हाँ, कई आलोचकों का मानना है कि 1971 की भारत-सोवियत मैत्री संधि से गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों का आंशिक उल्लंघन हुआ, क्योंकि इस संधि ने भारत को सोवियत संघ के करीब ला दिया। हालांकि, भारत सरकार का तर्क था कि यह संधि किसी देश के खिलाफ नहीं बल्कि आपातकालीन सुरक्षा और राष्ट्रीय हित के रक्षा के लिए थी।
(ग) अगर सैन्य-गुट न होते तो क्या गुटनिरपेक्षता की नीति बेमानी होती?: नहीं, गुटनिरपेक्षता की नीति केवल सैन्य गुटों के विरोध तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह स्वतंत्र विदेश नीति, उपनिवेशवाद विरोध, रंगभेद नीति का विरोध और वैश्विक शांति व विकास के लिए थी। इसलिए सैन्य गुट न होने पर भी यह नीति उतनी ही प्रासंगिक और महत्वपूर्ण रहती।

मुख्य बिंदु:

• सैन्य गुटों से दूरी बनाए रखना गुटनिरपेक्षता की मूल शर्त है।
• 1971 की सोवियत संधि पर वैचारिक बहस और आलोचनाएँ होती रही हैं।
• गुटनिरपेक्षता का दायरा केवल सैन्य विरोध से कहीं अधिक व्यापक है।

आम गलतियाँ:

• गद्यांश को ध्यान से पढ़े बिना सीधे अपने मन से उत्तर लिख देना।
• उप-प्रश्नों (क, ख, ग) के अलग-अलग उत्तर स्पष्ट रूप से न देना।
• गुटनिरपेक्षता के व्यापक अर्थ को केवल सैन्य गुटों तक सीमित समझ लेना।

Exam Tips:

a) अपठित गद्यांश या उद्धरण आधारित प्रश्नों में पहले गद्यांश को ध्यान से पढ़ें।
b) प्रत्येक भाग (क, ख, ग) का उत्तर अलग-अलग पैराग्राफ में स्पष्ट रूप से दें।
c) अपने तर्कों को ऐतिहासिक तथ्यों (जैसे 1971 की संधि) के साथ जोड़कर लिखें।

 

Political Science Class 12 Curriculum Solutions: Chapter 04 भारत के विदेश संबंध

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