NCERT Solutions Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 09 Constitution as a Living Document (संविधान एक जीवंत दस्तावेज) in Hindi

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Question 1: निम्नलिखित में से कौन-सा वाक्य सही है:
(क) संविधान में समय-समय पर संशोधन करना आवश्यक होता है क्योंकि
(ख) परिस्थितियाँ बदलने पर संविधान में उचित संशोधन करना आवश्यक हो जाता है।
(ग) किसी समय विशेष में लिखा गया दस्तावेज कुछ समय पश्चात् अप्रासंगिक हो जाता है।
(घ) हर पीढ़ी के पास अपनी पसंद का संविधान चुनने का विकल्प होना चाहिए।
(ड.) संविधान में मौजूदा सरकार का राजनीतिक दर्शन प्रतिबिंबित होना चाहिए।

Answer:

(ख) परिस्थितियाँ बदलने पर संविधान में उचित संशोधन करना आवश्यक हो जाता है।

मुख्य बिंदु:

• संविधान एक जीवंत दस्तावेज है जो समय के साथ बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालता है।
• समाज और देश की बदलती जरूरतों को पूरा करने के लिए संशोधनों की आवश्यकता होती है।
• पूरी तरह से नया संविधान बनाने के बजाय संशोधनों के माध्यम से निरंतरता बनाए रखी जाती है।

आम गलतियाँ:

• छात्रों द्वारा गलत विकल्प चुनना क्योंकि वे संविधान की स्थिरता और लचीलेपन के संतुलन को नहीं समझते।
• हर पीढ़ी को नया संविधान चुनने के विकल्प वाले गलत कथन को सही मान लेना।
• सरकार के राजनीतिक दर्शन को संविधान का मुख्य आधार मान लेना।

Exam Tips:

a) बहुविकल्पीय प्रश्नों में सभी विकल्पों को ध्यान से पढ़ें।
b) संविधान की जीवंतता के मूल सिद्धांत को हमेशा याद रखें।
c) NCERT पाठ्यपुस्तक के सारांश खंड का अभ्यास करें।

 

Question 2: निम्नलिखित वाक्यों के सामने सही/गलत का निशान लगाएँ।
(क) राष्ट्रपति किसी संशोधन विधेयक को संसद के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता।
(ख) संविधान में संशोधन करने का अधिकार केवल जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के पास ही होता है।
(ग) न्यायपालिका संवैधानिक संशोधन का प्रस्ताव नहीं ला सकता किंतु उसे संविधान की व्याख्या करने का अधिकार है। व्याख्या के द्वारा वह संविधान को काफी हद तक बदल सकती है।
(घ) संसद संविधान के किसी भी खंड में संशोधन कर सकती है।

Answer:

(क) सही
(ख) सही
(ग) सही
(घ) गलत

मुख्य बिंदु:

• राष्ट्रपति संविधान संशोधन विधेयक पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य हैं और उसे पुनर्विचार के लिए नहीं लौटा सकते।
• संशोधन की शक्ति केवल संसद (जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों) के पास है।
• न्यायपालिका संविधान के 'बुनियादी ढांचे' को छोड़कर व्याख्या कर सकती है।
• संसद संविधान के बुनियादी ढांचे में संशोधन नहीं कर सकती (केशवानंद भारती मामला)।

आम गलतियाँ:

• यह सोचना कि राष्ट्रपति अन्य विधेयकों की तरह संशोधन विधेयक को भी पुनर्विचार के लिए भेज सकते हैं।
• यह मानना कि संसद संविधान के किसी भी हिस्से को बदल सकती है (बुनियादी ढांचे की सीमा को भूल जाना)।

Exam Tips:

a) सही/गलत प्रश्नों के उत्तर देते समय प्रत्येक कथन के कानूनी पहलू की जांच करें।
b) केशवानंद भारती मामले के महत्व को याद रखें।
c) राष्ट्रपति की संशोधन विधेयक पर शक्तियों को स्पष्ट रूप से समझें।

 

Question 3: निम्नलिखित में से कौन भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया में भूमिका निभाते हैं? इस प्रक्रिया में वे कैसे शामिल होते हैं?
(क) मतदाता
(ख) भारत का राष्ट्रपति
(ग) राज्य की विधान सभाएँ
(घ) संसद
(ङ) राज्यपाल
(च) न्यायपालिका

Answer:

(क) मतदाता - भारत में मतदाता प्रत्यक्ष रूप से मतदान द्वारा अपने क्षेत्र के प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं और ये चुने हुए प्रतिनिधि मतदाता की राय को संसद या विधानसभा में पेश करते हैं।
(ख) भारत का राष्ट्रपति - भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया में सभी विधेयकों की तरह संशोधन विधेयक को भी राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए भेजा जाता है किंतु इस मामले में राष्ट्रपति को पुनर्विचार करने का अधिकार नहीं है।
(ग) राज्य की विधान सभाएँ - राज्य विधानपालिकाओं की संविधान संशोधन के मामले में सीमित भूमिका है। कोई भी संविधान संशोधन प्रस्ताव राज्य की विधानसभा में पेश नहीं किया जा सकता परंतु उस प्रस्ताव के बिल पारित होने के बाद आधे राज्यों की विधानसभाओं से पारित कराया जाता है।
(घ) संसद - संविधान संशोधन की प्रक्रिया संसद से ही शुरू होती है। संसद के विशेष बहुमत के अलावा बाहरी एजेंसी जैसे संविधान आयोग या किसी अन्य निकाय की संविधान की संशोधन प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं होती है।
(ङ) राज्यपाल - संविधान संशोधन में कोई भूमिका नहीं निभाता है।
(च) न्यायपालिका - संविधान संशोधन में कोई भूमिका नहीं निभाती है।

मुख्य बिंदु:

• संसद संविधान संशोधन का मुख्य केंद्र है।
• राष्ट्रपति केवल औपचारिक अनुमोदन देते हैं, पुनर्विचार नहीं कर सकते।
• कुछ संशोधनों के लिए आधे राज्यों की विधानसभाओं का अनुसमर्थन आवश्यक है।

आम गलतियाँ:

• यह सोचना कि राज्यपाल या न्यायपालिका संशोधन प्रक्रिया में सीधे भाग लेते हैं।
• राज्यों की भूमिका को संसद के समान ही समझना।

Exam Tips:

a) प्रत्येक संस्था की भूमिका को अलग-अलग बिंदुओं में स्पष्ट करें।
b) राष्ट्रपति की सीमाओं को विशेष रूप से उल्लेखित करें।
c) संघीय ढांचे से जुड़े संशोधनों में राज्यों की भूमिका को न भूलें।

 

Question 4: इस अध्याय में आपने पढ़ा कि संविधान का 42वाँ संशोधन अब तक का सबसे विवादास्पद संशोधन रहा है। इस विवाद के क्या कारण थे?
(क) यह संशोधन राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान किया गया था। आपातकाल की घोषणा अपने आप में ही एक विवाद का मुद्दा था।
(ख) यह संशोधन विशेष बहुमत पर आधारित नहीं था।
(ग) इसे राज्य विधानपालिकाओं का समर्थन प्राप्त नहीं था।
(घ) संशोधन के कुछ उपबंध विवादास्पद थे।

Answer:

(ख) यह संशोधन विशेष बहुमत पर आधारित नहीं था - यह कथन गलत है, क्योंकि संशोधन तो संसद द्वारा ही पारित हुआ था लेकिन आपातकाल की परिस्थितियों और उसके व्यापक प्रभावों के कारण यह विवादास्पद रहा। सही कारणों में आपातकाल, व्यापक बदलाव और विपक्षी नेताओं की जेल में मौजूदगी शामिल थी।

मुख्य बिंदु:

• 42वाँ संशोधन 1976 में आपातकाल के दौरान किया गया था।
• इसके द्वारा संविधान के कई महत्वपूर्ण हिस्सों में बुनियादी परिवर्तन किए गए थे।
• अधिकांश विपक्षी नेता जेल में थे, जिससे संसद में बहस का माहौल नहीं था।

आम गलतियाँ:

• केवल एक कारण को सही मानना जबकि इसके कई कारण थे।
• संशोधन की कानूनी वैधता और राजनीतिक विवाद के बीच अंतर न समझ पाना।

Exam Tips:

a) 42वें संशोधन को 'लघु संविधान' (Mini Constitution) भी कहा जाता है, इसे याद रखें।
b) आपातकाल के दौरान हुए राजनीतिक घटनाक्रम को समझें।
c) विवादास्पद प्रावधानों के नाम संक्षेप में याद रखें।

 

Question 5: निम्नलिखित वाक्यों में कौन-सा वाक्य विभिन्न संशोधनों के संबंध में विधायिका और न्यायपालिका के टकराव की सही व्याख्या नहीं करता:
(क) संविधान की कई तरह से व्याख्या की जा सकती है।
(ख) खंडन-मंडन/बहस और मतभेद लोकतंत्र के अनिवार्य अंग होते हैं।
(ग) कुछ नियमों और सिद्धांतों को संविधान में अपेक्षाकृत ज्यादा महत्व दिया गया है। कतिपय संशोधनों के लिए संविधान में विशेष बहुमत की व्यवस्था की गई है।
(घ) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी विधायिका को नहीं सौंपी जा सकती।
(ङ) न्यायपालिका केवल किसी कानून की संवैधानिकता के बारे में फैसला दे सकती है। वह ऐसे कानून की वांछनीयता से जुड़ी राजनीतिक बहसों का निपटारा नहीं कर सकती।

Answer:

(घ) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी विधायिका को नहीं सौंपी जा सकती।

मुख्य बिंदु:

• विधायिका और न्यायपालिका दोनों ही नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
• न्यायालय कानूनों की संवैधानिकता की जांच करता है, राजनीतिक वांछनीयता की नहीं।
• संविधान की व्याख्या को लेकर दोनों अंगों में कई बार मतभेद उत्पन्न होते हैं।

आम गलतियाँ:

• न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र और विधायिका के कार्यों को आपस में मिला देना।
• लोकतंत्र में संस्थागत टकराव को नकारात्मक रूप में देखना।

Exam Tips:

a) विधायिका और न्यायपालिका के शक्तियों के पृथक्करण को समझें।
b) न्यायिक समीक्षा की अवधारणा को स्पष्ट रखें।
c) विकल्पों को ध्यान से पढ़कर असत्य कथन को पहचानें।

 

Question 6: बुनियादी ढांचे के सिद्धांत के बारे में सही वाक्य को चिन्हित करें। गलत वाक्य को सही करें।
(क) संविधान में बुनियादी मान्यताओं का खुलासा किया गया है।
(ख) बुनियादी ढाँचे को छोड़कर विधायिका संविधान के सभी हिस्सों में संशोधन कर सकती है।
(ग) न्यायपालिका ने संविधान के उन पहलुओं को स्पष्ट कर दिया है जिन्हें बुनियादी ढांचे के अंतर्गत या उसके बाहर रखा जा सकता है।
(घ) यह सिद्धांत सबसे पहले केशवानंद भारती मामले में प्रतिपादित किया गया है।
(ङ) इस सिद्धांत से न्यायपालिका की शक्तियाँ बढ़ी हैं। सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी बुनियादी ढांचे के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है।

Answer:

उपरोक्त दिए गए सभी कथन सही हैं। (संविधान में बुनियादी ढांचे की कोई स्पष्ट सूची नहीं दी गई है, लेकिन न्यायपालिका ने समय-समय पर न्यायिक फैसलों के जरिए इसे स्पष्ट किया है)।

मुख्य बिंदु:

• बुनियादी ढांचे का सिद्धांत केशवानंद भारती वाद (1973) में आया।
• इसके अनुसार संसद संविधान के मूल ढांचे को नहीं बदल सकती।
• न्यायपालिका समय-समय पर तय करती है कि क्या बुनियादी ढांचे का हिस्सा है।

आम गलतियाँ:

• यह सोचना कि संविधान के लिखित पाठ में 'बुनियादी ढांचा' शब्द स्पष्ट रूप से परिभाषित है।
• यह मानना कि संसद न्यायपालिका के इस सिद्धांत को नहीं मानती।

Exam Tips:

a) केशवानंद भारती केस (1973) का नाम और वर्ष अवश्य याद रखें।
b) बुनियादी ढांचे के सिद्धांत के महत्व को समझें।
c) यह उत्तर लिखते समय न्यायालय की भूमिका को स्पष्ट करें।

 

Question 7: सन 2000-2003 के बीच संविधान में अनेक संशोधन किए गए। इस जानकारी के आधार पर निम्नलिखित में से कौन सा निष्कर्ष निकालेंगे-
(क) इस काल के दौरान किए गए संशोधनों में न्यायपालिका ने कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया।
(ख) इस काल के दौरान एक राजनीतिक दल के पास विशेष बहुमत था।
(ग) कतिपय संशोधनों के पीछे जनता का दबाव काम कर रहा था।
(घ) इस काल में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच कोई वास्तविक अंतर नहीं रह गया था।
(ड.) ये संशोधन विवादास्पद नहीं थे तथा संशोधनों के विषय को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सहमति पैदा हो चुकी थी।

Answer:

(ड.) ये संशोधन विवादास्पद नहीं थे तथा संशोधनों के विषय को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सहमति पैदा हो चुकी थी।

मुख्य बिंदु:

• 2000-2003 के दौरान हुए संशोधन व्यापक राजनीतिक सहमति पर आधारित थे।
• इस समय दलबदल, चुनाव और आरक्षण से संबंधित महत्वपूर्ण संशोधन किए गए।
• इन संशोधनों पर दलों के बीच आम राय होने के कारण ज्यादा विवाद नहीं हुआ।

आम गलतियाँ:

• इस काल के संशोधनों को आपातकालीन संशोधनों की तरह विवादास्पद समझ लेना।
• राजनीतिक दलों की सहमति के महत्व को नजरअंदाज करना।

Exam Tips:

a) समय अवधि और उस दौरान की राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखें।
b) संविधान संशोधन के लिए राजनीतिक सहमति की आवश्यकता को समझें।
c) पाठ्यपुस्तक के विशेष संदर्भों का अध्ययन करें।

 

Question 8: संविधान में संशोधन करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता क्यों पड़ती है? व्याख्या करें।

Answer:

विधायिका में किसी प्रस्ताव या विधेयक को पारित करने के लिए सदन में उपस्थित सदस्यों के साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है। ये सभी सदस्य एक विधेयक पर मतदान करते हैं। अगर इन सदस्यों में से कम से कम आधे से अधिक सदस्य विधेयक के पक्ष में मतदान करते हैं तो विधेयक को पारित माना जाता है लेकिन संशोधन विधेयक पर वह बात लागू नहीं होती। संविधान में संशोधन करने के लिए दो प्रकार के विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है:
1. पहले संशोधन विधेयक के पक्ष में मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या सदन के सदस्यों की संख्या के कम से कम आधी होनी चाहिए।
2. दूसरे, संशोधन का समर्थन करने वाले सदस्यों की संख्या मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों की दो तिहाई होनी चाहिए।
संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों में स्वतंत्र रूप से पारित करना होता है। इसके लिए संयुक्त सत्र बुलाने का प्रावधान नहीं है।
कोई भी संशोधन विधेयक विशेष बहुमत के बिना पारित नहीं किया जा सकता। लोकसभा में 545 सदस्य होते हैं। अतः किसी भी संशोधन विधेयक का समर्थन करने के लिए 273 सदस्यों की आवश्यकता होती है। अगर मतदान के समय 300 सदस्य मौजूद हो तो विधेयक पारित करने के लिए 273 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होगी।

मुख्य बिंदु:

• संविधान देश का सर्वोच्च कानून है, इसलिए इसे आसानी से नहीं बदला जाना चाहिए।
• विशेष बहुमत यह सुनिश्चित करता है कि संशोधन में व्यापक सहमति हो।
• इससे सत्ताधारी दल अपनी मर्जी से संविधान में मनमाने बदलाव नहीं कर सकता।

आम गलतियाँ:

• साधारण बहुमत और विशेष बहुमत के बीच अंतर स्पष्ट न करना।
• संयुक्त सत्र के प्रावधान (जो संशोधन के लिए नहीं होता) को लेकर भ्रमित होना।

Exam Tips:

a) विशेष बहुमत के दोनों मानदंडों को स्पष्ट रूप से लिखें।
b) यह क्यों जरूरी है (स्थिरता और सुरक्षा हेतु), इसे अपने शब्दों में समझाएं।
c) संख्यात्मक उदाहरण देकर उत्तर को प्रभावशाली बनाएं।

 

Question 9: भारतीय संविधान में अनेक संशोधन न्यायपालिका और संसद की अलग-अलग व्याख्याओं का परिणाम रहे हैं। उदाहरण सहित व्याख्या करें।

Answer:

भारतीय संविधान में अनेक संशोधन न्यायपालिका और संसद की अलग-अलग व्याख्याओं का परिणाम रहे हैं। जो निम्नलिखित हैं:
• तकनीकी या प्रशासनिक भाषा में संशोधन: भारतीय संविधान के पहली श्रेणी में तकनीकी या प्रशासनिक भाषा में संशोधन हैं। ये संशोधन संविधान के मूल उपबंधों को स्पष्ट बनाने, उनकी व्याख्या तथा छिट-पुट संशोधन से संबंधित हैं। उन्हें केवल तकनीकी भाषा में संशोधन कहा जा सकता है। वास्तव में वे इन उपबंधों में कोई विशेष बदलाव नहीं करते। उदाहरण के लिए- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु सीमा को 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष करना और इसी प्रकार, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन बढ़ाने संबंधी संबंधी संशोधन तथा विधायिकाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों के आरक्षण संबंधित संशोधन, जो मूल उपबंध में आरक्षण की बात दस वर्ष की अवधि के लिए कही गई थी। परंतु इन वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए इस अवधि को प्रत्येक दस वर्ष की समाप्ति पर एक संशोधन द्वारा आगामी दस वर्षों की बढ़ाना आवश्यकता समझा गया।
• संविधान की व्याख्याएँ: संविधान की व्याख्या को लेकर न्यायपालिका और सरकार के बीच अक्सर मतभेद होते हैं। संविधान के अनेक संशोधन इन्हीं मतभेदों की उपज के रूप में देखे जा सकते हैं। इस तरह के टकराव होने पर संसद को संशोधन का सहारा लेकर संविधान की किसी एक व्याख्या को प्रमाणिक सिद्ध करना पड़ता है। प्रजातंत्र में विभिन्न संस्थाएं संविधान और अपनी शक्तियों की अपने-अपने तरीके से व्याख्या करती हैं। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक अहम लक्षण है। कई बार संसद इन न्याययिक व्याख्याओं से सहमत नहीं होती और उसे न्यायपालिका के नियमों को नियंत्रित करने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ता है।
उदाहरण के लिए - मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक सिद्धांतों को लेकर संसद और न्यायपालिका के बीच अक्सर मतभेद पैदा होते हैं हैं। इसी प्रकार निजी संपत्ति के दायरे तथा संविधान में संशोधन के अधिकार की सीमा को लेकर भी दोनों के बीच विवाद उठते रहे हैं।
• राजनीतिक दलों में आम सहमति के माध्यम से संशोधन: संविधान में बहुत से संशोधन ऐसे हैं, जिन्हें राजनीतिक दलों की आपसी सहमति की आकांक्षाओं को समाहित करने के लिए किए गए हैं। दल बदल कानून के अलावा इस काल में मताधिकार की आयु को 21 से 18 वर्ष करने के लिए संविधान में 73वाँ और 74वाँ संशोधन किए गए थे। इस काल में नौकरियों में आरक्षण सीमा बढ़ाने और प्रवेश संबंधी नियमों को स्पष्ट करने के लिए भी संशोधन किए गए।
• विवादास्पद संशोधन: भारतीय संविधान में संशोधन करने के प्रश्न पर आज तक कोई विवाद नहीं हुआ। परंतु अस्सी के दशक में इन संशोधनों को लेकर विधि और राजनीति के दायरों में भारी बहस छिड़ी थी। 1971-1976 के समय में विपक्षी दल इन संशोधनों को संदेह की दृष्टि से देखते थे। उनका मानना था कि इन संशोधनों के माध्यम से सत्तासीन दल संविधान के मूल स्वरूप को बिगाड़ना चाहते हैं। इस संबंध में, 38वें, 39वें और 42वें संशोधन विशेष रूप से विवादास्पद रहे हैं। जून 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा की गई। ये तीन संशोधन इसी पृष्ठभूमि से निकले थे, इन संशोधनों का लक्ष्य संविधान के कई महत्वपूर्ण हिस्सों में बुनियादी परिवर्तन करना था।

मुख्य बिंदु:

• संसद और न्यायपालिका के बीच अधिकारों की सीमा को लेकर टकराव हुआ है।
• संपत्ति के अधिकार और मौलिक अधिकारों के मामलों में कई संशोधन हुए।
• न्यायिक व्याख्याओं को पलटने के लिए भी संसद ने कई बार संशोधन किए।

आम गलतियाँ:

• केवल एक ही प्रकार के संशोधन का उल्लेख करना।
• न्यायपालिका और संसद के बीच के संघर्ष के संवैधानिक आधार को न समझ पाना।

Exam Tips:

a) उत्तर को शीर्षकों (तकनीकी, न्यायिक व्याख्या, राजनीतिक सहमति) में बांटकर लिखें।
b) प्रासंगिक उदाहरण जैसे संपत्ति का अधिकार अवश्य दें।
c) संतुलन बनाए रखें कि यह लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रतीक है।

 

Question 10: अगर संशोधन की शक्ति जनता के द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास होती है तो न्यायपालिका को संशोधन की वैधता पर निर्णय लेने के अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। क्या आप इस बात से सहमत हैं? 100 शब्दों में व्याख्या करें।

Answer:

संविधान के विशेष खंडों में संशोधन करने के लिए अनुच्छेद 368 में प्रावधान किया गया है। इस अनुच्छेद में संविधान में संशोधन करने के दो तरीके दिए गए हैं। ये तरीके संविधान के एक समान रूप से पर लागू नहीं होते। एक तरीके के अंतर्गत संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत द्वारा संशोधन करने की बात कही गई है। दूसरा तरीका और अधिक कठोर है। इसके लिए संसद के विशेष बहुमत और राज्य विधानपालिका की आधी संख्या की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार संसद या कुछ मामलों में राज्य विधानपालिकाओं में संशोधन पारित होने के पश्चात इस संशोधन की पुष्टि करने के लिए किसी प्रकार के जनमत संग्रह की आवश्यकता नहीं होती। अन्य सभी विधेयकों की तरह संशोधन विधेयक को भी राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए भेजा जाता है परंतु इस मामले में राष्ट्रपति को पुनर्विचार करने का अधिकार नहीं है। इन बातों से पता चलता है कि संशोधन की प्रक्रिया कितनी कठोर और जटिल हो सकती है।

मुख्य बिंदु:

• न्यायपालिका को संविधान के 'बुनियादी ढांचे' की रक्षा करने का अधिकार है।
• यदि संसद पर कोई न्यायिक नियंत्रण न हो, तो सत्ताधारी दल मनमाने संशोधन कर सकते हैं।
• लोकतंत्र में शक्तियों का संतुलन (Checks and Balances) अत्यंत आवश्यक है।

आम गलतियाँ:

• जनता के प्रतिनिधियों की सर्वोच्चता को निरंकुश मान लेना और न्यायिक समीक्षा को नकारना।
• बुनियादी ढांचे के सिद्धांत के महत्व को न समझना।

Exam Tips:

a) अपने उत्तर की शुरुआत 'मैं इस बात से असहमत हूँ' से करें।
b) न्यायिक समीक्षा और संविधान की सर्वोच्चता के तर्क दें।
c) शब्द सीमा (लगभग 100 शब्द) का ध्यान रखें।

 

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