UP Board Solutions Class 12 Sahityik Hindi Gadya Chapter 1 Rashtra Ka Swaroop

NCERT Solutions for Class 12 Sahityik Hindi: Chapter 01 राष्ट्र का स्वरूप

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Practice Class 12 Sahityik Hindi Solutions: Chapter 01 राष्ट्र का स्वरूप

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राष्ट्र का स्वरूप – जीवन/साहित्यिक परिचय

प्रश्न-पत्र में पाठ्य-पुस्तक में संकलित पाठों में से लेखकों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित एक प्रश्न पूछा जाता हैं। इस प्रश्न में किन्हीं 4 लेखकों के नाम दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक लेखक के बारे में लिखना होगा। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन-परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ भारतीय संस्कृति और पुरातत्त्व के विद्वान वासुदेवशरण अग्रवाल का जन्म वर्ष 1904 में उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के खेड़ा' नामक ग्राम में हुआ था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद एम.ए. पी.एच.डी. तथा डी. लिट की उपाधि इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की। इन्होंने पालि, संस्कृत, अंग्रेजी आदि भाषाओं एवं उनके साहित्य का गहन अध्ययन किया। ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारती महाविद्यालय में 'पुरातत्त्व एवं प्राचीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष रहे । वासुदेवशरण अग्रवाल दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय के भी अध्यक्ष रहे । हिन्दी की इस महान् विभूति का वर्ष 1967 में स्वर्गवास हो गया।

साहित्यिक सेवाएँ इन्होंने कई ग्रन्थों का सम्पादन व पाठ शोधन भी किया जायसी के 'पद्मावत' की संजीवनी व्याख्या और बाणभट्ट के 'हर्षचरित' का सांस्कृतिक अध्ययन प्रस्तुत करके इन्होंने हिन्दी साहित्य को गौरवान्वित किया। इन्होंने प्राचीन महापुरुषों-श्रीकृष्ण, वाल्मीकि, मनु आदि का आधुनिक दृष्टिकोण से बुद्धिसंगत चरित्र-चित्रण प्रस्तुत किया।

कृतियाँ डॉ. अग्रवाल ने निबन्ध-रचना, शोध और सम्पादन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
1. निबन्ध संग्रह पृथिवी पुत्र, कल्पलता, कला और संस्कृति, कल्पवृक्ष, भारत की एकता, माता भूमि, वाग्धारा आदि ।
2. शोध पाणिनिकालीन भारत ।
3. म्पादन जायसीकृत पद्मावत की संजीवनी व्याख्या, बाणभट्ट के हर्षचरित का सांस्कृतिक अध्ययन । इसके अतिरिक्त इन्होंने संस्कृत, पालि और प्राकृत के अनेक ग्रन्थों का भी सम्पादन किया।

भाषा-शैली । डॉ. अग्रवाल की भाषा-शैली उत्कृष्ट एवं पाण्डित्यपूर्ण है। इनकी भाषा शुद्ध तथा परिष्कृत खड़ी बोली है। इन्होंने अपनी भाषा में अनेक प्रकार के देशज शब्दों का प्रयोग किया है, जिसके कारण इनकी भाषा सरल, सुबोध एवं व्यावहारिक लगती है। इन्होंने प्रायः उर्दू, अंग्रेजी आदि की शब्दावली, मुहावरों, लोकोक्तियों का प्रयोग नहीं किया है। इनकी भाषा विषय के अनुकूल है। संस्कृतनिष्ठ होने के कारण भाषा में कहीं अवरोध आ गया है, किन्तु इससे भाव प्रवाह में कोई कमी नहीं आई है। अग्रवाल जी की शैली में उनके व्यक्तित्व तथा विद्वता की सहज अभिव्यक्ति हुई है, इसलिए इनकी शैली विचार प्रधान है। इन्होंने गवेषणात्मक, व्याख्यात्मक तथा उद्धरण शैलियों का प्रयोग भी किया है।

हिन्दी साहित्य में स्थान पुरातत्त्व विशेषज्ञ डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल हिन्दी साहित्य में पाण्डित्यपूर्ण एवं सुललित निबन्धकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। पुरातत्वे व अनुसन्धान के क्षेत्र में, उनकी समता कर पाना अत्यन्त कठिन है। उन्हें एक विद्वान् टीकाकार एवं साहित्यिक ग्रन्थों के कुशल सम्पादक के रूप में भी जाना जाता है। अपनी विवेचना पद्धति की मौलिकता एवं विचारशीलता के कारण वे सदैव स्मरणीय रहेंगे।

राष्ट्र का स्वरूप – पाठ का सार

परीक्षा में 'पाठ का सार' से सम्बन्धित कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता है। यह केवल विद्यार्थियों को पाठ समझाने के उद्देश्य से दिया गया है।

प्रस्तुत निबन्ध डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के निबन्ध संग्रह 'पृथिवीपुत्र' से लिया गया है। इसमें लेखक ने राष्ट्र के स्वरूप को तीन तत्वों के सम्मिश्रण से निर्मित माना है-पृथ्वी (भूमि), जन (मनुष्य) और संस्कृति ।

पृथ्वी : हमारी धरती माता लेखक का मानना है कि यह पृथ्वी, भूमि वास्तव में हमारे लिए माँ है, क्योंकि इसके द्वारा दिए गए अन्न-जल से ही हमारा भरण-पोषण होता है। इसी से हमारा जीवन अर्थात् अस्तित्व बना हुआ है। धरती माता की कोख में जो अमूल्य निधियाँ भरी पड़ी हैं, उनसे हमारा आर्थिक विकास सम्भव हुआ है और आगे भी होगा। पृथ्वी एवं आकाश के अन्तराल में जो सामग्री भरी हुई है, पृथ्वी के चारों ओर फैले गम्भीर सागर में जो जलघर एवं रत्नों की राशियाँ हैं, उन सबका हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव । अतः हमें इन सबके प्रति आत्मीय चेतना रखने की आवश्यकता है। इससे हमारी राष्ट्रीयता की भावना को विकसित होने में सहायता मिलती है।

राष्ट्र का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं सजीव अंग : जन (मनुष्य) लेखक का मानना है कि पृथ्वी अर्थात् भूमि तब तक हमारे लिए महत्त्वपूर्ण नहीं हो सकती, जब तक इस भूमि पर निवास करने वाले जन को साथ में जोड़कर न देखा जाए। पृथ्वी माता है और इस पर रहने वाले जन अर्थात् मनुष्य इसकी सन्तान। जनों का विस्तार व्यापक है और इनकी विशेषताएँ भी विविध हैं। वस्तुतः जन का महत्त्व सर्वाधिक है। राष्ट्र जन से ही निर्मित होता है। जन के बिना राष्ट्र की कल्पना असम्भव है। ये जन अनेक उतार-चढ़ाव से जूझते हुए, कठिनाइयों का सामना करते हुए आगे बढ़ने के लिए कृत संकल्प रहते हैं। इन सबके प्रति आत्मीयता की भावना हमारे अन्दर राष्ट्रीयता की भावना को सुदृढ़ करती है।

संस्कृति : जन (मनुष्य) के जीवन की श्वास-प्रश्वास लेखक का मानना है कि यह संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है और सरकृति के विकास एवं अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि सम्भव है। अनेक संस्कृतियों के रहने के बावजूद सभी संस्कृतियों का मूल आधार पारस्परिक सहिष्णुता एवं समन्वय की भावना है। यही हमारे बीच पारस्परिक प्रेम एवं भाई-चारे का स्रोत है और इसी से राष्ट्रीयता की भावना को बल मिलता है।

लेखक का मानना है कि सहृदय व्यक्ति प्रत्येक संस्कृति के आनन्द पक्ष को स्वीकार करता है और उससे आनन्दित होता है। लेखक का मानना है कि अपने पूर्वजों से प्राप्त परम्पराओं, रीति-रिवाजों को बोझ न समझकर उन्हें सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। उन्हें भविष्य की उन्नति का आधार बनाकर ही राष्ट्र का स्वाभाविक विकास सम्भव है।

गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में गद्य भाग से दो गद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

Question 1. भूमि का निर्माण देवों ने किया है, वह अनंत काल से है। उसके भौतिक रूप, सौन्दर्य और समृद्धि के प्रति सचेत होना हमारा आवश्यक कर्तव्य है। भूमि के पार्थिव स्वरूप के प्रति हम जितने अधिक जागरित होंगे उतनी ही हमारी राष्ट्रीयता बलवती हो सकेगी। यह पृथ्वी सच्चे अर्थों में समस्त राष्ट्रीय विचारधाराओं की जननी है, जो राष्ट्रीय पृथ्वी के साथ नहीं जुडी, वह निर्मुल होती है। राष्ट्रीयता की जड़ें पृथ्वी में जितनी गहरी होंगी, उतना ही राष्ट्रीय भावों का अंकुर पल्लवित होगा। इसलिए पृथ्वी के भौतिक स्वरूप की आद्योपान्त जानकारी प्राप्त करना, उसकी सुन्दरता, उपयोगिता और महिमा को पहचानना आवश्यक धर्म है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

 

Question 1.(i). प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है तथा इसके लेखक कौन हैं?
Answer: प्रस्तुत गद्यांश 'राष्ट्र का स्वरूप' पाठ से लिया गया है तथा इसके लेख ‘वासुदेवशरण अग्रवाल' हैं।
In simple words: यह गद्यांश 'राष्ट्र का स्वरूप' नामक पाठ से लिया गया है और इसके लेखक वासुदेवशरण अग्रवाल हैं।

🎯 Exam Tip: गद्यांश आधारित प्रश्नों में पाठ का नाम और लेखक का नाम लिखना महत्वपूर्ण है, इससे पूरे अंक मिलते हैं।

 

Question 1.(ii). प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने किस बात पर बल दिया हैं?
Answer: प्ररतुत गद्यांश में लेखक ने राष्ट्र या देश के प्रथम महत्वपूर्ण तरच 'भूमि' या 'धरती' के रूप, उपयोगिता एवं महिमा के प्रति सर्तक रहने तथा उसे समृद्ध ।” बनाने की बात पर बल दिया है।
In simple words: लेखक ने इस गद्यांश में भूमि के महत्व को समझाते हुए बताया है कि हमें अपनी धरती के स्वरूप, उपयोगिता और महिमा को जानना चाहिए ताकि हमारा राष्ट्र समृद्ध बन सके।

🎯 Exam Tip: लेखक के मुख्य विचार को पहचानना और उसे संक्षेप में प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 1.(iii). लेखक ने हमारे कर्तव्य के प्रति क्या विचार प्रस्तुत किए हैं?
Answer: लेखक के अनुसार यह धरती या भूमि अनन्तकाल से है, जिसका निर्माण देवताओं ने किया है। इस भूमि के भौतिक स्वरूप, उसके सौन्दर्य एवं उसकी समृद्धि के प्रति सतर्क एवं जागरूक रहना हमारा परम कर्तव्य है।
In simple words: लेखक के अनुसार, हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी धरती के भौतिक स्वरूप, उसकी सुंदरता और समृद्धि के प्रति हमेशा सतर्क और जागरूक रहें, क्योंकि यह भूमि अनंत काल से मौजूद है।

🎯 Exam Tip: कर्तव्यों को स्पष्ट और संक्षिप्त रूप से व्यक्त करें, लेखक के विचारों को यथावत रखें।

 

Question 1.(iv). राष्ट्रीयता की भावना कब निर्मूल मानी जाती हैं?
Answer: लेखक के अनुसार हमारी समस्त राष्ट्रीय विचारधाराओं की जननी वस्तुतः पृथ्वी या धरती है। कोई भी राष्ट्रीयता यदि अपनी धरती से नहीं जुड़ी हो, तो उस राष्ट्रीयता की भावना को निर्मूल एवं निराधार माना जाता है।
In simple words: राष्ट्रीयता की भावना तब निर्मूल मानी जाती है जब वह अपनी धरती या मातृभूमि से जुड़ी हुई नहीं होती, क्योंकि धरती ही सभी राष्ट्रीय विचारधाराओं की जननी है।

🎯 Exam Tip: 'निर्मूल' शब्द का अर्थ समझते हुए, राष्ट्रीयता की जड़ें भूमि से कैसे जुड़ी हैं, इस संबंध को स्पष्ट करें।

 

Question 1.(v). 'निर्मूल' और 'पल्लवित' शब्दों में क्रमशः उपसर्ग और प्रत्यय छाँटकर लिखिए ।
Answer: निर्मूल – निर् (उपसर्ग) पल्लवित - इत (प्रत्यय)
In simple words: 'निर्मूल' में 'निर्' उपसर्ग है जिसका अर्थ बिना या रहित होता है, और 'पल्लवित' में 'इत' प्रत्यय है जो किसी चीज के विकसित या फैले होने को दर्शाता है।

🎯 Exam Tip: उपसर्ग और प्रत्यय की पहचान व्याकरण का एक महत्वपूर्ण भाग है; सही पहचान से पूरे अंक मिलते हैं।

 

Question 2. पृथ्वी और आकाश के अन्तराल में जो कुछ सामग्री भरी है, पृथ्वी के चारों ओर फैले हुए गम्भीर सागर में जो जलचर एवं रत्नों की राशियाँ । हैं, उन सबके प्रति चेतना और स्वागत के नए भाव राष्ट्र में फैलने चाहिए। राष्ट्र के नवयुवकों के हृदय में उन सबके प्रति जिज्ञासा की नयी किरणें जब तक नहीं फूटतीं, तब तक हम सोये हुए के समान हैं। विज्ञान और उद्यम दोनों को मिलाकर राष्ट्र के भौतिक स्वरूप का एक नया ठाट खड़ा करना है। यह कार्य प्रसन्नता, उत्साह और अथक परिश्रम के द्वारा नित्य आगे बढ़ाना चाहिए। हमारा ध्येय हो कि राष्ट्र में जितने हाथ हैं, उनमें से कोई भी इस कार्य में भाग लिए बिना रीता न रहे।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

 

Question 2.(i). राष्ट्रीय चेतना में भौतिक ज्ञान-विज्ञान के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
Answer: लेखक के अनुसार, राष्ट्रीयता की भावना केवल भावनात्मक स्तर तक ही नहीं होनी चाहिए, बल्कि भौतिक ज्ञान-विज्ञान के प्रति जागृति के स्तर पर भी होनी चाहिए, क्योंकि पृथ्वी एवं आकाश के बीच विद्यमान नक्षत्र, समुद्र में स्थित जलचर, खनिजों एवं रत्नों का ज्ञान आदि भौतिक ज्ञान-विज्ञान राष्ट्रीय चेतना को सुदृढ बनाने हेतु आवश्यक होते हैं।
In simple words: राष्ट्रीय चेतना के लिए केवल भावनात्मक जुड़ाव ही काफी नहीं है, बल्कि हमें भौतिक ज्ञान-विज्ञान के माध्यम से अपनी पृथ्वी और उसके संसाधनों को समझना और जानना भी आवश्यक है।

🎯 Exam Tip: भौतिक ज्ञान-विज्ञान के महत्व को विस्तार से समझाते हुए, राष्ट्रीय चेतना से उसके जुड़ाव को स्पष्ट करें।

 

Question 2.(ii). लेखक ने राष्ट्र की सुप्त अवस्था कब तक स्वीकार की है?
Answer: लेखक ने राष्ट्र की सुप्त अवस्था तब तक स्वीकार की है, जब तक नवयुवकों में राष्ट्रीय चेतना और भौतिक ज्ञान-विज्ञान के प्रति जिज्ञासा विकसित न हो जाए। जब तक राष्ट्र के नवयुवक जिज्ञासु और जागरूक नहीं होंगे, तब तक राष्ट्र को सुप्तावस्था में ही माना जाना चाहिए।
In simple words: लेखक का मानना है कि जब तक देश के युवा भौतिक ज्ञान-विज्ञान और राष्ट्रीय चेतना के प्रति जागरूक नहीं होते, तब तक राष्ट्र को सोई हुई अवस्था में ही माना जाना चाहिए।

🎯 Exam Tip: 'सुप्त अवस्था' के संदर्भ में नवयुवकों की भूमिका और ज्ञान-विज्ञान के महत्व को उजागर करें।

 

Question 2.(iii). विज्ञान और श्रम के संयोग से राष्ट्र प्रगति के पथ पर कैसे अग्रसर हो सकता है?
Answer: लेखक के अनुसार विज्ञान और परिश्रम दोनों को एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करना चाहिए, तभी किसी राष्ट्र का भौतिक स्वरूप उन्नत बन सकता है अर्थात् विज्ञान का विकास इस प्रकार हो कि उससे श्रमिकों को हानि न पहुँचे और उनके कार्य और कुशलता में वृद्धि हो । यह कार्य बिना किसी दबाव के हो तथा सर्वसम्मति में हो। इस प्रकार कोई भी राष्ट्र प्रगति कर सकता है।
In simple words: राष्ट्र की प्रगति के लिए विज्ञान और परिश्रम का एक साथ उपयोग आवश्यक है, जिससे श्रमिकों को लाभ हो और उनका कार्यकुशलता बढ़े।

🎯 Exam Tip: विज्ञान और श्रम के सहयोगात्मक महत्व पर जोर देते हुए, राष्ट्रीय प्रगति में उनकी भूमिका को स्पष्ट करें।

 

Question 2.(iv). लेखक के अनुसार, राष्ट्र समृद्धि का उद्देश्य कब पूर्ण नहीं हो पाएगा?
Answer: लेखक के अनुसार, राष्ट्र समृद्धि का उद्देश्य तब तक पूर्ण नहीं हो पाएगा, जब तक देश का कोई भी नागरिक बेरोजगार होगा, क्योंकि राष्ट्र का निर्माण एक एक व्यक्ति से होता है। यदि एक भी व्यक्ति को रोजगार नहीं मिलेगा, तो राष्ट्र की प्रगति अवरुद्ध हो जाएगी।
In simple words: राष्ट्र की समृद्धि का लक्ष्य तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक देश का प्रत्येक नागरिक बेरोजगार रहता है, क्योंकि हर व्यक्ति का योगदान राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण है।

🎯 Exam Tip: बेरोजगारी और राष्ट्र की प्रगति के संबंध को स्पष्ट रूप से दर्शाएं, व्यक्ति के योगदान पर बल दें।

 

Question 2.(v). 'स्वागत' का सन्धि विच्छेद करते हुए उसका भेद बताइए ।
Answer: सु + आगत = स्वागत (यण् सन्धि)
In simple words: 'स्वागत' शब्द का संधि विच्छेद 'सु + आगत' है और यह 'यण् सन्धि' का उदाहरण है।

🎯 Exam Tip: संधि विच्छेद और संधि के भेद को सही ढंग से पहचानना व्याकरण में सटीक अंक प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।

 

Question 3. माता अपने सब पुत्रों को समान भाव से चाहती है। इसी प्रकार पृथ्वी पर बसने वाले जन बराबर हैं। उनमें ऊँच और नीच का भाव नहीं है। जो मातृभूमि के उदय के साथ जुड़ा हुआ है, वह समान अधिकार का भागी हैं। पृथ्वी पर निवास करने वाले जनों का विस्तार अनन्त-नगर और जनपद, पैर और गाँव, जंगल और पर्वत नाना प्रकार के जनों से भरे हुए हैं। ये जन अनेक प्रकार की भाषाएँ बोलने वाले और अनेक धमों के मानने वाले हैं, फिर भी ये मातृभूमि के पुत्र हैं और इस कारण उनका सौहार्द्र भाव अखण्ड है। सभ्यता और रहन-सहन की दृष्टि से जन एक दूसरे से आगे-पीछे हो सकते हैं, किन्तु इस कारण से मातृभूमि के साथ उनका जो सम्बन्ध है उसमें कोई भेद-भाव उत्पन्न नहीं हो सकता। पृथ्वी के विशाल प्रांगण में सब जातियों के लिए समान क्षेत्र हैं। समन्वय के मार्ग से भरपूर प्रगति और उन्नति करने का सबको एक जैसा अधिकार है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

 

Question 3.(i). प्रस्तुत गद्यांश में माता और पृथ्वी की समानता किस आधार पर की गई
Answer: प्रस्तुत गद्यांश में माता और पृथ्वी के मध्य समानता प्रकट करते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार प्रत्येक माता अपने सभी पुत्रों को समान भाव से स्नेह करती है तथा सबके दुःख और सुख में साथ रहती है, उसी प्रकार पृथ्वी भी अपने सभी पुत्रों अर्थात् पृथ्वीवासियों को जिसमें सभी छोटे-बड़े प्राणी शामिल हैं, प्यार देती है तथा उनकी जरूरतों को पूरा करने में सहयोग देती हैं।
In simple words: माता और पृथ्वी की समानता इस आधार पर की गई है कि जैसे माता अपने सभी बच्चों को समान प्यार देती है, वैसे ही पृथ्वी अपने सभी निवासियों को समान रूप से पोषण और सहयोग देती है।

🎯 Exam Tip: माता और पृथ्वी के बीच समानता के मूल कारण को स्पष्ट करें और उदाहरणों के साथ समझाएं।

 

Question 3.(ii). “प्रगति और उन्नति करने का सबको एक जैसा अधिकार है-से लेखक का क्या आशय है?
Answer: प्रस्तुत पंक्ति से लेखक का आशय यह है कि व्यक्ति अमीर हों या गरीब, प्रगतिशील हो या पिछड़ा, सभी में मातृभूमि के लिए समान प्रेम-भाव होता है। संसार के समस्त प्राणियों को प्रगति व उन्नति करने के लिए मातृभूमि समान अवसर प्रदान करती है तथा इनकी समन्वय की भावना ही राष्ट्र की उन्नति च प्रगति का आधार होती हैं।
In simple words: लेखक का आशय यह है कि अमीर या गरीब, हर व्यक्ति को मातृभूमि पर प्रगति और उन्नति करने का समान अवसर मिलना चाहिए, और सभी को समन्वय की भावना से ही राष्ट्र आगे बढ़ता है।

🎯 Exam Tip: दिए गए कथन का अर्थ स्पष्ट करें और उसे राष्ट्रीय एकता और प्रगति से जोड़कर समझाएं।

 

Question 3.(iii). गद्यांश में मातृभूमि की सीमाओं को अनन्त क्यों कहा गया है?
Answer: गोश में मातृभूमि की सीमाओं को अनन्त इसलिए कहा गया है, क्योंकि इसके निवासी अनेक नगरों, शहरों, जनपदों, गाँवों, जंगलों एवं पर्वतों में बसे हुए हैं। भिन्न-भिन्न स्थानों पर रहने वाले व्यक्ति अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं तथा विभिन्न धर्मों को मानने वाले हैं, परन्तु वे सभी एक ही धरती माता के पुत्र हैं।
In simple words: मातृभूमि की सीमाओं को अनंत इसलिए कहा गया है क्योंकि इसमें विभिन्न नगरों, गाँवों, जंगलों और पर्वतों में अलग-अलग भाषाएँ और धर्मों के लोग रहते हैं, फिर भी वे सब एक ही मातृभूमि के पुत्र हैं।

🎯 Exam Tip: मातृभूमि की विशालता और विविध निवासियों की एकता के आधार पर 'अनन्त' शब्द की सार्थकता बताएं।

 

Question 3.(iv). प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से क्या सन्देश मिलता है
Answer: प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने राष्ट्र के विभिन्न महत्वपूर्ण अंगों का विवेचन करते हुए हमें सन्देश दिया है कि समानता का व्यवहार करते हुए हमें अपनी धरती माता की निःस्वार्थ भाव से सेवा करनी चाहिए ।
In simple words: यह गद्यांश हमें यह संदेश देता है कि हमें अपनी मातृभूमि की निःस्वार्थ भाव से सेवा करनी चाहिए और सभी प्राणियों के प्रति समानता का व्यवहार रखना चाहिए।

🎯 Exam Tip: गद्यांश के मुख्य संदेश को स्पष्ट और संक्षिप्त रूप से व्यक्त करें, जिसमें समानता और निःस्वार्थ सेवा पर जोर हो।

 

Question 3.(v). 'मातृभूमि' शब्द का समास विग्रह करते हुए उसका भेद लिखें।
Answer: मातृभूमि – माता की भूमि (तत्पुरुष समास)।
In simple words: 'मातृभूमि' का समास विग्रह 'माता की भूमि' है, और यह 'तत्पुरुष समास' का उदाहरण है।

🎯 Exam Tip: समास विग्रह करते समय शब्दों के अर्थ और उनके संबंधों को सही ढंग से पहचानें, और समास के भेद को स्पष्ट करें।

 

Question 4. राष्ट्र का तीसरा अंग जन की संस्कृति है। मनुष्यों ने युगों-युगों में जिस सभ्यता का निर्माण किया है वही उसके जीवन की श्वास-प्रश्वास है। बिना संस्कृति के जन की कल्पना कबन्ध मात्र है; संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है। संस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि सम्भव है। राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ जन की संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि भूमि और जन अपनी संस्कृति से विरहित कर दिए जाएँ तो राष्ट्र को लोप समझना चाहिए। जीवन के विटप का पुष्प संस्कृति है। संस्कृति के सौन्दर्य और सौरभ में ही राष्ट्रीय जन के जीवन का सौन्दर्य और यश अन्तर्निहित है। ज्ञान और कर्म दोनों के पारस्परिक प्रकाश की संज्ञा संस्कृति है। भूमि पर बसने ' वाले जन ने ज्ञान के क्षेत्र में जो सोचा है और कर्म के क्षेत्र में जो रचा है, दोनों के रूप में हमें राष्ट्रीय संस्कृति के दर्शन मिलते हैं। जीवन के विकास की युक्ति ही संस्कृति के रूप में प्रकट होती है। प्रत्येक जाति अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ इस युक्ति को निश्चित करती है और उससे प्रेरित संस्कृति का विकास करती हैं। इस दृष्टि से प्रत्येक जन की अपनी-अपनी भावना के अनुसार पृथक्-पृथक् संस्कृतियाँ राष्ट्र में विकसित होती हैं, परन्तु उन सबका मूल-आधार पारस्परिक सहिष्णुता और समन्वय पर निर्भर है।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

 

Question 4.(i). लेखक के अनुसार राष्ट्र का तीसरा महत्त्वपूर्ण अंग क्या है?
Answer: लेखक ने भूमि एवं जन के बाद राष्ट्र का तीसरा महत्वपूर्ण अंग जन की ' संस्कृति को बताया है। मनुष्य ने युगों-युगों से जिस सभ्यता का निर्माण किया है, वह राष्ट्र के लोगों के लिए जीवन की श्वास के समान महत्वपूर्ण है, क्योंकि संस्कृति के अभाव में राष्ट्र के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिह्न लग सकता है।
In simple words: लेखक के अनुसार, राष्ट्र का तीसरा महत्वपूर्ण अंग 'जन की संस्कृति' है, जो मानव सभ्यता और जीवन की श्वास-प्रश्वास के समान है, और इसके बिना राष्ट्र का अस्तित्व संभव नहीं है।

🎯 Exam Tip: राष्ट्र के तीन प्रमुख अंगों (भूमि, जन, संस्कृति) को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और संस्कृति के महत्व पर जोर दें।

 

Question 4.(ii). संस्कृति से क्या अभिप्राय है?
Answer: संस्कृति मनुष्य के मस्तिष्क से निर्मित वह व्यवस्था है, जिसके आधार पर परस्पर सह-अस्तित्व रखते हुए विभिन्न क्षेत्रों में विचारों, भावनाओं, संवेदनाओं, मूल्यों, रीति-रिवाजों, परम्पराओं का एक-दूसरे के साथ आदान-प्रदान होता है। तथा सामूहिक जीवन सम्भव हो पाता है।
In simple words: संस्कृति वह व्यवस्था है जो मानव मस्तिष्क द्वारा बनाई गई है, जिसके माध्यम से विचार, भावनाएं, मूल्य और रीति-रिवाज एक-दूसरे से साझा होते हैं, और इससे सामूहिक जीवन संभव होता है।

🎯 Exam Tip: संस्कृति की व्यापक परिभाषा को स्पष्ट करें, जिसमें उसके विभिन्न तत्वों और मानव जीवन पर उसके प्रभाव का उल्लेख हो।

 

Question 4.(iii). राष्ट्र की उन्नति में संस्कृति का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
Answer: राष्ट्र की उन्नति एवं विकास में संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि संस्कृति के विकास एवं अभ्युदय के फलस्वरूप राष्ट्र के लोगों के मस्तिष्क का विकास होता है, जिससे राष्ट्र की उन्नति एवं वृद्धि सम्भव हो पाती है।
In simple words: संस्कृति के विकास से राष्ट्र के लोगों का मानसिक विकास होता है, जिससे राष्ट्र की समग्र उन्नति और प्रगति संभव होती है।

🎯 Exam Tip: संस्कृति के विकास और राष्ट्र की उन्नति के बीच सीधा संबंध स्थापित करें, मानसिक विकास को मुख्य बिंदु बनाएं।

 

Question 4.(iv). जीवन के विटप का पुष्य संस्कृति है' से लेखक का क्या अभिप्राय है?
Answer: जिस प्रकार वृक्ष का सम्पूर्ण सौन्दर्य, महिमा उसके पुष्प में ही निहित होती है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य के जीवन रूपी वृक्ष का सम्पूर्ण सौन्दर्य, महिमा, सौरभ संस्कृति रूपी पुष्य में निहित होता है। जीवन के गौरव, चिन्तन, मनन और सौन्दर्य बोध में संस्कृति ही प्रतिबिम्बित होती है।
In simple words: इस कथन का अर्थ है कि जिस प्रकार एक वृक्ष की सुंदरता उसके फूलों में होती है, उसी प्रकार मानव जीवन का गौरव और सुंदरता उसकी संस्कृति में निहित है।

🎯 Exam Tip: उपमा का अर्थ स्पष्ट करें और 'संस्कृति' को 'जीवन के पुष्प' के रूप में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका समझाएं।

 

Question 4.(v). 'विटप' तथा 'पुष्प' शब्दों के तीन-तीन पर्यायवाची शब्द लिखिए।
Answer: विटप – वृक्ष, पेड़, वट ।। पुष्प – फूल, कुसुम, सुमन ।
In simple words: 'विटप' के पर्यायवाची शब्द वृक्ष, पेड़, वट हैं, जबकि 'पुष्प' के पर्यायवाची शब्द फूल, कुसुम, सुमन हैं।

🎯 Exam Tip: पर्यायवाची शब्दों को सही और स्पष्ट रूप से लिखना, व्याकरण संबंधी प्रश्नों में पूरे अंक प्राप्त करने में मदद करता है।

 

Question 5. गाँवों और जंगलों में स्वच्छन्द जन्म लेने वाले लोकगीतों में, तारों के नीचे विकसित लोक-कथाओं में संस्कृति का अमिट भण्डार भरा हुआ है, जहाँ से आनन्द की भरपूर मात्रा प्राप्त हो सकती है। राष्ट्रीय संस्कृति के परिचयकाल में उन सबका स्वागत करने की आवश्यकता है। पूर्वजों ने चरित्र और धर्म-विज्ञान, साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में जो कुछ भी पराक्रम किया है, उस सारे विस्तार को हम गौरव के साथ धारण करते हैं और उसके तेज को अपने भावी जीवन में साक्षात् देखना चाहते हैं। यही राष्ट्र-संवर्धन का स्वाभाविक प्रकार हैं। जहाँ अतीत वर्तमान के लिए भार रूप नहीं है, जहाँ भूत वर्तमान को जकड़कर नहीं रखना चाहता वरन् अपने वरदान से पुष्ट करके उसे आगे बढ़ाना चाहता है, उस राष्ट्र का हम स्वागत करते हैं।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

 

Question 5.(i). संस्कृति के वाहक एवं संरक्षक के रूप में लेखक ने किसे प्रस्तुत किया है?
Answer: लोक गीतों और लोक कथाओं को लेखक ने संस्कृति के वाहक एवं संरक्षक के रूप में प्रस्तुत किया है, क्योंकि ये लोक गीत एवं लोक कथाएँ हमारे आचार-विचार, सभ्यता, रीति-रिवाजों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा यही हमारी संस्कृति का भण्डार होते हैं।
In simple words: लेखक ने लोकगीतों और लोककथाओं को संस्कृति का वाहक और संरक्षक माना है, क्योंकि ये हमारी सभ्यता, रीति-रिवाजों और विचारों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

🎯 Exam Tip: संस्कृति के तत्वों को पहचानें और लेखक द्वारा उनके वाहक के रूप में बताए गए माध्यमों को स्पष्ट करें।

 

Question 5.(ii). लेखक के अनुसार राष्ट्र की धरोहर क्या हैं?
Answer: लेखक के अनुसार हमारे पूर्वजों ने चरित्र, धर्म-विज्ञान, साहित्य, कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में अपनी लगन, परिश्रम एवं बुद्धि के बल पर जो कुछ भी प्राप्त किया, वही राष्ट्र की धरोहर है।
In simple words: लेखक के अनुसार, हमारे पूर्वजों द्वारा चरित्र, धर्म-विज्ञान, साहित्य, कला और संस्कृति में किए गए सभी पराक्रम और उपलब्धियां ही राष्ट्र की वास्तविक धरोहर हैं।

🎯 Exam Tip: 'धरोहर' शब्द का अर्थ समझते हुए, पूर्वजों के योगदान को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें।

 

Question 5.(iii). एक राष्ट्र की उन्नति कब सम्भव हो सकती है?
Answer: एक राष्ट्र की स्वाभाविक उन्नति तभी सम्भव है, जब राष्ट्र के लोग प्राचीन इतिहास से जुड़कर भावी उन्नति की दिशा में प्रयास करें। ऐसा राष्ट्र प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उनकी उन्नति की दिशा को प्रशस्त करता है।
In simple words: राष्ट्र की उन्नति तभी संभव है जब उसके नागरिक अपने अतीत से प्रेरणा लेकर भविष्य की प्रगति के लिए सक्रिय रूप से प्रयास करें।

🎯 Exam Tip: राष्ट्र की उन्नति के लिए अतीत और भविष्य के संबंध को दर्शाएं, व्यक्तिगत प्रयास को महत्व दें।

 

Question 5.(iv). हम किस भावना के माध्यम से अपने भविष्य को उज्ज्वल बना सकते हैं?
Answer: हम अपनी प्राचीनता के प्रति गौरव की भावना के माध्यम से अपने भविष्य को उज्वल बना सकते हैं, क्योंकि यह भावना हमारे अन्तर्मन में प्रगति हेतु एक प्रबल आकांक्षा उत्पन्न करती है कि हम इस गौरव को अपने जीवन में उतारकर अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए प्रयासरत् रहें।
In simple words: हम अपनी प्राचीन परंपराओं और उपलब्धियों पर गर्व करते हुए, उनसे प्रेरणा लेकर अपने भविष्य को उज्ज्वल बना सकते हैं।

🎯 Exam Tip: प्राचीन गौरव से भविष्य निर्माण की प्रेरणा को स्पष्ट करें, भावना और प्रयास के संबंध को उजागर करें।

 

Question 5.(v). 'संवर्धन' शब्द का सन्धि-विच्छेद करते हुए इसमें प्रयुक्त सन्धि का नाम भी लिखिए।'
Answer: 'सम् + वर्धन' = संवर्धन । यहाँ व्यंजन सन्धि प्रयुक्त हुई है।
In simple words: 'संवर्धन' शब्द का संधि विच्छेद 'सम् + वर्धन' है, और इसमें 'व्यंजन सन्धि' का प्रयोग हुआ है।

🎯 Exam Tip: संधि विच्छेद और संधि के भेद को सही ढंग से पहचानना व्याकरण में सटीक अंक प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।

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