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Detailed Chapter 1 प्रेम माधुरी यमुना छवि UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi
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Class 12 Sahityik Hindi Chapter 1 प्रेम माधुरी यमुना छवि UP Board Solutions PDF
प्रेम माधुरी / यमुना-छवि - जीवन/साहित्यिक परिचय
प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर: देना होता है। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।
जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ आधुनिक युग के प्रवर्तक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 1850 ई. में काशी के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। काशी के प्रसिद्ध सेठ अमीचन्द के वंशज भारतेन्दु के पिता का नाम बाबू गोपालचन्द्र था, जो 'गिरिधरदास' के नाम से कविता लिखते थे। घरेलू परिस्थितियों एवं समस्याओं के कारण भारतेन्दु की शिक्षा व्यवस्थित रूप से नहीं चल पाई। इन्होंने घर पर ही स्वाध्याय द्वारा हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, बांग्ला, मराठी आदि भाषाओं की शिक्षा ग्रहण की। इन्होंने कविताएँ लिखने के साथ-साथ कवि-वचन सुधा (1884 बनारस) नामक पत्रिका का प्रकाशन भी आरम्भ किया। बाद में, हरिश्चन्द्र मैग्जीन (1883 बनारस) तथा 'हरिश्चन्द्र चन्द्रिका' का भी सफल सम्पादन किया। ये साहित्य के क्षेत्र में कवि, नाटककार, इतिहासकार, समालोचक, पत्र-सम्पादक आदि थे, तो समाज एवं राजनीति के क्षेत्र में एक राष्ट्रनेता एवं सच्चे पथ-प्रदर्शक थे। जब राजा शिवप्रसाद को अपनी चाटुकारिता के बदले विदेशी सरकार द्वारा सितारे-हिन्द की पदवी दी गई, तो देश के सुप्रसिद्ध विद्वज्जनों ने इन्हें 1880 ई. में 'भारतेन्दु' विशेषण से विभूषित किया। क्षय रोग से ग्रस्त होने के कारण अल्पायु में ही 1885 ई. में भारत को यह इन्दु (चन्द्रमा) अस्त हो गया।
साहित्यिक गतिविधियाँ गद्यकार के रूप में भारतेन्दु जी को हिन्दी गद्य का जनक माना जाता है। इन्होंने साहित्य को सर्वांगपूर्ण बनाया। काव्य के क्षेत्र में इनकी कृतियों को इनके युग का दर्पण माना जाता है। इनकी निम्नलिखित रचनाएँ उल्लेखनीय हैं।
काव्य कृतियाँ प्रेम मापुरी, प्रेम तरंग, प्रेम सरोवर, प्रेम मालिका, प्रेम प्रलाप, तन्मय लीला, कृष्ण चरित, दान-लीला, भारत वीरत्व, विजयिनी, विजय पताका आदि रचनाओं के अतिरिक्त उर्दू का स्यापा, नए जमाने की मुकरी आदि भी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं।
अन्य कृतियाँ नाटक 'वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति', 'सत्य हरिश्चन्द्र', 'श्रीचन्द्रावली', 'भारत दुर्दशा', 'नीलदेवी' और 'अँधेर नगरी' आदि नाटकों की रचना भारतेन्दु जी ने की। उपन्यास 'पूर्ण प्रकाश' और 'चन्द्रप्रभा' ।
इतिहास और पुरातत्त्व सम्बन्धी कृतियाँ 'कश्मीर कुसुम', 'महाराष्ट्र देश का इतिहास', 'रामायण का समय', 'अग्रवालों की उत्पत्ति', 'बूंदी का राजवंश' और 'चरितावली' । देश-प्रेम सम्बन्धी रचनाएँ । 'भारतवीरत्व, 'विजय-वल्लरी', 'विजयिनी' एवं 'विजय-पताका' प्रमुख हैं।
देश-प्रेम सम्बन्धी रचनाएँ ‘भारत-वीरत्व, ‘विजय-वल्लरी', 'विजयिनी' एवं 'विजय-पताका' प्रमुख हैं।
काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष
1. समाज सुधारक भारतेन्दु जी ने काव्य क्षेत्र को आधुनिक विषयों से सम्पन्न किया और रीति की बँधी-बँधाई परिपाटी से कविता को मुक्त कर आधुनिक युग का द्वार खोल दिया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कवि होने के साथ-साथ समाज सुधारक एवं प्रचारक भी थे। उन्होंने अपने काव्य में अनेक सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया तथा समाज में व्याप्त कुरीतियों पर तीखे व्यंग्य भी किए।
2. राष्ट्रप्रेम की भावना भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपनी सजग राजनीतिक चेतना के फलस्वरूप विदेशी शासन के अत्याचारों से पीड़ित भारतीय जनता में देशभक्ति की भावना एवं राष्ट्रीयता का भाव जगाने का प्रयास किया। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा किए गए शोषण के विरुद्ध जनता को सचेत करने का भी प्रयास किया।
3. सामाजिक दुर्दशा का निरूपण भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने समाज में व्याप्त रूढ़ियों एवं कुप्रथाओं का डटकर विरोध किया। भारतेन्दु जी ने नारी शिक्षा का समर्थन किया तथा विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया। वे सती प्रथा, छुआछूत आदि के विरोधी थे। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक पाखण्ड आदि का निरूपण निःसंकोच किया ।
4. भक्ति भावना भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कृष्ण के भक्त थे और पुष्टि मार्ग को मानने वाले थे। उनकी कविता में सच्ची भक्ति-भावना के दर्शन होते हैं। ईश्वर के प्रति दृढ विश्वास को व्यक्त करते हुए भारतेन्दु जी अपनी दीनता का उल्लेख करते हैं उधारौ दीन बन्धु महाराज जैसे हैं जैसे तुमरे ही नहीं और सौं काज।।।
5. प्रकृति चित्रण प्रकृति चित्रण करने में भारतेन्दु जी को अधिक सफलता नहीं मिली, क्योंकि वे मान-प्रकृति के शिल्पी थे। यद्यपि भारतेन्दु जी ने वसंत, वर्षा आदि ऋतुओं का मनोहारी चित्रण अपने काव्य में किया है। दूसरी ओर उन्होंने गंगा-यमुना, चाँदनी का सुन्दर चित्रण भी अपने काव्य में किया है।
कला पक्ष
1. भाषा भारतेन्दु आधुनिक हिन्दी गद्य के प्रवर्तक थे, जिन्होंने खड़ी बोली को आधार बनाया, लेकिन पद्म के सम्बन्ध में ये शिष्ट, सरल एवं माधुर्य से परिपूर्ण ब्रजभाषा का ही प्रयोग करते रहे। इसी क्रम में इन्होंने ब्रजभाषा के परिमार्जन का कार्य किया। कुछ अप्रचलित शब्दों को बाहर करने के अतिरिक्त भाषा के रूविमुक्त रूप को अपनाया। भाषा के निखार के लिए लोकोक्तियों एवं मुहावरों को भी अपनाया। भारतेन्दु ने पद्म की कुछ रचनाएँ खड़ी बोली में भी की।
2. शैली भारतेन्दु जी की शैली इनके भावों के अनुकूल है। इन्होंने इसमें नवीन प्रयोग करके अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है। इन्होंने अपने काव्य में चार प्रकार की शैलियों को अपनाया
• भावात्मक शैली प्रेम एवं भक्ति के पदों में
• रीतिकालीन अलंकार शैली श्रृंगार के पदों में
• उद्बोधन शैली देश-प्रेम की कविताओं में
• व्यंग्यात्मक शैली समाज सुधार सम्बन्धी कविताओं में इन सभी रचनाओं में इन्होंने काव्य-स्वरूप के अन्तर्गत मुक्तक शैली का प्रयोग किया।
3. छन्द एवं अलंकार भारतेन्दु जी के काव्य में अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है। इन्होंने अपने काव्य में अलंकारों को साधन के रूप में ही अपनाया है, साध्य-रूप में नहीं। भारतेन्दु जी ने मुख्यतः अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा एवं सन्देह अलंकारों को अपने काव्य में अधिक महत्व दिया। कवित्त, सवैया, लावनी, चौपाई, दोहा, छप्पय, गजल, कुण्डलिया आदि छन्दों का प्रयोग इनकी रचनाओं में मिलता है।
हिन्दी साहित्य में स्थान भारतेन्दु जी में वह प्रतिभा थी, जिसके बल पर ये अपने युग को सच्चा एवं सफल नेतृत्व प्रदान कर सका इनकी काव्य कृतियों को इनके युग का दर्पण कहा जाता है। भारतेन्दु जी की विलक्षण प्रतिभा के कारण ही इनके समकालीन युग को हिन्दी साहित्य में 'भारतेन्दु युग' के नाम से जाना जाता है।
पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-पत्र में पद्म भाग से दो पट्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर: देने होंगे।
प्रेम-माधुरी
Question 1. रोकहिं जो तौ अमंगल होय औ प्रेम नसै जो कहैं पिय जाइए। जौ कहैं जाहु न तो प्रभुता जौ कछू न कहैं तो सनेह नसाइए।। जो 'हरिचन्द' कहूँ तुमरे बिनु जीहैं न तो यह क्यों पतिआइए। तासों पयान समै तुम्हरे हम का कहैं आपै हमें समुझाइए ।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तरः दीजिए।
(i) प्रस्तुत पद्यांश के कवि व शीर्षक का नामोल्लेख कीजिए।
Answer: प्रस्तुत पद्यांश आधुनिक युग के प्रवर्तक कवि व नाटककार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित कविता 'प्रेम-माधुरी' से उधृत है।
(ii) पद्यांश में नायिका की किस मनोदशा का वर्णन किया गया है?
Answer: पद्यांश में नायिका की असमंजस एवं दुविधापूर्ण मानसिक स्थिति का वर्णन किया गया है। नायिका का पति परदेश जा रहा है और वह इस असमंजस की स्थिति में है कि किस प्रकार विदेश जाते हुए अपने पति को अपने मनोभावों से अवगत कराए।
(iii) नायिका द्वारा जगत् की किस रीति का उल्लेख किया गया है?
Answer: नायिका जाते हुए किसी को पीछे से टोकने से सम्बन्धित जगत् की रीति का उल्लेख करती है। नायिका कहती है कि यदि वह अपने प्रियतम को पीछे से टोकती हैं, तो लोगों के अनुसार यात्रा को जाते समय किसी को टोकना अशुभ होता है। अतः वह किस प्रकार अपने प्रियतम को अपनी बात बताए ।
(iv) जौ कहूँ जाहु न तो प्रभुता जौ कुछ न कहें तो सनेह नसाइट ।' पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए ।
Answer: प्रस्तुत पंक्ति में नायिका की दुविधापूर्ण स्थिति का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि वह सोचती है, यदि वह अपने प्रियतम से विदेश में जाने के लिए कहती है तो वह उन्हें आदेश देने के समान होगा और यदि वह उनसे कुछ नहीं कहती तो उसका प्रेम नष्ट होगा।
(v) पद्यांश की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
Answer: प्रस्तुत् पद्यांश में कवि ने नायिका की दुविधापूर्ण मानसिक स्थिति को व्यक्त करने के लिए ब्रज भाषा का प्रयोग किया है, जो अत्यन्त प्रभावशाली है। कवि ने मुक्तक शैली का प्रयोग करते हुए सम्पूर्ण कथा अभिव्यक्त की है।
In simple words: This passage beautifully portrays the dilemma of a woman whose beloved is leaving. She is torn between asking him to stay (which would be inauspicious or destroy love) and letting him go (which would show authority or lead to love's decay), unable to express her feelings.
🎯 Exam Tip: Focus on identifying the central emotion (duvidha/dilemma) and the reasons behind it for full marks in interpretive questions.
Question 2. आजु लौं जौ न मिले तो कहा हम तो तुम्हरे सब भाँति कहावें । मेरौ उराहनो है कछु नाहिं सबै फल आपने भाग को पावै ।। जो 'हरिचन्द भई सो भई अब प्रान चले चहूँ तासों सुनावें ।। प्यारे जू है जग की यह रीति बिदा के समै सब कण्ठ लगावें ।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तरः दीजिए।
(i) प्रस्तुत पद्यांश में नायिका की किस दशा की अभिव्यक्ति हुई है?
Answer: नायिका नायक से अत्यधिक प्रेम करती है। वह उसे बिछुड़ने के कारण अत्यधिक दुःखी है तथा उससे मिलने के लिए लालायित है। नायिका की इसे विरह अवस्था की अभिव्यक्ति ही काव्यांश में हुई है।
(ii) नायिका अपनी विरह अवस्था के लिए किसे उत्तर-दायी मानती है?
Answer: नायिका का मानना है कि नायक से न मिल पाने अर्थात् उससे (नायक) विरह के लिए उसका भाग्य ही उत्तर-दायी है। वह कहती है कि सभी अपने भाग्य के अनुसार फल पाते हैं और उसके भाग्य में नायक से विरह लिखा है, इसलिए वह इस दशा से पीड़ित हैं।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश में नायिका ने अपनी कौन-सी इच्छा प्रकट की है?
Answer: प्रस्तुत पद्मांश में नायिका-नायक के विरह में तड़प रही है। उसकी उत्कंठ इच्छा है कि नायक उससे मिलने के लिए आए। नायिका अपनी इच्छा प्रकट करते हुए कहती है कि उसके प्राण अब उसके तन से निकलने वाले हैं। अतः नायक को नायिका से मिलने के लिए आनी चाहिए और उसे गले लगाना चाहिए ।
(iv) प्रस्तुत पद्यांश में नायिका ने जगत की किस रीति का उल्लेख किया हैं?
Answer: नायिका का मानना है कि जगत् की यह रीति (नियम) रही है कि जो व्यक्ति जा रहा होता है, उसे गले लगाकर अन्तिम विदाई दी जाती है। अतः नायक को आकर इस रीति का पालन करना चाहिए।
(v) प्रस्तुत पद्मांश में प्रयुक्त रस को स्पष्ट कीजिए।
Answer: प्रस्तुत पद्मांश में कवि ने वियोग श्रृंगार रस का प्रयोग किया है। इस पद्यांश में कवि ने नायक से नायिका के न मिल पाने के कारण उसकी विरहावस्था का वर्णन किया है। अतः इसमें वियोग श्रृंगार रस हैं। अतः नायक को आकर इस . रीत का पालन करना चाहिए।
In simple words: This passage vividly portrays the intense longing and sorrow of a woman separated from her beloved. She yearns for a final embrace before her life ebbs away, lamenting her fate and reminding him of the tradition of a farewell hug.
🎯 Exam Tip: Correctly identifying 'Viyog Shringar Ras' (separation in love) and explaining its context is crucial for scoring well in such questions.
यमुना-छवि
Question 3. तरनि-तनूजा तट तमाले तरुवर बहु छाए । झुके कुल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाए। किधौं मुकुर मैं लखत उझकि सबै निज-निज सोभा । कै प्रनवत जल जानि परम पावन फल लोभा ।।। मनु आतप वारन तीर कौं सिमिटि सबै छाये रहत । कै हरि सेवा हित नै रहे निरखि नैन मन सुख लहत ।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तरः दीजिए।
(i) प्रस्तुत पद्मांश के शीर्षक व कवि का नाम बताइए।
Answer: प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक हिन्दी में संकलित भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित कविता 'यमुना छवि' से उद्धृत है।।
(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने किसका वर्णन किया हैं?
Answer: प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने यमुना नदी के किनारे छाए हुए तमाल के वृक्षों का वर्णन किया है। जिन्हें देखकर कवि के मस्तिष्क में भिन्न-भिन्न छायाचित्र निर्मित होते हैं।
(iii) यमुना नदी के किनारे खड़े वृक्षों को देखकर कवि को क्या प्रतीत होता है?
Answer: नदी के किनारे खड़े वृक्षों को देखकर कवि को ऐसा प्रतीत होता है जैसे तेमाल के वृक्ष यमुना नदी को स्पर्श करना चाहते हों या फिर वे झुककर नदी के पानी में अपना प्रतिबिम्ब देखना चाहते हों। कभी-कभी कवि को ऐसा लगता है मानो वे नदी के तट को धूप से बचाने के लिए उसे छाया प्रदान कर रहे हों या वे तट पर, कृष्ण को नमन करने एवं उनकी सेवा करने के लिए झुके हुए हौं ।'
(iv) प्रस्तुत पद्यांश के अलंकार सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
Answer: प्रस्तुत पद्मांश में कवि ने अलंकारों का अत्यन्त सुन्दर प्रयोग किया है, जिसने काव्य की शोभा बढ़ा दी हैं। 'तरनि तनूजा तट तमाल', में 'त' वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार, 'सब निज-निज सोभा', में निज-निज की पुनरावृत्ति के कारण पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार व 'मनु आतप वारन तीर कौं' में उत्प्रेक्षा अलंकार हैं तथा सम्पूर्ण पद्यांश में मानवीकरण अलंकार विद्यमान हैं।
(v) ‘तरनि-तनूजा' व 'तट' शब्दों के दो-दो पर्यायवाची, बताइए।
Answer:
| शब्द | पर्यायवाची शब्द |
| तरनि-तनूजा | यमुना, कालिन्दी |
| तट | तीर |
In simple words: This passage describes the beautiful scene of tamal trees leaning over the Yamuna riverbank. The poet imagines them touching the water, seeing their reflection, or bowing out of reverence, creating a serene and picturesque image.
🎯 Exam Tip: Identifying the various figures of speech (Alankar) like Anupras, Punrukti Prakash, Utpreksha, and Manveekaran is key to a comprehensive answer for this poetic description.
Question 4. कबहुँ होत सत चन्द कबहुँ प्रगटत दुरि भाजत ।। पवन गवन बस बिम्ब रूप जल में बहु साजते ।। मनु ससि भरि अनुराग जमुन जल लोटत डोलै । कै तरंग की डोर हिंडोरनि करत कलोलें ।। कै बालगुडी नभ में उड़ी सोहत इत उत धावती। कै अवगाहत डोलत कोऊ ब्रजरमनी जल आवती।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तरः दीजिए।
(i) कवि को यमुना नदी के जल पर पड़े चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को देखकर क्या अनुभूति होती है?
Answer: कवि जब यमुना नदी के जल पर चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को देखता है तो कभी उसे लहरों पर सौ-सौ चन्द्रमा दिखाई देते हैं, कभी वह उसे दूर जाकर अदृश्य होता हुआ अनुभूत होता है। कभी वह उसे जल में झूला झूलते हुए प्रतीत होता है तो कभी उसे उसमें बच्चे द्वारा उड़ाई गई पतंग की अनुभूति होती है।
(ii) “के बालगुडी नभ में उड़ी सोहत इत उत धावती ।” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
Answer: कवि यमुना के जल पर चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को देखकर कल्पना करते हुए कहता है कि यमुना की लहरों पर चन्द्रमा का हिलता हुआ प्रतिबिम्ब ऐसा प्रतीत हो रहा है, मानो किसी बच्चे की पतंग आकाश में हवा के जोर से इधर-उधर हिल रही हो।।
(iii) पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।
Answer: पट्यांश में कवि भारतेन्दु ने यमुना के जल पर पड़ने वाले चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब का वर्णन किया है। चन्द्रमा का यह रूप कवि को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है, जिसे देखकर कवि के मन में भिन्न-भिन्न प्रकार की कल्पनाएँ प्रकट हो रही हैं।
(iv) पट्यांश के शिल्प पक्ष पर प्रकाश डालिए।
Answer: प्रस्तुत पद्मांश में कवि ने ब्रजभाषा का प्रयोग करते हुए मुक्तक शैली में काव्य रचना की है। जल पर पड़ने वाली चन्द्रमा की छाया का वर्णन करते हुए पट्यांश में श्रृंगार रस की प्रधानता विद्यमान है। 'मनु ससि भरि अनुराग' में उत्प्रेक्षा अलंकार व 'सोहत इत उत धावती' में 'त' वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है। माधुर्य गुण व लक्षणा शब्दशक्ति भी काव्य में विद्यमान है।
(v) 'ससि' व 'नभ' शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
Answer:
| शब्द | पर्यायवाची शब्द |
| ससि | राकैश, चन्द्रमा |
| नभ | आकाश, गगन |
In simple words: This passage describes the enchanting dance of the moon's reflection on the Yamuna river's waves. The poet uses various imaginative comparisons, seeing the reflection as multiple moons, a swing, or a kite, to convey its captivating movement.
🎯 Exam Tip: When explaining poetic descriptions, focus on the poet's imagination and the various comparisons used to describe a single object (e.g., moon's reflection) for clear understanding.
Question 5. मनु जुग पच्छ प्रतच्छ होत मिटि जात जमुन जल । कै तारागन ठगन लुकत प्रगटत ससि अबिकल ।। कै कालिन्दी नीर तरंग जितो उपजावत ।। तितनो ही धरि रूप मिलन हित तासों धावत ।।' कै बहुत रजत चकई चलत के फुहार जल उच्छत। कै निसिपति मल्ल अनेक बिधि उठि बैठत कसरत करत।। कुजत कहुँ कलहंस कहूँ मज्जत पारावत । कहुँ कारण्डव उड़त कहूँ जल कुक्कुट धावत ।। चक्रवाक कहुँ बसत कहूँ बक ध्यान लगावत । सुक पिक जल कहुँ पियत कहूँ भ्रमरावलि गावत ।। कहूँ तट पर नाचत मोर बहु रोर बिबिध पच्छी करत । जल पान नहान करि सुख भरे तट सोभा सब जिय धरत ।।
उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तरः दीजिए।
(i) यमुना के जल में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब के दिखने व छिपने की तुलना कवि किससे करता है?
Answer: यमुना के जल में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब के दिखने व छिपने की तुलना कवि माह के दोनों पक्षों कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष से करता है। कवि कहता है कि जब चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है तो ऐसा लगता है, मानो शुक्ल पक्ष के कारण चारों ओर उजाला हो गया। हो और छिपने पर ऐसा लगता है, मानो कृष्ण पक्ष के कारण चारों ओर अँधेरा हो गया हो ।
(ii) “कै कालिन्दी नीर तरंग जितो उपजावत तितनो ही धरि रूप मिलन हित तासों धावत ।।” प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता हैं?
Answer: प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि प्रत्येक लहर के साथ चन्द्रमा की छवि दिखने के कारण कहता है कि उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो चाँद यमुना में उठने वाली प्रत्येक लहर से मिलने के लिए उतने ही रूप धारण करके उनके पीछे उत्साहित होकर दौड़ता रहता है।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने पक्षियों की शोभा का वर्णन किस प्रकार किया है?
Answer: प्रस्तुत पद्मांश में कवि पक्षियों की शोभा का वर्णन करते हुए कहता है कि यमुना के जल में विभिन्न पदी; राजहंस, कबूतर, जल मुर्गियों, चकवा-चकी, बगुले, सोते, कोयल, मोर, भंवरे आदि इधर-उधर विहार कर रहे हैं। कोई स्नान कर रहा है, कोई गीत गा रहा है। और कोई नृत्य कर रहे हैं। इस प्रकार, कवि ने पक्षियों के विभिन्न यिा -कलापों का वर्णन किया है।
(iv) पद्यांश की अलंकार योजना पर प्रकाश डालिए।
Answer: पशि में अलंकारों का प्रयोग उसके शिल्प एवं भाव पक्ष में सौन्दर्य उत्पन्न कर देता है। पाश में 'जात, जमुन जल' व 'कुजत कई कलहंस कहूँ' में क्रमशः 'ज' व 'क' वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार, 'तितनो ही धरि रूप मिलन हित तास धावत' में मानवीकरण, 'मनु जुग पच्छ प्रतछ' में उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग कवि ने किया है।
(v) 'कालिन्दी' व 'सुक' शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
Answer:
| शब्द | पर्यायवाची शब्द |
| कालिन्दी | यमुना, सूर्यसुता |
| सुक | तोता, सुगा |
In simple words: This passage paints a vibrant picture of the Yamuna river at night, where the moon's reflection plays hide-and-seek like the moon phases. It then transitions to describe the diverse activities of various birds—swans, pigeons, ducks, herons, parrots, cuckoos, and peacocks—enjoying the water and banks, creating a lively and beautiful riverside scene.
🎯 Exam Tip: For descriptions of nature, focus on identifying the different elements (moon, birds, river) and the specific actions or comparisons attributed to them, along with relevant figures of speech.
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