Step-by-Step Textbook Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 09 हाइड्रोकार्बन
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Question 1: मेथेन के क्लोरीनीकरण के दौरान एथेन कैसे बनती है? आप इसे कैसे समझाएँगे।
Answer:
मेथेन का क्लोरीनीकरण एक मुक्त-मूलक तंत्र के जरिए होता है, जिसमें मुख्य रूप से तीन चरण होते हैं: प्रारम्भन, संचरण और समापन। प्रारंभन चरण में क्लोरीन अणु का समांगी विदलन होकर क्लोरीन मुक्त-मूलक बनते हैं। संचरण चरण में क्लोरीन मुक्त-मूलक मेथेन पर आक्रमण करके C-H आबंध को तोड़ते हैं और मेथिल मुक्त-मूलक तथा हाइड्रोजन क्लोराइड बनाते हैं। यह मेथिल मुक्त-मूलक अन्य क्लोरीन अणु के साथ अभिक्रिया करके मेथिल क्लोराइड और नया क्लोरीन मुक्त-मूलक बनाता है। इसी प्रकार की श्रृंखला अभिक्रिया से डाइक्लोरोमेथेन, ट्राइक्लोरोमेथेन और टेट्राक्लोरोमेथेन बनते हैं। श्रृंखला समापन चरण के दौरान, विभिन्न मुक्त-मूलक आपस में मिलकर उप-उत्पाद बनाते हैं। जब दो मेथिल मुक्त-मूलक आपस में जुड़ते हैं, तो एथेन का अणु बनता है। यही कारण है कि मेथेन के क्लोरीनीकरण के उप-उत्पाद के रूप में थोड़ी मात्रा में एथेन प्राप्त होती है।
मुख्य बिंदु:
• क्लोरीनीकरण अभिक्रिया मुक्त-मूलक क्रियाविधि द्वारा होती है जिसमें प्रारम्भन, संचरण और समापन पद शामिल हैं।
• संचरण चरण में मेथिल मुक्त-मूलक बनते हैं जो आगे अभिक्रिया करके क्लोरोमेथेन बनाते हैं।
• समापन चरण में दो मेथिल मुक्त-मूलक मिलकर सममित एल्केन यानी एथेन का निर्माण करते हैं।
आम गलतियाँ:
• यह सोचना कि क्लोरीनीकरण केवल एक चरण में होने वाली सीधी आयनिक अभिक्रिया है।
• समापन चरण में बनने वाले उप-उत्पादों की उपेक्षा करना।
• मुक्त-मूलक की संरचना और उनके संयोजन को स्पष्ट न करना।
Exam Tips:
a) अभिक्रिया के तीनों चरणों (प्रारम्भन, संचरण, समापन) को रासायनिक समीकरण सहित स्पष्ट रूप से लिखें।
b) मुक्त-मूलक को दर्शाने के लिए ऊपर एक छोटे बिंदु (डॉट) का सही उपयोग करें।
c) एथेन के निर्माण का कारण समापन चरण में दो मेथिल मूलकों का संयोजन बताना न भूलें।
Question 2: निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए:
(क) CH3 CH = C(CH3)2
(ख) CH3 - C = C - C - CH3
(ग) साइक्लिक संरचनायुक्त यौगिक
(घ) बेन्जीन वलय से जुड़ी श्रृंखला
(च) फीनॉल व्युत्पन्न
(छ) दीर्घ श्रृंखला हाइड्रोकार्बन
(ज) जटिल अल्काइल श्रृंखलायुक्त यौगिक
Answer:
दिए गए यौगिकों के IUPAC नाम उनके संरचनात्मक सूत्रों के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं। (क) का नाम 2-मिथाइलबूट-2-ईन है क्योंकि सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला 4 कार्बन की है और दूसरे कार्बन पर द्विआबंध तथा एक मिथाइल समूह जुड़ा है। (ख) का नाम पेंट-1-इन-3-यैन है जिसमें द्विआबंध और त्रिआबंध दोनों उपस्थित हैं। (ग) का नाम 1, 3-ब्यूटाडाइन या ब्यूटा-1, 3-डाइन है। (घ) का नाम 4-फिनाइल बूट-1-ईन है। (च) का नाम 2-मिथाइल फीनॉल है। (छ) का नाम 5-(2-मिथाइलप्रोपाइल)-डिकेन है। (ज) का नाम 4-इथाइलअंडेका-1, 5, 8-ट्राइन है। इन सभी नामों में न्यूनतम लोकैंट नियम और प्राथमिकता क्रम (द्विआबंध और त्रिआबंध के लिए) का पालन किया गया है।
मुख्य बिंदु:
• सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला का चयन करना और क्रियात्मक समूहों को न्यूनतम अंक देना IUPAC नामकरण का मुख्य नियम है।
• द्विआबंध (-ईन) और त्रिआबंध (-आइन) दोनों होने पर वर्णमाला क्रम या नियमों के अनुसार प्राथमिकता दी जाती है।
• प्रतिस्थापियों के नाम वर्णमाला क्रम में लिखे जाते हैं।
आम गलतियाँ:
• श्रृंखला का चयन करते समय गलत दिशा से अंकन करना जिससे लोकैंट बढ़ जाए।
• 'ईन' और 'आين' के प्रत्यय लगाते समय वर्तनी या अंकों की स्थिति की गलती करना।
• प्रतिस्थापियों का नाम वर्णमाला क्रम के अनुसार न लिखना।
Exam Tips:
a) सबसे पहले मुख्य कार्बन श्रृंखला को पहचानें और उसके बाद प्रतिस्थापियों को रेखांकित करें।
b) अंकन हमेशा उस सिरे से करें जिधर से द्विआबंध या त्रिआबंध को कम से कम अंक मिले।
c) दीर्घ श्रृंखला वाले यौगिकों में ब्रैकेट का सही उपयोग करके उप-शाखाओं को स्पष्ट करें।
Question 3: निम्नलिखित यौगिकों, जिनमें द्विआबंध तथा त्रिआबंध की संख्या दर्शायी गई है, के सभी संभावित स्थिति समावयवों के संरचना-सूत्र एवं IUPAC नाम दीजिए:
(क) C5H8 (एक द्विआबंध)
(ख) C5H8 (एक त्रिआबंध)
Answer:
अणुसूत्र C5H8 वाले यौगिकों के लिए स्थिति समावयव निम्नलिखित हैं। (क) एक द्विआबंध वाले C5H8 (पेंटेन के समावयव) के तीन संरचनात्मक समावयव संभव हैं: (i) पेंट-1-ईन (CH2 = CH - CH2 - CH2 - CH3), (ii) पेंट-2-ईन (CH3 - CH = CH - CH2 - CH3), और (iii) 2-मिथाइलप्रोप-1-ईन (या 2-मिथाइलबूट-1-ईन संरचना के अनुसार)। (ख) एक त्रिआबंध वाले C5H8 के भी तीन संरचनात्मक समावयव संभव हैं: (i) पेंट-1-यैन (HC ≡ C - CH2 - CH2 - CH3), (ii) पेंट-2-यैन (H3C - C ≡ C - CH2 - CH3), और (iii) 3-मिथाइलबूट-1-यैन (H3C - CH(CH3) - C ≡ CH)। इन सभी यौगिकों में कार्बन की कुल संख्या 5 और हाइड्रोजन की कुल संख्या 8 है, लेकिन असंतृप्ति की स्थिति भिन्न है।
मुख्य बिंदु:
• स्थिति समावयवता में कार्बन कंकाल समान रहता है लेकिन द्विआबंध या त्रिआबंध की स्थिति बदल जाती है।
• C5H8 का सामान्य सूत्र CnH2n-2 है, जो एल्काइन या डाइन को दर्शाता है।
• प्रत्येक समावयव का IUPAC नाम उसकी संरचना के आधार पर अद्वितीय होता है।
आम गलतियाँ:
• हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या की गणना में गलती करना।
• एक ही यौगिक को अलग नाम से दोबारा लिख देना (पुनरावृत्ति करना)।
• श्रृंखला समावयवता और स्थिति समावयवता में अंतर न समझ पाना।
Exam Tips:
a) समावयव बनाते समय पहले सीधी श्रृंखला बनाएं और फिर द्विआबंध/त्रिआबंध की स्थिति बदलते जाएं।
b) अंत में शाखा (ब्रांचिंग) वाले समावयव बनाकर जाँच लें कि कुल कार्बन 5 ही हों।
c) प्रत्येक संरचना के नीचे उसका स्पष्ट IUPAC नाम अवश्य लिखें।
Question 4: निम्नलिखित यौगिकों के ओजोनी-अपघटन के पश्चात् बनने वाले उत्पादों के नाम लिखिए:
(क) पेंट-2-ईन
(ख) 3,4-डाइमिथाइलहेप्ट-3-ईन
(ग) 2-एथिलबूट-1-ईन
(घ) 1-फेनिलबूट-1-ईन
Answer:
ओजोनी-अपघटन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एल्कीन ओजोन के साथ अभिक्रिया करके ओजोनाइड बनाती है, जो जिंक और जल (Zn/H2O) के साथ अपघटित होकर कार्बोहाइड्रेल (एल्डिहाइड या कीटोन) प्रदान करती है। (क) पेंट-2-ईन के ओजोनी-अपघटन से एथेनल और प्रोपेनल प्राप्त होते हैं। (ख) 3,4-डाइमिथाइलहेप्ट-3-ईन के अपघटन से ब्यूटेन-2-और और पेंटेन-2-ओन प्राप्त होते हैं। (ग) 2-एथिलबूट-1-ईन के अपघटन से पेंटेन-3-और और मेथेनल प्राप्त होते हैं। (घ) 1-फेनिलबूट-1-ईन के ओजोनी-अपघटन से बेंग्लाल्डिहाइड और प्रोपेनल प्राप्त होते हैं। यह विधि एल्कीन में द्विआबंध की स्थिति का पता लगाने के लिए अत्यंत उपयोगी है।
मुख्य बिंदु:
• ओजोनी-अपघटन में द्विआबंध के दोनों कार्बन परमाणु ऑक्सीजन से जुड़कर कार्बोनिल समूह (C=O) बनाते हैं।
• Zn/H2O का उपयोग अपचायक के रूप में किया जाता है जो हाइड्रोजन पेरोक्साइड को हटाता है।
• उत्पादों के नामकरण से मूल एल्कीन की संरचना आसानी से ज्ञात की जा सकती है।
आम गलतियाँ:
• द्विआबंध के दोनों सिरों पर सही कार्बोनिल समूह न बनाना।
• उत्पादों के IUPAC नाम लिखते समय कार्बन संख्या की गिनती में भूल होना।
• जिंक (Zn) की भूमिका को नजरअंदाज करना।
Exam Tips:
a) ओजोनी-अपघटन का शॉर्टकट याद रखें: द्विआबंध को बीच से काटें और दोनों सिरों पर =O जोड़ दें।
b) प्रत्येक प्राप्त उत्पाद का IUPAC नाम अलग से लिखकर सत्यापित करें।
c) एरोमैटिक वलय (जैसे फेनिल समूह) वाले यौगिकों में वलय अपरिवर्तित रहता है, केवल पार्श्व श्रृंखला टूटती है।
Question 5: एक एल्कीन 'A' के ओजोनी अपघटन से पेन्टेन-3-ओन तथा ऐथेनॉल का मिश्रण प्राप्त होता है। A का IUPAC नाम तथा संरचना दीजिए।
Answer:
दी गई जानकारी के अनुसार, एल्कीन 'A' के ओजोनी-अपघटन से पेन्टेन-3-ओन और ऐथेनॉल प्राप्त होते हैं। ओजोनी-अपघटन की विपरीत प्रक्रिया (रिवर्स इंजीनियरिंग) का उपयोग करके हम मूल एल्कीन की संरचना ज्ञात कर सकते हैं। इसके लिए दोनों उत्पादों (पेन्टेन-3-ओन और ऐथेनॉल) के कार्बोनिल समूहों (C=O) के ऑक्सीजन परमाणुओं को हटाकर उनके कार्बन परमाणुओं को आपस में द्विआबंध (C=C) द्वारा जोड़ दिया जाता है। जब पेन्टेन-3-ओन (CH3CH2 - C(=O) - CH2CH3) और ऐथेनॉल (CH3 - CHO) के ऑक्सीजन हटाए जाते हैं, तो बनने वाली संरचना 3-एथिलपेंट-2-ईन होती है। अत: एल्कीन 'A' का IUPAC नाम 3-एथिलपेंट-2-ईन है।
मुख्य बिंदु:
• ओजोनी-अपघटन के उत्पादों से मूल एल्कीन प्राप्त करने के लिए C=O समूहों को आमने-सामने रखकर जोड़ते हैं।
• पेन्टेन-3-ओन एक कीटोन है और ऐथेनॉल एक एल्डिहाइड है।
• यौगिक 'A' में एक चतुःस्थापित (tetrasubstituted) द्विआबंध उपस्थित है।
आम गलतियाँ:
• उत्पादों को जोड़ते समय कार्बन श्रृंखला की लंबाई या शाखा की स्थिति गलत दर्शाना।
• कीटोन और एल्डिहाइड के भागों को आपस में गलत तरीके से संयोजित करना।
• IUPAC नाम में मुख्य श्रृंखला का चयन गलत करना।
Exam Tips:
a) उत्पादों के सूत्र आमने-सामने लिखकर उनके 'O' आमने-सामने करें और बीच में C=C बना दें।
b) मुख्य कार्बन श्रृंखला चुनते समय सबसे लंबी श्रृंखला और द्विआबंध की स्थिति का ध्यान रखें।
c) उत्तर की पुष्टि के लिए प्राप्त संरचना का ओजोनी-अपघटन करके पुनः उत्पाद की जाँच कर लें।
Question 6: एक एल्केन A में तीन C-C आबंध तथा C-H सिग्मा आबंध तथा एक C-C पाई आबंध है। A ओजोनी अपघटन से दो अणु ऐल्डिहाइड देता है, जिनका मोलर द्रव्यमान 44 है। A का आई.यू.सी. नाम लिखिए।
Answer:
दी गई जानकारी के अनुसार, एल्कीन 'A' में 3 C-C आबंध, 8 C-H सिग्मा आबंध और 1 C-C पाई आबंध है। ओजोनी अपघटन से प्राप्त एल्डिहाइड का मोलर द्रव्यमान 44 u है, जो एथेनल (CH3CHO) को दर्शाता है क्योंकि (2×12) + (4×1) + 16 = 44 u होता है। चूंकि ओजोनी अपघटन से दो मोल एथेनल प्राप्त होते हैं, इसका अर्थ है कि मूल एल्कीन 'A' सममित रूप से दो समान भागों में विभाजित होती है। एथेनल के दोनों अणुओं को आपस में जोड़ने पर बनने वाली एल्कीन 'A' का सूत्र CH3 - CH = CH - CH3 बनता है। इस यौगिक का IUPAC नाम बूट-2-ईन है।
मुख्य बिंदु:
• मोलर द्रव्यमान 44 u एथेनल (एसिटैल्डिहाइड) का होता है।
• दो समान एल्डिहाइड अणु मिलने का मतलब है कि एल्कीन सममित है।
• बूट-2-ईन में 4 कार्बन और 1 द्विआबंध होता है।
आम गलतियाँ:
• मोलर द्रव्यमान से सही एल्डिहाइड की पहचान न कर पाना।
• सममित और असमित एल्कीन के उत्पादों में अंतर न समझना।
• सिग्मा और पाई बंधों की कुल संख्या की गणना में गलती करना।
Exam Tips:
a) मोलर द्रव्यमान से यौगिक का अणुसूत्र निकालने के लिए सामान्य एल्डिहाइड सूत्र CnH2nO का उपयोग करें।
b) ओजोनी अपघटन के उत्पादों को जोड़कर मूल एल्कीन बनाने की तकनीक का अभ्यास करें।
c) बूट-2-ईन के दोनों ज्यामितीय समावयव (सिस और ट्रांस) संभव हैं, इसे भी ध्यान में रखें।
Question 7: एक एल्कीन, जिसके ओजोनी अपघटन से प्रोपेनॉल तथा पेन्टेन-3-ओन प्राप्त होते हैं, का संरचनात्मक सूत्र क्या है?
Answer:
ओजोनी अपघटन के उत्पाद प्रोपेनॉल (प्रोपेनल, CH3CH2CHO) और पेन्टेन-3-ओन (CH3CH2COCH2CH3) हैं। मूल एल्कीन 'A' को प्राप्त करने के लिए इन दोनों कार्बोनिल यौगिकों के ऑक्सीजन परमाणुओं को हटाकर उनके कार्बन परमाणुओं को द्विआबंध (C=C) से जोड़ा जाता है। प्रोपेनल के C=O समूह और पेन्टेन-3-ओन के C=O समूह को आपस में जोड़ने पर 3-एथिलपेंट-2-ईन (या संरचना के अनुसार एथिल और मेथिल समूहों की स्थिति के साथ उपयुक्त एल्कीन) प्राप्त होती है। इस प्रकार, एल्कीन की संरचना में मुख्य श्रृंखला पर एक तरफ दो एथिल समूह और दूसरी तरफ प्रोपाइल समूह जैसा विन्यास होता है।
मुख्य बिंदु:
• प्रोपेनल एक 3-कार्बन एल्डिहाइड है और पेंटेन-3-ओन एक 5-कार्बन कीटोन है।
• दोनों उत्पादों के कार्बन परमाणुओं को जोड़ने से कुल 8 कार्बन वाली एल्कीन बनती है।
• यह विधि अज्ञात एल्कीन की संरचना निर्धारित करने का सबसे प्रामाणिक तरीका है।
आम गलतियाँ:
• एल्डिहाइड और कीटोन के संरचनात्मक अंतर को नजरअंदाज करना।
• कार्बन परमाणुओं की कुल संख्या की गणना में त्रुटि करना।
• द्विआबंध की सही स्थिति का अंकन न करना।
Exam Tips:
a) ओजोनी अपघटन के उत्क्रमणीय पद को कागज पर लिखकर अभ्यास करें।
b) एल्डिहाइड हमेशा श्रृंखला के अंत में और कीटोन मध्य में बनता है, इस बात का ध्यान रखें।
c) अंतिम संरचना का नामकरण IUPAC नियमों के अनुसार ही करें।
Question 8: निम्नलिखित हाइड्रोकार्बनों के दहन की रासायनिक अभिक्रिया लिखिए: (i) ब्यूटेन (ii) पेन्टेन (iii) हैक्साइन (iv) टॉलूईन
Answer:
हाइड्रॉकार्बन का दहन एक ऐसी ऑक्सीकरण अभिक्रिया है जिसमें हाइड्रोकार्बन ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), जल (H2O) और प्रचुर मात्रा में ऊष्मा उत्पन्न करते हैं। (i) ब्यूटेन (C4H10) का दहन: 2C4H10(g) + 13O2(g) → 8CO2(g) + 10H2O(g) + ऊष्मा। (ii) पेन्टेन (C5H12) का दहन: 2C5H12(g) + 15O2(g) → 10CO2(g) + 10H2O(g) + ऊष्मा। (iii) हैक्साइन (C6H10) का दहन: 2C6H10(g) + 17O2(g) → 12CO2(g) + 10H2O(g) + ऊष्मा। (iv) टॉलूईन (C7H8) का दहन: C7H8(l) + 9O2(g) → 7CO2(g) + 4H2O(g) + ऊष्मा। ये सभी अभिक्रियाएँ अत्यधिक ऊष्माक्षेपी होती हैं।
मुख्य बिंदु:
• हाइड्रोकार्बन के पूर्ण दहन से हमेशा CO2 और H2O बनते हैं।
• रासायनिक समीकरण को संतुलित करने के लिए पहले कार्बन, फिर हाइड्रोजन और अंत में ऑक्सीजन को संतुलित करना चाहिए।
• दहन अभिक्रियाएँ ईंधन की ऊर्जा क्षमता को दर्शाती हैं।
आम गलतियाँ:
• ऑक्सीजन (O2) के गुणांक को संतुलित करने में भूल करना।
• जल (H2O) और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के भौतिक अवस्था संकेत (g या l) छोड़ देना।
• अपरिवर्तित समीकरण लिखना।
Exam Tips:
a) दहन समीकरण संतुलित करने का क्रम याद रखें: C फिर H और अंत में O।
b) यदि भिन्नात्मक गुणांक (fractional coefficients) आएँ, तो पूरी समीकरण को 2 से गुणा करके पूर्णांक बना लें।
c) प्रत्येक अभिक्रिया के अंत में '+ ऊष्मा' या 'र्जा' लिखना न भूलें।
Question 9: हैक्स-2-ईन की समपक्ष (सिस) तथा विपक्ष (ट्रांस) संरचनाएँ बनाइए। इनमें से कौन-से समावयव का क्वथनांक उच्च होता है और क्यों?
Answer:
हैक्स-2-ईन एक ज्यामितीय समावयवता दर्शाने वाला एल्कीन है। इसकी समपक्ष (सिस) संरचना में समान समूह (या हाइड्रोजन परमाणु) द्विआबंध के एक ही ओर होते हैं, जबकि विपक्ष (ट्रांस) संरचना में समान समूह विपरीत दिशाओं में होते हैं। सिस-हैक्स-2-ईन का द्विध्रुव आघूर्ण (dipole moment) शून्य नहीं होता क्योंकि C-CH3 और C-CH2CH3 आबंधों के द्विध्रुव आघूर्ण एक ही दिशा में जुड़ते हैं। इसके विपरीत, ट्रांस-हैक्स-2-ईन में ये आबंध विपरीत दिशाओं में होने के कारण एक-दूसरे के प्रभाव को आंशिक या पूर्ण रूप से निरस्त कर देते हैं, जिससे इसका द्विध्रुव आघूर्ण बहुत कम या शून्य होता है। परिणामस्वरूप, सिस-समावयव अधिक ध्रुवीय होता है जिसके कारण उसमें अंतर-आणविक द्विध्रुव-द्विध्रुव आकर्षण बल मजबूत होते हैं। यही कारण है कि सिस-हैक्स-2-ईन का क्वथनांक ट्रांस-समावयव की तुलना में उच्च होता है।
मुख्य बिंदु:
• सिस-समावयव में समान समूह एक ओर होते हैं, जिससे ध्रुवीयता अधिक होती है।
• ट्रांस-समावयव अधिक सममित होता है, जिसके कारण उसका द्विध्रुव आघूर्ण कम होता है।
• उच्च ध्रुवीयता के कारण सिस-समावयव का क्वथनांक ट्रांस से अधिक होता है (हालांकि गलनांक ट्रांस का अधिक होता है)।
आम गलतियाँ:
• क्वथनांक और गलनांक के तर्कों को आपस में मिला देना।
• द्विध्रुव आघूर्ण की दिशाओं को गलत समझना।
• सिस और ट्रांस की संरचनाओं को गलत तरीके से चित्रित करना।
Exam Tips:
a) सिस और ट्रांस का अंतर समझाते समय द्विध्रुव आघूर्ण (μ) के सदिश योग का उल्लेख अवश्य करें।
b) यह प्रश्न अक्सर परीक्षा में पूछा जाता है, इसलिए इसकी परिभाषा और कारण स्पष्ट रखें।
c) याद रखें: क्वथनांक ध्रुवीयता पर निर्भर करता है, जबकि गलनांक क्रिस्टल जालक में संकुलन (packing) पर निर्भर करता है।
Question 10: बेन्जीन में तीन द्वि-आबंध होते हैं, फिर भी यह अत्यधिक स्थायी है, क्यों?
Answer:
बेन्जीन का अणुसूत्र C6H6 है और इसकी केकुले संरचना में तीन एकांतर (alternate) द्विआबंध होते हैं। इसके बावजूद बेन्जीन अत्यधिक स्थायी होती है और सामान्य alkenes की तरह योगात्मक अभिक्रियाएँ आसानी से नहीं दर्शाती, बल्कि प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ देती है। इसका मुख्य कारण अनुनाद (resonance) और विस्थानीकरण (delocalization) है। बेन्जीन वलय के सभी छह कार्बन परमाणु sp² संकरित होते हैं और उनके असंकरित p-कक्षक पार्श्विक अतिव्यापन करके एक सतत पाई-इलेक्ट्रॉन मेघ बनाते हैं। ये छह पाई-इलेक्ट्रॉन वलय के ऊपर और नीचे पूरी तरह से विस्थानीकृत (delocalized) रहते हैं। इस विस्थानीकरण के कारण अनुनादी स्थायीकरण ऊर्जा प्राप्त होती है, जो बेन्जीन को असाधारण स्थायित्व प्रदान करती है।
मुख्य बिंदु:
• बेन्जीन वलय में छह पाई-इलेक्ट्रॉनों का पूर्ण विस्थानीकरण होता है।
• सभी C-C आबंधों की लंबाई एक समान (139 pm) होती है जो एकल और द्विआबंध के बीच की होती है।
• अनुनाद स्थायित्व के कारण बेन्जीन सामान्य असंतृप्त यौगिकों से भिन्न व्यवहार करती है।
आम गलतियाँ:
• यह मान लेना कि बेन्जीन में तीन स्थिर द्विआबंध और तीन एकल आबंध अलग-अलग होते हैं।
• अनुनाद और विस्थानीकरण की अवधारणा को स्पष्ट न करना।
• संकरण (sp²) का उल्लेख न करना।
Exam Tips:
a) उत्तर में 'विस्थानीकृत पाई-इलेक्ट्रॉन' और 'अनुनाद संकर' शब्दों का प्रयोग जरूर करें।
b) बेन्जीन की चक्रीय समतली संरचना और बंध लंबाई का संदर्भ दें।
c) यह रासायनिक स्थायित्व से जुड़ा एक महत्वपूर्ण वैचारिक प्रश्न है।
Question 11: किसी निकाय द्वारा ऐरोमैटिकता प्रदर्शित करने के लिए आवश्यक शर्तें क्या हैं?
Answer:
किसी कार्बनिक यौगिक के ऐरोमैटिक होने के लिए हकल के नियम (Huckel's Rule) और अन्य मानदंडों के अनुसार निम्नलिखित तीन शर्तें पूरी होनी आवश्यक हैं: (i) यौगिक का अणु समतली (planar) होना चाहिए ताकि सभी कार्बन परमाणुओं के p-कक्षक प्रभावी अतिव्यापन कर सकें। (ii) वलय के भीतर पाई-इलेक्ट्रॉनों का पूर्ण विस्थानीकरण (delocalization) होना चाहिए। (iii) वलय में उपस्थित पाई-इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या (4n + 2) के बराबर होनी चाहिए, जहाँ n एक पूर्ण संख्या है (n = 0, 1, 2, 3...). इस नियम को हकल नियम कहा जाता है। इन तीनों शर्तों का पालन करने वाले यौगिक अत्यधिक स्थायी और ऐरोमैटिक प्रकृति के होते हैं, जैसे बेन्जीन।
मुख्य बिंदु:
• अणु का समतली होना और पाई-इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण अनिवार्य है।
• हकल का नियम: पाई इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 4n + 2 होनी चाहिए।
• n = 0 पर 2 पाई-इलेक्ट्रॉन, n = 1 पर 6 पाई-इलेक्ट्रॉन ऐरोमैटिक यौगिक बनाते हैं।
आम गलतियाँ:
• हकल के नियम में (4n + 2) के स्थान पर केवल 4n लिख देना।
• समतलता (planarity) की शर्त को भूल जाना।
• चक्रीय संरचना के बिना ही ऐरोमैटिकता का दावा करना।
Exam Tips:
a) तीनों शर्तों को बिंदुवार (i, ii, iii) स्पष्ट रूप से लिखें।
b) हकल समीकरण 4n + 2 = पाई इलेक्ट्रॉनों की संख्या लिखकर उदाहरण सहित समझाएं।
c) यह परीक्षा की दृष्टि से एक अति महत्वपूर्ण परिभाषा आधारित प्रश्न है।
Question 12: इनमें से कौन सा निकाय ऐरोमैटिक नहीं है? कारण स्पष्ट कीजिए:
(i) CH2 समूह युक्त वलय (ii) पाँच सदस्यीय वलय (iii) आठ सदस्यीय वलय
Answer:
हकल के नियम (4n + 2 पाई इलेक्ट्रॉन) और समतलता की शर्त के आधार पर दिए गए यौगिकों की जाँच की जाती है: (i) पहले यौगिक में 6 पाई-इलेक्ट्रॉन हैं (4n + 2 = 6, जिससे n = 1), यह हकल नियम का पालन करता है और समतली होने के कारण ऐरोमैटिक है। (ii) दूसरे यौगिक (साइक्लोपेंटाडाइनाइल ऋणायन या संबंधित वलय) में 4 पाई-इलेक्ट्रॉन हैं, जिसके लिए 4n = 4 यानी n = 1/2 (भिन्न) आता है; चूँकि n का मान पूर्ण संख्या नहीं है, यह हकल नियम का पालन नहीं करता और ऐरोमैटिक नहीं है। (iii) तीसरे यौगिक (साइक्लोऑक्टाटेट्राईन) में 8 पाई-इलेक्ट्रॉन हैं, जो 4n का रूप है (n = 2), और यह टब-आकार की समतली संरचना नहीं रखता, इसलिए यह भी ऐरोमैटिक नहीं है। स्पष्ट है कि वे यौगिक जिनमें 4n पाई-इलेक्ट्रॉन होते हैं और n पूर्ण संख्या नहीं होती, वे ऐरोमैटिक नहीं होते।
मुख्य बिंदु:
• हकल नियम में n का मान हमेशा एक पूर्ण संख्या (0, 1, 2, 3...) होना चाहिए।
• 4n पाई-इलेक्ट्रॉन वाले निकाय ऐरोमैटिक नहीं होते (वे ऐंटीऐरोमैटिक हो सकते हैं)।
• अणु का समतली होना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि इलेक्ट्रॉनों की संख्या।
आम गलतियाँ:
• n के भिन्न मान आने पर भी उसे ऐरोमैटिक मान लेना।
• पाई-इलेक्ट्रॉनों की गिनती में गलती करना।
• समतलता की उपेक्षा करना।
Exam Tips:
a) गणना करके दिखाएं कि n का मान पूर्ण संख्या है या नहीं।
b) प्रत्येक संरचना के नीचे हकल समीकरण (4n + 2 = संख्या) लिखकर स्पष्ट करें।
c) कारण में विस्थानीकरण और हकल नियम का स्पष्ट उल्लेख करें।
Question 13: बेन्जीन को निम्नलिखित में कैसे परिवर्तित करेंगे:
(i) p-नाइट्राइब्रोमोबेन्जीन
(ii) m-नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन
(iii) p-नाइट्रोटॉलूईन
(iv) एैसेटोफेनोन?
Answer:
बेन्जीन का रासायनिक रूपांतरण इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन और फ्रीडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रियाओं द्वारा किया जाता है: (i) बेन्जीन की ब्रोमीन के साथ निर्जल FeBr3 की उपस्थिति में ब्रोमीनीकरण कराने पर ब्रोमोबेन्जीन बनती है, जिसका सांद्र HNO3 व सांद्र H2SO4 द्वारा नाइट्रीकरण करने पर p-नाइट्राइब्रोमोबेन्जीन मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होती है। (ii) बेन्जीन का नाइट्रीकरण करने पर नाइट्रोबेन्जीन बनती है, और इसके पश्चात् निर्जल AlCl3 की उपस्थिति में क्लोरीनीकरण (Cl2) कराने पर मेटा-निर्देशकारी प्रभाव के कारण m-नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन प्राप्त होती है। (iii) बेन्जीन की निर्जल AlCl3 की उपस्थिति में मेथिल क्लोराइड के साथ फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐल्किलीकरण कराने से टॉलूईन बनती है, जिसका नाइट्रीकरण करने पर p-नाइट्रोटॉलूईन मुख्य उत्पाद बनता है। (iv) बेन्जीन की एसिटिल क्लोराइड (CH3COCl) के साथ निर्जल AlCl3 की उपस्थिति में फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐसिलीकरण कराने पर एैसेटोफेनोन प्राप्त होती है।
मुख्य बिंदु:
• प्रतिस्थापी समूहों (ऑर्थो-पैरा या मेटा निर्देशक) का प्रभाव रासायनिक परिवर्तन के क्रम को निर्धारित करता है।
• फ्रीडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रियाओं में निर्जल AlCl3 उत्प्रेरक का उपयोग होता है।
• नाइट्रीकरण के लिए सांद्र HNO3 और सांद्र H2SO4 के मिश्रण का उपयोग किया जाता है।
आम गलतियाँ:
• अभिकर्मकों और उत्प्रेरकों (जैसे निर्जल AlCl3) को लिखना भूल जाना।
• ऑर्थो/पैरा और मेटा निर्देशित समूहों के क्रम को उलट देना।
• रासायनिक समीकरणों में तीर के ऊपर सही परिस्थितियाँ न दर्शाना।
Exam Tips:
a) रूपांतरण वाले प्रश्नों को हमेशा चरणबद्ध तरीके से तीर के निशान के साथ आरेख रूप में हल करें।
b) उत्प्रेरक (जैसे निर्जल AlCl3, FeBr3) और तापमान का उल्लेख अवश्य करें।
c) यह सुनिश्चित करें कि अंतिम उत्पाद का सही समomer (मुख्यतः पैरा उत्पाद) प्राप्त हो रहा हो।
Question 14: एल्केन H3C - CH2 - C(CH3)2 - CH2 - CH(CH3)2 में 1, 2 तथा 3 कार्बन परमाणु की पहचान कीजिए तथा प्रत्येक कार्बन से आबंधित कुल हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या भी बताइए।
Answer:
दिए गए हाइड्रोकार्बन सूत्र H3C - CH2 - C(CH3)2 - CH2 - CH(CH3)2 में विभिन्न प्रकार के कार्बन परमाणुओं (प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक) की पहचान उनके पड़ोसी कार्बन परमाणुओं की संख्या के आधार पर की जाती है। 1° कार्बन परमाणु वे होते हैं जो केवल एक अन्य कार्बन परमाणु से जुड़े होते हैं। इस संरचना में कुल 5 प्राथमिक (1°) कार्बन परमाणु हैं, जिनसे कुल 15 हाइड्रोजन परमाणु जुड़े हुए हैं। 2° कार्बन परमाणु वह होता है जो दो अन्य कार्बन परमाणुओं से जुड़ा होता है। इस संरचना में दो 2° कार्बन परमाणु हैं, जिनसे कुल 4 हाइड्रोजन परमाणु जुड़े हुए हैं। 3° कार्बन परमाणु वह होता है जो तीन अन्य कार्बन परमाणुओं से जुड़ा होता है। इस संरचना में एक 3° कार्बन परमाणु है, जिससे केवल 1 हाइड्रोजन परमाणु जुड़ा हुआ है। इसके अतिरिक्त, एक चतुष्कोणीय (4°) कार्बन भी उपस्थित है जो चार कार्बन से जुड़ा है और उससे कोई हाइड्रोजन जुड़ा नहीं है।
मुख्य बिंदु:
• 1° कार्बन सीधे 1 कार्बन से, 2° कार्बन 2 कार्बन से और 3° कार्बन 3 कार्बन से जुड़ा होता है।
• हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या कार्बन की संयोजकता (4) को पूरा करने के लिए होती है।
• 4° कार्बन से कोई हाइड्रोजन जुड़ा नहीं होता क्योंकि उसकी चारों संयोजकताएँ कार्बन से तृप्त होती हैं।
आम गलतियाँ:
• शाखाओं (branches) में छिपे हुए मेथिल समूहों के कार्बन को गिनने में भूल करना।
• हाइड्रोजन परमाणुओं की कुल संख्या की गणना गलत करना।
• 1°, 2° और 3° की परिभाषा में भ्रमित होना।
Exam Tips:
a) संरचना को पूरी तरह खोलकर (expanded formula) बनाएं ताकि प्रत्येक कार्बन और हाइड्रोजन स्पष्ट दिखे।
b) प्रत्येक कार्बन से जुड़े अन्य कार्बन परमाणुओं की संख्या की जाँच अलग से करें।
c) कुल हाइड्रोजन गिनते समय सभी 1°, 2° और 3° कार्बन के योग की पुष्टि करें।
Question 15: क्वथनांक पर एल्केन की श्रृंखला के शाखन का क्या प्रभाव पड़ता है?
Answer:
एल्केन अणुओं के बीच दुर्बल वांडर वाल्स बल (Van der Waals forces) कार्य करते हैं। जैसे-जैसे एल्केन श्रृंखला में शाखन (branching) बढ़ता है, अणु का आकार गोलाकार होने लगता है जिसके कारण अणु का पृष्ठीय क्षेत्रफल (surface area) घट जाता है। पृष्ठीय क्षेत्रफल घटने से अणुओं के बीच संपर्क का क्षेत्र कम हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप अंतर-आणविक वांडर वाल्स आकर्षण बल कमजोर हो जाते हैं। इन कमजोर बलों को तोड़ने के लिए कम ऊष्मा या कम तापमान की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि श्रृंखला में शाखन बढ़ने के साथ एल्केन का क्वथनांक घट जाता है। उदाहरण के लिए, सामान्य पेंटेन का क्वथनांक आइसोपेंटेन और नियोपेंटेन से अधिक होता है।
मुख्य बिंदु:
• शाखन बढ़ने से अणु का पृष्ठीय क्षेत्रफल कम हो जाता है।
• पृष्ठीय क्षेत्रफल घटने से वांडर वाल्स आकर्षण बल कमजोर होते हैं।
• कमजोर बलों के कारण क्वथनांक कम तापमान पर ही उबल जाता है।
आम गलतियाँ:
• शाखन का प्रभाव गलनांक पर और क्वथनांक पर एक जैसा मान लेना।
• वांडर वाल्स बलों के कमजोर होने के कारण को स्पष्ट न करना।
• आकार के गोलाकार होने से संपर्क क्षेत्र घटने के बिंदु को छोड़ देना।
Exam Tips:
a) उत्तर में 'पृष्ठीय क्षेत्रफल' (surface area) और 'वांडर वाल्स बल' शब्दों का प्रयोग अनिवार्य रूप से करें।
b) सीधी श्रृंखला (n-alkane) और शाखित श्रृंखला का एक छोटा सा उदाहरण दें।
c) यह भौतिक गुणों से जुड़ा एक बहुत ही सामान्य और महत्वपूर्ण कारण बताने वाला प्रश्न है।
Question 16: प्रोपीन पर HBr के संकलन से 2-ब्रामोप्रोपेन बनता है, जबकि बेन्जोयल पेरोक्साइड की उपस्थिति में यह अभिक्रिया 1-ब्रामोप्रोपेन देती है। क्रियाविधि की सहायता से इसका कारण स्पष्ट कीजिए।
Answer:
प्रोपीन पर HBr का संकलन दो अलग-अलग क्रियाविधियों से होता है। पेरोक्साइड की अनुपस्थिति में यह अभिक्रिया मार्कोनीकॉफ के नियम के अनुसार होती है जिसमें इलेक्ट्रोफिलिकी आक्रमण होता है। H+ आयन प्रोपीन के द्विआबंध पर आक्रमण करके अधिक स्थायी द्वितीयक कार्बोकैटायन बनाता है, जो प्राथमिक कार्बोकैटायन से अधिक स्थायी होता है, और अंत में Br- आयन जुड़कर 2-ब्रामोप्रोपेन मुख्य उत्पाद बनाता है। इसके विपरीत, बेन्जोयल पेरोक्साइड की उपस्थिति में यह अभिक्रिया मुक्त-मूलक क्रियाविधि (एंटी-मार्कोनीकॉफ प्रभाव या खराश प्रभाव) द्वारा होती है। इसमें पेरोक्साइड के सममित विदलन से बने ब्रोमीन मुक्त-मूलक (Br•) प्रोपीन पर आक्रमण करते हैं। द्वितीयक मुक्त-मूलक प्राथमिक मुक्त-मूलक की तुलना में अधिक स्थायी होता है, जिसके कारण मुख्य रूप से 1-ब्रामोप्रोपेन प्राप्त होता है।
मुख्य बिंदु:
• पेरोक्साइड की अनुपस्थिति में इलेक्ट्रोफिलिक संकलन होता है जो मार्कोनीकॉफ नियम का पालन करता है (उत्पाद: 2-ब्रोमोप्रोपेन)।
• पेरोक्साइड की उपस्थिति में मुक्त-मूलक संकलन होता है जो एंटी-मार्कोनीकॉफ नियम का पालन करता है (उत्पाद: 1-ब्रोमोप्रोपेन)।
• मध्यवर्ती के रूप में बनने वाले कार्बोकैटायन या मुक्त-मूलक का स्थायित्व (द्वितीयक > प्राथमिक) उत्पाद तय करता है।
आम गलतियाँ:
• दोनों स्थितियों (पेरोक्साइड के साथ और बिना) में उत्पादों को आपस में बदल देना।
• कार्बोकैटायन और मुक्त-मूलक के स्थायित्व क्रम को स्पष्ट न करना।
• केवल समीकरण लिखकर क्रियाविधि न समझाना।
Exam Tips:
a) दोनों अभिक्रियाओं की क्रियाविधि (आयनिक बनाम मुक्त-मूलक) अलग-अलग चरणों में समझाएं।
b) 'मार्कोनीकॉफ नियम' और 'परॉक्साइड प्रभाव (एंटी-मार्कोनीकॉफ)' की परिभाषा स्पष्ट लिखें।
c) मध्यवर्ती द्वितीयक स्पीशीज के अधिक स्थायी होने का तर्क अवश्य दें।
Question 17: 1,2-डाइमिथाइलबेन्जीन (o-जाइलीन) के ओजोनी अपघटन के फलस्वरूप निर्मित उत्पादों को लिखिए। यह परिणाम बेन्जीन की केकुले संरचना की पुष्टि किस प्रकार करता है?
Answer:
ओ-जाइलीन (1,2-डाइमिथाइलबेन्जीन) के ओजोनी अपघटन से तीन उत्पाद प्राप्त होते हैं: मिथाइलग्लायॉक्सल, ग्लायॉक्सल और डाइमिथाइलग्लायॉक्सल। यदि बेन्जीन में द्विआबंध एक निश्चित स्थान पर स्थिर होते (जैसा कि केकुले की दो संरचनाओं में माना जाता है), तो o-जाइलीन को दो अलग-अलग ओजोनी अपघटन उत्पाद देने चाहिए थे। लेकिन प्रयोगों से यह सिद्ध होता है कि o-जाइलीन से प्राप्त ये तीनों उत्पाद दोनों केकुले संरचनाओं (जो अनुनाद संकर बनाती हैं) के मिश्रण से प्राप्त होते हैं। यह इस बात की पुष्टि करता है कि बेन्जीन में द्विआबंध किसी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहते, बल्कि वे निरंतर विस्थानीकृत (delocalized) रहते हैं और बेन्जीन दोनों केकुले संरचनाओं का एक अनुनाद संकर है।
मुख्य बिंदु:
• o-जाइलीन के ओजोनी अपघटन से ग्लायॉक्सल, मिथाइलग्लायॉक्सल और डाइमिथाइलग्लायॉक्सल बनते हैं।
• यह प्रयोग बेन्जीन की गतिशील (dynamic) द्विआबंध व्यवस्था को सिद्ध करता है।
• केकुले की दोनों संरचनाओं का योगदान इस परिणाम से पूरी तरह मेल खाता है।
आम गलतियाँ:
• उत्पादों के नाम लिखने में भूल करना या उनकी संख्या गलत बताना।
• यह समझ न पाना कि यह प्रयोग केकुले संरचना की पुष्टि कैसे करता है।
• अनुनाद संकर की अवधारणा को न जोड़ना।
Exam Tips:
a) o-जाइलीन की दोनों केकुले अनुनादी संरचनाएँ अलग-अलग बनाकर उनके ओजोनी अपघटन को दर्शाएं।
b) प्राप्त उत्पादों का अनुपात और उनके नाम स्पष्ट रूप से लिखें।
c) निष्कर्ष में अनुनाद संकर का उल्लेख अवश्य करें।
Question 18: बेन्जीन, n-हैक्सेन तथा एथाइन को घटते हुए अम्लीय व्यवहार के क्रम में व्यवस्थित कीजिए और इस व्यवहार का कारण बताइए।
Answer:
दिए गए यौगिकों का अम्लीय व्यवहार उनके कार्बन परमाणुओं के संकरण (hybridization) और उससे जुड़ी विद्युतऋणात्मकता पर निर्भर करता है। इन यौगिकों में कार्बन का संकरण इस प्रकार है: एथाइन (sp संकरित), बेन्जीन (sp² संकरित) और n-हैक्सेन (sp³ संकरित)। जैसे-जैसे संकरण में s-लक्षण (s-character) बढ़ता है (sp में 50%, sp² में 33.3%, sp³ में 25%), कार्बन की विद्युतऋणात्मकता बढ़ती जाती है। अधिक विद्युतऋणात्मकता के कारण कार्बन परमाणु C-H आबंध के इलेक्ट्रॉन युग्म को अपनी ओर अधिक आकर्षित करता है, जिससे H+ आयन (प्रोटॉन) का निष्कासन आसान हो जाता है। अम्लता का घटता हुआ क्रम है: एथाइन > बेन्जीन > n-हैक्सेन।
मुख्य बिंदु:
• अम्लता का सीधा संबंध कार्बन के s-लक्षण और विद्युतऋणात्मकता से है।
• s-लक्षण का क्रम: sp (50%) > sp² (33.3%) > sp³ (25%) होता है।
• एथाइन सबसे अधिक अम्लीय और n-हैक्सेन सबसे कम अम्लीय होता है।
आम गलतियाँ:
• संकरण के s-लक्षण और विद्युतऋणात्मकता के संबंध को उल्टा समझ लेना।
• अम्लीयता के क्रम को गलत दिशा में लिख देना।
• प्रोटॉन त्यागने की क्षमता के कारण को स्पष्ट न करना।
Exam Tips:
a) प्रत्येक यौगिक में कार्बन का संकरण और उसमें s-प्रतिशत स्पष्ट रूप से लिखें।
b) यह नियम याद रखें: अधिक s-लक्षण = अधिक विद्युतऋणात्मकता = अधिक अम्लीयता।
c) घटते हुए क्रम (>) का सही चिह्न प्रयोग करें।
Question 19: बेन्जीन इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ सरलतापूर्वक क्यों प्रदर्शित करती है, जबकि उसमें नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन कठिन होता है?
Answer:
बेन्जीन एक समतली चक्रीय अणु है जिसमें वलय के समतल के ऊपर और नीचे छह विस्थानीकृत पाई-इलेक्ट्रॉनों का एक घना मेघ (electron cloud) पाया जाता है। चूँकि यह पाई-इलेक्ट्रॉन मेघ प्रचुर मात्रा में ऋण आवेशित इलेक्ट्रॉनों से समृद्ध होता है, इसलिए यह इलेक्ट्रॉन-न्यून प्रजातियों यानी इलेक्ट्रॉनस्नेहियों (electrophiles) को अपनी ओर अत्यधिक आकर्षित करता है। यही कारण है कि बेन्जीन सरलता से इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं से गुजरती है। इसके विपरीत, नाभिकस्नेही (nucleophiles) स्वयं इलेक्ट्रॉन-समृद्ध होते हैं, इसलिए वे बेन्जीन के इस ऋण आवेशित पाई-इलेक्ट्रॉन मेघ द्वारा प्रतिकर्षित (repelled) किए जाते हैं। परिणाम The, बेन्जीन पर नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया कराना अत्यंत कठिन होता है।
मुख्य बिंदु:
• बेन्जीन वलय में पाई-इलेक्ट्रॉनों का घना और समृद्ध मेघ होता है।
• इलेक्ट्रॉनस्नेही (इलेक्ट्रॉन-प्रेमी) इस ऋण आवेश से आकर्षित होते हैं, अतः वे आसानी से आक्रमण करते हैं।
• नाभिकस्नेही (केंद्र-प्रेमी) ऋण आवेश के कारण प्रतिकर्षित होते हैं, जिससे नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन कठिन होता है।
आम गलतियाँ:
• इलेक्ट्रॉनस्नेही और नाभिकस्नेही की परिभाषाओं और उनके आवेशों को आपस में मिला देना।
• बेन्जीन के पाई-मेघ की भूमिका को स्पष्ट न करना।
• प्रतिकर्षित और आकर्षित शब्दों का गलत प्रयोग करना।
Exam Tips:
a) उत्तर की शुरुआत 'बेन्जीन एक इलेक्ट्रॉन-समृद्ध प्रजाति है' वाक्य से करें।
b) इलेक्ट्रॉनस्نےही (धनात्मक/इलेक्ट्रॉन-न्यून) के आकर्षण और नाभिकस्नेही के प्रतिकर्षजन का स्पष्ट तर्क दें।
c) यह वैचारिक प्रश्न परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है।
Question 20: आप निम्नलिखित यौगिकों को बेन्जीन में कैसे परिवर्तित करेंगे? (i) एथाइन (ii) एथीन (iii) हैक्सेन
Answer:
विभिन्न हाइड्रोकार्बनों से बेन्जीन का निर्माण चक्रीकरण (cyclization) या विहाइड्रोजीनीकरण द्वारा किया जाता है: (i) एथाइन से बेन्जीन: जब एथाइन (एसिटिलीन) गैस को लाल तप्त लोहे की नली (Tapt Rakt Fe tube) में 873 K तापमान पर प्रवाहित किया जाता है, तो इसके तीन अणु आपस में संघनन (cyclic polymerization) करके बेन्जीन बनाते हैं। (ii) एथीन से बेन्जीन: एथीन की ब्रोमीन के साथ अभिक्रिया से 1,2-डाइब्रोमोइथेन बनता है, जिसे ऐल्कोहॉलीय KOH और फिर सोडियम एमाइड (NaNH2) के साथ उपचारित करने पर एथाइन बनती है; तत्पश्चात एथाइन को लाल तप्त लोहे की नली में प्रवाहित करके बेन्जीन में बदला जाता है। (iii) हैक्सेन से बेन्जीन: n-हैक्सेन को जब Cr2O3, V2O5 या Mo2O3 उत्प्रेरक की उपस्थिति में 773 K ताप और उच्च दाब पर गर्म किया जाता है, तो यह aromatization (चक्रीकरण और विहाइड्रोजीनीकरण) के माध्यम से बेन्जीन में परिवर्तित हो जाती है।
मुख्य बिंदु:
• एथाइन का चक्रीकरण लाल तप्त लोहे की नली में 873 K पर बेन्जीन देता है।
• n-हैक्सेन का उत्प्रेरकीय चक्रीकरण (Aromatization) बेन्जीन निर्माण की औद्योगिक विधि है।
• एथीन को पहले एथाइन में बदलना पड़ता है।
आम गलतियाँ:
• तापमान (873 K) और उत्प्रेरक (तप्त Fe या Cr2O3) के मान गलत लिखना।
• एथीन से बेन्जीन बनाते समय मध्यवर्ती चरणों को छोड़ देना।
• रासायनिक समीकरणों को संतुलित न करना।
Exam Tips:
a) तीनों रूपांतरणों के लिए अलग-अलग फ्लोचार्ट या समीकरण स्पष्ट रूप से बनाएं।
b) 'लाल तप्त लोहे की नली' और 'उत्प्रेरकीय चक्रीकरण' जैसे मुख्य शब्दों का उल्लेख अवश्य करें।
c) यह नामयुक्त और महत्वपूर्ण रासायनिक परिवर्तन अभिक्रिया है।
Question 21: उन सभी एल्कीनों की संरचनाएँ लिखिए, जो हाइड्रोजनीकरण करने पर 2-मिथाइलबूटूटेन देती है।
Answer:
2-मिथाइलबूटूटेन (C5H12) का हाइड्रोजनीकरण (यानी एल्केन बनाने के लिए एल्कीन में हाइड्रोजन जोड़ना) उसकी मूल एल्कीन संरचनाओं के द्विबंघों को हटाकर प्राप्त किया जाता है। यदि हम 2-मिथाइलबूटूटेन के विभिन्न कार्बन-कार्बन आबंधों पर द्विआबंध (C=C) की संभावित स्थितियाँ रखें, तो तीन ऐसी एल्कीन संभव हैं जो हाइड्रोजनीकरण पर 2-मिथाइलबूटूटेन प्रदान करती हैं: (i) 2-मिथाइलबूट-1-ईन (CH2 = C(CH3) - CH2 - CH3), (ii) 2-मिथाइलबूट-2-ईन (CH3 - C(CH3) = CH - CH3), और (iii) 3-मिथाइलबूट-1-ईन (H2C = CH - CH(CH3) - CH3)। इन तीनों एल्कीनों में से किसी का भी उत्प्रेरकीय हाइड्रोजनीकरण करने पर 2-मिथाइलबूटूटेन ही प्राप्त होता है।
मुख्य बिंदु:
• एल्कीन के हाइड्रोजनीकरण में Pt, Pd या Ni उत्प्रेरक की उपस्थिति में H2 जुड़ती है।
• 2-मिथाइलबूटूटेन की संरचना से द्विआबंध की संभावित स्थितियाँ (1, 2 और 3 स्थानों पर) निकालकर तीन एल्कीन बनाई जाती हैं।
• सभी संभावित एल्कीन का कंकाल समान रहता है, केवल द्विआबंध की स्थिति बदलती है।
आम गलतियाँ:
• कार्बन कंकाल की मूल शाखा को बदल देना।
• द्विआबंध की संभावित सभी स्थितियों को न पहचान पाना।
• IUPAC नामकरण या संरचना सूत्र में हाइड्रोजन की संख्या गलत लिखना।
Exam Tips:
a) पहले 2-मिथाइलबूटूटेन की कंकाल संरचना बनाएं।
b) उसके प्रत्येक कार्बन युग्म के बीच बारी-बारी से द्विआबंध रखकर तीन अलग-अलग संरचनाएँ बनाएं।
c) प्रत्येक संरचना का सही IUPAC नाम भी साथ में लिखें।
Question 22: निम्नलिखित यौगिकों को उनकी इलेक्ट्रॉनस्नेही (E+) के प्रति घटती आपेक्षिक क्रियाशीलता के क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
(क) क्लोरोबेन्जीन, 2,4-डाइनाइट्रॉक्लोरोबेन्जीन, p-नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन
(न) टॉलूईन, p-H3C-C6H4-NO2, p-O2N-C6H4-NO2
Answer:
इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया में किसी बेन्जीन व्युत्पन्न की क्रियाशीलता वलय पर उपस्थित इलेक्ट्रॉन घनत्व पर निर्भर करती है। इलेक्ट्रॉन-दाता समूह वलय में इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाते हैं (क्रियाशीलता बढ़ाते हैं), जबकि इलेक्ट्रॉन-खींचने वाले (अपचायक/इलेक्ट्रॉन-प्रतिकर्षी) समूह वलय से इलेक्ट्रॉन घनत्व कम करते हैं (क्रियाशीलता घटाते हैं)। (क) 2,4-डाइनाइट्रॉक्लोरोबेन्जीन में दो -NO2 समूह होने के कारण सबसे कम इलेक्ट्रॉन घनत्व होता है; p-नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन में एक -NO2 समूह है; और क्लोरोबेन्जीन में केवल -Cl (जो कमजोर प्रभाव डालता है) है। अतः घटता हुआ क्रम है: क्लोरोबेन्जीन > p-नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन > 2,4-डाइनाइट्रॉक्लोरोबेन्जीन। (न) टॉलूईन में -CH3 समूह इलेक्ट्रॉन दाता है (उच्चतम घनत्व), p-H3C-C6H4-NO2 में एक दाता और एक ग्राही है, और p-O2N-C6H4-NO2 में दो इलेक्ट्रॉन-ग्राही -NO2 समूह हैं (न्यूनतम घनत्व)। अतः घटता हुआ क्रम है: टॉलूईन > p-H3C-C6H4-NO2 > p-O2N-C6H4-NO2।
मुख्य बिंदु:
• इलेक्ट्रॉन-दाता समूह (जैसे -CH3) वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाकर क्रियाशीलता बढ़ाते हैं।
• इलेक्ट्रॉन-ग्राही समूह (जैसे -NO2) वलय से इलेक्ट्रॉन खींचकर क्रियाशीलता घटाते हैं।
• जितने अधिक इलेक्ट्रॉन-ग्राही समूह होंगे, इलेक्ट्रॉनस्नेही के प्रति क्रियाशीलता उतनी ही कम होगी।
आम गलतियाँ:
• दाता और ग्राही समूहों के प्रभावों को आपस में भ्रमित करना।
• घटते हुए क्रम के स्थान पर बढ़ता हुआ क्रम लिख देना।
• -NO2 समूहों की संख्या के प्रभाव को नजरअंदाज करना।
Exam Tips:
a) प्रत्येक यौगिक में उपस्थित समूहों (+I/-I या +R/-R प्रभाव) की पहचान करें।
b) याद रखें: अधिक इलेक्ट्रॉन घनत्व = अधिक क्रियाशीलता।
c) क्रम लिखते समय घटते हुए क्रम (>) के नियमों का पालन करें।
Question 23: बेन्जीन, m-डाइनाइट्रोबेन्जीन तथा टॉलूईन में से किसका नाइट्रीकरण आसानी से होता है और क्यों?
Answer:
दिए गए तीन यौगिकों में से टॉलूईन का नाइट्रीकरण सबसे आसानी से होता है। नाइट्रीकरण एक इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया है जो वलय पर उपस्थित इलेक्ट्रॉन घनत्व पर निर्भर करती है। टॉलूईन में जुड़ा हुआ -CH3 समूह एक प्रबल इलेक्ट्रॉन-दाता (hyperconjugation और प्रेणिक प्रभाव द्वारा) है, जो बेंजीन वलय के भीतर इलेक्ट्रॉन घनत्व को बढ़ा देता है, जिससे आने वाला नाइट्रोनियम आयन (NO2+) आसानी से आक्रमण करता है। इसके विपरीत, बेन्जीन में सामान्य इलेक्ट्रॉन घनत्व होता है, और m-डाइनाइट्रोबेन्जीन में दो प्रबल इलेक्ट्रॉन-खींचने वाले -NO2 समूह जुड़े होते हैं जो वलय से इलेक्ट्रॉन घनत्व को बहुत अधिक कम कर देते हैं। परिणामस्वरूप, m-डाइनाइट्रोबेन्जीन का नाइट्रीकरण सबसे कठिन होता है।
मुख्य बिंदु:
• टॉलूईन में -CH3 समूह इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाता है, जिससे नाइट्रीकरण आसान होता है।
• m-डाइनाइट्रोबेन्जीन में दो -NO2 समूह इलेक्ट्रॉन घनत्व को अत्यधिक घटा देते हैं, जिससे नाइट्रीकरण बहुत कठिन होता है।
• नाइट्रीकरण की दर वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व के सीधे समानुपाती होती है।
आम गलतियाँ:
• -NO2 और -CH3 समूहों के प्रभावों का विपरीत आकलन करना।
• m-डाइनाइट्रोबेन्जीन को टॉलूईन से अधिक सक्रिय मान लेना।
• नाइट्रीकरण अभिकर्मक (सांद्र HNO3 + सांद्र H2SO4) का उल्लेख न करना।
Exam Tips:
a) उत्तर में -CH3 के 'इलेक्ट्रॉन-दाता' और -NO2 के 'इलेक्ट्रॉन-ग्राही' स्वभाव का स्पष्ट उल्लेख करें।
b) क्रियाशीलता का बढ़ता या घटता क्रम स्पष्ट रूप से दर्शाएं।
c) यह बहुत ही महत्वपूर्ण वैचारिक एवं तुलनात्मक प्रश्न है।
Question 24: बेन्जीन के एथिलीकरण में निर्जल एल्युमीनियम क्लोराइड के स्थान पर कोई दूसरा लुईस अम्ल सुझाइए।
Answer:
बेन्जीन का एथिलीकरण (या ऐल्किलीकरण) फ्रीडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया का एक उदाहरण है, जिसमें एक एल्काइल समूह बेन्जीन वलय पर जुड़ता है। यह अभिक्रिया एक लुईस अम्ल (Lewis acid) की उपस्थिति में संपन्न होती है, जो इलेक्ट्रोफिलिक स्पीशीज (कार्बोकैटायन) बनाने में सहायता करता है। पारंपरिक रूप से निर्जल ऐलुमिनियम क्लोराइड (anhydrous AlCl3) का उपयोग किया जाता है। इसके स्थान पर अन्य किसी भी उपयुक्त लुईस अम्ल का उपयोग किया जा सकता है, जैसे निर्जल फेरिक क्लोराइड (anhydrous FeCl3), टिन टेट्राक्लोराइड (SnCl4), बोरॉन ट्राइफ्लोराइड (BF3), या जिंक क्लोराइड (ZnCl2)। ये सभी यौगिक इलेक्ट्रॉन-न्यून (electron-deficient) होने के कारण लुईस अम्ल की तरह कार्य करते हैं।
मुख्य बिंदु:
• फ्रीडेल-क्राफ्ट्स एथिलीकरण के लिए लुईस अम्ल अनिवार्य उत्प्रेरक है।
• AlCl3 के अलावा FeCl3, SnCl4, BF3 आदि का उपयोग किया जा सकता है।
• लुईस अम्ल वे प्रजातियाँ हैं जो एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म (lone pair) ग्रहण कर सकती हैं।
आम गलतियाँ:
• लुईस अम्ल के स्थान पर लुईस क्षार (Lewis base) का नाम लिख देना।
• निर्जल (anhydrous) शब्द लिखना भूल जाना।
• गलत रासायनिक सूत्रों का प्रयोग करना।
Exam Tips:
a) कम से कम दो अन्य लुईस अम्लों के नाम (जैसे FeCl3, BF3) हमेशा याद रखें।
b) 'निर्जल' शब्द का प्रयोग करना न भूलें क्योंकि जल की उपस्थिति से उत्प्रेरक निष्क्रिय हो जाता है।
c) यह एक सीधा और अंकदायी प्रश्न है।
Question 25: क्या कारण है कि वुर्ट्ज अभिक्रिया से विषम संख्या वाले कार्बन परमाणु विशुद्ध एल्केन बनाने के लिए प्रयुक्त नहीं की जाती? एक उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
Answer:
वुर्ट्ज अभिक्रिया सममित एल्केन के संश्लेषण के लिए अत्यंत उपयोगी है, लेकिन इसका उपयोग विषम संख्या वाले कार्बन परमाणुओं के शुद्ध एल्केन बनाने के लिए नहीं किया जा सकता है। जब दो अलग-अलग (असममित) एल्काइल हैलाइड्स (जैसे ब्रोमोमीथेन और आयोडोइथेन) को शुष्क ईथर की उपस्थिति में सोडियम धातु के साथ अभिकृत किया जाता है, तो अभिक्रिया में मुक्त-मूलक मध्यवर्ती बनते हैं जो आपस में यादृच्छिक (random) संयोजन करते हैं। इसके परिणामस्वरूप तीन अलग-अलग एल्केनों का एक मिश्रण प्राप्त होता है: पहला सममित एल्केन (एथेन), दूसरा सममित एल्केन (प्रोपेन या ब्यूटेन), और वांछित विषम एल्केन (प्रोपेन)। इन एल्केनों के क्वथनांक बहुत पास-पास होते हैं, जिससे उन्हें प्रभाوی आसवन (fractional distillation) द्वारा पृथक् करना अत्यंत कठिन हो जाता है। उदाहरण के लिए, ब्रोमोमीथेन और iodoethane के मिश्रण से मेथेन, एथेन और प्रोपेन का मिश्रण बनता है।
मुख्य बिंदु:
• वुर्ट्ज अभिक्रिया में असममित हैलाइड लेने पर तीन अलग-अलग एल्केनों का मिश्रण बनता है।
• बने हुए एल्केनों के क्वथनांक लगभग समान होने के कारण उन्हें अलग करना कठिन होता है।
• यह अभिक्रिया केवल सममित एल्केन (समान कार्बन संख्या वाले) बनाने के लिए उपयुक्त है।
आम गलतियाँ:
• यह मान लेना कि असममित हैलाइड लेने से केवल एक ही विषम एल्केन बनेगा।
• मुक्त-मूलक संयोजन के उप-उत्पादों के मिश्रण को नजरअंदाज करना।
• शुष्क ईथर (Dry ether) और सोडियम की भूमिका न लिखना।
Exam Tips:
a) उदाहरण सहित समझाइए कि कैसे तीन अलग-अलग उत्पाद (जैसे एथेन, प्रोपेन, ब्यूटेन) प्राप्त होते हैं।
b) मिश्रण के क्वथनांक पास-पास होने के कारण पृथक्करण की कठिनाई का उल्लेख करें।
c) यह नेम रिएक्शन (वुर्ट्ज अभिक्रिया) से जुड़ा एक महत्वपूर्ण वैचारिक प्रश्न है।
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