Official NCERT Book for Class 7 Sanskrit: Chapter 02 Nityam Pibamah Subhashitarasam
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Chapter-wise Study Material: Chapter 02 Nityam Pibamah Subhashitarasam
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पाठ 2: नित्यं पिबामः सुभाषितरसम्
महोदय: असमाक विद्यालयस्य भिन्नो 'अयोध्य: पुष्पो नास्ति योजकस्त्रे दुर्लभ:' इति लिखितम् अस्ति। असय क: भाव: इति कृपया बोधयतु।
भा: पुशोले! अस्य भावार्थ: अस्ति यत् अस्मिन् जगति कोऽपि अयोग्य: नास्ति। यत: अस्मिन् जगति सर्वे योग्या: सन्ति परन्तु प्रकृष्ठजनेः: सह अभाव: अस्ति।
समीचीनम्, तर्हि वयं सुभाषितानां रसं पिबामः। यथा नि:शेषम् अभिव्यक्ति करोति।
मान्यवर! अहं अपि विद्यालयस्य परिसरे एतादृश श्लोकांः पठितवती।
शिक्षक की टिप्पणी
यह पाठ सुभाषितों (नीति वचनों) के बारे में है जो हमें सही रास्ता दिखाते हैं। संस्कृत में सुभाषित का मतलब है - अच्छी तरह से कहे गए शब्द जो ज्ञान देते हैं। इस पाठ में जो श्लोक दिए गए हैं, उनको धीरे-धीरे पढ़ें और समझें कि वे हमारे जीवन के बारे में क्या सिखाते हैं।
[चित्र: कक्षा में शिक्षक और छात्र, पाठ्यपुस्तक में देखें]
वस्त्रेण वपुषा वाचा विनयेन च।
वकारे: पञ्चभिर्युक्तो नरो भवति पूजित: ।।१।।
पद्छेद: वस्त्रेण वपुषा वाचा विनयेन च वकारे: पञ्चभिर्युक्तो नरो भवति पूजित: ।
अन्वय: यत् समुद्रस्य उत्तरं हिमादे: च एवं दक्षिणं वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ति: ।।२।।
भावार्थ: असमसु सुभाषिते सुभाषितकार: भारतस्य भोगोलिक स्वरूपं वर्णयति। हिन्दमहागरस्य उत्तरभाग हिमालयस्य च दक्षिणभाग य: भूमाग य: भूमि अस्ति, तस्य भूमाग्स्य नाम भारतवर्षम्। अत्र: नागरिका: भारती या इति प्रसिद्ध: ।।
[चित्र: दिन और रात का दृश्य, पाठ्यपुस्तक में देखें]
फड़ दोषा: पुष्पेणोद् हातव्य भूतिमिच्छता।
निन्द्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूवता ।।३।।
पद्छेद: फड़ दोषा: पुष्पेणोद् हातव्य भूतिमिच्छता। निन्द्रा तन्द्रा भयं क्रोध: आलस्यं दीर्घसूवता।
अन्वय: गात्राणि अद्रि: शुद्धयन्ति मन: सत्येन शुद्धति। भूतात्मा विद्यात्पोभ्या भूतात्मा बुद्धि: निर्मला भवति। अत: मनुष्य: निन्द्रा ब्रह्मचर्य, विद्या भ्यास, ज्ञानजन आश्रये (समीपे) तिप्प्ति, तस्य बुद्धि: तथैव बृन्ति यथा सूर्यस्य क्रिणे: कमलं पूर्णतया विकसित भवति।
शिक्षक की टिप्पणी
संस्कृत सुभाषितों में अक्सर एक श्लोक के कई अर्थ हो सकते हैं। जब आप किसी श्लोक को पढ़ें, तो पहले पद्छेद (शब्दों को अलग करना) देखें, फिर अन्वय (वाक्य को सही क्रम में समझना) पढ़ें। इससे आप श्लोक का असली अर्थ समझ पाएँगे। भावार्थ सिर्फ एक व्याख्या है - हर किसी का अपना मतलब निकालने का तरीका हो सकता है।
उत्तरे यत् समुद्रस्य हिमादश्चेव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारते नाम भारती यत्र सन्ति: ।।४।।
पद्छेद: उत्तरे यत् समुद्रस्य हिमादश्चेव दक्षिणम्। वर्षं तद् भारते नाम भारती यत्र सन्ति: ।
अन्वय: यत् समुद्रस्य उत्तरं हिमादे: च एवं दक्षिणं वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ति: ।
भावार्थ: असमिन् सुभाषिते सुभाषितकार: भारतस्य भोगोलिक स्वरूपं वर्णयति। हिन्दमहागरस्य उत्तरभाग हिमालयस्य च दक्षिणभाग य: भूमाग य: भूमि अस्ति, तस्य भूमाग्स्य नाम भारतवर्षम्। अत्र: नागरिका: भारती या इति प्रसिद्ध: ।।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमश: पूर्ते घट: ।
स हेतु: सर्ववयद्धना धर्मस्य च धनस्य च ।।५।।
पद्छेद: जलबिन्दु-निपातेन क्रमश: पूर्ते घट: स हेतु: सर्वविद्धना धर्मस्य च धनस्य च।
अन्वय: घट: क्रमश: पूर्ते जलबिन्दु-निपातेन स: हेतु: सर्विद्धना धर्मस्य च धनस्य च भवति।
भावार्थ: यथा निरन्तरं जलबिन्दु: घटमान्तर्गतं भरयन्ति, तथैव निरन्तरं प्रयत्न: प्रकृष्ठ फलम् आनयति। एतेन बोध्यते यत् क्षुद्रम् अपि प्रयत्नम् महत्वपूर्ण अस्ति। जीवने धर्मं च धनं च प्राप्त करणे सतत् प्रयत्नः अपरिहार्य अस्ति।
[चित्र: जल की बूंदों से भरा लाल घड़ा, पाठ्यपुस्तक में देखें]
मुख्य बिंदु
- सुभाषितानि हमारे जीवन को सही मार्ग दिखाने वाले नीति-वचन हैं जो संस्कृत में कविता के रूप में लिखे गए हैं।
- किसी भी श्लोक को समझने के लिए पहले पद्छेद और अन्वय को ध्यान से पढ़ना चाहिए, फिर भावार्थ समझना चाहिए।
- छोटे प्रयास भी नियमित रूप से किए जाएँ तो बड़े परिणाम ला सकते हैं, जैसे पानी की बूंदें घड़े को भर देती हैं।
यह अध्याय के पहले 5 पृष्ठों का पूर्वावलोकन है। पूरा अध्याय पाने के लिए नीचे क्लिक करें।
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