Step-by-Step Textbook Solutions for Class 8 Mathematics Chapter 03 संख्याओं की कहानी
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Question 1: मान लीजिए आप एक संख्या पद्धति का उपयोग कर रहे हैं जिसमें संख्याओं को दर्शाने के लिए छड़ियों का उपयोग किया जाता है जैसा कि विधि 1 में बताया गया है। हिंदू संख्या पद्धति के संख्या-नामों या संख्यांकों का उपयोग किए बिना दो संख्याओं या छड़ियों के दो संग्रहों के जोड़, घटाव, गुणन और विभाजन की विधि बताइए।
Answer:
(क) जोड़ (Addition): दो समूहों की छड़ियों को एक साथ मिला दिया जाता है। जितनी कुल छड़ियाँ होंगी, वही जोड़ का परिणाम होगा। उदाहरण के लिए, यदि पहले समूह में \( |||| \) (4 छड़ियाँ) हैं और दूसरे समूह में \( ||| \) (3 छड़ियाँ) हैं, तो दोनों को मिलाने पर:
\( |||| + ||| = ||||||| \) अर्थात कुल 7 छड़ियाँ।
(ख) घटाव (Subtraction): एक समूह से उतनी छड़ियाँ हटा दी जाती हैं जितनी दूसरी संख्या दर्शाती है। उदाहरण के लिए, यदि एक समूह में \( |||||| \) (6 छड़ियाँ) हैं और उसमें से \( || \) (2 छड़ियाँ) हटा दें, तो शेष बचेंगी:
\( |||||| - || = |||| \) अर्थात 4 छड़ियाँ।
(ग) गुणा (Multiplication): किसी संख्या की छड़ियों के समूह को उतनी बार दोहराया जाता है जितनी दूसरी संख्या है। उदाहरण के लिए, यदि \( ||| \) (3 छड़ियाँ) को \( |||| \) (4 बार) लिया जाए:
\( ||| + ||| + ||| + ||| = |||||||||||| \) अर्थात 12 छड़ियाँ।
(घ) विभाजन (Division): कुल छड़ियों को बराबर-बराबर समूहों में बाँटा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि \( |||||||| \) (8 छड़ियाँ) को \( || \) (2 छड़ियों) के समूह में बाँटें:
\( || \quad || \quad || \quad || \) तो कुल 4 समूह बनेंगे। अर्थात परिणाम 4 है।
मुख्य बिंदु:
• जोड़ में छड़ियों के समूहों को आपस में मिलाया जाता है।
• घटाव में एक बड़े समूह से निश्चित संख्या में छड़ियाँ हटाई जाती हैं।
• गुणन और विभाजन पुनरावृत्ति तथा समूहीकरण पर आधारित हैं।
आम गलतियाँ:
• छड़ियों की संख्या गिनने में भूल करना।
• विभाजन करते समय समूहों को असमान बनाना।
• संक्रियाओं की मूल परिभाषाओं को भ्रमित करना।
Exam Tips:
a) ऐसे प्रश्नों में उदाहरण देकर अपनी बात स्पष्ट रूप से समझाएँ।
b) चित्रों या प्रतीकों का सही और स्पष्ट निरूपण करें।
c) प्रत्येक संक्रिया के लिए अलग-अलग उदाहरण दें।
Question 2: विधि 2 में दी गई संख्या पद्धति का विस्तार करने की एक विधि यह है कि एक से अधिक वर्णों वाली श्रृंखला का प्रयोग किया जाए। उदाहरण के लिए हम 27 के लिए 'aa' का प्रयोग कर सकते हैं। सभी संख्याओं को दर्शाने के लिए आप इस पद्धति को कैसे विस्तारित कर सकते हैं? ऐसा करने की अनेक विधियाँ हो सकती हैं।
Answer:
यदि हम अंग्रेज़ी वर्णमाला का उपयोग करें तो:
\( 1 = a \), \( 2 = b \), \( 3 = c \), \( 4 = d \), \( 5 = e \dots \)
\( 26 = z \)
26 के बाद दो वर्णों का प्रयोग किया जा सकता है:
\( 27 = aa \), \( 28 = ab \), \( 29 = ac \)
इसी प्रकार आगे बढ़ाया जा सकता है:
\( 52 = az \), \( 53 = ba \), \( 54 = bb \)
इस प्रकार वर्णों के संयोजन से बहुत बड़ी संख्याओं को भी व्यक्त किया जा सकता है।
मुख्य बिंदु:
• वर्णमाला के अक्षरों का उपयोग करके नई संख्या पद्धति बनाई जा सकती है।
• एकल वर्ण समाप्त होने पर द्वि-वर्ण श्रृंखला का उपयोग किया जाता है।
• यह क्रमिक संयोजन पर आधारित पद्धति है।
आम गलतियाँ:
• वर्णों के क्रम को सही से न समझना।
• द्वि-वर्ण श्रृंखला बनाते समय नियमों की निरंतरता तोड़ना।
Exam Tips:
a) पैटर्न को स्पष्ट रूप से लिखकर दिखाएँ।
b) उदाहरण के माध्यम से समझाइए कि बड़े मान कैसे प्राप्त किए जाते हैं।
c) वर्णों के संयोजन का सही क्रम याद रखें।
Question 3: आप स्वयं एक संख्या पद्धति बनाने का प्रयास कीजिए।
Answer:
एक सरल संख्या पद्धति इस प्रकार बनाई जा सकती है:
\( \bullet = 1 \), \( \bullet\bullet = 2 \), \( \bullet\bullet\bullet = 3 \)
पाँच वस्तुओं का एक समूह बनाने के लिए नया चिह्न लें:
\( \star = 5 \)
फिर,
\( \star \bullet = 6 \)
\( \star \bullet\bullet = 7 \)
\( \star \bullet\bullet\bullet = 8 \)
\( \star \bullet\bullet\bullet\bullet = 9 \)
\( \star\star = 10 \)
इस प्रकार हम छोटे चिह्नों और बड़े समूहों के चिह्नों का उपयोग करके अपनी स्वयं की संख्या पद्धति बना सकते हैं।
मुख्य बिंदु:
• छोटी इकाइयों के लिए एक सरल प्रतीक का उपयोग किया जाता है।
• बड़ी इकाइयों या समूहों के लिए एक नया प्रतीक निर्धारित किया जाता है।
• यह समूחיकरण के सिद्धांत पर कार्य करती है।
आम गलतियाँ:
• प्रतीकों का मान बार-बार बदलना।
• बड़ी संख्याओं के लिए उचित चिह्न निर्धारित न करना।
Exam Tips:
a) अपनी संख्या पद्धति के नियम शुरुआत में ही स्पष्ट कर दें।
b) प्रतीकों का चयन सरल और स्पष्ट रखें।
c) कुछ संख्याओं के उदाहरण देकर अपनी पद्धति को समझाएँ।
Question 1: प्रशांत महासागर के एक द्वीप में रहने वाले मूल निवासियों का एक समूह भिन्न-भिन्न वस्तुओं को गिनने के लिए संख्या नामों के विभिन्न अनुक्रम का प्रयोग करते हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं? सोचकर बताइए।
Answer:
प्रशांत महासागर के द्वीपों में रहने वाले मूल निवासी अलग-अलग प्रकार की वस्तुओं की गिनती के लिए अलग-अलग संख्या नामों के अनुक्रम का प्रयोग करते हैं। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं—
(1) सुविधा के लिए भिन्न वस्तुओं की गिनती अलग-अलग तरीके से करना उनके लिए अधिक आसान होता है।
(2) वस्तुओं के समूह अलग-अलग होने के कारण कुछ वस्तुएँ जोड़े में, कुछ पाँच-पाँच या दस-दस के समूह में गिनी जाती हैं। इसलिए उनके लिए अलग संख्या नाम उपयोग किए जाते हैं।
(3) परंपरा और संस्कृति के कारण उनकी पारंपरिक भाषा और संस्कृति में विभिन्न वस्तुओं के लिए अलग गिनती की प्रणालियाँ विकसित हो गई हैं।
(4) गणना को सरल बनाने के लिए जब अलग-अलग वस्तुओं के लिए अलग अनुक्रम होता है, तो बड़ी मात्रा में वस्तुओं की गिनती करना आसान हो जाता है। अतः विभिन्न वस्तुओं की गिनती को सरल और सुविधाजनक बनाने के लिए वे संख्या नामों के अलग-अलग अनुक्रम का उपयोग करते हैं।
मुख्य बिंदु:
• विभिन्न संस्कृतियों में गिनती की प्रणालियाँ भिन्न हो सकती हैं।
• वस्तुओं की प्रकृति (जोड़े, समूह) के अनुसार संख्या नाम तय किए जाते हैं।
• यह पद्धति गणना को सहज बनाती है।
आम गलतियाँ:
• केवल एक ही प्रकार की संख्या पद्धति को सर्वमान्य मान लेना।
• सांस्कृतिक और पारंपरिक कारणों की उपेक्षा करना।
Exam Tips:
a) बिंदुओं के रूप में उत्तर लिखने से प्रभाव अच्छा पड़ता है।
b) सांस्कृतिक विविधता के महत्व को समझें।
c) तार्किक कारणों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें।
Question 2: 2 के बार-बार प्रयोग से गिनती करने की इसी विधि से गुमुलगल संख्या पद्धति की 6 से आगे की संख्याओं पर विचार कीजिए। इस पद्धति में आने वाली संख्याओं के लिए हिंदू संख्यांकों का प्रयोग किए बिना विभिन्न अंकगणितीय संक्रियाएँ (+, −, ×, ÷) करने की विधियों का पता लगाइए। इसका उपयोग निम्नलिखित का मूल्यांकन करने के लिए कीजिए।
(i) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) + (उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन)
(ii) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) − (उकासर-उकासर-उकासर)
(iii) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) × (उकासर-उकासर)
(iv) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर) ÷ (उकासर-उकासर)
Answer:
गुमुलगल संख्या पद्धति में:
\( \text{उरापोन} = 1 \)
\( \text{उकासर} = 2 \)
अतः,
\( \text{उकासर-उरापोन} = 3 \)
\( \text{उकासर-उकासर} = 4 \)
\( \text{उकासर-उकासर-उरापोन} = 5 \)
\( \text{उकासर-उकासर-उकासर} = 6 \)
\( \text{उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन} = 7 \)
\( \text{उकासर-उकासर-उकासर-उकासर} = 8 \)
\( \text{उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन} = 9 \)
(i) \( (\text{उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन}) + (\text{उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन}) \)
\( = 9 + 7 = 16 \)
(ii) \( (\text{उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन}) - (\text{उकासर-उकासर-उकासर}) \)
\( = 9 - 6 = 3 \)
(iii) \( (\text{उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन}) \times (\text{उकासर-उकासर}) \)
\( = 9 \times 4 = 36 \)
(iv) \( (\text{उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर}) \div (\text{उकासर-उकासर}) \)
\( = 16 \div 4 = 4 \)
मुख्य बिंदु:
• गुमुलगल पद्धति में 1 और 2 के स्थानीय मानों को समझकर आगे की संख्याएँ बनाई जाती हैं।
• दी गई संख्या पद्धति के शब्दों को हिंदू संख्यांकों में बदलकर संक्रियाएँ करना आसान होता है।
• मूल मानों को पहचानना आवश्यक है।
आम गलतियाँ:
• शब्दों के मान को गलत पढ़ना।
• जोड़, घटाव, गुणा या भाग करते समय गणना त्रुटि करना।
Exam Tips:
a) पहले सभी शब्दों के हिंदू संख्यांक मान लिखकर साइड में रख लें।
b) प्रत्येक भाग को चरणबद्ध तरीके से हल करें।
c) गणना की अंतिम जाँच अवश्य करें।
Question 3: हिंदू संख्या पद्धति की उन विशेषताओं की पहचान कीजिए जो इसे रोमन संख्या पद्धति की तुलना में अधिक प्रभावी बनाती हैं।
Answer:
हिंदू संख्या पद्धति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
1. इसमें 0 से 9 तक केवल 10 अंक होते हैं।
2. यह स्थानमान (Place Value) प्रणाली पर आधारित है।
3. इसमें शून्य (0) का प्रयोग किया जाता है।
4. बड़ी संख्याओं को लिखना अत्यंत सरल होता है।
5. जोड़, घटाव, गुणा और भाग जैसी गणनाएँ आसानी से की जा सकती हैं।
6. वैज्ञानिक गणनाओं के लिए यह अत्यधिक उपयोगी है।
इसी कारण हिंदू संख्या पद्धति रोमन संख्या पद्धति से अधिक प्रभावी और सुविधाजनक मानी जाती है।
मुख्य बिंदु:
• स्थानमान प्रणाली हिंदू संख्या पद्धति की सबसे बड़ी ताकत है।
• शून्य (0) के आविष्कार ने गणनाओं को असीम रूप से सरल बना दिया है।
• रोमन पद्धति में बड़ी संख्याएँ लिखने के लिए जटिल नियमों की आवश्यकता होती है।
आम गलतियाँ:
• केवल अंकों की संख्या बताना और स्थानमान का उल्लेख न करना।
• शून्य के महत्व को न समझना।
Exam Tips:
a) उत्तर को बिंदुओं में लिखें ताकि सभी विशेषताएँ स्पष्ट दिखें।
b) रोमन और हिंदू पद्धति की तुलना का मुख्य आधार स्थानमान और शून्य को बताएं।
c) मुख्य बिंदुओं को रेखांकित करें।
Question 4: इस अनुभाग में चर्चा की गई अवधारणाओं का प्रयोग करते हुए पूर्व में बनी संख्या पद्धति को परिष्कृत करने का प्रयास कीजिए।
Answer:
संख्या पद्धति को परिष्कृत करने के लिए निम्न सुधार किए जा सकते हैं—
1. निश्चित आधार (जैसे 10) का प्रयोग किया जाए।
2. सीमित प्रतीकों (0–9) का उपयोग किया जाए।
3. स्थानमान प्रणाली अपनाई जाए।
4. बड़े समूहों को छोटे समूहों में व्यवस्थित किया जाए।
5. गणनाओं को सरल बनाने के लिए मानक नियम बनाए जाएँ।
इन सुधारों के कारण संख्या पद्धति अधिक सरल, व्यवस्थित और उपयोगी बन जाती है।
मुख्य बिंदु:
• किसी भी संख्या पद्धति को प्रभावी बनाने के लिए निश्चित आधार जरूरी है।
• सीमित प्रतीक भ्रम को दूर करते हैं।
• स्थानमान प्रणाली से बड़ी संख्याएँ आसानी से लिखी जाती हैं।
आम गलतियाँ:
• सुधार के लिए केवल एक ही पक्ष पर ध्यान देना।
• नियमों को स्पष्ट रूप से परिभाषित न करना।
Exam Tips:
a) सुधारों को क्रमबद्ध रूप से सूचियों में लिखें।
b) आधुनिक हिंदू संख्या पद्धति के आधार पर अपने सुझाव दें।
c) उत्तर को संक्षिप्त और सटीक रखें।
Question 1: निम्नलिखित संख्याओं को मिस्र की संख्या पद्धति में दर्शाइए।
10458, 1023, 2660, 784, 1111, 70707
Answer:
मिस्र की संख्या पद्धति में प्रतीकों के मान इस प्रकार होते हैं:
इकाई = \( | \), दस = \( \cap \), सौ = \( \text{कुण्डली} \), हज़ार = \( \text{कमल} \), दस हज़ार = \( \text{उंगली} \)
अतः दी गई संख्याओं के निरूपण इस प्रकार होंगे:
• \( 10458 \to \) 1 दस हज़ार, 4 सौ, 5 दस, 8 इकाई
• \( 1023 \to \) 1 हज़ार, 2 दस, 3 इकाई
• \( 2660 \to \) 2 हज़ार, 6 सौ, 6 दस
• \( 784 \to \) 7 सौ, 8 दस, 4 इकाई
• \( 1111 \to \) 1 हज़ार, 1 सौ, 1 दस, 1 इकाई
• \( 70707 \to \) 7 दस हज़ार, 7 सौ, 7 इकाई
मुख्य बिंदु:
• मिस्र की संख्या पद्धति योगात्मक (Additive) होती है।
• प्रत्येक प्रतीक एक निश्चित मान को दर्शाता है जो दस की घातों पर आधारित है।
• इसमें बड़े मान के प्रतीकों को पहले लिखा जाता है।
आम गलतियाँ:
• प्रतीकों की सही संख्या न गिनना।
• गलत मान वाले प्रतीक का प्रयोग करना।
Exam Tips:
a) मिस्र की संख्या पद्धति के प्रतीकों को साफ-सुथरा बनाएँ।
b) स्थानीय मान के अनुसार प्रतीकों को बड़े से छोटे क्रम में व्यवस्थित करें।
c) प्रत्येक प्रतीक के मान को ध्यान में रखें।
Question 2: ये संख्यांक किन संख्याओं को दर्शाते हैं?
(i) \( \text{[2 सौ के प्रतीक] [7 दस के प्रतीक] [6 इकाई के प्रतीक]} \)
(ii) \( \text{[4 हज़ार के प्रतीक] [3 सौ के प्रतीक] [2 दस के प्रतीक] [2 इकाई के प्रतीक]} \)
Answer:
(i) \( 100 + 100 + 10 + 10 + 10 + 10 + 10 + 10 + 10 + 1 + 1 + 1 + 1 + 1 + 1 \)
\( = 200 + 70 + 6 = 276 \)
(ii) \( 1000 + 1000 + 1000 + 1000 + 100 + 100 + 100 + 10 + 10 + 1 + 1 \)
\( = 4000 + 300 + 20 + 2 = 4322 \)
मुख्य बिंदु:
• दिए गए प्रतीकों के मानों को जोड़कर कुल संख्या ज्ञात की जाती है।
• प्रत्येक प्रतीक का मान मिस्र पद्धति के नियमों के अनुसार होता है।
• योग करने पर सही संख्या प्राप्त होती है।
आम गलतियाँ:
• प्रतीकों को गिनने में त्रुटि करना।
• मानों का योग गलत करना।
Exam Tips:
a) प्रतीकों के समूहों को अलग-अलग गिनकर लिखें।
b) योग करते समय चरणबद्ध विधि का प्रयोग करें।
c) उत्तर की पुनरावृत्ति करके जाँच लें।
Question 1: निम्नलिखित संख्याओं को आधार–5 पद्धति में दिए गए प्रतीकों का प्रयोग करके लिखिए।
15, 50, 137, 293, 651
Answer:
आधार–5 पद्धति में केवल पाँच अंक होते हैं: \( 0, 1, 2, 3, 4 \)
दी गई संख्याओं को आधार-5 में बदलने के लिए 5 से लगातार भाग दिया जाता है:
(1) 15 के लिए:
\( 15 \div 5 = 3 \) शेष \( 0 \)
\( 3 \div 5 = 0 \) शेष \( 3 \)
अतः \( 15_{10} = 30_5 \)
(2) 50 के लिए:
\( 50 \div 5 = 10 \) शेष \( 0 \)
\( 10 \div 5 = 2 \) शेष \( 0 \)
\( 2 \div 5 = 0 \) शेष \( 2 \)
अतः \( 50_{10} = 200_5 \)
(3) 137 के लिए:
\( 137 \div 5 = 27 \) शेष \( 2 \)
\( 27 \div 5 = 5 \) शेष \( 2 \)
\( 5 \div 5 = 1 \) शेष \( 0 \)
\( 1 \div 5 = 0 \) शेष \( 1 \)
अतः \( 137_{10} = 1022_5 \)
(4) 293 के लिए:
\( 293 \div 5 = 58 \) शेष \( 3 \)
\( 58 \div 5 = 11 \) शेष \( 3 \)
\( 11 \div 5 = 2 \) शेष \( 1 \)
\( 2 \div 5 = 0 \) शेष \( 2 \)
अतः \( 293_{10} = 2133_5 \)
(5) 651 के लिए:
\( 651 \div 5 = 130 \) शेष \( 1 \)
\( 130 \div 5 = 26 \) शेष \( 0 \)
\( 26 \div 5 = 5 \) शेष \( 1 \)
\( 5 \div 5 = 1 \) शेष \( 0 \)
\( 1 \div 5 = 0 \) शेष \( 1 \)
अतः \( 651_{10} = 10101_5 \)
मुख्य बिंदु:
• किसी संख्या को अन्य आधार में बदलने के लिए लगातार भाग विधि (Successive Division) का प्रयोग किया जाता है।
• शेष 0 से 4 तक ही आ सकते हैं।
• शेषों को नीचे से ऊपर के क्रम में लिखा जाता है।
आम गलतियाँ:
• भागफल और शेष को लिखते समय क्रम उलट देना।
• आधार-5 में 5 या उससे बड़ा अंक लिख देना।
Exam Tips:
a) प्रत्येक भाग की गणना को अलग पंक्ति में स्पष्ट दिखाएँ।
b) शेष को हमेशा दाईं ओर लिखें।
c) अंतिम उत्तर में आधार सबस्क्रिप्ट अवश्य लगाएँ।
Question 2: क्या ऐसी कोई संख्या है जिसे हमारी उपर्युक्त वर्णित आधार–5 पद्धति में नहीं दर्शाया जा सकता? क्यों या क्यों नहीं?
Answer:
नहीं, ऐसी कोई संख्या नहीं है जिसे आधार–5 पद्धति में न दर्शाया जा सके।
कारण: आधार–5 पद्धति में \( 0, 1, 2, 3 \) और \( 4 \) अंकों का उपयोग करके किसी भी प्राकृतिक संख्या को व्यक्त किया जा सकता है। जैसे दशमलव पद्धति में 0 से 9 तक के अंकों से सभी संख्याएँ लिखी जाती हैं, उसी प्रकार आधार–5 पद्धति में 0 से 4 तक के अंकों के संयोजन से सभी संख्याएँ दर्शाई जा सकती हैं। अतः हर संख्या को आधार–5 पद्धति में लिखा जा सकता है।
मुख्य बिंदु:
• किसी भी संख्या पद्धति का आधार सभी प्राकृतिक संख्याओं को व्यक्त करने में सक्षम होता है।
• अंकों का पुनर्संयोजन अनन्त संख्याएँ बना सकता है।
• आधार-5 में भी अनन्त संख्याएँ निरूपित की जा सकती हैं।
आम गलतियाँ:
• यह सोचना कि छोटे आधार में बड़ी संख्याएँ नहीं लिखी जा सकतीं।
• स्थानमान के महत्व को न समझना।
Exam Tips:
a) कारण स्पष्ट रूप से और तार्किक ढंग से लिखें।
b) दशमलव पद्धति के साथ तुलना करके उत्तर को पुख्ता करें।
Question 3: आधार–7 पद्धति की सांकेतिक संख्याओं का अभिकलन कीजिए। सामान्यतः आधार–n पद्धति की सांकेतिक संख्याएँ क्या हैं?
Answer:
आधार–7 पद्धति में प्रयुक्त अंक हैं: \( 0, 1, 2, 3, 4, 5, 6 \) अर्थात इसमें कुल 7 अंक होते हैं।
सामान्य रूप से आधार–n पद्धति में प्रयुक्त अंक होते हैं: \( 0, 1, 2, 3, \dots, (n - 1) \)
इस पद्धति की सांकेतिक संख्याएँ \( n \) की घातों के रूप में होती हैं:
\( n^0, n^1, n^2, n^3, \dots \)
अर्थात \( 1, n, n^2, n^3, \dots \)
यही आधार–n संख्या पद्धति की सांकेतिक संख्याएँ कहलाती हैं।
मुख्य बिंदु:
• किसी भी आधार \( n \) में अंकों की संख्या 0 से लेकर \( (n - 1) \) तक होती है।
• स्थानीय मान \( n \) की बढ़ती घातों के रूप में होते हैं।
• यह सभी positional number systems का सामान्य नियम है।
आम गलतियाँ:
• आधार \( n \) में अंक \( n \) को भी शामिल कर लेना।
• घातों के क्रम को गलत लिखना।
Exam Tips:
a) सामान्य सूत्र \( n^0, n^1, n^2 \) को स्पष्ट रूप से दर्शाएँ।
b) आधार-10 के उदाहरण से इसे आसानी से समझाएँ।
Question 1: निम्नलिखित मिश्र संख्यांकों का योग ज्ञात कीजिए।
(i) [पहला मिश्र संख्यांक] + [दूसरा मिश्र संख्यांक]
(ii) [पहला मिश्र संख्यांक] + [दूसरा मिश्र संख्यांक]
Answer:
(i) दिए गए मिश्र संख्यांकों के समूहों को आपस में जोड़ने पर समान प्रतीकों के मान जुड़ जाते हैं:
हज़ार, सौ, दस और इकाई के प्रतीकों को उनके संगत मानों के साथ जोड़ा जाता है, जिससे कुल योग प्राप्त होता है।
(ii) इसी प्रकार दूसरे भाग में भी समान श्रेणी के प्रतीकों (जैसे हजार, सौ, दस, इकाई) को एक साथ समूहीकृत करके जोड़ा जाता है।
मुख्य बिंदु:
• मिश्र संख्यांकों के योग में समान प्रकार के प्रतीकों को जोड़ा जाता है।
• यदि प्रतीकों की संख्या आधार सीमा पार करती है, तो उन्हें अगले बड़े प्रतीक में बदला जाता है।
• यह योगात्मक प्रणाली पर आधारित है।
आम गलतियाँ:
• अलग-अलग मान वाले प्रतीकों को आपस में जोड़ देना।
• समूहों को ठीक से व्यवस्थित न करना।
Exam Tips:
a) योग करते समय प्रत्येक प्रतीक के प्रकार को अलग-अलग गिनें।
b) अपने उत्तर को चरणों में प्रदर्शित करें।
Question 2: निम्नलिखित संख्यांकों का योग हिंदू संख्या पद्धति द्वारा निर्मित आधार–5 पद्धति में ज्ञात कीजिए।
\( (\text{वृत्त और त्रिभुज वाले प्रतीक}) + (\text{वृत्त और त्रिभुज वाले प्रतीक}) \)
स्मरण रखिए इस पद्धति में सांकेतिक संख्या का 5 गुना करने पर अगली सांकेतिक संख्या प्राप्त होती है।
Answer:
दी गई आधार-5 पद्धति के प्रतीकों के अनुसार, प्रत्येक प्रतीक अपने से छोटे प्रतीक का 5 गुना होता है।
दोनों दी गई संख्याओं के प्रतीकों को आपस में मिलाने पर:
समान प्रतीकों की कुल संख्या जोड़ी जाती है। यदि किसी प्रतीक की संख्या 5 हो जाती है, तो उसे अगले बड़े प्रतीक में बदल दिया जाता है।
अतः दोनों संख्याओं के संयोजन से नया योग संख्यांक प्राप्त होता है जो आधार-5 के नियमों का पालन करता है।
मुख्य बिंदु:
• आधार-5 में प्रत्येक स्थान का मान पिछले स्थान से 5 गुना होता है।
• 5 प्रतीक मिलकर अगले बड़े मान का एक नया प्रतीक बनाते हैं।
• यह स्थानीय मान और आधार के सिद्धांतों पर कार्य करता है।
आम गलतियाँ:
• 5 होने पर कैरी (हासिल) आगे न बढ़ाना।
• प्रतीकों के मानों को आपस में भ्रमित करना।
Exam Tips:
a) जोड़ते समय 5 के समूहीकरण नियम का विशेष ध्यान रखें।
b) चित्र आधारित प्रश्नों में प्रतीकों को साफ-सुथरा बनाएँ।
Question 1: क्या कोई ऐसी संख्या हो सकती है जिसके मिस्र संख्यांक निरूपण में कोई एक प्रतीक 10 या उससे अधिक बार आता हो? क्यों नहीं?
Answer:
नहीं, मिस्र संख्या पद्धति में किसी एक प्रतीक का प्रयोग 10 या उससे अधिक बार नहीं किया जाता।
कारण: मिस्र संख्या पद्धति में हर 10 समान प्रतीकों को मिलाकर अगले बड़े मान का एक नया प्रतीक प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण के लिए: 10 इकाइयाँ (\( | \)) मिलकर 1 दस (\( \cap \)) बनाती हैं। 10 दस मिलकर 1 सौ का प्रतीक बनाते हैं। 10 सौ मिलकर 1 हजार का प्रतीक बनाते हैं। इसलिए यदि किसी प्रतीक की संख्या 10 या उससे अधिक हो जाए तो उसे अगले बड़े मान के प्रतीक में बदल दिया जाता है। इसी कारण किसी एक प्रतीक का प्रयोग 10 या उससे अधिक बार नहीं किया जाता।
मुख्य बिंदु:
• मिस्र पद्धति में 'दशकीय समूहीकरण' (Grouping by 10) का नियम लागू होता है।
• 10 समान प्रतीक कभी भी एक साथ नहीं दिखते क्योंकि वे अगले प्रतीक में बदल जाते हैं।
• यह संख्या को संक्षिप्त रखने की विधि है।
आम गलतियाँ:
• नियम को समझे बिना किसी भी प्रतीक को अनगिनत बार लिख देना।
• मिस्र पद्धति के मूल आधार को भूल जाना।
Exam Tips:
a) कारण स्पष्ट रूप से लिखें कि 10 होते ही प्रतीक बदल जाता है।
b) उदाहरण देकर अपने उत्तर को समझाएँ।
Question 2: आधार–4 की अपनी स्वयं की संख्या पद्धति बनाइए और 1 से 16 तक की संख्याओं को इसमें निरूपित कीजिए।
Answer:
आधार–4 संख्या पद्धति में चार अंक होते हैं: \( 0, 1, 2, 3 \)
अब 1 से 16 तक की संख्याओं को आधार–4 में इस प्रकार लिखते हैं:
\( 1 = 1_4 \)
\( 2 = 2_4 \)
\( 3 = 3_4 \)
\( 4 = 10_4 \)
\( 5 = 11_4 \)
\( 6 = 12_4 \)
\( 7 = 13_4 \)
\( 8 = 20_4 \)
\( 9 = 21_4 \)
\( 10 = 22_4 \)
\( 11 = 23_4 \)
\( 12 = 30_4 \)
\( 13 = 31_4 \)
\( 14 = 32_4 \)
\( 15 = 33_4 \)
\( 16 = 100_4 \)
इस प्रकार 1 से 16 तक की संख्याएँ आधार–4 पद्धति में लिखी जाती हैं।
मुख्य बिंदु:
• आधार-4 में केवल 0, 1, 2 और 3 अंकों का प्रयोग होता है।
• संख्या 4 आते ही अगला स्थान बदल जाता है (\( 4 = 10_4 \))।
• स्थानमान 4 की घातों पर आधारित होता है।
आम गलतियाँ:
• आधार-4 में 4 या उससे बड़ा अंक लिख देना (जैसे \( 14_4 \) लिखना जो गलत है)।
• क्रम बदलते समय गणना में भूल करना।
Exam Tips:
a) संख्याओं को क्रमबद्ध सारणी के रूप में लिखें।
b) लगातार भाग विधि का मन में अभ्यास करके लिखें।
Question 3: हमारे द्वारा बनाई गई आधार–5 पद्धति में किसी दी गई संख्या को 5 से गुणा करने का एक सरल नियम दीजिए।
Answer:
आधार–5 संख्या पद्धति में किसी संख्या को 5 से गुणा करने का एक सरल नियम यह है कि उस संख्या के दाईं ओर एक शून्य (\( 0 \)) जोड़ दिया जाता है।
उदाहरण:
\( 12_5 \times 5 = 120_5 \)
\( 23_5 \times 5 = 230_5 \)
क्योंकि आधार–5 में 5 से गुणा करने पर संख्या का प्रत्येक अंक एक स्थान बाएँ खिसक जाता है (जैसे दशमलव पद्धति में 10 से गुणा करने पर होता है)।
अतः निष्कर्ष: आधार–5 पद्धति में किसी संख्या को 5 से गुणा करने के लिए उस संख्या के अंत में एक \( 0 \) जोड़ दिया जाता है।
मुख्य बिंदु:
• किसी संख्या पद्धति में उसके आधार से गुणा करने पर संख्या बाईं ओर खिसकती है और अंत में शून्य आ जाता है।
• यह नियम सभी positional number systems पर लागू होता है।
• गणना को बहुत आसान बना देता है।
आम गलतियाँ:
• शून्य बाईं ओर जोड़ देना।
• नियम के पीछे के स्थानमान के गणितीय कारण को न समझना।
Exam Tips:
a) नियम को स्पष्ट शब्दों में लिखकर एक उदाहरण अवश्य दें।
b) दशमलव पद्धति (आधार-10) के साथ इसकी समानता समझाएँ।
Question 1: नीचे दी गई संख्याओं को मेसोपोटामिया की पद्धति में निरूपित कीजिए।
(i) 63 (ii) 132 (iii) 200 (iv) 60 (v) 3605
Answer:
मेसोपोटामिया (बेबीलोन) की संख्या पद्धति आधार-60 (Sexagesimal) पर आधारित है और इसमें दो मुख्य प्रतीकों का प्रयोग होता है: कील जैसा प्रतीक (1 के लिए) और कोने वाला प्रतीक (10 के लिए)।
(i) \( 63 = 60 + 3 \to \) मेसोपोटामिया पद्धति में निरूपण: [1 स्थान साठ का, 3 इकाइयाँ]
(ii) \( 132 = (2 \times 60) + 12 \to \) निरूपण: [2 साठ, 12 इकाइयाँ]
(iii) \( 200 = (3 \times 60) + 20 \to \) निरूपण: [3 साठ, 20 इकाइयाँ]
(iv) \( 60 = (1 \times 60) + 0 \to \) निरूपण: [1 साठ]
(v) \( 3605 = (1 \times 60^2) + (0 \times 60) + 5 \to \) निरूपण: [1 साठ का वर्ग, 0, 5 इकाइयाँ]
मुख्य बिंदु:
• मेसोपोटामिया पद्धति आधार-60 पर आधारित स्थानीय मान प्रणाली है।
• इसमें 1 से 59 तक की संख्याएँ दो मूल प्रतीकों के संयोजन से बनती हैं।
• बड़े मानों के लिए स्थानों का अंतराल महत्वपूर्ण होता है।
आम गलतियाँ:
• आधार-10 और आधार-60 के नियमों को मिला देना।
• प्रतीकों को गलत क्रम में लिखना।
Exam Tips:
a) संख्या को पहले 60 के गुणकों में तोड़कर समझें।
b) प्रतीकों को स्पष्ट और सही आकार में बनाएँ।
Question 1: आपके विचार से चीन के लोग जोंग और हेंग प्रतीकों को एकांतर रूप से क्यों प्रयोग करते थे? यदि मात्र जोंग प्रतीकों का ही प्रयोग किया जाता तो 41 को कैसे प्रदर्शित किया जाता? यदि दो क्रमिक स्थानों के मध्य कोई सार्थक अंतराल न हो तो क्या इस संख्यांक की किसी अन्य प्रकार से व्याख्या की जा सकती थी?
Answer:
चीन की प्राचीन संख्या पद्धति में जोंग (ऊर्ध्व रेखा) और हेंग (क्षैतिज रेखा) प्रतीकों का एकांतर प्रयोग इसलिए किया जाता था ताकि अलग-अलग स्थानों के अंकों को स्पष्ट रूप से पहचाना जा सके। इससे यह समझना आसान हो जाता था कि कौन-सा अंक इकाई, दहाई या सैकड़ा के स्थान पर है।
यदि केवल जोंग प्रतीकों का ही प्रयोग किया जाता तो 41 को चार दहाइयों और एक इकाई के रूप में दर्शाना कठिन हो जाता, क्योंकि सभी प्रतीक एक जैसे दिखाई देते। उदाहरण के लिए: दहाई: \( |||| \), इकाई: \( | \) — इस स्थिति में यह स्पष्ट नहीं होता कि यह 41 है या 5। यदि दो क्रमिक स्थानों के बीच कोई स्पष्ट अंतराल न हो, तो संख्या की सही पहचान करना कठिन हो जाता और उसकी विभिन्न प्रकार से गलत व्याख्या की जा सकती थी। इसलिए अलग-अलग प्रतीकों या उनके एकांतर प्रयोग की आवश्यकता पड़ती थी।
मुख्य बिंदु:
• एकांतर प्रतीक (Alternating symbols) स्थानों के भ्रम को दूर करते हैं।
• यह बिना शून्य के स्थानमान को दर्शाने की एक अनूठी विधि है।
• अंतराल या भिन्न प्रतीकों के बिना बड़ी संख्याओं को पढ़ना असंभव हो जाता।
आम गलतियाँ:
• प्रश्न के सभी भागों का उत्तर न देना।
• जोंग और हेंग प्रतीकों के अंतर को न समझना।
Exam Tips:
a) प्रत्येक उप-प्रश्न का उत्तर अलग पैराग्राफ में दें।
b) उदाहरण देकर समझाएँ कि भ्रम कैसे उत्पन्न होता है।
Question 2: उकासर और उरापोन को अंकों के रूप में लेकर एक आधार–2 वाली स्थानीय मान पद्धति बनाइए। इस पद्धति की तुलना गुमुलगल पद्धति से कीजिए।
Answer:
गुमुलगल पद्धति में:
\( \text{उरापोन} = 1 \)
\( \text{उकासर} = 2 \)
यदि इन्हें आधार–2 (द्विआधारी) पद्धति में अंक के रूप में लें तो:
\( \text{उरापोन} = 0 \)
\( \text{उकासर} = 1 \)
आधार–2 पद्धति में स्थानमान इस प्रकार होते हैं:
\( 1, 2, 4, 8, 16, \dots \)
उदाहरण:
\( 1 = 1_2 \)
\( 2 = 10_2 \)
\( 3 = 11_2 \)
\( 4 = 100_2 \)
\( 5 = 101_2 \)
\( 6 = 110_2 \)
तुलना: गुमुलगल पद्धति में संख्याएँ 2 को बार-बार जोड़कर बनाई जाती हैं, जबकि आधार–2 पद्धति में केवल दो अंक (0 और 1) होते हैं और यह स्थानमान प्रणाली पर आधारित होती है। इसलिए आधार–2 पद्धति अधिक व्यवस्थित और गणनाओं के लिए अधिक उपयोगी है।
मुख्य बिंदु:
• आधार-2 पद्धति (Binary System) केवल दो अंकों 0 और 1 का उपयोग करती है।
• यह पूरी तरह से स्थानमान (Place Value) पर आधारित है।
• यह गुमुलगल पद्धति की तुलना में अधिक वैज्ञानिक और संक्षिप्त है।
आम गलतियाँ:
• 0 और 1 के मानों को आपस में उलटा मान लेना।
• स्थानमान के बढ़ते क्रम को गलत लिखना।
Exam Tips:
a) द्विआधारी संख्याओं के कुछ छोटे उदाहरण अवश्य दें।
b) तुलना करते समय दोनों पद्धतियों के मुख्य अंतर स्पष्ट करें।
Question 3: बताइए कि किस प्रकार आपके दैनिक जीवन में और किन व्यवसायों में हिंदू संख्यांक और 0 महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं? यदि हमारी संख्या पद्धति और 0 का आविष्कार या कल्पना नहीं हुई होती तो हमारा जीवन कितना भिन्न होता?
Answer:
हिंदू संख्यांक और शून्य (\( 0 \)) हमारे दैनिक जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
दैनिक जीवन में उपयोग:
• पैसों की गणना में
• समय और तिथि लिखने में
• दूरी और माप बताने में
• मोबाइल नंबर और पहचान संख्या में
• बैंकिंग और लेन-देन में
व्यवसायों में उपयोग:
• व्यापार और लेखांकन
• बैंकिंग और वित्तीय गणनाएँ
• विज्ञान और इंजीनियरिंग
• कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी
• सांख्यिकी और अनुसंधान
यदि शून्य और आधुनिक संख्या पद्धति का आविष्कार नहीं हुआ होता तो गणना करना बहुत कठिन होता। बड़ी संख्याएँ लिखना और गणितीय क्रियाएँ करना मुश्किल हो जाता, और विज्ञान, तकनीक तथा व्यापार का विकास भी धीमा पड़ जाता।
मुख्य बिंदु:
• शून्य ने गणित को पूर्णता प्रदान की है।
• आधुनिक तकनीक और विज्ञान पूरी तरह से हिंदू-अरबी संख्या पद्धति पर आधारित हैं।
• दैनिक जीवन का हर कार्य संख्याओं के बिना असंभव है।
आम गलतियाँ:
• केवल दैनिक जीवन के उदाहरण देना और व्यावसायिक उपयोग को छोड़ देना।
• शून्य के महत्व को कम करके आंकना।
Exam Tips:
a) उत्तर को 'दैनिक जीवन' और 'व्यवसाय' दो भागों में बाँटकर लिखें।
b) शून्य के आविष्कार के प्रभाव को अपने शब्दों में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करें।
Question 4: प्राचीन भारतीयों ने हिंदू संख्या पद्धति के लिए संभवतः आधार–10 का उपयोग किया होगा क्योंकि मनुष्य की दस उँगलियाँ होती हैं। यदि हमारी केवल 8 उँगलियाँ होती तो क्या होता? तब हम संख्याएँ कैसे लिखते? यदि हम आधार–8 का उपयोग करते तब हिंदू संख्यांक कैसे लिखते? आधार–5 का उपयोग करने पर हिंदू संख्यांक कैसे लिखे जाते हैं? आधार–10 वाले हिंदू संख्यांक 25 को क्रमशः आधार–8 और आधार–5 वाले हिंदू संख्यांकों के रूप में लिखने का प्रयास कीजिए। क्या आप इसे आधार–2 में लिख सकते हैं?
Answer:
यदि मनुष्य की केवल 8 उँगलियाँ होतीं तो संभवतः हम आधार–8 संख्या पद्धति का उपयोग करते।
आधार–8 में अंक होते हैं: \( 0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 \)
आधार–5 में अंक होते हैं: \( 0, 1, 2, 3, 4 \)
अब संख्या 25 को विभिन्न आधारों में लिखते हैं:
दशमलव (आधार–10) = \( 25 \)
आधार–8 में बदलने के लिए:
\( 25 \div 8 = 3 \) शेष \( 1 \)
अतः \( 25_{10} = 31_8 \)
आधार–5 में बदलने के लिए:
\( 25 \div 5 = 5 \) शेष \( 0 \)
\( 5 \div 5 = 1 \) शेष \( 0 \)
अतः \( 25_{10} = 100_5 \)
आधार–2 में बदलने के लिए:
\( 25 = 16 + 8 + 1 = (1 \times 2^4) + (1 \times 2^3) + (0 \times 2^2) + (0 \times 2^1) + (1 \times 2^0) \)
अतः \( 25_{10} = 11001_2 \)
मुख्य बिंदु:
• संख्या पद्धतियों के आधार मानव शरीर की उँगलियों जैसी प्राकृतिक सुविधाओं से प्रेरित हो सकते हैं।
• किसी भी संख्या को किसी भी आधार में लगातार भाग विधि से बदला जा सकता है।
• द्विआधारी (आधार-2) पद्धति में 25 को \( 11001_2 \) लिखा जाता है।
आम गलतियाँ:
• भाग देते समय शेष को गलत निकालना।
• विभिन्न आधारों के चिन्हों (subscripts) को न लिखना।
Exam Tips:
a) प्रत्येक आधार रूपांतरण को अलग-अलग चरण में हल करें।
b) अंतिम उत्तर में आधार को सबस्क्रिप्ट के रूप में अवश्य दर्शाएँ।
c) गणना की जाँच उल्टे क्रम में गुणा करके करें।
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