NCERT Solutions Class 11 Biology Chapter 02 Biological Classification (जीव जगत का वर्गीकरण) in Hindi

Official NCERT Solutions for Class 11 Biology: Chapter 02 जीव जगत का वर्गीकरण

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Chapter-wise Solutions for Biology: Chapter 02 जीव जगत का वर्गीकरण

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Question 1: वर्गीकरण की पद्धतियों में समय के साथ कई परिवर्तनों की व्याख्या कीजिए।

Answer:

वर्गीकरण प्रणालियों में समय के साथ कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। वर्गीकरण का प्रथम प्रयास अरस्तू ने किया था। उन्होंने पौधों को जड़ी-बूटियों, झाड़ियों और पेड़ों के रूप में वर्गीकृत किया। दूसरी ओर, जानवरों को लाल रक्त कोशिकाओं की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर वर्गीकृत किया गया था। वर्गीकरण की यह प्रणाली सभी ज्ञात जीवों को वर्गीकृत करने में विफल रही। इसलिए, लिनिअस ने वर्गीकरण की दो जगत प्रणाली दी। इसमें किंगडम प्लांटी और किंगडम एनिमेलिया शामिल हैं। हालांकि, यह प्रणाली एककोशिकीय और बहुकोशिकीय जीवों और यूकेरियोट्स और प्रोकैरियोट्स के बीच अंतर नहीं करती थी। इसलिए, बड़ी संख्या में ऐसे जीव थे जिन्हें दो साम्राज्यों के अंतर्गत वर्गीकृत नहीं किया जा सकता था। इन समस्याओं को हल करने के लिए, 1969 में आर.एच. व्हिटेकर द्वारा वर्गीकरण की एक पाँच जगत प्रणाली प्रस्तावित की गई थी। विशेषताओं के आधार पर, जैसे कोशिका संरचना, पोषण की विधि, कोशिका भित्ति की उपस्थिति, आदि, पाँच जगत, मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंगी, प्लांटी और एनिमेलिया का निर्माण हुआ।

मुख्य बिंदु:

• अरस्तू ने जीवों को उनकी बाहरी शारीरिक विशेषताओं (जैसे जड़ी-बूटी, पेड़, लाल रक्त) के आधार पर वर्गीकृत किया।
• लिनिअस ने पौधों और जंतुओं को दो जगत (प्लांटी और एनिमेलिया) में विभाजित किया।
• व्हिटेकर ने 1969 में कोशिका संरचना और पोषण विधि के आधार पर पाँच जगत वर्गीकरण दिया।

आम गलतियाँ:

• केवल आधुनिक वर्गीकरण को याद रखना और ऐतिहासिक चरणों को छोड़ देना।
• लिनिअस की दो जगत प्रणाली की कमियों को स्पष्ट न कर पाना।
• व्हिटेकर द्वारा उपयोग किए गए मुख्य मानदंडों का उल्लेख न करना।

Exam Tips:

a) वर्गीकरण के ऐतिहासिक विकास को कालक्रम (क्रोनोलॉजिकल ऑर्डर) में लिखें।
b) दो जगत और पाँच जगत वर्गीकरण के मुख्य अंतर को स्पष्ट करें।
c) आर.एच. व्हिटेकर के पाँच जगत के नाम क्रम से याद रखें।

 

Question 2: निम्नलिखित के बारे में आर्थिक दृष्टि से दो महत्वपूर्ण उपयोगों को लिखें:
(क) परपोषी बैक्टीरिया
(ख) आद्य बैक्टीरिया

Answer:

परपोषी बैक्टीरिया (Heterotrophic bacteria) और आद्य बैक्टीरिया (Archaebacteria) दोनों के मानव जीवन में महत्वपूर्ण आर्थिक और पारिस्थितिक उपयोग हैं। (क) परपोषी बैक्टीरिया का उपयोग दूध से दही जमाने (लैक्टोबैसिलस) में किया जाता है और कई प्रकार के प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक्स) प्राप्त करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके अलावा, ये प्रकृति में अपमार्जक के रूप में कार्य करते हैं और ह्यूमस के निर्माण तथा वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में मदद करते हैं। (ख) आद्य बैक्टीरिया में मिथेनोजेन शामिल होते हैं जो जुगाली करने वाले पशुओं के गोबर से बायोगैस (मीथेन गैस) का उत्पादन करते हैं। इनका उपयोग सीवेज उपचार (मल जल उपचार) संयंत्रों में भी किया जाता है।

मुख्य बिंदु:

• परपोषी बैक्टीरिया दही जमाने और एंटीबायोटिक्स बनाने में काम आते हैं।
• परपोषी बैक्टीरिया मृदा की उर्वरता बढ़ाने और नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सहायक हैं।
• आद्य बैक्टीरिया (मिथेनोजेन) गोबर गैस (बायोगैस) उत्पादन और सीवेज उपचार में उपयोग किए जाते हैं।

आम गलतियाँ:

• परपोषी और आद्य बैक्टीरिया के कार्यों को आपस में मिला देना।

• केवल एक उपयोग लिखकर छोड़ देना जबकि प्रश्न में दो पूछे गए हैं।
• मिथेनोजेन की भूमिका को गलत तरीके से परिभाषित करना।

Exam Tips:

a) दोनों भागों (क और ख) के लिए अलग-अलग दो स्पष्ट बिंदु लिखें।
b) बैक्टीरिया के आर्थिक महत्व को उद्योग और कृषि के संदर्भ में समझाएँ।
c) मिथेनोजेन का संबंध बायोगैस से है, इसे हमेशा याद रखें।

 

Question 3: डायटम की कोशिका भित्ति के क्या लक्षण हैं?

Answer:

डायटम की कोशिका भित्ति सिलिका की बनी होती है। इनकी कोशिका भित्ति निर्माण को फ्रस्टुल के रूप में जाना जाता है। इसमें दो पतले अतिव्यापी ढाँचे होते हैं जो एक साबुन बॉक्स जैसे एक दूसरे में फिट होते हैं। जब डायटम मर जाते हैं, तो उनकी कोशिका भित्ति में सिलika डायटोमेसियस मिट्टी के रूप में जमा हो जाती है। यह डायटोमेसियस मिट्टी बहुत नरम और काफी निष्क्रिय होती है। इसका उपयोग तेल, शर्करा और अन्य औद्योगिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

मुख्य बिंदु:

• डायटम की कोशिका भित्ति सिलिका से बनी होती है जो अविनाशी होती है।
• कोशिका भित्ति दो भागों में बंटी होती है जो साबुनदानी की तरह फिट बैठती है।
• इनके मरने पर संचित सिलिका डायटोमेसियस पृथ्वी (मिट्टी) बनाती है।

आम गलतियाँ:

• सिलिका के स्थान पर अन्य किसी रसायन का नाम लिखना।
• साबुनदानी जैसी संरचना (फ्रस्टुल) का वर्णन न करना।
• डायटोमेसियस मिट्टी के उपयोग को छोड़ देना।

Exam Tips:

a) 'सिलिका' और 'साबुन बॉक्स' जैसे मुख्य शब्दों का प्रयोग उत्तर में जरूर करें।
b) डायटम के आर्थिक महत्व (डायटोमेसियस अर्थ) को संक्षेप में अवश्य जोड़ें।
c) यह प्रश्न अक्सर संक्षिप्त टिप्पणी के रूप में पूछा जाता है।

 

Question 4: 'शैवाल पुष्पन' (algal bloom) तथा 'लाल तरंगें' (red-tides) क्या दर्शाती हैं?

Answer:

शैवाल पुष्पन और लाल तरंगें दोनों जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में पादప్प्लवक (फाइटोप्लांकटन) या शैवाल की अत्यधिक वृद्धि को दर्शाती हैं। शैवाल पुष्पन पानी में शैवाल या नील-हरे शैवाल की आबादी में भारी वृद्धि को संदर्भित करता है, जिसके परिणामस्वरूप जल निकाय का मलिनकीकरण होता है। इससे जैविक ऑक्सीजन की मांग (बीओडी) में वृद्धि होती है, जिसके परिणामस्वरूप मछलियों और अन्य जलीय जंतुओं की मृत्यु हो जाती है। लाल तरंगें, लाल डायनोफ्लैगलेट्स (गोडयालैक्स) के कारण होती हैं जो तेजी से बढ़ता है। इनकी संख्या अधिक होने के कारण समुद्र लाल रंग का दिखाई देता है। वे पानी में बड़ी मात्रा में विषाक्त पदार्थ छोड़ते हैं जो बड़ी संख्या में मछलियों की मौत का कारण बन सकते हैं.

मुख्य बिंदु:

• शैवाल पुष्पन पोषक तत्वों की अधिकता से पानी में शैवाल की तीव्र वृद्धि है।
• लाल तरंगें डायनोफ्लैगलेट्स (गोडयालैक्स) के अत्यधिक गुणन से उत्पन्न होती हैं।
• दोनों घटनाएँ जलीय जीवों के लिए हानिकारक होती हैं और ऑक्सीजन की कमी करती हैं।

आम गलतियाँ:

• शैवाल पुष्पन और लाल तरंगों को एक ही घटना मान लेना।
• बीओडी (BOD) और विषाक्तता के प्रभाव का उल्लेख न करना।
• लाल तरंगों के लिए उत्तरदायी जीव (गोडयालैक्स) का नाम भूल जाना।

Exam Tips:

a) दोनों शब्दों की अलग-अलग परिभाषा और उनके परिणाम स्पष्ट रूप से लिखें।
b) लाल तरंगों के लिए 'डायनोफ्लैगलेट्स' शब्द का प्रयोग करना न भूलें।
c) जलीय जीवन पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव (ऑक्सीजन की कमी) को अवश्य दर्शाएँ।

 

Question 5: वाइरस से विरोइड कैसे भिन्न होते हैं?

Answer:

विरोइड की खोज 1917 में टी.ओ. डैनिएर की थी। वे आलू में तकला कंद रोग का कारण बनते हैं। ये आकार में वायरस से छोटे होते हैं। उनके पास प्रोटीन कोट की भी कमी होती है और कम आणविक भार के मुक्त आरएनए (RNA) होते हैं, जबकि वाइरस में आनुवंशिक पदार्थ के चारों ओर एक प्रोटीन आवरण (कैप्सिड) पाया जाता है। इस प्रकार, विरोइड्स में प्रोटीन आवरण का अभाव होता है जो उन्हें वाइरस से अलग बनाता है।

मुख्य बिंदु:

• विरोइड्स में प्रोटीन आवरण (कैप्सिड) नहीं होता, जबकि वाइरस में होता है।
• विरोइड्स का आणविक भार बहुत कम होता है और ये केवल मुक्त आरएनए के बने होते हैं।
• विरोइड्स आकार में वाइरस की तुलना में बहुत छोटे होते हैं।

आम गलतियाँ:

• विरोइड्स में प्रोटीन आवरण की उपस्थिति मान लेना।
• वाइरस और विरोइड्स के आनुवंशिक पदार्थों में अंतर स्पष्ट न करना।
• विरोइड्स द्वारा होने वाले रोग (आलू का तकला कंद रोग) का उल्लेख न करना।

Exam Tips:

a) अंतर को स्पष्ट करने के लिए मुख्य बिंदु प्रोटीन आवरण की अनुपस्थिति को बनाएँ।
b) विरोइड्स की खोज और उनके आकार का संक्षिप्त उल्लेख करें।
c) यह अंतर वाला प्रश्न है, अतः बिंदुओं में उत्तर देना अधिक प्रभावी होगा।

 

Question 6: प्रोटोजोआ के चार प्रमुख समूहों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

Answer:

आकृति का विवरण: इस चित्र में अमीबीय प्रोटोजोआ की संरचना को दर्शाया गया है जिसमें कूटपाद, खाद्य रिक्तिका और केंद्रक स्पष्ट रूप से नामांकित हैं।

प्रोटोजोआ पोषण की परपोषी प्रणाली के साथ सूक्ष्म एककोशिकीय प्रोटिस्ट हैं। वे होलोज़ोइक, सैप्रॉबिक या परजीवी हो सकते हैं। इन्हें चार प्रमुख समूहों में बाँटा गया है। (1) अमीबीय प्रोटोजोआ या सार्कोडाइन: ये जीवधारी स्वच्छ जल, समुद्री जल तथा नम मृदा में पाए जाते हैं। ये अपने कूटपादों की सहायता से अपने शिकार को पकड़ते हैं। इनमें समुद्री प्रकारों की सतह पर सिलिका के कवच होते हैं। इनमें से कुछ एटामीबी परजीवी होते हैं। (2) कशाभी प्रोटोजोआ या जोफ्लेजेलेट्स: इस समूह के सदस्य स्वच्छंद अथवा परजीवी होते हैं, इनके शरीर पर कशाभ पाया जाता है। परजीवी कशाभी प्रोटोजोआ के कारण होते हैं, जिनसे निद्रालु व्याधि नामक बीमारी होती है। इससे पीड़ित इंसान को निद्रा अधिक आती है। उदाहरण: ट्रिपैनोसोमा। (3) पक्ष्माभी प्रोटोजोआ: ये जलीय तथा अत्यंत सक्रिय गति करने वाले जीवधारी हैं, क्योंकि इनके शरीर पर हजारों की संख्या में पक्ष्माभ पाए जाते हैं। इनमें एक गुहा (ग्रसिका) होती है जो कोशिका की सतह के बाहर की तरफ खुलती है। पक्ष्माभों की लయबद्ध गति के कारण जल से पूरित भोजन गलसेट की तरफ भेज दिया जाता है। उदाहरण-पैरामीशियम। (4) स्पोरोजोआ: इस समूह में वे विविध जीवधारी आते हैं जिनके जीवन चक्र में संक्रमण करने योग्य बीजाणु जैसी अवस्था पाई जाती है। इसमें सबसे कुख्यात प्लाज्मोडियम (मलेरिया परजीवी) प्रजाति है, जिसके कारण मानव की जनसंख्या पर आघात पहुँचाने वाला प्रभाव पड़ता है।

मुख्य बिंदु:

• अमीबीय प्रोटोजोआ कूटपाद द्वारा गति करते हैं और शिकार पकड़ते हैं।
• कशाभी प्रोटोजोआ में कशाभ होता है और यह निद्रालु व्याधि उत्पन्न करता है।
• पक्ष्माभी प्रोटोजोआ में पक्ष्माभ पाए जाते हैं और उदाहरण पैरामीशियम है।
• स्पोरोजोआ में बीजाणु अवस्था होती है, जैसे प्लाज्मोडियम (मलेरिया)।

आम गलतियाँ:

• चारों समूहों के गति अंगों (कूटपाद, कशाभ, पक्ष्माभ) को आपस में मिला देना।
• रोगों के नाम और उनके रोगजनकों के मिलान में गलती करना।
• स्पोरोजोआ की विशेषता (बीजाणु अवस्था) को भूल जाना।

Exam Tips:

a) प्रत्येक समूह की गति की विधि और एक उदाहरण अवश्य दें।
b) चारों समूहों के नाम और उनके मुख्य लक्षण स्पष्ट रूप से अलग-अलग पैराग्राफ में लिखें।
c) चित्र आधारित प्रश्नों के लिए अमीबा और पैरामीशियम की संरचना का अभ्यास करें।

 

Question 7: पादप स्वपोषी है। क्या आप ऐसे कुछ पादपों को बता सकते हैं, जो आंशिक रूप से परपोषी हैं?

Answer:

आकृति का विवरण: इस चित्र में घटपर्णी (पिचर प्लांट) के पौधे को दिखाया गया है जिसमें पत्ती कलश या घट के रूप में रूपांतरित होती है।

पौधों में स्वपोषी पोषण होता है क्योंकि उनमें क्लोरोफिल वर्णक होता है। इस प्रकार इनमें प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा अपना भोजन स्वयं तैयार करने की क्षमता होती है। हालांकि, कुछ कीटभक्षी पौधे आंशिक रूप से विषमपोषी होते हैं। उनके पास कीड़ों को पकड़ने के विभिन्न साधन हैं ताकि वे अपने आहार को कीड़ों से प्राप्त आवश्यक पोषक तत्वों के साथ पूरा कर सकें, जिससे वृद्धि का प्रसार हो सके। उदाहरणों में पिचर प्लांट (नेपेन्थस), वीनस फ्लाई ट्रैप, ब्लैडरवर्ट और सनड्यू प्लांट शामिल हैं।

मुख्य बिंदु:

• सामान्य पौधे स्वपोषी होते हैं क्योंकि उनमें क्लोरोफिल होता है।
• कीटभक्षी पौधे नाइट्रोजन की कमी वाले स्थानों पर उगते हैं और आंशिक रूप से परपोषी होते हैं।
• घटपर्णी (पिचर प्लांट), वीनस फ्लाई ट्रैप और ब्लैडरवर्ट इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

आम गलतियाँ:

• यह सोचना कि कीटभक्षी पौधे प्रकाश संश्लेषण बिल्कुल नहीं करते।
• कीटों को खाने का मुख्य उद्देश्य ऊर्जा प्राप्त करना समझना (जबकि मुख्य उद्देश्य नाइट्रोजन प्राप्त करना है)।
• कीटभक्षी पौधों के सही उदाहरण न दे पाना।

Exam Tips:

a) स्पष्ट करें कि ये पौधे प्रकाश संश्लेषण से अपना भोजन बनाते हैं, लेकिन नाइट्रोजन के लिए कीटों पर निर्भर होते हैं।
b) 'नेपेन्थस' (घटपर्णी) का उदाहरण अवश्य दें।
c) ऐसे पौधों को आंशिक परपोषी कहा जाता है, पूर्ण परपोषी नहीं।

 

Question 8: शैوالांश तथा कवकಾಂಶ शब्दों से क्या पता लगता है?

Answer:

शैवालांश लाइकेन के शैवाल घटक को संदर्भित करता है और कवकಾಂಶ कवक घटक को संदर्भित करता है। शैवाल में क्लोरोफिल होता है और कवक के लिए भोजन तैयार करता है जबकि कवक शैवाल को आश्रय प्रदान करता है और मिट्टी से पानी और पोषक तत्वों को अवशोषित करता है। इस प्रकार के संबंध को सहजीवी कहा जाता है।

मुख्य बिंदु:

• शैवालांश (Phycobiont) लाइकेन का शैवाल वाला भाग है जो प्रकाश संश्लेषण करता है।
• कवकಾಂಶ (Mycobiont) लाइकेन का कवक वाला भाग है जो आश्रय और जल देता है।
• यह दोनों के बीच एक प्रकार का सहजीवी (Symbiotic) संबंध है।

आम गलतियाँ:

• शैवालांश और कवकಾಂಶ के कार्यों को उलट देना।
• यह भूल जाना कि लाइकेन कवक और शैवाल का सहजीवी संबंध है।
• पोषक तत्वों के आदान-प्रदान को स्पष्ट न कर पाना।

Exam Tips:

a) दोनों शब्दों के अंग्रेजी नाम (Phycobiont और Mycobiont) भी याद रखें।
b) इनके आपसी लाभ (भोजन बनाम आश्रय) को स्पष्ट रूप से लिखें।
c) लाइकेन को प्रदूषण का अच्छा सूचक भी माना जाता है, इसे अतिरिक्त बिंदु में लिख सकते हैं।

 

Question 9: कवक (फंजाई) जगत के वर्गों का तुलनात्मक विवरण निम्नलिखित बिंदुओं पर करो:
(i) पोषण की विधि
(ii) जनन की विधि

Answer:

कवक जगत को मुख्य रूप से चार वर्गों में विभाजित किया गया है। (1) फाइकोमाइसििटीज: (i) पोषण की विधि: कवक के इस समूह में राइजोपस, अल्बुगो आदि जैसे सदस्य शामिल हैं। ये पौधों पर निर्भर मृतजीवी या लकड़ी जैसे सड़े हुए पदार्थ पर पाए जाते हैं। (ii) जनन की विधि: अलैंगिक जनन मोटाइल जोस्पोर या गैर-प्रेरक अपलानोस्पोर के माध्यम से होता है जो स्पोरेंजियम में अंतर्गत रूप से उत्पन्न होते हैं। लैंगिक जनन आइसोगॅमस, एनिसोगॅमस या ओडोगेमस प्रकार का हो सकता है। इसके परिणामस्वरूप मोटी दीवार वाले जागोस्पोर का निर्माण होता है। (2) एस्कोमाइसििटीज: (i) पोषण की विधि: कवक के इस समूह में पेनिसिलियम, एस्परगिलस, क्लेविसेps और न्यूरोस्पोरा जैसे सदस्य शामिल हैं। ये सैप्रोफाइटिक, डीकंपोजर, परजीवी या कॉप्रोफिलस (गोबर पर उगने वाले) हैं। (ii) जनन की विधि: अलैंगिक जनन बहिर्जात रूप से उत्पादित अलैंगिक बीजाणुओं के माध्यम से होता है, जैसे कि कोनिडियोफोर्स पर निर्मित कोनिडिया। लैंगिक जनन एस्कोस्पोर्स के माध्यम से होता है जो थैली की तरह एस्की में अंतर्जात रूप से उत्पादित होते हैं और एस्कोकार्प के अंदर व्यवस्थित होते हैं। (3) बेसिडіоमाइसििटीज: (i) पोषण की विधि: कवक के इस समूह में उसटिलगो, एगैरिकस और पक्सीनिया जैसे सदस्य शामिल हैं। ये मिट्टी में या लॉग और टी स्टंप पर डीकंपोजर के रूप में बढ़ते हैं। वे पौधों में परजीवी के रूप में भी पाए जाते हैं जिससे जंग एवं उससे जुड़ी बीमारियाँ होती हैं। (ii) जनन की विधि: अलैंगिक जनन आमतौर पर विखंडन के माध्यम से होता है। अलैंगिक बीजाणु अनुपस्थित होते हैं। यौन अंग अनुपस्थित हैं लेकिन यौन प्रजनन प्लास्मोगैमी के माध्यम से होता है। इसमें हाइफा के दो अलग-अलग उपभेदों का संलयन शामिल है। परिणामी डिकैरीयन एक बेसिडियम को जन्म देता है। एक बेसिडियम के अंदर चार बेसिडियोंस्पोर उत्पन्न होते हैं। (4) ड्यूटेरोमाइसििटीज: (i) पोषण की विधि: कवक के इस समूह में अल्टरनेरिया, ट्राइकोडर्मा और कोलेटोट्राइकम जैसे सदस्य शामिल हैं। कुछ सदस्य मृतजीवी हैं जबकि अन्य परजीवी होते हैं। हालांकि, बड़ी संख्या में पत्ती कूड़े के अपघटक के रूप में कार्य करते हैं। (ii) जनन की विधि: ड्यूटेरोमाइसििटीज में अलैंगिक जनन, प्रजनन का एकमात्र तरीका है। यह कोनिडिया नामक अलैंगिक बीजाणुओं के माध्यम से होता है। ड्यूटेरोमाइसििटीज में लैंगिक जनन अनुपस्थित होता है।

मुख्य बिंदु:

• फाइकोमाइसििटीज में चल बीजाणु (Zoospore) बनते हैं और कवकजाल पट्टहीन होता है।
• एस्कोमाइसििटीज में थैलीनुमा 'एस्की' में एस्कोस्पोर्स बनते हैं (जैसे पेनिसिलियम)।
• बेसिडियोमाइसििटीज में बेसिडियम पर बीजाणु बनते हैं (जैसे मशरूम/एगैरिकस)।
• ड्यूटेरोमाइसििटीज को 'अपूर्ण कवक' कहते हैं क्योंकि इसमें लैंगिक जनन अज्ञात है।

आम गलतियाँ:

• चारों वर्गों के बीजाणु के प्रकार (कोनिडिया, एस्कोस्पोर, बेसिडियोंस्पोर) को मिला देना।
• ड्यूटेरोमाइसििटीज में लैंगिक जनन की उपस्थिति बता देना (जबकि इसमें लैंगिक जनन नहीं होता)।
• कवक के पोषण के तरीकों (मृतजीवी, परजीवी) को स्पष्ट न करना।

Exam Tips:

a) चारों वर्गों को एक तालिका (Table) बनाकर तुलना करें ताकि याद रखने में आसानी हो।
b) प्रत्येक वर्ग का एक-एक प्रसिद्ध उदाहरण (जैसे राइजोपस, पेनिसिलियम, एगैरिकस, अल्टरनेरिया) अवश्य याद रखें।
c) ड्यूटेरोमाइसििटीज की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें केवल अलैंगिक जनन पाया जाता है।

 

Question 10: यूलीनॉइड्स के विशिष्ट चारित्रिक लक्षण कौन-कौन से हैं?

Answer:

यूलीनॉइड्स की कुछ विशिष्ट विशेषताएं इस प्रकार हैं। यूलीनॉइड्स (जैसे यूग्लीना) एककोशिकीय प्रोटिस्ट हैं जो आमतौर पर ताजे पानी में पाए जाते हैं। कोशिका भित्ति के बजाय, एक प्रोटीन युक्त कोशिका झिल्ली मौजूद होती है जिसे पेलिकल के रूप में जाना जाता है। वे शरीर के अग्र भाग पर दो कशाभिका धारण करते हैं। एक छोटा प्रकाशसंवेदनशील नेत्र स्थान मौजूद होता है। उनमें क्लोरोफिल जैसे प्रकाश संश्लेषक वर्णक होते हैं और इस प्रकार वे अपना भोजन स्वयं तैयार कर सकते हैं। हालांकि, प्रकाश की अनुपस्थिति में, वे अन्य जलीय जीवों को पकड़कर विषमपोषी के समान व्यवहार करते हैं। उनके पास पौधे और जानवर दोनों जैसी विशेषताएं हैं, जिससे उन्हें वर्गीकृत करना मुश्किल हो जाता है।

मुख्य बिंदु:

• यूलीनॉइड्स में कोशिका भित्ति की जगह लचीला प्रोटीन आवरण 'पेलिकल' होता है।
• इनमें दो कशाभ (फ्लैजेला) होते हैं, जिनमें एक लंबा और एक छोटा होता है।
• ये सूर्य के प्रकाश में स्वपोषी और अंधकार में विषमपोषी (मिश्रपोषण) होते हैं।

आम गलतियाँ:

• यह लिखना कि इनमें कवक जैसी कोशिका भित्ति होती है।
• इनकी मिश्रपोषी प्रकृति (स्वपोषी और विषमपोषी दोनों होना) को न समझा पाना।
• यूग्लीना को पादप या जंतु में से केवल एक ही श्रेणी का बताना।

Exam Tips:

a) 'पेलिकल' शब्द का उल्लेख उत्तर में अवश्य करें क्योंकि यह इनकी मुख्य पहचान है।
b) इन्हें पादप और जंतु के बीच की 'योजक कड़ी' (Connecting link) भी कहा जाता है, इसे याद रखें।
c) कशाभों की संख्या और स्थिति का वर्णन स्पष्ट रूप से करें।

 

Question 11: संरचना तथा आनुवंशिक पदार्थ की प्रकृति के संदर्भ में वाइरस का संक्षिप्त विवरण दो। वाइरस से होने वाले चार रोगों के नाम भी लिखें।

Answer:

वाइरस उप-सूक्ष्म संक्रामक एजेंट हैं जो सभी जीवित जीवों को संक्रमित कर सकते हैं। एक वाइरस में प्रोटीन आवरण से घिरे आनुवंशिक पदार्थ होते हैं। आनुवंशिक सामग्री डीएनए या आरएनए के रूप में मौजूद हो सकती है। पौधों को संक्रमित करने वाले अधिकांश विषाणुओं में आनुवंशिक पदार्थ के रूप में एकल छड़ वाले आरएनए होते हैं। दूसरी ओर, जानवरों को संक्रमित करने वाले वाइरस में एकल या दोहरी लड़ी वाले आरएनए या दोहरी लड़ी वाले डीएनए होते हैं। बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले बैक्टीरियोफेज या वाइरस में ज्यादातर दोहरी लड़ी वाले डीएनए होते हैं। उनका प्रोटीन कोट जिसे कैप्सिड कहा जाता है, कैप्सोमेर सबयूनिट्स से बना होता है। ये कैप्सोमेर पेचदार या बहुफलकीय ज्यामितीय रूपों में व्यवस्थित होते हैं। A.I.D.S., चेचक, कण्ठमाला और इन्फ्लूएंजा वायरल रोगों के कुछ सामान्य उदाहरण हैं.

मुख्य बिंदु:

• वाइरस अकोशिकीय होते हैं जिनमें प्रोटीन आवरण (कैप्सिड) और आनुवंशिक पदार्थ होता है।
• आनुवंशिक पदार्थ या तो DNA होता है या RNA, दोनों एक साथ नहीं होते।
• वाइरस से होने वाले प्रमुख रोग एड्स, चेचक, कण्ठमाला और इन्फ्लूएंजा हैं।

आम गलतियाँ:

• वाइरस के भीतर डीएनए और आरएनए दोनों की एक साथ उपस्थिति बता देना।
• कैप्सिड और कैप्सोमेरेस की संरचना को स्पष्ट न करना।
• वायरल रोगों के स्थान पर बैक्टीरिया से होने वाले रोग लिख देना।

Exam Tips:

a) वाइरस को 'सजीव और निर्जीव के बीच की योजक कड़ी' के रूप में समझें।
b) पादप वाइरस और जंतु वाइरस के आनुवंशिक पदार्थ में अंतर याद रखें।
c) चार सामान्य वायरल रोगों के नाम अच्छी तरह रट लें।

 

Question 12: अपनी कक्षा में इस शीर्षक क्या वाइरस सजीव है अथवा निर्जीव, पर चर्चा करें?

Answer:

विषाणु सूक्ष्म जीव होते हैं जिनमें सजीव और निर्जीव दोनों के गुण होते हैं। एक वाइरस में प्रोटीन आवरण द्वारा कवर डीएनए या आरएनए का एक किनारा होता है। न्यूक्लिक एसिड (डीएनए या आरएनए) की यह उपस्थिति बताती है कि वाइरस जीवित है। इसके अतिरिक्त, वे सीमित तरीके से अपने पर्यावरण (होस्ट सेल के अंदर) पर भी प्रतिक्रिया कर सकते हैं। हालांकि, कुछ लक्षण, जैसे कि मेजबान सेल मशीनरी और उनकी अकोशिकीय प्रकृति का उपयोग किए बिना पुन: उत्पन्न करने की उनकी अक्षमता, इंगित करती है कि वायरस निर्जीव हैं। इसलिए, विषाणुओं का आधुनिक प्रणाली विज्ञान के लिए एक रहस्य बना हुआ है।

मुख्य बिंदु:

• सजीव लक्षण: इनमें आनुवंशिक पदार्थ (DNA/RNA) होता है और ये परपोषी शरीर में गुणन करते हैं।
• निर्जीव लक्षण: ये अकोशिकीय होते हैं, क्रिस्टल रूप में संचित किए जा सकते हैं और स्वतंत्र रूप से उपापचय नहीं करते।
• इसलिए वाइरस को सजीव और निर्जीव के बीच की सीमा रेखा माना जाता है।

आम गलतियाँ:

• वाइरस को पूरी तरह से सजीव या पूरी तरह से निर्जीव मान लेना।
• होस्ट सेल (परपोषी कोशिका) के बाहर और अंदर की गतिविधियों में अंतर न समझा पाना।
• क्रिस्टलीकरण के गुण का उल्लेख न करना।

Exam Tips:

a) उत्तर को दो भागों में बांटकर लिखें - सजीवों जैसे लक्षण और निर्जीवों जैसे लक्षण।
b) निष्कर्ष में स्पष्ट करें कि यह सजीव और निर्जीव के बीच की कड़ी है।
c) यह एक विश्लेಷణాत्मक (Analytical) प्रश्न है, इसलिए तार्किक भाषा का प्रयोग करें।

 

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