NCERT Solutions Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 05 Legislature (विधायिका) in Hindi

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Question 1: आलोक मानता है कि किसी देश को कारागर सरकार की जरूरत होती है जो जनता की भलाई करे। अतः यदि हम सीधे-सीधे अपना प्रधानमंत्री और मंत्रीगण चुन लें और शासन का काम उन पर छोड़ दें, तो हमें विधायिका की जरूरत नहीं पड़ेगी। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण बताएँ।

Answer:

हम इससे बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं। संसद के अंतर्गत प्रत्येक सदन को अपनी पिछली बैठक के छह महीने के भीतर बैठक करनी होती है। किसी देश के कारागर सरकार की आधुनिक व कल्याणकारी राज्यों में विधायिका के गठन के बिना जनता द्वारा उस पद पर बैठे प्रधानमंत्री व मंत्रिमंडल का चुनाव होना सम्भव ही नहीं है जहाँ अध्यक्षामक कार्यपालिका है। राज्यों के आकार बड़े होने के कारण यह संभव नहीं हो पायेगा कि मंत्रियों और राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा किया जाए। प्राचीनकाल में राजतंत्र में भी राजा को विभिन्न विषयों पर परामर्श प्रदान करने के लिए सभा या समिति होती थी। विधायिका में संसद और राज्य विधानसभाएँ शामिल हैं।
संसद को राष्ट्रीय विधायिका कहा जाता है।
लोगों को प्रभावी प्रतिनिधित्व के बिना लोकतंत्र को पूरा नहीं किया जा सकता है।
बदले में, प्रतिनिधि कानून बनाने के निर्णयों के लिए लोगों के प्रति जवाबदेह होते हैं।
उसी प्रकार से लोककल्याण के उद्देश्य को प्राप्त करने में संसद बाधा नहीं है। लोक कल्याणकारी लोकतांत्रनात्मक सरकार एक ऐसी सरकार है जिसमें चर्चा, वाद-विवाद, विचार-विमर्श अनेक प्रकार की बातचीत होना अत्यंत आवश्यक है। संविधान के समय सबके पहलुओं का अध्ययन किया जाता है। स्पष्ट है कि देश के लिए कारागर सरकार की जरूरत भी संसद ही पूरा कर सकती है। विधायिका हालांकि देश में कानून बनाने वाली प्रमुख निकाय है, लेकिन इसकी भूमिका सीमित है। इसका मसोदा तैयार करने का कार्य मंत्रियों की देख-रेख के साथ नौकरशाही द्वारा किया जाता है।

मुख्य बिंदु:

• विधायिका के बिना आधुनिक कल्याणकारी राज्यों में सरकार का सुचारू संचालन असंभव है।
• संसद राष्ट्र के लिए कानून बनाने, बहस करने और सरकार पर नियंत्रण रखने का कार्य करती है।
• प्रत्यक्ष लोकतंत्र बड़े आकार वाले देशों में संभव नहीं होता, इसलिए प्रतिनिधियों की आवश्यकता होती है।

आम गलतियाँ:

• छात्रों का यह सोचना कि केवल कार्यपालिका ही देश चलाने के लिए पर्याप्त है।
• विधायिका के महत्व और उसकी कार्यप्रणाली को कम आँकना।
• संसद के विधायी और नियंत्रकारी कार्यों के बीच अंतर स्पष्ट न करना।

Exam Tips:

a) विधायिका की आवश्यकता को समझाते हुए लोकतंत्र में जन-प्रतिनिधि के महत्व को अवश्य लिखें।
b) उत्तर देते समय तार्किक दृष्टिकोण अपनाएँ और केवल हाँ या ना में उत्तर न दें।
c) मुख्य बिंदुओं को बुलेट पॉइंट्स में लिखने से उत्तर प्रभावशाली बनता है।

 

Question 2: किसी कक्षा में द्वि-सद्नीय प्रणाली के गुणों पर बहस चल रही थी। चर्चा में निम्नलिखित बातें उभरकर सामने आईं। इन तर्कों को पढ़िए और इनके आधार पर इस प्रणाली से सहमति-असहमतिके कारण बताइए:
(क) नेहा ने कहा कि द्वि-सद्नीय प्रणाली से कोई उद्देश्य हल नहीं होता।
(ख) शमा का तर्क था कि राज्यसभा में विशेषज्ञों का मनोनयन होना चाहिए।
(ग) त्रिदेब ने कहा कि यदि कोई देश संघीय नहीं है, तो फिर दूसरे सदन की जरूरत नहीं रह पाती।

Answer:

सरकारी व्यवस्था में द्विसदन पद्धति उस विधि को कहते हैं जिसमें विधायिका में दो सदन हों। इसे द्विसदन विधानमंडल भी कहते हैं। जैसे कि भारतीय संसद में दो सदन हैं-लोक सभा और राज्यसभा।
(क) नेहा द्वारा कही गई बातों से सहमर्त नहीं हुआ जा सकता। जहाँ द्वि-सद्नीय प्रणाली है वहाँ दूसरा सदन कमज़ोर नहीं होता। उसमें शक्तियाँ कम हो सकती है पर वह निरर्थक नहीं हो सकता। भारत की राज्यसभा कुछ क्षेत्रों में विशेष शक्तियाँ रखती है सामान्य रूप से उच्च सदन के निम्नलिखित लाभ हैं:
उच्च सदन निम्न सदन की मानमानी पर नियंत्रण रखता है।
निम्न सदन द्वारा पारित बिलों को उच्च सदन को पुनः विचार-विमर्श का मौका प्रदान करता है।
जनमत निर्माण में सहायक होता है।
संघीय प्रणाली में द्वितीय सदन आवश्यक है।
विशिष्ट वर्गों का प्रतिनिधित्व करता है।
(ख) शमा का यह तर्क था कि राज्यसभा में विशेषज्ञों का मनोनयन होना चाहिए, उचित है अधिकांश देशों में उच्च सदन में योग्य एवं अनुभवी व्यक्तियों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है। ब्रिटेन के लॉर्ड सदन में विशिष्ट वर्ग व योग्य पृष्ठभूमि के सदस्यों को प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाता है इसी प्रकार भारत व अमेरिका में भी अनुभवी योग्य और विशेष योग्यता वाले सदस्यों को इन सदनों में प्रतिनिधित्व दिया जाता है।
(ग) त्रिदेब का तर्क भी सही नहीं है क्योंकि दूसरे सदन को समाज के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की भी आवश्यकता है, भले ही वह संघ न हो। तो, मैं सहमर्त नहीं हूँ। ऐसी कोई शर्त नहीं है कि केवल संघीय देश में ही द्वितीय सदन सदन हो सकता है। भारत में केवल सात राज्यों में द्वisadnय विधायिका है, भले ही भारत प्रकृति में संघीय है। आमतौर पर बड़े राज्यों में द्विसदनीय व्यवस्था अपनाई जाती है।

मुख्य बिंदु:

• द्विसदनीय विधायिका कानून की गुणवत्ता और उस पर पुनर्विचार करने में मदद करती है।
• उच्च सदन समाज के उन वर्गों को प्रतिनिधित्व देता है जो सीधे चुनाव नहीं जीत पाते।
• संघीय शासन व्यवस्था वाले देशों के लिए दूसरा सदन और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।

आम गलतियाँ:

• उप-प्रश्नों (क), (ख) और (ग) के तर्कों को अलग-अलग स्पष्ट न करना।
• द्विसदनीय व्यवस्था के केवल नकारात्मक पहलुओं पर ध्यान देना।
• संघीय व्यवस्था और द्विसदनीय व्यवस्था के संबध को गलत समझना।

Exam Tips:

a) प्रत्येक उप-प्रश्न का उत्तर अलग-अलग पैराग्राफ या बुलेट पॉइंट्स में दें।
b) अपने पक्ष में संवैधानिक तर्क और उदाहरण प्रस्तुत करें।
c) उच्च सदन और निम्न सदन की उपयोगिता को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें।

 

Question 3: लोकसभा कार्यपालिका को राज्यसभा की तुलना में कारगर ढंग से नियंत्रण में रख सकती है?

Answer:

लोकसभा, राज्यसभा की तुलना में कार्यपालिका पर अधिक प्रभावी ढंग से नियंत्रण रखती हैं क्योंकि यह प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित निकाय है मंत्री परिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है न कि राज्यसभा के। लोकसभा के पास कानून बनाने, सवाल पूछने और संविधान में संशोधन करने की शक्ति है लोकसभा अविश्वास व्यक्त करके सरकार को हटा सकती है लेकिन राज्यसभा किसी भी सरकार को नहीं हटा सकती है। लोकसभा के पास वित्त को नियंत्रित करने की महत्वपूर्ण शक्ति है क्योंकि वह धन विधेयक को अस्वीकार कर सकती है लेकिन राज्यसभा को अस्वीकार नहीं कर सकती है।
भारत में कार्यपालिका अपने कार्यों तथा शासन के कार्य के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी है, परंतु यह उत्तरदायित्व वास्तव में लोकसभा के प्रति है जो उस पर राज्यसभा की तुलना में अधिक प्रभावकारी नियंत्रण रखती है। लोकसभा भारत की समस्त जनता का प्रतिनिधित्व करती है, और राज्यसभा भारतीय संघ की इकाइयों अर्थात् राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन इस संबंध में यह स्मरणीय है कि राज्यसभा में भारतीय संघ के सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान नहीं किया गया है।

मुख्य बिंदु:

• लोकसभा के सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं, इसलिए वे जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं।
• अविश्वास प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही लाया जा सकता है।
• धन विधेयक के मामले में लोकसभा के पास सर्वोपरि शक्तियाँ होती हैं।

आम गलतियाँ:

• यह मान लेना कि राज्यसभा और लोकसभा दोनों की कार्यपालिका पर नियंत्रण की शक्तियाँ समान हैं।
• अविश्वास प्रस्ताव के सदन का नाम गलत लिखना।
• प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष निर्वाचन के प्रभाव को न समझना।

Exam Tips:

a) लोकसभा की सर्वोच्चता दर्शाने वाले बिंदुओं जैसे धन विधेयक और अविश्वास प्रस्ताव को अवश्य उल्लेखित करें।
b) दोनों सदनों की शक्तियों की तुलनात्मक तालिका या बिंदु रूप में उत्तर दें।
c) प्रत्यक्ष निर्वाचन के महत्व को कार्यपालिका नियंत्रण से जोड़कर समझाएँ।

 

Question 4: लोकसभा कार्यपालिका पर कारगर ढंग से नियंत्रण रखने की नहीं बल्कि जनभावनाओं और जनता की अपेक्षाओं की अभिव्यक्ति का मंच है। क्या आप इससे सहमत हैं? कारण बताएँ।

Answer:

लोकसभा जनभावनाओं और जनता की अपेक्षाओं द्वारा लोकसभा के सदस्यों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर और प्रत्यक्ष निर्वाचन के द्वारा से होता है लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष है, लेकिन लोकसभा की सदस्य संख्या राज्यसभा के दुगुने से भी अधिक होने के कारण संयुक्त बैठक में लोकसभा की ही इच्छानुसार कार्य होने की संभावनाएँ अधिक रहती हैं।
यह कथन काफी हद तक सही है कि लोकसभा जनभावनाओं और जनता की अपेक्षाओं की अभिव्यक्ति का मंच है क्योंकि लोकसभा 543 चुने हुए प्रतिनिधियों का सदन है जो 1.3 अरब से अधिक भारतीय जनता की इच्छाओं, हितो, भावनाओं व अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं परंतु इस कार्य को करने के लिए लोकसभा के सदस्यों का सरकार पर नियंत्रण करना भी अत्यंत आवश्यक है। सरकार की मनमानी पर नियंत्रण करना, जनता के हितों इच्छाओं व आवश्यकताओं को सरकार तक पहुंचाना भी जनहित को पूरा करने के आवश्यक है तथा संसद का कार्य जनता के हितों की रक्षा करना होना चाहिए।

मुख्य बिंदु:

• लोकसभा देश की जनता की भावनाओं और आकांक्षाओं का सबसे बड़ा मंच है।
• प्रत्यक्ष चुनाव के कारण इसके सदस्यों का सीधा संपर्क आम जनता से होता है।
• नियंत्रण और अभिव्यक्ति दोनों ही लोकसभा के महत्वपूर्ण कार्य हैं।

आम गलतियाँ:

• केवल एक पक्ष (या तो अभिव्यक्ति या नियंत्रण) पर ही जोर देना, जबकि दोनों सही हैं।
• जनता की अपेक्षाओं और कार्यपालिका नियंत्रण के बीच संतुलन न बना पाना।
• तथ्यात्मक जानकारी जैसे सदस्यों की संख्या या कार्यकाल गलत लिखना।

Exam Tips:

a) प्रश्न में पूछे गए दोनों पहलुओं (जनभावनाओं की अभिव्यक्ति और कार्यपालिका पर नियंत्रण) का संतुलित मूल्यांकन करें।
b) 'काफी हद तक सही है' जैसी शुरुआत करके अपने उत्तर को तार्किक रूप से आगे बढ़ाएँ।
c) जन प्रतिनिधियों की भूमिका को स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत करें।

 

Question 5: संसद को ज़्यादा कारगर बनाने के नीचे कुछ प्रस्ताव लिखे जा रहे हैं। इनमें से प्रत्येक के साथ अपनी सहमति या असहमति का उल्लेख करें। यह भी बताएँ कि इन सुझावों के क्या प्रभाव होंगे।
(क) संसद को अपेक्षाकृत ज़्यादा समय तक काम करना चाहिए।
(ख) संसद के सदस्यों की सदन में मौजूदगी अनिवार्य कर दी जानी चाहिए।
(ग) अध्यक्ष को यह अधिकार होना चाहिए कि सदन की कार्यवाही में बाधा पैदा करने पर सदस्य को दण्डित कर सके।

Answer:

(क) संसद को अधिक कार्यदायी बनाने के लिए, इस कथन से सहमत है कि संसद को अपेक्षाकृत ज़्यादा समय तक काम करना चाहिए, क्योंकि इससे कार्य समय पर होंगे तथा संसद के पास काम का बोझ नहीं रहेगा। इसी प्रकार जब भी सदन की बैठक 4 घंटे से कम चले तो सदस्यों को उस दिन का भत्ता न दिया जाए। संसद को बिना काम-काज के कोई भी भत्ता नहीं दिया जाना चाहिए। यदि संसद अपेक्षाकृत अधिक समय तक काम करेगी तो देश के विकास कार्य नियत समय पर पूरे हो पाएंगे।
(ख) संसद के लिए निर्वाचित होने के पश्चात संसद सदस्य कतिपय सुख-सुविधा के हकदार हो जाते हैं। ये सुख सुविधाएं संसद सदस्यों को इसी दृष्टि से प्रदान की जाती है जिससेः सदस्यगण समय का सदुपयोग राष्ट्रीय हित के कार्यों में कर सकें। अधिकांश संसद सदस्य सदन में अनुपस्थिति रहते हैं। इससे सदन में महत्वपूर्ण विषयों पर आवश्यक विचार विमर्श नहीं हो पाता। सभी सदस्यों के लिए यह अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए कि जब सदन की बैठक ही हो तो प्रत्येक सदस्य सदन में उपस्थिति होना चाहिए।
(ग) लोकतांत्रिक संसदीय प्रणाली में अध्यक्ष का पद एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। अध्यक्ष के पद के बारे में कहा जाता है कि संसद सदस्य अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। अध्यक्ष सदन के ही पूर्ण प्राधिकार का प्रतिनिधित्व करता है। वह उस सदन की गरिमा और शक्ति का प्रतीक है जिसकी वह अध्यक्षता करता है। अध्यक्ष उस सदस्यों या उन सदस्यों को दण्डित कर सके जो सदन की कार्यवाही में अनावश्यक व्यवधान उत्पन्न करते हैं। इस कथन से पूर्ण सहमत हैं।

मुख्य बिंदु:

• संसद की कार्य अवधि बढ़ाने से विधेयकों पर व्यापक चर्चा संभव होगी।
• सदन में उपस्थिति अनिवार्य होने से जनप्रतिनिधि अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति गंभीर होंगे।
• पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष) को अनुशासनात्मक शक्तियाँ देना सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

आम गलतियाँ:

• तीनों उप-प्रश्नों पर अपनी सहमति या असहमति का स्पष्ट कारण न देना।
• केवल हाँ या ना लिखकर छोड़ देना बिना उसके संभावित प्रभावों की चर्चा किए।
• अध्यक्ष की शक्तियों और सदन की गरिमा के संबंध में गलत धारणा रखना।

Exam Tips:

a) प्रत्येक खंड (क, ख, ग) को अलग-अलग शीर्षक या बिंदु के तहत हल करें।
b) प्रत्येक सुझाव के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों का विश्लेषण करें।
c) संसदीय मर्यादा और अनुशासन के महत्व को अपने उत्तर में प्रमुखता दें।

 

Question 6: आरिफ यह जानता है कि मंत्री ही अधिकांश महत्वपूर्ण विधेयक प्रस्तुत करते हैं और बहुमत वाले दल अक्सर सरकारी विधेयक को पारित कर देते हैं, तो फिर कानून बनाने की प्रक्रिया में संसद की भूमिका क्या है? आप आरिफ को क्या उत्तर देंगे?

Answer:

आरिफ का मानना सही है कि संसदीय प्रणाली में अधिकांश बिल सरकारी बिल होते हैं। जिन्हें मंत्री ही तैयार करते हैं वे मंत्री ही इसे प्रस्तुत करते हैं हैं स्थिति में व्यावहारिक रूप से यह स्थिति दिखाई देती है कि संसद केवल उस बिल पर मुहर लगाने वाली संस्था बन गई है। विधायिका के सदस्यों का यह दायित्व होता है कि वे सदन में जनहित को दृष्टिगत रखकर सरकार के निर्णयों का समर्थन करे अथवा विरोध करें, भले ही वे किसी भी दल के हों। संसद केवल एक रबर स्टैम्प ही नहीं है। शासक दल के सदस्य सरकार की प्रत्येक सही व गलत बात का समर्थन करेंगे। संसद कानून बनाने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण घटक है, भले ही अधिकांश महत्वपूर्ण विधेयक मंत्रियों द्वारा प्रस्तावित किए जाते हैं।
ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रस्तावित कानून के प्रावधानों पर बहस की आवश्यकता है। विपक्ष भी विधेयक में आवश्यकतानुसार परिवर्तन का सुझाव देकर कानून बनाने में भाग लेता है और इस प्रकार, संसद में विधायी प्रक्रिया का होना आवश्यक है।

मुख्य बिंदु:

• संसद केवल कानून पास करने की मशीन नहीं है, बल्कि वहाँ विधेयकों पर गहन चर्चा और संशोधन होते हैं।
• विपक्ष की भूमिका सरकार की नीतियों की कमियों को उजागर करना और बेहतर विकल्प देना है।
• शासक दल के सदस्य भी अपने क्षेत्र की समस्याओं के आधार पर विधेयक में सुधार की मांग कर सकते हैं।

आम गलतियाँ:

• यह मान लेना कि यदि मंत्री विधेयक लाते हैं तो संसद की कोई भूमिका ही नहीं बचती।
• विपक्ष और सत्ता पक्ष के विधायी योगदान को नजरअंदाज करना।
• कानून निर्माण की प्रक्रिया में बहस और विचार-विमर्श के महत्व को न समझना।

Exam Tips:

a) स्पष्ट करें कि यद्यपि विधेयक मंत्री लाते हैं, पर संसद ही उन्हें कानून का रूप देने से पहले परिष्कृत करती है।
b) बहस, चर्चा और संसदीय समितियों के योगदान की चर्चा करें।
c) आरिफ की शंका का समाधान लोकतांत्रिक और तार्किक भाषा में करें।

 

Question 7: आप निम्नलिखित में से किस कथन से सबसे ज़्यादा सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण बताइये।
(क) सांसदों/विधायकों को अपनी पसंद की पार्टी में शामिल होने की छूट होनी चाहिए।
(ख) दल-विरोधी कानून के कारण पार्टी के नेता का दबदबा पार्टी के सांसदों/विधायकों पर बढ़ा है।
(ग) दल बदल हमेशा स्वार्थ के तहत होता है और इस कारण जो विधायक/सांसद दूसरे दल में शामिल होता है उसे आगामी दो वर्षों के लिए मंत्री पद के अयोग्य करार कर दिया जाना चाहिए।

Answer:

उपरोक्त दिए गए कथनों में कथन (ग) से मैं पूर्ण सहमत हूँ। अन्य कथन भी कुछ संशोधन के साथ ही हो सकते हैं।
(क) विधायकों को अपनी पसंद की किसी भी पार्टी में शामिल होने के लिए स्वतंत्र नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे भ्रष्ट आचरण को बढ़ावा मिलेगा, विशेष परिस्थितियों में जैसे विश्वास प्रस्ताव के समय सैद्धांतिक रूप से, उन्हें उस पार्टी को छोड़ने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। जो राष्ट्रीय हित के खिलाफ हो।
(ख) एक निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है। कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है। किसी सदस्य द्वारा सदन में पार्टी के पक्ष के विपरीत वोट किया जाता है। कोई सदस्य स्वयं को वोटिंग से अलग रखता है। कानून में कुछ ऐसी विशेष परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है, दल-बदल पर भी अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता। दल-बदल विरोधी कानून में एक राजनीतिक दल को किसी अन्य राजनीतिक दल में या उसके साथ विलय करने की अनुमति दी गई है।
(ग) दल बदल विरोधी कानून यह सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है जिससे एक स्थिर अपना कार्यकाल पूरा कर सकें। यह कानून एक विधायक या सांसद को उसके विवेक, निर्णय और अपने मतदाता के हितों के अनुरूप मतदान करने से भी रोकता है। राजनीतिक दल सदस्यों या विधायकों को यह निर्देश जारी करते हैं कि किसके पक्ष या विपक्ष में मतदान करना है। किसी भी सांसद या विधायक को दल-बदल का अधिकार केवल चुनाव के समय होना चाहिए। यदि कोई सदस्य कार्यकाल पूर्ण होने से पहले दल बदलता है तो शेष समय के लिए उसे योग्य घोषित कर देना चाहिए।

मुख्य बिंदु:

• दलबदल कानून राजनीतिक स्थिरता लाने के लिए बनाया गया है ताकि सरकारें आसानी से न गिरें।
• स्वेच्छा से पार्टी बदलने या व्हip (सचेतक) के खिलाफ मतदान करने पर सदस्यता समाप्त हो सकती है।
• बार-बार दल बदलने से अवसरवादी राजनीति को बढ़ावा मिलता है और जनता के विश्वास का हनन होता है।

आम गलतियाँ:

• तीनों कथनों के सूक्ष्म अंतर को समझे बिना किसी एक को चुन लेना।
• दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों को ठीक से न लिख पाना।
• व्यक्तिगत स्वतंत्रता और दलबदल के नियम के बीच संतुलन न समझा पाना।

Exam Tips:

a) अपने पसंदीदा कथन को चुनकर उसके समर्थन में मजबूत तर्क दें।
b) दलबदल विरोधी कानून के अपवादों (जैसे विलय) का भी संक्षेप में उल्लेख करें।
c) राजनीतिक स्थिरता बनाम जनप्रतिनिधि की स्वतंत्रता के द्वंद्व को स्पष्ट करें।

 

Question 8: डॉली और सुधा में इस बात पर चर्चा चल रही है कि मौजूदा वक्त में संसद कितनी कारगर और प्रभावकारी है। डॉली का मानना था कि भारतीय संसद के कामकाज में गिरावट आयी है यह गिरावट एक दम साफ दिखाई देती है क्योंकि अब बुनियादी मसलों पर बहस में समय कम खर्च होता है और सदन की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करने अथवा वॉकआउट करने में ज़्यादा। सुधा का तर्क था कि लोकसभा में अलग-अलग सरकारों ने मुँह की खायी है, धड़शाही हुई हैं। आप सुधा की तर्क के पक्ष में या विपक्ष में कौन सा तर्क देंगे?

Answer:

डॉली का कहना एक दम सही है कि सदन का बहुमूल्य समय व्यर्थ की बहस व अन्य गतिविधियों में ख़म कर रहे हैं तथा उपयोगी काम धीरे-धीरे कम होता जा रहा है संसद का वातावरण व कार्यविधि में गिरावट आई है जिससे संसद की गरिमा को भी धक्का लगा है। सदन के अध्यक्ष प्रायः असहहाय से दिख रहे हैं।
सुधा का कहना भी सत्य है कि बार बार सरकारें गिरती रहती है अर्थात् जिस सरकार का संसद में बहुमत समाप्त हो जाता है वह सरकार गिर जाती है एवं संसदीय लोकतंत्र के लिए अच्छा लक्षण नहीं है। लोकतंत्र के लिए संसद की गरिमा सर्वोपरि होनी चाहिए, लेकिन नहीं यह तभी संभव होगा जब राजनीतिक दलों का नैतिक चरित्र उच्च कोटि का हो तथा सदन के अध्यक्ष का अनुशासन भी निष्पक्ष और कठोर होना चाहिए।

मुख्य बिंदु:

• संसद में लगातार हंगामे और व्यवधान के कारण सार्थक चर्चा का समय घट रहा है।
• सरकारों का गिरना और राजनीतिक अस्थिरता भी संसद की कार्यप्रणाली पर प्रभाव डालती है।
• अध्यक्ष की निष्पक्षता और कठोर अनुशासन संसद की गरिमा बचाने के लिए जरूरी है।

आम गलतियाँ:

• केवल डॉली या केवल सुधा के पक्ष में एकतरफा उत्तर देना बिना दूसरे के तर्कों का विश्लेषण किए।
• संसद में गिरावट के कारणों (हंगामा, कोरम की कमी आदि) को स्पष्ट न करना।
• संसदीय गरिमा और राजनीतिक नैतिकता के बीच संबंध स्थापित न करना।

Exam Tips:

a) दोनों वक्ताओं (डॉली और सुधा) के तर्कों का संतुलित मूल्यांकन प्रस्तुत करें।
b) वर्तमान संसद की चुनौतियों (हंगामा, व्यवधान) और उसकी सफलताओं (सरकार बदलना) दोनों को शामिल करें।
c) निष्कर्ष में सुधार के उपाय अवश्य सुझाएँ।

 

Question 9: विधेयक को कानून बनने के क्रम में जिन अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है उन्हें क्रमवार सजाएँ।
(क) किसी विधेयक पर चर्चा के लिए प्रस्ताव पारित किया जाता है।
(ख) विधेयक भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है-बताइए कि वह अगर इस पर हस्ताक्षर नहीं करता/करती है, तो क्या होता है।
(ग) विधेयक दूसरे सदन में भेजा जाता है और वहां इसे पारित कर दिया जाता है।
(घ) विधेयक का प्रस्ताव जिस सदन में प्रस्तुत हुआ है उसमें यह विधेयक पारित होता है।
(ङ) विधेयक की हर धारा को पढ़ा जाता है और प्रत्येक धारा पर मतदान होता है।
(च) विधेयक उप समिति के पास भेजा जाता है समिति उसमें कुछ फेर-बदल करती है और चर्चा के लिए सदन में भेज देती है।
(छ) सम्बद्ध मंत्री विधेयक की ज़रुरत के बारे में प्रस्ताव करता है।
(ज) विधि मंत्रालय का कानून-विभाग विधेयक तैयार करता है।

Answer:

संबद्ध मंत्री विधेयक की ज़रुरत के बारे में प्रस्ताव करता है।
विधि मंत्रालय का कानून-विभाग विधेयक तैयार करता है।
किसी विधेयकों पर चर्चा के लिए प्रस्ताव पारित किया जाता है।
विधेयक उप समिति के पास भेजा जाता है समिति उसमें कुछ फेर-बदल करती है और चर्चा के लिए सदन में भेज देती है
विधेयक की हर धारा को पढ़ा जाता है और प्रत्येक धारा पर मतदान होता है।
विधेयक का प्रस्ताव जिस सदन में प्रस्तुत हुआ है उसमें यह विधेयक पारित होता है।
विधेयक दूसरे सदन में भेजा जाता है और वहां इसे पारित कर दिया जाता है।
विधेयक भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है-अगर राष्ट्रपति इस पर हस्ताक्षर कर देता है तो यह कानून बन जाता है। राष्ट्रपति इस प्रकार के बिल को पुनः विचार विमर्श के लिए भेज सकता है, परन्तु पुनः विचार विमर्श के बाद राष्ट्रपति को इस पर मंजूरी देनी पड़ती है।

मुख्य बिंदु:

• कानून निर्माण की प्रक्रिया का पहला चरण विधेयक का प्रारूप तैयार करना और उसका परिचय देना है।
• वाचन, समितियों द्वारा जाँच और दोनों सदनों से पारित होना अनिवार्य चरण हैं।
• राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ही कोई विधेयक अंतिम रूप से कानून बनता है।

आम गलतियाँ:

• विधायी प्रक्रिया के चरणों के क्रम को आगे-पीछे लिखना।
• राष्ट्रपति की पुनर्विचार की शक्ति और उसकी सीमा को गलत समझना।
• समितियों के कार्य चरण को छोड़ देना।

Exam Tips:

a) कानून बनने के चरणों को बिल्कुल क्रमबद्ध (Sequential) रूप में लिखें।
b) राष्ट्रपति की भूमिका और वीटो/पुनर्विचार शक्ति को स्पष्ट रूप से समझाएँ।
c) प्रत्येक चरण को छोटे वाक्यों में क्रमानुसार प्रस्तुत करें।

 

Question 10: संसदीय प्रणाली में समिति की व्यवस्था से संसद के विधायी कामों के मूल्यांकन और देख-रेख पर क्या प्रभाव पड़ता है?

Answer:

कानून निर्माण संसद का काम है और प्रत्येक सदन अपनी समितियों की सहायता से उसे निभाता है। प्रायः बिलों को विस्तृत विचार के लिए किसी समिति को सौंपा जाता है और सदन उस समिति की सिफारिशों के आधार पर विचार विमर्श करके उसे स्वीकृत या अस्वीकृत करता है अधिकांश मामलों में सदन समिति की सिफारिशों के आधार पर ही उसका निर्णय करता है और इसी आधार पर लोगों का मत है कि इससे संसद का कानून बनाने की शक्ति कुप्रभावित हुई है।
सदन में समिति की रिपोर्ट पर विचार करते समय यदि सदन अनुभव करे कि बिल के प्रभाव पर भली-भांति विचार नहीं हुआ है या इसपर पक्षपातपूर्ण रिपोर्ट दी गई है तो वह उसे पुनः उसी समिति या किसी नई समिति को भेज सकता है, अथवा समिति की रिपोर्ट को स्वीकार न करे। सदन अपना स्वतंत्र निर्णय भी ले सकता है। संसद के पास इतना समय नहीं होता है कि वह प्रत्येक बिल पर या उसकी प्रत्येक धारा पर विचार कर सके और उसका प्रत्येक दृष्टिकोण से विश्लेषण कर सके।

मुख्य बिंदु:

• संसदीय समितियाँ विधेयकों का गहराई से तकनीकी और विस्तृत अध्ययन करती हैं।
• इन्हें 'लघु विधायिका' भी कहा जाता है क्योंकि ये सदन का कार्यभार हल्का करती हैं।
• समितियों की सिफारिशें गैर-पार्टी आधार पर होती हैं, जिससे कानून की गुणवत्ता सुधरती है।

आम गलतियाँ:

• यह सोचना कि समितियाँ संसद के अधिकारों को कम करती हैं।
• समितियों की कार्यप्रणाली और महत्व को संक्षिप्त में न लिखकर छोड़ देना।
• सदन और समितियों के परस्पर संबंधों को गलत दर्शाना।

Exam Tips:

a) संसदीय समितियों के महत्व और उनके द्वारा विधायी कार्यों में मिलने वाली मदद को स्पष्ट करें।
b) 'मिनी संसद' या 'लघु विधायिका' शब्द का प्रयोग करके अपने उत्तर को प्रभावी बनाएँ।
c) समय की कमी और जटिल विधायी कार्यों में समितियों की अनिवार्यता को समझाएँ।

 

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FAQs

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Are the Political Science NCERT solutions for Class 11 updated for the new 50% competency-based exam pattern?

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Do you offer NCERT Solutions Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 05 Legislature (विधायिका) in Hindi in multiple languages like Hindi and English?

Yes, we provide bilingual support for Class 11 Political Science. You can access NCERT Solutions Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 05 Legislature (विधायिका) in Hindi in both English and Hindi medium.

Is it possible to download the Political Science NCERT solutions for Class 11 as a PDF?

Yes, you can download the entire NCERT Solutions Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 05 Legislature (विधायिका) in Hindi in printable PDF format for offline study on any device.