Official NCERT Solutions for Class 9 Science: Chapter 12 जीवजगत का स्वरूप विविधता एवं वर्गीकरण
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Chapter-wise Solutions for Science: Chapter 12 जीवजगत का स्वरूप विविधता एवं वर्गीकरण
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Question 1: समय-समय पर विकसित हुई विभिन्न जैविक वर्गीकरण प्रणालियों का वर्णन कीजिए।
Answer:
समय-समय पर जीवों को वर्गीकृत करने के लिए विभिन्न वैज्ञानिकों द्वारा कई प्रणालियाँ प्रस्तुत की गईं, जो निम्नलिखित हैं:
1. अरस्तू की प्रणाली: चौथी शताब्दी में अरस्तू ने जीवों को उनके पर्यावास (भूमि, जल, वायु) के आधार पर समूहित किया, परंतु यह प्रणाली पूरी तरह से बाहरी विशेषताओं पर आधारित थी।
2. द्विजगत प्रणाली: 18वीं शताब्दी में वैज्ञानिकों ने द्विजगत प्रणाली प्रस्तुत की, जिसमें सभी सजीवों को पादप (प्लांटी) और जंतु (एनिमेलिया) जगत में बाँटा गया। परंतु इसमें अमीबा जैसे जीवों को लेकर वर्गीकरण में भ्रम उत्पन्न हुआ।
3. त्रिजगत प्रणाली: द्विजगत प्रणाली की कमियों को दूर करने के लिए 1866 में अर्न्स्ट हेकेल ने तीसरा जगत 'प्रोटिस्टा' जोड़ा।
4. चतुर्जगत प्रणाली: सूक्ष्मदर्शी यंत्रों में सुधार के बाद 1938 में हर्बर्ट एफ. कोपलैंड ने जीवाणुओं को एक अलग 'मोनेरा' जगत में रखकर चार जगत प्रणाली बनाई।
5. पंचजगत प्रणाली: अंततः 1969 में रॉबर्ट एच. व्हिटेकर ने कवकों को एक अलग जगत 'फंजाई' में रखकर पाँच जगत वर्गीकरण प्रणाली (मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी, एनिमेलिया) प्रस्तुत की, जो वर्तमान में विज्ञान जगत में सर्वाधिक स्वीकृत प्रणाली है।
मुख्य बिंदु:
• अरस्तू ने जीवों का वर्गीकरण उनके पर्यावास (भूमि, जल, वायु) के आधार पर किया था।
• द्विजगत प्रणाली में सजीवों को केवल प्लांटी और एनिमेलिया में विभाजित किया गया था।
• रॉबर्ट एच. व्हिटेकर ने 1969 में आधुनिक पाँच जगत वर्गीकरण प्रणाली प्रस्तुत की।
आम गलतियाँ:
• विभिन्न वर्गीकरण प्रणालियों के कालक्रम और वैज्ञानिकों के नामों को आपस में मिला देना।
• केवल पाँच जगतों के नाम लिखकर उनके विकास के इतिहास को छोड़ देना।
• द्विजगत प्रणाली की कमियों (जैसे अमीबा का स्थान) को स्पष्ट न करना।
Exam Tips:
a) उत्तर लिखते समय वैज्ञानिकों के नाम और उनके द्वारा दिए गए जगत का वर्षवार उल्लेख करें।
b) पाँचों जगतों के नाम क्रमानुसार (मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी, एनिमेलिया) ही लिखें।
c) उत्तर को अधिक प्रभावी बनाने के लिए फ्लो चार्ट या क्रमिक बिंदुओं का प्रयोग करें।
Question 2: जगत प्लांटी (पादप जगत) के पाँच वर्गों का वर्णन उनकी विशिष्ट विशेषताओं सहित कीजिए।
Answer:
जगत प्लांटी को उनकी शारीरिक संरचना और जनन तंत्र की जटिलता के आधार पर पाँच प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है:
1. थैलोफाइटा: ये सबसे सरल पादप होते हैं जिनका शरीर थैलस जैसा होता है और ये मुख्य रूप से जलीय पर्यावास के लिए अनुकूलित होते हैं, जैसे स्पाइरोगाइरा।
2. ब्रायोफाइटा: इन्हें पादप जगत का उभयचर कहा जाता है क्योंकि ये प्रथम स्थलीय पौधे हैं जिनमें मूलाभास तो होते हैं परंतु लैंगिक जनन के लिए जल की अनिवार्य आवश्यकता होती है (उदाहरण: मॉस, लिवरवर्ट)।
3. टेरिडोफाइटा: इनमें वास्तविक जड़, तना, पत्तियाँ और संवहनी ऊतक विकसित होते हैं, किंतु ये बीज उत्पन्न नहीं करते और निषेचन के लिए जल पर निर्भर रहते हैं (उदाहरण: फर्न)।
4. जिम्नोस्पर्म: ये शुष्क क्षेत्रों के लिए अनुकूलित पौधे होते हैं जो बीज उत्पन्न करते हैं, परंतु इनके बीज किसी फल के भीतर बंद नहीं होते और निषेचन के लिए जल की आवश्यकता नहीं होती (उदाहरण: चीड़, साइकैड)।
5. एंजियोस्पर्म: ये सबसे जटिल और विविधतापूर्ण पुष्पी पौधे हैं, जो पुष्प व फल उत्पन्न करते हैं तथा इनके बीज फलों के भीतर पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं।
मुख्य बिंदु:
• थैलोफाइटा का शरीर विभेदित नहीं होता और यह थैलस रूप में होता है।
• ब्रायोफाइटा को 'पादप जगत का उभयचर' कहा जाता है।
• जिम्नोस्पर्म में बीज नग्न होते हैं जबकि एंजियोस्पर्म में बीज फलों के अंदर बंद होते हैं।
आम गलतियाँ:
• ब्रायोफाइटा और टेरिडोफाइटा में जल की आवश्यकता को लेकर भ्रमित होना।
• जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म के बीजों की स्थिति में अंतर स्पष्ट न करना।
• प्रत्येक वर्ग के सही उदाहरण न लिखना।
Exam Tips:
a) प्रत्येक वर्ग की विशेषता बताते समय उसके एक या दो मुख्य उदाहरण अवश्य लिखें।
b) पादपों की क्रमिक जटिलता (थैलोफाइटा से एंजियोस्पर्म की ओर) को स्पष्ट रूप से दर्शाएं।
c) 'उभयचर' शब्द का प्रयोग ब्रायोफाइटा के संदर्भ में सटीक रूप से करें।
Question 3: अकशेरुकी जीवों (नॉन-कॉर्डेटा) के विभिन्न संघों का उनकी शारीरिक जटिलता के क्रम में वर्णन कीजिए।
Answer:
अकशेरुकी जीवों में शरीर संगठन की जटिलता सरल से जटिल की ओर क्रमिक रूप से बढ़ती जाती है, जिसका विवरण विभिन्न संघों के अंतर्गत इस प्रकार है:
1. पोरीफेरा: इस संघ के जीवों (जैसे स्पंज) में शरीर संगठन केवल कोशिकीय स्तर का होता है, जिसमें ऊतक या अंग नहीं पाए जाते।
2. नाइडेरिया: इनमें कोशिकाओं से आगे बढ़कर ऊतक-स्तरीय संगठन विकसित होता है (उदाहरण: हाइड्रा, जेलीफिश)।
3. प्लैटीहेल्मिन्थीस: इस संघ के चपटे कृमियों में द्विपार्श्व सममिति और अंग-स्तरीय संगठन विकसित होता है।
4. नेमाटोडा: गोल कृमियों में दो छिद्रों वाली एक सुव्यवस्थित नली-जैसी शरीर रचना पाई जाती है।
5. ऐनेलिडा: केंचुए जैसे जीवों में खंडीभवन (Segmentation) और वास्तविक देहगुहा के साथ अंग-तंत्र स्तर का संगठन होता है।
6. आर्थ्रोपोडा: कीटों और मकड़ियों में संधिित उपांग और मजबूत बहिःकंकाल विकसित होता है, जो जंतु जगत का सबसे बड़ा संघ है।
7. मोलस्का: घोंघा जैसे जीवों में कोमल काया के साथ अंग-तंत्र स्तर का संगठन पाया जाता है।
8. एकाइनोडर्मेटा: स्टारफिश जैसे जीवों में पृष्ठरज्जु रहित होने के बावजूद कठोर कैल्सियमयुक्त अंतःकंकाल पाया जाता है, जो कशेरुकी जीवों की विकास यात्रा के करीब माना जाता है।
मुख्य बिंदु:
• पोरीफेरा में सबसे सरल कोशिकीय स्तर का संगठन होता है।
• ऐनेलिडा और आर्थ्रोपोडा में शारीरिक संगठन अधिक विकसित और खंडीभूत होता है।
• एकाइनोडर्मेटा कशेरुकियों के सबसे निकटतम अकशेरुकी संघों में माना जाता है।
आम गलतियाँ:
• संघों के क्रम को आगे-पीछे लिख देना जिससे जटिलता का सही क्रम बिगड़ जाता है।
• ऊतक स्तर और अंग-तंत्र स्तर के संगठन में अंतर न समझ पाना।
• प्रत्येक संघ के सही जंतु उदाहरण न दे पाना।
Exam Tips:
a) सभी संघों को उनके क्रमिक विकास (पोरीफेरा से एकाइनोडर्मेटा) के अनुसार ही क्रमबद्ध करें।
b) प्रत्येक संघ के साथ एक सामान्य उदाहरण (कोष्टक में) अवश्य लिखें।
c) मुख्य लक्षणों जैसे सममिति, देहगुहा और उपांगों का संक्षिप्त उल्लेख जरूर करें।
Question 4: वर्गीकरण की पदानुक्रमी प्रकृति को बाघ और मटर के पौधे के उदाहरण सहित समझाइए।
Answer:
जीवों का वर्गीकरण एक क्रमबद्ध पदानुक्रम प्रक्रिया है जिसमें बड़े व्यापक समूहों से आरंभ करके छोटे और अधिक विशिष्ट समूहों तक पहुँचा जाता है। यह पदानुक्रम इस प्रकार है: जगत → संघ → वर्ग → गण → कुल → वंश → जाति।
1. बाघ का वर्गीकरण: जगत - एनिमेलिया, संघ - कॉर्डेटा, उपसंघ - वर्टीब्रेटा, वर्ग - मैममेलिया, गण - कार्निवोरा, कुल - फेलिडी, वंश - पेंथेरा और जाति - पी. टाइग्रिस (पैंथेरा टाइग्रिस)।
2. मटर के पौधे का वर्गीकरण: जगत - प्लांटी, संघ - मैग्नोलियोफाइटा, वर्ग - मैग्नोलियोप्सिडा, गण - फेबेलीस, कुल - फेबेसी, वंश - पाइसम और जाति - पाइसम सेटाइवम।
यह पदानुक्रम एक पते की तरह कार्य करता है, जहाँ प्रत्येक निम्नतर स्तर पर जीव अधिक समान विशेषताओं को साझा करते हैं, जिससे वैज्ञानिकों को जीवों की पहचान, तुलना और उनके पारस्परिक संबंधों को समझने में सहायता मिलती है।
मुख्य बिंदु:
• वर्गीकरण का सही पदानुक्रम जगत से शुरू होकर जाति पर समाप्त होता है।
• जैसे-जैसे हम जगत से जाति की ओर बढ़ते हैं, जीवों की समान विशेषताएँ बढ़ती जाती हैं।
• वैज्ञानिक नाम में पहला पद वंश और दूसरा पद जाति को दर्शाता है।
आम गलतियाँ:
• पदानुक्रम की श्रेणियों (जगत, संघ, वर्ग, गण, कुल, वंश, जाति) का क्रम गलत लिख देना।
• जंतु और पादप के वर्गीकरण में प्रयुक्त होने वाले शब्दों में संभ्रमित होना।
• वैज्ञानिक नाम लिखते समय नियमों की उपेक्षा करना।
Exam Tips:
a) पदानुक्रम के सातों स्तरों को तीर के निशान (→) के साथ सही क्रम में प्रदर्शित करें।
b) बाघ और मटर दोनों के वर्गीकरण के चरणों को स्पष्ट रूप से अलग-अलग लिखकर समझाएं।
c) वैज्ञानिक नाम लिखते समय द्विपद नामकरण पद्धति के नियमों का विशेष ध्यान रखें।
Question 5: जैव विविधता पर मंडराते खतरों का वर्णन करते हुए बताइए कि जैव विविधता का संरक्षण क्यों आवश्यक है।
Answer:
प्रकृति में प्रत्येक जाति चाहे वह बड़ी हो या सूक्ष्म, एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जैसे- पौधे भोजन और ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं, जंतु पुष्पों का परागण और बीजों का प्रकीर्णन करते हैं तथा सूक्ष्मजीव पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करते हैं। वर्तमान में प्रदूषण, वनों की कटाई, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग जैसी मानवीय गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के कारण जैव विविधता का तेजी से ह्रास हो रहा है। जब पृथ्वी से कोई एक जाति विलुप्त हो जाती है तो उस पर निर्भर अन्य जातियाँ भी धीरे-धीरे प्रभावित होती हैं और संकट में आ जाती हैं, जैसा कि मणिपुर के संगाई हिरण और उसके फुमडिस पर्यावास के उदाहरण से स्पष्ट होता है। अतः जैव विविधता का संरक्षण इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन, खाद्य सुरक्षा, औषधीय संसाधनों और पृथ्वी पर जीवन की समग्र स्थिरता को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
मुख्य बिंदु:
• मानवीय गतिविधियाँ और जलवायु परिवर्तन जैव विविधता के ह्रास के मुख्य कारण हैं।
• एक भी प्रजाति के विलुप्त होने से संपूर्ण खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है।
• पारिस्थितिक संतुलन और जीवन की निरंतरता के लिए संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
आम गलतियाँ:
• केवल खतरों के कारण लिखकर संरक्षण की आवश्यकता के महत्व को न समझाना।
• पारिस्थितिकी तंत्र और खाद्य श्रृंखला के आपसी संबंधों को स्पष्ट न करना।
• उत्तर में विशिष्ट उदाहरण (जैसे संगाई हिरण) का उल्लेख न करना।
Exam Tips:
a) उत्तर को दो स्पष्ट भागों में विभाजित करें—पहला 'खतरे' और दूसरा 'संरक्षण की आवश्यकता'।
b) पारिस्थितिक संतुलन और मानव जीवन पर इसके प्रभाव को तार्किक रूप से प्रस्तुत करें।
c) पर्यावरण संरक्षण से जुड़े व्यावहारिक बिंदुओं को अपने शब्दों में प्रभावी ढंग से लिखें।
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