NCERT Solutions for Class 9 Science: Chapter 11 जनन जीवन की निरंतरता
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Practice Class 9 Science Solutions: Chapter 11 जनन जीवन की निरंतरता
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Question 1: पौधों में कायिक प्रवर्धन की विभिन्न विधियों (कर्तन, कलम बाँधना, परतन) को उदाहरण सहित समझाइए तथा बताइए कि ये कृषि में किस प्रकार उपयोगी हैं।
Answer:
पादपों में अलैंगिक जनन की कायिक प्रवर्धन विधि एक महत्वपूर्ण तकनीक है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित मुख्य विधियाँ आती हैं:
1. कर्तन (Cutting): इस विधि में पौधे के किसी भाग, विशेषकर तने या टहनी को काटकर, मिट्टी में लगभग 45° से 60° के कोण पर रोपित किया जाता है। उचित नमी और तापमान मिलने पर इससे नई जड़ें विकसित होती हैं और नया पौधा तैयार हो जाता है। उदाहरण के लिए, गुलाब, गन्ना और मनीप्लांट।
2. कलम बाँधना (Grafting): इस विधि में एक स्वस्थ, अच्छी जड़ प्रणाली वाले पौधे (स्कॉस्ट) पर किसी अन्य उत्तम किस्म के पौधे के तने या कली के टुकड़े (साइअन) को जोड़ा जाता है। दोनों के ऊतक आपस में जुड़ जाते हैं, जिससे एक ही पौधे में दोनों किस्मों के वांछित गुण (जैसे अधिक उपज और रोग प्रतिरोधक क्षमता) प्राप्त होते हैं। उदाहरण के लिए, आम और सेब की उन्नत किस्में।
3. परतन (Layering): इस विधि में पौधे की किसी लचीلي या झुकी हुई शाखा के बीच के भाग को छीलकर मिट्टी में दबा दिया जाता है। कुछ समय बाद दबे हुए भाग से अपस्थानिक जड़ें निकल आती हैं। इसके बाद उस शाखा को मुख्य (जनक) पौधे से अलग कर दिया जाता है, जो स्वतंत्र रूप से वृद्धि करने लगता है। उदाहरण के लिए, चमेली, नींबू और अंगूर।
कृषि और बागवानी में उपयोगिता:
• इन विधियों द्वारा आनुवंशिक रूप से समान (क्लोन) तथा उच्च गुणवत्ता वाले पौधे कम समय में बड़े पैमाने पर तैयार किए जाते हैं।
• जिन पौधों में बीज उत्पन्न नहीं होते या जिनके बीज अजीवित होते हैं, उनका प्रवर्धन आसानी से किया जा सकता है।
• इससे बीजों से उगने वाले पौधों की तुलना में कम समय में फल और फूल प्राप्त होने लगते हैं।
मुख्य बिंदु:
• कर्तन में टहनी को तिरछा काटकर मिट्टी में लगाया जाता है।
• कलम बाँधने में दो अलग-अलग पौधों के गुणों को संयोजित किया जाता है।
• परतन में झुकी हुई शाखा को मिट्टी में दबाकर नई जड़ें विकसित की जाती हैं।
• यह तकनीक कृषि और बागवानी में फसलों के सुधार के लिए अत्यंत उपयोगी है।
आम गलतियाँ:
• कर्तन और परतन विधि की परिभाषा में अंतर न स्पष्ट करना।
• कलम बाँधने में स्कॉस्ट और साइअन के सही संयोजन को न समझाना।
• कायिक प्रवर्धन को लैंगिक जनन की प्रक्रिया समझ लेना।
Exam Tips:
a) तीनों विधियों को स्पष्ट उदाहरण (जैसे गुलाब, आम, चमेली) सहित लिखें।
b) कृषि में इनके लाभों को बिंदुओं में लिखकर उत्तर को प्रभावी बनाएँ।
c) वैज्ञानिक शब्दावली जैसे 'अपस्थानिक जड़ें', 'स्कॉस्ट' और 'साइअन' का सही प्रयोग करें।
Question 2: पुष्प के विभिन्न भागों का वर्णन करते हुए बताइए कि परागण और निषेचन की प्रक्रिया किस प्रकार फल और बीज निर्माण की ओर ले जाती है।
Answer:
एक संपूर्ण पुष्प में मुख्य रूप से चार चक्र या भाग होते हैं:
1. बाह्यदल (Sepals): यह पुष्प का सबसे बाहरी हरा भाग है जो कली अवस्था में आंतरिक अंगों की रक्षा करता है।
2. दल (Petals): यह रंगीन और आकर्षक भाग होता है जो कीटों को परागण के लिए आकर्षित करता है।
3. पुंकेसर (Stamen): यह पुष्प का नर जनन अंग है, जिसमें तंतु (Filament) और परागकोश (Anther) होते हैं। परागकोश में परागकण बनते हैं।
4. स्त्रीकेसर (Pistil / Carpel): यह पुष्प का मादा जनन अंग है, जिसके तीन भाग होते हैं – वर्तिकाग्र (Stigma), वर्तिका (Style) और अंडाशय (Ovary)।
परागण और निषेचन की प्रक्रिया:
• परागण (Pollination): परागकोश से परागकणों का उसी पुष्प या अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण परागण कहलाता है (यह स्व-परागण या पर-परागण हो सकता है)।
• पराग नलिका का विकास: वर्तिकाग्र पर पहुँचने के बाद परागकण अंकुरित होता है और एक पराग नलिका का निर्माण करता है जो वर्तिका से होते हुए अंडाशय में स्थित बीजांड तक पहुँचती है।
• निषेचन (Fertilization): पराग नलिका के माध्यम से नर युग्मक बीजांड के भीतर मौजूद मादा युग्मक (अंडकोशिका) के साथ संलयित (युग्मित) होता है, जिसे निषेचन कहते हैं। इसके फलस्वरूप युग्मनज (Zygote) बनता है।
फल और बीज का निर्माण:
• निषेचन के पश्चात, युग्मनज विभाजित होकर भ्रूण में विकसित होता है।
• बीजांड कठोर आवरण विकसित करके बीज में बदल जाता है।
• अंडाशय विकसित होकर फल का निर्माण करता है, जबकि बाह्यदल और दल आमतौर पर मुरझाकर गिर जाते हैं।
मुख्य बिंदु:
• पुष्प के चार मुख्य भाग बाह्यदल, दल, पुंकेसर और स्त्रीकेसर हैं।
• परागकणों का वर्तिकाग्र तक पहुँचना परागण है।
• नर और मादा युग्मक का संलयन निषेचन कहलाता है।
• निषेचन के बाद बीजांड बीज में और अंडाशय फल में बदल जाता है।
आम गलतियाँ:
• परागण और निषेचन को एक ही प्रक्रिया मान लेना।
• पुंकेसर और स्त्रीकेसर के कार्यों को आपस में मिला देना।
• फल और बीज के निर्माण की सही उत्तरजीविता क्रम को न लिखना।
Exam Tips:
a) पुष्प की संरचना को क्रमानुसार (बाहर से भीतर की ओर) लिखें।
b) परागण से फल-बीज बनने के चरणों को फ्लोचार्ट या स्टेप-वाइज दर्शाएँ।
c) नर युग्मक और मादा युग्मक शब्दों का सटीक प्रयोग करें।
Question 3: नर जनन तंत्र और मादा जनन तंत्र के मुख्य अंगों तथा उनके कार्यों का वर्णन कीजिए।
Answer:
मानव में लैंगिक जनन के लिए सुविकसित नर जनन तंत्र और मादा जनन तंत्र पाए जाते हैं:
नर जनन तंत्र के मुख्य अंग और कार्य:
1. वृषण (Testes): यह मुख्य नर जनन अंग है जो वृषणकोश (Scrotum) नामक थैली में स्थित होते हैं। वृषण शुक्राणुओं (नर युग्मकों) तथा टेस्टोस्टेरोन (नर हार्मोन) का उत्पादन करते हैं।
2. शुक्रवाहिनी (Vas Deferens): यह नली वृषण से शुक्राणुओं को मूत्रमार्ग तक पहुँचाती है।
3. सहायक ग्रंथियाँ: शुक्राशय (Seminal vesicles) और प्रोस्टेट ग्रंथि (Prostate gland) अपने स्राव द्वारा शुक्राणुओं को पोषण प्रदान करती हैं और उन्हें गतिशील बनाती हैं।
मादा जनन तंत्र के मुख्य अंग और कार्य:
1. अंडाशय (Ovaries): यह मादाओं में एक जोड़ी होते हैं, जो अंडाणुओं (मादा युग्मकों) और मादा हार्मोन (ईस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्टेरोन) का निर्माण करते हैं।
2. डिंबवाहिनी (Fallopian Tube / Oviduct): यह अंडाशय को गर्भाशय से जोड़ती है। यहीं पर निषेचन की प्रक्रिया संपन्न होती है।
3. गर्भाशय (Uterus): यह एक थैलीनुमा संरचना है जहाँ निषेचित अंडे (भ्रूण) का रोपण होता है और गर्भस्थ शिशु का विकास होता है।
4. योनि (Vagina): गर्भाशय ग्रीवा (Cervix) के माध्यम से गर्भाशय योनि में खुलता है। यह मार्ग मैथुन के दौरान शुक्राणु ग्रहण करता है तथा प्रसव के समय शिशु जन्म का मार्ग बनता है।
मुख्य बिंदु:
• नर जनन तंत्र का मुख्य अंग वृषण है जो शुक्राणु बनाता है।
• मादा जनन तंत्र का मुख्य अंग अंडाशय है जो अंडाणु उत्पन्न करता है।
• निषेचन की क्रिया डिंबवाहिनी में होती है।
• गर्भ का विकास गर्भाशय के भीतर होता है।
आम गलतियाँ:
• शुक्रवाहिनी और मूत्रमार्ग के कार्यों में भ्रमित होना।
• डिंबवाहिनी और गर्भाशय के अंतर को स्पष्ट न करना।
• हार्मोन और युग्मकों के उत्पादन स्थलों में गलती करना।
Exam Tips:
a) उत्तर को दो स्पष्ट भागों (नर जनन तंत्र और मादा जनन तंत्र) में विभाजित करके लिखें।
b) प्रत्येक अंग का नाम लिखकर उसके सामने उसका मुख्य कार्य स्पष्ट रूप से दर्शाएँ।
c) युग्मक निर्माण और हार्मोन स्रावण के अंतर को विशेष रूप से रेखांकित करें।
Question 4: रजोधर्म चक्र (मासिक धर्म चक्र) के विभिन्न चरणों को उदाहरण सहित समझाइए।
Answer:
मानव मादाओं में जनन परिपक्वता आने पर एक नियमित चक्र संचालित होता है जिसे रजोधर्म चक्र या मासिक धर्म चक्र (Menstrual Cycle) कहते हैं। यह सामान्यतः 28 दिनों का होता है और इसे चार प्रमुख चरणों में विभाजित किया जा सकता है:
1. प्रथम चरण (रजोधर्म काल - दिन 1 से 5): यदि अंडाणु का निषेचन नहीं होता है, तो गर्भाशय का आंतरिक आस्तर (Endometrium) जो रक्त वाहिकाओं और ऊतकों से समृद्ध होता है, टूटने लगता है। यह रक्त और श्लेष्म के रूप में योनि से बाहर निकलता है, जिसे रजोधर्म या मासिक स्राव कहते हैं।
2. कूटोउत्सर्जन या पुटिका चरण (दिन 6 से 14): इस चरण में गर्भाशय के आस्तर का पुनर्निर्माण (मोटा होना) शुरू होता है। साथ ही, अंडाशय के भीतर फॉलिकल (पुटिका) के अंदर अंडाणु परिपक्व होने लगता है।
3. अंडोत्सर्ग (Ovulation - लगभग 14वें दिन): इस दिन हॉर्मोनल परिवर्तन के कारण परिपक्व अंडाणु अंडाशय से बाहर निकलकर डिंबवाहिनी में प्रवेश करता है। यह चक्र का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
4. luteal चरण या स्रावी चरण (दिन 15 से 28): इस दौरान गर्भाशय का आस्तर और अधिक मोटा और स्पंजी हो जाता है ताकि निषेचित अंडे को ग्रहण कर सके। यदि निषेचन नहीं होता है, तो हॉर्मोन का स्तर कम हो जाता है और चक्र पुनः पहले चरण (रजोधर्म) से दोहराया जाता है।
मुख्य बिंदु:
• रजोधर्म चक्र सामान्यतः 28 दिनों की अवधि का होता है।
• पहले चरण में गर्भाशय आस्तर का निस्तारण (मासिक स्राव) होता है।
• 14वें दिन अंडोत्सर्ग (Ovulation) द्वारा अंडाणु निर्मुक्त होता है।
• निषेचन न होने पर चक्र पुनः दोहराया जाता है।
आम गलतियाँ:
• चक्र के दिनों की संख्या और घटनाओं का गलत क्रम लिखना।
• अंडोत्सर्ग के समय (14वें दिन) को गलत बताना।
• गर्भाशय आस्तर के टूटने और बनने की प्रक्रिया को न समझाना।
Exam Tips:
a) चक्र को दिनों के अंतराल (दिन 1-5, 6-14 आदि) के हिसाब से ही वर्गीकृत करके लिखें।
b) वैज्ञानिक शब्दों जैसे 'अंडोत्सर्ग' और 'गर्भाशय आस्तर' का उचित प्रयोग करें।
c) निषेचन होने और न होने की स्थिति के प्रभाव को स्पष्ट करें।
Question 5: जंतुओं में जनन संबंधी विभिन्नताओं को स्पष्ट करते हुए बताइए कि निषेचन विधि (बाह्य/आंतरिक) संतति की उत्तरजीविता को किस प्रकार प्रभावित करती है।
Answer:
जंतुओं में लैंगिक जनन की विधियों में विविधता पाई जाती है, विशेषकर निषेचन के स्थान के आधार पर। निषेचन मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है – बाह्य निषेचन और आंतरिक निषेचन। यह विधि सीधे तौर पर संतति की उत्तरजीविता (Survival) को प्रभावित करती है:
1. बाह्य निषेचन (External Fertilization):
• जल में रहने वाले जंतुओं जैसे मछली और मेंढक में बाह्य निषेचन होता है, जहाँ नर और मादा अपने युग्मक जल में छोड़ते हैं और निषेचन शरीर के बाहर होता है।
• इस विधि में मादा एक बार में हजारों अंडे देती है, क्योंकि जल के बहाव, शिकारियों द्वारा खाए जाने तथा अन्य कारणों से अधिकांश अंडे नष्ट हो जाते हैं।
• सुरक्षा के अभाव के कारण इनमें संतति की उत्तरजीविता दर काफी कम होती है।
2. आंतरिक निषेचन (Internal Fertilization):
• थल पर रहने वाले अधिकांश जंतुओं जैसे पक्षियों, सरीसृपों और स्तनधारियों में आंतरिक निषेचन होता है, जिसमें निषेचन मादा के शरीर के भीतर होता है।
• इसमें कम संख्या में अंडे उत्पन्न होते हैं (जैसे पक्षियों में 1-15), परंतु निषेचित अंडे या भ्रूण माँ के शरीर के सुरक्षात्मक आवरण के भीतर या पर्याप्त पीतक (Yolk) के साथ सुरक्षित रहते हैं।
• शरीर के भीतर सुरक्षा मिलने के कारण इन संतानों की जीवित रहने की संभावना (उत्तरजीविता) मध्यम से उच्च होती है।
मुख्य बिंदु:
• बाह्य निषेचन जल में होता है और इसमें अत्यधिक अंडे नष्ट होते हैं।
• आंतरिक निषेचन मादा शरीर के भीतर होता है जिससे सुरक्षा अधिक मिलती है।
• निषेचन का प्रकार संतति की उत्तरजीविता और उनकी संख्या को निर्धारित करता है।
आम गलतियाँ:
• बाह्य और आंतरिक निषेचन के उदाहरणों में भ्रमित होना।
• संतति की उत्तरजीविता और निषेचन विधि के आपसी संबंध को स्पष्ट न करना।
• अंडों की संख्या और उनकी सुरक्षा के बीच के विपरीत संबंध को न समझाना।
Exam Tips:
a) दोनों विधियों (बाह्य व आंतरिक) में अंतर स्पष्ट करने के लिए तुलनात्मक बिंदुओं का प्रयोग करें।
b) जंतुओं के उदाहरण (मछली, मेंढक बनाम पक्षी, स्तनधारी) अवश्य लिखें।
c) 'उत्तरजीविता' शब्द के वैज्ञानिक अर्थ को उत्तर में भली-भांति दर्शाएँ।
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Science Class 9 Curriculum Solutions: Chapter 11 जनन जीवन की निरंतरता
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