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Question 1: गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR) को परिभाषित कीजिए।
Answer:
गुच्छीय निस्यंदन दर (Glomerular Filtration Rate - GFR) वह मात्रा है जो दोनों किडनियों के सभी नेफ्रॉन द्वारा प्रति मिनट बनाई जाती है। एक स्वस्थ वयस्क मनुष्य में यह लगभग 125 मिलीलीटर प्रति मिनट होती है। गुच्छीय निस्यंदन में ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, सोडियम, पोटेशियम, यूरिया, यuric एसिड, कीटोन बॉडी और बड़ी मात्रा में पानी निस्यंदित होकर बोमेन संपूट में पहुँचते हैं। यह प्रक्रिया शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने और रक्त के शोधन का मुख्य चरण है।
मुख्य बिंदु:
• यह दोनों किडनियों के नेफ्रॉन्स द्वारा प्रति मिनट बनने वाले निस्यंद की कुल मात्रा है।
• एक स्वस्थ व्यक्ति में इसका सामान्य मान लगभग 125 मिलीलीटर प्रति मिनट होता है।
• इसमें रक्त प्लाज्मा के अधिकांश विलेय और जल छनकर बोमेन संपूट में आ जाते हैं।
आम गलतियाँ:
• इसे केवल एक किडनी का मान समझना जबकि यह दोनों किडनियों का कुल मान है।
• प्रति सेकंड या प्रति घंटे की दर बताना जबकि मानक इकाई प्रति मिनट है।
• निस्यंदन और पुनरावशोषण की मात्रा को एक ही मान लेना।
Exam Tips:
a) परिभाषा में 'प्रति मिनट' और '125 मिलीलीटर' जैसे मुख्य आँकड़े अवश्य लिखें।
b) इसे संक्षिप्त और स्पष्ट रूप में लिखकर वैज्ञानिक नाम (GFR) का उल्लेख करें।
c) यह एक-दो अंकों के लघु उत्तरीय प्रश्नों में अक्सर पूछा जाता है।
Question 2: गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR) की स्वनियमन क्रियाविधि को समझाइए।
Answer:
किडनी में गुच्छीय निस्यंदन दर को नियंत्रित करने के लिए एक प्रभावी स्वनियमन तंत्र होता है जिसे जक्स्टाग्लोमेरुलर उपकरण (JGA) संचालित करता है। यह तंत्र वाहिनियों और नेफ्रॉन की नलिका के संपर्क स्थल पर स्थित होता है। जब गुच्छीय रक्त प्रवाह या निस्यंदन दर में गिरावट आती है, तो जेजी कोशिकाएं सक्रिय होकर रेनिन नामक हार्मोन स्रावित करती हैं। रेनिन रक्त में मौजूद एंजियोटेंसिनोजन को एंजियोटेंसिन I और फिर II में बदलता है, जो शक्तिशाली वाहिका संकीर्णक है। यह रक्तदाब और गुच्छीय निस्यंदन दर को वापस सामान्य स्तर पर ले आता है।
मुख्य बिंदु:
• जक्स्टाग्लोमेरुलर उपकरण (JGA) इस स्वनियमन तंत्र का मुख्य भाग है।
• GFR घटने पर रेनिन हार्मोन का स्राव होता है जो रक्तदाब बढ़ाता है।
• यह तंत्र शरीर में रक्त के दबाव और निस्पंदन दर को स्थिर रखता है।
आम गलतियाँ:
• JGA की स्थिति और उसकी कार्यप्रणाली को गलत लिखना।
• रेनिन के कार्य को किसी अन्य हार्मोन से मिला देना।
• स्वनियमन का अर्थ पूरी तरह से तंत्रिका नियंत्रण समझ लेना।
Exam Tips:
a) JGA का पूरा नाम और उसकी स्थिति का वर्णन जरूर करें।
b) रेनिन-एंजियोटेंसिन तंत्र के चरणों को क्रमानुसार लिखें।
c) आरेख की सहायता से अभिवाही और अपवाही धमनी की स्थिति स्पष्ट करें।
Question 3: निम्नलिखित कथनों को सही अथवा गलत में इंगित कीजिए:
(अ) मुत्रण प्रतिवर्ती क्रिया द्वारा होता है।
(ब) एडीएच मूत्र को अल्पपरासारी बनाने सहायक होता है।
(स) बोमेन-संपूट में रक्तप्लाज्मा से प्रोटीन रहित तरल निस्यंदित होता है।
(द) हेनले-लूप मूत्र के सांद्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(य) समीपस्थ संवलित नलिका (PCT) में ग्लूकोज सक्रिय रूप से पुनः अवशोषित होता है।
Answer:
दिए गए कथनों के उत्तर इस प्रकार हैं: (अ) सही - मूत्रण एक प्रतिवर्ती क्रिया है जिसमें मूत्राशय की मांसपेशियां और तंत्रिकाएं काम करती हैं। (ब) गलत - एडीएच (ADH) मूत्र को सांद्र (अतिपरासारी) बनाने में सहायक होता है, न कि अल्पपरासारी। (स) सही - बोमेन संपूट में रक्त प्लाज्मा छनता है जिसमें बड़े प्रोटीन को छोड़कर अधिकांश तरल आ जाता है। (द) सही - हेनले लूप का लूप मज्जा में सांद्रण प्रवणता बनाए रखकर मूत्र सांद्रण में मुख्य भूमिका निभाता है। (य) सही - समीपस्थ संवलित नलिका में ग्लूकोज और आवश्यक पोषक तत्वों का सक्रिय पुनरावशोषण होता है।
मुख्य बिंदु:
• एडीएच (वसोप्रेसिन) जल के पुनरावशोषण को बढ़ाकर मूत्र को सांद्र करता है।
• PCT में ग्लूकोज और अमीनो अम्ल का सक्रिय परिवहन द्वारा पुनरावशोषण होता है।
• बोमेन संपूट की झिल्ली बड़े प्रोटीन अणुओं को छानने से रोकती है।
आम गलतियाँ:
• एडीएच के कार्य को विपरीत समझकर उसे अल्पपरासारी लिख देना।
• निस्यंदन में प्रोटीन के छनने या न छनने में भ्रमित होना।
• प्रतिवर्ती क्रिया और ऐच्छिक नियंत्रण के अंतर को न समझना।
Exam Tips:
a) प्रत्येक कथन को ध्यान से पढ़कर सत्य/असत्य का कारण भी मन में स्पष्ट रखें।
b) एडीएच और हेनले लूप के कार्यों से जुड़े प्रश्न बहुविकल्पीय में अक्सर आते हैं।
c) सभी भागों के उत्तर स्पष्ट रूप से (अ), (ब), (स), (द), (य) क्रम में लिखें।
Question 4: प्रतिधारा क्रियाविधि का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
Answer:
आकृति का विवरण: नेफ्रॉन और वासा रेक्टा के बीच विपरीत दिशा में बहने वाले रक्त और द्रव की व्यवस्था को दर्शाने वाला नामांकित आरेख।
किडनी के अंदर होने वाली प्रतिधारा क्रियाविधि (Counter-current Mechanism) पानी के संरक्षण और मूत्र के सांद्रण के लिए एक मुख्य अनुकूलन है। हेनले लूप और वासा रेक्टा इस क्रियाविधि में मुख्य भूमिका निभाते हैं, जिनमें रक्त या द्रव विपरीत दिशाओं में प्रवाहित होता है। हेनले लूप की आरोही और अवरोही भुजाएं तथा वासा रेक्टा की केशिकाएं मिलकर मज्जा में एक सांद्रता प्रवणता (Osmolality Gradient) बनाती हैं। यह प्रवणता कोर्टेक्स के 300 mOsm/L से बढ़कर आंतरिक मज्जा में लगभग 1200 mOsm/L तक हो जाती है। इस उच्च सांद्रता के कारण collecting duct (संग्रह नलिका) से पानी का पुनरावशोषण आसान हो जाता है, जिससे शरीर में जल सुरक्षित रहता है और गाढ़ा मूत्र बनता है।
मुख्य बिंदु:
• हेनले लूप और वासा रेक्टा के बीच विपरीत दिशा में द्रव का प्रवाह प्रतिधारा तंत्र बनाता है।
• यह मज्जा क्षेत्र में 300 से 1200 mOsm/L तक की परासरण प्रवणता स्थापित करता है।
• इस प्रक्रिया के कारण ही शरीर जल का संरक्षण कर पाता है और सांद्र मूत्र उत्सर्जित होता है।
आम गलतियाँ:
• हेनले लूप और वासा रेक्टा की समानांतर व्यवस्था और विपरीत प्रवाह को स्पष्ट न कर पाना।
• ऑस्मोलैरिटी के मानों (300 से 1200 mOsm/L) को भूल जाना या गलत लिखना।
• यह न समझ पाना कि यह क्रिया मूत्र सांद्रण में कैसे मदद करती है।
Exam Tips:
a) प्रतिधारा क्रियाविधि को समझाने के लिए हेनले लूप और वासा रेक्टा का सरल आरेख जरूर बनाएं।
b) सोडियम क्लोराइड (NaCl) और यूरिया की भूमिका का संक्षेप में उल्लेख करें।
c) यह दीर्घ उत्तरीय या विस्तृत प्रश्न के रूप में पूछा जाता है, इसलिए चरणबद्ध उत्तर दें।
Question 5: उत्सर्जन में यकृत, फुफ्फुस तथा त्वचा का महत्व बताइए।
Answer:
आकृति का विवरण: मानव यकृत की स्थिति और फुफ्फुस (फेफड़े) की कूपिकाओं में गैस विनिमय को दर्शाने वाले नामांकित चित्र।
मुख्य उत्सर्जी अंग किडनी के अलावा यकृत, फुफ्फुस और त्वचा भी शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यकृत शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है जो अमीनो अम्ल के विघटन से बने अत्यधिक जहरीले अमोनिया को कम जहरीले यूरिया में बदलता है, जिसे बाद में किडनी बाहर निकालती है। इसके अलावा यकृत पुराने हीमोग्लोबिन को तोड़कर पित्त वर्णक (बिलीरुबिन और बिलीवर्दीन) बनाता है जो मल के साथ उत्सर्जित होते हैं। फुफ्फुस (फेफड़े) प्रतिदिन बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (लगभग 200 मिलीलीटर प्रति मिनट) और वाष्प के रूप में जल को शरीर से बाहर निकालते हैं। त्वचा में मौजूद स्वेद ग्रंथियां (Sweat glands) पसीने के माध्यम से जल, नमक (NaCl) और थोड़ी मात्रा में यूरिया बाहर निकालती हैं, जबकि तैल ग्रंथियां (Sebaceous glands) सीबम के द्वारा कुछ हाइड्रोकार्बन और मोम जैसे पदार्थ बाहर निकालती हैं।
मुख्य बिंदु:
• यकृत अमोनिया को यूरिया में बदलता है और बिलीरुबिन जैसे पित्त वर्णक उत्सर्जित करता है।
• फुफ्फुस श्वसन क्रिया द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प का निष्कासन करते हैं।
• त्वचा पसीने और सीबम के जरिए अतिरिक्त लवण, जल और कुछ अपशिष्ट बाहर निकालती है।
आम गलतियाँ:
• केवल किडनी को ही एकमात्र उत्सर्जी अंग मान लेना और अन्य अंगों के योगदान को भूल जाना।
• यकृत द्वारा यूरिया निर्माण (ओर्निथिन चक्र) और पित्त वर्णकों के निष्कासन को स्पष्ट न करना।
• स्वेद और तैल ग्रंथियों के स्राव में अंतर न बता पाना।
Exam Tips:
a) तीनों अंगों (यकृत, फेफड़े, त्वचा) की हेडिंग बनाकर उनके द्वारा उत्सर्जित पदार्थों के नाम स्पष्ट लिखें।
b) यकृत के मामले में अमोनिया से यूरिया परिवर्तन की प्रक्रिया का उल्लेख अवश्य करें।
c) यह प्रश्न अक्सर संक्षिप्त टिप्पणी के रूप में पूछा जाता है।
Question 6: मुत्रण की व्याख्या कीजिए।
Answer:
आकृति का विवरण: मानव उत्सर्जन तंत्र का नामांकित आरेख जिसमें किडनी, मूत्रवाहिनी, मूत्राशय और मूत्रमार्ग दर्शाए गए हैं।
मूत्रण (Micturition) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मूत्राशय में एकत्रित मूत्र को शरीर से बाहर निकाला जाता है। जैसे-जैसे वृक्क से मूत्र आकर मूत्राशय में जमा होता है, मूत्राशय की दीवारें फैलती हैं। मूत्राशय की दीवार में स्थित संवेदी तंत्रिकाएं खिंचाव को महसूस करती हैं और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक संदेश भेजती हैं। इसके परिणामस्वरूप एक प्रतिवर्ती क्रिया स्थापित होती है जिसके कारण मूत्राशय की चिकनी मांसपेशियां सिकुड़ती हैं और मूत्रमार्ग का अवरोधक (sphincter) शिथिल हो जाता है। इससे मूत्र बलपूर्वक शरीर से बाहर निकल जाता है। एक वयस्क मनुष्य प्रतिदिन औसतन 1 से 1.5 लीटर मूत्र उत्सर्जित करता है।
मुख्य बिंदु:
• मूत्राशय के भरने पर उसकी दीवार केstretch रिसेप्टर्स सक्रिय होते हैं।
• यह एक प्रतिवर्ती क्रिया है जिसमें मूत्राशय की पेशियां सिकुड़ती हैं और स्फिंक्टर ढीला होता है।
• सामान्य वयस्क मनुष्य प्रतिदिन 1 से 1.5 लीटर मूत्र का उत्सर्जन करता है।
आम गलतियाँ:
• मूत्रण को पूरी तरह से केवल ऐच्छिक क्रिया समझ लेना जबकि यह प्रतिवर्ती क्रिया से शुरू होती है।
• मूत्राशय की पेशियों और मूत्रमार्ग के अवरोधक की भूमिका को उल्टा लिख देना।
• प्रतिदिन उत्सर्जित होने वाले मूत्र की सामान्य मात्रा न बताना।
Exam Tips:
a) मूत्रण की परिभाषा में 'प्रतिवर्ती क्रिया' शब्द का प्रयोग अवश्य करें।
b) मूत्राशय के फैलाव और तंत्रिका संकेतों के प्रवाह को सरल चरणों में समझाएं।
c) सामान्य मूत्र की मात्रा (1-1.5 लीटर) का आंकड़ा उत्तर में जरूर शामिल करें।
Question 7: स्तंभ I के बिंदुओं का खंड स्तंभ II से मिलान करें:
स्तंभ I
(i) अमोनियोउत्सर्जन
(ii) बोमेन-संपूट
(iii) मूत्रण
(iv) यूरिकाम्ल उत्सर्जन
(v) एडीएच
स्तंभ II
(क) पक्षी
(ख) जल का पुनः अवशोषण
(ग) अस्थिल मछलियां
(घ) मूत्राशय
(ङ) वृक्क नलिका
Answer:
स्तंभ I के विभिन्न जैविक पदों का स्तंभ II के सही विकल्पों के साथ मिलान इस प्रकार है: (i) अमोनियोउत्सर्जन का मिलान (ग) अस्थिल मछलियां के साथ है क्योंकि जलीय जीव अमोनिया उत्सर्जित करते हैं। (ii) बोमेन-संपूट का मिलान (ङ) वृक्क नलिका के साथ है क्योंकि यह नेफ्रॉन का प्रारंभिक प्यालेनुमा भाग है। (iii) मूत्रण का मिलान (घ) मूत्राशय के साथ है क्योंकि मूत्राशय से ही मूत्र बाहर निकलता है। (iv) यूरिकाम्ल उत्सर्जन का मिलान (क) पक्षी के साथ है क्योंकि पक्षी और सरीसृप यूरिक अम्ल उत्सर्जित करते हैं। (v) एडीएच का मिलान (ख) जल का पुनः अवशोषण के साथ है क्योंकि यह हार्मोन जल के पुनरावशोषण को नियंत्रित करता है।
मुख्य बिंदु:
• अमोनियोउत्सर्जन मुख्य रूप से जलीय जीवों जैसे अस्थिल मछलियों में होता है।
• बोमेन-संपूट वृक्क नलिका (नेफ्रॉन) का शुरुआती निस्यंदन भाग है।
• एडीएच जल के पुनरावशोषण को नियमित करके शरीर में जल संतुलन बनाए रखता है।
आम गलतियाँ:
• पक्षियों और जलीय जीवों के उत्सर्जी पदार्थों में भ्रमित होना।
• एडीएच के कार्य को भूलकर उसे किसी अन्य प्रक्रिया से मिला देना।
• मिलान करते समय गलत क्रम या संख्या लिख देना।
Exam Tips:
a) परीक्षा में मिलान वाले प्रश्नों को उत्तरपुिका में आमने-सामने सही जोड़ी बनाकर लिखें।
b) प्रत्येक विकल्प का जैविक कारण दिमाग में रखकर ही मिलान करें।
c) यह प्रश्न एक-एक अंक के बहुविकल्पीय या मिलान खंड में आ सकता है।
Question 8: परासरण नियमन का अर्थ बताइए।
Answer:
परासरण नियमन (Osmoregulation) वह समस्थैतिक (homeostatic) तंत्र है जो जीवों के ऊतकों और शरीर के तरल पदार्थों में पानी और लवण (आयन) के इष्टतम तापमान और सांद्रता को नियंत्रित रखता है। यह प्रक्रिया शरीर के आंतरिक वातावरण को बाहरी पर्यावरण के बदलावों के बावजूद स्थिर बनाए रखती है। इसके माध्यम से कोशिकाएं अत्यधिक पानी के प्रवेश या बाहर निकलने से सुरक्षित रहती हैं, जिससे उनकी सामान्य चयापचय क्रियाएं सुचारू रूप से चलती रहती हैं।
मुख्य बिंदु:
• यह शरीर के भीतर जल और आयनों (लवणों) की सांद्रता को नियंत्रित करने वाला तंत्र है।
• यह आंतरिक वातावरण को स्थिर (समस्थैतिक) बनाए रखने में मदद करता है।
• इसके द्वारा कोशिकाएं परासरण के दुष्प्रभावों से सुरक्षित रहती हैं।
आम गलतियाँ:
• परासरण नियमन को केवल उत्सर्जन समझ लेना जबकि यह जल और आयन संतुलन से जुड़ा है।
• समस्थैतिकता (Homeostasis) के महत्व को स्पष्ट न कर पाना।
• जलीय और स्थलीय जीवों में इसके अंतर को नजरअंदाज करना।
Exam Tips:
a) परिभाषा में 'जल और आयनिक सांद्रता' तथा 'आंतरिक वातावरण' शब्दों का प्रयोग करें।
b) इसे एक छोटी और सटीक परिभाषा के रूप में याद रखें।
c) यह जीव विज्ञान की शब्दावली आधारित प्रश्नों में अक्सर पूछा जाता है।
Question 9: स्थलीय प्राणी सामान्यतया यूरिया उत्सर्जी या यूरिक अम्ल उत्सर्जी होते हैं हैं तथा अमोनिया उत्सर्जी नहीं होते हैं, क्यों?
Answer:
स्थलीय जीवों को अपने शरीर में पानी बचाने की विशेष आवश्यकता होती है। अमोनिया अत्यधिक जहरीला उत्सर्जी पदार्थ है और इसे शरीर से बाहर निकालने के लिए बहुत अधिक मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है, जो स्थलीय आवास में आसानी से उपलब्ध नहीं होता है। इसलिए स्थलीय प्राणी अमोनिया को कम जहरीले यौगिकों जैसे यूरिया या यूरिक अम्ल में बदल लेते हैं। यूरिया को बाहर निकालने के लिए अमोनिया की तुलना में काफी कम पानी चाहिए होता है, जबकि यूरिक अम्ल और भी कम घुलनशील होता है और इसे लगभग बिना पानी के क्रिस्टल के रूप में उत्सर्जित किया जा सकता है। इस प्रकार, जल संरक्षण के लिए स्थलीय जीव यूरिया या यूरिक अम्ल उत्सर्जी होते हैं।
मुख्य बिंदु:
• अमोनिया अत्यधिक विषैला है और इसके निष्कासन हेतु प्रचुर मात्रा में जल की आवश्यकता होती है।
• स्थलीय जीवों के पास जल की कमी होती है, इसलिए वे अमोनिया को यूरिया या यूरिक अम्ल में बदलते हैं।
• यूरिक अम्ल सबसे कम घुलनशील है और न्यूनतम जल हानि के साथ उत्सर्जित होता है।
आम गलतियाँ:
• अमोनिया की विषाक्तता और जल की आवश्यकता के बीच के संबंध को न समझा पाना।
• यूरिया और यूरिक अम्ल के उत्सर्जन में पानी की खपत का अंतर स्पष्ट न करना।
• स्थलीय और जलीय जीवों की शारीरिक विवशता को आपस में मिला देना।
Exam Tips:
a) उत्तर में 'अमोनिया की अधिक विषैलापन' और 'जल संरक्षण की आवश्यकता' मुख्य कारण बताएं।
b) उत्सर्जी पदार्थों की विषाक्तता का क्रम याद रखें: अमोनिया > यूरिया > यूरिक अम्ल।
c) यह कारण बताओ (Reasoning) प्रकार का महत्वपूर्ण प्रश्न है।
Question 10: वृक्क के कार्य में जक्स्टाग्लोमेरुलर उपकरण (JGA) का क्या महत्व है?
Answer:
आकृति का विवरण: नेफ्रॉन के ग्लोमेरुलस, बोमेन संपूट और JGA (जक्स्टाग्लोमेरुलर उपकरण) की स्थिति को दर्शाने वाला आरेख।
वृक्क के कार्य में जक्स्टाग्लोमेरुलर उपकरण (Juxtaglomerular Apparatus - JGA) एक अत्यंत संवेदनशील स्वनियमन तंत्र है। यह दूरस्थ संवलित नलिका (DCT) और अभिवाही व अपवाही धमनी के संपर्क स्थल पर बनता है। जब गुच्छीय रक्तदाब, रक्त प्रवाह या GFR में गिरावट आती है, तो JGA की विशेष कोशिकाएं सक्रिय होकर 'रेनिन' नामक एंजाइम स्रावित करती हैं। रेनिन रक्त में मौजूद एंजियोटेंसिनोजन को एंजियोटेंसिन I और फिर II में परिवर्तित करता है। एंजियोटेंसिन II एक शक्तिशाली वाहिका संकीर्णक है जो रक्तदाब और GFR को तुरंत बढ़ा देता है। इसके अलावा, यह अधिवृक्क ग्रंथि से 'एल्डोस्टेरोन' के स्राव को भी प्रेरित करता है, जिससे सोडियम और जल का पुनरावशोषण बढ़ जाता है। इस प्रकार JGA रक्तदाब और गुच्छीय निस्यंदन दर को नियंत्रित रखने में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
मुख्य बिंदु:
• JGA दूरस्थ नलिका और अभिवाही धमनी के मिलने पर बना विशेष सूक्ष्म क्षेत्र है।
• रक्तदाब या GFR घटने पर यह रेनिन एंजाइम का स्राव करता है।
• यह रेनिन-एंजियोटेंसिन तंत्र के माध्यम से रक्तचाप और निस्यंदन दर को सामान्य करता है.
आम गलतियाँ:
• JGA की सही शारीरिक स्थिति (DCT और अभिवाही धमनी के बीच) का वर्णन न करना।
• रेनिन के कार्य को पाचन वाले 'रेनिन' दूध प्रोटीन पचाने वाले एंजाइम से भ्रमित करना।
• एल्डोस्टेरोन और सोडियम पुनरावशोषण की भूमिका को छोड़ देना।
Exam Tips:
a) JGA की स्थिति और उसके द्वारा स्रावित मुख्य हार्मोन (रेनिन) का स्पष्ट उल्लेख करें।
b) रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन मार्ग (RAAS) को प्रवाह चार्ट के रूप में समझाएं।
c) यह प्रश्न परीक्षा में अक्सर विस्तृत या कारण सहित व्याख्या में पूछा जाता है।
Question 11: नाम का उल्लेख कीजिए:
(अ) एक कशेरुकी जिसमें ज्वाला कोशिकाओं द्वारा उत्सर्जन होता है।
(ब) मनुष्य के वृक्क के वल्कुट के भाग जो मद्यांश के पिरामिड के बीच धँसे रहते हैं।
(स) हेनले-लूप के समानांतर उपस्थित केशिका का लूप।
Answer:
दिए गए प्रश्नों के सही नाम इस प्रकार हैं: (अ) एम्फिऑक्सस (Amphioxus) एक ऐसा कार्डेट है जिसमें उत्सर्जी संरचनाओं के रूप में ज्वाला कोशिकाएं (Flame cells या प्रोटोनेफ्रिडिया) पाई जाती हैं। (ब) मनुष्य के वृक्क में मज्जा पिरामिड के बीच प्रक्षेपित वल्कुट भाग को 'बर्टिनी के स्तंभ' (Columns of Bertin) कहा जाता है। (स) हेनले-लूप के समानांतर चलने वाली केशिका को 'वासा रेक्टा' (Vasa recta) कहा जाता है, जो हेनले लूप के साथ मिलकर प्रतिधारा क्रियाविधि द्वारा सांद्रता प्रवणता बनाए रखती है।
मुख्य बिंदु:
• एम्फिऑक्सस में ज्वाला कोशिकाएं आदिम प्रकार के उत्सर्जी तंत्र का कार्य करती हैं।
• बर्टिनी के स्तंभ वल्कुट ऊतकों के मज्जा पिरामिडों के बीच के विस्तार हैं।
• वासा रेक्टा हेनले लूप के समानांतर होती है और जल संतुलन में सहायता करती है।
आम गलतियाँ:
• एम्फिऑक्सस के स्थान पर केंचुआ या अन्य जीवों के नाम लिख देना।
• बर्टिनी के स्तंभ और नेफ्रॉन के अन्य भागों के नाम में उलझन होना।
• वासा रेक्टा और केशिका गुच्छ (Glomerulus) को एक ही समझ लेना।
Exam Tips:
a) प्रत्येक भाग के लिए सटीक वैज्ञानिक शब्दावलियों (एम्फिऑक्सस, बर्टिनी के स्तंभ, वासा रेक्टा) को याद रखें।
b) वन-लाइनर या बहुविकल्पीय प्रश्नों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है।
c) वर्तनी (Spelling) का विशेष ध्यान रखें।
Question 12: रिक्त स्थानों की पूर्ति करें:
(अ) हेनले-लूप की आरोही भुजा जल के लिए _______, जबकि अवरोही भुजा इसके लिए _______ है।
(ब) वृक्क नलिका के दूरस्थ भाग द्वारा जल का पुनरावशोषण _______ हार्मोन द्वारा होता है।
(स) अपोहन द्रव में _______ पदार्थ के अलावा रक्त प्लाज्मा के अन्य सभी पदार्थ उपस्थित होते हैं।
(द) एक स्वस्थ वयस्क मनुष्य द्वारा औसतन _______ ग्राम यूरिया का प्रतिदिन उत्सर्जन होता है।
Answer:
रिक्त स्थानों की सही पूर्ति इस प्रकार है: (अ) हेनले-लूप की आरोही भुजा जल के लिए अभेद्य (impermeable), जबकि अवरोही भुजा इसके लिए पारगम्य (permeable) है। (ब) वृक्क नलिका के दूरस्थ भाग द्वारा जल का पुनरावशोषण वैसोप्रेसिन (Vasopressin या ADH) हार्मोन द्वारा होता है। (स) अपोहन द्रव (Dialysing fluid) में नाइट्रोजनयुक्त अपशिष्ट पदार्थ के अलावा रक्त प्लाज्मा के अन्य सभी आवश्यक लवण और पदार्थ उपस्थित होते हैं। (द) एक स्वस्थ वयस्क मनुष्य द्वारा औसतन 25-30 ग्राम यूरिया का प्रतिदिन उत्सर्जन होता है।
मुख्य बिंदु:
• हेनले लूप की अवरोही भुजा जल के लिए पारगम्य और आरोही भुजा अपारगम्य होती है।
• वैसोप्रेसिन (ADH) दूरस्थ नलिका में जल के पुनरावशोषण को नियंत्रित करता है।
• कृत्रिम वृक्क (डायलिसिस) में अपशिष्ट मुक्त द्रव का उपयोग होता है।
आम गलतियाँ:
• आरोही और अवरोही भुजाओं की पारगम्यता को उलट देना।
• ADH हार्मोन का नाम भूल जाना या गलत हार्मोन लिखना।
• प्रतिदिन उत्सर्जित यूरिया की मात्रा (25-30 ग्राम) के आंकड़े में गलती करना।
Exam Tips:
a) रिक्त स्थानों वाले प्रश्नों में वैज्ञानिक शब्दों और सटीक मात्राओं को ही भरें।
b) हेनले लूप की पारगम्यता वाला तथ्य प्रतिधारा क्रियाविधि को समझने की नींव है।
c) यूरिया की मात्रा और एडीएच हार्मोन के नाम को अच्छी तरह याद कर लें।
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