NCERT Class 7 Hindi Malhar Chapter 08 Birju Maharaj Se Sakshatkar (बिरजू महाराज से साक्षात्कार) PDF Download

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पाठ 8: बिरजू महाराज से साक्षात्कार

क्रथक की जब भी बात होती है तो हमारे मन में एक नाम अवश्य आता है - बिरजू महाराज। क्रथक की कला उन्हें विरासत में मिली थी, भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बिरजू महाराज का स्मरण उनकी मनमोहक प्रस्तुतियों के लिए किया जाता है। बिरजू महाराज का जीवन शास्त्रीय संगीत के रंगों के समान ही उतार-चढ़ाव भरा था। अपने जीवन में प्राप्त सफलताओं के लिए उन्होंने कठिन साधना की थी। आइए, आज हम पद्मविभूषण श्री बिरजू महाराज से मिलें इसने हमारा परिचय करवा रहे हैं आपके जैसे ही कुछ बच्चों।

श्रेया: सुना है कि आपका बचपन संघर्षों से भरा हुआ था। अपने बचपन के बारे में कुछ बताएँगी?

बिरजू महाराज: एक ज़माना था जब हमलौग छोटे नवाब कहलाते थे। हवेली के दरबाजे पर आठ-आठ सिपाहियों का पहरा होता था मेरे बाबूजी के देहांत के बाद आर्थिक परेशानियाँ बढ़ने लगीं। जिन डिब्बों में कभी तीन-चार लाख की कीमत के हार हुआ करते थे वे अब खाली पड़े थे। जीवन में उतार-चढ़ाव

तो होता ही है। सब समय का चक्र है। संघर्षों के दौर में मेरी सबसे बड़ी सहयोगी मेरी माँ थी। कभी कर्ज लेते थे तो कभी परानी जरूरी की साड़ियों जलाकर उनके सोने-चाँदी के तार बेचते थे और गुजारा करते थे। नूथ के कार्यक्रमों में भी कभी-कभी पैसा आ जाता था। दिन में खाना खाते थे तो रात को कई बार नहीं भी खाते थे। अम्मा बार-बार यही कहा करती थीं, "खाने को मले ही चना मिले या कुछ भी न मिले पर अभ्यास जरुर करो।"

शिक्षक की टिप्पणी

बिरजू महाराज के जीवन में माँ की भूमिका कितनी महत्त्वपूर्ण थी, यह इन पन्नों में साफ़ दिखता है। कठिन समय में भी उन्होंने अपने सपने को पंख देने में मदद की। आप अपने माता-पिता से पूछिए कि उन्होंने आपके लिए कौन-कौन सी कठिनाइयों का सामना किया है।

तनुश्री: आपने कथक किसे सीखा?

बिरजू महाराज: मेरे गुरु थे मेरे पिता अच्छे महाराज और चाचा शंभु महाराज और लक्ष्मी महाराजा। घर में बूंद कथक का माहौल था। अत: ओपचारिक प्रशिक्षण शुरू होने से पहले ही मैं देख-देखकर कथक सीख गया था और नवाब के दरबार में नाचने भी लगा था कथक की तालीम शुरू करते समय गुरु शिष्यों को गंडा (तामझा) बाँधते हैं और शिष्य गुरु को भेंट देता है। जब मेरी तालीम शुरू होने की बात आई तो बाबूजी ने कहा, "भेंट मिलने पर ही गंडा बाँधूँगा!" इस पर अम्मा ने मेरे दो कार्यक्रमों की कमाई बाबूजी को भेंट के रूप में दे दी। 'गंडा' गुरु और शिष्य के बीच पवित्र रिश्ता होता है। मैंने अब इस रस्म को पूरा कर लिया।

माणिक: कथक की शुरुआत कब हुई?

बिरजू महाराज: कथक की परंपरा बहुत प्राचीन है। 'महाभारत' के आदिपर्व और 'रामायण' में इसकी चर्चा मिलती है। पहले कथक रोचक और अनौपचारिक रूप से कथा कहने का ढंग होता था तब यह मंदिरों तक ही सीमित था। हमारे लखनऊ घराने के लोग मूलतः बनारस-इलाहाबाद के बीच हरिया गाँव के रहने वाले थे वहाँ 989 कार्थकों के घर हुआ करते थे। कार्थकों का एक तालाब अभी भी है। गाँव में एक बैरागिया नाला है, जिसके साथ यह कहानी जुड़ी हुई है -

एक बार नो कार्थक नाले के पास से गुजर रहे थे कि तीन डाकू वहाँ आ पहुँचे। कुछ कार्थक डर गए, किंतु उन कार्थकों की कला में इतना दम था कि डाकू सब कुछ भूलकर उन कार्थकों के कथक में मन हो गया। तब से यह पद लोगों में प्रचलित हो गया -

बैरागिया नाला जुलूम जोर,
नो कार्थक नचावे तीन चोरा।
जब तबला बोले धीन-धीन,
तब एक-एक पर तीन-तीना

लखनऊ घराने के बाद जयपुर घराने और फिर बनारस घराने का विकास हुआ। इसके अलावा रायगढ़ के महाराज चक्रधर की भी अपनी अलग शैली थी।

श्रेया: क्या नूथ सीखने के लिए संगीत जानना जरुरी होता है?

बिरजू महाराज: बहुत छोटपन से ही तबला पीटना शुरू कर दिया था। चाचा ने कहा, "लड़के के हाथ में लय है।" पाँच साल का होते-होते हारमोनियम पर लहरा बजाने लगा। सुबको खुश करने के लिए फिल्मी गाने भी खूब गाता था। एक बार सबकी फरमाइश पर सुरेया के एक गाने पर देर तक नाचा। बहनों ने बड़े शोक से बिंदी-चुन्नी से सजा दिया था। तब तक चाचा आ गए। बस डर के मारे तुरंत सब कुछ उतार फेंका और छिप गया।

शिक्षक की टिप्पणी

बिरजू महाराज ने जब नृत्य सीखना शुरू किया, तो उस समय यह काम माना जाता था कि नर्तकियों का काम है। समाज के पूर्वाग्रहों के बावजूद उन्होंने इस कला को जारी रखा और आज वह विश्व-प्रसिद्ध कलाकार हैं। जब आपको कोई काम करना हो जो आप से सच में प्रेम करते हों, तो दूसरों की बातों की परवाह किए बिना उस पथ पर आगे बढ़िए।

मुख्य बिंदु

  • बिरजू महाराज क्रथक नृत्य के महान कलाकार थे जिन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया।
  • उनकी माँ ने कठिन समय में भी उन्हें कला की साधना जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया।
  • क्रथक की परंपरा बहुत प्राचीन है और इसकी शुरुआत मंदिरों में कथा कहने से हुई थी।
  • लखनऊ, जयपुर और बनारस घराने क्रथक की अलग-अलग शैलियाँ हैं।
  • कला के प्रति समर्पण और लगन से कोई भी बाधा को पार किया जा सकता है।

यह अध्याय के पहले 5 पृष्ठों का पूर्वावलोकन है। पूरा अध्याय पाने के लिए नीचे क्लिक करें।

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