NCERT Solutions for Class 10 Hindi: पाठ 2 जॉर्ज पंचम की नाक
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Practice Class 10 Hindi Solutions: पाठ 2 जॉर्ज पंचम की नाक
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NCERT Solutions for Class 10 Hindi for Kritika पाठ 2 जॉर्ज पंचम की नाक
2. जॉर्ज पंचम की नाक (लेखक: कमलेश्वर)
पाठ का सार
प्रस्तावना: प्रस्तुत कहानी में तत्कालीन भारतीय सरकारी तंत्र और शासकीय अधिकारियों की गुलामी व हीन भावना से ग्रस्त मानसिकता पर करारा प्रहार किया गया है। लेखक ने दर्शाया है कि सैकड़ों वर्षों तक जिस ब्रिटिश हुकूमत के हम अधीन रहे, उनके भारत से चले जाने के उपरांत भी हमारी मानसिक गुलामी और परतंत्रता की सोच वैसी ही बनी हुई है। ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के भारत आगमन की खबर सुनते ही पूरा सरकारी अमला अपने सारे जरूरी काम-काज छोड़कर उनके स्वागत-सत्कार और आवभगत की तैयारियों में दिन-रात एक कर देता है। यहाँ तक कि इंडिया गेट के सामने लगी जॉर्ज पंचम की लाट (मूर्ति) की टूटी हुई नाक को पुनः लगाने के लिए पूरा तंत्र देश के जीवित नागरिकों और शहीदों के सम्मान को दांव पर लगाने के लिए तैयार हो जाता है। यह कहानी एक अत्यंत तीखी और प्रभावशाली व्यंग्य रचना है।
रानी एलिजाबेथ के आगमन पर हड़कंप: इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय अपने पति प्रिंस फिलिप के साथ भारत के शाही दौरे पर आने वाली थीं। उनके इस ऐतिहासिक आगमन की चर्चाएं लंदन के प्रमुख अखबारों में प्रतिदिन बड़े चाव से छपती थीं, जिनकी गूँज अगले ही दिन भारतीय समाचार पत्रों में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देती थी। पूरे राजकीय तंत्र में हड़कंप मचा हुआ था। महारानी भारत, पाकिस्तान और नेपाल के दौरे के दौरान किस दिन कौन-सी वेशभूषा पहनेंगी, इसे लेकर उनका शाही दर्जी अत्यंत परेशान और चिंतित था। उनके आगमन से पूर्व उनके सुरक्षा अधिकारी, सचिव और जासूस पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का तूफानी दौरा करके सुरक्षा का जायजा लेना चाहते थे। फोटोग्राफरों की एक विशाल फौज तैयार हो रही थी। अखबारों में यह खबर प्रमुखता से छपी कि रानी ने भारत से मंगाए गए अत्यंत कीमती हल्के नीले रंग के रेशमी कपड़े से एक सुंदर सूट बनवाया है, जिसका कुल खर्च चार सौ पाउंड आया है। इसके उपरांत, रानी के रसोइयों, नौकरों, अंगरक्षकों की पूरी जीवनियाँ और यहाँ तक कि राजमहल के पालतू कुत्तों की तस्वीरें भी भारतीय समाचार पत्रों में छपने लगीं। इस प्रकार, इंग्लैंड में बजने वाले स्वागत के शंख की गूँज भारत की राजधानी दिल्ली में तहलका मचा रही थी और देखते ही देखते दिल्ली का कायाकल्प किया जाने लगा।
जॉर्ज पंचम की नाक मुसीबत बनी: नई दिल्ली को पूरी तरह सजाया जा रहा था, परंतु अचानक एक बहुत बड़ी मुसीबत सामने आ गई। इंडिया गेट के ठीक सामने लगी जॉर्ज पंचम की लाट (पाषाण मूर्ति) की नाक अचानक गायब हो गई थी। वहाँ हथियारबंद सिपाही दिन-रात गश्त लगा रहे थे, फिर भी न जाने कैसे लाट की नाक चली गई। यद्यपि देश के अन्य हिस्सों में लगी कई औपनिवेशिक मूर्तियों की नाकों को पहले ही उतारकर संग्रहालयों (अजायबघरों) में सुरक्षित पहुँचा दिया गया था, परंतु राजधानी के मुख्य स्थल पर लगी जॉर्ज पंचम की मूर्ति बिना नाक के खड़ी रहे और महारानी भारत आएं, यह सरकारी तंत्र के लिए घोर अपमान और उनकी अपनी नाक कटने जैसी चिंता का विषय बन गया। आनन-फानन में एक आपातकालीन बैठक बुलाई गई। सभी अधिकारियों का मानना था कि यदि जॉर्ज पंचम की मूर्ति पर नाक नहीं रही, तो पूरे विश्व के सामने हमारी खुद की नाक कट जाएगी। इस समस्या के त्वरित समाधान के लिए देश के एक प्रख्यात मूर्तिकार को तुरंत दिल्ली हाजिर होने का शाही हुक्म दिया गया। मूर्तिकार जब हाजिर हुआ, तो उसने उपस्थित हुक्कामों (अधिकारियों) के लटके और परेशान चेहरों को देखा, जिनकी दयनीय दशा देखकर स्वयं उसकी आँखों में आँसू आ गए। तभी उसे एक गंभीर आदेश सुनाई दिया - "मूर्तिकार! जॉर्ज पंचम की लाट पर तुरंत नाक लगानी है।" मूर्तिकार ने हामी भर दी कि नाक लग जाएगी, परंतु इसके लिए उसे यह जानना होगा कि इस लाट के निर्माण में प्रयुक्त पत्थर कहाँ से मंगाया गया था। इस जानकारी के लिए पुरातत्व विभाग के क्लर्क को बुलाकर पुरानी फाइलें टटोलने का आदेश दिया गया। क्लर्क ने सभी फाइलों की बारीकी से जाँच की, परंतु उसने काँपते हुए जवाब दिया कि "फाइलें सब कुछ हज़म कर चुकी हैं" और उसमें कोई विवरण दर्ज नहीं है। यह सुनकर अधिकारियों के चेहरों पर पुनः उदासी छा गई और इस महत्वपूर्ण कार्य की जिम्मेदारी एक विशेष कमेटी बनाकर उसके कंधों पर सौंप दी गई।
पत्थर की खोज: कमेटी ने पुनः मूर्तिकार को विचार-विमर्श के लिए बुलाया। मूर्तिकार ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि वे तनिक भी परेशान न हों; वह स्वयं भारत के प्रत्येक पहाड़ी क्षेत्र का भ्रमण करेगा और लाट के पत्थर से पूरी तरह मेल खाने वाला पत्थर खोजकर लाएगा। यह आश्वासन सुनते ही कमेटी के सदस्यों की जान में जान आई। सभापति ने बड़े गर्व से घोषणा की कि "ऐसी कौन-सी चीज़ है जो भारत में नहीं मिलती। हमारे देश के गर्भ में हर रहस्य और वस्तु छिपी हुई है, बस आवश्यकता उसे परिश्रम से खोजने की है। आने वाला समय देश के लिए अत्यंत खुशहाल होगा।" सभापति का यह छोटा सा भाषण अगले ही दिन अखबारों की मुख्य सुर्खी बन गया। मूर्तिकार पत्थर की खोज में देश के विभिन्न पहाड़ी राज्यों और खदानों के दौरे पर निकल पड़ा, परंतु कुछ समय बाद वह अत्यंत निराश होकर दिल्ली लौटा। उसने अपना सिर झुकाकर खेदपूर्ण समाचार दिया कि उसने पूरे देश का चप्पा-चप्पा छान मारा, परंतु इस प्रकार का पत्थर कहीं नहीं मिला; यह पत्थर पूर्णतः विदेशी है। यह सुनकर सभापति अत्यधिक क्रोधित और तैश में आ गए और उन्होंने मूर्तिकार को फटकारते हुए कहा कि "आपकी बुद्धि पर लानत है! जब हमने विदेशों की पूरी संस्कृति - उनका रहन-सहन, तौर-तरीके और दिल-दिमाग - को अपना लिया है, यहाँ तक कि भारत में विदेशी वेस्टर्न डांस (बाल डांस) भी मिल जाता है, तो फिर एक विदेशी पत्थर क्यों नहीं मिल सकता?"
अपने किसी नेता की मूर्ति से नाक उतार ली जाए: सभापति की फटकार सुनने के बाद चतुर और स्वार्थी मूर्तिकार ने बंद कमरे में एक और अत्यंत गुप्त योजना प्रस्तुत की। उसने इस शर्त पर अपनी बात रखी कि यह विचार किसी भी स्थिति में अखबार वालों तक नहीं पहुँचना चाहिए। सभापति की सहमति मिलने पर मूर्तिकार ने धीरे से कहा कि "हमारे देश में हमारे पूजनीय राष्ट्रीय नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों की भी कई मूर्तियाँ लगी हुई हैं। यदि आप लोग उचित और आवश्यक समझें, तो जिस नेता की नाक जॉर्ज पंचम की लाट पर पूरी तरह फिट बैठ जाए, उसे वहाँ से उतारकर इस लाट पर लगा दिया जाए।" यह सुनते ही सभापति के चेहरे पर थोड़ी राहत लौटी और उन्होंने दबे स्वर में कहा - "लेकिन बड़ी होशियारी से करना।" मूर्तिकार तुरंत देश के विस्तृत दौरे पर निकल पड़ा। उसने दिल्ली से लेकर मुंबई, गुजरात, बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मद्रास, मैसूर, केरल और पंजाब तक का दौरा किया। उसने दादाभाई नौरोजी, बाल गंगाधर तिलक, छत्रपति शिवाजी, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, रवींद्रनाथ टैगोर, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, पंडित नेहरू, मदनमोहन मालवीय, लाला लाजपत राय और भगत सिंह जैसे महान देशभक्तों और शहीदों की मूर्तियों की नाकों को टटोला और उनका माप लिया। अंत में उसने दिल्ली आकर निराश मन से अपनी विवशता बताई कि "मैंने पूरे हिंदुस्तान की परिक्रमा कर ली है, परंतु जॉर्ज पंचम की इस नाक से हमारे देश के सभी महान नेताओं और शहीदों की नाक बहुत बड़ी है (अर्थात हमारे देश के वीरों का सम्मान जॉर्ज पंचम से कहीं अधिक ऊँचा है)।" मूर्तिकार की बात सुनकर अधिकारी पुनः हताश हो गए। मूर्तिकार ने हार न मानते हुए एक और तथ्य बताया कि उसने सुना है कि बिहार सेक्रेटेरिएट के सामने वर्ष १९४२ के आंदोलन में शहीद हुए बच्चों की मूर्तियाँ स्थापित हैं, शायद किसी बच्चे की नाक ही इस लाट पर फिट बैठ जाए। वह वहाँ भी गया, परंतु उसे अत्यंत आश्चर्य हुआ कि उन शहीद बच्चों की नाक भी जॉर्ज पंचम की इस नाक से बहुत बड़ी थी।
जॉर्ज पंचम की नाक लग गई: महारानी के आगमन का समय निरंतर निकट आ रहा था, जिससे अधिकारियों के बीच खलबली मची हुई थी। जॉर्ज पंचम की लाट को साफ करके, नहला-धुलाकर और उस पर नया रंग (रोगन) पोतकर तैयार कर दिया गया था, परंतु नाक न होने से पूरी साख दांव पर लगी थी। इस विकट परिस्थिति में मूर्तिकार ने कमेटी के सामने अपनी अंतिम और सबसे ख़तरनाक योजना रखी। उसने कहा कि "चूँकि नाक लगाना अत्यंत अनिवार्य है, इसलिए देश की चालीस करोड़ की आबादी में से किसी भी एक जीवित व्यक्ति की नाक काटकर इस लाट पर लगा दी जानी चाहिए।" मूर्तिकार के इस प्रस्ताव को सुनते ही कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। सभी को घबराया हुआ देखकर मूर्तिकार ने कहा कि "आप लोग चिंता न करें, यह ज़िम्मेदारी मेरी है। मुझे केवल आपकी अनुमति चाहिए।" अधिकारियों ने आपस में कानाफूसी की और अंततः उसे जीवित नागरिक की नाक लगाने की क्रूर अनुमति दे दी गई। अगले दिन अखबारों में केवल इतना ही छपा कि "नाक का मसला पूरी तरह हल हो गया है और इंडिया के सामने लगी जॉर्ज पंचम की लाट पर नाक लगाई जा रही है।" मूर्ति के आसपास के जलाशय (तालाब) को सुखाया गया, उसकी अच्छी सफाई करके उसमें ताज़ा पानी डाला गया ताकि जीवित व्यक्ति की लगाई गई वह नाक सूखने न पाए। अंततः वह दिन आया जब जॉर्ज पंचम की लाट पर जीवित मनुष्य की नाक लगा दी गई। अखबारों में खबर छपी कि "जॉर्ज पंचम को ऐसी नाक लगाई गई है जो कतई पत्थर की नहीं लगती (अर्थात वह जीवित व्यक्ति की नाक है)।"
सब अखबार खाली: २६ अगस्त, १९८२ को जॉर्ज पंचम की लाट पर जीवित नाक लगाए जाने के उस ऐतिहासिक दिन पूरे देश के समाचार पत्रों में एक अत्यंत विचित्र और मौन विरोध दिखाई दिया। उस दिन अखबारों में किसी भी प्रकार के उद्घाटन, फीता काटने या सार्वजनिक सभा की कोई खबर नहीं थी। न तो किसी हवाई अड्डे या रेलवे स्टेशन पर किसी विदेशी अतिथि के स्वागत का कोई समाचार था और न ही किसी भी व्यक्ति का कोई चित्र अखबार में छपा था। सभी समाचार पत्र पूरी तरह खाली थे। इस मौन विरोध का कारण यह था कि देश के हुक्मरानों ने एक विदेशी तानाशाह के सम्मान की खातिर देश के एक बेज़ुबान जीवित नागरिक की नाक (इज्जत) काट दी थी, जो संपूर्ण राष्ट्र के स्वाभिमान की पराजय और अत्यंत शर्मनाक कृत्य था।
शब्दार्थ
पृष्ठ संख्या 10
कारनामा - साहसिक कार्य, काम। बावरची - रसोईया, रसोइया। खानसामा - रसोइघर का प्रमुख या प्रबंधक। सनसनी - खलबली, सनसनाहट। तहलका - शोर-शराबा, खलबली.
पृष्ठ संख्या 11
जान हथेली पर लेकर - प्राणों की चिंता किए बिना काम करना। रहमत - कृपा, दया। बेसाख्ता - स्वाभाविक रूप से, अचानक। कायापलट - पूरी तरह से रूप बदल जाना। करिश्मा - जादू, चमत्कार। जवान हो गई - नई और साफ-सुथरी हो गई। नाज़नीन - कोमल अंगों वाली स्त्री। दास्तान - गाथा, कहानी। मज़ाल - साहस, हिम्मत। गुरिल्ला युद्ध - छापामार युद्ध प्रणाली। सरगर्मी - हलचल, सक्रियता। खै़रख्वाहों - भलाई चाहने वाले लोग.
पृष्ठ संख्या 12
हुक्कामों - शासकीय अधिकारी, शासक वर्ग। बदहवास - डरे हुए, घबराए हुए। ख़ता - भूल, अपराध। हज़म कर चुकी है - नष्ट कर चुकी है, गायब कर चुकी है.
पृष्ठ संख्या 13
दारोमदार - संपूर्ण उत्तरदायित्व, ज़िम्मेदारी। जान में जान आई - आशा बँधना, राहत मिलना। लानत - धिक्कार। इजाज़त - अनुमति.
पृष्ठ संख्या 14
हताश हो गए - निराश हो गए। नाक कटने वाली बात - इज्ज़त चली जाने वाली बात। लाचार - विवश, लाचार। हैरतअंगेज़ - अत्यंत विचित्र, आश्चर्यजनक। अचपचाया - चौंक उठना, भौंचक्का रह जाना। कानाफूसी - धीरे स्वर में कानों में बात करना.
पृष्ठ संख्या 15
मसला - मामला, समस्या। तैनाती - नियुक्ति। हिदायत - चेतावनी, निर्देश। गौर करना - ध्यानपूर्वक सोचना.
अभ्यास प्रश्नोत्तर
I. बहुविकल्पी प्रश्न
Question 1. इंग्लैंड की रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय अपने पति के साथ निम्नलिखित में से कहाँ के दौरे पर आ रही थीं?
(a) हिंदुस्तान के
(b) पाकिस्तान के
(c) नेपाल के
(d) उपर्युक्त सभी जगह
Answer: (d) उपर्युक्त सभी जगह
In simple words: महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय अपने पति के साथ उपमहाद्वीप के दौरे पर भारत, पाकिस्तान और नेपाल आने वाली थीं।
Exam Tip: पाठ के आरंभ में रानी के शाही दौरे के अंतर्गत तीनों देशों (हिंदुस्तान, पाकिस्तान, नेपाल) का स्पष्ट रूप से उल्लेख है।
Question 2. रानी एलिज़ाबेथ ने अपने नीले रंग के सूट के लिए रेशमी कपड़ा कहाँ से मँगवाया था?
(a) चीन से
(b) हिंदुस्तान से
(c) जापान से
(d) पाकिस्तान से
Answer: (b) हिंदुस्तान से
In simple words: रानी के उस महंगे नीले रेशमी सूट के निर्माण के लिए रेशमी कपड़ा भारत (हिंदुस्तान) से मंगवाया गया था।
Exam Tip: रानी के नीले सूट का कपड़ा भारत से गया था, जिसका कुल खर्च 'चार सौ पाउंड' आया था, यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है।
Question 3. कहीं-कहीं गुरिल्ला युद्ध क्यों हुआ?
(a) अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए
(b) देश को आज़ाद कराने के लिए
(c) शाही लाटों की नाकों के लिए
(d) उपर्युक्त सभी
Answer: (c) शाही लाटों की नाकों के लिए
In simple words: देश के विभिन्न हिस्सों में लगी ब्रिटिश अधिकारियों की मूर्तियों की नाकों को काटकर हटाने के लिए स्वतंत्रता सेनानियों के बीच संघर्ष (गुरिल्ला युद्ध) होता रहा।
Exam Tip: यह व्यंग्यात्मक प्रसंग औपनिवेशिक मूर्तियों (शाही लाटों) के अंग-भंग करने के ऐतिहासिक संदर्भ को दर्शाता है।
Question 4. जॉर्ज पंचम की लाट इंडिया गेट के किस तरफ़ थी?
(a) पीछे
(b) सामने
(c) दाहिने
(d) बाएँ
Answer: (b) सामने
In simple words: ब्रिटिश शासक जॉर्ज पंचम की वह पाषाण मूर्ति राजधानी के मुख्य स्थल इंडिया गेट के ठीक सामने स्थापित थी।
Exam Tip: लाट की भौगोलिक स्थिति 'इंडिया गेट के सामने' थी, जहाँ हथियारबंद सैनिक गश्त लगाते थे।
Question 5. मूर्तिकार ने जॉर्ज पंचम की नाक लगाने के लिए क्या जानना चाहा?
(a) यह लाट कब बनी थी?
(b) यह लाट कहाँ बनी थी?
(c) इस लाट के लिए पत्थर कहाँ से आया था?
(d) उपर्युक्त सभी
Answer: (d) उपर्युक्त सभी
In simple words: मूर्तिकार ने काम शुरू करने से पहले लाट के निर्माण का समय, निर्माण का स्थान और प्रयुक्त पत्थर के मूल स्रोत की जानकारी माँगी।
Exam Tip: मूर्तिकार द्वारा पूछे गए इन तीनों सवालों (समय, स्थान, पत्थर का स्रोत) को ध्यान में रखकर 'उपर्युक्त सभी' चुनें।
Question 6. जॉर्ज पंचम की लाट से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी जुटाने की ज़िम्मेदारी कमेटी ने किसे सौंपी?
(a) सचिव को
(b) क्लर्क को
(c) सेक्शन अधिकारी को
(d) इनमें से किसी को नहीं
Answer: (b) क्लर्क को
In simple words: कमेटी ने पुरातत्व विभाग की पुरानी फाइलों को टटोलकर लाट के इतिहास का पता लगाने का काम एक सरकारी क्लर्क को सौंपा था।
Exam Tip: पुरातत्व विभाग की फाइलों की छानबीन का कार्य करने वाला पात्र 'क्लर्क' था।
Question 7. पहाड़ी प्रदेशों और पत्थर की खानों के दौरे के बाद मूर्तिकार ने पत्थर की किस्म के बारे में क्या कहा?
(a) इस किस्म का पत्थर हिंदुस्तान में कहीं नहीं मिला
(b) यह पत्थर विदेशी है
(c) इस तरह का पत्थर कहीं नहीं मिलेगा।
(d) (a) तथा (b) दोनों
Answer: (d) (a) तथा (b) दोनों
In simple words: पूरे देश का दौरा करने के बाद मूर्तिकार ने निष्कर्ष दिया कि यह पत्थर भारत की किसी भी खदान में नहीं है और यह पूरी तरह से विदेशी है।
Exam Tip: मूर्तिकार के कथन में 'भारत में न मिलना' और 'पत्थर का विदेशी होना' - दोनों ही बातें शामिल थीं, अतः (d) सही उत्तर है।
Question 8. बिहार सेक्रेटेरिएट के सामने बच्चे कब शहीद हुए थे?
(a) सन् चालीस
(b) सन् इकतालीस
(c) सन् बयालीस
(d) सन् तैंतालीस
Answer: (c) सन् बयालीस
In simple words: भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वर्ष १९४२ (सन् बयालीस) में बिहार सेक्रेटेरिएट के सामने कुछ वीर बच्चे देश के लिए शहीद हुए थे।
Exam Tip: ऐतिहासिक 'भारत छोड़ो आंदोलन' वर्ष १९४२ (सन् बयालीस) में हुआ था, जब बच्चे पटना सचिवालय के सामने शहीद हुए थे।
Question 9. जब रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय हिंदुस्तान आने वाली थीं, उस समय यहाँ की जनसंख्या कितनी थी?
(a) पैंतीस करोड़
(b) चालीस करोड़
(c) पैंतालीस करोड़
(d) पचास करोड़
Answer: (b) चालीस करोड़
In simple words: रानी के भारत आगमन के समय हमारे देश की कुल जनसंख्या लगभग चालीस करोड़ थी, जिसका उल्लेख जीवित नाक लगाने के प्रसंग में हुआ है।
Exam Tip: 'चालीस करोड़ में से कोई एक जिंदा नाक...' प्रसंग से जनसंख्या का आँकड़ा 'चालीस करोड़' याद रखें।
Question 10. पत्थर की नाक नहीं मिलने पर मूर्तिकार ने क्या राय दी?
(a) नाक लगाने की योजना छोड़ देने की
(b) ज़िंदा नाक लगाने की
(c) पत्थर से मिलती-जुलती किसी अन्य चीज़ की नाक लगाने की
(d) इनमें से कोई नहीं
Answer: (b) ज़िंदा नाक लगाने की
In simple words: जब हर तरफ से असफलता हाथ लगी, तो मूर्तिकार ने अत्यंत क्रूर और अंतिम राय दी कि किसी जीवित व्यक्ति की नाक काटकर लगा दी जाए।
Exam Tip: कहानी का मुख्य मोड़ और उसका अंतिम तीखा व्यंग्य इसी 'जिंदा नाक लगाने' के फैसले पर टिका हुआ है।
II. पाठ आधारित महत्वपूर्ण प्रश्न (3 अंक)
प्रश्न 1. जॉर्ज पंचम की नाक की लंबी दास्तान क्या है?
Answer: जॉर्ज पंचम की नाक की दास्तान हमारे देश के आत्मसम्मान और सरकारी तंत्र की गुलामी की एक लंबी कहानी है। औपनिवेशिक काल में जॉर्ज पंचम की पाषाण लाट की सुरक्षा के लिए कड़े पहरेदार और हथियारबंद सिपाही तैनात किए गए थे ताकि कोई भी उनकी नाक (इज्जत) को नुकसान न पहुँचा सके। देश में अन्य स्थानों पर लगी विदेशी शासकों की मूर्तियों की नाकों को स्वाभिमान के तहत उतारकर संग्रहालयों में रख दिया गया था, जिसके लिए कभी-कभी हिंसक संघर्ष भी हुए। परंतु, एक दिन इंडिया गेट के सामने लगी जॉर्ज पंचम की मूर्ति की नाक अचानक गायब हो गई, जिससे पूरा प्रशासनिक अमला अपनी इज्जत बचाने के लिए घबरा उठा। अंत में, एक जीवित भारतीय नागरिक की नाक काटकर उस लाट पर लगा दी गई, जो इस दास्तान का सबसे शर्मनाक पहलू है।
In simple words: जॉर्ज पंचम की नाक बचाने के लिए सरकार ने कड़े पहरेदार रखे थे, पर नाक गायब होने के बाद रानी के आगमन पर अपनी नाक बचाने के लिए सरकार ने एक जीवित भारतीय की नाक काटकर मूर्ति पर लगा दी।
Exam Tip: उत्तर में मूर्ति की सुरक्षा, नाक गायब होने की घटना, और अंत में जीवित नागरिक की नाक लगाने के क्रूर निर्णय को क्रमानुसार स्पष्ट करें।
प्रश्न 2. मूर्तिकार ने नाक के लिए कहाँ - कहाँ जाकर किन नेताओं की मूर्तियों की नाक टटोली?
Answer: मूर्तिकार जॉर्ज पंचम की टूटी नाक का माप लेकर पूरे भारत के विस्तृत दौरे पर निकल पड़ा:
- उसने सर्वप्रथम **मुंबई** जाकर दादाभाई नौरोजी, बाल गंगाधर तिलक, गोपालकृष्ण गोखले, और छत्रपति शिवाजी महाराज की मूर्तियों की नाकों को टटोला। [43, 44]
- इसके बाद उसने **गुजरात** जाकर महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल और महादेव देसाई की मूर्तियों की नाकों की नाप ली। [44]
- वह **बंगाल** गया और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, और राजा राममोहन राय की प्रतिमाओं को जाँचा। [44]
- वह **उत्तर प्रदेश** गया और चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, मोतीलाल नेहरू, और मदनमोहन मालवीय की लाटों का निरीक्षण किया। [44]
- वह **मद्रास, मैसूर, केरल** और **पंजाब** गया, जहाँ उसने लाला लाजपत राय, सत्यमूर्ति और भगत सिंह की लाटों को देखा, और अंत में **बिहार** जाकर शहीद बच्चों की मूर्तियों की नाकों का भी नाप लिया। [44, 45]
In simple words: मूर्तिकार ने मुंबई, गुजरात, बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और पंजाब जाकर गांधी जी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, तिलक, और यहाँ तक कि बिहार के शहीद बच्चों की मूर्तियों की नाप ली। [44, 45]
Exam Tip: मूर्तिकार की यात्रा के प्रमुख पड़ावों (राज्यों) और उन राज्यों से जुड़े महान देशभक्तों के नामों को क्रमबद्ध तरीके से लिखें।
प्रश्न 3. ‘जॉर्ज पंचम की नाक’ पाठ की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालिए।
Answer: इस कहानी की पृष्ठभूमि उस समय की है जब इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय अपने पति प्रिंस फिलिप के साथ भारत के शाही दौरे पर आने वाली थीं। लंदन के अखबारों में प्रतिदिन उनके स्वागत, सुरक्षा तैयारियों और उनके शाही वस्त्रों के बारे में विस्तृत खबरें छपती थीं, जिनकी चर्चा अगले ही दिन भारतीय समाचार पत्रों में मुख्य रूप से होती थी। पूरा सरकारी तंत्र रानी के स्वागत की तैयारियों में डूबा हुआ था। इसी बीच इंडिया गेट के सामने लगी जॉर्ज पंचम की लाट की नाक का गायब होना पूरी सरकार के लिए एक गंभीर संकट बन गया। रानी के आगमन पर यदि जॉर्ज पंचम की नाक नहीं रही, तो भारत की नाक भी कट जाएगी - इसी हीन भावना और औपनिवेशिक गुलामी की मानसिकता पर यह कहानी आधारित है।
In simple words: यह कहानी उस समय की है जब इंग्लैंड की महारानी भारत आ रही थीं और उनके स्वागत के लिए पूरा सरकारी अमला जॉर्ज पंचम की मूर्ति पर नाक लगाने की चिंता में डूब गया था।
Exam Tip: महारानी एलिजाबेथ के भारत आगमन और इंडिया गेट पर जॉर्ज पंचम की लाट की नाक गायब होने के विरोधाभास को कहानी की मुख्य पृष्ठभूमि के रूप में प्रस्तुत करें।
प्रश्न 4. रानी के दौरे का समय जैसे - जैसे नज़दीक आ रहा था, वैसे - वैसे सरकारी तंत्र के माथे पर बल पड़ते जा रहे थे। माथे पर बल पड़ने के क्या कारण थे?
Answer: रानी एलिजाबेथ के भारत आगमन की तारीख जैसे-जैसे समीप आ रही थी, भारतीय सरकारी अधिकारियों और हुक्मरानों की चिंता और घबराहट (माथे पर बल पड़ना) निरंतर बढ़ती जा रही थी। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
- दिल्ली को दुल्हन की तरह सजाया जा चुका था, सड़कें साफ हो गई थीं और कायाकल्प हो चुका था, परंतु मुख्य मार्ग पर स्थित जॉर्ज पंचम की लाट बिना नाक के खड़ी थी।
- सुरक्षा के कड़े पहरे के बावजूद लाट की नाक का गायब होना सरकार की अक्षमता को दर्शाता था।
- अधिकारियों को यह भय सता रहा था कि यदि महारानी ने अपने दादा जॉर्ज पंचम की लाट को बिना नाक के देखा, तो वे इसे ब्रिटिश साम्राज्य का अपमान समझेंगी, जिससे भारत की वैश्विक साख और स्वयं अधिकारियों की प्रतिष्ठा (नाक) पूरी तरह मिट्टी में मिल जाएगी।
In simple words: रानी के आने का समय पास था पर जॉर्ज पंचम की लाट की नाक गायब थी। अधिकारियों को डर था कि बिना नाक की मूर्ति देखकर रानी नाराज़ हो जाएँगी और देश का अपमान होगा।
Exam Tip: उत्तर में 'लाट की नाक गायब होना' और 'शाही मेहमान के सामने देश की नाक (प्रतिष्ठा) खोने के भय' को मुख्य कारणों के रूप में लिखें।
प्रश्न 5. रानी के आने से पहले नाक को लगवाने के लिए क्या प्रबंध किए गए?
Answer: रानी एलिजाबेथ के आगमन से पूर्व जॉर्ज पंचम की लाट पर नाक लगवाने के लिए सरकारी स्तर पर निम्नलिखित आपातकालीन प्रबंध किए गए:
(i) देश के सभी शीर्ष अधिकारियों और नीति-निर्धारकों की एक उच्च स्तरीय गुप्त बैठक (मीटिंग) बुलाई गई, जहाँ इस गंभीर मसले पर विचार-विमर्श किया गया। [45]
(ii) सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि हर हाल में लाट पर नाक लगाना अनिवार्य है, चाहे इसके लिए कोई भी तरीका क्यों न अपनाना पड़े। [45]
(iii) एक विख्यात मूर्तिकार को तुरंत दिल्ली तलब किया गया और उसे लाट के समान पत्थर खोजने के लिए पूरे भारत के पहाड़ी क्षेत्रों का दौरा करने का आदेश और वित्तीय सहायता दी गई। [45]
In simple words: सरकार ने तुरंत एक बड़ी बैठक बुलाई, यह तय किया कि नाक लगाना ज़रूरी है, और एक चतुर मूर्तिकार को बुलाकर उसे पत्थर की खोज में पूरे देश के दौरे पर भेजा। [45]
Exam Tip: सरकारी मीटिंग के आयोजन, 'नाक लगाना अनिवार्य है' के निर्णय, और 'मूर्तिकार की नियुक्ति व दौरे' के प्रबंधों को क्रमानुसार लिखें।
प्रश्न 6. मूर्तिकार दिल्ली आया और उसकी आँखों में आँसू आ गए। क्यों?
Answer: जब मूर्तिकार दिल्ली बुलाए जाने पर सरकारी दफ्तर पहुँचा, तो उसने वहाँ उपस्थित सभी शासकीय अधिकारियों और हुक्मरानों के चेहरों पर एक अजीब सी बेबसी, उदासी और घोर निराशा देखी। वे सभी अपने देश की प्रतिष्ठा बचाने के बजाय एक विदेशी शासक की टूटी नाक की चिंता में पूरी तरह बदहवास और डरे हुए थे। अपने देश के शासकों और प्रतिष्ठित लोगों के चेहरों पर छाई इस लाचारी, गुलामी की मानसिकता और आत्मसम्मान की कमी को देखकर संवेदनशील मूर्तिकार का हृदय भर आया और उसकी आँखों में आँसू आ गए।
In simple words: मूर्तिकार ने जब दिल्ली के बड़े-बड़े अधिकारियों के चेहरों पर एक विदेशी मूर्ति की नाक के लिए इतनी बेबसी और लाचारी देखी, तो उसका मन दुखी हो गया और उसकी आँखों में आँसू आ गए।
Exam Tip: मूर्तिकार के आँसू आने का कारण अधिकारियों की 'लाचारी' और एक विदेशी लाट के लिए उनके 'गहरे मानसिक संताप' को बताएं।
प्रश्न 7. “जॉर्ज पंचम की नाक लगानी है” - सुनकर मूर्तिकार ने क्या कहा और उसका gqDdkekas पर क्या प्रभाव पड़ा?
Answer: जब मूर्तिकार से कहा गया कि उसे जॉर्ज पंचम की लाट पर नाक लगानी है, तो उसने बहुत ही आत्मविश्वास से हामी भरते हुए कहा कि "हाँ, नाक तो लग जाएगी। परंतु, मुझे यह जानकारी चाहिए कि यह लाट कब और कहाँ बनी थी? और इसके निर्माण के लिए प्रयुक्त विशिष्ट पत्थर किस पहाड़ी खदान से लाया गया था?"
मूर्तिकार के इन तकनीकी प्रश्नों को सुनकर उपस्थित सभी अधिकारियों (gqDdkekas) के होश उड़ गए। वे असहज होकर एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे, मानो वे इस ज़िम्मेदारी से बचना चाहते हों। अंत में, सभापति ने पुरातत्व विभाग के क्लर्क को फोन करके तुरंत पुरानी फाइलों की छानबीन करने का आदेश दिया।
In simple words: मूर्तिकार ने कहा कि नाक लग जाएगी पर उसे लाट के पत्थर और उसके बनने के समय की जानकारी चाहिए। यह सुनकर अधिकारी घबरा गए और उन्होंने क्लर्क को पुरानी फाइलें खोजने का काम सौंपा।
Exam Tip: मूर्तिकार के सवालों (पत्थर का स्रोत, निर्माण काल) और अधिकारियों की घबराहट व क्लर्क को फाइलें टटोलने के आदेश के प्रभाव को स्पष्ट रूप से लिखें।
प्रश्न 8. क्लर्क की छानबीन का क्या परिणाम निकला?
Answer: पुरातत्व विभाग के क्लर्क ने पूरी मुस्तैदी और लगन के साथ विभाग की पुरानी फाइलों को खंगाला। उसने फाइलों के पन्नों को उलट-पलट कर देखा, परंतु उसे जॉर्ज पंचम की लाट के निर्माण या उसके पत्थर के संबंध में कोई भी जानकारी प्राप्त नहीं हुई। क्लर्क ने वापस लौटकर कमेटी के सदस्यों के सामने थर-थर काँपते हुए बयान दिया कि "सर! मेरी खता माफ़ हो। पुरातत्व विभाग की फाइलें सब कुछ हज़म कर चुकी हैं (अर्थात वे नष्ट हो चुकी हैं या उनमें कोई रिकॉर्ड शेष नहीं है)।" क्लर्क के इस नकारात्मक उत्तर ने अधिकारियों की चिंता को और अधिक बढ़ा दिया।
In simple words: क्लर्क ने पुरातत्व विभाग की सभी फाइलें छान मारीं, पर उसे कोई जानकारी नहीं मिली। उसने डरते हुए कहा कि फाइलें सब कुछ नष्ट कर चुकी हैं।
Exam Tip: क्लर्क की छानबीन के परिणाम के रूप में उसके इस कथन "फाइलें सब कुछ हज़म कर चुकी हैं" का उल्लेख विशेष रूप से करें।
प्रश्न 9. क्लर्क को फाइलों में कुछ नहीं मिला तो हुक्कामों ने फिर क्या किया?
Answer: जब क्लर्क की छानबीन के बाद भी फाइलों से कोई सुराग हाथ नहीं लगा, तो उपस्थित अधिकारियों के चेहरों पर गहरी उदासी के बादल छा गए। वे अत्यंत चिंतित हो गए। इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए उन्होंने तुरंत एक विशेष और गुप्त कमेटी का गठन किया। इस कमेटी को यह कड़ा निर्देश और अधिकार दिया गया कि चाहे जैसे भी हो, जॉर्ज पंचम की लाट पर नाक लगाने का यह कार्य समय सीमा के भीतर पूरा होना चाहिए। इस नाक को लगवाने का संपूर्ण दारोमदार और ज़िम्मेदारी नव-गठित कमेटी के कंधों पर डाल दी गई।
In simple words: फाइलों में कुछ न मिलने पर अधिकारी दुखी हो गए और उन्होंने एक विशेष कमेटी बनाकर नाक लगाने की पूरी ज़िम्मेदारी उसके सिर पर डाल दी।
Exam Tip: उत्तर में 'विशेष कमेटी का गठन' और 'नाक लगाने की ज़िम्मेदारी कमेटी को सौंपने' की सरकारी प्रक्रिया को दर्शाएँ।
प्रश्न 10. सभापति का कौन - सा छोटा - सा भाषण अखबारों में छप गया?
Answer: जब चतुर मूर्तिकार ने कमेटी को आश्वस्त किया कि वह स्वयं भारत के पहाड़ी प्रदेशों का दौरा करके लाट के समान पत्थर खोज लाएगा, तो सभापति का खोया हुआ स्वाभिमान और गर्व पुनः लौट आया। उन्होंने बड़े गर्व और नवाबी ठसक के साथ एक भाषण दिया - "ऐसी कौन-सी चीज़ है जो हमारे प्यारे हिंदुस्तान में नहीं मिलती? हर मूल्यवान चीज़ इस देश के गर्भ में छिपी हुई है, बस आवश्यकता उसे सच्चे मन से खोजने की है। खोजने के लिए हमें कड़ी मेहनत करनी होगी, और इस मेहनत का फल हमें अवश्य मिलेगा, जिससे आने वाला ज़माना बहुत खुशहाल होगा।" सभापति का यही छोटा सा ओजस्वी भाषण अगले दिन के समाचार पत्रों में प्रमुखता से छप गया।
In simple words: सभापति ने गर्व से कहा कि भारत में सब कुछ मिलता है, बस हमें मेहनत से खोजना होगा और आने वाला समय बहुत खुशहाल होगा। उनका यही भाषण अखबारों में छप गया।
Exam Tip: सभापति के भाषण के मुख्य अंश ("ऐसी कौन-सी चीज़ है जो हिंदुस्तान में नहीं मिलती...", "मेहनत का फल मिलेगा") को उद्धृत करते हुए उत्तर लिखें।
प्रश्न 11. मूर्तिकार के पत्थर ढूँढ़ने के असफल प्रयास पर सभापति ने मूर्तिकार से क्या टिप्पणी की?
Answer: जब मूर्तिकार पूरे भारत के पर्वतीय क्षेत्रों और खदानों का चप्पा-चप्पा छानने के बाद निराश होकर लौटा और उसने बताया कि "यह पत्थर भारत में कहीं नहीं मिला, क्योंकि यह पत्थर पूर्णतः विदेशी है," तो सभापति अत्यंत क्रोधित और तैश में आ गए। उन्होंने मूर्तिकार पर बरसते हुए टिप्पणी की - "लानत है आपकी अक्ल पर! जब हमने विदेशों की पूरी संस्कृति, उनकी जीवन शैली - उनका रहन-सहन, तौर-तरीके और यहाँ तक कि उनका दिल-दिमाग - तक को पूरी तरह अपना लिया है, और जब भारत में उनका वेस्टर्न डांस (बाल डांस) तक मिल जाता है, तो फिर एक मामूली सा विदेशी पत्थर क्यों नहीं मिल सकता?" सभापति का यह कथन पाश्चात्य संस्कृति के प्रति उनकी अंधी नकल की मानसिकता को दर्शाता है।
In simple words: मूर्तिकार द्वारा पत्थर को विदेशी बताने पर सभापति ने गुस्सा होकर कहा कि जब हमने विदेशों की पूरी संस्कृति, दिल-दिमाग और उनका रहन-सहन अपना लिया है, तो एक पत्थर क्यों नहीं मिल सकता।
Exam Tip: सभापति की टिप्पणी "लानत है आपकी अक्ल पर..." और 'पाश्चात्य संस्कृति की अंधी नकल' पर लेखक के व्यंग्य को उत्तर में स्पष्ट करें।
प्रश्न 12. “यह बात अखबार वालों तक न पहुँचे” - इस शर्त पर मूर्तिकार ने क्या कहा और इस पर सभापति की क्या प्रतिक्रिया हुई?
Answer: जब पत्थर न मिलने से सभी अधिकारी हताश हो गए, तो मूर्तिकार ने बंद कमरे में अपनी गुप्त योजना रखने से पहले यह कड़ी शर्त रखी कि "यह बात किसी भी स्थिति में अखबार वालों तक नहीं पहुँचनी चाहिए।" सभापति द्वारा हामी भरने और चपरासी से कमरे के सभी दरवाज़े बंद करवा देने के बाद, मूर्तिकार ने कहा - "हमारे देश में हमारे पूजनीय राष्ट्रीय नेताओं की भी कई मूर्तियाँ स्थापित हैं। यदि आप लोग उचित और आवश्यक समझें, तो जिस नेता की नाक जॉर्ज पंचम की लाट पर पूरी तरह फिट बैठ जाए, उसे वहाँ से उतारकर इस लाट पर लगा दिया जाए।"
मूर्तिकार की इस आपत्तिजनक योजना को सुनकर सभापति के चेहरे पर छाई उदासी दूर हो गई और उन्होंने अपनी सहमति देते हुए दबी आवाज़ में कहा - "लेकिन जो भी करना, बड़ी होशियारी से करना।"
In simple words: मूर्तिकार ने गुप्त कमरे में शर्त रखकर कहा कि यदि इजाज़त हो तो हमारे देश के नेताओं की मूर्तियों में से जिसकी नाक फिट बैठे, उसे निकालकर लाट पर लगा दें। सभापति ने खुश होकर कहा कि जो भी करो, होशियारी से करो।
Exam Tip: बंद कमरे की गोपनीयता, मूर्तिकार का राष्ट्रीय नेताओं की मूर्तियों की नाक उतारने का प्रस्ताव, और सभापति का 'बड़ी होशियारी से' करने का निर्देश - इन तीनों कड़ियों को जोड़कर उत्तर पूरा करें।
प्रश्न 13. अंत में कानाफूसी कर मूर्तिकार को सभापति द्वारा किस बात के लिए इजाज़त दे दी गई?
Answer: जब मूर्तिकार की राष्ट्रीय नेताओं और शहीद बच्चों की मूर्तियों की नाकों को नापने की योजना भी असफल हो गई, क्योंकि हमारे देश के शहीदों और बच्चों का सम्मान (नाक) भी जॉर्ज पंचम से कहीं बड़ा था, तो महारानी के आने के भय से घबराकर मूर्तिकार ने अंतिम और सबसे क्रूर योजना रखी। उसने बंद कमरे में दबी आवाज़ में कहा - "चूँकि नाक लगना एकदम अनिवार्य है, इसलिए मेरी राय है कि देश की चालीस करोड़ की आबादी में से किसी भी एक जीवित व्यक्ति की असली नाक काटकर इस लाट पर लगा दी जानी चाहिए।"
मूर्तिकार के इस अमानवीय प्रस्ताव को सुनकर पहले तो कमरे में सन्नाटा छा गया। फिर, अपनी लाज बचाने की हताशा में डूबे अधिकारियों और सभापति ने आपस में कानाफूसी की और अंततः मूर्तिकार को देश के किसी भी जीवित नागरिक की नाक काटने की क्रूर इजाज़त दे दी।
In simple words: जब कोई मूर्ति फिट नहीं बैठी, तो मूर्तिकार ने देश के चालीस करोड़ लोगों में से किसी एक जीवित व्यक्ति की असली नाक काटकर लगाने का प्रस्ताव रखा, जिसकी इजाज़त अधिकारियों ने कानाफूसी करके दे दी।
Exam Tip: अंतिम निर्णय के रूप में 'चालीस करोड़ में से किसी एक जीवित व्यक्ति की असली नाक लगाने' के क्रूर और अमानवीय फैसले का उल्लेख करें।
प्रश्न 14. सभापति द्वारा मूर्तिकार को ज़िंदा नाक लगाने की इजाज़त दिए जाने पर अखबार वालों ने अखबार में क्या छापा?
Answer: जब सरकारी हुक्मरानों ने अपनी इज्जत बचाने के लिए देश के एक जीवित नागरिक की नाक काटने की क्रूर अनुमति दे दी, तो इस शर्मनाक सच को छिपाने के लिए अखबारों में केवल एक संक्षिप्त और गोलमोल खबर छापी गई। समाचार पत्रों में केवल इतना ही छापा गया - "जॉर्ज पंचम की लाट की नाक का मसला पूरी तरह हल हो गया है। राजपथ पर इंडिया गेट के सामने लगी जॉर्ज पंचम की लाट पर नाक लगाई जा रही है।" इसके अतिरिक्त अखबारों में जीवित नाक लगाने की अमानवीय सच्चाई का कोई भी विवरण नहीं दिया गया।
In simple words: अखबारों में केवल इतना ही छापा गया कि जॉर्ज पंचम की लाट की नाक का मामला हल हो गया है और इंडिया गेट के सामने वाली लाट पर नाक लगाई जा रही है।
Exam Tip: अखबारों में छपी संक्षिप्त और गोलमोल खबर ("नाक का मसला हल हो गया है...") को उत्तर में उद्धृत करें।
प्रश्न 15. अखबार वाले सरकारी तंत्र की इच्छा के अनुकूल भी लिखते हैं और ऐसे कार्यों को छापने से बचते भी हैं जो उनको नहीं करना चाहिए? स्पष्ट कीजिए।
Answer: 'जॉर्ज पंचम की नाक' कहानी के माध्यम से लेखक ने समाचार पत्रों और मीडिया की स्वतंत्रता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाया है। अखबार वाले प्रायः सरकारी तंत्र की इच्छा और उनकी आवभगत की खबरों को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर और रंगीन बनाकर प्रस्तुत करते हैं, जैसे रानी एलिजाबेथ के दर्जी और उनके पालतू कुत्तों की जीवनियाँ छापना। परंतु, जब सरकार कोई अमानवीय या शर्मनाक काम करती है (जैसे जॉर्ज पंचम की लाट पर देश के एक जीवित नागरिक की नाक लगाना), तो अखबार वाले इस कड़वी सच्चाई को छापने से बचते हैं। वे जनता के सामने इस क्रूरता को छिपाने के लिए केवल "नाक का मसला हल हो गया है" जैसी गोलमोल खबरें छापते हैं। यह दर्शाता है कि मीडिया स्वतंत्र होने के बजाय कई बार शासकीय दबाव और स्वार्थ के वशीभूत होकर काम करता है।
In simple words: अखबार वाले सरकार की तारीफ की छोटी खबरों को भी बहुत बड़ा करके छापते हैं, परंतु जब सरकार कोई शर्मनाक काम (जैसे जीवित व्यक्ति की नाक काटना) करती है, तो वे उस कड़वी सच्चाई को छिपाने के लिए केवल गोलमोल खबरें छापते हैं।
Exam Tip: मीडिया की 'सरकारी चाटुकारिता' (रानी के कुत्तों की खबरें छापना) और उनकी 'कायरता' (जीवित व्यक्ति की नाक काटने के सच को दबाना) के विरोधाभास को स्पष्ट करें।
प्रश्न 16. जॉर्ज पंचम की लाट पर ज़िंदा नाक लगने के दिन समारोह न होने के क्या कारण रहे होंगे?
Answer: जॉर्ज पंचम की लाट पर जीवित मनुष्य की असली नाक लगाए जाने के दिन राजधानी दिल्ली में कोई भी राजकीय समारोह या खुशी का आयोजन न होने के निम्नलिखित प्रमुख कारण थे:
(i) **राष्ट्रीय लज्जा और अपराध बोध:** सरकारी अधिकारी और शासक वर्ग भीतर ही भीतर इस बात से अत्यंत लज्जित और शर्मिंदा थे कि उन्होंने एक मृत विदेशी शासक के सम्मान की खातिर अपने ही देश के एक निर्दोष जीवित नागरिक की इज्जत (नाक) काट दी थी। [46]
(ii) **जनता के आक्रोश का भय:** अधिकारियों को यह डर सता रहा था कि यदि जनता को यह पता चल गया कि मूर्ति पर एक जीवित भारतीय की असली नाक लगाई गई है, तो पूरे देश में भयंकर जन-आक्रोश और विद्रोह भड़क उठेगा। [46]
(iii) **अखबारों का मौन विरोध:** समाचार पत्रों के संपादकों ने इस अमानवीय कृत्य के प्रति अपना गहरा मौन विरोध दर्ज कराया था, जिसके कारण उन्होंने उस दिन किसी भी उत्सव, भाषण या चित्र को छापने से पूरी तरह परहेज किया। [46]
In simple words: उस दिन कोई समारोह नहीं हुआ क्योंकि सरकार अंदर ही अंदर इस अमानवीय काम से बहुत शर्मिंदा थी और उसे जनता के गुस्से का डर था, साथ ही अखबारों ने भी इस घटना का मौन विरोध किया था। [46]
Exam Tip: उत्तर में मुख्य रूप से 'अपराध बोध और लज्जा की भावना' तथा 'जन-आक्रोश और अखबारों के मौन विरोध के भय' को समारोह न होने का कारण बताएं।
प्रश्न 17. क्या सचमुच अखबार वालों के पास कुछ भी छापने के लिए नहीं था या और कोई कारण रहा होगा? अपने विचार लिखें।
Answer: हमारे विचार से, उस दिन देश के सभी अखबारों के पूरी तरह खाली रहने का कारण यह बिल्कुल नहीं था कि देश में कोई गतिविधि या घटना नहीं हुई थी। इसके पीछे मुख्य रूप से **अखबारों का गहरा नैतिक और मूक विरोध** काम कर रहा था। समाचार पत्र के संपादक और पत्रकार इस बात से अत्यंत दुखी, लज्जित और आक्रोशित थे कि हमारे स्वतंत्र देश की सरकार ने एक औपनिवेशिक शासक की निर्जीव मूर्ति के लिए देश के एक जीवित नागरिक के स्वाभिमान को कुचल दिया। वे इस अमानवीय कृत्य का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे। वे सरकार की इस चाटुकारिता और कायरतापूर्ण फैसले की खुलेआम आलोचना तो नहीं कर सके, परंतु उन्होंने उस दिन किसी भी उत्सव, भाषण या चित्र को न छापकर अपना मौन विरोध दर्ज कराया। यह खाली पन्ने उनके गहरे शोक और प्रतिरोध का प्रतीक थे।
In simple words: अखबारों के खाली रहने का कारण उनका मूक विरोध था। वे सरकार द्वारा एक जीवित भारतीय की नाक काटे जाने के इस शर्मनाक कृत्य से बहुत दुखी और नाराज़ थे, इसलिए उन्होंने कोई भी खबर न छापकर अपना विरोध जताया।
Exam Tip: समाचार पत्रों के खाली रहने को 'मौन विरोध' (Silent Protest) और 'राष्ट्रीय शोक व आत्मग्लानि' के प्रतीक के रूप में स्पष्ट करें।
प्रश्न 18. विदेशी सभ्यता के प्रति बढ़ती हुई रुचि को देखकर लेखक ने किस तरह व्यंग्य किया है?
Answer: लेखक ने भारतीय समाज में पाश्चात्य सभ्यता (विदेशी रहन-सहन) की अंधी नकल करने की बढ़ती हुई होड़ पर अत्यंत तीखा व्यंग्य किया है। जब मूर्तिकार लाट के पत्थर को विदेशी बताता है, तो सभापति अत्यंत झुँझलाते हुए कहते हैं कि "जब हमने विदेशों की पूरी संस्कृति - उनका दिल-दिमाग, उनकी सोचने की शैली, उनके तौर-तरीके और उनका रहन-सहन - सब कुछ पूरी तरह से अपना लिया है, यहाँ तक कि भारत में उनका विदेशी वेस्टर्न डांस (बाल डांस) भी मिल जाता है, तो फिर एक मामूली सा विदेशी पत्थर क्यों नहीं मिल सकता?" इस प्रसंग के माध्यम से लेखक ने दर्शाया है कि आधुनिक भारतीय अपनी मौलिक पहचान और आत्मसम्मान खोकर मानसिक रूप से अब भी अंग्रेजों के गुलाम बने हुए हैं।
In simple words: लेखक ने व्यंग्य किया है कि जब हमने अंग्रेजों का रहन-सहन, उनका दिल-दिमाग और उनका पाश्चात्य डांस (बाल डांस) तक अपना लिया है, तो फिर एक मामूली विदेशी पत्थर ढूँढ़ना कौन सी बड़ी बात है।
Exam Tip: सभापति के इस कथन "जब हिंदुस्तान में बाल डांस तक मिल जाता है..." को उद्धृत करते हुए पाश्चात्य संस्कृति की अंधी नकल पर लेखक के व्यंग्य को स्पष्ट करें।
प्रश्न 19. मूर्तिकार को समय की परख है। वह हाथ में आए अवसर और हुक्कामों की विवशता का खूब लाभ उठाता है। किसी प्रकार भी इस अवसर को हाथ से निकलने नहीं देता है, कैसे?
Answer: मूर्तिकार अत्यंत चतुर, व्यावहारिक, वाकपटु और स्वार्थी व्यक्ति है। वह जानता है कि सरकारी अधिकारी जॉर्ज पंचम की लाट की नाक को लेकर कितने घबराए हुए और लाचार हैं। वह उनकी इसी विवशता का भरपूर फायदा उठाता है:
- वह पहले उन्हें विदेशी पत्थर खोजने के बहाने सरकारी पैसे पर पूरे भारत के पहाड़ी क्षेत्रों की सैर करता है।
- जब वह असफल होता है, तो वह अपनी नई चालाकी से देश के महान नेताओं और शहीद बच्चों की मूर्तियों की नाप लेने के नाम पर पुनः पूरे देश की यात्रा करता है और सरकारी धन का उपयोग करता है।
- अंत में, जब कोई भी रास्ता शेष नहीं बचता, तो वह जीवित नागरिक की नाक लगाने की अमानवीय योजना रखकर अधिकारियों को अपने जाल में फंसा लेता है। वह अपने आर्थिक लाभ और अवसर को भुनाने के लिए देश के आत्मसम्मान और मानवीय मूल्यों से खिलवाड़ करने से भी पीछे नहीं हटता।
In simple words: मूर्तिकार बहुत चालाक है। वह अधिकारियों के डर का फायदा उठाकर सरकारी पैसे से पूरे देश की यात्रा करता है और अंत में पैसे कमाने के लिए जीवित व्यक्ति की नाक काटने का अमानवीय सुझाव देकर काम पूरा करवा लेता है।
Exam Tip: मूर्तिकार की चतुर वाकपटुता, सरकारी पैसे का दुरुपयोग करके देश भ्रमण करने और अंत में जीवित नाक लगाने के स्वार्थी इरादों का चित्रण करें।
प्रश्न 20. जॉर्ज पंचम की मूर्ति का पत्थर विदेशी है - यह जानकर सभापति ने जो उद्गार व्यक्त किए उससे क्या स्पष्ट होता है?
Answer: जब सभापति को पता चला कि जॉर्ज पंचम की मूर्ति का पत्थर पूरी तरह से विदेशी है और भारत की किसी भी खदान में उपलब्ध नहीं है, तो वे अत्यधिक क्रोधित हो गए। उनके मुख से जो उद्गार निकले, उससे निम्नलिखित बातें स्पष्ट होती हैं:
- यह दर्शाता है कि हमारे देश के शासक वर्ग के भीतर आज भी ब्रिटिश हुकूमत और विदेशी वस्तुओं के प्रति एक अंधी श्रद्धा और मानसिक गुलामी बनी हुई है।
- वे अपनी ऐतिहासिक धरोहरों और देश के गौरव से अधिक एक विदेशी तानाशाह की निर्जीव लाट को महत्व देते हैं।
- यह उनकी कमज़ोर निर्णय क्षमता और अकर्मण्यता को भी प्रकट करता है, जो अपनी समस्या के लिए आत्मनिर्भर बनने के बजाय विदेशों पर निर्भर रहना अधिक पसंद करते हैं।
In simple words: इससे स्पष्ट होता है कि हमारे अधिकारियों के मन में आज भी अंग्रेज़ों के प्रति गुलामी की सोच बनी हुई है और वे देश के सम्मान से ज़्यादा एक विदेशी लाट की नाक को महत्व देते हैं।
Exam Tip: सभापति के क्रोध और उनके उद्गारों के माध्यम से देश के शासक वर्ग की 'मानसिक परतंत्रता' और 'हीन भावना' को उजागर करें।
प्रश्न 21. सरकारी दफ्तरों के क्लर्कों में उत्तरदायित्व का अभाव दिखाई देता है। कैसे?
Answer: 'जॉर्ज पंचम की नाक' पाठ में सरकारी दफ्तरों की अकर्मण्यता, लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना कार्यप्रणाली पर गहरा कटाक्ष किया गया है:
- जब मूर्तिकार ने लाट के पत्थर और उसके बनने के समय का ब्यौरा माँगा, तो अधिकारी एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे, मानो वे इस कार्य की ज़िम्मेदारी एक-दूसरे पर थोपना चाहते हों।
- पुरातत्व विभाग के क्लर्क ने फाइलों की जाँच तो की, परंतु उसकी घोर लापरवाही के कारण फाइलें पहले ही नष्ट (हज़म) हो चुकी थीं और उसमें कोई रिकॉर्ड नहीं था।
- क्लर्क का यह कहना कि "फाइलें सब कुछ हज़म कर चुकी हैं" और अधिकारियों का उस पर कोई कड़ी कार्रवाई न करना यह सिद्ध करता है कि सरकारी कार्यालयों में उत्तरदायित्व, कर्तव्यनिष्ठा और कार्यों के रख-रखाव का घोर अभाव है, जहाँ हर कोई अपनी ज़िम्मेदारी से बचना चाहता है।
In simple words: सरकारी दफ्तरों में कोई भी कर्मचारी अपनी ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहता। फाइलों के नष्ट होने और क्लर्क के गैर-जिम्मेदाराना जवाब से स्पष्ट है कि वहाँ काम के प्रति घोर लापरवाही है।
Exam Tip: उत्तर में क्लर्क के कथन "फाइलें सब कुछ हज़म कर चुकी हैं" और अधिकारियों द्वारा एक-दूसरे पर ज़िम्मेदारी टालने (ठीकरा फोड़ने) की प्रवृत्ति का उल्लेख करें।
प्रश्न 22. ‘जॉर्ज पंचम की नाक’ पाठ के आधार पर उन नकारात्मक मूल्यों का उल्लेख कीजिए, जिनके कारण आपाधापी की स्थिति उत्पन्न हो गई थी।
Answer: जॉर्ज पंचम की टूटी हुई नाक को दोबारा जोड़ने के लिए सरकारी महकमों में जो भगदड़ और आपाधापी मची थी, उसके पीछे निम्नलिखित नकारात्मक सामाजिक और नैतिक मूल्य मुख्य रूप से ज़िम्मेदार थे:
(i) **गुलामी की मानसिक दासता:** देश के स्वतंत्र होने के इतने वर्षों बाद भी हमारे अधिकारियों के भीतर अंग्रेजों के प्रति जो चाटुकारिता और मानसिक गुलामी की हीन भावना थी, वही इस आपाधापी का मुख्य कारण थी। [47]
(ii) **कमज़ोर निर्णय क्षमता और कायरता:** प्रशासनिक अधिकारियों में त्वरित और सही निर्णय लेने के साहस का घोर अभाव था, जिसके कारण वे एक छोटी सी समस्या पर भी बदहवास हो रहे थे। [47]
(iii) **गैर-जिम्मेदाराना आचरण:** सरकारी दफ्तरों और क्लर्कों की लापरवाही के कारण महत्वपूर्ण फाइलों और रिकॉर्ड का नष्ट हो जाना। [47]
(iv) **शहीदों और देशवासियों का अनादर:** एक विदेशी शासक की नाक बचाने के लिए देश के महान क्रांतिकारियों, शहीदों और यहाँ तक कि जीवित भारतीय नागरिकों के स्वाभिमान को ताक पर रख देना सबसे घृणित और नकारात्मक मूल्य था। [47]
In simple words: इस आपाधापी के पीछे अँग्रेजों के प्रति गुलामी की सोच, अधिकारियों की कमज़ोर निर्णय शक्ति, काम के प्रति लापरवाही, और देश के वीर शहीदों व जीवित नागरिकों का अपमान करने वाले नकारात्मक विचार ज़िम्मेदार थे। [47]
Exam Tip: इन चारों नकारात्मक मूल्यों (मानसिक गुलामी, निर्णय क्षमता की कमी, गैर-जिम्मेदाराना रवैया, और देशभक्तों का अनादर) को परीक्षा में अलग-अलग बिंदुओं में स्पष्टता से लिखें।
प्रश्न 23. देश को मिली आज़ादी में देशभक्तों एवं शहीदों का सर्वाधिक योगदान है। ‘जॉर्ज पंचम की नाक’ पाठ के आधार पर बताइए कि लेखक ने उनका उल्लेख किन गुणों के कारण किया है?
Answer: 'जॉर्ज पंचम की नाक' पाठ में लेखक कमलेश्वर ने देश के महान देशभक्तों और वीर शहीदों का उल्लेख निम्नलिखित अनूठे और गौरवमयी गुणों के कारण किया है:
(i) **प्रचंड देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम:** हमारे शहीदों और नेताओं के भीतर मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम और निस्वार्थ सेवा भाव कूट-कूट कर भरा था। [47]
(ii) **सर्वोच्च स्वाभिमान की समझ:** हमारे क्रांतिकारियों ने देश की मान-प्रतिष्ठा और आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, परंतु कभी किसी विदेशी सत्ता के सामने अपना सिर (नाक) नहीं झुकाया। [47]
(iii) **त्याग और बलिदान की भावना:** भारत छोड़ो आंदोलन में शहीद हुए नन्हें बच्चों का निस्वार्थ बलिदान यह सिद्ध करता है कि देश की आज़ादी के लिए उन्होंने हँसते-हँसते अपनी जान दे दी। [47]
(iv) **अतुलनीय गरिमा:** उनका सम्मान (नाक) जॉर्ज पंचम जैसे किसी भी औपनिवेशिक क्रूर शासक से कहीं अधिक ऊँचा और अमूल्य था। [47]
In simple words: लेखक ने देश के वीरों का उल्लेख उनकी सच्ची देशभक्ति, असीम स्वाभिमान, देश के लिए प्राणों का बलिदान देने की भावना और जॉर्ज पंचम से कहीं ऊँचे उनके मान-सम्मान के कारण किया है। [47]
Exam Tip: उत्तर में देशभक्तों के 'स्वाभिमान', 'बलिदान' और 'जॉर्ज पंचम से कहीं बड़ी उनकी नाक' (उच्च सम्मान) के साहित्यिक प्रतीकों का उल्लेख करें।
प्रश्न 24. ‘जॉर्ज पंचम की नाक’ पाठ के आधार पर बताइए कि आप किन-किन गुणों को अपनाना चाहेंगे?
Answer: 'जॉर्ज पंचम की नाक' पाठ के अध्ययन से मिलने वाली सीख के आधार पर मैं अपने जीवन में निम्नलिखित सकारात्मक मानवीय और राष्ट्रीय गुणों को अपनाना चाहूँगा:
(i) **शहीदों और देशभक्तों के प्रति सच्चा आदर:** मैं अपने देश के महान क्रांतिकारियों और शहीदों के प्रति हमेशा कृतज्ञता और गहरे आदर का भाव रखूँगा, क्योंकि उनके अमूल्य बलिदान से ही हमें यह आज़ादी मिली है। [47]
(ii) **राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा:** मैं सदैव अपने देश के मान-सम्मान, तिरंगे और यहाँ की गौरवमयी संस्कृति के प्रति सजग रहूँगा और किसी भी परिस्थिति में अपने देश के आत्मसम्मान को झुकने नहीं दूँगा। [47]
(iii) **मानसिक गुलामी का सर्वथा त्याग:** मैं विदेशी सभ्यताओं की अंधी नकल करने की हीन मानसिकता का त्याग करूँगा और स्वदेशी वस्तुओं व अपनी भाषा का हमेशा आदर करूँगा। [47]
(iv) **दृढ़ निर्णय क्षमता और ईमानदारी:** मैं अपने कार्यों में टालमटोल की आदत छोड़कर पूरी ईमानदारी, जिम्मेदारी और साहस के साथ सही निर्णय लेने के गुणों को अपनाऊँगा। [47]
In simple words: मैं देश के शहीदों का आदर करना, अपनी मातृभूमि के स्वाभिमान की रक्षा करना, विदेशी सभ्यता के पीछे भागने की गुलामी की सोच का त्याग करना, और पूरी ईमानदारी से निर्णय लेने के गुणों को अपनाना चाहूँगा। [47]
Exam Tip: अपने उत्तर में वैयक्तिक नैतिक गुण (ईमानदारी, निर्णय क्षमता) और राष्ट्रीय गुण (देशभक्ति, शहीदों का सम्मान, मानसिक स्वतंत्रता) दोनों का सुंदर मिश्रण करें।
प्रश्न 25. लानत है आपकी अकल पर! विदेशों की सारी चीज़ें हम अपना चुके हैं- दिल-दिमाग, तौर-तरीके और रहन-सहन। सभापति की यह स्वीकारोक्ति हमारी संस्कृति के लिए कितनी हानिकारक है? जीवन-मूल्यों को ध्यान में रखकर स्पष्ट कीजिए।
Answer: सभापति की यह स्वीकारोक्ति हमारी महान भारतीय संस्कृति और जीवन-मूल्यों के लिए अत्यंत हानिकारक और चिंताजनक स्थिति को दर्शाती है। इसका विश्लेषण निम्नलिखित जीवन-मूल्यों के आधार पर किया जा सकता है:
- **सांस्कृतिक और वैचारिक पतन:** जब हम बिना सोचे-समझे पाश्चात्य सभ्यता की अंधी नकल करते हैं - उनका पहनावा, खान-पान, और सोचने का तरीका (दिल-दिमाग) अपना लेते हैं - तो हम अपनी हज़ारों वर्ष पुरानी अनूठी सांस्कृतिक पहचान खो बैठते हैं। [48]
- **मूल्यों का ह्रास:** भारतीय संस्कृति का मूल आधार परोपकार, त्याग, सादगी, संतोष और वसुधैव कुटुंबकम् की पवित्र भावना है। इसके विपरीत, पाश्चात्य सभ्यता मुख्य रूप से अत्यधिक भौतिकतावाद, घोर स्वार्थ, उपभोगवाद और आत्मकेंद्रित होने को बढ़ावा देती है। इसे अपनाने से समाज में आपसी आत्मीयता, संवेदना और भाईचारे के मानवीय मूल्य समाप्त होने लगते हैं और मनुष्य स्वार्थी बन जाता है। [48]
In simple words: सभापति की यह बात हमारे सांस्कृतिक पतन को दिखाती है। विदेशी संस्कृति की अंधी नकल करने से हम अपनी सादगी, परोपकार और भाईचारे जैसे अच्छे भारतीय जीवन-मूल्यों को खोकर स्वार्थी और बनावटी बनते जा रहे हैं। [48]
Exam Tip: उत्तर में पाश्चात्य सभ्यता के 'उपभोगवाद व भौतिकता' की तुलना भारतीय संस्कृति के 'त्याग, परोपकार और नैतिक मूल्यों' से करते हुए इसके नुकसान को स्पष्ट करें।
प्रश्न 26. ‘फाइलें सब कुछ हज़म कर चुकी हैं’ - यह कथन कार्यालयों की मौजूदा व्यवस्था पर चोट करने वाला है। इसके आलोक में बताइए कि क्लर्कों में किन-किन मूल्यों का अभाव दिखाई देता है?
Answer: "फाइलें सब कुछ हज़म कर चुकी हैं" का अर्थ है कि सरकारी दफ्तरों के गैर-जिम्मेदाराना रवैये के कारण महत्वपूर्ण सरकारी रिकॉर्ड और फाइलें पहले ही नष्ट हो चुकी हैं। यह कथन हमारी शासकीय कार्यप्रणाली की निम्नलिखित कमियों और क्लर्कों में नैतिक मूल्यों के अभाव को उजागर करता है:
- **उत्तरदायित्व और ज़िम्मेदारी का घोर अभाव:** सरकारी कर्मचारियों में अपने कर्तव्यों और कार्यों के प्रति जवाबदेही का भारी अभाव दिखाई देता है, जहाँ वे अपनी भूल को केवल फाइलों के माथे मढ़कर बचना चाहते हैं। [48]
- **कार्य के प्रति घोर लापरवाही और उदासीनता:** सरकारी दस्तावेजों और देश के ऐतिहासिक रिकॉर्डों को सँभालने के प्रति उदासीन रवैया रखना। [48]
- **पारदर्शिता और देश-प्रेम की कमी:** अपने काम को केवल नौकरी समझकर करना, उसमें देश की साख या कार्य के प्रति कोई निष्ठा या लगाव न होना तथा आपसी सहयोग की भावना का पूरी तरह शून्य होना। [48]
In simple words: यह कथन सरकारी दफ्तरों की लापरवाही को दिखाता है। इससे स्पष्ट होता है कि क्लर्कों में अपनी ज़िम्मेदारी निभाने की कमी, काम के प्रति लापरवाही, और देश के प्रति कर्तव्यनिष्ठा की भारी कमी है। [48]
Exam Tip: क्लर्कों की 'लापरवाही', 'ज़िम्मेदारी टालने की आदत', और 'कर्तव्यनिष्ठा के अभाव' को मुख्य बिंदुओं के रूप में लिखें।
प्रश्न 27. ‘जॉर्ज पंचम की नाक’ पाठ के माध्यम से लेखक ने विदेशी सभ्यता के प्रति बढ़ती हुई रुचि को देखकर क्या व्यंग्य किया है?
Answer: लेखक कमलेश्वर ने भारतीय समाज में पाश्चात्य सभ्यता (विदेशी रहन-सहन) के प्रति बढ़ती हुई अंधी दीवानगी पर अत्यंत तीखा व्यंग्य किया है। जब मूर्तिकार कहता है कि जॉर्ज पंचम की लाट का पत्थर विदेशी है, तो सभापति अत्यंत झुँझलाते हुए तर्क देते हैं कि जब हमारे देश के लोगों ने विदेशों की पूरी जीवन शैली - उनका रहन-सहन, सोचने का तरीका, और दिल-दिमाग - तक को सहर्ष अपना लिया है, और जब यहाँ उनका वेस्टर्न डांस (बाल डांस) तक आसानी से मिल जाता है, तो फिर एक मामूली सा विदेशी पत्थर मिलना कौन सी बड़ी बात है। इसके माध्यम से लेखक ने यह व्यंग्य किया है कि शारीरिक रूप से स्वतंत्र होने के बाद भी भारत का संभ्रांत वर्ग मानसिक रूप से अब भी अँग्रेजों का गुलाम बना हुआ है और अपनी मौलिकता खो चुका है। [48]
In simple words: लेखक ने व्यंग्य किया है कि जब हमारे देश के लोगों ने विदेशों का पूरा रहन-सहन, दिल-दिमाग और उनका वेस्टर्न डांस तक अपना लिया है, तो फिर एक मामूली पत्थर के लिए इतनी हताशा क्यों। यह हमारी मानसिक गुलामी पर तीखा कटाक्ष है। [48]
Exam Tip: उत्तर में सभापति के झुँझलाहट भरे कथन ("जब हिंदुस्तान में बाल डांस तक मिल जाता है...") का उल्लेख करते हुए पाश्चात्य सभ्यता की अंधी नकल पर लेखक के व्यंग्य को स्पष्ट करें।
प्रश्न 28. जॉर्ज पंचम की लाट पर किसी भी भारतीय नेता यहाँ तक की भारतीय बच्चे की नाक फिट न होने की बात से लेखक किस ओर संकेत करता है? आप इस बारे में क्या सोचते हैं?
Answer: जॉर्ज पंचम की लाट की नाक का माप हमारे देश के किसी भी महान क्रांतिकारी, देशभक्त नेता और यहाँ तक कि सन् १९४२ के आंदोलन में शहीद हुए छोटे से बच्चे की नाक से भी छोटा होना एक अत्यंत गहरा प्रतीकात्मक व्यंग्य है:
- **संकेत:** लेखक यह स्पष्ट संकेत देना चाहते हैं कि हमारे स्वतंत्र भारत के वीर शहीदों, देशभक्तों और नन्हें बच्चों का सम्मान (नाक) और उनकी प्रतिष्ठा, उस अत्याचारी विदेशी शासक जॉर्ज पंचम के झूठे सम्मान और रईसी से हज़ारों गुना अधिक ऊँची और अनमोल है। जॉर्ज पंचम का स्थान हमारे देश के वीरों के सामने बिल्कुल नगण्य (शून्य) है। [48]
- **हमारा मत:** हम लेखक के इस विचार से पूरी तरह सहमत हैं। हमारे देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीदों का आत्मसम्मान ही हमारे राष्ट्र की वास्तविक नाक है, जिसे किसी भी विदेशी शासक के सम्मान के लिए कभी भी नीचा नहीं किया जा सकता। [48]
In simple words: इसका अर्थ यह है कि हमारे देश के वीर शहीदों, नेताओं और यहाँ तक कि शहीद बच्चों का सम्मान (नाक) जॉर्ज पंचम के सम्मान से बहुत बड़ा है। जॉर्ज पंचम की औकात हमारे देश के देशभक्तों के सामने कुछ भी नहीं है। [48]
Exam Tip: 'नाक का बड़ा होना' यहाँ सम्मान और प्रतिष्ठा के ऊँचे होने का प्रतीक है, इसे उत्तर में स्पष्ट रूप से समझाएं।
अभ्यास प्रश्न पत्र
1. निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
Question 1(क). सरकारी तंत्र में जॉर्ज पंचम की नाक लगाने को लेकर जो चिंता और बदहवासी दिखाई देती है, वह किस मानसिकता को दर्शाती है? स्पष्ट कीजिए।
Answer: सरकारी तंत्र में जॉर्ज पंचम की लाट पर नाक लगाने को लेकर जो छटपटाहट, घबराहट और बदहवासी दिखाई देती है, वह हमारे देश के शासक वर्ग के भीतर सदियों से जमी हुई **मानसिक गुलामी, हीन भावना और चाटुकारिता की मानसिकता** को दर्शाती है। यद्यपि हमारा देश स्वतंत्र हो चुका था, परंतु अधिकारियों के मन में आज भी अंग्रेज़ों के प्रति एक अदृश्य डर और अंधी श्रद्धा बनी हुई थी। वे अपनी देश की जनता, शहीदों और अपने आत्मसम्मान की रक्षा करने के बजाय एक मृत विदेशी शासक की निर्जीव लाट को अधिक महत्व दे रहे थे ताकि वे आने वाली रानी एलिजाबेथ की नज़रों में अच्छे बने रह सकें। यह उनकी कायरता और रीढ़-विहीन प्रशासनिक मानसिकता का परिचायक है।
In simple words: यह बदहवासी हमारे अधिकारियों की गुलामी की सोच और चाटुकारिता को दिखाती है, जो अपनी देश की इज्जत से ज़्यादा एक विदेशी राजा की मूर्ति की नाक की चिंता कर रहे थे।
Exam Tip: उत्तर में 'मानसिक दासता' (Mental Slavery), 'चाटुकारिता' (Flattery), और 'आत्मसम्मान की कमी' जैसे मनोवैज्ञानिक बिंदुओं को सरकारी तंत्र की मानसिकता के रूप में लिखें।
Question 1(ख). जॉर्ज पंचम की लाट की नाक लगाने के क्रम में पुरातत्व विभाग की फ़ाइलों की छानबीन करने की ज़रूरत क्यों पड़ी?
Answer: जॉर्ज पंचम की लाट की टूटी हुई नाक को दोबारा ठीक करने के लिए सर्वप्रथम मूर्तिकार ने यह शर्त रखी थी कि उसे यह जानना होगा कि यह मूर्ति कब बनी थी, कहाँ बनी थी और इसके निर्माण में प्रयुक्त विशिष्ट पत्थर किस पहाड़ी खदान से लाया गया था। इसी विशिष्ट पत्थर के मूल स्रोत का इतिहास खोजने और उसके बारे में प्रामाणिक जानकारी जुटाने के उद्देश्य से ही पुरातत्व विभाग की पुरानी ऐतिहासिक फ़ाइलों की छानबीन करने की आवश्यकता पड़ी थी ताकि उस पत्थर का रासायनिक और भौगोलिक मिलान किया जा सके।
In simple words: मूर्तिकार ने लाट के पत्थर का पता लगाने के लिए उसके बनने का समय और स्थान जानना चाहा था, इसीलिए पुरातत्व विभाग की फाइलों की छानबीन करनी पड़ी।
Exam Tip: उत्तर में 'लाट के प्रयुक्त पत्थर की किस्म' और 'उसके निर्माण के इतिहास' का विवरण खोजने की आवश्यकता को मुख्य कारण बताएं।
Question 1(ग). “नई दिल्ली में सब था, सिर्फ़ नाक नहीं थी।” इस कथन के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है? स्पष्ट कीजिए।
Answer: इस अत्यंत तीखे व्यंग्यपूर्ण कथन के माध्यम से लेखक यह कहना चाहते हैं कि महारानी एलिजाबेथ के स्वागत के लिए दिल्ली में हर प्रकार की भौतिक सुख-सुविधाएं, चकाचौंध, सुंदर साफ-सुथरी सड़कें, सुरक्षा व्यवस्था और तड़क-भड़क मौजूद थी (सब था), परंतु इंडिया गेट के सामने लगी जॉर्ज पंचम की लाट की नाक गायब थी और हमारे शासकों के मन में अपने देश के प्रति कोई आत्मसम्मान, स्वाभिमान या गौरव की भावना नहीं बची थी (सिर्फ़ नाक नहीं थी)। यहाँ 'नाक' इज्जत और राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक है। लेखक दर्शाते हैं कि भौतिक रूप से सजी-धजी दिल्ली वास्तव में मानसिक रूप से पूरी तरह लाचार, हीन और स्वाभिमान-रहित थी।
In simple words: इस कथन का मतलब है कि दिल्ली में बड़ी-बड़ी इमारतें, साफ सड़कें और सजावट तो थी, परंतु हमारे देश के बड़े अधिकारियों के मन में अपने देश के लिए कोई मान-सम्मान या स्वाभिमान नहीं बचा था।
Exam Tip: 'नाक' शब्द के दोहरे अर्थ - शारीरिक अंग (लाट की नाक) और लाक्षणिक अर्थ (राष्ट्रीय स्वाभिमान व सम्मान) - को जोड़कर इस कथन की व्याख्या करें।
Question 1(घ). “जॉर्ज पंचम की नाक” कहानी का केंद्रीय भाव स्पष्ट कीजिए।
Answer: 'जॉर्ज पंचम की नाक' कहानी का केंद्रीय भाव स्वतंत्र भारत के शासक वर्ग और सरकारी तंत्र में व्याप्त **औपनिवेशिक हीनता, चाटुकारिता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के अभाव** पर तीखा कटाक्ष करना है। कमलेश्वर जी इस कहानी के माध्यम से यह दिखाना चाहते हैं कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद भी हमारी मानसिकता आज भी गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी हुई है। हम अपने वीर शहीदों और जीवित नागरिकों के मान-सम्मान की बलि देकर भी एक विदेशी आक्रांता की बेजान मूर्ति का सम्मान बचाना चाहते हैं। यह कहानी हमें अपनी हीन भावना को त्यागकर अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान, स्वतंत्रता सेनानियों और नागरिकों की गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की प्रेरणा देती है।
In simple words: इस कहानी का मुख्य भाव हमारी गुलामी की सोच और चाटुकारिता पर चोट करना है, और यह समझाना है कि हमारे देश के नागरिकों का सम्मान किसी भी विदेशी राजा से बहुत बड़ा है।
Exam Tip: उत्तर में 'मानसिक गुलामी के विरुद्ध चेतना', 'शहीदों का सर्वोच्च सम्मान', और 'सरकारी तंत्र के खोखलेपन' को कहानी के केंद्रीय भाव के रूप में लिखें।
Question 1(ङ). दिल्ली की कायापलट क्यों की जाने लगी?
Answer: दिल्ली की कायापलट इसलिए की जाने लगी क्योंकि इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय अपने पति प्रिंस फिलिप के साथ भारत के शाही दौरे पर आने वाली थीं। उनके इस ऐतिहासिक आगमन को अत्यंत भव्य और यादगार बनाने के लिए सरकारी अधिकारियों ने दिल्ली का कायाकल्प करना शुरू कर दिया। बरसों पुरानी जमी हुई धूल साफ की गई, सड़कों की मरम्मत करके उन्हें चमकाया गया, ऐतिहासिक इमारतों पर नया रंग-रोगन पोता गया और पूरी राजधानी को फूलों व रोशनी से किसी सुंदर दुल्हन की तरह सजाया जाने लगा ताकि महारानी को भारत की प्रगति और सुंदरता का एक भव्य रूप दिखाई दे सके।
In simple words: इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ के भारत आगमन की खबर सुनकर उनके स्वागत-सत्कार के लिए दिल्ली की सड़कों को साफ किया गया, इमारतों को रंगा गया और पूरी राजधानी को सुंदर सजाया जाने लगा।
Exam Tip: महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के आगमन की शाही तैयारियों और 'अधिकारियों द्वारा की जा रही आवभगत' को कायापलट का मुख्य कारण बताएं।
1. सरकारी तंत्र में जॉर्ज पंचम की नाक लगाने को लेकर जो चिंता या बदहवासी दिखाई देती है वह उनकी किस मानसिकता को दर्शाती है।
उत्तर
सरकारी तंत्र में जॉर्ज पंचम की नाक लगाने को लेकर जो चिंता या बदहवासी दिखाई देती है, वह उनकी गुलाम और औपनिवेशिक मानसिकता को प्रकट करती है। सरकारी लोग उस जॉर्ज पंचम के नाम से चिंतित है जिसने न जाने कितने ही कहर ढहाए। उसके अत्याचारों को याद न कर उसके सम्मान में जुट जाते हैं। सरकारी तंत्र अपनी अयोग्यता,अदूरदर्शिता, मूर्खता और चाटुकारिता को दर्शाता है।
2. रानी एलिजाबेथ के दरज़ी की परेशानी का क्या कारण था? उसकी परेशानी को आप किस तरह तर्कसंगत ठहराएँगे?
उत्तर
रानी एलिज़ाबेथ के दरजी की परेशानी का कारण रानी की वेशभूषा थी। दरजी यह सोच कर परेशान हो रहा था की भारत-पाकिस्तान और नेपाल यात्रा के समय रानी किस अवसर पर क्या पहनेंगी।
दरजी की परेशानी तर्कसंगत थी। यह इसलिए क्योंकि रानी इस यात्रा पर अपने देश का प्रतिनिधित्व कर रहीं थी। अर्थात उनके कपड़ों का उनकी मर्यादा के अनुकूल होना जरूरी था। रानी की वेशभूषा तैयार करने में यदि उससे कोई चूक हो जाती, तो उसे रानी के क्रोध का सामना करना पड़ता।
3. 'और देखते ही देखते नयी दिल्ली का काया पलट होने लगा' - नयी दिल्ली के काया पलट के लिए क्या-क्या प्रयत्न किए गए होंगे ?
4. आज की पत्रकारिता में चर्चित हस्तियों के पहनावे और खान-पान संबंधी आदतों आदि के वर्णन का दौर चल पड़ा है -
(क) इस प्रकार की पत्रकारिता के बारे में आपके क्या विचार हैं?
उत्तर
आज की पत्रकारिता में चर्चित हस्तियों के पहनावे और खान-पान सम्बंधि आदतों आदि के वर्णन का दौर चल पड़ा है वह न केवल अनावश्यक है, बल्की समाज की उन्नति के लिए बाधक भी है। यह एक निम्न स्तर की भटकी हुई पत्रकारिता है। पत्रकारिता लोकतंत्र का वह मुख्य स्तम्भ है, जो समाज के अधिकारों के प्रहरी के रूप में समाज तथा राष्ट्र दोनों के विकास मैं महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। किन्तु इस प्रकार की पत्रकारिता जिससे सामान्य ज्ञान नहीं बढ़ता, न ही इससे आम आदमी के जीवन में कोइ लेना-देना है, समाज को सिर्फ हानि पहुँचाती है। यह व्यक्ति-विशेष की निजी जीवन में अनुचित ताक-झाँक है जो हमारी सभ्यता व संस्कृति के विपरीत है।
इस प्रकार की पत्रकारिता आम जनता विशेषकर युवा पीढ़ी पर अत्यंत नकारात्मक और हानिकारक प्रभाव डालती है। यह युवा पीढ़ी के चारों ओर चर्चित हस्तियों की जीवन-शैली का ऐसा भ्रम-जाल बुन देती है, जिसमें उलझकर युवा पीढ़ी और आम जनता अपने लक्ष्यों और कर्तव्यों से भटककर अपराध के दल-दल में फँस जाती है। राष्ट्र को सही दिशा में चलाने के लिए यह आवश्यक है कि पत्रकारिता का प्रत्येक विषय समस्त नागरिकों के हित में हो न की लोगों को पथ भ्रष्ट करने के लिए हो।
उत्तर
जॉर्ज पंचम की लाट की नाक को पुनः लगाने के लिए मूर्तिकार ने सर्वप्रथम जॉर्ज पंचम की नाक के निर्माण में प्रयुक्त पत्थर को खोजने का प्रयास किया। इसके लिए उसने देश भर में जा-जाकर खोज की, पर असफल रहा। वह पत्थर विदेशी था। उसने देश भर में घूम-घूमकर शहीद नेताओं की मूर्तियों की नाक का नाप लिया, ताकि उन मूर्तियों में से किसी की नाक को जॉर्ज पंचम की लाट पर लगाया जा सके, किंतु सभी नाकें आकार में बड़ी निकलीं। इसके पश्चात् उसने 1942 में बिहार सेक्रेटरिएट के सामने शहीद बच्चों की मूर्ती की नाक का नाप लिया, किंतु वे भी बड़ी निकलीं। अंत में उसने जिंदा नाक लगाने का निर्णय किया।
6. प्रस्तुत कहानी में जगह-जगह कुछ ऐसे कथन आए हैं जो मौजूदा व्यवस्था पर करारी चोट करते हैं। उदाहरण के लिए 'फाईलें सब कुछ हज़म कर चुकी हैं।' 'सब हुक्कामों ने एक दूसरे की तरफ़ ताका।' पाठ में आए ऐसे अन्य कथन छाँटकर लिखिए।
उत्तर
1. सभापति ने तैश में आकर कहा, "लानत है आपकी अकल पर। विदेशों की सारी चीज़ें हम अपना चुके हैं- दिल-दिमाग तौर तरीके और रहन-सहन, जब हिन्दुस्तान में बाल डांस तक मिल जाता है तो पत्थर क्यों नहीं मिल सकता?"
2. मूर्तिकार ने अपनी नई योजना पेश की "चूँकि नाक लगाना एकदम ज़रूरी है, इसलिए मेरी राय है कि चालीस करोड़ में से कोई एक ज़िदा नाक काटकर लगा दी जाए..."
3. किसी ने किसी से नहीं कहा, किसी ने किसी को नहीं देखा पर सड़के जवान हो गई, बुढ़ापे की धूल साफ़ हो गई।
7. नाक मान-सम्मान व प्रतिष्ठा का द्योतक है। यह बात पूरी व्यंग्य रचना में किस तरह उभरकर आई है? लिखिए।
उत्तर
नाक, इज्जत-प्रतिष्ठा, मान-मर्यादा और सम्मान का प्रतीक है। शायद यही कारण है कि इससे संबंधित कई मुहावरे प्रचलित हैं जैसे - नाक कटना, नाक रखना, नाक का सवाल,नाक रगड़ना आदि। इस पाठ में नाक मान सम्मान व प्रतिष्ठा का द्योतक है। यह बात लेखक ने विभिन्न बातों द्वारा व्यक्त की हैं। रानी एलिज़ाबेथ अपने पति के साथ भारत दौरे पर आ रही थीं। ऐसे मौके में जॉर्ज पंचम की नाक का न होना उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल करने जैसा था। यह लोग विदेशियों की नाक को ऊँचा करने को अपने नाक का सवाल बना लेते हैं। यहाँ तक की जॉर्ज पंचम की नाक का सम्मान भारत के महान नेताओं एवं साहसी बालकों के सम्मान से भी ऊँचा था।
8. जॉर्ज पंचम की लाट पर किसी भी भारतीय नेता, यहाँ तक कि भारतीय बच्चे की नाक फिट न होने की बात से लेखक किस ओर संकेत करना चाहता है।
उत्तर
यहाँ लेखक ने भारतीय समाज के महान नेताओं व साहसी बालकों के प्रति अपना प्रेम प्रस्तुत किया है। हमारे समाज में यह विशेष आदरणीय लोग हैं। इनका स्थान जॉर्ज पंचम से सहस्त्रों गुणा बड़ा है जॉर्ज पंचम ने भारत को कुछ नहीं दिया परन्तु इन्होनें अपने बलिदान व त्याग से भारत को एक नीवं दी उसे आज़ादी दी है। इसलिए इनकी नाक जॉर्ज पंचम की नाक से सहस्त्रों गुणा ऊँची है।
9. अखबारों ने जिंदा नाक लगने की खबर को किस तरह से प्रस्तुत किया?
उत्तर
अखबारों ने इस खबर पर खास ध्यान नहीं दिया पर उन्होनें इतना लिखा की नाक का मसला हल हो गया है और राजपथ पर इंडिया गेट के पास वाली जॉर्ज पंचम की लाट कि नाक लग गई है। इसके अतिरिक्त अखबारों में नाक के विषय को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई ना ही किसी समारोह के होने की खबर को छापा गया।
10. "नयी दिल्ली में सब था... सिर्फ़ नाक नहीं थी।" इस कथन के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?
उत्तर
इस कथन के माध्यम से लेखक कहना चाहता है कि रानी की स्वागत तथा उनकी प्रसन्नता हेतु दिल्ली में हर प्रकार की तैयारियाँ की गयी थीं। साफ़-सफाई, सजावट, सुख-सुविधा से लेकर सुरक्षा की सभी व्यवस्था की गयी थीं, किन्तु इन सबकी बावजूद भी जॉर्ज पंचम की लाट की नाक, जो संभवतः अंग्रेजों के मान-सम्मान का प्रतीक है, नहीं थी।
इसका एक अर्थ यह होता है कि भारत में अपना शासन खो चुके अंग्रेजों के प्रति लोगों के मन में अब कोई मान-सम्मान नहीं बचा था, और साथ ही इस से हमारे प्रशासन की कमज़ोर एवं त्रुटिपूर्ण व्यवस्था का भी पता चलता है।
11. जॉर्ज पंचम की नाक लगने वाली खबर के दिन अखबार चुप क्यों थे?
उत्तर
ब्रिटिश सरकार को दिखाने के लिए किसी ज़िदा इनसान कि नाक जॉर्ज पंचम की लाट कि नाक पर लगाना किसी को पसंद नहीं आया। इसके विरोध में सभी अखबार चुप रहें। यदि वे सच छापदेते तो पूरी दुनिया क्या कहती। दुनिया के लोग जब जानते कि आज़ादी के बाद भी दिल्ली में बैठे हुक़्मरान आज भी अंग्रेजों के आगे अपनी दुम हिलाते हैं।
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