Official NCERT Solutions for Class 9 Science: Chapter 08 एक यात्रा परमाणु के भीतर
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Chapter-wise Solutions for Science: Chapter 08 एक यात्रा परमाणु के भीतर
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Question 1: स्वर्ण पर्णिका प्रयोग का वर्णन कीजिए और बताइए कि इसने रदरफोर्ड को परमाणु के नाभिकीय मॉडल तक कैसे पहुँचाया।
Answer:
वर्ष 1911 में गाइगर एवं मार्सडेन ने रदरफोर्ड के निर्देशन में स्वर्ण पर्णिका पर धनावेशित अल्फा कणों की संकीर्ण किरणपुंज की बौछार की।
टॉमसन मॉडल के अनुसार धनावेश समान रूप से वितरित होने के कारण अल्फा कणों को बिना विक्षेपित हुए आर-पार निकल जाना चाहिए था।
परंतु प्रयोग में देखा गया कि अधिकांश कण बिना विक्षेपित हुए सीधे निकल गए, जबकि कुछ कण बड़े कोणों पर विक्षेपित हुए और कुछ पुनः लौट आए।
इस आश्चर्यजनक परिणाम से रदरफोर्ड ने निष्कर्ष निकाला कि परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त है और उसका संपूर्ण धनावेश तथा अधिकांश द्रव्यमान एक अति सूक्ष्म, सघन केंद्र – नाभिक – में केंद्रित होता है, जिसके चारों ओर इलेक्ट्रॉन परिक्रमा करते हैं।
इस प्रकार यह प्रयोग परमाणु के ग्रहीय मॉडल का आधार बना।
मुख्य बिंदु:
• स्वर्ण पर्णिका प्रयोग रदरफोर्ड द्वारा वर्ष 1911 में किया गया था।
• अधिकांश अल्फा कण बिना किसी विक्षेपण के सीधे निकल गए।
• परमाणु का संपूर्ण धनावेश और द्रव्यमान एक अति सूक्ष्म केंद्र (नाभिक) में केंद्रित होता है।
आम गलतियाँ:
• छात्रों द्वारा अल्फा कणों को ऋणावेशित मान लेना।
• अधिकांश कणों के विक्षेपित होने का गलत दावा करना।
• नाभिक के आकार और स्थिति को स्पष्ट न करना।
Exam Tips:
a) प्रयोग के तीनों मुख्य प्रेक्षणों को स्पष्ट रूप से क्रमानुसार लिखें।
b) रदरफोर्ड के निष्कर्षों को बिंदुवार लिखना अधिक प्रभावी होता है।
c) 'नाभिक' शब्द और उसकी विशेषताओं का उल्लेख करना अनिवार्य है।
Question 2: बोर के परमाणु मॉडल के मुख्य अभिगृहीत लिखिए और स्पष्ट कीजिए कि इसने परमाणु के स्थायित्व की समस्या को कैसे हल किया।
Answer:
नील्स बोर ने वर्ष 1913 में प्रस्तावित किया कि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर यादृच्छिक रूप से गति नहीं करते, बल्कि निश्चित वृत्ताकार पथों (कोशों) में गति करते हैं जिन्हें K, L, M, N आदि नामों से दर्शाया जाता है।
प्रत्येक कोश में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा निश्चित होती है, और इन्हीं अनुमत कोशों में गति करते हुए इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का क्षय नहीं करता।
इलेक्ट्रॉन दो कोशों की ऊर्जा के अंतर के बराबर निश्चित मात्रा में ऊर्जा अवशोषित या उत्सर्जित करके ही एक कोश से दूसरे कोश में जा सकता है।
बोर ने स्थायी कक्षाओं की अवधारणा को अभिगृहीत के रूप में प्रस्तुत करके यह स्पष्ट किया कि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर गति करते हुए भी ऊर्जा नहीं खोता, जिससे परमाणु का स्थायित्व स्पष्ट रूप से समझाया जा सका।
मुख्य बिंदु:
• इलेक्ट्रॉन निश्चित ऊर्जा वाले वृत्ताकार पथों (कोशों) में चक्कर लगाते हैं।
• इन कक्षाओं में घूमते समय इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का विकिरण (क्षय) नहीं करते हैं।
• ऊर्जा का आदान-प्रदान केवल एक कोश से दूसरे कोश में संक्रमण के दौरान होता है।
आम गलतियाँ:
• कक्षाओं को ऊर्जाहीन मान लेना जबकि उनकी ऊर्जा निश्चित होती है।
• स्थायित्व के कारण को मैक्सवेल के विद्युत चुम्बकीय सिद्धांत से जोड़कर भ्रमित होना।
• K, L, M, N कोशों के क्रम को गलत लिखना।
Exam Tips:
a) नील्स बोर का वर्ष (1913) और कोशों के नाम अवश्य लिखें।
b) ऊर्जा का क्षय न होने की बात को रेखांकित करें।
c) उत्तर को वैज्ञानिक शब्दावली जैसे 'अभिगृहीत' और 'स्थायी कक्षा' के साथ लिखें।
Question 3: संयोजकता की अवधारणा को इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर समझाइए और सोडियम, ऑक्सीजन तथा कार्बन के उदाहरण दीजिए।
Answer:
परमाणु का बाह्यतम कोश जिसमें इलेक्ट्रॉन होते हैं, संयोजकता कोश कहलाता है, और इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉन संयोजकता इलेक्ट्रॉन कहलाते हैं।
अष्टक (8 इलेक्ट्रॉन) पूर्ण करने हेतु त्यागे गए, ग्रहण किए गए, अथवा साझा किए गए इलेक्ट्रॉनों की संख्या को उस तत्व की संयोजकता कहते हैं।
सोडियम का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \( 2, 8, 1 \) है – यह एक इलेक्ट्रॉन त्यागकर अष्टक प्राप्त करता है, अतः इसकी संयोजकता 1 है।
ऑक्सीजन का विन्यास \( 2, 6 \) है – यह दो इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके अष्टक पूर्ण करता है, अतः इसकी संयोजकता 2 है।
कार्बन का विन्यास \( 2, 4 \) है – यह न तो चार इलेक्ट्रॉन त्याग सकता है और न ग्रहण कर सकता है, इसलिए यह अन्य परमाणुओं के साथ चार इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी करके अष्टक पूर्ण करता है, अतः इसकी संयोजकता 4 है।
मुख्य बिंदु:
• बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉनों को संयोजकता इलेक्ट्रॉन कहते हैं।
• अष्टक प्राप्त करने की प्रवृत्ति संयोजकता निर्धारित करती है।
• धातु इलेक्ट्रॉन त्यागते हैं जबकि अधातु ग्रहण या साझा करते हैं।
आम गलतियाँ:
• इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को गलत लिखना (जैसे सोडियम को \( 2, 9 \) लिखना)।
• संयोजकता और संयोजकता इलेक्ट्रॉनों को एक ही समझ लेना।
• कार्बन की संयोजकता को गलत तरीके से त्यागने या ग्रहण करने के आधार पर बताना।
Exam Tips:
a) तीनों तत्वों (सोडियम, ऑक्सीजन, कार्बन) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास स्पष्ट रूप से दर्शाएं।
b) त्यागने, ग्रहण करने और साझा करने की प्रक्रिया को अलग-अलग समझाएं।
c) 'अष्टक नियम' शब्द का प्रयोग उत्तर में अवश्य करें।
Question 4: समस्थानिक और समभारिक में अंतर स्पष्ट करते हुए दोनों के दो-दो उदाहरण दीजिए तथा समस्थानिकों के व्यावहारिक उपयोग बताइए।
Answer:
समस्थानिक एक ही तत्व के ऐसे परमाणु होते हैं जिनका परमाणु क्रमांक समान होता है परंतु न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न होने के कारण द्रव्यमान संख्याएँ भिन्न-भिन्न होती हैं, जैसे हाइड्रोजन के (प्रोटियम, ड्यूटीरियम, ट्राइटियम) तथा कार्बन के (कार्बन-12, कार्बन-13, कार्बन-14)।
इसके विपरीत समभारिक भिन्न-भिन्न तत्वों के ऐसे परमाणु होते हैं जिनकी द्रव्यमान संख्या समान होती है परंतु परमाणु क्रमांक भिन्न होते हैं — जैसे कैल्सियम व आर्गन (दोनों की द्रव्यमान संख्या 40)।
समस्थानिकों के महत्वपूर्ण उपयोग हैं – यूरेनियम-235 का उपयोग नाभिकीय संयंत्र में ईंधन के रूप में, कोबाल्ट-60 का उपयोग कैंसर के उपचार (रेडियोथेरेपी) में, आयोडीन-131 का उपयोग थायरॉइड कैंसर के उपचार में, और कार्बन-14 का उपयोग पुरातत्व में प्राचीन वस्तुओं की आयु निर्धारण में किया जाता है।
मुख्य बिंदु:
• समस्थानिकों में परमाणु क्रमांक समान लेकिन द्रव्यमान संख्या भिन्न होती है।
• समभारिकों में द्रव्यमान संख्या समान लेकिन परमाणु क्रमांक भिन्न होते हैं।
• समस्थानिकों के चिकित्सा और उद्योग में कई व्यावहारिक उपयोग हैं।
आम गलतियाँ:
• समस्थानिक और समभारिक की परिभाषाओं को आपस में मिला देना।
• उदाहरण लिखते समय परमाणु क्रमांक और द्रव्यमान संख्या का ध्यान न रखना।
• उपयोगों में रेडियोएक्टिव समस्थानिकों के सही नाम न लिखना।
Exam Tips:
a) अंतर स्पष्ट करने के लिए परिभाषा और उदाहरण दोनों दें।
b) कम से कम दो-दो प्रसिद्ध उदाहरण अवश्य लिखें।
c) उपयोगों को बुलेट पॉइंट्स में लिखें ताकि जांचने वाले को आसानी हो।
Question 5: परमाणु मॉडलों के ऐतिहासिक विकास को डाल्टन से लेकर आधुनिक क्वांटम यांत्रिकीय मॉडल तक कालक्रमानुसार व्याख्या कीजिए।
Answer:
वर्ष 1808 में जॉन डाल्टन ने परमाणु को द्रव्य की सबसे छोटी अविभाज्य इकाई माना।
वर्ष 1897 में जे. जे. टॉमसन ने इलेक्ट्रॉन की खोज कर ‘प्लम पुडिंग मॉडल’ प्रस्तावित किया, जिसमें इलेक्ट्रॉन धनावेशित गोले में धँसे होते हैं।
वर्ष 1911 में अर्नेस्ट रदरफोर्ड ने स्वर्ण पर्णिका प्रयोग द्वारा नाभिक की खोज की और ‘ग्रहीय मॉडल’ प्रस्तुत किया, जिसमें इलेक्ट्रॉन धनावेशित नाभिक के चारों ओर परिक्रमा करते हैं, परंतु यह मॉडल परमाणु के स्थायित्व को नहीं समझा सका।
वर्ष 1913 में नील्स बोर ने निश्चित ऊर्जा स्तरों (कोशों) की अवधारणा देकर इस समस्या को हल किया।
तत्पश्चात प्रोटॉन (रदरफोर्ड, नाभिक में) और न्यूट्रॉन (जेम्स चैडविक, 1932) की खोज हुई।
अंततः वैज्ञानिकों ने पाया कि बोर मॉडल भी पूर्णतः सही नहीं था, क्योंकि इलेक्ट्रॉन निश्चित पथ पर गति नहीं करते; अतः आधुनिक क्वांटम यांत्रिकीय मॉडल प्रस्तावित हुआ, जिसके अनुसार इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर ‘इलेक्ट्रॉन अभ्र’ के रूप में रहते हैं और उनकी यथार्थ स्थिति के बजाय केवल संभाव्यता क्षेत्र का अनुमान लगाया जा सकता है।
मुख्य बिंदु:
• डाल्टन से शुरू होकर मॉडल अभाज्य से उप-परमाणु कणों तक विकसित हुए।
• टॉमसन और रदरफोर्ड के मॉडलों ने क्रमशः इलेक्ट्रॉन और नाभिक की खोज की।
• आधुनिक मॉडल में इलेक्ट्रॉनों की निश्चित स्थिति के बजाय 'संभाव्यता क्षेत्र' (इलेक्ट्रॉन अभ्र) की बात की जाती है।
आम गलतियाँ:
• वैज्ञानिकों के नाम और उनके वर्षों के क्रम को आगे-पीछे कर देना।
• आधुनिक क्वांटम मॉडल की जगह केवल बोर मॉडल तक ही उत्तर समाप्त कर देना।
• प्रत्येक मॉडल की मुख्य कमी या विशेषता को न लिखना।
Exam Tips:
a) उत्तर को कालक्रमानुसार (Chronological order) ही लिखें।
b) प्रत्येक वैज्ञानिक (डाल्टन, टॉमसन, रदरफोर्ड, बोर) और उनके द्वारा दिए गए मॉडल का नाम स्पष्ट करें।
c) आधुनिक मॉडल के 'इलेक्ट्रॉन अभ्र' (Electron Cloud) शब्द का उल्लेख जरूर करें।
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