NCERT Solutions Class 12 Political Science Politics in India since Independence Chapter 08 Recent Developments in Indian Politics (भारतीय राजनीति नए बदलाव) in Hindi

Official NCERT Solutions for Class 12 Political Science: Chapter 08 भारतीय राजनीति नए बदलाव

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Chapter-wise Solutions for Political Science: Chapter 08 भारतीय राजनीति नए बदलाव

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Question 1: उत्तरी-ध्रुवी ने अखबार की कुछ कतरनों को बिखेर दिया है। आप उन्हें कालक्रम के अनुसार व्यवस्थित करें.
(क) मंडल आयोग की सिफारिश और आरक्षण विरोधी हंगामा
(ख) जनता दल का गठन
(ग) बाबरी मस्जिद का विध्वंस
(घ) इंदिरा गांधी की हत्या
(ङ) राजम सरकार का गठन
(च) गोधरा की दुर्घटना और उसके परिणाम
(छ) संप्रग सरकार का गठन

Answer:

(घ) इंदिरा गांधी की हत्या (अक्टूबर 1984)
(ख) जनता दल का गठन (1988-1989)
(क) मंडल आयोग की सिफारिश और आरक्षण विरोधी हंगामा (1990)
(ग) बाबरी मस्जिद का विध्वंस (दिसंबर 1992)
(ङ) राजम (राजीव गांधी/राउत/राजनैतिक संदर्भानुसार) सरकार का गठन (तथ्य क्रमानुसार यहाँ अन्य सरकार जैसे वी.पी. सिंह या एनडीए/अन्य सरकार संदर्भ)
(च) गोधरा की दुर्घटना और उसके परिणाम (2002)
(छ) संप्रग (UPA) सरकार का गठन (2004)

मुख्य बिंदु:

• घटनाओं का कालक्रम 1984 से 2004 के बीच की भारतीय राजनीति के बड़े बदलावों को दर्शाता है।
• इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस विरोधी राजनीति और क्षेत्रीय दलों का उभार तेजी से हुआ।
• गठबंधन सरकारों और मंडल-कमंडल की राजनीति ने इस कालखंड को मुख्य रूप से प्रभावित किया।

आम गलतियाँ:

• घटनाओं के वर्षों को आपस में मिला देना।
• मंडल आयोग की सिफारिश (1990) और बाबरी मस्जिद विध्वंस (1992) के सही क्रम को न समझना।
• संप्रग सरकार के गठन के वर्ष 2004 को भूल जाना।

Exam Tips:

a) ऐसे प्रश्नों में प्रत्येक घटना का वर्ष मन में या रफ कार्य में लिख लें।
b) कालक्रम व्यवस्थित करते समय वर्णमाला क्रम (क, ख, ग...) के अनुसार उत्तर की सूची बनाएं।
c) भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण पड़ावों को तिथिवार याद रखना दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों में भी मदद करता है।

 

Question 2: निम्नलिखित में मेल करें:
(क) सर्वसम्मति की राजनीति      (i) शाहबानों मामला
(ख) जाति आधारित दल           (ii) अन्य पिछड़ा वर्ग का उभार
(ग) पर्सनल लॉं और लैंगिक न्याय    (iii) गठबंधन सरकार
(घ) क्षेत्रीय पार्टियों की बढ़ती ताकत    (iv) आर्थिक नीतियों पर सहमति

Answer:

(क) सर्वसम्मति की राजनीति - (iv) आर्थिक नीतियों पर सहमति
(ख) जाति आधारित दल - (ii) अन्य पिछड़ा वर्ग का उभार
(ग) पर्सनल लॉं और लैंगिक न्याय - (i) शाहबानों मामला
(घ) क्षेत्रीय पार्टियों की बढ़ती ताकत - (iii) गठबंधन सरकार

मुख्य बिंदु:

• सर्वसम्मति की राजनीति से तात्पर्य उदारीकरण के बाद मुख्य दलों की आर्थिक नीतियों पर एकमत होने से है।
• शाहबानो मामला पर्सनल लॉ और लैंगिक न्याय से जुड़ा एक ऐतिहासिक कानूनी विवाद था।
• क्षेत्रीय दलों के मजबूत होने से राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ।

आम गलतियाँ:

• मिलान करते समय रेखाओं को गंदा खींचना, इसके बजाय सही जोड़े के सामने उसका विकल्प लिखना बेहतर है।
• शाहबानो मामले को अन्य पिछड़ा वर्ग से भ्रमित कर देना।

Exam Tips:

a) मिलान करने वाले प्रश्नों में उत्तर हमेशा आमने-सामने सही विकल्प लिखकर प्रस्तुत करें।
b) प्रत्येक विकल्प के पीछे के राजनीतिक संदर्भ को समझें।
c) यह प्रश्न एक-एक अंक के बहुविकल्पीय या मिलान वाले प्रश्नों के लिए अति महत्वपूर्ण है।

 

Question 3: 1989 के बाद की अवधि में भारतीय राजनीति के मुख्य मुद्दे क्या रहे हैं? इन मुद्दों के राजनीतिक दलों के आपसी जुड़ाव के क्या रूप सामने आए हैं?

Answer:

1989 के बाद की अवधि को कांग्रेस के पतन और भाजपा के अभ्युदय की अवधि कहा जाता है। इस कालखंड में भारतीय राजनीति में कई मुख्य मुद्दे उभरे:
1. अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का राजनीतिक उभार और मंडल आयोग की सिफारिशों का लागू होना।
2. हिंदुत्व की राजनीति का उभार और अयोध्या विवाद तथा बाबरी मस्जिद विध्वंस।
3. आर्थिक सुधारों (उदारीकरण) की नीति पर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सहमति।
4. क्षेत्रीय दलों का महत्व बढ़ना और गठबंधन सरकारों के युग की शुरुआत।
इन मुद्दों के कारण राजनीतिक दलों के आपसी जुड़ाव में वैचारिक दूरियां कम हुईं और सत्ता प्राप्ति के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रमों पर आधारित गठबंधन बनने लगे।

मुख्य बिंदु:

• 1989 के बाद एक दलीय प्रभुत्व का दौर समाप्त हुआ।
• जाति और धर्म आधारित राजनीति ने चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया।
• आर्थिक नीतियों को लेकर लगभग सभी दल एक ही दिशा में सहमत नजर आए।

आम गलतियाँ:

• केवल एक ही मुद्दे (जैसे सिर्फ गठबंधन) पर उत्तर केंद्रित रखना, जबकि अन्य सामाजिक व आर्थिक मुद्दों को छोड़ देना।
• कालक्रम को स्पष्ट रूप से न दर्शाना।

Exam Tips:

a) उत्तर को बिंदुओं में लिखें ताकि परीक्षक को मुख्य मुद्दे स्पष्ट रूप से दिखाई दें।
b) 'मंण्डल' और 'कमंडल' शब्दों का उचित प्रयोग करें।
c) गठबंधन और आर्थिक सुधारों के बिंदुओं को जोड़कर एक संपूर्ण निष्कर्ष लिखें।

 

Question 4: 'गठबंधन की राजनीति के इस नए दौर में राजनीतिक दल विचारधारा को आधार मानकर गठजोड़ नहीं करते हैं।' इस कथन के पक्ष या विपक्ष में आप कौन से तर्क देंगे?

Answer:

हम इस कथन के विपक्ष में तर्क देना उचित समझते हैं क्योंकि वर्तमान राजनीति में गठबंधन का दौर जरूर है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि विचारधारा का पूरी तरह से अभाव हो गया है।
तर्क:
1. गठबंधन के दौर में भी कई दल न्यूनतम साझा कार्यक्रम (Common Minimum Programme) के तहत वैचारिक सहमति बनाकर सरकार चलाते हैं।
2. 1977 में जनता पार्टी का गठन हो या वामपंथी दलों तथा भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन, सभी ने समय-समय पर व्यावहारिक और वैचारिक तालमेल बिठाया है।
3. राजनीति में कोई भी दल पूरी तरह अछूत नहीं होता; परिस्थितिवश वैचारिक रूप से विरोधी दल भी साझा मुद्दों पर साथ आते हैं ताकि स्थिर शासन दिया जा सके।

मुख्य बिंदु:

• गठबंधन की राजनीति अवसरवादी लग सकती है, पर इसके पीछे राजनीतिक विवशता और व्यावहारिक जरूरतें होती हैं।
• वैचारिक भिन्नता के बावजूद साझा शत्रुओं या मुद्दों के आधार पर दल एकजुट होते हैं।
• क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों का मेल भारतीय लोकतंत्र की विविधता को दर्शाता है।

आम गलतियाँ:

• केवल एक पक्ष (या तो पूरी तरह समर्थन या विरोध) पर अड़े रहना बिना तार्किक कारणों के।
• ऐतिहासिक उदाहरणों (जैसे एनडीए या यूपीए) का उल्लेख न करना।

Exam Tips:

a) अपने उत्तर में 'पक्ष' या 'विपक्ष' स्पष्ट रूप से लिखकर शुरुआत करें।
b) एनडीए (NDA) और संप्रग (UPA) जैसे वास्तविक राजनीतिक गठबंधनों के उदाहरण दें।
c) उत्तर को संतुलित रखें और बताएं कि गठबंधन केवल सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि व्यापक प्रतिनिधित्व का जरिया भी है।

 

Question 5: आपातकाल के बाद के दौर में भाजपा एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी। इस दौर में इस पार्टी के विकास-क्रम का उल्लेख करें।

Answer:

आपातकाल के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का विकास-क्रम निम्नलिखित चरणों में हुआ:
1. 1977 में जनता पार्टी का गठन हुआ जिसमें पूर्ववर्ती जनसंघ भी शामिल था। बाद में 1980 में भारतीय जनसंघ को समाप्त कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का नए रूप में गठन हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले अध्यक्ष बने।
2. शुरुआती दौर में पार्टी ने 'गांधीवादी समाजवादी' को अपनी विचारधारा बनाया। 1986 के बाद राम जन्मभूमि आंदोलन और हिंदुत्व की राजनीति ने पार्टी की केंद्रीय राजनीति को नया मोड़ दिया।
3. 1990 के दशक में भाजपा ने आक्रामक रूप से अपनी स्थिति मजबूत की और 1996 के आम चुनावों में लोकसभा में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी।
4. मई 1996 से लेकर 1999 और फिर 1999 से 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार ने देश का सफल संचालन किया, जिससे भाजपा एक राष्ट्रीय स्तर की सर्वप्रमुख पार्टी बन गई।

मुख्य बिंदु:

• 1980 में भाजपा की औपचारिक स्थापना हुई।
• अयोध्या आंदोलन और हिंदुत्व के मुद्दे ने पार्टी के जनआधार का विस्तार किया।
• गठबंधन राजनीति के सफल प्रयोग से भाजपा ने केंद्र में सरकार बनाई।

आम गलतियाँ:

• भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के वर्षों (1951 और 1980) में भ्रमित होना।
• अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व और एनडीए के गठन का जिक्र न करना।

Exam Tips:

a) विकास-क्रम को कालक्रम (Years wise) के अनुसार क्रमिक चरणों में लिखें।
b) महत्वपूर्ण नेताओं (जैसे अटल बिहारी वाजपेयी) और प्रमुख आंदोलनों (राम मंदिर आंदोलन) का नाम अवश्य लिखें।
c) पार्टी की विचारधारा में आए बदलाव को स्पष्ट रूप से दर्शाएं।

 

Question 6: कांग्रेस के प्रमुत्व का दौर समाप्त हो गया है इसके बावजूद देश की राजनीति पर कांग्रेस का असर लगातार कायम है। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए।

Answer:

हाँ, हम इस कथन से पूर्णतः सहमत हैं कि कांग्रेस के एकदलीय प्रभुत्व का दौर समाप्त हो चुका है, परंतु देश की राजनीति पर कांग्रेस का असर आज भी कायम है। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क हैं:
1. हालांकि 1989 के बाद से केंद्र की सत्ता में कई गैर-कांग्रेस सरकारें आईं, लेकिन कांग्रेस पार्टी आज भी देश की राजनीति का एक केंद्रीय धुरी बनी हुई है।
2. क्षेत्रीय दलों या अन्य राष्ट्रीय दलों की नीतियां और राजनीति अक्सर कांग्रेस के विरोध या समर्थन के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं।
3. आज भी गठबंधन सरकारों के निर्माण में (चाहे वह UPA हो या अन्य रूप) कांग्रेस की उपस्थिति या उसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रहती है।
4. देश के सुदूर इलाकों और विभिन्न राज्यों में कांग्रेस का सांगठनिक ढांचा और वैचारिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

मुख्य बिंदु:

• प्रभुत्व समाप्त होने का अर्थ राजनीतिक अस्तित्व समाप्त होना नहीं है।
• कांग्रेस भारतीय दलीय प्रणाली की मुख्य धुरी रही है जिसके साथ या विरोध में अन्य दल खड़े होते हैं।
• चुनावी राजनीति में कांग्रेस पार्टी का वोट शेयर और उपस्थिति अभी भी मजबूत है।

आम गलतियाँ:

• यह मान लेना कि कांग्रेस का दौर खत्म होने का मतलब उसका राजनीति से पूरी तरह सफाया हो जाना है।
• समकालीन राजनीतिक परिदृश्य के तर्कों को शामिल न करना।

Exam Tips:

a) अपने उत्तर की शुरुआत स्पष्ट रूप से 'सहमत' या 'असहमत' लिखकर करें।
b) तर्कों को बिंदुओं के रूप में प्रस्तुत करें ताकि मूल्यांकन आसान हो।
c) यह स्पष्ट करें कि एकदलीय प्रभुत्व (One-party dominance) और एक महत्वपूर्ण दल के रूप में बने रहने में क्या अंतर है।

 

Question 7: अनेक लोग सोचते हैं कि सफल लोकतंत्र के लिए दो-दलीय व्यवस्था जरूरी है। पिछले तीस सालों के भारतीय अनुभवों के आधार बनाकर एक लेख लिखिए और इसमें भारत की मौजूदा बहुदलीय व्यवस्था के क्या फायदे हैं?

Answer:

भारत की बहुदलीय व्यवस्था के लाभ:
अनेक विचारक यह मानते हैं कि दो-दलीय व्यवस्था लोकतंत्र के संचालन को सरल बनाती है, परंतु भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे देश में बहुदलीय व्यवस्था ही सबसे उपयुक्त है। पिछले तीस वर्षों के भारतीय अनुभवों से यह स्पष्ट हुआ है कि बहुदलीय प्रणाली के निम्नलिखित बड़े फायदे हैं:
1. विभिन्न सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व: भारत में विभिन्न जातियों, धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के लोग रहते हैं। बहुदलीय व्यवस्था के कारण समाज के हर छोटे-बड़े वर्ग को अपनी राजनीतिक अभिव्यक्ति का अवसर मिलता है।
2. व्यापक विकल्प: मतदाताओं के पास वोट देने के लिए विभिन्न विचारधाराओं के अनेक विकल्प होते हैं, जिससे किसी एक दल की तानाशाही की संभावना समाप्त हो जाती है.
3. राष्ट्रीय और क्षेत्रीय संतुलन: बहुदलीय प्रणाली के अंतर्गत प्रांतीय दलों और राष्ट्रीय दलों के बीच का भेद अब इस प्रकार घुल-मुल गया है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सम्मान राष्ट्रीय स्तर पर भी होने लगा है।
4. सामाजिक सुधार का संबल: राजनीतिक दल केवल सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और सुधार के लिए भी क्षेत्रीय स्तर पर कार्य करते हैं।

मुख्य बिंदु:

• बहुदलीय व्यवस्था भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता के अनुकूल है।
• यह प्रणाली तानाशाही को रोकती है और छोटे समूहों को भी आवाज देती है।
• क्षेत्रीय दलों के उदय से संघवाद (Federalism) और मजबूत हुआ है।

आम गलतियाँ:

• केवल दो-दलीय व्यवस्था की वकालत करना और भारत की विविधता को नजरअंदाज करना।
• बहुदलीय व्यवस्था की कमियों (जैसे राजनीतिक अस्थिरता) को ही केवल लिखना, फायदों को छोड़ देना।

Exam Tips:

a) लेख रूपी उत्तर में उचित शीर्षक का प्रयोग करें।
b) भारत की विविधता और संघवाद जैसे शब्दों का प्रभावशाली ढंग से उपयोग करें।
c) पिछले 30 वर्षों के राजनीतिक अनुभवों (गठबंधन और क्षेत्रीय दल) का संक्षेप में हवाला दें।

 

Question 8: निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें:
भारत की दलगत राजनीति ने कई चुनौतियों का सामना किया है। कांग्रेस-प्रणाली ने अपना खात्मा ही नहीं किया, बल्कि कांग्रेस के जमावड़े के बिखर जाने से आत्म-प्रतिनिधित्व की नई प्रवृत्तियों का भी जोर बढ़ा। इससे दलगत व्यवस्था और विभिन्न लोगों के हितों की समाहार करने की क्षमता पर सवाल उठे। राजव्यवस्था के सामने महत्वपूर्ण काम एक ऐसे दलगत व्यवस्था खड़ा करने अथवा राजनीतिक दलों को गढ़ने की है, जो कारगर तरीके से विभिन्न पक्षों के हितों को मुखर और एकजुट करें.... -जोया हसन
(क) इस अध्याय को पढ़ने के बाद क्या आप दलगत व्यवस्था की चुनौतियों की सूची बना सकते हैं?
(ख) विभिन्न पक्षों के हितों का समाहार और उनमें एकजुटता होना क्यों जरूरी है?
(ग) इस अध्याय में आपने अयोध्या विवाद के बारे में पढ़ा है। इस विवाद ने भारत के राजनीतिक दलों की समाहार की क्षमता के आगे क्या चुनौती पेश की?

Answer:

(क) दलगत व्यवस्था की मुख्य चुनौतियाँ:
• पिछड़े वर्गों की राजनीति का उभार और सामाजिक टकराव।
• गठबंधन की राजनीति में अस्थिरता और अवसरवादिता।
• क्षेत्रीय दलों का बढ़ता प्रभाव और राष्ट्रीय दलों का कमजोर होना।
• दल-बदल की प्रवृत्ति और वैادिक सिद्धांतों से समझौता।

(ख) विभिन्न पक्षों के हितों का समाहार और उनमें एकजुटता होना इसलिए जरूरी है क्योंकि इससे राष्ट्र की अखंडता, राष्ट्रीय एकता बनी रहती है तथा राष्ट्र का समग्र विकास हो पाता है। यदि विभिन्न हितों में समन्वय न हो तो समाज में संघर्ष और अलगाव बढ़ सकता है।

(ग) अयोध्या विवाद ने भारत के राजनीतिक दलों के सामने सांप्रदायिकता की गंभीर समस्या खड़ी कर दी थी। इस विवाद ने धार्मिक भावनाओं को भड़काकर राजनीतिक दलों के समक्ष 'सांप्रदायिक वोटबैंक' की राजनीति की ऐसी चुनौती पेश की जिससे समाज का ध्रुवीकरण हुआ और धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को बनाए रखना कठिन हो गया।

मुख्य बिंदु:

• गद्यांश आधारित प्रश्नों में उत्तर हमेशा गद्यांश के संदर्भ और पाठ की समझ के आधार पर लिखें।
• दलगत व्यवस्था की चुनौतियाँ जैसे क्षेत्रीयता, जातिवाद और अवसरवादिता प्रमुख हैं।
• सांप्रदायिक और धार्मिक विवाद देश की एकता के लिए बड़ी चुनौती बनते हैं।

आम गलतियाँ:

• उप-प्रश्नों (क, ख, ग) के उत्तर अलग-अलग स्पष्ट रूप से न लिखकर मिला देना।
• गद्यांश के मूल भाव को समझे बिना अपने मन से कुछ भी लिख देना।

Exam Tips:

a) प्रत्येक उप-प्रश्न का उत्तर अलग पैराग्राफ या बिंदु में स्पष्ट रूप से दें।
b) गद्यांश के मुख्य लेखिका (जैसे जोया हसन) के दृष्टिकोण को ध्यान में रखें।
c) 'समाहार' और 'ध्रुवीकरण' जैसे शब्दों का सही अर्थ समझकर उत्तर में प्रयोग करें।

 

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