UP Board Solutions Class 9 Hindi Chapter 11 Nagarjun

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Detailed Chapter 11 नागार्जुन UP Board Solutions for Class 9 Hindi

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Class 9 Hindi Chapter 11 नागार्जुन UP Board Solutions PDF

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. निम्नलिखित पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए तथा काव्यगत सौन्दर्य भी स्पष्ट कीजिए :
Answer:
(बादल को घिरते देखा है)
1. अमल धवल ... तिरते देखा है।
शब्दार्थ-अमल = निर्मल । धवल = सफेद शिखर = चोटी स्वर्णिम = सुनहले । तुंग = ऊँचा। ऊमस = गर्मी । पावस = वर्षा तिक्त = कसैला । बिसतन्तु = कमलनाल के अन्दर के कोमल रेशे । तिरते = तैरते हुए।
सन्दर्भ – प्रस्तुत काव्य-पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी काव्य' में जनकवि नागार्जुन द्वारा रचित 'बादल को घिरते देखा है' नामक कविता से अवतरित हैं। यह कविता उनके काव्य-संग्रह 'प्यासी-पथराई आँखें' में संकलित है।
प्रसंग – इस स्थल पर कवि ने हिमालय के वर्षाकालीन सौन्दर्य का चित्रण किया है।
व्याख्या – कवि का कथन है कि मैंने निर्मल, चाँदी के समान सफेद और बर्फ से मण्डित पर्वत की चोटियों पर घिरते हुए बादलों के मनोरम दृश्य को देखा है। मैंने मानसरोवर में खिलनेवाले स्वर्ण-जैसे सुन्दर कमल-पुष्पों पर मोती के समान चमकदार अत्यधिक शीतल जल की बूंदों को गिरते हुए देखा है। कवि हिमालय की प्राकृतिक सुषमा का अंकन करते हुए कहता है कि उस पर्वत-प्रदेश में हिमालय के ऊँचे शिखररूपी कन्धों पर छोटी-बड़ी अनेक झीलें फैली हुई हैं। मैंने उन झीलों के नीचे शीतल, स्वच्छ, निर्मल जल में ग्रीष्म के ताप के कारण व्याकुल और समतल क्षेत्रों से आये (अर्थात् मैदानों से आये हुए) हंसों को कसैले और मधुर कमलनाल के तन्तुओं को खोजते हुए और उन झीलों में तैरते हुए देखा है।
काव्यगत सौन्दर्य
• कवि ने साहित्यिक और कलात्मक शब्दावली का प्रयोग करते हुए हिमालय की सुन्दरता का अंकन किया है, जहाँ पर सभी प्राणी आनन्द और उल्लास का अनुभव कर सकते हैं।
• आलम्बने रूप में प्रकृति का चित्रण हुआ है।
• सरल व प्रवाहपूर्ण भाषा का प्रयोग ।
• गुण-माधुर्य ।
• रस-श्रृंगार ।
• शब्द-शक्ति-लक्षणा ।
• अलंकार-अनुप्रास, उपमा, पुनरुक्तिप्रकाश, रूपकातिशयोक्ति ।

2. एक दूसरे से ... चिढ़ते देखा है।
अथवा निशा काल ... के तीरे।
अथवा दुर्गम ... हो-होकर ।
शब्दार्थ-वियुक्त = पृथक्, जुदा । तीरे = किनारे शैवाल = घास परिमल = सुगन्ध ।
सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्म-पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी काव्य' में कविवर नागार्जुन द्वारा रचित 'बादल को घिरते देखा है' शीर्षक कविता से अवतरित हैं।
प्रसंग – इनमें कवि ने हिमालय के मोहक दृश्यों का चित्रण किया है।
व्याख्या – कवि कहता है कि चकवा-चकवी आपस में एक-दूसरे से अलग रहकर सारी रात बिता देते हैं। किसी शाप के कारण वे रात्रि में मिल नहीं पाते हैं। विरह में व्याकुल होकर वे क्रन्दन करने लगते हैं। प्रातः होने पर उनका क्रन्दन बन्द हो जाता है और वे मानसरोवर के किनारे मनोरम दृश्य में एक-दूसरे से मिलते हैं और हरी घास पर प्रेम-क्रीड़ा करते हैं। महाकवि कालिदास द्वारा मेघदूत महाकाव्य में वर्णित अपार धन के स्वामी कुबेर और उसकी सुन्दर अलका नगरी अब कहाँ है? आज आकाश मार्ग से जाती हुई पवित्र गंगा का जल कहाँ गया? बहुत हूँढ़ने पर भी मुझे मेघ के उस दूत के दर्शन नहीं हो सके । ऐसा भी हो सकता है कि इधर-उधर भटकते रहनेवाला यह मेघ पर्वत पर यहीं कहीं बरस पड़ा हो । छोड़ो, रहने दो, यह तो कवि की कल्पना थी। मैंने तो गगनचुम्बी कैलाश पर्वत के शिखर पर भयंकर सर्दी में विशाल आकारवाले बादलों को तूफानी हवाओं से गरजे-बरस कर संघर्ष करते हुए देखा है। हजारों फुट ऊँचे पर्वत-शिखर पर स्थित बर्फानी घाटियों में जहाँ पहुँचना बहुत कठिन होता है, कस्तूरी मृग अपनी नाभि में स्थित अगोचर कस्तूरी की मनमोहक सुगन्ध से उन्मत्त होकर इधर-उधर दौड़ता रहता है। निरन्तर भाग-दौड़ करने पर भी जब वह उसे कस्तूरी को प्राप्त नहीं कर पाता तो अपने-आप पर झुंझला उठता है।
काव्यगत सौन्दर्य
• यहाँ कवि ने विभिन्न मोहक दृश्यों को प्रस्तुत करके अपनी कुशल प्रकृति-चित्रण कला को दर्शाया है।
• भाषा-तत्सम प्रधान खड़ीबोली ।
• रस-श्रृंगार ।
• गुण-माधुर्य ।
• अलंकार-अनुप्रास ।

3. शत-शत ... फिरते देखा है।
शब्दार्थ-मुखरित = गुंजित कानन = वन शोणित = लाल धवल = सफेद कुन्तल = केश। सुघर = सुन्दर कुवलय = नीलकमल वेणी = चोटी । रजित = चाँदी के बने, मणियों से गढ़े । लोहित = लाल त्रिपदी = तिपाई । मदिरारुण = मद्यपान कर लेने के कारण हुई लाल, नशे में लाल। उन्मद = नशे में मस्त ।
सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्म हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी काव्य' में कविवर नागार्जुन द्वारा रचित 'बादल को घिरते देखा है' से लिया गया है।
प्रसंग – यहाँ कवि ने किन्नर-प्रदेश की शोभा का वर्णन किया है।
व्याख्या – कवि का कथन है कि आकाश में बादल छा जाने के बाद किन्नर-प्रदेश की शोभा अद्वितीय हो जाती है। सैकड़ों छोटे-बड़े झरने अपनी कल-कल ध्वनि से देवदार के वन को गुंजित कर देते हैं अर्थात् गिरते हुए झरनों का स्वर देवदार के वनों में गूंजता रहता है। इन वनों के बीच में लाल और श्वेत भोजपत्रों से छाये हुए कुटीर के भीतर किन्नर और किन्नरियों के जोड़े विलासमय क्रीडाएँ करते रहते हैं। वे अपने केशों को विभिन्न रंगों के सुगन्धित पुष्पों से सुसज्जित किये रहते हैं। सुन्दर शंख जैसे गले में इन्द्र-नीलमणि की माला धारण करते हैं, कानों में नीलकमल के कर्णफूल पहनते हैं और उनकी वेणी में लाल कमल सजे रहते हैं। कवि का कथन है कि किन्नर प्रदेश के नर-नारियों के मदिरापान करनेवाले बर्तन चाँदी के बने हुए हैं। वे मणिजड़ित तथा “कलात्मक ढंग से बने हुए हैं। वे अपने सम्मुख निर्मित तिपाई पर मदिरा के पात्रों को रख लेते हैं और स्वयं कस्तूरी मृग के नन्हें बच्चों की कोमल और दागरहित छाल पर आसन लगाकर बैठ जाते हैं । मदिरा पीने के कारण उनके नेत्र लाल रंग के हो जाते हैं। उनके नेत्रों में उन्माद छा जाता है। मदिरा पीने के बाद वे लोग मस्ती को प्रकट करने के लिए अपनी कोमल और सुन्दर अँगुलियों से सुमधुर स्वरों में वंशी की तान छेड़ने लगते हैं। कवि कहता है कि इन सभी दृश्यों की मनोहरता को मैंने देखा है।
काव्यगत सौन्दर्य
• यहाँ किन्नर प्रदेश के स्त्री-पुरुषों के विलासमय जीवन को यथार्थ चित्रण हुआ है।
• प्रकारान्तर से कवि ने धनी वर्ग की विलासिता का वर्णन किया है।
• भाषा-संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।
• रस-श्रृंगार ।
• अलंकार-उपमा, पुनरुक्तिप्रकाश ।
• शब्द-शक्ति-लक्षणी ।
In simple words: कवि ने 'बादल को घिरते देखा है' कविता में हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य, मानसरोवर के जीवंत दृश्यों, चकवा-चकवी के प्रेम-विरह और किन्नर-प्रदेश के विलासमय जीवन का विस्तृत वर्णन किया है।

🎯 Exam Tip: पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या करते समय प्रत्येक भाग के शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसंग और काव्यगत सौन्दर्य के बिन्दुओं को स्पष्ट और व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. नागार्जुन का जीवन-परिचय देते हुए उनकी भाषा-शैली का उल्लेख कीजिए।
Answer:
(नागार्जुन)
स्मरणीय तथ्य
जन्म - सन् 1910 ई०, तरौनी (जिला दरभंगा (बिहार)।
मृत्यु - सन् 1998 ई० ।
शिक्षा - स्थानीय संस्कृत पाठशाला में, श्रीलंका में बौद्ध धर्म की दीक्षा ।
वास्तविक नाम-वैद्यनाथ मिश्र ।
रचनाएँ - युगधारा, प्यासी-पथराई आँखें, सतरंगे पंखोंवाली, तुमने कहा था, तालाब की मछलियाँ, हजार-हजार बाँहोंवाली, पुरानी जूतियों का कोरस, भस्मांकुर (खण्डकाव्य), बलचनमा, रतिनाथ की चाची, नयी पौध, कुम्भीपाक, उग्रतारा (उपन्यास), दीपक, विश्वबन्धु (सम्पादन)।
काव्यगत विशेषताएँ
वर्य-विषय - सम-सामयिक, राजनीतिक तथा सामाजिक समस्याओं का चित्रण, दलित वर्ग के प्रति संवेदना, अत्याचारपीड़ित एवं त्रस्त व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति ।
भाषा - शैली-तत्सम शब्दावली प्रधान शुद्ध खड़ीबोली । ग्रामीण और देशज शब्दों का प्रयोग । प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग। अलंकार व छन्द-उपमा, रूपक, अनुप्रास। मुक्तक छन्द।।
जीवन-परिचय - श्री नागार्जुन का जन्म दरभंगा जिले के तरौनी ग्राम में सन् 1910 ई० में हुआ था। आपका वास्तविक नाम वैद्यनाथ मिश्र है। आपका आरम्भिक जीवन अभावों का जीवन था। जीवन के अभावों ने ही आगे चलकर आपके संघर्षशील व्यक्तित्व का निर्माण किया व्यक्तिगत दुःख ने आपको मानवता के दुःख को समझने की क्षमता प्रदान की है। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा स्थानीय संस्कृत पाठशाला में हुई । सन् 1936 ई० में आप श्रीलंका गये और वहाँ पर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। सन् 1938 ई० में आप स्वदेश लौट आये। राजनीतिक कार्यकलापों के कारण आपको कई बार जेल-यात्रा भी करनी पड़ी। आप बाबा के नाम से प्रसिद्ध हैं तथा घुमक्कड़ एवं फक्कड़ किस्म के व्यक्ति हैं। आप निरन्तर भ्रमण करते रहे। सन् 1998 ई० में आपका निधन हो गया।
रचनाएँ - युगधारा, प्यासी-पथराई आँखें, सतरंगे पंखोंवाली, तुमने कहा था, तालाब की मछलियाँ, हजार-हजार बाँहोंवाली, पुरानी जूतियों का कोरस, भस्मांकुर (खण्डकाव्य) आदि ।
उपन्यास - बलचनमा, रतिनाथ की चाची, नयी पौध, कुम्भीपाक, उग्रतारा आदि । सम्पादन-दीपक, विश्व-बन्धु पत्रिका ।
मैथिली के 'पत्र - हीन नग्न-गाछ' काव्य-संकलन पर आपको साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिल चुका है।
काव्यगत विशेषताएँ
नागार्जुन के काव्य में जन भावनाओं की अभिव्यक्ति, देश-प्रेम, श्रमिकों के प्रति सहानुभूति, संवेदनशीलता तथा व्यंग्य की प्रधानता आदि प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं। अपनी कविताओं में आप अत्याचार-पीड़ित, त्रस्त व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करके ही सन्तुष्ट नहीं होते हैं, बल्कि उनको अनीति और अन्याय का विरोध करने की प्रेरणा भी देते हैं। व्यंग्य करने में आपको संकोच नहीं होता। तीखी और सीधी चोट करनेवाले आप वर्तमान युग के प्रमुख व्यंग्यकार हैं। नागार्जुन जीवन के, धरती के, जनता के तथा श्रम के गीत गानेवाले कवि हैं, जिनकी रचनाएँ किसी वाद की सीमा में नहीं बँधी हैं।
भाषा - शैली-नागार्जुन जी की भाषा-शैली सरल, स्पष्ट तथा मार्मिक प्रभाव डालनेवाली है। काव्य-विषय आपके प्रतीकों के माध्यम से स्पष्ट उभरकर सामने आते हैं। आपके गीतों में जन- जीवन का संगीत है। आपकी भाषा तत्सम प्रधान शुद्ध खड़ीबोली है, जिसमें अरबी व फारसी के शब्दों का भी प्रयोग किया गया है।
अलंकार एवं छन्द - आपकी कविता में अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग है। उपमा, रूपक, अनुप्रास आदि अलंकार ही देखने को मिलते हैं। प्रतीक विधान और बिम्ब-योजना भी श्रेष्ठ है। साहित्य में स्थान-निस्सन्देह नागार्जुन जी का काव्य भाव-पक्ष तथा कला पक्ष की दृष्टि से हिन्दी साहित्य का अमूल्य कोष है।
In simple words: नागार्जुन एक संघर्षशील कवि थे जिन्होंने अपनी रचनाओं में जन भावनाओं, देश-प्रेम और सामाजिक समस्याओं को प्रमुखता दी, जिनकी भाषा सरल, स्पष्ट और प्रतीकात्मक है।

🎯 Exam Tip: जीवन-परिचय लिखते समय जन्म-मृत्यु, शिक्षा, वास्तविक नाम, रचनाएँ और काव्यगत विशेषताओं का व्यवस्थित उल्लेख करें, साथ ही भाषा-शैली पर विशेष ध्यान दें।

 

Question 3. नागार्जुन का जीवन वृत्त लिखकर उनके साहित्यिक योगदान का उल्लेख कीजिए
Answer:
(नागार्जुन)
स्मरणीय तथ्य
जन्म - सन् 1910 ई०, तरौनी (जिला दरभंगा (बिहार)।
मृत्यु - सन् 1998 ई० ।
शिक्षा - स्थानीय संस्कृत पाठशाला में, श्रीलंका में बौद्ध धर्म की दीक्षा ।
वास्तविक नाम-वैद्यनाथ मिश्र ।
रचनाएँ - युगधारा, प्यासी-पथराई आँखें, सतरंगे पंखोंवाली, तुमने कहा था, तालाब की मछलियाँ, हजार-हजार बाँहोंवाली, पुरानी जूतियों का कोरस, भस्मांकुर (खण्डकाव्य), बलचनमा, रतिनाथ की चाची, नयी पौध, कुम्भीपाक, उग्रतारा (उपन्यास), दीपक, विश्वबन्धु (सम्पादन)।
काव्यगत विशेषताएँ
वर्य-विषय - सम-सामयिक, राजनीतिक तथा सामाजिक समस्याओं का चित्रण, दलित वर्ग के प्रति संवेदना, अत्याचारपीड़ित एवं त्रस्त व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति ।
भाषा - शैली-तत्सम शब्दावली प्रधान शुद्ध खड़ीबोली । ग्रामीण और देशज शब्दों का प्रयोग । प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग। अलंकार व छन्द-उपमा, रूपक, अनुप्रास। मुक्तक छन्द।।
जीवन-परिचय - श्री नागार्जुन का जन्म दरभंगा जिले के तरौनी ग्राम में सन् 1910 ई० में हुआ था। आपका वास्तविक नाम वैद्यनाथ मिश्र है। आपका आरम्भिक जीवन अभावों का जीवन था। जीवन के अभावों ने ही आगे चलकर आपके संघर्षशील व्यक्तित्व का निर्माण किया व्यक्तिगत दुःख ने आपको मानवता के दुःख को समझने की क्षमता प्रदान की है। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा स्थानीय संस्कृत पाठशाला में हुई । सन् 1936 ई० में आप श्रीलंका गये और वहाँ पर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। सन् 1938 ई० में आप स्वदेश लौट आये। राजनीतिक कार्यकलापों के कारण आपको कई बार जेल-यात्रा भी करनी पड़ी। आप बाबा के नाम से प्रसिद्ध हैं तथा घुमक्कड़ एवं फक्कड़ किस्म के व्यक्ति हैं। आप निरन्तर भ्रमण करते रहे। सन् 1998 ई० में आपका निधन हो गया।
रचनाएँ - युगधारा, प्यासी-पथराई आँखें, सतरंगे पंखोंवाली, तुमने कहा था, तालाब की मछलियाँ, हजार-हजार बाँहोंवाली, पुरानी जूतियों का कोरस, भस्मांकुर (खण्डकाव्य) आदि ।
उपन्यास - बलचनमा, रतिनाथ की चाची, नयी पौध, कुम्भीपाक, उग्रतारा आदि । सम्पादन-दीपक, विश्व-बन्धु पत्रिका ।
मैथिली के 'पत्र - हीन नग्न-गाछ' काव्य-संकलन पर आपको साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिल चुका है।
काव्यगत विशेषताएँ
नागार्जुन के काव्य में जन भावनाओं की अभिव्यक्ति, देश-प्रेम, श्रमिकों के प्रति सहानुभूति, संवेदनशीलता तथा व्यंग्य की प्रधानता आदि प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं। अपनी कविताओं में आप अत्याचार-पीड़ित, त्रस्त व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करके ही सन्तुष्ट नहीं होते हैं, बल्कि उनको अनीति और अन्याय का विरोध करने की प्रेरणा भी देते हैं। व्यंग्य करने में आपको संकोच नहीं होता। तीखी और सीधी चोट करनेवाले आप वर्तमान युग के प्रमुख व्यंग्यकार हैं। नागार्जुन जीवन के, धरती के, जनता के तथा श्रम के गीत गानेवाले कवि हैं, जिनकी रचनाएँ किसी वाद की सीमा में नहीं बँधी हैं।
भाषा - शैली-नागार्जुन जी की भाषा-शैली सरल, स्पष्ट तथा मार्मिक प्रभाव डालनेवाली है। काव्य-विषय आपके प्रतीकों के माध्यम से स्पष्ट उभरकर सामने आते हैं। आपके गीतों में जन- जीवन का संगीत है। आपकी भाषा तत्सम प्रधान शुद्ध खड़ीबोली है, जिसमें अरबी व फारसी के शब्दों का भी प्रयोग किया गया है।
अलंकार एवं छन्द - आपकी कविता में अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग है। उपमा, रूपक, अनुप्रास आदि अलंकार ही देखने को मिलते हैं। प्रतीक विधान और बिम्ब-योजना भी श्रेष्ठ है। साहित्य में स्थान-निस्सन्देह नागार्जुन जी का काव्य भाव-पक्ष तथा कला पक्ष की दृष्टि से हिन्दी साहित्य का अमूल्य कोष है।
In simple words: नागार्जुन का साहित्यिक योगदान समसामयिक मुद्दों, जनवेदना और प्रकृति चित्रण में मुखर रहा है, जिसमें उनकी सरल भाषा और विभिन्न अलंकारों का सुंदर प्रयोग दिखता है।

🎯 Exam Tip: साहित्यिक योगदान बताते समय उनकी प्रमुख रचनाओं का नामोल्लेख तथा उनके लेखन की मुख्य प्रवृत्तियों को संक्षेप में समझाना आवश्यक है।

 

Question 4. नागार्जुन के साहित्यिक अवदान एवं रचनाओं पर प्रकाश डालिए ।
Answer:
(नागार्जुन)
स्मरणीय तथ्य
जन्म - सन् 1910 ई०, तरौनी (जिला दरभंगा (बिहार)।
मृत्यु - सन् 1998 ई० ।
शिक्षा - स्थानीय संस्कृत पाठशाला में, श्रीलंका में बौद्ध धर्म की दीक्षा ।
वास्तविक नाम-वैद्यनाथ मिश्र ।
रचनाएँ - युगधारा, प्यासी-पथराई आँखें, सतरंगे पंखोंवाली, तुमने कहा था, तालाब की मछलियाँ, हजार-हजार बाँहोंवाली, पुरानी जूतियों का कोरस, भस्मांकुर (खण्डकाव्य), बलचनमा, रतिनाथ की चाची, नयी पौध, कुम्भीपाक, उग्रतारा (उपन्यास), दीपक, विश्वबन्धु (सम्पादन)।
काव्यगत विशेषताएँ
वर्य-विषय - सम-सामयिक, राजनीतिक तथा सामाजिक समस्याओं का चित्रण, दलित वर्ग के प्रति संवेदना, अत्याचारपीड़ित एवं त्रस्त व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति ।
भाषा - शैली-तत्सम शब्दावली प्रधान शुद्ध खड़ीबोली । ग्रामीण और देशज शब्दों का प्रयोग । प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग। अलंकार व छन्द-उपमा, रूपक, अनुप्रास। मुक्तक छन्द।।
जीवन-परिचय - श्री नागार्जुन का जन्म दरभंगा जिले के तरौनी ग्राम में सन् 1910 ई० में हुआ था। आपका वास्तविक नाम वैद्यनाथ मिश्र है। आपका आरम्भिक जीवन अभावों का जीवन था। जीवन के अभावों ने ही आगे चलकर आपके संघर्षशील व्यक्तित्व का निर्माण किया व्यक्तिगत दुःख ने आपको मानवता के दुःख को समझने की क्षमता प्रदान की है। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा स्थानीय संस्कृत पाठशाला में हुई । सन् 1936 ई० में आप श्रीलंका गये और वहाँ पर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। सन् 1938 ई० में आप स्वदेश लौट आये। राजनीतिक कार्यकलापों के कारण आपको कई बार जेल-यात्रा भी करनी पड़ी। आप बाबा के नाम से प्रसिद्ध हैं तथा घुमक्कड़ एवं फक्कड़ किस्म के व्यक्ति हैं। आप निरन्तर भ्रमण करते रहे। सन् 1998 ई० में आपका निधन हो गया।
रचनाएँ - युगधारा, प्यासी-पथराई आँखें, सतरंगे पंखोंवाली, तुमने कहा था, तालाब की मछलियाँ, हजार-हजार बाँहोंवाली, पुरानी जूतियों का कोरस, भस्मांकुर (खण्डकाव्य) आदि ।
उपन्यास - बलचनमा, रतिनाथ की चाची, नयी पौध, कुम्भीपाक, उग्रतारा आदि । सम्पादन-दीपक, विश्व-बन्धु पत्रिका ।
मैथिली के 'पत्र - हीन नग्न-गाछ' काव्य-संकलन पर आपको साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिल चुका है।
काव्यगत विशेषताएँ
नागार्जुन के काव्य में जन भावनाओं की अभिव्यक्ति, देश-प्रेम, श्रमिकों के प्रति सहानुभूति, संवेदनशीलता तथा व्यंग्य की प्रधानता आदि प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं। अपनी कविताओं में आप अत्याचार-पीड़ित, त्रस्त व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करके ही सन्तुष्ट नहीं होते हैं, बल्कि उनको अनीति और अन्याय का विरोध करने की प्रेरणा भी देते हैं। व्यंग्य करने में आपको संकोच नहीं होता। तीखी और सीधी चोट करनेवाले आप वर्तमान युग के प्रमुख व्यंग्यकार हैं। नागार्जुन जीवन के, धरती के, जनता के तथा श्रम के गीत गानेवाले कवि हैं, जिनकी रचनाएँ किसी वाद की सीमा में नहीं बँधी हैं।
भाषा - शैली-नागार्जुन जी की भाषा-शैली सरल, स्पष्ट तथा मार्मिक प्रभाव डालनेवाली है। काव्य-विषय आपके प्रतीकों के माध्यम से स्पष्ट उभरकर सामने आते हैं। आपके गीतों में जन- जीवन का संगीत है। आपकी भाषा तत्सम प्रधान शुद्ध खड़ीबोली है, जिसमें अरबी व फारसी के शब्दों का भी प्रयोग किया गया है।
अलंकार एवं छन्द - आपकी कविता में अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग है। उपमा, रूपक, अनुप्रास आदि अलंकार ही देखने को मिलते हैं। प्रतीक विधान और बिम्ब-योजना भी श्रेष्ठ है। साहित्य में स्थान-निस्सन्देह नागार्जुन जी का काव्य भाव-पक्ष तथा कला पक्ष की दृष्टि से हिन्दी साहित्य का अमूल्य कोष है।
In simple words: नागार्जुन का साहित्यिक अवदान व्यापक है, जिसमें जनवादी चेतना, सामाजिक यथार्थ और प्रकृति चित्रण प्रमुख हैं, जो उनकी अनेक काव्य और उपन्यास रचनाओं में परिलक्षित होता है।

🎯 Exam Tip: साहित्यिक अवदान और रचनाओं पर प्रकाश डालते समय उनकी प्रमुख कृतियों का नामोल्लेख तथा उनके लेखन की मुख्य प्रवृत्तियों को संक्षेप में समझाना आवश्यक है।

 

Question 5. नागार्जुन का जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए तथा उनके काव्य-सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए ।
Answer:
(नागार्जुन)
स्मरणीय तथ्य
जन्म - सन् 1910 ई०, तरौनी (जिला दरभंगा (बिहार)।
मृत्यु - सन् 1998 ई० ।
शिक्षा - स्थानीय संस्कृत पाठशाला में, श्रीलंका में बौद्ध धर्म की दीक्षा ।
वास्तविक नाम-वैद्यनाथ मिश्र ।
रचनाएँ - युगधारा, प्यासी-पथराई आँखें, सतरंगे पंखोंवाली, तुमने कहा था, तालाब की मछलियाँ, हजार-हजार बाँहोंवाली, पुरानी जूतियों का कोरस, भस्मांकुर (खण्डकाव्य), बलचनमा, रतिनाथ की चाची, नयी पौध, कुम्भीपाक, उग्रतारा (उपन्यास), दीपक, विश्वबन्धु (सम्पादन)।
काव्यगत विशेषताएँ
वर्य-विषय - सम-सामयिक, राजनीतिक तथा सामाजिक समस्याओं का चित्रण, दलित वर्ग के प्रति संवेदना, अत्याचारपीड़ित एवं त्रस्त व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति ।
भाषा - शैली-तत्सम शब्दावली प्रधान शुद्ध खड़ीबोली । ग्रामीण और देशज शब्दों का प्रयोग । प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग। अलंकार व छन्द-उपमा, रूपक, अनुप्रास। मुक्तक छन्द।।
जीवन-परिचय - श्री नागार्जुन का जन्म दरभंगा जिले के तरौनी ग्राम में सन् 1910 ई० में हुआ था। आपका वास्तविक नाम वैद्यनाथ मिश्र है। आपका आरम्भिक जीवन अभावों का जीवन था। जीवन के अभावों ने ही आगे चलकर आपके संघर्षशील व्यक्तित्व का निर्माण किया व्यक्तिगत दुःख ने आपको मानवता के दुःख को समझने की क्षमता प्रदान की है। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा स्थानीय संस्कृत पाठशाला में हुई । सन् 1936 ई० में आप श्रीलंका गये और वहाँ पर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। सन् 1938 ई० में आप स्वदेश लौट आये। राजनीतिक कार्यकलापों के कारण आपको कई बार जेल-यात्रा भी करनी पड़ी। आप बाबा के नाम से प्रसिद्ध हैं तथा घुमक्कड़ एवं फक्कड़ किस्म के व्यक्ति हैं। आप निरन्तर भ्रमण करते रहे। सन् 1998 ई० में आपका निधन हो गया।
रचनाएँ - युगधारा, प्यासी-पथराई आँखें, सतरंगे पंखोंवाली, तुमने कहा था, तालाब की मछलियाँ, हजार-हजार बाँहोंवाली, पुरानी जूतियों का कोरस, भस्मांकुर (खण्डकाव्य) आदि ।
उपन्यास - बलचनमा, रतिनाथ की चाची, नयी पौध, कुम्भीपाक, उग्रतारा आदि । सम्पादन-दीपक, विश्व-बन्धु पत्रिका ।
मैथिली के 'पत्र - हीन नग्न-गाछ' काव्य-संकलन पर आपको साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिल चुका है।
काव्यगत विशेषताएँ
नागार्जुन के काव्य में जन भावनाओं की अभिव्यक्ति, देश-प्रेम, श्रमिकों के प्रति सहानुभूति, संवेदनशीलता तथा व्यंग्य की प्रधानता आदि प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं। अपनी कविताओं में आप अत्याचार-पीड़ित, त्रस्त व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करके ही सन्तुष्ट नहीं होते हैं, बल्कि उनको अनीति और अन्याय का विरोध करने की प्रेरणा भी देते हैं। व्यंग्य करने में आपको संकोच नहीं होता। तीखी और सीधी चोट करनेवाले आप वर्तमान युग के प्रमुख व्यंग्यकार हैं। नागार्जुन जीवन के, धरती के, जनता के तथा श्रम के गीत गानेवाले कवि हैं, जिनकी रचनाएँ किसी वाद की सीमा में नहीं बँधी हैं।
भाषा - शैली-नागार्जुन जी की भाषा-शैली सरल, स्पष्ट तथा मार्मिक प्रभाव डालनेवाली है। काव्य-विषय आपके प्रतीकों के माध्यम से स्पष्ट उभरकर सामने आते हैं। आपके गीतों में जन- जीवन का संगीत है। आपकी भाषा तत्सम प्रधान शुद्ध खड़ीबोली है, जिसमें अरबी व फारसी के शब्दों का भी प्रयोग किया गया है।
अलंकार एवं छन्द - आपकी कविता में अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग है। उपमा, रूपक, अनुप्रास आदि अलंकार ही देखने को मिलते हैं। प्रतीक विधान और बिम्ब-योजना भी श्रेष्ठ है। साहित्य में स्थान-निस्सन्देह नागार्जुन जी का काव्य भाव-पक्ष तथा कला पक्ष की दृष्टि से हिन्दी साहित्य का अमूल्य कोष है।
In simple words: नागार्जुन का जीवन संघर्षों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने अपनी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ, जनभावनाओं और प्रकृति को सरल तथा सशक्त भाषा में व्यक्त किया, जिससे उनका काव्य-सौन्दर्य अद्वितीय बन गया।

🎯 Exam Tip: जीवन-परिचय, रचनाओं और काव्य-सौन्दर्य का वर्णन करते समय कवि के व्यक्तिगत जीवन के संघर्षों को उनके साहित्यिक दृष्टिकोण से जोड़कर प्रस्तुत करें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. नागार्जुन ने अपनी कविता 'बादल को घिरते देखा है' में प्रकृति के किस रूप के सौन्दर्य का वर्णन किया
Answer:
इस कविता में कवि ने हिमालय पर्वत पर स्थित कैलाश पर्वत की चोटी पर घिरते बादलों के सौन्दर्य का वर्णन किया है।
In simple words: नागार्जुन ने 'बादल को घिरते देखा है' कविता में हिमालय के कैलाश पर्वत पर घिरते बादलों के मनोरम प्राकृतिक सौन्दर्य का चित्रण किया है।

🎯 Exam Tip: प्रकृति के वर्णन से संबंधित प्रश्नों में कवि द्वारा वर्णित विशिष्ट प्राकृतिक दृश्यों और उनके प्रतीकात्मक अर्थों पर ध्यान केंद्रित करें।

 

Question 2. 'महामेघ को झंझानिल से गरज-गरज भिड़ते देखा है' पंक्ति में प्राकृतिक वर्णन के अतिरिक्त मुख्य भाव क्या है?
Answer:
कवि कहता है कि इस संसार में निरन्तर संघर्ष चल रहा है। मैंने असहाय जाड़ों में आकाश को छूने वाले कैलाश पर्वत की चोटी पर बहुत बड़े बादल-समूह को बर्फानी और तूफानी हवाओं से गर्जना करके क्रोध प्रकट करते हुए युद्धरत देखा है। यद्यपि हवा बादल को उड़ा ले जाती है। बादल वायु के समक्ष शक्तिहीन है फिर भी उसको हवा के प्रति संघर्ष उसके अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।कहने का भाव यह है कि सफलता की सम्पूर्ण सामर्थ्य व्यक्ति के अन्दर निहित रहती है, किन्तु अज्ञानतावश उस सामर्थ्य को न जानने के कारण और सफलता से वंचित रहने के कारण वह अपने ऊपर ही झुंझलाता है।
In simple words: इस पंक्ति में बादलों और तूफानी हवाओं का संघर्ष मानव जीवन के सतत संघर्ष और अपनी क्षमता को न समझ पाने के कारण होने वाली निराशा का प्रतीक है।

🎯 Exam Tip: काव्य पंक्तियों के प्रतीकात्मक या गूढ़ अर्थों को स्पष्ट करते समय प्राकृतिक वर्णन के साथ उसके दार्शनिक या सामाजिक निहितार्थों को भी उजागर करें।

 

Question 3. कवि ने नरेत्तर (मनुष्य से इतर) दम्पतियों का किस प्रकार वर्णन किया है?
Answer:
कवि नरेत्तर दम्पतियों का वर्णन करते हुए कहता है कि सुगन्धित फूलों को अपने बालों में लगाये हुए, अपने शंख जैसे गलों में, मणि की माला तथा कानों में नीलकमल के कर्णफूल पहने हुए, अंगूरी शराब पीकर हिरण की खाल पर पालथी मारकर बैठे हुए किन्नर युगल दर्शकों के हृदय को गद्गद करते हैं।
In simple words: कवि ने किन्नर युगल को सुगंधित फूलों, आभूषणों और मदिरापान के साथ हिरण की खाल पर बैठे हुए अत्यंत मनोहर और विलासितापूर्ण रूप में चित्रित किया है।

🎯 Exam Tip: किसी विशेष चरित्र या समूह के वर्णन वाले प्रश्नों में, उनकी वेशभूषा, क्रियाकलाप और उनके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ को स्पष्ट रूप से दर्शाएँ।

 

Question 4. 'बादल को घिरते देखा है' शीर्षक कविता का सारांश लिखिए।
Answer:
'बादल को घिरते देखा है' कविता में हिमालय पर्वत पर स्थित कैलास पर्वत की चोटी पर घिरते बादलों के सौन्दर्य को वर्णन किया गया है। कवि के अनुसार निर्मल, चाँदी के समान सफेद और बर्फ से मण्डित पर्वत-चोटियों पर घिरते हुए बादलों से सम्पूर्ण वातावरण अत्यन्त मनोहारी दिखायी देने लगता है। कैलाश पर्वत पर छाये बड़े-बड़े बादल; तूफानी हवाओं से गरज-गरजकर दो-दो हाथ करते हैं। यद्यपि तूफानी हवाएँ अन्ततः बादलों को उड़ा ले जाती हैं, फिर भी बादल अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत रहता है। आकाश में बादल छा जाने से किन्नर प्रदेश की शोभा अद्वितीय हो जाती है। सैकड़ों छोटे-बड़े झरने अपनी कल-कल ध्वनि से देवदार के वन को गुंजित कर देते हैं। इन वनों में किन्नर और किन्नरियाँ विलासितापूर्ण क्रीड़ाएँ करने लगती हैं।
In simple words: 'बादल को घिरते देखा है' कविता हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य, बादलों के संघर्ष और किन्नर-प्रदेश की विलासिता का सजीव चित्रण करती है, जहाँ कवि ने प्रकृति और जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया है।

🎯 Exam Tip: सारांश लिखते समय कविता के मुख्य विषयों, प्रमुख दृश्यों और कवि के संदेश को संक्षिप्त और स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. नागार्जुन किस युग के कवि हैं?
Answer: आधुनिक (प्रगतिवाद) युग के कवि हैं।
In simple words: नागार्जुन आधुनिक काल के प्रगतिवादी धारा के प्रमुख कवि माने जाते हैं।

🎯 Exam Tip: कवियों के युग से संबंधित प्रश्नों में उनके प्रमुख साहित्यिक आंदोलन या विचारधारा का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. नागार्जुन की दो रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
Answer: युगधारा, खून और शोले ।
In simple words: नागार्जुन की प्रमुख रचनाएँ 'युगधारा' और 'खून और शोले' हैं।

🎯 Exam Tip: रचनाओं के नाम याद करते समय उनकी विशिष्टता या प्रमुख शैली को ध्यान में रखें।

 

Question 3. नागार्जुन की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए ।
Answer: नागार्जुन की भाषा सहज, सरल, बोधगम्य, स्पष्ट, स्वाभाविक और मार्मिक प्रभाव डालने वाली है। उनकी शैली स्वाभाविक और पाठकों के हृदय में तत्सम्बन्धी भावनाओं को उदीप्त करनेवाली होती है।
In simple words: नागार्जुन की भाषा-शैली सरल, सहज और बोधगम्य है, जो पाठकों के मन पर सीधा और मार्मिक प्रभाव डालती है।

🎯 Exam Tip: भाषा-शैली का वर्णन करते समय उसके मुख्य गुणों जैसे सरलता, स्पष्टता, प्रवाहपूर्णता और प्रभावशीलता पर जोर दें।

 

Question 4. बादल को घिरते देखा है? शीर्षक कविता का सारांश लिखिए।
Answer:
नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 4 देखें ।
In simple words: 'बादल को घिरते देखा है' कविता का सारांश लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 4 में विस्तार से दिया गया है।

🎯 Exam Tip: जब कोई प्रश्न किसी अन्य प्रश्न के उत्तर का संदर्भ दे, तो सुनिश्चित करें कि छात्र मुख्य उत्तर तक पहुँच सकें और उसका संक्षिप्त पुनरावलोकन कर सकें।

 

Question 5. 'बादल को घिरते देखा है' शीर्षक कविता का उद्देश्य क्या है?
Answer: प्रस्तुत कविता 'बादल को घिरते देखा है' के माध्यम से कवि ने हिमालय पर्वत पर स्थित कैलाश पर्वत की चोटी के सौन्दर्य को वर्णित करने की चेष्टा की है।
In simple words: कविता का मुख्य उद्देश्य हिमालय के कैलाश पर्वत और वहाँ घिरते बादलों के अनुपम प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन करना है।

🎯 Exam Tip: कविता के उद्देश्य वाले प्रश्नों में कवि के मुख्य संदेश या केंद्रीय विचार को स्पष्ट और संक्षिप्त रूप में व्यक्त करें।

 

Question 6. 'बादल को घिरते देखा है' कविता का प्रतिपाद्य बताइए ।
Answer: 'बादल को घिरते देखा है' कविता का प्रतिपाद्य हिमालय पर्वत पर स्थित कैलाश पर्वत की चोटी का सौन्दर्य वर्णन है।
In simple words: इस कविता का प्रतिपाद्य हिमालय के कैलाश पर्वत के प्राकृतिक दृश्यों और बादलों के सौंदर्य का सजीव चित्रण है।

🎯 Exam Tip: प्रतिपाद्य (केंद्रीय विषय) बताते समय कविता के मुख्य भाव या संदेश को सीधे और संक्षेप में प्रस्तुत करें।

काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध

 

Question. निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए
(अ) श्यामल शीतल अमल सलिल में। समतल देशों के आ-आकर पावस की उमस से आकुल तिक्त मधुर बिस तंतु खोजते, हंसों को तिरते देखा है।
(ब) मृदुल मनोरम अँगुलियों को वंशी पर फिरते देखा है।
Answer:
(अ) काव्य-सौन्दर्य-
• कैलाश पर्वत अत्यन्त रमणीक स्थान है। गर्मी की उमस से व्याकुल होकर यहाँ दूर देश के पक्षी आते हैं और विचरण करते हैं।
• शैली-गेय है।
• भाषा-सहज, स्वाभाविक एवं बोधगम्य है।
• अलंकार-अनुप्रास ।
(ब) काव्य-सौन्दर्य-
• कवि कह रहा है कि कोमल अँगुलियों द्वारा वंशीवादन से लोग थिरक उठते हैं। जैसे गोपिकाएँ भगवान् श्रीकृष्ण की मुरली पर मोहित हो जाती थीं।
• शैली-गेय है।
• भाषा-सहज, स्वाभाविक एवं बोधगम्य है।
In simple words: पहले पद्यांश में हंसों द्वारा मानसरोवर के जल में भोजन खोजने का प्राकृतिक चित्रण है, जबकि दूसरे में बंसी बजाने वाली कोमल उँगलियों का मधुर प्रभाव दर्शाया गया है।

🎯 Exam Tip: काव्य-सौन्दर्य के विश्लेषण में, पंक्तियों के भावार्थ, अलंकार, रस, छंद और भाषा-शैली जैसे साहित्यिक तत्वों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

 

Question. 2. निम्नलिखित शब्द युग्मों से विशेषण-विशेष्य अलग कीजिएअतिशय शीतल, स्वर्णिम कमलों, प्रणय कलह, रजत-रचित ।
Answer:
विशेषण विशेष्य अतिशय -
कलह स्वर्णिम
कमलों रजत
शीतल प्रणय
रचित
In simple words: इस प्रश्न में दिए गए प्रत्येक शब्द युग्म से विशेषण (जो विशेषता बताता है) और विशेष्य (जिसकी विशेषता बताई जाती है) को पहचान कर अलग करना है।

🎯 Exam Tip: विशेषण-विशेष्य की पहचान करते समय यह ध्यान रखें कि विशेषण हमेशा विशेष्य से पहले आकर उसकी विशेषता बताता है या उसे स्पष्ट करता है।

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