NCERT Solutions Class 11 Political Science Political Theory Chapter 04 Social Justice (सामाजिक न्याय) in Hindi

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Question 1: हर व्यक्ति को उसका प्राप्य देने का क्या मतलब है? हर किसी को उसका प्राप्य देने का मतलब समय के साथ कैसे बदला?

Answer:

हर व्यक्ति को उसका प्राप्य देने का अर्थ है- न्याय में प्रत्येक व्यक्ति को उसका उचित भाग प्रदान करना। जर्मन दार्शनिक काण्ट के अनुसार, प्रत्येक मनुष्य की गरिमा होती है। अगर सभी व्यक्तियों की गरिमा स्वीकृत है, तो उनमें से हर एक को प्राप्य यह होगा कि उन्हें अपनी प्रतिभा के विकास और लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मौका मिले। न्याय के लिए आवश्यक है कि हम सभी व्यक्तियों को समुचित और समान महत्व दें।
प्लेटो के अनुसार- न्याय के अंतर्गत प्रत्येक वर्ग को अपने क्षेत्र में कार्यों की उपलब्धि और दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप न करना ही न्याय है। समय के साथ 'प्राप्य' के अर्थ में यह बदलाव आया है कि अब केवल परम्परागत या जन्मजात अधिकारों की बजाय व्यक्ति की बुनियादी जरूरतों, योग्यताओं और गरिमा को ध्यान में रखकर उसे उसका उचित हिस्सा देने पर बल दिया जाता है।

मुख्य बिंदु:

• हर व्यक्ति को उसका प्राप्य देने का अर्थ उसे उसका उचित हिस्सा देना है।
• जर्मन दार्शनिक काण्ट के अनुसार प्रत्येक मनुष्य की एक गरिमा होती है।
• प्लेटो के अनुसार अपने निर्धारित कार्य को करना और दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप न करना न्याय है।
• समय के साथ न्याय में मानवीय गरिमा और आवश्यकताओं को प्राथमिकता मिलने लगी है।

आम गलतियाँ:

• छात्र 'प्राप्य' का अर्थ केवल धन या संपत्ति से लगा लेते हैं।
• काण्ट और प्लेटो के विचारों को आपस में मिला देना।
• समय के साथ हुए वैचारिक बदलाव को स्पष्ट न करना।

Exam Tips:

a) दार्शनिकों (जैसे काण्ट और प्लेटो) के विचारों का उल्लेख करने से उत्तर प्रभावशाली बनता है।
b) 'प्राप्य' शब्द के प्राचीन और आधुनिक दृष्टिकोण को अलग-अलग बिंदुओं में स्पष्ट करें।
c) उत्तर को संक्षिप्त और तथ्यात्मक रखें।

 

Question 2: अध्याय में दिए गए न्याय के तीन सिद्धांतों को संक्षेप में चर्चा करो। प्रत्येक को उदाहरण के साथ समझाइए।

Answer:

अध्याय में दिए गए न्याय के तीन सिद्धांत निम्नलिखित हैं:
1. समान लोगों के प्रति समान व्यवहार: आज अधिकांश उदारवादी जनतंत्रों में कुछ महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं। इनमें जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकार जैसे नागरिक अधिकार शामिल हैं। इससे समाज के अन्य सदस्यों के साथ समान अवसरों के उपयोग करने का सामाजिक अधिकार तथा मताधिकार जैसे राजनीतिक अधिकार भी शामिल हैं। ये अधिकार व्यक्तियों को राज प्रक्रियाओं में भागीदार बनाते हैं। समान अधिकारों के अलावा समकक्षों के साथ समान बरताव के सिद्धांत के लिए ज़रूरी है कि लोगों के साथ वर्ण, जाति, नस्ल के आधार पर भेदभाव न किया जाए।
2. समानुपातिक न्याय: सबके लिए समान अधिकार की दौड़ में एक शुरुआती रेखा निर्धारित करने के बावजूद, ऐसे मसलों में न्याय का मतलब होगा, लोगों को उनके प्रयास के पैमाने और अर्हता के अनुपात में पुरस्कार करना। उदाहरण के तौर पर खनिकों, कुशल कारीगरों अथवा पुलिस कर्मियों जैसे कभी-कभी खतरनाक, लेकिन सामाजिक रूप से उपयोगी पेशों में लगे लोगों को सदैव वह परिश्रमिक नहीं मिलता, जो समाज में कुछ अन्य लोगों को होने वाली कमाई की तुलना में न्यायोचित हो। समाज में न्याय के लिए समान बरताव के सिद्धांत का समानुपातिकता के सिद्धांत के साथ संतुलन बिठाने की ज़रूरत है।
3. विशेष आवश्यकताओं का विशेष ध्यान: न्याय के जिस तीसरे सिद्धांत को हम समाज के लिए मान्य करते हैं, वह कर्तव्यों का वितरण करते समय लोगों की विशेष ज़रूरतों का ध्यान रखने का सिद्धांत है। इसे सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने का तरीका माना जा सकता है। लोगों की विशेष ज़रूरतों को ध्यान में रखने का सिद्धांत समान व्यवहार के सिद्धांत को अनिवार्यत: खंडित नहीं, बल्कि उसका विस्तार ही करता है।

मुख्य बिंदु:

• समान लोगों के प्रति समान व्यवहार के अंतर्गत सभी नागरिकों को बुनियादी अधिकार दिए जाते हैं।
• समानुपातिक न्याय लोगों के प्रयासों, योग्यताओं और कार्य की कठिनाई के अनुपात में फल या पुरस्कार देने की बात करता है।
• विशेष आवश्यकताओं का विशेष ध्यान रखना सामाजिक न्याय का एक अनिवार्य हिस्सा है।

आम गलतियाँ:

• तीनों सिद्धांतों के नाम गलत लिखना या उन्हें आपस में मिला देना।
• उचित और सटीक उदाहरणों का प्रयोग न करना।
• समानुपातिक न्याय और समान व्यवहार के अंतर को स्पष्ट न कर पाना।

Exam Tips:

a) तीनों सिद्धांतों को अलग-अलग शीर्षकों के अंतर्गत लिखें।
b) प्रत्येक सिद्धांत के साथ एक उपयुक्त दैनिक जीवन का उदाहरण अवश्य दें।
c) उत्तर की प्रस्तुति में बुलेट पॉइंट्स का प्रयोग करें ताकि परीक्षक को पढ़ने में आसानी हो।

 

Question 3: क्या जरूरतों का सिद्धांत सभी के साथ समान बरताव के सिद्धांत के विरुद्ध है?

Answer:

समाज के सदस्यों के रूप में लोगों की बुनियादी हैसियत तथा अधिकारों के लिहाज से न्याय के लिए यह ज़रूरी हो सकता है कि लोगों के साथ समान व्यवहार न किया जाए। लेकिन, लोगों के बीच भेदभाव न करना और समाज में अपने जीवन के अन्य संदर्भों में भी लोग समानताप्राप्त करें जिससे समाज समग्र रूप से सबके प्रति न्यायपूर्ण हो जाए। लोगों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखने का सिद्धांत समान व्यवहार के सिद्धांत को अनिवार्यता खंडित नहीं, बल्कि उसका विस्तार ही करता है। 'शारीरिक विकलांगता, उम्र या अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच न होना कुछ ऐसे कारक हैं, जिन्हें अनेक देशों में विशेष व्यवहार का आधार समझा जाता है।

मुख्य बिंदु:

• जरूरतों का सिद्धांत और समान व्यवहार का सिद्धांत एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
• विशेष आवश्यकताओं का ध्यान रखना समान न्याय की अवधारणा का विस्तार है।
• विकलांग, वृद्ध या वंचित वर्ग को विशेष सहायता देना सामाजिक न्याय के अंतर्गत आता है।

आम गलतियाँ:

• यह मान लेना कि विशेष ध्यान देना भेदभाव या असमानता को बढ़ावा देना है।
• 'समानता' और 'आवश्यकता' के बीच के संबंध को गलत समझना।

Exam Tips:

a) स्पष्ट रूप से बताएं कि ये दोनों सिद्धांत एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।
b) दिव्यांगों या वृद्धों के उदाहरण से अपने उत्तर को पुष्ट करें।
c) सामाजिक न्याय के परिप्रेक्ष्य में उत्तर का अंत करें।

 

Question 4: निष्पक्ष और न्यायपूर्ण वितरण को युक्तिसंगत आधार पर सही ठहराया जा सकता है। रॉल्स ने इस तर्क को आगे बढ़ाने में 'अज्ञानता के आवरण' के विचार का उपयोग किस प्रकार किया।

Answer:

जॉन रॉल्स तर्क करते हैं कि निष्पक्ष और न्यायसंगत नियम तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता यही है कि हम खुद को ऐसी परिस्थिति में होने की कल्पना करें जहाँ हमें यह निर्णय लेना है कि समाज को कैसे संगठित किया जाए। अर्थात् हम नहीं जानते कि किस किस्म के परिवार में हम जन्म लेंगे, हम 'उच्च' जाति के परिवार में पैदा होंगे या 'निम्न' जाति में, धनै होंगे या गरीब, सुविधा-संपन्न होंगे या सुविधाहीन। रॉल्स तक देते हैं कि अगर हमें यह नहीं मालूम हो कि हम कौन होंगे और भविष्य के समाज में हमारे लिए कौन से विकल्प खुले होंगे, तब हम भविष्य के उस समाज के नियमों और संगठन के बारे में जिस निर्णय का समर्थन करेंगे वह तमाम सदस्यों के लिए अच्छा होगा। रॉल्स ने इसे 'अज्ञानता के आवरण' में सोचना कहा है। वे आशा करते हैं कि समाज में अपने संभावित स्थान और हैसियत के बारे में पूर्ण अज्ञानता की हालत में हर आदमी, आमतौर पर जैसे सब करते हैं, अपने खुद के हितों को ध्यान में रखकर फैसला करेगा। 'अज्ञानता के आवरण' वाली स्थिति की विशेषता यह है कि उसमें लोगों से सामान्य रूप से विवेकशील मनुष्य बनने की उम्मीद बनाती है।

मुख्य बिंदु:

• जॉन रॉल्स ने न्याय के सिद्धांत के लिए 'अज्ञानता के आवरण' (Veil of Ignorance) की कल्पना की है।
• इस स्थिति में व्यक्ति को अपनी सामाजिक स्थिति, जाति, वर्ग या योग्यता का ज्ञान नहीं होता।
• ऐसी स्थिति में लिया गया निर्णय सबसे निष्पक्ष और न्यायसंगत होता है क्योंकि व्यक्ति सभी वर्गों के हितों की रक्षा का प्रयास करता है।

आम गलतियाँ:

• 'अज्ञानता के आवरण' की अवधारणा को ठीक से न समझा पाना।
• जॉन रॉल्स के नाम या उनके मुख्य तर्क को छोड़ देना।

Exam Tips:

a) 'अज्ञानता के आवरण' शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से करें और इसे कोट करें।
b) समझाइए कि कैसे यह स्थिति निष्पक्ष निर्णय लेने में मदद करती है।
c) उत्तर को तार्किक और दार्शनिक दृष्टिकोण से लिखें।

 

Question 5: आम तौर पर एक स्वस्थ और उत्पादक जीवन जीने के लिए व्यक्ति की न्यूनतम बुनियादी जरूरतें क्या मानी गई हैं? इस न्यूनतम को सुनिश्चित करने में सरकार की क्या जिम्मेदारी है?

Answer:

विभिन्न सरकारों और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने लोगों की बुनियादी जरूरतों की गणना के लिए विभिन्न तरीके दिए हैं। लेकिन इस पर सहमति है कि स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की बुनियादी मात्रा, आवास, शुद्ध पेयजल की आपूर्ति, शिक्षा और न्यूनतम मजदूरी इन बुनियादी स्थितियों के महत्वपूर्ण हिस्से होंगे। लोगों की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी समझੀ जाती है। सभी नागरिकों के लिए इन बुनियादी शर्तों की पूर्ति, खासकर भारत जैसे देश में जहाँ गरीबों की बड़ी संख्या है, सरकार पर भारी बोझ बन सकती है।

मुख्य बिंदु:

• बुनियादी जरूरतों में पोषणयुक्त भोजन, आवास, पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य शामिल हैं।
• इन जरूरतों को पूरा करना लोकतांत्रिक सरकारों की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है।
• विकासशील देशों में संसाधनों की कमी के कारण यह सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होती है।

आम गलतियाँ:

• केवल भोजन और पानी को बुनियादी जरूरत मान लेना, शिक्षा और स्वास्थ्य को छोड़ देना।
• सरकार की जिम्मेदारी के पहलू को नजरअंदाज करना।

Exam Tips:

a) बुनियादी जरूरतों की सूची बुलेट पॉइंट्स में दें।
b) सरकार की कल्याणकारी भूमिका (Welfare State) का उल्लेख अवश्य करें।
c) विकासशील देशों की यथार्थ स्थिति का जिक्र करें।

 

Question 6: सभी नागरिकों को जीवन की न्यूनतम बुनियादी स्थितियाँ उपलब्ध कराने के लिए राज्य की कार्रवाई को निम्न में से कौन-से तर्क को वाजिब ठहराया जा सकता है?
(क) गरीब और जरूरतमंदों को नि:शुल्क सेवाएं देना एक धार्मिक कार्य के रूप में न्यायोचित है।
(ख) सभी नागरिकों को जीवन का न्यूनतम बुनियादी स्तर उपलब्ध करवाना अवसरों की समानता सुनिश्चित करने का एक तरीका है।
(ग) कुछ लोग प्राकृतिक रूप से आलसी होते हैं और हमें उनके प्रति दयालु होना चाहिए।
(घ) सभी के लिए बुनियादी सुविधाएँ और न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित करना साझी मानवता और मानव अधिकारों की स्वीकृति है।

Answer:

(घ) सभी के लिए बुनियादी सुविधाएँ और न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित करना साझी मानवता और मानव अधिकारों की स्वीकृति है।

मुख्य बिंदु:

• न्यूनतम बुनियादी स्तर उपलब्ध कराना मानव अधिकारों का अभिन्न अंग है।
• यह किसी की दया या दान नहीं, बल्कि साझी मानवता और न्याय का तकाजा है।
• सही विकल्प (घ) है जो न्याय और मानवीय गरिमा को रेखांकित करता है।

आम गलतियाँ:

• विकल्प (क) या (ग) को सही मान लेना जो कि नैतिक या तार्किक रूप से कमजोर हैं।
• बिना प्रश्न को समझे तुक्का लगाना।

Exam Tips:

a) बहुविकल्पीय प्रश्न में सही विकल्प का चयन करने के बाद उसका संक्षिप्त कारण भी दें।
b) मानव अधिकारों और साझी मानवता के सिद्धांतों को उत्तर का आधार बनाएं।
c) अन्य विकल्पों के गलत होने का कारण समझें।

 

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