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Detailed Chapter 7 प्रत्यावर्ती धारा UP Board Solutions for Class 12 Physics
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Class 12 Physics Chapter 7 प्रत्यावर्ती धारा UP Board Solutions PDF
UP Board Solutions For Class 12 Physics Chapter 7 Alternating Current (प्रत्यावर्ती धारा)
अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर
Question 1. एक 100 Ω का प्रतिरोधक 220 V, 50 Hz आपूर्ति से संयोजित है।
(a) परिपथ में धारा का rms मान कितना है?
(b) एक पूरे चक्र में कितनी नेट शक्ति व्यय होती है?
Answer: हल - यहाँ \( R = 100 \Omega \), \( V_{rms} = 220 \) वोल्ट, \( f = 50 \) Hz
(a) \( I_{rms} = \frac{V_{rms}}{R} = \frac{220 \text{ वोल्ट}}{100 \text{ ओम}} = 2.2 \) ऐम्पियर
(b) प्रतिरोधक में पूरे एक चक्र में व्यय औसत शक्ति
\( P = V_{rms} \times I_{rms} = 220 \text{ वोल्ट} \times 2.2 \text{ ऐम्पियर} = 484 \text{ वाट} \)
In simple words: इस प्रश्न में, हमें एक प्रतिरोधक के लिए धारा का rms मान और एक पूरे चक्र में व्यय हुई नेट शक्ति ज्ञात करनी है। धारा का rms मान ओम के नियम से निकाला जाता है (\( I_{rms} = V_{rms} / R \)), और औसत शक्ति (\( P = V_{rms} \times I_{rms} \)) के सूत्र से ज्ञात की जाती है।
🎯 Exam Tip: प्रतिरोधक वाले AC परिपथों में औसत शक्ति की गणना करते समय शक्ति गुणांक (cosφ) का मान 1 होता है क्योंकि धारा और वोल्टता समान कला में होते हैं।
Question 2. (a) ac आपूर्ति का शिखर मान 300 V है। rms वोल्टता कितनी है?
(b) ac परिपथ में धारा का rms मान 10 A है। शिखर धारा कितनी है?
Answer: हल-(a) यहाँ \( V_0 = 300 \) वोल्ट
\( V_{rms} = \frac{V_0}{\sqrt{2}} = \frac{300 \text{ वोल्ट}}{\sqrt{2}} = 150\sqrt{2} \text{ वोल्ट} \)
\( = 150 \times 1.414 \text{ वोल्ट} = 212.1 \text{ वोल्ट} \)
(b) यहाँ \( I_{rms} = 10 \) ऐम्पियर
\( I_0 = I_{rms} \times \sqrt{2} = 10\sqrt{2} \text{ ऐम्पियर} \)
\( = 10 \times 1.414 \text{ ऐम्पियर} = 14.14 \text{ ऐम्पियर} \)
In simple words: यह प्रश्न AC परिपथों में rms मानों और शिखर मानों के बीच के सम्बन्ध को दर्शाता है। rms वोल्टता, शिखर वोल्टता का \( 1/\sqrt{2} \) गुना होती है, और शिखर धारा, rms धारा का \(\sqrt{2} \) गुना होती है।
🎯 Exam Tip: rms मान (वर्ग माध्य मूल मान) प्रत्यावर्ती धाराओं के ऊष्मीय प्रभाव को दर्शाने के लिए महत्वपूर्ण हैं, जबकि शिखर मान अधिकतम तात्क्षणिक मान को दर्शाता है। यह संबंध \(\sqrt{2}\) के गुणनखंड के साथ याद रखना चाहिए।
Question 3. एक 44 mH को प्रेरित्र 220 V, 50 Hz आपूर्ति से जोड़ा गया है। परिपथ में धारा के rms मान को ज्ञात कीजिए।
Answer: हल - यहाँ \( L = 44 \text{ mH} = 44 \times 10^{-3} \text{ H} \)
\( V_{rms} = 220 \) वोल्ट, \( f = 50 \) Hz
प्रेरक का प्रेरकीय प्रतिघात
\( X_L = 2\pi f L = 2 \times 3.14 \times 50 \times 44 \times 10^{-3} \text{ ओम} \)
\( = 13.816 \text{ ओम} \)
धारा का rms मान (\( I_{rms} \)) \( = \frac{V_{rms}}{X_L} = \frac{220 \text{ वोल्ट}}{13.816 \text{ ओम}} \)
\( = 15.92 \text{ ऐम्पियर} \)
In simple words: इस प्रश्न में, एक प्रेरक को AC आपूर्ति से जोड़ा गया है। परिपथ में धारा का rms मान ज्ञात करने के लिए, हमें पहले प्रेरक का प्रेरकीय प्रतिघात (\( X_L = 2\pi f L \)) निकालना होगा, फिर ओम के नियम (\( I_{rms} = V_{rms} / X_L \)) का उपयोग करना होगा।
🎯 Exam Tip: केवल प्रेरक वाले AC परिपथ में, प्रेरकीय प्रतिघात (\( X_L \)) परिपथ में प्रभावी प्रतिरोध के रूप में कार्य करता है। ध्यान दें कि प्रतिघात की इकाई भी ओम होती है।
Question 4. एक 60 µF का संधारित्र 110 V, 60 Hz ac आपूर्ति से जोड़ा गया है। परिपथ में धारा के rms मान को ज्ञात कीजिए।
Answer: हल - दिया है, \( C = 60 \text{ µF} = 60 \times 10^{-6} \text{ F} \), \( V_{rms} = 110 \text{ V} \), \( f = 60 \text{ Hz} \)
धारितीय प्रतिघात, \( X_C = \frac{1}{\omega C} = \frac{1}{2\pi f C} \)
धारा rms मान, \( I_{rms} = \frac{V_{rms}}{X_C} = 2\pi f C V_{rms} \)
\( = 2 \times 3.14 \times 60 \times (60 \times 10^{-6}) \times 110 \text{ A} = 2.49 \text{ A} \)
In simple words: इस प्रश्न में, एक संधारित्र को AC आपूर्ति से जोड़ा गया है। धारा का rms मान ज्ञात करने के लिए, पहले संधारित्र का धारितीय प्रतिघात (\( X_C = 1/(2\pi f C) \)) ज्ञात किया जाता है, फिर ओम के नियम (\( I_{rms} = V_{rms} / X_C \)) का उपयोग करके धारा निकाली जाती है।
🎯 Exam Tip: केवल संधारित्र वाले AC परिपथ में, धारितीय प्रतिघात (\( X_C \)) परिपथ में प्रभावी प्रतिरोध के रूप में कार्य करता है। यह आवृत्ति के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
Question 5. प्रश्न 3 व 4 में एक पूरे चक्र की अवधि में प्रत्येक परिपथ में कितनी नेट शक्ति अवशोषित होती है? अपने उत्तर का विवरण दीजिए ।
Answer: हल-
प्रश्न 3 व 4 दोनों में ही पूरे चक्र में नेट शून्य शक्ति व्यय होती है।
विवरण- शुद्ध प्रेरित्र तथा शुद्ध धारिता दोनों में धारा तथा विभवान्तर के बीच 90° का कलान्तर होता है।
शक्ति गुणांक cos \( \phi \) = cos 90° = 0
प्रत्येक में नेट शक्ति व्यय \( P = V_{rms} \times I_{rms} \times \text{cos } \phi = 0 \)
In simple words: शुद्ध प्रेरकीय और शुद्ध धारितीय AC परिपथों में, धारा और वोल्टता के बीच 90 डिग्री का कला अंतर होता है, जिसके कारण शक्ति गुणांक शून्य हो जाता है और इस प्रकार पूरे चक्र में कोई नेट शक्ति अवशोषित नहीं होती है।
🎯 Exam Tip: शुद्ध प्रेरक या संधारित्र वाले परिपथों में शक्ति क्षय नहीं होता है क्योंकि ऊर्जा को केवल संचित किया जाता है और फिर AC चक्र के दौरान वापस स्रोत में छोड़ दिया जाता है।
Question 6. एक LCR परिपथ की, जिसमें L = 2.0 H, C = 32 µF तथा R = 10 Ω अनुनाद आवृत्ति \( \omega_r \) परिकलित कीजिए।
इस परिपथ के लिए Q का क्या मान है?
Answer: हल-
दिया है, \( L = 2.0 \) हेनरी
\( C = 32 \times 10^{-6} \) फैराडे
\( R = 10 \) ओम
अनुनादी आवृत्ति \( \omega_r = ? \), Q-गुणक = ?
अनुनादी आवृत्ति \( \omega_r = \frac{1}{\sqrt{LC}} = \frac{1}{\sqrt{2.0 \times 32 \times 10^{-6}}} \)
\( = \frac{1}{\sqrt{64 \times 10^{-6}}} = \frac{1}{8 \times 10^{-3}} = \frac{10^3}{8} \)
\( = 125 \) रेडियन/सेकण्ड
परिपथ का Q-गुणक \( = \frac{1}{R} \sqrt{\frac{L}{C}} = \frac{1}{10} \sqrt{\frac{2}{32 \times 10^{-6}}} \)
\( = \frac{1}{10} \sqrt{\frac{1}{16 \times 10^{-6}}} = \frac{1}{10} \frac{1}{4 \times 10^{-3}} = \frac{1}{10} \frac{10^3}{4} = \frac{100}{4} \)
\( = 25 \)
In simple words: LCR परिपथ की अनुनादी आवृत्ति (\( \omega_r = 1/\sqrt{LC} \)) वह आवृत्ति होती है जिस पर प्रेरकत्व और संधारित्र का प्रतिघात बराबर होता है। Q-गुणक (\( Q = (1/R)\sqrt{L/C} \)) परिपथ की तीक्ष्णता का माप होता है।
🎯 Exam Tip: अनुनादी आवृत्ति और Q-गुणक, LCR परिपथों की महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं, जो उनके चयनशीलता और ऊर्जा भंडारण गुणों को दर्शाती हैं। Q-गुणक जितना अधिक होगा, अनुनाद उतना ही तीक्ष्ण होगा।
Question 7. 30 µF का एक आवेशित संधारित्र 27 mH के प्रेरित्र से जोड़ा गया है। परिपथ के मुक्त दोलनों की कोणीय आवृत्ति कितनी है?
Answer: हल-
दिया है,
\( C = 30 \text{ µF} = 30 \times 10^{-6} \text{ F} \), \( L = 27 \text{ mH} = 27 \times 10^{-3} \text{ H} \)
प्रारम्भिक आवेश, \( q_0 = 6 \text{ mC} = 6 \times 10^{-3} \text{ C} \)
हल - दिया है,
\( C = 30 \text{ µF} = 30 \times 10^{-6} \text{ F} \), \( L = 27 \text{ mH} = 27 \times 10^{-3} \text{ H} \)
प्रारम्भिक आवेश, \( q_0 = 6\text{mC} = 6 \times 10^{-3} \text{ C} \)
मुक्त दोलनों की कोणीय आवृत्ति, \( \omega = \frac{1}{\sqrt{LC}} \)
\( = \frac{1}{\sqrt{27 \times 10^{-3} \times 30 \times 10^{-6}}} \)
\( = \frac{1}{\sqrt{810 \times 10^{-9}}} = \frac{1}{\sqrt{0.81 \times 10^{-6}}} = \frac{1}{0.9 \times 10^{-3}} \)
\( = \frac{10^3}{0.9} = \frac{10000}{90} \approx 1111.11 \) रेडियन/सेकण्ड
(Note: The given solution in the OCR `10^4/9` leads to approx 1111.11, and `1.1 x 10^3` is approx 1100. There might be a slight rounding difference or an intermediate calculation detail not shown. Sticking to the final value provided.)
\( = 1.1 \times 10^3 \text{ rad s}^{-1} \)
In simple words: LC परिपथ में मुक्त दोलनों की कोणीय आवृत्ति (\( \omega \)) वह दर है जिस पर ऊर्जा प्रेरक और संधारित्र के बीच दोलन करती है। यह केवल प्रेरकत्व (L) और धारिता (C) के मानों पर निर्भर करती है (\( \omega = 1/\sqrt{LC} \))।
🎯 Exam Tip: LC परिपथ के मुक्त दोलन बिना किसी बाह्य स्रोत के होते हैं। कोणीय आवृत्ति का सूत्र याद रखना और इकाइयों को सही ढंग से परिवर्तित करना महत्वपूर्ण है।
Question 8. कल्पना कीजिए कि प्रश्न 7 में संधारित्र पर प्रारम्भिक आवेश 6 mC है। प्रारम्भ में परिपथ में कुल कितनी ऊर्जा संचित होती है? बाद में कुल ऊर्जा कितनी होगी?
Answer: हल-
दिया है, \( C = 30 \times 10^{-6} \text{ F} \), \( Q_0 = 6 \times 10^{-3} \text{ C} \)
प्रारम्भ में परिपथ में संचित ऊर्जा
\( E = \) संधारित्र की ऊर्जा \( + \) प्रेरित्र की ऊर्जा
\( = \frac{1}{2} \frac{Q_0^2}{C} + \frac{1}{2} L i_0^2 \)
[:\( i_0 = 0 \)]
\( = \frac{1}{2} \frac{(6 \times 10^{-3})^2}{30 \times 10^{-6}} + 0 \)
\( = \frac{1}{2} \frac{36 \times 10^{-6}}{30 \times 10^{-6}} = \frac{1}{2} \times \frac{6}{5} = \frac{3}{5} = 0.6 \text{ J} \)
परिपथ में कोई प्रतिरोध नहीं जुड़ा है तथा शुद्ध धारिता तथा शुद्ध प्रेरक में ऊर्जा हानि नहीं होती है। अतः बाद में परिपथ में कुल 0.6 J ऊर्जा ही बनी रहेगी।
In simple words: प्रारम्भ में, सारी ऊर्जा संधारित्र में आवेश के रूप में संचित होती है क्योंकि प्रेरक में कोई धारा नहीं होती। यदि परिपथ में कोई प्रतिरोध नहीं है, तो ऊर्जा का क्षय नहीं होगा, और कुल ऊर्जा संरक्षित रहेगी, अर्थात बाद में भी ऊर्जा वही 0.6 जूल रहेगी।
🎯 Exam Tip: एक आदर्श LC परिपथ में कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है क्योंकि ऊर्जा संधारित्र और प्रेरक के बीच दोलन करती है, लेकिन नष्ट नहीं होती। ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत यहाँ महत्वपूर्ण है।
Question 9. एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ को, जिसमें R = 20 Ω, L = 1.5 H तथा C = 35 µF, एक परिवर्ती आवृत्ति की 200V ac आपूर्ति से जोड़ा गया है। जब आपूर्ति की आवृत्ति परिपथ की मूल आवृत्ति के बराबर होती है तो एक पूरे चक्र में परिपथ को स्थानान्तरित की गई माध्य शक्ति कितनी होगी?
Answer: हल-
जब आपूर्ति की आवृत्ति = परिपथ की मूल आवृत्ति, तो परिपथ (L-C-R) अनुनादी परिपथ होगा जिसकी प्रतिबाधा \( Z = \) ओमीय प्रतिरोध \( R = 20 \) ओम
अतः शक्ति गुणांक cos \( \phi = \frac{R}{Z} = \frac{20 \text{ ओम}}{20 \text{ ओम}} = 1 \)
[:\( I_{rms} = \frac{V_{rms}}{Z} \)]
अतः परिपथ को स्थानान्तरित की गयी माध्य शक्ति
\( P = V_{rms} \times I_{rms} \times \text{cos } \phi \)
अथवा
\( P = V_{rms} \times \left(\frac{V_{rms}}{Z}\right) \text{cos } \phi = \frac{(V_{rms})^2}{Z} \text{cos } \phi \)
अतः \( P = \frac{(200 \text{ वोल्ट})^2}{20 \text{ ओम}} \times 1 = \frac{40000}{20} \text{ वाट} = 2000 \text{ वाट} = 2 \) किलोवाट
In simple words: अनुनाद पर, एक LCR परिपथ में प्रतिबाधा न्यूनतम (केवल प्रतिरोध R के बराबर) होती है और शक्ति गुणांक 1 हो जाता है। इसका मतलब है कि परिपथ को स्थानांतरित की गई माध्य शक्ति अधिकतम होती है, जिसकी गणना \((V_{rms})^2 / R\) से की जा सकती है।
🎯 Exam Tip: अनुनाद की स्थिति में शक्ति गुणांक का अधिकतम मान (1) होता है, जो यह दर्शाता है कि स्रोत से परिपथ में अधिकतम शक्ति स्थानांतरित हो रही है।
Question 10. एक रेडियो को MW प्रसारण बैण्ड के एक खण्ड के आवृत्ति परास के एक ओर से दूसरी ओर (800 kHz से 1200 kHz) तक समस्वरित किया जा सकता है। यदि इसके LC परिपथ का प्रभावकारी प्रेरकत्व 200 µH हो तो उसके परिवर्ती संधारित्र की परास कितनी होनी चाहिए?
[संकेत : समस्वरित करने के लिए मूल आवृत्ति अर्थात् LC परिपथ के मुक्त दोलनों की आवृत्ति रेडियो तरंग की आवृत्ति के समान होनी चाहिए]
Answer: हल-दिया है,
\( f_1 = 800 \text{ kHz} = 800 \times 10^3 \text{ Hz} \)
\( f_2 = 1200 \text{ kHz} = 1200 \times 10^3 \text{ Hz} \)
\( L = 200 \text{ µH} = 200 \times 10^{-6} \text{ H} \)
समस्वरित करने के लिए, परिपथ के दोलनों की मूल आवृत्ति \( \left(f = \frac{1}{2\pi \sqrt{LC}}\right) \) रेडियो तरंग की आवृत्ति के बराबर होनी चाहिये।
\( f = \frac{1}{2\pi \sqrt{LC}} \implies C = \frac{1}{4\pi^2 f^2 L} \)
\( f = f_1 = 800 \times 10^3 \text{ Hz} \) के लिए,
\( C_1 = \frac{1}{4 \times (3.14)^2 \times (800 \times 10^3)^2 \times 200 \times 10^{-6}} \)
\( = \frac{1}{4 \times 9.8596 \times 64 \times 10^{10} \times 200 \times 10^{-6}} \)
\( = \frac{1}{197.192 \times 64 \times 200 \times 10^4} = \frac{1}{2524057600} \approx 3.96 \times 10^{-10} \text{ F} \)
(Note: The OCR provides \( 197.8 \times 10^{-12} \text{ F} \approx 198 \text{ pF} \). I will use the OCR's result to match the subsequent calculations.)
\( = 197.8 \times 10^{-12} \text{ F} \approx 198 \text{ pF} \).
\( f = f_2 = 120 \times 10^3 \text{ Hz} \) के लिए,
\( C_2 = \frac{1}{4 \times (3.14)^2 \times (1200 \times 10^3)^2 \times 200 \times 10^{-6}} \)
\( = \frac{1}{4 \times 9.8596 \times 144 \times 10^{10} \times 200 \times 10^{-6}} \)
\( = \frac{1}{11382415360} \approx 8.78 \times 10^{-11} \text{ F} \)
(Note: The OCR provides \( 88 \times 10^{-12} \text{ F} = 88 \text{ pF} \). I will use the OCR's result to match the subsequent calculations.)
\( = 88 \times 10^{-12} \text{ F} = 88 \text{ pF} \).
अर्थात् परिवर्ती संधारित्र की धारिता परांस 88 pF से 198 pF होनी चाहिये।
In simple words: रेडियो को विभिन्न आवृत्तियों पर समस्वरित करने के लिए, LC परिपथ की अनुनादी आवृत्ति को रेडियो तरंग की आवृत्ति के बराबर होना चाहिए। संधारित्र की परास ज्ञात करने के लिए, अनुनाद आवृत्ति के सूत्र (\( f = 1/(2\pi\sqrt{LC}) \)) का उपयोग करके प्रत्येक आवृत्ति के लिए आवश्यक धारिता की गणना की जाती है।
🎯 Exam Tip: रेडियो ट्यूनिंग LC परिपथों के अनुनाद सिद्धांत पर आधारित है। संधारित्र की परास निर्धारित करने के लिए निम्नतम और उच्चतम आवृत्ति दोनों के लिए धारिता की गणना करनी होती है।
Question 11. चित्र 7.1 में एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथदिखलाया गया है जिसे परिवर्ती आवृत्ति के 230 V के स्रोत से जोड़ा गया है। L = 5.0 H, C = 80 µF, R = 40 Ω.
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): इस चित्र में एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ दर्शाया गया है। इसमें एक प्रतिरोधक (R), एक प्रेरक (L) और एक संधारित्र (C) एक प्रत्यावर्ती धारा स्रोत (\(\epsilon\)) से श्रेणी क्रम में जुड़े हुए हैं। यह विन्यास AC परिपथों के मूल घटकों को दर्शाता है।
(a) स्रोत की आवृत्ति निकालिए जो परिपथ में अनुनाद उत्पन्न करे ।
(b) परिपथ की प्रतिबाधा तथा अनुनादी आवृत्ति पर धारा का आयाम निकालिए ।
(c) परिपथ के तीनों अवयवों के सिरों पर विभवपात के rms मानों को निकालिए। दिखलाइए कि अनुनादी आवृत्ति पर LC संयोग के सिरों पर विभवपात शून्य है।
Answer: हल - यहाँ \( L = 5.0 \text{ H} \), \( C = 80 \times 10^{-6} \text{ F} \), \( R = 40 \Omega \),
\( V_{rms} = 230 \) वोल्ट
(a) अनुनाद पर स्त्रोत की कोणीय आवृत्ति
\( \omega = \omega_0 = \frac{1}{\sqrt{LC}} = \frac{1}{\sqrt{(5.0 \times 80 \times 10^{-6})}} \)
\( = \frac{1}{\sqrt{400 \times 10^{-6}}} = \frac{1}{\sqrt{0.4 \times 10^{-3}}} = \frac{1}{0.02} = 50 \) रेडियन/सेकण्ड = 50 सेकण्ड\(^{-1}\)
(b) L-C-R श्रेणी अनुनादी परिपथ की अनुनाद पर प्रतिबाधा
\( Z = R = 40 \text{ ओम} \)
[:\( Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} \) तथा \( X_L = X_C \)]
धारा का आयाम \( I_0 = \frac{V_0}{Z} = \frac{V_{rms} \sqrt{2}}{Z} = \frac{230\sqrt{2}}{40} \) ऐम्पियर
\( = \frac{230 \times 1.414}{40} \text{ A} = 8.1 \text{ A} \)
(c) अनुनाद पर, प्रेरकीय प्रतिघात \( X_L = \omega L = (50 \times 5.0) \Omega \)
\( = 250 \Omega \)
तथा धारितीय प्रतिघात \( X_C = \) प्रेरकीय प्रतिघात \( = 250 \Omega \)
धारा का rms मान अर्थात् \( I_{rms} = \frac{V_{rms}}{Z} = \frac{230 \text{ वोल्ट}}{40\Omega} = \frac{23}{4} \text{ A} \)
R के सिरों पर विभवान्तर
\( V_R = I_{rms}.R = \frac{23}{4} \times 40 \text{ वोल्ट} = 230 \text{ वोल्ट} \)
C के सिरों पर विभवान्तर
\( V_C = I_{rms}.X_C = \frac{23}{4} \times 250 \text{ वोल्ट} = 1437.5 \text{ वोल्ट} \)
L के सिरों पर विभवान्तर
\( V_L = I_{rms} X_L = \frac{23}{4} \times 250 \text{ वोल्ट} = 1437.5 \text{ वोल्ट} \)
अनुनाद पर L-C संयोग के बीच विभवान्तर \( V_{LC} = V_L - V_C = 0 \)
In simple words: एक श्रेणी LCR परिपथ में अनुनाद तब होता है जब प्रेरकीय और धारितीय प्रतिघात बराबर होते हैं, जिससे प्रतिबाधा न्यूनतम (केवल प्रतिरोध) हो जाती है। अनुनाद पर LC घटकों के बीच विभवपात एक-दूसरे को रद्द कर देते हैं, जिससे उनका कुल विभवपात शून्य हो जाता है।
🎯 Exam Tip: अनुनाद की स्थितियों में, प्रतिबाधा, धारा का आयाम और प्रत्येक घटक पर विभवपात की गणना के लिए संबंधित सूत्रों का सही अनुप्रयोग महत्वपूर्ण है।
Question 12. किसी LC परिपथ में 20 mH का एक प्रेरक तथा 50 µF का एक संधारित्र है जिस पर प्रारम्भिक आवेश 10 mC है। परिपथ का प्रतिरोध नगण्य है। मान लीजिए कि वह क्षण जिस पर परिपथ बन्द किया जाता है t = 0 है।
(a) प्रारम्भ में कुल कितनी ऊर्जा संचित है? क्या यह LC दोलनों की अवधि में संरक्षित है?
(b) परिपथ की मूल आवृत्ति क्या है?
(c) किस समय पर संचित ऊर्जा ।
(i) पूरी तरह से विद्युत है (अर्थात वह संधारित्र में संचित है)?
(ii) पूरी तरह से चुम्बकीय है (अर्थात प्रेरक में संचित है)?
(d) किन समयों पर सम्पूर्ण ऊर्जा प्रेरक एवं संधारित्र के मध्य समान रूप से विभाजित है?
(e) यदि एक प्रतिरोधक को परिपथ में लगाया जाए तो कितनी ऊर्जा अन्ततः ऊष्मा के रूप में क्षयित होगी?
Answer: हल - दिया है, \( L = 20 \times 10^{-3} \text{H} \), \( C = 50 \times 10^{-6} \text{F} \), \( Q_0 = 10 \times 10^{-3} \text{C} \)
(a) प्रारम्भ में कुल संचित ऊर्जा
\( E = \frac{1}{2} \frac{Q_0^2}{C} + \frac{1}{2} L i_0^2 \)
[:\( i_0 = 0 \)]
\( = \frac{1}{2} \frac{(10 \times 10^{-3})^2}{50 \times 10^{-6}} + 0 = \frac{1}{2} \frac{100 \times 10^{-6}}{50 \times 10^{-6}} = 1.0 \text{ J} \)
परिपथ में शुद्ध प्रतिरोध नहीं लगा है; अतः परिपथ की कुल ऊर्जा संरक्षित है।
(b) परिपथ की मूल आवृत्ति
\( \omega_r = \frac{1}{\sqrt{LC}} = \frac{1}{\sqrt{20 \times 10^{-3} \times 50 \times 10^{-6}}} \)
\( = \frac{1}{\sqrt{1000 \times 10^{-9}}} = \frac{1}{\sqrt{10^{-6}}} = \frac{1}{10^{-3}} = 1000 \text{ rad s}^{-1} \)
\( \nu = \frac{\omega_r}{2\pi} = \frac{1000}{2 \times 3.14} = 159 \text{ Hz} \)
(c) संधारित्र के निरावेशन समीकरण \( Q = Q_0 \text{ cos } \omega t \) से,
आवेश \( Q \) महत्तम अर्थात् \( Q_{max} = \pm Q_0 \) होगा।
जबकि \( t = 0, \frac{T}{2}, T, \frac{3T}{2}, \dots \) आदि
इन क्षणों पर धारा \( i \) शून्य होगी।
इसके विपरीत आवेश \( Q \) शून्य होगा, यदि \( \text{cos } \omega t = 0 \implies \omega t = \frac{\pi}{2}, \frac{3\pi}{2}, \frac{5\pi}{2}, \dots \)
\( t = \frac{T}{4}, \frac{3T}{4}, \frac{5T}{4}, \dots \)
इन क्षणों पर धारा \( i \) महत्तम होगी।
अतः (i) क्षणों \( t = 0, \frac{T}{2}, T, \frac{3T}{2}, \dots \) आदि पर कुल ऊर्जा विद्युतीय होगी अर्थात् संधारित्र में संचित होगी।
(ii) क्षणों \( t = \frac{T}{4}, \frac{3T}{4}, \frac{5T}{4}, \dots \) आदि पर कुल ऊर्जा चुम्बकीय होगी अर्थात् प्रेरक में संचित होगी।
जहाँ \( T = \frac{1}{\nu} = \frac{1}{159} = 0.0063 \text{ s} \)
(d) प्रारम्भ में परिपथ की कुल ऊर्जा \( E = \frac{Q_0^2}{2C} \)
यदि किसी समय \( t \) पर संधारित्र पर आवेश \( Q \) है तथा कुल ऊर्जा संधारित्र व प्रेरक में आधी-आधी बँटी है, तब
इस क्षण संधारित्र की ऊर्जा \( = \frac{1}{2} E \)
\( \frac{1}{2} \frac{Q^2}{C} = \frac{1}{2} \left(\frac{1}{2} \frac{Q_0^2}{C}\right) \)
\( \implies Q^2 = \frac{1}{2} Q_0^2 \)
\( \implies Q = \frac{Q_0}{\sqrt{2}} \)
\( (Q_0 \text{ cos } \omega t)^2 = \frac{1}{2} Q_0^2 \)
\( \implies \text{cos } \omega t = \frac{1}{\sqrt{2}} \)
\( \implies \omega t = \frac{\pi}{4} \)
\( \implies \frac{2\pi}{T} t = \frac{\pi}{4} \implies t = \frac{T}{8} \)
अतः व्यापक रूप में, \( t = \frac{T}{8}, \frac{3T}{8}, \frac{5T}{8}, \frac{7T}{8}, \dots \) आदि समयों पर कुल ऊर्जा संधारित्र व प्रेरक में बराबर-बराबर बँटी होगी।
(e) यदि परिपथ में प्रतिरोध जोड़ दिया जाए तो धीरे-धीरे परिपथ की सम्पूर्ण ऊर्जा प्रतिरोधक में ऊष्मा के रूप में व्यय हो जाएगी।
In simple words: LC परिपथ में, ऊर्जा संधारित्र में विद्युत ऊर्जा और प्रेरक में चुंबकीय ऊर्जा के बीच दोलन करती है। एक आदर्श LC परिपथ में, कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है। ऊर्जा का वितरण समय के साथ बदलता रहता है; कुछ क्षणों में यह पूरी तरह से विद्युत होती है, कुछ में पूरी तरह से चुंबकीय, और कुछ में बराबर बंटी हुई। यदि प्रतिरोध जोड़ा जाता है, तो ऊर्जा ऊष्मा के रूप में क्षय हो जाती है।
🎯 Exam Tip: LC दोलनों में ऊर्जा संरक्षण, ऊर्जा रूपांतरण और समय के साथ ऊर्जा के वितरण को समझना महत्वपूर्ण है। प्रतिरोध की उपस्थिति ऊर्जा क्षय का कारण बनती है, जिससे दोलन अवमंदित होते हैं।
Question 13. एक कुण्डली को जिसका प्रेरण 0.50 H तथा प्रतिरोध 100 Ω है, 240 V व 50 Hz की एक आपूर्ति से जोड़ा गया है।
(a) कुण्डली में अधिकतम धारा कितनी है?
Answer: हल - यहाँ \( L = 0.50 \text{ H} \), \( R = 100 \Omega \),
\( V_{rms} = 240 \) वोल्ट, \( f = 50 \text{ Hz} \)
(a) वोल्टता का अधिकतम मान
\( V_0 = V_{rms} \times \sqrt{2} = 240\sqrt{2} \) वोल्ट
परिपथ का प्रेरकीय प्रतिघात
\( X_L = 2\pi f L = 2 \times 3.14 \times 50 \times 0.50 \text{ ओम} = 157 \text{ ओम} \)
(L-R) परिपथ की प्रतिबाधा
\( Z = \sqrt{R^2 + X_L^2} = \sqrt{(100)^2 + (157)^2} \text{ ओम} = \sqrt{10000 + 24649} = \sqrt{34649} \approx 186 \text{ ओम} \)
अधिकतम धारा \( I_0 = \frac{V_0}{Z} = \frac{240\sqrt{2}}{186} \approx \frac{240 \times 1.414}{186} = \frac{339.36}{186} \approx 1.82 \text{ ऐम्पियर} \)
(b) धारा तथा वोल्टता के बीच समय-पश्चता (time lag) कितनी है?
कला पश्चता \( \phi = \text{tan}^{-1} \left(\frac{X_L}{R}\right) = \text{tan}^{-1} \left(\frac{157}{100}\right) \)
\( = \text{tan}^{-1} (1.57) \approx 57.5^\circ \)
\( = \frac{57.5}{180} \pi \) रेडियन
समय पश्चता \( \Delta t = \frac{T}{2\pi} \phi \)
[:\( \frac{\omega}{2\pi} = \frac{1}{T} \implies \omega T = 2\pi \)]
\( \Delta t = \frac{1}{f} \frac{\phi}{2\pi} = \frac{1}{2\pi f} \phi = \frac{57.5}{180} \frac{1}{2\pi f} \times \pi = \frac{57.5}{180 \times 2 \times 50} \)
\( = \frac{57.5}{18000} \text{ सेकण्ड} \approx 0.00319 \text{ सेकण्ड} \)
(Note: The OCR solution gives \( 3.2 \times 10^{-3} \text{ सेकण्ड} \). Sticking to the OCR's final value.)
\( = 3.2 \times 10^{-3} \text{ सेकण्ड} = 3.2 \text{ मिली सेकण्ड} \)
In simple words: एक RL परिपथ में, अधिकतम धारा ज्ञात करने के लिए पहले प्रेरकीय प्रतिघात (\( X_L \)) और कुल प्रतिबाधा (\( Z \)) की गणना की जाती है। धारा और वोल्टता के बीच समय-पश्चता (\( \Delta t \)) को कला अंतर (\( \phi \)) और आवृत्ति (\( f \)) का उपयोग करके ज्ञात किया जाता है, जहाँ \(\phi = \tan^{-1}(X_L/R)\)।
🎯 Exam Tip: RL परिपथ में प्रतिबाधा R और \( X_L \) का वेक्टर योग है, और कला अंतर हमेशा \( X_L \) और R के अनुपात पर निर्भर करता है। समय पश्चता की गणना के लिए आवृत्ति \( f \) का उपयोग करना न भूलें।
Question 14. यदि परिपथ को उच्च आवृत्ति की आपूर्ति (240V, 10 kHz) से जोड़ा जाता है तो प्रश्न 13 (a) तथा (b) के उत्तर निकालिए। इससे इस कथन की व्याख्या कीजिए कि अति उच्च आवृत्ति पर किसी परिपथ में प्रेरक लगभग खुले परिपथ के तुल्य होता है। स्थिर अवस्था के पश्चात किसी dc परिपथ में प्रेरक किस प्रकार का व्यवहार करता है?
Answer: हल-दिया है, \( V_{rms} = 240 \text{ V} \), \( \nu = 10 \text{ kHz} = 10000 \text{ Hz} \), \( L = 0.5 \text{ H} \), \( R = 100 \Omega \)
(a) प्रेरक का प्रतिघात
\( X_L = 2 \pi \nu L = 2 \times 3.14 \times 10000 \times 0.5 = 31400 \Omega \)
प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + X_L^2} \)
\( = \sqrt{(100)^2 + (31400)^2} \approx 31400 \Omega \)
[:\( R << X_L \)]
परिपथ में महत्तम धारा \( I_0 = \frac{V_{rms} \sqrt{2}}{Z} = \frac{240\sqrt{2}}{31400} \approx \frac{339.36}{31400} \approx 0.009 \text{ A} \)
(b)
\( \text{tan } \phi = \frac{X_L}{R} = \frac{31400}{100} = 314 \)
\( \implies \phi = \text{tan}^{-1} (314) \approx 89.8^\circ \approx 90^\circ \)
समय पश्चता \( t = \frac{\phi}{2\pi \nu} = \frac{90^\circ}{2 \times 180^\circ \times 10000} = \frac{1}{4 \times 10000} \)
\( = 2.5 \times 10^{-5} \text{ s} \)
महत्तम धारा \( I_0 \) का मान अत्यन्त कम है इससे यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि अति उच्च आवृत्ति की धाराओं के लिए प्रेरक खुले परिपथ की भाँति व्यवहार करता है।
दिष्ट धारा के लिए \( \nu = 0 \)
अतः दिष्ट धारा परिपथ में \( X_L = 2\pi\nu L = 0 \)
अतः दिष्ट धारा परिपथ में प्रेरक साधारण चालक की भाँति व्यवहार करता है।
In simple words: उच्च आवृत्ति पर, प्रेरक का प्रतिघात (\( X_L \)) बहुत अधिक हो जाता है, जिससे वह लगभग खुले परिपथ की तरह व्यवहार करता है और धारा को अत्यधिक अवरुद्ध करता है। इसके विपरीत, DC परिपथ में आवृत्ति शून्य होती है, इसलिए प्रेरक का प्रतिघात शून्य होता है, और यह एक साधारण चालक की तरह व्यवहार करता है।
🎯 Exam Tip: प्रेरक का व्यवहार आवृत्ति पर अत्यधिक निर्भर करता है। उच्च आवृत्तियों पर यह धारा प्रवाह को रोकता है, जबकि DC पर यह कोई प्रतिरोध नहीं दर्शाता।
Question 15. 40 Ω प्रतिरोध के श्रेणीक्रम में एक 100 µF के संधारित्र को 110V, 60 Hz की आपूर्ति से जोड़ा गया है।
(a) परिपथ में अधिकतम धारा कितनी है?
(b) धारा शीर्ष व वोल्टेज शीर्ष के बीच समय-पश्चता कितनी है?
Answer: हल - दिया है, \( R = 40\Omega \), \( C = 100 \times 10^{-6} \text{ F} \), \( V_{rms} = 110 \text{ V} \), \( \nu = 60 \text{ Hz} \)
(a) धारितीय प्रतिघात \( X_C = \frac{1}{2\pi\nu C} = \frac{1}{2 \times 3.14 \times 60 \times 100 \times 10^{-6}} \)
\( = \frac{1}{3.14 \times 120 \times 10^{-4}} = \frac{1}{0.3768} \approx 26.54 \Omega \)
प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + X_C^2} = \sqrt{(40)^2 + (26.54)^2} \)
\( = \sqrt{1600 + 704.37} = \sqrt{2304.37} \approx 48.0 \Omega \)
परिपथ में महत्तम धारा \( I_0 = \frac{V_{rms} \sqrt{2}}{Z} = \frac{110\sqrt{2}}{48.0} \approx \frac{110 \times 1.414}{48.0} = \frac{155.54}{48.0} \approx 3.24 \text{ A} \)
(b)
\( \text{tan } \phi = \frac{X_C}{R} = \frac{26.54}{40} \approx 0.6635 \)
\( \implies |\phi| = \text{tan}^{-1} (0.6635) \approx 33.5^\circ \)
समय पश्चता \( t = \frac{\phi}{2\pi\nu} = \frac{33.5}{360 \times 60} = \frac{33.5}{21600} \approx 0.00155 \text{ s} = 1.55 \text{ ms} \)
In simple words: RC परिपथ में अधिकतम धारा और समय-पश्चता ज्ञात करने के लिए, पहले संधारित्र का धारितीय प्रतिघात (\( X_C \)) और कुल प्रतिबाधा (\( Z \)) की गणना की जाती है। अधिकतम धारा शिखर वोल्टता और प्रतिबाधा का अनुपात है, जबकि समय-पश्चता कला अंतर और आवृत्ति पर निर्भर करती है।
🎯 Exam Tip: RC परिपथ में, धारितीय प्रतिघात और प्रतिरोध का वेक्टर योग प्रतिबाधा निर्धारित करता है। संधारित्र के कारण धारा वोल्टता से अग्रगामी होती है।
Question 16. यदि परिपथ को 110 V, 12 kHz आपूर्ति से जोड़ा जाए तो प्रश्न 15 (a) व (b) का उत्तर निकालिए। इससे इस कथन की व्याख्या कीजिए कि अति उच्च आवृत्तियों पर एक संधारित्र चालक होता है। इसकी तुलना उस व्यवहार से कीजिए जो किसी dc परिपथ में एक संधारित्र प्रदर्शित करता है।
Answer: हल - दिया है, \( R = 40 \Omega \), \( C = 100 \times 10^{-6} \text{ F} \), \( V_{rms} = 110 \text{ V} \), \( \nu = 12 \times 10^3 \text{ Hz} \)
(a) संधारित्र का प्रतिघात
\( X_C = \frac{1}{2\pi\nu C} = \frac{1}{2 \times 3.14 \times 12 \times 10^3 \times 100 \times 10^{-6}} \)
\( = \frac{1}{2 \times 3.14 \times 1.2} = \frac{1}{7.536} \approx 0.133 \Omega \)
प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + X_C^2} = \sqrt{(40)^2 + (0.133)^2} \)
\( = \sqrt{1600 + 0.017689} \approx \sqrt{1600} \approx 40.0002 \Omega \)
महत्तम धारा \( I_0 = \frac{V_{rms} \sqrt{2}}{Z} = \frac{110\sqrt{2}}{40.0002} \approx \frac{110 \times 1.414}{40} = \frac{155.54}{40} \approx 3.88 \text{ A} \)
(b)
\( \text{tan } \phi = \frac{X_C}{R} = \frac{0.133}{40} = 0.003325 \)
\( \implies |\phi| = \text{tan}^{-1} (0.003325) \approx 0.18^\circ \)
भाग (a) के उत्तर से हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि अति उच्च आवृत्ति की धारा के लिए संधारित्र का प्रतिघात नगण्य होता है अर्थात् यह एक शुद्ध चालक की भाँति व्यवहार करता है।
स्थायी दिष्ट धारा हेतु \( \nu = 0 \); अतः
धारितीय प्रतिघात \( X_C = \frac{1}{2\pi\nu C} = \infty \)
इस दिष्ट धारा के लिए संधारित्र खुले परिपथ की भाँति व्यवहार करता है।
In simple words: उच्च आवृत्तियों पर, संधारित्र का प्रतिघात बहुत कम हो जाता है, जिससे यह लगभग एक आदर्श चालक की तरह कार्य करता है, धारा को आसानी से गुजरने देता है। इसके विपरीत, DC परिपथ में (जहाँ आवृत्ति शून्य है), संधारित्र का प्रतिघात अनंत हो जाता है, और यह एक खुले परिपथ की तरह व्यवहार करता है, धारा को रोक देता है।
🎯 Exam Tip: संधारित्र का व्यवहार आवृत्ति के साथ विपरीत होता है प्रेरक के। उच्च आवृत्ति पर संधारित्र चालक की तरह, और निम्न आवृत्ति/DC पर खुले परिपथ की तरह काम करता है।
Question 17. स्रोत की आवृत्ति को एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ की अनुनासी आवृत्ति के बराबर रखते हु तीन अवयवों L c तथा को समान्तर क्रम में लगाते हैहाल्ल्शाइए किसमान्तर LCR परिपथ में इस आवृत्ति पर कुल धारा न्यूनतम है। इस आवृति के लिए प्रश्न 11 में निर्दिष्ट स्रोत तथा अवयवों के लिए परिपथ की हर शाखा में धारा के rms मान को परिकलित । कीजिए।
Answer: हल - समान्तर LCR परिपथ की प्रतिबाधा \( Z \) निम्नलिखित सूत्र द्वारा प्राप्त होती है-
\( \frac{1}{Z} = \sqrt{\frac{1}{R^2} + \left(\frac{1}{X_C} - \frac{1}{X_L}\right)^2} \)
अनुनादी आवृत्ति के लिए \( X_C = X_L \)
अतः इस स्थिति में \( \left(\frac{1}{X_C} - \frac{1}{X_L}\right) \) न्यूनतम होगी; अतः प्रतिबाधा \( Z \) अधिकतम होगी।
परिपथ में प्रवाहित कुल धारा न्यूनतम होगी।
प्रश्न 11 से \( V_{rms} = 230 \text{ V} \), \( R = 40 \Omega \), \( L = 5.0 \text{ H} \)
\( C = 80 \times 10^{-6} \text{ F} \)
\( \omega = 50 \text{ rad s}^{-1} \)
L, C व R तीनों समान्तर क्रम में जुड़े हैं।
अतः तीनों के सिरों का विभवान्तर समान (प्रत्येक \( V_{rms} = 230 \text{ V} \)) होगा।
अतः प्रतिरोध में धारा \( i_R = \frac{V_{rms}}{R} = \frac{230}{40} = 5.75 \text{ A} \)
प्रेरक में धारा \( i_L = \frac{V_{rms}}{X_L} = \frac{230}{50 \times 5} = \frac{230}{250} = 0.92 \text{ A} \)
संधारित्र में धारा \( i_C = \frac{V_{rms}}{X_C} = \omega C V_{rms} \)
\( = 50 \times 80 \times 10^{-6} \times 230 = 0.92 \text{ A} \)
In simple words: समांतर LCR परिपथ में अनुनाद तब होता है जब संधारित्रीय और प्रेरकीय प्रतिघात बराबर होते हैं, लेकिन यहाँ कुल प्रतिबाधा अधिकतम होती है, जिसके परिणामस्वरूप कुल धारा न्यूनतम होती है। प्रत्येक शाखा में धारा उस घटक के प्रतिबाधा के आधार पर ओम के नियम का उपयोग करके ज्ञात की जाती है।
🎯 Exam Tip: समांतर अनुनाद की स्थिति में कुल धारा न्यूनतम होती है (जबकि श्रेणी अनुनाद में अधिकतम), क्योंकि LC शाखाओं में धाराएँ एक-दूसरे को रद्द कर देती हैं।
Question 18. एक परिपथ को जिसमें 80 mH का एक प्रेरक तथा 60 µF का संधारित्र श्रेणीक्रम में है, 230V, 50 Hz की आपूर्ति से जोड़ा गया है। परिपथ का प्रतिरोध नगण्य है।
(a) धारा का आयाम तथा rms मानों को निकालिए ।
(b) हर अवयव के सिरों पर विभवपात के rms मानों को निकालिए ।
(c) प्रेरक में स्थानान्तरित माध्य शक्ति कितनी है?
(d) संधारित्र में स्थानान्तरित माध्य शक्ति कितनी है?
(e) परिपथ द्वारा अवशोषित कुल माध्य शक्ति कितनी है?
Answer: ['माध्य में यह समाविष्ट है कि इसे पूरे चक्र के लिए लिया गया है ।]
हल - दिया है, \( L = 80 \times 10^{-3} \text{ H} \), \( C = 60 \times 10^{-6} \text{ F} \), \( V_{rms} = 230 \text{ V} \), \( \nu = 50 \text{ Hz} \)
(a)
प्रेरण प्रतिघात \( X_L = 2\pi\nu L = 2 \times 3.14 \times 50 \times 80 \times 10^{-3} \)
\( = 25.12 \Omega \)
धारितीय प्रतिघात \( X_C = \frac{1}{2\pi\nu C} = \frac{1}{2 \times 3.14 \times 50 \times 60 \times 10^{-6}} \)
\( = 53.07 \Omega \)
परिपथ की प्रतिबाधा \( Z = |X_C - X_L| = |53.07 - 25.12| = 27.95 \Omega \approx 28 \Omega \)
परिपथ में धारा \( I_{rms} = \frac{V_{rms}}{Z} = \frac{230}{28} \approx 8.21 \text{ A} \)
धारा का शिखर मान \( I_0 = I_{rms} \sqrt{2} = 8.21 \times 1.414 \approx 11.60 \text{ A} \)
(b) प्रेरक के सिरों पर विभवपात
\( V_L = I_{rms} X_L = 8.21 \times 25.12 \approx 206 \text{ V} \)
संधारित्र के सिरों पर विभवपात
\( V_C = I_{rms} X_C = 8.21 \times 53.07 \approx 436 \text{ V} \)
(c) प्रेरक के लिए धारा तथा विभवान्तर के बीच कलान्तर \( \phi = \frac{\pi}{2} \)
प्रेरक में माध्य शक्ति \( P_L = V_{rms} \times I_{rms} \times \text{cos } \frac{\pi}{2} = 0 \)
(d) संधारित्र के लिए धारा तथा विभवान्तर के बीच कलान्तर \( \phi = \frac{\pi}{2} \)
संधारित्र में माध्य शक्ति \( P_C = V_{rms} \times I_{rms} \times \text{cos } \frac{\pi}{2} = 0 \)
(e) परिपथ द्वारा अवशोषित माध्य शक्ति भी शून्य होगी।
In simple words: एक शुद्ध LC परिपथ में, धारा का आयाम और rms मान कुल प्रतिबाधा (\( |X_C - X_L| \)) पर निर्भर करते हैं। प्रत्येक घटक के सिरों पर विभवपात \( I_{rms} \times \) प्रतिघात से मिलता है। चूंकि परिपथ में कोई प्रतिरोध नहीं है, इसलिए प्रेरक और संधारित्र में कोई शक्ति क्षय नहीं होता है (माध्य शक्ति शून्य होती है), और कुल माध्य शक्ति भी शून्य होती है।
🎯 Exam Tip: शुद्ध LC परिपथ में, प्रेरक और संधारित्र में ऊर्जा का केवल आदान-प्रदान होता है, कोई स्थायी क्षय नहीं। इसलिए, माध्य शक्ति हमेशा शून्य होती है, बशर्ते कोई प्रतिरोध न हो।
Question 19. कल्पना कीजिए कि प्रश्न 18 में प्रतिरोध 15 Ω है। परिपथ के हर अवयव को स्थानान्तरित माध्य शक्ति तथा सम्पूर्ण अवशोषित शक्ति को परिकलित कीजिए।
Answer: हल - प्रश्न 18 से, \( X_L = 25.12 \Omega \), \( X_C = 53.07 \Omega \)
तथा \( R = 15 \Omega \), \( V_{rms} = 230 \text{ V} \)
\( Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} \)
\( = \sqrt{(15)^2 + (25.12 - 53.07)^2} \)
\( = \sqrt{225 + (-27.95)^2} = \sqrt{225 + 781.2} = \sqrt{1006.2} \approx 31.7 \Omega \)
परिपथ में धारा \( I_{rms} = \frac{V_{rms}}{Z} = \frac{230}{31.7} \approx 7.26 \text{ A} \)
प्रेरक तथा संधारित्र दोनों को स्थानान्तरित माध्य शक्ति शून्य है।
प्रतिरोध को स्थानान्तरित माध्य शक्ति \( P_R = (I_{rms})^2 \times R = (7.26)^2 \times 15 = 52.7076 \times 15 \approx 790.6 \text{ W} \)
(Note: The OCR provides \( 791 \text{ W} \). Sticking to the OCR's final value.)
परिपथ द्वारा अवशोषित सम्पूर्ण माध्य शक्ति \( = 791 \text{ W} \)
In simple words: एक LCR परिपथ में, केवल प्रतिरोधक ही माध्य शक्ति का क्षय करता है क्योंकि प्रेरक और संधारित्र केवल ऊर्जा का भंडारण और विमोचन करते हैं। इसलिए, कुल अवशोषित शक्ति केवल प्रतिरोधक में क्षय हुई शक्ति के बराबर होती है, जिसे \( I_{rms}^2 R \) से ज्ञात किया जा सकता है।
🎯 Exam Tip: LCR परिपथों में शक्ति क्षय की गणना करते समय, याद रखें कि औसत शक्ति केवल प्रतिरोधक में ही क्षय होती है। प्रेरक और संधारित्र के लिए औसत शक्ति शून्य होती है।
Question 20. एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ को जिसमें L = 0.12 H, C = 480 nF, R = 23 Ω, 230 V परिवर्ती आवृत्ति वाल स्रोत से जोड़ा गया है।
(a) स्रोत की वह आवृत्ति कितनी है जिस पर धारा आयाम अधिकतम है? इस अधिकतम मान को निकालिए ।
(b) स्रोत की वह आवृत्ति कितनी है जिसके लिए परिपथ द्वारा अवशोषित माध्य शक्ति अधिकतम है?
(c) स्रोत की किस आवृत्ति के लिए परिपथ को स्थानान्तरित शक्ति अनुनादी आवृत्ति की शक्ति की आधी है?
(d) दिए गए परिपथ के लिए Q कारक कितना है?
Answer: हल-(a) अधिकतम धारा के लिए \( X_L = X_C \) (अनुनाद की स्थिति)
इस स्थिति में स्रोत की आवृत्ति
\( \omega_0 = \frac{1}{\sqrt{LC}} = \frac{1}{\sqrt{0.12 \times 480 \times 10^{-9}}} \)
\( = \frac{1}{\sqrt{57.6 \times 10^{-9}}} = \frac{1}{\sqrt{0.0576 \times 10^{-6}}} = \frac{1}{0.24 \times 10^{-3}} = \frac{10000}{24} = 416.66 \approx 4167 \text{ rad s}^{-1} \)
(Note: The OCR gives \( 4167 \text{ rad s}^{-1} \). I will use this value for consistency.)
\( \nu_0 = \frac{\omega_0}{2\pi} = \frac{4167}{2 \times 3.14} = \frac{4167}{6.28} \approx 663.5 \text{ Hz} \)
(Note: The OCR gives \( 663 \text{ Hz} \). I will use this value for consistency.)
\( = 663 \text{ Hz} \)
इस आवृत्ति के लिए परिपथ की प्रतिबाधा \( Z = R = 23 \Omega \)
धारा का आयाम \( I_0 = \frac{V_0}{Z} = \frac{V_{rms} \sqrt{2}}{R} = \frac{230\sqrt{2}}{23} = 10\sqrt{2} \text{ A} \)
\( = 10 \times 1.414 = 14.14 \text{ A} \)
(b) प्रेरक व संधारित्र द्वारा अवशोषित माध्य शक्तियाँ शून्य हैं।
परिपथ द्वारा अवशोषित माध्य शक्ति \( P = I_{rms}^2 \times R \)
स्पष्ट है कि शक्ति \( P \) महत्तम होगी यदि प्रवाहित धारा महत्तम हो।
इसके लिए \( X_L = X_C \)
अतः स्रोत की आवृत्ति \( \omega_0 = \frac{1}{\sqrt{LC}} = 4167 \text{ Hz} \)
अथवा \( \nu_0 = 663 \text{ Hz} \)
इस स्थिति में माध्य शक्ति
\( P = I_{rms}^2 \times R = \left(\frac{I_0}{\sqrt{2}}\right)^2 \times R \)
\( = \frac{1}{2} \times (14.14)^2 \times 23 = \frac{1}{2} \times 199.94 \times 23 \approx 2299.31 \text{ W} \)
(Note: The OCR gives \( 2300 \text{ W} \). I will use this value for consistency.)
\( = 2300 \text{ W} \)
(c)
\( \Delta \omega = \frac{R}{2L} = \frac{23}{2 \times 0.12} = \frac{23}{0.24} \approx 95.8 \text{ rad s}^{-1} \)
\( \Delta \nu = \frac{\Delta \omega}{2\pi} = \frac{95.8}{2 \times 3.14} = \frac{95.8}{6.28} \approx 15.25 \text{ Hz} \)
(Note: The OCR gives \( 15.2 \text{ Hz} \). I will use this value for consistency.)
\( = 15.2 \text{ Hz} \)
अतः वे आवृत्तियाँ जिन पर परिपथ द्वारा अवशोषित शक्ति, महत्तम शक्ति की आधी होगी, निम्नलिखित हैं-
\( \nu = \nu_0 \pm \Delta \nu = 663 \pm 15.2 \)
\( \nu = 678.2 \text{ Hz} \) या \( 647.8 \text{ Hz} \)
(Note: The OCR gives \( 678 \text{ Hz} \) या \( 648 \text{ Hz} \). I will use these rounded values for consistency.)
\( \nu = 678 \text{ Hz} \) या \( 648 \text{ Hz} \)
(d) परिपथ के लिए Q-कारक \( Q = \frac{\omega_0 L}{R} = \frac{X_L}{R} = \frac{4167 \times 0.12}{23} = \frac{500.04}{23} \approx 21.74 \)
(Note: The OCR gives \( 21.7 \). I will use this value for consistency.)
\( = 21.7 \)
In simple words: LCR परिपथ में, धारा का आयाम और अवशोषित शक्ति अनुनाद आवृत्ति पर अधिकतम होती है, जहाँ \( X_L = X_C \)। वे आवृत्तियाँ जहाँ शक्ति आधी हो जाती है, उन्हें अर्ध-शक्ति आवृत्तियाँ कहते हैं, और वे अनुनाद आवृत्ति के आसपास एक निश्चित बैंडविड्थ में होती हैं। Q-कारक परिपथ की तीक्ष्णता का माप है।
🎯 Exam Tip: इस प्रकार के विस्तृत प्रश्नों में, अनुनाद आवृत्ति (\( \omega_0 \)), अर्ध-शक्ति आवृत्तियाँ (\( \nu_0 \pm \Delta \nu \)) और Q-कारक के बीच के संबंधों को समझना महत्वपूर्ण है। प्रत्येक भाग के लिए सूत्र और गणनाएँ सटीक होनी चाहिए।
Question 21. एक श्रेणीबद्ध LCR परिपथ के लिए जिसमें L = 3.0 H, C = 27 µF तथा R = 7.4 Ω अनुनादी आवृत्ति तथा ९कारक निकालिए। परिपथ के अनुनाद की तीक्ष्णता को सुधारने की इच्छा से “अर्ध उच्चिष्ठ पर पूर्ण चौड़ाई" को 2 गुणक द्वारा घटा दिया जाता है। इसके लिए उचित उपाय सुझाइए।
Answer: हल- अनुनादी आवृत्ति
\[ \omega_r = \frac{1}{\sqrt{LC}} = \frac{1}{\sqrt{3.0 \times 27 \times 10^{-6}}} = 111 \text{ rad s}^{-1} \]
तथा
\[ Q = \frac{\omega_r L}{R} = \frac{111 \times 3.0}{7.4} = 45 \]
पर पूर्ण चौड़ाई को आधा करने अथवा समान आवृत्ति के लिए Q को दोगुना करने हेतु प्रतिरोध R का आधा कर देना चाहिए।
In simple words: अनुनादी आवृत्ति \( \omega_r \) और Q-कारक की गणना दी गई L, C, और R मानों का उपयोग करके की जाती है। परिपथ के अनुनाद की तीक्ष्णता सुधारने के लिए, प्रतिरोध R को आधा करना चाहिए ताकि Q-कारक दोगुना हो जाए।
🎯 Exam Tip: अनुनादी आवृत्ति और Q-कारक के सूत्रों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये LCR परिपथों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने में सहायक होते हैं। प्रतिरोध का तीक्ष्णता पर प्रभाव समझने से अच्छे अंक प्राप्त होते हैं।
Question 22. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(1) क्या किसी ac परिपथ में प्रयुक्त तात्क्षणिक वोल्टता परिपथ में श्रेणीक्रम में जोड़े गए अवयवों के सिरों पर तात्क्षणिक वोल्टताओं के बीजगणितीय योग के बराबर होता है? क्या यही बात rms वोल्टताओं में भी लागू होती है?
(2) प्रेरण कुण्डली के प्राथमिक परिपथ में एक संधारित्र का उपयोग करते हैं।
(3) एक प्रयुक्त वोल्टता संकेत एक dc वोल्टता तथा उच्च आवृत्ति के एक ac वोल्टता के अध्यारोपण से निर्मित है। परिपथ एक श्रेणीबद्ध प्रेरक तथा संधारित्र से निर्मित है। दर्शाइए कि dc संकेत C तथा ac संकेत L के सिरे पर प्रकट होगा।
(4) एक लैम्प से श्रेणीक्रम में जुडी चोक को एक dc लाइन से जोड़ा गया है। लैम्प तेजी से चमकता है। चोक में लोहे के क्रोड को प्रवेश कराने पर लैम्प की दीप्ति में कोई अन्तर नहीं पड़ता है। यदि एक ac लाइन से लैम्प का संयोजन किया जाए तो तदनुसार प्रेक्षणों की प्रागुक्ति कीजिए।
(5) ac मेंस के साथ कार्य करने वाली फ्लोरोसेंट ट्यूब में प्रयुक्त चोक कुण्डली की आवश्यकता क्यों होती है? चोक कुण्डली के स्थान पर सामान्य प्रतिरोधक का उपयोग क्यों नहीं होता?
Answer: उत्तर-
(1) हाँ, परन्तु यह तथ्य rms वोल्टताओं के लिए सत्य नहीं है क्योंकि विभिन्न अवयवों की rms वोल्टताएँ समान कला में नहीं होती।
(2) संधारित्र को जोड़ने से, परिपथ को तोड़ते समय चिनगारी देने वाली धारा संधारित्र को आवेशित करती है; अतः चिनगारी नहीं निकल पाती।
(3) संधारित्र dc सिग्नल को रोक देता है; अतः dc सिग्नल वोल्टता संधारित्र के सिरों पर प्रकट होगा जबकि ac सिग्नल प्रेरक के सिरों पर प्रकट होगा।
(4) dc लाइन के लिए \( V = 0 \) अतः चोक की प्रतिबाधा \( X_L = 2\pi\nu L = 0 \) अतः चोक दिष्ट धारा के मार्ग में कोई रुकावट नहीं डालती, इससे लैम्प तेज चमकता है। ac लाइन में चोक उच्च प्रतिघात उत्पन्न करती है (L का मान अधिक होने के कारण); अतः लैम्प में धारा घट जाती है और उसकी चमक मद्धिम पड़ जाती है।
(5) चोक कुण्डली एक प्रेरक का कार्य करती है और बिना शक्ति खर्च किए ही धारा को कम कर देती है। यदि चोक के स्थान पर प्रतिरोधक का प्रयोग करें तो वह धारा को कम तो कर देगा परन्तु इसमें विद्युत शक्ति ऊष्मा के रूप में व्यय होती रहेगी।
In simple words: तात्क्षणिक वोल्टेज बीजगणितीय रूप से जुड़ते हैं, लेकिन rms वोल्टेज नहीं क्योंकि वे कला में नहीं होते। संधारित्र DC को ब्लॉक करता है और AC को पास करता है, जबकि प्रेरक AC को ब्लॉक करता है और DC को पास करता है। चोक कुण्डली बिना शक्ति हानि के धारा नियंत्रित करती है, प्रतिरोधक के विपरीत जो ऊष्मा के रूप में ऊर्जा क्षय करता है।
🎯 Exam Tip: इन अवधारणाओं को समझना महत्वपूर्ण है, खासकर चोक कुण्डली के कार्य सिद्धांत और DC/AC परिपथों में विभिन्न घटकों के व्यवहार को। यह सुनिश्चित करता है कि आप ऊर्जा दक्षता और परिपथ डिजाइन के सिद्धांतों को समझते हैं।
Question 23. एक शक्ति संप्रेषण लाइन अपचायी ट्रांसफॉर्मर में जिसकी प्राथमिक कुण्डली में 4000 फेरे हैं, 2300 वोल्ट पर शक्ति निवेशित करती है। 230V की निर्गत शक्ति प्राप्त करने के लिए द्वितीयक में कितने फेरे होने चाहिए?
Answer: हल-दिया है, \( N_p = 4000 \), \( V_p = 2300 \) V, \( V_s = 230 \) V, \( N_s = ? \)
सूत्र \( \frac{V_s}{V_p} = \frac{N_s}{N_p} \) से,
द्वितीयक कुण्डली में फेरों की संख्या
\[ N_s = \frac{V_s}{V_p} \times N_p = \frac{230}{2300} \times 4000 = 400 \]
In simple words: ट्रांसफॉर्मर के वोल्टेज और फेरों की संख्या के अनुपात का उपयोग करके, हम द्वितीयक कुण्डली में आवश्यक फेरों की संख्या ज्ञात कर सकते हैं। दिए गए प्राथमिक वोल्टेज और फेरों तथा वांछित द्वितीयक वोल्टेज के लिए, द्वितीयक कुण्डली में 400 फेरे होने चाहिए।
🎯 Exam Tip: ट्रांसफॉर्मर समीकरण \( \frac{V_s}{V_p} = \frac{N_s}{N_p} \) को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह ट्रांसफॉर्मर के बुनियादी कार्य सिद्धांतों को दर्शाता है और ऐसे गणना-आधारित प्रश्नों के लिए आवश्यक है।
Question 24. एक जल विद्युत शक्ति संयंत्र में जल दाब शीर्ष 300 m की ऊँचाई पर है तथा उपलब्ध जल प्रवाह 100 m³s-1 है। यदि टरबाइन जनित्र की दक्षता 60% हो तो संयंत्र से उपलब्ध विद्युत शक्ति का आकलन कीजिए, \( g = 9.8 \text{ m s}^{-2} \)
Answer: हल-
दिया है, \( h = 300 \) m, \( g = 9.8 \text{ m/s}^2 \), जल का आयतन \( V = 100 \text{ m}^3 \), समय \( t = 1 \) s, जनित्र की दक्षता = 60%
जल विद्युत शक्ति = जल-स्तम्भ का दाब x प्रति सेकण्ड प्रवाहित जल का आयतन
\( = h\rho g \times \frac{V}{t} = 300 \times 10^3 \times 9.8 \times 100 = 29.4 \times 10^7 \) W
जनित्र द्वारा उत्पन्न विद्युत शक्ति = कुल शक्ति x दक्षता
\( = 29.4 \times 10^7 \times \frac{60}{100} \)
\( = 176.4 \times 10^6 \) W \( = 176.4 \) MW
In simple words: जल विद्युत शक्ति संयंत्र में जल की ऊँचाई और प्रवाह दर से कुल यांत्रिक शक्ति की गणना की जाती है। फिर, जनित्र की दक्षता को ध्यान में रखते हुए, उपलब्ध विद्युत शक्ति का आकलन 176.4 MW किया जाता है।
🎯 Exam Tip: जल विद्युत शक्ति की गणना के लिए गुरुत्वाकर्षण स्थितिज ऊर्जा और प्रवाह दर के साथ दक्षता को सही ढंग से लागू करना महत्वपूर्ण है। सभी इकाइयों को मानक SI इकाइयों में रखना सुनिश्चित करें।
Question 25. 440V पर शक्ति उत्पादन करने वाले किसी विद्युत संयंत्र से 15 km दूर स्थित एक छोटे से कस्बे में 220 V पर 800 kW शक्ति की आवश्यकता है। विद्युत शक्ति ले जाने वाली दोनों तार की लाइनों का प्रतिरोध 0.5 Ω प्रति किलोमीटर है। कस्बे को उप-स्टेशन में लगे 4000-220V अपचायी ट्रांसफॉर्मर से लाइन द्वारा शक्ति पहुँचती है।
(a) ऊष्मा के रूप में लाइन से होने वाली शक्ति के क्षय का आकलन कीजिए ।
(b) संयंत्र से कितनी शक्ति की आपूर्ति की जानी चाहिए, यदि क्षरण द्वारा शक्ति का क्षय नगण्य है।
(c) संयंत्र के उच्चायी ट्रांसफॉर्मर की विशेषता बताइए।
Answer: हल-
(a) तार की लाइनों का प्रतिरोध \( R = 30 \text{ km} \times 0.5 \text{ } \Omega \text{ km}^{-1} = 15 \Omega \)
उप-स्टेशन पर लगे ट्रांसफॉर्मर के लिए \( V_p = 4000 \) V, \( V_s = 220 \) v माना।
प्राथमिक परिपथ में धारा \( = i_p \)
द्वितीयक परिपथ में धारा \( = i_s \)
ट्रांसफॉर्मर द्वारा द्वितीयक परिपथ में दी गई शक्ति
\( V_s \times i_s = 800 \text{ kW} = 800 \times 10^3 \) W
\( V_p \times i_p = V_s \times i_s \) से,
प्राथमिक परिपथ में धारा \( i_p = \frac{V_s \times i_s}{V_p} = \frac{800 \times 10^3}{4000} = 200 \) A
यह धारा सप्लाई लाइन से होकर गुजरती है।
लाइन में होने वाला शक्ति क्षय \( P = i_p^2 \times R = (200)^2 \times 15 \) W \( = 600 \) kW
(b) संयंत्र द्वारा आपूर्ति की जाने वाली शक्ति = 800 kW + 600 kW = 1400 kW
(c) सप्लाई लाइन पर विभवपात \( V = i_p \times R = 200 \times 15 = 3000 \) V उप-स्टेशन पर लगा अपचायी ट्रांसफॉर्मर 4000 V – 220 V प्रकार का है; अतः इस ट्रांसफॉर्मर की प्राथमिक कुण्डली पर विभवपात = 4000 V संयंत्र पर लगे उच्चायी ट्रांसफॉर्मर द्वारा प्रदान की जाने वाली वोल्टता = 3000 + 4000 = 7000 V अतः यह ट्रांसफॉर्मर 440 V – 7000 V प्रकार का होना चाहिए। सप्लाई लाइन में प्रतिशत शक्ति क्षय \( = \frac{600 \text{ kW}}{1400 \text{ kW}} \times 100 = 42.86 \% \)
In simple words:
(a) ट्रांसमिशन लाइन में शक्ति हानि की गणना करने के लिए, पहले ट्रांसफॉर्मर के प्राथमिक पक्ष में धारा (200A) ज्ञात करते हैं, फिर इसे लाइन प्रतिरोध (15Ω) के साथ वर्ग करके (P=I²R) शक्ति क्षय (600kW) प्राप्त करते हैं।
(b) कुल आपूर्ति की गई शक्ति, आवश्यक शक्ति और लाइन हानि (1400kW) का योग है।
(c) लाइन में विभवपात और आवश्यक इनपुट वोल्टेज के आधार पर, संयंत्र के उच्चायी ट्रांसफॉर्मर को 440V से 7000V तक वोल्टेज बढ़ाना चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 42.86% शक्ति क्षय होता है।
🎯 Exam Tip: ट्रांसमिशन लाइनों में शक्ति हानि की गणना के लिए \( P=I^2R \) और ट्रांसफॉर्मर अनुपात समीकरणों का सटीक उपयोग महत्वपूर्ण है। प्रतिशत हानि की गणना करते समय कुल आपूर्ति की गई शक्ति का ध्यान रखें।
Question 26. प्रश्न 25 को पुनः कीजिए। इसमें पहले के ट्रांसफॉर्मर के स्थान पर 40,000-220 V का अपचायी ट्रांसफॉर्मर है। [पूर्व की भाँति क्षरण के कारण हानियों को नगण्य मानिए। यद्यपि अब यह सन्निकटन उचित नहीं है, क्योंकि इसमें उच्च वोल्टता पर संप्रेषण होता है] अतः समझाइए कि क्यों उच्च वोल्टता संप्रेषण अधिक वरीय है?
Answer: हल-(a) पूर्व प्रश्न की भाँति \( V_s \times i_s = 800 \times 10^3 \)
\[ i_p = \frac{V_s \times i_s}{V_p} = \frac{800 \times 10^3}{40000} = 20 \text{ A} \]
लाइन में होने वाला शक्ति व्यय \( P = i_p^2 \times R \)
\( P = (20)^2 \times 15 = 6000 \) W \( = 6 \) kW
(b) संयंत्र द्वारा प्रदान की जाने वाली शक्ति = 800 kW + 6 kW = 808 W
(c) सप्लाई लाइन पर विभवपात \( V = I_p \times R = 20 \times 15 = 300 \) V उपस्टेशन पर लगा ट्रांसफॉर्मर 40000 V – 220 V प्रकार का है; अतः इसकी प्राथमिक कुण्डली पर विभवपात = 40000 V संयंत्र पर लगे उच्चायी ट्रांसफॉर्मर द्वारा प्रदान की जाने वाली वोल्टता = 40000 V + 300 V = 40300 V संयंत्र पर लगा ट्रांसफॉर्मर 440 V – 40300 V प्रकार का होना चाहिए। सप्लाई लाइन में प्रतिशत शक्ति क्षय \( = \frac{6}{806} \times 100 = 0.74\% \)
प्रत्यावर्ती धारा प्रश्न 25 व 26 के हलों से स्पष्ट है कि विद्युत शक्ति उच्च वोल्टता पर सम्प्रेषित करने से सप्लाई लाइन में होने वाला शक्ति क्षय बहुत घट जाता है। यही कारण है कि विद्युत उत्पादन संयंत्रों से विद्युत शक्ति का सम्प्रेषण उच्च वोल्टता पर किया जाता है।
In simple words: उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन का उपयोग करने पर, प्राथमिक धारा बहुत कम हो जाती है (200A से 20A)। इससे लाइन में शक्ति हानि \( (I^2R) \) नाटकीय रूप से कम हो जाती है (600kW से 6kW)। परिणामस्वरूप, प्रतिशत शक्ति क्षय भी काफी कम हो जाता है (42.86% से 0.74%)। यही कारण है कि उच्च वोल्टेज पर विद्युत शक्ति का संचरण अधिक कुशल और पसंदीदा है।
🎯 Exam Tip: उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन के लाभों को समझना महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से शक्ति हानि में कमी के संदर्भ में। \( P=I^2R \) संबंध का उपयोग करके उच्च वोल्टेज और कम धारा के बीच संबंध को स्पष्ट करें।
परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. वोल्टमीटर द्वारा मापे गए प्रत्यावर्ती धारा के मेन्स का विभव 200 वोल्ट प्राप्त होता है, तो इस विभव का वर्ग-माध्य-मूल मान होगा-
(i) \( 200\sqrt{2} \) वोल्ट
(ii) \( 100\sqrt{2} \) वोल्ट
(iii) 200 वोल्ट
(iv) \( 400/\pi \) वोल्ट
Answer: (iii) 200 वोल्ट
In simple words: वोल्टमीटर द्वारा मापा गया प्रत्यावर्ती धारा का विभव हमेशा वर्ग-माध्य-मूल (rms) मान होता है। इसलिए, यदि वोल्टमीटर 200 वोल्ट दिखाता है, तो rms मान 200 वोल्ट ही होगा।
🎯 Exam Tip: यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि अधिकांश ac मापन उपकरण (जैसे वोल्टमीटर और एमीटर) rms मानों को प्रदर्शित करते हैं, शिखर मानों को नहीं।
Question 2. एक ऐमीटर का प्रत्यावर्ती परिपथ में पाठयांक 4 ऐम्पियर है। परिपथ में धारा का शिखर मान है-
(i) 4 ऐम्पियर
(ii) 8 ऐम्पियर
(iii) \( 4\sqrt{2} \) ऐम्पियर
(iv) \( 2\sqrt{2} \) ऐम्पियर
Answer: (iii) \( 4\sqrt{2} \) ऐम्पियर
In simple words: एमीटर द्वारा मापा गया मान rms धारा है। शिखर धारा \( (I_0) \) rms धारा \( (I_{rms}) \) के \( \sqrt{2} \) गुना होती है। इसलिए, यदि rms धारा 4 ऐम्पियर है, तो शिखर धारा \( 4\sqrt{2} \) ऐम्पियर होगी।
🎯 Exam Tip: rms मान और शिखर मान के बीच संबंध \( I_0 = I_{rms} \sqrt{2} \) को जानना ऐसे प्रश्नों को हल करने के लिए आवश्यक है।
Question 3. विशुद्ध प्रेरकीय परिपथ में शक्ति गुणांक का मान है-
(i) शून्य
(ii) 0.1
(iii) 1
(iv) अनन्त
Answer: (i) शून्य
In simple words: एक विशुद्ध प्रेरकीय परिपथ में धारा और वोल्टेज के बीच का कलांतर \( 90^\circ \) होता है। चूंकि शक्ति गुणांक \( \cos\phi \) होता है, और \( \cos 90^\circ = 0 \), इसलिए शक्ति गुणांक शून्य होता है।
🎯 Exam Tip: विशुद्ध प्रेरक (और विशुद्ध संधारित्र) परिपथों के लिए शक्ति गुणांक हमेशा शून्य होता है, क्योंकि धारा और वोल्टेज के बीच \( 90^\circ \) का कलांतर होता है। यह अवधारणा ऊर्जा क्षय को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 4. एक प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में 8 ओम का प्रतिरोध तथा 6 ओम प्रतिघात का प्रेरकत्व श्रेणीक्रम में लगे हैं। परिपथ की प्रतिबाधा होगी
(i) 2 ओम
(ii) 10 ओम
(iii) 14 ओम
(iv) \( 14\sqrt{2} \) ओम
Answer: (ii) 10 ओम
In simple words: श्रेणीक्रम RL परिपथ की प्रतिबाधा \( \sqrt{R^2 + X_L^2} \) सूत्र से ज्ञात की जाती है। प्रतिरोध 8 ओम और प्रेरकीय प्रतिघात 6 ओम होने पर, प्रतिबाधा \( \sqrt{8^2 + 6^2} = \sqrt{64 + 36} = \sqrt{100} = 10 \) ओम होगी।
🎯 Exam Tip: श्रेणीक्रम RL, RC, और RLC परिपथों के लिए प्रतिबाधा के सूत्रों को याद रखें। यह एक मौलिक अवधारणा है जो गणना-आधारित प्रश्नों में अक्सर पूछी जाती है।
Question 5. अनुनाद की स्थिति में L-C परिपथ की आवृत्ति है-
(i) \( 2\pi\sqrt{LC} \)
(ii) \( \frac{1}{2\pi} \sqrt{LC} \)
(iii) \( \frac{1}{2\pi} \sqrt{\frac{1}{LC}} \)
(iv) \( 2\pi \sqrt{\frac{1}{LC}} \)
Answer: (iii) \( \frac{1}{2\pi} \sqrt{\frac{1}{LC}} \)
In simple words: एक LC परिपथ में अनुनाद तब होता है जब प्रेरकीय प्रतिघात धारितीय प्रतिघात के बराबर होता है। इस स्थिति में, परिपथ की अनुनादी आवृत्ति \( \frac{1}{2\pi\sqrt{LC}} \) के बराबर होती है।
🎯 Exam Tip: अनुनादी आवृत्ति के लिए सूत्र \( f_0 = \frac{1}{2\pi\sqrt{LC}} \) बहुत महत्वपूर्ण है और इसे हमेशा याद रखना चाहिए। यह RLC परिपथों की मूलभूत विशेषता है।
Question 6. एक श्रेणी अनुनादी LCR परिपथ में धारिता C से 4C परिवर्तित की जाती है। उतनी ही अनुनादी आवृत्ति के लिए प्रेरकत्व Lको परिवर्तित करना चाहिए-
(i) 2L
(ii) \( \frac{L}{2} \)
(iii) 4L
(iv) \( \frac{L}{4} \)
Answer: (iv) \( \frac{L}{4} \)
In simple words: अनुनादी आवृत्ति \( f_0 = \frac{1}{2\pi\sqrt{LC}} \) है। यदि अनुनादी आवृत्ति को समान रखना है और धारिता को C से 4C तक बढ़ाया जाता है, तो प्रेरकत्व को \( \frac{L}{4} \) करना होगा ताकि LC का गुणनफल स्थिर रहे।
🎯 Exam Tip: अनुनादी आवृत्ति सूत्र का उपयोग करके L और C के बीच के संबंध को समझें। यदि एक घटक बदलता है, तो आवृत्ति को स्थिर रखने के लिए दूसरे घटक को कैसे समायोजित किया जाए, यह जानना महत्वपूर्ण है।
Question 7. एक L-C-R परिपथ को प्रत्यावर्ती धारा के स्रोत से जोड़ा गया है। अनुनाद की स्थिति में लगाये गये विभवान्तर एवं प्रवाहित धारा में कलान्तर होगा-
(i) शून्य
(ii) \( \frac{\pi}{4} \)
(iii) \( \frac{\pi}{2} \)
(iv) \( \pi \)
Answer: (i) शून्य
In simple words: LCR परिपथ में अनुनाद की स्थिति में, प्रेरकीय प्रतिघात धारितीय प्रतिघात के बराबर होता है, जिससे वे एक-दूसरे को रद्द कर देते हैं। परिपथ विशुद्ध प्रतिरोधी की तरह व्यवहार करता है, और इस स्थिति में वोल्टेज और धारा के बीच कलांतर शून्य होता है।
🎯 Exam Tip: अनुनादी RLC परिपथ के लिए, \( X_L = X_C \) और \( \phi = 0^\circ \) (शक्ति गुणांक = 1) होता है। यह शक्ति संचरण के लिए एक इष्टतम स्थिति है।
Question 8. किसी प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में वोल्टेज V तथा धारा I हो तब शक्ति क्षय-
(i) Vi
(ii) \( \frac{1}{2} \) Vi
(iii) \( \frac{1}{\sqrt{2}} \) Vi
(iv) V तथा I के बीच कला कोण पर निर्भर करता है।
Answer: (iv) V तथा I के बीच कला कोण पर निर्भर करता है।
In simple words: प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में शक्ति क्षय केवल वोल्टेज और धारा के गुणनफल पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उनके बीच के कला कोण \( (\phi) \) पर भी निर्भर करता है। औसत शक्ति क्षय \( P = V_{rms} I_{rms} \cos\phi \) द्वारा दिया जाता है, जहाँ \( \cos\phi \) शक्ति गुणांक है।
🎯 Exam Tip: प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में औसत शक्ति क्षय का सूत्र \( P = V_{rms} I_{rms} \cos\phi \) है, जहाँ \( \cos\phi \) शक्ति गुणांक है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि शक्ति क्षय कलांतर पर निर्भर करता है।
Question 9. किसी ट्रांसफॉर्मर में क्या सम्भव नहीं है ?
(i) भंवर धारा
(ii) दिष्ट धारा
(iii) प्रत्यावर्ती धारा
(iv) प्रेरित धारा
Answer: (ii) दिष्ट धारा
In simple words: ट्रांसफॉर्मर फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है, जिसमें परिवर्तित चुम्बकीय फ्लक्स की आवश्यकता होती है। दिष्ट धारा एक स्थिर चुम्बकीय क्षेत्र बनाती है, जो फ्लक्स परिवर्तन नहीं कर सकता, इसलिए ट्रांसफॉर्मर दिष्ट धारा पर कार्य नहीं कर सकता।
🎯 Exam Tip: ट्रांसफॉर्मर केवल प्रत्यावर्ती धारा (AC) पर काम करते हैं क्योंकि उन्हें फ्लक्स में लगातार परिवर्तन की आवश्यकता होती है। दिष्ट धारा (DC) फ्लक्स परिवर्तन प्रदान नहीं करती, जिससे कोई प्रेरित EMF नहीं होता।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. एक प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में विभवान्तर का वर्ग-माध्य-मूल मान 220 V है। विभव का शिखर मान क्या है?
Answer: हल-
विभव का शिखर मान \( V_0 = V_{rms} \sqrt{2} = 220\sqrt{2} \) वोल्ट.
In simple words: वर्ग-माध्य-मूल (rms) मान को \( \sqrt{2} \) से गुणा करके हम प्रत्यावर्ती विभव का शिखर मान ज्ञात कर सकते हैं। 220 V rms मान के लिए, शिखर मान \( 220\sqrt{2} \) वोल्ट होगा।
🎯 Exam Tip: rms मान \( (V_{rms}) \) और शिखर मान \( (V_0) \) के बीच संबंध \( V_0 = V_{rms}\sqrt{2} \) को याद रखना आवश्यक है।
Question 2. किसी प्रत्यावर्ती धारा का वर्ग-माध्य-मूल मान 8 ऐम्पियर है। इसका शिखर मान ज्ञात कीजिए।
Answer: हल-
धारा का शिखर मान \( i_0 = I_{rms} \sqrt{2} = 8\sqrt{2} \) ऐम्पियर
In simple words: प्रत्यावर्ती धारा का शिखर मान, उसके वर्ग-माध्य-मूल मान का \( \sqrt{2} \) गुना होता है। 8 ऐम्पियर के rms मान के लिए, शिखर मान \( 8\sqrt{2} \) ऐम्पियर होगा।
🎯 Exam Tip: धारा के rms मान और शिखर मान के बीच संबंध \( I_0 = I_{rms}\sqrt{2} \) को जानना महत्वपूर्ण है।
Question 3. किसी परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा का शीर्ष मान \( \sqrt{2} \) A है। धारा का वर्ग-माध्य-मूल (rms) मान ज्ञात कीजिए।
Answer: हल-
धारा का वर्ग-माध्य-मूल (rms) मान
\[ i_{rms} = \frac{i_0}{\sqrt{2}} = \frac{\sqrt{2}A}{\sqrt{2}} = 1 \text{ A} \]
In simple words: प्रत्यावर्ती धारा का वर्ग-माध्य-मूल (rms) मान उसके शीर्ष मान को \( \sqrt{2} \) से विभाजित करके प्राप्त किया जाता है। यदि शीर्ष मान \( \sqrt{2} \) A है, तो rms मान 1 A होगा।
🎯 Exam Tip: धारा के rms मान \( (I_{rms}) \) और शीर्ष मान \( (I_0) \) के बीच संबंध \( I_{rms} = \frac{I_0}{\sqrt{2}} \) को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 4. एक प्रत्यावर्ती विभव \( E = 240\sqrt{2} \sin 300\pi t \) से प्रदर्शित है । विभव का वर्ग-माध्य-मूल मान एवं आवृत्ति ज्ञात कीजिए।
Answer: हल-
प्रत्यावर्ती विभव के समीकरण \( E = 240\sqrt{2} \sin 300\pi t \) की तुलना \( E = E_0 \sin\omega t \) से करने पर
\( E_0 = 240\sqrt{2} \), तथा \( \omega = 300\pi \)
वर्ग-माध्य-मूलमान \( E_{rms} = \frac{E_0}{\sqrt{2}} = \frac{240\sqrt{2}}{\sqrt{2}} = 240 \) वोल्ट
तथा आवृत्ति, \( f = \frac{\omega}{2\pi} = \frac{300\pi}{2\pi} = 150 \) हर्ट्ज
In simple words: दिए गए प्रत्यावर्ती विभव समीकरण से, शिखर विभव \( (E_0) \) और कोणीय आवृत्ति \( (\omega) \) की पहचान करें। फिर, \( E_0 \) को \( \sqrt{2} \) से विभाजित करके rms मान प्राप्त करें, और \( \omega \) को \( 2\pi \) से विभाजित करके आवृत्ति ज्ञात करें।
🎯 Exam Tip: प्रत्यावर्ती वोल्टेज या धारा के सामान्य समीकरण \( V = V_0 \sin\omega t \) (या \( I = I_0 \sin\omega t \)) को पहचानना और \( \omega = 2\pi f \) तथा \( V_{rms} = V_0/\sqrt{2} \) जैसे संबंधों को जानना आवश्यक है।
Question 5. एक प्रत्यावर्ती धारा का समीकरण \( i = 4 \sin (100\pi t – 0) \) है। धारा का आवर्तकाल ज्ञात कीजिए।
Answer: हल-
समीकरण \( i = 4 \sin (100\pi t – 0) \) की समीकरण \( i = i_0 \sin (2\pi f t – 0) \) से तुलना करने पर \( 2\pi f = 100\pi \)
\( f = 50 \) हर्ट्ज़
धारा का आवर्तकाल \( T = \frac{1}{f} = \frac{1}{50} = 0.2 \) सेकण्ड
In simple words: प्रत्यावर्ती धारा समीकरण \( i = i_0 \sin(\omega t + \phi) \) से कोणीय आवृत्ति \( \omega \) को पहचानें। फिर, \( \omega = 2\pi f \) संबंध का उपयोग करके आवृत्ति \( f \) ज्ञात करें, और \( T = 1/f \) सूत्र से आवर्तकाल \( T \) की गणना करें।
🎯 Exam Tip: प्रत्यावर्ती धारा के तात्कालिक समीकरण से कोणीय आवृत्ति (\( \omega \)) और आवृत्ति (\( f \)) के बीच संबंध \( \omega = 2\pi f \) को समझना महत्वपूर्ण है। आवर्तकाल \( T = 1/f \) भी एक आवश्यक सूत्र है।
Question 6. एक प्रत्यावर्ती वोल्टता का समीकरण \( V = 100\sqrt{2} \sin (100\pi t) \) है। वोल्टता का वर्ग माध्य मूल मान तथा आवृत्ति ज्ञात कीजिए।
Answer: हल-
समीकरण \( V = 100\sqrt{2} \sin (100 \pi t) \) की समीकरण \( V = V_0 \sin (2\pi f t) \) से तुलना करने पर,
\( V_0 = 100\sqrt{2} \) वोल्ट तथा \( 2\pi f t = 100\pi t \)
वोल्टता का वर्ग माध्य मूल मान \( V_{rms} = \frac{V_0}{\sqrt{2}} = \frac{100\sqrt{2}}{\sqrt{2}} = 100 \) वोल्ट
आवृत्ति \( f = \frac{100\pi}{2\pi} = 50 \) हर्ट्ज
In simple words: दिए गए प्रत्यावर्ती वोल्टता समीकरण से शिखर वोल्टेज \( (V_0) \) और कोणीय आवृत्ति \( (\omega) \) को पहचानें। वर्ग-माध्य-मूल (rms) मान ज्ञात करने के लिए \( V_0 \) को \( \sqrt{2} \) से विभाजित करें, और आवृत्ति \( f \) ज्ञात करने के लिए \( \omega \) को \( 2\pi \) से विभाजित करें।
🎯 Exam Tip: प्रत्यावर्ती वोल्टेज समीकरण से \( V_0 \), \( \omega \), \( V_{rms} \) और \( f \) के मानों को निकालना एक मानक प्रक्रिया है। इन सभी मात्राओं के बीच संबंधों को याद रखना सुनिश्चित करें।
Question 7. प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रेरण प्रतिघात का अर्थ समझाइए ।
Answer: उत्तर-
प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में शुद्ध प्रेरकत्व द्वारा धारा के मार्ग में उत्पन्न प्रभावी प्रतिरोध परिपथ को प्रेरण प्रतिघात कहलाता है। इसे \( X_L \) से व्यक्त करते हैं तथा
\( X_L = \omega L = 2\pi f L \)
In simple words: प्रेरण प्रतिघात \( (X_L) \) वह प्रतिरोध है जो एक प्रेरक (inductor) प्रत्यावर्ती धारा के प्रवाह के लिए प्रस्तुत करता है। यह धारा की आवृत्ति और प्रेरकत्व \( (L) \) पर निर्भर करता है, और इसे \( X_L = 2\pi f L \) द्वारा परिभाषित किया जाता है।
🎯 Exam Tip: प्रेरण प्रतिघात की अवधारणा, इसकी निर्भरता (आवृत्ति और प्रेरकत्व पर) और इसका सूत्र \( (X_L = \omega L) \) को समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ac परिपथ विश्लेषण का एक मूलभूत घटक है।
Question 8. 100 mH प्रेरकत्व की कुण्डली में 50 Hz आवृत्ति की प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित हो रही है। कुण्डली का प्रेरण प्रतिघात ज्ञात कीजिए।
Answer: हल-
\( L = 100 \text{ mH} = 100 \times 10^{-3} \text{ H} = 0.1 \text{ H} \)
\( f = 50 \text{ Hz} \)
प्रेरण प्रतिघात \( X_L = 2\pi f L = 2 \times 3.14 \times 50 \times 0.1 = 31.4 \) ओम
In simple words: एक प्रेरक कुण्डली का प्रेरण प्रतिघात \( (X_L) \) धारा की आवृत्ति \( (f) \) और कुण्डली के प्रेरकत्व \( (L) \) पर निर्भर करता है। दिए गए मानों को सूत्र \( X_L = 2\pi f L \) में रखकर, हम प्रेरण प्रतिघात को 31.4 ओम ज्ञात कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: प्रेरण प्रतिघात की गणना के लिए \( X_L = 2\pi f L \) सूत्र को याद रखें और सुनिश्चित करें कि प्रेरकत्व को हेनरी में और आवृत्ति को हर्ट्ज में परिवर्तित किया गया है।
Question 9. निम्न चित्र से प्रेरक कुण्डली के प्रतिघात की गणना कीजिए-
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक श्रेणीक्रम परिपथ दिखाता है जिसमें एक प्रेरक कुण्डली (L = 20 mH) एक प्रत्यावर्ती वोल्टेज स्रोत से जुड़ी है। वोल्टेज स्रोत का समीकरण \( V = 10 \sin 1000 t \) है, जो परिपथ में धारा प्रवाहित करता है।
Answer: हल-
दी गयी समीकरण \( V = 10 \sin 1000 t \) की समीकरण \( V = V_0 \sin\omega t \) से तुलना करने पर
\( \omega = 1000 \) सेकण्ड-1
कुण्डली का प्रतिघात \( X_L = \omega L = 1000 \times 20 \times 10^{-3} \Omega = 20 \Omega \)
In simple words: दिए गए वोल्टेज समीकरण से कोणीय आवृत्ति \( (\omega) \) को पहचानें। फिर, प्रेरकत्व \( (L) \) के मान को हेनरी में बदलकर \( X_L = \omega L \) सूत्र का उपयोग करके प्रेरक कुण्डली का प्रतिघात ज्ञात करें।
🎯 Exam Tip: प्रत्यावर्ती वोल्टेज समीकरण \( V=V_0 \sin\omega t \) से कोणीय आवृत्ति \( \omega \) को निकालना और फिर प्रेरकत्व \( L \) का उपयोग करके प्रेरकत्व \( X_L=\omega L \) की गणना करना महत्वपूर्ण है।
Question 10. किसी प्रत्यावर्ती परिपथ में 8 ओम का प्रतिरोध 6 ओम प्रतिघात के प्रेरकत्व से श्रेणीक्रम में जुड़ा है। परिपथ के प्रतिबाधा की गणना कीजिए।
Answer: हल- प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + X_L^2} = \sqrt{8^2 + 6^2} = \sqrt{64 + 36} = \sqrt{100} = 10 \) ओम
In simple words: श्रेणीक्रम में जुड़े प्रतिरोध \( (R) \) और प्रेरकीय प्रतिघात \( (X_L) \) वाले परिपथ की कुल प्रतिबाधा \( (Z) \) पाइथागोरस प्रमेय का उपयोग करके ज्ञात की जाती है। दिए गए मानों के लिए, प्रतिबाधा 10 ओम होगी।
🎯 Exam Tip: श्रेणीक्रम RL परिपथ के लिए प्रतिबाधा का सूत्र \( (Z = \sqrt{R^2 + X_L^2}) \) को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह ऐसे गणना-आधारित प्रश्नों के लिए आवश्यक है।
Question 11. एक कुण्डली की प्रतिबाधा 141.4 Ω तथा प्रतिरोध 100 Ω है। उसका प्रतिघात कितना होगा ?
Answer: हल-
\[ X_L = \sqrt{(141.4)^2 – (100)^2} = \sqrt{(\sqrt{2}(100))^2 – (100)^2} = \sqrt{20000 – 10000} = \sqrt{10000} = 100 \Omega \]
In simple words: एक कुण्डली में प्रतिरोध \( (R) \), प्रेरकीय प्रतिघात \( (X_L) \) और कुल प्रतिबाधा \( (Z) \) के बीच का संबंध \( Z^2 = R^2 + X_L^2 \) होता है। इस सूत्र का उपयोग करके, हम दिए गए \( Z \) और \( R \) मानों से \( X_L \) की गणना कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: प्रतिबाधा सूत्र \( (Z^2 = R^2 + X_L^2) \) का उपयोग करके अज्ञात प्रतिघात \( X_L \) की गणना करने में सक्षम होना महत्वपूर्ण है।
Question 12. L-R परिपथ के शक्ति गुणांक का सूत्र लिखिए।
Answer: उत्तर-
\[ \cos \phi = \frac{R}{Z} = \frac{R}{\sqrt{R^2 + (\omega L)^2}} \]
In simple words: L-R परिपथ में शक्ति गुणांक \( (\cos\phi) \) प्रतिरोध \( (R) \) और कुल प्रतिबाधा \( (Z) \) का अनुपात होता है। इसे \( \frac{R}{\sqrt{R^2 + (\omega L)^2}} \) के रूप में भी व्यक्त किया जा सकता है, जहाँ \( \omega L \) प्रेरकीय प्रतिघात है।
🎯 Exam Tip: L-R परिपथ के शक्ति गुणांक \( (\cos\phi = R/Z) \) का सूत्र जानना आवश्यक है, क्योंकि यह ऐसे परिपथों में ऊर्जा हस्तांतरण की दक्षता को दर्शाता है।
Question 13. कुण्डली में उत्पन्न वैद्युत वाहक बल का व्यंजक कोणीय चाल के पदों में लिखिए।
Answer: उत्तर- कुण्डली में उत्पन्न वैद्युत वाहक बल \( e = NBA\omega \sin\omega t \) \( \sin\omega t \) की महत्तम मान 1 होता है तब वैद्युत वाहक बल \( e = NBA\omega \)
In simple words: एक कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित वैद्युत वाहक बल \( (e) \) कोणीय चाल \( (\omega) \), फेरों की संख्या \( (N) \), चुम्बकीय क्षेत्र \( (B) \), और कुण्डली के क्षेत्रफल \( (A) \) के गुणनफल पर निर्भर करता है। इसका तात्कालिक मान \( e = NBA\omega \sin\omega t \) है, और अधिकतम मान \( NBA\omega \) है।
🎯 Exam Tip: प्रत्यावर्ती धारा जनित्र में प्रेरित EMF के लिए सूत्र \( e = NBA\omega \sin\omega t \) को याद रखना महत्वपूर्ण है, और यह समझना कि \( e_{max} = NBA\omega \) इसका शिखर मान है।
Question 14. प्रत्यावर्ती धारा तथा प्रत्यावर्ती वोल्टेज के समीकरण लिखिए जब प्रत्यावर्ती धारा स्रोत से एक संधारित्र जोड़ा जाता है।
Answer: उत्तर-
\( i = i_0 \sin(\omega t + 90^\circ) \) तथा \( V = V_0 \sin \omega t \). इन दोनों समीकरणों से स्पष्ट है कि धारा \( i \) वोल्टता \( V \) से \( 90^\circ \) कलान्तर अग्रगामी है।
In simple words: जब एक संधारित्र को प्रत्यावर्ती धारा स्रोत से जोड़ा जाता है, तो धारा वोल्टेज से \( 90^\circ \) आगे चलती है। इसे \( V = V_0 \sin \omega t \) और \( i = i_0 \sin(\omega t + 90^\circ) \) समीकरणों से दर्शाया जाता है।
🎯 Exam Tip: संधारित्रीय परिपथों में धारा और वोल्टेज के बीच \( 90^\circ \) के कलांतर को समझना महत्वपूर्ण है, जिसमें धारा वोल्टेज से अग्रगामी होती है।
Question 15. एक LC परिपथ अनुनाद की स्थिति में है। यदि \( C = 1.0 \times 10^{-6} \) F तथा \( L = 0.25 \) H हो, तो परिपथ में दोलन की आवृत्ति ज्ञात कीजिए।
Answer: हल-
परिपथ में दोलन की आवृत्ति
\[ f = \frac{1}{2\pi \sqrt{LC}} = \frac{1}{2 \times 3.14 \times \sqrt{0.25 \times 1.0 \times 10^{-6}}} = \frac{1}{2 \times 3.14 \times 0.5 \times 10^{-3}} = 318.47 \text{ Hz} \]
In simple words: LC परिपथ की अनुनादी आवृत्ति की गणना \( f = \frac{1}{2\pi\sqrt{LC}} \) सूत्र का उपयोग करके की जाती है। दिए गए प्रेरकत्व (L) और धारिता (C) के मानों को प्रतिस्थापित करने पर, दोलन की आवृत्ति 318.47 Hz प्राप्त होती है।
🎯 Exam Tip: LC परिपथ के लिए अनुनादी आवृत्ति का सूत्र \( f = \frac{1}{2\pi\sqrt{LC}} \) को याद रखना और उचित इकाइयों में गणना करना सुनिश्चित करें।
Question 16. RC का विमीय समीकरण निकालिए जबकि R प्रतिरोध तथा C धारिता है।
Answer: हल-
RC की विमा = [R की विमा] [C की विमा]
\[ = [ML^2T^{-3}A^{-2}][M^{-1}L^{-2}T^4A^2] = [M^0L^0T] \]
In simple words: प्रतिरोध (R) और धारिता (C) के विमीय सूत्रों को गुणा करने पर, RC का विमीय समीकरण \[M^0L^0T\] प्राप्त होता है, जो समय के आयाम के बराबर है।
🎯 Exam Tip: प्रतिरोध और धारिता के विमीय सूत्रों को जानना महत्वपूर्ण है। ध्यान दें कि RC का गुणनफल समय का आयाम देता है, जिसका उपयोग RC परिपथ में समय स्थिरांक को दर्शाने के लिए किया जाता है।
Question 17. एक L-C-R परिपथ के शक्ति गुणांक का व्यंजक क्या है? इसका अधिकतम और न्यूनतम मान क्या है?
Answer: हल- शक्ति गुणांक
\[ \cos \phi = \frac{R}{\sqrt{R^2 + (\omega L - \frac{1}{\omega C})^2}} \]
शक्ति गुणांक का अधिकतम मान 1 तथा न्यूनतम मान -1 होता है।
In simple words: L-C-R परिपथ का शक्ति गुणांक \( (\cos\phi) \) प्रतिरोध \( (R) \) और प्रतिबाधा \( (Z) \) का अनुपात है। प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} \) है। शक्ति गुणांक का अधिकतम मान 1 (अनुनाद पर) और न्यूनतम मान -1 होता है।
🎯 Exam Tip: RLC परिपथ के लिए शक्ति गुणांक का सूत्र और इसके अधिकतम (अनुनाद पर) और न्यूनतम मानों को समझना महत्वपूर्ण है। यह सूत्र परिपथ में शक्ति क्षय को नियंत्रित करता है।
Question 18. नीचे दिए गए प्रत्यावर्ती परिपथ (i), (ii) व (iii) में आरोपित प्रत्यावर्ती वोल्टेज की आवृत्ति बढ़ाने पर धारा के मान पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह तीन अलग-अलग प्रत्यावर्ती धारा परिपथ दिखाते हैं। चित्र (i) में केवल एक प्रेरक कुण्डली (L) है, चित्र (ii) में केवल एक प्रतिरोधक (R) है, और चित्र (iii) में केवल एक संधारित्र (C) है।
Answer: उत्तर-
परिपथ (i) में धारा घट जायेगी क्योंकि परिपथ का प्रभावी प्रतिरोध \( X_L (= \omega L) \) आवृत्ति बढ़ने पर बढ़ जायेगा। परिपथ (ii) में वही धारा रहेगी क्योंकि प्रतिरोध R वोल्टेज की आवृत्ति पर निर्भर नहीं करता। परिपथ (iii) में धारा बढ़ जायेगी क्योंकि इसका प्रभावी प्रतिरोध \( X_C = \frac{1}{\omega C} \) आवृत्ति बढ़ने पर घट जायेगा।
In simple words: प्रेरकीय परिपथ में, आवृत्ति बढ़ने पर प्रेरकीय प्रतिघात बढ़ता है जिससे धारा घटती है। प्रतिरोधी परिपथ में, धारा आवृत्ति से अप्रभावित रहती है। संधारित्रीय परिपथ में, आवृत्ति बढ़ने पर धारितीय प्रतिघात घटता है जिससे धारा बढ़ती है।
🎯 Exam Tip: यह समझना महत्वपूर्ण है कि आवृत्ति परिवर्तन प्रेरकत्व (\( X_L \propto f \)), धारिता (\( X_C \propto 1/f \)), और प्रतिरोध \( (R) \) को कैसे प्रभावित करता है। यह धारा के व्यवहार को निर्धारित करता है।
Question 19. L-C-Rपरिपथ में अनुनाद की दशा में शक्ति गुणांक का मान कितना होता है?
Answer: उत्तर- L-C-R परिपथ में अनुनाद की दशा में शक्ति गुणांक का मान 1 होता है।
In simple words: L-C-R परिपथ में अनुनाद की स्थिति में, प्रेरकीय प्रतिघात और धारितीय प्रतिघात एक-दूसरे को रद्द कर देते हैं। इस स्थिति में, परिपथ विशुद्ध रूप से प्रतिरोधी होता है, और धारा व वोल्टेज एक ही कला में होते हैं, जिससे शक्ति गुणांक 1 हो जाता है।
🎯 Exam Tip: अनुनाद की स्थिति में शक्ति गुणांक 1 होता है, जो अधिकतम शक्ति हस्तांतरण को दर्शाता है। यह LCR परिपथों की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।
Question 20. चित्र 7.4 में प्रत्यावर्ती वोल्टमीटर द्वारा नापे गए विभवान्तर \( V_L, V_C \) तथा \( V_R \) क्रमशः 20 V, 11 V तथा 12 V प्राप्त हुए। परिणामी विभवान्तर तथा परिपथ धारा में कलान्तर ज्ञात कीजिए।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक RLC श्रेणीक्रम परिपथ को दर्शाता है जिसमें प्रतिरोधक (R), प्रेरक (L) और संधारित्र (C) जुड़े हुए हैं। वोल्टेज का मापन \( V_R \) (प्रतिरोधक के पार), \( V_L \) (प्रेरक के पार) और \( V_C \) (संधारित्र के पार) वोल्टमीटर द्वारा दिखाया गया है।
Answer: हल-
परिणामी विभवान्तर तथा परिपथ धारा में कलान्तर
\[ \tan\phi = \frac{V_L - V_C}{V_R} = \frac{20 - 11}{12} = \frac{9}{12} = 0.75 \]
\[ \implies \phi = \tan^{-1}(0.75) \]
In simple words: RLC परिपथ में वोल्टेज के कलांतर \( (\phi) \) को ज्ञात करने के लिए, प्रेरकीय वोल्टेज \( (V_L) \), धारितीय वोल्टेज \( (V_C) \), और प्रतिरोधी वोल्टेज \( (V_R) \) के बीच के संबंध का उपयोग किया जाता है। \( \tan\phi = \frac{V_L - V_C}{V_R} \) सूत्र का उपयोग करके, हम कलांतर \( \phi = \tan^{-1}(0.75) \) ज्ञात कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: RLC परिपथ में वोल्टेज त्रिभुज और \( \tan\phi = \frac{V_L - V_C}{V_R} \) संबंध को याद रखें। यह कलांतर की गणना और परिपथ के प्रकृति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 21. दिए गए परिपथ में प्रत्यावर्ती स्रोत का विद्युत वाहक बल तथा परिपथ का शक्ति गुणांक ज्ञात कीजिए।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक श्रेणीक्रम RLC परिपथ को दर्शाता है जिसमें एक प्रतिरोधक, एक संधारित्र, और एक प्रेरक जुड़े हुए हैं। प्रतिरोधक के पार 80V, संधारित्र के पार 40V, और प्रेरक के पार 100V का वोल्टेज ड्रॉप दिखाया गया है।
Answer: हल-
दिया है, \( V_R = 80 \) वोल्ट, \( V_C = 40 \) वोल्ट, \( V_L = 100 \) वोल्ट, \( V = ? \), \( \cos \phi = ? \)
L-C-R परिपथ में,
परिणामी विभवान्तर \( V = \sqrt{V_R^2 + (V_L-V_C)^2} = \sqrt{(80)^2 + (100-40)^2} \)
\( = \sqrt{6400 + 3600} = \sqrt{10000} = 100 \) वोल्ट
अतः प्रत्यावर्ती धारा स्त्रोत का वैद्युत वाहक बल = 100 वोल्ट
परिपथ का शक्ति गुणांक \( \cos \phi = \frac{V_R}{V} = \frac{80}{100} = 0.8 \)
In simple words: RLC श्रेणीक्रम परिपथ में स्रोत का कुल वोल्टेज \( (V) \) प्रतिरोधक, प्रेरक और संधारित्र पर वोल्टेज ड्रॉप्स का सदिश योग होता है। सूत्र \( V = \sqrt{V_R^2 + (V_L - V_C)^2} \) का उपयोग करके कुल वोल्टेज 100 V प्राप्त होता है। शक्ति गुणांक \( \cos \phi = V_R/V \) का उपयोग करके 0.8 प्राप्त होता है।
🎯 Exam Tip: RLC श्रेणीक्रम परिपथ में स्रोत वोल्टेज और शक्ति गुणांक की गणना के लिए वोल्टेज त्रिभुज और \( \cos \phi = V_R/V \) सूत्रों को याद रखें।
Question 22. वैद्युत अनुनाद से आप क्या समझते हैं?
Answer: उत्तर-
किसी वैद्युत परिपथ की वह स्थिति, जब किसी विशेष अनुनादी आवृत्ति पर उस परिपथ की प्रतिबाधाओं या प्रवेश्यता के मान परस्पर निरस्त हो जाएँ, 'वैद्युत अनुनाद' कहलाती है।
In simple words: वैद्युत अनुनाद एक AC परिपथ की स्थिति है जहाँ प्रेरकत्व और धारिता के प्रतिघात एक-दूसरे को रद्द कर देते हैं। इस स्थिति में, परिपथ की प्रतिबाधा न्यूनतम होती है और धारा अधिकतम होती है।
🎯 Exam Tip: वैद्युत अनुनाद की परिभाषा और इसकी मुख्य विशेषताएं (न्यूनतम प्रतिबाधा, अधिकतम धारा, और \( X_L = X_C \)) को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 23. दिष्ट धारा परिपथ में ट्रांसफॉर्मर का उपयोग क्यों नहीं किया जाता है?
Answer: उत्तर-
दिष्ट धारा परिपथ में ट्रांसफॉर्मर का उपयोग नहीं किया जा सकता क्योंकि दिष्ट धारा से क्रोड में परिवर्ती चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न नहीं हो सकता।
In simple words: ट्रांसफॉर्मर फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है, जिसके लिए कुण्डली में परिवर्तित चुम्बकीय फ्लक्स की आवश्यकता होती है। दिष्ट धारा (DC) एक स्थिर चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है, जिससे फ्लक्स में कोई परिवर्तन नहीं होता और कोई EMF प्रेरित नहीं होता, इसलिए यह ट्रांसफॉर्मर के लिए अनुपयोगी है।
🎯 Exam Tip: यह महत्वपूर्ण है कि ट्रांसफॉर्मर केवल प्रत्यावर्ती धारा (AC) पर काम करता है, दिष्ट धारा (DC) पर नहीं, क्योंकि इसके संचालन के लिए समय-परिवर्तनशील चुंबकीय फ्लक्स आवश्यक है।
Question 24. एक उच्चायी ट्रांसफॉर्मर 220 वोल्ट पर कार्य करता है तथा एक लोड में 3 ऐम्पियर धारा देता है। प्राथमिक तथा द्वितीयक फेरों की संख्या का अनुपात 1:15 है। प्राथमिक कुण्डली में धारा की गणना कीजिए।
Answer: हल-
\[ \frac{i_s}{i_p} = \frac{N_p}{N_s} \implies i_p = \frac{N_s}{N_p} \times i_s = \frac{15}{1} \times 3 = 45 \text{ ऐम्पियर} \]
In simple words: ट्रांसफॉर्मर में धारा और फेरों की संख्या के बीच का अनुपात \( \frac{i_s}{i_p} = \frac{N_p}{N_s} \) होता है। इस संबंध का उपयोग करके, हम प्राथमिक कुण्डली में धारा की गणना 45 ऐम्पियर के रूप में कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: ट्रांसफॉर्मर के लिए धारा और फेरों के अनुपात \( (\frac{I_s}{I_p} = \frac{N_p}{N_s}) \) का सूत्र याद रखें। यह ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. प्रत्यावर्ती धारा के वर्ग-माध्य-मूल मान का व्यंजक प्राप्त कीजिए। किसी प्रत्यावर्ती धारा का शिखर मान \( 10\sqrt{2} \) ऐम्पियर है। धारा का वर्ग-माध्य-मूल मान ज्ञात कीजिए।
Answer: हल-
प्रत्यावर्ती धारा की एक पूर्ण साइकिल के लिए धारा के वर्ग \( i^2 \) के औसत मान के वर्गमूल को धारी का 'वर्ग-माध्य-मूल मान' (rms value) कहते हैं। इसे \( i_{rms} \) से प्रदर्शित करते हैं।
एक पूर्ण साइकिल के लिए \( i^2 \) का माध्य (औसत) मान
\[ \overline{i^2} = \frac{1}{T} \int_0^T i^2 dt \]
\( i = i_0 \sin\omega t \) तथा \( T = 2\pi/\omega \) रखने पर,
\[ \overline{i^2} = \frac{\omega}{2\pi} \int_0^{2\pi/\omega} i_0^2 \sin^2 \omega t dt \]
\[ = \frac{\omega i_0^2}{2\pi} \int_0^{2\pi/\omega} \frac{(1 - \cos 2\omega t)}{2} dt \]
\[ = \frac{\omega i_0^2}{4\pi} \left[ t - \frac{\sin 2\omega t}{2\omega} \right]_0^{2\pi/\omega} \]
\[ = \frac{\omega i_0^2}{4\pi} \left[ \frac{2\pi}{\omega} - 0 \right] = \frac{i_0^2}{2} \]
अतः प्रत्यावर्ती धारा का वर्ग-माध्य-मूल मान \( i_{rms} = \sqrt{\overline{i^2}} = \frac{i_0}{\sqrt{2}} = 0.707 i_0 \)
यदि \( i_0 = 10\sqrt{2} \),
तो \( i_{rms} = \frac{10\sqrt{2}}{\sqrt{2}} = 10 \) ऐम्पियर
In simple words: प्रत्यावर्ती धारा का वर्ग-माध्य-मूल (rms) मान वह प्रभावी मान है जो परिपथ में उतनी ही शक्ति क्षय करता है जितनी दिष्ट धारा। इसे धारा के वर्ग के औसत मान के वर्गमूल के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसका व्यंजक \( i_{rms} = \frac{i_0}{\sqrt{2}} \) होता है। यदि शिखर मान \( 10\sqrt{2} \) ऐम्पियर है, तो rms मान 10 ऐम्पियर होगा।
🎯 Exam Tip: प्रत्यावर्ती धारा के rms मान का व्यंजक \( (I_{rms} = I_0/\sqrt{2}) \) प्राप्त करना महत्वपूर्ण है। यह व्यंजक और इसकी व्युत्पत्ति को याद रखना चाहिए।
Question 2. प्रत्यावर्ती वोल्टता के वर्ग-माध्य-मूल मान की परिभाषा लिखिए। एक प्रत्यावर्ती वोल्टता का समीकरण \( V = 300\sqrt{2} \sin 500\pi t \) वोल्ट है। प्रत्यावर्ती धारा के वर्ग-माध्य-मूल मान एवं आवृत्ति की गणना कीजिए।
Answer: उत्तर-
प्रत्यावर्ती वोल्टता का वर्ग-माध्य-मूल मान- प्रत्यावर्ती वोल्टेज की एक पूर्ण साइकिल के लिए वोल्टेज के वर्ग के औसत मान के वर्गमूल को वोल्टता का वर्ग-मध्य-मूल मान कहते हैं। इसे \( V_{rms} \) से प्रदर्शित करते हैं।
\( V_{rms} = \frac{V_0}{\sqrt{2}} = 0.707 V_0 \)
दी गई समीकरण \( V = 300\sqrt{2} \sin 500 \pi t \) वोल्ट की तुलना प्रत्यावर्ती वोल्टता समीकरण \( V = V_0 \sin\omega t \) से करने पर
शिखर वोल्टता \( V_0 = 300\sqrt{2} \) वोल्ट
कोणीय आवृत्ति \( \omega = 500\pi \) सेकण्ड-1
\( 2\pi f = 500 \pi \)
\( f = \frac{500\pi}{2\pi} = 250 \) हर्ट्ज
तथा वर्ग-माध्य-मूल मान \( V_{rms} = \frac{V_0}{\sqrt{2}} = \frac{300\sqrt{2}}{\sqrt{2}} = 300 \) वोल्ट
In simple words: प्रत्यावर्ती वोल्टता का वर्ग-माध्य-मूल (rms) मान वह प्रभावी मान है जो एक पूर्ण चक्र में वोल्टता के वर्ग के औसत मान के वर्गमूल के बराबर होता है। दिए गए समीकरण से, शिखर वोल्टता \( 300\sqrt{2} \) V और कोणीय आवृत्ति \( 500\pi \) rad/s है। इससे rms वोल्टता 300 V और आवृत्ति 250 Hz प्राप्त होती है।
🎯 Exam Tip: rms मान की परिभाषा और प्रत्यावर्ती वोल्टेज समीकरण से \( V_0 \), \( \omega \), \( f \) और \( V_{rms} \) की गणना करना महत्वपूर्ण है।
Question 3. 0.21 हेनरी का प्रेरक तथा 12 ओम का प्रतिरोध 220 वोल्ट एवं 50 हर्ट्ज के प्रत्यावर्ती आवृत्ति धारा स्रोत से जुड़े हैं। परिपथ में धारा का मान और धारा एवं स्रोत के विभवान्तर में कलान्तर ज्ञात कीजिए।
Answer: हल-दिया है, \( L = 0.21 \) H, \( R = 12 \Omega \), \( V = 220 \) V, \( f = 50 \) हर्ट्ज
परिपथ का प्रेरण प्रतिघात \( X_L = 2\pi f L = 2 \times \frac{22}{7} \times 50 \times 0.21 = 66 \Omega \)
प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + X_L^2} = \sqrt{(12)^2 + (66)^2} \)
\( = \sqrt{144 + 4356} = \sqrt{4500} \approx 67.08 \Omega \)
परिपथ में धारा \( i = \frac{V}{Z} = \frac{220}{67.08} \approx 3.28 \) ऐम्पियर
धारा तथा विभवान्तर में कलान्तर \( \phi = \tan^{-1} \left( \frac{X_L}{R} \right) = \tan^{-1} \left( \frac{66}{12} \right) = \tan^{-1} (5.5) \) अथवा \( 80^\circ \)
In simple words: सबसे पहले, प्रेरकत्व \( (L) \) और आवृत्ति \( (f) \) का उपयोग करके प्रेरण प्रतिघात \( (X_L) \) की गणना करें। फिर, प्रतिरोध \( (R) \) और \( X_L \) का उपयोग करके परिपथ की कुल प्रतिबाधा \( (Z) \) ज्ञात करें। अंत में, ओम के नियम \( (i=V/Z) \) से धारा और \( \tan\phi = X_L/R \) से धारा और वोल्टेज के बीच कलांतर ज्ञात करें।
🎯 Exam Tip: RL श्रेणीक्रम परिपथ में धारा और कलांतर की गणना के लिए प्रेरण प्रतिघात, प्रतिबाधा और ओम के नियम के सूत्रों को सही ढंग से लागू करना महत्वपूर्ण है।
Question 4. दिए गए वैद्युत परिपथ में प्रतिबाधा, ऐमीटर का पाठयांक एवं शक्ति गुणांक ज्ञात कीजिए।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक RL श्रेणीक्रम परिपथ दिखाता है जिसमें एक प्रतिरोधक (40 Ω) और एक प्रेरक (0.1 H) एक प्रत्यावर्ती वोल्टेज स्रोत से जुड़े हैं जिसका समीकरण \( V = 200 \sin 300t \) है। परिपथ में एक ऐमीटर (A) भी जुड़ा है।
Answer: हल-
यहाँ, \( R = 40 \Omega \), \( L = 0.1 \) हेनरी
दी गई समीकरण \( V = 200 \sin 300t \) की तुलना \( V = V_0 \sin\omega t \) से करने पर,
\( V_0 = 200 \) वोल्ट, \( \omega = 300 \) रेडियन/सेकण्ड
प्रेरण प्रतिघात \( X_L = \omega L = 300 \times 0.1 = 30 \Omega \)
प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + X_L^2} = \sqrt{(40)^2 + (30)^2} \)
\( = \sqrt{1600+900} = \sqrt{2500} = 50 \Omega \)
अब,
\( V_{rms} = \frac{V_0}{\sqrt{2}} = \frac{200}{\sqrt{2}} = 100\sqrt{2} \) वोल्ट
ऐमीटर का पाठ्यांक \( i_{rms} = \frac{V_{rms}}{Z} = \frac{100\sqrt{2}}{50} = 2\sqrt{2} \) ऐम्पियर \( \approx 2.83 \) ऐम्पियर
तथा शक्ति गुणांक \( \cos \phi = \frac{R}{Z} = \frac{40}{50} = 0.8 \)
In simple words: दिए गए वोल्टेज समीकरण से कोणीय आवृत्ति \( \omega \) प्राप्त करें, फिर प्रेरण प्रतिघात \( X_L \) की गणना करें। प्रतिरोध \( R \) और \( X_L \) का उपयोग करके प्रतिबाधा \( Z \) ज्ञात करें। rms वोल्टेज से rms धारा (ऐमीटर का पाठ्यांक) निकालें, और अंत में \( \cos\phi = R/Z \) से शक्ति गुणांक ज्ञात करें।
🎯 Exam Tip: प्रत्यावर्ती वोल्टेज समीकरण से \(\omega\) निकालना, फिर \(X_L\), \(Z\), \(I_{rms}\) और \(\cos\phi\) की गणना करना एक मानक समस्या-समाधान रणनीति है। सभी सूत्रों और उनकी इकाइयों को सही ढंग से लागू करें।
Question 5. 0.1 हेनरी का प्रेरकत्व तथा 30 ओम प्रतिरोध को श्रेणीक्रम में \( V = 10 \sin 400t \) प्रत्यावर्ती वोल्टेज से जोड़ा गया है। परिपथ में प्रेरण प्रतिघात, प्रतिबाधा, धारा का शिखर मान एवं वोल्टेज और धारा के बीच कलान्तर ज्ञात कीजिए।
Answer: हल-
दी गयी समीकरण \( V = 10 \sin 400t \) वोल्ट की प्रत्यावर्ती वोल्टता समीकरण \( V= V_0 \sin\omega t \) से तुलना करने पर,
शिखर वोल्टता \( V_0 = 10 \) वोल्ट
कोणीय आवृत्ति \( \omega = 400 \) सेकण्ड-1
प्रेरण प्रतिघात \( X_L = \omega L = 400 \times 0.1 = 40 \) ओम
प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + X_L^2} = \sqrt{(30)^2 + (40)^2} \)
\( = \sqrt{900+1600} = \sqrt{2500} = 50 \Omega \)
धारा का शिखर मान \( i_0 = \frac{V_0}{Z} = \frac{10}{50} = 0.2 \) ऐम्पियर
वोल्टेज और धारा के बीच कलान्तर \( \phi = \tan^{-1} \left( \frac{X_L}{R} \right) = \tan^{-1} \left( \frac{40}{30} \right) = \tan^{-1} \left( \frac{4}{3} \right) \)
In simple words: दिए गए वोल्टेज समीकरण से शिखर वोल्टेज \( V_0 \) और कोणीय आवृत्ति \( \omega \) निकालें। प्रेरकत्व \( L \) और प्रतिरोध \( R \) का उपयोग करके प्रेरण प्रतिघात \( X_L \) और प्रतिबाधा \( Z \) की गणना करें। फिर, \( i_0 = V_0/Z \) से शिखर धारा और \( \phi = \tan^{-1}(X_L/R) \) से कलांतर ज्ञात करें।
🎯 Exam Tip: यह एक व्यापक प्रश्न है जो RL परिपथ के कई मापदंडों की गणना को कवर करता है। \( X_L \), \( Z \), \( i_0 \), और \( \phi \) के लिए सभी सूत्रों को सही ढंग से लागू करना महत्वपूर्ण है।
Question 6. प्रतिघात का विमीय समीकरण लिखिए। दिए गये परिपथ में ज्ञात कीजिए-
(i) परिपथ में प्रवाहित धारा का अधिकतम मान
(ii) परिपथ में प्रवाहित धारा का वर्ग-माध्य-मूल मान
(iii) वोल्टता एवं धारा में कलान्तर ।
Answer:
In simple words:
🎯 Exam Tip:
प्रश्न 7. प्रत्यावर्ती परिपथ के लिए औसत शक्ति का व्यंजक प्राप्त कीजिए तथा वाटहीन धारा को समझाइए। या वाटहीन धारा क्या है ? या किसी प्रत्यावर्ती धारा की शक्ति के लिए सूत्र ज्ञात कीजिए। शक्ति गुणांक किसे कहते हैं? या प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में व्यय शक्ति का सूत्र लिखिए।
Answer:कलान्तर \(\phi\) है तो परिपथ के लिए किसी क्षण वोल्टता तथा धारा के मान निम्नलिखित समीकरणों से व्यक्त कर सकते हैं। \[ V = V_0 \sin \omega t \] तथा \[ i = i_0 \sin (\omega t - \phi) \] अतः किसी क्षण परिपथ में शक्ति \[ P = V \times i = V_0 \sin \omega t \times i_0 \sin (\omega t - \phi) \]
शक्ति \(P = V_0 i_0 \sin \omega t(\sin \omega t \cos \phi - \cos \omega t \sin \phi)\) \[ = V_0 i_0 (\sin^2 \omega t \cos \phi - \sin \omega t \cos \omega t \sin \phi) \]
\[ = V_0 i_0 (\sin^2 \omega t \cos \phi - \frac{1}{2} \sin 2\omega t \sin \phi) \] प्रत्यावर्ती धारा के सम्पूर्ण एक चक्र के लिए \(\sin^2 \omega t = 1/2\) तथा \(\sin 2\omega t = 0\) अतः औसत शक्ति \( P = \frac{1}{2} V_0 i_0 \cos \phi \)
अथवा \[ P = V_{rms} I_{rms} \cos \phi \] राशि \(\cos \phi\) परिपथ का शक्ति गुणांक (power factor) कहलाती है। इसका मान परिपथ की प्रकृति (अर्थात् परिपथ में उपस्थित अवयवों; जैसे- प्रतिरोध, धारिता, प्रेरकत्व) पर निर्भर करता है। यह सूत्र सभी प्रकार के प्रत्यावर्ती धारा परिपथों के लिए सत्य है। **वाटहीन धारा (Wattless Current)** - यदि किसी परिपथ में केवल प्रेरकत्व या धारिता है और R का मान शून्य है तो धारा व वोल्टता में \(90^\circ\) का कलान्तर होता है अर्थात् \(\phi = 90^\circ\). अतः औसत शक्ति क्षय के सूत्र \(P = V_{rms} I_{rms} \cos \phi\) से इस दशा में परिपथ में औसत शक्ति व्यय \[ P = V_{rms} I_{rms} \cos 90^\circ = 0 \] (\( \because \cos 90^\circ = 0 \)) अतः यदि किसी प्रत्यावर्ती परिपथ में केवल प्रेरकत्व अथवा केवल धारिता है (अर्थात् प्रतिरोध शून्य है) तो परिपथ में धारा प्रवाहित होते हुए भी औसत शक्ति क्षय शून्य रहता है। इसलिए ऐसी प्रत्यावर्ती धारा को वाटहीन धारा कहते हैं।
In simple words: Average power in an AC circuit depends on the voltage, current, and power factor. The power factor describes the phase difference between voltage and current. When this phase difference is 90 degrees (as in pure inductive or capacitive circuits), the average power consumed is zero, and the current is called wattless current.
🎯 Exam Tip: Understanding the power factor and the concept of wattless current is crucial for solving AC circuit problems and is a frequently tested concept in board exams, often appearing as a short or long answer question.
प्रश्न 8. चोक कुण्डली का कार्य-सिद्धान्त समझाइए। चोक कुण्डली में वाटहीन धारा के महत्त्व को समझाइए।
Answer:**चोक कुण्डली**- प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में वैद्युत ऊर्जा का ह्रास हुए बिना धारा को कम करने का एक साधन उपलब्ध है जिसे चोक कुण्डली कहते हैं। यह एक ऊँचे प्रेरकत्व की कुण्डली होती है जो एक पृथक्कृत (insulated) ताँबे के मोटे तार को बहुत-से फेरों में लोहे की पटलित क्रोड पर लपेटकर बनायी जाती है। इस कुण्डली का ओमीय प्रतिरोध लगभग शून्य रहता है। इसका प्रेरकत्व काफी ऊँचा रहता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक चोक कुण्डली को दर्शाता है, जिसमें लोहे का क्रोड होता है और तांबे के तार की कुण्डली बल्ब के साथ जुड़ी होती है। यह प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में धारा को नियंत्रित करने के लिए उपयोग की जाती है, जिसमें कम ऊर्जा हानि होती है। इसकी प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + (\omega L)^2} \) प्रतिरोध R नगण्य होने के कारण इसमें ऊष्मा के रूप में क्षय बहुत ही कम होता है। L-R परिपथ में औसत शक्ति \( P = V_{rms} \times I_{rms} \times \cos \phi \) ...(1) जहाँ, \( \cos \phi = \frac{R}{\sqrt{(R^2 + \omega^2 L^2)}} \), चूँकि चोक कुण्डली का ओमीय प्रतिरोध R लगभग शून्य है तथा L बहुत ऊँचा है, अतः \(\cos \phi = 0\) (लगभग)। इस प्रकारे समी० (1) के अनुसार चोक कुण्डली में औसत शक्ति लगभग शून्य होगी। इस प्रकार चोक कुण्डली का कार्य-सिद्धान्त वाटहीन धारा के सिद्धान्त पर आधारित है। अतः प्रत्यावर्ती धारा परिपथों में चोक कुण्डली के उपयोग से ऊर्जा क्षय में पर्याप्त कमी हो जाती है।
In simple words: A choke coil is an inductor used in AC circuits to reduce current with minimal power loss, unlike a resistor which dissipates energy as heat. It works on the principle of wattless current, where the phase difference between voltage and current is nearly 90 degrees, making the average power consumption close to zero.
🎯 Exam Tip: When explaining the choke coil, emphasize its low power dissipation compared to a resistor, and its working principle based on inductive reactance and wattless current. Drawing a neat diagram can also fetch extra marks.
प्रश्न 9. 10 वोल्ट, 2 कीटंक बल्ब को 100 वोल्ट, 40 हर्ट्ज के प्रत्यावर्ती धारा स्रोत से जलाना है। बल्ब के श्रेणीक्रम में जोड़े जाने हेतु आवश्यक चोक-कुण्डली के प्रेरकत्व की गणना कीजिए।
Answer:हल - बल्ब को उचित रेटिंग पर जलाने के लिए लैम्प में आवश्यक धारा \[ i = \frac{2 \text{ वाट}}{10 \text{ वोल्ट}} = 0.2 \text{ ऐम्पियर} \] बल्ब का प्रतिरोध \( R = \frac{10 \text{ वोल्ट}}{0.2 \text{ ऐम्पियर}} = 50 \, \Omega \) बल्ब को 100 वोल्ट के प्रत्यावर्ती धारा स्रोत से जलाने के लिये बल्ब के श्रेणीक्रम में इतने प्रेरकत्व की चोक कुण्डली लगानी होगी जिससे कि परिपथ का प्रभावी प्रतिरोध (प्रतिबाधा) इतना बढ़ जाए कि परिपथ में प्रवाहित धारा 0.2 ऐम्पियर हो। माना वह प्रेरकत्व L है। तब चोक-कुण्डली का प्रतिघात \( X_L = \omega L \), जहाँ \(\omega\) धारा की कोणीय आवृत्ति है। अब परिपथ की प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + X_L^2} \) तथा परिपथ में धारा \( I_{rms} = \frac{V_{rms}}{Z} = \frac{V_{rms}}{\sqrt{R^2 + X_L^2}} \) प्रश्नानुसार, \( I_{rms} = 0.2 \text{ ऐम्पियर}, V_{rms} = 100 \text{ वोल्ट} \) तथा \( R = 50 \, \Omega \)
\[ 0.2 = \frac{100}{\sqrt{(50)^2 + (X_L)^2}} \]
\[ \implies \sqrt{(50)^2 + (X_L)^2} = \frac{100}{0.2} = 500 \]
\[ \implies (50)^2 + (X_L)^2 = (500)^2 \]
\[ \implies (X_L)^2 = (500)^2 - (50)^2 = 250000 - 2500 = 247500 \]
\[ \implies X_L = \sqrt{247500} \approx 497.49 \, \Omega \]
चोक कुण्डली का प्रेरकत्व \( L = \frac{X_L}{\omega} = \frac{X_L}{2\pi f} \) \[ = \frac{497.49}{2 \times 3.14 \times 40} = \frac{497.49}{251.2} \approx 1.98 \text{ हेनरी} \]
In simple words: To safely operate a 10V, 2W bulb on a 100V, 40Hz AC supply, a choke coil is connected in series. First, calculate the bulb's resistance and safe current. Then, use the total RMS voltage and current to find the required total impedance of the circuit. From this impedance, and the bulb's resistance, the inductive reactance of the choke coil can be determined, which then gives its inductance.
🎯 Exam Tip: Remember to calculate the RMS current the bulb needs first based on its power and voltage rating. Then, use the total RMS voltage of the source and this current to find the total impedance of the series circuit, which includes the choke coil. Always use the appropriate formulas for impedance and inductive reactance.
प्रश्न 10. एक प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में 100 हर्ट्ज आवृत्ति पर सप्लाई विभवान्तर 80 वोल्ट है। एक संधारित्र को श्रेणीक्रम में 10 ओम प्रतिरोधक के साथ इस परिपथ में जोड़ा जाता है तो परिपथ का शक्ति गुणांक 0.5 हो जाता है। इस संधारित्र की धारिता ज्ञात कीजिए।
Answer:हल-: धारितीय प्रतिघात \( X_C = \frac{1}{2\pi f C} \) दिया है, शक्ति गुणांक \( \cos \phi = 0.5 \)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक RC श्रेणी परिपथ को दर्शाता है, जिसमें एक संधारित्र (C) और एक प्रतिरोधक (10 \(\Omega\)) एक प्रत्यावर्ती वोल्टता स्रोत (80V) से जुड़े हुए हैं। यह परिपथ में संधारित्र की धारिता ज्ञात करने में मदद करता है। परिणामी परिपथ में, शक्ति गुणांक \( \cos \phi = \frac{R}{Z} = \frac{R}{\sqrt{R^2 + X_C^2}} \) यहाँ \( R = 10 \, \Omega \), \( \cos \phi = 0.5 \) \[ 0.5 = \frac{10}{\sqrt{10^2 + X_C^2}} \]
हल करने पर, \[ 0.5 \sqrt{100 + X_C^2} = 10 \] \[ \sqrt{100 + X_C^2} = \frac{10}{0.5} = 20 \] \[ 100 + X_C^2 = (20)^2 = 400 \] \[ X_C^2 = 300 \] \[ X_C = \sqrt{300} = 10\sqrt{3} \approx 17.32 \, \Omega \] अब, \( X_C = \frac{1}{2\pi f C} \) जहाँ \( f = 100 \text{ हर्ट्ज} \) \[ 17.32 = \frac{1}{2 \times 3.14 \times 100 \times C} \] \[ C = \frac{1}{2 \times 3.14 \times 100 \times 17.32} = \frac{1}{10878.56} \approx 9.19 \times 10^{-5} \text{ फैरड} \]
In simple words: Given an RC series circuit with a known resistance, frequency, and power factor, we can find the capacitance. The power factor relates the resistance to the total impedance. By calculating the total impedance and then the capacitive reactance, the capacitance can be determined using the formula \( X_C = \frac{1}{2\pi f C} \).
🎯 Exam Tip: When dealing with RC circuits and power factor, remember the formula \( \cos \phi = R/Z \). Ensure you use the correct expression for impedance \( Z = \sqrt{R^2 + X_C^2} \). Accuracy in calculation for \(X_C\) is vital for the final capacitance value.
प्रश्न 11. एक 50 वाट 100 वोल्ट के वैद्युत लैम्प को 200 वोल्ट, 60 हर्ट्ज के विद्युत मेन्स से जोड़ना है। लैम्प के श्रेणी क्रम में आवश्यक संधारित्र की धारिता ज्ञात कीजिए।
Answer:हल - दिया है, \( P = 50 \text{ वाट}, V = 100 \text{ वोल्ट}, f = 60 \text{ हर्ट्ज} \), स्रोत वोल्टता \( V_{source} = 200 \text{ वोल्ट} \) बल्ब का प्रतिरोध \( R = \frac{V^2}{P} = \frac{100 \times 100}{50} = 200 \, \Omega \) बल्ब में धारा \( i = \frac{P}{V} = \frac{50}{100} = 0.5 \text{ ऐम्पियर} \) दूसरी दशा में परिपथ में धारा \( i_{rms} = 0.5 \text{ ऐम्पियर} \) (लैम्प को अपनी रेटेड धारा पर काम करना चाहिए) अतः परिपथ की प्रतिबाधा \( Z = \frac{V_{source}}{i_{rms}} = \frac{200}{0.5} = 400 \, \Omega \) सूत्र, \( Z^2 = R^2 + X_C^2 \) से धारितीय प्रतिघात \( X_C = \sqrt{Z^2 - R^2} \) \[ X_C = \sqrt{(400)^2 - (200)^2} \] \[ = \sqrt{160000 - 40000} = \sqrt{120000} \] \[ = \sqrt{40000 \times 3} = 200\sqrt{3} \] \[ = 200 \times 1.732 = 346.4 \, \Omega \] सूत्र \( X_C = \frac{1}{2\pi f C} \) से \[ C = \frac{1}{2\pi f X_C} = \frac{1}{2 \times 3.14 \times 60 \times 346.4} \] \[ C = \frac{1}{130523.52} \approx 7.66 \times 10^{-6} \text{ F} \] अतः संधारित्र की धारिता \( C = 7.6 \times 10^{-6} \, \mu\text{F} \)
In simple words: To operate a lamp at its rated power and voltage from a higher voltage AC supply, a capacitor is connected in series. First, find the lamp's resistance and the current it needs. Then, use the supply voltage and this current to determine the total impedance. With the lamp's resistance and total impedance, calculate the capacitive reactance, and finally, the capacitance needed.
🎯 Exam Tip: For problems involving a lamp operating at its rated values in an AC circuit with an added component, ensure the current flowing through the lamp is its rated current. Calculate the total impedance of the circuit and then the reactance of the added component to find its value. Pay attention to units.
प्रश्न 12. दिए गए परिपथ में ज्ञात कीजिए (i) ऐमीटर (A) का पाठयांक (ii) वोल्टमीटर (V) का पाठयांक (iii) शक्ति-गुणांक ।
Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक श्रेणी LCR परिपथ को दर्शाता है, जिसमें एक संधारित्र (C=62.5mF), एक प्रेरक (L=0.1 H), और एक प्रतिरोधक (R=20 \(\Omega\)) एक प्रत्यावर्ती वोल्टेज स्रोत (V=200\(\sqrt{2}\) sin 400t) से जुड़े हुए हैं। एक ऐमीटर (A) और एक वोल्टमीटर (V) भी परिपथ में लगे हुए हैं। हल- \( V = 200\sqrt{2} \sin 400t \) की तुलना \( V = V_0 \sin \omega t \) से करने पर, \( V_0 = 200\sqrt{2} \text{ वोल्ट} \) तथा \( \omega = 400 \text{ रेडियन/सेकण्ड} \)
\( V_{rms} = \frac{V_0}{\sqrt{2}} = \frac{200\sqrt{2}}{\sqrt{2}} = 200 \text{ वोल्ट} \) परिपथ की प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} \) जहाँ \( X_L = \omega L = 400 \times 0.1 = 40 \, \Omega \) और \( X_C = \frac{1}{\omega C} = \frac{1}{400 \times 62.5 \times 10^{-3}} = \frac{1}{400 \times 0.0625} = \frac{1}{25} = 40 \, \Omega \) \[ Z = \sqrt{(20)^2 + (40 - 40)^2} \] \[ = \sqrt{400 + (0)^2} = \sqrt{400} = 20 \, \Omega \] (i) ऐमीटर A का पाठ्यांक \( i_{rms} = \frac{V_{rms}}{Z} = \frac{200}{20} = 10 \text{ ऐम्पियर} \) (ii) वोल्टमीटर V का पाठ्यांक (यह LC संयोजन के सिरों पर विभवपात है) \( V_{LC} = |V_L - V_C| = |i_{rms} X_L - i_{rms} X_C| = i_{rms} |X_L - X_C| \) \[ = 10 \times |40 - 40| = 10 \times 0 = 0 \text{ शून्य} \] (iii) शक्ति गुणांक \( \cos \phi = \frac{R}{Z} = \frac{20}{20} = 1 \)
In simple words: For the given LCR circuit, first determine the peak voltage and angular frequency from the source equation. Calculate the RMS voltage. Then, compute the inductive and capacitive reactances. Since \(X_L = X_C\), the circuit is at resonance, meaning the impedance equals the resistance. The ammeter reads the total RMS current, the voltmeter across the LC combination reads zero at resonance, and the power factor is 1.
🎯 Exam Tip: Recognize that when \(X_L = X_C\), the circuit is in resonance. At resonance, impedance \(Z=R\), power factor \(\cos \phi = 1\), and the voltage across the LC combination is zero. These are key characteristics to remember for LCR series resonant circuits.
प्रश्न 13. एक प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रेरकत्व (L), संधारित्र (C) तथा प्रतिरोध (R) श्रेणीक्रम में जोड़े गये हैं। परिपथ से L को हटा देने पर वोल्टता तथा विद्युत धारा के बीच \( \frac{\pi}{3} \) का कलान्तर होता है। यदि के बजाय परिपथ सेट को हटा दें तब भी कलान्तर \( \frac{\pi}{3} \) रहता है। परिपथ का शक्ति गुणांक क्या होगा?
Answer:हल- 'L' हटाने पर परिपथ एक RC परिपथ बन जाता है। तब \( \tan \phi = \frac{X_C}{R} \) दिया है \( \phi = \frac{\pi}{3} \) (या \( 60^\circ \))
\[ \tan 60^\circ = \frac{X_C}{R} \implies X_C = R\sqrt{3} \] ...(1) अब 'C' को हटाने पर, परिपथ एक RL परिपथ बन जाता है। तब \( \tan \phi = \frac{X_L}{R} \) दिया है \( \phi = \frac{\pi}{3} \) (या \( 60^\circ \))
\[ \tan 60^\circ = \frac{X_L}{R} \implies X_L = R\sqrt{3} \] ...(2) समीकरण (1) तथा (2) से, \( X_L = X_C \) शक्ति गुणांक \( \cos \phi = \frac{R}{Z} = \frac{R}{\sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2}} \) चूँकि \( X_L = X_C \), तो \( X_L - X_C = 0 \) \[ \cos \phi = \frac{R}{\sqrt{R^2 + (0)^2}} = \frac{R}{R} = 1 \]
In simple words: If removing the inductor or the capacitor from an LCR series circuit individually results in the same phase difference ( \( \frac{\pi}{3} \) ), it implies that the inductive reactance \(X_L\) is equal to the capacitive reactance \(X_C\). In such a case, when all three components are present, the circuit is at resonance, and the power factor is 1.
🎯 Exam Tip: This question tests your understanding of phase angle in RL and RC circuits and the condition for resonance. If \(X_L = X_C\), the circuit is resonant, and the power factor is unity, indicating maximum power transfer.
प्रश्न 14. एक प्रत्यावर्ती परिपथ में प्रतिरोध, संधारित्र तथा प्रेरण कुण्डली एक प्रत्यावर्ती स्रोत से श्रेणीक्रम में संयोजित हैं। धारा तथा वोल्टता के समीकरणों से स्पष्ट है कि \( V_0 = 200 \) वोल्ट, \( i_0 = 5 \) ऐम्पियर तथा \( \omega = 314 \) रेडियन/सेकण्ड हैं। ज्ञात कीजिए- (i) प्रत्यावर्ती धारा स्रोत की आवृत्ति (ii) V तथा । के मध्य कलान्तर (iii) परिपथ की प्रतिबाधा ।
Answer:हल- धारा तथा वोल्टता के समीकरणों से स्पष्ट है कि \( V_0 = 200 \text{ वोल्ट}, i_0 = 5 \text{ ऐम्पियर} \) तथा \( \omega = 314 \text{ रेडियन/सेकण्ड} \) (i) प्रत्यावर्ती धारा के स्रोत की आवृत्ति \( f = \frac{\omega}{2\pi} = \frac{314}{2 \times 3.14} = 50 \text{ Hz} \) (ii) V तथा । के मध्य कलान्तर: माना वोल्टेज समीकरण \( V = V_0 \sin(\omega t + \phi_1) \) और धारा समीकरण \( i = i_0 \sin(\omega t + \phi_2) \). कलान्तर \( \phi = \phi_1 - \phi_2 \). दिया गया है कि \( \phi = \frac{\pi}{3} \) रेडियन या \( 60^\circ \)
\[ \phi = \frac{180^\circ}{3} = 60^\circ \] कलान्तर \( \phi \) धनात्मक है; अतः स्पष्ट है कि V की कला i की कला से (\(\pi/3\)) रेडियन अर्थात् \(60^\circ\) अग्रगामी है। (iii) परिपथ की प्रतिबाधा \( Z = \frac{V_0}{i_0} = \frac{200}{5} = 40 \, \Omega \)
In simple words: For a series LCR circuit, given the peak voltage, peak current, and angular frequency, we can calculate the frequency, the phase difference between voltage and current, and the impedance. The frequency is derived directly from the angular frequency. The phase difference is given as \( \pi/3 \). The impedance is the ratio of peak voltage to peak current.
🎯 Exam Tip: Remember the basic relationships: \( \omega = 2\pi f \) for frequency, \( Z = V_0/i_0 \) for impedance, and the phase angle \(\phi\) indicates whether voltage leads or lags current, or if they are in phase. Convert radians to degrees if necessary for clarity.
प्रश्न 15. एक श्रेणी L-C-R परिपथ, जिसमें L = 10.0 H, C = 40 µF तथा R = 60 Ω को 240 V के परिवर्ती आवृत्ति के प्रत्यावर्ती धारा स्रोत से जोड़ा गया है। गणना कीजिए- (i) स्रोत की कोणीय आवृत्ति जो परिपथ को अनुनाद की अवस्था में लाता है। (ii) अनुनादी आवृत्ति पर धारा।
Answer:हल- L = 10 H, C = 40 \(\mu\)F = \(40 \times 10^{-6}\) F, R = 60 \(\Omega\), \(V_{rms} = 240 \text{ V}\) (i) अनुनाद पर स्रोत की कोणीय आवृत्ति \(\omega_0\) \[ \omega_0 = \frac{1}{\sqrt{LC}} = \frac{1}{\sqrt{10 \times 40 \times 10^{-6}}} \] \[ \omega_0 = \frac{1}{\sqrt{400 \times 10^{-6}}} = \frac{1}{\sqrt{0.0004}} = \frac{1}{0.02} = 50 \text{ रेडियन/सेकण्ड} \] (ii) अनुनादी आवृत्ति पर धारा \(I_{rms}\) अनुनाद पर, प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} \) जहाँ \( X_L = \omega_0 L = 50 \times 10 = 500 \, \Omega \) \( X_C = \frac{1}{\omega_0 C} = \frac{1}{50 \times 40 \times 10^{-6}} = \frac{1}{2000 \times 10^{-6}} = \frac{1}{0.002} = 500 \, \Omega \)
\[ Z = \sqrt{(60)^2 + (500 - 500)^2} \] \[ = \sqrt{3600 + 0} = 60 \, \Omega \] धारा \( I_{rms} = \frac{V_{rms}}{Z} = \frac{240}{60} = 4 \text{ ऐम्पियर} \]
In simple words: For an LCR series circuit, the resonant angular frequency is found using the inductance and capacitance values. At resonance, the inductive and capacitive reactances cancel out, making the total impedance equal to the resistance. The current at resonance is then calculated by dividing the RMS voltage by this minimum impedance (resistance).
🎯 Exam Tip: The key to this problem is correctly identifying the resonant angular frequency \( \omega_0 = \frac{1}{\sqrt{LC}} \) and understanding that at resonance, \( X_L = X_C \), leading to \( Z = R \). This simplifies current calculations significantly and is a common evaluation point.
प्रश्न 17. चित्र 7.12 में प्रदर्शित प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रतिरोध R, संधारित्र C तथा प्रेरक कुण्डली L के सिरों के बीच उपलब्ध विभवान्तर प्रदर्शित किए गए हैं। प्रत्यावर्ती धारा स्रोत के विद्युत वाहक बले की गणना कीजिए।
Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक श्रेणी LCR परिपथ को दर्शाता है जिसमें प्रतिरोध (R), संधारित्र (C) और प्रेरक (L) जुड़े हैं। इसमें प्रत्येक घटक के सिरों पर विभवान्तर दर्शाए गए हैं: \( V_R = 40 \text{ V} \), \( V_C = 80 \text{ V} \), और \( V_L = 40 \text{ V} \)। यह स्रोत के कुल विद्युत वाहक बल की गणना करने के लिए है। हल - यदि L-C-R परिपथ में परिणामी विभवान्तर V हो, तो \[ V = \sqrt{V_R^2 + (V_L - V_C)^2} \] दिया है, \( V_R = 40 \text{ V}, V_L = 40 \text{ V}, V_C = 80 \text{ V} \) \[ V = \sqrt{(40)^2 + (40 - 80)^2} \] \[ V = \sqrt{1600 + (-40)^2} = \sqrt{1600 + 1600} \] \[ V = \sqrt{3200} = \sqrt{1600 \times 2} = 40\sqrt{2} \text{ वोल्ट} \] अतः परिपथ में प्रत्यावर्ती स्रोत का विद्युत वाहक बल, \( V = 40\sqrt{2} \text{ वोल्ट} \)
In simple words: In a series LCR circuit, the total voltage of the AC source is the vector sum of the voltages across the resistor, inductor, and capacitor. Since the inductor and capacitor voltages are 180 degrees out of phase, their difference is taken. The total voltage is found using the Pythagorean theorem, combining the resistor voltage with the net reactive voltage.
🎯 Exam Tip: Remember the formula for the net voltage in a series LCR circuit: \( V = \sqrt{V_R^2 + (V_L - V_C)^2} \). It's a vector sum, not a scalar sum, due to phase differences. Ensure correct subtraction of \(V_L\) and \(V_C\) before squaring.
प्रश्न 18. अनुनादी परिपथ से क्या अभिप्राय है? श्रेणी व समान्तर अनुनादी परिपथ के लिए आवश्यक प्रतिबन्ध तथा प्रत्येक अनुनाद की स्थिति में आवृत्ति का व्यंजक लिखिए। इनमें अन्तर भी स्पष्ट कीजिए।
Answer:**अनुनादी परिपथ (Resonant Circuits)**- वे प्रत्यावर्ती धारा परिपथ जो अपने पर आरोपित प्रत्यावर्ती वोल्टता की आवृत्ति के एक विशेष मान के संगत प्रत्यावर्ती धारा को अपने अन्दर से प्रवाहित होने देते हैं अथवा प्रवाहित होने से रोक देते हैं, अनुनादी परिपथ कहलाते हैं। ये निम्न दो प्रकार के होते हैं- **1. श्रेणी अनुनादी परिपथ (Series Resonant Circuit)**- वह प्रत्यावर्ती धारा परिपथ जिसमें प्रेरकत्व L, धारिता C तथा प्रतिरोध R परस्पर श्रेणीक्रम में जुड़े होते हैं तथा यह परिपथ इस पर आरोपित प्रत्यावर्ती वोल्टता की आवृत्ति के एक विशेष मान \(f_0\) के संगत अधिकतम प्रत्यावर्ती धारा को अपने अन्दर से प्रवाहित होने देता है, श्रेणी अनुनादी परिपथ कहलाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक श्रेणी LCR परिपथ को दर्शाता है, जिसमें एक प्रत्यावर्ती वोल्टेज स्रोत \( V = V_0 \sin \omega t \) से जुड़े प्रेरक (L), संधारित्र (C) और प्रतिरोधक (R) श्रेणीक्रम में लगे हैं। यह श्रेणी अनुनादी परिपथ के लिए मूल संरचना को दिखाता है। **2. समान्तर अनुनादी परिपथ (Parallel Resonant Circuit)**- वह प्रत्यावर्ती धारा परिपथ जिसमें कुण्डली (प्रेरकत्व = L) व संधारित्र (धारिता = C) प्रत्यावर्ती वोल्टता स्रोत से समान्तर क्रम में जुड़े हों तथा यह परिपथ इस पर आरोपित प्रत्यावर्ती वोल्टता की आवृत्ति के विशेष मान \(f_0\) के संगत धारा को अपने अन्दर से प्रवाहित नहीं होने देता हो; समान्तर अनुनादी परिपथ कहलाता है। यह विशेष आवृत्ति \(f_0\) इसकी अनुनादी आवृत्ति कहलाती है। यह (L-C) परिपथ की स्वाभाविक आवृत्ति होती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक समान्तर अनुनादी परिपथ को दर्शाता है, जिसमें एक प्रेरक (L) और एक संधारित्र (C) एक प्रत्यावर्ती वोल्टेज स्रोत \( V = V_0 \sin \omega t \) से समानांतर में जुड़े हैं। एक प्रतिरोधक (R) भी समान्तर में दर्शाया गया है। यह समान्तर अनुनादी परिपथ के लिए मूल संरचना को दिखाता है। **प्रत्येक परिपथ में अनुनाद की स्थिति में आवृत्ति** \[ f_0 = \frac{1}{2\pi \sqrt{LC}} \] **श्रेणी अनुनादी परिपथ तथा समान्तर अनुनादी परिपथ में अन्तर**
| श्रेणी अनुनादी परिपथ | समान्तर अनुनादी परिपथ |
|---|---|
| (i) इस परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा का मान अधिकतम होता है। | (i) इस परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा का मान न्यूनतम होता है। |
| (ii) परिपथ की प्रतिबाधा न्यूनतम होती है (\(Z = R\))। | (ii) परिपथ की प्रतिबाधा अधिकतम होती है। |
| (iii) शक्ति गुणांक 1 होता है। | (iii) शक्ति गुणांक 1 होता है। |
| (iv) इसका उपयोग ग्राही परिपथ (acceptor circuit) के रूप में होता है। | (iv) इसका उपयोग अस्वीकारी परिपथ (rejector circuit) के रूप में होता है। |
| (v) यह आवृत्ति जिस पर \(X_L = X_C\) होती है। | (v) यह आवृत्ति जिस पर \(X_L = X_C\) होती है। |
In simple words: Resonant circuits are AC circuits where components (inductors and capacitors) interact to cause specific current or voltage responses at a particular frequency. Series resonant circuits allow maximum current flow at resonance due to minimum impedance, while parallel resonant circuits allow minimum current flow due to maximum impedance. Both have the same resonant frequency formula, but their applications differ (acceptor vs. rejector circuits).
🎯 Exam Tip: Clearly distinguish between series and parallel resonance. Remember that series resonance means minimum impedance and maximum current, while parallel resonance means maximum impedance and minimum current. The resonant frequency formula \(f_0 = \frac{1}{2\pi \sqrt{LC}}\) is common to both. Be prepared to explain their applications.
प्रश्न 19. L-C-R संयोजन के लिए श्रेणी क्रम अनुनादी परिपथ बनाइए। इस परिपथ के लिए अनुनादी आवृत्ति का सूत्र प्राप्त कीजिए। या एक प्रत्यावर्ती वोल्टेज स्रोत V = V0 sinwt से प्रेरकत्व L संधारित्र C तथा प्रतिरोध R श्रेणी क्रम में जुड़े हैं। वेक्टर आरेख खींचकर परिपथ की प्रतिबाधा तथा कला कोण के सूत्र निकालिए। या किसी प्रत्यावर्ती परिपथ में L, C और R श्रेणीक्रम में जुड़े हैं। इस परिपथ का आरेख बनाइए। परिपथ की प्रतिबाधा एवं अनुनादी आवृति के लिए सूत्र लिखिए। यदि परिपथ में लगा प्रत्यावर्ती विभव 300 वोल्ट हो, प्रेरण प्रतिघात 50 ओम, धारितीय प्रतिघात 50 ओम तथा ओमीय प्रतिरोध 10 ओम हों तो परिपथ की प्रतिबाधा तथा L, C व R के सिरों के बीच विभवान्तर ज्ञात कीजिए । या प्रत्यावर्ती वोल्टेज स्रोत V = V0 sinwt से विप्रेरक L संधारित C तथा प्रतिरोध R तीनों श्रेणी क्रम में जुड़े हैं। सिद्ध कीजिए कि परिपथ की प्रतिबाधा Z का मान \( \sqrt{R^2 + (\omega L - \frac{1}{\omega C})^2} \) तथा \( \tan \phi = \frac{\omega L - \frac{1}{\omega C}}{R} \) है जहाँ, \( \phi \) धारा तथा वोल्टेज के बीच कलान्तर है।
Answer:हल- माना प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में, प्रेरकत्व L की एक कुण्डली, धारिता C का संधारित्र तथा प्रतिरोध R को श्रेणीक्रम में जोड़कर प्रत्यावर्ती धारा-स्रोत \( V = V_0 \sin \omega t \) से जोड़ देते हैं [चित्र 7.15 (a)]। इस दशा में प्रतिरोध R के सिरों के बीच प्रेरित विभवान्तर \( V_R \) तथा धारा \( i \) समान कला में होंगे। प्रेरकत्व L के सिरों के बीच प्रेरित विभवान्तर \( V_L \), धारा \( i \) से कला में \(90^\circ\) अग्रगामी होगा तथा धारिता C सिरों के बीच प्रेरित विभवान्तर \( V_C \), धारा \( i \) से कला में \(90^\circ\) पश्चगामी होगा। [चित्र 7.15 (b)]। अतः \( V_L \) तथा \( V_C \) का परिणामी विभवान्तर \( V_L - V_C \) होगा। यदि L-C-R परिपथ में परिणामी विभवान्तर V हो, तब \[ V^2 = V_R^2 + (V_L - V_C)^2 \] परन्तु \( V_R = iR, V_L = iX_L \) तथा \( V_C = iX_C \) अतः \[ i^2 Z^2 = i^2 R^2 + (iX_L - iX_C)^2 \] \[ Z = \frac{V}{i} = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} \] स्पष्ट है कि परिपथ की प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} \) परन्तु \( X_C = \frac{1}{\omega C} \) तथा \( X_L = \omega L \) अतः \( Z = \sqrt{R^2 + (\omega L - \frac{1}{\omega C})^2} \)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक श्रेणी LCR परिपथ (a) और उसके संबंधित फेज़र आरेख (b) को दर्शाता है। फेज़र आरेख में, प्रतिरोधक (VR) के पार वोल्टेज धारा (i) के साथ फेज में होता है, प्रेरक (VL) के पार वोल्टेज धारा से \(90^\circ\) आगे होता है, और संधारित्र (VC) के पार वोल्टेज धारा से \(90^\circ\) पीछे होता है। कुल स्रोत वोल्टेज V, VR और शुद्ध प्रतिक्रियाशील वोल्टेज (\(V_L - V_C\)) का वेक्टर योग है, जिससे कुल कलान्तर \(\phi\) बनता है। चित्र 7.15 (b) के अनुसार, यदि वोल्टेज V तथा धारा i के बीच कलान्तर \(\phi\) हो, तब \[ \tan \phi = \frac{V_L - V_C}{V_R} = \frac{i(X_L - X_C)}{iR} = \frac{X_L - X_C}{R} \] \[ \tan \phi = \frac{\omega L - \frac{1}{\omega C}}{R} \] स्पष्ट है कि कलान्तर \(\phi\) का मान R तथा \( \omega L \) व \( \frac{1}{\omega C} \) के आपेक्षिक मानों पर निर्भर करता है। इसकी निम्न तीन स्थितियाँ हैं- (i) यदि \( \omega L > \frac{1}{\omega C} \), तब \(\tan \phi\) अर्थात् \(\phi\) धनात्मक होगा। इस दशा में धारा i वोल्टेज V से पश्चगामी (lagging) होगी। (ii) यदि \( \omega L < \frac{1}{\omega C} \), तब \(\tan \phi\) अर्थात् \(\phi\) ऋणात्मक होगा। इस दशा में धारा i वोल्टेज V से अग्रगामी (leading) होगी। (iii) यदि \( \omega L = \frac{1}{\omega C} \), तब \(\tan \phi = 0\) अर्थात् \(\phi = 0\)। इस दशा में धारा i व वोल्टेज V समान कला में होंगे। इस स्थिति में प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + (0)^2} = R \) इस प्रकार, इस दशा में परिपथ की प्रतिबाधा न्यूनतम होगी तथा इसका मान प्रतिरोध R के बराबर होगा। स्पष्टतः धारा का आयाम अधिकतम होगा। यह 'वैद्युत अनुनाद' की दशा है। यहाँ, प्रत्यावर्ती विभव \( V_{rms} = 300 \text{ वोल्ट} \) प्रेरण प्रतिघात \( X_L = 50 \text{ ओम} \) धारितीय प्रतिघात \( X_C = 50 \text{ ओम} \) ओमीय प्रतिरोध \( R = 10 \text{ ओम} \) परिपथ की प्रतिबाधा \( Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} \) \[ = \sqrt{(10)^2 + (50 - 50)^2} = \sqrt{100 + 0} \] \[ = \sqrt{100} = 10 \text{ ओम} \] परिपथ में धारा \( I_{rms} = \frac{V_{rms}}{Z} = \frac{300}{10} = 30 \text{ ऐम्पियर} \] L, C व R सिरों के बीच विभवान्तर \( V_R = I_{rms} \times R = 30 \times 10 = 300 \text{ वोल्ट} \) \( V_L = I_{rms} \times X_L = 30 \times 50 = 1500 \text{ वोल्ट} \) \( V_C = I_{rms} \times X_C = 30 \times 50 = 1500 \text{ वोल्ट} \)
In simple words: In a series LCR circuit, the total impedance is found using the resistance and the difference between inductive and capacitive reactances. The phase angle, which indicates the lead/lag relationship between voltage and current, is determined by the ratio of net reactance to resistance. Resonance occurs when inductive and capacitive reactances are equal, leading to minimum impedance, maximum current, and a zero phase angle.
🎯 Exam Tip: For LCR circuits, remember the impedance formula \( Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} \) and the phase angle formula \( \tan \phi = \frac{X_L - X_C}{R} \). Pay attention to the conditions for resonance (\(X_L = X_C\)), where \(Z=R\) and \(\phi=0\). Vector diagrams are helpful for visualizing these relationships and deriving formulas.
प्रश्न 20. एक आदर्श ट्रांसफॉर्मर की प्राथमिक एवं द्वितीयक कुण्डलियों में फेरों की संख्या क्रमशः 1100 एवं 110 है। प्राथमिक कुण्डली में सप्लाई वोल्टेज 220 वोल्ट है। यदि द्वितीयक कुण्डली से जुड़े यंत्र की प्रतिबाधा 220 ओम हो, तो प्राथमिक कुण्डली द्वारा ली गई धारा का मान ज्ञात कीजिए।
Answer:हल - दिया है, \( N_p = 1100, N_s = 110, V_p = 220 \text{ वोल्ट} \) आदर्श ट्रांसफॉर्मर के लिए: \[ \frac{V_s}{V_p} = \frac{N_s}{N_p} \]
\[ \implies V_s = V_p \times \frac{N_s}{N_p} = 220 \times \frac{110}{1100} = 22 \text{ वोल्ट} \] द्वितीयक कुण्डली में धारा \( i_s = \frac{V_s}{R_s} = \frac{22}{220} = 0.1 \text{ ऐम्पियर} \] ट्रांसफॉर्मर आदर्श है, तो \( V_p \times i_p = V_s \times i_s \) \[ i_p = \frac{V_s \times i_s}{V_p} = \frac{22 \times 0.1}{220} = \frac{2.2}{220} = 0.01 \text{ ऐम्पियर} \]
In simple words: For an ideal transformer, the ratio of voltages is equal to the ratio of turns, and input power equals output power. First, use the turns ratio and primary voltage to find the secondary voltage. Then, calculate the secondary current using Ohm's law (secondary voltage and impedance). Finally, use the power conservation principle (\(V_p i_p = V_s i_s\)) to find the primary current.
🎯 Exam Tip: Remember the transformer equations: \( \frac{V_s}{V_p} = \frac{N_s}{N_p} \) and \( V_p i_p = V_s i_s \) for an ideal transformer. These are fundamental for solving transformer-related numerical problems. Ensure correct identification of primary and secondary values.
प्रश्न 21. 220 वोल्ट आपूर्ति से किसी आदर्श ट्रांसफॉर्मर की प्राथमिक कुण्डली द्वारा उस समय कितनी धारा ली जाती है जब यह 110V-550 W के रेफ्रिजरेटर को शक्ति प्रदान करता।
Answer:हल—दिया है, \( P_s = 550 \text{ वाट}, V_s = 110 \text{ वोल्ट}, V_p = 220 \text{ वोल्ट}, i_p = ? \) सूत्र \( P_s = i_s \times V_s \) से द्वितीय कुण्डली में धारा \( i_s = \frac{P_s}{V_s} = \frac{550}{110} = 5 \text{ ऐम्पियर} \)
द्वितीयक कुण्डली में वैद्युत शक्ति = प्राथमिक कुण्डली में शक्ति (आदर्श ट्रांसफॉर्मर के लिए) अर्थात् \( V_s \times i_s = V_p \times i_p \) अतः प्राथमिक कुण्डली में धारा \( i_p = \frac{V_s \times i_s}{V_p} = \frac{110 \times 5}{220} = \frac{550}{220} = 2.5 \text{ ऐम्पियर} \)
In simple words: For an ideal transformer powering a device, the power consumed by the device (secondary power) is equal to the power drawn from the source (primary power). First, calculate the secondary current using the device's power and voltage. Then, use the principle of power conservation with primary and secondary voltages and secondary current to find the primary current.
🎯 Exam Tip: For ideal transformers, power conservation (\(P_p = P_s\)) is a key concept. Always start by finding the current or voltage in the secondary circuit using the device's specifications, then apply the power relation to the primary side.
प्रश्न 22. एक उच्चायी ट्रांसफॉर्मर में प्राथमिक तथा द्वितीयक कुण्डलियों में फेरों की संख्याओं का अनुपात 1 : 200 है। यदि इसे 200 वोल्ट की प्रत्यावर्ती धारा की मेन लाइन से जोड़ दें तो द्वितीयक में प्राप्त वोल्टता ज्ञात कीजिए। यदि प्राथमिक में धारा का मान 2.0 ऐम्पियर हो तो द्वितीयक में प्रवाहित अधिकतम धारा का मान ज्ञात कीजिए।
Answer:हल- दिया है, फेरों की संख्याओं का अनुपात \( \frac{N_p}{N_s} = \frac{1}{200} \) प्राथमिक वोल्टता \( V_p = 200 \text{ वोल्ट} \) प्राथमिक धारा \( i_p = 2.0 \text{ ऐम्पियर} \)
जहाँ, \( V_s \) व \( V_p \) क्रमशः द्वितीयक व प्राथमिक वोल्टेज हैं, \( N_s \) व \( N_p \) क्रमशः द्वितीयक व प्राथमिक कुण्डलियों में फेरों की संख्याएँ हैं। आदर्श ट्रांसफॉर्मर के लिए: \[ \frac{V_s}{V_p} = \frac{N_s}{N_p} \]
\[ \implies V_s = V_p \times \frac{N_s}{N_p} = 200 \text{ वोल्ट} \times \frac{200}{1} = 40000 \text{ वोल्ट} \] माना प्राथमिक व द्वितीयक कुण्डलियों में बहने वाली धाराएँ क्रमशः \( i_p \) व \( i_s \) हैं। तब यह मानने पर कि ट्रांसफॉर्मर "आदर्श" है, \( V_p \times i_p = V_s \times i_s \) अथवा \( 200 \text{ वोल्ट} \times 2.0 \text{ ऐम्पियर} = 40000 \text{ वोल्ट} \times i_s \)
\[ \implies i_s = \frac{200 \times 2.0}{40000} = \frac{400}{40000} = 0.01 \text{ ऐम्पियर} \]
In simple words: For a step-up transformer, the turns ratio directly determines the voltage transformation. Given the primary voltage and turns ratio, the secondary voltage can be calculated. For an ideal transformer, input power equals output power, so using the primary voltage and current along with the calculated secondary voltage, the secondary current can be determined.
🎯 Exam Tip: In transformer problems, distinguish between step-up and step-down. A step-up transformer increases voltage (and has more secondary turns), while a step-down transformer decreases voltage. The core relations \( \frac{V_s}{V_p} = \frac{N_s}{N_p} \) and \( V_p i_p = V_s i_s \) are essential for solving these numerical problems.
Question 22.का मान 2.0 ऐम्पियर हो तो द्वितीयक में प्रवाहित अधिकतम धारा का मान ज्ञात कीजिए।
Answer:
हल-
\[ \frac{V_s}{V_p} = \frac{N_s}{N_p} \]
जहाँ, \(V_s\) व \(V_p\) क्रमशः द्वितीयक व प्राथमिक वोल्टेज हैं, \(N_s\) व \(N_p\) क्रमशः द्वितीयक व प्राथमिक कुण्डलियों में फेरों की संख्याएँ हैं। यहाँ \(V_p = 200\) वोल्ट
\[ \implies V_s = V_p \times \frac{N_s}{N_p} = 200 \text{ वोल्ट} \times \frac{200}{1} = 40,000 \text{ वोल्ट} \]
माना प्राथमिक व द्वितीयक कुण्डलियों में बहने वाली धाराएँ क्रमशः \(i_p\) व \(i_s\) हैं। तब यह मानने पर कि ट्रांसफॉर्मर "आदर्श" है
\[ V_p \times i_p = V_s \times i_s \]
अथवा \(200\) वोल्ट \( \times 2.0\) ऐम्पियर \( = 40,000\) वोल्ट \( \times i_s \)
\[ \implies i_s = \frac{200 \times 2.0}{40000} \text{ ऐम्पियर} \]
\[ = 0.01 \text{ ऐम्पियर} \]In simple words: This question asks to find the maximum current in the secondary coil of a transformer given the primary voltage, current, and the turns ratio. The solution uses the transformer equation relating voltage, current, and turns ratio to calculate the secondary current.
🎯 Exam Tip: Remember the ideal transformer equations for voltage and current ratios. Pay attention to unit conversions for current and voltage.
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
Question 1.ट्रांसफॉर्मर की रचना तथा कार्यविधि का वर्णन कीजिए।
या
ट्रांसफॉर्मर का नामांकित चित्र बनाइए तथा उसके परिणमन अनुपात का सूत्र व्युत्पादित कीजिए।
या
ट्रांसफॉर्मर का सिद्धान्त क्या है?
Answer:
उत्तर-
ट्रांसफॉर्मर (Transformer)- अन्योन्य प्रेरण (mutual induction) के सिद्धान्त पर आधारित यह एक ऐसी युक्ति है जिससे प्रत्यावर्ती धारा के विभव को कम अथवा अधिक किया जाता है। ट्रांसफॉर्मर केवल प्रत्यावर्ती धारा या विभव को ही परिवर्तित करने के काम आते हैं, दिष्ट धारा या विभव के परिवर्तन में नहीं। ये दो प्रकार के होते हैं-
1. **उच्चायी ट्रांसफॉर्मर (Step-up Transformer)-** इनके द्वारा कम विभवे वाली प्रबल प्रत्यावर्ती धारा को ऊँचे विभव वाली निर्बल धारा में बदला जाता है।
2. **अपचायी ट्रांसफॉर्मर (Step-down Transformer)-** इनके द्वारा ऊँचे विभव वाली निर्बल प्रत्यावर्ती धारा को कम विभव वाली प्रबल धारा में बदला जाता है।
**रचना-** इसमें कच्चे लोहे की आयताकार गोलाकार मुड़ी हुई पत्तियाँ एक पटलित क्रोड (laminated core) के रूप में होती हैं। ये पत्तियाँ एक-दूसरे के ऊपर वार्निश से जोड़ दी जाती हैं जिससे कि ये एक-दूसरे से पृथक्कृत रहें। फलतः क्रोड में कम भंवर धाराएँ उत्पन्न होती हैं और वैद्युत ऊर्जा का ह्रास घट जाता है। इस क्रोड पर ताँबे के तार की दो कुण्डलियाँ इस प्रकार लपेटी जाती हैं कि वे एक-दूसरे से तथा लोहे की क्रोड से पृथक्कृत रहें [चित्र 7.16 (a)] इनमें से एक पर ताँबे के मोटे तार के कम फेरे होते हैं तथा दूसरी में ताँबे के पतले तार के अधिक फेरे होते हैं। इनमें एक को प्राथमिक कुण्डली (Primary coil) और दूसरी को 'द्वितीयक कुण्डली' (Secondary coil) कहते हैं। उच्चायी ट्रांसफॉर्मर में मोंटे तार की कम फेरों वाली प्राथमिक कुण्डली होती है, और पतले तार की अधिक फेरों वाली
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक ट्रांसफॉर्मर की संरचना और उसके प्रकारों को दर्शाता है। चित्र 7.16(a) उच्चायी ट्रांसफॉर्मर की आंतरिक संरचना दिखाता है जिसमें प्राथमिक और द्वितीयक कुंडलियां एक पटलित लोहे के क्रोड पर लिपटी होती हैं। चित्र 7.16(b) और 7.16(c) क्रमशः उच्चायी और अपचायी ट्रांसफॉर्मर के प्रतीकात्मक आरेख दिखाते हैं, जहाँ कुंडलियों में फेरों की संख्या का अंतर स्पष्ट होता है जो वोल्टेज परिवर्तन के लिए जिम्मेदार है।
कुण्डली द्वितीयक कुण्डली होती है [चित्र 7.16 (b)] अपचायी ट्रांसफॉर्मर में इसके विपरीत होता है [चित्र 7.16 (c)]]
**कार्यविधि-** जिस वि० वा० बल को परिवर्तित करना होता है, उसे सदैव प्राथमिक कुण्डली से जोड़ते हैं। जब प्राथमिक कुण्डली में प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित होती है तो धारा के प्रत्येक चक्कर में क्रोड एक बार एक दिशा में चुम्बकित होती है तथा दूसरी बार दूसरी दिशा में। अतः क्रोड में एक परिवर्ती चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार प्राथमिक कुण्डली की वैद्युत-ऊर्जा का क्रोड में चुम्बकीय ऊर्जा के रूप में स्थानान्तरण हो जाता है। चूंकि द्वितीयक कुण्डली इस क्रोड पर लिपटी रहती है, अतः क्रोड के बार-बार चुम्बकन तथा विचुम्बकन होने की क्रिया से इस कुण्डली से बद्ध चुम्बकीय-फ्लक्स में लगातार परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार वैद्युत-चुम्बकीय प्रेरण के प्रभाव से द्वितीयक कुण्डली में उसी आवृत्ति का प्रत्यावर्ती वि० वा० बल उत्पन्न हो जाता है। इस प्रेरित वि० वा० बल का मान दोनों कुण्डलियों के फेरों की संख्या के अनुपात तथा प्राथमिक कुण्डली को दिये गये वि० वा० बल पर निर्भर करता है। माना कि प्राथमिक एवं द्वितीयक कुण्डलियों में तार के फेरों की संख्या क्रमशः \(N_p\) और \(N_s\) हैं। मान लो कि चुम्बकीय फ्लक्स का कोई क्षरण (leakage) नहीं होता है जिससे कि दोनों कुण्डलियों के प्रत्येक फेरे में से समान फ्लक्स गुजरता है। माना कि किसी क्षण कुण्डलियों के प्रत्येक फेरे से बद्ध फ्लक्स का मान \(\Phi\) है। तब फैराडे के वैद्युत-चुम्बकीय प्रेरण के नियमानुसार प्राथमिक कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित वि० वा० बल
\[ e_p = - N_p \frac{\Delta\Phi}{\Delta t} \]
तथा द्वितीयक कुण्डली में प्रेरित वि० वा० बल
\[ e_s = - N_s \frac{\Delta\Phi}{\Delta t} \]
\[ \implies \frac{e_s}{e_p} = \frac{N_s}{N_p} \]
यदि प्राथमिक परिपथ का प्रतिरोध नगण्य हो तथा ऊर्जा का कोई क्षय न हो तो प्राथमिक कुण्डली में प्रेरित वि० वा० बल \(e_p\), का मान प्राथमिक परिपथ में लगाये गये विभवान्तर \(V_p\) के तुल्य (लगभग) होगा। इसके अतिरिक्त यदि द्वितीयक परिपथ खुला हो (अर्थात् प्रतिरोध अनन्त हो) तो द्वितीयक कुण्डली के सिरों के बीच विभवान्तर \(V_s\) उसमें उत्पन्न प्रेरित वि० वा० बल \(e_s\) के तुल्य होगा। इन आदर्श परिस्थितियों में
\[ \frac{V_s}{V_p} = \frac{e_s}{e_p} = \frac{N_s}{N_p} = r \]
जहाँ r को 'परिणमन-अनुपात' (transformation ratio) कहते हैं। उच्चायी ट्रांसफॉर्मर के लिए r का मान \(r > 1\) से अधिक तथा अपचायी ट्रांसफॉर्मर के लिए \(r < 1\) से कम होता है।
यदि ट्रांसफॉर्मर द्वारा वैद्युत विभव को बढ़ाना है तो विद्युत वाहक बल के स्रोत को उस कुण्डली से सम्बन्धित करते हैं जिसके तार मोटे हैं और जिसमें फेरों की संख्या कम होती है। उपर्युक्त सूत्र से स्पष्ट है। कि इस दशा में \(V_s, V_p\) से बड़ा होगा; अर्थात् r का माने \(r > 1\) से अधिक होगा । वैद्युत-विभव को कम करने के लिए विद्युत वाहक बल के स्रोत को पतले तार से बनी अधिक फेरों वाली कुण्डली से जोड़ते हैं। स्पष्ट है कि इस दशा में \(V_s\) का मान \(V_p\) से कम होगा जिसके फलस्वरूप r का मान \(r < 1\) से कम होगा।In simple words: A transformer works on mutual induction to change AC voltage levels. It consists of two coils (primary and secondary) wound on a laminated iron core. The ratio of secondary to primary voltage is proportional to the ratio of their turns, defining whether it's a step-up (voltage increases) or step-down (voltage decreases) transformer.
🎯 Exam Tip: When describing transformer construction, emphasize the laminated core to reduce eddy currents. For working, clearly explain mutual induction and Faraday's law. For calculations, remember the turns ratio formula.
Question 2.एक समांग चुम्बकीय क्षेत्र में क्षेत्र के लम्बवत् किसी अक्ष के परितः कोणीय वेग से घूमती हुई आयताकार कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल का सूत्र निगमित कीजिए । प्रेरित विद्युत वाहक बल कब महत्तम होगा और कब शून्य?
Answer:
उत्तर-
माना एक कुण्डली के तल का क्षेत्रफल A है तथा इसमें तार के N फेरे हैं। इस कुण्डली को एक नियत कोणीय वेग \(\omega\) से चित्र 7.17 (a) की भाँति एक ऊर्ध्वाधर अक्ष YY' के परितः एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र B में दक्षिणावर्त दिशा में घुमाया जा रहा है।
माना किसी क्षण कुण्डली के तल पर खींचा गया अभिलम्ब अर्थात् कुण्डली का अक्ष चित्र 7.17 (b) की भाँति \( \vec{B} \) की दिशा के साथ \(\theta\) कोण बनाता है। इस क्षण चुम्बकीय क्षेत्र B का कुण्डली के तल के लम्बवत् घटक B \(cos\theta\) से होगा।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक आयताकार कुण्डली को एक समान चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाते हुए दर्शाता है। चित्र 7.17(a) कुण्डली की प्रारंभिक स्थिति और क्षेत्र B की दिशा दिखाता है। चित्र 7.17(b) कुण्डली के अक्ष और चुंबकीय क्षेत्र \(\vec{B}\) के बीच कोण \(\theta\) को दर्शाता है, जो प्रेरित EMF की गणना के लिए महत्वपूर्ण है।
अतः इस क्षण कुण्डली से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स
\[ \Phi = (B \cos \theta) \times A \text{ अर्थात् } \Phi = BA \cos \theta \]
परन्तु \( \theta = \omega t \) ( कोण = कोणीय वेग \( \times \) समय)
\[ \implies \Phi = BA \cos \omega t \]
अतः कुण्डली को लगातार घुमाये जाने के कारण इससे बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स के परिवर्तन की दर
\[ \frac{d\Phi}{dt} = \frac{d}{dt} (BA \cos \omega t) \]
\[ = BA \frac{d}{dt} (\cos \omega t) = BA (-\omega \sin \omega t) = - BA \omega \sin \omega t \]
अतः फैराडे के वैद्युत-चुम्बकीय प्रेरण सम्बन्धी द्वितीय नियम से कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल
\[ e = - N \frac{d\Phi}{dt} = - N (- BA \omega \sin \omega t) \]
\[ \implies e = NBA \omega \sin \omega t \quad ...(1) \]
प्रेरित वि० वी० बल के लिए सूत्र (1) से स्पष्ट है कि प्रेरित वि० वा० बल का मान समय t के साथ-साथ निरन्तर बदलता रहेगा परन्तु \(\sin\omega t\) का अधिकतम मान 1 होता है। अतः प्रेरित विद्युत वाहक बल e का
अधिकतम मान = \(NBA\omega\) होगा। यदि इसको \(e_0\) से प्रदर्शित किया जाए तो प्रेरित विद्युत वाहक बल के लिए सूत्र (1) को निम्नलिखित रूप में व्यक्त किया जाता है।
\[ e = e_0 \sin \omega t \quad ...(2) \]
जहाँ \(e_0\) का अधिकतम मान \(e_0 = NBA\omega\) उपर्युक्त सूत्र (2) से स्पष्ट है कि जब किसी कुण्डली
को चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है तो उसमें प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है जो ज्या-वक्र (sine curve) की भाँति बदलता रहता है। इसका मान कुण्डली के घुमाव कोण \(\theta = \omega t\) पर निर्भर करता है।
जब कुण्डली का तल चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् होता है तब से \(\theta = 0^{\circ}\) अतः \(e = e_0 \sin 0^{\circ} = 0\) अर्थात् \(e\) का मान शून्य होता है। यह कुण्डली की प्रारम्भिक स्थिति है तथा प्रत्येक चक्कर के पश्चात् यही स्थिति होती है।
जब कुण्डली चौथाई चक्कर घूम जाती है तो \(\theta = 90^{\circ}\) तथा इस दशा में \(e = e_0 \sin 90^{\circ} = e_0\) (अधिकतम)
यही स्थिति कुण्डली के तीन-चौथाई चक्कर घूमने पर आती है परन्तु विपरीत दिशा में प्रेरित विद्युत वाहक बल अधिकतम होता है।
अर्थात् \(e = - e_0\) इस प्रकार कुण्डली के पहले आधे चक्कर में कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित वि० वी० बल शून्य से बढ़कर
अधिकतम मान को प्राप्त करता है तथा पुनः घटकर शून्य हो जाता है, जबकि शेष आधे चक्कर में यह विपरीत दिशा में अधिकतम मान को प्राप्त करता है तथा पुनः घटकर शून्य हो जाता है। यही क्रिया बार-बार दोहरायी जाती है।In simple words: When a coil rotates in a uniform magnetic field, the magnetic flux linked with it changes, inducing an electromotive force (EMF). The induced EMF is given by \(e = NBA\omega \sin \omega t\). It is maximum when \(\sin \omega t = \pm 1\) (i.e., \(\omega t = 90^\circ\) or \(270^\circ\)), and zero when \(\sin \omega t = 0\) (i.e., \(\omega t = 0^\circ\) or \(180^\circ\)).
🎯 Exam Tip: Clearly define the terms N, B, A, and \(\omega\). Remember that EMF is maximum when the coil's plane is parallel to the magnetic field (flux change is maximum), and zero when perpendicular (flux is maximum but not changing). Faraday's law is key here.
Question 3.ए०सी० जनित्र की रचना एवं कार्यविधि समझाइए । दिष्ट धारा की तुलना में प्रत्यावर्ती धारा के क्या लाभ हैं जिनके कारण अब आमतौर पर प्रत्यावर्ती धारा ही प्रयोग की जाती है?
Answer:
हल-
प्रत्यावर्ती धारा जनित्र का सिद्धान्त तथा कार्य-प्रणाली चित्र द्वारा समझाइए।
उत्तर-
प्रत्यावर्ती धारा जनित्र अथवा डायनमो विद्युत चुम्बकीय प्रेरण की क्रिया का सबसे महत्त्वपूर्ण उपयोग विद्युत जनित्र अथवा डायनमो में किया गया है। यह एक ऐसी विद्युत चुम्बकीय मशीन है जिसके द्वारा यान्त्रिक ऊर्जा को वैद्युत ऊर्जा में बदला जाता है। प्रत्यावर्ती धारा को उत्पन्न करने के लिये प्रत्यावर्ती-धारा डायनमो तथा दिष्ट धारा को उत्पन्न करने के लिए दिष्ट-धारा डायनमो का उपयोग होती है।
**सिद्धान्त-** जब किसी बन्द कुण्डली को चुम्बकीय क्षेत्र में तेजी से घुमाया जाता है तो उसमें से गुजरने वाली फ्लक्स-रेखाओं की संख्या में लगातार परिवर्तन होता रहता है। जिसके कारण कुण्डली में वैद्युत धारा प्रेरित हो जाती है। कुण्डली को घुमाने में जो कार्य करना पड़ता है (अर्थात् यान्त्रिक ऊर्जा व्यय होती है) वही कुण्डली में वैद्युत ऊर्जा के रूप में प्राप्त होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक सरल AC जनरेटर (डायनमो) की आंतरिक संरचना को दर्शाता है। इसमें एक शक्तिशाली क्षेत्र चुंबक (N और S ध्रुव), एक आयताकार आर्मेचर कुण्डली (ABCD), सर्पी-वलय (स्लिप रिंग्स), और कार्बन ब्रुश (X और Y) जैसे मुख्य घटक शामिल हैं। यह AC जनरेटर के कार्य सिद्धांत को समझाने के लिए एक विज़ुअल संदर्भ प्रदान करता है, जहां कुण्डली के घूमने से चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है और प्रेरित धारा उत्पन्न होती है।
**रचना-** इसके तीन मुख्य भाग होते हैं (चित्र 7.18)।
(i) **क्षेत्र चुम्बक (Field Magnet)-** यह एक शक्तिशाली चुम्बक NS होता है। इसके द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की बल रेखाएँ चुम्बक के ध्रुव N से S की ओर होती हैं।
(ii) **आर्मेचर (Armature)-** चुम्बक के ध्रुवों के N बीच में पृथक्कृत ताँबे के तारों की एक कुण्डली ABCD होती है, जिसे आर्मेचर कुण्डली कहते सर्दी-वलय हैं। कुण्डली कई फेरों की होती है तथा ध्रुवों के बीच क्षैतिज अक्ष पर जल के टरबाइन से घुमाई जाती है।
(iii) **सप वलय तथा बुश (Slip Rings and Brushes)-** कुण्डली के सिरों का सम्बन्ध अलग-अलग दो ताँबे के छल्लों से होता है जो आपस में एक-दूसरे को स्पर्श नहीं करते और कुण्डली के साथ उसी अक्ष पर घूमते हैं। इन्हें 'सप वलय' कहते हैं। इन छल्लों को दो कार्बन की ब्रुश X तथा Y स्पर्श करती रहती हैं। ये ब्रुश स्थिर रहती हैं तथा छल्ले इन ब्रुशों के नीचे फिसलते हुए घूमते हैं। इन ब्रुशों का सम्बन्ध उस बाह्य परिपथ से कर देते हैं जिसमें वैद्युत धारा भेजनी होती है।
**क्रिया-** जब आमेचर-कुण्डली ABCD घूमती है तो कुण्डली में से होकर जाने वाली फ्लक्स-रेखाओं की संख्या में परिवर्तन होता है। अतः कुण्डली में धारा प्रेरित हो जाती है। मान लो कुण्डली दक्षिणावर्त (clockwise) दिशा में घूम रही है तथा किसी क्षण क्षैतिज अवस्था में है (चित्र 7.18)। इस क्षण कुण्डली की भुजा AB ऊपर उठ रही है तथा भुजा CD नीचे आ रही है। फ्लेमिंग के दायें हाथ के नियम अनुसार, इन भुजाओं में प्रेरित धारा की दिशा वही है जो चित्र में दिखाई गई है। अतः धारा ब्रुश X से बाहर जा रही है (अर्थात् यह ब्रुश धन ध्रुव है) तथा ब्रुश Y पर वापस आ रही है (अर्थात् यह बुश ऋण ध्रुव है) । जैसे ही कुण्डली अपनी ऊध्वाधर स्थिति से गुजरेगी, भुजा AB नीचे की ओर आने लगेगी तथा CD ऊपर की ओर जाने लगेगी । अतः अब धारा ब्रुश Y से बाहर जायेगी तथा ब्रुश X पर वापस आयेगी। इस प्रकार आधे चक्कर के बाद बाह्य परिपथ में धारा की दिशा बदल जायेगी। अतः परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा' (alternating current) उत्पन्न होती है।
प्रत्यावर्ती धारा की-दिष्ट-धारा की तुलना में उपयोगिता आजकल घरेलू व औद्योगिक कार्यों में प्रत्यावर्ती धारा का ही उपयोग होता है क्योंकि दिष्ट-धारा की तुलना में इसके निम्न लाभ हैं।
(i) प्रत्यावर्ती धारा को पावर हाऊस से किसी स्थान पर ट्रांसफॉर्मर की सहायता से उच्च वोल्टेज पर भेजा जा सकता है तथा वहाँ इसे पुनः निम्न वोल्टेज पर लाया जा सकता है। इस प्रकार भेजने में लागत भी कम आती है तथा ऊर्जा ह्रास भी बहुत घट जाता है। ट्रांसफॉर्मर का उपयोग दिष्ट-धारा के लिए नहीं किया जा सकता। अतः दिष्ट-धारा को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने में ऊर्जा ह्रास भी होता है तथा लागत भी अधिक आती है।
(ii) प्रत्यावर्ती धारा को चोक-कुण्डली द्वारा बहुत कम ऊर्जा ह्रास पर नियन्त्रित किया जा सकता है, जबकि दिष्ट-धारा ओमीय प्रतिरोध द्वारा ही नियन्त्रित की जा सकती है जिसमें अत्यधिक ऊर्जा ह्रास होता है।
(iii) प्रत्यावर्ती धारा वाले यन्त्र; जैसे-वैद्युत मोटर, दिष्ट-धारा वाले यन्त्रों की तुलना में सुदृढ़ व सुविधाजनक होते हैं।
(iv) जहाँ दिष्ट धारा की आवश्यकता होती है (जैसे-विद्युत अपघटन में, संचायक सेलों को आवेशित करने में, वैद्युत चुम्बक बनाने में) वहाँ दिष्टकारी (rectifier) द्वारा प्रत्यावर्ती धारा को सुगमता से | दिष्ट-धारा में बदल लिया जाता है।In simple words: An AC generator converts mechanical energy into electrical energy based on electromagnetic induction. It uses a rotating coil in a magnetic field, slip rings, and brushes to produce alternating current. AC is preferred over DC for power transmission due to its ability to be efficiently stepped up or down using transformers, minimizing energy loss over long distances, and easy control with choke coils.
🎯 Exam Tip: When describing the AC generator, ensure you label all parts correctly in the diagram and explain the function of each. For AC vs. DC advantages, focus on transmission efficiency via transformers and control using choke coils without significant power loss.
Question 4.एक कुण्डली 220 वोल्ट, 50 हर्ट्ज वाले प्रत्यावर्ती धारा स्रोत से 20 ऐम्पियर धारा तथा 200 वाट शक्ति लेती है। कुण्डली का प्रतिरोध तथा प्रेरकत्व ज्ञात कीजिए।
Answer:
हल-
कुण्डली में शक्ति-क्षय P, केवल इसके ओमीय प्रतिरोध R के कारण है। अतः
\[ P = i_{rms}^2 \times R \]
\[ \implies R = \frac{P}{i_{rms}^2} = \frac{200}{(20)^2} = \frac{200}{400} = 0.5 \text{ ओम} \]
परिपथ की प्रतिबाधा \(Z = \sqrt{R^2 + X_L^2}\)
परिपथ में धारा \(i_{rms} = \frac{V_{rms}}{Z} \implies Z = \frac{V_{rms}}{i_{rms}} = \frac{220}{20} = 11 \text{ ओम} \)
प्रश्नानुसार,
\[ Z = \sqrt{R^2 + X_L^2} \]
\[ 11 = \sqrt{(0.5)^2 + X_L^2} \]
\[ 121 = 0.25 + X_L^2 \]
\[ X_L^2 = 121 - 0.25 = 120.75 \]
\[ X_L = \sqrt{120.75} \approx 10.98 \text{ ओम} \]
माना कि कुण्डली का प्रेरकत्व L है। इसका प्रतिरोध \(X_L = \omega L\) होगा, जहाँ \(\omega\) धारा की कोणीय आवृत्ति है, तब
\[ \omega = 2\pi f = 2 \times 3.14 \times 50 = 314 \text{ rad/s} \]
\[ X_L = \omega L \implies L = \frac{X_L}{\omega} = \frac{10.98}{314} \approx 0.035 \text{ हेनरी} \]In simple words: Given the RMS voltage, RMS current, and power consumed by a coil, we first calculate its resistance (R) using the power formula \(P = I_{rms}^2 R\). Then, using the RMS voltage and current, we find the impedance (Z) of the coil. Finally, we use the impedance formula \(Z = \sqrt{R^2 + X_L^2}\) to determine the inductive reactance (\(X_L\)) and then the inductance (L) from \(X_L = \omega L\).
🎯 Exam Tip: Remember to distinguish between total power (P) and apparent power (V_rms * I_rms). Power is consumed only by resistance. Impedance calculation uses both resistance and reactance, which are then used to find inductance L.
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