NCERT Solutions for Class 9 Science: Chapter 10 ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
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Practice Class 9 Science Solutions: Chapter 10 ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
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Question 1: क्रियाकलाप के आधार पर सिद्ध कीजिए कि ध्वनि कंपन करने वाली वस्तुओं द्वारा उत्पन्न होती है।
Answer:
ध्वनि की उत्पत्ति को समझने के लिए विभिन्न क्रियाकलाप किए जा सकते हैं। एक खुले गत्ते के डिब्बे पर रबड़ बैंड को तानकर बाँधा जाता है। जब उंगली से रबड़ बैंड को खींचकर छोड़ा जाता है, तो ध्वनि सुनाई देती है और साथ ही रबड़ बैंड कंपन करता हुआ स्पष्ट दिखाई देता है। जब रबड़ बैंड का कंपन रुक जाता है, तो ध्वनि भी आना बंद हो जाती है।
इसी प्रकार, एक स्वरित्र द्विभुज (Tuning Fork) को रबड़ पैड से टकराकर पानी की सतह से स्पर्श कराने पर पानी की सतह पर तरंगें बनती हैं, जो यह दर्शाती हैं कि स्वरित्र द्विभुज वास्तव में कंपन कर रहा है। इन सभी प्रेक्षणों और अवलोकनों से यह सिद्ध होता है कि ध्वनि केवल कंपन करने वाली वस्तुओं द्वारा ही उत्पन्न होती है।
मुख्य बिंदु:
• कंपन करने वाली वस्तुएँ ही ध्वनि का मुख्य स्रोत होती हैं।
• रबड़ बैंड के प्रयोग से यह स्पष्ट होता है कि कंपन रुकने पर ध्वनि भी समाप्त हो जाती है।
• स्वरित्र द्विभुज और पानी का प्रयोग कंपनों के दृश्य प्रमाण को प्रस्तुत करता है।
आम गलतियाँ:
• छात्र यह मान लेते हैं कि सभी वस्तुएँ बिना कंपन किए भी ध्वनि उत्पन्न कर सकती हैं।
• क्रियाकलाप के स्पष्ट निष्कर्ष को भौतिक कारणों के साथ नहीं लिखना।
• कंपन और ध्वनि के संबंध को गलत तरीके से परिभाषित करना।
Exam Tips:
a) उत्तर में हमेशा दैनिक जीवन या क्रियाकलाप आधारित उदाहरणों का उल्लेख करें।
b) 'कंपन' शब्द का प्रयोग मुख्य बिंदु के रूप में अवश्य करें।
c) उत्तर को छोटे-छोटे तार्किक चरणों में विभाजित करके लिखें।
Question 2: ध्वनि तरंग की उत्पत्ति को पिस्टनयुक्त नली के उदाहरण द्वारा समझाइए, तथा संपीडन एवं विरलन की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
Answer:
वायु से भरी एक लंबी नली, जिसके एक सिरे पर पिस्टन लगा है, के माध्यम से ध्वनि तरंग की उत्पत्ति को समझा जा सकता है। जब पिस्टन आगे की ओर गति करता है, तो यह समीप की वायु के कणों को धक्का देकर विस्थापित करता है, जिससे वायु एक क्षेत्र में संपीड़ित हो जाती है – इस क्षेत्र को संपीडन (Compression) कहते हैं।
इसके विपरीत, जब पिस्टन पीछे की ओर गति करता है, तो वायु कम सघन हो जाती है – इस क्षेत्र को विरलन (Rarefaction) कहते हैं। पिस्टन के आगे-पीछे होने वाले निरंतर दोलन से क्रमशः संपीडन और विरलन उत्पन्न होते रहते हैं, जो स्रोत से दूर की ओर गमन करते हैं। माध्यम के कणों के वास्तविक संचरण के बिना क्रमिक रूप से संचरित होने वाले इन संपीडनों और विरलनों की श्रृंखला को ही ध्वनि तरंग कहा जाता है।
मुख्य बिंदु:
• संपीडन वह क्षेत्र है जहाँ वायु के कण पास-पास होते हैं और दाब अधिक होता है।
• विरलन वह क्षेत्र है जहाँ वायु के कण दूर-दूर होते हैं और दाब कम होता है।
• ध्वनि तरंग के संचरण में माध्यम के कणों का आगे-पीछे विस्थापन होता है, न कि उनका स्थानांतरण।
आम गलतियाँ:
• संपीडन और विरलन की परिभाषा में भ्रमित होना।
• यह समझना कि तरंग के साथ माध्यम के कण भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते हैं।
• पिस्टन की गति और वायु के घनत्व के बीच के संबंध को स्पष्ट न करना।
Exam Tips:
a) संपीडन और विरलन को रेखांकित करते हुए स्पष्ट परिभाषा दें।
b) पिस्टनयुक्त नली का उदाहरण भौतिकी के कॉन्सेप्ट को समझाने के लिए जरूर लिखें।
c) कणों के कंपन और ऊर्जा के संचरण के अंतर को स्पष्ट रखें।
Question 3: प्रतिध्वनि और अनुरणन में अंतर स्पष्ट करते हुए बताइए कि आधुनिक सभागारों के डिजाइन में इनका ध्यान क्यों रखा जाता है।
Answer:
प्रतिध्वनि तब उत्पन्न होती है जब मूल ध्वनि किसी कठोर सतह से परावर्तित होकर कम-से-कम \( 0.1 \) सेकंड के बाद कानों तक पहुँचती है, जिससे मूल ध्वनि और परावर्तित ध्वनि दोनों अलग-अलग सुनाई देती हैं। वहीं, अनुरणन (Reverberation) तब होता है जब किसी हॉल में ध्वनि दीवारों से अनेक बार \( 0.05 \) सेकंड से कम समयांतराल में लगातार परावर्तित होती रहती है, जिससे ध्वनि का स्रोत बंद होने के बाद भी वह कुछ समय तक गूंजती रहती है।
यदि किसी सभागार में अत्यधिक अनुरणन हो, तो ध्वनि आपस में मिलकर अस्पष्ट और विकृत हो जाती है। इसलिए आधुनिक सभागारों और कॉन्सर्ट हॉलों की वास्तुकला को विशेष रूप से डिजाइन किया जाता है, तथा ध्वनि-अवशोषक पैनल, गद्देदार कुर्सियाँ और पर्दे लगाए जाते हैं, ताकि अवांछित परावर्तन रुकें और श्रोता तक स्पष्ट ध्वनि पहुँच सके।
मुख्य बिंदु:
• प्रतिध्वनि के लिए न्यूनतम समयांतराल \( 0.1 \) सेकंड होना आवश्यक है।
• अनुरणन बार-बार होने वाले कम अंतराल के परावर्तनों का परिणाम है।
• सभागारों में ध्वनि नियंत्रण के लिए ध्वनि-अवशोषक सामग्रियों का उपयोग किया जाता है।
आम गलतियाँ:
• प्रतिध्वनि और अनुरणन के समयांतराल (\( 0.1 \) सेकंड और \( 0.05 \) सेकंड) में गलती करना।
• सभागार के डिजाइन में ध्वनि अवशोषण के उद्देश्य को न समझाना।
• दोनों शब्दों को एक ही मान लेना।
Exam Tips:
a) दोनों के बीच का मुख्य अंतर समय अंतराल और गूँज के आधार पर स्पष्ट करें।
b) सभागारों में उपयोग होने वाली अवशोषक सामग्रियों के नाम (पर्दे, पैनल) अवश्य लिखें।
c) परिभाषा में स्पष्टता और वैज्ञानिक शब्दावली का प्रयोग करें।
Question 4: सोनार तकनीक की कार्यप्रणाली समझाइए और इसके एक संख्यात्मक उदाहरण से महासागर की गहराई ज्ञात करने की विधि बताइए।
Answer:
सोनार (SONAR - Sound Navigation And Ranging) तकनीक में जहाज से पराश्रव्य (Ultrasonic) तरंगें जल में भेजी जाती हैं, जो पनडुब्बी या समुद्र तल जैसी वस्तुओं से टकराकर परावर्तित होती हैं और वापस जहाज तक पहुँचती हैं। इन परावर्तित तरंगों द्वारा लिए गए कुल समय की सहायता से वस्तु या समुद्र तल की दूरी ज्ञात की जाती है।
उदाहरण के लिए, यदि सोनार संकेत को समुद्र तल से वापस आने में \( 4 \) सेकंड का समय लगता है और समुद्री जल में ध्वनि की चाल \( 1500 \text{ m/s} \) है, तो कुल तय की गई दूरी निम्न प्रकार होगी:
\( \text{कुल दूरी} = \text{चाल} \times \text{समय} \)
\( \text{कुल दूरी} = 1500 \times 4 = 6000 \text{ m} \)
चूँकि यह दूरी ध्वनि के जाने और वापस आने दोनों की है, अतः महासागर की वास्तविक गहराई आधी होगी:
\( \text{महासागर की गहराई} = \frac{6000}{2} = 3000 \text{ मीटर} \)
मुख्य बिंदु:
• सोनार पराश्रव्य तरंगों के परावर्तन के सिद्धांत पर कार्य करता है।
• महासागर की गहराई निकालते समय कुल दूरी को \( 2 \) से विभाजित करना अनिवार्य है क्योंकि ध्वनि को जाना और लौटना होता है।
• इस विधि का उपयोग समुद्र की गहराई मापने और डूबी हुई वस्तुओं का पता लगाने में किया जाता है।
आम गलतियाँ:
• गणना करते समय जाने और आने की दूरी के अंतर को भूल जाना और \( 2 \) से भाग न देना।
• चाल, समय और दूरी के सही सूत्र का प्रयोग न करना।
• पराश्रव्य तरंगों के स्थान पर सामान्य ध्वनि तरंगों का उल्लेख करना।
Exam Tips:
a) संख्यात्मक प्रश्नों में प्रत्येक चरण को अलग-अलग लाइन में लिखकर दिखाएं।
b) अंतिम उत्तर के साथ उचित मात्रक (मीटर या m) अवश्य लिखें।
c) सोनार का पूरा नाम और उसकी कार्यप्रणाली के मुख्य बिंदुओं को संक्षिप्त में बताएँ।
Question 5: मानव द्वारा ध्वनि-बोध (तारत्व और प्रबलता) को समझाते हुए बताइए कि ये भौतिक गुणों से किस प्रकार भिन्न हैं।
Answer:
ध्वनि के भौतिक गुण जैसे आवर्तकाल, तरंगदैर्घ्य, आवृत्ति, आयाम और चाल पूरी तरह सुपरिभाषित हैं और इन्हें भौतिक उपकरणों द्वारा सटीक रूप से मापा जा सकता है। परंतु, ध्वनि को मानव द्वारा अनुभव करने की प्रक्रिया व्यक्तिनिष्ठ (Subjective) होती है। ध्वनि की आवृत्ति के मानवीय बोध को तारत्व (Pitch) कहते हैं – उच्च आवृत्ति की ध्वनि का तारत्व उच्च होता है (जैसे सीटी की आवाज़) और निम्न आवृत्ति की ध्वनि का तारत्व निम्न होता है (जैसे बादलों की गड़गड़ाहट)।
वहीं, ध्वनि तरंग के आयाम के मानवीय बोध को प्रबलता (Loudness) कहा जाता है – अधिक आयाम वाली ध्वनि अधिक प्रबल (तेज) सुनाई देती है। इस प्रकार, भौतिकी में तीव्रता एक मापन योग्य भौतिक राशि है, जबकि प्रबलता श्रोता की कान की श्रव्य क्षमता और संवेदनशीलता पर निर्भर करती है।
मुख्य बिंदु:
• आवृत्ति का संबंध ध्वनि के तारत्व से होता है, जो तीक्ष्णता निर्धारित करता है।
• आयाम का संबंध ध्वनि की प्रबलता से होता है, जो उसकी ऊर्जा और ऊँचेपन को दर्शाता है।
• भौतिक राशियाँ वस्तुनिष्ठ होती हैं जबकि मानवीय बोध (तारत्व और प्रबलता) व्यक्तिनिष्ठ होते हैं।
आम गलतियाँ:
• आवृत्ति और आयाम के प्रभावों को आपस में मिला देना।
• तारत्व और प्रबलता को पूरी तरह से भौतिक राशियाँ मान लेना जबकि ये मानवीय अनुभूति हैं।
• दैनिक जीवन के सही उदाहरण (जैसे सीटी और गड़गड़ाहट) न देना।
Exam Tips:
a) तारत्व और प्रबलता की परिभाषा देते समय क्रमशः आवृत्ति और आयाम का उल्लेख जरूर करें।
b) भौतिक गुणों और मानवीय बोध के अंतर को स्पष्ट रूप से बिंदुवार समझाएँ।
c) परीक्षा में स्पष्टता के लिए उदाहरणों का प्रयोग करें।
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