Step-by-Step Textbook Solutions for Class 11 Biology Chapter 04 प्राणि जगत
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Question 1: यदि मूलभूत लक्षण ज्ञात न हों तो प्राणियों के वर्गीकरण में आप क्या परेशानियाँ महसूस करेंगे?
Answer:
यदि हमें प्राणियों के मूलभूत लक्षण जैसे संगठन का स्तर, सममिति, प्रगुहा, और खंडीभवन ज्ञात न हों, तो जीवों का वर्गीकरण करना असंभव या अत्यंत भ्रामक हो जाएगा। वर्गीकरण का मुख्य उद्देश्य जीवों के बीच समानताओं और भिन्नताओं को पहचानकर उन्हें सही समूहों में व्यवस्थित करना है। यदि हम किसी विशिष्ट या सतही लक्षण पर विचार करेंगे, तो प्रत्येक जीव को एक अलग समूह में रखना पड़ेगा, जिससे वर्गीकरण का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होगा। जीवों के विकासवादी संबंधों (फाइलोजेनी) को समझने के लिए मूलभूत और संरक्षित शारीरिक विशेषताओं का ज्ञान होना अनिवार्य है।
मुख्य बिंदु:
• मूलभूत लक्षणों के अभाव में जीवों का सही समूहीकरण और उनकी पहचान कठिन हो जाती है।
• केवल विशिष्ट या बाहरी लक्षणों के आधार पर वर्गीकरण करने से वर्गीकरण का उद्देश्य पूरा नहीं होता।
• जीवों के विकासवादी संबंधों को समझने के लिए शारीरिक संगठन के मूलभूत लक्षण आवश्यक हैं।
आम गलतियाँ:
• केवल बाहरी रूप-रंग को ही वर्गीकरण का मुख्य आधार मान लेना।
• वर्गीकरण के वैज्ञानिक उद्देश्यों और विकासवादी महत्व को नजरअंदाज करना।
• शारीरिक संगठन के मूलभूत स्तरों की महत्ता को न समझना।
Exam Tips:
a) वर्गीकरण के आधारभूत सिद्धांतों जैसे संगठन स्तर और सममिति को हमेशा प्राथमिकता दें।
b) उत्तर लिखते समय यह स्पष्ट करें कि मूलभूत लक्षण प्रजातियों के बीच आनुवंशिक संबंध दर्शाते हैं।
c) सतही लक्षणों और मूलभूत लक्षणों के अंतर को उदाहरण सहित समझाइए।
Question 2: यदि आपको एक नमूना (स्पेसिमेन) दे दिया जाए तो वर्गीकरण हेतु आप क्या कदम अपनाएंगे?
Answer:
आकृति का विवरण: एक फ्लोचार्ट दिया गया है जो प्राणी जगत के वर्गीकरण के विभिन्न स्तरों जैसे संगठन का स्तर, सममिति, प्रगुहा और संघ को दर्शाता है।
यदि हमें अध्ययन के लिए कोई नया नमूना (स्पेसिमेन) दिया जाए, तो हम उसके वर्गीकरण के लिए क्रमिक वैज्ञानिक चरणों का पालन करेंगे। सबसे पहले हम यह देखेंगे कि जीव कोशिकीय स्तर का है या ऊतक/अंग/अंग तंत्र स्तर का है। इसके बाद उसकी सममिति की जाँच करेंगे कि वह असममित है, अरीय सममित है या द्विपार्श्व सममित है। अगले चरण में हम शरीर की देहगुहा (प्रगुहा) की स्थिति देखेंगे कि जीव अचूक रूप से अगुहीय है, कूटगुहीय है या सत्य प्रगुहीय है। इन सभी मूलभूत शारीरिक विशेषताओं के आधार पर हम उस नमूने को उसके संबंधित संघ (फाइलम) जैसे पोरिफेरा, एनेलिडा, आर्थोपोडा या कॉर्डेटा आदि में आसानी से वर्गीकृत कर सकते हैं।
मुख्य बिंदु:
• सबसे पहले प्राणी के संगठन के स्तर (कोशिकीय या अंग तंत्र) की पहचान की जाती है।
• इसके बाद सममिति और प्रगुहा (सिलोम) की उपस्थिति या अनुपस्थिति की जाँच की जाती है।
• इन सभी लक्षणों के क्रमिक विश्लेषण से नमूने को उसके सही संघ में रखा जाता है।
आम गलतियाँ:
• चरणों का क्रम बदले बिना सीधा संघ का अनुमान लगाने की कोशिश करना।
• प्रगुहा और सममिति जैसी महत्वपूर्ण विशेषताओं को छोड़ देना।
• फ्लोचार्ट के सही क्रम को याद न रखना।
Exam Tips:
a) वर्गीकरण पदानुक्रम (Hierarchy) के चरणों को हमेशा क्रमबद्ध तरीके से याद रखें।
b) प्रगुहा और सममिति के प्रकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना सीखें।
c) इस प्रकार के प्रश्नों में पदानुक्रम चार्ट बनाने से अंक अच्छे मिलते हैं।
Question 3: देहगुहा एवं प्रगुहा का अध्ययन प्राणियों के वर्गीकरण में किस प्रकार सहायक होता है?
Answer:
देहगुहा या प्रगुहा (सिलोम) शरीर की दीवार और आहार तंत्र के बीच स्थित उस गुहा को कहते हैं जो mesoderm (मध्यजनस्तर) से आच्छादित होती है। प्रगुहा की उपस्थिति या अनुपस्थिति प्राणियों के वर्गीकरण में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिन जीवों में शरीर की दीवार और पाचन तंत्र के बीच कोई गुहा नहीं होती, उन्हें अगुहीय (एलोइमेट्स) कहा जाता है (जैसे प्लेटीहैल्मिंथिस)। जिन जीवों में यह गुहा मध्यजनस्तर से पूरी तरह आच्छादित नहीं होती बल्कि थैलियों के रूप में बिखरी रहती है, उन्हें कूटगुहीय (स्यूडोइलोइमेट्स) कहते हैं (जैसे एस्केल्मिंथिस)। इसके विपरीत, जिन जीवों में सत्य प्रगुहा पाई जाती है, उन्हें प्रगुहीय (इलोइमेट्स) कहा जाता है (जैसे एनेलिडा, आर्थोपोडा, मोलस्का, इकाइनोडर्मेटा और कॉर्डेटा)। यह वर्गीकरण जीवों की शारीरिक जटिलता को समझने में मदद करता है।
मुख्य बिंदु:
• देहगुहा मध्यजनस्तर से आच्छादित शरीर की आंतरिक गुहा होती है।
• इसके आधार पर जीव अगुहीय, कूटगुहीय और सत्य प्रगुहीय में विभाजित किए जाते हैं।
• यह लक्षण जीवों के विकास और उनकी शारीरिक जटिलता को स्पष्ट करता है।
आम गलतियाँ:
• प्रगुहा और पाचन नली की गुहा को एक ही मान लेना।
• कूटगुहीय और अगुहीय जीवों के उदाहरणों में भ्रमित होना।
• मध्यजनस्तर की भूमिका को स्पष्ट न करना।
Exam Tips:
a) सिलोम (प्रगुहा) की परिभाषा और उसके प्रकारों के एक-एक उदाहरण जरूर याद रखें।
b) प्लेटीहैल्मिंथिस (अगुहीय) और एस्केल्मिंथिस (कूटगुहीय) का अंतर स्पष्ट रूप से लिखें।
c) नामांकित आरेख की सहायता से प्रगुहा की स्थिति को दर्शाना लाभदायक होता है।
Question 4: अंतःकोशिकीय एवं बाह्य कोशिकीय पाचन में विभेद करें।
Answer:
अंतःकोशिकीय पाचन वह प्रक्रिया है जिसमें भोजन का पाचन सीधे कोशिका के भीतर खाद्य रिक्तिका (फूड वैक्यूओल) में होता है और इसके लिए पाचक एंजाइम cytoplasm (कोशिकाद्रव्य) से स्रावित होते हैं। यह आमतौर पर सरल और एककोशिकीय जीवों में पाया जाता है, और पचे हुए पदार्थों को कोशिकाद्रव्य में फैला दिया जाता है। इसके विपरीत, बाह्य कोशिकीय पाचन आहारनगल (गुहा) या शरीर के बाहर विशेष अंगों में होता है, जहाँ पाचक एंजाइमों को स्रावित करके भोजन को तोड़ा जाता है। यह बहुकोशिकीय जीवों (जैसे कशेरुकी और उच्च अकेशरुकी) की अधिक कुशल और उन्नत पाचन विधि है। इसमें पाचन तंत्र के माध्यम से जटिल पोषक तत्वों को सरल रूपों में बदला जाता है।
मुख्य बिंदु:
• अंतःकोशिकीय पाचन कोशिका के अंदर होता है, जबकि बाह्य कोशिकीय पाचन आहारनाल या गुहा में होता है।
• अंतःकोशिकीय पाचन सरल जीवों में और बाह्य कोशिकीय पाचन बहुकोशिकीय जीवों में पाया जाता है।
• बाह्य कोशिकीय पाचन अधिक कुशल और उन्नत विधि है।
आम गलतियाँ:
• दोनों प्रकार के पाचन के स्थलों (कोशिका के अंदर बनाम आहारनाल) को आपस में मिला देना।
• जीवों के उदाहरण (एककोशिकीय बनाम बहुकोशिकीय) गलत लिखना।
• एंजाइमों के स्राव के स्थान को स्पष्ट न करना।
Exam Tips:
a) दोनों के बीच अंतर को हमेशा सारणी (Table) के रूप में प्रस्तुत करें।
b) मुख्य शब्दावली जैसे खाद्य रिक्तिका और आहारनाल का उल्लेख अवश्य करें।
c) उच्च और निम्न श्रेणी के जीवों के साथ इसका संबंध स्पष्ट रखें।
Question 5: प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष परिवर्धन में क्या अंतर है?
Answer:
प्रत्यक्ष परिवर्धन वह विकास प्रक्रिया है जिसमें युग्मज से सीधे वयस्क प्राणी का निर्माण होता है और इसमें किसी भी प्रकार का लार्वा चरण शामिल नहीं होता। इस प्रक्रिया में रूपान्तरण (मेटामोर्फोसिस) अनुपस्थित होता है और नवजात शिशु काफी हद तक वयस्क के समान ही दिखाई देता है (जैसे स्तनधारियों, पक्षियों और सरीसृपों में)। इसके विपरीत, अप्रत्यक्ष परिवर्धन में अंडे से सीधे वयस्क नहीं बनता, बल्कि एक या अधिक लार्वा चरण होते हैं जो वयस्क से आकार और संरचना में काफी भिन्न होते हैं। इसमें वयस्क बनने से पहले लार्वा में महत्वपूर्ण रूपान्तरण (मेटामोर्फोसिस) होता है। यह अधिकांश अकशेरुकी जीवों और कुछ कशेरुकी जीवों जैसे उभयचरों (मेंढक आदि) में देखा जाता है।
मुख्य बिंदु:
• प्रत्यक्ष परिवर्धन में लार्वा अवस्था नहीं होती, जबकि अप्रत्यक्ष परिवर्धन में लार्वा चरण अनिवार्य होता है।
• अप्रत्यक्ष परिवर्धन में वयस्क बनने के लिए कायांतरण (Metamorphosis) की आवश्यकता होती है।
• प्रत्यक्ष विकास स्तनधारी और पक्षियों में तथा अप्रत्यक्ष विकास उभयचरों और कई अकशेरुकी जीवों में होता है।
आम गलतियाँ:
• लार्वा अवस्था की उपस्थिति और अनुपस्थिति के नियमों को उलटना।
• कायांतरण (रूपान्तरण) शब्द का प्रयोग केवल प्रत्यक्ष विकास में कर देना।
• सही जंतुओं के उदाहरण न दे पाना।
Exam Tips:
a) प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विकास की परिभाषा के साथ मेंढक (अप्रत्यक्ष) और मानव (प्रत्यक्ष) का उदाहरण दें।
b) लार्वा और कायांतरण शब्दों का प्रयोग उत्तर में मुख्य रूप से करें।
c) अंतर स्पष्ट करने के लिए बिंदुओं का प्रयोग करें।
Question 6: परजीवी प्लेटिहैल्मिंथिस के विशेष लक्षण बताएँ।
Answer:
परजीवी प्लेटिहैल्मिंथिस (चपटे कृमि, जैसे टीनिया और फैसिला) जीवों के शरीर के भीतर रहकर अपना पोषण प्राप्त करते हैं, इसलिए उनके शरीर में विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं। उनका शरीर पृष्ठीय रूप से चपटा होता है ताकि वे परपोषी के शरीर के अंगों से आसानी से चिपक सकें और पोषक तत्वों को सीधे अपने शरीर की सतह से अवशोषित कर सकें। परजीवी होने के कारण उनके पास परपोषी के ऊतकों और अंगों को जकड़ने के लिए विशेष अंग जैसे हुक (Hooks) और चूषक (Suckers) होते हैं। इसके अलावा, उनकी त्वचा पर एक सुरक्षात्मक आवरण (टैगुमेंट) पाया जाता है जो परपोषी के शक्तिशाली पाचक रसों और अम्लों के प्रभाव से उनकी रक्षा करता है और परपोषी के शरीर के पाचक तत्वों को अवशोषित करने में भी मदद करता है।
मुख्य बिंदु:
• इनका शरीर पृष्ठीय रूप से चपटा होता है जिससे ये परपोषी से आसानी से चिपक सकते हैं।
• परपोषी के शरीर में मजबूती से टिकने के लिए हुक और चूषक पाए जाते हैं।
• पाचक रसों से बचने के लिए शरीर पर विशेष टैगुमेंट (Tegument) आवरण होता है।
आम गलतियाँ:
• हुक और चूषक के कार्यों को गलत लिखना।
• चपटे शरीर के महत्व को परपोषी के संदर्भ में न समझा पाना।
• टैगुमेंट के सुरक्षात्मक कार्य को भूल जाना।
Exam Tips:
a) परजीवी अनुकूलन (Parasitic adaptations) शब्दों का उपयोग करें।
b) टीनिया सोलियम (फीताकृमि) का उदाहरण अवश्य दें।
c) बिंदुओं में उत्तर लिखने से परीक्षक पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
Question 7: आर्थोपोडा प्राणि-समूह का सबसे बड़ा वर्ग है, इस कथन के प्रमुख कारण बताएँ।
Answer:
फाइलम आर्थोपोडा प्राणी जगत का सबसे बड़ा संघ है जिसमें पृथ्वी पर ज्ञात सभी जातियों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा शामिल है। आर्थोपोडा की इस अपार सफलता के पीछे कई महत्वपूर्ण जैविक कारण हैं। सबसे पहले, इनमें संयुक्त पाद (Jointed appendages) पाए जाते हैं जो इन्हें भूमि पर अत्यधिक गतिशीलता और विभिन्न कार्यों को करने की अनुमति देते हैं। दूसरा, इनका शरीर चिटिन (Chitin) से बने एक कठोर बाह्य कंकाल (Exoskeleton) से ढका होता है जो शरीर की यांत्रिक सुरक्षा करता है और जल की हानि को रोकता है। यह कठोर बाह्यकंकाल आर्थोपोडा को शुष्क और कठिन स्थलीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाता है, जिससे वे विभिन्न प्रकार के पर्यावासों में आसानी से जीवित रह सकते हैं।
मुख्य बिंदु:
• इसमें पृथ्वी की कुल ज्ञात जातियों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा शामिल है।
• संयुक्त पाद (Jointed appendages) अत्यधिक गतिशीलता प्रदान करते हैं।
• चिटिनयुक्त कठोर बाह्यकंकाल शरीर की रक्षा करता है और जल की हानि रोकता है।
आम गलतियाँ:
• संयुक्त पाद और बाह्यकंकाल की महत्ता को सही से स्पष्ट न करना।
• चिटिन शब्द का उल्लेख न करना।
• यह भूल जाना कि यह सबसे बड़ा संघ क्यों है।
Exam Tips:
a) 'चिटिनयुक्त बाह्यकंकाल' और 'संयुक्त पाद' मुख्य की-वर्ड्स हैं, इन्हें अवश्य लिखें।
b) स्थलीय अनुकूलन (Terrestrial adaptation) का बिंदु जोड़ें।
c) कीटों का उदाहरण देकर उत्तर को प्रभावी बनाएं।
Question 8: जल संवहन-तंत्र किस वर्ग के मुख्य लक्षण हैं?
(अ) पोरिफेरा (ब) टीनोफोरा (स) इकाइनोडर्मेटा (द) कॉर्डेटा
Answer:
सही उत्तर: (स) इकाइनोडर्मेटा।
स्पष्टीकरण: जल संवहन-तंत्र (Water vascular system) इकाइनोडर्मेटा संघ का एक विशिष्ट और अद्वितीय लक्षण है। इसमें रेडीएटिंग चैनल, ट्यूब फीट (नाल पाद) और मैड्रेपोराईट जैसी संरचनाएँ शामिल होती हैं। यह तंत्र इस संघ के जीवों को चलन (चलने-फिरने), भोजन ग्रहण करने, श्वसन करने और शिकार को पकड़ने में मदद करता है। पोरिफेरा में जल नाल तंत्र (Water canal system) होता है, जो इससे भिन्न है।
मुख्य बिंदु:
• जल संवहन-तंत्र इकाइनोडर्मेटा संघ की मुख्य पहचान है।
• इसमें ट्यूब फीट (नाल पाद) का विशेष महत्व होता है।
• यह चलन, भोजन और श्वसन तीनों कार्यों में सहायता करता है।
आम गलतियाँ:
• पोरिफेरा के 'जल नाल तंत्र' और इकाइनोडर्मेटा के 'जल संवहन-तंत्र' को आपस में मिला देना।
• ट्यूब फीट की भूमिका को भूल जाना।
• गलत विकल्प का चयन करना।
Exam Tips:
a) बहुविकल्पीय प्रश्न में सटीक विकल्प (स) चुनें।
b) अंतर स्पष्ट करने के लिए पोरिफेरा और इकाइनोडर्मेटा के जल तंत्रों के नाम याद रखें।
c) ट्यूब फीट (नाल पाद) का नाम लिखना न भूलें।
Question 9: सभी कशेरुकी (वर्टीब्रेट्स) रज्जुकी (कॉर्डेट्स) हैं, लेकिन सभी रज्जुकी कशेरुकी नहीं हैं। इस कथन को सिद्ध करें।
Answer:
फाइलम कॉर्डेटा की सभी जातियों में भ्रूण अवस्था या जीवन के किसी चरण में एक नोटोकॉर्ड (Notochord), एक पृष्ठीय नलीदार तंत्रिका रज्जु और युग्मित ग्रसनी गिल स्लिट्स की उपस्थिति अनिवार्य होती है। उप-फाइलम वर्टीब्रेटा (कशेरुकी) कॉर्डेटा का ही एक उप-समूह है, जिसमें भ्रूण में मौजूद नोटोकॉर्ड वयस्क अवस्था में कार्टिलाजीनस या बोनी वर्टेब्रल कॉलम (मेरुदंड) में बदल जाती है। चूँकि सभी कशेरुकियों में कॉर्डेटा के मूलभूत लक्षण होते हैं, इसलिए सभी कशेरुकी रज्जुकी होते हैं। परंतु, कॉर्डेटा संघ में कुछ ऐसे उप-फाइलम भी शामिल हैं (जैसे यूरोकॉर्डेटा और सेफलोकॉर्डेटा) जिनमें नोटोकॉर्ड कशेरुक दंड में रूपांतरित नहीं होती बल्कि उनके पूरे जीवन या केवल लार्वा अवस्था में वैसे ही बनी रहती है। इसलिए सभी रज्जुकी कशेरुकी नहीं होते हैं।
मुख्य बिंदु:
• सभी कशेरुकी कॉर्डेटा के मूलभूत लक्षणों को प्रदर्शित करते हैं।
• कशेरुकियों में नोटोकॉर्ड रीढ़ की हड्डी (मेरुदंड) में बदल जाती है।
• कॉर्डेटा के अन्य उप-संघों (यूरोकॉर्डेटा और सेफलोकॉर्डेटा) में मेरुदंड नहीं बनती, इसलिए सभी कॉर्डेट वर्टीब्रेट नहीं हैं.
आम गलतियाँ:
• नोटोकॉर्ड और वर्टेब्रल कॉलम (मेरुदंड) के बीच का संबंध न समझ पाना।
• यूरोकॉर्डेटा और सेफलोकॉर्डेटा की स्थिति को नजरअंदाज करना।
• कथन के दोनों हिस्सों को तार्किक रूप से सिद्ध न कर पाना।
Exam Tips:
a) यह एक वैचारिक प्रश्न है, इसे कॉर्डेटा के वर्गीकरण के आधार पर समझाएँ।
b) "सभी कशेरुकी कॉर्डेट हैं पर विलोम सत्य नहीं है" - इस वाक्य को फ्लोचार्ट से स्पष्ट करें।
c) नोटोकॉर्ड के रूपांतरण का मुख्य बिंदु अवश्य लिखें।
Question 10: मछलियों में वायु-आशय (एयर ब्लैडर) की उपस्थिति का क्या महत्व है?
Answer:
मछलियों (विशेषकर ऑस्टिचथिज या अस्थिल मछलियों) में वायु-आशय या तैरने वाला थैला (Swim bladder) एक महत्वपूर्ण हाइड्रोस्टेटिक अंग है। यह वायु-आशय गैस से भरी हुई एक थैली होती है जो मछली के शरीर के भीतर उत्प्लावकता (Buoyancy) को बनाए रखने में मदद करती है। इसकी सहायता से मछली बिना किसी लगातार ऊर्जा के उपयोग के पानी में एक निश्चित गहराई पर तैरती है या ऊपर-नीचे आसानी से आ-जा सकती है। यह मछली को पानी की धारा में ऊर्जा बचाते हुए तैरने और संतुलन बनाए रखने में सक्षम बनाता है।
मुख्य बिंदु:
• वायु-आशय अस्थिल मछलियों (Osteichthyes) में पाया जाने वाला गैस से भरा थैला है।
• यह पानी में मछली की उत्प्लावकता (Buoyancy) को नियंत्रित करता है।
• मछली को जल में ऊपर-नीचे उतरने और ऊर्जा बचाने में मदद करता है।
आम गलतियाँ:
• वायु-आशय को श्वसन अंग (फेफड़े) समझ लेना।
• उत्प्लावकता और तैरने के संतुलन के महत्व को न समझाना।
• सभी मछलियों में इसकी उपस्थिति मान लेना (यह कार्टिलाजीनस मछलियों में अनुपस्थित होता है)।
Exam Tips:
a) 'उत्प्लावकता' (Buoyancy) शब्द का प्रयोग उत्तर में अवश्य करें।
b) यह स्पष्ट करें कि यह अस्थिल मछलियों (Osteichthyes) की विशेषता है।
c) संक्षिप्त और सटीक उत्तर लिखें।
Question 11: पक्षियों में उड़ने हेतु क्या-क्या रूपांतरण हैं?
Answer:
पक्षियों (एवीज) ने अपने शरीर में उड़ने के हवाई जीवन के अनुकूल कई महत्वपूर्ण शारीरिक और संरचनात्मक अनुकूलन विकसित किए हैं। उनका शरीर हवा में तेजी से और आसानी से उड़ने के लिए सुव्यवस्थित और चिकनी गति (Streamlined body) वाला होता है। उनका अगला जोड़ा पंखों में रूपांतरित हो जाता है, जो उड़ान में मुख्य भूमिका निभाता है, जबकि पिछले पैर चलने, बैठने और पेड़ों पर ठहरने के लिए अनुकूलित होते हैं। उड़ान के दौरान शरीर का वजन कम करने के लिए उनकी हड्डियाँ छिद्रयुक्त और वायु से भरी (प्यूमेटिक बोंस / Pneumatic bones) होती हैं। इसके अलावा, अत्यधिक ऊर्जा की माँग को पूरा करने के लिए उनमें पूरक श्वसन हेतु अतिरिक्त वायु कोश (Air sacs) पाए जाते हैं और उनका शरीर इंसुलेशन के लिए पंखों से ढका होता है।
मुख्य बिंदु:
• शरीर का सुव्यवस्थित (Streamlined) आकार हवा के प्रतिरोध को कम करता है।
• अग्रपादों का पंखों में रूपांतरण और प्यूमेटिक (वायु से भरी) हड्डियों द्वारा शरीर का हल्का होना।
• उच्च चयापचय और पूरक श्वसन के लिए अतिरिक्त वायु कोशों की उपस्थिति।
आम गलतियाँ:
• प्यूमेटिक हड्डियों के महत्व को वजन कम करने के बजाय केवल हल्का मानना।
• पंखों के दोनों कार्यों (उड़ान और ताप नियमन) को स्पष्ट न करना।
• श्वसन तंत्र में वायु कोशों का जिक्र न करना।
Exam Tips:
a) 'प्यूमेटिक हड्डियाँ' (Pneumatic bones) और 'सुव्यवस्थित शरीर' (Streamlined body) मुख्य शब्दावली हैं।
b) बिंदुओं में उत्तर लिखने से सभी अनुकूलन स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
c) पक्षियों के वर्गीय लक्षणों के साथ इसे जोड़कर याद रखें।
Question 12: अंडजनक तथा जरायुज द्वारा उत्पन्न अंडे या बच्चे संख्या में बराबर होते हैं? यदि हाँ तो क्यों? यदि नहीं तो क्यों?
Answer:
अंडजनक (Oviparous) जीवों द्वारा उत्पादित अंडों की संख्या सामान्यतः जरायुज (Viviparous) जीवों द्वारा उत्पादित बच्चों की संख्या की तुलना में काफी अधिक होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अंडजनक जीवों में बच्चों का विकास माँ के शरीर के बाहर होता है, जिससे अंडे पर्यावरण की कठोर परिस्थितियों, खराब मौसम और शिकारियों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील और असुरक्षित होते हैं। अंडों के नष्ट होने की भरपाई के लिए मादा जीव बड़ी संख्या में अंडे देती है ताकि कुछ अंडे बच सकें और नए बच्चे पैदा हो सकें। इसके विपरीत, जरायुज जीवों में बच्चों का विकास माँ के सुरक्षित आंतरिक गर्भ में होता है, जहाँ वे पर्यावरण की कठोरताओं और शिकारियों के संपर्क से सुरक्षित रहते हैं। इसलिए उनके जीवित रहने की संभावना बहुत अधिक होती है, जिसके कारण जरायुज जीव अंडजनक जीवों की तुलना में संख्या में बहुत कम बच्चे पैदा करते हैं।
मुख्य बिंदु:
• अंडजनक जीव अधिक अंडे देते हैं क्योंकि बाहरी पर्यावरण में उनके नष्ट होने का खतरा अधिक होता है।
• जरायुज जीवों में बच्चों का विकास माँ के शरीर के भीतर सुरक्षित वातावरण में होता है।
• उत्तर 'नहीं' है; अंडजनक जीवों की संख्या जरायुज की तुलना में अधिक होती है।
आम गलतियाँ:
• यह मान लेना कि दोनों की संख्या बराबर होती है।
• पर्यावरणीय सुरक्षा और शिकारियों के प्रभाव को कारण के रूप में स्पष्ट न करना।
• अंडजनक और जरायुज की परिभाषा में उलझ जाना।
Exam Tips:
a) प्रश्न के पहले भाग का स्पष्ट उत्तर (नहीं) दें और फिर कारण समझाएँ।
b) 'बाहरी विकास बनाम आंतरिक सुरक्षा' के तर्क को मुख्य रूप से प्रस्तुत करें।
c) उत्तर को तार्किक और तुलनात्मक रूप में लिखें।
Question 13: निम्नलिखित में से शारीरिक खंडीभवन किसमें पहले देखा गया?
(अ) प्लेटीहैल्मिंथिस (ब) एस्केल्मिंथिस (स) एनेलिडा (द) आर्थोपोडा
Answer:
सही उत्तर: (स) एनेलिडा।
स्पष्टीकरण: शारीरिक खंडीभवन (Segmentation / Metamerism) सबसे पहले एनेलिडा संघ के जीवों (जैसे केंचुआ) में स्पष्ट रूप से देखा गया था। एनेलिडा शब्द का शाब्दिक अर्थ ही 'छोटी अंगूठी' (Little rings) होता है, क्योंकि इनके शरीर पर खंड या वलय पाए जाते हैं। इससे पहले के संघों जैसे प्लेटीहैल्मिंथिस और एस्केल्मिंथिस में वास्तविक शारीरिक खंडीभवन नहीं पाया जाता है।
मुख्य बिंदु:
• शारीरिक खंडीभवन की शुरुआत सबसे पहले एनेलिडा संघ से हुई।
• एनेलिडा का अर्थ छोटे छल्ले या खंड होता है।
• केंचुआ इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
आम गलतियाँ:
• आर्थोपोडा को पहला खंडीभवन वाला संघ समझ लेना (आर्थोपोडा में भी खंडीभवन होता है, पर सबसे पहले एनेलिडा में देखा गया)।
• प्लेटीहैल्मिंथिस या एस्केल्मिंथिस का चयन करना।
• सही विकल्प (स) को भूल जाना।
Exam Tips:
a) बहुविकल्पीय प्रश्न में (स) एनेलिडा का चयन करें।
b) खंडीभवन (Metamerism) शब्द को याद रखें।
c) केंचुआ का उदाहरण दिमाग में रखें।
Question 14: निम्न का मिलान करें:
स्तंभ-I स्तंभ-II
(i) प्रच्छद (अ) टीनोफोरा
(ii) पार्श्वपाद (ब) मोलस्का
(iii) शल्क (स) पोरिफेरा
(iv) केकड़ पटिका (काम्बप्लेट) (द) रेप्टिलिया
(v) रेड़ूला (इ) एनेलिडा
(vi) बाल (ई) मैममेलिया
(vii) कीपकोशिका (कोएनोसाइट) (उ) साइक्लोस्टोमेटा एवं कोंड्रिक्टीज
(viii) क्लोमछिद्र (ऊ) ऑस्टिक्टीज
Answer:
दी गई विशेषताओं और उनके सही संघों या वर्गों का मिलान इस प्रकार है:
(i) प्रच्छद का सही मिलान (ऊ) ऑस्टिक्टीज के साथ है, क्योंकि अस्थिल मछलियों में गिल्स को ढकने के लिए प्रच्छद (Operculum) होता है।
(ii) पार्श्वपाद का सही मिलान (इ) एनेलिडा के साथ है (जैसे नेरीस में तैरने के लिए पैरापोडिया होते हैं)।
(iii) शल्क का सही मिलान (द) रेप्टिलिया के साथ है (शरीर पर शल्क पाए जाते हैं)।
(iv) कंकत पट्टिका (काम्बप्लेट) का सही मिलान (अ) टीनोफोरा के साथ है (इनमें गति के लिए 8 कंकत पट्टिकाएँ होती हैं)।
(v) रेड़ूला का सही मिलान (ब) मोलस्का के साथ है (यह भोजन चबाने का अंग है)।
(vi) बाल का सही मिलान (ई) मैममेलिया के साथ है (यह स्तनधारियों का मुख्य लक्षण है)।
(vii) कीपकोशिका (कोएनोसाइट) का सही मिलान (स) पोरिफेरा के साथ है (यह स्पंज की विशेषता है)।
(viii) क्लोमछिद्र का सही मिलान (उ) साइक्लोस्टोमेटा एवं कोंड्रिक्टीज के साथ है (इनमें प्रच्छद नहीं होता, क्लोमछिद्र खुले होते हैं)।
मुख्य बिंदु:
• प्रच्छद अस्थिल मछलियों (ऑस्टिक्टीज) में और क्लोमछिद्र कार्टिलाजीनस मछलियों में पाए जाते हैं।
• कंकत पट्टिकाएँ टीनोफोरा की और कीपकोशिकाएँ पोरिफेरा की विशेषता हैं।
• बाल मैममेलिया का और रेड़ूला मोलस्का का मुख्य लक्षण है।
आम गलतियाँ:
• प्रच्छद और क्लोमछिद्र के मिलान में भ्रमित होना।
• कंकत पट्टिका को किसी अन्य संघ से जोड़ देना।
• पार्श्वपाद (पैरापोडिया) को आर्थोपोडा मान लेना।
Exam Tips:
a) मिलान करते समय प्रत्येक अंग और उसके विशिष्ट संघ को अच्छी तरह जाँच लें।
b) यह प्रश्न विभिन्न संघों के विशिष्ट लक्षणों (Unique features) को परखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
c) सभी विशिष्ट अंगों के नाम और उनके जीवों के जोड़े याद रखें।
Question 15: मनुष्यों पर पाए जाने वाले कुछ परजीवियों के नाम लिखें।
Answer:
मनुष्यों के शरीर पर या शरीर के भीतर कई प्रकार के परजीवी (Parasites) पाए जाते हैं जो विभिन्न रोग उत्पन्न करते हैं। मानव शरीर के भीतर पाए जाने वाले कुछ प्रमुख परजीवी इस प्रकार हैं: 1. टीनिया सोलियम (फीताकृमि) जो प्लेटिहैल्मिंथिस संघ से संबंधित है और हमारी आंत में रहता है। 2. फैसिला हिपेटिका (यकृत पर्णाभ) जो यकृत में परजीवी के रूप में रहता है। 3. आंत्र परजीवी के रूप में एस्केरिस (गोलकृमि) जो एस्केल्मिंथिस संघ का है और आंत को प्रभावित करता है। 4. वुचेरेरिया ब्रैंक्रॉप्टाइ (फाइलेरिया कृमि) जो लसिका वाहिनियों में रहता है और हाथीपांव रोग करता है। 5. एंकीलोस्टोमा (अंकुश कृमि) जो आंत में रहकर रक्त चूसता है। ये सभी परजीवी मनुष्यों में विभिन्न संक्रमण और बीमारियाँ फैलाते हैं।
मुख्य बिंदु:
• टीनिया सोलियम (फीताकृमि) और फैसिला प्लेटिहैल्मिंथिस संघ के परजीवी हैं।
• एस्केरिस और एंकीलोस्टोमा आंत्र परजीवी हैं जो एस्केल्मिंथिस संघ से हैं।
• वुचेरेरिया लसिका तंत्र में रहने वाला खतरनाक परजीवी है।
आम गलतियाँ:
• परजीवियों के नाम और उनके संघ (Phylum) को गलत लिखना।
• मानव शरीर में उनके रहने के स्थान को गलत बताना।
• सामान्य स्पेलिंग की अशुद्धियाँ करना।
Exam Tips:
a) परजीवियों के वैज्ञानिक नाम (Scientific names) तिरछे या underline करके लिखें।
b) उनके संघ का नाम कोष्ठक में अवश्य दर्शाएँ।
c) सारणी बनाकर लिखने से उत्तर आकर्षक और स्पष्ट लगता है।
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