NCERT Solutions Class 9 Science Chapter 05 Exploring Mixtures and their Separation (मिश्रण एवं उनके पृथक्करण का अन्वेषण) Long Answer Questions in Hindi

NCERT Solutions for Class 9 Science: Chapter 05 मिश्रण एवं उनके पृथक्करण का अन्वेषण

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Question 1: विलयन की सांद्रता व्यक्त करने की तीन विधियों (% m/m, % m/v, % v/v) को उदाहरण सहित समझाइए।

Answer:

द्रव्यमान-द्रव्यमान प्रतिशत (% m/m) समांगी मिश्रणों की सांद्रता व्यक्त करता है और यह बताता है कि 100 g विलयन में विलेय के कितने ग्राम उपस्थित हैं, जैसे दुग्ध पाउडर या मसालों के मिश्रण में।
द्रव्यमान-आयतन प्रतिशत (% m/v) का उपयोग तब किया जाता है जब द्रव को तोलने की तुलना में आयतन मापना अधिक सुगम होता है, जैसे 5% ग्लूकोस का विलयन जो 100 mL विलयन में 5 g ग्लूकोस दर्शाता है।
आयतन-आयतन प्रतिशत (% v/v) दो मिश्रणीय द्रवों को मिश्रित करते समय प्रयुक्त होता है, जैसे सिरके में 5% v/v ऐसीटिक अम्ल।
इन तीनों विधियों का चयन पदार्थ की प्रकृति (ठोस या द्रव) और मापने की सुविधा पर निर्भर करता है।

मुख्य बिंदु:

• % m/m विलेय और विलयन दोनों के द्रव्यमान पर आधारित होता है।
• % m/v विलेय के द्रव्यमान और विलयन के आयतन को दर्शाता है।
• % v/v द्रव विलेय और द्रव विलायक दोनों के आयतन का अनुपात है।

आम गलतियाँ:

• द्रव्यमान और आयतन की इकाइयों में भ्रमित होना।
• प्रतिशत निकालते समय विलायक और विलयन के अंतर को न समझना।
• सही सूत्रों का प्रयोग न करना।

Exam Tips:

a) सांद्रता की प्रत्येक विधि का एक-एक व्यावहारिक उदाहरण अवश्य याद रखें।
b) परीक्षा में सूत्र लिखते समय मात्रकों (g और mL) का विशेष ध्यान रखें।
c) परिभाषा लिखते समय '100 g' या '100 mL' मानक का स्पष्ट उल्लेख करें।

 

Question 2: क्रिस्टलीकरण की प्रक्रिया को क्रियाकलाप 5.3 (कॉपर सल्फेट के क्रिस्टल बनाना) के आधार पर चरणबद्ध रूप से समझाइए।

Answer:

सबसे पहले कॉपर सल्फेट को जल में गर्म करके एक संतृप्त विलयन तैयार किया जाता है, जिसमें सल्फ्यूरिक अम्ल की एक बूँद अवांछित रासायनिक अभिक्रियाओं को रोकने के लिए डाली जाती है।
इसके पश्चात, अघुलनशील अशुद्धियों को हटाने के लिए गर्म विलयन का निस्यंदन किया जाता है और निस्यंद को एक स्वच्छ बीकर में एकत्रित कर वॉच ग्लास से ढक दिया जाता है।
अब इसे बिना हिलाए स्थिर रखकर धीरे-धीरे ठंडा होने दिया जाता है, जिससे विलयन में विद्यमान कणों को संगठित होकर नीले रंग के, चमकदार और सुरूपित क्रिस्टल बनने के लिए पर्याप्त समय मिलता है।
अंत में, क्रिस्टलों को निस्यंदित कर, ठंडे जल से धोकर सुखा लिया जाता है।

मुख्य बिंदु:

• संतृप्त विलयन से शुद्ध ठोस को क्रिस्टل के रूप में पृथक करना क्रिस्टलीकरण कहलाता है।
• सल्फ्यूरिक अम्ल जल-अपघटन या अन्य अवांछित अभिक्रियाओं को रोकता है।
• धीरे-धीरे ठंडा करने से बेहतर गुणवत्ता के क्रिस्टल प्राप्त होते हैं।

आम गलतियाँ:

• गर्म विलयन को अचानक या तेजी से ठंडा करना।
• निस्यंदन प्रक्रिया को छोड़ देना।
• क्रिस्टलों को सुखाने के चरण को न लिखना।

Exam Tips:

a) इस प्रक्रिया को हमेशा क्रमबद्ध चरणों में ही लिखें।
b) 'संतृप्त विलयन' और 'निस्यंदन' जैसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक शब्दों का सही प्रयोग करें।
c) कॉपर सल्फेट के क्रिस्टल का रंग (नीला) परीक्षा में अवश्य उल्लेखित करें।

 

Question 3: विलयन, निलंबन और कोलॉइड में कण के आकार, दृश्यता, टिंडल प्रभाव और स्थिरता के आधार पर विस्तृत तुलना कीजिए।

Answer:

विलयन में कणों का आकार सबसे छोटा (< 1 nm) होता है, कण नग्न आँखों से अदृश्य होते हैं, यह टिंडल प्रभाव नहीं दर्शाता है और अत्यंत स्थिर रहता है क्योंकि इसके कण तली पर नहीं बैठते हैं।
कोलॉइड में कणों का आकार मध्यम (1-1000 nm) होता है, ये नग्न आँखों से दिखाई नहीं देते लेकिन प्रकाश का प्रकीर्णन करते हुए टिंडल प्रभाव दर्शाते हैं, और ये भी तली पर नहीं बैठते बल्कि माध्यम में समान रूप से फैले रहते हैं।
निलंबन में कणों का आकार सबसे बड़ा (> 1000 nm) होता है, कण नग्न आँखों से स्पष्ट दिखाई देते हैं, टिंडल प्रभाव दर्शाते हैं और कुछ समय पश्चात गुरुत्वाकर्षण के कारण तली पर बैठ जाते हैं।
इस प्रकार इन तीनों को उनके भौतिक गुणधर्मों के आधार पर स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है।

मुख्य बिंदु:

• कणों का आकार तीनों को एक-दूसरे से भिन्न बनाता है।
• टिंडल प्रभाव केवल कोलॉइड और निलंबन द्वारा दर्शाया जाता है, वास्तविक विलयन द्वारा नहीं।
• स्थिरता के मामले में वास्तविक विलयन और कोलॉइड स्थायी होते हैं, जबकि निलंबन अस्थायी होता है।

आम गलतियाँ:

• कणों के आकार की सीमा (नैनोमीटर में) गलत लिखना।
• यह समझना कि वास्तविक विलयन भी टिंडल प्रभाव दिखाता है।
• स्थिरता के गुण को गलत तरीके से परिभाषित करना।

Exam Tips:

a) इस प्रश्न का उत्तर हमेशा तालिका (Table) के रूप में लिखें ताकि तुलना स्पष्ट हो सके।
b) नैनोमीटर (nm) इकाई का सही और सटीक उल्लेख करें।
c) टिंडल प्रभाव की परिभाषा और कारण को संक्षिप्त में जोड़ें।

 

Question 4: विषमांगी मिश्रणों के पृथक्करण की विभिन्न विधियों (पृथक्कारी कीप, ऊर्ध्वपातन, अपकेंद्रण, स्कंदन) का उनके उपयोग सहित वर्णन कीजिए।

Answer:

पृथक्कारी कीप का उपयोग दो अमिश्रणीय द्रवों, जैसे तेल और जल, को उनके भिन्न घनत्व के आधार पर पृथक करने के लिए किया जाता है।
ऊर्ध्वपातन का उपयोग उन ठोस-ठोस मिश्रणों को पृथक करने के लिए किया जाता है जिनमें एक घटक (जैसे कर्पूर) गर्म करने पर सीधे वाष्प में बदल जाता है जबकि दूसरा घटक (जैसे रेत) नहीं बदलता है।
अपकेंद्रण में मिश्रण को तीव्र गति से घुमाकर अपकेंद्रीय बल की सहायता से भारी कणों को हल्के द्रव से नीचे बैठाकर पृथक किया जाता है, जैसे दूध से क्रीम या रक्त के घटकों को पृथक करने में।
स्कंदन में फिटकरी जैसे स्कंदक की सहायता से सूक्ष्म निलंबित कणों को गुच्छों में एकत्रित कर अवसादित किया जाता है, जैसे जल शुद्धिकरण में।
प्रत्येक विधि मिश्रण के घटकों के भौतिक गुणधर्मों में अंतर पर आधारित होती है।

मुख्य बिंदु:

• पृथक्कारी कीप घनत्व के अंतर पर कार्य करती है।
• ऊर्ध्वपातन सीधे ठोस से गैस में बदलने के गुण पर आधारित है।
• अपकेंद्रण घनत्व और गति जनित बल का उपयोग करता है।

आम गलतियाँ:

• अमिश्रणीय द्रवों के लिए गलत विधि का नाम लिखना।
• ऊर्ध्वपातन के सही उदाहरण (जैसे कपूर और नमक) न दे पाना।
• स्कंदन और निस्यंदन में अंतर स्पष्ट न करना।

Exam Tips:

a) प्रत्येक पृथक्करण विधि के साथ उसका एक सटीक और प्रसिद्ध उदाहरण जरूर लिखें।
b) यह स्पष्ट करें कि किस भौतिक गुण में अंतर के कारण विधि का चयन किया गया है।
c) वैज्ञानिक शब्दावली जैसे 'घनत्व', 'वाष्पीकरण' और 'अपकेंद्रीय बल' का सही प्रयोग करें।

 

Question 5: भारत में मिश्रणों के पृथक्करण से जुड़े पारंपरिक व वैज्ञानिक योगदानों (नमक क्रिस्टलीकरण, कन्नौज की इत्र विधि, ORS) का वर्णन कीजिए।

Answer:

भारत के तटीय क्षेत्रों में नमक का क्रिस्टलीकरण एक प्राचीन प्रक्रिया रही है, जिसमें ‘पांगा’ नमक समुद्र के सांद्र खारे जल को उबालकर और ‘करकच’ नमक समुद्री जल के प्राकृतिक वाष्पीकरण द्वारा प्राप्त किया जाता था।
उत्तर प्रदेश के कन्नौज शहर, जिसे भारत की इत्र राजधानी कहा जाता है, में पारंपरिक ‘देग-भापका विधि’ द्वारा आसवन के माध्यम से पुष्पों से सुगंधित पदार्थों का निष्कर्षण कर सोंधी सुगंध वाला प्राकृतिक इत्र बनाया जाता है।
इसके अतिरिक्त, भारतीय शिशुरोग विशेषज्ञ दिलीप महालनोबिस ने ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ORS) का सूत्रीकरण किया, जिसमें नमक और चीनी की नियत सांद्रता का उपयोग करके निर्जलीकरण (Dehydration) के उपचार में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया गया और विश्व भर में लाखों लोगों के जीवन की रक्षा की गई।

मुख्य बिंदु:

• पारंपरिक तकनीकें भारत की समृद्ध वैज्ञानिक और व्यावहारिक विरासत को दर्शाती हैं।
• कन्नौज की इत्र विधि जल-आसवन (Hydro-distillation) का उत्कृष्ट पारंपरिक उदाहरण है।
• ORS का विकास जीवनरक्षक घोल के रूप में चिकित्सा विज्ञान में एक बड़ा योगदान है।

आम गलतियाँ:

• पारंपरिक विधियों के स्थानीय नाम (जैसे पांगा, करकच, देग-भापका) भूल जाना।
• ORS के घटकों (नमक और चीनी) का सही अनुपात या उद्देश्य न लिखना।
• वैज्ञानिक और पारंपरिक योगदान को आपस में मिला देना।

Exam Tips:

a) भारतीय संदर्भ से जुड़े इन विशेष नामों और स्थानों को उत्तर में रेखांकित (underline) करें।
b) प्रत्येक योगदान (नमक, इत्र, ORS) के वैज्ञानिक सिद्धांत को संक्षेप में स्पष्ट करें।
c) उत्तर लिखते समय ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण दोनों का संतुलन बनाए रखें।

 

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