NCERT Solutions Class 10 Science Chapter 10 The Human Eye and the Colourful World (मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार) in Hindi

Official NCERT Solutions for Class 10 Science: Chapter 10 मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार

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Chapter-wise Solutions for Science: Chapter 10 मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार

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Question 1: मानव नेत्र अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी को समायोजित करके विभिन्न दूरियों पर रखी वस्तुओं को फोकित कर सकता है। ऐसा हो पाने का कारण है -
(a) जरा-दूरदृष्टिता
(b) समंजन
(c) निकट-दृष्टि
(d) दीर्घ-दृष्टि

Answer:

सही उत्तर (b) समंजन है। मानव नेत्र की अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी को आवश्यकतानुसार बदलने या समायोजित करने की क्षमता को समंजन (Accommodation) कहा जाता है। इसके कारण नेत्र पास या दूर की वस्तुओं को स्पष्ट देख पाता है। जरा-दूरदृष्टिता, निकट-दृष्टि और दीर्घ-दृष्टि नेत्र के दोष हैं, न कि फोकस दूरी बदलने की प्रक्रिया।

मुख्य बिंदु:

• अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी में परिवर्तन पक्ष्माभी पेशियों द्वारा किया जाता है।
• इस क्षमता के कारण ही नेत्र विभिन्न दूरियों पर स्थित वस्तुओं का स्पष्ट प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर बनाता है।
• यह नेत्र की एक प्राकृतिक और महत्वपूर्ण कार्यप्रणाली है।

आम गलतियाँ:

• समंजन और नेत्र दोषों को एक ही समझ लेना।
• पक्ष्माभी पेशियों की भूमिका को नजरअंदाज करना।
• गलत विकल्प का चयन करना।

Exam Tips:

a) बहुविकल्पीय प्रश्नों में विकल्पों को ध्यान से पढ़ें।
b) समंजन क्षमता की परिभाषा याद रखें।
c) यह प्रश्न एक-नंबर के प्रश्नों में अक्सर पूछा जाता है।

 

Question 2: मानव नेत्र जिस भाग पर किसी वस्तु का प्रतिबिंब बनाते हैं वह है -
(a) कॉर्निया
(b) परितारिका
(c) पुतली
(d) दृष्टिपटल

Answer:

सही उत्तर (d) दृष्टिपटल (Retina) है। मानव नेत्र में प्रवेश करने वाला प्रकाश कॉर्निया और पुतली से गुजरते हुए अभिनेत्र लेंस पर पड़ता है, जो इसे दृष्टिपटल पर फोकसित करता है। दृष्टिपटल एक सुकुमार झिल्ली होती है जिस पर प्रकाश-सुग्राही कोशिकाएँ होती हैं। यहीं पर वस्तु का वास्तविक और उल्टा प्रतिबिंब बनता है, जिसे मस्तिष्क सीधा अनुभव करता है।

मुख्य बिंदु:

• दृष्टिपटल नेत्र के सबसे पिछले भाग में स्थित पर्दा है।
• यहाँ प्रकाश संकेतों को विद्युत सिग्नलों में बदला जाता है।
• कॉर्निया प्रकाश का अधिकांश अपवर्तन करता है, लेकिन प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर बनता है।

आम गलतियाँ:

• कॉर्निया और दृष्टिपटल के कार्यों में भ्रमित होना।
• परितारिका या पुतली को प्रतिबिंब निर्माण का स्थान समझना।
• बिना सोचे-समझे विकल्प चुनना।

Exam Tips:

a) नेत्र के विभिन्न भागों के कार्य स्पष्ट रूप से याद रखें।
b) प्रतिबिंब हमेशा दृष्टिपटल पर बनता है, इसे कभी न भूलें।
c) नामांकित चित्र का अभ्यास करें ताकि सही भाग की पहचान हो सके।

 

Question 3: सामान्य दृष्टि के वयस्क के लिए सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी होती है, लगभग -
(a) 25 m
(b) 2.5 cm
(c) 25 cm
(d) 2.5 m

Answer:

सही उत्तर (c) 25 cm है। सामान्य नेत्र के लिए बिना किसी तनाव के वस्तुओं को स्पष्ट देखने की न्यूनतम दूरी 25 सेंटीमीटर होती है। यदि वस्तु को इससे अधिक निकट लाया जाए, तो अभिनेत्र लेंस उसे फोकसित नहीं कर पाता और प्रतिबिंब धुंधला दिखाई देता है। इस दूरी को सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी या निकट बिंदु कहा जाता है।

मुख्य बिंदु:

• सामान्य नेत्र का निकट बिंदु 25 सेमी होता है।
• दूर बिंदु अनंत पर होता है।
• उम्र बढ़ने के साथ निकट बिंदु की दूरी थोड़ी बढ़ सकती है।

आम गलतियाँ:

• सेंटीमीटर और मीटर की इकाइयों में भ्रम होना (जैसे 25 m या 25 cm में अंतर न समझना)।
• निकट बिंदु और दूर बिंदु के मानों को आपस में मिला देना।
• मात्रक को ठीक से न देखना।

Exam Tips:

a) मान के साथ-साथ इकाई (सेंटीमीटर) पर विशेष ध्यान दें।
b) यह संख्यात्मक और बहुविकल्पीय दोनों प्रकार के प्रश्नों में उपयोगी है।
c) निकट बिंदु (25 cm) और दूर बिंदु (अनंत) दोनों को याद रखें।

 

Question 4: अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी में परिवर्तन किया जाता है -
(a) पुतली द्वारा
(b) दृष्टिपटल द्वारा
(c) पक्ष्माभी द्वारा
(d) परितारिका द्वारा

Answer:

सही उत्तर (c) पक्ष्माभी (Ciliary muscles) द्वारा है। पक्ष्माभी पेशियाँ अभिनेत्र लेंस की वक्रता को बदलकर उसकी फोकस दूरी को समायोजित करती हैं। जब हमें पास की वस्तु देखनी होती है तो पेशियाँ सिकुड़ती हैं और लेंस मोटा हो जाता है, जिससे फोकस दूरी कम हो जाती है। दूर की वस्तु देखने पर पेशियाँ शिथिल हो जाती हैं और लेंस पतला हो जाता है।

मुख्य बिंदु:

• पक्ष्माभी पेशियाँ लेंस के आकार को नियंत्रित करती हैं।
• यह प्रक्रिया नेत्र की समंजन क्षमता का मुख्य आधार है।
• परितारिका पुतली के आकार को नियंत्रित करती है, लेंस को नहीं।

आम गलतियाँ:

• परितारिका और पक्ष्माभी पेशियों के कार्यों को आपस में मिला देना।
• पुतली को फोकस दूरी बदलने वाला अंग समझ लेना।
• लेंस की वक्रता और फोकस दूरी के संबंध को न समझना।

Exam Tips:

a) पुतली प्रकाश की मात्रा नियंत्रित करती है, पक्ष्माभी पेशियाँ फोकस दूरी नियंत्रित करती हैं।
b) दोनों में अंतर स्पष्ट रखें।
c) चित्र देखकर पेशियों की स्थिति समझें।

 

Question 5: किसी व्यक्ति को अपनी दूर की दृष्टि को संशोधित करने के लिए -5.5 डाइऑप्टर क्षमता के लेंस की आवश्यकता है। अपनी निकट दृष्टि को संशोधित करने के लिए उसे +1.5 डाइऑप्टर क्षमता के लेंस की आवश्यकता है। संशोधित करने के लिए आवश्यक लेंस की फोकस दूरी क्या होगी -
(i) दूर की दृष्टि के लिए
(ii) निकट की दृष्टि के लिए

Answer:

आकृति का विवरण: यहाँ दूर दृष्टि दोष और निकट दृष्टि दोष के संशोधन के लिए क्रमशः अवतल और उत्तल लेंस के उपयोग को दर्शाया गया है।

लेंस की क्षमता (P) और फोकस दूरी (f) में संबंध f = 1/P होता है, जहाँ f मीटर में होता है। इसे सेंटीमीटर में बदलने के लिए 100 से गुणा किया जाता है। (i) दूर की दृष्टि के लिए लेंस की क्षमता P = -5.5 D है, अतः फोकस दूरी f = 100 / (-5.5) = -18.18 cm या लगभग -18 cm होगी। (ii) निकट की दृष्टि के लिए लेंस की क्षमता P = +1.5 D है, अतः फोकस दूरी f = 100 / (+1.5) = +66.67 cm या लगभग 66 cm होगी।

मुख्य बिंदु:

• लेंस की क्षमता और फोकस दूरी एक-दूसरे के व्युत्क्रमानुपाती होती हैं (f = 1/P)।
• ऋणात्मक क्षमता का अर्थ अवतल लेंस है जो दूर दृष्टि (निकट-दृष्टि दोष) सुधारता है।
• धनात्मक क्षमता का अर्थ उत्तल लेंस है जो पास की दृष्टि (दीर्घ-दृष्टि दोष) सुधारता है।

आम गलतियाँ:

• मीटर को सेंटीमीटर में बदलते समय 100 से भाग देना या गलती करना।
• चिह्न (+ या -) को भूल जाना।
• क्षमता और फोकस दूरी के सूत्र का गलत उपयोग करना।

Exam Tips:

a) सूत्र f = 1/P (मीटर में) और f = 100/P (सेंटीमीटर में) अच्छी तरह याद रखें।
b) गणना करते समय दशमलव और चिह्नों का विशेष ध्यान रखें।
c) उत्तर में सही मात्रक (सेमी) अवश्य लिखें।

 

Question 6: किसी निकट-दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति का दूर बिंदु नेत्र के सामने 80 cm दूरी पर है। इस दोष को संशोधित करने के लिए आवश्यक लेंस की प्रकृति तथा क्षमता क्या होगी?

Answer:

निकट-दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति को अनंत पर रखी वस्तु स्पष्ट नहीं दिखती, क्योंकि उसका दूर बिंदु सीमित (80 cm) हो जाता है। इस दोष को दूर करने के लिए अवतल लेंस का उपयोग किया जाता है। यहाँ वस्तु की दूरी u = अनंत (-∞) और प्रतिबिंब की दूरी v = -80 cm है। लेंस सूत्र 1/f = 1/v - 1/u के अनुसार, 1/f = 1/(-80) - 1/(-∞) = -1/80 cm = -0.8 m है। अतः फोकस दूरी f = -80 cm (-0.8 m) होगी। लेंस की क्षमता P = 1 / f (मीटर में) = 1 / (-0.8) = -1.25 डाइऑप्टर होगी। इस प्रकार -1.25 D क्षमता का अवतल लेंस आवश्यक है।

मुख्य बिंदु:

• निकट-दृष्टि दोष में व्यक्ति को दूर की वस्तुएँ साफ नहीं दिखतीं, जिसके लिए अवतल लेंस चाहिए।
• लेंस सूत्र का सही प्रयोग करके फोकस दूरी निकाली जाती है।
• क्षमता निकालने के लिए फोकस दूरी को मीटर में होना आवश्यक है।

आम गलतियाँ:

• u और v के चिह्न (- या +) गलत रख देना।
• सेंटीमीटर को मीटर में बदले बिना क्षमता की गणना करना।
• लेंस की प्रकृति (अवतल या उत्तल) गलत बताना।

Exam Tips:

a) संख्यात्मक प्रश्न हल करते समय पहले दिए गए मान (u, v) चिह्न सहित लिखें।
b) निकट-दृष्टि दोष के लिए हमेशा ऋणात्मक क्षमता वाला अवतल लेंस आता है।
c) गणना के चरणों को साफ-सुथरा लिखें ताकि अंक न कटें।

 

Question 7: चित्र बनाकर दर्शाइए कि दीर्घ-दृष्टि दोष कैसे संशोधित किया जाता है। एक दीर्घ-दृष्टि दोषयुक्त नेत्र का निकट बिंदु 1 m है। इस दोष को संशोधित करने के लिए आवश्यक लेंस की क्षमता क्या होगी? यह मान लीजिए कि सामान्य नेत्र का निकट बिंदु 25 cm है।

Answer:

आकृति का विवरण: इस चित्र में दीर्घ-दृष्टि दोषयुक्त नेत्र तथा उत्तल लेंस के उपयोग द्वारा इसके संशोधन को दर्शाया गया है जिसमें प्रकाश किरणें रेटिना पर फोकसित होती हैं।

दीर्घ-दृष्टि दोष (दूरदृष्टि) में व्यक्ति को पास की वस्तु स्पष्ट नहीं दिखती क्योंकि उसका निकट बिंदु 25 cm से दूर (यहाँ 1 m या 100 cm) हो जाता है। इसे संशोधित करने के लिए उत्तल लेंस का उपयोग किया जाता है। यहाँ वस्तु की सामान्य स्थिति u = -25 cm और आवश्यक प्रतिबिंब की स्थिति v = -1 m = -100 cm है। लेंस सूत्र 1/f = 1/v - 1/u के अनुसार, 1/f = 1/(-100) - 1/(-25) = -1/100 + 4/100 = 3/100 cm है। अतः फोकस दूरी f = 100/3 cm = 1/3 मीटर है। लेंस की क्षमता P = 1 / f (मीटर में) = 1 / (1/3) = +3 डाइऑप्टर होगी। अतः +3 D क्षमता का उत्तल लेंस आवश्यक है।

मुख्य बिंदु:

• दीर्घ-दृष्टि दोष में पास की वस्तु देखने के लिए उत्तल लेंस (+ क्षमता) का उपयोग होता है।
• वस्तु की दूरी u हमेशा -25 cm ली जाती है।
• रोगी का निकट बिंदु प्रतिबिंब दूरी v बनता है।

आम गलतियाँ:

• u और v के मानों को आपस में बदल देना।
• मीटर और सेंटीमीटर के रूपांतरण में गलती करना।
• क्षमता के आगे धनात्मक चिह्न (+) लगाना भूल जाना।

Exam Tips:

a) चित्र बनाने का अभ्यास करें - लेंस लगाने से किरणें कैसे मिलती हैं, इसे दर्शाएं।
b) दीर्घ-दृष्टि दोष के लिए हमेशा उत्तल लेंस और धनात्मक क्षमता आती है।
c) सभी चरणों को सूत्र के साथ क्रमानुसार हल करें।

 

Question 8: सामान्य नेत्र 25 cm से निकट रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट क्यों नहीं देख पाते?

Answer:

सामान्य नेत्र की अभिनेत्र लेंस की एक निश्चित न्यूनतम सीमा (25 cm) होती है। जब हम किसी वस्तु को 25 cm से भी अधिक निकट रखते हैं, तो पक्ष्माभी पेशियाँ अभिनेत्र लेंस को और अधिक वक्रित (मोटी) करने में असमर्थ होती हैं। लेंस की अधिकतम समंजन क्षमता की भी एक सीमा होती है, जिससे वह अत्यधिक पास की वस्तु से आने वाली अपसृत किरणों को दृष्टिपटल पर फोकसित नहीं कर पाता। इस कारण 25 cm से निकट रखी वस्तु का प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर धुंधला बनता है और वस्तु स्पष्ट नहीं दिखाई देती।

मुख्य बिंदु:

• अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी एक न्यूनतम सीमा से कम नहीं हो सकती।
• पक्ष्माभी पेशियों की अपनी संकुचन सीमा होती है।
• सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी 25 सेमी से कम दूरी पर प्रकाश किरणें रेटिना के पीछे या ठीक से फोकसित नहीं होतीं।

आम गलतियाँ:

• यह सोचना कि नेत्र की क्षमता असीमित होती है।
• पक्ष्माभी पेशियों की भूमिका को न समझना।
• 25 सेमी की सीमा के वैज्ञानिक कारण को स्पष्ट न करना।

Exam Tips:

a) उत्तर में 'समंजन क्षमता की सीमा' और 'पक्ष्माभी पेशियों' का उल्लेख अवश्य करें।
b) संक्षिप्त और स्पष्ट भाषा में कारण लिखें।
c) परिभाषा और कारण दोनों को मिलाकर उत्तर दें।

 

Question 9: जब हम नेत्र से किसी वस्तु की दूरी को बढ़ा देते हैं तो नेत्र में प्रतिबिंब-दूरी का क्या होता है?

Answer:

जब हम नेत्र से वस्तु की दूरी बढ़ाते हैं, तब भी नेत्र में प्रतिबिंब-दूरी (अर्थात अभिनेत्र लेंस से दृष्टिपटल की दूरी) में कोई परिवर्तन नहीं होता है, यह हमेशा नियत रहती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अभिनेत्र लेंस अपनी फोकस दूरी को समंजन क्षमता द्वारा समायोजित कर लेता है ताकि वस्तु चाहे पास हो या दूर, उसका स्पष्ट प्रतिबिंब हमेशा दृष्टिपटल (Retina) पर ही बने। दृष्टिपटल और लेंस के बीच की दूरी नेत्रगोलक के आकार के कारण स्थिर रहती है।

मुख्य बिंदु:

• नेत्र में लेंस और दृष्टिपटल की दूरी हमेशा निश्चित रहती है।
• वस्तु की दूरी बदलने पर लेंस अपनी फोकस दूरी बदलता है, प्रतिबिंब दूरी (v) नहीं।
• समंजन क्षमता के कारण प्रतिबिंब हमेशा रेटिना पर बनता है।

आम गलतियाँ:

• यह मान लेना कि वस्तु दूर जाने पर प्रतिबिंब दूरी भी बदल जाती है।
• लेंस की फोकस दूरी और प्रतिबिंब दूरी को एक ही समझ लेना।
• दृष्टिपटल की स्थिति को स्थिर न मानना।

Exam Tips:

a) याद रखें कि सामान्य नेत्र में लेंस से रेटिना की दूरी नहीं बदलती।
b) फोकस दूरी बदलती है, प्रतिबिंब दूरी नहीं - इस अंतर को स्पष्ट लिखें।
c) एक-दो वाक्यों का सटीक उत्तर दें।

 

Question 10: तारे क्यों टिमटिमाते हैं?

Answer:

आकृति का विवरण: इस चित्र में तारों के प्रकाश का वायुमंडलीय अपवर्तन दर्शाया गया है जिसके कारण तारा अपनी वास्तविक स्थिति से थोड़ा ऊपर आभासी स्थिति पर प्रतीत होता है।

तारे के टिमटिमाते प्रतीत होने का मुख्य कारण वायुमंडलीय अपवर्तन है। तारे पृथ्वी से बहुत दूर होने के कारण प्रकाश के बिंदु स्रोत के समान हैं। जब तारों का प्रकाश पृथ्वी के वायुमंडल की विभिन्न परतों (जो अलग-अलग घनत्व और तापमान की होती हैं) से गुजरता है, तो लगातार अपवर्तन के कारण उसका मार्ग थोड़ा-थोड़ा बदलता रहता है। इसके फलस्वरूप, हमारी आँखों तक पहुँचने वाले प्रकाश की मात्रा में उतार-चढ़ाव होता रहता है, जिससे तारे कभी चमकीले तो कभी धुंधले दिखाई देते हैं, जिसे टिमटिमाना कहते हैं।

मुख्य बिंदु:

• इसका कारण वायुमंडलीय अपवर्तन है।
• तारे प्रकाश के बिंदु स्रोत होते हैं क्योंकि वे बहुत दूर हैं।
• वायुमंडल के घनत्व और तापमान में लगातार परिवर्तन से प्रकाश की किरणें विचलित होती हैं।

आम गलतियाँ:

• इसे तारों के वास्तविक प्रकाश के कम-ज्यादा होने से जोड़ना।

• वायुमंडलीय अपवर्तन के स्थान पर परावर्तन लिख देना।
• तारों और ग्रहों के टिमटिमाने के अंतर को न समझना।

Exam Tips:

a) 'वायुमंडलीय अपवर्तन' शब्द का प्रयोग उत्तर में अवश्य करें।
b) तारों को 'बिंदु स्रोत' बताना न भूलें।
c) कारण को क्रमबद्ध तरीके से समझाएं।

 

Question 11: व्याख्या कीजिए कि ग्रह क्यों नहीं टिमटिमाते?

Answer:

ग्रह पृथ्वी के बहुत निकट हैं और इसलिए उन्हें विस्तृत स्रोतों (बिंदु स्रोतों का संग्रह) का रूप माना जा सकता है। चूँकि ग्रह से आने वाले प्रकाश के सभी भागों से आने वाली किरणों का औसत परिवर्तन शून्य होता है, इसलिए टिमटिमाने का प्रभाव निष्प्रभावी हो जाता है। दूसरे शब्दों में, यदि एक बिंदु से प्रकाश की मात्रा कम होती है, तो दूसरे बिंदु से थोड़ी अधिक मात्रा उसकी भरपाई कर देती है। इस प्रकार कुल प्रकाश की चमक स्थिर बनी रहती है, और ग्रह टिमटिमाते हुए प्रतीत नहीं होते हैं।

मुख्य बिंदु:

• ग्रह तारों की तुलना में पृथ्वी के बहुत पास हैं और बड़े आकार के (विस्तृत स्रोत) प्रतीत होते हैं।
• इनमें कई बिंदु स्रोतों का संग्रह माना जा सकता है।
• प्रकाश की मात्रा में होने वाले छोटे उतार-चढ़ाव आपस में संतुलित हो जाते हैं।

आम गलतियाँ:

• ग्रहों का अपना प्रकाश न होने को उनके न टिमटिमाटे का कारण बताना (ग्रहों का अपना प्रकाश नहीं होता, वे सूर्य के प्रकाश से चमकते हैं, लेकिन टिमटिमाने का संबंध आकार और दूरी से है)।
• तारों और ग्रहों के आकार के प्रभाव को न समझना।
• भ्रमित होकर गलत कारण लिखना।

Exam Tips:

a) ग्रहों को 'विस्तृत स्रोत' और तारों को 'बिंदु स्रोत' के रूप में तुलना करके समझाएं।
b) औसत प्रभाव शून्य होने के बिंदु को स्पष्ट करें।
c) यह प्रश्न अक्सर तारों के टिमटिमाने के साथ अंतर के रूप में पूछा जाता है।

 

Question 12: सूर्योदय के समय सूर्य रक्ताभ क्यों प्रतीत होता है?

Answer:

आकृति का विवरण: इस आरेख में सूर्योदय और सूर्यास्त के समय वायुमंडल द्वारा नीले प्रकाश के प्रकीर्णन तथा लाल प्रकाश के सीधे नेत्र तक पहुँचने की प्रक्रिया को दर्शाया गया है।

सूर्योदय (या सूर्यास्त) के समय सूर्य क्षितिज के निकट होता है। सूर्य से आने वाले प्रकाश को पृथ्वी के वायुमंडल में अधिक दूरी तय करनी पड़ती है। इस लंबी यात्रा के दौरान, कम तरंगदैर्ध्य वाले नीले और बैंगनी रंग का वायुमंडल के कणों द्वारा प्रकीर्णन (फैलाव) सबसे अधिक होता है और वे रास्ते में ही बिखर जाते हैं। इसके विपरीत, लाल रंग का तरंगदैर्ध्य बहुत अधिक (लगभग 1.5 गुना) होता है, इसलिए उसका प्रकीर्णन बहुत कम होता है और वह बिना अधिक फैले सीधे हमारी आँखों तक पहुँच जाता है। यही कारण है कि सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सूर्य और उसके आस-पास का आकाश रक्ताभ (लाल) प्रतीत होता है।

मुख्य बिंदु:

• इसका मुख्य कारण प्रकाश का प्रकीर्णन है।
• लाल रंग का तरंगदैर्ध्य सबसे अधिक और प्रकीर्णन सबसे कम होता है।
• सूर्य क्षितिज पर होता है जिससे प्रकाश को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

आम गलतियाँ:

• प्रकीर्णन के स्थान पर अपवर्तन या परावर्तन लिख देना।
• तरंगदैर्ध्य और प्रकीर्णन के संबंध को उल्टा समझ लेना।
• दूरी के प्रभाव को न बताना।

Exam Tips:

a) 'अधिक तरंगदैर्ध्य' और 'कम प्रकीर्णन' शब्दों का स्पष्ट उल्लेख करें।
b) क्षितिज पर सूर्य की स्थिति और लंबी दूरी का जिक्र करना न भूलें।
c) वैज्ञानिक कारणों पर आधारित मुख्य पंक्तियाँ अंडरलाइन करें।

 

Question 13: किसी अंतरिक्षयात्री को आकाश नीले की अपेक्षा काला क्यों प्रतीत होता है?

Answer:

अंतरिक्षयात्री अत्यधिक ऊँचाई पर या अंतरिक्ष में होते हैं, जहाँ पृथ्वी का वायुमंडल अनुपस्थित होता है या बहुत विरल होता है। चूँकि अंतरिक्ष में वायु या धूल के कण नहीं होते, इसलिए वहाँ सूर्य के प्रकाश का प्रकीर्णन नहीं हो पाता है। प्रकाश के प्रकीर्णन के अभाव में कोई भी नीला रंग अंतरिक्षयात्री की आँखों तक प्रकीर्णित होकर नहीं पहुँच पाता है। जब प्रकाश का कोई प्रकीर्णन ही नहीं होगा, तो अंतरिक्षयात्री को आकाश पूरी तरह अंधेरा यानी काला दिखाई देता है, जबकि पृथ्वी पर वायुमंडल के कारण नीला दिखाई देता है।

मुख्य बिंदु:

• अंतरिक्ष में वायुमंडल (वायु और कण) नहीं पाया जाता है।
• वायुमंडल न होने के कारण प्रकाश का प्रकीर्णन संभव नहीं है।
• प्रकीर्णन न होने से आकाश काला प्रतीत होता है।

आम गलतियाँ:

• अंतरिक्ष में सूर्य के प्रकाश न होने का गलत कारण देना (सूर्य का प्रकाश होता है, लेकिन प्रकीर्णन नहीं होता)।
• प्रकीर्णन शब्द का प्रयोग न करना।
• वायुमंडल की अनुपस्थिति को नजरअंदाज करना।

Exam Tips:

a) मुख्य कारण 'वायुमंडल की अनुपस्थिति' और 'प्रकीर्णन न होना' लिखें।
b) पृथ्वी पर नीला दिखने और अंतरिक्ष में काला दिखने का अंतर स्पष्ट करें।
c) यह एक बहुत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कारण है, इसे स्पष्ट रूप से याद रखें।

 

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