CBSE Class 8 Hindi Unseen Passage A

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अपठित गद्यांश 

धर्म का वास्तविक गुण प्रकट होता है जब हम जीवन का सत्य जानने के लिए और इस दुनिया की दया और क्षमा योग्य वस्तुओ में वृद्धि के लिए निरंतर खोज करते हैं और सतत अनुसंधान करते हैं| अनुसंधान या खोज की लगन और उद्देश्यों का विस्तार जिन्हें हम प्रेम अर्पण करते हैं, यह वास्तविक रूप में आध्यात्मिक मनुष्य के दो पक्ष होते हैं| हमें सत्य की खोज कब तक करते रहना चाहिए जब तक हम उसे पा ना लें और उससे हमारा साक्षात्कार ने हो| जो कुछ भी हो, हर मनुष्य में वही तत्व मौजूद है, अतः वह हमारे प्यार और हमारी सद्भावना का अधिकारी है| समाज और सारी सभ्यता केवल किस बात का प्रयास है कि मनुष्य आपस में सद्भाव के साथ रह सके| हम इस प्रयास को तब तक बनाए रखते हैं जब तक सारी दुनिया हमारा परिवार ने बन जाए|

 

अपठित गद्यांश के आधार पर निम्न प्रश्नो के उत्तर दीजिये :-

(अ) धर्म का वास्तविक गुण कब प्रकट होता है|

(ब) आध्यात्मिक मनुष्य के दो पक्ष कौन से हैं|

(स) हर मनुष्य में कौन सा तत्व मौजूद है|

(द) मनुष्य को आपस में सद्भावना का प्रयास कब तक करते रहना चाहिए|

 

उपरोक्त प्रश्नो के संभावित उत्तर:-

(अ) जीवन-सत्य एवं विश्व की दया-क्षमा योग्य वस्तु की खोज में संलग्न रहने पर धर्म का वास्तविक गुण प्रकट होता है|

(ब) आध्यात्मिक मनुष्य के यह दो पक्ष होते हैं- जीवन-सत्य की खोज में निरंतर लगे रहना और सृष्टि-प्रक्रिया के सत्यान्वेषण के उद्देश्यों के लिए स्वयं पारित करना स्वयं को अर्पित करना|

(स) हर मनुष्य में धर्म का वास्तविक गुण तथा सत्य का अनुसंधान करने का तत्व मौजूद होता है|

(द) जब तक सारा विश्व हमारा अपना परिवार न बन जाए, तब तक सद्भाव का प्रयास करना चाहिए|

 

अपठित गद्यांश 

नगरीकरण की प्रवृत्ति सारे विश्व में काम कर रही है| नगरीकरण की यह दिशा स्पष्ट: छोटे समुदायों की समाप्ति की दिशा है| भारत में भी शहरों की जनसंख्या अभी प्रतिवर्ष पैंतीस लाख के हिसाब से बढ़ रही है| भले ही मनुष्य के पास तर्क एवं बुद्धि है और वह अपने जीवन को अपनी इच्छा के अनुसार व्यवस्थित कर सकता है| विज्ञान में ऐसा कुछ निहित नहीं है जो मनुष्य को विशाल, विकटाकार बस्तियों में अव्यवस्थित रूप से रहने के लिए बाध्य करता हूं| वर्तमान नगरोन्मुख प्रवर्ति के कुछ आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कारण है| वे शाश्वत नहीं है और उन्हें प्रबुद्ध मानवीय प्रयत्न से परिवर्तित किया जा सकता है| इसमें संदेह नहीं कि गांव आज जैसा है, वैसा ही यदि रहता है तो नगरीकरण की प्रवृत्ति रोकी नहीं जा सकती| लेकिन यदि मानव समाज का निर्माण छोटे प्राथमिक समुदायों के आधार पर ही करना है, तो आज के गांव के ऐसी बस्तियों के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है जो हर दृष्टि से आकर्षक होंगी और तब सामान्यत: कोई भी उन्हें छोड़ना नहीं चाहेगा|

 

अपठित गद्यांश के आधार पर निम्न प्रश्नो के उत्तर दीजिये:-

(अ) वर्तमान में नगरीकरण की प्रवृत्ति क्यों बढ़ रही है?

(ब) “भले ही मनुष्य के पास तर्क एवं बुद्धि है और वह अपने जीवन को अपनी इच्छा के अनुसार व्यवस्थित कर सकता है|” यह किस प्रकार का वाक्य है? इसकी परिभाषा भी लिखिए|

(स) ‘मानवीय’ शब्द में मूल शब्द और प्रत्यय बताइए|

(द) गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए|

 

उपरोक्त प्रश्नो के संभावित उत्तर:-

(अ) वर्तमान में नगरों में भौतिक सुख सुविधा रोजगार व्यवसाय शिक्षा सुविधा आदि अनेक कारणों से नगरीकरण की प्रवृत्ति बढ़ रही है|

(ब) यह संयुक्त वाक्य है जिस वाक्य में एक से अधिक साधारण या मिश्र वाक्य और वह किसी संयोजक अव्यय से जुड़े हो वह संयुक्त वाक्य के लाते हैं

(स) मानवीय - मूल शब्द मानव + इय प्रत्यय

(द) शीर्षक - नगरीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति |

 

अपठित गद्यांश  

जातीय जीवन, उसकी संस्कृति तथा भूमिगत सीमाबद्ध परिवेश ये सब सम्मिलित रूप से राष्ट्रीयता के उपकरण होते हैं| यह समष्टि रूप से ही आवश्यक उपकरण है, व्यष्टि रूप से नहीं| राष्ट्रीयता ही राष्ट्रीय भावना की पोषक होती है| हिंदी-साहित्य-कोश में राष्ट्रीयता के संबंध में लिखा है- “राष्ट्रीय साहित्य के अंतर्गत वह समस्त साहित्य लिया जा सकता है जो किसी देश की जातीय विशेषताओं का परिचायक है| ”वैसे भूमि (देश), उस भूमि पर बसने वाले जन और उनकी संस्कृति, ये तीनों ही सम्मिलित भावना रूप में राष्ट्रीयता के परिचायक है| राष्ट्रीयता ’राष्ट्र’ शब्द से निर्मित है| इस राष्ट्रीयता शब्द का सामान्य अर्थ है राष्ट्र के प्रति निष्ठा रखने की भावना| राष्ट्रीयता नेशनलिटी का हिंदी रूप है एनसाइक्लोपीडिया में 'नेशनेलिटी' के बारे में लिखा है कि ”राष्ट्रीयता मन की वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति की सर्वोपरि कर्तव्यनिष्ठा राष्ट्र के प्रति अनुभव की जाती है| 

अपठित गद्यांश के आधार पर निम्न प्रश्नो के उत्तर दीजिये:- 

(अ) राष्ट्रीयता से क्या आशय लिया जाता है?

 (ब) “ये समष्टि रूप से ही आवश्यक उपकरण है, व्यष्टि रूप से नहीं|” इस वाक्य को संयुक्त वाक्य में बदलिए| 

(स) ‘राष्ट्रीयता’ शब्द में मूल शब्द और प्रत्यय बताइए| 

(द) गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए| 

 

उपरोक्त प्रश्नो के संभावित उत्तर:- 

(अ) भूमि, उसके निवासी और उनकी संस्कृति- इन तीनों के सम्मिलित रूप को राष्ट्रीयता कहते हैं| 

(ब) यह समष्टि रूप से ही आवश्यक उपकरण है, परंतु व्यष्टि रूप से नहीं| 

(स) राष्ट्रीयता- मूल शब्द राष्ट्र + इय व ता प्रत्यय| 

(द) शीर्षक- राष्ट्रीयता का महत्व| 

 

अपठित गद्यांश 

भारत में विभिन्न जातियों के पारस्परिक संपर्क में आने से संस्कृति की समस्या कुछ जटिल हो गई | पुराने जमाने में द्रविड़ और आर्य- संस्कृति का समन्वय बहुत उत्तम रीती से हो गया था तत्पश्चात मुस्लिम और अंग्रेजी संस्कृतियों का मेल हुआ | हम इन संस्कृतियों से अछूते नहीं रह सकते इन संस्कृतियों में से हम कितना छोड़ेंगे हमारे सामने बड़ी समस्या है अपनी भारतीय संस्कृति को तिलांजलि देकर इनको अपनाना आत्महत्या होगी | भारतीय संस्कृति की समन्वयक शीलता यहां भी अपेक्षित है किंतु सामान्य में अपना न खो बैठना  चाहिए | दूसरी संस्कृतियों के जो अंग हमारी संस्कृति में अवरोध रूप में अपनाया जा सके उनके द्वारा अपनी संस्कृति को संपन्न बनाना आपत्तिजनक नहीं अपनी संस्कृति चाहे अच्छी हो या बुरी, चाहे दूसरों की संस्कृति से मेल खाती हो या नहीं खाती हो उचित होने की कोई बात नहीं|

 

अपठित गद्यांश के आधार पर निम्न प्रश्नो के उत्तर दीजिये:-

(अ) भारतीय संस्कृति की समन्वय शीलता कहां दिखाई देती है?

(ब)”इन संस्कृतियों में से हम कितना छोड़ें यह हमारे सामने बड़ी समस्या है|” यह किस प्रकार का वाक्य है?

(स)’पारस्परिक’ शब्द में मूल शब्द और प्रत्यय बताइए ?

(द) गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए?

 

उपरोक्त प्रश्नो के संभावित उत्तर:-

(अ) द्रविड़, मुस्लिम एवं अंग्रेजी संस्कृति के मेल- मिलाप में भारतीय संस्कृति की समन्वयशीलता दिखाई देती है|

(ब) यह (संज्ञा उपवाक्य आश्रित) मिश्र वाक्य है |

(स) पारस्परिक परस्पर मूल शब्द + +एक प्रत्याशी        

(द) भारतीय संस्कृति का महत्व

 

अपठित गद्यांश 

सृष्टि के आदि काल से नर-नारी का पारस्परिक संबंध रहा है| नारी के द्वारा ही सृष्टि का क्रम चलता है, वह पुरुष की प्रेरणा है| भारतीय संस्कृति की पावन परंपरा में नारी को सदैव सम्मानीय स्थान प्राप्त हुआ है| यज्ञादि धार्मिक आयोजनों एवं सामाजिक मांगलिक पुनीत अवसरों पर नारी की उपस्थिति अनिवार्य घोषित की गई है| हिंदू धर्मशास्त्र के प्रणेता महर्षि मनु का कथन है- “जहां नारियों को पूजा जाता है, वहां देवता गण निवास करते हैं|” मानव-जाति के विकास में नारी का पद पुरुष के पद से कहीं अधिक श्रेष्ठ है नारी प्रेम दया त्याग व श्रद्धा की प्रतिमूर्ति है और ये आदर्श मानव-जीवन की उच्चतम आदर्श है| नारी का हर रूप वंदनीय है चाहे वह मां का हो; बहिन का हो या पत्नी का; नारी की महत्ता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता|

 

अपठित गद्यांश के आधार पर निम्न प्रश्नो के उत्तर दीजिये:-

(अ) भारतीय संस्कृति में नारी की महत्ता बताइए|

(ब) “नारी के द्वारा ही सृष्टि का क्रम चलता है, वह पुरुष की प्रेरणा है|” इसे संयुक्त वाक्य में बदलिए|

(स) ‘सम्मान्निये’ शब्द में मूल शब्द, उपसर्ग और प्रत्यय बताइए|

(द) गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए|

 

उपरोक्त प्रश्नो के संभावित उत्तर:-

(अ) भारतीय संस्कृति में नारी को प्रेम, दया, त्याग व श्रद्धा की प्रतिमूर्ति माना गया है| नारी का मां, बहन या पत्नी रूप सदा वंदनीय है|

(ब) नारी के द्वारा ही सृष्टि का क्रम चलता है और वह पुरुष की प्रेरणा है|

(स) सम्मानीय- सम उपसर्ग + मान मूल शब्द + अनिय प्रत्यय

(द) शीर्षक- भारतीय संस्कृति में नारी

 

अपठित गद्यांश 

उत्साह की गिनती अच्छे गुणों में होती है| परंतु जब तक आनंद का लाभ और किसी क्रिया व्यापार या उसकी भावना के साथ नहीं दिखाई पड़ता तब तक उसे ’उत्साह’ की संज्ञा प्राप्त नहीं होती| यदि किसी प्रिय मित्र के आने का समाचार प्राप्त कर हम चुपचाप ज्यों के त्यों आनंदित होकर बैठे रह जाएंगे या थोड़ा हंस भी दें तो यह हमारा उत्साह नहीं कहा जाएगा जब हम अपने मित्र का आगमन सुनते ही उठ खड़े होंगे| उससे मिलने के लिए दौड़ पड़ंगे और उसके ठहरने आदि के प्रबंध में प्रसन्न- मुख इधर-उधर आते-जाते दिखाई देंगे| प्रयत्न और कर्म-संकल्प उत्साह नामक आनंद के लिए नित्य लक्षण हैं| प्रत्येक कर्म में थोड़ा या बहुत बुद्धि का योग भी रहता है| कुछ कर्मों में तो बुद्धि की तत्परता और शरीर की तत्परता दोनों बराबर साथ-साथ चलती है| उत्साह की उमंग इस प्रकार हाथ-पैर चलवाती है उसी प्रकार बुद्धि से भी काम कराती है|

 

अपठित गद्यांश के आधार पर निम्न प्रश्नो के उत्तर दीजिये:-

(अ) उत्साह की संज्ञा किसे नहीं दी जाती है|

(ब)”उत्साह की उमंग जिस प्रकार हाथ-पैर चलवाती है, उसी प्रकार बुद्धि से भी काम कराती है|”  से संयुक्त वाक्य में बदलिए|

(स) आनंद शब्द में मूल शब्द और प्रत्यय बताइए

(द) गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए|

 

उपरोक्त प्रश्नो के संभावित उत्तर:-

(अ) क्रिया या उसकी भावना के साथ जब तक में कर्मनिष्ठा का आनंद नहीं दिखाई पड़ता है, तब तक उसे उत्साह की संज्ञा नहीं दी जाती है|

(ब) उत्साह की उमंग हाथ-पैर चलाती है तथा उसी प्रकार वह बुद्धि से भी काम करवाती है|

(स) आनंदित- आनंद मूल शब्द + इत प्रत्यय|

(द) शीर्षक- उत्साह का स्वरूप

 

अपठित गद्यांश

तुलसी हमारे जातीय जन जागरण के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं| उनकी कविता की आधारशिला जनता की एकता है| मिथिला से लेकर अवध और ब्रज तक चार सो साल से तुलसी की सरस वाणी नगरों और गांवों में गूंजती है| साम्राज्यवादी, सामंती अवशेष और बड़े पूंजीपतियों के शोषण से हिंदी-भाषी जनता को मुक्त करके उसकी जातीय संस्कृति को विकसित करना है| हमारे जातीय संगठन के मार्ग में सांप्रदायिकता, ऊंच--नीच के भेद-भाव, नारी के प्रति सामंती शासक का रुख आदि अनेक बाधाएं है| तुलसी का साहित्य में इनसे संघर्ष करना सिखाता है| तुलसी का मूल संदेश है, मानव प्रेम मानव प्रेम को सक्रिय रुप देना, सहानुभूति को व्यवहार में परिणत करके जनता के मुक्ति-संघर्ष में योग देना हमारा कर्तव्य है|

 

अपठित गद्यांश के आधार पर निम्न प्रश्नो के उत्तर दीजिये:-

(अ) तुलसी साहित्य से हमें क्या शिक्षा लेनी चाहिए?

(ब) ”तुलसी का साहित्य हमें इनसे संघर्ष करना सिखाता है|” यह किस प्रकार का वाक्य है? परिभाषा लिखिए|

(स) ’सांप्रदायिकता’ शब्द में मूल शब्द और प्रत्यय बताइए|

(द) गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए|

 

उपरोक्त प्रश्नो के संभावित उत्तर:-

(अ) तुलसी-साहित्य से हमें सामाजिक समन्वय, मानव-प्रेम एवं उच्च विचारों की शिक्षा लेनी चाहिए|

(ब) यह साधारण वाक्य है| जिस वाक्य में एक ही उद्देश्य और एक ही विधेय होता है, वह साधारण वाक्य कहलाता है|

(स) सांप्रदायिकता संप्रदाय मूल शब्द व ता प्रत्यय

(द) शीर्षक- तुलसी-साहित्य का महत्व|

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