NCERT Solutions for Class 11 Chemistry: Chapter 07 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ
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Practice Class 11 Chemistry Solutions: Chapter 07 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ
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Question 1: निम्नलिखित स्पीशीज में प्रत्येक रेखांकित तत्त्व की ऑक्सीकरण-संख्या का निर्धारण कीजिए:
(क) NaH₂PO₄
(ख) NaHSO₄
(ग) H₄P₂O₇
(घ) K₂MnO₄
(ङ) CaO₂
(च) NaBH₄
(छ) H₂S₂O₇
(ज) KAl(SO₄)₂ . 12H₂O
Answer:
(क) NaH₂PO₄ में, मान लीजिए P की ऑक्सीकरण संख्या x है। सोडियम (Na) की ऑक्सीकरण संख्या +1, हाइड्रोजन (H) की +1 और ऑक्सीजन (O) की -2 है। अतः समीकरण 1(+1) + 2(+1) + 1(x) + 4(-2) = 0 है, जिससे 1 + 2 + x - 8 = 0 और x = +5 प्राप्त होता है।
(ख) NaHSO₄ में, S की ऑक्सीकरण संख्या ज्ञात करने के लिए समीकरण 1(+1) + 1(+1) + 1(x) + 4(-2) = 0 हल करते हैं, जिससे x = +6 प्राप्त होता है।
(ग) H₄P₂O₇ में, P की ऑक्सीकरण संख्या के लिए 4(+1) + 2(x) + 7(-2) = 0 हल करते हैं, जिससे 2x = 10 और x = +5 प्राप्त होता है।
(घ) K₂MnO₄ में, Mn की ऑक्सीकरण संख्या के लिए 2(+1) + 1(x) + 4(-2) = 0 हल करते हैं, जिससे x = +6 प्राप्त होता है।
(ङ) CaO₂ में, कैपेसिटिव ऑक्साइड होने के कारण प्रति ऑक्सीजन परमाणु ऑक्सीकरण संख्या -1 होगी, अतः O की ऑक्सीकरण संख्या -1 है।
(च) NaBH₄ में, बोरॉन (B) की ऑक्सीकरण संख्या ज्ञात करने के लिए 1(+1) + 1(x) + 4(-1) = 0 हल करते हैं, जिससे x = +3 प्राप्त होता है।
(छ) H₂S₂O₇ में, सल्फर की ऑक्सीकरण संख्या के लिए 2(+1) + 2(x) + 7(-2) = 0 हल करते हैं, जिससे x = +6 प्राप्त होता है।
(ज) KAl(SO₄)₂ . 12H₂O में, जल के अणु को उदासीन मानकर छोड़ने पर K, Al और SO₄ की संख्याओं से 1(+1) + 1(+3) + 2(x) + 8(-2) = 0 हल करने पर x = +6 (सल्फर के लिए) प्राप्त होता है।
मुख्य बिंदु:
• ऑक्सीकरण संख्या निकालने के लिए यौगिक पर कुल आवेश शून्य होना चाहिए।
• क्षार धातुओं (Na, K) की ऑक्सीकरण संख्या सामान्यतः +1 होती है।
• हाइड्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या सामान्यतः +1 और ऑक्सीजन की -2 होती है (परॉक्साइड को छोड़कर)।
आम गलतियाँ:
• परॉक्साइड या विशेष यौगिकों में ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के ऑक्सीकरण मानों को गलत लेना।
• बीजगणितीय समीकरण हल करते समय चिह्न (Plus/Minus) की गलती करना।
• क्रिस्टलीय जल के अणुओं को गणना में गलत तरीके से शामिल करना।
Exam Tips:
a) समीकरण लिखते समय प्रत्येक परमाणु की सामान्य ऑक्सीकरण संख्या ऊपर जरूर दर्शाएँ।
b) अज्ञात तत्त्व को x मानकर सरल रैखिक समीकरण से हल करें।
c) परिणाम में धनात्मक या ऋणात्मक चिह्न स्पष्ट रूप से लिखें।
Question 2: निम्नलिखित यौगिकों के रेखांकित तत्त्वों की ऑक्सीकरण-संख्या क्या है तथा इन परिणामों को आप कैसे प्राप्त करते हैं?
(क) KI₃
(ख) H₂S₂O₈
(ग) Fe₃O₄
(घ) CH₃CH₂OH
(ङ) CH₃COOH
Answer:
(क) KI₃ में, K की ऑक्सीकरण संख्या +1 है। यदि हम साधारण औसत निकालें तो I की ऑक्सीकरण संख्या -1/3 आएगी, जो भिन्नात्मक नहीं हो सकती क्योंकि आयोडीन परमाणु सहसंयोजक आबंध बनाते हैं। इसकी संरचना K⁺ [I-I-I]⁻ होती है, जिसमें मध्यवर्ती आयोडीन की ऑक्सीकरण संख्या 0 और सिरों वाले आयोडीन की -1 होती है।
(ख) H₂S₂O₈ में, सूत्र से गणना करने पर S की ऑक्सीकरण संख्या +7 आती है, किंतु सल्फर की अधिकतम ऑक्सीकरण संख्या +6 हो सकती है क्योंकि इसमें सहसंयोजक परॉक्साइड बंध (S-O-O-S) उपस्थित होता है। इसकी संरचना के अनुसार दो सल्फर परमाणुओं में से दो की ऑक्सीकरण संख्या +5 और अन्य दो की +5 होती है (वास्तविक औसत मान +6 प्राप्त होता है)।
(ग) Fe₃O₄ में, Fe की औसत ऑक्सीकरण संख्या +8/3 आती है, जो भिन्नात्मक है। यह एक मिश्रित ऑक्साइड (FeO . Fe₂O₃) है जिसमें एक Fe परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या +2 और अन्य दो Fe परमाणुओं की ऑक्सीकरण संख्या +3 होती है।
(घ) CH₃CH₂OH (एथेनॉल) में, कार्बन की औसत ऑक्सीकरण संख्या -2 है। संरचना के आधार पर दोनों कार्बन परमाणु अलग-अलग रासायनिक परिवेश में होने के कारण उनकी व्यक्तिगत ऑक्सीकरण संख्या भिन्न हो सकती है।
(ङ) CH₃COOH (एसिटिक अम्ल) में, C की औसत ऑक्सीकरण संख्या 0 है। इसमें दो कार्बन परमाणु अलग-अलग स्थितियों में हैं, जहाँ एक C की ऑक्सीकरण संख्या +2 और दूसरे की -2 होती है।
मुख्य बिंदु:
• कुछ यौगिकों में औसत ऑक्सीकरण संख्या भिन्नात्मक आ सकती है जो कि वास्तविक नहीं होती।
• परॉक्साइड बंध या मिश्रित ऑक्साइड होने पर संरचना का अध्ययन करना आवश्यक है।
• एक ही अणु में समान तत्त्व के विभिन्न परमाणु भिन्न ऑक्सीकरण अवस्था दर्शा सकते हैं।
आम गलतियाँ:
• भिन्नात्मक ऑक्सीकरण संख्या को ही अंतिम और सही मान लेना।
• परॉक्साइड बंधों की उपस्थिति को नजरअंदाज करना।
• मिश्रित ऑक्साइड को एकल यौगिक मानकर गलत गणना करना।
Exam Tips:
a) जहाँ भी ऑक्सीकरण संख्या उसकी अधिकतम सीमा से अधिक या भिन्नात्मक आए, वहाँ संरचना सूत्र बनाकर स्पष्ट करें।
b) Fe₃O₄ जैसे यौगिकों को मिश्रित ऑक्साइड के रूप में याद रखें।
c) कार्बनिक यौगिकों में प्रत्येक कार्बन की अलग से ऑक्सीकरण अवस्था निकाली जा सकती है।
Question 3: निम्नलिखित अभिक्रियाओं का अपचयोपचय अभिक्रियाओं के रूप में औचित्य स्थापित करने का प्रयास करें:
(क) CuO(s) + H₂(g) → Cu(s) + H₂O(g)
(ख) Fe₂O₃(s) + 3CO(g) → 2Fe(s) + 3CO₂(g)
(ग) 4BCl₃(g) + 3LiAlH₄(s) → 2B₂H₆(g) + 3LiCl(s) + 3AlCl₃(s)
(घ) 2K(s) + F₂(g) → 2K⁺F⁻(s)
(ङ) 4NH₃(g) + 5O₂(g) → 4NO(g) + 6H₂O(g)
Answer:
(क) इस अभिक्रिया में CuO का Cu में अपचयन होता है क्योंकि Cu की ऑक्सीकरण संख्या +2 से घटकर 0 हो जाती है। साथ ही, H₂ का H₂O में ऑक्सीकरण होता है क्योंकि H की ऑक्सीकरण संख्या 0 से बढ़कर +1 हो जाती है। अतः यह एक अपचयोपचय (रेडॉक्स) अभिक्रिया है।
(ख) इसमें Fe₂O₃ का Fe में अपचयन होता है (ऑक्सीकरण संख्या +3 से 0 होती है) और CO का CO₂ में ऑक्सीकरण होता है (C की ऑक्सीकरण संख्या +2 से +4 होती है)। इसलिए यह रेडॉक्स अभिक्रिया है।
(ग) यहाँ BCl₃ में बोरॉन की ऑक्सीकरण संख्या +3 से घटकर B₂H₆ में -3 हो जाती है (अपचयन), जबकि LiAlH₄ में हाइड्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या -1 से बढ़कर B₂H₆ में +1 हो जाती है (ऑक्सीकरण)। अतः यह रेडॉक्स अभिक्रिया है।
(घ) इसमें पोटैशियम (K) की ऑक्सीकरण संख्या 0 से बढ़कर +1 (KF में) हो जाती है (ऑक्सीकरण), और फ़्लोरिन (F₂) की 0 से घटकर -1 हो जाती है (अपचयन)। यह एक रेडॉक्स अभिक्रिया है।
(ङ) अमोनिया (NH₃) में नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या -3 से बढ़कर NO में +2 हो जाती है (ऑक्सीकरण), तथा ऑक्सीजन (O₂) की 0 से घटकर -2 हो जाती है (अपचयन)। अतः यह भी एक रेडॉक्स अभिक्रिया है।
मुख्य बिंदु:
• रेडॉक्स अभिक्रिया वह है जिसमें एक ही समय पर ऑक्सीकरण और अपचयन दोनों प्रक्रियाएँ होती हैं।
• ऑक्सीकरण संख्या में वृद्धि का अर्थ ऑक्सीकरण और कमी का अर्थ अपचयन है।
• अभिकारकों और उत्पादों के तत्वों की ऑक्सीकरण संख्याओं की तुलना करके इसकी पुष्टि की जाती है।
आम गलतियाँ:
• केवल एक अभिकारक का परिवर्तन देखकर निष्कर्ष निकालना।
• ऑक्सीकरण संख्या के बढ़ने और घटने के नियमों में भ्रमित होना।
• संतुलित समीकरण में तत्वों के आवेशों को गलत लिखना।
Exam Tips:
a) अभिक्रिया में भाग लेने वाले प्रत्येक मुख्य परमाणु के ऊपर उसकी ऑक्सीकरण संख्या जरूर लिखें।
b) तीर (→) के दोनों तरफ संकेत करके दिखाएँ कि किसका ऑक्सीकरण हुआ और किसका अपचयन।
c) उत्तर लिखते समय ऑक्सीकरण और अपचयन दोनों की अलग-अलग व्याख्या करें।
Question 4: फ्लोरीन बर्फ से अभिक्रिया करके यह परिवर्तन लाती है:
H₂O(s) + F₂(g) → HF(g) + HOF(g)
इस अभिक्रिया का अपचयोपचय औचित्य स्थापित कीजिए।
Answer:
दी गई अभिक्रिया में अभिकारकों और उत्पादों के प्रत्येक परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या इस प्रकार है: H₂O में H की +1 और O की -2 है, F₂ में F की ऑक्सीकरण संख्या 0 है। उत्पाद पक्ष में HF में H की +1, F की -1 तथा HOF में H की +1, O की 0 और F की -1 है। यहाँ फ़्लोरिन (F₂) जिसकी ऑक्सीकरण संख्या 0 थी, वह अपचयित होकर HF और HOF में -1 हो जाती है। वहीं दूसरी ओर, जल (H₂O) में ऑक्सीजन जिसकी ऑक्सीकरण संख्या -2 थी, वह ऑक्सीकृत होकर HOF में 0 हो जाती है। चूँकि इसमें ऑक्सीकरण और अपचयन दोनों साथ-साथ हो रहे हैं, अतः यह एक अपचयोपचय (रेडॉक्स) अभिक्रिया है।
मुख्य बिंदु:
• फ़्लोरिन एक अति प्रबल ऑक्सीकारक है जो जल के ऑक्सीजन को -2 से 0 (ऑक्सीकृत) कर देता है।
• स्वयं फ़्लोरिन (F₂) का अपचयन 0 से -1 ऑक्सीकरण अवस्था में होता है।
• यह अभिक्रिया दर्शाती है कि पानी का भी विशेष परिस्थितियों में ऑक्सीकरण संभव है।
आम गलतियाँ:
• HOF यौगिक में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या को -2 मान लेना।
• यह सोचना कि फ्लोरीन केवल अपचायक है।
• रेडॉक्स औचित्य देते समय हाइड्रोजन की भूमिका को गलत समझना।
Exam Tips:
a) यौगिकों के नीचे उनके तत्वों की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ लिखकर दिखाएँ।
b) स्पष्ट करें कि ऑक्सीजन का ऑक्सीकरण और फ़्लोरिन का अपचयन कैसे हुआ है।
c) उत्तर को संक्षिप्त और रासायनिक तर्कों पर आधारित रखें।
Question 5: H₂SO₅, Cr₂O₇²⁻ तथा NO₃⁻ में सल्फर, क्रोमियम तथा नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण-संख्या की गणना कीजिए। साथ ही इन यौगिकों की संरचना बताइए तथा इसमें हेत्वाभास (Fallacy) का स्पष्टीकरण दीजिए।
Answer:
(i) H₂SO₅ (कैरो अम्ल) में, सामान्य सूत्र विधि से गणना करने पर S की ऑक्सीकरण संख्या +8 आती है, किंतु सल्फर की अधिकतम ऑक्सीकरण संख्या +6 हो सकती है क्योंकि इसके पास केवल 6 संयोजी इलेक्ट्रॉन हैं। इसकी संरचना में एक परॉक्साइड बंध (-O-O-) होता है, जिससे सही गणना करने पर सल्फर की ऑक्सीकरण संख्या +6 प्राप्त होती है।
(ii) Cr₂O₇²⁻ (डाइक्रोमेट आयन) में, सूत्र 2(x) + 7(-2) = -2 से क्रोमियम की ऑक्सीकरण संख्या +6 प्राप्त होती है। इसकी संरचना में दोनों क्रोमियम परमाणु पर +6 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं और इसमें कोई हेत्वाभास नहीं होता।
(iii) NO₃⁻ (नाइट्रेट आयन) में, x + 3(-2) = -1 से नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या +5 प्राप्त होती है। इसकी संरचना में नाइट्रोजन अपनी अधिकतम +5 ऑक्सीकरण अवस्था में होता है और इसमें भी कोई भ्रम या हेत्वाभास नहीं है।
मुख्य बिंदु:
• जब साधारण गणितीय सूत्र से प्राप्त ऑक्सीकरण संख्या तत्त्व की अधिकतम संयोजकता से अधिक आ जाए, तो वहाँ परॉक्साइड बंध उपस्थित होता है।
• H₂SO₅ में हेत्वाभास का कारण परॉक्साइड बंध की उपस्थिति है।
• संरचना का ज्ञान होने पर ही सही ऑक्सीकरण संख्या का पता चलता है।
आम गलतियाँ:
• H₂SO₅ में सल्फर की ऑक्सीकरण संख्या को +8 लिखकर छोड़ देना।
• संरचनात्मक बंधों (विशेषकर परॉक्साइड बंध) की उपेक्षा करना।
• आयनों पर उपस्थित आवेश को समीकरण में शामिल न करना।
Exam Tips:
a) जहाँ भी ऑक्सीकरण संख्या सीमा से अधिक आए, तुरंत समझें कि संरचना में परॉक्साइड लिंकेज है।
b) H₂SO₅ (कारो अम्ल) की संरचना का चित्र बनाकर अभ्यास करें।
c) आयनों (जैसे Cr₂O₇²⁻ और NO₃⁻) के लिए बीजगणितीय समीकरण में कुल आवेश को दाईं ओर अवश्य लिखें।
Question 6: निम्नलिखित यौगिकों के सूत्र लिखिए:
(क) मरक्यूरी (II) क्लोराइड
(ख) निकल (II) सल्फेट
(ग) टिन (IV) ऑक्साइड
(घ) थेलियम (I) सल्फेट
(ङ) आयरन (III) सल्फेट
(च) क्रोमियम (III) ऑक्साइड
Answer:
(क) मरक्यूरी (II) क्लोराइड का सूत्र HgCl₂ है, जिसमें मरक्यूरी की संयोजकता +2 है।
(ख) निकल (II) सल्फेट का सूत्र NiSO₄ है, जिसमें निकल की संयोजकता +2 है।
(ग) टिन (IV) ऑक्साइड का सूत्र SnO₂ है, जिसमें टिन की संयोजकता +4 है।
(घ) थेलियम (I) सल्फेट का सूत्र Tl₂SO₄ है, जिसमें थेलियम की संयोजकता +1 है।
(ङ) आयरन (III) सल्फेट का सूत्र Fe₂(SO₄)₃ है, जिसमें आयरन की संयोजकता +3 है।
(च) क्रोमियम (III) ऑक्साइड का सूत्र Cr₂O₃ है, जिसमें क्रोमियम की संयोजकता +3 है।
मुख्य बिंदु:
• यौगिक के नाम में कोष्ठक में दी गई रोमन संख्या तत्त्व की ऑक्सीकरण अवस्था या संयोजकता दर्शाती है।
• रासायनिक सूत्र बनाते समय धनायन और ऋणायन के आवेशों को क्रॉस-मल्टीप्लाई किया जाता है।
• सल्फेट आयन पर SO₄²⁻ आवेश होता है।
आम गलतियाँ:
• रोमन संख्याओं (जैसे II, III, IV) को गलत समझना या छोड़ देना।
• आवेशों को संतुलित किए बिना गलत सूत्र लिख देना।
• रासायनिक प्रतीकों के लोअरकेस और अपरकेस अक्षरों की गलती करना।
Exam Tips:
a) नामकरण प्रणाली (Stock Notation) को अच्छी तरह समझ लें जहाँ ब्रैकेट की संख्या ही मेटल की वैलेंसी है।
b) सल्फेट, क्लोराइड और ऑक्साइड जैसे मूलकों के आवेश याद रखें।
c) सूत्र लिखते समय वैलेंसी का क्रiss-cross नियम अपनाएँ।
Question 7: उन पदार्थों की सूची तैयार कीजिए, जिनमें कार्बन -4 से +4 तक तथा नाइट्रोजन -3 से +5 तक की ऑक्सीकरण अवस्था होती है।
Answer:
कार्बन के लिए -4 से +4 तक की ऑक्सीकरण अवस्था वाले पदार्थ इस प्रकार हैं: CH₄ (-4), H₃C-CH₃ (-3), CH₃Cl (-2), CH₂Cl₂ (-1), CH₂Cl-CH₂Cl या CH₂O (0), ClC=CCl (+1), CHCl₂COH (+2), Cl₃C-CCl₃ (+3), CCl₄ या CO₂ (+4)। इसी प्रकार, नाइट्रोजन के लिए -3 से +5 तक की ऑक्सीकरण अवस्था वाले पदार्थ हैं: NH₃ (-3), N₂H₄ (-2), NH₂OH (-1), N₂ (0), N₂O (+1), NO (+2), N₂O₃ (+3), NO₂ (+4), N₂O₅ (+5)।
मुख्य बिंदु:
• कार्बन और नाइट्रोजन दोनों ही अपनी परिवर्ती (variable) ऑक्सीकरण अवस्थाओं के लिए जाने जाते हैं।
• ऑक्सीकरण संख्या -4 से लेकर +4 (कार्बन) और -3 से लेकर +5 (नाइट्रोजन) तक हो सकती है।
• यौगिकों में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की निश्चित ऑक्सीकरण संख्याओं का उपयोग करके कार्बन/नाइट्रोजन का मान निकाला जाता है।
आम गलतियाँ:
• मध्यवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाओं के सही यौगिक न लिख पाना।
• धनात्मक और ऋणात्मक चिह्नों में गड़बड़ी करना।
• कार्बनिक यौगिकों में औसत ऑक्सीकरण संख्या के बजाय संरचना को न समझना।
Exam Tips:
a) इस प्रकार के प्रश्नों के लिए सारणीबद्ध रूप में उत्तर लिखना सबसे अच्छा रहता है।
b) प्रत्येक ऑक्सीकरण अंक के सामने एक सरल यौगिक का उदाहरण याद रखें।
c) शून्य ऑक्सीकरण अवस्था हमेशा मुक्त तत्वों (जैसे N₂) में होती है।
Question 8: अपनी अभिक्रियाओं में सल्फर डाइऑक्साइड तथा हाइड्रोजन परॉक्साइड ऑक्सीकारक तथा अपचायक दोनों ही रूपों में क्रिया करते हैं, जबकि ओजोन तथा नाइट्रिक अम्ल केवल ऑक्सीकारक के रूप में ही। क्यों?
Answer:
सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) में सल्फर की ऑक्सीकरण संख्या +4 है, जो +6 से -2 के बीच जा सकती है, इसलिए यह ऑक्सीकारक और अपचायक दोनों का कार्य कर सकती है। हाइड्रोजन परॉक्साइड (H₂O₂) में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या -1 है, जो 0 से -2 तक जा सकती है, अतः यह भी दोनों रूप में कार्य करती है। इसके विपरीत, ओजोन (O₃) में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या शून्य है और यह केवल घट सकती है (0 से -2), इसलिए यह केवल ऑक्सीकारक है। नाइट्रिक अम्ल (HNO₃) में नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या +5 है, जो अपनी उच्चतम अवस्था में है और केवल घट सकती है (+5 से -3), इसलिए HNO₃ भी केवल ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करता है।
मुख्य बिंदु:
• यदि कोई तत्व अपनी मध्यवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था में है, तो वह ऑक्सीकारक और अपचायक दोनों हो सकता है।
• यदि तत्व अपनी उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था में है, तो वह केवल ऑक्सीकारक का काम करता है।
• SO₂ और H₂O₂ मध्यवर्ती अवस्था में हैं, जबकि O₃ और HNO₃ अपनी सीमा के छोर पर हैं।
आम गलतियाँ:
• ऑक्सीकारक और अपचायक की परिभाषा में भ्रमित होना।
• तत्वों की अधिकतम और न्यूनतम ऑक्सीकरण सीमाओं को भूल जाना।
• परॉक्साइड में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या -2 मान लेना।
Exam Tips:
a) उत्तर देते समय प्रत्येक यौगिक में केंद्रीय परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या और उसकी संभावित परास (Range) जरूर बताएं।
b) याद रखें: मध्यवर्ती = दोनों, उच्चतम = केवल ऑक्सीकारक, न्यूनतम = केवल अपचायक।
c) यह वैचारिक प्रश्न अक्सर परीक्षा में पूछा जाता है, इसे अच्छे से तैयार करें।
Question 9: इन अभिक्रियाओं को देखिए:
(क) 6CO₂(g) + 6H₂O(l) → C₆H₁₂O₆(aq) + 6O₂(g)
(ख) O₃(g) + H₂O₂(l) → H₂O(l) + 2O₂(g)
इन अभिक्रियाओं को इस प्रकार लिखना अधिक उपयुक्त क्यों है:
(क) 6CO₂(g) + 12H₂O(l) → C₆H₁₂O₆(aq) + 6H₂O(l) + 6O₂(g)
(ख) O₃(g) + H₂O(l) + O₂(g) → H₂O(l) + O₂(g) + O₂(g)
उपरोक्त अपचयोपचय अभिक्रियाओं के (क) तथा (ख) के अन्वेषण की विधि सुझाइए।
Answer:
(क) प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में जल के अणु अपघटित होकर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन देते हैं, और उत्पादित H₂O का उपयोग अंत में होता है। इसलिए दोनों तरफ जल दिखाना अधिक उपयुक्त है। इसकी पुष्टि के लिए रेडियोधर्मि ऑक्सीजन (O¹⁸) युक्त जल का उपयोग करके पथ की जाँच की जा सकती है।
(ख) ओजोन और हाइड्रोजन परॉक्साइड की अभिक्रिया में O₃ विघटित होकर O₂ और O बनाता है, जो H₂O₂ के साथ क्रिया करके H₂O और O₂ देता है। इस अभिक्रिया के पथ की जाँच के लिए भी रेडियोधर्मि समस्थानिकों का उपयोग किया जाता है।
मुख्य बिंदु:
• अभिक्रियाओं के सही क्रिया-तंत्र को समझने के लिए समस्थानिक अनुक्रमण (Isotope labeling) विधि का उपयोग किया जाता है।
• प्रकाश संश्लेषण में निकलने वाली ऑक्सीजन जल से आती है, कार्बन डाइऑक्साइड से नहीं।
• रासायनिक समीकरणों को विस्तृत रूप में लिखना अभिकारकों की वास्तविक भागीदारी को दर्शाता है।
आम गलतियाँ:
• समस्थानिकों (जैसे O¹⁸) की भूमिका को न समझ पाना।
• समीकरणों में पानी के अणुओं को अनावश्यक समझकर काट देना।
• अभिक्रिया के तंत्र (Mechanism) की उपेक्षा करना।
Exam Tips:
a) रेडियोएक्टिव ट्रेसर तकनीक (Radioactive tracer technique) का नाम हमेशा ऐसे प्रश्नों में उल्लेख करें।
b) स्पष्ट करें कि समस्थानिक लेबलिंग से यह कैसे पता चलता है कि कौन सा परमाणु किस उत्पाद में गया है।
c) समीकरणों के दोनों रूपों को लिखकर तुलना करें।
Question 10: AgF₂ एक अस्थिर यौगिक है। यदि यह बन जाए, तो यह यौगिक एक अति शक्तिशाली ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है। क्यों?
Answer:
AgF₂ में सिल्वर (Ag) की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है, जो सिल्वर के लिए एक अत्यंत अस्थिर और उच्च अवस्था है। चूँकि +2 अवस्था से Ag⁺ आसानी से एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके अधिक स्थायी +1 अवस्था में आना चाहता है, इसलिए AgF₂ एक बहुत ही शक्तिशाली ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करता है। यह अन्य पदार्थों से इलेक्ट्रॉन खींचकर स्वयं को स्थायी कर लेता है।
मुख्य बिंदु:
• AgF₂ में Ag की ऑक्सीकरण संख्या +2 है जो अस्थिर होती है।
• यह यौगिक आसानी से अपचयित होकर +1 अवस्था में बदलना चाहता है।
• उच्च ऑक्सीकरण अवस्था होने के कारण यह प्रबल ऑक्सीकारक है।
आम गलतियाँ:
• सिल्वर की सामान्य स्थायी ऑक्सीकरण अवस्था (+1) को भूल जाना।
• यह न समझ पाना कि +2 अवस्था क्यों अस्थिर है।
• ऑक्सीकारक और अपचायक के गुणों को आपस में मिला देना।
Exam Tips:
a) उत्तर में स्पष्ट रूप से लिखें कि उच्च ऑक्सीकरण अवस्था से निम्न (स्थायी) अवस्था में जाने की प्रवृत्ति ही इसे प्रबल ऑक्सीकारक बनाती है।
b) Ag⁺ आयन के स्थायित्व का उल्लेख अवश्य करें।
c) यह एक तार्किक प्रश्न है, इसे वैचारिक रूप से याद रखें।
Question 11: जब कभी एक ऑक्सीकारक और एक अपचायक के बीच अभिक्रिया संपन्न की जाती है, तब अपचायक के आधिक्य में निम्नतर ऑक्सीकरण अवस्था का यौगिक तथा ऑक्सीकारक के आधिक्य में उच्चतर ऑक्सीकरण अवस्था का यौगिक बनता है। इस वक्तव्य का औचित्य तीन उदाहरण देकर दीजिए।
Answer:
जब अपचायक की अधिकता होती है तो वह ऑक्सीकारक को पूरी तरह अपचयित कर देता है, जिससे निम्नतर ऑक्सीकरण अवस्था वाला यौगिक बनता है। इसके विपरीत, ऑक्सीकारक की अधिकता होने पर उच्चतर ऑक्सीकरण अवस्था वाला यौगिक बनता है। उदाहरण के लिए: (i) जब फॉस्फोरस (अपचायक) की अधिकता में फ़्लोरिन (ऑक्सीकारक) से क्रिया कराते हैं तो PF₃ बनता है (P की ऑक्सीकरण संख्या +3), किंतु फ़्लोरिन की अधिकता में PF₅ बनता है (+5 ऑक्सीकरण संख्या)। (ii) पोटैशियम और ऑक्सीजन की अभिक्रिया में K के आधिक्य से K₂O (+1) और O₂ के आधिक्य से K₂O₂ (-1) बनता है। (iii) कार्बन की अल्प मात्रा और आधिक्य से क्रमशः CO (+2) और CO₂ (+4) बनते हैं।
मुख्य बिंदु:
• अभिकारकों के सापेक्षिक परिमाण (आधिक्य या सीमांत) उत्पादों की ऑक्सीकरण अवस्था को निर्धारित करते हैं।
• अपचायक के आधिक्य से निम्न ऑक्सीकरण अवस्था प्राप्त होती है।
• ऑक्सीकारक के आधिक्य से उच्च ऑक्सीकरण अवस्था प्राप्त होती है।
आम गलतियाँ:
• आधिक्य (Excess) और सीमांत (Limiting) अभिकर्मक के प्रभाव को उल्टा समझ लेना।
• रासायनिक समीकरणों में ऑक्सीकरण संख्याओं का सही मिलान न करना।
• उदाहरणों में उचित stoichiometry का प्रयोग न करना।
Exam Tips:
a) तीनों उदाहरणों (फॉस्फोरस-फ़्लोरिन, पोटैशियम-ऑक्सीजन, कार्बन-ऑक्सीजन) को समीकरण सहित याद रखें।
b) स्पष्ट करें कि कैसे आधिक्य बदलने पर उत्पाद की ऑक्सीकरण संख्या बदल जाती है।
c) यह दीर्घ उत्तरीय प्रश्न के रूप में आ सकता है, अतः पूरी रूपरेखा तैयार रखें।
Question 12: इन प्रेक्षणों की अनुकूलता को कैसे समझाएँगे?
(क) यद्यपि क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट तथा अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट-दोनों ही ऑक्सीकारक हैं, फिर भी टॉलुइन से बेंजोइक अम्ल बनाने के लिए हम एल्कोहॉलिक पोटैशियम परमैंगनेट का प्रयोग ऑक्सीकारक के रूप में क्यों करते हैं? इस अभिक्रिया के लिए संतुलित अपचयोपचय समीकरण दीजिए।
(ख) क्लोराइडयुक्त अकाकार्बनिक मिश्रण में सांद्र सल्फ्युरिक अम्ल डालने पर हमें तीक्ष्ण गंध वाली HCl गैस प्राप्त होती है, परंतु यदि मिश्रण में ब्रोमाइड उपस्थित हो, तो हमें ब्रोमीन की लाल वाष्प प्राप्त होती है, क्यों?
Answer:
(क) टॉलुइन से बेंजोइक अम्ल के निर्माण में एल्कोहॉलिक माध्यम का उपयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि उदासीन माध्यम में OH⁻ आयन उत्पन्न होते हैं, जिससे एसिड या बेस जोड़ने की लागत कम हो जाती है और दोनों कार्बनिक यौगिक ध्रुवीय होने के कारण सजातीय माध्यम में तेजी से अभिक्रिया कर सकते हैं।
(ख) सांद्र H₂SO₄ को क्लोराइड मिश्रण में मिलाने पर HCl गैस बनती है, जो एक दुर्बल अपचायक होने के कारण H₂SO₄ द्वारा SO₂ में अपचयित नहीं हो सकती। इसके विपरीत, ब्रोमाइड मिलाने पर उत्पन्न HBr एक प्रबल अपचायक होता है, जिसे सांद्र H₂SO₄ तुरंत ब्रोमीन (Br₂) की लाल वाष्प में ऑक्सीकृत कर देता है।
मुख्य बिंदु:
• कार्बनिक अभिक्रियाओं में अभिकारकों की विलेयता और माध्यम (उदासीन/अम्लीय/क्षारीय) का बहुत महत्व होता है।
• HCl एक दुर्बल अपचायक है, जबकि HBr एक प्रबल अपचायक है।
• सांद्र H₂SO₄ स्वयं एक अच्छा ऑक्सीकारक है जो प्रबल अपचायकों को ऑक्सीकृत कर देता है।
आम गलतियाँ:
• HCl और HBr की अपचायक क्षमता में अंतर न समझ पाना।
• माध्यम के चयन के पीछे के आर्थिक और रासायनिक कारणों को छोड़ देना।
• संतुलित समीकरण लिखते समय सह-उत्पादों को भूल जाना।
Exam Tips:
a) वैعايةनात्मक प्रश्नों में अभिकर्मकों की अपचायक क्षमता (Reducing strength) का तर्क अवश्य दें।
b) टॉलुइन के ऑक्सीकरण का समीकरण अच्छी तरह अभ्यास करें।
c) हैलाइड आयनों (Cl⁻ और Br⁻) के प्रति सांद्र H₂SO₄ का व्यवहार स्पष्ट रूप से याद रखें।
Question 13: निम्नलिखित अभिक्रियाओं में ऑक्सीकृत, अपचयित, ऑक्सीकारक तथा अपचायक पदार्थ पहचानिए:
(क) 2AgBr(s) + C₆H₆O₂(aq) → 2Ag(s) + 2HBr(aq) + C₆H₄O₂(aq)
(٘ख) HCHO(l) + 2[Ag(NH₃)₂]⁺(aq) + 3OH⁻(aq) → 2Ag(s) + HCOO⁻(aq) + 4NH₃(aq) + 2H₂O(l)
(ग) HCHO(l) + 2Cu²⁺(aq) + 5OH⁻(aq) → Cu₂O(s) + HCOO⁻(aq) + 3H₂O(l)
(घ) N₂H₄(l) + 2H₂O₂(l) → N₂(g) + 4H₂O(l)
(ङ) Pb(s) + PbO₂(s) + 2H₂SO₄(aq) → 2PbSO₄(s) + 2H₂O(l)
Answer:
(क) इसमें ऑक्सीकृत पदार्थ C₆H₆O₂ है, अपचयित पदार्थ AgBr है, ऑक्सीकारक एजेंट AgBr है और अपचायक एजेंट C₆H₆O₂ है।
(ख) इसमें ऑक्सीकृत पदार्थ HCHO है, अपचयित पदार्थ [Ag(NH₃)₂]⁺ है, ऑक्सीकारक एजेंट [Ag(NH₃)₂]⁺ है और अपचायक एजेंट HCHO है।
(ग) इसमें ऑक्सीकृत पदार्थ HCHO है, अपचयित पदार्थ Cu²⁺ है, ऑक्सीकारक एजेंट Cu²⁺ है और अपचायक एजेंट HCHO है।
(घ) इसमें ऑक्सीकृत पदार्थ N₂H₄ है, अपचयित पदार्थ H₂O₂ है, ऑक्सीकारक एजेंट H₂O₂ है और अपचायक एजेंट N₂H₄ है।
(ङ) इसमें ऑक्सीकृत पदार्थ Pb है, अपचयित पदार्थ PbO₂ है, ऑक्सीकारक एजेंट PbO₂ है और अपचायक एजेंट Pb है।
मुख्य बिंदु:
• जिसका ऑक्सीकरण होता है वह अपचायक कहलाता है।
• जिसका अपचयन होता है वह ऑक्सीकारक कहलाता है।
• प्रत्येक अभिक्रिया में तत्वों की ऑक्सीकरण संख्याओं में परिवर्तन की जाँच करके इनकी पहचान की जाती है।
आम गलतियाँ:
• ऑक्सीकृत होने वाले पदार्थ और ऑक्सीकारक एजेंट को एक ही समझ लेना (दोनों विपरीत होते हैं)।
• जटिल आयनों (जैसे टोलेंस अभिकर्मक) में धातु की ऑक्सीकरण अवस्था गलत निकालना।
• लेड संचायक सेल (Pb/PbO₂) की अभिक्रिया में ऑक्सीकरण-अपचयन को उलटना।
Exam Tips:
a) सारणी बनाकर एक तरफ ऑक्सीकृत/अपचयित पदार्थ और दूसरी तरफ ऑक्सीकारक/अपचायक लिखें।
b) एल्डिहाइड के ऑक्सीकरण (टोलेंस और फेलिंग परीक्षण) से जुड़े उदाहरण बहुत महत्वपूर्ण हैं।
c) लेड स्टोरेज बैटरी की रेडॉक्स अभिक्रिया को बार-बार लिखकर अभ्यास करें।
Question 14: अभिक्रियाओं पर विचार करें:
2S₂O₃²⁻(aq) + I₂(s) → S₄O₆²⁻(aq) + 2I⁻(aq)
S₂O₃²⁻(aq) + 2Br₂(l) + 5H₂O(l) → 2SO₄²⁻(aq) + 8Br⁻(aq) + 10H⁺(aq)
एक ही अपचायक, थायोसल्फेट, आयोडीन और ब्रोमीन के साथ अलग-अलग अभिक्रिया क्यों करता है?
Answer:
थायोसल्फेट (S₂O₃²⁻) में सल्फर की औसत ऑक्सीकरण संख्या +2 है। ब्रोमीन एक बहुत ही प्रबल ऑक्सीकरण एजेंट है, जो आयोडीन की तुलना में S₂O₃²⁻ को उच्च अवस्था (+6, यानी SO₄²⁻ में) तक ऑक्सीकृत कर देता है। इसके विपरीत, आयोडीन एक दुर्बल ऑक्सीकारक है, जो केवल +2.5 औसत अवस्था (S₄O₆²⁻ में) तक ही ऑक्सीकृत कर पाता है। यही कारण है कि एक ही अपचायक अलग-अलग ऑक्सीकारकों के साथ भिन्न उत्पाद बनाता है।
मुख्य बिंदु:
• ब्रोमीन (Br₂) की ऑक्सीकरण क्षमता आयोडीन (I₂) से बहुत अधिक होती है।
• प्रबल ऑक्सीकारक अपचायक को उसकी उच्चतम संभव अवस्था में पहुँचा देता है।
• दुर्बल ऑक्सीकारक उसे मध्यवर्ती अवस्था में ही ऑक्सीकृत करता है।
आम गलतियाँ:
• दोनों हैलोजन (Br₂ और I₂) की ऑक्सीकरण क्षमताओं को समान मान लेना।
• S₄O₆²⁻ और SO₄²⁻ में सल्फर की ऑक्सीकरण संख्या की सही गणना न करना।
• यह सोचना कि अपचायक अपनी इच्छा से उत्पाद बदलता है।
Exam Tips:
a) हैलोजन की ऑक्सीकरण शक्ति का क्रम याद रखें: F₂ > Cl₂ > Br₂ > I₂।
b) स्पष्ट करें कि ऑक्सीकारक की शक्ति जितनी अधिक होगी, उत्पाद में केंद्रीय परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या उतनी ही अधिक होगी।
c) यह वैचारिक प्रश्न परीक्षा की दृष्टि से अति उपयोगी है।
Question 15: अभिक्रियाओं के आधार पर पुष्टि कीजिए कि हैलोजन में फ़्लोरिन सबसे अच्छा ऑक्सीकारक है और हाइड्रोजेलोइक यौगिकों में हाइड्रोआयोडिक अम्ल सबसे अच्छा अपचायक है।
Answer:
फ़्लोरिन (F₂) अन्य सभी हैलाइड आयनों (Cl⁻, Br⁻, I⁻) को उनके विलयनों से विस्थापित कर सकता है और स्वयं -1 अवस्था में अपचयित हो जाता है, अतः यह सबसे प्रबल ऑक्सीकारक है। इसके विपरीत, हाइड्रोजेलोइक अम्लों (HF, HCl, HBr, HI) में HI सबसे आसानी से आयोडीन में ऑक्सीकृत हो जाता है और अन्य पदार्थों को अपचयित करता है। अपचायक शक्ति का क्रम HI > HBr > HCl > HF होता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि हाइड्रोआयोडिक अम्ल सबसे अच्छा अपचायक है।
मुख्य बिंदु:
• फ़्लोरिन की इलेक्ट्रॉन बंधुता और मानक अपचयन विभव इसे सबसे शक्तिशाली ऑक्सीकारक बनाते हैं।
• HI में H और I के बीच का बंध सबसे कमजोर होता है, जिससे यह आसानी से हाइड्रोजन और इलेक्ट्रॉन मुक्त करता है।
• अपचायक क्षमता नीचे जाने पर (HF से HI तक) बढ़ती है।
आम गलतियाँ:
• ऑक्सीकारक और अपचायक के क्रम को आपस में मिला देना।
• बंध वियोजन ऊर्जा (Bond dissociation enthalpy) के प्रभाव को नजरअंदाज करना।
• फ़्लोरिन को अपचायक समझ लेना।
Exam Tips:
a) हैलोजन की ऑक्सीकरण क्षमता और उनके हाइड्राइडों की अपचायक क्षमता के दोनों क्रमों को अलग-अलग लिखकर याद करें।
b) HI की प्रबल अपचायक प्रकृति का कारण उसका कमजोर H-I बंध है।
c) रासायनिक समीकरणों के माध्यम से विस्थापन अभिक्रियाओं को दर्शाएँ।
Question 16: निम्नलिखित अभिक्रिया क्या होती है?
XeO₆⁴⁻(aq) + 2F⁻(aq) + 6H⁺(aq) → XeO₃(g) + F₂(g) + 3H₂O(l)
यौगिक Na₄XeO₆ (जिसका एक भाग XeO₆⁴⁻ है) के बारे में आप इस अभिक्रिया में क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं?
Answer:
दी गई अभिक्रिया में XeO₆⁴⁻ आयन F⁻ आयन को F₂ गैस में ऑक्सीकृत कर देता है। इस अभिक्रिया में ज़ेनॉन (Xe) की ऑक्सीकरण संख्या XeO₆⁴⁻ में +8 से घटकर XeO₃ में +6 हो जाती है (अपचयन), जबकि फ़्लोरिन F⁻ में -1 से बढ़कर F₂ में 0 हो जाती है (ऑक्सीकरण)। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि Na₄XeO₆ एक अत्यंत शक्तिशाली ऑक्सीकारक है, जो फ्लोराइड आयन को भी ऑक्सीकृत करने की क्षमता रखता है।
मुख्य बिंदु:
• XeO₆⁴⁻ में ज़ेनॉन अपनी उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था (+8) में रहता है।
• यह F⁻ आयन जैसे प्रबल ऋणायन को भी मुक्त फ़्लोरिन (F₂) में बदल सकता है।
• यह बहुत ही दुर्लभ और प्रबल ऑक्सीकारकों में से एक है।
आम गलतियाँ:
• Xe की ऑक्सीकरण संख्या +8 को गलत गणना के कारण कुछ और मान लेना।
• यह सोचना कि फ्लोराइड आयन आसानी से ऑक्सीकृत हो सकता है।
• ऑक्सीकरण और अपचयन की दिशाओं में भ्रमित होना।
Exam Tips:
a) ज़ेनॉन के यौगिकों की उच्च ऑक्सीकरण अवस्थाओं पर विशेष ध्यान दें।
b) यह बताइए कि यह अभिक्रिया सामान्य ऑक्सीकारकों द्वारा संभव नहीं है, अतः Na₄XeO₆ विशिष्ट है।
c) समीकरण में तत्वों की ऑक्सीकरण संख्याओं के बदलाव को तीर के साथ दर्शाएँ।
Question 17: अभिक्रियाओं पर विचार करें:
(क) H₃PO₂(aq) + 4AgNO₃(aq) + 2H₂O(l) → H₃PO₄(aq) + 4Ag(s) + 4HNO₃(aq)
(ख) H₃PO₂(aq) + 2CuSO₄(aq) + 2H₂O(l) → H₃PO₄(aq) + 2Cu(s) + H₂SO₄(aq)
(ग) C₆H₅CHO(l) + 2[Ag(NH₃)₂]⁺(aq) + 3OH⁻(aq) → C₆H₅COO⁻(aq) + 2Ag(s) + 4NH₃(aq) + 2H₂O(l)
(घ) C₆H₅CHO(l) + 2Cu²⁺(aq) + 5OH⁻(aq) → कोई परिवर्तन नहीं
इन अभिक्रियाओं से आप Ag⁺ और Cu²⁺ के व्यवहार के बारे में क्या निष्कर्ष निकालते हैं?
Answer:
दी गई अभिक्रियाओं (क) और (ख) में Ag⁺ और Cu²⁺ दोनों ही ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करते हैं। अभिक्रिया (ग) में Ag⁺, C₆H₅CHO को बेंजोएट में ऑक्सीकृत कर देता है, किंतु अभिक्रिया (घ) में Cu²⁺, C₆H₅CHO को ऑक्सीकृत नहीं कर पाता। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि Cu²⁺ की तुलना में Ag⁺ अधिक प्रबल ऑक्सीकारक है, क्योंकि यह उन पदार्थों को भी ऑक्सीकृत कर सकता है जिन्हें कॉपर आयन नहीं कर पाता।
मुख्य बिंदु:
• Ag⁺ और Cu²⁺ दोनों संक्रमण धातु आयन हैं जो ऑक्सीकारक का कार्य करते हैं।
• टोलेंस अभिकर्मक (Ag⁺) फेलिंग विलयन (Cu²⁺) की तुलना में अधिक शक्तिशाली ऑक्सीकारक है।
• एल्डिहाइड के ऑक्सीकरण परीक्षण में इस अंतर को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
आम गलतियाँ:
• दोनों धातु आयनों की ऑक्सीकरण क्षमताओं को समान मान लेना।
• यह न समझ पाना कि अभिक्रिया (घ) में परिवर्तन क्यों नहीं हुआ।
• कार्बनिक यौगिकों के ऑक्सीकरण उत्पादों को गलत लिखना।
Exam Tips:
a) टोलेंस परीक्षण और फेलिंग परीक्षण के परिणामों को इस प्रश्न के आधार पर समझें।
b) स्पष्ट करें कि Ag⁺ का अपचयन विभव Cu²⁺ से अधिक होता है।
c) निष्कर्ष को स्पष्ट और वैज्ञानिक शब्दों में लिखें।
Question 18: निम्नलिखित रेडॉक्स अभिक्रियाओं को आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा संतुलित कीजिए:
(क) MnO₄⁻(aq) + I⁻(aq) → MnO₂(s) + I₂(s) (क्षारीय माध्यम में)
(ख) MnO₄⁻(aq) + SO₂(g) → Mn²⁺(aq) + HSO₄⁻(aq) (अम्लीय माध्यम में)
(ग) H₂O₂(aq) + Fe²⁺(aq) → Fe³⁺(aq) + H₂O(l) (अम्लीय माध्यम में)
(घ) Cr₂O₇²⁻(aq) + SO₂(g) → Cr³⁺(aq) + SO₄²⁻(aq) (अम्लीय माध्यम में)
Answer:
(क) क्षारीय माध्यम में MnO₄⁻ और I⁻ की अभिक्रिया की अर्ध-अभिक्रियाएँ लिखकर, ऑक्सीकरण अर्ध-अभिक्रिया को 3 से और अपचयन अर्ध-अभिक्रिया को 2 से गुणा करने तथा OH⁻ आयनों द्वारा आवेश संतुलित करने पर पूर्ण संतुलित समीकरण प्राप्त होता है: 2MnO₄⁻ + I⁻ + H₂O → 2MnO₂ + IO₃⁻ + 2OH⁻ (या मानक प्रारूप अनुसार हल)।
(ख) अम्लीय माध्यम में MnO₄⁻ और SO₂ के लिए ऑक्सीकरण और अपचयन अर्ध-अभिक्रियाओं को उपयुक्त गुणांकों से गुणा करके जोड़ने पर समीकरण संतुलित होती है।
(ग) H₂O₂ और Fe²⁺ की अम्लीय माध्यम की अभिक्रिया में Fe²⁺ का ऑक्सीकरण और H₂O₂ का अपचयन होता है, जिससे संतुलित समीकरण 2Fe²⁺ + H₂O₂ + 2H⁺ → 2Fe³⁺ + 2H₂O प्राप्त होती है।
(घ) डाइक्रोमेट आयन (Cr₂O₇²⁻) और SO₂ की अम्लीय माध्यम में अभिक्रिया के लिए Cr का अपचयन (+6 से +3) और S का ऑक्सीकरण (+4 से +6) कराके आयन-इलेक्ट्रॉन विधि से संतुलित करते हैं।
मुख्य बिंदु:
• आयन-इलेक्ट्रॉन विधि में पहले समीकरण को दो अर्ध-अभिक्रियाओं (ऑक्सीकरण और अपचयन) में तोड़ते हैं।
• अम्लीय माध्यम में O परमाणुओं को संतुलित करने के लिए H₂O और H⁺ जोड़े जाते हैं।
• क्षारीय माध्यम में O परमाणुओं को संतुलित करने के लिए H₂O और OH⁻ जोड़े जाते हैं।
आम गलतियाँ:
• इलेक्ट्रॉन की संख्या दोनों अर्ध-अभिक्रियाओं में बराबर किए बिना जोड़ देना।
• माध्यम (अम्लीय या क्षारीय) के अनुसार H⁺ या OH⁻ का गलत चयन करना।
• परमाणु संतुलन (Mass balance) और आवेश संतुलन (Charge balance) में गलती करना.
Exam Tips:
a) आयन-इलेक्ट्रॉन संतुलन के चरणों (Steps) को क्रम से याद रखें - पहले परमाणु, फिर इलेक्ट्रॉन, फिर माध्यम के अनुसार आयन।
b) परीक्षा में प्रत्येक चरण को स्पष्ट रूप से दिखाएं ताकि अंक न कटें।
c) अंतिम समीकरण में दोनों पक्षों का कुल आवेश और परमाणु संख्या जरूर जाँच लें।
Question 19: निम्नलिखित अभिक्रियाओं के समीकरणों को आयन इलेक्ट्रॉन तथा ऑक्सीकरण-संख्या विधि (क्षारीय माध्यम में) द्वारा संतुलित कीजिए तथा इनमें ऑक्सीकरण और अपचायकों की पहचान कीजिए:
(क) P₄(s) + OH⁻(aq) → PH₃(g) + HPO₂⁻(aq)
(ख) N₂H₄(l) + ClO₃⁻(aq) → NO(g) + Cl⁻(g)
(ग) Cl₂O₇(g) + H₂O₂(aq) → ClO₂⁻(aq) + O₂(g) + H⁺
Answer:
(क) इस असमाचनुपातन (Disproportionation) अभिक्रिया में फास्फोरस (P₄) का ऑक्सीकरण और अपचयन दोनों होता है। P₄ की ऑक्सीकरण संख्या 0 से घटकर PH₃ में -3 और बढ़कर HPO₂⁻ में +2 हो जाती है। अतः यह ऑक्सीकारक और अपचायक दोनों का कार्य करता है। आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा संतुलित समीकरण: P₄ + 3OH⁻ + 3H₂O → PH₃ + 3H₂PO₂⁻ (या समकक्ष)।
(ख) N₂H₄ में N की ऑक्सीकरण संख्या -2 से बढ़कर NO में +2 हो जाती है (ऑक्सीकरण), और ClO₃⁻ में Cl की +5 से घटकर Cl⁻ में -1 हो जाती है (अपचयन)। यहाँ N₂H₄ अपचायक है और ClO₃⁻ ऑक्सीकारक है।
(ग) Cl₂O₇ और H₂O₂ की अभिक्रिया में क्लोरीन का अपचयन और ऑक्सीजन का ऑक्सीकरण होता है, जिससे संतुलित रेडॉक्स समीकरण प्राप्त होती है।
मुख्य बिंदु:
• असमाचनुपातन अभिक्रियाओं में एक ही तत्व का ऑक्सीकरण और अपचयन दोनों होता है।
• क्षारीय माध्यम में समीकरण संतुलित करते समय अंत में जल और हाइड्रॉक्साइड आयन जोड़े जाते हैं।
• ऑक्सीकरण संख्या विधि और आयन-इलेक्ट्रॉन विधि दोनों से उत्तर समान आना चाहिए।
आम गलतियाँ:
• असमाचनुपातन अभिक्रियाओं में अभिकारक को दो बार अलग-अलग न लिखना।
• क्षारीय माध्यम में H⁺ आयन का प्रयोग कर देना (क्षारीय में केवल OH⁻ का प्रयोग होता है)।
• इलेक्ट्रॉन विनिमय की संख्या गलत गिनना।
Exam Tips:
a) यदि एक ही तत्व ऑक्सीकृत और अपचयित हो रहा हो, तो उसे विशेष ध्यान से अलग करके संतुलित करें।
b) दोनों विधियों (आयन-इलेक्ट्रॉन और ऑक्सीकरण अंक) का अभ्यास करें क्योंकि प्रश्न में विधि पूछी जा सकती है।
c) संतुलित समीकरण का अंतिम सत्यापन अवश्य करें।
Question 20: निम्नलिखित अभिक्रिया से आप कौन सी सूचनाएँ प्राप्त कर सकते हैं:
(CN)₂(g) + 2OH⁻(aq) → CN⁻(aq) + CNO⁻(aq) + H₂O(l)
Answer:
इस अभिक्रिया में सायनोजेन ((CN)₂) की क्षार के साथ अभिक्रिया दी गई है। (CN)₂ में कार्बन की ऑक्सीकरण संख्या +3 है। अभिक्रिया के दौरान यह CN⁻ (जहाँ C की ऑक्सीकरण संख्या +2 है) और CNO⁻ (जहाँ C की ऑक्सीकरण संख्या +4 है) में बदल जाता है। इससे यह सूचना मिलती है कि यह एक असमाचनुपातन (Disproportionation) अभिक्रिया है, जिसमें एक ही पदार्थ का एक साथ अपचयन (+3 से +2) और ऑक्सीकरण (+3 से +4) होता है।
मुख्य बिंदु:
• सायनोजेन की क्षारीय माध्यम में यह एक विशिष्ट असमाचनुपातन अभिक्रिया है।
• कार्बन की ऑक्सीकरण अवस्था +3 से +2 (अपचयन) और +4 (ऑक्सीकरण) में विभाजित होती है।
• यह प्रदर्शित करता है कि कुछ यौगिक क्षारीय माध्यम में असमानुपातित हो जाते हैं।
आम गलतियाँ:
• CN⁻ और CNO⁻ में कार्बन की ऑक्सीकरण संख्या की गलत गणना करना।
• इसे सामान्य उदासीनीकरण अभिक्रिया मान लेना।
• असमानुपातन (Disproportionation) की परिभाषा को भूल जाना।
Exam Tips:
a) ऑक्सीकरण संख्या में होने वाले परिवर्तन (+3 से +2 और +4) को स्पष्ट रूप से दर्शाएँ।
b) यह बताएँ कि यह स्वतः होने वाली रेडॉक्स और असमानुपातन अभिक्रिया है।
c) उत्तर को संक्षिप्त और तार्किक रखें।
Question 21: Mn³⁺ आयन विलयन में अस्थायी होता है तथा असमानुपातन द्वारा Mn²⁺, MnO₂ और H⁺ आयन देता है। इस अभिक्रिया के लिए संतुलित आयनिक समीकरण लिखिए।
Answer:
जब Mn³⁺ विलयन में होता है तो यह असमानुपातिक होकर Mn²⁺ और MnO₂ बनाता है। इसके लिए ऑक्सीकरण अर्ध-अभिक्रिया (Mn³⁺ → MnO₂) और अपचयन अर्ध-अभिक्रिया (Mn³⁺ → Mn²⁺) को लिखकर संतुलित करते हैं। ऑक्सीकरण अर्ध-अभिक्रिया को संतुलित करने पर और दोनों को जोड़ने पर अंतिम संतुलित आयनिक समीकरण प्राप्त होती है:
2Mn³⁺(aq) + 2H₂O(l) → MnO₂(s) + Mn²⁺(aq) + 4H⁺(aq)।
मुख्य बिंदु:
• Mn³⁺ एक अस्थायी प्रजाति है जो असमानुपातन दर्शाती है।
• इस अभिक्रिया में Mn की +3 अवस्था +4 (MnO₂) और +2 (Mn²⁺) में बदल जाती है।
• अम्लीय माध्यम में यह प्रक्रिया स्वतः होती है।
आम गलतियाँ:
• जल के अणुओं और हाइड्रोजन आयनों (H⁺) की संख्या को संतुलित करने में भूल करना।
• Mn³⁺ के दोनों उत्पादों (Mn²⁺ और MnO₂) को सही stoichiometry में न रखना।
• आवेश संतुलन की उपेक्षा करना।
Exam Tips:
a) असमानुपातन अभिक्रियाओं के लिए अभिकारकों को एक तरफ लिखकर उत्पादों को दो अलग रूपों में दर्शाएँ।
b) अर्ध-अभिक्रिया विधि का उपयोग करके समीकरण को चरणबद्ध तरीके से संतुलित करें।
c) अंतिम समीकरण में द्रव्यमान और आवेश दोनों का संरक्षण सुनिश्चित करें।
Question 22: Cs, Ne, I तथा F में ऐसे तत्त्व की पहचान कीजिए, जो
(क) केवल ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ख) केवल धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ग) ऋणात्मक तथा धनात्मक दोनों ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(घ) न ऋणात्मक और न ही धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
Answer:
(क) फ्लोरीन (F) केवल -1 की ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है क्योंकि यह सबसे अधिक विद्युत ऋणात्मक तत्व है।
(ख) सीजियम (Cs) केवल +1 की धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है क्योंकि यह एक क्षार धातु है।
(ग) आयोडीन (I) ऋणात्मक तथा धनात्मक दोनों ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है (जैसे -1, +1, +3, +5, +7)।
(घ) नियॉन (Ne) की ऑक्सीकरण अवस्था शून्य है, यह न तो ऋणात्मक और न ही धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है क्योंकि यह एक अक्रिय (नोबल) गैस है।
मुख्य बिंदु:
• आवर्त सारणी में तत्वों की स्थिति उनकी ऑक्सीकरण अवस्थाओं को निर्धारित करती है।
• हैलोजन में फ्लोरीन एकमात्र ऐसा तत्व है जो कभी धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था नहीं दर्शाता।
• उत्कृष्ट गैसें (Noble gases) सामान्यतः शून्य ऑक्सीकरण अवस्था रखती हैं।
आम गलतियाँ:
• अन्य हैलोजन (जैसे Cl, Br, I) के साथ फ्लोरीन के गुणों को मिला देना।
• क्षार धातुओं में धनात्मक के साथ कोई अन्य अवस्था सोच लेना।
• अक्रिय गैसों के लिए ऑक्सीकरण संख्या कुछ और मान लेना।
Exam Tips:
a) तत्वों के आवर्ती गुणों (Periodic properties) के आधार पर इस प्रश्न को याद रखें।
b) F = केवल -1, Cs = केवल +1, I = दोनों, Ne = शून्य - यह संक्षिप्त कुंजी याद रखें।
c) यह बहुविकल्पीय या लघु उत्तरीय प्रश्न के रूप में अक्सर आता है।
Question 23: जल के शुद्धिकरण में क्लोरीन का प्रयोग में लाया जाता है। क्लोरीन की अधिकता हानिकारक होती है। सल्फरडाइऑक्साइड से अभिक्रिया करके इस अधिकता को दूर किया जाता है। जल में होने वाले इस अपचयोपचय परिवर्तन के लिए संतुलित समीकरण लिखिए।
Answer:
जल के शुद्धिकरण के बाद बची हुई हानिकारक क्लोरीन (Cl₂) को हटाने के लिए सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) का उपयोग किया जाता है। इस रेडॉक्स अभिक्रिया में क्लोरीन का अपचयन क्लोराइड आयन (Cl⁻) में होता है और सल्फर डाइऑक्साइड का ऑक्सीकरण सल्फेट आयन (SO₄²⁻) में होता है। जल की उपस्थिति में होने वाली संतुलित रेडॉक्स समीकरण इस प्रकार है:
Cl₂(g) + SO₂(g) + 2H₂O(l) → 2Cl⁻(aq) + SO₄²⁻(aq) + 4H⁺(aq)।
मुख्य बिंदु:
• क्लोरीन जल को रोगाणुमुक्त करती है, किंतु उसकी अतिरिक्त मात्रा जहरीली होती है।
• SO₂ एक अपचायक के रूप में अतिरिक्त क्लोरीन को निष्प्रभावी कर देती है।
• यह एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक रेडॉक्स अभिक्रिया है।
आम गलतियाँ:
• समीकरण में जल (H₂O) की भूमिका को भूल जाना।
• Cl₂ और SO₂ के ऑक्सीकरण-अपचयन उत्पादों को गलत लिखना।
• आवेश और हाइड्रोजन आयनों को संतुलित न करना।
Exam Tips:
a) दैनिक जीवन से जुड़ी इस रासायनिक प्रक्रिया को समीकरण सहित अच्छी तरह तैयार करें।
b) स्पष्ट करें कि क्लोरीन ऑक्सीकारक है और SO₂ अपचायक है।
c) संतुलित समीकरण लिखते समय H⁺ आयनों को सही स्थान दें।
Question 24: इस पुस्तक में दी गई आवर्त सारणी की सहायता से निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
(क) संभावित अधातुओं के नाम बताइए, जो असमानुपातन की अभिक्रिया प्रदर्शित कर सकती हों।
(ख) किन्हीं तीन धातुओं के नाम बताइए, जो असमानुपातन अभिक्रिया प्रदर्शित कर सकती हों।
Answer:
(क) असमानुपातन (Disproportionation) अभिक्रियाओं में भाग लेने वाले पदार्थों में ऐसा तत्व होना चाहिए जो कम से कम तीन ऑक्सीकरण अवस्थाओं में मौजूद हो सके। अधातुओं में P, Cl, और S ऐसे तत्व हैं जो असमानुपातन अभिक्रियाएँ दिखा सकते हैं क्योंकि ये तीन या अधिक ऑक्सीकरण अवस्थाओं में रह सकते हैं।
(ख) धातुओं में Cu, Mn, और Ga असमानुपातन अभिक्रिया दिखा सकते हैं क्योंकि ये भी एक से अधिक (तीन या अधिक) ऑक्सीकरण अवस्थाओं में मौजूद हो सकते हैं।
मुख्य बिंदु:
• असमानुपातन के लिए तत्व के पास न्यूनतम तीन ऑक्सीकरण अवस्थाएँ होने की शर्त आवश्यक है।
• फॉस्फोरस, क्लोरीन, सल्फर (अधातुएँ) और कॉपर, मैंगनीज (धातुएँ) इसके बेहतरीन उदाहरण हैं।
• यह आवर्त सारणी के तत्वों की परिवर्ती संयोजकता पर आधारित है।
आम गलतियाँ:
• ऐसे तत्वों को चुन लेना जिनकी ऑक्सीकरण अवस्थाएँ केवल दो ही होती हैं।
• धातु और अधातु के वर्गीकरण में भ्रमित होना।
• कारण स्पष्ट किए बिना केवल नाम लिखकर छोड़ देना।
Exam Tips:
a) असमानुपातन की मूल शर्त (कम से कम तीन ऑक्सीकरण अवस्थाएँ) हमेशा याद रखें।
b) धातु और अधातु दोनों श्रेणियों के 2-3 उदाहरण कंठस्थ रखें।
c) उत्तर को तार्किक और स्पष्ट रूप से लिखें।
Question 25: नाइट्रिक अम्ल निर्माण की ओस्टवाल्ड विधि के प्रथम पद में अमोनिया गैस के ऑक्सीजन गैस द्वारा ऑक्सीकरण से नाइट्रिक ऑक्साइड गैस तथा जलवाष्प बनती है। 10.0 ग्राम अमोनिया तथा 20.0 ग्राम ऑक्सीजन द्वारा नाइट्रिक ऑक्साइड की कितनी अधिकतम मात्रा प्राप्त हो सकती है?
Answer:
ऑस्टवाल्ड विधि के प्रथम पद की संतुलित समीकरण है:
4NH₃(g) + 5O₂(g) → 4NO(g) + 6H₂O(g)
यहाँ 4 × 17 = 68 ग्राम NH₃, 5 × 32 = 160 ग्राम O₂ के साथ क्रिया करके 4 × 30 = 120 ग्राम NO बनाता है।
दी गई मात्रा के अनुसार, 10 ग्राम NH₃ के लिए आवश्यक O₂ = (160 × 10) / 68 = 23.53 ग्राम है, किंतु O₂ की उपलब्ध मात्रा केवल 20.0 ग्राम है। इसलिए ऑक्सीजन (O₂) यहाँ सीमांत अभिकर्मक (Limiting reagent) है।
अब 160 ग्राम O₂ से 120 ग्राम NO प्राप्त होती है, अतः 20.0 ग्राम O₂ से प्राप्त NO की मात्रा = (120 × 20) / 160 = 15 ग्राम होगी।
अतः अधिकतम 15 ग्राम नाइट्रिक ऑक्साइड प्राप्त की जा सकती है।
मुख्य बिंदु:
• सीमांत अभिकर्मक (Limiting Reagent) तय करता है कि उत्पाद की कितनी मात्रा बनेगी।
• अभिक्रिया की स्टोइकोमेट्री (Stoichiometry) के आधार पर द्रव्यमान की गणना की जाती है।
• अमोनिया और ऑक्सीजन के मोल अनुपात का ध्यान रखना आवश्यक है।
आम गलतियाँ:
• सीमांत अभिकर्मक की पहचान किए बिना सीधे अमोनिया से उत्पाद निकाल लेना।
• मोलर द्रव्यमान (Molar mass) की गणना में गलती करना।
• समीकरण के गुणांकों (Stoichiometric coefficients) को अनुपात में न लेना।
Exam Tips:
a) ऐसे संख्यात्मक प्रश्नों में पहले समीकरण को संतुलित करें और मोलर द्रव्यमान सही निकालें।
b) सीमांत अभिकर्मक निकालने के लिए दोनों अभिकारकों की तुलना करें।
c) अंत में इकाई (ग्राम) लिखना न भूलें।
Question 26: सारणी 7-1 में दिए गए मानक विभवों की सहायता से अनुमान लगाइए कि क्या इन अभिकारकों के बीच अभिक्रिया संभव है:
(क) Fe³⁺(aq) तथा I⁻(aq)
(ख) Ag⁺(aq) तथा Cu(s)
(ग) Fe³⁺(aq) तथा Cu(s)
(घ) Ag(s) तथा Fe³⁺(aq)
(ङ) Br₂(aq) तथा Fe²⁺(aq)
Answer:
(क) Fe³⁺ और I⁻ के बीच संभावित अभिक्रिया में Fe³⁺ का अपचयन और I⁻ का ऑक्सीकरण होता है, जिसके लिए मानक सेल विभव (E°) धनात्मक आता है, अतः यह अभिक्रिया संभव है।
(ख) Ag⁺ और Cu के बीच अभिक्रिया में कॉपर सिल्वर आयन को विस्थापित करता है और E° धनात्मक होता है, अतः यह अभिक्रिया संभव है।
(ग) Fe³⁺ और Cu के बीच अभिक्रिया में भी E° धनात्मक प्राप्त होता है, अतः यह अभिक्रिया संभव है।
(घ) Ag(s) और Fe³⁺ के बीच संभावित अभिक्रिया के लिए मानक सेल विभव E° ऋणात्मक आता है, अतः Ag और Fe³⁺ के बीच अभिक्रिया संभव नहीं है।
(ङ) Br₂ और Fe²⁺ के बीच अभिक्रिया में E° धनात्मक होता है, अतः Br₂ द्वारा Fe²⁺ का ऑक्सीकरण संभव है (अभियान संभव है)।
मुख्य बिंदु:
• किसी रेडॉक्स अभिक्रिया के स्वतः होने के लिए कुल सेल विभव (E° cell) का मान धनात्मक होना चाहिए।
• मानक अपचयन विभव (Standard reduction potential) की तालिका का उपयोग करके E°_cell = E°_cathode - E°_anode निकाला जाता है।
• ऋणात्मक E° का अर्थ है कि अभिक्रिया स्वतः संभव नहीं है।
आम गलतियाँ:
• एनोड और कैथोड के विभवों को आपस में घटाते समय चिह्नों की गलती करना।
• E° का मान ऋणात्मक आने पर भी अभिक्रिया संभव बता देना।
• ऑक्सीकरण और अपचयन अर्ध-सेल को गलत पहचानना।
Exam Tips:
a) नियम याद रखें: E°_cell धनात्मक = अभिक्रिया संभव (स्वतः), E°_cell ऋणात्मक = अभिक्रिया संभव नहीं।
b) मानक अपचयन विभव के मानों को सही ढंग से सूत्र में रखें।
c) प्रत्येक भाग के लिए कैथोड और एनोड स्पष्ट करें।
Question 27: निम्नलिखित में से प्रत्येक के विद्युत-अपघटन से प्राप्त उत्पादों के नाम बताइए:
(क) सिल्वर नाइट्रेट का जलীয় विलयन
(ख) प्लेटिनम इलेक्ट्रोड के साथ AgNO₃ का जलीय विलयन
(ग) प्लेटिनम इलेक्ट्रोड के साथ H₂SO₄ का तनु विलयन
(घ) प्लेटिनम इलेक्ट्रोड के साथ CuCl₂ का जलीय विलयन
Answer:
(क) AgNO₃ के जलीय विलयन के विद्युत-अपघटन में कैथोड पर सिल्वर (Ag) धातु निक्षेपित होती है और एनोड पर ऑक्सीजन (O₂) गैस मुक्त होती है (सिल्वर इलेक्ट्रोड होने पर Ag एनोड पर घुलता है)।
(ख) प्लेटिनम इलेक्ट्रोड के साथ AgNO₃ के जलीय विलयन में कैथोड पर Ag निक्षेपित होता है और एनोड पर जल के ऑक्सीकरण से O₂ गैस मुक्त होती है।
(ग) प्लेटिनम इलेक्ट्रोड के साथ H₂SO₄ के तनु विलयन के विद्युत-अपघटन में कैथोड पर हाइड्रोजन (H₂) गैस और एनोड पर ऑक्सीजन (O₂) गैस मुक्त होती है।
(घ) प्लेटिनम इलेक्ट्रोड के साथ CuCl₂ के जलीय विलयन में कैथोड पर कॉपर (Cu) धातु निक्षेपित होती है और एनोड पर क्लोरीन (Cl₂) गैस मुक्त होती है।
मुख्य बिंदु:
• विद्युत-अपघटन के उत्पाद इเลक्ट्रोड की प्रकृति (अक्रिय या सक्रिय) और आयनों के अपचयन/ऑक्सीकरण विभव पर निर्भर करते हैं।
• कम अपचयन विभव वाले आREFERENCES आयन पहले कैथोड पर अपचयित होते हैं।
• ओवरवोल्टेज (Overpotential) के कारण जलीय विलयनों में कुछ गैसों का मुक्त होना बदल जाता है।
आम गलतियाँ:
• सक्रिय और अक्रिय इलेक्ट्रोड के प्रभाव को एक जैसा मान लेना।
• एनोड पर क्लोरीन के बजाय हमेशा ऑक्सीजन निकाल देना (सांद्रता का प्रभाव भूल जाना)।
• कैथोड और एनोड की अभिक्रियाओं को उल्टा लिख देना।
Exam Tips:
a) विद्युत-अपघटन के उत्पादों को याद रखने के लिए डिस्चार्ज पोटेंशियल (Discharge potential) के क्रम को समझें।
b) प्लैटिनम (अक्रिय) और Ag/Cu (सक्रिय) इलेक्ट्रोड के अंतर को स्पष्ट रूप से याद रखें।
c) यह प्रश्न वैعايةनात्मक और प्रायोगिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
Question 28: निम्नलिखित धातुओं को उनके लवणों के विलयन में से विस्थापन की क्षमता के क्रम में लिखिए:
Al, Cu, Fe, Mg और Zn
Answer:
धातुओं की अपचायक शक्ति और उनकी सक्रियता (विद्युत रासायनिक श्रेणी) के आधार पर उनका क्रम तय होता है। प्रबल अपचायक शक्ति वाली धातु अपने लवण के विलयन से दुर्बल अपचायक शक्ति वाली दूसरी धातु को विस्थापित कर देती है। दी गई धातुओं की बढ़ती हुई अपचायक शक्ति और विस्थापन क्षमता का क्रम इस प्रकार है:
Cu < Fe < Zn < Al < Mg (या विस्थापन का क्रम: Mg > Al > Zn > Fe > Cu)।
मुख्य बिंदु:
• सक्रियता श्रेणी (Reactivity Series) में जो धातु जितनी ऊपर होती है, उसकी अपचायक क्षमता उतनी ही अधिक होती है।
• अधिक सक्रिय धातु अपने से नीचे की कम सक्रिय धातु को उसके लवण विलयन से विस्थापित कर देती है।
• कॉपर सबसे कम सक्रिय और मैग्नीशियम सबसे अधिक सक्रिय है।
आम गलतियाँ:
• सक्रियता श्रेणी के क्रम को उल्टा लिख देना।
• विस्थापन के नियमों में कौन किसको हटाएगा, इसमें भ्रमित होना।
• Zn, Fe और Al के सही क्रम को भूल जाना।
Exam Tips:
a) सक्रियता श्रेणी (K, Na, Ca, Mg, Al, Zn, Fe, Pb, H, Cu, Hg, Ag, Au) को क्रमानुसार याद रखें।
b) विस्थापन अभिक्रिया तभी संभव है जब धातु श्रेणी में ऊपर हो।
c) उत्तर को बढ़ते या घटते क्रम में स्पष्ट रूप से दर्शाएँ।
Question 29: नीचे दिए गए मानक इलेक्ट्रोड विभवों के आधार पर धातुओं को उनकी बढ़ती अपचायक क्षमता के क्रम में लिखिए:
K⁺/K = -2.93V, Ag⁺/Ag = 0.80V
Hg²⁺/Hg = 0.79V
Mg²⁺/Mg = -2.37V, Cr³⁺/Cr = -0.74V
Answer:
इलेक्ट्रोड विभव का मान जितना ऋणात्मक होता है, उस स्पीशीज की अपचायक क्षमता उतनी ही अधिक होती है। दिए गए मानक अपचयन विभवों के मान इस प्रकार हैं: Ag⁺ (0.80V), Hg²⁺ (0.79V), Cr³⁺ (-0.74V), Mg²⁺ (-2.37V), K⁺ (-2.93V)। चूँकि अपचायक क्षमता विभव के ऋणात्मक मान बढ़ने के साथ बढ़ती है, अतः धातुओं की बढ़ती हुई अपचायक क्षमता का क्रम होगा:
Ag < Hg < Cr < Mg < K
मुख्य बिंदु:
• मानक अपचयन विभव जितना कम (ऋणात्मक) होगा, तत्व उतना ही प्रबल अपचायक होगा।
• मानक अपचयन विभव जितना अधिक (धनात्मक) होगा, तत्व उतना ही प्रबल ऑक्सीकारक होगा।
• पोटैशियम (K) सबसे प्रबल अपचायक और सिल्वर (Ag) सबसे दुर्बल अपचायक है।
आम गलतियाँ:
• धनात्मक और ऋणात्मक विभवों के आधार पर क्षमता का क्रम उल्टा लिख देना।
• अपचायक क्षमता और ऑक्सीकारक क्षमता को एक ही समझ लेना।
• मानों की तुलना करते समय गणितीय चिह्नों में गलती करना।
Exam Tips:
a) मुख्य नियम याद रखें: निम्नतम अपचयन विभव = अधिकतम अपचायक क्षमता।
b) मानों को पहले आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित करें, फिर धातु का क्रम लिखें।
c) यह वैचारिक प्रश्न परीक्षा में प्रायः अंकों के लिए पूछा जाता है।
Question 30: उस गैल्वेनी सेल को चित्रित कीजिए, जिसमें निम्नलिखित अभिक्रिया होती है:
Zn(s) + 2Ag⁺(aq) → Zn²⁺(aq) + 2Ag(s)
अब बताइए कि-
(क) कौन सा इलेक्ट्रोड ऋण आवेशित है?
(ख) सेल में विद्युतधारा के वाहक कौन हैं?
(ग) प्रत्येक इलेक्ट्रोड पर होने वाली अभिक्रियाएँ क्या हैं?
Answer:
दी गई रेडॉक्स अभिक्रिया से संबंधित गैल्वेनी सेल (डैनियल सेल के रूप में) का निरूपण इस प्रकार है:
Zn(s) | Zn²⁺(aq) || Ag⁺(aq) | Ag(s)
(क) जिंक (Zn) इलेक्ट्रोड ऋण आवेशित होता है क्योंकि इस पर ऑक्सीकरण होकर इलेक्ट्रॉन मुक्त होते हैं।
(ख) सेल में बाहरी परिपथ में विद्युतधारा के वाहक इलेक्ट्रॉन हैं और आंतरिक विलयन में वाहक आयन हैं।
(ग) प्रत्येक इलेक्ट्रोड पर होने वाली अभिक्रियाएँ:
एनोड पर (ऑक्सीकरण): Zn(s) → Zn²⁺(aq) + 2e⁻
कैथोड पर (अपचयन): Ag⁺(aq) + e⁻ → Ag(s)
मुख्य बिंदु:
• गैल्वेनी सेल में एनोड ऋणात्मक और कैथोड धनात्मक होता है।
• ऑक्सीकरण हमेशा एनोड पर और अपचयन हमेशा कैथोड पर होता है।
• इलेक्ट्रॉन का प्रवाह एनोड से कैथोड की ओर होता है।
आम गलतियाँ:
• गैल्वेनी सेल में एनोड और कैथोड के आवेशों को विद्युत अपघटनी सेल जैसा समझ लेना।
• अर्ध-अभिक्रियाओं को गलत इलेक्ट्रोड पर दर्शा देना।
• सेल निरूपण (Cell notation) के नियमों की अवहेलना करना।
Exam Tips:
a) सेल निरूपण का मानक तरीका याद रखें: Anode | Anode ion || Cathode ion | Cathode.
b) 'लोन' (LOAN - Left, Oxidation, Anode, Negative) का नियम गैल्वेनी सेल के लिए याद रखें।
c) एनोड और कैथोड की अलग-अलग समीकरणें स्पष्ट रूप से लिखें।
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