NCERT Solutions Class 11 Chemistry Chapter 08 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques (कार्बनिक रसायन कुछ आधारभूत सिद्धांत तथा तकनीकें) in Hindi

Official NCERT Solutions for Class 11 Chemistry: Chapter 08 कार्बनिक रसायन कुछ आधारभूत सिद्धांत तथा तकनीकें

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Chapter-wise Solutions for Chemistry: Chapter 08 कार्बनिक रसायन कुछ आधारभूत सिद्धांत तथा तकनीकें

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Question 1: निम्नलिखित यौगिकों में प्रत्येक कार्बन की संकरण अवस्था बताइए—
CH₂ = C = O, CH₃CH = CH₂, (CH₃)₂CO, CH₂ = CHCN, C₆H₆

Answer:

दिए गए यौगिकों में कार्बन परमाणुओं की संकरण अवस्था उनके बीच के बंधों (सिग्मा और पाई बंध) पर निर्भर करती है। (i) CH₂ = C = O में, C-1 कार्बन sp² संकरित है क्योंकि यह एक द्विआबंध से जुड़ा है, और केंद्रीय C-2 कार्बन sp संकरित है क्योंकि यह दो दोहरे आबंधों से जुड़ा है। (ii) CH₃CH = CH₂ में, C-1, C-2 और C-3 क्रमशः sp³, sp² और sp³ संकरित हैं। (iii) (CH₃)₂CO (एसिटोन) में, मेथिल कार्बन sp³ संकरित हैं और कार्बोनिल कार्बन (C=O) sp² संकरित है। (iv) CH₂ = CHCN में, C-1 और C-2 क्रमशः sp² और sp² संकरित हैं, जबकि सायनो समूह का कार्बन sp संकरित है। (v) C₆H₆ (बेंजीन) वलय के सभी छह कार्बन परमाणु sp² संकरित हैं क्योंकि प्रत्येक कार्बन एक द्विआबंध और दो एकल बंध बनाता है।

मुख्य बिंदु:

• एकल बंधित कार्बन परमाणु sp³ संकरण प्रदर्शित करते हैं जिनकी ज्यामिति चतुष्फलकीय होती है।
• द्विआबंधित कार्बन परमाणु sp² संकरण प्रदर्शित करते हैं जिनकी ज्यामिति त्रिकोणीय समतलीय होती है।
• त्रिआबंधित या दो दोहरे आबंधों से जुड़े केंद्रीय कार्बन परमाणु sp संकरण प्रदर्शित करते हैं जिनकी ज्यामिति रैखिक होती है।

आम गलतियाँ:

• केंद्रीय कार्बन (जैसे C=O या C=C=O में) के संकरण को पहचानते समय दोहरे आबंधों के दोनों पाई बंधों को गिन लेना।
• बेंजीन वलय के सभी कार्बनों को अलग-अलग संकरण अवस्था में मान लेना जबकि सभी sp² संकरित हैं।
• कार्बन की संयोजकता और उससे जुड़े एकल/द्विआबंधों की सही गणना न करना।

Exam Tips:

a) संकरण निकालने के लिए कुल सिग्मा बंधों की संख्या गिनें; 4 सिग्मा = sp³, 3 सिग्मा = sp², 2 सिग्मा = sp।
b) संरचना सूत्र (Expanded Structure) बनाकर बंधों को स्पष्ट रूप से चित्रित करें।
c) अल्केन, एल्कीन और एल्काइन के सामान्य संकरण नियमों को अच्छी तरह याद रखें।

 

Question 2: निम्नलिखित अणुओं में सिग्मा (σ) तथा पाई (π) आबंध दर्शाइए—
C₂H₆, C₅H₁₂ (साधारणतः C₆H₁₂ दिया गया है), CH₃Cl, CH₂ = C = CH₂, CH₃NO₂, HCONHCH₃

Answer:

अणुओं में सिग्मा और पाई आबंधों की संख्या उनकी संरचना पर निर्भर करती है। (i) C₂H₆ (एथेन) में 6 C-H सिग्मा आबंध और 1 C-C सिग्मा आबंध होता है, कुल 7 सिग्मा आबंध और कोई पाई आबंध नहीं होता। (ii) C₆H₁₂ (साइक्लोहेक्साने) में 6 C-C सिग्मा आबंध और 12 C-H सिग्मा आबंध होते हैं। (iii) CH₃Cl में 3 C-H सिग्मा आबंध और 1 C-Cl सिग्मा आबंध होता है। (iv) CH₂ = C = CH₂ (प्रोपलीन) में 4 C-H सिग्मा आबंध, 2 C-C सिग्मा आबंध और 2 C=C पाई आबंध होते हैं। (v) CH₃NO₂ में तीन C-H सिग्मा, एक C-N सिग्मा, एक N-O सिग्मा और एक N=O पाई आबंध होता है। (vi) HCONHCH₃ में दो C-N सिग्मा आबंध, चार C-H सिग्मा आबंध, एक N-H सिग्मा आबंध और एक C=O पाई आबंध उपस्थित होता है।

मुख्य बिंदु:

• प्रत्येक एकल सहसंयोजक बंध केवल एक सिग्मा (σ) आबंध होता है।
• द्विआबंध में एक सिग्मा (σ) और एक पाई (π) आबंध होता है।
• त्रिआबंध में एक सिग्मा (σ) और दो पाई (π) आबंध होते हैं।

आम गलतियाँ:

• द्विआबंध में दोनों आबंधों को सिग्मा मान लेना या पाई आबंधों की गलत गिनती करना।
• हाइड्रोजन परमाणुओं द्वारा बनाए जाने वाले बंधों को छोड़ देना।
• नाइट्रो और एमाइड समूहों की खुली संरचना का सही आरेख न बनाना।

Exam Tips:

a) संरचना सूत्र लिखकर प्रत्येक बंध पर स्पष्ट रूप से σ और π अंकित करें।
b) कुल सिग्मा बंध = कुल एकल बंध + द्विआबंधों में मौजूद सिग्मा बंध + त्रिआबंधों में मौजूद सिग्मा बंध।
c) बहु-परमाणुक क्रियात्मक समूहों (जैसे -NO₂, -CONH-) की संरचनाओं का बार-बार अभ्यास करें।

 

Question 3: निम्नलिखित यौगिकों के आबंध-रेखा सूत्र लिखिए—
आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल, 2,3-डाइमेथिल ब्यूटेनैल, हेप्टेन-4-ओन

Answer:

आबंध-रेखा सूत्र (Bond-line formula) में कार्बन और हाइड्रोजन परमाणुओं को रेखाओं के सिरों और कोनों के रूप में दर्शाया जाता है, जबकि heteroatoms (जैसे O, N, Cl) और उनके साथ जुड़े हाइड्रोजन को स्पष्ट लिखा जाता है। (क) आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल का संघटित सूत्र (CH₃)₂CHOH है, जिसका आबंध-रेखा सूत्र एक V-आकार की रेखा के कोने पर -OH समूह जुड़ा हुआ होता है। (ख) 2,3-डाइमेथिल ब्यूटेनैल की संरचना में चार कार्बन की मुख्य श्रृंखला होती है जिसमें C-2 और C-3 पर मेथिल समूह (-CH₃) और C-1 पर ऐल्डिहाइड समूह (-CHO) होता है। (ग) हेप्टेन-4-ओन में सात कार्बन की सीधी श्रृंखला होती है जिसके चौथे कार्बन पर कीटोन समूह (=O) उपस्थित होता है।

मुख्य बिंदु:

• आबंध-रेखा सूत्रों में रेखाओं के अंत और कोने कार्बन परमाणुओं को दर्शाते हैं।
• क्रियात्मक समूहों (जैसे -OH, -CHO, =O) को उनके प्रतीकों के साथ दर्शाना अनिवार्य है।
• श्रृंखला में कार्बन की सही संख्या गिनकर कोनों का निर्धारण किया जाता है।

आम गलतियाँ:

• मुख्य श्रृंखला में कार्बन परमाणुओं की संख्या कम या ज्यादा बना देना।
• क्रियात्मक समूह की स्थिति (लोकेन्ट) को गलत कार्बन पर दर्शाना।
• आबंध-रेखा में सिरों और मोड़ों को ठीक से न दिखाना।

Exam Tips:

a) पहले यौगिक का संघटित या पूर्ण संरचना सूत्र लिखें, फिर उसे आबंध-रेखा में बदलें।
b) मुख्य श्रृंखला के सिरों और मोड़ों की गिनती सावधानी से करें।
c) कीटोन और ऐल्डिहाइड जैसे समूहों में ऑक्सीजन के द्विआबंध को स्पष्ट दिखाएं।

 

Question 4: निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए—
(a) फेनिल प्रोपेन (b) 2-मेथिल-1-सायनोब्यूटेन (c) 2,5-डाइमेथिल हेप्टेन (d) 3-bromo-3-क्लोरोहेप्टेन (e) 3-क्लोरोप्रोपैनैल (f) 1,1-डाइक्लोरो-2-इथैनॉल

Answer:

दिए गए यौगिकों के सही IUPAC नाम नियमों के अनुसार इस प्रकार हैं: (a) दिए गए यौगिक में प्रोपेन श्रृंखला से फेनिल समूह जुड़ा है, अतः इसका नाम 3-फेनिलप्रोपेन या फेनिलप्रोपेन है। (b) इसमें चार कार्बन की मुख्य श्रृंखला है जिसमें C-1 पर सायनो (-CN) समूह और C-2 पर मेथिल समूह है, नाम 2-मेथिलब्यूटेन-1-नाइट्राइल (या 2-मेथिल-1-सायनोब्यूटेन) है। (c) सात कार्बन की मुख्य श्रृंखला पर C-2 और C-5 पर मेथिल समूह हैं, इसलिए नाम 2,5-डाइमेथिलहेप्टेन है। (d) सात कार्बन की श्रृंखला में C-3 पर ब्रोमो और क्लोरो दोनों हैं, वर्णक्रम के अनुसार ब्रोमो पहले आता है, अतः नाम 3-ब्रोमो-3-क्लोरोहेप्टेन है। (e) तीन कार्बन की ऐल्डिहाइड श्रृंखला जिसमें C-3 पर क्लोरो है, नाम 3-क्लोropropanal है। (f) दो कार्बन की एथेनॉल श्रृंखला में C-1 पर दो क्लोरो समूह हैं, नाम 2,2-डाइक्लोरोएथेनॉल (पीडीएफ के अनुसार 1,1-डाइक्लोरो-2-इथैनॉल) है।

मुख्य बिंदु:

• सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला को मुख्य जनक श्रृंखला के रूप में चुना जाता है।
• प्रतिस्थापियों का नामकरण अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम (Alphabetical order) के अनुसार किया जाता है।
• मुख्य क्रियात्मक समूह को न्यूनतम संभव स्थानीय अंक (Locant) दिया जाता है।

आम गलतियाँ:

• वर्णमाला क्रम को नजरअंदाज करके प्रतिस्थापियों के नाम उल्टे लिख देना।
• मुख्य श्रृंखला की लंबाई की गणना में गलती करना।
• क्रियात्मक समूह को प्राथमिकता न देकर प्रतिस्थापी को प्राथमिकता देना।

Exam Tips:

a) IUPAC नाम लिखते समय हमेशा पूर्वलग्न (Prefix) + मूल शब्द (Root Word) + अनुलग्न (Suffix) के क्रम का पालन करें।
b) बहु-प्रतिस्थापी यौगिकों में दोनों सिरों से नंबरिंग करके न्यूनतम योग नियम (Lowest Locant Rule) देखें।
c) हैलो समूहों (क्लोरो, ब्रोमो) को हमेशा वर्णमाला क्रम में ही व्यवस्थित करें।

 

Question 5: निम्नलिखित यौगिकों में से कौन सा नाम IUPAC पद्धति के अनुसार सही है?
(क) 2,2-डाइएथिलपेन्टेन अथवा 2,2-डाइमेथिलपेन्टेन
(ख) 2,4,7-ट्राइमेथिलऑक्टेन अथवा 2,5,7-ट्राइमेथिलऑक्टेन
(ग) 2-क्लोरो-4-मेथिलपेन्टेन अथवा 4-क्लोरो-2-मेथिलपेन्टेन
(घ) ब्यूट-3-आइन-1-ऑल अथवा ब्यूट-4-ऑल-1-आइन

Answer:

(क) सही नाम 2,2-डाइमेथिलपेन्टेन है क्योंकि 'di' उपसर्ग दो समान प्रतिस्थापियों को दर्शाता है जो C-2 पर स्थित हैं। (ख) सही नाम 2,4,7-ट्राइमेथिलऑक्टेन है क्योंकि इसके स्थानीय अंकों का सेट (2, 4, 7) दूसरे सेट (2, 5, 7) से छोटा है। (ग) सही नाम 2-क्लोरो-4-मेथिलपेन्टेन है क्योंकि दोनों सिरों से देखने पर पहली स्थिति समतुल्य होने पर वर्णक्रम में पहले आने वाले (क्लोरो) को कम अंक दिया जाता है। (घ) सही नाम ब्यूट-3-आइन-1-ऑल है क्योंकि प्रमुख क्रियात्मक समूह ऐल्कोहॉल (-OH) है जिसे न्यूनतम अंक (1) मिलना चाहिए, और एल्काइन C-3 पर है।

मुख्य बिंदु:

• न्यूनतम स्थानीय अंक नियम (Lowest Locant Rule) के अनुसार सही दिशा से नंबरिंग की जाती है।
• मुख्य क्रियात्मक समूह को हमेशा प्राथमिकता दी जाती है और उसे न्यूनतम अंक मिलता है।
• वर्णमाला क्रम केवल तभी लागू होता है जब दोनों सिरों से समतुल्य स्थितियाँ हों।

आम गलतियाँ:

• बड़े स्थानीय अंकों वाले सेट को चुन लेना।
• क्रियात्मक समूह के स्थान पर प्रतिस्थापी को कम अंक दे देना।
• वर्णमाला क्रम के नियमों को गलत तरीके से लागू करना।

Exam Tips:

a) दोनों सिरों से नंबरिंग करके स्थानीय अंकों की तुलना बाईं से दाईं ओर करें।
b) क्रियात्मक समूहों की वरीयता सारणी (Priority Table) हमेशा याद रखें।
c) बहुविकल्पीय प्रश्नों में प्रत्येक विकल्प की नंबरिंग की जाँच रफ कार्य में अवश्य करें।

 

Question 6: निम्नलिखित दो सजातीय श्रेणियों में से प्रत्येक के प्रथम पाँच सजातों के संरचना-सूत्र लिखिए—
(क) H-COOH (ख) CH₃COCH₃ (ग) H-CH = CH₂

Answer:

सजातीय श्रेणी (Homologous Series) ऐसे कार्बनिक यौगिकों का समूह है जिनका सामान्य सूत्र समान होता है और क्रमिक सदस्यों के बीच -CH₂- इकाई का अंतर होता है। (क) कार्बोक्सिलिक अम्ल श्रेणी (H-COOH से शुरू): (1) मेथेनोइक अम्ल (H-COOH), (2) एथेनोइक अम्ल (CH₃-COOH), (3) प्रोपेनोइक अम्ल (CH₃-CH₂-COOH), (4) ब्यूटेनोइक अम्ल (CH₃-CH₂-CH₂-COOH), (5) पेंटेनोइक अम्ल (CH₃-CH₂-CH₂-CH₂-COOH)। (ख) कीटोन श्रेणी (CH₃COCH₃ से शुरू): (1) प्रोपेनोन (CH₃COCH₃), (2) ब्यूटेनोन (CH₃COCH₂CH₃), (3) पेंटेन-2-ऑन (CH₃COCH₂CH₂CH₃), (4) हेक्सेन-2-ऑन, (5) हेप्टेन-2-ऑन। (ग) एल्कीन श्रेणी (H-CH=CH₂ अर्थात एथीन से शुरू): (1) एथीन (CH₂=CH₂), (2) प्रोपीन (CH₃-CH=CH₂), (3) 1-ब्यूटिीन (CH₃-CH₂-CH=CH₂), (4) 1-पेन्टीन, (5) 1-हेक्सीन।

मुख्य बिंदु:

• सजातीय श्रेणी के सभी सदस्यों का सामान्य सूत्र और क्रियात्मक समूह समान होता है।
• दो क्रमागत सदस्यों के आणविक द्रव्यमान में 14 u (या -CH₂- समूह) का अंतर होता है।
• रासायनिक गुण लगभग समान होते हैं जबकि भौतिक गुणों में क्रमिक परिवर्तन होता है।

आम गलतियाँ:

• -CH₂- इकाई जोड़ने के बजाय गलत कार्बन श्रृंखला बढ़ा देना।
• श्रेणी के प्रारंभिक सदस्य से शुरू न करके बीच के सदस्य से लिखना शुरू कर देना।
• IUPAC नामकरण में कार्बन की सही संख्या न गिनना।

Exam Tips:

a) सजातीय श्रेणी का सामान्य सूत्र याद रखें (जैसे एल्केन CₙH₂ₙ₊₂)।
b) प्रत्येक अगले सदस्य में केवल एक -CH₂- समूह जोड़ते जाएं।
c) संरचना सूत्र लिखते समय संयोजकता (कार्बन की 4 और हाइड्रोजन की 1) का विशेष ध्यान रखें।

 

Question 7: निम्नलिखित के संघटित और आबंध रेखा-सूत्र लिखिए उनमें यदि कोई क्रियात्मक समूह हो, तो उसे पहचानिए—
(क) 2,2,4-ट्राइमेथिलपेन्टेन (ख) 2-हाइड्रॉक्सी-1,2,3-प्रोपेंट्रिकार्बोक्सिलिक अम्ल (ग) हेक्सेनडाइएैल

Answer:

इन यौगिकों के संघटित और आबंध-रेखा सूत्र इस प्रकार हैं: (क) 2,2,4-ट्राइमेथिलपेन्टेन — संघटित सूत्र: (CH₃)₂CHCH₂C(CH₃)₃, आबंध-रेखा सूत्र एक पाँच कार्बन की मुख्य श्रृंखला और उस पर C-2 पर दो तथा C-4 पर एक मेथिल समूह दर्शाता है। इसमें कोई विशिष्ट क्रियात्मक समूह नहीं है (यह एक ऐल्केन है)। (ख) 2-हाइड्रॉक्सी-1,2,3-प्रोपेंट्रिकार्बोक्सिलिक अम्ल (सिट्रिक अम्ल) — संघटित सूत्र: (COOH)CH₂C(OH)(COOH)CH₂(COOH), आबंध-रेखा सूत्र में मध्य कार्बन पर -OH और तीन सिरों पर -COOH समूह जुड़े होते हैं। इसमें कार्बोक्सिलिक एसिड (-COOH) और एल्कोहलिक (-OH) क्रियात्मक समूह मौजूद हैं। (ग) हेक्सेनडाइएैल — संघटित सूत्र: (CHO)(CH₂)₄(CHO), आबंध-रेखा सूत्र में 6 कार्बन की सीधी श्रृंखला के दोनों सिरों पर ऐल्डिहाइड (-CHO) समूह जुड़े होते हैं। इसमें क्रियात्मक समूह ऐल्डिहाइड (-CHO) है।

मुख्य बिंदु:

• संघटित सूत्र (Condensed formula) सभी परमाणुओं और समूहों को बिना बंध रेखाओं के लिखता है।
• आबंध-रेखा सूत्र (Bond-line formula) केवल कार्बन-कार्बन कंकाल को zig-zag रेखाओं से दर्शाता है।
• क्रियात्मक समूहों (যেমন -COOH, -OH, -CHO) को आबंध-रेखा में स्पष्ट रूप से लिखना आवश्यक है।

आम गलतियाँ:

• संघटित सूत्र से आबंध-रेखा बनाते समय कार्बन या शाखाओं (Branches) की संख्या भूल जाना।
• बहु-क्रियात्मक समूहों वाले यौगिकों में किसी एक समूह को छोड़ देना।
• -COOH और -CHO समूहों के कार्बन को मुख्य श्रृंखला में गलत गिनना।

Exam Tips:

a) नाम से सबसे पहले जनक श्रृंखला (Parent Chain) की कार्बन संख्या पहचानें।
b) प्रतिस्थापियों और क्रियात्मक समूहों की स्थिति (लोकेन्ट) को सही कार्बन पर रखें।
c) बहु-क्रियात्मक यौगिकों का अभ्यास करते समय संरचना को विस्तार से एक बार जरूर ड्रा करें।

 

Question 8: निम्नलिखित यौगिकों में क्रियात्मक समूह पहचानिए—
(क) OHC-C₆H₄-OH with -OMe
(ख) H₂N-C₆H₄-O-CH₂CH₂N(C₂H₅)₂
(ग) C₆H₅-CH=CHNO₂

Answer:

दिए गए यौगिकों में उपस्थित क्रियात्मक समूह (Functional Groups) निम्नलिखित हैं: (क) इस यौगिक में ऐल्डिहाइड (-CHO), हाइड्रॉक्सिल (-OH), मेथॉक्सी (-OCH₃) और बेंजीन वलय का C=C द्विआबंध (-C=C-) उपस्थित है। (ख) इस यौगिक में ऐमीनो (-NH₂), ईथर (अथवा एल्कोक्सी -O-), और तृतीयक ऐमीन (-N(C₂H₅)₂) समूह उपस्थित हैं। (ग) इस यौगिक में नाइट्रो (-NO₂) समूह और बेंजीन वलय के साथ-साथ ऐल्कीन का C=C द्विआबंध उपस्थित है।

मुख्य बिंदु:

• क्रियात्मक समूह वे विशिष्ट परमाणु या समूह होते हैं जो अणु के रासायनिक गुणों का निर्धारण करते हैं।
• एक ही कार्बनिक यौगिक में एक से अधिक क्रियात्मक समूह उपस्थित हो सकते हैं।
• एरोमैटिक यौगिकों में बेंजीन वलय का C=C आबंध भी असंतृप्ति का प्रतिनिधित्व करता है।

आम गलतियाँ:

• ईथर लिंकेज (-O-) या मेथॉक्सी समूह को पहचान न पाना।
• तृतीयक ऐमीन समूह के नाइट्रोजन पर जुड़े दो एथिल समूहों को नजरअंदाज करना।
• नाइट्रो समूह (-NO₂) और नाइट्राइट समूह में भ्रमित होना।

Exam Tips:

a) जटिल संरचनाओं को छोटे-छोटे हिस्सों (प्रतिस्थापी और क्रियात्मक समूह) में तोड़कर अध्ययन करें।
b) सभी सामान्य क्रियात्मक समूहों के प्रतीकों (जैसे -CHO, -OH, -NO₂, -NH₂) को अच्छी तरह याद रखें।
c) संरचना में उपस्थित बहुआबंधों (द्वि और त्रि आबंध) को भी क्रियात्मक समूह के रूप में पहचानें।

 

Question 9: निम्नलिखित में से कौन अधिक स्थायी है तथा क्यों? O₂NCH₂CH₂O⁻ और CH₃CH₂O⁻

Answer:

O₂NCH₂CH₂O⁻ आयन, CH₃CH₂O⁻ आयन की तुलना में अधिक स्थायी है। इसका कारण यह है कि -NO₂ समूह एक प्रबल इलेक्ट्रॉन-प्रदाता (इलेक्ट्रॉन-आकर्षक) समूह है जो -I प्रभाव (प्रेरणिक प्रभाव) प्रदर्शित करता है। यह अपनी ओर इलेक्ट्रॉनों को आकर्षित करके O₂NCH₂CH₂O⁻ पर उपस्थित ऋणात्मक आवेश को कम (विस्थापित) कर देता है, जिससे आयन का स्थायित्व बढ़ जाता है। इसके विपरीत, एथिल समूह (CH₃CH₂) एक इलेक्ट्रॉन-विमोचन (इलेक्ट्रॉन-दातार) समूह है जो +I प्रभाव प्रदर्शित करता है। यह ऋणात्मक आवेश को और बढ़ा देता है, जिससे CH₃CH₂O⁻ आयन अपेक्षाकृत कम स्थायी (अस्थायी) हो जाता है।

मुख्य बिंदु:

• इलेक्ट्रॉन-आकर्षक समूह (-I प्रभाव वाले जैसे -NO₂, -CN, -X) ऋणायन के आवेश को कम करके उसे स्थायी बनाते हैं।
• इलेक्ट्रॉन-दाता समूह (+I प्रभाव वाले जैसे -CH₃, -C₂H₅) ऋणायन के आवेश को बढ़ाकर उसे अस्थिर करते हैं।
• आवेश का विसंसजन (Delocalisation or Dispersion) हमेशा स्थायित्व में वृद्धि करता है।

आम गलतियाँ:

• +I और -I प्रभावों के विपरीत प्रभाव (स्थायित्व पर) को आपस में मिला देना।
• -NO₂ समूह को इलेक्ट्रॉन-दाता मान लेना।
• ऋण आवेश के घनत्व और स्थायित्व के संबंध को गलत समझना।

Exam Tips:

a) याद रखें: ऋणायन का स्थायित्व ∝ -I प्रभाव ∝ 1/(+I प्रभाव)।
b) धनात्मक और ऋणात्मक आवेशों वाले स्पीशीज़ के स्थायित्व की तुलना करते समय प्रेरणिक प्रभाव (-I / +I) का तर्क अवश्य दें।
c) उत्तर लिखते समय तीर के निशानों द्वारा इलेक्ट्रॉन विस्थापन को स्पष्ट करें।

 

Question 10: π-निकाय से आबधित होने पर ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉनदाता की तरह व्यवहार प्रदर्शित क्यों करते हैं? समझाइए।

Answer:

जब एक ऐल्किल समूह (जैसे मेथिल समूह) किसी असंतृप्त π-निकाय (जैसे एल्कीन या बेंजीन वलय) से जुड़ा होता है, तो यह अतिसंयुग्मन (Hyperconjugation) या बaker-Nathan प्रभाव के कारण इलेक्ट्रॉनदाता की तरह व्यवहार करता है। ऐल्किल समूह के C-H आबंध के सिग्मा (σ) इलेक्ट्रॉन π-प्रणाली के साथ युग्मित हो जाते हैं। चूँकि C-H आबंध के σ इलेक्ट्रॉन असंतृप्त प्रणाली के निकट होते हैं, इसलिए वे विस्थापित होकर π-इलेक्ट्रॉनों के साथ अनुनाद जैसी स्थिति बनाते हैं। इस प्रक्रिया में ऐल्किल समूह का C-H आबंध बिना किसी बंध के (प्रोटॉन के रूप में) आंशिक रूप से अलग रहता है, और इलेक्ट्रॉन घनत्व π-निकाय की ओर स्थानांतरित हो जाता है, जिससे ऐल्किल समूह एक इलेक्ट्रॉन-दाता के रूप में कार्य करता है।

मुख्य बिंदु:

• अतिसंयुग्मन को 'बंधरहित अनुनाद' (No-bond resonance) भी कहा जाता है।
• इसमें C-H सिग्मा इलेक्ट्रॉन और π-इलेक्ट्रॉनों का परस्पर युग्मन होता है।
• ऐल्किल समूहों में जितने अधिक α-हाइड्रोजन होंगे, उनका अतिसंयुग्मी प्रभाव उतना ही अधिक होगा।

आम गलतियाँ:

• अतिसंयुग्मन को केवल प्रेरणिक प्रभाव समझ लेना।
• α-हाइड्रोजन परमाणुओं की भूमिका को न समझ पाना।
• यह मान लेना कि ऐल्किल समूह हमेशा +I प्रभाव से ही इलेक्ट्रॉन देते हैं, अतिसंयुग्मन की उपेक्षा करना।

Exam Tips:

a) प्रोपीन का उदाहरण लेकर अतिसंयुग्मन की अनुनादी संरचनाओं को चित्र सहित अभ्यास करें।
b) मुख्य शब्द 'अतिसंयुग्मन' (Hyperconjugation) और 'α-हाइड्रोजन' का उल्लेख उत्तर में अवश्य करें।
c) यह प्रश्न दीर्घ उत्तरीय या आरेख आधारित आ सकता है।

 

Question 11: निम्नलिखित यौगिकों की अनुनाद-संरचना लिखिए तथा इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन मुड़े तीरों की सहायता से दर्शाइए—
(क) C₆H₅OH (ख) C₆H₅NO₂ (ग) CH₂CH=CHCHO (घ) C₆H₅CHO (ङ) C₆H₅CH₂⁺ (च) CH₂CH=CHCH₂⁺

Answer:

अनुनाद संरचनाओं में पाई इलेक्ट्रॉनों या लोन पेयर का विस्थापन मुड़े हुए तीरों (curved arrows) द्वारा दर्शाया जाता है। (क) फिनॉल (C₆H₅OH) में -OH समूह के ऑक्सीजन की लोन पेयर वलय की ओर विस्थापित होती है, जिससे ऑर्थो और पैरा स्थिति पर ऋण आवेश आता है। (ख) नाइट्रोबेंजीन (C₆H₅NO₂) में -NO₂ समूह इलेक्ट्रॉन-आकर्षक होने के कारण वलय से इलेक्ट्रॉन खींचता है, जिससे ऑर्थो और पैरा स्थितियों पर धन आवेश आता है। (ग) CH₂=CH-CH=CHO में पाई इलेक्ट्रॉन ऑक्सीजन की ओर विस्थापित होते हैं जिससे श्रृंखला में धनावेश का विस्थापन होता है। (घ) बेंजल्डिहाइड (C₆H₅CHO) में कार्बोनिल समूह इलेक्ट्रॉन खींचकर वलय के ऑर्थो/पैरा स्थानों पर धनावेश उत्पन्न करता है। (ङ) बेंजिल कार्बोकेशन (C₆H₅CH₂⁺) में वलय के पाई इलेक्ट्रॉन धनावेश को उदासीन करने के लिए विस्थापित होते हैं। (च) ऐलिल कार्बोकेशन (CH₂=CH-CH₂⁺) में द्विआबंध के पाई इलेक्ट्रॉन धनावेशित कार्बन की ओर विस्थापित होते हैं।

मुख्य बिंदु:

• मुड़ा हुआ तीर हमेशा उच्च इलेक्ट्रॉन घनत्व (लोन पेयर या π-आबंध) से कम इलेक्ट्रॉन घनत्व की ओर जाता है।
• अनुनाद संकर (Resonance hybrid) वास्तविक अणु का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि व्यक्तिगत संरचनाएं काल्पनिक होती हैं।
• अनुनाद के दौरान परमाणु अपनी जगह नहीं बदलते, केवल इलेक्ट्रॉन और पाई आबंध विस्थापित होते हैं।

आम गलतियाँ:

• मुड़े हुए तीर की दिशा उल्टी बना देना (कम से अधिक की ओर)।
• अनुनाद संरचनाओं के बीच द्विपक्षीय तीर (⟷) के स्थान पर रासायनिक अभिक्रिया का तीर (→) लगा देना।
• आवेशों (+ और -) को सही जगह न दर्शाना।

Exam Tips:

a) फिनॉल और नाइट्रोबेंजीन की अनुनाद संरचनाओं का बार-बार लिखकर अभ्यास करें क्योंकि ये परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं।
b) प्रत्येक संरचना में अष्टक नियम और औपचारिक आवेश (Formal charge) का ध्यान रखें।
c) तीरों के सिरों को सटीक रूप से उस परमाणु या बंध पर दिखाएं जहाँ इलेक्ट्रॉन जा रहे हैं।

 

Question 12: इलेक्ट्रोफाइल तथा नाभिकस्नेही क्या हैं? उदाहरणसहित समझाइए।

Answer:

इलेक्ट्रोफाइल (इलेक्ट्रॉन्सनेही) वे अभिकर्मक होते हैं जिनमें इलेक्ट्रॉन की कमी होती है (अर्थात इलेक्ट्रॉन-रागी)। ये इलेक्ट्रॉन-युग्म के प्राप्तकर्ता होते हैं। उदाहरण के लिए: कार्बोकेशन (CH₃CH₂⁺) और कार्बोनिल समूह (C=O) जैसे क्रियाशील समूहों वाले उदासीन अणु। दूसरी ओर, नाभिकस्नेही (Nucleophile) वे अभिकर्मक होते हैं जो इलेक्ट्रॉन-युग्म दान करते हैं (अर्थात नाभिक-रागी)। ये इलेक्ट्रॉन-समृद्ध प्रजातियाँ हैं। उदाहरण के लिए: OH⁻, NC⁻, R₃C⁻ जैसे ऋणावेशित आयन तथा H₂O और अमोनिया (NH₃) जैसे उदासीन अणु जिनमें एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म (lone pair) उपस्थित होता है।

मुख्य बिंदु:

• इलेक्ट्रॉन्सनेही (+E या E⁺) इलेक्ट्रॉन न्यून (Electron-deficient) होते हैं और लुईस अम्ल की तरह व्यवहार करते हैं।
• नाभिकस्नेही (Nu:) इलेक्ट्रॉन समृद्ध (Electron-rich) होते हैं और लुईस क्षार की तरह व्यवहार करते हैं।
• रासायनिक अभिक्रियाओं में इलेक्ट्रॉन्सनेही इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं और नाभिकस्नेही इलेक्ट्रॉन दान करते हैं।

आम गलतियाँ:

• इलेक्ट्रॉन्सनेही और नाभिकस्नेही की परिभाषाओं और उनके आवेशों को आपस में मिला देना।
• उदासीन अणुओं (जैसे H₂O या NH₃) को नाभिकस्नेही न पहचान पाना।
• कार्बोकेशन को नाभिकस्नेही समझ लेना।

Exam Tips:

a) याद रखने की ट्रिक: Electro-phile (Electron loving = positive/deficient) और Nucleo-phile (Nucleus/Positive loving = negative/rich)।
b) प्रत्येक श्रेणी के कम से कम दो-दो धनात्मक, ऋणावेशित और उदासीन उदाहरण याद रखें।
c) यह प्रश्न अंतर स्पष्ट करने के रूप में अक्सर पूछा जाता है।

 

Question 13: निम्नलिखित समीकरणों में मोटे अक्षरों में लिखे अभिकर्मकों को नाभिकस्नेही तथा इलेक्ट्रोफाइल में वर्गीकृत कीजिए—
(क) CH₃COOH + HO⁻ → CH₃COO⁻ + H₂O
(ख) CH₃COCH₃ + CN⁻ → (CH₃)₂C(CN)(OH)
(ग) C₆H₆ + CH₃CO⁺ → C₆H₅COCH₃

Answer:

(क) इस अभिक्रिया में HO⁻ एक नाभिकस्नेही है क्योंकि यह एक इलेक्ट्रॉन-समृद्ध प्रजाति है जो प्रोटॉन पर आक्रमण करती है। (ख) इस अभिक्रिया में CN⁻ एक नाभिकस्नेही है क्योंकि साइनाइड आयन पर ऋणावेश और एकाकी युग्म होता है जो कार्बोनिल कार्बन पर आक्रमण करता है। (ग) इस अभिक्रिया में CH₃CO⁺ (एसिलियम आयन) एक इलेक्ट्रोफाइल है क्योंकि इस पर धनावेश होता है और यह इलेक्ट्रॉन की कमी वाला अभिकर्मक है जो बेंजीन वलय पर आक्रमण करता है।

मुख्य बिंदु:

• ऋणावेशित प्रजातियाँ और एकाकी युग्म वाले उदासीन अणु सामान्यतः नाभिकस्नेही होते हैं।
• धनावेशित प्रजातियाँ या वे अणु जिनके केंद्रीय परमाणु का अष्टक अपूर्ण होता है, इलेक्ट्रोफाइल होते हैं।
• अभिक्रिया समीकरण में अभिकर्मकों के आवेश देखकर उनकी प्रकृति पहचानी जा सकती है।

आम गलतियाँ:

• धनावेशित आयन को नाभिकस्नेही मान लेना।
• समीकरण में प्रहार करने वाले अभिकर्मक के बजाय उत्पाद को वर्गीकृत कर देना।
• HO⁻ और CN⁻ को इलेक्ट्रोफाइल समझ लेना।

Exam Tips:

a) अभिकर्मक पर उपस्थित आवेश (+ या -) और लोन पेयर को देखकर तुरंत पहचानें।
b) एसाइलियम आयन (CH₃CO⁺) को हमेशा एक मजबूत इलेक्ट्रोफाइल के रूप में याद रखें।
c) प्रतिक्रिया तंत्र (Reaction mechanism) के मूल सिद्धांतों का अभ्यास करें।

 

Question 14: निम्नलिखित अभिक्रियाओं को वर्गीकृत कीजिए—
(क) CH₃CH₂Br + HS⁻ → CH₃CH₂SH + Br⁻
(ख) (CH₃)₂C = CH₂ + HCl → (CH₃)₂ClC-CH₃
(ग) CH₃CH₂Br + HO⁻ → CH₂ = CH₂ + H₂O + Br⁻
(घ) (CH₃)₃C-CH₂OH + HBr → (CH₃)₂CBrCH₂CH₂CH₃ + H₂O

Answer:

इन रासायनिक अभिक्रियाओं का वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से है: (क) यह प्रतिस्थापन अभिक्रिया (Substitution reaction) का उदाहरण है क्योंकि ब्रोमोएथेन से ब्रोमीन समूह को -HS समूह द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है। (ख) यह संकलन अभिक्रिया (Addition reaction) का उदाहरण है क्योंकि इसमें दो अभिकारक अणु मिलकर एक एकल उत्पाद बनाते हैं। (ग) यह विलोपन अभिक्रिया (Elimination reaction) का उदाहरण है क्योंकि इसमें ब्रोमोएथेन से हाइड्रोजन और ब्रोमीन का निष्कासन होकर एथीन प्राप्त होता है। (घ) यह पुनर्विन्यास अभिक्रिया (Rearrangement reaction) या प्रतिस्थापन के साथ होने वाली पुनर्विन्यास अभिक्रिया है जिसमें कार्बनकंकाल की संरचना में परिवर्तन होता है (कार्बोकेशन पुनर्विन्यास)।

मुख्य बिंदु:

• प्रतिस्थापन अभिक्रिया में एक समूह दूसरे समूह का स्थान लेता है।
• संकलन अभिक्रिया में असंतृप्त बंध पर परमाणु जुड़ते हैं और उत्पाद एक ही बनता है।
• विलोपन अभिक्रिया में छोटे अणु (जैसे H₂O, HBr) बाहर निकलकर द्वि/त्रि आबंध बनाते हैं।

आम गलतियाँ:

• विलोपन और प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के अंतर को समझ न पाना।
• संकलन अभिक्रिया को प्रतिस्थापन समझ लेना।
• पुनर्विन्यास में कार्बोकेशन के स्थायित्व के कारक की उपेक्षा करना।

Exam Tips:

a) अभिकारकों और उत्पादों की संख्या तथा उनके बंधों में परिवर्तन को ध्यान से देखें।
b) 'आना और जाना' (प्रतिस्थापन), 'जुड़ना' (संकलन), और 'बाहर निकलना' (विलोपन) के मूल मंत्र याद रखें।
c) यह प्रश्न अक्सर 2 या 4 अंकों में वर्गीकरण के लिए पूछा जाता है।

 

Question 15: निम्नलिखित युग्मों में सदस्य-संरचनाओं के मध्य कैसा संबंध है? क्या ये संरचनाएँ संरचनात्मक या ज्यामितीय समावयव अथवा अनुनाद संरचनाएँ हैं?
(क) CH₃CH₂CH₂COCH₃ और CH₃CH₂COCH₂CH₃
(ख) cis- और trans- आरेख
(ग) enol और keto संरचनाएँ

Answer:

(क) दिए गए युग्म में समान आणविक सूत्र है लेकिन क्रियात्मक समूह (कीटोन) की स्थिति भिन्न है, इसलिए ये स्थिति समावयव (Position isomers) या संरचनात्मक समावयव हैं। (ख) दिए गए युग्म में अंतरिक्ष में ड्यूटेरियम (D) और हाइड्रोजन (H) का अनुक्रम भिन्न है, अतः ये ज्यामितीय समावयव (Geometrical isomers - cis एवं trans) को निरूपित करते हैं। (ग) दी गई संरचनाएँ किसी वास्तविक अणु का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं बल्कि एक ही अणु की काल्पनिक अनुनाद संरचनाएँ या tautomers (चलावयव) को प्रदर्शित करती हैं (विशेषकर कीटो-इenol चलावयवता)।

मुख्य बिंदु:

• संरचनात्मक समावयवता में परमाणुओं के जुड़ने का क्रम (Connectivity) भिन्न होता है।
• ज्यामितीय समावयवता (cis-trans) द्विआबंध के चारों ओर समूहों की त्रिविम व्यवस्था (Spatial arrangement) पर आधारित होती है।
• अनुनाद संरचनाएँ काल्पनिक होती हैं और केवल π-इलेक्ट्रॉनों के विस्थापन को दर्शाती हैं।

आम गलतियाँ:

• ज्यामितीय समावयवों को संरचनात्मक समावयव मान लेना।
•चलावयवता (Tautomerism) और अनुनाद (Resonance) के अंतर को न समझना।
• कार्बन श्रृंखला की लंबाई को ठीक से न गिनना।

Exam Tips:

a) समावयवता के प्रकार (संरचनात्मक, त्रिविम, ज्यामितीय) की परिभाषाएँ पक्की रखें।
b) cis और trans रूपों की पहचान के लिए मुख्य समूहों की स्थिति (एक ही तरफ या विपरीत) देखें।
c) अनुनाद संरचनाओं में केवल इलेक्ट्रॉनों की स्थिति बदलती है, परमाणुओं की नहीं।

 

Question 16: निम्नलिखित आबंध-विदलन के लिए इलेक्ट्रॉन-विस्थापन को मुड़े तीरों द्वारा दर्शाइए तथा प्रत्येक विदलन को समांश अथवा विषमांश में वर्गीकृत कीजिए। साथ ही निर्मित सक्रिय मध्यवर्ती उत्पादों में मुक्त-मूलक, carbocation तथा carbanion पहचानिए—
(क) CH₃O - OCH₃ → CH₃O• + •OCH₃
(ख) (CH₃)₂C = O + OH⁻ → ...
(ग) R-Br → R⁺ + Br⁻ (विभाजन)
(घ) कार्बनिक अणु पर इलेक्ट्रोफाइल का आक्रमण

Answer:

(क) यह समांश विदलन (Homolytic cleavage) है क्योंकि सहसंयोजक आबंध का समान विभाजन होता है और प्रत्येक परमाणु को एक इलेक्ट्रॉन मिलता है, जिससे मुक्त-मूलक (Free radical) बनते हैं। (ख) यह विषमांश विदलन (Heterolytic cleavage) है जिसमें इलेक्ट्रॉन युग्म एक ही परमाणु पर रहता है, जिससे कार्बोनियन या ऋणायन बनता है। (ग) यह विषमांश विदलन (Heterolytic cleavage) है जिसमें ब्रोमीन अधिक ऋणाविद्युत होने के कारण दोनों इलेक्ट्रॉन लेकर Br⁻ बनाता है और कार्बन पर धनावेश आ जाता है, जिससे कार्बोकेशन (Carbocation) बनता है। (घ) यह विषमांश विदलन और आक्रमण का उदाहरण है जिससे नया उप-मध्यवर्ती कार्बोनिक धनायन बनता है।

मुख्य बिंदु:

• समांश विदलन में आधा-शीर्ष वाला तीर (fish-hook arrow) उपयोग होता है और मुक्त-मूलक बनते हैं।
• विषमांश विदलन में पूरा मुड़ा हुआ तीर उपयोग होता है और आयन (कार्बोकेशन/कार्बोनियन) बनते हैं।
• विषमांश विदलन सामान्यतः विषमांग बंधों या ध्रुवीय बंधों में होता है।

आम गलतियाँ:

• समांश और विषमांश विदलन के तीरों (मछلی-हुक तीर बनाम पूर्ण तीर) का गलत प्रयोग करना।
• मुक्त-मूलक और कार्बोकेशन की पहचान में गड़बड़ी करना।
• विदलन के बाद बनने वाले आवेशों को सही ढंग से न दर्शाना।

Exam Tips:

a) समांश विदलन हमेशा सूर्य के प्रकाश (UV), पेरोक्साइड या उच्च ताप पर होता है, इसे याद रखें।
b) विषमांश विदलन में इलेक्ट्रोनेगेटिविटी (विद्युत् ऋणाता) के अंतर को देखकर आबंध तोड़ें।
c) तीरों के प्रकार (Fish-hook vs Curved arrow) का विशेष ध्यान रखें।

 

Question 17: निम्नलिखित कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लता का सही क्रम कौन सा है, इलेक्ट्रॉन-विस्थापन वर्णित करता है? प्रेरणिक तथा electromeric प्रभावों की व्याख्या कीजिए।

Answer:

अम्लता का क्रम मुख्य रूप से प्रेरणिक प्रभाव (-I प्रभाव) पर निर्भर करता है। क्लोरोएसिटिक अम्ल के व्युत्पन्न में जितने अधिक क्लोरीन परमाणु होंगे, -I प्रभाव उतना ही अधिक होगा, जिससे O-H आबंध कमजोर होता है और H⁺ आयन का निकलना आसान हो जाता है। अतः अम्लता का सही क्रम है: Cl₃CCOOH > Cl₂CHCOOH > ClCH₂COOH। प्रेरणिक प्रभाव (Inductive effect) सिग्मा इलेक्ट्रอน का किसी अधिक विद्युत् ऋणी परमाणु की ओर स्थायी विस्थापन है। इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव (Electromeric effect - E प्रभाव) एक अस्थायी प्रभाव है जिसमें आक्रमणकारी अभिकर्मक की उपस्थिति में बहुआबंध के π-इलेक्ट्रॉनों का पूर्ण स्थानांतरण होता है (+E प्रभाव जब आक्रमणकारी की ओर, -E प्रभाव जब उससे दूर)।

मुख्य बिंदु:

• -I प्रभाव बढ़ाने वाले समूह अम्लता को बढ़ाते हैं जबकि +I प्रभाव वाले समूह अम्लता घटाते हैं।
• प्रेरणिक प्रभाव एक स्थायी प्रभाव है जो σ-आबंधों के माध्यम से कार्य करता है।
• इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव केवल तभी उत्पन्न होता है जब कोई आक्रमणकारी अभिकर्मक उपस्थित हो।

आम गलतियाँ:

• प्रेरणिक प्रभाव और इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव की स्थायी/अस्थायी प्रकृति को मिला देना।
• क्लोरीन की संख्या बढ़ने पर अम्लता घटा देना।
• +I और -I प्रभावों के संकेतों को उलटा लिख देना।

Exam Tips:

a) अम्ल की शक्ति ∝ -I प्रभाव ∝ क्लोराइड/विद्युत् ऋणी परमाणुओं की संख्या।
b) प्रेरणिक प्रभाव हमेशा दूरी के साथ कम होता जाता है, इसे अपने उत्तर में उल्लेख करें।
c) E-प्रभाव और I-प्रभाव में अंतर स्पष्ट करने के लिए मुख्य बिंदु याद रखें।

 

Question 18: प्रत्येक का एक उदाहरण देते हुए निम्नलिखित प्रक्रमों के सिद्धांतों का संक्षिप्त विवरण दीजिए—(क) क्रिस्टलन (ख) आसवन (ग) क्रोमैटोग्राफी

Answer:

(क) क्रिस्टलन (Crystallization): यह विलेयता में अंतर के सिद्धांत पर आधारित है। अशुद्ध ठोस को उपयुक्त विलायक में गर्म करके घोला जाता है और फिर ठंडा करने पर शुद्ध यौगिक क्रिस्टل के रूप में पृथक् हो जाता है (जैसे अशुद्ध एस्पिरिन का शोधन)। (ख) आसवन (Distillation): यह क्वथनांकों में अंतर के सिद्धांत पर आधारित है। वाष्पशील द्रवों को उनके भिन्न क्वथनांकों के कारण पहले वाष्पित किया जाता है और फिर संघनित करके अलग किया जाता है (जैसे क्लोरोफॉर्म और एनिलीन का मिश्रण)। (ग) क्रोमैटोग्राफी (Chromatography): यह स्थिर प्रावস্থা और गतिशील प्रावस्था के बीच घटकों के भिन्न अवशोषण या वितरण गुणांक पर आधारित है (जैसे कागज क्रोमैटोग्राफी द्वारा स्याही के घटकों को अलग करना)।

मुख्य बिंदु:

• क्रिस्टलन घुलनशीलता के तापमान-आधारित अंतर पर काम करता है।
• आसवन क्वथनांकों (Boiling points) के अंतर का उपयोग करता है।
• क्रोमैटोग्राफी स्थिर और गतिशील प्रावस्थाओं के बीच यौगिकों के वितरण पर आधारित है।

आम गलतियाँ:

• आसवन और प्रभाजी आसवन के सिद्धांतों को एक ही बता देना।
• क्रोमैटोग्राफी में स्थिर और गतिशील प्रावस्थाओं की परिभाषा न लिखना।
• तापमान और घुलनशीलता के संबंध को स्पष्ट न करना।

Exam Tips:

a) प्रत्येक तकनीक का मुख्य आधार (जैसे 'क्वथनांक का अंतर' या 'विलेयता का अंतर') एक पंक्ति में अवश्य लिखें।
b) प्रत्येक विधि का एक मानक उदाहरण (जैसे एस्पिरिन, क्लोरोफॉर्म) याद रखें।
c) यह प्रश्न शोधन की तकनीकों पर एक विस्तृत टिप्पणी के रूप में आ सकता है।

 

Question 19: ऐसे दो यौगिकों, जिनकी विलेयताएँ विलायक S में भिन्न हैं, को पृथक् करने की विधि की व्याख्या कीजिए।

Answer:

विभिन्न विलेयता वाले दो ठोस यौगिकों को अलग करने के लिए 'प्रभाजी क्रिस्टलीकरण' (Fractional Crystallization) विधि का उपयोग किया जाता है। यह प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में की जाती है: (क) विलयन तैयार करना: चूर्ण मिश्रण को एक फ्लास्क में लिया जाता है और विलायक को धीरे-धीरे मिलाया जाता है और हिलाया जाता है जब तक कि विलेय विलायक में घुल न जाए। इस संतृप्त घोल को गर्म किया जाता है। (ख) छानना: गर्म संतृप्त विलयन को फिल्टर पेपर के माध्यम से छाना जाता है। (ग) क्रिस्टलीकरण: ठंडा होने पर कम घुलनशील यौगिक पहले क्रिस्टलीकृत होता है, जबकि अधिक घुलनशील यौगिक विलयन में रहता है। (घ) अंत में छनन और सुखाने की प्रक्रिया से शुद्ध क्रिस्टल प्राप्त कर लिए जाते हैं।

मुख्य बिंदु:

• प्रभाजी क्रिस्टलीकरण विलायक में विलेयताओं के अंतर पर आधारित है।
• कम घुलनशील पदार्थ पहले क्रिस्टल बनाता है।
• छानने की प्रक्रिया गर्म अवस्था में की जाती है ताकि अवांछित अशुद्धियाँ निकल जाएं।

आम गलतियाँ:

• सामान्य क्रिस्टलन और प्रभाजी क्रिस्टलन के चरणों में भ्रमित होना।
• गर्म विलयन को छानने के चरण को छोड़ देना।
• विलेयता के अंतर के सिद्धांत को स्पष्ट न करना।

Exam Tips:

a) चरणों को क्रमबद्ध (क, ख, ग, घ) रूप में लिखें।
b) 'कम घुलनशील पहले क्रिस्टलीकृत होता है' - इस मुख्य बिंदु को उत्तर में अवश्य शामिल करें।
c) डायग्राम या फ्लोचार्ट के रूप में भी इस विधि को समझा सकते हैं।

 

Question 20: आसवन, निम्न दाब पर आसवन तथा भाप आसवन में क्या अंतर है? विवेचना कीजिए।

Answer:

आसवन (Distillation) का उपयोग उन द्रवों के शोधन के लिए किया जाता है जो अपने क्वथनांक पर बिना अपघटन के उबलते हैं और जिनके क्वथनांकों में पर्याप्त अंतर होता है (जैसे पेट्रोल और मिट्टी के तेल का मिश्रण)। निम्न दाब पर आसवन (Distillation under reduced pressure) का उपयोग उन द्रवों के लिए किया जाता है जो अपने सामान्य क्वथनांक पर अपघटित हो जाते हैं; इसमें दाब कम करके क्वथनांक घटाया जाता है (जैसे ग्लिसरोल का शोधन)। भाप आसवन (Steam distillation) का उपयोग उन कार्बनिक यौगिकों के लिए किया जाता है जो भाप में वाष्पशील और पानी में अमिश्रणीय होते हैं (जैसे पानी और एनिलीन का मिश्रण)।

मुख्य बिंदु:

• सामान्य आसवन पर्याप्त क्वथनांक अंतर वाले स्थिर द्रवों के लिए है।
• निम्न दाब आसवन उच्च क्वथनांक वाले और ताप-संवेदनशील (thermally unstable) द्रवों के लिए है।
• भाप आसवन जल-अमिश्रणीय और भाप-वाष्पशील पदार्थों के लिए उपयुक्त है।

आम गलतियाँ:

• तीनों प्रकार के आसवन की उपयोगिताओं को आपस में मिला देना।
• कम दाब पर आसवन के सिद्धांत (वाष्प दाब और क्वथनांक का संबंध) को न समझाना।
• भाप आसवन में अमिश्रणीयता के नियम की उपेक्षा करना।

Exam Tips:

a) अंतर स्पष्ट करने के लिए तालिका (Table) का उपयोग करें।
b) प्रत्येक विधि का एक-एक उत्कृष्ट उदाहरण (जैसे ग्लिसरोल, एनिलीन) अवश्य लिखें।
c) वाष्प दाब और क्वथनांक के वैचारिक अंतर को संक्षिप्त में बताएं।

 

Question 21: लैंस-परीक्षण का रसायन-सिद्धांत समझाइए।
*(क) नाइट्रोजन के लिए परीक्षण (ख) सल्फर के लिए परीक्षण (ग) हैलोज़न के लिए परीक्षण*

Answer:

लैंस-परीक्षण (Lassaigne's test) कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन, सल्फर, हैलोजन और फास्फोरस की उपस्थिति का पता लगाने के लिए किया जाता है। जब कार्बनिक यौगिक को सोडियम धातु के साथ संगलित (fuse) किया जाता है, तो सहसंयोजक यौगिक आयनिक रूप में परिवर्तित हो जाते हैं: Na + C + N → NaCN, 2Na + S → Na₂S, Na + X → NaX (X = Cl, Br, I)। इस संगलन निष्कर्ष (Sodium fusion extract) को आसुत जल में उबालकर छान लिया जाता है। (क) नाइट्रोजन के लिए: निष्कर्ष में फेरस सल्फेट और सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल मिलाने पर प्रियन नीला (Prussian blue) रंग बनता है। (ख) सल्फर के लिए: निष्कर्ष में लेड एसीटेट मिलाने पर काला अवक्षेप या सोडियम नाइट्रोप्रुसाइड मिलाने पर बैंगनी रंग बनता है। (ग) हैलोजन के लिए: निष्कर्ष में तनु नाइट्रिक अम्ल और सिल्वर नाइट्रेट मिलाने पर सिल्वर हैलाइड का अवक्षेप बनता है।

मुख्य बिंदु:

• सोडियम धातु सहसंयोजक तत्वों को जल-विलेय आयनिक लवणों में बदल देती है।
• नाइट्रोजन के परीक्षण में प्रियन नीला (फेरि फेरीसाइनाइड) रंग प्राप्त होता है।
• हैलोजन परीक्षण से पहले सोडियम निष्कर्ष से CN⁻ और S²⁻ को हटाने के लिए HNO₃ मिलाया जाता है।

आम गलतियाँ:

• सीधे सोडियम निष्कर्ष में अभिकर्मक मिला देना और अम्लीकरण (Acidification) भूल जाना।
• प्रियन नीले रंग के रासायनिक सूत्र या नाम में गलती करना।
• सोडियम धातु के साथ अभिक्रिया के समीकरण न लिखना।

Exam Tips:

a) तीनों परीक्षणों (N, S, Halogen) के रासायनिक समीकरण और अंतिम रंग (जैसे प्रियन नीला, काला अवक्षेप) अवश्य याद रखें।
b) परीक्षण से पहले सोडियम संगलन निष्कर्ष बनाने की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से समझाएँ।
c) यह रसायन विज्ञान की परीक्षाओं का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न है।

 

Question 22: किसी कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन के आकलन की (i) ड्यूमा विधि तथा (ii) कैल्डॉल विधि के सिद्धांत की रूप-रेखा प्रस्तुत कीजिए।

Answer:

(i) ड्यूमा विधि (Dumas method): इस विधि में, कार्बनिक यौगिक को कॉपर ऑक्साइड (CuO) की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड के वातावरण में गर्म किया जाता है, जिससे मुक्त नाइट्रोजन गैस उत्पन्न होती है। इस नाइट्रोजन गैस को पोटेशियम हाइड्रोक्साइड (KOH) के जलीय विलयन में एकत्र किया जाता है, और इसका आयतन मापकर मानक दाब और ताप पर नाइट्रोजन की प्रतिशतता की गणना की जाती है। (ii) कैल्डॉल विधि (Kjeldahl method): इस विधि में, नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक यौगिक को सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) के साथ गर्म किया जाता है, जिससे नाइट्रोजन अमोनियम सल्फेट में परिवर्तित हो जाती है। इसके बाद इसे सोडियम हाइड्रोक्साइड (NaOH) के साथ आसवनीय किया जाता है, और उत्पन्न अमोनिया को ज्ञात मात्रा के अम्ल द्वारा अवशोषित कर अनुमापन (Titration) द्वारा नाइट्रोजन का प्रतिशत ज्ञात किया जाता है।

मुख्य बिंदु:

• ड्यूमा विधि में नाइट्रोजन गैस मुक्त होती है जिसे KOH विलयन द्वारा मापा जाता है।
• कैल्डॉल विधि में नाइट्रोजन अमोनियम सल्फेट के रूप में संचित होती है।
• कैल्डॉल विधि नाइट्रो, एजो और वलय-बद्ध नाइट्रोजन (जैसे पिरिڈین) पर लागू नहीं होती।

आम गलतियाँ:

• कैल्डॉल विधि को सभी प्रकार के नाइट्रोजन यौगिकों के लिए उपयुक्त मान लेना।
• दोनों विधियों के रासायनिक समीकरणों में stoichiometric गुणांकों को गलत लिखना।
• अनुमापन गणना के सूत्रों में त्रुटि करना।

Exam Tips:

a) दोनों विधियों (ड्यूमा और कैल्डॉल) के गणना सूत्र और सिद्धांत अलग-अलग याद रखें।
b) कैल्डॉल विधि की सीमा (Limitations) का उल्लेख परीक्षा में विशेष रूप से करें।
c) समीकरणों और आयतन मापन के चरणों का सही आरेख/विवरण दें।

 

Question 23: किसी यौगिक में हैलोजन, सल्फर तथा फॉस्फोरस के आकलन के सिद्धांत की विवेचना कीजिए।

Answer:

(क) हैलोजन का आकलन (कै-रियस विधि): कार्बनिक यौगिक को सांद्र नाइट्रिक अम्ल और सिल्वर नाइट्रेट के साथ कैरियस ट्यूब में गर्म किया जाता है। यौगिक में मौजूद हैलोजन सिल्वर हैलाइड (AgX) के रूप में अवक्षेपित होता है, जिसे छानकर, धोकर और सुखाकर तौला जाता है। (ख) सल्फर का आकलन: यौगिक को सांद्र नाइट्रिक अम्ल या सोडियम परॉक्साइड के साथ गर्म करके सल्फर को सल्फ्यूरिक अम्ल में ऑक्सीकृत किया जाता है, और फिर बेरियम क्लोराइड मिलाकर बेरियम सल्फेट (BaSO₄) के रूप में अवक्षेपित करके तोला जाता है। (ग) फॉस्फोरस का आकलन: यौगिक को नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म करने पर फॉस्फोरस फॉस्फोरिक अम्ल में बदल जाता है, जिसे अमोनिया और अमोनियम मोलिब्डेट मिलाकर अमोनियम फॉस्फोमोलीब्डेट या मैग्नीशियम अमोनियम फॉस्फेट के रूप में अवक्षेपित करके आकलित किया जाता है।

मुख्य बिंदु:

• हैलोजन का आकलन AgX के भार पर आधारित है (कैरियस विधि)।
• सल्फर का आकलन BaSO₄ के रूप में होता है।
• फॉस्फोरस का आकलन अमोनियम फॉस्फोमोलीब्डेट या Mg₂P₂O₇ के रूप में किया जाता है।

आम गलतियाँ:

• BaSO₄ और AgX के आणविक द्रव्यमानों की गणना में त्रुटि करना।
• अभिकर्मकों (जैसे कैरियस ट्यूब, BaCl₂, अमोनियम मोलिब्डेट) के नाम भूल जाना।
• प्रतिशत निकालने के सूत्रों में मानों को उल्टा रख देना।

Exam Tips:

a) मात्रात्मक आकलन (Quantitative estimation) के तीनों मुख्य सूत्र (हैलोजन, सल्फर, फॉस्फोरस) याद रखें।
b) प्रतिशतता का सामान्य सूत्र: (अवक्षेप का भार / यौगिक का भार) × (तत्व का परमाणु भार / अवक्षेप का आणविक भार) × 100।
c) कैरियस विधि की प्रक्रिया को स्टेप-बाय-स्टेप लिखें।

 

Question 24: पेपर क्रोमैटोग्राफी के सिद्धांत को समझाइए।

Answer:

पेपर क्रोमैटोग्राफी एक उन्नत तकनीक है जो दो प्रावस्थाओं के बीच घटकों के वितरण पर आधारित है। इसमें विशेष क्रोमैटोग्राफी पेपर का उपयोग किया जाता है जिसके छिद्रों में जल-अणु पाशित (adsorbed) रहते हैं, जो स्थिर प्रावस्था (Stationary phase) का कार्य करते हैं। मिश्रण के विलयन को पेपर की पट्टी पर रखकर एक उपयुक्त विलायक (मोबाइल प्रावस्था) में लटका दिया जाता है। यह विलायक केशिका क्रिया (Capillary action) द्वारा पेपर पर ऊपर की ओर चढ़ता है। विभिन्न घटक अपनी विलेयता और स्थिर प्रावस्था के प्रति आकर्षण के अनुसार अलग-अलग दूर तय करते हैं, जिससे अलग-अलग धब्बे बनते हैं। इस प्रकार प्राप्त कागज को क्रोमैटोग्राम कहा जाता है।

मुख्य बिंदु:

• स्थिर प्रावस्था (Stationary phase) क्रोमैटोग्राफी पेपर पर उपस्थित जल होता है।
• गतिशील प्रावस्था (Mobile phase) उपयुक्त कार्बनिक या अकार्बनिक विलायक होता है जो ऊपर चढ़ता है।
• विभिन्न घटकों के मान (Rf values) उनकी विलेयता के आधार पर भिन्न होते हैं।

आम गलतियाँ:

• स्थिर और गतिशील प्रावस्थाओं को आपस में उलटा बता देना।
• केशिका क्रिया के महत्व को नजरअंदाज करना।
• क्रोमैटोग्राम शब्द की सही व्याख्या न करना।

Exam Tips:

a) Rf (Retardation factor) मूल्य की परिभाषा और उसका सूत्र याद रखें।
b) केशिका क्रिया (Capillary action) शब्द का उल्लेख उत्तर में अवश्य करें।
c) यह प्रश्न पृथक्करण तकनीकों के अंतर्गत बहुत महत्वपूर्ण है।

 

Question 25: 'सोडियम संगलन निष्कर्ष' में हैलोजन के परीक्षण के लिए सिल्वर नाइट्रेट मिलाने से पूर्व नाइट्रिक अम्ल क्यों मिलाया जाता है?

Answer:

सोडियम संगलन निष्कर्ष (Sodium fusion extract) में यदि नाइट्रोजन और सल्फर भी उपस्थित हों, तो वे NaCN और Na₂S का निर्माण करते हैं जो सिल्वर नाइट्रेट परीक्षण में बाधा डालते हैं। सिल्वर नाइट्रेट मिलाने से पूर्व सांद्र नाइट्रिक अम्ल (HNO₃) के साथ निष्कर्ष को उबाला जाता है, जिससे NaCN और Na₂S वाष्پशील HCN और H₂S गैसों के रूप में बाहर निकल जाते हैं। यदि इन्हें न हटाया जाए, तो वे AgCN या Ag₂S का अवक्षेप बनाकर हैलोजन के परीक्षण में हस्तक्षेप (interference) करेंगे।

मुख्य बिंदु:

• नाइट्रिक अम्ल मिलाने से NaCN और Na₂S विघटित होकर HCN और H₂S गैस बनकर उड़ जाते हैं।
• यह कदम हैलोजन परीक्षण की शुद्धता और सटीकता सुनिश्चित करता है।
• यदि यह न किया जाए तो गलत सकारात्मक (False positive) परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।

आम गलतियाँ:

• यह मान लेना कि नाइट्रिक अम्ल केवल माध्यम को अम्लीय बनाने के लिए है, बाधाओं को हटाने के लिए नहीं।
• HCN और H₂S गैसों के निकलने की रासायनिक अभिक्रिया को भूल जाना।
• सीधे AgNO₃ मिला देने के परिणाम से अनभिज्ञ रहना।

Exam Tips:

a) अभिक्रिया समीकरण सहित समझाएँ: NaCN + HNO₃ → NaNO₃ + HCN↑
b) कारण स्पष्ट रूप से लिखें कि यह अन्य आयनों (CN⁻, S²⁻) के हस्तक्षेप को रोकने के लिए किया जाता है।
c) यह वैचारिक प्रश्न (Reasoning type) परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है।

 

Question 26: नाइट्रोजन, सल्फर तथा फ़ॉस्फोरस के परीक्षण के लिए सोडियम के साथ कार्बनिक यौगिक का संगलन क्यों किया जाता है?

Answer:

कार्बनिक यौगिकों में नाइट्रोजन, सल्फर और हैलोजन सहसंयोजक बंधों (Covalent bonds) द्वारा जुड़े होते हैं, जो सीधे आयनिक परीक्षण (जैसे AgNO₃ या BaCl₂ के साथ अवक्षेप बनाना) नहीं दे सकते। इन तत्वों का पता लगाने के लिए इन्हें आयनिक रूप में बदलना अनिवार्य होता है। जब कार्बनिक यौगिक को अत्यधिक सक्रिय सोडियम धातु के साथ गर्म (संगलित) किया जाता है, तो ये सहसंयोजक तत्व सोडियम के साथ क्रिया करके जल-विलेय आयनिक लवण (जैसे NaCN, Na₂S, NaX) बना लेते हैं, जिनका आसानी से परीक्षण किया जा सकता है। इस प्रक्रिया को 'लैंस परीक्षण' कहा जाता है।

मुख्य बिंदु:

• सहसंयोजक यौगिक सीधे आयनिक परीक्षण नहीं देते, इसलिए उन्हें आयनित करना पड़ता है।
• सोडियम धातु अत्यधिक प्रतिक्रियाशील होने के कारण इन तत्वों के साथ आयनिक यौगिक बनाती है।
• यह सोडियम संगलन निष्कर्ष (Sodium fusion extract) परीक्षण का आधार है।

आम गलतियाँ:

• सहसंयोजक और आयनिक बंधों के अंतर को न समझना।
• सोडियम धातु के उपयोग के मुख्य उद्देश्य को भूल जाना।
• केवल रटने का प्रयास करना, रसायन को न समझना।

Exam Tips:

a) 'सहसंयोजक बंधों को आयनिक रूप में बदलना' - इस मुख्य वाक्यांश को अपने उत्तर में प्रमुखता दें।
b) लैंस परीक्षण के मूल उद्देश्य को स्पष्ट रखें।
c) सोडियम धातु की क्रिया के सामान्य समीकरण याद रखें।

 

Question 27: कैल्सियम सल्फेट तथा कपूर के मिश्रण के अवयवों को पृथक् करने के लिए एक उपयुक्त तकनीक बताइए।

Answer:

कैल्सियम सल्फेट और कपूर के मिश्रण को अलग करने के लिए 'ऊर्ध्वपातन' (Sublimation) तकनीक का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में, कपूर एक ऊर्ध्वपातनशील (sublimable) ठोस है जो गर्म करने पर बिना द्रव अवस्था में आए सीधे ठोस से वाष्प अवस्था में बदल जाता है। जब इस मिश्रण को गर्म किया जाता है, तो कपूर वाष्प बनकर ऊपर उठ जाता है और ठंडा होने पर संघनित होकर शुद्ध रूप में प्राप्त हो जाता है, जबकि कैल्सियम सल्फेट (अवाष्पशील होने के कारण) पात्र में पीछे छूट जाता है।

मुख्य बिंदु:

• ऊर्ध्वपातन उन पदार्थों के लिए है जो गर्म करने पर बिना द्रव बने सीधे वाष्प में बदलते हैं।
• कपूर ऊर्ध्वपातनशील है जबकि कैल्सियम सल्फेट अवाष्पशील है।
• यह बहुत ही सरल और प्रभावी भौतिक पृथक्करण विधि है।

आम गलतियाँ:

• आसवन या क्रिस्टलन विधि लिख देना।
• ऊर्ध्वपातन की परिभाषा में द्रव अवस्था का गलत जिक्र करना।
• कौन सा पदार्थ वाष्पशील है और कौन सा नहीं, इसमें भ्रमित होना।

Exam Tips:

a) कपूर, नेफ़थलीन, अमोनियम क्लोराइड जैसे ऊर्ध्वपातनशील पदार्थों के नाम याद रखें।
b) एक पंक्ति में सिद्धांत लिखें: "वाष्पशील ठोस का सीधे वाष्प में बदलना।"
c) यह प्रायोगिक रसायन का एक बहुत सामान्य प्रश्न है।

 

Question 28: भाप-आसवन करने पर एक कार्बनिक द्रव अपने क्वथनांक से निम्न ताप पर वाष्पीडृृत क्यों हो जाता है?

Answer:

भाप-आसवन (Steam distillation) में जब अवाष्पशील जल और कार्बनिक द्रव का मिश्रण उबाला जाता है, तो कुल वाष्प दाब (p) वायुमंडलीय दाब (P) के बराबर हो जाता है, जहाँ p = p₁ + p₂ (p₁ कार्बनिक द्रव का वाष्प दाब और p₂ पानी का वाष्प दाब है)। चूँकि कुल वाष्प दाब व्यक्तिगत वाष्प दाबों का योग होता है, इसलिए कार्बनिक द्रव का आंशिक दाब कम होने पर भी मिश्रण बहुत कम तापमान पर ही उबलने लगता है और अपने सामान्य क्वथनांक से कम ताप पर वाष्पीकृत हो जाता है।

मुख्य बिंदु:

• डाल्टन के आंशिक दाब के नियम के अनुसार कुल दाब घटकों के दाब का योग होता है (p = p₁ + p₂)।
• मिश्रण का कुल वाष्प दाब वायुमंडलीय दाब के बराबर होते ही द्रव उबलने लगता है।
• इसके परिणामस्वरूप द्रव अपने सामान्य क्वथनांक से बहुत नीचे के तापमान पर वाष्पित हो जाता है।

आम गलतियाँ:

• वाष्प दाब के योग के सिद्धांत (Dalton's law) को न समझाना।
• तापमान और दाब के संबंध में भ्रमित होना।
• केवल यह कहना कि भाप गर्म होती है, वैज्ञानिक कारण न देना।

Exam Tips:

a) सूत्र p = p₁ + p₂ लिखकर स्पष्ट करें कि कुल दाब वायुमंडलीय दाब के बराबर कब होता है।
b) यह समझें कि तापमान कम रहने से ताप-संवेदनशील यौगिक अपघटित होने से बच जाते हैं।
c) भाप आसवन के सैद्धांतिक आधार पर यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

 

Question 29: क्या CCl₄, सिल्वर नाइट्रेट के साथ गर्म करने पर AgCl का श्वेत अवक्षेप देगा? अपने उत्तर को कारण सहित समझाइए।

Answer:

नहीं, CCl₄ (कार्बन टेट्राक्लोराइड) सिल्वर नाइट्रेट (AgNO₃) के साथ गर्म करने पर AgCl का श्वेत अवक्षेप नहीं देगा। इसका कारण यह है कि CCl₄ में क्लोरीन परमाणु कार्बन के साथ सहसंयोजक बंध (Covalently bonded) द्वारा मजबूती से जुड़े होते हैं। सिल्वर नाइट्रेट परीक्षण के लिए हैलोजन का आयनिक रूप (X⁻ जैसे Cl⁻) में होना आवश्यक है। चूंकि CCl₄ पानी में आयनित नहीं होता और क्लोरीन आयਨ मुक्त नहीं करता, इसलिए यह सिल्वर नाइट्रेट के साथ अभिक्रिया करके AgCl का अवक्षेप नहीं बनाता।

मुख्य बिंदु:

• CCl₄ एक सहसंयोजक यौगिक है जो जलीय विलयन में क्लोराइड आयन (Cl⁻) नहीं देता।
• सिल्वर नाइट्रेट परीक्षण केवल आयनिक हैलाइडों (जैसे NaCl) के साथ सकारात्मक परिणाम देता है।
• सहसंयोजक बंधित क्लोरीन आसानी से Ag⁺ के साथ अवक्षेप नहीं बना सकती।

आम गलतियाँ:

• यह मान लेना कि किसी भी यौगिक में क्लोरीन होने पर वह AgNO₃ के साथ अवक्षेप देगा ही।
• सहसंयोजक और आयनिक प्रकृति के अंतर को नजरअंदाज करना।
• गलत समीकरण लिख देना।

Exam Tips:

a) उत्तर की शुरुआत स्पष्ट 'नहीं' से करें और फिर सहसंयोजक बंध की बात समझाएँ।
b) यह याद रखें कि केवल आयनिक क्लोराइड ही AgCl का श्वेत अवक्षेप देते हैं।
c) यह वैचारिक प्रश्न अक्सर परीक्षाओं में परीक्षण की सीमाएँ जाँचने के लिए आता है।

 

Question 30: किसी कार्बनिक यौगिक में कार्बन का आकलन करते समय उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने के लिए पोटेशियम हाइड्रोक्साइड विलयन का उपयोग क्यों किया जाता है?

Answer:

पोटेशियम हाइड्रोक्साइड (KOH) एक प्रबल क्षारक है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) प्रकृति में अम्लीय (अध्यातुर ऑक्साइड) होती है। जब दहन के दौरान उत्पन्न CO₂ गैस को KOH विलयन से गुजारा जाता है, तो यह इसके साथ तीव्रता से अभिक्रिया करके पोटेशियम कार्बोनेट और जल का निर्माण करती है: 2KOH + CO₂ → K₂CO₃ + H₂O। इस रासायनिक अभिक्रिया के कारण U-नली (जिसमें KOH होता है) का द्रव्यमान बढ़ जाता है, और इस बढ़े हुए द्रव्यमान से अवशोषित CO₂ की मात्रा तथा कार्बन की प्रतिशतता का सटीक आकलन किया जाता है.

मुख्य बिंदु:

• CO₂ एक अम्लीय ऑक्साइड है और KOH एक प्रबल क्षारक है, जिससे इनके बीच त्वरित उदासीनीकरण होता है।
• U-नली का बढ़ा हुआ भार सीधे तौर पर उत्पन्न हुई कार्बन डाइऑक्साइड के द्रव्यमान को दर्शाता है।
• यह मात्रात्मक विश्लेषण (Quantitative estimation) की लीबिग विधि का एक मुख्य चरण है।

आम गलतियाँ:

• KOH के स्थान पर किसी अन्य उदासीन विलायक का उपयोग समझ लेना।
• रासायनिक समीकरण (2KOH + CO₂ → K₂CO₃ + H₂O) को गलत संतुलित करना।
• द्रव्यमान वृद्धि और CO₂ के संबंध को स्पष्ट न करना।

Exam Tips:

a) अम्ल-क्षारक अभिक्रिया (अम्लीय CO₂ और क्षारीय KOH) के सिद्धांत को स्पष्ट रूप से लिखें।
b) गणना के लिए U-नली के भार में वृद्धि (Δm) का उपयोग कैसे होता है, यह जानें।
c) कार्बन और हाइड्रोजन के आकलन पर आधारित संख्यात्मक प्रश्नों के लिए यह मूल अवधारणा है।

 

Question 31: सल्फर के लेड ऐसिटेट द्वारा परीक्षण में 'सोडियम संगलन निष्कर्ष को ऐसिटटिक अम्ल द्वारा उदासीन किया जाता है, न कि सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा क्यों?

Answer:

सल्फर के परीक्षण के लिए सोडियम निष्कर्ष में लेड ऐसिटेट [Pb(CH₃COO)₂] मिलाया जाता है ताकि लेड सल्फाइड (PbS) का काला अवक्षेप प्राप्त हो सके। यदि सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) का उपयोग करके निष्कर्ष को अम्ليكृत किया जाए, तो सल्फ्यूरिक अम्ल लेड के साथ अभिक्रिया करके लेड सल्फेट (PbSO₄) का श्वेत अवक्षेप बना लेगा, जो सामान्य आयन प्रभाव के कारण सल्फर के परीक्षण को बाधित करेगा। इसके अतिरिक्त, एसिटिक अम्ल एक दुर्बल अम्ल है जो लेड सल्फेट का अवक्षेप बनने से रोकता है और केवल लेड सल्फाइड के काले अवक्षेप को सुनिश्चित करता है।

मुख्य बिंदु:

• सल्फ्यूरिक अम्ल लेड सल्फेट (PbSO₄) का अवांछित श्वेत अवक्षेप बना देता है।
• एसिटिक अम्ल एक दुर्बल अम्ल है जो सल्फर परीक्षण में कोई बाधा उत्पन्न नहीं करता।
• लेड सल्फाइड (PbS) का काला अवक्षेप सल्फर की उपस्थिति कासत्यापन करता है।

आम गलतियाँ:

• प्रबल अम्ल और दुर्बल अम्ल के प्रभावों को नजरअंदाज करना।
• PbSO₄ और PbS के अवक्षेपों के रंगों में भ्रमित होना।
• सामान्य आयन प्रभाव के सिद्धांत को न समझना।

Exam Tips:

a) हमेशा याद रखें कि प्रबल अम्ल (जैसे H₂SO₄) अवांछित सल्फेट अवक्षेप बना सकता है।
b) परीक्षण के दौरान एसिटिक अम्ल (CH₃COOH) के उपयोग का कारण 'दुर्बल अम्लीय माध्यम' प्रदान करना है।
c) यह लैंस परीक्षण के अपवादों और सावधानियों से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है।

 

Question 32: एक कार्बनिक यौगिक में 69% कार्बन, 4.8% हाइड्रोजन तथा शेष ऑक्सीजन है। इस यौगिक के 0.20 g के पूर्ण दहन के फलस्वरूप उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल की मात्राओं की गणना कीजिए।

Answer:

दिए गए यौगिक में कार्बन = 69%, हाइड्रोजन = 4.8% और ऑक्सीजन = 26.2% है।
0.20 g कार्बनिक यौगिक में कार्बन की मात्रा = (69 × 0.20) / 100 = 0.138 g
चूँकि 44 g CO₂ में 12 g कार्बन होता है, इसलिए 0.138 g कार्बन से उत्पन्न CO₂ का द्रव्यमान = (44 × 0.138) / 12 = 0.506 g
अब, 0.20 g यौगिक में हाइड्रोजन की मात्रा = (4.8 × 0.20) / 100 = 0.0096 g
चूँकि 18 g जल (H₂O) में 2 g हाइड्रोजन होती है, इसलिए 0.0096 g हाइड्रोजन से उत्पन्न जल का द्रव्यमान = (18 × 0.0096) / 2 = 0.0864 g
अतः, उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड का द्रव्यमान 0.506 g और जल का द्रव्यमान 0.0864 g होगा।

मुख्य बिंदु:

• CO₂ के कुल द्रव्यमान में कार्बन का अनुपात (12/44) होता है।
• H₂O के कुल द्रव्यमान में हाइड्रोजन का अनुपात (2/18) होता है।
• प्रतिशतता से पहले दिए गए यौगिक के द्रव्यमान (0.20 g) के आधार पर तत्वों का वास्तविक द्रव्यमान निकाला जाता है।

आम गलतियाँ:

• मोलर अनुपातों (12/44 और 2/18) को उलट देना।
• प्रतिशत मान को सीधे द्रव्यमान मान समझ लेना।
• दशमलव की गणना में गलती करना।

Exam Tips:

a) सूत्र याद रखें: CO₂ का द्रव्यमान = (CO₂ का आणविक भार / C का परमाणु भार) × कार्बन का द्रव्यमान।
b) H₂O का द्रव्यमान = (H₂O का आणविक भार / H₂ का द्रव्यमान) × हाइड्रोजन का द्रव्यमान।
c) संख्यात्मक प्रश्नों में इकाई (g) लिखना न भूलें।

 

Question 33: 0.50 g कार्बनिक यौगिक को कैल्डॉल विधि के अनुसार उपचारित करने पर प्राप्त अमोनिया को 0.5 M H₂SO₄ के 50 mL में अवशोषित किया गया। अवशिष्ट अम्ल के उदासीनीकरण के लिए 0.5 M विलयन के 60 mL की आवश्यकता हुई। यौगिक में नाइट्रोजन प्रतिशतता की गणना कीजिए।

Answer:

कुल H₂SO₄ अम्ल की मात्रा = 50 mL, 0.5 M
उदासीनीकरण के लिए प्रयुक्त NaOH का आयतन = 60 mL, 0.5 M
चूँकि 2 NaOH ≡ 1 H₂SO₄, अतः 60 mL 0.5 M NaOH द्वारा उदासीन होने वाले H₂SO₄ की मात्रा = (60 × 0.5) / 2 = 15 mL (0.5 M H₂SO₄ के तुल্য)
अमोनिया द्वारा अवशोषित H₂SO₄ = 50 mL - 15 mL = 35 mL (0.5 M)
चूँकि 1 L 1 M H₂SO₄ ≡ 2 moles NH₃, अतः अमोनिया की मात्रा = 2 × (35/1000) × 0.5 मोल = 0.035 मोल
नाइट्रोजन का द्रव्यमान = 0.035 × 14 = 0.49 g (संशोधित गणना अनुसार मान निकालें)
सूत्रानुसार नाइट्रोजन प्रतिशत = (1.4 × संधारित अम्ल की normality × आयतन) / यौगिक का भार = 56% नाइट्रोजन प्राप्त होती है।

मुख्य बिंदु:

• कैल्डॉल विधि में नाइट्रोजन की प्रतिशतता का सीधा सूत्र: % N = (1.4 × M × V) / W होता है।
• अम्ल की बची हुई मात्रा का पता NaOH से अनुमापन करके लगाया जाता है।
• अमोनिया द्वारा अवशोषित अम्ल = कुल अम्ल - बचा हुआ अम्ल।

आम गलतियाँ:

• NaOH और H₂SO₄ के stoichiometric गुणांकों (2:1 अनुपात) की उपेक्षा करना।
• कुल अम्ल और व्यय हुए अम्ल के घटाव में गलती करना।
• सूत्र में मानों को गलत प्रतिस्थापित करना।

Exam Tips:

a) कैल्डॉल विधि के प्रतिशत सूत्र: % N = [1.4 × (V₁N₁ - V₂N₂/2)] / W को अच्छी तरह याद रखें।
b) अनुमापन के प्रत्येक स्टेप की मिलीमोल्स (millimoles) में गणना करें।
c) चरणों को स्पष्ट रूप से लिखकर अंत में प्रतिशत का चिन्ह लगाएं।

 

Question 34: कैरियस आकलन में 0.3780 g कार्बनिक क्लोरो यौगिक से 0.5740 g सिल्वर क्लोराइड प्राप्त हुआ। यौगिक में क्लोरीन की प्रतिशतता की गणना कीजिए।

Answer:

यौगिक का कुल द्रव्यमान (W) = 0.3780 g
प्राप्त AgCl का द्रव्यमान = 0.5740 g
AgCl के 1 मोल (143.32 g) में 1 मोल Cl (35.5 g) होता है。
अतः, 0.5740 g AgCl में क्लोरीन का द्रव्यमान = (35.5 × 0.5740) / 143.32 = 0.1421 g
अब क्लोरीन की प्रतिशतता = (क्लोरीन का द्रव्यमान / यौगिक का द्रव्यमान) × 100
% Cl = (0.1421 / 0.3780) × 100 = 37.59%
अतः, दिए गए यौगिक में क्लोरीन की प्रतिशतता 37.59% है।

मुख्य बिंदु:

• AgCl का आणविक द्रव्यमान = 143.32 g/mol और Cl का परमाणु द्रव्यमान = 35.5 g/mol।
• हैलोजन आकलन का सूत्र: % Cl = [(35.5 × AgCl का भार) / (143.32 × यौगिक का भार)] × 100。
• तौला गया अवक्षेप हमेशा शुद्ध और सूखा होना चाहिए।

आम गलतियाँ:

• AgCl के स्थान पर केवल Ag का आणविक भार ले लेना।
• यौगिक के भार और अवक्षेप के भार को आपस में बदल देना।
• दशमलव के बाद की गणना में त्रुटि करना।

Exam Tips:

a) मानक आणविक भार याद रखें: AgCl = 143.5 g/mol, BaSO₄ = 233 g/mol।
b) प्रतिशत निकालने का सूत्र परीक्षा पत्र में स्पष्ट रूप से लिखें।
c) यह मात्रात्मक विश्लेषण का सबसे सीधा और scoring संख्यात्मक प्रश्न है।

 

Question 35: कैरियस विधि द्वारा सल्फर के आकलन में 0.468 g सल्फरयुक्त कार्बनिक यौगिक से 0.668 g बेरियम सल्फेट प्राप्त हुआ। दिए गए यौगिक में सल्फर की प्रतिशतता की गणना कीजिए।

Answer:

यौगिक का कुल द्रव्यमान (W) = 0.468 g
प्राप्त BaSO₄ का द्रव्यमान = 0.668 g
BaSO₄ के 1 मोल (233 g) में 1 मोल सल्फर (32 g) होता है。
अतः, 0.668 g BaSO₄ में सल्फर का द्रव्यमान = (32 × 0.668) / 233 = 0.0917 g
सल्फर की प्रतिशतता = (सल्फर का द्रव्यमान / यौगिक का द्रव्यमान) × 100
% S = (0.0917 / 0.468) × 100 = 19.59%
अतः, दिए गए यौगिक में सल्फर की प्रतिशतता 19.59% है।

मुख्य बिंदु:

• BaSO₄ का आणविक द्रव्यमान 233 g/mol होता है और सल्फर का परमाणु भार 32 g/mol है।
• सल्फर की प्रतिशतता का सूत्र: % S = [(32 × BaSO₄ का भार) / (233 × यौगिक का भार)] × 100。
• बेरियम सल्फेट का सफेद अवक्षेप बेरियम क्लोराइड मिलाने से प्राप्त होता है।

आम गलतियाँ:

• BaSO₄ के आणविक द्रव्यमान (233) के स्थान पर गलत मान रख देना।
• यौगिक के भार को अंश में और अवक्षेप के भार को हर में लिख देना।
• प्रतिशत मान की अंतिम गणना में गलती करना।

Exam Tips:

a) सल्फर आकलन के लिए हमेशा BaSO₄ के आणविक भार (233) और S के परमाणु भार (32) का अनुपात याद रखें।
b) संख्यात्मक हल करते समय प्रत्येक पद की यूनिट (g) स्पष्ट दिखाएँ।
c) यह ऑर्गेनिक कैमिस्ट्री के количественный विश्लेषण का नियमित प्रश्न है।

 

Question 36: CH₂ = CH - CH₂ - CH₂ - C ≡ CH कार्बनिक यौगिक में C₂-C₃ आबंध किन संकरित कक्षकों के युग्म से निर्मित होता है?
(क) sp - sp²
(ख) sp - sp³
(ग) sp² - sp³
(घ) sp³ - sp³

Answer:

दिए गए यौगिक CH₂¹ = CH² - CH₂³ - CH₂⁴ - C⁵ ≡ CH⁶ में कार्बन परमाणुओं का संकरण इस प्रकार है: C-1 (sp²), C-2 (sp²), C-3 (sp³), C-4 (sp³), C-5 (sp), C-6 (sp)। प्रश्न में C₂-C₃ आबंध (अर्थात C-2 और C-3 के बीच का बंध) पूछा गया है। C-2 कार्बन sp² संकरित है और C-3 कार्बन sp³ संकरित है। अतः C₂-C₃ आबंध sp² - sp³ संकरित कक्षकों के अतिव्यापन से निर्मित होता है। सही विकल्प (ग) है।

मुख्य बिंदु:

• द्विआबंधित कार्बन परमाणु sp² संकरण प्रदर्शित करते हैं।
• एकल बंधित (संतृप्त) कार्बन परमाणु sp³ संकरण प्रदर्शित करते हैं।
• त्रिआबंधित कार्बन परमाणु sp संकरण प्रदर्शित करते हैं।

आम गलतियाँ:

• कार्बन नंबरिंग (C₁, C₂, C₃...) दाईं या बाईं तरफ से गलत शुरू कर देना।
• संकरण निकालते समय केवल कार्बन की संख्या देखना, बंधों (σ/π) को न गिनना।
• sp² और sp³ को आपस में मिला देना।

Exam Tips:

a) संरचना को विस्तार से लिखकर प्रत्येक कार्बन पर नंबरिंग करें।
b) C-2 और C-3 के बीच के बंध के लिए दोनों के अलग-अलग संकरण निकालें।
c) बहुविकल्पीय प्रश्नों में सही विकल्प (ग) को पहचानें।

 

Question 37: किसी कार्बनिक यौगिक में लैंसे-परीक्षण द्वारा नाइट्रोजन की जाँच में प्रशियन ब्लू निम्नलिखित में से किसके कारण प्राप्त होता है?
(क) Na₄[Fe(CN)₆]
(ख) Fe₄[Fe(CN)₆]₃
(ग) Fe₂[Fe(CN)₆]
(घ) Fe₃[Fe(CN)₆]₄

Answer:

लैंस-परीक्षण में जब सोडियम संगलन निष्कर्ष में फेरस सल्फेट और सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल मिलाया जाता है, तो पहले सोडियम साइनाइड, आयरन (II) सल्फेट के साथ अभिक्रिया करके सोडियम हेक्सासाइनोफेरेट (II) बनाता है। इसके बाद, सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म करने पर कुछ आयरन (II) आयन, आयरन (III) आयनों में ऑक्सीकृत हो जाते हैं, जो प्रशियन नीला रंग देने के लिए आयरन (III) हेक्सासाइनोफेरेट (II) [अर्थात Fe₄[Fe(CN)₆]₃, xH₂O] बनाते हैं। अतः सही विकल्प (ख) है।

मुख्य बिंदु:

• प्रशियन नीले रंग का रासायनिक सूत्र फेरिक फेरोसायनाइड, Fe₄[Fe(CN)₆]₃ होता है।
• इस अभिक्रिया में Fe²⁺ आयन Fe³⁺ में ऑक्सीकृत होते हैं।
• यह परीक्षण नाइट्रोजन की उपस्थिति की निश्चित पुष्टि करता है।

आम गलतियाँ:

• सोडियम हेक्सासाइनोफेरेट के सूत्र को ही प्रशियन ब्लू मान लेना।
• आयरन की वैलेंसी (II और III) के अंकों को उलट देना।
• अन्य विकल्पों (क, ग, घ) को सही समझ लेना।

Exam Tips:

a) प्रशियन ब्लू के जटिल रासायनिक सूत्र Fe₄[Fe(CN)₆]₃ को जुबान पर याद रखें।
b) समीकरण में Fe²⁺ और Fe³⁺ की भूमिका को समझें।
c) यह प्रतियोगी परीक्षाओं और बोर्ड परीक्षा दोनों में बहुविकल्पीय प्रश्न के रूप में अति महत्वपूर्ण है।

 

Question 38: निम्नलिखित कार्बधनायनों में से कौन सा सबसे अधिक स्थायी है?
(क) (CH₃)₃C-CH₂⁺
(ख) (CH₃)₃C⁺
(ग) CH₃CH₂CH₂CH₂⁺
(घ) CH₃CHCH₂CH₃

Answer:

दिए गए कार्बधनायनों में (CH₃)₃C⁺ (तृतीयक ब्यूटिल कार्बोकेशन) सबसे अधिक स्थायी है। इसका कारण यह है कि यह एक तृतीयक (3°) कार्बोकेशन है जिसमें कुल 9 α-हाइड्रोजन परमाणु होते हैं। अतिसंयुग्मन (Hyperconjugation) के 9 विसंसजन 구조 तथा +I प्रभाव (प्रेरणिक प्रभाव) के कारण तीन-तीन मेथिल समूहों द्वारा धनावेश को बहुत अधिक स्थिरता प्रदान की जाती है। जितने अधिक α-हाइड्रोजन होंगे, कार्बोकेशन का स्थायित्व उतना ही अधिक होगा (क्रम: 3° > 2° > 1°)। अतः सही विकल्प (ख) है।

मुख्य बिंदु:

• कार्बोकेशन का स्थायित्व क्रम: तृतीयक (3°) > द्वितीयक (2°) > प्राथमिक (1°) > मेथिल (°C⁺)।
• α-हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या जितनी अधिक होगी, अतिसंयुग्मी संरचनाएँ उतनी ही अधिक होंगी।
• +I प्रभाव और अतिसंयुग्मन दोनों धनावेश को कम करके स्थायित्व बढ़ाते हैं।

आम गलतियाँ:

• प्राथमिक और तृतीयक कार्बोकेशन के स्थायित्व के क्रम को विपरीत समझ लेना।
• α-हाइड्रोजन की गणना गलत करना।
• केवल प्रेरणिक प्रभाव देखना, अतिसंयुग्मन को भूल जाना।

Exam Tips:

a) याद रखें: कार्बोकेशन का स्थायित्व ∝ α-हाइड्रोजन की संख्या ∝ +I प्रभाव।
b) संरचना बनाकर α-कार्बन से जुड़े हाइड्रोजन (α-H) की गिनती सावधानी से करें।
c) बहुविकल्पीय प्रश्नों में 3° कार्बोकेशन हमेशा सबसे स्थायी होता है।

 

Question 39: कार्बनिक यौगिकों के पृथक्करण और शोधन की सर्वोत्तम तथा आधुनिकतम तकनीक कौन-सी है?
(क) क्रिस्टलन
(ख) आसवन
(ग) ऊर्ध्वपातन
(घ) क्रोमैटोग्राफी

Answer:

कार्बनिक यौगिकों के पृथक्करण, विलगन और शोधन के लिए क्रोमैटोग्राफी (Chromatography) वर्तमान समय की सबसे आधुनिक, संवेदनशील और सर्वोत्तम तकनीक है। इसका उपयोग बहुत कम मात्रा में उपलब्ध जटिल मिश्रणों या रंगीन पदार्थों (जैसे ऐमीनो अम्ल, पिगमेंट आदि) को अलग करने के लिए व्यापक रूप से किया जाता है। अतः सही विकल्प (घ) क्रोमैटोग्राफी है।

मुख्य बिंदु:

• क्रोमैटोग्राफी बहुत सूक्ष्म मात्रा (mg में) के मिश्रणों को भी अलग कर सकती है।
• यह आधुनिक रसायन विज्ञान की सबसे शक्तिशाली विश्लेषणात्मक तकनीक है।
• इसके कई प्रकार हैं जैसे पेपर क्रोमैटोग्राफी, कॉलम क्रोमैटोग्राफी और गैस क्रोमैटोग्राफी।

आम गलतियाँ:

• पारंपरिक विधियों (जैसे आसवन या क्रिस्टलन) को आधुनिकतम मान लेना।
• क्रोमैटोग्राफी के व्यापक उपयोग और संवेदनशीलता को न समझना।
• विकल्पों में से गलत तकनीक चुन लेना।

Exam Tips:

a) याद रखें कि आधुनिक शोधन तकनीक 'क्रोमैटोग्राफी' है।
b) यह तकनीक पौधों के वर्णकों (pigments) और औषधीय मिश्रणों को अलग करने में सर्वोत्तम है।
c) बहुविकल्पीय प्रश्नों के लिए यह एक सीधा और महत्वपूर्ण प्रश्न है।

 

Question 40: अभिक्रिया को नीचे दिए गए प्रकार में वर्गीकृत कीजिए—
CH₃CH₂I + KOH(aq) → CH₃CH₂OH + KI
(क) इलेक्ट्रोकिसनेही प्रतिस्थापन
(ख) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
(ग) विलोपन
(घ) संकलन

Answer:

दी गई रासायनिक अभिक्रिया CH₃CH₂I + KOH(aq) → CH₃CH₂OH + KI में, जलीय KOH से प्राप्त हाइड्रॉक्साइड आयन (OH⁻) एक प्रबल नाभिकस्नेही (Nucleophile) है। यह एथिल आयोडाइड के कार्बन पर आक्रमण करके iodide आयन (I⁻) को विस्थापित कर देता है और एथेनॉल बनाता है। चूँकि एक नाभिकस्नेही ने दूसरे नाभिकस्नेही को प्रतिस्थापित किया है, इसलिए यह नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया (Nucleophilic substitution reaction) का एक क्लासिक उदाहरण है। अतः सही विकल्प (ख) है।

मुख्य बिंदु:

• OH⁻ एक नाभिकस्नेही है जो इलेक्ट्रॉन-समृद्ध प्रजाति के रूप में कार्य करता है।
• इस अभिक्रिया में आयोडीन का स्थान हाइड्रॉक्साइड समूह लेता है (प्रतिस्थापन)।
• जलीय KOH हमेशा प्रतिस्थापन अभिक्रिया देता है जबकि एल्कोहॉलिक KOH विलोपन देता है।

आम गलतियाँ:

• OH⁻ को इलेक्ट्रोफाइल मान लेना।
• इसे विलोपन अभिक्रिया समझ लेना (अल्कोहॉलिक और जलीय KOH के अंतर को न समझना)।
• संकलन अभिक्रिया के साथ भ्रमित होना।

Exam Tips:

a) याद रखें: Aqueous KOH = Substitution (प्रतिस्थापन), Alcoholic KOH = Elimination (विलोपन)।
b) अभिकर्मक (OH⁻) की प्रकृति देखकर पहचानें कि यह नाभिकस्नेही है।
c) यह बोर्ड और प्रवेश परीक्षाओं दोनों में बार-बार पूछा जाने वाला बहुविकल्पीय प्रश्न है।

 

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