UP Board Solutions Class 12 Chemistry Chapter 9 Coordination Compounds

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Detailed Chapter 9 समन्वय यौगिक UP Board Solutions for Class 12 Chemistry

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Class 12 Chemistry Chapter 9 समन्वय यौगिक UP Board Solutions PDF

UP Board Solutions For Class 12 Chemistry Chapter 9 Coordination Compounds (उपसहसंयोजन यौगिक)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

Question 1. निम्नलिखित उपसहसंयोजन यौगिकों के सूत्र लिखिए –
1. टेट्राऐम्मीनडाइऐक्वाकोबाल्ट (III) क्लोराइड
2. पोटैशियम टेट्रासायनिडोनिकिलेट (II)
3. ट्रिस (एथेन-1, 2-डाइऐमीन) क्रोमियम (III) क्लोराइड
4. ऐम्मीनब्रोमिडोक्लोरिडोनाइट्रिटो-N-प्लैटिनेट (II)
5. डाइक्लोरोबिस (एथेन-1, 2-डाइऐमीन) प्लैटिनम (IV) नाइट्रेट
6. आयरन (III) हेक्सासायनिडोफेरेट (II)
Answer:
1. [Co(NH3)4(H2O)2]Cl3
2. K2[Ni(CN)6]
3. [Cr (en)3]Cl3
4. [Pt (NH3) BrCI(NO2)]
5. [PtCl2(en)2](NO3)2
6. Fe4[Fe(CN)6]3
In simple words: यह प्रश्न उपसहसंयोजन यौगिकों के IUPAC नामों से उनके रासायनिक सूत्र लिखने पर केंद्रित है। आपको केंद्रीय धातु आयन, लिगेंड्स और उनके आवेश को ध्यान में रखते हुए यौगिकों के सही सूत्र लिखने होते हैं।

🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण के नियमों को ध्यान से समझें, विशेषकर लिगेंड के प्रकार (एकदंतुर, द्विदंतुर), ऑक्सीकरण अवस्था, और समन्वय संख्या को। सही सूत्र लिखने के लिए इन सभी घटकों का ज्ञान आवश्यक है।

 

Question 2. निम्नलिखित उपसहसंयोजन यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए –
1. [Co(NH3)6]Cl3
2. [Co(NH3)5CI]CI2
3. K3[Fe(CN)6]
4. K3[Fe(C2O4)3]
5. K2[PdCl4]
6. [Pt (NH3)2CI(NH2CH3)]CI
Answer:
1. हेक्साऐम्मीनकोबाल्ट (III) क्लोराइड
2. पेन्टाऐम्मीनक्लोरिडोकोबाल्ट (III) क्लोराइड
3. पोटैशियम हेक्सासायनोफेरेट (III)
4. पोटैशियम ट्राइऑक्सेलेटोफेरेट (III)
5. पोटैशियम टेट्राक्लोरिडोपैलेडेट (II)
6. डाइऐम्मीनक्लोरिडो(मेथिलऐमीन)प्लैटिनम (II) क्लोराईड
In simple words: यह प्रश्न दिए गए उपसहसंयोजन यौगिकों के रासायनिक सूत्रों से उनके सही IUPAC नाम लिखने के बारे में है। नामकरण के नियमों का पालन करते हुए लिगेंड्स की संख्या और प्रकार, केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था और समन्वय संख्या को पहचानना महत्वपूर्ण है।

🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण में लिगेंड्स को अल्फाबेटिक क्रम में लिखना, उपसर्गों (डाइ, ट्राइ, टेट्रा) का उपयोग, और केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था को रोमन अंकों में कोष्ठक में दर्शाना याद रखें। यह एक स्कोरिंग भाग है।

 

Question 3. निम्नलिखित संकुलों द्वारा प्रदर्शित समावयवता का प्रकार बतलाइए तथा इन समावयवों की संरचनाएँ बनाइए -
1. K[Cr(H2O)2 (C2O4)2]
2. [Co(en)3] CI3
3. [Co(NH3)5 (NO2)](NO3)2
4. [Pt(NH3)(H2O)CI2]
Answer:
1. (क) इसके लिए ज्यामितीय (सिस-ट्रान्स) तथा प्रकाशिक समावयव सम्भव हैं।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख एक कोबाल्ट कॉम्प्लेक्स K[Cr(H2O)2(C2O4)2] के ज्यामितीय समावयवों (सिस और ट्रांस) को दर्शाता है। सिस रूप में, समान लिगेंड एक-दूसरे के करीब होते हैं, जबकि ट्रांस रूप में वे एक-दूसरे के विपरीत होते हैं। क्रोमियम केंद्रीय धातु आयन है, और H2O तथा ऑक्सेलेट (ox) लिगेंड हैं।

(ख) सिस के प्रकाशिक समावयव (d- तथा l-)

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख सिस आइसोमर के दो प्रकाशिक समावयवों (d-रूप और l-रूप) को दर्शाता है, जो एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब हैं और अध्यारोपित नहीं हो सकते। क्रोमियम केंद्रीय धातु आयन है, जो H2O और ऑक्सेलेट (ox) लिगेंड्स से घिरा है। दर्पण तल बीच में दिखाया गया है जो दोनों रूपों को अलग करता है।

2. इसके दो प्रकाशिक समावयव हो सकते हैं।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख क्रोमियम (III) कॉम्प्लेक्स [Cr(en)3]Cl3 के d-रूप और l-रूप प्रकाशिक समावयवों को दर्शाता है। केंद्रीय क्रोमियम आयन तीन एथेन-1,2-डाइऐमीन (en) लिगेंड्स से घिरा है, जो बाइडेन्टेट लिगेंड हैं। d-रूप और l-रूप एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब हैं और अध्यारोपित नहीं हो सकते, जिससे उनकी चिरैलिटी स्पष्ट होती है।

3. आयनन समावयव - निम्न समावयव सम्भव हैं (इसके दो आयनन तथा दो बन्धनी समावयव सम्भव हैं)।
[Co(NH3)5 (NO2)](NO3)2, [Co(NH3)5(NO3)](NO2)(NO3)
बन्धनी समावयव
[Co(NH3)5(NO2)](NO3)2, [Co(NH3)5(ONO)](NO3)2

4. इसके दो ज्यामितीय समावयव (सिस-, ट्रान्स-) सम्भव हैं।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख प्लैटिनम कॉम्प्लेक्स [Pt(NH3)(H2O)Cl2] के दो ज्यामितीय समावयवों- सिस (समपक्ष) और ट्रांस (विपक्ष) को दर्शाता है। सिस रूप में, समान लिगेंड (H3N और Cl) एक-दूसरे के करीब होते हैं, जबकि ट्रांस रूप में वे एक-दूसरे के विपरीत होते हैं। केंद्रीय प्लैटिनम आयन H3N, Cl और H2O लिगेंड्स से जुड़ा है।
In simple words: इस प्रश्न में विभिन्न संकुल यौगिकों द्वारा प्रदर्शित समावयवता के प्रकारों (जैसे ज्यामितीय, प्रकाशिक, आयनन और बन्धनी) की पहचान करनी थी और उनकी संरचनाएँ बनानी थी। यह समावयवता यौगिक के गुणों और व्यवहार को निर्धारित करती है।

🎯 Exam Tip: समावयवता के प्रकारों (ज्यामितीय, प्रकाशिक, आयनन, बन्धनी, विलायकयोजन) और उनके उदाहरणों को अच्छी तरह समझें। संरचनाएँ बनाते समय, लिगेंड्स की स्थिति और केंद्रीय धातु के चारों ओर उनकी व्यवस्था पर विशेष ध्यान दें। प्रकाशिक समावयवता के लिए दर्पण प्रतिबिंबों का स्पष्ट चित्रण महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. इसका प्रमाण दीजिए कि [Co(NH3)5 CI]SO4 तथा [Co(NH3)5SO4]CI आयनन समावयव हैं।
Answer:
आयनन समावयव जल में घुलकर भिन्न आयन देते हैं, इसलिए विभिन्न अभिकर्मकों के साथ भिन्न-भिन्न अभिक्रियाएँ देते हैं।
[Co(NH3)5CI]SO4 + Ba2+ - BaSO4 (S)
[Co(NH3)5SO4]CI + Ba2+ - कोई अभिक्रिया नहीं
[Co(NH3)5CI]SO4 + Ag+ - कोई अभिक्रिया नहीं
[Co(NH3)5SO4]CI + Ag+ - AgCl (s) चूँकि दिए गए संकुल विभिन्न अभिकर्मकों के साथ भिन्न अभिक्रियाएँ देते हैं,
अतः ये आयनन समावयव हैं।
In simple words: आयनन समावयवता तब होती है जब समन्वय मंडल के अंदर और बाहर के आयन आपस में बदल जाते हैं। इन यौगिकों को पानी में घोलने पर अलग-अलग आयन मुक्त होते हैं, जो विभिन्न अभिकर्मकों (जैसे Ba2+ और Ag+) के साथ अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ देते हैं, जिससे यह साबित होता है कि वे आयनन समावयव हैं।

🎯 Exam Tip: आयनन समावयवता की पहचान करने के लिए, यौगिकों को जलीय घोल में विभिन्न अभिकर्मकों के साथ प्रतिक्रिया कराना एक महत्वपूर्ण प्रायोगिक विधि है। BaSO4 और AgCl जैसे अवक्षेपों का निर्माण आयनों की उपस्थिति का स्पष्ट संकेत देता है।

 

Question 5. संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त के आधार पर समझाइए कि वर्ग समतलीय संरचना वाला [Ni(CN)4]2- आयन प्रतिचुम्बकीय है तथा चतुष्फलकीय ज्यामिति वाला [NiCl4]2- आयन अनुचुम्बकीय है।
Answer:
[Ni(CN)4]2- का चुम्बकीय व्यवहार (Magnetic behaviour of [Ni(CN)4]2-)- Ni का परमाणु क्रमांक 28 है।
Ni, Ni2+ तथा [Ni(CN)4]2- में निकिल की अवस्था के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नलिखित हैं -

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख Ni परमाणु, Ni2+ आयन, और [Ni(CN)4]2- कॉम्प्लेक्स में निकिल के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को दर्शाता है। 3d, 4s और 4p कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था दिखाई गई है। Ni2+ आयन में 3d कक्षक में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, लेकिन CN- लिगेंड की उपस्थिति में ये इलेक्ट्रॉन युग्मित हो जाते हैं, जिससे dsp2 संकरण होता है और कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं बचता है।

संकुल आयन [Ni(CN)4]2- प्रतिचुम्बकीय है; क्योंकि इसमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं होते हैं।
[NiCl4]2- का चुम्बकीय व्यवहार (Magnetic behaviour of [NiCl4]2-)- इसमें CI दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड है तथा यह इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं करता है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख Ni परमाणु, Ni2+ आयन, और [NiCl4]2- कॉम्प्लेक्स में निकिल के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को दर्शाता है। 3d, 4s और 4p कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था दिखाई गई है। Ni2+ आयन में 3d कक्षक में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, और Cl- जैसे दुर्बल क्षेत्र लिगेंड की उपस्थिति में ये इलेक्ट्रॉन युग्मित नहीं होते हैं, जिससे sp3 संकरण होता है और अयुग्मित इलेक्ट्रॉन बने रहते हैं।

संकुल आयन [NiCl4]2- के d-उपकोश में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित हैं, इसलिए यह अनुचुम्बकीय होता है।
In simple words: [Ni(CN)4]2- में, CN- एक प्रबल लिगेंड है जो Ni2+ के 3d इलेक्ट्रॉनों को युग्मित कर देता है, जिससे कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं बचता और यह प्रतिचुम्बकीय होता है। [NiCl4]2- में, Cl- एक दुर्बल लिगेंड है जो Ni2+ के 3d इलेक्ट्रॉनों को युग्मित नहीं कर पाता, जिससे अयुग्मित इलेक्ट्रॉन बचे रहते हैं और यह अनुचुम्बकीय होता है।

🎯 Exam Tip: संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त (VBT) के अनुसार, संकरण के प्रकार (dsp² या sp³) और अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति को पहचानना महत्वपूर्ण है। प्रबल और दुर्बल क्षेत्र लिगेंड्स के प्रभाव को समझना चुम्बकीय व्यवहार (प्रतिचुम्बकीय या अनुचुम्बकीय) को निर्धारित करने की कुंजी है।

 

Question 6. [NiCl4]2- अनुचुम्बकीय है, जबकि [Ni(CO)4] प्रतिचुम्बकीय है यद्यपि दोनों चतुष्फलकीय हैं। क्यों?
Answer:
[Ni(CO)4] में निकिल शून्य ऑक्सीकरण अवस्था में है, जबकि [NiCI4]2- में यह +2 ऑक्सीकरण अवस्था में है। CO लिगेण्ड की उपस्थिति में निकिल के अयुग्मित d-इलेक्ट्रॉन युग्मित हो जाते हैं, परन्तु CI- दुर्बल लिगेण्ड होने के कारण अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों को युग्मित करने योग्य नहीं होता है। अतः [Ni(CO)4] में कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित नहीं होता, इसलिए यह प्रतिचुम्बकीय है तथा [NiCI4]2- में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण यह अनुचुम्बकीय होता है।
In simple words: [Ni(CO)4] में CO एक प्रबल लिगेंड है जो Ni(0) के सभी d-इलेक्ट्रॉनों को युग्मित कर देता है, जिससे यह प्रतिचुम्बकीय हो जाता है। इसके विपरीत, [NiCl4]2- में Cl- एक दुर्बल लिगेंड है जो Ni(II) के d-इलेक्ट्रॉनों को युग्मित नहीं कर पाता, जिससे अयुग्मित इलेक्ट्रॉन बने रहते हैं और यह अनुचुम्बकीय होता है, भले ही दोनों की ज्यामिति चतुष्फलकीय हो।

🎯 Exam Tip: इस तरह के प्रश्नों में केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था और लिगेंड की प्रबलता (प्रबल क्षेत्र या दुर्बल क्षेत्र) दोनों पर ध्यान केंद्रित करें। लिगेंड की प्रबलता ही इलेक्ट्रॉनों के युग्मन और अंततः चुम्बकीय व्यवहार को निर्धारित करती है।

 

Question 7. [Fe(H2O)6]3+ प्रबल अनुचुम्बकीय है, जबकि [Fe(CN)6]3- दुर्बल अनुचुम्बकीय । समझाइए ।
Answer:
CN- (प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड) की उपस्थिति में, 3d- इलेक्ट्रॉन युग्मित होकर केवल एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन छोड़ते हैं। d2 sp3 संकरण वाला आन्तरिक कक्षक संकुल बनता है। इसलिए [Fe(CN)6]3- दुर्बल अनुचुम्बकीय होता है। HO (दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड) की उपस्थिति में 3d-इलेक्ट्रॉन युग्मित नहीं होते अर्थात् संकरण spa है जो बाह्य कक्षक संकुल, जिसमें पाँच अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, बनाता है, इसलिए [Fe(H2O)6]3+ प्रबल अनुचुम्बकीय होता है।
In simple words: [Fe(CN)6]3- में CN- एक प्रबल लिगेंड है जो Fe3+ के अधिकांश 3d इलेक्ट्रॉनों को युग्मित कर देता है, जिससे केवल एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन बचता है और यह दुर्बल अनुचुम्बकीय होता है। इसके विपरीत, [Fe(H2O)6]3+ में H2O एक दुर्बल लिगेंड है जो Fe3+ के 3d इलेक्ट्रॉनों को युग्मित नहीं कर पाता, जिससे पाँच अयुग्मित इलेक्ट्रॉन बने रहते हैं और यह प्रबल अनुचुम्बकीय होता है।

🎯 Exam Tip: यह समझना महत्वपूर्ण है कि प्रबल क्षेत्र लिगेंड इलेक्ट्रॉनों को युग्मित करते हैं (जिससे अयुग्मित इलेक्ट्रॉन कम होते हैं), जबकि दुर्बल क्षेत्र लिगेंड ऐसा नहीं करते (जिससे अयुग्मित इलेक्ट्रॉन अधिक होते हैं)। यही कारण है कि समान धातु आयन के अलग-अलग लिगेंड्स वाले संकुलों में भिन्न-भिन्न चुम्बकीय व्यवहार होता है।

 

Question 8. समझाइए कि [Co(NH3)6]3+ एक आन्तरिक कक्षक संकुल है, जबकि [Ni(NH3)6]2+ एक बाह्य कक्षक संकुल है।
Answer:
NH3 की उपस्थिति में Co के 3d- इलेक्ट्रॉन युग्मित होकर दो रिक्त d-कक्षक छोड़ते हैं जो [Co(NH3)6]3+ की स्थिति में आन्तरिक कक्षक संकुल बनाने वाले d2 sp3 संकरण में सम्मिलित होते हैं। [Ni(NH3)6]2+ में निकिल +2 ऑक्सीकरण अवस्था में है तथा इसका विन्यास 28 है। इसमें बाह्य कक्षक संकुल बनाने वाला sp3 d² संकरण में सम्मिलित होता है।
In simple words: [Co(NH3)6]3+ में NH3 प्रबल लिगेंड है, जो Co3+ के 3d इलेक्ट्रॉनों को युग्मित कर आंतरिक d-कक्षक उपलब्ध कराता है, जिससे यह d2sp3 संकरण और आंतरिक कक्षक संकुल बनता है। [Ni(NH3)6]2+ में Ni2+ के 3d इलेक्ट्रॉन युग्मित नहीं होते, जिससे यह बाहरी 4d कक्षक का उपयोग करता है, परिणामस्वरूप sp3d2 संकरण और बाह्य कक्षक संकुल बनता है।

🎯 Exam Tip: आंतरिक और बाह्य कक्षक संकुलों के बीच अंतर को स्पष्ट करने के लिए लिगेंड की प्रबलता (जो इलेक्ट्रॉनों के युग्मन को प्रभावित करती है) और केंद्रीय धातु के संकरण (जैसे d2sp3 बनाम sp3d2) पर ध्यान केंद्रित करें।

 

Question 9. वर्ग समतली (Pt(CN)4]2- आयन में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बतलाइए ।
Answer:
78Pt आवर्त सारणी के वर्ग 10 में स्थित होता है तथा इसका विन्यास 5d9 6s1 है। अत: Pt2+ का विन्यास d8 है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख Pt2+ आयन के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को दर्शाता है। 5d, 6s और 6p कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था दिखाई गई है। Pt2+ में d8 विन्यास होता है, जहाँ 5d कक्षक में 8 इलेक्ट्रॉन होते हैं। वर्ग समतलीय संरचना के लिए dsp2 संकरण होता है, जिसमें 5d कक्षक के अयुग्मित इलेक्ट्रॉन युग्मित होकर संकरण में भाग लेते हैं।

वर्ग समतली संरचना के लिए संकरण dsp² होता है। चूंकि 5d में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन युग्मित होकर dsp² संकरण के लिए एक रिक्त d-कक्षक बनाते हैं, अतः कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं होता।
In simple words: Pt(CN)4]2- में केंद्रीय धातु Pt2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास d8 होता है। चूंकि CN- एक प्रबल क्षेत्र लिगेंड है, यह Pt2+ के 5d कक्षकों में मौजूद अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों को युग्मित कर देता है, जिससे dsp2 संकरण होता है और संकुल में कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं बचता है।

🎯 Exam Tip: वर्ग समतलीय कॉम्प्लेक्स में dsp2 संकरण होता है। यदि लिगेंड प्रबल क्षेत्र हो, तो d8 कॉन्फ़िगरेशन वाले केंद्रीय धातु आयन के सभी d-इलेक्ट्रॉन युग्मित हो जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या शून्य हो जाती है।

 

Question 10. क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त को प्रयुक्त करते हुए समझाइए कि कैसे हेक्साऐक्वा मैंगनीज (II) आयन में पाँच अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं, जबकि हेक्सासायनो आयन में केवल एक ही अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है। उत्तर ऑक्सीकरण अवस्था +2 में Mn का विन्यास 3d5 होता है। लिगेण्ड के रूप में H2O (दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड) की उपस्थिति में इन पाँच इलेक्ट्रॉनों का वितरण t32g e2g होता है अर्थात् सभी इलेक्ट्रॉन अयुग्मित रह जाते हैं। लिगेण्ड के रूप में CN¯ (प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड) की उपस्थिति में वितरण t52g e0g है। अर्थात् दो t2g कक्षकों में युग्मित इलेक्ट्रॉन हैं, जबकि तीसरे t2g कक्षक में एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होता
Answer:
ऑक्सीकरण अवस्था +2 में Mn का विन्यास 3d5 होता है। लिगेण्ड के रूप में H2O (दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड) की उपस्थिति में इन पाँच इलेक्ट्रॉनों का वितरण t32g e2g होता है अर्थात् सभी इलेक्ट्रॉन अयुग्मित रह जाते हैं। लिगेण्ड के रूप में CN¯ (प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड) की उपस्थिति में वितरण t52g e0g है। अर्थात् दो t2g कक्षकों में युग्मित इलेक्ट्रॉन हैं, जबकि तीसरे t2g कक्षक में एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होता है।
In simple words: [Mn(H2O)6]2+ में H2O दुर्बल लिगेंड होने के कारण Mn2+ के 3d5 इलेक्ट्रॉन युग्मित नहीं होते, जिससे सभी पाँच इलेक्ट्रॉन अयुग्मित रहते हैं (t32g e2g)। [Mn(CN)6]4- में CN- प्रबल लिगेंड होने के कारण Mn2+ के 3d5 इलेक्ट्रॉन युग्मित हो जाते हैं, जिससे केवल एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन बचता है (t52g e0g)।

🎯 Exam Tip: क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त में, लिगेंड की प्रबलता (H2O दुर्बल, CN- प्रबल) इलेक्ट्रॉनों के वितरण (उच्च चक्रण बनाम निम्न चक्रण) को प्रभावित करती है, जिससे अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या और अंततः चुम्बकीय व्यवहार में अंतर आता है।

 

Question 11. [Cu(NH3)4]2+ संकुल आयन के \( \beta_{4} \) का मान \( 2.1 \times 10^{13} \) है, इस संकुल के समग्र वियोजन स्थिरांक के मान की गणना कीजिए।
Answer:
हल
समग्र वियोजन स्थिरांक, समग्र स्थायित्व स्थिरांक का व्युत्क्रम होता है।
अतः समग्र वियोजन स्थिरांक = \( \frac{1}{\beta_{4}} = \frac{1}{2.1 \times 10^{13}} \)

\( \frac{1}{2.1} \times 10^{-13} \)

\( 0.476 \times 10^{-13} \)

\( 4.76 \times 10^{-14} \)
In simple words: समग्र वियोजन स्थिरांक, समग्र स्थायित्व स्थिरांक (\( \beta_{4} \)) का व्युत्क्रम होता है। दिए गए स्थायित्व स्थिरांक के मान को 1 से विभाजित करके वियोजन स्थिरांक की गणना की जाती है।

🎯 Exam Tip: समग्र स्थायित्व स्थिरांक (\( \beta \)) और समग्र वियोजन स्थिरांक (K_instability) एक-दूसरे के व्युत्क्रम होते हैं। गणना करते समय घातांकों (powers of 10) का सही ढंग से प्रबंधन सुनिश्चित करें।

अतिरिक्त अभ्यास

Question 1. वर्नर की अभिधारणाओं के आधार पर उपसहसंयोजन यौगिकों में आबन्धन को समझाइए। उत्तर उपसहसंयोजन यौगिकों में आबन्धन को समझाने के लिए वर्नर ने सन् 1898 में उपसहसंयोजन यौगिकों का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इस सिद्धान्त की मुख्य अभिधारणाएँ निम्नलिखित हैं -
1. उपसहसंयोजन यौगिकों में धातुएँ दो प्रकार की संयोजकताएँ दर्शाती हैं- प्राथमिक तथा द्वितीयक ।
2. प्राथमिक संयोजकताएँ सामान्य रूप से धातु परमाणु की ऑक्सीकरण अवस्था से सम्बन्धित होती हैं। तथा आयननीय होती हैं। ये संयोजकताएँ ऋणात्मक आयनों द्वारा सन्तुष्ट होती हैं।
3. द्वितीयक संयोजकताएँ धातु परमाणु की उपसहसंयोजन संख्या से सम्बन्धित होती हैं। द्वितीयक संयोजकताएँ अन-आयननीय होती हैं। ये उदासीन अणुओं अथवा ऋणात्मक आयनों द्वारा सन्तुष्ट होती हैं। द्वितीयक संयोजकता उपसहसंयोजन संख्या के बराबर होती है तथा इसका मान किसी धातु के लिए सामान्यतः निश्चित होता है।
4. धातु से द्वितीयक संयोजकता से आबन्धित आयन समूह विभिन्न उपसहसंयोजन संख्या के अनुरूप दिक्स्थान में विशिष्ट रूप से व्यवस्थित रहते हैं।
आधुनिक सूत्रीकरण में इस प्रकार की दिक्स्थान व्यवस्थाओं को समन्वये बहुफलक (coordination polyhedra) कहते हैं। गुरुकोष्ठक में लिखी स्पीशीज संकुल तथा गुरु कोष्ठक के बाहर लिखे आयन प्रति आयन (counter ions) कहलाते हैं।
उन्होंने यह भी अभिधारणा दी कि संक्रमण तत्वों के समन्वय यौगिकों में सामान्यतः अष्टफलकीय, चतुष्फलकीय व वर्ग समतली ज्यामितियाँ पायी जाती हैं। इस प्रकार [Co(NH3)6]3+, [CoCI(NH3)5]2+ तथा [CoCl2(NH3)4]+ की ज्यामितियाँ अष्टफलकीय हैं, जबकि [Ni(CO)4)] तथा [PtCl4]2- क्रमशः चतुष्फलकीय तथा वर्ग समतली हैं।
उपर्युक्त अभिधारणाओं से वर्नर, जिसने निम्नलिखित यौगिकों को कोबाल्ट (III) क्लोराइड की NH3 से अभिक्रिया करके बनाया, ने इन यौगिकों (उपसहसंयोजक) की संरचना की सफलतापूर्वक व्याख्या की जिसका वर्णन निम्नलिखित है -
- CoCl3.6NH3 नारंगी
- CoCl3.5NH3. H2O गुलाबी
- CoCl3.5NH3 बैंगनी
- CoCl3.4NH3 बैंगनी
- CoCl3.3NH3 हरा
CoCl3.4NH3 के विभिन्न रंगों का कारण यह है कि यह समपक्ष तथा विपक्ष समावयव के रूप में उपस्थित होता है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख वर्नर के उपसहसंयोजन यौगिकों के सिद्धांत के अनुसार विभिन्न कोबाल्ट (III) क्लोराइड-अमोनिया कॉम्प्लेक्सों की संरचनात्मक व्यवस्था को दर्शाता है। इसमें प्राथमिक संयोजकता (ऑक्सीकरण अवस्था) और द्वितीयक संयोजकता (उपसहसंयोजन संख्या) को दर्शाया गया है। उदाहरण के तौर पर, [Co(NH3)6]Cl3 (I), [Co(NH3)5Cl]Cl2 (II), [Co(NH3)4Cl2]Cl (III), और [Co(NH3)3Cl3] (IV) की संरचनाएं दिखाई गई हैं, जो ऑक्टाहेड्रल ज्यामिति को प्रदर्शित करती हैं।
In simple words: वर्नर का सिद्धांत बताता है कि धातुओं की दो प्रकार की संयोजकताएँ होती हैं- प्राथमिक (ऑक्सीकरण अवस्था, आयनित) और द्वितीयक (समन्वय संख्या, गैर-आयनित)। द्वितीयक संयोजकताएँ धातु के चारों ओर लिगेंड्स की विशिष्ट स्थानिक व्यवस्था को निर्धारित करती हैं, जिससे विभिन्न ज्यामिति (जैसे अष्टफलकीय, चतुष्फलकीय) बनती हैं।

🎯 Exam Tip: वर्नर के सिद्धांत की मूल अभिधारणाओं को स्पष्ट रूप से समझें और उन्हें विभिन्न संकुलों पर लागू करना सीखें। प्राथमिक और द्वितीयक संयोजकता के बीच अंतर और उनके द्वारा उत्पन्न होने वाली ज्यामितियों को उदाहरणों के साथ याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. FeSO4 विलयन तथा (NH4)2SO4 विलयन का 1 : 1 मोलर अनुपात में मिश्रण Fe2+ आयन का परीक्षण देता है, परन्तु CuSO4 व जलीय अमोनिया का 1 : 4 मोलर अनुपात में मिश्रण Cu2+ आयनों का परीक्षण नहीं देता। समझाइए क्यों?
Answer:
FeSO4 विलयन को (NH4)2SO4 विलयन में 1 : 1 मोलर अनुपात में मिश्रित करने पर एक द्विक-लवण प्राप्त होता है, जिसे मोहर लवण (FeSO4.(NH4)2SO4.6H2O) कहते हैं। यह निम्न प्रकार आयनित होता है -
FeSO4 (NH4)2SO4 .6H4O - F2+ + 2NH+4 + 3SO2-4 + 6H2O
विलयन में Fe2+ आयनों की उपस्थिति के कारण यह Fe2+ आयन का परीक्षण देता है। जब CuSO4 विलयन को जलीय अमोनिया में 1 : 4 मोलर अनुपात में मिश्रित किया जाता है, तो संकर लवण [Cu(NH4)4]SO4 प्राप्त होता है। यह विलयन में निम्न प्रकार आयनित होता है-
[Cu(NH3)4]SO4 - [Cu(NH3)4]2+ + SO2-4
संकर आयन [Cu(NH3)4]2+ पुनः आयनित होकर Cu2+ आयन नहीं देता है। इसलिए विलयन Cu2+ आयन का परीक्षण नहीं देता है।
In simple words: FeSO4 और (NH4)2SO4 का 1:1 मिश्रण एक द्विक-लवण (मोहर लवण) बनाता है जो पानी में पूरी तरह से आयनित होकर मुक्त Fe2+ आयन देता है, इसलिए परीक्षण सकारात्मक आता है। इसके विपरीत, CuSO4 और जलीय अमोनिया का मिश्रण एक संकुल यौगिक [Cu(NH3)4]SO4 बनाता है। यह संकुल अत्यधिक स्थिर होता है और पानी में Cu2+ आयन को मुक्त नहीं करता, बल्कि एक जटिल आयन [Cu(NH3)4]2+ बनाता है, इसलिए Cu2+ आयन का परीक्षण नकारात्मक आता है।

🎯 Exam Tip: द्विक-लवण और संकुल यौगिकों के बीच के मौलिक अंतर को समझें- द्विक-लवण पानी में पूरी तरह से अपने घटक आयनों में टूट जाते हैं, जबकि संकुल यौगिक पानी में जटिल आयन के रूप में अपनी पहचान बनाए रखते हैं।

 

Question 3. प्रत्येक के दो उदाहरण देते हुए निम्नलिखित को समझाइए-समन्वय समूह, लिगेण्ड, उपसहसंयोजन संख्या, उपसहसंयोजन बहुफलक, होमोलेप्टिक तथा हेटरोलेप्टिक । या उपसहसंयोजक (समन्वय) संख्या को एक उदाहरण द्वारा ज्ञात कीजिए।
Answer:
1. उपसहसंयोजन सत्ता या समन्वय समूह (Coordination entity) - केन्द्रीय धातु परमाणु अथवा आयन से किसी एक निश्चित संख्या में आबन्धित आयन अथवा अणु मिलकर एक उपसहसंयोजन सत्ता का निर्माण करते हैं। उदाहरणार्थ-
[CoCl3(NH3)3] एक उपसहसंयोजन सत्ता है। जिसमें कोबाल्ट आयन तीन अमोनिया अणुओं तथा तीन क्लोराइड आयनों से घिरा है। अन्य उदाहरण हैं -
[Ni(CO)4], [PtCl2(NH3)2], [Fe(CN)6]4-, [Co(NH3)6]3+ आदि ।
2. लिगेण्ड (Ligand) - उपसहसंयोजन सत्ता में केन्द्रीय परमाणु/आयन से परिबद्ध आयन अथवा अणु लिगेण्ड कहलाते हैं। ये सामान्य आयने हो सकते हैं; जैसे- CI-, F¯, CN¯, OH¯ छोटे अणु हो सकते हैं; जैसे- H2O या NH3, बड़े अणु हो सकते हैं; जैसे- H2NCH2CH2NH2 या N (CH2CH2NH2)3 अथवा वृहदाणु भी हो सकते हैं; जैसे- प्रोटीन ।
3. उपसहसंयोजन संख्या (Coordination number) - एक संकुले में धातु आयन की उपसहसंयोजन संख्या (CN) उससे आबन्धित लिगेण्डों के उन दाता परमाणुओं की संख्या के बराबर होती है, जो सीधे धातु आयन से जुड़े हों। उदाहरणार्थ - संकुल आयनों [PtCl6]2- तथा [Ni(NH3)4]2+ में Pt तथा Ni की उपसहसंयोजन संख्या क्रमशः 6 तथा 4 है। इसी प्रकार संकुल आयनों [Fe(C2O4)3]3- और [Co(en)3]3+ में Fe और Co दोनों की समन्वय संख्या 6 है क्योंकि C2O2-4 तथा en (एथेन-1, 2-डाइऐमीन) द्विदन्तुर लिगेण्ड हैं।
उपसहसंयोजन संख्या के सन्दर्भ में यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि केन्द्रीय परमाणु/आयन की उपसहसंयोजन संख्या केन्द्रीय परमाणु/आयन तथा लिगेण्ड के मध्य बने केवल \( \sigma \) (सिग्मा) आबन्धों की संख्या के आधार पर ही निर्धारित की जाती है। यदि लिगेण्ड तथा केन्द्रीय परमाणु/आयन के मध्य \( \pi \) (पाई) आबन्ध बने हों तो उन्हें नहीं गिना जाता।
4. उपसहसंयोजन बहुफलक (Coordination polyhedron) - केन्द्रीय परमाणु/आयन से सीधे जुड़े लिगेण्ड परमाणुओं की दिक्स्थान व्यवस्था (spacial arrangement) को उपसहसंयोजन बहुफलक कहते हैं। इनमें अष्टफलकीय, वर्ग समतलीय तथा चतुष्फलकीय मुख्य हैं। उदाहरणार्थ- [Co(NH3)6]3+ अष्टफलकीय है, [Ni(CO)4] चतुष्फलकीय है
तथा [PtCl4]2- वर्ग समतलीय है। चित्र-1 में विभिन्न उपसहसंयोजन बहुफलकों की आकृतियाँ दर्शायी गई हैं।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख विभिन्न उपसहसंयोजन बहुफलकों की ज्यामिति को दर्शाता है, जिसमें केंद्रीय परमाणु/आयन (M) को एकदंतुर लिगेंड (L) से घिरा हुआ दिखाया गया है। इसमें अष्टफलकीय, चतुष्फलकीय, वर्ग समतलीय, त्रिकोणीय द्विसमतलीय और वर्ग पिरामिडी जैसी संरचनाएँ शामिल हैं, जो केंद्रीय धातु के चारों ओर लिगेंड्स की स्थानिक व्यवस्था को दर्शाती हैं।

5. होमोलेप्टिक (Homoleptic) - संकुल जिनमें धातु परमाणु केवल एक प्रकार के दाता समूह (लिगेण्ड) से जुड़ा रहता है, होमोलेप्टिक संकुल कहलाते हैं। उदाहरणार्थ- [Co(NH3)6]3+ तथा [Fe(CN)6]4-.
6. हेटरोलेप्टिक (Heteroleptic) - संकुल जिनमें धातु परमाणु एक से अधिक प्रकार के दाता समूहों (लिगेण्डों) से जुड़ा रहता है, हेटरोलेप्टिक संकुल कहलाते हैं। उदाहरणार्थ - [Co(NH3)4CI2]+ तथा [Pt(NH3)5CI]3+.
In simple words: यह प्रश्न उपसहसंयोजन यौगिकों से संबंधित विभिन्न मूलभूत अवधारणाओं जैसे समन्वय सत्ता (केंद्रीय धातु और उससे जुड़े लिगेंड), लिगेंड (दाता अणु या आयन), उपसहसंयोजन संख्या (दाता परमाणुओं की संख्या), उपसहसंयोजन बहुफलक (स्पेशियल व्यवस्था), होमोलेप्टिक (एक प्रकार के लिगेंड) और हेटरोलेप्टिक (विभिन्न प्रकार के लिगेंड) को उदाहरणों सहित समझाता है।

🎯 Exam Tip: इन सभी शब्दावलियों की स्पष्ट परिभाषाओं और प्रत्येक के कम से कम दो उदाहरणों को याद रखना महत्वपूर्ण है। समन्वय संख्या की गणना करते समय द्विदंतुर लिगेंड के योगदान पर विशेष ध्यान दें, और \( \sigma \) आबन्धों की संख्या को ही गिनें।

 

Question 4. एकदन्तुर, द्विदन्तुर तथा उभयदन्तुर लिगेण्ड से क्या तात्पर्य है? प्रत्येक के दो उदाहरण दीजिए। उत्तर लिगेण्ड का एक परमाणु दाता परमाणु होता है जो केन्द्रीय धातु आयन को एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म दान करके उपसहसंयोजक आबन्ध बनाता है। जब एक लिगेण्ड धातु आयन से एक दाता परमाणु द्वारा परिबद्ध होता है; जैसे- CI-, H2O या NH3 तो लिगेण्ड एकदन्तुर (unidentate) कहलाता है। जब लिगेण्ड दो दाता परमाणुओं द्वारा परिबद्ध होता है; जैसे- H2NCH2CH2NH2 (एथेन-1, 2-डाइऐमीन) अथवा C2O2-4 (ऑक्सेलेट) तो ऐसा लिगेण्ड द्विदन्तुर कहलाता है।
वह लिगेण्ड जो दो भिन्न परमाणुओं द्वारा जुड़ सकता है, उसे उभयदन्ती संलग्नी या उभयदन्तुर लिगेण्ड कहते हैं। ऐसे लिगेण्ड के उदाहरण हैं- NO-2 तथा SCN- आयन । NO-2 आर्यन केन्द्रीय धातु परमाणु/आयन से या तो नाइट्रोजन द्वारा अथवा ऑक्सीजन द्वारा संयोजित हो सकता है। इसी प्रकार SCN- आयन सल्फर अथवा नाइट्रोजन परमाणु द्वारा संयोजित हो सकता है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख उभयदंतुर लिगेंड्स के दोहरे आबंधन मोड को दर्शाता है। नाइट्रेटो-N (M-NO) में नाइट्रोजन के माध्यम से और नाइट्रिटो-O (M-O-N=O) में ऑक्सीजन के माध्यम से आबंधन होता है। इसी तरह, थायोसायनेटो (M-SCN) में सल्फर के माध्यम से और आइसोथायोसायनेटो (M-NCS) में नाइट्रोजन के माध्यम से आबंधन होता है, जो लिगेंड की बहुसंयोजक प्रकृति को उजागर करता है।
In simple words: लिगेंड्स को उनके दाता परमाणुओं की संख्या के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है- एकदंतुर (एक दाता परमाणु, जैसे Cl-, H2O), द्विदंतुर (दो दाता परमाणु, जैसे एथेन-1,2-डाइऐमीन, ऑक्सेलेट), और उभयदंतुर (एक ही लिगेंड में दो भिन्न दाता परमाणु होते हैं, लेकिन एक समय में केवल एक ही आबंधित होता है, जैसे NO2-, SCN-)।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक प्रकार के लिगेंड (एकदंतुर, द्विदंतुर, उभयदंतुर) के उदाहरणों को अच्छी तरह याद रखें। उभयदंतुर लिगेंड की विशेषता यह है कि वे दो अलग-अलग परमाणुओं के माध्यम से आबंधित हो सकते हैं, जिससे बन्धनी समावयवता उत्पन्न हो सकती है।

 

Question 5. निम्नलिखित उपसहसंयोजन सत्ता में धातुओं के ऑक्सीकरण अंक का उल्लेख कीजिए -
1. [Co(H2O)(CN)(en)2]2+
2. [CoBr2(en)2]+
3. [PtCl4]2-
4. [K3[Fe(CN)6]
5. [Cr(NH3)3CI3].
Answer:
उत्तर माना कि दिये गये संकर आयनों में धातु के ऑक्सीकरण अंक x हैं। अतः
1. \( x + (0) + (-1) + 2 \times (0) = +2; \implies x = +3 \)
2. \( x + 2 \times (-1) + 2 \times (0) = +1; \implies x = +3 \)
3. \( x + 4 \times (-1) = - 2, \implies x = +2 \)
4. \( 3 \times (+1) + x + 6 \times (-1) = 0; \implies x = +3 \)
5. \( x + 3 \times (0) + 3 \times (-1) = 0; \implies x = +3 \)
In simple words: उपसहसंयोजन यौगिकों में केंद्रीय धातु आयन का ऑक्सीकरण अंक ज्ञात करने के लिए, आपको सभी लिगेंड्स के आवेशों को ध्यान में रखना होता है। उदासीन लिगेंड का आवेश शून्य होता है, जबकि आयनिक लिगेंड्स का आवेश उनके आयन के बराबर होता है। यौगिक के कुल आवेश को शून्य या दिए गए आयनिक आवेश के बराबर सेट करके धातु का ऑक्सीकरण अंक निकाला जाता है।

🎯 Exam Tip: लिगेंड्स के आवेशों को याद रखें (उदासीन, ऋणात्मक)। संकुल के कुल आवेश को समीकरण के दाहिने हाथ की ओर रखें। यह अभ्यास ऑक्सीकरण अंक की गणना में सटीकता के लिए आवश्यक है।

 

Question 6. IUPAC नियमों के आधार पर निम्नलिखित के लिए सूत्र लिखिए -
1. टेट्राहाइड्रॉक्सिडोजिंकेट (II)
2. पोटैशियम टेट्राक्लोरिडोपैलेडेट (II)
3. डाइऐम्मीनडाइक्लोरिडोप्लैटिनम (II)
4. पोटैशियम टेट्रासायनिडोनिकिलेट (II)
5. पेन्टाऐम्मीननाइट्रिटो-O-कोबाल्ट(III)
6. हेक्साऐम्मीनकोबाल्ट (III) सल्फेट
7. पोटैशियम ट्राइ (ऑक्सेलेटो) क्रोमेट (III)
8. हेक्साऐम्मीनप्लैटिनम (IV)
9. टेट्राब्रोमिडोक्यूप्प्रेट (II)
10. पेन्टाऐम्मीनंनाइट्रिटो-N-कोबाल्ट (III)
Answer:
1. [Zn(OH)4]2-
2. K2[PdCl4]
3. [Pt(NH3)2CI2]
4. K2[Ni(CN)4]
5. [Co(NH3)5(ONO)]2+
6. [Co(NH3)6]2(SO4)3
7. K3[Cr(C2O4)3]
8. [Pt(NH3)6]4+
9. [CuBr4]2-
10. [Co(NH3)5(NO2)]2+
In simple words: इस प्रश्न में दिए गए IUPAC नामों से उपसहसंयोजन यौगिकों के रासायनिक सूत्र लिखने हैं। इसमें लिगेंड्स के नाम और उनकी संख्या, केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था और संकुल के कुल आवेश को ध्यान में रखकर सही सूत्र बनाना शामिल है।

🎯 Exam Tip: IUPAC नाम से सूत्र लिखते समय, लिगेंड्स के प्रतीकों और उनके आवेशों को याद रखें। केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था का उपयोग करके संकुल पर कुल आवेश की गणना करें और फिर यदि आवश्यक हो, तो प्रति आयनों को जोड़ें।

 

Question 7. IUPAC नियमों के आधार पर निम्नलिखित के सुव्यवस्थित नाम लिखिए -
1. [Co(NH3)6]Cl3
2. [Pt(NH3)2CI(NH2CH3)]CI
3. [Ti(H2O)6]3+
4. [Co(NH3)4CI(NO2)]CI
5. [Mn(H2O)6]2+
6. [NiCl4]2-
7. [Ni(NH3)6]Cl2
8. [Co(en)3]3+
9. [Ni(CO)4]
Answer:
1. हेक्साऐम्मीनकोबाल्ट (III) क्लोराइड
2. डाइऐम्मीनक्लोरिडो (मेथिल ऐमीन) प्लैटिनम (II) क्लोराइड
3. हेक्साऐक्वाटाइटेनियम (III) आयन
4. टेट्राऐम्मीनक्लोरिडोनाइट्रिटो-N-कोबाल्ट (III) क्लोराईड
5. हेक्साऐक्वामैंगनीज (II) आयन
6. टेट्राक्लोरिडोनिकिलेट (II) आयन
7. हेक्साऐम्मीननिकिल (II) क्लोराइड
8. ट्रिस (एथेन-1,2-डाइऐमीन) कोबाल्ट (III) आयन
9. टेट्राकार्बोनिलनिकिल(0)।
In simple words: यह प्रश्न दिए गए उपसहसंयोजन यौगिकों के सूत्रों से उनके IUPAC नाम लिखने के बारे में है। इसमें लिगेंड्स के नाम, उनकी संख्या, केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था और संकुल के आयनिक/उदासीन प्रकृति को निर्धारित करना शामिल है।

🎯 Exam Tip: नामकरण करते समय लिगेंड्स के अल्फाबेटिक क्रम, उनके उपसर्गों (जैसे डाइ, ट्रिस), और केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था को रोमन अंकों में कोष्ठक में दर्शाना न भूलें। अंत में, यदि संकुल आयन है, तो "आयन" लिखें; यदि उदासीन है, तो नहीं।

 

Question 15. संयोजकता आबन्धसिद्धान्त के आधार पर निम्नलिखित उपसहसंयोजन सत्ता में आबन्ध की प्रकृति की विवेचना कीजिए –
Answer:
3. [CO(C2O4)3]3-
Co (Z = 27) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास : [Ar] 3d7 4s²
Co3+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास : [Ar] 3d6 4s0
C2O2-4 प्रबल क्षेत्रीय लिगेण्ड है जिसके कारण इलेक्ट्रॉनों का युग्मन हो जाता है।

Co(27)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)
Co³+\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)
[Co(C2O4)3]3-\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)
dsp² संकरण, अष्टफलकीय आकृति
अतः स्पष्ट है कि [Co(C2O4)3]³- प्रतिचुम्बकीय तथा अष्टफलकीय संकुल है।
4. [CoF6]3- – Co (27) : [Ar] 3d7 4s²
Co3+ : [Ar] 3d6 4s0
F- एक दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड होने के कारण इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं कर सकता है।
3d4s4p4d
[CoF6]3-\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)
sp³d² संकरण, अष्टफलकीय आकृति
अतः [CoF6]3- अनुचुम्बकीय तथा अष्टफलकीय संकुल है।
In simple words: [Co(C2O4)3]3- is diamagnetic and octahedral due to strong field ligand C2O4 2- causing electron pairing and d2sp3 hybridization. [CoF6]3- is paramagnetic and octahedral as F- is a weak field ligand, preventing electron pairing and leading to sp3d2 hybridization.

🎯 Exam Tip: Understanding the electronic configuration, ligand strength (strong vs. weak field), and resulting hybridization is key to determining magnetic properties and geometry.

 

Question 16. अष्टफलकीय क्रिस्टल क्षेत्र में d-कक्षकों के विपाटन को दर्शाने के लिए चित्र बनाइए।
Answer: उत्तर माना छह लिगेण्ड कार्तिक अक्षों के अनुदिश सममित रूप से स्थित हैं तथा धातु परमाणु मूल बिन्दु पर है। लिगेण्ड के निकट आने पर d-कक्षकों की ऊर्जा में मुक्त आयनों की तुलना में अपेक्षित वृद्धि होती है। जैसा कि गोलीय क्रिस्टल क्षेत्र की स्थिति में होता है। अक्षों के अनुदिश कक्षक (dz² तथा dx²- y²) dxy, dyz तथा dzx कक्षकों की तुलना में अधिक प्रबलता से प्रतिकर्षित होते हैं तथा इनमें अक्षों के मध्य निर्देशित पालियाँ (lobes) होती हैं। गोलीय क्रिस्टल क्षेत्र में औसत ऊर्जा की अपेक्षा dz² तथा dx²- y² कक्षक ऊर्जा में बढ़ जाते हैं तथा dxy, dyz, dzx, कक्षक ऊर्जा में न्यून हो जाते हैं।
अतः d- कक्षकों का समभ्रंश समूह (degenerate set) दो समूहों में विपाटित हो जाता है- निम्न ऊर्जा कक्षक समूह t2g तथा उच्च ऊर्जा कक्षक समूह eg ऊर्जा △o द्वारा पृथक्कृत होती हैं।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र अष्टफलकीय क्रिस्टल क्षेत्र में d-कक्षकों के ऊर्जा विपाटन को दर्शाता है। यह दिखाता है कि एक मुक्त धातु आयन में सभी d-कक्षक समान ऊर्जा पर होते हैं, फिर गोलीय क्रिस्टल क्षेत्र में उनकी औसत ऊर्जा बढ़ती है, और अंत में अष्टफलकीय क्षेत्र में वे t2g (कम ऊर्जा) और eg (उच्च ऊर्जा) में विभाजित हो जाते हैं, जिनके बीच का ऊर्जा अंतर डेल्टा-ओ (Δo) होता है।
In simple words: In an octahedral crystal field, the five d-orbitals split into two sets: lower energy t2g orbitals and higher energy eg orbitals, because ligands approach along the axes, causing stronger repulsion for orbitals aligned with those axes.

🎯 Exam Tip: Clearly labeling the energy levels (free ion, spherical field, split orbitals) and the energy gap (Δo) is crucial for full marks when drawing crystal field splitting diagrams.

 

Question 17. स्पेक्टमीरासायनिक श्रेणी क्या है? दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड तथा प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer: उत्तर
स्पेक्टमीरासायनिक श्रेणी (Spectrochemical Series) – क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन, △0 लिगेण्ड तथा धातु आयन पर विद्यमान आवेश से उत्पन्न क्षेत्र पर निर्भर करता है। कुछ लिगेण्ड प्रबल क्षेत्र उत्पन्न कर सकते हैं तथा ऐसी स्थिति में विपाटन अधिक होता है, जबकि अन्य दुर्बल क्षेत्र उत्पन्न करते हैं जिसके फलस्वरूप d-कक्षकों का विपाटन कम होता है। सामान्यतः लिगण्डों को उनके बढ़ती हुई क्षेत्र प्रबलता के क्रम में एक श्रेणी में निम्नानुसार व्यवस्थित किया जा सकता है -
I- < Br- < SCN- < Cl- < S2- < F- < OH- < C2O2-4 < H2O < NCS- < EDTA4- < NH3 < en < CN- < CO
इस प्रकार की श्रेणी स्पेक्ट्रमीरासायनिक श्रेणी (spectrochemical series) कहलाती है। यह विभिन्न लिगेण्डों के साथ बने संकुलों द्वारा प्रकाश के अवशोषण पर आधारित प्रायोगिक तथ्यों द्वारा निर्धारित श्रेणी है।
दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड तथा प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड के मध्य अन्तर (Difference between weak field ligand and strong field ligand) – वे लिगेण्ड जिनकी क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा (CFSE), △0 का मान कम होता है, दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड कहलाते हैं। दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड के कारण इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं होता तथा ये उच्च चक्रण संकुल बनाते हैं। वे लिगेण्ड जिनकी क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा, △0 का मान अधिक होता है, प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड कहलाते हैं। प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड के कारण इलेक्ट्रॉनों का युग्मन होता है तथा ये निम्न चक्रण संकुल बनाते हैं।
In simple words: The spectrochemical series ranks ligands by their ability to cause crystal field splitting; strong field ligands cause high splitting and electron pairing (low spin complexes), while weak field ligands cause low splitting and no electron pairing (high spin complexes).

🎯 Exam Tip: Memorizing the order of common ligands in the spectrochemical series is essential for predicting magnetic properties and complex stability.

 

Question 18. क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा क्या है? उपसहसंयोजन सत्ता में d-कक्षकों का वास्तविक विन्यास △, के मान के आधार पर कैसे निर्धारित किया जाता है?
Answer: उत्तर जब लिगेण्ड संक्रमण धातु आयन के निकट जाता है, तब d-कक्षक दो समुच्चयों में विपाटित हो जाते हैं, एक निम्न ऊर्जा के साथ तथा दूसरा उच्च ऊर्जा के साथ। कक्षकों के इन दो समुच्चयों के बीच ऊर्जा का अन्तर अष्टफलकीय क्षेत्र के लिए क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा, △0 कहलाता है।
यदि △0 < P (युग्मन ऊर्जा) तो चौथा इलेक्ट्रॉन किसी एक है, कक्षक में प्रवेश करता है तथा t32g e1g विन्यास देकर उच्च चक्रण संकुल बनाता है। ऐसे लिगेण्ड (जिनके लिए, △0 < P) दुर्बल क्षेत्र लिंगैण्ड कहलाते हैं।
यदि △0 > P तो चौथा इलेक्ट्रॉन किसी एक है t42g eg0 विन्यास देकर निम्न चक्रण संकुल बनाता है। ऐसे लिगेण्ड (जिनके लिए, △o > P) प्रबल क्षेत्र लिंगेण्ड कहलाते
In simple words: Crystal field splitting energy (Δo) is the energy difference between the split d-orbitals in a complex; it determines d-orbital configuration based on whether Δo is greater or lesser than the pairing energy (P), dictating high spin (weak field) or low spin (strong field) complexes.

🎯 Exam Tip: The comparison between crystal field splitting energy (Δo) and pairing energy (P) is a critical concept for predicting whether a complex will be high-spin or low-spin.

 

Question 19. [Cr(NH3)6] अनुचुम्बकीय है, जबकि [Ni(CN)4] प्रतिचुम्बकीय, समझाइए क्यों?
Answer: उत्तर
[Cr(NH3)6]3+ का निर्माण (Formation of [Cr(NH3)6]3+)
[Cr(NH3)6]3+ आयन में क्रोमियम की ऑक्सीकरण अवस्था +3 है। क्रोमियम का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d5 4s1 है। संकरण को निम्नलिखित आरेख में दर्शाया गया है –

3d4s4p
Cr परमाणु (Z = 24)
(सामान्य अवस्था में)
\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\ } \)\( \boxed{\ } \)\( \boxed{\ } \)
Cr3+\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\ } \)\( \boxed{\ } \)\( \boxed{\ } \)\( \boxed{\ } \)\( \boxed{\ } \)\( \boxed{\ } \)
[Cr(NH3)6]3+\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)
d2sp³ संकरण
Cr3+ आयन अमोनिया के छह अणुओं से छह इलेक्ट्रॉन युग्मों को स्थान देने के लिए छह रिक्त कक्षक उपलब्ध कराते हैं। परिणामस्वरूप संकुल [Cr(NH3)] 3+ में d2 sp³ संकरण होता है तथा यह अष्टफलकीय होता है। संकुल में तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति इसके अनुचुम्बकीय गुण को स्पष्ट करती हैं।
[Ni(CN)4]2- का निर्माण (Formation of [Ni(CN)4]2-)
[Ni(CN)4]2- में Ni की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है तथा इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d है। संकरण को निम्नवत् समझाया जा सकता है –
Ni2+ आयन के कक्षक
\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)\( \boxed{\uparrow} \)
Ni2+ आयन के dsp² संकरित कक्षक
\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\ } \)
dsp² संकरण
[Ni(CN)4]2- (निम्न चक्रण संकुल)
\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)\( \boxed{\uparrow\downarrow} \)
dsp² संकरण
प्रत्येक संकरित कक्षक सायनाइड आयन से एक इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करता है। अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की अनुपस्थिति [Ni(CN)4]2- के प्रतिचुम्बकीय व्यवहार की पुष्टि करती है।
In simple words: [Cr(NH3)6]3+ is paramagnetic because Cr3+ has three unpaired electrons after d2sp3 hybridization. [Ni(CN)4]2- is diamagnetic because the strong field ligand CN- causes pairing of all Ni2+ d-electrons, resulting in zero unpaired electrons and dsp2 hybridization.

🎯 Exam Tip: When explaining magnetic properties, always explicitly state the oxidation state of the central metal, the d-electron count, the ligand type (strong/weak field), electron pairing, hybridization, and the number of unpaired electrons.

 

Question 20. [Ni(H2O)6]2+ का विलयन हरा है, परन्तु [Ni(CN)4]2- का विलयन रंगहीन है। समझाइए।
Answer: उत्तर
[Ni(H2O)6]2+ विलयन में निकिल Ni2+ के रूप में स्थित रहता है तथा इसका 3d8 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होता है। इसमें दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, जो कि दुर्बल जल लिगेण्डों की उपस्थिति में युग्मित नहीं हो पाते हैं। अयुग्मित इलेक्ट्रॉन d-d संक्रमण प्रदर्शित करते हैं जिसमें Ni2+ लाल प्रकाश अवशोषित करता है। इसलिए, संकर पूरक हरा रंग प्रदर्शित करता है।
[Ni(CN)4]2- में भी निकिल Ni2+ आयन के रूप में रहता है। इसका भी 3d8 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होता है, जिसमें दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन पाये जाते हैं परन्तु प्रबल CN- लिगेण्ड युग्मित हो जाते हैं अतः अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की अनुपस्थिति में d-d संक्रमण नहीं होता है तथा विलयन रंगहीन रहता है।
In simple words: [Ni(H2O)6]2+ is green because H2O is a weak ligand, leaving two unpaired Ni2+ d-electrons that undergo d-d transitions by absorbing red light. [Ni(CN)4]2- is colorless because CN- is a strong ligand, causing all Ni2+ d-electrons to pair up, preventing d-d transitions and light absorption.

🎯 Exam Tip: The presence or absence of d-d transitions, which is determined by the number of unpaired electrons and ligand field strength, directly correlates with the color of coordination complexes.

 

Question 21. [Fe(CN)6]4- तथा [Fe(H2O)6]2+ के तनु विलयनों के रंग भिन्न होते हैं। क्यों?
Answer: उत्तर
दोनों जटिलों में आयरन की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है। Fe2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d6 है। तथा इसमें चार अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। [Fe(CN)6]4- में CN- लिगेण्ड्स प्रबल हैं तथा इलेक्ट्रॉनों को युग्मित कर देते हैं जबकि [Fe(H2O)6]2+ में H2O लिगेण्ड्स दुर्बल हैं तथा इलेक्ट्रॉनों को युग्मित करने में असमर्थ होते हैं। अतः अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की संख्या में अन्तर के कारण ये जटिल तनु विलयन में भिन्न-भिन्न रंग प्रदर्शित करते हैं।
In simple words: The color difference between [Fe(CN)6]4- and [Fe(H2O)6]2+ arises because CN- is a strong ligand that causes electron pairing in Fe2+, resulting in a low number of unpaired electrons, while H2O is a weak ligand that prevents pairing, leading to more unpaired electrons and different d-d transitions.

🎯 Exam Tip: Ligand field strength is a key factor influencing electron pairing and the resulting number of unpaired electrons, which in turn dictates the specific d-d electronic transitions and observed color of the complex.

 

Question 22. धातु काबनिलों में आबन्ध की प्रकृति की विवेचना कीजिए।
Answer: उत्तर
धातु कार्बोनिलों में आबन्ध की प्रकृति (Nature of Bonding in Metal Carbonyls) – धातु कार्बोनिलों में निम्नलिखित दो प्रकार के आबन्धन सम्मिलित होते हैं –
1. CO के कार्बन से एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म का धातु परमाणु के उचित रिक्त कक्षक में दान। यह एक अप्रत्यक्ष अतिव्यापन है तथा एक सिग्मा M - C आबन्ध बनाता है।
2. π-अतिव्यापन जिसमें पूरित धातु d-कक्षकों से इलेक्ट्रॉनों का CO के रिक्त प्रतिआबन्धन π* आण्विक कक्षकों में दान निहित होता है। इसके परिणामस्वरूप M → Cπ आबन्ध बनता है। धातु से लिगेण्ड का आबन्ध एक सहक्रियाशीलता का प्रभाव उत्पन्न करता है जो CO व धातु के मध्य आबन्ध को मजबूत बनाता है।
धातु कार्बोनिलों में आबन्धन निम्नवत् प्रदर्शित है

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र धातु कार्बोनिल में सहक्रियाशीलता आबन्धन (synergic bonding) को दर्शाता है। इसमें CO लिगेण्ड से धातु (M) को सिग्मा दान (M ← Cσ) और धातु से CO के π* एंटी-बॉन्डिंग ऑर्बिटल को पाई बैक-बॉन्डिंग (M → Cπ) के रूप में इलेक्ट्रॉनों का दान दिखाया गया है, जो धातु-कार्बन आबन्ध को मजबूत करता है।
In simple words: Metal carbonyls exhibit synergic bonding involving two main interactions: a sigma bond formed by the donation of a lone pair from CO to the metal, and a pi back-bond formed by the donation of electrons from filled metal d-orbitals to the empty antibonding π* orbitals of CO, strengthening the metal-carbon bond.

🎯 Exam Tip: The concept of synergic bonding (sigma donation and pi back-bonding) is fundamental to understanding the stability and unique properties of metal carbonyls.

 

Question 23. निम्नलिखित संकुलों में केन्द्रीय धातु आयन की ऑक्सीकरण अवस्था, d-कक्षकों का अधिग्रहण एवं उपसहसंयोजन संख्या बतलाइए – (i) K3[Co(C2O4)3]
(ii) cis-[CrCl2(en)2]Cl
(iii) (NH4)2[COF4]
(iv) [Mn(H2O)6]SO4

Answer: उत्तर

क्र. सं.संकर यौगिकऑक्सीकरण अवस्थाउप-सहसंयोजन संख्याकेन्द्रीय धातु आयनd-ऑर्बिटल समावेशन
(i)K3[Co(C2O4)3]3 × (+1) + x + 3 × (-2) = 0



\( \implies \) x = +3
6 (C2O42- is didentate)Co3+3d6, t2g6, eg0
(ii)Cis-[CrCl2 (en)2]Clx + 2 × (0) + 3 × (-1) = 0



\( \implies \) x = +3
6 (en is didentate)Cr3+3d3, t2g3
(iii)(NH4)2[CoF4]2 × (+1) + x + 4 × (-1) = 0



\( \implies \) x = +2
4Co2+3d7, e4g, t2g3
(iv)[Mn(H2O)6]SO4x + 6 × (0) - 2 = 0



\( \implies \) x = +2
6Mn2+3d5, t2g3 eg2
In simple words: This table systematically presents the oxidation state of the central metal ion, its coordination number, and the d-orbital electron configuration for various coordination complexes, which are essential characteristics for describing their properties.

🎯 Exam Tip: For each complex, correctly identify the charge of the ligands and the overall complex to accurately calculate the central metal's oxidation state, which is crucial for determining its d-electron count and subsequent orbital configurations.

 

Question 24. निम्नलिखित संकुलों के IUPAC नाम लिखिए तथा ऑक्सीकरण अवस्था, इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और उपसहसंयोजन संख्या दर्शाइए । संकुल का त्रिविम रसायन तथा चुम्बकीय आघूर्ण भी बतलाइए – (i) K[Cr(H2O)2(C2O4)2].3H2O
(ii) [CrCl3(Py)3]
(iii) [Co(NH3)5CI]CI2
(iv) Cs[FeC4]
(v) K4[Mn(CN)6]

Answer: उत्तर

क्र. सं.संकर यौगिक का IUPAC नामकेन्द्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्थासह-संयोजन संख्यात्रिविम रसायन (ज्यामिति)केन्द्रीय धातु आयनइलेक्ट्रॉनिक विन्यासn का मान तथा चुम्बकीय आघूर्ण
(i)पोटैशियम डाइएक्वाडाइ ऑक्जैलेटो क्रोमेट (III) हाइड्रेट-1 + x + 2 × (0)
+ 2 × (-2) = 0
\( \implies \) x = +3
6अष्टफलकीयCr3+3d3, t2g3 eg0n = 3,
\( \sqrt{3(3+2)} \)
= 3.87 BM
(ii)पेन्टाऐम्मीन-क्लोरिडो कोबाल्ट (III) क्लोराइडx + 5 × (0) + 3 × (-1) = 0
\( \implies \) x = +3
6अष्टफलकीयCo3+3d6, t2g6 eg0n = 0,
\( \sqrt{0(0+2)} \)
= 0 BM
(iii)ट्राइक्लोरिडोट्राइपिरिडीन क्रोमियम (III)x + 3 × (-1)
+ 3 × (0) = 0
\( \implies \) x = +3
6अष्टफलकीयCr3+3d3, t2g3 eg0n = 3,
\( \sqrt{3(3+2)} \)
= 3.87 BM
(iv)सीजियम टेट्राक्लोराइड फेरेट (III)+1 + x + 4 × (-1) = 0
\( \implies \) x = +3
4चतुष्फलकीयFe3+3d5, t2g3 eg2n = 5,
\( \sqrt{5(5+2)} \)
= 5.92 BM
(v)पोटैशियम हेक्सा-सायनो मैग्नेट (II)(+1) x 4 + x
+ 6 × (-1) = 0
\( \implies \) x = +2
6अष्टफलकीयMn2+3d5, t2g3 eg2n = 1,
\( \sqrt{1(1+2)} \)
= 1.73 BM
In simple words: This table provides a comprehensive analysis of various coordination complexes, detailing their IUPAC names, central metal oxidation states, coordination numbers, stereochemistry, electronic configurations, and calculated magnetic moments, offering a complete chemical profile for each compound.

🎯 Exam Tip: Accurately calculating the magnetic moment requires correctly determining the number of unpaired electrons (n) from the electronic configuration, which depends on the ligand field strength and the oxidation state of the metal.

 

Question 25. उपसहसंयोजन यौगिक के विलयन में स्थायित्व से आप क्या समझते हैं? संकुलों के स्थायित्व को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए।
Answer: उत्तर
विलयन में उपसहसंयोजन यौगिकों को स्थायित्व (Stability of Coordination Compounds in Solution) – अधिकांश संकुल अत्यधिक स्थायी होते हैं। धातु आयन तथा लिगेण्ड के बीच अन्योन्यक्रिया को लुईस अम्ल-क्षार अभिक्रिया के समान माना जाता है। यदि अन्योन्यक्रिया प्रबल होगी तो बनने वाला संकुल ऊष्मागतिकीय रूप से अत्यधिक स्थायी होगा। विलयन में संकुल के स्थायित्व का अर्थ है-साम्य अवस्था पर भाग ले रही दो स्पीशीज के मध्य संगुणन की मात्रा का मान। संगुणन के लिए साम्य स्थिरांक (स्थायित्व या विरचन) को परिमाण गुणात्मक रूप से स्थायित्व को प्रकट करता है। इस प्रकार यदि हम निम्न प्रकार की अभिक्रिया को लें
M + 4L \( \implies \) ML
K =
साम्य स्थिरांक का मान जितना अधिक होगा, ML4 की विलयन में मात्रा उतनी ही अधिक होगी। विलयन में मुक्त धातु आयनों का अस्तित्व नगण्य होता है। अतः M सामान्यतः विलायक अणुओं से घिरा होगा जो लिगेण्ड अणुओं, L से प्रतिस्पर्धा करेंगे तथा धीरे-धीरे उनसे प्रतिस्थापित हो जाएँगे।
संकुलों के स्थायित्व को प्रभावित करने वाले कारक
(Factors Affecting the Stability of Complexes)
संकुलों को स्थायित्व निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है -
I. केन्द्रीय आयन की प्रकृति (Nature of Central Ion)
(i) केन्द्रीय धातु आयन पर आवेश (Charge on central metal ion) – सामान्यतया केन्द्रीय आयन पर आवेश घनत्व जितना अधिक होता है, उसके संकुलों का स्थायित्व भी उतना ही अधिक होता है। दूसरे शब्दों में, किसी आयन पर आवेश अधिक तथा आकार छोटा होने पर अर्थात् आयन का आवेश/त्रिज्या अनुपात अधिक होने पर इसके संकुलों का स्थायित्व अधिक होता है। उदाहरणार्थ – Fe2+ आयन की तुलना में Fe3+ आयन उच्च आवेश वहन करते हैं, परन्तु इनके आकार समान होते हैं। इसलिए Fe2+ आयन की तुलना में Fe3+ पर आवेश घनत्व उच्च होता है, इसलिए Fe3+ आयन के संकुल अधिक स्थायी होते हैं।
Fe3+ + 6CN- \( \implies \) [Fe(CN)6]3-; ; K = 1.2 x 1031
Fe2+ + 6CN- \( \implies \) [Fe(CN)6]4-; K = 1.8 x 106
(ii) धातु आयन का आकार (Size of metal ion) – धातु आयन का आकार घटने पर संकुल का स्थायित्व बढ़ता है। यदि हम द्विसंयोजी धातु आयन पर विचार करें तो इनके संकुलों का स्थायित्व केन्द्रीय धातु आयन की आयनिक त्रिज्या घटने के साथ बढ़ता है।

आयनMn2+Fe2+Co2+Ni2+Cu2+Zn2+
आयनिक त्रिज्या (pm)918382786964
इसलिए स्थायित्व का क्रम इस प्रकार है –
Mn2+ < Fe2+ < Co2+ < Ni2+ < Cu2+ < Zn2+
यह क्रम इवैग विलयम का स्थायित्व क्रम कहलाता है।
(iii) धातु आयन की विद्युतऋणात्मकता या आवेश वितरण (Electronegativity or Charge distribution of metal ion) – संकुल आयन का स्थायित्व धातु आयन पर इलेक्ट्रॉन आवेश वितरण से भी सम्बन्धित होता है। आरलेण्ड, चैट तथा डेविस के अनुसार धातु आयनों को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
(क) वर्ग 'a' ग्राही (Class 'a' acceptors) – ये पूर्णतया विद्युतधनात्मक धातुएँ होती हैं तथा इनमें वर्ग 1 तथा 2 की धातुएँ सम्मिलित होती हैं। इनके अतिरिक्त आन्तरसंक्रमण धातुएँ तथा संक्रमण श्रेणी के पूर्व सदस्य (वर्ग 3 से 6 तक), जिनमें अक्रिय गैस विन्यास से कुछ इलेक्ट्रॉन अधिक होते हैं, भी इस वर्ग में सम्मिलित होते हैं। ये N, O तथा F दाता परमाणुओं से युक्त लिगेण्डों के साथ अत्यधिक स्थायी उपसहसंयोजक सत्ता बनाते हैं।
(ख) वर्ग ‘b' ग्राही (Class 'b' acceptors) – ये बहुत कम विद्युतधनात्मक होते हैं। इनमें भारी धातुएँ; जैसे- Rh, Pd, Ag, Ir, Pt, Au, Hg, Pb आदि, जिनमें भरित d-कक्षक होते हैं, सम्मिलित होती हैं। ये उन लिगेण्डों के साथ स्थायी संकुल बनाती हैं जिनमें N, O तथा F वर्ग के भारी सदस्य दाता परमाणु होते हैं।
(iv) कीलेट प्रभाव (Chelate effect) – स्थायित्व कीलेट वलयों के निर्माण पर भी निर्भर करता है। यदि L एक एकदन्तुर लिगेण्ड तथा L-L द्विदन्तुर लिगेण्ड हो तथा यदि L तथा L-L के दाता परमाणु एक ही तत्व के हों, तब L-L, L को प्रतिस्थापित कर देगा। कीलेशन के कारण यह स्थायित्व कीलेट प्रभाव कहलाता है। 5 तथा 6 सदस्यीय वलयों में कीलेट प्रभाव अधिकतम होता है। सामान्य रूप में वलय संकुल को अधिक स्थायित्व प्रदान करती है।
(v) वृहद्धक्रीय प्रभाव (Macrocyclic effect) – यदि एक बहुदन्तुर लिगेण्ड चक्रीय है तथा कोई अनुपयुक्त त्रिविम प्रभाव नहीं है तो बनने वाला संकुल बिना चक्रीय लिगेण्ड वाले सम्बन्धित संकुल की तुलना में अधिक स्थायी होगी। यह वृहद्धक्रीय प्रभाव कहलाता है।
II. लिगेण्ड की प्रकृति (Nature of Ligand)
(i) क्षारीय सामर्थ्य (Basic strength) – लिगेण्ड जितना अधिक क्षारीय होगा, उतनी ही अधिक सरलता उसे अपने एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म को दान देने में होगी, इसलिए इससे बनने वाले संकुल उतने ही अधिक स्थायी होंगे। अतः CN- तथा F- आयन एवं NH3, जो प्रबल क्षार हैं, अच्छे लिगेण्ड हैं। तथा अनेक स्थायी संकुल बनाते हैं।
(ii) लिगेण्डों का आकार तथा आवेश (Size and charge of ligands)-ऋणायनी लिगेण्डों के लिए आवेश उच्च तथा आकार छोटा होने पर बनने वाला संकुल अधिक स्थायी होता है। अतः F- अधिक स्थायी संकुल देता है, परन्तु Cl- आयन नहीं।
In simple words: The stability of coordination compounds in solution is determined by the equilibrium constant of their formation. Factors affecting stability include the central ion's charge, size, and electronegativity, as well as ligand properties like basicity, size, and the chelate or macrocyclic effect.

🎯 Exam Tip: When discussing complex stability, emphasize how a higher charge density on the metal ion, smaller ionic radius, and chelate/macrocyclic ligands generally lead to greater stability.

 

Question 26. कीलेट प्रभाव से क्या तात्पर्य है? एक उदाहरण दीजिए।
Answer: उत्तर जब कोई बहुदन्तुर लिगेण्ड दो या अधिक दाता परमाणुओं के द्वारा केन्द्रीय धातु आयन से अपने आप को इस प्रकार जोड़ता है कि केन्द्रीय आयन के साथ 5 या 6 सदस्यीय चक्र बनता है, तो यह प्रभाव कीलेट प्रभाव कहलाता है। कीलेट संकर यौगिक को स्थिरता प्रदान करते हैं; जैसे
\[ \text{CH2-H2N} \\ \quad\quad\quad \text{NH2-CH2} \\ \text{Cu} \\ \quad\quad\quad \text{NH2-CH2} \\ \text{CH2-H2N} \]^{2+} अर्थात् [PtCl2(en)]
In simple words: The chelate effect refers to the enhanced stability of a coordination complex formed when a multidentate ligand binds to a central metal ion through multiple donor atoms, creating stable ring structures, typically 5- or 6-membered rings.

🎯 Exam Tip: Always mention the formation of stable ring structures (usually 5- or 6-membered) and the increased stability as the key characteristics of the chelate effect.

 

Question 27. प्रत्येक का एक उदाहरण देते हुए निम्नलिखित में उपसहसंयोजन यौगिकों की भूमिका की संक्षिप्त विवेचना कीजिए
1. जैव प्रणालियाँ
2. औषध रसायन
3. विश्लेषणात्मक रसायन
4. धातुओं का निष्कर्षण/धातुकर्म ।
या जैविक निकायों में उपसहसंयोजक यौगिकों के महत्त्व का उल्लेख कीजिए।

Answer: उत्तर
1. जैव प्रणालियाँ (Biological Systems) – उपसहसंयोजन यौगिक जैव तन्त्र में बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। प्रकाश संश्लेषण के लिए उत्तरदायी वर्णक, क्लोरोफिल, मैग्नीशियम का उपसहसंयोजन यौगिक हैं। रक्त का लाल वर्णक हीमोग्लोबिन, जो कि ऑक्सीजन का वाहक है, आयरन का एक उपसहसंयोजन यौगिक है। विटामिन B12 सायनोकोबालऐमीन, प्रतिप्रणाली अरक्तता कारक (antipernicious anaemia factor), कोबाल्ट का एक उपसहसंयोजन यौगिक है। जैविक महत्त्व के अन्य धातु आयन युक्त उपसहसंयोजन यौगिक; जैसे- कार्बोक्सीपेप्टिडेज-A (carboxypeptidase A) तथा कार्बोनिक एनहाइड्रेज (carbonic anhydrase) (जैव प्रणाली के उत्प्रेरक) एन्जाइम हैं।
2. औषध रसायन (Medicinal Chemistry) – औषध रसायन में कीलेट चिकित्सा के उपयोग में अभिरुचि बढ़ रही है। इसका एक उदाहरण है-पौधे/जीव-जन्तु निकायों में विषैले अनुपात में विद्यमान धातुओं के द्वारा उत्पन्न समस्याओं का उपचार। इस प्रकार कॉपर तथा आयरन की अधिकता को D-पेनिसिलऐमीन तथा डेसफेरीऑक्सिम B लिगेण्डों के साथ उपसहसंयोजन यौगिक बनाकर दूर किया जाता है। EDTA को लेड की विषाक्तता के उपचार में प्रयुक्त किया जाता है। प्लैटिनम के कुछ उपसहसंयोजन यौगिक ट्यूमर वृद्धि को प्रभावी रूप से रोकते हैं। उदाहरण हैं- समपक्ष-प्लैटिन (cis-platin) तथा सम्बन्धित यौगिक
3. विश्लेषणात्मक रसायन (Analytical Chemistry) – गुणात्मक (qualitative) तथा मात्रात्मक (quantitative) रासायनिक विश्लेषणों में उपसहसंयोजन यौगिकों के अनेक उपयोग हैं। अनेक परिचित रंगीन अभिक्रियाएँ जिनमें धातु आयनों के साथ अनेक लिगेण्डों (विशेष रूप से कीलेट लिगेण्ड) की उपसहसंयोजन सत्ता बनने के कारण रंग उत्पन्न होता है, चिरसम्मत (classical) तथा यान्त्रिक (instrumental) विधियों द्वारा धातु आयनों की पहचान व उनके मात्रात्मक आकलन का आधार हैं। ऐसे अभिकर्मकों के उदाहरण हैं- EDTA, DMG (डाइमेथिल ग्लाइऑक्सिम), α- नाइट्रोसो- β-नैफ्थॉल आदि ।
4. धातुओं का निष्कर्षण/धातुकर्म (Extraction of the Metals/Metallurgy) – धातुओं की कुछ प्रमुख निष्कर्षण विधियों में; जैसे- सिल्वर तथा गोल्ड के लिए, संकुल विरचन का उपयोग होता, है। उदाहरणार्थ-ऑक्सीजन तथा जल की उपस्थिति में गोल्ड, सायनाइड आयन से संयोजित होकर जलीय विलयन में उपसहसंयोजन सत्ता, [Au(CN)2]- बनाता है। इस विलयन में जिंक मिलाकर गोल्ड को पृथक् किया जा सकता है।
In simple words: Coordination compounds are vital in biological systems (e.g., chlorophyll, hemoglobin), medicinal chemistry (e.g., chelate therapy for metal poisoning, cisplatin for cancer), analytical chemistry (e.g., metal ion detection with EDTA), and metallurgy (e.g., gold/silver extraction via complex formation).

🎯 Exam Tip: When listing applications, provide a specific example for each category (e.g., chlorophyll for biological, EDTA for medicinal, DMG for analytical, cyanide process for metallurgy) to demonstrate clear understanding.

 

Question 28. संकुल [Co(NH3)6]Cl2 से विलयन में कितने आयन उत्पन्न होंगे?
Answer: 3. 3 आयन
[Co(NH3)6]Cl2 \( \implies \) [Co(NH3)6]2+ + 2Cl-
In simple words: When [Co(NH3)6]Cl2 dissolves, it dissociates into one complex cation, [Co(NH3)6]2+, and two chloride anions, Cl-, yielding a total of three ions in solution.

🎯 Exam Tip: To determine the number of ions produced, correctly identify the complex ion (within the square brackets) and the counter ions outside the brackets, remembering that each counter ion dissociates separately.

 

Question 29. निम्नलिखित आयनों में से किसके चुम्बकीय आघूर्ण का मान सर्वाधिक होगा?
1. [Cr(H2O)6]3+
2. [Fe(H2O)6]2+
3. [Zn(H2O)6]2+

Answer: [Fe(H2O)6]2+ का सबसे अधिक चुम्बकीय आघूर्ण है क्योंकि
1. Cr3+ में 3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं, जबकि
2. में Fe2+ में चार अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं तथा
3. Zn2+ में कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं है।
In simple words: [Fe(H2O)6]2+ will have the highest magnetic moment because Fe2+ (d6) with a weak field ligand (H2O) will have 4 unpaired electrons, more than Cr3+ (d3) with 3 unpaired electrons or Zn2+ (d10) with 0 unpaired electrons.

🎯 Exam Tip: Magnetic moment is directly proportional to the number of unpaired electrons; higher unpaired electrons lead to a higher magnetic moment. Calculate the d-electron count and determine unpaired electrons for each option.

 

Question 30. K[Co(CO) 4] में कोबाल्ट (Co) की ऑक्सीकरण संख्या है –
Answer: 3. -1
[+1 + x + 4 × (0) = 0]


\( \implies \) x = - 1
In simple words: In the complex K[Co(CO)4], potassium has a +1 charge, and carbonyl (CO) is a neutral ligand, so the oxidation state of cobalt (Co) must be -1 to balance the overall charge.

🎯 Exam Tip: Remember that neutral ligands like CO do not contribute to the overall charge, so the oxidation state of the central metal is determined by the charges of the counter ion and any anionic ligands.

 

Question 31. निम्नलिखित में सर्वाधिक स्थायी संकुल है –
1. [Fe(H2O)6]2+
2. [Fe(NH3)6]3+
3. [Fe(C2O4)3]3-
4. [FeCl6]3-

Answer: 3. [Fe(C2O4)3]3-
(C2O2-4 एक कीलेटिंग लिगेण्ड है तथा संकर योगिक को स्थिरता प्रदान करता है।)
In simple words: [Fe(C2O4)3]3- is the most stable complex because oxalate (C2O42-) is a bidentate chelating ligand, and chelating ligands form more stable complexes compared to monodentate ligands due to the chelate effect.

🎯 Exam Tip: The chelate effect is a significant factor in complex stability; complexes with chelating ligands are generally more stable than those with an equivalent number of monodentate ligands.

 

Question 32. निम्नलिखित के लिए दृश्य प्रकाश में अवशोषण की तरंगदैर्ध्य का सही क्रम क्या होगा? [Ni(NO2)6]4-, [Ni(NH3)6]2+, [Ni(H2O)6]2+
Answer: उत्तर
स्पेक्ट्रोकेमिकल श्रेणी में दिये गये संकर यौगिकों में उपस्थित लिगेण्ड्स का क्रम निम्न प्रकार है –
H2O < NH3 < NO-3
इसलिए अवशोषित प्रकाश की तरंगदैर्ध्य का क्रम निम्न होगा - [Ni(H2O)6]2+ < [Ni(NH3)6]2+ < [Ni(NO2)6]4-
चूंकि अवलोकित तरंगदैर्ध्य अवशोषित तरंगदैर्ध्य की पूरक होती हैं, इसलिए अवशोषित प्रकाश की तरंगदैर्ध्य ( E = ) विपरीत क्रम में होगी अर्थात्
[Ni(NO2)6]4- < [Ni(NH3)6]2+ < [Ni(H2O)6]2+
In simple words: The order of absorbed wavelength for these complexes is based on the spectrochemical series, where stronger ligands (like NO2-) cause greater crystal field splitting and absorb shorter wavelengths, while weaker ligands (like H2O) cause less splitting and absorb longer wavelengths.

🎯 Exam Tip: Remember that stronger field ligands cause greater crystal field splitting (higher Δ), which corresponds to absorption of higher energy (shorter wavelength) light, while weak field ligands cause less splitting (lower Δ), absorbing lower energy (longer wavelength) light.

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

 

Question 1. [Co(en)2Cl2]Cl में Co की समन्वय संख्या है –
(i) 3
(ii) 4
(iii) 5
(iv) 6
Answer: (iv) 6
In simple words: In [Co(en)2Cl2]Cl, the central cobalt ion is coordinated by two bidentate 'en' (ethylenediamine) ligands and two monodentate chloride ligands, making its coordination number 2*2 + 2 = 6.

🎯 Exam Tip: When determining coordination number, remember that bidentate ligands like 'en' (ethylenediamine) occupy two coordination sites each.

 

Question 2. [Cr(H,O) Cl, J+ आयन में Cr की संयोजकता होती है –
(i) 3
(ii) 1
(iii) 6
(iv) 5
Answer: (iii) 6
In simple words: In the complex ion [Cr(H2O)5Cl]2+, the central chromium ion is bonded to five monodentate water ligands and one monodentate chloride ligand, resulting in a coordination number (valency in this context) of 5 + 1 = 6.

🎯 Exam Tip: For coordination complexes, "valency" often refers to the coordination number, which is the total number of ligand donor atoms directly bonded to the central metal atom.

 

Question 3. [Co(NH) CI]CI, में Co की ऑक्सीकरण अवस्था है –
(i) +1
(ii) +2
(iii) +3
(iv) +4
Answer: (iii) +3
In simple words: In [Co(NH3)5Cl]Cl2, ammonia (NH3) is neutral, and there are two chloride ions outside the bracket (each -1 charge) and one chloride ligand inside (-1 charge), so for a neutral complex, Cobalt must be in a +3 oxidation state to balance the total -3 charge from three chlorides.

🎯 Exam Tip: To find the oxidation state, always consider the charges of all ligands and counter ions, equating the sum to the overall charge of the complex (or zero if neutral).

 

Question 4. हैटरोलैप्टिक संकर है –
(i) [Fe(CN)6]4-
(ii) [Co(NH3)5SO4]+
(iii) [Hgl4]2-
(iv) [Co(NH3)6]3+

Answer: (ii) [Co(NH3)5SO4]+
In simple words: [Co(NH3)5SO4]+ is a heteroleptic complex because the central cobalt ion is bonded to more than one type of ligand, specifically ammonia (NH3) and sulfate (SO42-).

🎯 Exam Tip: A heteroleptic complex contains more than one type of ligand attached to the central metal ion, distinguishing it from homoleptic complexes which have only one type of ligand.

 

Question 5. निम्नलिखित में से कौन-सा आयन उपसहसंयोजन यौगिक नहीं बनाता है?
(i) Na+
(ii) Cr2+
(iii) Co+2
(iv) Cr3+
Answer: (i) Na+
In simple words: Na+ typically does not form coordination compounds because it is an alkali metal ion with a stable noble gas configuration, lacking accessible d-orbitals for coordination with ligands.

🎯 Exam Tip: Transition metal ions (like Cr2+, Co2+, Cr3+) readily form coordination compounds due to their empty or partially filled d-orbitals, which can accept electron pairs from ligands.

 

Question 6. कौन-सा धनायन अमोनिया के साथ ऐमीन संकुल नहीं बनाता है?
(i) Ag+
(ii) Al3+
(iii) Cd2+
(iv) Cu2+
Answer: (ii) Al3+
In simple words: Al3+ does not readily form amine complexes with ammonia because, as a main group element, it lacks accessible d-orbitals for strong coordination, unlike transition metal ions which effectively form such complexes.

🎯 Exam Tip: Ions of main group elements (like Al3+) generally have less tendency to form stable coordination complexes with ammonia compared to transition metal ions due to the absence of d-orbitals for ligand bonding.

 

Question 7. [Pt(NH3)2Cl2] यौगिक के त्रिविम समावयवियों की संख्या है-
(i) 1
(ii) 2
(iii) 4
(iv) 3
Answer: (ii) 2
In simple words: The compound [Pt(NH3)2Cl2] has two stereoisomers: a cis-isomer and a trans-isomer, due to its square planar geometry.

🎯 Exam Tip: For square planar complexes of the MA2B2 type, two geometric isomers (cis and trans) are possible, but no optical isomers exist due to the presence of a plane of symmetry.

 

Question 8. जटिल यौगिक [Fe(H2O)5NO]SO4 में Fe के अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्यष्ट है –
(i) 2
(ii) 3
(iii) 4
(iv) इनमें से कोई नहीं
Answer: (iv) इनमें से कोई नहीं
In simple words: In [Fe(H2O)5NO]SO4, the iron is in the +1 oxidation state (Fe+1) in this unique complex (Brown Ring Complex), with a d7 configuration and NO acting as a 3-electron donor, resulting in 3 unpaired electrons in a high-spin state.

🎯 Exam Tip: The Brown Ring complex ([Fe(H2O)5NO]2+) is an exception where NO acts as a 3-electron donor, and Fe is in +1 state. This leads to a d7 configuration on Fe, and a high spin complex gives 3 unpaired electrons (which isn't an option, so 'none of these' is correct). Be aware of unusual ligand behaviors.

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. लिगेण्ड क्या है? दो उदाहरण भी दीजिए।
Answer: उत्तर
वह आण्विक अथवा आयनिक स्पीशीज जो संकर यौगिक में केन्द्रीय धातु परमाणु अथवा आयन से स्थायी रूप से जुड़ी होती है, लिगेण्ड कहलाती है। उदाहरणार्थ – K4[Fe(CN)6] में CN- आयन लिगेण्ड है क्योंकि यह संकर में केन्द्रीय Fe2+ आयन से सीधे जुड़ा है। [Cu(NH3)4]2+ एक अन्य संकर आयन है जिसमें Cu2+ आयन चार NH3 लिगेण्ड से जुड़ा हुआ है।
In simple words: A ligand is an ion or molecule that binds to a central metal atom or ion to form a coordination complex, donating a pair of electrons to the metal, such as CN- in [Fe(CN)6]4- or NH3 in [Cu(NH3)4]2+.

🎯 Exam Tip: Always remember that ligands are Lewis bases (electron pair donors) and the central metal is a Lewis acid (electron pair acceptor).

 

Question 2. निम्नलिखित लिगेण्डों के नाम लिखिए – OH-, H2O, NH3, NH2, CH2, NH2-CH2NH2, CH3COO-, CN-, NCS-
Answer: उत्तर
- OH- \( \implies \) हाइड्रॉक्सो
- H2O \( \implies \) एक्वा
- NH3 \( \implies \) ऐम्मीन
- NH2 \( \implies \) एमिडो
- CH2NH2-CH2NH2 \( \implies \) एथीलिन डाइएमीन
- CH3COO- \( \implies \) एसीटेटो
- CN- \( \implies \) सायनो
- NCS- \( \implies \) थायोसायनेटो
In simple words: These are common ligands with their corresponding names: OH- (hydroxo), H2O (aqua), NH3 (ammine), NH2- (amido), H2NCH2CH2NH2 (ethylenediamine), CH3COO- (acetato), CN- (cyano), and NCS- (thiocyanato).

🎯 Exam Tip: Pay close attention to the -o ending for anionic ligands and the specific nomenclature for neutral ligands (e.g., ammine, aqua) to avoid common naming errors.

 

Question 3. निम्न में से धनायनिक, ऋणायनिक तथा उदासीन संकर यौगिकों को छाँटिए- K2[Hg I4], [Co(NH3)6]Cl3, K4[Fe(CN)6], [Ni(CO)4], [Pt(NH3),Cl2], [Fe(H2O)6]Cl3
Answer: उत्तर
- धनायनिक संकर यौगिक \( \implies \) [Co(NH3)6]Cl3, [Fe(H2O)6]Cl3
- ऋणायनिक संकर यौगिक \( \implies \) K2[Hg I4], K4 [Fe(CN)6]
- उदासीन संकर यौगिक \( \implies \) [Ni(CO)4], [Pt(NH3)2 Cl2]
In simple words: Coordination compounds are classified as cationic, anionic, or neutral based on their overall charge: [Co(NH3)6]Cl3 and [Fe(H2O)6]Cl3 are cationic, K2[HgI4] and K4[Fe(CN)6] are anionic, and [Ni(CO)4] and [Pt(NH3)2Cl2] are neutral.

🎯 Exam Tip: To classify a complex, identify the counter ions (if any) and their charges; if the complex part is in brackets and has a positive charge, it's cationic; negative, anionic; and if there are no counter ions, it's neutral.

 

Question 4. K2SO4. Al2(SO4)3. 24H2O के जलीय विलयन में उपस्थित आयनों के नाम लिखिए।
Answer: उत्तर
K2SO4. Al2(SO4)3. 24H2O के जलीय विलयन में K+, Al3+ व SO42- आयन उपस्थित होते हैं।
In simple words: When K2SO4.Al2(SO4)3.24H2O (potash alum) dissolves in water, it fully dissociates into its constituent ions: potassium ions (K+), aluminum ions (Al3+), and sulfate ions (SO42-).

🎯 Exam Tip: Double salts like alum completely dissociate into their simple constituent ions in aqueous solution, which is a key difference from coordination compounds.

 

Question 5. [Fe(C2O4)3]- में केन्द्रीय धातु आयन की उपसहसंयोजकता (समन्वय संख्या) ज्ञात कीजिए।
Answer: उत्तर
समन्वय संख्या = 6
In simple words: In [Fe(C2O4)3]-, the central iron ion has a coordination number of 6 because each oxalate ligand (C2O42-) is bidentate, meaning three such ligands bind through two donor atoms each (3 ligands * 2 donor atoms/ligand = 6).

🎯 Exam Tip: Always identify the denticity of each ligand to accurately calculate the coordination number; bidentate ligands contribute two to the coordination number, not one.

 

Question 6. संकर [Fe(CN)6]4- की आवेश संख्या ज्ञात कीजिए।
Answer: हल
[Fe(CN)6]4- की आवेश संख्या = Fe2+ आयन पर आवेश + (6 × CN- आयन पर आवेश) = 2+ 6 x (-1) = -4
In simple words: In the complex [Fe(CN)6]4-, the central iron ion is in the +2 oxidation state, and there are six cyanide ligands each with a -1 charge, leading to an overall complex charge of 2 + 6*(-1) = -4.

🎯 Exam Tip: To find the charge of a complex, sum the oxidation state of the central metal ion with the charges of all its ligands.

 

Question 7. [Cu(NH3)4] SO4 में Cu की ऑक्सीकरण संख्या ज्ञात कीजिए।
Answer: हल
माना Cu की ऑक्सीकरण संख्या x है । x + 4(0) + 1(-2) = 0
x - 2= 0
x = +2
In simple words: In [Cu(NH3)4]SO4, the ammonia ligands are neutral and the sulfate counter-ion has a -2 charge, so the oxidation state of copper (Cu) must be +2 to make the overall complex neutral.

🎯 Exam Tip: When calculating oxidation states, always remember that neutral ligands (like NH3) do not contribute to the charge, and the sum of charges must equal the overall complex charge (zero for a neutral compound).

 

Question 8. IUPAC नियमों का प्रयोग करते हुए निम्न के नाम लिखिए –
(i) K3[Co(C2O4)3]
(ii) [Ni(CO)4]
(iii) [Zn(NH3)4]Cl2
(iv) K4[Fe(CN)6]
(v) K3[Al(C2O4)3]
(vi) K[PtBr3 (NH3)]
(vii) Ag(NH3)2][Ag(CN)2]
(viii) K2 [HgI4]
(ix) Na[Ag(CN)2]
(x) [Cu(NH3)4]SO4
(xi) [Cr(Cl) H2O)5] Cl2
(xii) [Co(CO3)(NH3)5] Cl
(xiii) K3[Fe(CN)5 NO]· 2H2O
(xiv) [Pt(NH3)6]Cl4
(xv) K2[Ni(CN)4]
(xvi) K3[Cr(C2O4)3]
(xvii) [Co(NH3)4]Cl(SO4)
(xviii) Ca2 [Fe(CN)6]
(xix) K3[Co(NO3)6]
(xx) [Fe(H2O)6]Cl3
(xxi) [Co(NH3)4 (H2O)2Cl3
(xxii) Fe4 [Fe(CN)6]3

Answer: उत्तर
(i) पोटैशियम ट्राइ (ऑक्सैलेटो) कोबाल्ट (III)
(ii) टेट्राकार्बोनिलनिकिल (0)
(iii) टेट्राऐम्मीन जिंक (II) क्लोराइड
(iv) पोटैशियम हेक्सा सायनो फैरेट (II)
(v) पोटैशियम ट्राइ ऑक्सेलेटो ऐलुमिनेट (III)
(vi) पोटैशियम ऐम्मीन ट्राइ ब्रोमाइडो प्लैटिनेट (III)
(vii) डाइऐम्मीन सिल्वर (I) डाइसायनो अर्जेन्टेट (I)
(viii) पोटैशियम टेट्रा आयोडो मरक्यूरेट (II)
(ix) सोडियम डाइ सायनो अर्जेन्टेट (I)
(x) टेट्राऐम्मीन कॉपर (II) सल्फेट
(xi) पेन्टा ऐक्वा क्लोरिडो क्रोमियम (III) क्लोराइड
(xii) पेन्टाऐम्मीन कार्बोनेटो कोबाल्ट (III) क्लोराइड
(xiii) पोटैशियम पेन्टासायनोनाइट्रोसिलफैरेट (II) डाइहाइड्रेट
(xiv) हेक्सा ऐम्मीन प्लेटिनम (IV) क्लोराइड
(xv) पोटैशियम टेट्रासायनो निकिलेट (II)
(xvi) पोटैशियम ट्राइ (ऑक्सैलेटो) क्रोमेट (III)
(xvii) टेट्राऐम्मीन क्लोराइडो कोबाल्ट (III) सल्फेट
(xviii) कैल्सियम हेक्सा सायनोफैरेट (II)
(xix) पोटैशियम ट्राइहेक्सा नाइट्रोकोबाल्ट (II)
(xx) हेक्साऐक्वाफैरेट (V) ट्राइक्लोराइड
(xxi) टेट्राऐम्मीनडाइऐक्वा कोबाल्ट (III) क्लोराइड
(xxii) आयरन (III) हेक्सासायनिडोफरेट (II)
In simple words: This list provides the systematic IUPAC names for a diverse set of coordination compounds, accurately reflecting their central metal, ligands, oxidation states, and overall complex structure as per chemical nomenclature rules.

🎯 Exam Tip: For IUPAC naming, remember to name ligands alphabetically before the metal, specify the metal's oxidation state with Roman numerals, and use appropriate prefixes (di-, tri-, tetra-, or bis-, tris-, tetrakis- for complex ligands).

 

Question 9. निम्न समावयवियों के युग्मों के द्वारा कौन-सी समावयवता प्रदर्शित होती है?
1. [Pt(OH)2 (NH3)4]SO4 तथा Pt(SO4)(NH3)4](OH)2
2. [Cu(NH3)4] [PtCl4) तथा [Pt(NH3)4] [Cucl4]

Answer: उत्तर
1. आयनन समावयवता,
2. उपसहसंयोजन समावयवता।
In simple words: The first pair, [Pt(OH)2(NH3)4]SO4 and [Pt(SO4)(NH3)4](OH)2, exhibits ionization isomerism, where the counter-ion and a ligand exchange places. The second pair, [Cu(NH3)4][PtCl4] and [Pt(NH3)4][CuCl4], shows coordination isomerism, where ligands are exchanged between two complex ions within the same compound.

🎯 Exam Tip: Ionization isomers differ in the ion that acts as a ligand versus the counter-ion, while coordination isomers involve the exchange of ligands between a cationic and an anionic complex within the same compound.

 

Question 10. निम्नलिखित में से किस आयन का चुम्बकीय आघूर्ण सबसे अधिक है?
1. [Cr(H2O)6]3+
2. [Fe(H2O)6]2+
3. [Zn(H2O)6]2+

Answer: 2. [Fe(H2O)6]2+ का सबसे अधिक चुम्बकीय आघूर्ण है क्योंकि Cr3+ में 3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं, जबकि Zn2+ में कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं है। यौगिक (ii) में Fe2+ में चार अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं।
In simple words: [Fe(H2O)6]2+ has the highest magnetic moment because Fe2+ (d6) with weak field H2O ligands has 4 unpaired electrons, more than Cr3+ (d3, 3 unpaired electrons) or Zn2+ (d10, 0 unpaired electrons).

🎯 Exam Tip: The magnitude of the magnetic moment is directly related to the number of unpaired electrons (n); calculate n for each metal ion in its complex environment to find the highest value.

 

Question 11. संयोजकता बन्ध सिद्धान्त के अनुसार निम्न उपसहसंयोजन स्पीशीज में बन्ध की प्रकृति बताइए
1. [Fe(CN)6]4-
2. [FeF6]3-
3. [Co(C2O4)3]3-
4. [COF6]3-

Answer: उत्तर-
(i) d2 sp³, अष्टफलकीय, प्रतिचुम्बकीय,
(ii) sp3 d², अष्टफलकीय, अनुचुम्बकीय,
(iii) d2 sp³, अष्टफलकीय, प्रतिचुम्बकीय,
(iv) sp3 d², अष्टफलकीय, अनुचुम्बकीय ।
In simple words: [Fe(CN)6]4- and [Co(C2O4)3]3- are diamagnetic octahedral complexes with d2sp3 hybridization, while [FeF6]3- and [CoF6]3- are paramagnetic octahedral complexes with sp3d2 hybridization.

🎯 Exam Tip: Ligand field strength dictates electron pairing and hybridization; strong field ligands (like CN-, C2O42-) promote d2sp3 and diamagnetism, whereas weak field ligands (like F-) lead to sp3d2 and paramagnetism.

 

Question 12. VBT के आधार पर [FeF6]3- संकुल आयन की संरचना एवं चुम्बकीय प्रकृति बताइए।
Answer: उत्तर
sp3 d2 प्रकार का संकरण, अष्टफलकीय संरचना, अनुचुम्बकीय प्रकृति
In simple words: Based on VBT, [FeF6]3- undergoes sp3d2 hybridization, resulting in an octahedral structure. Since F- is a weak field ligand, it does not cause electron pairing in Fe3+ (d5), making the complex paramagnetic with 5 unpaired electrons.

🎯 Exam Tip: When using VBT, remember to identify the oxidation state of the metal, its d-electron configuration, and the ligand's field strength to predict hybridization, geometry, and magnetic properties accurately.

 

Question 13. प्रभावी परमाणु क्रमांक क्या है? उदाहरण द्वारा समझाइए। उत्तर प्रभावी परमाणु क्रमांक = परमाणु क्रमांक + ग्रहण किये गये इलेक्ट्रॉनों की संख्या – त्याग किए गए इलेक्ट्रॉनों की संख्या ।
Answer: उत्तर प्रभावी परमाणु क्रमांक = परमाणु क्रमांक + ग्रहण किये गये इलेक्ट्रॉनों की संख्या - त्याग किए गए इलेक्ट्रॉनों की संख्या।
In simple words: Effective Atomic Number (EAN) is the total number of electrons around the central metal ion in a complex, calculated as the atomic number minus the electrons lost to form the ion, plus the electrons gained from ligands.

🎯 Exam Tip: EAN is calculated as Atomic Number - Oxidation State + (2 × Coordination Number), where the coordination number represents the total number of electrons donated by ligands.

 

Question 14. [Fe(CN)6]3- में आयरन का प्रभावी परमाणु क्रमांक ज्ञात कीजिए। (Fe का परमाणु क्रमांक = 26)
Answer: उत्तर
[Fe(CN)6]3- में आयरन का प्रभावी परमाणु क्रमांक = [26- 3 + 2(6)] = 35
In simple words: For [Fe(CN)6]3-, iron (atomic number 26) is in the +3 oxidation state, meaning it has lost 3 electrons, and it accepts 12 electrons from six cyanide ligands (each donating 2), resulting in an Effective Atomic Number (EAN) of 26 - 3 + 12 = 35.

🎯 Exam Tip: Always correctly determine the oxidation state of the central metal first, as it affects the number of electrons to subtract before adding those donated by ligands to calculate EAN.

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. आवेश के आधार पर लिगेण्डों को किस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है? उदाहरण देते हुए समझाइए । उत्तर आवेश के आधार पर लिगेण्ड निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं –
Answer: उत्तर
आवेश के आधार पर लिगेण्ड निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं –
1. धनात्मक लिगेण्ड – धनावेश वाले लिगेण्ड धनात्मक लिगेण्ड कहलाते हैं। ये संकर में बहुत कम पाये जाते हैं। उदाहरणार्थ – NO+, NH2 NH+3 आदि ।
2. ऋणात्मक लिगेण्ड – ऋणावेश वाले लिगेण्ड ऋणात्मक लिगेण्ड कहलाते हैं। ये ऋणात्मक स्पीशीज होती हैं जिनमें एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों के एकाकी युग्म पाये जाते हैं। उदाहरणार्थ – F-, Cl-, Br-, CN- आदि ।
3. उदासीन लिगेण्ड – ऐसे लिगेण्डों पर कोई आवेश नहीं होती है और ये प्रायः आण्विक स्पीशीज होती हैं जिनमें एक या एक से अधिक इलेक्ट्रॉनों के एकाकी युग्म उपस्थित रहते हैं। उदाहरणार्थ – H2O, NH3, CO, NO आदि ।
In simple words: Ligands are classified by their charge as positive (e.g., NO+), negative (e.g., Cl-, CN-), or neutral (e.g., H2O, NH3), depending on the net charge they carry when coordinating to a metal ion.

🎯 Exam Tip: When classifying ligands by charge, remember the common examples and their typical charge states, as this is fundamental for determining the oxidation state of the central metal in a complex.

 

Question 2. संकर यौगिकों में निम्न में से प्रत्येक को उदाहरण सहित समझाइए-
या
(i) आयनन समावयवता तथा
(ii) हाइड्रेट समावयवता।
उपसहसंयोजन यौगिकों की संरचना समावयवता की व्याख्या उचित उदाहरण के साथ कीजिए।
Answer:
(i) आयनन समावयवता - जब सहसंयोजक यौगिकों के अणुसूत्र समान होते हैं परन्तु वह भिन्न आयनन व्यवहार प्रदर्शित करते हैं तथा विलयन में भिन्न आयन प्रदान करते हैं तो इसे आयनन समावयवता कहते हैं। आयनन समावयवता, उपसहसंयोजन तथा आयनन मण्डल के मध्य समूहों के विनिमय के कारण होती है।
उदाहरणार्थ - Co(NH3)5 (Br) (SO4) सूत्र वाले दो भिन्न यौगिक इस प्रकार हैं -
\[ \text{[CoBr(NH3)5]SO4} \quad \text{और} \quad \text{[Co(SO4)(NH3)5]Br} \]
पेन्टाऐम्मीनब्रोमोकोबाल्ट (III) सल्फेट
(लाल बैंगनी)
पेन्टाऐम्मीनसल्फेटो कोबाल्ट (III)
ब्रोमाइड (लाल)
(ii) हाइड्रेट समावयवता - जल के अणु लिगण्ड की भाँति तथा क्रिस्टलीकरण जल दोनों की भाँति व्यवहार प्रदर्शित कर सकते हैं। जब दो योगिक इस प्रकार की भिन्नता प्रदर्शित करते हैं तो उन्हें हाइड्रेट समावयवी कहते हैं तथा इस घटना को हाइड्रेट समावयवता कहते हैं। उदाहरणार्थ - CrCl3 . 6H2O सूत्र के निम्नलिखित तीन हाइड्रेट समावयवी ज्ञात हैं -
• [Cr(H2O)6]Cl3 हेक्साऐक्वाक्रोमियम (III) क्लोराइड (बैंगनी)
• [Cr(H2O)5Cl]Cl2 . H2O पेन्टाऐक्वाक्लोरिडोक्रोमियम (III) क्लोराइड मोनोहाइड्रेट (नीला-हरा)
• [Cr(H2O)4Cl2]Cl . 2H2O टेट्राऐक्वाडाइक्लोरिडोक्रोमियम (III) क्लोराइड डाइहाइड्रेट (गाढ़ा-हरा)
In simple words: आयनन समावयवता तब होती है जब समान सूत्र वाले संकुल जल में घुलने पर अलग-अलग आयन देते हैं। हाइड्रेट समावयवता में, जल के अणु संकुल में लिगेण्ड या क्रिस्टलन जल दोनों के रूप में कार्य कर सकते हैं, जिससे समान सूत्र वाले अलग-अलग यौगिक बनते हैं।

🎯 Exam Tip: समावयवता के प्रकारों को उदाहरणों सहित स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है, खासकर उनके सूत्र और जल में व्यवहार को दिखाते हुए।

 

Question 3. निम्न संकर यौगिकों के सन्दर्भ में ज्यामितीय समावयवता को समझाइए
या
(i) [PtCl2(NH3)2]
(ii) [Co(NH3)2Cl2] तथा
(iii) [Pt(gly)2]
सिस समावयवता और ट्रांस समावयवता की परिभाषा बताइए।
Answer:
जब समान समूह केन्द्रीय धातु परमाणु के एक ही ओर स्थित होते हैं तो उसे सिस समावयवी तथा जब विपरीत ओर स्थित होते हैं तो उसे ट्रांस समावयवी कहते हैं।
(i) [PtCl2(NH3)2] के सिस एवं ट्रांस रूप नीचे चित्र में दर्शाए गए हैं -

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र [PtCl2(NH3)2] यौगिक के सिस और ट्रांस समावयवों को दर्शाता है। सिस रूप में, समान लिगेण्ड (NH3 और Cl) धातु परमाणु प्लैटिनम के एक ही तरफ स्थित होते हैं, जबकि ट्रांस रूप में वे विपरीत दिशाओं में स्थित होते हैं।
(ii) [Co(NH3)4]Cl2 के सिस एवं ट्रांस रूप नीचे चित्र में दर्शाए गए हैं

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र [Co(NH3)4]Cl2 यौगिक के सिस और ट्रांस समावयवों को दर्शाता है। सिस रूप में, समान लिगेण्ड (NH3 और Cl) धातु परमाणु कोबाल्ट के एक ही तरफ स्थित होते हैं, जबकि ट्रांस रूप में वे विपरीत दिशाओं में स्थित होते हैं।
(iii) [Pt(gly)2] के सिस एवं ट्रांस रूप नीचे चित्र में दर्शाए गए हैं -

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र [Pt(gly)2] यौगिक के सिस और ट्रांस समावयवों को दर्शाता है, जहाँ gly ग्लाइसिनेट लिगेण्ड है। सिस रूप में, ग्लाइसिनेट के समान दाता परमाणु प्लैटिनम के एक ही तरफ होते हैं, जबकि ट्रांस रूप में वे विपरीत दिशाओं में होते हैं।
In simple words: ज्यामितीय समावयवता में, लिगेण्ड्स धातु के चारों ओर अलग-अलग स्थानिक व्यवस्थाएँ बनाते हैं। सिस-समावयवी में, समान लिगेण्ड एक ही तरफ होते हैं, जबकि ट्रांस-समावयवी में, वे एक-दूसरे के विपरीत होते हैं।

🎯 Exam Tip: सिस-ट्रांस समावयवों की संरचनाओं को स्पष्ट रूप से बनाना और उनके बीच के अंतर को समझाना महत्वपूर्ण है, खासकर प्लैटिनम और कोबाल्ट जैसे धातु परिसरों के लिए।

 

Question 4. द्विक-लवण क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
Answer: ये वे आण्विक अथवा योगात्मक यौगिक हैं जो कि ठोस अवस्था में रहते हैं परन्तु जल में घोलने पर ये अपने घटक आयनों में वियोजित हो जाते हैं। इस प्रकार घटक विलयन में अपनी पहचान खो देते हैं। उदाहरणार्थ-
(i) पोटाश एलम (Potash alum), K2SO4 . Al2(SO4)3 . 24H2O द्विक-लवण है। इसे पोटैशियम सल्फेट तथा ऐलुमिनियम सल्फेट के संतृप्त विलयनों को मिलाकर तथा तत्पश्चात् मिश्रण का वाष्पीकरण करके प्राप्त किया जाता है।
\[ \text{K2SO4} + \text{Al2(SO4)3} + \text{24H2O} \longrightarrow \text{K2SO4} . \text{Al2(SO4)3} . \text{24H2O} \]
जब पोटाश एलम को जल में घोला जाता है तो यह पहचान खोकर अपने आयनों में वियोजित हो जाता है।
\[ \text{K2SO4} . \text{Al2(SO4)} . \text{24H2O} \longrightarrow \text{2K+} + \text{2Al3+} + \text{4SO4-2} + \text{24H2O} \]
पोटाश एलम का जलीय विलयन K+, Al3+ तथा SO4-2 आयनों का परीक्षण देता है। अतः यह द्विक लवण है।
(ii) मोहर लवण (Mohr's salt) FeSO4 . (NH4)2SO4 . 6H2O भी एक द्विक-लवण है तथा इसे फेरस सल्फेट तथा अमोनियम सल्फेट के संतृप्त विलयनों को मिश्रित करके तथा मिश्रण को ठण्डा करके प्राप्त किया जाता है।
\[ \text{FeSO4} + \text{(NH4)2 SO4} . \text{6H2O} \longrightarrow \text{FeSO4} . \text{(NH4)2 SO4} . \text{6H2O} \]
जब मोहर लवण को जल में घोला जाता है तो वह अपने आयनों में निम्न प्रकार वियोजित होता है ” तथा उसकी पहचान समाप्त हो जाती है -
\[ \text{FeSO4} \text{(NH4)2SO4} . \text{6H2O} \longrightarrow \text{Fe2+} + \text{2NH4+} + \text{2SO4-2} + \text{6H2O} \]
इसका जलीय विलयन Fe2+, NH4+ तथा SO4-2 आयनों का परीक्षण देता है है। अतः मोहर लवण एक द्विक-लवण है।
In simple words: द्विक-लवण वे आण्विक यौगिक होते हैं जो ठोस अवस्था में स्थिर रहते हैं लेकिन जल में घुलने पर पूरी तरह से अपने घटक आयनों में टूट जाते हैं और अपनी पहचान खो देते हैं। पोटाश एलम और मोहर लवण इसके सामान्य उदाहरण हैं।

🎯 Exam Tip: द्विक-लवण की परिभाषा और उनके आयनीकरण को उदाहरणों के साथ याद रखना, विशेष रूप से पोटाश एलम और मोहर लवण के लिए, उच्च अंक प्राप्त करने में सहायक होगा।

 

Question 5. FeSO4 विलयन को (NH4)2SO4 विलयन के साथ 1 : 1 मोलर अनुपात में मिश्रित करने पर विलयन Fe2+ आयन का परीक्षण देता है, परन्तु CuSO4 विलयन को जलीय अमोनिया में 1 : 4मोलर अनुपात में मिश्रित करने पर विलयन Cu2+ आयन का परीक्षण नहीं देता है। समझाइए क्यों?
Answer:
FeSO4 विलयन को (NH4)2SO4 विलयन में 1 : 1 मोलर अनुपात में मिश्रित करने पर एक द्विक-लवण प्राप्त होता है, जिसे मोहर लवण (FeSO4.(NH4)2SO4.6H2O) कहते हैं। यह निम्न प्रकार आयनित होता है -
\[ \text{(FeSO4.(NH4)2SO4.6H2O)} \longrightarrow \text{Fe2+} + \text{2NH4+} + \text{3SO4-2} + \text{6H2O} \]
विलयन में Fe2+ आयनों की उपस्थिति के कारण यह Fe2+ आयन का परीक्षण देता है।
जब CuSO4 विलयन को जलीय अमोनिया में 1 : 4 मोलर अनुपात में मिश्रित किया जाता है, तो संकर लवण [Cu(NH3)4]SO4 प्राप्त होता है। यह विलयन में निम्न प्रकार आयनित होता है -
\[ \text{[Cu(NH3)4]SO4} \longrightarrow \text{[Cu(NH3)4]2+} + \text{SO4-2} \]
संकर आयन [Cu(NH3)4]2+ पुनः आयनित होकर Cu2+ आयन नहीं देता है। इसलिए विलयन Cu2+ आयन का परीक्षण नहीं देता है।
In simple words: FeSO4 और (NH4)2SO4 का मिश्रण मोहर लवण बनाता है, जो जल में Fe2+ आयन देता है। जबकि CuSO4 और अमोनिया का मिश्रण एक संकुल [Cu(NH3)4]SO4 बनाता है, जो जल में Cu2+ आयन नहीं देता क्योंकि Cu2+ आयन संकुल के अंदर बंधा रहता है।

🎯 Exam Tip: द्विक-लवण और संकुल यौगिकों के जल में आयनीकरण व्यवहार के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही अंतर आयनों के परीक्षण में भिन्नता का कारण है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त (VBT) की मुख्य अवधारणाएँ क्या हैं? निकिल कार्बोनिल आयन की संरचना तथा चुम्बकीय व्यवहार को इस सिद्धान्त के आधार पर समझाइए।
Answer: संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त - इस सिद्धान्त का प्रतिपादन लाइनस पॉलिंग (Linus Pauling) ने किया था। इस सिद्धान्त के अनुसार, संकर का निर्माण, एक लूइस बेस (लिगेण्ड) तथा एक लूइस अम्ल (धातु या धातु आयन) के मध्य हुई अभिक्रिया है जिसके परिणामस्वरूप लिगेण्ड तथा धातु के मध्य उपसहसंयोजन अथवा दाता आबन्ध का निर्माण होता है।
संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त की अवधारणाएँ - संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त की मुख्य अवधारणाएँ निम्नलिखित हैं -
(i) केन्द्रीय धातु परमाणु अथवा आयन में कई रिक्त कक्षक (उनके उपसहसंयोजन संख्या के बराबर) उपस्थित होते हैं जिनमें लिगेण्ड द्वारा दिये गये इलेक्ट्रॉन समावेशित होते हैं। प्रत्येक एकदंतुर लिगेण्ड केन्द्रीय परमाणु अथवा आयन को इलेक्ट्रॉनों का एक युग्म प्रदान करता है।
(ii) केन्द्रीय धातु परमाणु अथवा आयन के रिक्त परमाण्विक कक्षक आवश्यकतानुसार संकरण में भाग लेते हैं। संकरण में, कक्षक आपस में मिलकर अपनी ऊर्जा का पुनः वितरण करते हैं। इस प्रकार समान संख्या में समान ऊर्जा वाले संकरित कक्षकों का निर्माण होता है।
(iii) जब लिगेण्ड, केन्द्रीय धातु परमाणु अथवा आयन के सम्पर्क में आता है, तो केन्द्रीय धातु परमाणु अथवा आयने के संकरित कक्षक, लिगेण्ड के इलेक्ट्रॉनों के एकाकी युग्म युक्त कक्षकों के साथ अतिव्यापन करते हैं तथा प्रबल लिगेण्ड-धातु उपसहसंयोजक आबन्धों का निर्माण करते हैं।
(iv) केन्द्रीय धातु परमाणु अथवा आयन के अनाबन्धी इलेक्ट्रॉन (non-binding electrons) अप्रभावित रहते हैं तथा रासायनिक आबन्ध निर्माण में भाग नहीं लेते हैं।
(v) संकर निर्माण प्रक्रिया में, हुण्ड के अधिकतम बहुलता के नियम का अनुसरण किया जाता है परन्तु प्रबल लिगेण्ड के प्रभाव के कारण इलेक्ट्रॉन हुण्ड के नियम के विरुद्ध युग्मित हो सकते हैं।
(vi) यदि किसी संकर में एक या अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित हों तो वह संकर अनुचुम्बकीय होता है। यदि संकर में उपस्थित सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित हैं तो संकर प्रतिचुम्बकीय होता है।
निकिल कार्बोनिल [Ni(CO)4] - इस संकर में केन्द्रीय निकिल परमाणु चार CO लिगेण्डों से घिरा रहता है। यौगिक में निकिल की ऑक्सीकरण अवस्था शून्य है। निकिल परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d8 4s2 है। प्रबल CO लिगेण्डों की उपस्थिति में इलेक्ट्रॉन पुनर्व्यवस्थित होता है तथा 4s- इलेक्ट्रॉन 3d-कक्षक में प्रवेश करने के लिए बाध्य हो जाते हैं। इस प्रकार निकिल में 4s- तथा 4p- कक्षक संकरण में भाग लेने के लिए बाध्य हो जाते हैं। एक 4s- तथा तीन 4p- कक्षक sp3 संकरण में भाग लेते हैं तथा समान ऊर्जा के चार संकरित कक्षक का निर्माण करते हैं जो कि एक नियमित चतुष्फलक के चार कोनों की ओर दिष्ट होते हैं। ये कक्षक CO लिगेण्ड के कक्षक के साथ अतिव्यापित हो जाते हैं और इस प्रकार चतुष्फलकीय [Ni(CO)4] संकर का निर्माण होता है।
\[ \begin{array}{lccc} \text{Ni परमाणु} & \text{3d} & \text{4s} & \text{4p} \\ & \boxed{\uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow} & \boxed{\uparrow\downarrow} & \boxed{\phantom{\uparrow\downarrow}\phantom{\uparrow\downarrow}\phantom{\uparrow\downarrow}} \\ \text{CO लिगेण्डों का Ni परमाणु के } & \text{3d} & \text{4s} & \text{4p} \\ \text{कक्षकों पर प्रभाव तथा संकरण} & \boxed{\uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow} & \boxed{\phantom{\uparrow\downarrow}} & \boxed{\phantom{\uparrow\downarrow}\phantom{\uparrow\downarrow}\phantom{\uparrow\downarrow}} \\ \text{Ni में sp3 } & \boxed{\uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow} & \boxed{\uparrow\downarrow} & \boxed{\uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow} \\ \text{संकर कक्षक} & & \text{sp3 संकरण} & \text{रिक्त sp3 संकर कक्षक} \\ \text{[Ni(CO)4] में sp3 संकर} & \boxed{\uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow} & \boxed{\uparrow\downarrow} & \boxed{\uparrow\downarrow \uparrow\downarrow \uparrow\downarrow} \\ \text{कक्षक} & & \text{CO लिगेण्डों से चार} & \\ \text{चतुष्फलकीय [Ni(CO)4] संकर} & & \text{इलेक्ट्रॉन युग्म} & \text{यह संकर चतुष्फलकीय} \end{array} \]
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त के आधार पर निकिल कार्बोनिल [Ni(CO)4] संकुल के निर्माण और ज्यामिति को दर्शाता है। इसमें निकिल परमाणु (3d8 4s2) के इलेक्ट्रॉन प्रबल CO लिगेण्डों की उपस्थिति में पुनर्व्यवस्थित होकर sp3 संकरण करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप चतुष्फलकीय संरचना बनती है और सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होने के कारण यह प्रतिचुम्बकीय होता है।
ज्यामिति युक्त है। इसमें सभी इलेक्ट्रॉनों के युग्मित होने के कारण यह प्रतिचुम्बकीय है।
In simple words: संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त (VBT) बताता है कि संकुल धातु आयन और लिगेण्ड के बीच दाता-स्वीकर्ता आबन्धों से बनते हैं, जिसमें धातु के रिक्त कक्षक लिगेण्ड के इलेक्ट्रॉन युग्मों को स्वीकार करने के लिए संकरित होते हैं। [Ni(CO)4] में, निकिल के 3d8 4s2 इलेक्ट्रॉन CO की उपस्थिति में युग्मित होकर sp3 संकरण करते हैं, जिससे चतुष्फलकीय और प्रतिचुम्बकीय संकुल बनता है।

🎯 Exam Tip: VBT के मुख्य बिंदुओं, विशेष रूप से संकरण प्रकार और चुंबकीय व्यवहार के निर्धारण के लिए इलेक्ट्रॉन युग्मन के नियमों को समझना महत्वपूर्ण है। [Ni(CO)4] जैसे उदाहरणों के साथ इसे स्पष्ट करें।

 

Question 2. क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त (CFT) को समझाइए। अष्टफलकीय व चतुष्फलकीय संकुल यौगिकों में d-कक्षकों को विपाटन स्पष्ट कीजिए। या अष्टफलकीय क्रिस्टल क्षेत्र में d-कक्षकों के विपाटन को दर्शाने हेतु चित्र बनाइए।
Answer: एच० बैथे (H. Bethe, 1929) तथा वी॰व्लैक (Van Vleck) द्वारा 1932 ई० में उपसहसंयोजक यौगिकों के गुणों को स्पष्ट करने हेतु एक सिद्धान्त प्रस्तुत किया गया था, जिसे क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त (CFT) कहा गया, जो 1950 में लागू हुआ। इस सिद्धान्त के मुख्य विन्दु निम्नवत् हैं -
(i) संक्रमण धातु संकुल के केन्द्रीय आयन का कार्य करती हैं। लिगण्ड एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म प्रदान करता है, जबकि संक्रमण धातु आयन के रिक्त कक्षक इन इलेक्ट्रॉन युग्म को ग्रहण करते हैं।
(ii) लिगेण्ड (ऋणात्मक/द्विध्रुवी) बिन्दु आवेश की तरह माने जाते हैं।
(iii) संकुल यौगिकों में धातु आयन व लिगेण्ड के मध्य बनने वाले आबन्ध को पूर्णतया आयनिक माना जाता, है, अर्थात धातु आयन व लिगेण्ड परस्पर स्थित विद्युत आकर्षण बल द्वारा जुड़े रहते हैं।
(iv) यह स्थिर विद्युत आकर्षण बल धनायन व ऋणायन के मध्य आयन-आयन आकर्षण बल हो सकता है या धनायन व उदासीन लिगेण्ड के मध्य आयन-द्विध्रुव आकर्षण बल हो सकता है।
अष्टफलकीय संकुल यौगिकों में d-कक्षकों को विपाटन
एक मुक्त धातु आयन में सभी पाँच कक्षक (t2g और eg) अपभ्रंश होते हैं, अर्थात् उनकी ऊर्जा समान होती है। एक अष्टफलकीय संकर [ML6]n+ पर विचार करें जिसमें धातु आयन Mn+ अष्ट्रफलक के केन्द्र पर है तथा कोनों पर एकदन्ती लिगेण्ड (L) द्वारा घिरा हुआ है।
जब x,y और z अक्ष पर समस्त छः लिगेण्ड धातु आयन की ओर अग्रसर होते हैं, तब लिगेण्ड के ऋण छोर (इलेक्ट्रॉन द्वारा) d-कक्षकों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों से प्रतिकर्षित होते हैं। इस प्रतिकर्षण द्वारा पाँचों d-कक्षकों की ऊर्जाओं में परिवर्तन होता है है। चूंकि eg, कक्षकों (dx2-y2 और dz2) की पालियाँ केन्द्रीय धातु आयन के समीप जाने वाले लिगेण्ड के मार्ग में आती हैं,

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक धातु आयन Mn+ को छह लिगेण्ड L द्वारा अष्टफलकीय रूप से घिरा हुआ दर्शाता है, जो x, y, और z अक्षों पर स्थित हैं। यह लिगेण्डों के धातु आयन की ओर बढ़ने की दिशा को दर्शाता है, जिससे d-कक्षकों का विपाटन होता है।
अतः t2g कक्षकों (dxy, dyz, dzx) की अपेक्षा इनमें इलेक्ट्रॉनों का प्रतिकर्षण अधिक होता है। इस कारण पाँच d-कक्षक दो ऊर्जा समूहों में विभक्त हो जाते हैं, अर्थात् eg कक्षकों की ऊर्जा में वृद्धि होती है। धातु आयन के पाँच d-कक्षकों का भिन्न ऊर्जा के दो समूहों में विभाजन, d - d विपाटन या क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन कहलाता है। t2g और eg कक्षकों की ऊर्जा के मध्य के अन्तर को △o द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। (△ = ऊर्जा में अन्तर व o = अष्टफलकीय) इसे 10Dq द्वारा भी दर्शाया जाता है और यह क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा कहलाती है।
चतुष्फलकीय संकुल यौगिकों में d-कक्षकों का विपाटन - चतुष्फलकीय संकुलों में d- कक्षकों का विपाटन समझने के लिए कल्पना कीजिए कि एक घन में चतुष्फलक रखा हुआ है। चतुष्फलक के चार किनारे घन के एकान्तर कोनों पर स्थापित हैं जिन पर चार लिगेण्ड स्थित हैं तथा धातु आयन उसके केन्द्र पर है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक चतुष्फलकीय संकुल को दर्शाता है जिसमें केंद्रीय धातु M एक घन के केंद्र पर स्थित है और चार लिगेण्ड L घन के वैकल्पिक कोनों पर स्थित हैं। अक्ष x, y, z भी दर्शाए गए हैं, जो लिगेण्डों की स्थानिक व्यवस्था को स्पष्ट करते हैं।
अब, हम यदि केन्द्रीय धातु परमाणु के d-कक्षकों की तुलना में चार लिगेण्डों की स्थिति को अध्ययन करें तो अक्ष (dx2-y2 और dz2 अर्थात् eg कक्षक) पर t2g कक्षकों (dxy, dxz, dyz) की अपेक्षा चार लिगण्ड और अधिक दर हो जाते हैं। अतः eg कक्षक निम्न ऊर्जा के हैं और t2g कक्षक उच्च ऊर्जा के हैं । eg और t2g कक्षकों के मध्य ऊर्जा का अन्तर चतुष्फलकीय संकुलों के लिए क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा कहलाता है तथा इसको A) द्वारा दर्शाया जाता है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र अष्टफलकीय संकुल यौगिक में d-कक्षकों के विपाटन को दर्शाता है। इसमें मुक्त आयन या परमाणु के d-कक्षक की ऊर्जा (t2g + eg) को बेरी सेंटर से नीचे t2g कक्षकों (dxy, dyz, dzx) और ऊपर eg कक्षकों (dx2-y2, dz2) में विभाजित होते हुए दिखाया गया है, जहाँ ऊर्जा अंतर △o है, जिसमें t2g की ऊर्जा 0.4 △o कम और eg की 0.6 △o अधिक होती है।
In simple words: क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त बताता है कि लिगेण्ड्स धातु के d-कक्षकों को दो ऊर्जा स्तरों (t2g और eg) में विभाजित करते हैं, जिसे क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन कहते हैं। अष्टफलकीय संकुलों में eg उच्च ऊर्जा पर और t2g निम्न ऊर्जा पर होते हैं, जबकि चतुष्फलकीय संकुलों में विपरीत होता है।

🎯 Exam Tip: CFT की अवधारणाओं, अष्टफलकीय और चतुष्फलकीय विपाटन आरेखों, और उनके संबंधित ऊर्जा स्तरों को अच्छी तरह से समझना महत्वपूर्ण है। प्रत्येक विपाटन में d-कक्षकों की ऊर्जा व्यवस्था और उनके प्रभावों को स्पष्ट रूप से समझाएं।

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