Chapter-wise Worksheets for Class 9 Hindi: All Chapters
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Practice Class 9 Hindi Worksheets: All Chapters
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1. विषय: बाल मजदूरी
प्रस्तावना
कक्षा नवीं में हिन्दी 'अ' विषय के अंतर्गत बाल-मज़दूरी की समस्या से संबंधित कविता 'बच्चे काम पर जा रहे हैं' में सुबह-सुबह छोटे बच्चों को स्कूल न जाकर काम पर जाने के लिए क्यों बाध्य होना पड़ता है जैसे प्रश्न उठाए गए हैं। कक्षा नवीं में हिन्दी 'ब' में भी 'खुशबू रचते हैं हाथ' कविता में अंधेरी बदबूदार गलियों में बच्चों द्वारा अगरबत्ती बनाने जैसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक कार्य का उल्लेख किया गया है। इस अध्ययन सामग्री में देश में बाल-श्रमिकों के संबंध में तथ्यात्मक जानकारी प्रस्तुत की गई है। विभिन्न आंकड़ों के सहयोग से विद्यार्थी देश में बाल-मज़दूरी की दर, शिक्षा, बच्चों के प्रति होने वाले अपराध का तुलनात्मक अध्ययन कर सकेंगे। बाल-श्रम से जुड़े कानूनों के बारे में जानेंगे तथा उन पर चर्चा करेंगे। साथ ही शिक्षा का अधिकार कानून 2009 और सर्व शिक्षा अभियान जैसी योजनाएं देश में बाल-मज़दूरी से निपटने के लिए क्या भूमिका निभा रही हैं इस पर विद्यार्थी कक्षा में और अपने परिवार में चर्चा करेंगे। इस प्रकार वे एक ऐसी सोच-समझ के वाहक बन सकेंगे जो समाज में संवेदनशील वातावरण बनाने में सहायक सिद्ध हो सकेगी।
सारांश: आज भारत में सारी दुनिया की तुलना में सबसे अधिक युवा हैं। 0-14 आयु के बच्चे देश की कुल जनसंख्या का एक-तिहाई हैं। दुनिया के 10-19 वर्ष के किशोर और किशोरियों का घर भारत है। ऐसे में बच्चों को लेकर बनाई जाने वाली नीतियां और कानूनों को और भी प्रभावशाली बनाए जाने की आवश्यकता है क्योंकि आज बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भावी रोज़गार संबंधी चुनौतियां हमारे सामने हैं। बच्चों के प्रति होने वाले अपराधों के प्रति संवेदनशील होना अति आवश्यक है। बच्चों के साथ होने वाले ऐसे ही एक अपराध 'बाल-मज़दूरी' के विषय में हम यहां तथ्यात्मक जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि आप स्वयं बच्चों के अधिकारों को जानें, समझें तथा इस समस्या के समाधान के लिए अपने स्तर पर सतत प्रयासरत रहें।
आज के बच्चे कल का भविष्य हैं-इस वक्तव्य का भारत के लिए विशेष महत्व है क्योंकि आज देश में विश्व की तुलना में सबसे अधिक नौजवान लोगों की जनसंख्या है। यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रन्स फंड (यूनिसेफ) की रिपोर्ट स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन-2011 में जानकारी दी गई थी कि भारत में लगभग 24 करोड़ 30 लाख बच्चे ऐसे हैं जिनकी आयु 10-19 वर्ष है। इस पंक्ति में दूसरा स्थान चीन का (20 करोड़ 70 लाख), तीसरा स्थान अमेरिका का (4 करोड़ 40 लाख) और चौथे स्थान पर इंडोनेशिया और पाकिस्तान दोनों (4 करोड़ 10 लाख) हैं।
बच्चों के अधिकारों को संबोधित करते हुए अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर संगठन न भी गंभीरता दिखाते हुए सन् 2016 तक पूरी दुनिया से स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माने जाने वाले व्यवसायों से बाल मज़दूरी को खत्म करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। साथ ही इस दिशा में तेज़ गति से काम करने पर जोर दिया गया है। विश्वभर में 12 जून को बाल-श्रम के खिलाफ विश्व दिवस मनाया जाता है। सन् 2010 में पूरी दुनिया में बाल-मज़दूरी की दर में कमी देखी गई है, लेकिन इसके घटने की दर बहुत ही धीमी है।
क्या आप जानते हैं कि भारत में बाल-मज़दूरी की दर पर क्या असर हुआ है? कानून के अनुसार किस उम्र तक के बच्चों को बाल-श्रमिक कहा जाता है? इस समस्या से निपटने के लिए कौन-कौन से कानून बनाए गए हैं? क्या आपने अखबारों, टेलीविज़न या फिल्मों में बाल-श्रमिकों की व्यथा को पढ़ा या देखा है? आप अपने विद्यालय और घर में इस विषय पर चर्चा करें। अपने अध्यापक और परिवार के सदस्यों की सहायता से बाल-श्रम से जुड़े कानूनों की जानकारी प्राप्त करें। हम यहां कुछ तथ्य और आंकड़े प्रस्तुत कर रहे हैं जिससे आप स्वयं इस समस्या के प्रति संवेदनशील होकर एक सार्थक सोच बना सकेंगे।
(तालिका 1.1) 5-14 वर्ष के बच्चों में बाल-मज़दूरी के जनसंख्या संबंधित आंकड़ा (करोड़ में)
| वर्ष | जनसंख्या |
|---|---|
| 1971 | 10753985 |
| 1981 | 13640870 |
| 1991 | 11285349 |
| 2001 | 12666377 |
| 2004-2005 (नेशनल सैम्पल सर्वे संगठन, NSSO) | 9075000 |
| 2009-2010 (नेशनल सैम्पल सर्वे संगठन) 66वां सर्वे | 4983871 |
भारत में बच्चों की समस्याओं और अधिकारों को लेकर समय-समय पर कदम उठाए जाते रहे हैं। बाल-श्रम निषेध एवम् विनियमन अधिनियम, 1986, बंधुआ मजदूर प्रणाली उन्मूलन अधिनियम, 1976, सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार कानून 2009 आदि देश में मौजूद हैं किंतु विभिन्न आंकड़ों के संदर्भ में बाल-श्रमिकों की स्थिति का विश्लेषण करना आवश्यक है जिससे सही दिशा में प्रयास किए जा सकें। आप बच्चों से जुड़े कानूनों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करें। शिक्षा का अधिकार कानून के विषय में जानें।
नेशनल सैम्पल सर्वे संगठन (NSSO) द्वारा 2009-2010 में 66वें दौर के सर्वे में विभिन्न राज्यों से प्राप्त 5-14 वर्ष के बाल-श्रमिकों के आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं। (तालिका 1.2)
तालिका 1.2: 5-14 वर्ष के बाल-श्रमिकों के राज्यवार आंकड़े (NSSO 2009-2010)
| राज्य | लड़के | लड़कियां | कुल | प्रतिशत |
|---|---|---|---|---|
| आंध्र प्रदेश | 108923 | 125739 | 234662 | 4.71 |
| असम | 156488 | 32666 | 189154 | 3.80 |
| बिहार | 235309 | 41213 | 276522 | 5.55 |
| छत्तीसगढ़ | 4305 | 7321 | 11626 | 0.23 |
| दिल्ली | 18576 | 0 | 18576 | 0.37 |
| गुजरात | 166432 | 224255 | 390687 | 7.84 |
| हरियाणा | 50737 | 21459 | 72196 | 1.45 |
| हिमाचल प्रदेश | 4456 | 2942 | 7398 | 0.15 |
| जम्मू और कश्मीर | 12413 | 16872 | 29285 | 0.59 |
| झारखंड | 67807 | 14661 | 82468 | 1.65 |
| कर्नाटक | 110589 | 115908 | 226497 | 4.54 |
| केरल | 1182 | 1583 | 2765 | 0.06 |
| मध्य प्रदेश | 149142 | 41875 | 191017 | 3.83 |
| महाराष्ट्र | 120600 | 140073 | 260673 | 5.23 |
| ओडिशा | 90912 | 43651 | 134563 | 2.70 |
| पंजाब | 32466 | 16370 | 48836 | 0.98 |
| राजस्थान | 136239 | 269697 | 405936 | 8.14 |
| तमिलनाडु | 3471 | 13880 | 17351 | 0.35 |
| उत्तर प्रदेश | 18029 | 9342 | 27371 | 0.55 |
| उत्तराखंड | 1160114 | 615219 | 1775333 | 35.62 |
| पश्चिम बंगाल | 389211 | 162373 | 551584 | 11.07 |
| अखिल भारत | 3057998 | 1925873 | 49,83,871 | 100.00 |
तालिका 1.3: प्रति 1000 व्यक्तियों पर नियुक्त बाल-श्रमिकों का विभाजन
| वर्ष | आयु (वर्ष में) | ग्रामीण | शहरी | कुल | |||
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| लड़के | लड़कियाँ | लड़के | लड़कियाँ | लड़के | लड़कियाँ | ||
| 2004-2005 | 5-9 | 2 | 1 | 2 | 1 | 2 | 1 |
| 10-14 | 54 | 49 | 44 | 24 | 52 | 43 | |
| 2009-2010 | 5-9 | 2 | 1 | 0 | 0 | 1 | 1 |
| 10-14 | 27 | 21 | 24 | 8 | 26 | 18 | |
स्रोत: नेशनल सैम्पल सर्वे संगठन 2004-2005, 2009-2010 (भारत में रोज़गार और बेरोज़गार की स्थिति)
साक्षर और निरक्षर लोगों का प्रतिशत (जनगणना 2011) (चित्र 1.1)
- 2001: साक्षर - 65%, निरक्षर - 35%
- 2011: साक्षर - 74%, निरक्षर - 26%
विभिन्न राज्यों में साक्षरता दर (प्रतिशत में) (जनगणना 2011) (तालिका 1.4)
| राज्य | पुरुष | महिला | कुल |
|---|---|---|---|
| आंध्र प्रदेश | 75.56 | 59.74 | 67.66 |
| असम | 78.81 | 67.27 | 73.18 |
| बिहार | 73.39 | 53.33 | 63.82 |
| छत्तीसगढ़ | 81.45 | 60.59 | 71.04 |
| दिल्ली | 91.03 | 80.93 | 86.34 |
| गुजरात | 87.23 | 70.73 | 79.31 |
| हरियाणा | 85.38 | 66.77 | 76.64 |
| हिमाचल प्रदेश | 90.83 | 76.60 | 83.78 |
| जम्मू और कश्मीर | 78.26 | 58.01 | 68.74 |
| झारखंड | 78.45 | 56.21 | 76.63 |
| कर्नाटक | 82.85 | 68.13 | 75.60 |
| केरल | 96.02 | 91.98 | 93.91 |
| मध्य प्रदेश | 80.53 | 60.02 | 70.63 |
| महाराष्ट्र | 89.82 | 75.48 | 82.81 |
| ओडिशा | 82.40 | 64.36 | 73.45 |
| पंजाब | 81.48 | 71.34 | 76.68 |
| राजस्थान | 80.51 | 52.66 | 67.06 |
| तमिलनाडु | 86.81 | 73.86 | 80.33 |
| उत्तर प्रदेश | 79.24 | 59.26 | 69.72 |
| उत्तराखंड | 88.33 | 70.70 | 79.63 |
| पश्चिम बंगाल | 82.67 | 71.16 | 77.08 |
बाल-मज़दूरी में लगे हुए बच्चे अप्रशिक्षित कामगार बनकर रह जाते हैं। अतः एक समय के बाद इनके पास रोज़गार के अवसर और माध्यम बहुत ही सीमित रह जाते हैं। ऐसे में 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बेरोज़गारी संबंधी आंकड़ों को आपके अवलोकन के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है। (चित्र 1.2)
15-29 वर्ष के युवाओं में बेरोज़गारी की स्थिति से संबंधित आंकड़े (चित्र 1.2)
| वर्ग | 1992-94 | 1999-2000 | 2004-05 | 2009-10 |
|---|---|---|---|---|
| Rural Male | 9 | 11.1 | 12 | 10.9 |
| Rural Female | 7.6 | 10.6 | 12.7 | 12 |
| Urban Male | 13.7 | 14.7 | 13.7 | 10.5 |
| Urban Female | 21.2 | 19.1 | 21.5 | 18.9 |
Source: NSS 55th, 61st and 66th rounds.
सन् 2001 की जनगणना में दिए गए आंकड़ों के अनुसार देश में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माने जाने वाले व्यवसायों में लगे 5-14 वर्ष की आयु के बच्चों का पाई-चार्ट प्रस्तुतीकरण। (चित्र 1.3)
स्वास्थ्य के लिए हानिकारक व्यवसायों में लगे 5-14 वर्ष के बच्चों का प्रतिशत (चित्र 1.3)
- घरेलू कार्यों में: 15%
- ढाबों, होटलों, रेस्तरां में: 6%
- अगरबत्ती, धूप, डिटर्जेंट बनाने में: 1%
- पान, बीड़ी, सिगरेट बनाने में: 20%
- बुनाई कढ़ाई में: 11%
- निर्माण कार्यों में: 17%
- ईंट के भट्टों में: 7%
- आभूषण बनाने में: 3%
- चटाई बनाने में: 3%
- वाहनों के सुधारने में: 4%
- चीनी मिट्टी का सामान बनाने में: 2%
- अन्य: 11%
स्रोत: नेशनल सैम्पल सर्वे
आपको यह भी ज्ञात होगा कि बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में भी वृद्धि हुई है जो एक गंभीर मसला है। 2010 में नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार बाल अपराध का राष्ट्रीय आंकड़ा 26,694 था जो कि 2011 में बढ़कर 33,098 हो गया था। अतः बाल अपराध में 24% वृद्धि देखी गई है। इसमें सबसे अधिक बाल अपराध प्रतिशत उत्तर प्रदेश (16.6%) का है। इसके बाद, मध्य प्रदेश 13.2%, दिल्ली 12.8%, महाराष्ट्र 10.2%, बिहार 6.7% और आंध्र प्रदेश 6.7% हैं। नीचे प्रस्तुत किए गए पाई-चार्ट में बच्चों के विरुद्ध होने वाले विभिन्न अपराधों को दर्शाया गया है। (चित्र 1.4)
बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध (चित्र 1.4)
- अपहरण: 46.17%
- शारीरिक शोषण: 21.48%
- हत्या: 4.38%
- नाबालिग लड़कियों का शोषण: 2.60%
- बच्चों को अनाथ छोड़ देना: 2.11%
- अन्य अपराध: 23.21%
स्रोत: क्राइम इन इंडिया 2011, नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो
जानकारी के स्रोत:
- www.mospi.nic.in
- unicef report-State of the world children-2011
- www.googlescholar.com
आदर्श प्रश्न (विषय 1: बाल मजदूरी)
निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर दीजिए। (10 अंक)
Question. सभी तालिकाओं और चित्रों को ध्यानपूर्वक समझें और बताएं कि कुल मिलाकर देश में बाल मज़दूरी को लेकर कैसी स्थिति है? क्या चित्र 1.4 में दर्शाए गए अपराध बाल-मज़दूरी करने वाले बच्चों के साथ एक आम समस्या बनते जा रहे हैं? कारण बताते हुए उत्तर दीजिए। इस समस्या से निपटने में शिक्षा क्या भूमिका निभा सकती है?
Answer: (अंक योजना एवं उत्तर रूपरेखा के आधार पर पूर्ण उत्तर):
1. स्थिति का अवलोकन (2 अंक):
तालिकाओं और आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारत में बाल-मजदूरी की स्थिति चिंताजनक है। यद्यपि 1981 (1.36 करोड़) की तुलना में 2009-2010 (NSSO 66वां सर्वे) में बाल-श्रमिकों की संख्या घटकर 49.83 लाख (लगभग 50 लाख) रह गई है, फिर भी यह संख्या बहुत बड़ी है। उत्तराखंड (35.62%), पश्चिम बंगाल (11.07%), राजस्थान (8.14%) और गुजरात (7.84%) जैसे राज्यों में बाल-श्रमिकों का प्रतिशत अत्यधिक है। इसके अलावा, चित्र 1.3 के अनुसार 5-14 वर्ष के बच्चे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक व्यवसायों में लगे हैं; जैसे- पान, बीड़ी, सिगरेट उद्योग (20%), निर्माण कार्य (17%), घरेलू कार्य (15%), बुनाई-कढ़ाई (11%), ईंट-भट्टे (7%) और ढाबों/होटलों (6%) आदि में। इससे उनका शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास अवरुद्ध हो रहा है।
2. अपराधों की भयावहता का उल्लेख (3 अंक):
चित्र 1.4 के अनुसार बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में अपहरण (46.17%), शारीरिक शोषण (21.48%), हत्या (4.38%), नाबालिग लड़कियों का शोषण (2.60%) तथा बच्चों को अनाथ छोड़ देना (2.11%) प्रमुख हैं। 2010 से 2011 के बीच बाल अपराधों में 24% की भारी वृद्धि हुई है (एनसीआरबी रिपोर्ट)। बाल-मजदूरी करने वाले बच्चे असुरक्षित, असहाय और शोषित होते हैं। वे अपने कार्यस्थलों पर तथा आने-जाने के दौरान शारीरिक व मानसिक शोषण, तस्करी, बंधुआ मजदूरी और अपहरण जैसे अपराधों के सबसे आसान शिकार बनते हैं। समाचार पत्रों, दूरदर्शन और फिल्मों (जैसे 'सलाम बॉम्बे', 'आई एम कलाम' आदि) में भी बाल-श्रमिकों के साथ होने वाले इन अमानवीय अपराधों को प्रमुखता से दर्शाया गया है। अतः यह उनके साथ एक गंभीर व आम समस्या बन चुकी है।
3. कारण (2 अंक):
बाल-मजदूरी और बच्चों के प्रति बढ़ते अपराधों के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
• गरीबी और भुखमरी: निर्धन परिवारों में भरण-पोषण के लिए बच्चों को काम पर भेजना माता-पिता की विवशता बन जाती है।
• अशिक्षा और जागरूकता का अभाव: माता-पिता शिक्षा के महत्व से अनभिज्ञ होते हैं।
• सस्ता श्रम: कारखानेदार और व्यवसायी कम मजदूरी में अधिक काम कराने तथा विरोध न कर पाने के कारण बच्चों को काम पर रखते हैं।
• कानूनों का लचर क्रियान्वयन: बाल-श्रम निषेध कानूनों की प्रभावी निगरानी न होना।
4. शिक्षा की भूमिका एवं नवीन सुझाव (3 अंक):
शिक्षा बाल-मजदूरी के उन्मूलन में सबसे सशक्त माध्यम है:
• शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून, 2009 का प्रभावी क्रियान्वयन: 6-14 वर्ष के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित की जाए।
• सर्व शिक्षा अभियान और मध्याह्न भोजन (Mid-Day Meal): स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पौष्टिक भोजन देकर बच्चों तथा निर्धन अभिभावकों को स्कूल से जोड़ा जाए।
• व्यावसायिक व कौशल-आधारित शिक्षा: बच्चों को प्रारंभिक स्तर से ही व्यावहारिक हुनर सिखाया जाए ताकि वे भविष्य में कुशल कामगार बन सकें।
• जागरूकता व पुनर्वास: बाल-श्रमिकों को मुक्त कराकर विशेष आवासीय विद्यालयों में ब्रिज कोर्स के जरिए मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जाए और उनके परिवारों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से आर्थिक सहायता दी जाए।
मुक्त पाठ्य सामग्री–कक्षा-नवीं
हिन्दी 'अ' ( 002 )
2. विषय: बालक-बालिकाओं का असमान लिंग अनुपात
प्रस्तावना
कक्षा नवीं में हिन्दी 'अ' विषय के अंतर्गत समाज में महिलाओं की शिक्षा और विवाह के संदर्भ में रूढ़िवादी मानसिकता को प्रस्तुत किया गया है। इस अध्ययन में समाज में लड़कियों की घटती जनसंख्या, स्वास्थ्य और शिक्षा को संख्यात्मक तथ्यों के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है जिससे शिक्षार्थी अपने कौशल से अध्ययन करें, विश्लेषण करें और इस विषय पर ज्ञानार्जन करके एक ऐसी सोच-समझ के वाहक बनें जो समाज में संवेदनशील वातावरण बनाने में सहायक सिद्ध हो सके।
सारांश: 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता' अर्थात जहां नारी की पूजा की जाती है वहां देवताओं का वास होता है। लेकिन इस बात को समाज ने कदाचित अभी जाना नहीं है। लड़कियों की घटती संख्या समाज के एक ऐसे पक्ष को उजागर करती है जो लड़कियों के प्रति लोगों के दूसरे दर्जे के व्यवहार का परिचायक है। लेकिन इस विषय को आपके अध्ययन हेतु क्यों प्रस्तुत किया जा रहा है? या फिर लड़कियों की संख्या कम होने से आखिर क्या फर्क पड़ता है? ऐसी कौन-सी समस्याएं हैं जो लड़कियों के घटते जनसंख्या अनुपात का परिणाम हैं? इन प्रश्नों पर आप अपने विद्यालय में, अपने परिवार में चर्चा करें। यहां आपके समक्ष स्थिति की गंभीरता को समझने के लिए तथ्यात्मक जानकारी प्रस्तुत की जा रही है। जिससे आप इस समस्या की भयावहता को समझें, जाने, और इस दिशा में सुधार के लिए गतिशील हो सकें।
जन गणना-2011 से प्राप्त नतीजों से स्पष्ट हो चुका है कि पिछले एक दशक में 0-6 वर्ष के बच्चों की जनसंख्या में कमी हुई है लेकिन यदि लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या को देखा जाए तो इनकी संख्या में ज्यादा गिरावट देखी गई है। लड़कियों की संख्या में लगभग 30 लाख की घटौती हुई है जो किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं है। 0-6 वर्ष के बच्चों के लिंग अनुपात में जो अंतर आया है उससे पता चलता है कि लड़कियों के प्रति आज भी समाज में पूर्वाग्रहग्रसित दोहरी मानसिकता है।
सन् 2011 में हुई पंद्रहवीं राष्ट्रीय जनगणना में दिए गए आंकड़ों को देखें।
तालिका 1.1: जनसंख्या (करोड़ों में)
| क्षेत्र | 2001 | 2011 | अंतर |
|---|---|---|---|
| भारत | 102.9 | 121.0 | 18.1 |
| ग्रामीण | 74.3 | 83.3 | 9.0 |
| शहरी | 28.6 | 37.7 | 9.1 |
स्रोत: www.censusindia.gov.in
तालिका 1.2: लिंग अनुपात (प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या)
| वर्ग / क्षेत्र | 2001 | 2011 | अंतर |
|---|---|---|---|
| भारत | 933 | 940 | +7 |
| ग्रामीण | 946 | 947 | +1 |
| शहरी | 900 | 926 | +26 |
| 0-6 वर्ष | |||
| भारत | 927 | 914 | -13 |
| ग्रामीण | 934 | 919 | -15 |
| शहरी | 906 | 902 | -4 |
स्रोत: www.censusindia.gov.in
तालिका: 1.3
| जनगणना वर्ष | 0-6 वर्ष के बच्चों की जनसंख्या 2001-2011 (करोड़ में) | कुल जनसंख्या (करोड़ में) | कुल जनसंख्या में 0-6 वर्ष बच्चों का कुल जनसंख्या में भाग (प्रतिशत में) | ||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कुल | लड़के | लड़कियाँ | कुल | पुरुष | महिला | कुल | लड़के | लड़कियाँ | |
| 2001 | 163.84 | 85.01 | 78.83 | 1028.74 | 532.2 | 496.5 | 15.93 | 15.97 | 15.88 |
| 2011 | 158.79 | 82.95 | 75.84 | 1210.19 | 623.72 | 586.47 | 13.1 | 13.3 | 12.9 |
स्रोत: जनगणना 2011, भारत, ऑफिस ऑफ रजिस्ट्रार जनरल इंडिया
भारत में लिंग अनुपात का चलन (1961-2011) (ग्राफ 1.1)
- सभी आयु समूह: 1961: 941 | 1971: 930 | 1981: 934 | 1991: 927 | 2001: 933 | 2011: 940
- 0-6 वर्ष: 1961: 976 | 1971: 964 | 1981: 962 | 1991: 945 | 2001: 927 | 2011: 914
0-6 वर्ष की लड़कियों की संख्या < 900 (तालिका 1.4)
| राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश | 0-6 वर्ष (प्रति 1000 लड़कों की तुलना में) |
|---|---|
| हरियाणा | 830 |
| पंजाब | 846 |
| जम्मू और कश्मीर | 859 |
| दिल्ली | 866 |
| चंडीगढ़ | 867 |
| राजस्थान | 883 |
| महाराष्ट्र | 883 |
| उत्तराखण्ड | 886 |
| गुजरात | 886 |
| उत्तर प्रदेश | 899 |
0-6 वर्ष की लड़कियों की संख्या >= 950 (तालिका 1.5)
| राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश | 0-6 वर्ष (प्रति 1000 लड़कों की तुलना में) |
|---|---|
| मिज़ोरम | 971 |
| मेघालय | 970 |
| अंडमान-निकोबार द्वीप समूह | 966 |
| छत्तीसगढ़ | 964 |
| अरूणाचल प्रदेश | 960 |
| असम | 959 |
| त्रिपुरा | 953 |
| पश्चिम बंगाल | 950 |
| हिमाचल प्रदेश | 906 |
तालिका 1.4 और 1.5 स्रोत: जनगणना 2011, भारत, ऑफिस ऑफ रजिस्ट्रार जनरल इंडिया
आपको यह भी ज्ञात होगा कि देश में ऐसे भी राज्य हैं जहां 0-6 वर्ष के बच्चों का लिंग अनुपात बहुत अच्छा है। केरल और पांडिचेरी में प्रति 1000 लड़कों पर क्रमशः 1084 और 1038 लड़कियां हैं। केरल राज्य का मॉडल पूरे देश के लिए एक उदाहरण है। यहां न केवल लिंग अनुपात बल्कि बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर भी सबसे अच्छी स्थिति है। आखिर केरल ने ऐसी कौन-सी नीतियां अपनाई हैं जिससे यह राज्य एक आदर्श बन गया है? आप जानने का प्रयास करें।
सन् 2008-2010 में सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम, ऑफिस ऑफ रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया द्वारा देश में बच्चों के जन्म के समय में लिंग अनुपात के संबंध में सर्वे किया गया था जिसमें प्रांतवार प्रति 1000 लड़कों की तुलना में जन्म लेने वाली लड़कियों का अनुपात पंजाब में (832), हरियाणा में (848), केरल में (966) और छत्तीसगढ़ में (985) पाया गया था। यह असमान अनुपात देश में होने वाले कन्या भ्रूण हत्या जैसे घिनौने अपराध के संबंध में भयानक स्थिति का संकेत देता है। साथ ही यह राष्ट्र की उन्नति में विषम स्थिति का परिचायक है। आपसे यह आग्रह किया जाता है कि आप अपने विद्यालय और घर में इस विषय पर चर्चा-परिचर्चा करें कि आखिर लड़कियों की जन्मदर कम क्यों हो रही है?
जन्मदर के बाद शिशु मृत्यु दर के संबंध में आंकड़े क्या कहते हैं, इसकी जानकारी भी यहां प्रस्तुत की जा रही है। शिशु मृत्यु दर संबंधी आँकड़े (ग्राफ 1.2)
शिशु मृत्यु दर संबंधी आँकड़े (प्रति 1000 जीवित जन्म) (ग्राफ 1.2)
- 1990: लड़कियाँ - 81, लड़के - 78
- 1994: लड़कियाँ - 73, लड़के - 75
- 2003: लड़कियाँ - 64, लड़के - 57
- 2006: लड़कियाँ - 59, लड़के - 56
- 2007: लड़कियाँ - 56, लड़के - 55
- 2008: लड़कियाँ - 55, लड़के - 52
- 2009: लड़कियाँ - 52, लड़के - 49
- 2010: लड़कियाँ - 49, लड़के - 46
शिशु मृत्यु दर शहर और गांवों में (ग्राफ 1.3)
- 1990: ग्रामीण - 86, शहरी - 50
- 1994: ग्रामीण - 80, शहरी - 52
- 2003: ग्रामीण - 66, शहरी - 38
- 2006: ग्रामीण - 62, शहरी - 39
- 2007: ग्रामीण - 61, शहरी - 37
- 2008: ग्रामीण - 58, शहरी - 36
- 2009: ग्रामीण - 55, शहरी - 34
- 2010: ग्रामीण - 51, शहरी - 31
स्रोत: जनगणना, भारत, ऑफिस ऑफ रजिस्ट्रार जनरल इंडिया
पंद्रहवीं जनगणना 2011 में देश में साक्षरता संबंधी जानकारी उपलब्ध कराई गई थी। नीचे दी गई तालिका 1.6 और 1.7 से आप यह जानने और समझने का प्रयत्न करें कि शिक्षा देश में लड़कियों के बेहतर जीवन और बेहतर लिंग अनुपात के संबंध में क्या भूमिका निभा सकती है। उदाहरण के लिए आप केरल में लड़कियां की संख्या और लिंग अनुपात का तुलनात्मक रूप से अध्ययन करें। आपसे यह आग्रह किया जाता है बालिकाओं की शिक्षा के विषय में बनाई गई योजनाओं जैसे लाडली, सबला तथा बालिका समृद्धि योजना आदि के विषय में जानने का प्रयास करें।
साक्षरता दर 1951-2011 (प्रतिशत में) तालिका 1.6
| जनगणना वर्ष | कुल व्यक्ति | पुरुष | महिला | पुरुषों और महिलाओं में साक्षरता दर अंतर |
|---|---|---|---|---|
| 1951 | 18.33 | 27.16 | 8.86 | 18.30 |
| 1961 | 28.3 | 40.4 | 15.35 | 25.05 |
| 1971 | 34.45 | 45.96 | 21.97 | 23.98 |
| 1981 | 43.57 | 56.38 | 29.76 | 26.62 |
| 1991 | 52.21 | 64.13 | 39.29 | 24.84 |
| 2001 | 64.83 | 75.26 | 53.67 | 21.59 |
| 2011 | 74.04 | 82.14 | 65.46 | 16.68 |
विभिन्न राज्यों में साक्षरता दर (जनगणना 2011) तालिका 1.7
| राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश | पुरुष | महिला | पुरुषों और महिलाओं में साक्षरता दर अंतर |
|---|---|---|---|
| हरियाणा | 85.38 | 66.77 | 18.61 |
| पंजाब | 81.48 | 71.34 | 10.14 |
| जम्मू और कश्मीर | 78.26 | 58.01 | 20.25 |
| दिल्ली | 91.03 | 80.93 | 10.10 |
| चंडीगढ़ | 90.54 | 81.38 | 9.16 |
| राजस्थान | 80.51 | 52.66 | 27.85 |
| महाराष्ट्र | 89.82 | 75.48 | 14.34 |
| उत्तराखण्ड | 88.33 | 70.70 | 17.63 |
| गुजरात | 87.23 | 70.73 | 16.50 |
| उत्तर प्रदेश | 79.24 | 59.26 | 19.98 |
| मिज़ोरम | 93.72 | 79.40 | 4.32 |
| मेघालय | 77.17 | 73.78 | 3.39 |
| अंडमान-निकोबार द्वीप समूह | 90.11 | 81.84 | 8.27 |
| छत्तीसगढ़ | 81.45 | 60.59 | 20.86 |
| अरूणाचल प्रदेश | 73.69 | 59.57 | 14.12 |
| असम | 78.81 | 67.27 | 11.54 |
| त्रिपुरा | 92.18 | 83.15 | 9.03 |
| पश्चिम बंगाल | 82.67 | 71.16 | 11.51 |
| हिमाचल प्रदेश | 90.83 | 76.60 | 14.23 |
| केरल | 96.02 | 91.98 | 0.04 |
| पुदुच्चेरी | 92.12 | 81.22 | 10.90 |
स्रोत: www.censusindia.gov.in
6 से 17 वर्ष के लड़के-लड़कियों का स्कूल जाने का प्रतिशत (तीसरा नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2004-2005) ग्राफ 1.4
- 6-17 वर्ष: लड़के - 75%, लड़कियाँ - 66%
- 6-10 वर्ष: लड़के - 85%, लड़कियाँ - 81%
- 11-14 वर्ष: लड़के - 80%, लड़कियाँ - 70%
- 15-17 वर्ष: लड़के - 49%, लड़कियाँ - 34%
यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रन्स् फंड (यूनिसेफ) की रिपोर्ट स्टेट ऑफ द वर्ल्डस् चिल्ड्रन-2011 में यह जानकारी दी गई है कि भारत दुनिया की सबसे अधिक किशोरियों (10-19 वर्ष) का घर है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारत में लड़कियों की समस्याओं और अधिकारों को आवाज़ दी जाती रही है। भारत के साथ-साथ अन्य देशों में लड़कियों के स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर जागृति लाने के प्रयास हो रहे हैं। यूनिसेफ ने 15-29 वर्ष की लड़कियों में अरक्तता (अनीमिया) और कम वज़न (अंडरवेट) से संबंधित आंकड़े उपलब्ध करवाएँ हैं जिन्हें आपके अध्ययन के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है। (ग्राफ 1.5)
उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया: 15-29 वर्षीय लड़कियों में अरक्तता (अनीमिया) और कम वज़न (अंडरवेट) (ग्राफ 1.5)
15-29 वर्षीय लड़कियों में अरक्तता (अनीमिया प्रतिशत):
- Mali: 68%
- Senegal: 66%
- Ghana: 63%
- Benin: 59%
- Congo: 57%
- India: 56%
- Burkina Faso: 52%
- Guinea: 51%
- Sierra Leone: 51%
- United Republic of Tanzania: 49%
*उपरोक्त ग्राफ में 40% को दर्शाने वाली क्षैतिज रेखा लड़कियों में एनीमिया की वह स्थिति बताती है जिस पर पहुंचने के बाद यह एक गंभीर रूप ले लेती है जिसका दुष्प्रभाव भावी पीढ़ी पर भी पड़ना स्वाभाविक है।
15-29 वर्षीय लड़कियों में कम वज़न (अंडरवेट प्रतिशत - बीएमआई < 18.5):
- India: 47%
- Eritrea: 40%
- Bangladesh: 35%
- Niger: 34%
- Senegal: 34%
- Ethiopia: 33%
- Namibia: 30%
- Chad: 29%
- Cambodia: 28%
- Burkina Faso: 27%
लड़कियों के विवाह और विवाह के समय उनकी आयु के संबंध में विभिन्न देशों में किए गए सर्वे (यूनिसेफ रिपोर्ट 2011) से प्राप्त आंकड़ों को नीचे (ग्राफ 1.6) में प्रदर्शित किया गया है। भारत में लड़कियों के विवाह के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष निर्धारित की गई है।
उपरोक्त ग्राफ में भारत और नेपाल में लड़कियों के विवाह और आयु से संबंधित आंकड़ों के प्रस्तुतीकरण की एक तालिका नीचे दी जा रही है। तालिका (1.8)
तालिका 1.8: भारत और नेपाल में लड़कियों के विवाह की आयु (प्रतिशत में)
| आयु वर्ग | भारत (प्रतिशत में) | नेपाल (प्रतिशत में) |
|---|---|---|
| 0-15 वर्ष | 14 | 21 |
| 15-18 वर्ष | 31 | 40 |
| 18-20 वर्ष | 19 | 10 |
जानकारी के स्रोत:
- www.mospi.nic.in
- www.censusindia.gov.in
- Unicef Report-State of the World Children-2011
- www.googlescholar.com
- www.wcd.nic.in
आदर्श प्रश्न (विषय 2: बालक-बालिकाओं का असमान लिंग अनुपात)
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए। (दो प्रश्न 5 अंक या एक प्रश्न 10 अंक का पूछा जाएगा)
Question. तालिका 1.4, तालिका 1.5 और तालिका 1.7 का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए बताइए कि शिक्षा की उन्नत स्थिति कन्याओं के जनसंख्या अनुपात को किस रूप में प्रभावित करती है? बालिकाओं की शिक्षा दर को बेहतर बनाने के लिए शिक्षा प्रणाली में कौन सी बातें शामिल की जानी चाहिएं। (10 अंक)
Answer: (अंक योजना एवं उत्तर रूपरेखा के आधार पर पूर्ण उत्तर):
1. तथ्यों के आधार पर स्थिति का अवलोकन एवं तुलनात्मक अध्ययन (3 अंक):
तालिका 1.4, 1.5 और 1.7 के तुलनात्मक विश्लेषण से यह प्रत्यक्ष प्रमाणित होता है कि महिला साक्षरता दर और बाल लिंग अनुपात (0-6 वर्ष) के बीच गहरा संबंध है:
• उच्च साक्षरता वाले राज्यों में संतुलित लिंग अनुपात: तालिका 1.5 और 1.7 को देखने से स्पष्ट है कि जिन राज्यों में महिला साक्षरता दर उच्च है तथा स्त्री-पुरुष साक्षरता में अंतर न्यूनतम है, वहाँ बाल लिंग अनुपात अत्यंत बेहतर है। उदाहरणस्वरूप, केरल में महिला साक्षरता 91.98% (साक्षरता अंतर मात्र 0.04%) है और वहाँ जन्म के समय लिंग अनुपात 966 तथा कुल लिंग अनुपात 1084 है। इसी प्रकार मिज़ोरम (महिला साक्षरता 79.40%, लिंग अनुपात 971), मेघालय (महिला साक्षरता 73.78%, लिंग अनुपात 970), छत्तीसगढ़ (बाल लिंग अनुपात 964) और असम (959) में स्थिति काफी संतोषजनक है।
• निम्न साक्षरता अथवा बड़े साक्षरता अंतर वाले राज्यों में विकट स्थिति: तालिका 1.4 के अनुसार हरियाणा (बाल लिंग अनुपात 830, साक्षरता अंतर 18.61%), पंजाब (846), राजस्थान (883, महिला साक्षरता मात्र 52.66% तथा साक्षरता अंतर 27.85%), उत्तर प्रदेश (899, महिला साक्षरता 59.26%) और जम्मू-कश्मीर (859) में स्थिति अत्यंत दयनीय है।
अतः शिक्षा की उन्नत स्थिति कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियों को समाप्त कर कन्याओं के जनसंख्या अनुपात में उल्लेखनीय सुधार लाती है।
2. वास्तव में शिक्षा की भूमिका (4 अंक):
शिक्षा समाज से लिंग-आधारित रूढ़िवादिता और पितृसत्तात्मक संकीर्ण सोच को दूर करती है। शिक्षित महिलाएँ अपने अधिकारों, स्वास्थ्य और संतानों के प्रति जागरूक होती हैं। 'सर्व शिक्षा अभियान', 'शिक्षा का अधिकार कानून (RTE) 2009', 'लाडली योजना', 'सबला योजना' तथा 'बालिका समृद्धि योजना' जैसी सरकारी पहल बालिकाओं के नामांकन, ठहराव और सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
3. बालिकाओं की शिक्षा दर सुधारने हेतु शिक्षा प्रणाली में सुधार के नवीन सुझाव (3 अंक):
• सुरक्षित व सुलभ आवागमन: बालिकाओं के लिए दूरदराज के क्षेत्रों में निःशुल्क व सुरक्षित परिवहन व्यवस्था (जैसे निःशुल्क साइकिल या बस सेवा) उपलब्ध कराई जाए।
• बुनियादी सुविधाएँ: प्रत्येक विद्यालय में बालिकाओं के लिए अलग व स्वच्छ शौचालय तथा सेनेटरी पैड की उपलब्धता सुनिश्चित हो।
• महिला शिक्षकों की नियुक्ति: ग्रामीण विद्यालयों में अधिक महिला शिक्षिकाओं की नियुक्ति की जाए जिससे अभिभावक अपनी बेटियों को भेजने में झिझकें नहीं।
• व्यावहारिक व कौशलपरक शिक्षा: बालिकाओं को आत्मरक्षा (मार्शल आर्ट्स) तथा व्यावसायिक कौशल सिखाए जाएँ।
• आर्थिक प्रोत्साहन व छात्रवृत्ति: उच्च शिक्षा तक निरंतर उपस्थिति बनाए रखने के लिए विशेष वित्तीय प्रोत्साहन व छात्रवृत्तियाँ दी जाएँ।
Question. सभी ग्राफ और तालिकाओं के अध्ययन के बाद आप देश में लड़कियों की स्थिति का किस रूप में आकलन करते हैं? संतुलित लिंग अनुपात के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिएं? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए। (5 अंक)
Answer: (अंक योजना एवं उत्तर रूपरेखा के आधार पर पूर्ण उत्तर):
1. लड़कियों की स्थिति का आकलन (2 अंक):
प्रस्तुत तालिकाओं और ग्राफों के विश्लेषण से भारत में लड़कियों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक और विरोधाभासी परिलक्षित होती है:
• गिरता बाल लिंग अनुपात: 2001 में 0-6 वर्ष का लिंग अनुपात 927 था जो 2011 में घटकर 914 रह गया (13 अंकों की गिरावट), जो कन्या भ्रूण हत्या और दोहरी मानसिकता को दर्शाता है।
• स्वास्थ्य व पोषण की कमी: ग्राफ 1.5 के अनुसार भारत में 15-29 वर्ष की 56% लड़कियाँ एनीमिया (रक्ताल्पता) से पीड़ित हैं तथा 47% लड़कियाँ अल्प-वज़न (अंडरवेट) हैं, जो वैश्विक स्तर पर अत्यधिक गंभीर है।
• बाल विवाह व स्कूल छोड़ना: 15-18 वर्ष की आयु में 31% लड़कियों का विवाह हो जाता है तथा 15-17 वर्ष आयु वर्ग में केवल 34% लड़कियाँ ही स्कूल जा पाती हैं।
2. संतुलित लिंग अनुपात हेतु उठाए जाने वाले कदम/उपाय (3 अंक):
• पीसी-पीएनडीटी (PCPNDT) कानून की सख्त पालना: लिंग परीक्षण और कन्या भ्रूण हत्या में लिप्त क्लीनिकों व डॉक्टरों पर कठोरतम दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
• बाल विवाह पर पूर्ण रोक: बाल विवाह निषेध कानून का कड़ाई से पालन हो।
• कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार: 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ', 'लाडली' और 'सबला' जैसी योजनाओं का लाभ प्रत्यक्ष रूप से बालिकाओं तक पहुँचे।
• सामाजिक चेतना व सोच में बदलाव: समाज में पुत्र-प्राथमिकता की सामंती सोच को समाप्त करने हेतु व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाए जाएँ और बालिकाओं को संपत्ति व सामाजिक निर्णयों में समान अधिकार दिया जाए।
Question. ग्राफ 1.5 और ग्राफ 1.6 का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए और लड़कियों के स्वास्थ्य, विवाह और विवाह के समय आयु जैसे विषय पर टिप्पणी कीजिए। (5 अंक)
Answer: (अंक योजना एवं उत्तर रूपरेखा के आधार पर पूर्ण उत्तर):
1. आंकड़ों का तुलनात्मक विश्लेषण (2 अंक):
ग्राफ 1.5 और 1.6 के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि लड़कियों के विवाह की कम आयु और उनके खराब स्वास्थ्य के बीच सीधा संबंध है:
• ग्राफ 1.6 व तालिका 1.8 के अनुसार भारत में 18 वर्ष की कानूनी आयु से पूर्व ही 45% लड़कियों का विवाह हो जाता है (14% का 15 वर्ष से पहले तथा 31% का 15-18 वर्ष के बीच)।
• ग्राफ 1.5 के अनुसार भारत में 15-29 वर्ष की 56% लड़कियाँ गंभीर रूप से अनीमिया (अरक्तता) से ग्रस्त हैं तथा 47% लड़कियाँ कुपोषित (अंडरवेट) हैं।
2. समस्या का वर्णन, दुष्परिणाम एवं सुझाव (3 अंक):
• दुष्परिणाम: कम उम्र में विवाह होने से लड़कियों की पढ़ाई अधूरी छूट जाती है। उनका शारीरिक और मानसिक विकास पूरा नहीं हो पाता। अपरिपक्व उम्र में गर्भधारण से शिशु मृत्यु दर (ग्राफ 1.2 के अनुसार लड़कियों की शिशु मृत्यु दर 49 प्रति हजार) और मातृ मृत्यु दर में वृद्धि होती है। अनीमिया से पीड़ित कमजोर माँ से जन्म लेने वाले बच्चे भी कुपोषित होते हैं, जिससे भावी पीढ़ी रुग्ण होती है।
• कारण: गरीबी, अशिक्षा, सामाजिक असुरक्षा, रूढ़िवादिता और दहेज प्रथा।
• सुझाव: लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पूर्व किसी भी सूरत में न होने दी जाए। विद्यालयों व आँगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से किशोरियों को आयरन, फोलिक एसिड की गोलियाँ और पौष्टिक आहार दिया जाए तथा बालिकाओं की माध्यमिक व उच्च शिक्षा अनिवार्य व निःशुल्क की जाए।
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