Official NCERT Solutions for Class 9 Science: Chapter 13 पृथ्वी एक तंत्र ऊर्जा, द्रव्य और जीवन
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Chapter-wise Solutions for Science: Chapter 13 पृथ्वी एक तंत्र ऊर्जा, द्रव्य और जीवन
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Question 1: पृथ्वी के पाँच परस्पर संबंधित मंडलों का वर्णन कीजिए और उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए कि एक मंडल में विक्षोभ अन्य मंडलों को किस प्रकार प्रभावित करता है।
Answer:
पृथ्वी में पाँच परस्पर संबंधित मंडल पाए जाते हैं जो निम्नलिखित हैं:
1. भूमंडल: इसमें ठोस चट्टानें, मृदा और विभिन्न भू-आकृतियाँ शामिल हैं।
2. जलमंडल: इसमें द्रव रूप में जल जैसे महासागर, नदियाँ, झीलें और भूजल आते हैं।
3. हिममंडल: यह जल का ठोस रूप है, जिसमें हिम और बर्फ शामिल हैं।
4. वायुमंडल: यह पृथ्वी के चारों ओर आवरण के रूप में मौजूद वायु की परत है।
5. जैवमंडल: इसमें सभी जीवित जीव और उनके पर्यावास सम्मिलित हैं।
ये सभी मंडल आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। किसी एक मंडल में होने वाला विक्षोभ या परिवर्तन अन्य मंडलों को भी प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, यदि शीतकाल में हिमपात कम होता है (हिममंडल प्रभावित होता है), तो ग्रीष्मकाल में झीलों का जल स्तर घट जाता है (जलमंडल प्रभावित होता है), जिससे मैदानी क्षेत्रों में घास की वृद्धि के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं हो पाता और अंततः जैवमंडल प्रभावित होता है। इसी प्रकार, वायुमंडलीय तापमान में वृद्धि होने से हिमानियाँ और ध्रुवीय हिम तेजी से पिघलती हैं, जिससे समुद्र का जल स्तर बढ़ जाता है और तटीय क्षेत्रों में रहने वाले जीवों तथा मानव बस्तियों को खतरा उत्पन्न हो जाता है।
मुख्य बिंदु:
• पृथ्वी पर पाँच प्रमुख मंडल भूमंडल, जलमंडल, हिममंडल, वायुमंडल और जैवमंडल हैं।
• सभी मंडल एक-दूसरे पर निर्भर हैं और परस्पर संबंधित रूप से कार्य करते हैं।
• एक मंडल का परिवर्तन या विक्षोभ श्रृंखला प्रतिक्रिया के माध्यम से अन्य मंडलों को प्रभावित करता है।
आम गलतियाँ:
• छात्रों द्वारा केवल मंडलों के नाम लिखकर उनके अंतर्संबंधों को उदाहरण सहित स्पष्ट न करना।
• हिममंडल और जलमंडल को एक ही मान लेना जबकि दोनों की अवस्थाएँ अलग हैं।
• विक्षोभ के प्रभाव को केवल एक ही मंडल तक सीमित मान लेना।
Exam Tips:
a) पृथ्वी के पाँचों मंडलों के नाम और उनके मुख्य घटकों को स्पष्ट रूप से लिखें।
b) अंतर्संबंध को समझाने के लिए हिमपात, जल स्तर और जैवमंडल का उचित उदाहरण दें।
c) उत्तर को पैराग्राफ के साथ-साथ बिंदुओं में लिखकर अधिक प्रभावशाली बनाएँ।
Question 2: पृथ्वी की सतह पर सौर विकिरण की पारस्परिक क्रिया को स्पष्ट कीजिए और एल्बिडो की भूमिका बताइए।
Answer:
पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाला सौर विकिरण विभिन्न पदार्थों द्वारा अलग-अलग मात्रा में अवशोषित और परावर्तित किया जाता है। गहरे रंग की सतहें सूर्य के प्रकाश का अधिक अवशोषण करती हैं और अधिक गर्म हो जाती हैं, जबकि हल्के रंग की सतहें प्रकाश का अधिकांश भाग परावर्तित कर देती हैं और अपेक्षाकृत ठंडी बनी रहती हैं। किसी सतह द्वारा परावर्तित सौर विकिरण का अंश उसका एल्बिडो कहलाता है।
उच्च एल्बिडो वाली सतहें (जैसे हिम और बर्फ, जिनका एल्बिडो 0.80 से 0.90 तक होता है) अधिक प्रकाश परावर्तित करती हैं, जिसके कारण वे ठंडी रहती हैं और ध्रुवीय प्रदेश अत्यधिक ठंडे बने रहते हैं। इसके विपरीत, निम्न एल्बिडो वाली सतहें (जैसे काली मृदा और महासागरीय जल) प्रकाश का कम परावर्तन और अधिक अवशोषण करती हैं, जिससे वे शीघ्रता से गर्म हो जाती हैं। जलवायु परिवर्तन के अध्ययन में यह अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक तापन के कारण हिम पिघलने से एल्बिडो घटता है, जिससे पृथ्वी का तापन और अधिक तीव्र हो जाता है।
मुख्य बिंदु:
• विभिन्न सतहें सूर्य के प्रकाश को अलग-अलग मात्रा में अवशोषित और परावर्तित करती हैं।
• किसी सतह द्वारा सौर विकिरण के परावर्तन का अनुपात एल्बिडो कहलाता है।
• हिम और बर्फ का एल्बिडो उच्च होता है जबकि काली मृदा और जल का एल्बिडो निम्न होता है।
आम गलतियाँ:
• एल्बिडो की परिभाषा में परावर्तित अंश के स्थान पर अवशोषित अंश लिख देना।
• उच्च और निम्न एल्बिडो के प्रभावों (ठंडा या गर्म रहना) को आपस में मिला देना।
• जलवायु परिवर्तन के साथ एल्बिडो के संबंध को स्पष्ट न करना।
Exam Tips:
a) एल्बिडो शब्द को मानक वैज्ञानिक परिभाषा के साथ ही लिखें।
b) बर्फ और गहरे रंग की मृदा के एल्बिडो का मान व अंतर अवश्य दर्शाएँ।
c) जलवायु परिवर्तन पर इसके पड़ने वाले प्रभाव का संक्षिप्त उल्लेख जरूर करें।
Question 3: स्थानीय पवन (घाटी समीर और पर्वतीय समीर) तथा ग्रहीय पवन के निर्माण की प्रक्रिया को समझाइए।
Answer:
स्थानीय पवनें पृथ्वी की सतह के असमान ऊष्मन के कारण उत्पन्न होती हैं। दिन के समय सूर्य के सामने वाली पर्वतीय ढलानें घाटी तल की तुलना में अधिक तीव्रता से गर्म होती हैं, जिससे ढलानों के पास की वायु गर्म होकर ऊपर उठती है और वहाँ निम्न दाब क्षेत्र बन जाता है; परिणाम둡, घाटी से ठंडी वायु ऊपर की ओर बहती है जिसे घाटी समीर कहते हैं। सूर्यास्त के पश्चात यह स्थिति बिल्कुल विपरीत हो जाती है—ढलानें ठंडी हो जाती हैं और घाटी की ओर ठंडी वायु बहती है, जिसे पर्वतीय समीर कहा जाता है।
दूसरी ओर, भूमध्य रेखा और ध्रुवों के बीच बड़े पैमाने पर होने वाले असमान ऊष्मन से उच्च व निम्न दाब की पट्टियाँ बनती हैं, जिससे ग्रहीय पवनों का निर्माण होता है। भूमध्य रेखा के पास गर्म वायु ऊपर उठकर निम्न दाब पट्टी बनाती है, जो लगभग 30° अक्षांश पर उतरकर उच्च दाब पट्टी का निर्माण करती है। पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूर्णन के कारण ये पवनें सीधी रेखा में न बहकर वक्राकार मार्ग में चलती हैं।
मुख्य बिंदु:
• स्थानीय पवनें दिन और रात के समय पर्वतीय ढलानों और घाटियों के तापमान अंतर से बनती हैं।
• दिन में घाटी समीर और रात में पर्वतीय समीर का प्रवाह होता है।
• ग्रहीय पवनें भूमध्य रेखा और ध्रुवों के असमान ऊष्मन तथा पृथ्वी के घूर्णन (कोरिऑलिस प्रभाव) से चलती हैं।
आम गलतियाँ:
• घाटी समीर और पर्वतीय समीर के समय (दिन और रात) को आपस में भ्रमित कर देना।
• ग्रहीय पवनों के निर्माण में पृथ्वी के घूर्णन की भूमिका को छोड़ देना।
• दाब पट्टियों (उच्च और निम्न दाब) के बनने की प्रक्रिया को स्पष्ट न करना।
Exam Tips:
a) स्थानीय पवनों को समझाते समय दिन और रात की स्थितियों को अलग-अलग पैराग्राफ में लिखें।
b) ग्रहीय पवनों के निर्माण में अक्षांशों और दाब पट्टियों का सही जिक्र करें।
c) चित्र या प्रवाह चार्ट के रूप में इस अवधारणा को मानसिक रूप से स्पष्ट रखकर उत्तर लिखें।
Question 4: कार्बन चक्र का विस्तृत वर्णन कीजिए और बताइए कि मानवीय गतिविधियाँ इसे किस प्रकार बाधित कर रही हैं।
Answer:
कार्बन जीवन का मुख्य आधार है और यह वायुमंडल (कार्बन डाइऑक्साइड गैस), जैवमंडल (पादप और जंतु), भूमंडल (कार्बोनेट चट्टानें और जीवाश्म ईंधन) तथा जलमंडल (घुली हुई कार्बन डाइऑक्साइड) के मध्य निरंतर परिसंचित होता रहता है। कार्बन चक्र दो रूपों में चलता है—द्रुत चक्र और मंद चक्र। द्रुत चक्र में पादप प्रकाश संश्लेषण द्वारा वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड को ग्लूकोस में बदलते हैं और श्वसन व अपघटन द्वारा यह पुनः वायुमंडल में लौटती है। मंद चक्र में मृत पादप और जंतु मृदा में दबकर लाखों वर्षों में जीवाश्म ईंधनों में परिवर्तित हो जाते हैं।
मानवीय गतिविधियाँ इस प्राकृतिक संतुलन को गंभीर रूप से बाधित कर रही हैं। जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक दहन और बड़े पैमाने पर वनोन्मूलन के कारण 1960 के दशक से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगभग 35 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है (जो 315 ppm से बढ़कर 420 ppm हो गई है)। इससे हरितगृह प्रभाव तीव्र हो रहा है, वैश्विक तापन बढ़ रहा है, हिमानियाँ पिघल रही हैं, तथा महासागरीय जल अधिक अम्लीय हो रहा है, जिससे सूक्ष्म प्लवकों और प्रवाल भित्तियों के जीवन को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।
मुख्य बिंदु:
• कार्बन वायुमंडल, जैवमंडल, भूमंडल और जलमंडल के बीच निरंतर प्रवाहित होता है।
• प्रकाश संश्लेषण और श्वसन द्रुत चक्र बनाते हैं, जबकि जीवाश्म ईंधन का निर्माण मंद चक्र है।
• मानवीय गतिविधियों (ईंधन दहन और वनोन्मूलन) से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा तेजी से बढ़ी है।
आम गलतियाँ:
• केवल वायुमंडल और पौधों तक कार्बन चक्र को सीमित रखना और भूमंडल या जलमंडल की भूमिका छोड़ देना।
• ppm (पार्ट्स प्रति मिलियन) के आँकड़ों को गलत लिखना।
• कार्बन वृद्धि के पर्यावरणीय परिणामों (जैसे महासागरीय अम्लीकरण) का उल्लेख न करना।
Exam Tips:
a) कार्बन चक्र के चारों प्रमुख भंडारों का स्पष्ट उल्लेख करें।
b) द्रुत चक्र और मंद चक्र में अंतर को भली-भांति समझाएँ।
c) मानवीय हस्तक्षेप और उसके दुष्परिणामों को बुलेट पॉइंट्स में लिखें ताकि परीक्षक का ध्यान आकर्षित हो।
Question 5: पृथ्वी की प्रक्रियाओं पर मानवीय प्रभाव का वर्णन करते हुए बताइए कि पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को पुनः स्थापित करने के लिए कौन-से उपाय किए जा सकते हैं।
Answer:
मानवीय गतिविधियाँ पृथ्वी के विभिन्न मंडलों में जैव-रासायनिक चक्रों को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं। वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की अत्यधिक वृद्धि से महासागरों की अम्लीयता बढ़ रही है, जिससे प्रवाल भित्तियों को खतरा पैदा हो गया है। कृषि में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से जल स्रोतों में सुपोषण होता है, जिससे पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और जलीय जीव (मछलियाँ आदि) मरने लगते हैं। वनोन्मूलन के कारण मृदा अपरदन बढ़ रहा है तथा वाहनों के धुएँ से धूमकुहरा व हानिकारक ओजोन का निर्माण होता है।
इन समस्याओं के समाधान और पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को पुनः स्थापित करने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
1. ऊर्जा और ऊर्जा संसाधनों का विवेकपूर्ण संरक्षण तथा सौर एवं पवन जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का अधिकतम उपयोग।
2. बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना और वनों की कटाई पर रोक लगाना।
3. जल संरक्षण की तकनीकों को अपनाना और सतत कृषि पद्धतियों का पालन करना।
4. मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल जैसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों का पालन करना तथा मिशन लाइफ जैसी पहलों के माध्यम से व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर कचरे को कम करना, पुनः उपयोग (Reuse) और पुनर्चक्रण (Recycle) की आदत डालना।
मुख्य बिंदु:
• मानवीय क्रियाएँ जैसे प्रदूषण, उर्वरक का उपयोग और वनोन्मूलन प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ रहे हैं।
• जलीय निकायों में सुपोषण और महासागरों का अम्लीकरण प्रमुख पर्यावरणीय संकट हैं।
• नवीकरणीय ऊर्जा, वृक्षारोपण और सतत जीवन शैली से संतुलन पुनः स्थापित किया जा सकता है।
आम गलतियाँ:
• केवल समस्या लिखकर उनके निवारण के उपायों को न लिखना।
• सुपोषण (Eutrophication) जैसी प्रक्रिया को ठीक से स्पष्ट न करना।
• व्यक्तिगत और वैश्विक दोनों स्तरों के प्रयासों को उत्तर में शामिल न करना।
Exam Tips:
a) उत्तर को दो भागों में विभाजित करें—पहला मानवीय प्रभाव और दूसरा सुधार के उपाय।
b) नवीकरणीय ऊर्जा, सतत कृषि और मिशन लाइफ जैसे प्रमुख कीवर्ड्स का अवश्य प्रयोग करें।
c) स्पष्ट और तथ्यात्मक भाषा का उपयोग करें ताकि उत्तर उच्च गुणवत्ता का लगे।
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Free NCERT Textbook Explanations: Class 9 Science Chapter 13 पृथ्वी एक तंत्र ऊर्जा, द्रव्य और जीवन
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