Solutions for Class 12 Biology: Chapter 01 पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन
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Practice Class 12 Biology Solutions: Chapter 01 पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन
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Question 1: एक आवृतबीजी पादप के उन अंगों के नाम बताएँ, जहाँ नर एवं मादा युग्मकोद्भिद का विकास होता है?
Answer:
आवृतबीजी पादप एक पुष्पीय पादप है जिसमें पुष्प जनन अंग होता है। पुष्प में चार प्रमुख चक्र होते हैं:
1. बाह्यदलपुंज: इसका निर्माण बाह्यदल से होता है।
2. दलपुंज: इसका निर्माण दल से होता है।
3. पुमंग: यह पुष्प का नर जनन चक्र है, जिसका निर्माण पुंकेसर से होता है।
4. जायांग: यह पुष्प का मादा जनन चक्र है, जिसका निर्माण अंडप से होता है।
पुंकेसर के परागकोश में परागकण मातृ कोशिका में अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा परागकण (नर युग्मकोद्भिद) का निर्माण होता है।
अंडप के तीन भाग होते हैं: अंडाशय, वर्तिका तथा वर्तिकाग्र। अंडाशय के भीतर बीजांड होता है, जिसमें बीजांडकाय की गुरुबीजाणु मातृ कोशिका से अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित गुरुबीजाणु बनता है, जो आगे चलकर मादा युग्मकोद्भिद अर्थात् भ्रूणकोष का विकास करता है।
मुख्य बिंदु:
• नर युग्मकोद्भिद परागकोश में परागकण के रूप में विकसित होता है।
• मादा युग्मकोद्भिद बीजांड के भीतर भ्रूणकोष के रूप में विकसित होता है।
• पुमंग और जायांग क्रमशः नर और मादा जनन अंग हैं।
आम गलतियाँ:
• परागकण को सीधे नर युग्मकोद्भिद के बजाय केवल एक कोशिका समझ लेना।
• बीजांड और अंडाशय को एक ही संरचना मान लेना।
• अर्द्धसूत्री और समसूत्री विभाजन के स्थानों में भ्रमित होना।
Exam Tips:
a) पादप जनन अंगों के नाम लिखते समय पुमंग (नर) और जायांग (मादा) का स्पष्ट उल्लेख करें।
b) नर तथा मादा युग्मकोद्भिद के विकास स्थलों को अलग-अलग बिंदुओं में समझाएँ।
c) चित्र के माध्यम से इनकी स्थिति को स्पष्ट करना लाभदायक होता है।
Question 2: लघुबीजाणुधानी तथा गुरुबीजाणुधानी के बीच अन्तर स्पष्ट करें। इन घटनाओं के दौरान किस प्रकार का कोशिका विभाजन संपन्न होता है? इन दोनों घटनाओं के अंत में बनने वाली संरचनाओं के नाम बताएँ।
Answer:
लघुबीजाणुधानी तथा गुरुबीजाणुधानी के मध्य मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं:
1. लघुबीजाणुधानी बाह्य त्वचा, मध्य स्तर तथा टैपीटम से घिरी रहती है, जबकि गुरुबीजाणुधानी बाह्य त्वचा अंतःअध्यावरण से घिरी रहती है।
2. इसमें परागकण मातृ कोशिका से सूक्ष्म बीजाणु बनते हैं जो परागकोश के चारों कोनों पर विकसित होते हैं, जबकि इसमें गुरुबीजाणु मातृ कोशिका से गुरुबीजाणु बनते हैं जो अंडाशय में विकसित होते हैं।
3. सूक्ष्म बीजाणु मातृ कोशिका के अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा अनेक परागकणों का निर्माण होता है, जबकि गुरुबीजाणु मातृ कोशिका के अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा गुरुबीजाणुओं का निर्माण होता है।
4. परागकोश के स्फुटन पर परागकण विमुक्त होते हैं और परागकण नर युग्मकोद्भिद बनाते हैं, जबकि गुरुबीजाणु से भ्रूणकोष बनता है जो मादा युग्मकोद्भिद बनाता है।
इन दोनों घटनाओं के दौरान अर्द्धसूत्री विभाजन होता है। लघुबीजाणुजनन के अंत में लघुबीजाणु अथवा परागकण बनते हैं तथा गुरुबीजाणुजनन के अंत में चार गुरुबीजाणु बनते हैं।
मुख्य बिंदु:
• लघुबीजाणुधानी पुंकेसर में और गुरुबीजाणुधानी अंडाशय/बीजांड में पाई जाती है।
• दोनों में जनन कोशिकाओं का विभाजन अर्द्धसूत्री होता है।
• अंत में बनने वाली संरचनाएँ क्रमशः परागकण और गुरुबीजाणु हैं।
आम गलतियाँ:
• दोनों प्रकार की धानियों में होने वाले विभाजन का गलत प्रकार (समसूत्री) लिख देना।
• अंत में बनने वाली संरचनाओं के नाम में भ्रमित होना।
• अंतर स्पष्ट करते समय सही मापदंडों का उपयोग न करना।
Exam Tips:
a) अंतर हमेशा तालिका (Table) बनाकर स्पष्ट करें।
b) कोशिका विभाजन का प्रकार (अर्द्धसूत्री) स्पष्ट रूप से उल्लेख करें।
c) अंतिम उत्पादों के नाम सही वैज्ञानिक शब्दावली में लिखें।
Question 3: निम्नलिखित शब्दावली को सही विकासीय क्रम में व्यवस्थित करें:
परागकण, बीजांडुन उत्तक, लघुबीजाणुतुच्छ, परागमातृ कोशिका, नर युग्मक
Answer:
उपरोक्त शब्दावली का सही विकासीय क्रम निम्नलिखित है:
बीजाणुजनक उत्तक \(\rightarrow\) परागमातृ कोशिका \(\rightarrow\) लघुबीजाणुतुच्छ \(\rightarrow\) परागकण \(\rightarrow\) नरयुग्मक
मुख्य बिंदु:
• विकास क्रम की शुरुआत बीजाणुजनक उत्तक से होती है।
• इसके पश्चात परागमातृ कोशिका और लघुबीजाणुतुच्छ का निर्माण होता है।
• अंत में परागकण से नर युग्मक का विकास होता है।
आम गलतियाँ:
• विकासीय चरणों के क्रम को उल्टा लिख देना।
• बीजाणुजनक उत्तक और परागमातृ कोशिका की स्थिति को आपस में बदल देना।
Exam Tips:
a) क्रम वाले प्रश्नों में तीरों (\(\rightarrow\)) का सही प्रयोग करें।
b) प्रत्येक चरण की जैविक स्थिति को ध्यान में रखें।
c) उत्तर लिखते समय वर्तनी की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें।
Question 4: एक प्ररूपीय आवृतबीजी बीजांड के भागों का विवरण दिखाते हुए एक स्पष्ट एवं साफ-सुथरा नामांकित चित्र बनाइए।
Answer:
एक प्ररूपीय आवृतबीजी बीजांड के प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं:
1. हाइलाइट
2. फनिकल
3. बीजांड द्वार
4. बीजांडद्वारी सिरा
5. बाह्य आवरण
6. अन्तः आवरण
7. बीजांडकाय
8. भ्रूण-कोष
9. कैलेज़ल सीरा या निभाग्रीय सिरा
मुख्य बिंदु:
• बीजांड पुष्प के अंडाशय के भीतर पाया जाने वाला बीजाणुधानी है।
• इसमें आवरण (अध्यावरण) तथा केंद्रीय भाग (बीजांडकाय) होता है।
• इसका एक सिरा बीजांडद्वारी और दूसरा निभाग्रीय कहलाता है।
आम गलतियाँ:
• चित्र में प्रमुख भागों जैसे बीजांड द्वार और निभाग का सही नामकरण न करना।
• अध्यावरणों की संख्या या परतों को गलत दिखाना।
Exam Tips:
a) चित्र हमेशा पेंसिल से बनाएँ और नामाकन स्पष्ट रखें।
b) सभी मुख्य भागों को तीर के निशान से प्रदर्शित करें।
c) चित्र के नीचे उसका मुख्य शीर्षक अवश्य लिखें।
Question 5: आप मादा युग्मकोद्भिद के एकबीजाणुज विकास से क्या समझते हैं?
Answer:
गुरुबीजाणुजनन के फलस्वरूप बने गुरुबीजाणु चतष्क में से तीन नष्ट हो जाते हैं तथा केवल एक गुरुबीजाणु ही सक्रिय होता है जो मादा युग्मकोद्भिद का विकास करता है। गुरुबीजाणु का केन्द्रक तीन सूत्रों विभाजनों द्वारा आठ केन्द्रक बनाता है। प्रत्येक ध्रुव पर चार-चार केन्द्रक व्यवस्थित हो जाते हैं। भ्रूणकोष के बीजांडद्वारी ध्रुव पर स्थित चारो केन्द्रक में से तीन केन्द्रक कोशिकाएँ अंड उपकरण बनाते हैं, जबकि निभाग्री सिरे के चार केन्द्रक में से तीन केन्द्रक एण्टीपोडल् कोशिकाएँ बनाते हैं। दोनों ध्रुवों से आये एक-एक केन्द्रक, केन्द्रीय कोशिका में संयोजन द्वारा ध्रुवीयकेन्द्रक बनाते हैं। चूकि मादा युग्मकोद्भिद सिर्फ एक ही गुरुबीजाणु से विकसित होता है, अतः इसे एक बीजाणुज विकास कहते हैं।
मुख्य बिंदु:
• चार गुरुबीजाणुओं में से केवल एक सक्रिय रहता है।
• तीन समसूत्री विभाजनों द्वारा 8-केन्द्रकीय स्थिति बनती है।
• इस प्रकार का विकास एकबीजाणुज विकास कहलाता है।
आम गलतियाँ:
• अर्द्धसूत्री और समसूत्री विभाजनों की संख्या में भ्रमित होना।
• नष्ट होने वाले गुरुबीजाणुओं की संख्या गलत बताना।
Exam Tips:
a) विभाजन के चरणों (तीन समसूत्री विभाजन) का स्पष्ट उल्लेख करें।
b) कोशिकाओं और केन्द्रकों की संख्या का सही गणितीय विवरण दें।
c) मुख्य परिभाषा को रेखांकित (underline) करें।
Question 6: एक स्पष्ट एवं साफ-सुथरे चित्र के द्वारा परिपक्व मादा युग्मकोद्भिद के 7-कोशिकीय, 8-न्यूक्लिएट (केन्द्रक) प्रकृति की व्याख्या करें।
Answer:
आवृतबीजी पौधों की मादा युग्मकोद्भिद 7-कोशिकीय व 8-केन्द्रकीय होता है जिसके परिवहन के समय क्रियाशील गुरुबीजाणु, प्रथम केन्द्रीय विभाजन द्वारा दो केन्द्रक बनाता है। दोनों केन्द्रक गुरुबीजाणु के दोनों ध्रुवों (माइक्रोपाइल व निभागी) पर पहुँच जाते हैं। द्वितीय विभाजन द्वारा दोनों सिरों पर दो-दो केन्द्रिकाएँ बन जाती हैं। तृतीय विभाजन द्वारा दोनों सिरों पर चार-चार केन्द्रक बन जाते हैं। माइक्रोपाइलर शीर्ष पर चार केन्द्रकों में से तीन केन्द्रक अंड उपकरण बनाते हैं तथा चौथा केन्द्रक ऊपरी ध्रुव का चक्र बनाता है। निभागी शीर्ष पर चार केन्द्रकों में से तीन एण्टीपोडल केन्द्रक तथा चौथा केन्द्रक निचला ध्रुव केन्द्रक का निर्माण करता है। ऊपरी तथा निचला ध्रुवीय केन्द्रक मध्य में आकर संयोजन द्वारा द्वितीय केन्द्रक बनाते हैं। अंड उपकरण के तीन केन्द्रकों से मध्य वाला केन्द्रक अंड बनाता है। शेष दोनों केन्द्रक सहायक कोशिकाएँ बनाते हैं।
मुख्य बिंदु:
• भ्रूणकोष में 7 कोशिकाएँ और 8 केन्द्रक होते हैं।
• अंड उपकरण में एक अंड और दो सहायक कोशिकाएँ होती हैं।
• केंद्र में दो ध्रुवीय केंद्रक मिलकर द्वितीयक केंद्रक बनाते हैं।
आम गलतियाँ:
• कोशिकाओं और केन्द्रकों की संख्या को आपस में मिला देना (जैसे 8 कोशिका और 7 केन्द्रक लिखना)।
• विभिन्न कोशिकाओं के नाम गलत लिखना।
Exam Tips:
a) 7-कोशिकीय और 8-केन्द्रकीय अवस्था को अलग-अलग बिंदुओं में समझाएँ।
b) नामांकित चित्र अवश्य बनाएँ जिसमें सभी सातों कोशिकाओं का स्पष्ट स्थान दिखे।
c) द्वितीयक केन्द्रक के निर्माण की प्रक्रिया को संक्षिप्त में लिखें।
Question 7: उन्मील परागणी पुष्पों से क्या तात्पर्य है? क्या अनुन्मील पुष्पों में परपरागण सम्पन्न होता है? अपने उत्तर की सतर्क व्याख्या करें।
Answer:
वे पुष्प जिनके परागकोश तथा वर्तिकाग्र अनावरत होते हैं, उन्मील परागणी पुष्प कहलाते हैं। उदाहरण: बायोला, ऑक्जेलिस। अनुन्मील पुष्पों में परपरागण नहीं होता है। अनुन्मील पुष्प अनावृत्त नहीं होते हैं। अतः इनमें पर-परागण सम्भव नहीं होता है। इस प्रकार के पुष्पों के परागकोश तथा वर्तिकाग्र पास-पास स्थित होते हैं। परागकोश के स्फुटन होने पर परागकण वर्तिकाग्र के सम्पर्क में आकर परागण करते हैं। अतः अनुन्मील पुष्प स्व-परागण ही करते हैं।
मुख्य बिंदु:
• उन्मील पुष्प खुले होते हैं जिससे इनमें परपरागण संभव है।
• अनुन्मील पुष्प कभी नहीं खुलते (बंद रहते हैं)।
• अनुन्मील पुष्पों में केवल स्व-परागण होता है।
आम गलतियाँ:
• अनुन्मील पुष्पों में परपरागण होना मान लेना।
• उन्मील और अनुन्मील की परिभाषा में अंतर न समझ पाना।
Exam Tips:
a) दोनों प्रकार के पुष्पों के उदाहरण (जैसे बायोला, ऑक्जेलिस) याद रखें।
b) कारण स्पष्ट करें कि बंद पुष्पों में परपरागण क्यों असंभव है।
c) 'स्व-परागण' शब्द का स्पष्ट उल्लेख करें।
Question 8: पुष्पों में स्व-परागण रोकने के लिए विकसित की गई दो कार्यनीति का विवरण दें।
Answer:
पुष्पों में स्व-परागण को रोकने हेतू विकसित की गई दो कार्यनीतियाँ निम्न हैं:
1. स्व-बन्ध्यता: इस प्रकार की कार्यनीति में यदि किसी पुष्प के परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर गिरते हैं तो वे उसे निषेचित नहीं कर पाते हैं। उदाहरण: मालवा के एक पुष्प के परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर अंकुरित नहीं होते हैं।
2. भिन्न काल पक्वता: इसमें नर तथा मादा जननांग अलग-अलग समय में परिपक्व होते हैं जिससे स्व-परागण नहीं हो पाता है। उदाहरण: सेक्सिफ्रेगा कुल के सदस्य।
मुख्य बिंदु:
• स्व-बन्ध्यता आनुवंशिक तंत्र है जो समान परागकण को रोकता है।
• भिन्न काल पक्वता में नर और मादा अंग अलग समय पर परिपक्व होते हैं।
• दोनों युक्तियाँ पर-परागण को बढ़ावा देती हैं।
आम गलतियाँ:
• दोनों युक्तियों को एक ही मान लेना या नाम में भ्रमित होना।
• उचित उदाहरण न लिखना।
Exam Tips:
a) दोनों युक्तियों (स्व-बन्ध्यता और भिन्न काल पक्वता) की उचित परिभाषा दें।
b) प्रत्येक युक्ति के साथ एक उपयुक्त उदाहरण अवश्य दें।
c) उत्तर को बिंदुओं में लिखकर स्पष्ट बनाएँ।
Question 9: स्व-अयोग्यता क्या है? स्व-अयोग्यता वाली प्रजातियों में स्व-परागण प्रक्रिया की रचना क्यों नहीं पहुँच पाती है?
Answer:
स्व-अयोग्यता पुष्पीय पौधों में पाई जाने वाली ऐसी प्रयुक्त है जिसके फलस्वरूप पौधे में स्व-परागण नहीं होता है। अतः इन पौधों में सिर्फ परपरागण ही होता है। स्व-अयोग्यता दो प्रकार की होती है:
1. विष्वरूपती: इस प्रकार की स्व-अयोग्यता में एक ही जाति के पौधों के वर्तिकाग्र तथा परागकोशों की स्थिति में भिन्नता होती है अतः परागनलिका की वृद्धि वर्तिकाग्र में रुक जाती है।
2. समकारी: इस प्रकार की स्व-अयोग्यता विरोधी-S अलील्स द्वारा होती है। उपरोक्त कारणों के फलस्वरूप स्व-अयोग्यता वाली जातियों में स्व-परागण प्रक्रिया बीज की रचना तक नहीं पहुँच पाती है।
मुख्य बिंदु:
• स्व-अयोग्यता पौधे की एक आनुवंशिक युक्ति है।
• यह स्व-परागकणों के अंकुरण या नली की वृद्धि को रोकती है।
• इससे केवल पर-परागण सुनिश्चित होता है।
आम गलतियाँ:
• इसे पर्यावरणीय कारक समझ लेना जबकि यह आनुवंशिक है।
• प्रकारों (विष्वरूपती और समकारी) के मध्य अंतर स्पष्ट न करना।
Exam Tips:
a) स्व-अयोग्यता के जैविक महत्व को स्पष्ट करें।
b) इसके दोनों रूपों का संक्षेप में वर्णन करें।
c) बीज निर्माण तक प्रक्रिया क्यों नहीं पहुँचती, इसका कारण स्पष्ट लिखें।
Question 10: बैगिंग (बोरावस्त्रवरण) या थैली लगाना तकनीक क्या है? पादप जनन कार्यक्रम में यह कैसे उपयोगी है?
Answer:
बैगिंग (बोरावस्त्रवरण) एक ऐसी तकनीक है जिसके द्वारा परागण में ऐच्छिक परागकणों का उपयोग तथा वर्तिकाग्र को अनैच्छिक परागकणों से बचाना सुनिश्चित किया जाता है। बैगिंग के अन्तर्गत विपुषित पुष्पों को थैली से ढककर, इनके वर्तिकाग्र को अवांछित परागकणों से बचाया जाता है। पादप जनन में इस तकनीक द्वारा फसलों की उन्नतशील बनाया जाता है तथा सिर्फ ऐच्छिक गुणों वाले परागकण व वर्तिकाग्र के मध्य परागण सुनिश्चित कराया जाता है।
मुख्य बिंदु:
• अवांछित परागण को रोकने के लिए थैली से ढका जाता है।
• यह कृत्रिम संकरण का एक मुख्य चरण है।
• इससे केवल ऐच्छिक गुणों वाले बीज प्राप्त किए जाते हैं।
आम गलतियाँ:
• बैगिंग और विपुशन को एक ही प्रक्रिया समझ लेना।
• इसके मुख्य उद्देश्य को स्पष्ट न कर पाना।
Exam Tips:
a) बैगिंग की परिभाषा और उपयोगिता दोनों अलग-अलग लिखें।
b) पादप प्रजनन में इसके महत्व को रेखांकित करें।
c) विपुषण के बाद बैगिंग की जाती है, इस क्रम को याद रखें।
Question 11: त्रि-संलयन क्या है? यह कहाँ और कैसे होता है? त्रि-संलयन में सम्मिलित न्यूक्लिआई का नाम बताएँ।
Answer:
परागनलिका से मुक्त दोनों केन्द्रकों में से एक मादा केन्द्रक से संयोजन करता है। दूसरा नर केन्द्रक भ्रूणकोष में स्थित द्वितीयक केन्द्रक (2n) से संयोजन करता है। द्वितीयक केन्द्रक में दो केन्द्रक पहले से होते हैं हैं तथा नर केन्द्रक से संलयन के पश्चात केन्द्रकों की संख्या तीन हो जाती है। तीन केन्द्रकों का यह संलयन, त्रिसंलयन कहलाता है। त्रिसंलयन की प्रक्रिया भ्रूणकोष में होती है तथा इसमें ध्रुवीय केन्द्रक अर्थात द्वितीयक केन्द्रक व नर केन्द्रक सम्मिलित होते हैं।
मुख्य बिंदु:
• यह भ्रूणकोष के केंद्रीय भाग में होता है।
• इसमें एक नर युग्मक और दो ध्रुवीय केंद्रक (या द्वितीयक केंद्रक) संलित होते हैं।
• इसके परिणामस्वरूप प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN) बनता है।
आम गलतियाँ:
• सामान्य निषेचन और त्रिसंलयन को मिला देना।
• सम्मिलित न्यूक्लिआई की संख्या या प्रकृति (गुणसूत्रता) गलत लिखना।
Exam Tips:
a) त्रिसंलयन में भाग लेने वाले तीनों केन्द्रकों का नाम स्पष्ट लिखें।
b) यह प्रक्रिया कहाँ होती है (भ्रूणकोष में) इसका उल्लेख जरूर करें।
c) इसके बाद बनने वाली संरचना (प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक) का नाम दें।
Question 12: एक निषेचित बीजांड में, युग्मनज प्रसुप्ति के बारे में आप क्या सोचते हैं?
Answer:
निषेचन के पश्चात बीजांड में युग्मनज का विकास होता है। बीजांड के अध्यावरण दृढ होकर बीजावरण बनाते हैं। बीजांड के बाहरी अध्यावरण से बीजकवच तथा भीतरी अध्यावरण से अन्तः कवच बनता है। भ्रूणपोष में भोज्य पदार्थ एकत्र होने लगते हैं। जल की मात्रा धीरे-धीरे कम हो जाती है, अतः कोमल बीजावांद कड़ा व शुष्क हो जाता है। धीरे-धीरे बीजांड के अंदर की कार्यिकी रुक जाती है है तथा युग्मनज से बना नया भ्रूण सुप्तावस्था में पहुँच जाता है। इसे युग्मनज प्रसुप्ति कहते हैं। बीजावरण से घिरा, एकत्रित भोजन युक्त तथा सुसुप्त भ्रूण युक्त यह रचना, बीज कहलाती है।
मुख्य बिंदु:
• निषेचन के बाद युग्मनज कुछ समय के लिए निष्क्रिय (सुप्त) हो जाता है।
• बीज की नमी कम होने से उपापचय क्रियाएँ रुक जाती हैं।
• यह अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरण के लिए तैयार रहता है।
आम गलतियाँ:
• प्रसुप्ति को मृत्यु समझ लेना।
• बीज बनने की प्रक्रिया में युग्मनज की भूमिका को नजरअंदाज करना।
Exam Tips:
a) 'प्रसुप्ति' (Dormancy) शब्द का वैज्ञानिक अर्थ स्पष्ट करें।
b) जल की कमी और उपापचय गतिविधियों के रुकने को कारण के रूप में लिखें।
c) उत्तर को क्रमबद्ध तरीके से समझाएँ।
Question 13: इनमें विभेद करें:
(क) बीजपत्रधार तथा बीजपत्रोपarik
(ख) प्रांकुर चोल तथा मूलांकुर चोल
(ग) अध्यावरण तथा बीजचोल
(घ) परिभ्रूण पोष तथा फल भित्ति
Answer:
(क) बीजपत्रधार तथा बीजपत्रोपारिक में अंतर:
1. बीजपत्रों के ठीक नीचे या मूलांकुर के ठीक ऊपर स्थित अक्ष का भाग बीजपत्रधार कहलाता है।
2. इसकी समाप्ति मूल शीर्ष में होती है।
बीजपत्रोपरिक:
1. प्रांकुर के ठीक नीचे का भाग बीजपत्रोपारिक कहलाता है।
2. इसकी समाप्ति प्रांकुर में होती है।
(ख) प्रांकुर चोल तथा मूलांकुर चोल में अंतर:
1. स्कूटेलम के प्रांकुर को ढकने वाली खोखली पर्णीय संरचना प्रांकुर चोल कहलाती है।
2. यह प्रांकुर को ढकती है।
मूलांकुर चोल:
1. स्कूटेलम के निचले भाग में मूलांकुर को ढकने वाली पर्त मूलांकुर चोल कहलाती है।
2. यह मूलांकुर को ढकती है।
(ग) अध्यावरण तथा बीजचोल में अंतर:
1. अध्यावरण बीजांड में पाए जाते हैं।
2. बीजांड के दोनों बाहरी आवरण अध्यावरण कहलाते हैं।
बीजचोल:
1. बीजचोल बीज में पाए जाते हैं।
2. बीजावरण का बाहरी कड़ा आवरण बीजचोल कहलाता है।
(घ) परिभ्रूण पोष तथा फल भित्ति में अंतर:
1. बीजों में उपस्थित बीजांडकाय परिभ्रूण पोष कहलाता है।
फल भित्ति:
1. निषेचन के पश्चात अंडाशय की दीवार से विकसित फल का छिलका फल भित्ति कहलाता है।
मुख्य बिंदु:
• सभी युग्म पादप शरीर की अलग-अलग संरचनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
• बीज और फल के विकास में इनकी भूमिका भिन्न होती है।
• तालिका द्वारा अंतर स्पष्ट करना सबसे उत्तम विधि है।
आम गलतियाँ:
• प्रांकुर और मूलांकुर के आवरणों को आपस में मिला देना।
• अध्यावरण और बीजचोल को एक ही मान लेना।
Exam Tips:
a) प्रत्येक भाग के लिए अलग-अलग तालिका या उप-शीर्षक बनाएँ।
b) इनकी स्थिति (बीज या बीजांड) का स्पष्ट अंतर दिखाएँ।
c) परिभाषाओं में वैज्ञानिक शब्दों का प्रयोग करें।
Question 14: सेब को आभासी फल क्यों कहते हैं? पुष्प का कौन-सा भाग फल की रचना करता है?
Answer:
सेब में फल का विकास पुष्पासन से होता है। इसी कारण इसे आभासी फल कहते हैं। फल की रचना, पुष्प के निषेचित अंडाशय से होती है।
मुख्य बिंदु:
• सत्य फल केवल अंडाशय से विकसित होते हैं।
• आभासी फल में अंडाशय के अलावा अन्य भाग (जैसे पुष्पासन) भी भाग लेते हैं।
• सेब में पुष्पासन मांसवर्धी होकर खाने योग्य भाग बनाता है।
आम गलतियाँ:
• आभासी फल की परिभाषा में पुष्पासन का उल्लेख न करना।
• यह मान लेना कि सभी फल केवल अंडाशय से बनते हैं।
Exam Tips:
a) 'आभासी फल' (False fruit) की सही परिभाषा दें।
b) सेब के अलावा नाशपाती आदि का उदाहरण भी याद रखें।
c) पुष्पासन की भूमिका को स्पष्ट रूप से लिखें।
Question 15: विपुंसन से क्या तात्पर्य है? एक पादप प्रജനक कब और क्यों इस तकनीक का प्रयोग करता है?
Answer:
एक द्विलिंगी पुष्प की कली अवस्था में, परागकोश को काटकर अलग करने की प्रक्रिया, विपुंसन कहलाती है। यह कृत्रिम परागकण की एक तकनीक है तथा इसका प्रयोग प्रजनक द्वारा आर्थिक महत्व के पौधों की अच्छी नस्ल बनाने में किया जाता है। विपुंसन द्वारा यह सुनिश्चित किया जाता है कि ऐच्छिक वर्तिकाग्र युक्त पौधे पर ही परागण हो।
मुख्य बिंदु:
• विपुंसन में नर अंगों (पुंकेसर/परागकोश) को हटाया जाता है।
• यह केवल द्विलिंगी पुष्पों में कली अवस्था में की जाती है।
• इसका उद्देश्य अवांछित स्व-परागण रोकना है।
आम गलतियाँ:
• खिले हुए पुष्प में विपुंसन करने का प्रयास करना।
• विपुंसन के उद्देश्य को स्पष्ट न कर पाना।
Exam Tips:
a) 'विपुंसन' (Emasculation) शब्द को स्पष्ट परिभाषित करें।
b) यह प्रक्रिया किस प्रकार के पुष्पों में की जाती है (द्विलिंगी) यह अवश्य लिखें।
c) पादप प्रजनन में इसके महत्व को समझाएँ।
Question 16: यदि कोई व्यक्ति वृद्धि कारकों का प्रयोग करते हुए अनिषेकजनन को प्रेरित करता है तो आप प्रेरित अनिषेकजनन के लिए कौन-सा फल चुनते हैं और क्यों?
Answer:
वृद्धि कारकों के प्रयोग द्वारा अनिषेकजनन हेतु हम केले का चयन करेंगे क्योंकि यह बीज रहित होता है।
मुख्य बिंदु:
• अनिषेकजनन वह प्रक्रिया है जिसमें बिना निषेचन के फल बनता है।
• इससे बीज रहित फलों का उत्पादन किया जाता है।
• केला इसका एक उत्कृष्ट प्राकृतिक व प्रेरित उदाहरण है।
आम गलतियाँ:
• ऐसे फल का चयन करना जिसमें सामान्यतः बीज बहुत अधिक होते हैं और उनका कोई आर्थिक लाभ न हो।
• अनिषेकजनन और अनिषेकबीजता में अंतर न समझना।
Exam Tips:
a) उदाहरण के रूप में 'केला' का नाम स्पष्ट लिखें।
b) बीज रहित फल प्राप्त करना इसका मुख्य लाभ है, इसे कारण में बताएँ।
c) उत्तर को संक्षिप्त और सटीक रखें।
Question 17: परागकण भित्ति रचना में टैपीटम की भूमिका की व्याख्या कीजिए।
Answer:
पुंकेसर के परागकोश में प्रायः चार लघुबीजाणुधानी बनती हैं। प्रत्येक लघुबीजाणुधानी चार पर्वो वाली भित्ति से आवृत होती है। बाहर से भीतर की ओर इन्हें क्रमशः बाह्य त्वचा, अंतःस्थीसियम, मध्यपर्ति तथा टैपीटम कहते हैं। बाह्य तीन पर्तें लघुबीजाणुधानी की संरक्षण प्रदान करती हैं और स्फुटन में सहायता करती हैं। सबसे भीतरी टैपीटम पर्त की कोशिकाएँ विकासशील परागकणों को पोषण प्रदान करती हैं।
मुख्य बिंदु:
• टैपीटम परागकोश की सबसे भीतरी भित्ति स्तर है।
• यह विकासशील परागकणों को पोषण प्रदान करती है।
• यह स्पोरोपोलेनिन और अन्य आवश्यक पदार्थ भी स्रावित करती है।
आम गलतियाँ:
• टैपीटम को बाहरी परत मान लेना।
• इसके मुख्य कार्य (पोषण प्रदान करना) को भूल जाना।
Exam Tips:
a) परागकोश की भित्ति की चारों परतों के नाम बाहर से भीतर की ओर लिखें।
b) टैपीटम की स्थिति (सबसे भीतरी) पर विशेष जोर दें।
c) पोषण देने की कार्यप्रणाली को स्पष्ट करें।
Question 18: असंगजनन क्या है और इसका क्या महत्व है?
Answer:
कुछ पुष्पीय पौधों जैसे कि एस्टेरिएसिया तथा घासों ने बिना निषेचन के ही बीज पैदा करने की प्रक्रिया विकसित कर ली है, जिसे असंगजनन कहते हैं। यदि संकर किस्म के संग्रहित बीज की बुआई करके प्राप्त किया गया तो उसकी पादप संतति पृथक्कृत होगी और वह संकर बीज की विशिष्टता को यथावत नहीं रख पाएगा। यदि एक संकर (बीज) असंगजनन से तैयार की जाती है तो संकर संतति में कोई पृथक्करण की विशेषताएँ नहीं होगी। इसके बाद किसान प्रतिवर्ष फसल-दर-फसल संकर बीजों का उपयोग जारी रख सकते हैं और उसे प्रतिवर्ष बीजों को खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। संकर बीज उद्योग में असंगजनन के महत्व के कारण दुनिया भर में, विभिन्न प्रयोगशालाओं में असंगजनन की आनुवंशिकता को समझने के लिए शोध और संकर किस्मों में असंगजनन जीन्स को स्थानांतरित करने पर अध्ययन चल रहा है। बागवानी एवं कृषि विज्ञान में असंगजनन के बहुत सारे लाभ हैं।
मुख्य बिंदु:
• असंगजनन बिना निषेचन के बीज बनने की प्रक्रिया है (अलैंगिक जनन का प्रकार)।
• यह लैंगिक जनन का विकल्प है जो आनुवंशिक रूप से समान संतति देता है।
• इससे किसानों को हर साल नए संकर बीज खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
आम गलतियाँ:
• असंगजनन को सामान्य लैंगिक जनन या निषेचन मान लेना।
• इसके कृषि संबंधी महत्व को ठीक से न समझा पाना।
Exam Tips:
a) असंगजनन की परिभाषा (बिना निषेचन बीज निर्माण) स्पष्ट लिखें।
b) किसानों के लिए इसके आर्थिक लाभ का वर्णन करें।
c) संकर बीजों के संदर्भ में इसके महत्व को बिंदुओं के रूप में दर्शाएँ।
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