NCERT Solutions Class 10 Hindi Kshitiz पाठ 13 मानवीय करुणा की दिव्या चमक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

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Class 10 Hindi पाठ 13 मानवीय करुणा की दिव्या चमक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना NCERT Solutions PDF

NCERT Solutions for Class 10 Hindi for Kshitiz पाठ 13 मानवीय करुणा की दिव्या चमक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

 

2. मानवीय करुणा की दिव्य चमक (लेखक: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)

 

पाठ की रूपरेखा

संस्मरण स्मृतियों से बनता है और स्मृतियों की विश्वसनीयता उसे महत्वपूर्ण बनाती है। फ़ादर कामिल बुल्के पर लिखा सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का यह संस्मरण इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है। स्वयं को पूरी आस्था से भारतीय कहने वाले फ़ादर बुल्के का जन्म तो बेल्जियम (यूरोप) के रैम्सचैपल शहर में हुआ था - जो गिरिजाघरों, पादरियों, धर्मगुरुओं और संतों की भूमि कही जाती है - परंतु उन्होंने अपनी कर्मभूमि भारत को बनाया। फ़ादर बुल्के मन से संन्यासी थे, परंतु पारंपरिक अर्थ में नहीं। लेखक सर्वेश्वर का फ़ादर बुल्के से अत्यंत आत्मीय और निकट का संबंध था, जिसकी झलक हमें इस संस्मरण में मिलती है। लेखक का अटूट विश्वास है कि जब तक इस देश में रामकथा का अस्तित्व रहेगा, तब तक इस विदेशी भारतीय साधु को आदरपूर्वक याद किया जाएगा तथा उन्हें हिंदी भाषा और बोलियों के प्रति अगाध प्रेम का एक अनुपम उदाहरण माना जाएगा।

 

पाठ का सार

प्रस्तुत पाठ सर्वेश्वर दयाल सक्सेना द्वारा लिखित एक उत्कृष्ट और भावपूर्ण संस्मरण है, जिसमें फ़ादर कामिल बुल्के की अनूठी चारित्रिक और व्यावहारिक विशेषताओं का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है। बेल्जियम में जनमे फ़ादर बुल्के एक ऐसी पावन भूमि को छोड़कर भारत आए जो पादरियों और गिरिजाघरों के लिए प्रसिद्ध है। भारत आने के बाद उन्होंने मृत्युपर्यंत इसे ही अपनी कर्मभूमि बनाए रखा। फ़ादर संकल्प से तो संन्यासी थे ही, परंतु वे पारंपरिक रूढ़ियों से अलग एक संवेदनशील संन्यासी थे। लेखक और फ़ादर के गहरे, आत्मीय संबंधों की सघन अभिव्यक्ति इस संस्मरण में हुई है। वे भारतीय संस्कृति के अंग बन गए और उन्होंने हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा का गौरव दिलाने के लिए आजीवन सराहनीय संघर्ष किया।

 

फ़ादर बुल्के के निधन पर लेखक का आक्रोश

लेखक फ़ादर कामिल बुल्के के असामयिक निधन पर गहरा दुःख और आक्रोश व्यक्त करते हुए ईश्वर से प्रश्न करते हैं कि जिस पुण्यात्मा के हृदय और रग-रग में दूसरों के लिए केवल मिठास और स्नेह भरा हुआ था, उसे ईश्वर ने गैंग्रीन (ज़हरबाद) जैसी अत्यंत कष्टदायक और दर्दनाक मृत्यु का दंड क्यों दिया? फ़ादर की मृत्यु ज़हरबाद के कारण असहनीय पीड़ा सहते हुए हुई थी। जिस संत ने जीवन भर अपने प्रियजनों और परिचितों पर ममता, दया और अपनत्व की अमृत वर्षा की, उसे अंत में ऐसी कष्टकारी मृत्यु क्यों मिली? लेखक आज भी फ़ादर की स्नेहमयी बाँहों की आत्मीय गर्माहट और उनके स्नेहपूर्ण आलिंगन का दबाव अपनी छाती पर महसूस करते हैं।

 

फ़ादर बुल्के की आत्मीयता और लेखक

लेखक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के लिए फ़ादर बुल्के की स्मृतियों को याद करना किसी शांत और धीमे संगीत को सुनने जैसा सुखद और गंभीर अनुभव लगता है। उन्हें देखना पवित्र और निर्मल जल में स्नान करने के समान आत्मिक शुद्धि देता था और उनसे बातचीत करना मन को अच्छे कर्मों के संकल्प से भर देता था। लेखक उनके साथ बिताए दिनों की स्मृतियों में डूब जाते हैं, जब वे 'परिमल' नामक साहित्यिक संस्था के दिनों में एक पारिवारिक रिश्ते की तरह जुड़े थे। फ़ादर लेखक और उनके मित्रों के हँसी-मज़ाक में बड़े भाई की तरह शामिल होते, साहित्यिक गोष्ठियों में बिना किसी संकोच के गंभीर बहस करते और उनकी रचनाओं पर बेबाक राय तथा उचित सुझाव देते थे। वे मित्रों के घरों के हर उत्सव और संस्कार में पुरोहित की तरह उपस्थित होकर अपनी स्नेहिल आशीषों से उन्हें सराबोर कर देते थे। लेखक ने उन्हें कभी क्रोध में नहीं देखा, बल्कि उनके चेहरे पर हमेशा वात्सल्य और ममता की अविरल धारा बहती महसूस की। उन्हें देखकर लेखक के मन में हमेशा यह जिज्ञासा बनी रही कि बेल्जियम में इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष की पढ़ाई पूरी करने के दौरान ही उनके मन में घर-परिवार होने के बावजूद संन्यासी बनने की इच्छा कैसे जागृत हुई थी।

 

फ़ादर बुल्के का परिवार

लेखक जब भी उनसे बातचीत के दौरान उनके परिवार के बारे में पूछते, तो वे बहुत ही सरलता से कहते कि अब तो मेरा देश भारत ही है। हाँ, उन्हें अपनी जन्मभूमि रैम्सचैपल और अपनी स्नेहमयी माँ की बहुत याद आती थी। वे अक्सर अपनी माँ की यादों में खो जाते थे। उनकी माँ द्वारा लिखे गए पत्र अक्सर भारत में उनके पास आते थे, जिन्हें वे बड़े गर्व से अपने घनिष्ठ मित्र डॉ. रघुवंश को दिखाया करते थे। पिता और भाइयों के प्रति उनका विशेष मोह नहीं था। उनके पिता एक व्यवसायी थे, उनका एक भाई पादरी बन चुका था और दूसरा भाई काम करता था तथा उसका अपना परिवार था। उनकी एक बहन भी थी, जो बहुत ही सख्त और ज़िद्दी स्वभाव की थी। फ़ादर को कभी उसकी शादी की चिंता करते हुए नहीं देखा गया। भारत आने के बाद वे केवल दो या तीन बार ही अपने परिवार से मिलने बेल्जियम गए थे। जब लेखक उनसे पूछते कि वे सब कुछ छोड़कर भारत क्यों चले आए, तो वे मुस्कुराकर कहते कि यह प्रभु की ही इच्छा थी। वे बताते कि उनकी माँ ने उनके बचपन में ही यह घोषणा कर दी थी कि यह लड़का हाथ से निकल गया है, और सचमुच इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष की पढ़ाई अधूरी छोड़कर वे संन्यासी बनने के लिए धर्मगुरु के पास चले गए और भारत जाने की शर्त रखकर संन्यास ले लिया। भारत आने की इच्छा का कारण पूछने पर वे अक्सर अज्ञानता प्रकट कर देते थे।

 

फ़ादर बुल्के की भारत में प्रक्रियाएँ

भारत आने के बाद फ़ादर बुल्के ने अपनी पढ़ाई को नए सिरे से शुरू किया। उन्होंने 'जिसेट संघ' में रहकर लगभग दो वर्ष तक धर्माचार की विधिवत पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने ९ - १० वर्ष तक दार्जिलिंग में रहकर अध्ययन किया। कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) से उन्होंने बी.ए. की डिग्री ली और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रहते हुए वर्ष १९५० में अपना अत्यंत प्रसिद्ध शोध-प्रबंध 'रामकथा: उत्पत्ति और विकास' पूरा किया। उन्होंने फादर कामिल बुल्के के रूप में माटरलिंक के प्रसिद्ध नाटक 'ब्लूबर्ड' का हिंदी में 'नीलपंछी' नाम से अनुवाद भी किया। वे रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज में हिंदी और संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष रहे, जहाँ उन्होंने एक अत्यंत प्रसिद्ध और व्यापक अंग्रेजी - हिंदी शब्दकोश (डिक्शनरी) तैयार की और ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल का हिंदी अनुवाद भी किया। वहीं रहते हुए वे अस्वस्थ हुए और पटना से दिल्ली लाए गए, जहाँ ४७ वर्ष भारत में रहकर और ७३ वर्ष का सार्थक जीवन जीकर वे इस नश्वर संसार से विदा हो गए।

 

संकल्प से संन्यासी फ़ादर बुल्के

फ़ादर बुल्के बाह्य आचरण से अधिक अपने मन के संकल्प से संन्यासी थे। उनके स्वभाव में यह विशेषता थी कि वे जिससे भी एक बार आत्मीय रिश्ता बना लेते थे, उसे कभी तोड़ते नहीं थे। दसियों साल बाद मिलने पर भी उनके व्यवहार में वही पुराना अपनत्व और स्नेह की महक महसूस होती थी। वे जब भी दिल्ली आते, चाहे मौसम कैसा भी हो - अत्यधिक गर्मी, कड़ाके की ठंड या भारी बरसात - वे लेखक से मिलने दो मिनट के लिए ही सही, अवश्य आते थे। उन्हें हिंदी भाषा के प्रति अगाध प्रेम था और वे हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते थे। वे हर मंच पर हिंदी की दुर्दशा पर अपना दुःख प्रकट करते थे और हिंदी भाषियों द्वारा ही हिंदी की उपेक्षा किए जाने पर अत्यंत क्षुब्ध और आक्रोशित हो उठते थे। लोगों के पारिवारिक सुख-दुःख और व्यक्तिगत समस्याओं के बारे में पूछना उनका सहज स्वभाव था। किसी के बड़े से बड़े संकट के समय भी उनके सांत्वना भरे शब्द मन को अद्भुत शांति और संबल प्रदान करते थे। लेखक को अपनी पत्नी और पुत्र की असमय मृत्यु पर फ़ादर के मुख से निकले सांत्वना के शब्दों में बहती हुई शांत और अलौकिक शांति की ध्वनि आज भी याद है, जिसने उनके व्याकुल मन को ढांढस बंधाया था।

 

फ़ादर बुल्के की अंतिम जीवन-यात्रा

लेखक को इस बात का अत्यंत मलाल और दुःख है कि वे फ़ादर के अंतिम क्षणों में उनसे मिल नहीं सके, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं चला कि फ़ादर दिल्ली में गंभीर रूप से बीमार हैं। जब लेखक ने उन्हें देखा, तो उनका पार्थिव शरीर कफन से ढका हुआ ताबूत में रखा था। १८ अगस्त, १९८२ की सुबह कश्मीरी गेट के निकलसन कब्रिस्तान में उनके ताबूत को एक छोटी नीली गाड़ी से उतारा गया। उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने वालों में कुछ ईसाई पादरी, डॉ. रघुवंश का पुत्र और उनके घनिष्ठ संबंधी राजेश्वर सिंह मुख्य थे। अंतिम विदाई के समय दिल्ली के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, साहित्यकारों और वैज्ञानिकों की भारी भीड़ नम आँखों से खड़ी थी, जिनमें डॉ. सत्यप्रकाश और डॉ. रघुवंश प्रमुख थे। मसीही विधि से प्रार्थना करने के बाद हिंदी में भी उनके लिए प्रार्थना की गई। सेंट जेवियर्स के रेक्टर फादर पास्कल ने उनके पावन जीवन और परोपकारी कर्मों को याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की और कहा, "फ़ादर कामिल बुल्के अब इस मिट्टी में समा रहे हैं। ईश्वर करे कि इस धरती से ऐसे ही और अनमोल रत्न पैदा हों।" डॉ. सत्यप्रकाश ने भी उनकी वंदनीय और अनुकरणीय जीवन शैली को नमन किया, जिसके बाद उनके पार्थिव शरीर को कब्र में उतार दिया गया।

 

लेखक की सोच

लेखक कहते हैं कि मैं नहीं जानता कि इस निस्वार्थ संन्यासी ने कभी यह सोचा भी था या नहीं कि उसकी मृत्यु पर कोई रोएगा भी, परंतु उस दुःखद क्षण में उनकी विदाई पर अश्रु बहाने वालों की संख्या अनगिनत थी। नम आँखों वाले उन रोने वाले लोगों की गिनती करना मानो स्याही फैलाकर कागज़ काला करने जैसा व्यर्थ काम था, क्योंकि रोने वालों का कोई अंत नहीं था। हमारे बीच से वह महान आत्मा विदा हो गई जो हम सबमें सबसे अधिक विशाल, छायादार, फूलों और फलों की सुगंध से युक्त, सबसे अलग और सबके प्रिय होकर भी मानवीय करुणा की अलौकिक चमक में हमेशा मुस्कुराते हुए खड़े थे।

 

शब्दार्थ

 

पृष्ठ - 85

ज़हरबाद - गैंग्रीन, एक प्रकार का ज़हरीला और कष्टसाध्य फोड़ा। रगों - नसों। दिव्य - अलौकिक। विधान - तरीका। आस्था - श्रद्धा। अस्तित्व - विद्यमान। यातना - पीड़ा। देहरी - दहलीज़। पादरी - ईसाई धर्म का पुरोहित या आचार्य। आतुर - अधीर, उत्सुक। अपनत्व - अपनापन। साक्षी - गवाह। निर्मल - पवित्र, साफ़। संकल्प - निश्चय। निर्लिप्त - आसक्ति से रहित, जो लिप्त न हो। बेबाक राय - स्पष्ट विचारों को प्रकट करना। वात्सल्य - बच्चों के प्रति स्नेह। आवेश - उत्साह। लबालब - ऊपर तक भरा हुआ। छलकना - उमड़ना.

 

पृष्ठ - 86

अभिन्न मित्र - घनिष्ठ मित्र। लगाव - अधिक प्रेम। हाथ से जाना - वश में न होना, प्रभाव से मुक्त। धर्मगुरु - धार्मिक उपदेश देने वाला पादरी.

 

पृष्ठ - 87

परिमल - साहित्यिक संस्था का नाम। रूपांतर - किसी वस्तु का बदला हुआ रूप। कोश - खजाना, शब्दकोश। बयान करना - वर्णन करना। अकाट्य - जो बात काटी न जा सके, तर्कपूर्ण। झुँझलाते - गुस्सा प्रकट करते हुए। उपेक्षा - महत्त्व न देना। सांत्वना - ढाढ़स, विश्वास, भरोसा। तन्मयी - लीन होना। विरल - कम मिलने वाली। ताबूत - शव रखे जाने वाला संदूक। जिस्म - शरीर। गैरिक वसन - गेरुए रंग के वस्त्र.

 

पृष्ठ - 88

अपरिचित - अनजाने लोग। अनुकरणीय - अपनाने योग्य। स्याही फैलाना - जिसे लिखा न जा सके, उसे लिखने का प्रयास करना। आजीवन - जीवनभर, संपूर्ण जीवन। श्रद्धानत - श्रद्धा से झुका हुआ.

 

अभ्यास प्रश्नोत्तर

 

I. बहुविकल्पी प्रश्न

 

Question 1. "करुणा के निर्मल जल में स्नान" का क्या आशय है?
(a) करुणा नदी के साफ़ पानी में नहाना
(b) साफ़ पानी में नहाने से ईश्वर की करुणा मिलती है
(c) फ़ादर की करुणा के स्पर्श से मन का अच्छाइयों की ओर प्रेरित होना
(d) फ़ादर निर्मल जल में नहाते तो उन्हें करुणा मिलती
Answer: (c) फ़ादर की करुणा के स्पर्श से मन का अच्छाइयों की ओर प्रेरित होना
In simple words: फ़ादर कामिल बुल्के की पवित्र उपस्थिति और उनकी दयालुता का अनुभव करना ऐसा था मानो हमारे मन के सारे विचार शुद्ध होकर भलाई की ओर मुड़ गए हों।

Exam Tip: 'निर्मल जल' यहाँ शारीरिक स्नान का नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक पवित्रता का प्रतीक है, जिसे फ़ादर की संगति से जोड़कर समझा जाना चाहिए।

 

Question 2. फ़ादर से बातें करके व्यक्ति कैसा महसूस करता था?
(a) प्रसन्नता
(b) दुःख एवं करुणा
(c) कर्तव्य बोध तथा सुकर्म की प्रेरणा युक्त
(d) तनाव रहित
Answer: (c) कर्तव्य बोध तथा सुकर्म की प्रेरणा युक्त
In simple words: फ़ादर बुल्के की गंभीर बातें सुनकर इंसान अपने जीवन के लक्ष्यों, ज़िम्मेदारियों और अच्छे कर्मों को करने के दृढ़ संकल्प से भर जाता था।

Exam Tip: पाठ में लेखक ने फ़ादर की बातचीत की तुलना 'संकल्प' और 'कर्म' से की है, जो व्यक्ति को नैतिक कर्तव्य का बोध कराती है।

 

Question 3. 'मुझे परिमल के दिन याद हैं' - वाक्य में वर्णित 'परिमल' क्या है?
(a) लेखक के आवास का नाम
(b) फ़ादर के आवास का नाम
(c) एक प्रसिद्ध विश्राम गृह का नाम
(d) युवा साहित्यकारों के समूह का नाम।
Answer: (d) युवा साहित्यकारों के समूह का नाम।
In simple words: 'परिमल' इलाहाबाद के युवा और उत्साही लेखकों व बुद्धिजीवियों की एक प्रसिद्ध साहित्यिक गोष्ठी का नाम था, जिससे लेखक और फ़ादर जुड़े थे।

Exam Tip: परिमल को किसी इमारत या घर का नाम समझने की भूल न करें, यह एक प्रगतिशील साहित्यिक संस्था का नाम था।

 

Question 4. उत्सव तथा संस्कार में फ़ादर पुरोहित जैसे शामिल होकर क्या करते?
(a) मंत्रोच्चारण करते
(b) कर्मकांड की विधि बताते
(c) भरपूर आशीर्वाद देते
(d) कर्मकांड के बाद प्रसाद वितरित करते थे
Answer: (c) भरपूर आशीर्वाद देते
In simple words: किसी भी पारिवारिक आयोजन या मांगलिक संस्कार में फ़ादर बुल्के घर के बड़े सदस्य या पुरोहित की भाँति खड़े होकर सबको अपना असीम प्यार और आशीर्वाद देते थे।

Exam Tip: फ़ादर का पुरोहित रूप कर्मकांडीय मंत्रोच्चार का नहीं, बल्कि उनके बड़े भाई जैसे वात्सल्य और 'भरपूर आशीर्वाद' देने की भूमिका का परिचायक था।

 

Question 5. 'वात्सल्य' शब्द व्याकरणिक दृष्टि से क्या है?
(a) भाववाचक संज्ञा
(b) जातिवाचक संज्ञा
(c) अव्यय
(d) विशेषण
Answer: (a) भाववाचक संज्ञा
In simple words: व्याकरण के अनुसार 'वात्सल्य' एक आंतरिक मानवीय भावना या स्नेह का नाम है, इसलिए यह भाववाचक संज्ञा की श्रेणी में आता है।

Exam Tip: स्नेह, प्रेम, ममता और वात्सल्य जैसे शब्द जो मन के अमूर्त भावों को व्यक्त करते हैं, सदैव भाववाचक संज्ञा कहलाते हैं।

 

Question 6. लेखक के दुखी होने का कारण निम्नलिखित में से क्या था?
(a) फ़ादर की मृत्यु होना
(b) उसकी पत्नी की मृत्यु होना
(c) फ़ादर की मृत्यु तथा फ़ादर द्वारा गले न लगाना
(d) उसकी पत्नी और पुत्र की मृत्यु
Answer: (c) फ़ादर की मृत्यु तथा फ़ादर द्वारा गले न लगाना
In simple words: लेखक इस बात से गहरे दुःख में थे कि फ़ादर दिल्ली में अंतिम सांसें ले रहे थे पर वे उनसे गले नहीं मिल सके, और जब देखा तो उनका पार्थिव शरीर ताबूत में शांत लेटा था।

Exam Tip: लेखक के दुःख का दोहरा कारण फ़ादर का संसार से चले जाना और अंतिम पलों में उनकी बाहों के आत्मीय आलिंगन से वंचित रह जाना था।

 

Question 7. लेखक को गले लगाने वाली फ़ादर की बाँहें कहाँ थीं?
(a) पेट पर
(b) कब्र में
(c) लेखक की पीठ पर
(d) ताबूत में उनके शरीर पर
Answer: (d) ताबूत में उनके शरीर पर
In simple words: लेखक ने जब फ़ादर को अंतिम बार देखा, तो वे बाहें जो हमेशा आलिंगन के लिए खुली रहती थीं, ताबूत के भीतर उनके शांत शरीर पर स्थिर रखी हुई थीं।

Exam Tip: यह दृश्य फ़ादर की आत्मीयता के अंत को दर्शाता है, जहाँ हमेशा प्यार बरसाने वाले हाथ अब निष्प्राण होकर ताबूत में विश्राम कर रहे थे।

 

Question 8. कब्रगाह तक उनका शव किस प्रकार लाया गया?
(a) सरकारी गाड़ी में
(b) मिलिट्री की गाड़ी में
(c) छोटी-सी नीली गाड़ी में
(d) लोगों के कंधे पर
Answer: (c) छोटी-सी नीली गाड़ी में
In simple words: फ़ादर कामिल बुल्के के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए कश्मीरी गेट स्थित निकलसन कब्रिस्तान तक एक छोटी सी नीली गाड़ी के माध्यम से लाया गया था।

Exam Tip: अंतिम यात्रा के इस दृश्य में प्रयुक्त 'छोटी-सी नीली गाड़ी' के सटीक प्रसंग को स्मृति में बनाए रखें।

 

Question 9. फ़ादर को जहाँ कब्र में दफ़नाया जाना था वहाँ निम्नलिखित में से क्या था?
(a) पीपल की छाया
(b) करील की छाया
(c) बरगद की छाया
(d) नीम की छाया
Answer: (b) करील की छाया
In simple words: कब्रिस्तान के जिस शांत कोने में फ़ादर बुल्के की कब्र खोदी गई थी, उसके ठीक ऊपर करील के घने पेड़ों की ठंडी और उदास छाया पसरी हुई थी।

Exam Tip: मरुस्थलीय या कँटीले क्षेत्रों में मिलने वाले 'करील' वृक्ष की छाँह का प्रसंग ही पाठ में वर्णित है, इसे नीम या बरगद से न बदलें।

 

Question 10. "एक लंबी संकरी उदास पेड़ों की घनी छाँह वाली सड़क" विशेषण वाला विकल्प कौन-सा है?
(a) एक लंबी
(b) संकरी उदास
(c) घनी छाँह वाली
(d) एक लंबी संकरी उदास पेड़ों की घनी छाँह वाली सड़क।
Answer: (d) एक लंबी संकरी उदास पेड़ों की घनी छाँह वाली सड़क।
In simple words: यह पूरा वाक्यांश सड़क की शांत, संकरी और गमगीन स्थिति को दर्शाने के लिए एक बड़े विशेषण पदबंध के रूप में प्रयुक्त किया गया है।

Exam Tip: व्याकरण की दृष्टि से जब कई शब्द मिलकर किसी संज्ञा (सड़क) की विशेषता बताते हैं, तो वह 'विशेषण पदबंध' कहलाता है।

 

Question 11. फ़ादर की मृत्यु पर रोने वालों की कमी नहीं थी, क्यों?
(a) क्योंकि फ़ादर सभी से आत्मीय संबंध रखते थे
(b) फ़ादर के संन्यासी होने के कारण
(c) फ़ादर के दिल्ली आने के कारण
(d) सबसे अधिक छायादार तथा गंध से भरा होने के कारण
Answer: (a) क्योंकि फ़ादर सभी से आत्मीय संबंध रखते थे
In simple words: फ़ादर कामिल बुल्के जिससे भी मिलते थे, उससे अत्यंत आत्मीय और गहरा रिश्ता बना लेते थे, इसलिए उनके जाने पर शोक मनाने वालों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी।

Exam Tip: उनके प्रति लोगों के इस अपार दुख का मूल कारण उनका निष्काम और आत्मीय प्रेम भाव ही था।

 

Question 12. "नम आँखों को गिनना स्याही फैलाना है" - का आशय क्या है?
(a) नम आँखों से स्याही फैलती है।
(b) आँखें नम हों तो स्याही फैल जाती है।
(c) नम आँखों वाले थोड़े से व्यक्ति थे।
(d) रोने वालों को गिना नहीं जा सकता था।
Answer: (d) रोने वालों को गिना नहीं जा सकता था।
In simple words: फ़ादर की अंतिम यात्रा में दुख से रोने और नम आँखों वाले लोगों की संख्या इतनी अधिक थी कि उनके नामों की गिनती लिखना कागज़ और स्याही बर्बाद करने जैसा असंभव काम था।

Exam Tip: इस मुहावरेदार कथन का अर्थ शोक संतप्त लोगों की 'असीमित संख्या' और असीम शोक को दर्शाना है।

 

Question 13. लेखक ने फ़ादर को सबसे अधिक छायादार, फल - फूल गंध से भरा कहा है, क्यों?
(a) वे लोगों को छाया देते थे।
(b) वे लोगों को फल-फूल देते थे।
(c) वे लोगों को सुगंधित पदार्थ देते थे।
(d) वे पुष्पित - फलित वृक्ष के समान स्नेह करुणा तथा वात्सल्य देते थे।
Answer: (d) वे पुष्पित - फलित वृक्ष के समान स्नेह करुणा तथा वात्सल्य देते थे।
In simple words: जैसे एक विशाल और हरा-भरा वृक्ष सबको ठंडी छाँह, फल और खुशबू देता है, वैसे ही फ़ादर बुल्के भी सबको निस्वार्थ प्रेम, करुणा और ममता से भर देते थे।

Exam Tip: यहाँ लेखक ने फ़ादर के मानवीय और दयालु व्यक्तित्व की तुलना एक परोपकारी 'फलदार वृक्ष' से की है।

 

Question 14. लेखक के मन में फ़ादर की स्मृति किस तरह रहेगी?
(a) चूल्हे की आग की तरह
(b) यज्ञ की आग की आँच की तरह
(c) जंगल की आग की आँच की तरह
(d) समुद्र की आग की तरह
Answer: (b) यज्ञ की आग की आँच की तरह
In simple words: फ़ादर कामिल बुल्के की पावन यादें लेखक के हृदय में हमेशा एक पवित्र यज्ञ की उठती हुई शांत और दिव्य आँच की तरह अमर रहेंगी।

Exam Tip: यज्ञ की पवित्र अग्नि का उल्लेख फ़ादर की निष्पाप, पवित्र और सात्विक उपस्थिति को दर्शाने के लिए किया गया है।

 

Question 15. 'श्रद्धानत' शब्द में समास और विग्रह का उचित विकल्प कौन - सा है?
(a) श्रद्धा के अनुसार नत - अव्ययीभाव समास
(b) श्रद्धा और नत - द्वंद्व समास
(c) श्रद्धा से नत - तत्पुरुष समास
(d) श्रद्धा जैसा नत - कर्मधारय समास
Answer: (c) श्रद्धा से नत - तत्पुरुष समास
In simple words: 'श्रद्धानत' का अर्थ है 'श्रद्धा से झुका हुआ'। यहाँ 'से' कारक चिह्न का लोप होने के कारण यह करण तत्पुरुष समास के अंतर्गत आता है।

Exam Tip: जब विग्रह करते समय 'से' (करण कारक) विभक्ति प्रकट होती है, तो वहाँ तत्पुरुष समास ही होता है।

 

Question 16. फ़ादर बुल्के के मन में संन्यासी बनने की इच्छा कब उत्पन्न हुई?
(a) इंजीनियरिंग के प्रथम वर्ष में
(b) इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में
(c) इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद
(d) इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए सोचने से पहले
Answer: (b) इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में
In simple words: जब फ़ादर बुल्के बेल्जियम में इंजीनियरिंग की अपनी पढ़ाई के आख़िरी साल में थे, तभी अचानक उनके मन में सब कुछ त्याग कर संन्यासी बनने का विचार आया।

Exam Tip: पढ़ाई के वर्ष 'अंतिम वर्ष' को अच्छी तरह याद रखें, जब उनके मन में वैराग्य की भावना जागी थी।

 

Question 17. फ़ादर बुल्के का जन्म कहाँ हुआ था?
(a) दार्जिलिंग में
(b) कोलकाता में
(c) इलाहाबाद में
(d) रैम्सचैपल में
Answer: (d) रैम्सचैपल में
In simple words: फ़ादर कामिल बुल्के का जन्म यूरोप महाद्वीप के बेल्जियम देश के एक सुंदर शहर 'रैम्सचैपल' में हुआ था।

Exam Tip: रैम्सचैपल बेल्जियम का वह शहर है जिसे पादरियों और चर्च की पवित्र भूमि माना जाता है।

 

Question 18. फ़ादर बुल्के के परिवार में कौन बहुत सख्त और ज़िद्दी था?
(a) पिता
(b) माँ
(c) बहन
(d) भाई
Answer: (c) बहन
In simple words: फ़ादर बुल्के की बहन का स्वभाव बचपन से ही बहुत अधिक सख्त, हठी और अपनी बात पर अड़े रहने वाला (ज़िद्दी) था।

Exam Tip: परिवार के सदस्यों के स्वभाव में 'बहन के ज़िद्दी स्वभाव' का विशेष प्रसंग पाठ में दिया गया है।

 

Question 19. फ़ादर बुल्के के बचपन में ही किसने घोषित कर दिया था कि वे हाथ से निकल जाएँगे?
(a) माँ ने
(b) पिता ने
(c) भाई ने
(d) बहन ने
Answer: (a) माँ ने
In simple words: फ़ादर बुल्के के शांत, गंभीर और वैराग्य वाले व्यवहार को देखकर उनकी माताजी ने बचपन में ही कह दिया था कि यह लड़का बड़ा होकर साधु बन जाएगा।

Exam Tip: माँ के ममतामयी हृदय ने उनके संन्यासी स्वभाव को बचपन में ही पहचान लिया था।

 

Question 20. भारत आने के बाद फ़ादर बुल्के ने ‘जिसेट संघ’ में पादरियों के बीच कितने साल धर्माचार की पढ़ाई की?
(a) एक साल
(b) दो साल
(c) तीन साल
(d) चार साल
Answer: (b) दो साल
In simple words: भारत पहुँचने के बाद फ़ादर बुल्के ने 'जिसेट संघ' के पादरियों के साथ मिलकर लगातार दो वर्षों तक ईसाई धर्म के नियमों और दर्शन की पढ़ाई की थी।

Exam Tip: पादरियों के बीच उनके धर्माचार के अध्ययन की अवधि 'दो वर्ष' (Two years) थी।

 

Question 21. ‘जिसेट संघ’ में की गई पढ़ाई के बाद फ़ादर बुल्के ने कहाँ 9 - 10 साल तक पढ़ाई की?
(a) कलकत्ता में
(b) दार्जिलिंग में
(c) इलाहाबाद में
(d) राँची में
Answer: (b) दार्जिलिंग में
In simple words: अपनी प्रारंभिक धर्म-पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पहाड़ी क्षेत्र दार्जिलिंग में रहकर लगभग नौ से दस वर्षों तक आगे का अध्ययन जारी रखा।

Exam Tip: ९ - १० वर्ष के लंबे अध्ययन काल का संबंध पर्वतीय स्थल 'दार्जिलिंग' से है।

 

Question 22. फ़ादर बुल्के ने बी.ए. तथा एम.ए. की पढ़ाई क्रमशः कहाँ से की?
(a) कलकत्ता तथा इलाहाबाद से
(b) राँची तथा दार्जिलिंग से
(c) दिल्ली तथा पटना से
(d) इनमें से कोई नहीं
Answer: (a) कलकत्ता तथा इलाहाबाद से
In simple words: फ़ादर बुल्के ने अपनी स्नातक (B.A.) की पढ़ाई कोलकाता से और हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर (M.A.) की डिग्री इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी।

Exam Tip: दोनों ऐतिहासिक शिक्षा केंद्रों के नाम क्रमशः 'कलकत्ता' (B.A.) और 'इलाहाबाद' (M.A.) के रूप में याद रखें।

 

Question 23. फ़ादर बुल्के ने सेंट जेवियर्स कॉलेज, राँची में हिंदी तथा संस्कृत विभाग का विभागाध्यक्ष रहते हुए निम्नलिखित में से किसकी रचना नहीं की थी?
(a) बाइबिल का अनुवाद
(b) अंग्रेज़ी - हिंदी कोश
(c) ‘ब्लू बर्ड’ नाटक का ‘नीलपंछी’ नाम से रूपांतरण
(d) इनमें से कोई नहीं
Answer: (d) इनमें से कोई नहीं
In simple words: फ़ादर बुल्के ने राँची में रहते हुए इन तीनों महान साहित्यिक कृतियों (बाइबिल का हिंदी अनुवाद, अंग्रेज़ी-हिंदी डिक्शनरी और नीलपंछी) की रचना स्वयं की थी।

Exam Tip: चूँकि विकल्प (a), (b) और (c) तीनों ही उनके द्वारा रचित वास्तविक कृतियाँ हैं, अतः 'किसकी रचना नहीं की' का सही उत्तर 'इनमें से कोई नहीं' होगा।

 

Question 24. इस बार लेखक को फ़ादर बुल्के ने बाँहें खोलकर गले क्यों नहीं लगाया?
(a) अत्यधिक बीमार होने के कारण
(b) अत्यधिक दुर्बल हो जाने के कारण
(c) निधन हो जाने के कारण
(d) मनमुटाव हो जाने के कारण
Answer: (c) निधन हो जाने के कारण
In simple words: इस बार फ़ादर बुल्के लेखक को गले लगाने के लिए खड़े नहीं हो सके क्योंकि उनका स्वर्गवास हो चुका था और वे ताबूत में चिरनिद्रा में लीन थे।

Exam Tip: लेखक का यह कथन कि फ़ादर ने गले नहीं लगाया, उनकी मृत्यु के पश्चात की विवशता को अत्यंत कारुणिक ढंग से व्यक्त करता है।

 

Question 25. फ़ादर बुल्के को जिस कब्र में दफ़नाया जाना था, वहाँ के आस - पास की कौन - सी स्थिति सही नहीं है?
(a) उसके ऊपर करील पेड़ की घनी छाया थी।
(b) उसके आस-पास अन्य कोई कब्र नहीं थी।
(c) उसके चारों तरफ अनेक कब्रें थीं
(d) चारों तरफ तेज़ धूप थी।
Answer: (b) उसके आस - पास अन्य कोई कब्र नहीं थी।
In simple words: वह कब्रिस्तान दिल्ली का एक पुराना निकलसन कब्रिस्तान था, जहाँ उनके आस-पास पहले से ही कई अन्य पादरियों और लोगों की कब्रें बनी हुई थीं।

Exam Tip: 'अन्य कोई कब्र न होना' तथ्य गलत है, क्योंकि वह एक पुराना और घना कब्रिस्तान था जहाँ अनेक पुरानी कब्रें पहले से ही मौजूद थीं।

 

II. विषय - वस्तु का ज्ञान बोध एवं अभिव्यक्ति आधारित प्रश्न (2 अंक)

 

प्रश्न 1. फ़ादर बुल्के की यातना भरी मृत्यु पर लेखक के मन में किस प्रकार के भाव उत्पन्न हुए और क्यों?
Answer: फ़ादर कामिल बुल्के के असामयिक और कष्टदायक निधन से लेखक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का मन अत्यंत व्यथित और क्षुब्ध था। उनके मन में ईश्वर के न्याय के प्रति एक गहरी पीड़ा और आक्रोश का भाव उमड़ा। वे सोचने लगे कि जिस पवित्र इंसान की नसों में दूसरों के लिए केवल असीम स्नेह और ममता का अमृत बहता था, जिसने कभी किसी के प्रति कटुता या द्वेष भाव नहीं रखा, उसे अंत में गैंग्रीन (ज़हरबाद) जैसी पीड़ादायक और असहनीय बीमारी से तड़प-तड़प कर मरने की सज़ा क्यों मिली। लेखक को लगा कि ऐसी दयालु और पुण्यात्मा के लिए ईश्वर का यह क्रूर विधान सर्वथा अनुचित और पीड़ादायक था।
In simple words: लेखक फ़ादर की दर्दनाक मौत से बहुत दुखी थे और सोच रहे थे कि इतने दयालु और प्यारे इंसान को भगवान ने ऐसी दर्दभरी बीमारी क्यों दी।

Exam Tip: उत्तर में फ़ादर के निस्वार्थ और करुणामयी चरित्र की तुलना उनकी यातनापूर्ण बीमारी (गैंग्रीन) से करते हुए लेखक के आक्रोश को स्पष्ट करें।

 

प्रश्न 2. लेखक के स्मृति - पटल पर उस संन्यासी के कौन - कौन से चित्र बार - बार उभरते हैं?
Answer: लेखक के मानस पटल पर फ़ादर बुल्के से जुड़ी कई जीवंत और हृदयस्पर्शी स्मृतियाँ बार-बार उभरकर सामने आती हैं:
(i) सफ़ेद चोगे से ढकी उनकी लंबी और भव्य आकृति, उनका गोरा रंग, सफ़ेद और भूरी घनी दाढ़ी, नीली आँखें और हमेशा गले लगाने के लिए आतुर उनकी खुली बाँहें।
(ii) लेखक आज भी पैंतीस वर्ष बीत जाने के बाद भी उनकी उन ममतामयी बाँहों की आत्मीय गर्माहट और स्नेह का दबाव अपनी छाती पर महसूस करते हैं।
(iii) 'परिमल' साहित्यिक गोष्ठियों के वे मज़ेदार दिन, जहाँ वे निस्वार्थ भाव से हँसी-मज़ाक में शामिल होते, रचनाओं पर बेबाक सुझाव देते और पारिवारिक आयोजनों में बड़े भाई व पुरोहित की तरह स्नेहिल आशीर्वाद बरसाते थे।
(iv) इलाहाबाद की सूनी सड़कों पर फ़ादर की साइकिल का धीरे-धीरे आगे बढ़ना, मुस्कुराते हुए पास आकर उतरना और बड़े प्यार से हाल-चाल पूछना। ये सभी चित्र लेखक को बार-बार याद आते हैं।
In simple words: लेखक को फ़ादर का नीली आँखों वाला चेहरा, उनकी स्नेहमयी बाँहें, साइकिल चलाते हुए मुस्कुराना और गोष्ठियों में बड़े भाई की तरह आशीर्वाद देना हमेशा याद आता है।

Exam Tip: फ़ादर के शारीरिक सौंदर्य (नीली आँखें, भूरी दाढ़ी) और उनके व्यावहारिक स्नेह (साइकिल से आना, गोष्ठियों में आशीर्वाद देना) दोनों प्रकार के स्मृतिकणों का उल्लेख करें।

 

प्रश्न 3. मनुष्य अन्य बहुत - सी बातें भूल जाता है, किंतु दूर रह कर भी माँ के स्नेह को नहीं भुला पाता है। संन्यासी फ़ादर बुल्के भी अपनी माँ को नहीं भूल पाते हैं। उनकी भावनाओं को व्यक्त कीजिए।
Answer: संन्यास ग्रहण करने और अपनी मातृभूमि बेल्जियम से हज़ारों मील दूर भारत आ जाने के बाद भी फ़ादर बुल्के के मन में अपनी माँ के प्रति अपार स्नेह और आदर हमेशा बना रहा। वे अक्सर अपनी माँ की स्मृतियों में खो जाते थे और उनकी आँखों में गीलापन तैर आता था। बेल्जियम से उनकी माँ द्वारा भेजे गए पत्र उनके लिए सबसे अमूल्य धरोहर थे, जिन्हें वे बड़े गर्व से अपने घनिष्ठ मित्र डॉ. रघुवंश को दिखाते थे। माँ के स्नेह की यह पराकाष्ठा सिद्ध करती है कि भले ही कोई व्यक्ति भौतिक रूप से संन्यासी बन जाए और घर-परिवार छोड़ दे, परंतु अपनी जननी (माँ) के निस्वार्थ और अनमोल प्रेम की डोर को वह कभी अपने हृदय से अलग नहीं कर पाता।
In simple words: फ़ादर बुल्के संन्यासी बनने के बाद भी अपनी माँ को बहुत याद करते थे और उनके द्वारा भेजे गए पत्रों को अपने मित्र को बड़े चाव से दिखाते थे।

Exam Tip: संन्यासी के कर्तव्य-पथ (वैराग्य) और उनकी मातृ-भक्ति (माँ के प्रति लगाव) के सुंदर समन्वय को उत्तर में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें।

 

प्रश्न 4. फ़ादर बुल्के भारतीयता में रच - बस गए। ऐसा उनके जीवन में कैसे संभव हुआ होगा? अपने विचार लिखिए।
Answer: फ़ादर कामिल बुल्के का भारतीय संस्कृति में पूरी तरह रच-बस जाना उनके गहरे बौद्धिक लगाव और इस देश के प्रति उनके निस्वार्थ प्रेम का परिणाम था। भारत आने के बाद उन्होंने यहाँ की मिट्टी और भाषा को गहराई से जानने की ठानी। उन्होंने यहाँ आकर न केवल हिंदी और संस्कृत का विधिवत और उच्च अध्ययन किया, बल्कि हमारे आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र को अपने शोध (रामकथा: उत्पत्ति और विकास) का मुख्य विषय बनाया। राम के श्रेष्ठ जीवन मूल्यों ने उनके मन को पूरी तरह बदल दिया। वे भारत के लोगों के सुख-दुःख में शामिल होकर उनके सच्चे हितैषी बन गए। यहाँ की जीवन शैली, भाषा और आत्मीय रिश्तों को अपनाने के कारण ही वे एक विदेशी होने के बावजूद पूरी तरह से सच्चे भारतीय बन गए।
In simple words: फ़ादर बुल्के ने भारत आकर हिंदी और संस्कृत सीखी, रामकथा पर शोध किया और यहाँ के लोगों के साथ सच्चे पारिवारिक रिश्ते बनाए, जिससे वे भारतीय बन गए।

Exam Tip: उनके भारतीय बनने के प्रमुख कारणों (संस्कृत का अध्ययन, रामकथा पर शोध, और भारतीय लोकजीवन से जुड़ाव) को क्रमानुसार समझाएं।

 

प्रश्न 5. हिंदी की दुर्दशा पर फ़ादर बुल्के के हृदय से एक चीख सुनाई देती है और आश्चर्य भी। कैसे?
Answer: फ़ादर कामिल बुल्के विदेशी होने के बावजूद हिंदी भाषा से अनन्य प्रेम करते थे। जब वे देखते थे कि स्वयं भारत के लोग और हिंदी भाषी नागरिक ही अपनी मातृभाषा हिंदी की उपेक्षा कर रहे हैं, उसे वह सम्मान नहीं दे रहे जिसकी वह हकदार है, तो उनके संवेदनशील हृदय को गहरी ठेस पहुँचती थी। वे हर साहित्यिक और सामाजिक मंच पर हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने की पुरज़ोर वकालत करते थे। उनके लिए यह सबसे बड़ा आश्चर्य और वेदना का विषय था कि जिस भाषा में इतना समृद्ध साहित्य और संस्कार बिखरे पड़े हैं, उसे उसके ही देश में उपेक्षित किया जाता है। इसी उपेक्षा को देखकर उनके मुख से दुःख और आश्चर्य भरी चीख निकल पड़ती थी।
In simple words: फ़ादर बुल्के को इस बात पर बहुत हैरानी और दुःख होता था कि भारत के लोग खुद अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी का आदर नहीं करते और उसकी उपेक्षा करते हैं।

Exam Tip: हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के उनके प्रयासों और हिंदी भाषियों द्वारा ही की जाने वाली 'हिंदी की उपेक्षा' के प्रति उनकी नाराज़गी को उत्तर में दर्शाएँ।

 

प्रश्न 6. उनकी अंतिम - यात्रा पर उमड़ती हुई भीड़ और तरल आँखों को देखकर आपके मन में क्या आश्चर्य होता है?
Answer: फ़ादर कामिल बुल्के की अंतिम यात्रा का दृश्य देखकर मन में यह गहरा आश्चर्य और श्रद्धा का भाव जागता है कि हज़ारों मील दूर बेल्जियम से आया एक विदेशी ईसाई पादरी, भारत के लोगों के दिलों में कितनी गहरी जगह बना चुका था। उनकी विदाई पर शोक व्यक्त करने के लिए दिल्ली के बड़े-बड़े विद्वान, वैज्ञानिक, लेखक, और आम लोग कड़ाके की धूप में कब्रिस्तान में नम आँखों से खड़े थे। इस नम आँखों की अथाह भीड़ को देखकर यह साफ हो जाता है कि फ़ादर के भीतर लोगों के लिए जो निस्वार्थ और सच्चा मानवीय प्रेम था, उसी की गूँज ने आज इतने सारे लोगों को उनके अंतिम दर्शन के लिए विवश कर दिया था। यह आत्मीयता की वास्तविक विजय थी।
In simple words: एक विदेशी पादरी के चले जाने पर दिल्ली के इतने बड़े-बड़े विद्वानों और आम लोगों को रोते हुए देखकर आश्चर्य होता है कि वे सबके कितने प्रिय थे।

Exam Tip: अंतिम यात्रा में शामिल हस्तियों (जैसे डॉ. सत्यप्रकाश, जैनेंद्र, डॉ. रघुवंश) के नामों का उल्लेख करते हुए जनसमुदाय के शोक को चित्रित करें।

 

प्रश्न 7. प्रस्तुत पाठ में लेखक क्या संदेश देना चाहता है? स्पष्ट करें।
Answer: इस संस्मरण के माध्यम से लेखक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना हमें निस्वार्थ प्रेम, मानवता, और अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति आदर रखने का एक अत्यंत गहरा संदेश देना चाहते हैं। फ़ादर कामिल बुल्के के अनुकरणीय और सात्विक चरित्र के माध्यम से वे हमें सिखाते हैं कि आत्मीयता और दया की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती; एक विदेशी भी भारत की मिट्टी और भाषा को अपनाकर हमारी संस्कृति का अनमोल रत्न बन सकता है। लेखक हमें अपनी मातृभाषा हिंदी का सम्मान करने, समाज में आपसी भाईचारा और अपनत्व बढ़ाने तथा दिखावे की दुनिया से दूर रहकर निस्वार्थ मानवीय सेवा करने की सीख देते हैं।
In simple words: लेखक हमें संदेश देते हैं कि हमें फ़ादर की तरह अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी से प्यार करना चाहिए, और बिना किसी स्वार्थ के सभी इंसानों की मदद करनी चाहिए।

Exam Tip: उत्तर में तीन प्रमुख संदेशों (मानवीय करुणा, हिंदी का सम्मान, और निस्वार्थ सेवा भाव) को अलग-अलग वाक्यों में स्पष्ट करें।

 

प्रश्न 8. आप फ़ादर बुल्के के आदर्श जीवन के किस कार्य से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, जिसके कारण वे आपके लिए प्रशंसनीय हो सकते हैं?
Answer: फ़ादर कामिल बुल्के के पावन और आदर्श जीवन में मुझे उनका हिंदी भाषा के उत्थान के लिए किया गया निस्वार्थ समर्पण सबसे अधिक प्रभावित करता है। एक विदेशी ईसाई पादरी होने के बावजूद, उन्होंने हिंदी भाषा की सेवा को अपना जीवन लक्ष्य बनाया। उन्होंने भारत आकर संस्कृत और हिंदी का गहन अध्ययन किया, रामकथा के उद्भव पर एक महान शोध-प्रबंध लिखा, और हमारे देश की समृद्ध विरासत को सँभालने का प्रयास किया। उनका यह कार्य अत्यंत वंदनीय और प्रशंसनीय है, जो हमें अपनी ही भाषा और संस्कृति का आदर करने की अमूल्य सीख देता है।
In simple words: फ़ादर बुल्के का विदेशी होने के बावजूद हिंदी भाषा और रामकथा पर शोध करना हमें सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है और उन्हें पूजनीय बनाता है।

Exam Tip: हिंदी के विकास में उनके ऐतिहासिक योगदान (जैसे शब्दकोश निर्माण, रामकथा शोध) को प्रभावित होने का मुख्य आधार बताएं।

 

प्रश्न 9. फ़ादर बुल्के ने भारत में रहते हुए जो कार्य किए उन्हें लिखिए।
Answer: फ़ादर कामिल बुल्के ने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाकर हिंदी और संस्कृति के उत्थान के लिए निम्नलिखित ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण कार्य किए थे:
(i) उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वर्ष १९५० में 'रामकथा: उत्पत्ति और विकास' विषय पर अपना अत्यंत प्रामाणिक शोध-प्रबंध पूरा किया। [17]
(ii) उन्होंने प्रसिद्ध विदेशी नाटक 'ब्लूबर्ड' का अत्यंत सुंदर हिंदी अनुवाद 'नीलपंछी' नाम से किया। [17]
(iii) उन्होंने राँची के सेंट जेवियर्स कॉलेज में हिंदी तथा संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएँ दीं। [17]
(iv) उन्होंने एक बहुत ही प्रामाणिक और विशाल 'अंग्रेज़ी - हिंदी शब्दकोश' (डिक्शनरी) तैयार की। [17]
(v) उन्होंने ईसाई धर्मग्रंथ 'बाइबिल' का अत्यंत सरल और सुंदर हिंदी भाषा में अनुवाद किया। [17]
In simple words: फ़ादर बुल्के ने भारत में रहकर बाइबिल का हिंदी अनुवाद किया, अंग्रेज़ी-हिंदी डिक्शनरी बनाई, और रामकथा पर एक महान खोज पत्र लिखा। [17]

Exam Tip: फ़ादर बुल्के के इन पाँचों प्रमुख कार्यों (शोध, अनुवाद, अध्यापन, और डिक्शनरी निर्माण) को परीक्षा में अंकवार साफ़-साफ़ लिखें।

 

प्रश्न 10. भारत आने के कारण पूछने पर फ़ादर बुल्के क्या उत्तर देते थे?
Answer: जब भी लेखक या कोई अन्य व्यक्ति फ़ादर बुल्के से उनकी समृद्ध जन्मभूमि बेल्जियम को छोड़कर भारत आने का कारण पूछता, तो वे अत्यंत सहजता और सरलता से उत्तर देते कि यह सब "प्रभु की इच्छा" थी। वे मुस्कुराते हुए बताते कि जब वे इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में थे, तभी उनके मन में संन्यासी बनने की तीव्र इच्छा जागी और उन्होंने अपने धर्मगुरु के समक्ष भारत जाने की शर्त रखी। वे कहते थे कि भारत की पावन संस्कृति उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती थी, इसलिए वे सब कुछ छोड़कर यहाँ चले आए।
In simple words: वे कहते थे कि भारत आना भगवान की इच्छा थी और बचपन से ही उनके मन में भारत की पावन संस्कृति के लिए बहुत आदर था।

Exam Tip: उत्तर में उनके इस कथन "प्रभु की इच्छा थी" और इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में संन्यास की शर्त को मुख्य रूप से लिखें।

 

प्रश्न 11. फ़ादर बुल्के ने अपने परिवार और माँ के बारे में क्या बताया?
Answer: फ़ादर बुल्के ने अपने परिवार के विषय में बताते हुए कहा कि उनके परिवार में उनके माता-पिता, दो भाई और एक बेहद ज़िद्दी बहन थी। उनके पिता एक व्यापारी थे, एक भाई पादरी बन गया था और दूसरा भाई शादी करके सपरिवार रहता था। उन्होंने बताया कि अपनी जन्मभूमि बेल्जियम में उन्हें सबसे अधिक अपनी स्नेहमयी माँ की याद सताती थी। उनकी माँ उन्हें नियमित रूप से पत्र लिखती थीं, जिन्हें वे बड़े चाव से सँभाल कर रखते थे और अपने मित्रों को दिखाते थे।
In simple words: उन्होंने बताया कि उनके परिवार में माता-पिता, दो भाई और एक ज़िद्दी बहन थी, और उन्हें अपनी माँ के प्यार और उनके पत्रों की बहुत याद आती थी।

Exam Tip: माता-पिता के व्यवसाय और भाई-बहन के विवरण के साथ माँ के पत्रों के प्रति उनके अनुराग को विशेष रूप से लिखें।

 

प्रश्न 12. लेखक ने फ़ादर की उपस्थिति को देवदार की छाया सदृश क्यों कहा है?
Answer: लेखक ने फ़ादर कामिल बुल्के की पावन उपस्थिति को देवदार के वृक्ष की शीतल छाया के समान इसलिए माना है क्योंकि देवदार का वृक्ष अत्यंत विशाल, घना और शीतल छाँह देने वाला होता है, जो हर थके हुए राहगीर की थकान और तपन को पल भर में हर लेता है। ठीक इसी प्रकार, फ़ादर बुल्के का ममतामयी और आत्मीय व्यक्तित्व भी उनके संपर्क में आने वाले हर इंसान को अलौकिक सुख, परम शांति, असीम वात्सल्य, अपनत्व और सांत्वना का शीतल संबल प्रदान करता था। उनके सांत्वना के शब्द गहरे दुखों को भी शांत कर देते थे।
In simple words: जैसे देवदार का बड़ा पेड़ थके हुए लोगों को शीतल छाया देता है, वैसे ही फ़ादर बुल्के की बातें दुखी लोगों को बहुत शांति और हिम्मत देती थीं।

Exam Tip: देवदार के पेड़ की भौतिक विशेषताओं (विशालता, ठंडी छाया) की तुलना फ़ादर के आत्मीय गुणों (ममता, सांत्वना, आशीर्वाद) से करते हुए उत्तर लिखें।

 

प्रश्न 13. फ़ादर बुल्के भारतीय संस्कृति से अत्यंत प्रभावित थे। पाठ के आधार पर लिखिए।
Answer: फ़ादर कामिल बुल्के के भारतीय संस्कृति से अत्यधिक प्रभावित होने के कई अकाट्य प्रमाण हमें इस पाठ में मिलते हैं:
(i) वे अपनी जन्मभूमि बेल्जियम को छोड़कर भारत आए और आजीवन यहीं के होकर रह गए।
(ii) उन्होंने भारतीय लोकजीवन के आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पावन चरित्र को अपने जीवन के शोध का मुख्य विषय बनाया।
(iii) वे भारतीय त्यौहारों, संस्कारों और मांगलिक आयोजनों में बड़े भाई की भाँति उपस्थित होकर अपना भरपूर आशीर्वाद देते थे।
(iv) उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए हर स्तर पर भरपूर प्रयास किया और आजीवन गैरिक वसन (संन्यासी वस्त्र) धारण किए रहे।
In simple words: फ़ादर बुल्के ने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया, रामकथा पर शोध किया, हिंदी भाषा का प्रचार किया और यहाँ के पारिवारिक रीति-रिवाजों को पूरे दिल से अपनाया।

Exam Tip: भारतीय संस्कृति के प्रति उनके अनुराग को दर्शाने के लिए उनके शोध-विषय 'रामकथा' और 'पारिवारिक संस्कारों में उनकी भागीदारी' का उल्लेख अवश्य करें।

 

प्रश्न 14. ‘नम आँखों को गिनना स्याही फैलाने जैसा है’ ऐसा कब और क्यों कहा गया है?
Answer: लेखक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने यह कारुणिक कथन फ़ादर कामिल बुल्के की अंतिम विदाई (अंतिम संस्कार) के समय उमड़े जनसैलाब को देखकर कहा था। ऐसा इसलिए कहा गया क्योंकि फ़ादर की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने और रोने वाले नम आँखों वाले लोगों की संख्या इतनी अधिक थी कि उनके नामों की सूची बनाना कागज़ और स्याही को व्यर्थ में बर्बाद करने जैसा असंभव काम था। उनके जाने से दुखी हर आँख गीली थी और उनके जाने का शोक असीम था, जिसे शब्दों या गिनती में नहीं बाँधा जा सकता था।
In simple words: फ़ादर की अंतिम यात्रा में रोने वाले लोगों की संख्या इतनी ज़्यादा थी कि उन सबकी गिनती करना या नाम लिखना नामुमकिन और व्यर्थ काम था।

Exam Tip: इस मुहावरेदार कथन का प्रयोग फ़ादर की लोकप्रियता और उनके निधन पर उमड़े असीमित शोक को दर्शाने के लिए किया गया है, इसे स्पष्ट करें।

 

प्रश्न 15. ‘फ़ादर ने हिंदी के उत्थान के लिए हज़ारों भारतीयों से भी बढ़कर प्रयास किया।’ इससे आप कितना सहमत हैं? प्रमाण सहित लिखिए।
Answer: हम इस कथन से पूरी तरह सहमत हैं। फ़ादर कामिल बुल्के ने विदेशी होने के बावजूद हिंदी भाषा की जो सेवा की, वह हज़ारों जन्मजात भारतीयों के लिए भी एक बहुत बड़ी प्रेरणा है। इसके मुख्य प्रमाण निम्नलिखित हैं:
- उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा में एम.ए. किया और रामकथा के उद्भव पर अपना प्रसिद्ध शोध ग्रंथ लिखा।
- उन्होंने हिंदी और संस्कृत विभाग के अध्यक्ष के रूप में काम करते हुए एक अत्यंत समृद्ध और उपयोगी अंग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोश तैयार किया।
- वे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए हर मंच पर आवाज़ उठाते थे और हिंदी भाषियों द्वारा ही हिंदी की उपेक्षा किए जाने पर सबसे अधिक दुखी और चिंतित होते थे।
In simple words: फ़ादर बुल्के ने हिंदी सीखी, डिक्शनरी बनाई, और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए लगातार आवाज़ उठाई, जो कई भारतीयों से भी कहीं बढ़कर प्रयास था।

Exam Tip: हिंदी के विकास में उनके अद्वितीय योगदानों (जैसे शब्दकोश निर्माण, विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य, और राष्ट्रभाषा के लिए संघर्ष) को तर्क सहित प्रमाण के रूप में लिखें।

 

प्रश्न 16. फ़ादर बुल्के को हिंदी के बारे में क्या चिंता थी?
Answer: फ़ादर कामिल बुल्के को हिंदी भाषा के विकास और उसके सम्मान को लेकर दो मुख्य चिंताएँ हमेशा सताती थीं:
1. **राष्ट्रभाषा का दर्जा न मिलना:** वे चाहते थे कि हिंदी को भारत की एकमात्र राष्ट्रभाषा के रूप में सम्मान मिले, और इसके लिए वे हर मंच पर आवाज़ उठाते थे।
2. **हिंदी भाषियों द्वारा उपेक्षा:** उन्हें सबसे अधिक दुःख और आश्चर्य तब होता था जब वे देखते थे कि भारत के पढ़े-लिखे हिंदी भाषी लोग ही अपनी मातृभाषा हिंदी की उपेक्षा करते हैं और उसे कमतर आंकते हैं। इसी उपेक्षा से वे अत्यंत चिंतित और दुखी रहते थे।
In simple words: फ़ादर बुल्के को चिंता थी कि हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान मिलना चाहिए, और वे हिंदी बोलने वालों द्वारा ही हिंदी की उपेक्षा किए जाने से बहुत दुखी रहते थे।

Exam Tip: परीक्षा में इन दोनों चिंताओं (राष्ट्रभाषा का सम्मान और हिंदी भाषियों की उदासीनता) को साफ़-साफ़ अलग-अलग बिंदुओं में लिखें।

 

अभ्यास प्रश्न पत्र

1. निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए। 

 

Question 1(क). “फ़ादर को याद करना एक उदास शांत संगीत सुनने जैसे है।” ऐसा क्यों कहा गया है?
Answer: लेखक ने फ़ादर बुल्के की यादों की तुलना एक उदास और शांत संगीत से इसलिए की है क्योंकि फ़ादर की मृत्यु के बाद उनकी स्मृतियाँ मन को एक गहरा दुःख तो देती हैं, परंतु साथ ही एक अद्भुत आत्मिक शांति और धीरज भी प्रदान करती हैं। जैसे कोई धीमा, उदास संगीत सुनने से मन शांत और गंभीर हो जाता है और हृदय में एक पवित्र सात्विकता छा जाती है, ठीक वैसी ही अनुभूति फ़ादर बुल्के को याद करने से लेखक और उनके परिचितों के मन में स्वतः जाग्रत हो जाती है।
In simple words: फ़ादर की यादें मन को उदास तो करती हैं, परंतु साथ ही एक बहुत ही मीठी शांति और हिम्मत भी देती हैं, जैसे कोई धीमा उदास संगीत सुनने पर होता है।

Exam Tip: संगीत की अमूर्त विशेषताओं (शांति, गंभीरता) की तुलना फ़ादर की यादों से उत्पन्न होने वाली आत्मिक शांति से करते हुए उत्तर लिखें।

 

Question 1(ख). फ़ादर कामिल बुल्के एक संन्यासी थे, परंतु पारंपरिक अर्थ में हम उन्हें संन्यासी क्यों नहीं कह सकते?
Answer: पारंपरिक अर्थ में संन्यासी वे होते हैं जो संसार के सभी आत्मीय रिश्तों और मोह-माया का पूरी तरह त्याग कर देते हैं तथा समाज से दूर एकांत में रहते हैं। परंतु, फ़ादर बुल्के ऐसे संन्यासी नहीं थे। वे जिससे भी एक बार प्रेम या अपनत्व का रिश्ता बना लेते थे, उसे आजीवन निभाते थे। वे लोगों के पारिवारिक आयोजनों में शामिल होते, सुख-दुःख में हाथ बटाते और सबको अपना वात्सल्यमयी आशीर्वाद देते थे। रिश्तों के प्रति उनके इसी गहरे आदर और सामाजिक जुड़ाव के कारण वे पारंपरिक संन्यासियों से भिन्न थे।
In simple words: पारंपरिक संन्यासी रिश्ते तोड़ देते हैं, पर फ़ादर बुल्के जिससे भी रिश्ता बनाते थे उसे हमेशा निभाते थे और लोगों के सुख-दुःख में शामिल होते थे।

Exam Tip: पारंपरिक संन्यासी (जो मोह-माया छोड़ देते हैं) और फ़ादर के संन्यास (जो रिश्ते बनाते और निभाते थे) के बीच के मुख्य अंतर को उत्तर में स्पष्ट करें।

 

Question 1(ग). फ़ादर बुल्के ने भारत में रहते हुए हिंदी के उत्थान के लिए कौन - कौन से कार्य किए?
Answer: फ़ादर कामिल बुल्के ने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाकर हिंदी भाषा और साहित्य के विकास के लिए निम्नलिखित अविस्मरणीय कार्य किए:
- उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया और 'रामकथा: उत्पत्ति और विकास' विषय पर अपना ऐतिहासिक शोध-प्रबंध लिखा।
- उन्होंने प्रसिद्ध अंग्रेज़ी - हिंदी शब्दकोश तैयार किया, जो आज भी विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगी है।
- उन्होंने ईसाईयों के पवित्र धर्मग्रंथ बाइबिल का सरल और सुंदर हिंदी भाषा में अनुवाद किया।
- वे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए लगातार संघर्ष करते रहे और हर मंच पर इसके पक्ष में आवाज़ उठाई।
In simple words: फ़ादर बुल्के ने हिंदी सीखी, डिक्शनरी बनाई, बाइबिल का हिंदी अनुवाद किया, और हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा बनाने के लिए बहुत मेहनत की।

Exam Tip: उनके इन चारों प्रमुख योगदानों (शोध-प्रबंध, बाइबिल अनुवाद, शब्दकोश निर्माण, और राष्ट्रभाषा आंदोलन) का उल्लेख अपने उत्तर में बिंदुवार करें।

 

Question 1(घ). फ़ादर बुल्के की याद को यज्ञ की पवित्र अग्नि क्यों कहा गया है? कारण सहित स्पष्ट कीजिए।
Answer: फ़ादर बुल्के की यादों को यज्ञ की पवित्र अग्नि की आँच के समान इसलिए माना गया है क्योंकि जिस प्रकार यज्ञ की अग्नि अत्यंत पवित्र, सात्विक और वातावरण को शुद्ध करने वाली होती है, ठीक वैसी ही सात्विकता फ़ादर बुल्के की यादों में भी है। उनकी यादें हमारे मन के बुरे विचारों को दूर करके हमें भलाई और परोपकार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं। जैसे यज्ञ की आँच शांत और दिव्य होती है, वैसे ही फ़ादर की स्मृतियाँ भी हमारे हृदय में सदैव एक पावन पवित्र आँच की तरह धधकती रहेंगी और हमें प्रकाशित करती रहेंगी।
In simple words: जैसे यज्ञ की आग पवित्र होती है और मन को शुद्ध करती है, वैसे ही फ़ादर की यादें भी हमारे मन को शांत, पवित्र और अच्छा बनाने की सीख देती हैं।

Exam Tip: यज्ञ की अग्नि की 'पवित्रता' और 'वातावरण शुद्धि' के गुणों की तुलना फ़ादर की यादों से मिलने वाली आत्मिक शुद्धि से करके उत्तर लिखें।

 

Question 1(ङ). फ़ादर के मुख से निकले हुए शब्द जादू का काम कैसे करते थे? उदाहरण सहित सिद्ध कीजिए।
Answer: फ़ादर बुल्के के हृदय में असीम करुणा, ममता और वात्सल्य का सागर बहता था। जब भी कोई व्यक्ति अत्यधिक दुख या विपत्ति में होता था, तो उनके मुख से निकले सांत्वना के शीतल शब्द उसके पीड़ित मन पर जादू की तरह असर करते थे और उसका सारा कष्ट व तनाव दूर कर देते थे। उदाहरण के लिए, जब लेखक की पत्नी और पुत्र का असमय देहांत हुआ था, तो लेखक गहरे शोक में थे। उस कठिन समय में फ़ादर के सांत्वना भरे दिव्य शब्दों ने लेखक के हृदय को असीम शांति प्रदान की थी और उन्हें दुख सहने की नई शक्ति दी थी। उनके शब्द जादू की तरह मन का अंधकार दूर कर देते थे।
In simple words: फ़ादर बुल्के के सांत्वना भरे मीठे शब्द दुखी लोगों के मन को शांत कर देते थे, जैसे लेखक की पत्नी और बेटे की मौत पर उनके शब्दों ने लेखक को बहुत हिम्मत दी थी।

Exam Tip: सांत्वना देने के उनके अनूठे कौशल को स्पष्ट करने के लिए लेखक के व्यक्तिगत पारिवारिक दुःख (पत्नी व पुत्र के निधन) के प्रसंग का उल्लेख उदाहरण के रूप में अवश्य करें।

 
प्रश्न अभ्यास 

1. फ़ादर की उपस्थिति देवदार की छाया जैसी क्यों लगती थी ?

उत्तर

देवदार का वृक्ष आकार में लंबा-चौड़ा होता है तथा छायादार भी होता है। फ़ादर बुल्के का व्यक्तित्व भी कुछ ऐसा ही है। जिस प्रकार देवदार का वृक्ष वृहदाकार होने के कारण लोगों को छाया देकर शीतलता प्रदान करता है। ठीक उसी प्रकार फ़ादर बुल्के भी अपने शरण में आए लोगों को आश्रय देते थे। तथा दु:ख के समय में सांत्वना के वचनों द्वारा उनको शीतलता प्रदान करते थे।

2. फ़ादर बुल्के भारतीय संस्कृति के एक अभिन्न अंग हैं, किस आधार पर ऐसा कहा गया है?
 
उत्तर
 

फ़ादर बुल्के को भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग इसलिए कहा गया है क्योंकि वे बेल्जियम से भारत आकर यहाँ की संस्कृति में पूरी तरह रच-बस गए थे। वे सदा यह बात कहते थे कि अब भारत ही मेरा देश है। भारत के लोग ही उनके लिए सबसे अधिक आत्मीय थे। वे भारत की सांस्कृतिक परंपराओं को पूरी तरह आत्मसात कर चुके थे। फ़ादर हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए बहुत से प्रयास किये तथा हिंदी के समृद्धि के लिए ''ब्लू-बर्ड '' तथा ''बाइबिल'' का हिंदी रूपान्तरण भी किये। वे भारतीय संस्कृति के अनुरूप ही वसुधैव कुटुम्बकम की भावना से ओतप्रोत थे।


3. पाठ में आए उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जिनसे फ़ादर बुल्के का हिंदी प्रेम प्रकट होता है?

उत्तर

फ़ादर बुल्के के हिन्दी प्रेम के कई प्रसंग इस पाठ में आये हैं, जैसे - 
इलाहबाद में फादर बुल्के 'परिमल' नाम की साहित्यिक संस्था से जुड़े थे। वे वहाँ हिन्दी भाषा व साहित्य से सम्बंधित गोष्ठियों में सम्मिलित होते हुए गंभीर बहस करते थे। 
वे लेखकों की रचनाओं पर अपनी स्पष्ट राय और सुझाव भी देते थें। वे सड़क पर जा रहे लेखकों के पास साइकिल से उतर कर पहुँच जाते और उनकी रचनाओं पर बात-चीत करते। फ़ादर बुल्के ने हिन्दी में शोध भी किया, जिसका विषय था - "रामकथा: उत्पत्ति और विकास।" उन्होंने एक नाटक "ब्लू - बर्ड" का हिन्दी में "नील - पंछी" के नाम से अनुवाद भी किया। 
फ़ादर बुल्के राँची के सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज में हिन्दी तथा संस्कृति विभाग के विभागाध्यक्ष हो गए। वहीं उनहोंने अंग्रेज़ी - हिन्दी कोश तथा बाइबिल का अनुवाद भी तैयार किया। फ़ादर बुल्के को हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने की बड़ी चिंता थी। वे हर मंच पर इस चिंता को प्रकट करते तथा इसके लिए अकाट्य तर्क देते। वे हिन्दी वालों द्वारा ही हिन्दी की उपेक्षा पर दुखी हो जाते।

 
4. इस पाठ के आधार पर फ़ादर कामिल बुल्के की जो छवि उभरती है उसे अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर

फ़ादर बुल्के एक निष्काम कर्मयोगी थे। वे लम्बे, गोरे, भूरी दाढ़ी व नीली आँखों वाले चुम्बकिय आकर्षण से युक्त संन्यासी थे। अपने हर प्रियजन के लिए उनके ह्रदय में ममता व अपनत्व की अमृतमयी भावना उमड़ती रहती थी। उनके व्यक्तित्व में मानवीय करुणा की दिव्य चमक थी। वे अपने प्रिय जनों को आशीषों से भर देते थे। वे भारत को ही अपना देश मानते हुए यहीं की संस्कृति में रच -बस गए थे। वे हिंदी के प्रकांड विद्वान थे एवं हिंदी के उत्थान के लिए सदैव तत्पर रहते थे। उन्होंने हिंदी में पी.एच.डी की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त ''ब्लू-बर्ड ''ताठा ''बाइबिल ''का हिंदी अनुवाद भी किया। फ़ादर बुल्के अपने स्नेहीजनों के व्यक्तिगत सुख -दुख का सदा ध्यान रखते थे। वे रिश्ते बनाते थे ,तो तोड़ते नहीं थे। उनके सांत्वना भरे शब्दों से लोगों का हृदय प्रकाशित हो उठता था। अपने व्यक्तित्व की महानता के कारण ही वे सभी की श्रद्धा के पात्र थे। 
 
5. लेखक ने फ़ादर बुल्के को 'मानवीय करुणा की दिव्य चमक' क्यों कहा है?
 
उत्तर 
 

लेखक ने फ़ादर बुल्के को 'मानवीय करूणा के दिव्य चमक' इसलिए कहा है क्योंकि फ़ादर के हृदय में मानव मात्र के प्रति करूणा की असीम भावना विद्दमान थी। उनके मन में अपने हर एक प्रियजन के लिए ममता और अपनत्व का भावना उमड़ता रहता था। वे लोगों को अपने आशीषों से भर देते थे। उनकी आँखों की चमक में असीम वात्सल्य तैरता रहता था। वे लोगों के सुख -दुख में शामिल होकर उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करते थे तथा उन्हें सांत्वना भी देते थे। लोगों का कष्ट उनसे देखा नहीं देखा जाता था। 

6. फ़ादर बुल्के ने संन्यासी की परंपरागत छवि से अलग एक नयी छवि प्रस्तुत की है, कैसे?

उत्तर

प्राय: संन्यासी सांसारिक मोह - माया से दूर रहते हैं । जबकि फ़ादर ने ठीक उसके विपरीत छवि प्रस्तुत की है।परंपरागत संन्यासियों के परिपाटी का निर्वाहन न कर, वे सबके सुख - दुख मे शामिल होते। एक बार जिससे रिश्ता बना लेते ; उसे कभी नहीं तोड़ते । सबके प्रति अपनत्व,प्रेम और गहरा लगाव रखते थे । लोगों के घर आना - जाना नित्य प्रति काम था। इस आधार पर कहा जा सकता है कि फ़ादर बुल्क़े ने संन्यासी की परंपरागत छवि से अलग छवि प्रस्तुत की है।

7. आशय स्पष्ट कीजिए -

(क) नम आँखों को गिनना स्याही फैलाना है।

उत्तर

प्रस्तुत पंक्ति का आशय है कि फ़ादर बुल्के की मृत्यु पर वहाँ उपस्थित नम आँखों वाले व्यक्तियों के नामों का उल्लेख करना सिर्फ स्याही को बरबाद करना है। कहने का आशय है कि आँसू बहाने वालों की संख्या इतनी अधिक थी कि उसे गिनना संभव नहीं था।

(ख) फ़ादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है।

उत्तर

प्रस्तुत पंक्ति का आशय है कि जिस प्रकार एक उदास शांत संगीत को सुनते समय हमारा मन गहरे दुःख में डूब जाता है, वातावरण में एक अवसाद भरी निस्तब्ध शांति छा जाती है और हमारी आँखें अपने-आप ही नम हो जाती हैं, ठीक वैसी ही दशा फ़ादर बुल्के को याद करते समय हो जाती है। 

रचना और अभिव्यक्ति

8. आपके विचार से बुल्के ने भारत आने का मन क्यों बनाया होगा ? 

उत्तर

हमारे विचार से फ़ादर बुल्क़े ने भारत के प्राचीन एवं गौरवपूर्ण इतिहास तथा यहाँ की सभ्यता-संस्कृति, जीवन-दर्शन, सत्य, अहिंसा, प्रेम, धर्म, त्याग तथा ऋषि-मुनियों से प्रभावित होकर ही भारत आने का मन बनाया होगा।

9. 'बहुत सुंदर है मेरी जन्मभूमि - रेम्सचैपल।' - इस पंक्ति में फ़ादर बुल्के की अपनी जन्मभूमि के प्रति कौन-सी भावनाएँ अभिव्यक्त होती हैं? आप अपनी जन्मभूमिके बारे में क्या सोचते हैं?

उत्तर

फ़ादर कामिल बुल्के की जन्मभूमि 'रेम्सचैपल' थी। फ़ादर बुल्के के इस कथन से यह स्पष्ट है कि उन्हें अपनी जन्मभूमि से बहुत प्रेम था तथा वे अपनी जन्मभूमि को बहुत याद करते थे।
मनुष्य कहीं भी रहे परन्तु अपनी जन्मभूमि की स्मृतियाँ हमेशा उसके साथ रहती है। हमारे लिए भी हमारी जन्मभूमि अनमोल है। हमें अपनी जन्मभूमि की सभी वस्तुओं से प्रेम है। यहीं हमारा पालन-पोषण हुआ। अत: हमें अपनी मातृभूमि पर गर्व है। हम चाहें जहाँ भी रहे परन्तु ऐसा कोई भी कार्य नहीं करेंगे जिससे हमारी जन्मभूमि को अपमानित होना पड़े।

भाषा अध्यन

12. निम्नलिखित वाक्यों में समुच्यबोध छाँटकर अलग लिखिए -

(क) तब भी जब वह इलाहाबाद में थे और तब भी जब वह दिल्ली आते थे।
(ख) माँ ने बचपन में ही घोषित कर दिया था कि लड़का हाथ से गया।
(ग) वे रिश्ता बनाते थे तो तोड़ते नहीं थे।
(घ) उनके मुख से सांत्वना के जादू भरे दो शब्द सुनना एक ऐसी रोशनी से भर देता था जो किसी गहरी तपस्या से जनमती है।
(ङ) पिता और भाइयों के लिए बहुत लगाव मन में नहीं था लेकिन वो स्मृति में अकसर डूब जाते।

उत्तर

(क) और
(ख) कि
(ग) तो
(घ) जो
(ङ) लेकिन

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