Official NCERT Book for Class 8 Hindi: Chapter 08 Naye Mehman
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Chapter-wise Study Material: Chapter 08 Naye Mehman
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पाठ 8: नए मेहमान
किसायें के एक छोटे से मकान में अनेक असुविधाओं और गर्मी से परेशान घर के लोग रात में सोने की तैयारी कर रहे हैं। तभी अचानक दो ऐसे मेहमान आ जाते हैं जिन्हें घर का कोई व्यक्ति नहीं जानता है। 'मान न मान में तेरा मेहमान' वाली स्थिति हो जाती है। संकलनवश उनकी खातिरदारी में जुटा एक आधुनिक शाही मध्यवर्गीय परिवार किन परेशानियों से जूझता है, हम इसका जीवंत चित्रण उदयशंकर भट्ट के 'नए मेहमान' एकांकी में देख सकते हैं।
पात्र-परिचय
विश्वनाथ - गृहपति
नन्हेमल, बाबूलाल - अंतिथि
प्रमोद, किरण - विश्वनाथ के बच्चे
आगतुक - रेवती का भाई
रेवती - विश्वनाथ की पत्नी
स्थान
भारत का कोई बड़ा नगर
(गर्मी की ऋतु, रात के आठ बजे का समय कमरे के पूर्व की ओर दो दरवाजे। दक्षिण का द्वार बाहर आने-जाने के लिए परंचम का द्वार भीतर खुलता है। उत्तर की ओर एक मेज है, जिस पर कुछ किताबें और खबार रखे हैं। पास ही दो कुर्सियां, परिचम द्वार के पास एक पलंग बिछा है। मेज पर रखा हुआ पुराना पंखा चल रहा है, जिससे बहुत कम हवा आ रही है। कमरा बेहद गर्म है। मकान एक साधारण गृहस्थ का है। पलंग के ऊपर चार-पाँच साल का एक बच्चा सो रहा है। पंखे की हवा केवल उस बच्चे को लग रही है। फिर भी वह पसीने से तर है। इसलिए वह कभी-कभी बेचैन है। उठता है, फिर सो जाता है।
कुरता-धोती पहने एक व्यक्ति प्रवेश करता है। पसीने से उसके कपड़े तर हैं। कुरता उतार कर वह खुंटी पर रखता है और ऊपर।
शिक्षक की टिप्पणी
एकांकी को पढ़ते समय यह ध्यान दीजिए कि हर पात्र की बोली और व्यवहार उसके व्यक्तित्व को दिखाता है। विश्वनाथ कैसा आदमी है, बाबूलाल कैसा है, यह उनके संवादों में स्पष्ट नजर आता है। पात्रों को समझने से कहानी को समझना आसान हो जाता है।
टांग वेता है और हाथ के पंजे से बच्चे को हवा करता है। उसका नाम विश्वनाथ है। उम्र 45 वर्ष, गठा हुआ शरीर, गोरा रंग, मुख पर गंभीरता का चिह्न।)
विश्वनाथ - ओफ, बड़ी गर्मी है! (पंखा जोर-जोर से करने लगता है) इन बंद मकानों में रहना कितना भयंकर है! मकान है कि भट्टी!
(परिचम की ओर से एक स्त्री प्रवेश करती है)
रेवती - (अंचल से मुंह का पसीना पोंछती हुई) पता तक नहीं हिल रहा है। जैसे सांस बंद हो जाएगी सिर फटा जा रहा है। (सिर दबाती है)
विश्वनाथ - पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है और प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती। अभी चार गिलास पीकर आया हूँ, फिर भी होठ सूख रहे हैं। एक गिलास पानी और पिला दो। ठंडा तो क्या होगा!
रेवती - गर्म है। अंगन में घड़े में भी तो पानी ठंडा नहीं होता - हवा लगे तब तो ठंडा हो। जाने कब तक इस जेलखाने में सड़ना होगा!
विश्वनाथ - मकान मिलता ही नहीं आज दो साल से दिन-रात एक करके ढूंढ रहा हूँ। हाँ, पानी तो ले आओ, जरा गला ही तर कर ले।
रेवती - बरफ ले आओ पर बरफ भी कोई कहाँ तक पिए।
विश्वनाथ - बरफ! बरफ का पानी पीने से क्या फायदा? प्यास जैसी-की-तैसी, बल्कि दुगनी लगती है। आओ! लो, पंखा कर लो। बच्चे क्या ऊपर हैं?
रेवती - रहने दो, तुम्हें करो छत इतनी छोटी है कि पूरी खाँटे भी तो नहीं आती। एक खाट पर दो-दो, तीन-तीन बच्चे सोते हैं, तब भी पूरा नहीं पड़ता।
विश्वनाथ - एक यह पड़ोसी है, निर्दयी, जो खाली छत पड़ी रहने पर भी बच्चों के लिए एक खाट नहीं बिठाने देता। (बाहर से कोई दरवाजा खटखटाता है।)
रेवती - कौन होगा?
विश्वनाथ - न जानो देखता हूँ। (बाहर से कोई दरवाजा खोलने की आवाज आती है।)
रेवती - इसी गर्मी में कौन आए? (दरवाजा खोलता है।)
विश्वनाथ - ईश्वर करे इन दिनों कोई मेहमान न आए। मैं तो कहता हूँ खुली हवा में सो जाऊँ तो बेहतर है। जैसे सांस बंद हो जाए, सबरे काम पर जाना है, जाओ।
रेवती - आओ, उसी गर्मी में कौन आए? तुम्हें करो छत इतनी छोटी है कि पूरी खाँटे भी तो नहीं आती। एक खाट पर दो-दो, तीन-तीन बच्चे सोते हैं, तब भी पूरा नहीं पड़ता।
विश्वनाथ - एक यह पड़ोसी है, निर्दयी, जो खाली छत पड़ी रहने पर भी बच्चों के लिए एक खाट नहीं बिठाने देता। (बाहर से कोई दरवाजा खटखटाता है।)
रेवती - कौन होगा?
विश्वनाथ - न जानो देखता हूँ। (बाहर जाता है।)
रेवती - (आवाज लगाती है) अरे, बाहर से कोई दरवाजा खटखटा रहा है। देखो प्रमोद, जरा आराम से सो जाएगा। बेसे भी मुझे कुछ काम करना है।
विश्वनाथ - पर बच्चों के सोने में क्या हर्ज है? जरा आराम से सो जाएगा। बेसे भी मुझे कुछ काम करना है।
रेवती - जब मैं हैं, बड़ी की जेब में है। अब डर की क्या बात है! घर ही तो है।
विश्वनाथ - फिर जाने दो। मैं नीचे आँगन में जाया कूँगा। कमरे में भला क्या सोधा जाएगा! उस गर्मी में किसी को सोता देखकर प्रसन्न होते हैं। उस दिन मैंने कहा तो लाला की ओरत बोली 'क्या छत तुम्हारे लिए हैं? नकद पंचास देते हैं, तब चार खाटों की जगह मिली है। न, बाबा, यह नहीं हो सकेगा। मैं खाट नहीं बिठाने दूँगी। सब हवा एकल जाएगी। उन्हें और किसी को सोता देखकर नीद नहीं आती।'
विश्वनाथ - (बड़े लड़के से) प्रमोद, जरा आराम से सो जाएगा। बेसे भी मुझे कुछ काम करना है।
रेवती - ईश्वर करे इन दिनों कोई मेहमान न आए। मैं तो कहता हूँ खुली हवा में सो जाऊँ तो बेहतर है। जैसे सांस बंद हो जाए, सबरे काम पर जाना है, जाओ।
नन्हेमल - (पगड़ी के पल्ले से मुंह का पसीना पोंछकर उसी से हवा करता हुआ) बड़ी गर्मी है। क्या कहे, पंडित जी, पेडल चले आ रहे हैं, कंधे तो ऐसे हो गए कि निचोड़ लो। धोती ऐसी चर्रो रही है, जैसे प्राचीन हो।
विश्वनाथ - जी, आप लोग...
बाबूलाल - चाचा, मेरे कंधे निचोड़कर देख लो। एक लौटे से कम पसीना नहीं निकलेगा (धोती ऐसी चर्रो रही है, जैसे प्राचीन हो। पिछले दिनों नकद नो रूपये खर्च करके खरीदी थी।)
बाबूलाल - मुझे कोई पिलाकर देखे, दस से कम नहीं पीऊँगा। (बच्चों की ओर देखकर) क्या नाम है तुम्हारा भाई?
प्रमोद - प्रमोद
किरण - किरण
बाबूलाल - ठंडा-ठंडा पानी पिलाओ दोस्त, प्राण सूखे जा रहे हैं। (सिर दबाती है।)
विश्वनाथ - देखो प्रमोद, कहीं से बरफ मिले तो ले आओ, आप लोग...
नन्हेमल - अपना लोटा कहाँ रखा है? शेले में ही है न?
बाबूलाल - बिस्तर में होगा, निकालूँ कोई? और तो और बिस्तर भी पसीने से भीगा गया, चाचा बिस्तर में तो पहले नहीँ निकलेगा, फिर जो होगा देखा जाएगा, हाँ नहीं तो! मुझे नहीं मालूम था यहाँ इतनी गर्मी है।
विश्वनाथ - देखो प्रमोद, कहीं से बरफ मिले तो ले आओ, आप लोग...न जानो देखता हूँ। (बाहर जाता है।)
नन्हेमल - अपना लोटा कहाँ रखा है? शेले में ही है न?
बाबूलाल - ठंडा-ठंडा पानी पिलाओ दोस्त, प्राण सूखे जा रहे हैं। (सिर दबाती है।)
विश्वनाथ - मकान मिलता ही नहीं आज दो साल से दिन-रात एक करके ढूंढ रहा हूँ। हाँ, पानी तो ले आओ, जरा गला ही तर कर ले।
रेवती - (अंचल से मुंह का पसीना पोंछती हुई) पता तक नहीं हिल रहा है। जैसे सांस बंद हो जाएगी सिर फटा जा रहा है। (सिर दबाती है।)
विश्वनाथ - पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है और प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती। अभी चार गिलास पीकर आया हूँ, फिर भी होठ सूख रहे हैं। एक गिलास पानी और पिला दो। ठंडा तो क्या होगा!
रेवती - गर्म है। अंगन में घड़े में भी तो पानी ठंडा नहीं होता - हवा लगे तब तो ठंडा हो। जाने कब तक इस जेलखाने में सड़ना होगा!
विश्वनाथ - मकान मिलता ही नहीं आज दो साल से दिन-रात एक करके ढूंढ रहा हूँ। हाँ, पानी तो ले आओ, जरा गला ही तर कर ले।
रेवती - बरफ ले आओ पर बरफ भी कोई कहाँ तक पिए।
विश्वनाथ - बरफ! बरफ का पानी पीने से क्या फायदा? प्यास जैसी-की-तैसी, बल्कि दुगनी लगती है। आओ! लो, पंखा कर लो। बच्चे क्या ऊपर हैं?
रेवती - रहने दो, तुम्हें करो छत इतनी छोटी है कि पूरी खाँटे भी तो नहीं आती। एक खाट पर दो-दो, तीन-तीन बच्चे सोते हैं, तब भी पूरा नहीं पड़ता।
विश्वनाथ - एक यह पड़ोसी है, निर्दयी, जो खाली छत पड़ी रहने पर भी बच्चों के लिए एक खाट नहीं बिठाने देता। (बाहर से कोई दरवाजा खटखटाता है।)
रेवती - कौन होगा?
विश्वनाथ - न जानो देखता हूँ। (बाहर जाता है।)
रेवती - (अंचल से मुंह का पसीना पोंछती हुई) पता तक नहीं हिल रहा है। जैसे सांस बंद हो जाएगी सिर फटा जा रहा है।
विश्वनाथ - ईश्वर करे इन दिनों कोई मेहमान न आए। मैं तो कहता हूँ खुली हवा में सो जाऊँ तो बेहतर है। (बाहर जाता है।)
नन्हेमल - (पगड़ी के पल्ले से मुंह का पसीना पोंछकर उसी से हवा करता हुआ) बड़ी गर्मी है। क्या कहे, पंडित जी, पेडल चले आ रहे हैं, कंधे तो ऐसे हो गए कि निचोड़ लो। धोती ऐसी चर्रो रही है, जैसे प्राचीन हो। पिछले दिनों नकद नो रूपये खर्च करके खरीदी थी।
बाबूलाल - मुझे कोई पिलाकर देखे, दस से कम नहीं पीऊँगा। (बच्चों की ओर देखकर) क्या नाम है तुम्हारा भाई?
प्रमोद - प्रमोद
किरण - किरण
बाबूलाल - ठंडा-ठंडा पानी पिलाओ दोस्त, प्राण सूखे जा रहे हैं।
विश्वनाथ - देखो प्रमोद, कहीं से बरफ मिले तो ले आओ, आप लोग...।
नन्हेमल - अपना लोटा कहाँ रखा है? शेले में ही है न?
बाबूलाल - बिस्तर में होगा, निकालूँ कोई? और तो और बिस्तर भी पसीने से भीगा गया, चाचा (बड़े लड़के से) प्रमोद, जरा आराम से सो जाएगा। बेसे भी मुझे कुछ काम करना है।
रेवती - (अंचल से मुंह का पसीना पोंछती हुई) पता तक नहीं हिल रहा है। जैसे सांस बंद हो जाएगी सिर फटा जा रहा है। (सिर दबाती है।)
विश्वनाथ - पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है और प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती। अभी चार गिलास पीकर आया हूँ, फिर भी होठ सूख रहे हैं। एक गिलास पानी और पिला दो। ठंडा तो क्या होगा!
रेवती - गर्म है। अंगन में घड़े में भी तो पानी ठंडा नहीं होता - हवा लगे तब तो ठंडा हो। जाने कब तक इस जेलखाने में सड़ना होगा!
विश्वनाथ - (बड़े लड़के से) प्रमोद, जरा आराम से सो जाएगा। बेसे भी मुझे कुछ काम करना है।
रेवती - गर्म है। अंगन में घड़े में भी तो पानी ठंडा नहीं होता - हवा लगे तब तो ठंडा हो। जाने कब तक इस जेलखाने में सड़ना होगा!
विश्वनाथ - मकान मिलता ही नहीं आज दो साल से दिन-रात एक करके ढूंढ रहा हूँ। हाँ, पानी तो ले आओ, जरा गला ही तर कर ले।
रेवती - बरफ ले आओ पर बरफ भी कोई कहाँ तक पिए।
विश्वनाथ - बरफ! बरफ का पानी पीने से क्या फायदा? प्यास जैसी-की-तैसी, बल्कि दुगनी लगती है। आओ! लो, पंखा कर लो। बच्चे क्या ऊपर हैं?
मुख्य बिंदु
- एकांकी 'नए मेहमान' एक पारिवारिक नाटक है जो गर्मी के मौसम में एक मध्यवर्गीय परिवार की दैनिक परेशानियों को दिखाता है।
- विश्वनाथ और रेवती अपने छोटे और गर्म मकान में जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं और अचानक आए मेहमानों का स्वागत करते हैं।
- पात्रों के संवाद उनके व्यक्तित्व और सामाजिक स्थिति को दर्शाते हैं, जो एकांकी को नाटकीय बनाते हैं।
- नन्हेमल और बाबूलाल जैसे मेहमान की आवभगत के लिए परिवार की मेहनत और समर्पण को उजागर करते हैं।
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