NCERT Solutions Class 11 Biology Chapter 05 Morphology of Flowering Plants (पुष्पी पादपों की आकारिकी) in Hindi

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Question 1: एक पिच्छाकार संयुक्त पत्ती, हस्ताकार संयुक्त पत्ती से किस प्रकार भिन्न है?

Answer:

पिच्छाकार संयुक्त पत्ती (pinnately compound leaf) में एक सामान्य अक्ष होता है जिसे रैकिस (rachis) कहा जाता है, जिस पर कई पर्णक (leaflets) जुड़े होते हैं, जैसे नीम और कैसिया फिस्टुला। इसके विपरीत, हस्ताकार संयुक्त पत्ती (palmately compound leaf) में पर्णक एक ही सामान्य बिंदु यानी पर्ण डंठल के अग्र भाग पर जुड़े होते हैं, जैसे सिल्क कॉटन और कैनबिस। पिच्छाकार पत्तियों में पर्णक अक्ष के दोनों ओर पार्श्व में लगे होते हैं, जबकि हस्ताकार पत्तियों में वे हथेली की अंगुलियों की तरह एक ही केंद्रीय बिंदु से निकलते हैं। इस प्रकार दोनों में पर्णकों के जुड़ने का पैटर्न बिल्कुल अलग होता है।

मुख्य बिंदु:

• पिच्छाकार पत्ती में रैकिस नामक मुख्य अक्ष पर पर्णक व्यवस्थित होते हैं。
• हस्ताकार पत्ती में सभी पर्णक पर्णवृंत के एक ही शीर्ष बिंदु से जुड़े होते हैं。
• नीम पिच्छाकार का उदाहरण है और सिल्क कॉटन हस्ताकार का उदाहरण है।

आम गलतियाँ:

• रैकिस और पर्णवृंत के शीर्ष बिंदु में अंतर न समझ पाना।
• उदाहरणों को आपस में मिला देना।
• परिभाषा में मुख्य अक्ष का उल्लेख न करना।

Exam Tips:

a) दोनों पत्तियों के बीच अंतर स्पष्ट करने के लिए मुख्य अक्ष (रैकिस) की उपस्थिति या अनुपस्थिति का मुख्य रूप से उल्लेख करें।
b) प्रत्येक प्रकार का कम से कम एक वैज्ञानिक या सामान्य उदाहरण अवश्य याद रखें।
c) चित्र आधारित प्रश्नों के लिए इनके संरचनात्मक अंतर को ध्यान में रखें।

 

Question 2: विभिन्न प्रकार के पर्णविन्यास का उदाहरण सहित वर्णन करो।

Answer:

पर्णविन्यास (phyllotaxy) एक पौधे के तने या शाखा पर पत्तियों की व्यवस्था या पैटर्न को संदर्भित करता है। यह मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है: (i) एकांतर (alternate) पर्णविन्यास, जिसमें प्रत्येक गाँड (node) से एकांतर रूप से एक ही पत्ती निकलती है, जैसे सूरजमुखी, सरसों और पीपल। (ii) विपरीत (opposite) पर्णविन्यास, जिसमें प्रत्येक गाँठ से दो पत्तियाँ एक-दूसरे के विपरीत दिशा में उत्पन्न होती हैं, जैसे अमरूद और जामुन। (iii) चक्कारदार (whorled) पर्णविन्यास, जिसमें एक ही गाँठ से दो से अधिक पत्तियाँ चक्र के रूप में उत्पन्न होती हैं, जैसे अल्स्टोनिया। यह व्यवस्था पौधों को अधिकतम सूर्य का प्रकाश प्राप्त करने में सहायता करती है।

मुख्य बिंदु:

• एकांतर पर्णविन्यास में प्रत्येक गाँठ पर केवल एक पत्ती होती है (उदाहरण: सरसों)।
• विपरीत पर्णविन्यास में प्रत्येक गाँठ पर दो पत्तियाँ आमने-सामने होती हैं (उदाहरण: अमरूद)।
• चक्कारदार पर्णविन्यास में एक गाँठ पर तीन या अधिक पत्तियाँ चक्र बनाती हैं (उदाहरण: अल्स्टोनिया)।

आम गलतियाँ:

• विपरीत और चक्कारदार पर्णविन्यास की परिभाषा में पत्तियों की संख्या में भ्रम होना।
• गाँठ (node) शब्द के स्थान पर केवल तना लिख देना।
• दिए गए उदाहरणों को गलत पर्णविन्यास के साथ जोड़ देना।

Exam Tips:

a) तीनों प्रकार के पर्णविन्यास को हेडिंग और उनके उचित उदाहरणों के साथ सूचीबद्ध करें।
b) प्रत्येक प्रकार में प्रति गाँठ पत्तियों की संख्या को स्पष्ट रूप से दर्शाएँ।
c) यह प्रश्न अक्सर अंतर स्पष्ट करने या सीधे वर्णन के रूप में पूछा जाता है।

 

Question 3: निम्नलिखित की परिभाषा लिखो:
(क) पुष्प दल विन्यास
(ख) बीजांडासन
(ग) त्रिज्‍या सममिति
(घ) एकव्यास सममिति
(ङ) ऊर्ध्ववर्ती
(च) परिजायंगी पुष्प
(छ) दललग्न पुंकेसर

Answer:

आकृति का विवरण: इसमें पुष्प के विभिन्न भागों की व्यवस्था, पुष्प दल विन्यास, बीजांडासन के प्रकार और पुष्प की सममिति को दर्शाया गया है।
(क) पुष्प दल विन्यास (Aestivation): पुष्पीय कली में बाह्यदल या पंखुड़ियों की परस्पर व्यवस्था को पुष्प दल विन्यास कहते हैं, जैसे कोरस्पर्शी, व्यावर्तित, कोरछादी और वेक्सीलेरी।
(ख) बीजांडासन (Placentation): अंडाशय के भीतर बीजांडों (ovules) की व्यवस्था को बीजांडासन कहते हैं, जो सीमांत, स्तंभीय, भित्तिीय, आधारी और मुक्तस्तम्भीय प्रकार का हो सकता है।
(ग) त्रिज्‍या सममिति (Actinomorphic): जब किसी पुष्प को केंद्र से गुजरने वाले किसी भी त्रिज्य तल (radial plane) द्वारा दो समान भागों में विभाजित किया जा सके, तो उसे त्रिज्य सममित कहते हैं, जैसे मिर्च और सरसों।
(घ) एकव्यास सममिति (Zygomorphic): जब पुष्प को केवल एक ही ऊर्ध्वाधर तल द्वारा दो समान भागों में विभाजित किया जा सके, तो उसे एकव्यास सममित कहते हैं, जैसे मटर और सेम।
(ङ) ऊर्ध्ववर्ती (Hypogynous/Superior ovary): ऐसा पुष्प जिसमें जायांग सर्वोच्च स्थान पर उपस्थित होता है और अन्य पुष्पीय भाग उसके नीचे से शुरू होते हैं, इसमें अंडाशय ऊर्ध्ववर्ती होता है, जैसे बैंगन और सरसों।
(च) परिजायंगी पुष्प (Perigynous): ऐसा पुष्प जिसमें जायांग केंद्र में होता है और अन्य पुष्पीय भाग थैलेमस के रिम पर समान स्तर पर व्यवस्थित होते हैं, जैसे बेर और गुलाब।
(छ) दललग्न पुंकेसर (Epipetalous): जब पुंकेसर दलपुंज यानी पंखुड़ियों से जुड़े होते हैं, तो उन्हें दललग्न पुंकेसर कहते हैं, जैसे बैंगन।

मुख्य बिंदु:

• पुष्प दल विन्यास कली की अवस्था में दलों की व्यवस्था है।
• त्रिज्य सममिति को किसी भी तल से दो बराबर भागों में बाँटा जा सकता है, जबकि एकव्यास सममिति में केवल एक ही तल होता है।
• ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय में जायांग सबसे ऊपर और परिजायंगी में मध्य स्तर पर होता है।

आम गलतियाँ:

• त्रिज्य और एकव्यास सममिति के उदाहरणों को आपस में मिला देना।
• ऊर्ध्ववर्ती और परिजायंगी की स्थिति में थैलेमस और अंडाशय की स्थिति गलत लिखना।
• दललग्न पुंकेसर को दलपुंज से अलग समझ लेना।

Exam Tips:

a) प्रत्येक परिभाषा के साथ एक उपयुक्त उदाहरण अवश्य लिखें।
b) सममिति के लिए 'किसी भी तल' और 'केवल एक तल' जैसे कीवर्ड्स का सही प्रयोग करें।
c) पुष्पीय भागों की स्थिति (ऊपर, नीचे, समान स्तर) को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें।

 

Question 4: निम्नलिखित में अंतर लिखो:
(अ) असीमाक्षी तथा सीमाक्षी पुष्पक्रम
(ब) युक्तांडपी तथा वियुक्ततांडपी अंडाशय

Answer:

(अ) असीमाक्षी (Racemose) तथा सीमाक्षी (Cymose) पुष्पक्रम में अंतर: असीमाक्षी पुष्पक्रम में मुख्य धुरी लगातार बढ़ती रहती है और फूल अग्रभिसारी क्रम (acropetal succession) में लगते हैं यानी नए फूल ऊपर और पुराने फूल नीचे होते हैं। इसके विपरीत, सीमाक्षी पुष्पक्रम में मुख्य धुरी एक फूल में समाप्त हो जाती है और वृद्धि सीमित होती है, तथा फूल तलाभिसारी क्रम (basipetal succession) में लगते हैं यानी नए फूल नीचे और पुराने फूल शीर्ष पर होते हैं।
(ब) वियुक्ततांडपी (Apocarpous) तथा युक्तांडपी (Syncarpous) अंडाशय में अंतर: वियुक्ततांडपी अंडाशय वाले पुष्पों में एक से अधिक अंडप होते हैं परंतु वे आपस में स्वतंत्र (मुक्त) होते हैं, जैसे कमल और गुलाब के फूल। इसके विपरीत, युक्तांडपी अंडाशय में भी एक से अधिक अंडप होते हैं, लेकिन वे आपस में जुड़े हुए होते हैं, जैसे टमाटर और सरसों के फूल।

मुख्य बिंदु:

• असीमाक्षी में मुख्य धुरी बढ़ती है (असीमित वृद्धि), जबकि सीमाक्षी में मुख्य धुरी फूल में समाप्त होती है (सीमित वृद्धि)।
• असीमाक्षी में अग्रभिसारी तथा सीमाक्षी में तलाभिसारी क्रम होता है।
• वियुक्ततांडपी में अंडप मुक्त होते हैं, जबकि युक्तांडपी में वे आपस में संयुक्त होते हैं।

आम गलतियाँ:

• अग्रभिसारी और तलाभिसारी क्रम के अर्थ को उल्टा समझ लेना।
• वियुक्ततांडपी और युक्तांडपी के उदाहरणों में भ्रमित होना।
• मुख्य धुरी की वृद्धि के अंतर को स्पष्ट न कर पाना।

Exam Tips:

a) अंतर हमेशा तालिका बनाकर या स्पष्ट बिंदुओं के रूप में लिखें।
b) वृद्धि की सीमा और फूलों के लगने के क्रम (अग्रभिसारी/तलाभिसारी) को मुख्य आधार बनाएँ।
c) प्रत्येक भाग के लिए दो-दो सटीक उदाहरण याद रखें।

 

Question 5: निम्नलिखित के चिह्नित चित्र बनाओ:
(अ) चने के बीज तथा
(ब) मक्के के बीज का अनुदैर्ध्यकाट

Answer:

आकृति का विवरण: इसमें द्विबीजपत्री चने के बीज और एकबीजपत्री मक्के के बीज की आंतरिक संरचना का अनुदैर्ध्य काट दिखाया गया है, जिसमें बीजआवरण, बीजपत्र, प्रांकुर, मूलांकुर, और भ्रूणपोष को चिह्नित किया गया है।
(अ) चने का बीज: यह एक द्विबीजपत्री (dicot) बीज है। इसके बाहरी आवरण को बीजआवरण कहते हैं जिस पर नाभििका और बीजद्वार होते हैं। इसके अंदर दो मानसल बीजपत्र होते हैं जो भ्रूण को पोषण देते हैं। बीज अक्ष पर प्रांकुर (जो प्ररोह बनाता है) और मूलांकुर (जो जड़ बनाता है) स्थित होते हैं।
(ब) मक्के का बीज: यह एक एकबीजपत्री (monocot) बीज है। इसमें बीजआवरण और भ्रूणपोष जुड़े होते हैं। भ्रूणपोष खाद्य पदार्थों का संग्रह करता है। इसका एकल बीजपत्र स्कूटेलम कहलाता है। भ्रूण अक्ष के ऊपर प्रांकुरचोल से ढँका प्रांकुर और नीचे मूलांकुरचोल से ढँका मूलांकुर होता है।

मुख्य बिंदु:

• चना द्विबीजपत्री है जिसमें दो बीजपत्र और स्पष्ट मूलांकुर-प्रांकुर होते हैं।
• मक्का एकबीजपत्री है जिसमें भ्रूणपोष प्रमुख होता है और बीजपत्र स्कूटेलम कहलाता है।
• मक्के के बीज में प्रांकुरचोल और मूलांकुरचोल सुरक्षात्मक आवरण होते हैं।

आम गलतियाँ:

• चने और मक्के के चित्रों के लेबलिंग को आपस में मिला देना।
• स्कूटेलम और भ्रूणपोष की सही स्थिति न दर्शाना।
• प्रांकुर और मूलांकुर के स्थान को गलत बनाना।

Exam Tips:

a) चित्र बनाते समय पेंसिल का प्रयोग करें और सभी मुख्य भागों (बीजआवरण, प्रांकुर, मूलांकुर, बीजपत्र) के नाम स्पष्ट लिखें।
b) द्विबीजपत्री और एकबीजपत्री बीज की संरचना का मुख्य अंतर (जैसे स्कूटेलम की उपस्थिति) ध्यान रखें।
c) यह आरेखीय प्रश्न परीक्षा में बहुत बार पूछा जाता है, इसलिए इसका बार-बार अभ्यास करें।

 

Question 6: सोलैनेसी कुल के एक पुष्प को उदाहरण के रूप में लो तथा उनका अर्द्धतकनीकी का विवरण करो। पुष्पीय चित्र भी बनाओ।

Answer:

आकृति का विवरण: इसमें सोलैनेसी कुल के प्रतिनिधि पौधे (जैसे सोलनम नाइग्रम या मकोय) की वानस्पतिक शाखा, पुष्प, अनुदैर्ध्य काट, पुंकेसर, जायांग और पुष्पीय आरेख को दर्शाया गया है।
सोलैनेसी (Solanaceae) कुल का अर्द्धतकनीकी विवरण निम्नलिखित है:
परिवार: सोलैनेसी
वानस्पतिक विशेषताएँ: पौधे प्रायः शाकीय, झाड़ियाँ तथा छोटे वृक्ष होते हैं। पत्तियाँ एकांतर, पिच्छाकार या सरल, जालीदार शिराविन्यास वाली होती हैं। तना शाकीय, कभी-कभी काष्ठीय, सीधा और रोमयुक्त होता है।
पुष्पीय अभिलक्षण: पुष्प उभयलिंगी और त्रिज्य सममित होते हैं। बाह्यदलपुंज में पाँच बाह्यदल होते हैं जो संयुक्त और कोरस्पर्शी होते हैं। दलपुंज में पाँच दल होते हैं जो संयुक्त और कोरस्पर्शी होते हैं। पुंमंग में पाँच दललग्न पुंकेसर होते हैं। जायांग द्विअंडपी, युक्तांडपी, तिरछी अंडाशय ऊर्ध्ववर्ती, द्विकोष्ठी, बीजांडासन फूला हुआ जिसमें बहुत से बीजांड होते हैं।
फल: संपুট अथवा सरस।
बीज: भ्रूणपोषी, अनेक।
पुष्पीय सूत्र: ⊕ ⚥ K(5) C(5) A5 G(2)

मुख्य बिंदु:

• सोलैनेसी कुल के पुष्प त्रिज्य सममित और उभयलिंगी होते हैं।
• इसमें दललग्न पुंकेसर और संयुक्त बाह्यदल व दलपुंज पाए जाते हैं।
• अंडाशय द्विअंडपी, युक्तांडपी और तिरछा होता है।

आम गलतियाँ:

• पुष्पीय सूत्र में कोष्ठकों (brackets) का सही प्रयोग न करना (जैसे संयुक्त अवस्था के लिए)।
• पुष्प की सममिति का प्रतीक गलत बनाना।
• अंडाशय की स्थिति (ऊर्ध्ववर्ती) को गलत लिखना।

Exam Tips:

a) सोलैनेसी, फैबेसी या लिलिऐसी कुल का अर्द्धतकनीकी विवरण और पुष्पीय सूत्र निश्चित रूप से तैयार करें।
b) पुष्पीय सूत्र लिखते समय प्रतीकों (⊕, ⚥, K, C, A, G) का सही क्रम याद रखें।
c) वर्णन को बिंदुओं (वंश, पत्तियाँ, पुष्प, फल, बीज) में लिखकर स्पष्ट करें।

 

Question 7: पुष्पी पादपों में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के बीजांडान्यासों का वर्णन करो।

Answer:

आकृति का विवरण: इसमें अंडाशय के भीतर बीजांडों की व्यवस्था के विभिन्न प्रकार यानी बीजांडासन (placentation) जैसे सीमांत, भित्तीय, स्तंभीय, आधारी और मुक्तस्तम्भीय को चित्रों द्वारा दर्शाया गया है।
बीजांडासन अंडाशय के अंदर बीजांडों की व्यवस्था को संदर्भित करता है। यह मुख्य रूप से पाँच प्रकार का होता है: (1) सीमांत बीजांडासन (Marginal): इसमें बीजांडासन अंडाशय के अदर सीवन के साथ-साथ कटक बनाता है और बीजांड कटक पर स्थित रहते हैं, जैसे मटर। (2) भित्तीय बीजांडासन (Parietal): इसमें बीजांड अंडाशय की भीतरी भित्ति पर लगे होते हैं, जैसे सरसों। (3) स्तंभीय बीजांडासन (Axile): जब बीजांडासन अक्षीय होता है और बीजांड बहुकोष्ठी अंडाशय पर लगे होते हैं, जैसे गुड़हल और टमाटर। (4) आधारी बीजांडासन (Basal): इसमें बीजांडासन अंडाशय के आधार पर होता है और इसमें केवल एक बीजांड होता है, जैसे सूरजमुखी और गेंदा। (5) मुक्तस्तम्भीय बीजांडासन (Free central): जब बीजांड केंद्रीय कक्ष में होते हैं और भित्तिीय पट्टिकाएँ नहीं होती हैं, जैसे डायैंथस और प्रिमरोज।

मुख्य बिंदु:

• सीमांत बीजांडासन में बीजांड किनारों पर कटक बनाते हैं (उदाहरण: मटर)।
• स्तंभीय बीजांडासन बहुकोष्ठी अंडाशय के केंद्र में अक्ष पर होता है (उदाहरण: टमाटर)।
• आधारी बीजांडासन में आधार पर केवल एक बीजांड होता है (उदाहरण: गेंदा)।

आम गलतियाँ:

• भित्तीय और मुक्तस्तम्भीय बीजांडासन में अंतर न समझ पाना।
• प्रत्येक प्रकार के सही उदाहरण न लिख पाना।
• अंडाशय के कोष्ठों की संख्या का उल्लेख भूल जाना।

Exam Tips:

a) सभी पाँचों प्रकार के बीजांडासन के नाम और उनके एक-एक मुख्य उदाहरण अच्छी तरह याद रखें।
b) परिभाषा लिखते समय 'अंडाशय के भीतर बीजांडों की व्यवस्था' मुख्य शब्दावली का प्रयोग करें।
c) यदि संभव हो तो रेखाचित्र बनाकर व्याख्या को अधिक प्रभावी बनाएँ।

 

Question 8: पत्तियों के विभिन्न रूपांतरण पौधे की कैसे सहायता करते हैं?

Answer:

आकृति का विवरण: इसमें पत्तियों के विभिन्न रूपांतरणों जैसे प्रतान (मटर), शूल या काँटे (नागफनी), गद्देदार पत्तियाँ (प्याज) और कीटभक्षी पत्तियों को चित्रों द्वारा प्रदर्शित किया गया है।
पत्तियों का मुख्य कार्य प्रकाश संश्लेषण करना है, किंतु कुछ पौधों में विभिन्न विशेष कार्यों के लिए पत्तियाँ रूपांतरित हो जाती हैं: (1) प्रतान (Tendrils): मटर के पौधे की पत्तियाँ प्रतान में रूपांतरित हो जाती हैं जो पौधों को ऊपर चढ़ने में सहायता करती हैं। (2) शूल या काँटे (Spines): नागफनी (Cactus) में पत्तियाँ तेज काँटों में बदल जाती हैं जो रक्षा का कार्य करती हैं और वाष्पोत्सर्जन को रोकती हैं। (3) मांसल/गुद्देदार पत्तियाँ: प्याज और लहसुन की गुद्देदार पत्तियाँ भोजन का संचय करती हैं। (4) कीटभक्षी पौधे: कुछ पौधों (जैसे पिचर प्लांट और वीनस फ्लाईट्रैप) की पत्तियाँ कीटों को फंसाने और पचाने के लिए घड़े जैसी संरचनाओं में बदल जाती हैं ताकि नाइट्रोजन की कमी पूरी हो सके।

मुख्य बिंदु:

• मटर में पत्ती का प्रतान पौधे को चढ़ने में मदद करता है।
• नागफनी में पत्तियाँ शूल में बदलकर सुरक्षा और जल संरक्षण करती हैं।
• प्याज में गुद्देदार पत्तियाँ खाद्य संचय करती हैं।

आम गलतियाँ:

• तने के रूपांतरण और पत्ती के रूपांतरण को आपस में मिला देना।
• कीटभक्षी पौधों में पत्तियों के कार्य को केवल प्रकाश संश्लेषण तक सीमित समझना।
• रूपांतरण के सही जैविक उद्देश्य (जैसे सुरक्षा या जल संचय) न लिखना।

Exam Tips:

a) पत्तियों के रूपांतरणों को उदाहरण (मटर, नागफनी, प्याज) सहित सूचबद्घ करें।
b) प्रत्येक रूपांतरण का विशिष्ट कार्य (जैसे चढ़ना, सुरक्षा, संचय) स्पष्ट रूप से बताएँ।
c) यह दीर्घ उत्तरीय या संक्षिप्त टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

 

Question 9: पुष्पक्रम की परिभाषा करो। पुष्पी पादपों में विभिन्न प्रकार के पुष्पक्रमों के आधार का वर्णन करो।

Answer:

आकृति का विवरण: इसमें पुष्पीय अक्ष पर फूलों की व्यवस्था के विभिन्न प्रकारों को आरेखीय रूप में दर्शाया गया है।
पुष्पक्रम (Inflorescence) वह तरीका है जिसमें फूलों को पुष्पी अक्ष (peduncle) पर व्यवस्थित किया जाता है। फूलों के मौसम के दौरान, तने का वानस्पतिक शीर्ष पुष्पज्योतक (floral meristem) में परिवर्तित हो जाता है। मुख्य रूप से पुष्पक्रम को दो प्रमुख प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है: (1) असीमाक्षी (Racemose) पुष्पक्रम: इस प्रकार के पुष्पक्रम में मुख्य अक्ष लगातार बढ़ता रहता है और फूल कभी समाप्त नहीं होते बल्कि नए फूल ऊपर की ओर लगते हैं (अग्रभिसारी क्रम)। इसमें वृद्धि असीम होती है। (2) सीमाक्षी (Cymose) पुष्पक्रम: इस प्रकार के पुष्पक्रम में मुख्य अक्ष एक फूल में समाप्त हो जाता है, इसलिए मुख्य अक्ष की वृद्धि सीमित होती है और नए फूल नीचे की ओर लगते हैं (तलाभिसारी क्रम)।

मुख्य बिंदु:

• पुष्पक्रम पुष्पी अक्ष पर फूलों की व्यवस्था को कहते हैं।
• असीमाक्षी में मुख्य अक्ष की वृद्धि असीम होती है और फूल अग्रभिसारी क्रम में लगते हैं।
• सीमाक्षी में मुख्य अक्ष फूल में समाप्त हो जाता है और वृद्धि सीमित होती है।

आम गलतियाँ:

• असीमाक्षी और सीमाक्षी की वृद्धि के प्रकार (असीम बनाम सीमित) में भ्रमित होना।
• अग्रभिसारी और तलाभिसारी क्रम की परिभाषा गलत लिखना।
• पुष्पी अक्ष (peduncle) शब्द का प्रयोग न करना।

Exam Tips:

a) पुष्पक्रम की परिभाषा लिखकर उसके दोनों मुख्य प्रकारों की तुलनात्मक तालिका बनाएँ।
b) वृद्धि की सीमा (असीम/सीमित) को मुख्य आधार के रूप में समझाएँ।
c) चित्रों के माध्यम से अक्ष के अंत (फूल में समाप्त होना या न होना) को दर्शाने का अभ्यास करें।

 

Question 10: पुष्पासन पर स्थिति के अनुसार लगे पुष्पीय भागों का वर्णन करो।

Answer:

आकृति का विवरण: इसमें पुष्पासन पर अन्य पुष्पीय अंगों (बाह्यदल, दलपुंज और पुंमंग) की स्थिति के आधार पर हाइपोगिनस, पेरीगिनस और एपिगिनस अवस्थाओं को चित्रों द्वारा दर्शाया गया है।
पुष्पासन (thalamus) पर स्थिति के आधार पर पुष्पीय भाग निम्नलिखित प्रकार से व्यवस्थित होते हैं: (1) हाइपोगिनस (Hypogynous) या अधो जायांगी: इस व्यवस्था में जायांग थैलेमस पर उच्चतम स्थान रखता है और अन्य पुष्पीय भाग (बाह्यदल, दलदल, पुंकेसर) उसके नीचे स्थित होते हैं। इसमें अंडाशय ऊर्ध्ववर्ती (superior) होता है, जैसे सरसों और चीन गुलाब। (2) पेरीगिनस (Perigynous) या परिजायंगी: इसमें जायांग केंद्र में होता है और अन्य पुष्पीय भाग थैलेमस के रिम या किनारे पर समान स्तर पर व्यवस्थित होते हैं। इसमें अंडाशय अर्ध-अधोवर्ती (half-inferior) होता है, जैसे गुलाब और बेर। (3) एपिगिनस (Epigynous) या अधि जायांगी: इसमें थैलेमस अंडाशय के चारों ओर बढ़ता है और इसके साथ संलयित हो जाता है, जिससे अन्य पुष्पीय भाग अंडाशय के ऊपर स्थित होते हैं। इसमें अंडाशय अधोवर्ती (inferior) होता है, जैसे अमरूद और ककड़ी के फूल।

मुख्य बिंदु:

• हाइपोगिनस पुष्प में अंडाशय ऊर्ध्ववर्ती होता है और अन्य भाग नीचे होते हैं।
• पेरीगिनस पुष्प में अंडाशय अर्ध-अधोवर्ती और भाग समान स्तर पर होते हैं।
• एपिगिनस पुष्प में अंडाशय अधोवर्ती होता है और अन्य भाग सबसे ऊपर होते हैं।

आम गलतियाँ:

• ऊर्ध्ववर्ती, अर्ध-अधोवर्ती और अधोवर्ती अंडाशय की स्थितियों को आपस में मिला देना।
• थैलेमस की स्थिति और पुष्पीय भागों के स्तर को स्पष्ट न कर पाना।
• प्रत्येक प्रकार के सही उदाहरण न लिखना।

Exam Tips:

a) तीनों अवस्थाओं (हाइपोगिनस, पेरीगिनस, एपिगिनस) को उनके अंडाशय के प्रकार (ऊर्ध्ववर्ती, अर्ध-अधोवर्ती, अधोवर्ती) के साथ याद रखें।
b) प्रत्येक अवस्था के लिए कम से कम दो-दो लोकप्रिय उदाहरण जरूर दें।
c) यह वनस्पति विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संकल्पना आधारित प्रश्न है।

 

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