UP Board Solutions Class 12 Chemistry Chapter 8 The d and f Block Elements

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Detailed Chapter 8 d और f ब्लॉक तत्व UP Board Solutions for Class 12 Chemistry

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Class 12 Chemistry Chapter 8 d और f ब्लॉक तत्व UP Board Solutions PDF

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

Question 1. सिल्वर परमाणु की मूल अवस्था में पूर्ण भरित d कक्षक (4d10) हैं। आप कैसे कह सकते हैं कि यह एक संक्रमण तत्व है?
Answer: सिल्वर (Z = 47), +2 ऑक्सीकरण अवस्था भी प्रदर्शित कर सकता है तथा इस अवस्था में इसके 4d कक्षक अपूर्ण भरे हुए होते हैं, अतः यह एक संक्रमण तत्व है।
In simple words: सिल्वर (Ag) एक संक्रमण तत्व है क्योंकि यद्यपि इसकी मूल अवस्था में 4d कक्षक पूर्ण भरे होते हैं, यह अपनी +2 ऑक्सीकरण अवस्था में अपूर्ण 4d कक्षक प्रदर्शित करता है, जो संक्रमण तत्वों की परिभाषा के अनुरूप है।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों की पहचान उनके किसी भी सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था में अपूर्ण d-कक्षक होने पर आधारित होती है, मूल अवस्था के भरे हुए कक्षक एकमात्र कसौटी नहीं हैं।

Question 2. श्रेणी Sc (Z = 21) से Zn (Z = 30) में, जिंक की कणन एन्थैल्पी का मान सबसे कम अर्थात 128 kJ mol-1 होता है, क्यों?
Answer: जिंक के 3d कक्षकों के इलेक्ट्रॉन आबन्धन में प्रयुक्त नहीं होते हैं, जबकि 3d श्रेणी की शेष सभी धातुओं के d कक्षक के इलेक्ट्रॉन आबन्ध बनाने में प्रयुक्त होते हैं। इसलिए श्रेणी में जिंक की कणन एन्थैल्पी का मान सबसे कम होता है।
In simple words: जिंक की कणन एन्थैल्पी कम होती है क्योंकि इसके पूर्ण भरे 3d कक्षक आबन्ध बनाने में भाग नहीं लेते हैं, जिससे धात्विक आबन्धों की शक्ति कम होती है।

🎯 Exam Tip: कणन एन्थैल्पी धातु-धातु आबन्ध की शक्ति को दर्शाती है; अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की संख्या जितनी अधिक होगी, कणन एन्थैल्पी उतनी ही अधिक होगी।

Question 3. संक्रमण तत्वों की 3d श्रेणी का कौन-सा तत्व बड़ी संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाता है एवं क्यों?
Answer: मैंगनीज (Z = 25) के परमाणु में सर्वाधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं। अतः यह +2 से +7 तक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है जो सबसे बड़ी संख्या है।
In simple words: मैंगनीज 3d श्रेणी में सबसे अधिक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (+2 से +7) दर्शाता है क्योंकि इसमें सर्वाधिक अयुग्मित d इलेक्ट्रॉन होते हैं जो विभिन्न आबन्धों में भाग ले सकते हैं।

🎯 Exam Tip: किसी संक्रमण तत्व द्वारा प्रदर्शित ऑक्सीकरण अवस्थाओं की संख्या सीधे उसके परमाणुओं में उपलब्ध अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या से संबंधित होती है।

Question 4. कॉपर के लिए E- (M2-| M), का मान धनात्मक (+0.34 V) है। इसके सम्भावित कारण क्या हैं? [संकेत-इसके उच्च △aH- और ∆Hyd H- पर ध्यान दें ।]
Answer: किसी धातु के लिए E- (M2-| M), निम्नलिखित पदों में होने वाले एन्थैल्पी परिवर्तन के योग से सम्बद्ध होता है –

  • M(s) + ΔɑΗ → M(g) (∆H = परमाण्विक एन्थैल्पी = धनात्मक)
  • M(g) + Δ₁Η → M2+ (g) (∆¡H = आयनन एन्थैल्पी = धनात्मक)
  • M2+ (g) + (aq) → M2+ (aq) + ΔhydΗ (ΔhydH = जलयोजन एन्थैल्पी = ऋणात्मक)
कॉपर की परमाण्विक एन्थैल्पी, उच्च तथा जलयोजन एन्थैल्पी कम होती हैं। इसलिए E- (Cu2+ | Cu) को मान धनात्मक होता है। अतः Cu(s) के Cu2+ (aq) में रूपान्तरण की उच्च ऊर्जा इसकी जलयोजन एन्थैल्पी द्वारा सन्तुलित नहीं होती है।
In simple words: कॉपर के लिए धनात्मक E- मान यह दर्शाता है कि इसकी उच्च परमाण्विकरण एन्थैल्पी और द्वितीय आयनन एन्थैल्पी को कम जलयोजन एन्थैल्पी पर्याप्त रूप से प्रतिसंतुलित नहीं कर पाती, जिससे Cu से Cu2+ (aq) का निर्माण ऊर्जावान रूप से प्रतिकूल हो जाता है।

🎯 Exam Tip: उच्च परमाण्विक एन्थैल्पी और आयनन एन्थैल्पी, तथा कम जलयोजन एन्थैल्पी का संयोजन धनात्मक मानक इलेक्ट्रोड विभव का कारण बनता है।

Question 5. संक्रमण तत्वों की प्रथम श्रेणी में आयनन एन्थैल्पी (प्रथम और द्वितीय) में अनियमित परिवर्तन को आप कैसे समझाएँगे?
Answer: आयनन एन्थैल्पी में अनियमित परिवर्तन विभिन्न 3d विन्यासों के स्थायित्व की क्षमता में भिन्नता के कारण है (उदाहरण dº, d5, d10 असामान्य रूप से स्थायी होते हैं)।
In simple words: प्रथम संक्रमण श्रेणी में आयनन एन्थैल्पी में अनियमितताएँ 3d कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के भरे जाने और स्थिर विन्यास (d0, d5, d10) प्राप्त करने की प्रवृत्ति के कारण होती हैं।

🎯 Exam Tip: स्थिर इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (जैसे अर्ध-भरित या पूर्ण-भरित) आयनन एन्थैल्पी में महत्वपूर्ण अपवाद उत्पन्न करते हैं।

Question 6. कोई धातु अपनी उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था केवल ऑक्साइड अथवा फ्लुओराइड में ही क्यों प्रदर्शित करती है?
Answer: छोटे आकार एवं उच्च विद्युत ऋणात्मकता के कारण ऑक्सीजन अथवा फ्लुओरीन तत्व, धातु को उसकी उच्च ऑक्सीकरण अवस्था तेक ऑक्सीकृत कर सकते हैं।
In simple words: धातुएँ अपनी उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्थाएँ केवल ऑक्साइडों या फ्लुओराइडों में दर्शाती हैं क्योंकि ऑक्सीजन और फ्लुओरीन का छोटा आकार और उच्च विद्युत ऋणात्मकता धातुओं को अत्यधिक ऑक्सीकृत करने में सक्षम बनाती है।

🎯 Exam Tip: ऑक्सीकारक की शक्ति और आकार उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्थाओं को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

Question 7. Cr2+ और Fe2+ में से कौन प्रबल अपचायक है और क्यों?
Answer: Fe2+ की तुलना में Cr2+ एक प्रबल अपचायक पदार्थ है। कारण - Cr2+ से Cr3+ बनने में d4 → d3 परिवर्तन होता है, किन्तु Fe2+ से Fe3+ में d6 → d5 में परिवर्तन होता है। जल जैसे माध्यम में d5 की तुलना में d3 अधिक स्थायी है।
In simple words: Cr2+ एक प्रबल अपचायक है क्योंकि यह Cr3+ में ऑक्सीकृत होने पर एक स्थिर d3 विन्यास प्राप्त करता है, जो Fe2+ द्वारा Fe3+ (d5) में ऑक्सीकृत होने से अधिक स्थिर होता है।

🎯 Exam Tip: ऑक्सीकरण के बाद बनने वाले उत्पाद की स्थिरता अपचायक शक्ति को निर्धारित करती है। d3 विन्यास (t2g3) जलीय माध्यम में अतिरिक्त स्थिरता प्रदान करता है।

Question 8. M2+ (aq) आयन (Z = 27) के लिए 'प्रचक्रण-मात्र चुम्बकीय आघूर्ण की गणना कीजिए।
Answer: M परमाणु (Z = 27) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d7 4s2 है। .. M2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = [Ar] 3d7 अतः इसमें तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। ... 'प्रचक्रण-मात्र चुम्बकीय आघूर्ण (µ) = \( \sqrt{n(n+2)} \) B.M. = \( \sqrt{3(3+2)} \) B.M. = \( \sqrt{15} \) B.M. = 3.87 B.M.
In simple words: कोबाल्ट (Z=27) के M2+ आयन में तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं (3d7 विन्यास), जिससे इसका प्रचक्रण-मात्र चुम्बकीय आघूर्ण \( \sqrt{15} \) या 3.87 B.M. होता है।

🎯 Exam Tip: चुंबकीय आघूर्ण की गणना के लिए, पहले आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निर्धारित करें, अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ज्ञात करें, और फिर 'प्रचक्रण-मात्र' सूत्र (\( \mu = \sqrt{n(n+2)} \)) का उपयोग करें।

Question 9. स्पष्ट कीजिए कि Cu' आयन जलीय विलयन में स्थायी नहीं है, क्यों? समझाइए ।
Answer: Cu+ (aq) से Cu2+ (aq) अधिक स्थायी होता है। इसका कारण यह है कि कॉपर की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी अधिक होती है, परन्तु Cu2+ (aq) के लिए AhydH, Cu+ (aq) की तुलना में अधिक ऋणात्मक होती है, इसलिए यह कॉपर की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के लिए अधिक क्षतिपूर्ति करती है। अतः अनेक कॉपर (I) यौगिक जलीय विलयन में अस्थायी होते हैं तथा निम्नलिखित प्रकार असमानुपातित होते हैं – \[ 2Cu^+ (aq) \longrightarrow Cu^{2+} (aq) + Cu (S) \]
In simple words: Cu+ आयन जलीय विलयन में अस्थायी होता है और असमानुपातन से Cu2+ और Cu बनाता है, क्योंकि Cu2+ आयन की उच्च जलयोजन एन्थैल्पी इसकी उच्च द्वितीय आयनन एन्थैल्पी को संतुलित कर देती है, जिससे Cu2+ अधिक स्थिर हो जाता है।

🎯 Exam Tip: जलीय विलयन में आयन की स्थिरता को समझने के लिए आयनन एन्थैल्पी और जलयोजन एन्थैल्पी दोनों पर विचार करें; अधिक जलयोजन एन्थैल्पी आयन को स्थिर करती है।

Question 10. लैन्थेनाइड आकुंचन की तुलना में एक तत्व से दूसरे तत्व के बीच ऐक्टिनाइड आकुंचन अधिक होता है, क्यों?
Answer: 5f इलेक्ट्रॉन नाभिकीय आवेश से प्रभावी रूप से परिरक्षित रहते हैं। दूसरे शब्दों में, 5f इलेक्ट्रॉनों की श्रेणी में एक तत्व से दूसरे तत्व की ओर जाने पर दुर्बल परिरक्षण प्रभाव परिलक्षित होता है। अतः ऐक्टिनाइड आकुंचन (संकुचन) अधिक होता है।
In simple words: ऐक्टिनाइड आकुंचन लैन्थेनाइड आकुंचन से अधिक होता है क्योंकि 5f इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण प्रभाव 4f इलेक्ट्रॉनों की तुलना में बहुत दुर्बल होता है, जिससे प्रभावी नाभिकीय आवेश में अधिक वृद्धि होती है।

🎯 Exam Tip: f-कक्षक इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण प्रभाव जितना कमजोर होता है, आकुंचन उतना ही अधिक होता है। 5f कक्षक 4f कक्षकों की तुलना में अधिक विसरित होते हैं।

अतिरिक्त अभ्यास

Question 1. निम्नलिखित के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए –
(1) Cr3+
(2) Pm3+
(3) Cu+
(4) Ce4+
(5) Co2+
(6) Lu2+
(7) Mn2+
(8) Th4+
Answer:
(1) Cr3+ : [Ar] 3d3
(2) Pm3+ : [Xe] 4f4
(3) Cu+ : [Ar] 3d10
(4) Ce4+ : [Xe] 4f0
(5) Co2+ : [Ar] 3d7
(6) Lu2+ : [Xe] 4f14 5d1
(7) Mn2+ : [Ar] 3d5
(8) Th4+ : [Rn] 5f0
In simple words: इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखते समय, पहले निकटतम उत्कृष्ट गैस विन्यास का उपयोग करें, फिर बाहरी s-इलेक्ट्रॉनों को हटाकर और फिर d या f इलेक्ट्रॉनों को हटाकर आयन के लिए विन्यास प्राप्त करें, हमेशा स्थिरता (जैसे d0, d5, d10, f0, f7, f14) प्राप्त करने का लक्ष्य रखें।

🎯 Exam Tip: आयनों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखते समय, पहले बाहरीतम s-इलेक्ट्रॉन हटाएँ, उसके बाद d-इलेक्ट्रॉन। f-ब्लॉक तत्वों के लिए f-इलेक्ट्रॉनों की भराई और स्थायित्व पर विशेष ध्यान दें।

Question 2. +3 ऑक्सीकरण अवस्था में ऑक्सीकृत होने के सन्दर्भ में Mn2+ के यौगिक Fe2+ के यौगिकों की तुलना में अधिक स्थायी क्यों हैं?
Answer: Mn2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d5 है, जबकि Fe2+ का [Ar] 3d6 है। चूंकि Mn2+ में अर्द्ध-पूर्ण कक्ष (3d5) होती है, जो कि Fe2+ की 3d कक्ष से अधिक स्थायी है, इसलिए Mn2+ यौगिक सरलता से Mn3+ में ऑक्सीकृत नहीं होते हैं क्योंकि इनकी द्वितीय आयनन एन्थैल्पी बहुत अधिक होती है। इसके विपरीत, Fe2+ यौगिक कम द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के कारण Fe3+ में सरलता से ऑक्सीकृत हो जाता है। यही कारण है कि Mn2+ यौगिक अपनी +3 अवस्था के लिए ऑक्सीकरण के प्रति Fe2+ से अधिक स्थायी होते हैं।
In simple words: Mn2+ यौगिक Fe2+ यौगिकों की तुलना में +3 ऑक्सीकरण अवस्था में ऑक्सीकृत होने के प्रति अधिक स्थायी होते हैं क्योंकि Mn2+ का स्थिर अर्ध-भरित d5 विन्यास होता है, जिसे ऑक्सीकृत करने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जबकि Fe2+ आसानी से Fe3+ (d5) में ऑक्सीकृत हो जाता है।

🎯 Exam Tip: अर्ध-भरित (d5) और पूर्ण-भरित (d10) विन्यास विशेष रूप से स्थिर होते हैं और इन विन्यासों से इलेक्ट्रॉन निकालना मुश्किल होता है।

Question 3. संक्षेप में स्पष्ट कीजिए कि प्रथम संक्रमण श्रेणी के प्रथम अर्द्धभाग में बढ़ते हुए परमाणु क्रमांक के साथ +2 ऑक्सीकरण अवस्था कैसे अधिक स्थायी होती जाती है?
Answer: प्रथम संक्रमण श्रेणी में बायें से दाये जाने पर IE₁ + IE2 का योग बढ़ता जाता है। इसके परिणामस्वरूप M2+ आयन बनाने की प्रवृत्ति घटती जाती है। यही कारण है कि श्रेणी के प्रथम अर्द्ध भाग में +2 अवस्था अधिकाधिक स्थायी होती है।
In simple words: प्रथम संक्रमण श्रेणी के प्रथम अर्द्धभाग में, परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ M2+ आयन की स्थिरता बढ़ती है क्योंकि पहले और दूसरे आयनन एन्थैल्पी का योग बढ़ता जाता है, जिससे M2+ आयन बनाना मुश्किल हो जाता है।

🎯 Exam Tip: M2+ आयन की स्थिरता उसके बनने के लिए आवश्यक कुल आयनन ऊर्जा पर निर्भर करती है; जैसे-जैसे यह ऊर्जा बढ़ती है, M2+ की स्थिरता कम होती जाती है।

Question 4. प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास किस सीमा तक ऑक्सीकरण अवस्थाओं को निर्धारित करते हैं? उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए।
Answer: जिस ऑक्सीकरण अवस्था में आयनों में पूर्ण भरी या अर्द्ध भरी d कक्ष होती है, वे आयन अधिक स्थायी होते हैं। जैसे Mn की +2 अवस्था इसकी अन्य ऑक्सीकरण अवस्थाओं की अपेक्षा अधिक स्थायी होती है। जैसे Mn की +2 अवस्था इसकी अन्य ऑक्सीकरण अवस्थाओं की अपेक्षा अधिक स्थायी होती है। क्योंकि Mn2+ में अर्द्ध भरी 3d5 कक्ष होती है। इसी प्रकार Zn की +2 अवस्था इसकी सबसे अधिक स्थायी अवस्था होती है क्योंकि इसमें पूर्ण भरी 3d10 कक्ष होती है।
In simple words: संक्रमण तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास उनकी ऑक्सीकरण अवस्थाओं की स्थिरता को अत्यधिक प्रभावित करते हैं; अर्ध-भरित (d5) या पूर्ण-भरित (d10) d-कक्षक वाले आयन विशेष रूप से स्थिर होते हैं, जैसे Mn2+ (3d5) और Zn2+ (3d10)।

🎯 Exam Tip: d0, d5 और d10 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास असाधारण रूप से स्थिर होते हैं और अक्सर एक विशेष ऑक्सीकरण अवस्था की प्रबलता को निर्धारित करते हैं।

Question 5. संक्रमण तत्वों की मूल अवस्था में नीचे दिए गए d इलेक्ट्रॉनिक विन्यासों में कौन-सी ऑक्सीकरण अवस्था स्थायी होगी? 3d3, 3d5, 3d6 तथा 3d4
Answer:

  • 3d3 (वैनेडियम) : (+2), +3, +4, +5
  • 3d5 (क्रोमियम) : (+3), +4, +6
  • 3d5 (मैंगनीज) : (+2), +4, +6, +7
  • 3d6 (कोबाल्ट) : (+2), +3
  • 3d4 : इस विन्यास वाला कोई भी तत्त्व तलस्थ अवस्था में नहीं पाया जाता है।

In simple words: संक्रमण तत्वों की स्थायी ऑक्सीकरण अवस्थाएँ उनके d-इलेक्ट्रॉन विन्यास पर निर्भर करती हैं, जिसमें अर्ध-भरित (d5) या पूर्ण-भरित (d10) विन्यास अधिक स्थिरता प्रदान करते हैं।

🎯 Exam Tip: ऑक्सीकरण अवस्थाओं की स्थिरता का अनुमान लगाने के लिए d-कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या और उनके स्थिरीकरण प्रभावों को ध्यान में रखें।

Question 6. प्रथम संक्रमण श्रेणी के ऑक्सो-धातुऋणायनों का नाम लिखिए, जिसमें धातु संक्रमण श्रेणी की वर्ग संख्या के बराबर ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करती है।
Answer: Cr2O72- तथा CrO42- में क्रोमियम +6 अवस्था प्रदर्शित करता है, जो कि इसके समूह की संख्या (6) के बराबर है। MnO4- में Mn + 7 अवस्था प्रदर्शित करता है, जो कि इसकी समूह की संख्या (7) के बराबर है। VO3- में V+ 5 अवस्था प्रदर्शित करता है, जो कि इसकी समूह की संख्या (5) के बराबर है।
In simple words: प्रथम संक्रमण श्रेणी के ऑक्सो-धातुऋणायनों में, धातु अक्सर अपनी उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था में होती है, जो उसके समूह संख्या के बराबर होती है, जैसे क्रोमेट और डाइक्रोमेट में क्रोमियम (+6) तथा परमैंगनेट में मैंगनीज (+7)।

🎯 Exam Tip: ऑक्सो-ऋणायनों में, ऑक्सीजन की उच्च विद्युत-ऋणात्मकता अक्सर धातु को उसकी समूह संख्या के बराबर उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था तक ऑक्सीकृत करने में मदद करती है।

Question 7. लैन्थेनाइड आकुंचन क्या है? लैन्थेनाइड आकुंचन के परिणाम क्या हैं?
Answer: लैन्थेनाइड आकुंचन (Lanthanoid Contraction) - लैन्थेनाइड श्रेणी में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर परमाण्विक तथा आयनिक त्रिज्याएँ एक तत्व से दूसरे तत्व तक घटती हैं, परन्तु यह कमी अत्यन्त कम होती है। उदाहरणार्थ - Ce से Lu तक जाने पर परमाण्विक त्रिज्या 183 pm से 173 pm तक घट जाती है तथा यह कमी केवल 10 pm है। इसी प्रकार Ce3+ से Lu3+ आयन तक जाने पर आयनिक त्रिज्या 103 pm से घटकर 85 pm रह जाती है तथा यह कमी केवल 18 pm है। अतः परमाणु क्रमांक में 14 की वृद्धि के लिए, परमाण्विक तथा आयनिक त्रिज्याओं में होने वाली कमी अत्यन्त कम है। यह कमी अन्य वर्गों तथा आवर्तों के तत्वों की तुलना में अत्यल्प है।

सारणी-लैन्थेनम तथा लैन्थेनाइडों के परमाण्विक तथा आयनिक त्रिज्याओं में परिवर्तन (pm)

तत्वLaCePrNdPmSmEuGdTbDyHoErTmYbLu
त्रिज्या (Ln)187183182181181180199180178177176175174173-
त्रिज्या (Ln³⁺)1061031019998969594929189888785-
लैन्थेनाइड तत्वों में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर उनके परमाणु तथा आयनिक आकारों में होने वाली स्थिर कमी 'लैन्थेनाइड आकुंचन' कहलाती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र लैन्थेनाइड आयनों (Ln³⁺) की आयनिक त्रिज्याओं में परमाणु क्रमांक के साथ कमी की प्रवृत्ति को दर्शाता है। इसमें विभिन्न लैन्थेनाइड तत्वों के लिए आयनिक त्रिज्याओं को उनके परमाणु क्रमांक के विरुद्ध प्लॉट किया गया है, जो लैन्थेनाइड संकुचन के प्रभाव को स्पष्ट रूप से चित्रित करता है। लैन्थेनाइड आकुंचन का कारण (Cause of Lanthanide Contraction) - लेन्थेनाइड श्रेणी में एक तत्व से दूसरे तत्व तक जाने पर नाभिकीय आवेश एक इकाई बढ़ता है तथा एक इलेक्ट्रॉन जुड़ता है। ये नए इलेक्ट्रॉन समानान्तर 4f- उपकोशों में जुड़ते हैं। यद्यपि एक 4f- इलेक्ट्रॉन का दूसरे 4f- इलेक्ट्रॉन पर परिरक्षण प्रभाव (नाभिकीय आवेश से), f- कक्षकों के अत्यन्त विस्तृत आकार के कारण, कम होता है। यद्यपि नाभिकीय आवेश प्रत्येक पद पर एक इकाई बढ़ जाता है, इसलिए परमाणु क्रमांक तथा नाभिकीय आवेश बढ़ने पर प्रत्येक 4f- इलेक्ट्रॉन द्वारा अनुभव किया जाने वाला प्रभावी नाभिकीय आवेश बढ़ जाता है, परिणामस्वरूप सम्पूर्ण 4f- इलेक्ट्रॉन कोश प्रत्येक तत्व के जुड़ने पर आकुंचित हो जाता है, यद्यपि यह कमी अत्यन्त अल्प होती है। इसके परिणामस्वरूप परमाणु क्रमांक बढ़ने पर लैन्थेनाइडों के आकार में नियमित हस पाया जाता है। क्रमिक अपचयनों का योग कुल लैन्थेनाइड आकुंचन देता है। लैन्थेनाइड आकुंचन के परिणाम (Consequences of Lanthanide Contraction) - लैन्थेनाइड आकुंचन के महत्त्वपूर्ण परिणाम निम्नलिखित हैं -
(1) द्वितीय तथा तृतीय संक्रमण श्रेणियों की समानता (Resemblance of second and third transition series) - आवर्त सारणी में लैन्थेनाइडों से पहले तथा बाद में आने वाले तत्वों के आपेक्षिक गुणों पर इसका महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। अग्रलिखित सारणी से स्पष्ट होता है कि Sc से Y तथा Y से La तक आकार में नियमित वृद्धि होती है।

सारणी- d-ब्लॉक के तत्वों की परमाणु त्रिज्याएँ (pm में)

ScTiVCrMnFeCoNiCuZn
164147135129137126125125128137
YZrNbMoTcRuRhPdAgCdलैन्थेनाइड
180160146139136134134137144154
La*HfTaWReOsIrPtAuHg
187158146139137135136138144157
आकुंचन इसी प्रकार हम अन्य वर्गों में आकार में सामान्य वृद्धि की अपेक्षा कर सकते हैं, यद्यपि लैन्थेनाइडों के पश्चात् द्वितीय से तृतीय संक्रमण श्रेणियों में त्रिज्याओं की वृद्धि लगभग नगण्य होती है। Ti - Zr - Hf V - Nb - Ta आदि तत्वों के युग्मों; जैसे- Zr - Hf, Nb - Ta, Mo - W आदि के आकार समान (लगभग) होते हैं तथा इन तत्वों के गुण भी समान होते हैं। अतः लैन्थेनाइड आकुंचन के परिणामस्वरूप द्वितीय तथा तृतीय संक्रमण श्रेणियों के तत्व, प्रथम तथा द्वितीय संक्रमण श्रेणियों के तत्वों की तुलना में परस्पर अत्यधिक समानता रखते हैं।
(2) लैन्थेनाइडों में समानता (Similarity among lanthanides) - लैन्थेनाइडों की त्रिज्याओं में अत्यन्त अल्प-परिवर्तन के कारण, इनके रासायनिक गुण लगभग समान होते हैं। अतः तत्वों को शुद्ध अवस्था में पृथक्कृत करना अत्यन्त कठिन होता है। पुनरावृत्त प्रभाजी क्रिस्टलन अथवा आयन-विनिमय तकनीकों पर आधारित आधुनिक विधियों द्वारा इनके त्रिसंयोजी आयनों के आकारों में अत्यल्प-अन्तर के आधार पर इन्हें पृथक्कृत किया जाता है। इन विधियों द्वारा तत्वों के गुणों जैसे विलेयता, संकुल आयन निर्माण, जलयोजन आदि में बहुत कम अन्तर के आधार पर इन्हें पृथक्कृत किया जाता है।
(3) क्षारकता अन्तर (Basicity differences) - लैन्थेनाइड आकुंचन के कारण लैन्थेनाइड आयनों का आकार, परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ नियमित रूप से घटता है। आकार में कमी के फलस्वरूप लैन्थेनाइड आयन तथा OH आयनों के मध्य इनके सहसंयोजक गुण La3+ से Lu3+ तक बढ़ते हैं, इसलिए परमाणु क्रमांक बढ़ने पर हाइड्रॉक्साइडों की क्षारकीय सामर्थ्य घटती है। अतः La(OH)3 अधिकतम क्षारकीय है, जबकि Lu(OH)3 सबसे कम क्षारकीय है।
In simple words: लैन्थेनाइड आकुंचन 4f इलेक्ट्रॉनों के खराब परिरक्षण प्रभाव के कारण परमाणु क्रमांक बढ़ने पर लैन्थेनाइड आयनों की त्रिज्याओं में क्रमिक कमी है। इसके परिणामों में द्वितीय और तृतीय संक्रमण श्रृंखला के तत्वों के बीच समान आकार, लैन्थेनाइड तत्वों को अलग करना मुश्किल होना, और लैन्थेनाइड हाइड्रॉक्साइड्स की बढ़ती अम्लता शामिल है।

🎯 Exam Tip: लैन्थेनाइड आकुंचन के कारणों और परिणामों को समझना महत्वपूर्ण है, खासकर आवर्त सारणी में तत्वों के गुणों पर इसके प्रभाव के संदर्भ में।

Question 8. संक्रमण धातुओं के अभिलक्षण क्या हैं? ये संक्रमण धातु क्यों कहलाती हैं? d- ब्लॉक के तत्वों में कौन-से तत्व संक्रमण श्रेणी के तत्व नहीं कहे जा सकते?
Answer: संक्रमण धातुओं के सामान्य अभिलक्षण (General Characteristics of Transition Elements) - संक्रमण धातुओं (d-ब्लॉक के तत्वों) के सामान्य अभिलक्षण निम्नलिखित हैं –
(1) लगभग सभी संक्रमण तत्व अभिधात्विक गुण जैसे उच्च तनन सामर्थ्य (tensile strength), तन्यता (ductility), वर्धनीयता (malleability), उच्च तापीय तथा विद्युत चालकता तथा धात्विक चमक दर्शाते हैं।
(2) मर्करी को छोड़कर, जो कमरे के ताप पर द्रव है, अन्य संक्रमण तत्वों की अभिधात्विक संरचनाएँ होती हैं।
(3) इनके गलनांक तथा क्वथनांक उच्च होते हैं तथा असंक्रमण तत्वों की तुलना में इनकी वाष्पन ऊष्मा उच्च होती है।
(4) s- ब्लॉक तत्वों की तुलना में संक्रमण तत्वों के घनत्व उच्च होते हैं।
(5) d- ब्लॉक के तत्वों की प्रथम आयनन ऊर्जाएँ 5-ब्लॉक के तत्वों से अधिक, परन्तु p-ब्लॉक के तत्वों से कम होती हैं।
(6) इनकी प्रवृत्ति विद्युत धनात्मक होती है।
(7) इनमें से अधिकांश तत्व रंगीन यौगिक बनाते हैं।
(8) इनमें संकुल बनाने की प्रवृत्ति अत्यधिक होती है।
(9) ये अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं।
(10) इनके यौगिक सामान्यतया अनुचुम्बकीय प्रवृत्ति के होते हैं।
(11) ये अन्य धातुओं के साथ मिश्रधातु (alloy) बनाते हैं।
(12) ये कुछ तत्वों; जैसे हाइड्रोजन, बोरॉन, कार्बन, नाइट्रोजन आदि के साथ अन्तराकाशी यौगिक बनाते हैं।
(13) अधिकांश संक्रमण धातुएँ जैसे Mn, Ni, Co, Cr, V, Pt आदि तथा इनके यौगिक उत्प्रेरकों के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं। d- ब्लॉक के तत्व संक्रमण धातुएँ कहलाते हैं क्योंकि ये तत्व अधिक विद्युत-धनात्मक s-ब्लॉक के तत्वों तथा कम विद्युत-धनात्मक p-ब्लॉक के तत्वों से मध्यवर्ती गुण प्रदर्शित करते हैं तथा आवर्त सारणी में इनका स्थान s- तथा p-ब्लॉक के तत्वों के मध्य में है। Zn, Cd तथा Hg का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास सामान्य सूत्र (n - 1)d10 ns2 से प्रदर्शित किया जाता है। इन तत्वों में कक्षक तलस्थ (सामान्य) अवस्था में तथा साधारण ऑक्सीकरण अवस्थाओं में भी पूर्णपूरित होते हैं अर्थात् इनकी परमाण्विक अवस्था अथवा किसी भी एक आयनिक अवस्था में उपकोश अपूर्ण नहीं होते हैं, इसलिए इन्हें संक्रमण तत्व नहीं कहा जा सकता ।
In simple words: संक्रमण धातुएँ वे d-ब्लॉक तत्व हैं जिनमें उनके आयनों में आंशिक रूप से भरे d-कक्षक होते हैं; उनके अभिलक्षणों में उच्च गलनांक, रंगीन यौगिक, परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्थाएँ, उत्प्रेरक गुण और जटिल यौगिक बनाने की क्षमता शामिल है। जिंक, कैडमियम और पारा संक्रमण धातुएँ नहीं हैं क्योंकि उनके d-कक्षक हमेशा पूर्ण भरे होते हैं।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों के मुख्य अभिलक्षणों को याद रखें और समझें कि d-कक्षक में अपूर्ण भराई उनकी विविध रासायनिक व्यवहारों का मूल कारण क्यों है। जिंक, कैडमियम और पारा के अपवाद को स्पष्ट रूप से इंगित करें।

Question 9. संक्रमण धातुओं के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास किस प्रकार असंक्रमण तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से भिन्न हैं?
Answer: संक्रमण तत्त्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n - 1)d1-10 ns1-2 प्रकार के होते हैं तथा इस प्रकार इनमें अपूर्ण d-ऑर्बिटल होती है जबकि असंक्रमण तत्त्वों में d-ऑर्बिटल नहीं पायी जाती है। इनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns1-2 या ns2 np1-6 प्रकार के होते हैं।
In simple words: संक्रमण धातुओं में अपूर्ण d-कक्षक (n-1)d1-10 होते हैं, जबकि असंक्रमण तत्वों में d-कक्षक या तो अनुपस्थित होते हैं या पूर्ण भरे होते हैं (जैसे s-ब्लॉक और p-ब्लॉक तत्वों में)।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों की प्रमुख विशेषता उनके d-कक्षकों का अपूर्ण भरा होना है, जो असंक्रमण तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से उन्हें अलग करता है।

Question 10. लैन्थेनाइडों द्वारा कौन-कौन सी ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित की जाती हैं?
Answer: लैन्थेनाइडों की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (Oxidation States of Lanthanides) - आवर्त सारणी के वर्ग 3 के सदस्यों से प्रत्याशित होता है कि लेन्थेनाइडों की एकसमान +3 ऑक्सीकरण अवस्था उनकी एक विशेषता है। त्रिधनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था 6s2 इलेक्ट्रॉन और एकाकी 5d-इलेक्ट्रॉन अथवा यदि कोई 5d- इलेक्ट्रॉन उपस्थित न हो तो f-इलेक्ट्रॉनों में से एक के उपयोग के अनुसार होती है। प्रथम तीन आयनन एन्थैल्पियों का योग अपेक्षाकृत निम्न होता है जिससे ये तत्व उच्च धनविद्युती होते हैं और तत्परता से +3 आयन बना लेते हैं। यद्यपि जलीय विलयन में तथा ठोस अवस्था में सीरियम (Ce4+) चर्तुधनात्मक तथा सैमेरियम, यूरोपियम और इटर्बियम (Sm2+, Eu2+ और Yb2+) द्विधनात्मक आयन दे सकते हैं। अन्य तत्व ठोस अवस्था में +4 अवस्था दे सकते हैं। MX3 का अपचयन न केवल MX2 अपितु विशेष स्थिति में जटिल अपचयित स्पीशीज भी दे सकता है। लैन्थेनाइडों के लिए +3 ऑक्सीकरण अवस्था की धारणा पर्याप्त दृढ़ हो गई है तथा अन्य ऑक्सीकरण अवस्थाओं को प्रायः 'असंगत' कहा जाता है। विभिन्न लैन्थेनाइडों की ऐसी असंगत ऑक्सीकरण अवस्थाएँ अग्र प्रकार प्रदर्शित की गई हैं –
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र लैन्थेनम तथा लैन्थेनाइड तत्वों द्वारा प्रदर्शित विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं को परमाणु क्रमांक के विरुद्ध दर्शाता है। इसमें +3 ऑक्सीकरण अवस्था सबसे सामान्य है, जबकि +2 और +4 जैसी अन्य अवस्थाएँ कुछ तत्वों में अस्थिर या संदिग्ध होती हैं, जिन्हें बिन्दुवत् रेखाओं से दर्शाया गया है। यदि हम यह मान लें कि रिक्त, अर्द्धपूर्ण या पूर्ण f- उपकोश के साथ विशेष स्थायित्व सम्बन्धित होता है। तो एक निश्चित सीमा तक +2 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्थाओं की उपस्थिति का इलेक्ट्रॉनिक संरचनाओं के साथ सामंजस्य किया जा सकता है। इस प्रकार La, Gd और Lu केवल त्रिधनात्मक आयन निर्मित करते हैं क्योंकि तीन इलेक्ट्रॉनों के निष्कासन से La3+ आयन में उत्कृष्ट गैस का विन्यास बन जाता है। Gd3+ तथा Lu3+ आयनों में क्रमशः स्थायी विन्यास 4f7 तथा 4f14 से इलेक्ट्रॉनों का निष्कासन नहीं होता क्योंकि M3+ आयनों की अपेक्षा M2+ अथवा M+ आयनों की जालक अथवा जलयोजन ऊर्जाएँ लघु M3+ आयनों के लवणों की योगात्मक जालक या जलयोजन ऊर्जाओं की अपेक्षा कम होगी । सबसे अधिक स्थायी द्वि या चतुर्धनात्मक आयन उन तत्वों द्वारा निर्मित होते हैं जो ऐसा करके f0, f7 तथा f14 विन्यास प्राप्त कर सकते हों। इस प्रकार सीरियम +4 ऑक्सीकरण अवस्था में आकर f0 विन्यास प्राप्त कर लेता है। यूरोपियम तथा इटर्बियम +2 ऑक्सीकरण अवस्था में क्रमशः f7 तथा f14 विन्यास प्राप्त कर लेते हैं। ये तथ्य इस धारणा का समर्थन करते प्रतीत होते हैं कि लैन्थेनाइडों के लिए +3 के अतिरिक्त दूसरी ऑक्सीकरण अवस्थाओं का अस्तित्व निर्धारित करने में f0, f7 तथा f14 विन्यास का विशेष स्थायित्व महत्त्वपूर्ण है, परन्तु यह तर्क कम निर्णयात्मक हो जाता है जब हम देखते हैं कि सैमेरियम और थूलियम f0 तथा f13 विन्यास रखते हुए M2+ आयन बनाते हैं, M+ आयन नहीं। साथ ही प्रेजियोडिमियम एवं नियोडिमियम f1 तथा f2 विन्यासों के साथ M4+ आयन बनाते हैं, परन्तु कोई पंच या षट-संयोजक प्रकार के आयन नहीं बनाते। इसमें सन्देह नहीं है कि Sm (II) और विशेषकर Tm (II), Pr (IV) तथा Nd (IV) अवस्थाएँ बहुत अस्थायी हैं, परन्तु यह विचार भी संदिग्ध है कि f0, f7 या f14 विन्यास के केवल समीप पहुँच जाना भी स्थायित्व के लिए सहायक होता है चाहे ऐसा कोई विन्यास वस्तुतः प्राप्त नहीं भी हो। Nd2+ (f4) का अस्तित्व यह विश्वास करने के लिए विशेष निर्णयात्मक प्रमाण है कि यद्यपि f0, f7, f14 विन्यास का स्थायित्व ऑक्सीकरण अवस्थाओं का स्थायित्व निर्धारण करने में एक घटक हो सकता है, यद्यपि अन्य ऊष्मागतिकीय तथा गतिकीय घटक विशेष भी हैं जिनका समान या अधिक महत्त्व है।
In simple words: लैन्थेनाइड मुख्य रूप से +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं, जो सबसे सामान्य है। कुछ तत्व +2 या +4 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ भी दिखा सकते हैं, जो अक्सर स्थिर f0, f7 या f14 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से जुड़े होते हैं, हालांकि अन्य ऊर्जा संबंधी कारक भी महत्वपूर्ण हैं।

🎯 Exam Tip: लैन्थेनाइडों में +3 ऑक्सीकरण अवस्था की प्रबलता को याद रखें और समझें कि +2 और +4 अवस्थाएँ क्यों और किन तत्वों द्वारा प्रदर्शित की जाती हैं (f0, f7, f14 स्थायित्व)।

Question 11. कारण देते हुए स्पष्ट कीजिए –
(1) संक्रमण धातुएँ तथा उनके अधिकांश यौगिक अनुचुम्बकीय हैं।
Answer: पदार्थों में अनुचुम्बकत्व की उत्पत्ति, अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण होती है। प्रतिचुम्बकीय पदार्थ वे होते हैं जिनमें सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं। संक्रमण धातु आयनों में प्रतिचुम्बकत्व तथा अनुचुम्बकत्व दोनों होते हैं अर्थात् इनमें दो विपरीत प्रभाव पाए जाते हैं, इसलिए परिकलित चुम्बकीय आघूर्ण इनका परिणामी चुम्बकीय आघूर्ण माना जाता है। d0 (Sc3+, Ti4+) या d10 (Cu+, Zn2+) विन्यासों को छोड़कर, संक्रमण धातुओं के सभी सरल आयनों में इनके (n - 1) d उपकोशों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं; अतः ये अधिकांशतः अनुचुम्बकीय होते हैं। ऐसे अयुग्मित इलेक्ट्रॉन का चुम्बकीय आघूर्ण, प्रचक्रण कोणीय संवेग तथा कक्षीय कोणीय संवेग से सम्बन्धित होता है। प्रथम संक्रमण श्रेणी की धातुओं के यौगिकों में कक्षीय कोणीय संवेग को योगदान प्रभावी रूप से शमित (quench) हो जाता है, इसलिए इसका कोई महत्त्व नहीं रह जाता । अतः इनके लिए चुम्बकीय आघूर्ण का निर्धारण उसमें उपस्थित अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या के आधार पर किया जाता है तथा इसकी गणना निम्नलिखित 'प्रचक्रण मात्र' सूत्र द्वारा की जाती है- \( \mu = \sqrt{n(n+2)} \) यहाँ n अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है तथा \( \mu \) चुम्बकीय आघूर्ण है जिसका मात्रक बोर मैग्नेटॉन (BM) है। अतः एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन का चुम्बकीय आघूर्ण 1.73 BM होता है।
In simple words: संक्रमण धातुएँ और उनके यौगिक अनुचुम्बकीय होते हैं क्योंकि उनके (n-1)d कक्षकों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, जिससे एक शुद्ध चुंबकीय आघूर्ण उत्पन्न होता है।

🎯 Exam Tip: अनुचुम्बकत्व अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण होता है, और 'प्रचक्रण-मात्र' सूत्र (\( \mu = \sqrt{n(n+2)} \)) का उपयोग करके चुंबकीय आघूर्ण की गणना की जा सकती है।

Question 11. कारण देते हुए स्पष्ट कीजिए –
(2) संक्रमण धातुओं की कणन एन्थैल्पी के मान उच्च होते हैं।
Answer: संक्रमण धातुओं की कणन एन्थैल्पी के मान उच्च होते हैं क्योंकि इनके परमाणुओं में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिक होती है। इस कारण इनमें प्रबल अन्तरापरमाण्विक अन्योन्य-क्रियाएँ होती हैं। तथा इसलिए परमाणुओं के मध्य प्रबल आबन्ध उपस्थित होते हैं।
In simple words: संक्रमण धातुओं की कणन एन्थैल्पी उच्च होती है क्योंकि उनके d-कक्षकों में बड़ी संख्या में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, जो मजबूत धात्विक आबन्धों के निर्माण में योगदान करते हैं।

🎯 Exam Tip: उच्च कणन एन्थैल्पी मजबूत धात्विक आबन्धों को दर्शाती है, जो अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की भागीदारी के कारण होते हैं।

Question 11. कारण देते हुए स्पष्ट कीजिए –
(3) संक्रमण धातुएँ सामान्यतः रंगीन यौगिक बनाती हैं।
Answer: अधिकांश संक्रमण धातु आयन विलयन तथा ठोस अवस्थाओं में रंगीन होते हैं। ऐसा दृश्य प्रकाश के आंशिक अवशोषण के कारण होता है। अवशोषित प्रकाश इलेक्ट्रॉन को समान d-उपकोश के एक कक्षक से दूसरे कक्षक में उत्तेजित कर देता है। चूंकि इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण धातु आयनों के d-कक्षकों में होते हैं, इसलिए ये d-d संक्रमण कहलाते हैं। संक्रमण धातु आयनों में दृश्य प्रकाश को अवशोषित करके होने वाले d-d संक्रमणों के कारण ही ये रंगीन दिखाई देते हैं।
In simple words: संक्रमण धातु यौगिक रंगीन होते हैं क्योंकि d-कक्षक में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन दृश्य प्रकाश को अवशोषित करके एक d-कक्षक से दूसरे d-कक्षक में उत्तेजित हो सकते हैं (d-d संक्रमण), जिससे पूरक रंग उत्सर्जित होता है।

🎯 Exam Tip: d-d संक्रमण रंगीन यौगिकों का प्राथमिक कारण है; जिन आयनों में d0 या d10 विन्यास होता है वे रंगहीन होते हैं।

Question 11. कारण देते हुए स्पष्ट कीजिए –
(4) संक्रमण धातुएँ तथा इनके अनेक यौगिक उत्तम उत्प्रेरक का कार्य करते हैं।
Answer: संक्रमण धातुएँ तथा इनके यौगिक उत्प्रेरकीय सक्रियता के लिए जाने जाते हैं। संक्रमण धातुओं का यह गुण उनकी परिवर्तनशील संयोजकता एवं संकुल यौगिक के बनाने के गुण के कारण है। वैनेडियम (V) ऑक्साइड (संस्पर्श प्रक्रम में), सूक्ष्म विभाजित आयरन (हेबर प्रक्रम में) और निकिल (उत्प्रेरकीय हाइड्रोजनीकरण में) संक्रमण धातुओं के द्वारा उत्प्रेरण के कुछ उदाहरण हैं। उत्प्रेरक के ठोस पृष्ठ पर अभिकारक के अणुओं तथा उत्प्रेरक की सतह के परमाणुओं के बीच आबन्धों की रचना होती है। आबन्ध बनाने के लिए प्रथम संक्रमण श्रेणी की धातुएँ 3d एवं 4s इलेक्ट्रॉनों का उपयोग करती हैं, परिणामस्वरूप उत्प्रेरक की सतह पर अभिकारक की सान्द्रता में वृद्धि हो जाती है तथा अभिकारक के अणुओं में उपस्थित आबन्ध दुर्बल हो जाते हैं। इन कारण सक्रियण ऊर्जा का मान घटे जाता है। ऑक्सीकरण अवस्थाओं में परिवर्तन हो सकने के कारण संक्रमण धातुएँ उत्प्रेरक के रूप में अधिक प्रभावी होती हैं। उदाहरणार्थ – आयरन (III), आयोडाइड आयन तथा परसल्फेट आयन के बीच सम्पन्न होने वाली अभिक्रिया को उत्प्रेरित करता है। \[ 2I^- + S_2O_8^{2-} \longrightarrow I_2 \uparrow + 2SO_4^{2-} \] इस उत्प्रेरकीय अभिक्रिया का स्पष्टीकरण इस प्रकार है –

  • \[ 2Fe^{3+} + 2I^- \longrightarrow 2Fe^{2+} + I_2 \uparrow \]
  • \[ 2Fe^{2+} + S_2O_8^{2-} \longrightarrow 2Fe^{3+} + 2SO_4^{2-} \]

In simple words: संक्रमण धातुएँ और उनके यौगिक उत्कृष्ट उत्प्रेरक होते हैं क्योंकि वे परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित कर सकते हैं और जटिल यौगिक बना सकते हैं, जिससे सक्रियण ऊर्जा कम हो जाती है और अभिक्रिया दर बढ़ जाती है।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों की उत्प्रेरक प्रकृति उनकी परिवर्तनशील संयोजकता और जटिल यौगिक बनाने की क्षमता से सीधे जुड़ी होती है, जिससे वे सक्रियण ऊर्जा को कम कर पाते हैं।

Question 12. अन्तराकाशी यौगिक क्या हैं? इस प्रकार के यौगिक संक्रमण धातुओं के लिए भली प्रकार से ज्ञात क्यों हैं?
Answer: वे यौगिक जिनके क्रिस्टल जालक में अन्तराकाशी स्थलों को छोटे आकार वाले परमाणु अध्यासित कर लेते हैं, अन्तराकाशी यौगिक कहलाते हैं। अन्तराकाशी यौगिक संक्रमण धातुओं के लिए भली प्रकार से ज्ञात होते हैं क्योंकि संक्रमण धातुओं के क्रिस्टल जालकों में उपस्थित रिक्तियों (voids) में छोटे आकार वाले परमाणु; जैसे- H, N या C सरलता से सम्पाशित हो जाते हैं।
In simple words: अन्तराकाशी यौगिक वे होते हैं जहाँ छोटे परमाणु (जैसे H, C, N) संक्रमण धातुओं के क्रिस्टल जालक में रिक्त स्थानों को भरते हैं; संक्रमण धातुएँ इसके लिए उपयुक्त होती हैं क्योंकि उनके पास उपयुक्त आकार के रिक्त स्थान होते हैं।

🎯 Exam Tip: अन्तराकाशी यौगिकों के गुणों में बढ़ी हुई कठोरता, उच्च गलनांक और विद्युत चालकता शामिल होती है।

Question 13. संक्रमण धातुओं की ऑक्सीकरण अवस्थाओं में परिवर्तनशीलता असंक्रमण धातुओं में ऑक्सीकरण अवस्थाओं में परिवर्तनशीलता से किस प्रकार भिन्न है? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
Answer: संक्रमण धातुओं में ऑक्सीकरण अवस्था +1 से एक के क्रमिक परिवर्तन से उच्च अवस्थाओं में परिवर्तित होती है। जैसे, मैंगनीज में यह +2, +3, +4, +5, +6, +7 पायी जाती है। असंक्रमण धातुओं में परिवर्तन चयनात्मक होता है तथा सामान्य रूप से 2 के अन्तर से परिवर्तित होता है, जैसे क्लोरीन में परिवर्तन क्रम -1, +1,+3, +5, +7 है।
In simple words: संक्रमण धातुएँ ऑक्सीकरण अवस्थाओं में क्रमिक परिवर्तन (एक इकाई के अंतर से) दर्शाती हैं, जबकि असंक्रमण धातुएँ चयनात्मक परिवर्तन (दो इकाई के अंतर से) दर्शाती हैं।

🎯 Exam Tip: संक्रमण धातुओं में d-इलेक्ट्रॉनों और s-इलेक्ट्रॉनों के बीच ऊर्जा के छोटे अंतर के कारण क्रमिक परिवर्तन होता है।

Question 14. आयरन क्रोमाइट अयस्क से पोटैशियम डाइक्रोमेट बनाने की विधि का वर्णन कीजिए। पोटैशियम डाइक्रोमेट विलयन पर pH बढ़ाने से क्या प्रभाव पड़ेगा?
Answer: पोटैशियम डाइक्रोमेट बनाने की विधि (Method of Preparation of Potassium Dichromate) - आयरन क्रोमाइट अयस्क (FeCr2O4) को जब वायु की उपस्थिति में सोडियम यो पोटैशियम कार्बोनेट के साथ संगलित किया जाता है तो क्रोमेट प्राप्त होता है। \[ 4FeCr_2O_4 + 8Na_2CO_3 + 7O_2 \longrightarrow 8Na_2CrO_4 + 2Fe_2O_3 + 8CO_2 \uparrow \] सोडियम क्रोमेट के पीले विलयन को छानकर उसे सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा अम्लीय बना लिया जाता है। जिसमें से नारंगी सोडियम डाइक्रोमेट, Na2Cr2O7 . 2H2O को क्रिस्टलित कर लिया जाता है। \[ 2Na_2CrO_4 + 2H^+ \longrightarrow Na_2Cr_2O_7 + 2Na^+ + H_2O \] सोडियम डाइक्रोमेट की विलेयता, पोटैशियम डाइक्रोमेट से अधिक होती है, इसलिए सोडियम डाइक्रोमेट के विलयन में पोटैशियम क्लोराइड डालकर पोटैशियम डाइक्रोमेट प्राप्त कर लिया जाता है। \[ Na_2Cr_2O_7 + 2KCl \longrightarrow K_2Cr_2O_7 + 2NaCl \] पोटैशियम डाइक्रोमेट के नारंगी रंग के क्रिस्टल, क्रिस्टलीकृत हो जाते हैं। जलीय विलयन में क्रोमेट तथा डाइक्रोमेट का अन्तरारूपान्तरण होता है जो विलयन के pH पर निर्भर करता है। क्रोमेट तथा डाइक्रोमेट में क्रोमियम की ऑक्सीकरण संख्या समान है। \[ 2CrO_4^{2-} + 2H^+ \longrightarrow Cr_2O_7^{2-} + H_2O \] \[ Cr_2O_7^{2-} + 2OH^- \longrightarrow 2CrO_4^{2-} + H_2O \] अतः pH बढ़ाने पर, अर्थात् विलयन को क्षारीय करने पर, डाइक्रोमेट आयन (नारंगी रंग) क्रोमेट आयन में परिवर्तित हो जाते हैं तथा विलयन का रंग पीला हो जाता है।
In simple words: पोटैशियम डाइक्रोमेट क्रोमाइट अयस्क से कई चरणों में बनता है: पहले संलयन से क्रोमेट, फिर अम्लीकरण से डाइक्रोमेट और अंत में KCl के साथ अवक्षेपण। pH बढ़ाने पर, नारंगी डाइक्रोमेट आयन पीले क्रोमेट आयन में परिवर्तित हो जाता है।

🎯 Exam Tip: डाइक्रोमेट से क्रोमेट में परिवर्तन अम्लीय-क्षारीय संतुलन का एक क्लासिक उदाहरण है; अभिक्रियाओं को pH के आधार पर याद रखें।

Question 15. पोटैशियम डाइक्रोमेट की ऑक्सीकरण क्रिया का उल्लेख कीजिए तथा निम्नलिखित के साथ आयनिक समीकरण लिखिए-
(1) आयोडाइड आयन
(2) आयरन (II) विलयन
(3) H2S.
Answer: पोटैशियम डाइक्रोमेट प्रबल ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करता है। इसका उपयोग आयतनमितीय विश्लेषण में प्राथमिक मानक के रूप में किया जाता है। अम्लीय माध्यम में डाइक्रोमेट आयन की ऑक्सीकरण क्रिया निम्नलिखित प्रकार से प्रदर्शित की जा सकती है – \[ Cr_2O_7^{2-} + 14H^+ + 6e^- \longrightarrow 2Cr^{3+} + 7H_2O \] आयनिक अभिक्रियाएँ (Ionic Reactions)
(1) आयोडाइड आयन के साथ (With iodide ion) – \[ Cr_2O_7^{2-} + 14H^+ + 6I^- \longrightarrow 2Cr^{3+} + 7H_2O + 3I_2 \uparrow \]
(2) आयरन (II) विलयन के साथ (With Iron (II) solution) \[ Cr_2O_7^{2-} + 14H^+ + 6Fe^{2+} \longrightarrow 2Cr^{3+} + 7H_2O + 6Fe^{3+} \]
(3) H2S के साथ (With H2S) \[ Cr_2O_7^{2-} + 8H^+ + 3H_2S \longrightarrow 2Cr^{3+} + 7H_2O + 3S \downarrow \]
In simple words: पोटैशियम डाइक्रोमेट अम्लीय माध्यम में एक प्रबल ऑक्सीकारक है, जो खुद को Cr3+ में अपचयित करता है और आयोडाइड, Fe(II) आयनों और H2S जैसे पदार्थों को ऑक्सीकृत करता है।

🎯 Exam Tip: डाइक्रोमेट की ऑक्सीकरण क्षमता और अम्लीय माध्यम में होने वाली विशिष्ट अभिक्रियाओं (विशेषकर उत्पादों) को याद रखना महत्वपूर्ण है।

Question 16. पोटैशियम परमैंगनेट को बनाने की विधि का वर्णन कीजिए। अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट किस प्रकार 1. आयरन (II) आयन, 2. SO2 तथा 3. ऑक्सैलिक अम्ल से अभिक्रिया करता है? अभिक्रियाओं के लिए आयनिक समीकरण लिखिए।
Answer: पोटैशियम परमैंगनेट, KMnO4 (Potassium Permanganate, KMnO4) बनाने की विधि (Method of Preparation) - पोटैशियम परमैंगनेट को निम्नलिखित विधियों से बनाया जा सकता है –
(1) पोटैशियम परमैंगनेट को प्राप्त करने के लिए MnO2 को क्षारीय धातु हाइड्रॉक्साइड तथा KNO3 जैसे ऑक्सीकारक के साथ संगलित किया जाता है। इससे गाढ़े हरे रंग का उत्पाद K2MnO4 प्राप्त होता है जो उदासीन या अम्लीय माध्यम में असमानुपातित होकर पोटैशियम परमैंगनेट देता है। \[ 2MnO_2 + 4KOH + O_2 \longrightarrow 2K_2MnO_4 + 2H_2O \] \[ 3MnO_4^{2-} + 4H^+ \longrightarrow 2MnO_4^- + MnO_2 + 2H_2O \]
(2) औद्योगिक स्तर पर इसका उत्पादन MnO2 के क्षारीय ऑक्सीकरणी संगलन के पश्चात् मैंगनेट (VI) के विद्युत-अपघटनी ऑक्सीकरण द्वारा किया जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मैंगनीज डाइऑक्साइड (MnO₂) से पोटैशियम परमैंगनेट (MnO₄⁻) के औद्योगिक उत्पादन की प्रक्रिया को दर्शाता है। इसमें पहले MnO₂ को KOH और ऑक्सीकारक (वायु या KNO₃) के साथ संगलित करके मैंगनेट आयन (MnO₄²⁻) बनाया जाता है, और फिर इस मैंगनेट आयन को क्षारीय विलयन में विद्युत-अपघटनी ऑक्सीकरण द्वारा परमैंगनेट आयन में परिवर्तित किया जाता है।
(3) प्रयोगशाला में मैंगनीज (II) आयन के लवण परऑक्सीडाइसल्फेट द्वारा ऑक्सीकृत होकर परमैंगनेट बनाते हैं। \[ 2Mn^{2+} + 5S_2O_8^{2-} + 8H_2O \longrightarrow 2MnO_4^- + 10SO_4^{2-} + 16H^+ \] रासायनिक अभिक्रियाएँ (Chemical Reactions) अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट की रासायनिक अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं –
(1) आयरन (II) आयन के साथ (With Iron (II) ion) \[ MnO_4^- + 8H^+ + 5Fe^{2+} \longrightarrow Mn^{2+} + 4H_2O + 5Fe^{3+} \]
(2) SO2 के साथ (With SO2) \[ 2MnO_4^- + 2H_2O + 5SO_2 \longrightarrow 2Mn^{2+} + 4H^+ + 5SO_4^{2-} \]
(3) ऑक्सैलिक अम्ल के साथ (With oxalic acid) \[ 2MnO_4^- + 16H^+ + 5(COO^-)_2 \longrightarrow 2Mn^{2+} + 8H_2O + 10CO_2 \uparrow \]
In simple words: पोटैशियम परमैंगनेट को मैंगनीज डाइऑक्साइड से (1) संलयन और असमानुपातन या (2) औद्योगिक विद्युत-अपघटनी ऑक्सीकरण द्वारा तैयार किया जा सकता है। अम्लीय KMnO4 एक प्रबल ऑक्सीकारक है, जो Fe(II), SO2 और ऑक्सैलिक अम्ल जैसे पदार्थों को ऑक्सीकृत करता है।

🎯 Exam Tip: पोटैशियम परमैंगनेट की तैयारी के दोनों तरीकों (प्रयोगशाला और औद्योगिक) और अम्लीय माध्यम में इसकी ऑक्सीकरण अभिक्रियाओं के उत्पादों को याद रखें।

Question 17. M2+ | M तथा M3+ | M2+ निकाय के सन्दर्भ में कुछ धातुओं के E- के मान नीचे दिए गए हैं।
Cr2+ | Cr -0.9 V
Mn2+ | Mn -1.2 V
Fe2+ | Fe -0.4 V
Cr3+ | Cr2+ -0.4 V
Mn3+ | Mn2+ + 1.5 V
Fe3+ | Fe2+ + 0.8 V
उपर्युक्त आँकड़ों के आधार पर निम्नलिखित पर टिप्पणी कीजिए –

(1) अम्लीय माध्यम में Cr3+ या Mn3+ की तुलना में Fe3+ का स्थायित्व ।
Answer:
(1) Cr3+ / Cr2+ के लिए E- का मान ऋणात्मक है। इसलिए Cr3+ स्थायी है तथा Cr2+ में अपचयित नहीं हो सकता है। Mn3+ / Mn2+ के लिए E- का मान अधिक धनात्मक है, इसलिए Mn3+ बहुत स्थायी नहीं है तथा सरलता से Mn2+ में अपचयित हो सकता है। Fe3+ / Fe2+ के लिए E- का मान कम धनात्मक लेकिन छोटा है। इसलिए Fe3+, Mn3+ से अधिक स्थायी है। लेकिन यह Cr2+ से कम स्थायी है।
In simple words: E- मानों के आधार पर, Fe3+ Mn3+ की तुलना में अधिक स्थायी है क्योंकि Fe3+/Fe2+ के लिए E- मान कम धनात्मक है, जिसका अर्थ है कि Fe3+ आसानी से Fe2+ में अपचयित नहीं होता। Mn3+ बहुत अस्थिर है (उच्च धनात्मक E- मान), जबकि Cr3+ काफी स्थिर है (ऋणात्मक E- मान)।

🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रोड विभव (E-) मानों की व्याख्या करना सीखें: अधिक धनात्मक E- मान का अर्थ है कि ऑक्सीकृत प्रजाति अधिक स्थायी है और आसानी से अपचयित हो सकती है।

Question 17. M2+ | M तथा M3+ | M2+ निकाय के सन्दर्भ में कुछ धातुओं के E- के मान नीचे दिए गए हैं।
Cr2+ | Cr -0.9 V
Mn2+ | Mn -1.2 V
Fe2+ | Fe -0.4 V
Cr3+ | Cr2+ -0.4 V
Mn3+ | Mn2+ + 1.5 V
Fe3+ | Fe2+ + 0.8 V
उपर्युक्त आँकड़ों के आधार पर निम्नलिखित पर टिप्पणी कीजिए –

(2) समान प्रक्रिया के लिए क्रोमियम अथवा मैंगनीज धातुओं की तुलना में आयरन के ऑक्सीकरण में सुगमता ।
Answer:
(2) Fe, Cr तथा Mn के लिए ऑक्सीकरण विभव क्रमशः +0.4 V, + 0.9 V तथा +1.2V है। इसलिए इनके ऑक्सीकरण की सुलभता का क्रम Mn > Cr > Fe होगा।
In simple words: Mn Fe और Cr की तुलना में आसानी से ऑक्सीकृत होता है, क्योंकि इसका M2+/M इलेक्ट्रोड विभव सबसे अधिक ऋणात्मक (-1.2 V) है, जो ऑक्सीकरण के लिए प्रबल प्रवृत्ति का संकेत देता है।

🎯 Exam Tip: अधिक ऋणात्मक M2+/M मानक इलेक्ट्रोड विभव वाली धातुएँ आसानी से ऑक्सीकृत होती हैं।

Question 18. निम्नलिखित में कौन-से आयन जलीय विलयन में रंगीन होंगे? Ti3+, V3+, Cu+, Sc3+, Mn2+, Fe3+ तथा Co2+ प्रत्येक के लिए कारण बताइए।
Answer: वे आयन रंगीन होते हैं जिनमें एक या अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं। Ti3+, V3+, Mn2+, Fe3+ तथा Co2+ रंगीन होते हैं। Cu+ तथा Sc3+ रंगहीन होते हैं।
In simple words: जलीय विलयन में केवल वे आयन रंगीन होते हैं जिनके d-कक्षकों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं (जैसे Ti3+, V3+, Mn2+, Fe3+, Co2+), क्योंकि ये d-d संक्रमणों में सक्षम होते हैं। पूर्ण भरे (d10) या खाली (d0) d-कक्षक वाले आयन रंगहीन होते हैं (जैसे Cu+, Sc3+)।

🎯 Exam Tip: रंगीनता के लिए d-d संक्रमणों की आवश्यकता होती है, जिसके लिए d-कक्षक में कम से कम एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन का होना अनिवार्य है।

Question 19. प्रथम संक्रमण श्रेणी की धातुओं की +2 ऑक्सीकरण अवस्थाओं के स्थायित्व की तुलना कीजिए।
Answer: प्रथम संक्रमण श्रेणी के प्रथम अर्द्धभाग में बढ़ते हुए परमाणु क्रमांक के साथ प्रथम तथा द्वितीय आयनन एन्थैल्पियों का योग बढ़ता है। अतः मानक अपचायक विभव (E-) कम तथा ऋणात्मक होता है। इसलिए M2+ आयन बनाने की प्रवृत्ति घटती है। अतः +2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रथम अर्द्ध-भाग में अधिक स्थायी होती है। +2 ऑक्सीकरण अवस्था का अधिक स्थायित्व, Mn2+ में अर्द्धपूरित d-उपकोशों (d5) के कारण, Zn2+ में पूर्णपूरित d-उपकोशों (d10) के कारण तथा निकिल में उच्च ऋणात्मक जलयोजन एन्थैल्पी के कारण होता है।
In simple words: प्रथम संक्रमण श्रेणी में +2 ऑक्सीकरण अवस्था की स्थिरता आयनन एन्थैल्पी, अर्ध-भरित (Mn2+, d5) या पूर्ण-भरित (Zn2+, d10) d-कक्षकों की विशेष स्थिरता और उच्च जलयोजन एन्थैल्पी (Ni2+) जैसे कारकों पर निर्भर करती है।

🎯 Exam Tip: d-कक्षक में इलेक्ट्रॉनों की संख्या और जलयोजन एन्थैल्पी के प्रभाव को ध्यान में रखकर M2+ आयनों की सापेक्ष स्थिरता का विश्लेषण करें।

Question 20. निम्नलिखित के सन्दर्भ में लैन्थेनाइड एवं ऐक्टिनाइड के रसायन की तुलना कीजिए –
(1) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
Answer:
(1) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration) - लैन्थेनाइडों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Xe]54 4f1-14 5d0-1 6s2 होता है, जबकि ऐक्टिनाइडों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Rn]86 5f1-14 6d1-2 7s2 होता है। अतः लैन्थेनाइड 4f श्रेणी से तथा ऐक्टिनाइड 5f श्रेणी से सम्बद्ध होते हैं।
In simple words: लैन्थेनाइड 4f श्रेणी से संबंधित होते हैं ([Xe] 4f1-14 5d0-1 6s2), जबकि ऐक्टिनाइड 5f श्रेणी से संबंधित होते हैं ([Rn] 5f1-14 6d1-2 7s2)।

🎯 Exam Tip: लैन्थेनाइड और ऐक्टिनाइड के सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में f-कक्षक की भराई (4f बनाम 5f) पर ध्यान दें।

Question 20. निम्नलिखित के सन्दर्भ में लैन्थेनाइड एवं ऐक्टिनाइड के रसायन की तुलना कीजिए –
(2) परमाण्वीय एवं आयनिक आकार
Answer:
(2) परमाण्वीय एवं आयनिक आकार (Atomic and ionic sizes) - लैन्थेनाइड तथा ऐक्टिनाइड दोनों +3 ऑक्सीकरण अवस्था में अपने परमाणुओं अथवा आयनों के आकारों में कमी प्रदर्शित करते हैं। लैन्थेनाइडों में यह कमी लैन्थेनाइड आकुंचन कहलाती है, जबकि ऐक्टिनाइडों में यह ऐक्टिनाइड आकुंचन कहलाती है। यद्यपि ऐक्टिनाइडों में एक तत्व से दूसरे तत्व तक 5f-इलेक्ट्रॉनों द्वारा अत्यन्त कम परिरक्षण प्रभाव के कारण आकुंचन उत्तरोत्तर बढ़ता है।
In simple words: दोनों श्रेणी के तत्व परमाणु क्रमांक बढ़ने पर आकुंचन (क्रमशः लैन्थेनाइड और ऐक्टिनाइड संकुचन) दर्शाते हैं, लेकिन 5f इलेक्ट्रॉनों के खराब परिरक्षण के कारण ऐक्टिनाइड संकुचन अधिक स्पष्ट होता है।

🎯 Exam Tip: लैन्थेनाइड और ऐक्टिनाइड संकुचन को उनके संबंधित f-इलेक्ट्रॉनों के परिरक्षण प्रभाव से जोड़ें।

Question 20. निम्नलिखित के सन्दर्भ में लैन्थेनाइड एवं ऐक्टिनाइड के रसायन की तुलना कीजिए –
(3) ऑक्सीकरण अवस्था
Answer:
(3) ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation states) - लैन्थेनाइड सीमित ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (+2, +3, +4) प्रदर्शित करते हैं जिनमें +3 ऑक्सीकरण अवस्था सबसे अधिक सामान्य है। इसका कारण 4f, 5d तथा 6s उपकोशों के बीच अधिक ऊर्जा-अन्तर होना है। दूसरी ओर ऐक्टिनाइड अधिक संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं क्योंकि 5f,6d तथा 7s उपकोशों में ऊर्जा-अन्तर कम होता है।
In simple words: लैन्थेनाइड मुख्य रूप से +3 ऑक्सीकरण अवस्था दिखाते हैं (सीमित +2, +4 के साथ), जबकि ऐक्टिनाइडों में 5f, 6d और 7s कक्षकों के बीच ऊर्जा अंतर कम होने के कारण +2 से +7 तक ऑक्सीकरण अवस्थाओं की एक विस्तृत श्रृंखला होती है।

🎯 Exam Tip: ऑक्सीकरण अवस्थाओं की सीमा f, d और s कक्षकों के बीच ऊर्जा अंतर पर निर्भर करती है; कम अंतर अधिक विविधता की ओर ले जाता है।

Question 20. निम्नलिखित के सन्दर्भ में लैन्थेनाइड एवं ऐक्टिनाइड के रसायन की तुलना कीजिए –
(4) रासायनिक अभिक्रियाशीलता।
Answer:
(4) रासायनिक अभिक्रियाशीलता (Chemical reactivity) - लैन्थेनाइड (Lanthanides) सामान्य रूप से श्रेणी के आरम्भ वाले सदस्य अपने रासायनिक व्यवहार में कैल्सियम की तरह बहुत क्रियाशील होते हैं, परन्तु बढ़ते परमाणु क्रमांक के साथ ये ऐलुमिनियम की तरह व्यवहार करते हैं। अर्द्ध- अभिक्रिया Ln3+ (aq) + 3e- → Ln(s) के लिए E- का मान -2.2 V से -2.4 V के परास में है। Eu के लिए E- का मान -2.0 V है। निस्सन्देह मान में थोड़ा-सा परिवर्तन है। हाइड्रोजन गैस के वातावरण में मन्द गति से गर्म करने पर ये धातुएँ हाइड्रोजन से संयोग कर लेती हैं। इन धातुओं को कार्बन के साथ गर्म करने पर कार्बाइड- Ln3C, Ln2C3 तथा LnC2 बनते हैं। ये तनु अम्लों से हाइड्रोजन गैस मुक्त करती हैं तथा हैलोजेन के वातावरण में जलने पर हैलाइड बनाती हैं। ये ऑक्साइड M2O3 तथा हाइड्रॉक्साइड M(OH)3 बनाती हैं। हाइड्रॉक्साइड निश्चित यौगिक हैं न कि केवल हाइड्रेटेड (जलयोजित) ऑक्साइड । ये क्षारीय मृदा धातुओं के ऑक्साइड तथा हाइड्रॉक्साइड की भाँति क्षारकीय होते हैं। इनकी सामान्य अभिक्रियाएँ चित्र-3 में प्रदर्शित की गई हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र लैन्थेनाइड (Ln) तत्वों की विभिन्न रासायनिक अभिक्रियाओं को दर्शाता है। इसमें दिखाया गया है कि लैन्थेनाइड ऑक्सीजन (O₂) के साथ मिलकर ऑक्साइड (Ln₂O₃), सल्फर (S) के साथ सल्फाइड (Ln₂S₃), नाइट्रोजन (N₂) के साथ नाइट्राइड (LnN), अम्ल के साथ H₂ गैस, हैलोजेन के साथ हैलाइड (LnX₃), जल (H₂O) के साथ हाइड्रॉक्साइड (Ln(OH)₃) और H₂ गैस, तथा कार्बन के साथ कार्बाइड (LnC₂) बनाते हैं। ऐक्टिनाइड (Actinides) - ऐक्टिनाइड अत्यधिक अभिक्रियाशील धातुएँ हैं, विशेषकर जब वे सूक्ष्मविभाजित हों। इन पर उबलते हुए जल की क्रिया से ऑक्साइड तथा हाइड्राइड का मिश्रण प्राप्त होता है और अधिकांश अधातुओं से संयोजन सामान्य ताप पर होता है । हाइड्रोक्लोरिक अम्ल सभी धातुओं को प्रभावित करता है, परन्तु अधिकतर धातुएँ नाइट्रिक अम्ल द्वारा अल्प प्रभावित होती हैं, इसका कारण यह है कि इन धातुओं पर ऑक्साइड की संरक्षी सतह बन जाती है। क्षारों का इन धातुओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
In simple words: लैन्थेनाइड कैल्शियम की तरह सक्रिय होते हैं, जो ऑक्साइड, हाइड्राइड, कार्बाइड और हैलाइड बनाते हैं। ऐक्टिनाइड और भी अधिक सक्रिय होते हैं, खासकर जब finely divided, और ऑक्साइड, हाइड्राइड और विभिन्न अम्ल उत्पादों के साथ प्रतिक्रिया करते हैं, लेकिन नाइट्रिक अम्ल के साथ passivation दिखाते हैं।

🎯 Exam Tip: लैन्थेनाइडों और ऐक्टिनाइडों दोनों के लिए विशिष्ट रासायनिक अभिक्रियाओं और उनके उत्पादों को याद रखें।

Question 21. आप निम्नलिखित को किस प्रकार से स्पष्ट करेंगे –
(1) d4 स्पीशीज में से Cr2+ प्रबल अपचायक है, जबकि मैंगनीज (III) प्रबल ऑक्सीकारक है।
Answer:
(1) Cr2+ प्रबल अपचायक होता है क्योंकि इसमें 3d4 से 3d3 का परिवर्तन निहित है। 3d3 विन्यास (t2g) अधिक स्थायी है। Mn3+ के ऑक्सीकारक गुणों में 3d4 से 3d5 का परिवर्तन होता है। तथा 3d5 अधिक स्थायी विन्यास है। यही कारण है कि Mn3+ प्रबल ऑक्सीकारक है।
In simple words: Cr2+ (d4) एक प्रबल अपचायक है क्योंकि यह अधिक स्थिर Cr3+ (d3) में ऑक्सीकृत होता है, जबकि Mn3+ (d4) एक प्रबल ऑक्सीकारक है क्योंकि यह अधिक स्थिर Mn2+ (d5) में अपचयित होता है।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों की अपचायक या ऑक्सीकारक शक्ति ऑक्सीकरण के बाद बनने वाले उत्पादों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास की स्थिरता से संबंधित होती है (जैसे d3 और d5 स्थिरता)।

Question 21. आप निम्नलिखित को किस प्रकार से स्पष्ट करेंगे –
(2) जलीय विलयन में कोबाल्ट (II) स्थायी है, परन्तु संकुलनकारी अभिकर्मकों की उपस्थिति में यह सरलतापूर्वक ऑक्सीकृत हो जाता है।
Answer:
(2) जटिलीकरण (complexing) अभिकर्मकों की उपस्थिति में क्रिस्टल फील्ड स्थिरीकरण ऊर्जा (CFSE) कोबाल्ट की तृतीय आयनन एन्थैल्पी से अधिक होती है। इस प्रकार Co (II) सरलता से Co (III) में ऑक्सीकृत हो जाता है।
In simple words: कोबाल्ट (II) जलीय विलयन में स्थिर होता है, लेकिन जब संकुल बनाने वाले अभिकर्मक उपस्थित होते हैं, तो यह आसानी से कोबाल्ट (III) में ऑक्सीकृत हो जाता है, क्योंकि बनने वाले Co(III) संकुल की क्रिस्टल फील्ड स्थिरीकरण ऊर्जा उच्च आयनन एन्थैल्पी को पार कर जाती है।

🎯 Exam Tip: CFSE संक्रमण धातु आयनों की स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, खासकर जब जटिल यौगिक बनते हैं।

Question 21. आप निम्नलिखित को किस प्रकार से स्पष्ट करेंगे –
(3) आयनों का d1 विन्यास अत्यन्त अस्थायी है।
Answer:
(3) वे आयन जिनमें d1 विन्यास होता है, वे d-उपकक्ष में उपस्थित इलेक्ट्रॉन को त्यागने की प्रवृत्ति रखते हैं तथा अधिक स्थायी d0 विन्यास प्राप्त कर लेते हैं। यह सरलता से सम्पन्न हो सकता है। क्योंकि जलयोजन या जालक ऊर्जा का मान d-उपकक्ष से इलेक्ट्रॉन के पृथक्कीकरण में निहित आयनन एन्थैल्पी से अधिक होता है।
In simple words: d1 विन्यास वाले आयन अत्यधिक अस्थायी होते हैं क्योंकि वे अपने एकमात्र d-इलेक्ट्रॉन को आसानी से खोकर अधिक स्थिर d0 विन्यास प्राप्त करते हैं, जिसकी ऊर्जा जलयोजन या जालक ऊर्जा द्वारा संतुलित होती है।

🎯 Exam Tip: d1 से d0 परिवर्तन के लिए ऊर्जा की लागत को जलयोजन या जालक ऊर्जा से मुआवजा मिलने पर d1 विन्यास अस्थायी हो जाता है।

Question 22. असमानुपातन से आप क्या समझते हैं? जलीय विलयन में असमानुपातन अभिक्रियाओं के दो उदाहरण दीजिए।
Answer: किसी रासायनिक अभिक्रिया के फलस्वरूप किसी पदार्थ का एक समय में ऑक्सीकरण व अपचयन समानुपातीकरण कहलाता है। इस प्रकार, पदार्थ की ऑक्सीकरण अवस्था बढ़ती भी है तथा घटती भी है। जैसे, \[ 3Cl_2 + 6OH^- \longrightarrow 5Cl^- + ClO_3^- + 3H_2O \] \[ 3MnO_4^{2-} + 4H^+ \longrightarrow 2MnO_4^- + MnO_2 + 2H_2O \]
In simple words: असमानुपातन एक ऐसी अभिक्रिया है जिसमें एक ही प्रजाति एक साथ ऑक्सीकृत और अपचयित होती है, जिससे इसकी ऑक्सीकरण अवस्था बढ़ती और घटती दोनों है।

🎯 Exam Tip: असमानुपातन अभिक्रियाओं को पहचानना सीखें जहाँ एक ही तत्व विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं में बदलता है।

Question 23. प्रथम संक्रमण श्रेणी में कौन-सी धातु बहुधा तथा क्यों +1 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाती हैं?
Answer: Cu(3d10 4s1) प्रायः +1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है तथा Cu+ आयन (3d10) बनाता है, जिसकी अधिक स्थायी विन्यास होता है।
In simple words: कॉपर अक्सर +1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है क्योंकि Cu+ आयन में एक स्थिर और पूर्ण भरा 3d10 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होता है।

🎯 Exam Tip: पूर्ण भरे d-कक्षक (d10) अत्यधिक स्थिर होते हैं, जो कॉपर में +1 ऑक्सीकरण अवस्था की प्रबलता की व्याख्या करते हैं।

Question 24. निम्नलिखित गैसीय आयनों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की गणना कीजिए – Mn3+, Cr3+, V3+ तथा Ti3+ इनमें से कौन-सा जलीय विलयन में अतिस्थायी है?
Answer: Mn3+; 3d4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 4 Cr3+; 3d3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 3 V3+; 3d2 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 2 Ti3+; 3d1 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 1 इनमें से Cr3+ जलीय विलयन में अतिस्थायी हैं, क्योंकि इनमें अर्द्धपूरित t2g स्तर होता है।
In simple words: Mn3+ में 4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन (3d4), Cr3+ में 3 (3d3), V3+ में 2 (3d2), और Ti3+ में 1 (3d1) होता है। जलीय विलयन में Cr3+ सबसे स्थिर है क्योंकि इसमें एक अर्ध-भरित t2g विन्यास होता है।

🎯 Exam Tip: d-कक्षक विन्यास से अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या निर्धारित करना सीखें और जलीय विलयन में स्थिरता के लिए t2g कक्षकों के स्थिरीकरण पर विचार करें।

 

Question 26. निम्नलिखित को बनाने के लिए विभिन्न पदों का उल्लेख कीजिए -
(i) क्रोमाइट अयस्क से K2Cr2O7
(ii) पाइरोलुसाइट से KMnO4
Answer: (i) क्रोमाइट अयस्क से K2Cr2O7 (K2Cr2O7 from chromite ore) - अभ्यास प्रश्न 14 का उत्तर देखें ।
(ii) पाइरोलुसाइट से KMnO4(KMnO4 from pyrolusite) - अभ्यास प्रश्न 16 का (ii) देखें ।
In simple words: यह प्रश्न पोटैशियम डाइक्रोमेट और पोटैशियम परमैंगनेट बनाने की विधियों के बारे में है, जिनके उत्तर पिछले अभ्यास प्रश्नों में दिए गए हैं।

🎯 Exam Tip: रिएक्शंस के साथ बनाने की विधि का विस्तृत वर्णन करने पर अच्छे अंक मिलते हैं।

 

Question 27. मिश्रातुएँ क्या हैं? लैन्थेनाइड धातुओं से युक्त एक प्रमुख मिश्रातु का उल्लेख कीजिए। इसके उपयोग भी बताइए ।
Answer: दो या दो से अधिक धातुओं या धातुओं व अधातुओं का समांग मिश्रण मिश्रातु कहलाती है। मिश धातु एक महत्त्वपूर्ण मिश्रातु है, जिसमें 30-35% सीरियम तथा कुछ मात्रा में अन्य हल्की लैन्थेनाइड धातु Zr होती है। यह धातुकर्म में अपचायक के रूप में प्रयोग होती है। 30% मिश्रातु तथा 1% Zr धातु युक्त मैग्नीशियम मिश्रातु का प्रयोग जेट इंजन में किया जाता है।
In simple words: मिश्रातु दो या दो से अधिक धातुओं का मिश्रण होता है, और मिश धातु एक विशेष लैन्थेनाइड मिश्रातु है जिसका उपयोग धातुओं को शुद्ध करने और जेट इंजनों में होता है।

🎯 Exam Tip: मिश्रातु की परिभाषा, उदाहरण और उपयोगों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 28. आन्तरिक संक्रमण तत्व क्या हैं? बताइए कि निम्नलिखित में कौन-से परमाणु क्रमांक आन्तरिक संक्रमण तत्वों के हैं - 29, 59, 74, 95, 102, 104
Answer: वे तत्त्व जिनमें विभेदी इलेक्ट्रॉन (n - 2) f-उपकक्षक में प्रवेश करता है, अन्तः संक्रमण तत्त्व कहलाते हैं। दिये गये तत्त्वों में 59,95 तथा 102 परमाणु क्रमांक वाले तत्त्व अन्तः संक्रमण तत्त्व हैं।
In simple words: आन्तरिक संक्रमण तत्व वे होते हैं जिनके इलेक्ट्रॉन f-उपकोश में जाते हैं। दिए गए क्रमांकों में 59, 95 और 102 आंतरिक संक्रमण तत्व हैं।

🎯 Exam Tip: आंतरिक संक्रमण तत्वों की परिभाषा और उनके परमाणु क्रमांकों को पहचानना महत्वपूर्ण है।

 

Question 29. ऐक्टिनाइड तत्वों का रसायन उतना नियमित नहीं है जितना कि लैन्थेनाइड तत्वों का रसायन । इन तत्वों की ऑक्सीकरण अवस्थाओं के आधार पर इस कथन का आधार प्रस्तुत कीजिए।
Answer: लैन्थेनाइडों की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ +2, +3 तथा +4 हैं। इनमें से +3 अवस्था सर्वाधिक सामान्य है। ऑक्सीकरण अवस्थाओं की सीमित संख्या का कारण 4f, 5d तथा 6s उपकक्षाओं के बीच अधिक ऊर्जा अन्तर होना है। इसके विपरीत, ऐक्टिनाइड अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ जैसे +2, +3, +4, +5, +6 तथा +7 प्रदर्शित करते हैं, यद्यपि इनकी सामान्य अवस्था +3 होती है। इसका कारण यह है कि 5f, 6d तथा 7s उपकक्षाओं के बीच ऊर्जा का अन्तर कम होता है।
In simple words: लैंथेनाइड्स की ऑक्सीकरण अवस्थाएं अधिक सीमित होती हैं क्योंकि उनके उपकोशों में ऊर्जा अंतर अधिक होता है, जबकि एक्टिनाइड्स की ऑक्सीकरण अवस्थाएं अधिक होती हैं क्योंकि उनके उपकोशों के बीच ऊर्जा अंतर कम होता है।

🎯 Exam Tip: लैंथेनाइड और एक्टिनाइड की ऑक्सीकरण अवस्थाओं की तुलना करते समय ऊर्जा अंतर के प्रभाव को समझाना आवश्यक है।

 

Question 30. ऐक्टिनाइड श्रेणी का अन्तिम तत्व कौन-सा है? इस तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए। इस तत्व की सम्भावित ऑक्सीकरण अवस्थाओं पर टिप्पणी कीजिए।
Answer: ऐक्टिनाइड श्रेणी का अन्तिम तत्त्व लॉरेन्शियम (Lr) है तथा इसका परमाणु क्रमांक 103 होता है। इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \[Rn]5f14 6d1 7s2 है तथा सम्भावित ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।
In simple words: एक्टिनाइड श्रेणी का अंतिम तत्व लॉरेंशियम (Lr) है, जिसका परमाणु क्रमांक 103 है, इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \[Rn]5f14 6d1 7s2 है, और इसकी मुख्य ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।

🎯 Exam Tip: एक्टिनाइड श्रेणी के अंतिम तत्व का नाम, परमाणु क्रमांक, इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 31. हुण्ड-नियम के आधार पर Ce3+ आयन के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को व्युत्पन्न कीजिए तथा 'प्रचक्रण मात्र सूत्र के आधार पर इसके चुम्बकीय आघूर्ण की गणना कीजिए।
Answer: Ce तथा Ce3+ आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न है -
Ce (Z = 58) : 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 3d10 4s2 4p6 4d10 4f1 5s2 5p6 5d1 6s2 या : \[Xe] 4f1 5d1 6s2
Ce3+ (z = 55) : \[Xe]4f1
इस प्रकार Ce3+ में केवल एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होता है, अर्थात् n = 1
.: μs = \(\sqrt { n(n+2) }\) BM
= \(\sqrt { 1\times (1+2) } =\sqrt { 3 }\) BM
= 1.732 BM
In simple words: सेरियम आयन Ce3+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \[Xe]4f1 है, जिसका अर्थ है कि इसमें एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है। इसके प्रचक्रण मात्र चुम्बकीय आघूर्ण की गणना करने पर यह 1.732 BM आता है।

🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या के आधार पर चुम्बकीय आघूर्ण की गणना करना सीखें।

 

Question 32. लैन्थेनाइड श्रेणी के उन सभी तत्वों का उल्लेख कीजिए जो +4 तथा जो +2 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाते हैं। इस प्रकार के व्यवहार तथा उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के बीच सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
Answer: +4 ऑक्सीकरण अवस्था : Ce, Pr, Nd, Tb तथा Dy
+2 ऑक्सीकरण अवस्था : Ce, Nd, Sm, Tm तथा Yb
ये तत्त्व +2 ऑक्सीकरण अवस्था उस समय प्रदर्शित करते हैं जब इनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 5d0 6s2 होता है। इसके विपरीत, +4 अवस्था उस समय प्रदर्शित की जाती है जब इनका शेष विन्यास 4f0 के समीप (जैसे 4f1, 4f2, 4f3) या 4f7 की समीप (जैसे 4f8, 4f9) होता है।
In simple words: लैंथेनाइड्स में +2 ऑक्सीकरण अवस्था 5d0 6s2 विन्यास से जुड़ी है, जबकि +4 ऑक्सीकरण अवस्था 4f0 या 4f7 विन्यास के करीब होने पर दिखाई देती है।

🎯 Exam Tip: लैंथेनाइड्स की विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं को उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से जोड़कर समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 33. निम्नलिखित के सन्दर्भ में ऐक्टिनाइड श्रेणी के तत्वों तथा लैन्थेनाइड श्रेणी के तत्वों के रसायन की तुलना कीजिए – (i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (ii) ऑक्सीकरण अवस्थाएँ। (iii) रासायनिक अभिक्रियाशीलता ।
Answer: 1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration) – लैन्थेनाइडों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \[Xe]54 4f1-14 5d0-1 6s2 होता है, जबकि ऐक्टिनाइडों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \[Rn]86 5f1-14 6d1-2 7s2 होता है। अतः लैन्थेनाइड 4f श्रेणी से तथा ऐक्टिनाइड 5f श्रेणी से सम्बद्ध होते हैं।
2. ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation states) – लैन्थेनाइड सीमित ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (+2, +3, +4) प्रदर्शित करते हैं जिनमें +3 ऑक्सीकरण अवस्था सबसे अधिक सामान्य है। इसका कारण 4f, 5d तथा 6s उपकोशों के बीच अधिक ऊर्जा-अन्तर होना है। दूसरी ओर ऐक्टिंनाइड अधिक संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं क्योंकि 5f,6d तथा 7s उपकोशों में ऊर्जा-अन्तर कम होता है।
3. रासायनिक अभिक्रियाशीलता (Chemical reactivity) – लैन्थेनाइड (Lanthanides) सामान्य रूप से श्रेणी के आरम्भ वाले सदस्य अपने रासायनिक व्यवहार में कैल्सियम की तरह बहुत क्रियाशील होते हैं, परन्तु बढ़ते परमाणु क्रमांक के साथ ये ऐलुमिनियम की तरह व्यवहार करते हैं।

अर्द्ध- अभिक्रिया Ln3+ (aq) + 3e- \(\implies\) Ln(s) के लिए E- का मान -2.2 V से -2.4 V के परास में है। Eu के लिए E- का मान -2.0 V है। निस्सन्देह मान में थोड़ा-सा परिवर्तन है। हाइड्रोजन गैस के वातावरण में मन्द गति से गर्म करने पर ये धातुएँ हाइड्रोजन से संयोग कर लेती हैं। इन धातुओं को कार्बन के साथ गर्म करने पर कार्बाइड- Ln3C, Ln2C3 तथा LnC2 बनते हैं। ये तनु अम्लों से हाइड्रोजन गैस मुक्त करती हैं तथा हैलोजेन के वातावरण में जलने पर हैलाइड बनाती हैं। ये ऑक्साइड M2O3 तथा हाइड्रॉक्साइड M(OH)3 बनाती हैं। हाइड्रॉक्साइड निश्चित यौगिक हैं न कि केवल हाइड्रेटेड (जलयोजित) ऑक्साइड । ये क्षारीय मृदा धातुओं के ऑक्साइड तथा हाइड्रॉक्साइड की भाँति क्षारकीय होते हैं। इनकी सामान्य अभिक्रियाएँ चित्र-3 में प्रदर्शित की गई हैं।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख लैंथेनाइड तत्वों की विभिन्न रासायनिक अभिक्रियाओं को दर्शाता है। यह दिखाता है कि लैंथेनाइड ऑक्सीजन, सल्फर, नाइट्रोजन, अम्ल, हाइड्रोजन और पानी के साथ कैसे प्रतिक्रिया करते हैं, जिससे ऑक्साइड, सल्फाइड, नाइट्राइड, हाइड्राइड और हाइड्रॉक्साइड जैसे विभिन्न यौगिक बनते हैं।
ऐक्टिनाइड (Actinides) - ऐक्टिनाइड अत्यधिक अभिक्रियाशील धातुएँ हैं, विशेषकर जब वे सूक्ष्मविभाजित हों। इन पर उबलते हुए जल की क्रिया से ऑक्साइड तथा हाइड्राइड का मिश्रण प्राप्त होता है और अधिकांश अधातुओं से संयोजन सामान्य ताप पर होता है। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल सभी धातुओं को प्रभावित करता है, परन्तु अधिकतर धातुएँ नाइट्रिक अम्ल द्वारा अल्प प्रभावित होती हैं, इसका कारण यह है कि इन धातुओं पर ऑक्साइड की संरक्षी सतह बन जाती है। क्षारों का इन धातुओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
In simple words: लैंथेनाइड्स और एक्टिनाइड्स दोनों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्थाएं और रासायनिक प्रतिक्रियाशीलता में अंतर होता है। लैंथेनाइड्स की ऑक्सीकरण अवस्थाएं सीमित होती हैं और वे कम प्रतिक्रियाशील होते हैं, जबकि एक्टिनाइड्स की ऑक्सीकरण अवस्थाएं अधिक होती हैं और वे अत्यधिक प्रतिक्रियाशील होते हैं।

🎯 Exam Tip: लैंथेनाइड और एक्टिनाइड के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्थाएं और रासायनिक गुणों में तुलनात्मक अंतर को स्पष्ट रूप से समझें।

 

Question 34. 61, 91, 101 तथा 109 परमाणु क्रमांक वाले तत्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
Answer: Z = 61 (प्रोमिथियम, Pr) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, \[Xe]54 4f5 5d0 6s2
Z = 91 (प्रोटेक्टिनियम, Pa) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, \[Rn]86 5f2 6d1 7s2
Z = 101 (मेण्डेलीवियम, Md) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \[Rn]86 5f13 6d0 7s2
Z = 109 (मेटनेरियम, Mt) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \[Rn]86 5f14 6d7 7s2
In simple words: यह प्रश्न दिए गए परमाणु क्रमांकों (61, 91, 101, 109) वाले तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को दर्शाता है, जिसमें संबंधित f, d और s उपकोशों में इलेक्ट्रॉनों का वितरण बताया गया है।

🎯 Exam Tip: इन तत्वों के परमाणु क्रमांक और उनके विशिष्ट इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर f-ब्लॉक तत्वों के लिए।

 

Question 35. प्रथम श्रेणी के संक्रमण तत्वों के अभिलक्षणों की द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के वर्गों के संगत तत्वों से क्षैतिज वर्गों में तुलना कीजिए। निम्नलिखित बिन्दुओं पर विशेष महत्त्व दीजिए -
(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
(ii) ऑक्सीकरण अवस्थाएँ
(iii) आयनन एन्थैल्पी तथा
(iv) परमाण्वीय आकार ।
Answer: 1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration) - एक ही वर्ग के तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास सामान्यतया समान होते हैं। यद्यपि प्रथम संक्रमण श्रेणी दो अपवाद प्रदर्शित करती है -
Cr = 3d5 4s1 तथा Cu = 3d10 4s1, परन्तु द्वितीय श्रेणी इससे अधिक अपवाद प्रदर्शित करती है -
Mo (42) = 4d5 5s1, Tc (43) = 4d6 5s1, Ru (44) = 4d7 5s1, Rh (45) = 4d8 5s1, Pd (46) = 4d10 5s0, Ag (47) = 4d10 5s1 । इसी प्रकार, तृतीय श्रेणी में W (74) = 5d4 6s1, Pt (78) = 5d9 6s1 तथा Au (79) = 5d10 6s1 अपवाद हैं। इसलिए क्षैतिज वर्ग में अनेक स्थितियों में, तीनों श्रेणियों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान नहीं हैं।
2. ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (Oxidation states) - समान क्षैतिज वर्ग में तत्व सामान्यतया समान ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं। प्रत्येक श्रेणी के मध्य में तत्वों द्वारा प्रदर्शित ऑक्सीकरण अवस्थाओं की संख्या अधिकतम होती है, जबकि अन्त में न्यूनतम होती है।
3. आयनन एन्थैल्पी (Ionization enthalpy) - प्रत्येक श्रेणी में बाएँ से दाएँ जाने पर प्रथम आयनन एन्थैल्पी सामान्यतया धीरे-धीरे बढ़ती है, यद्यपि प्रत्येक श्रेणी में कुछ अपवाद भी प्रेक्षित होते हैं। समान क्षैतिज वर्ग में 3d श्रेणी के तत्वों की तुलना में 4d श्रेणी के कुछ तत्वों की प्रथम आयनन एन्थैल्पी उच्च तथा कुछ तत्वों की कम होती है, यद्यपि 5d श्रेणी की प्रथम आयनन एन्थैल्पी 3d तथा 4d श्रेणियों की तुलना में उच्च होती है। इसका कारण 5d श्रेणी में 4f इलेक्ट्रॉनों पर नाभिक का दुर्बल परिरक्षण प्रभाव है।
4. परमाण्वीय आकार (Atomic sizes) - सामान्यतया किसी श्रेणी में समान आवेश के आयन अथवा परमाणु, परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ त्रिज्याओं में क्रमिक कमी प्रदर्शित करते हैं, यद्यपि यह कमी अत्यन्त कम होती है। परन्तु 4d श्रेणी के परमाणुओं के आकार, 3d श्रेणी के सम्बन्धित तत्वों की तुलना में अधिक होते हैं, जबकि 5d श्रेणी के सम्बन्धित तत्वों के आकार के लगभग समान होते हैं। इसका कारण लैन्थेनाइड आकुंचन है।
In simple words: संक्रमण तत्वों की विभिन्न श्रेणियों (3d, 4d, 5d) के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्थाएं, आयनन एन्थैल्पी और परमाणु आकार भिन्न-भिन्न होते हैं। 4f इलेक्ट्रॉनों के दुर्बल परिरक्षण और लैंथेनाइड संकुचन जैसे कारक इन भिन्नताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों के गुणों में श्रेणी-वार और वर्ग-वार प्रवृत्तियों को याद रखें, विशेषकर अपवादों और उनके कारणों को।

 

Question 36. निम्नलिखित आयनों में प्रत्येक के लिए 3d इलेक्ट्रॉनों की संख्या लिखिए - Ti2+, V2+, Cr3+, Mn2+, Fe2+, Fe3+, Co2+, Ni2+, Cu2+
आप इन जलयोजित आयनों (अष्टफलकीय) में पाँच 3d कक्षकों को किस प्रकार अधिग्रहीत करेंगे? दर्शाइए ।

Answer:
Ti2+ 3d2
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख Ti2+ आयन के 3d कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को दर्शाता है। इसमें t2g उपकोश में दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन भरे हुए हैं, जबकि eg उपकोश खाली है।
(2 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन)
V2+ 3d3
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख V2+ आयन के 3d कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को दर्शाता है। इसमें t2g उपकोश में तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन भरे हुए हैं, जबकि eg उपकोश खाली है।
(3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन)
Cr3+ 3d3
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख Cr3+ आयन के 3d कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को दर्शाता है। इसमें t2g उपकोश में तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन भरे हुए हैं, जबकि eg उपकोश खाली है।
(3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन)
Mn2+ 3d5
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख Mn2+ आयन के 3d कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को दर्शाता है। इसमें t2g उपकोश में तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन और eg उपकोश में दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन भरे हुए हैं, कुल पाँच अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं।
(5 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन)
Fe2+ 3d6
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख Fe2+ आयन के 3d कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को दर्शाता है। इसमें t2g उपकोश में चार इलेक्ट्रॉन (एक युग्मित और दो अयुग्मित) और eg उपकोश में दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन भरे हुए हैं, कुल चार अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं।
(4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन)
Fe3+ 3d5
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख Fe3+ आयन के 3d कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को दर्शाता है। इसमें t2g उपकोश में तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन और eg उपकोश में दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन भरे हुए हैं, कुल पाँच अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं।
(5 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन)
Co2+ 3d7
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख Co2+ आयन के 3d कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को दर्शाता है। इसमें t2g उपकोश में पाँच इलेक्ट्रॉन (दो युग्मित और एक अयुग्मित) और eg उपकोश में दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन भरे हुए हैं, कुल तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं।
(3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन)
Ni2+ 3d8
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख Ni2+ आयन के 3d कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को दर्शाता है। इसमें t2g उपकोश में छह इलेक्ट्रॉन (तीन युग्मित) और eg उपकोश में दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन भरे हुए हैं, कुल दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं।
(2 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन)
Cu2+ 3d9
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख Cu2+ आयन के 3d कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को दर्शाता है। इसमें t2g उपकोश में छह इलेक्ट्रॉन (तीन युग्मित) और eg उपकोश में तीन इलेक्ट्रॉन (एक युग्मित और एक अयुग्मित) भरे हुए हैं, कुल एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है।
(1 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन)
In simple words: यह प्रश्न विभिन्न धातु आयनों के 3d इलेक्ट्रॉनों की संख्या और उनके अष्टफलकीय विन्यास में क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (t2g और eg) के अनुसार इलेक्ट्रॉनों के वितरण को दर्शाता है, जिससे अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ज्ञात होती है।

🎯 Exam Tip: क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत के अनुसार 3d कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण (t2g और eg) को समझना और अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ज्ञात करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 37. प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्व भारी संक्रमण तत्वों के अनेक गुणों से भिन्नता प्रदर्शित करते हैं। टिप्पणी कीजिए ।
Answer: दिया गया कथन सत्य है। इस कथन के पक्ष में कुछ प्रमाण निम्नलिखित हैं -
1. भारी संक्रमण तत्वों (4d तथा 5d श्रेणियाँ) की परमाणु त्रिज्याएँ प्रथम संक्रमण श्रेणी के सम्बन्धित तत्वों की तुलना में अधिक होती हैं, यद्यपि 4d तथा 5d श्रेणियों की परमाणु त्रिज्याएँ लगभग समान होती हैं।
2. 5d श्रेणी की आयनन एन्थैल्पियाँ 3d तथा 4d श्रेणियों के सम्बन्धित तत्वों से उच्च होती हैं।
3. 4d तथा 5d श्रेणियों की कणन एन्थैल्पियाँ प्रथम श्रेणी के सम्बन्धित तत्वों की तुलना में उच्च होती हैं।
4. भारी संक्रमण तत्वों के गलनांक तथा क्वथनांक प्रथम संक्रमण श्रेणी की तुलना में अधिक होते हैं। इसका कारण इनमें प्रबल अन्तराधात्विक बन्धों की उपस्थिति है।
In simple words: प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्व भारी संक्रमण तत्वों (4d और 5d श्रेणी) से परमाणु त्रिज्या, आयनन एन्थैल्पी, कणन एन्थैल्पी, गलनांक और क्वथनांक जैसे गुणों में भिन्न होते हैं, जिसका मुख्य कारण भारी संक्रमण तत्वों में प्रबल धात्विक बंधन है।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों की श्रेणियों के बीच गुणों में भिन्नता के कारणों को याद रखना और उन्हें स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 38. निम्नलिखित संकुल स्पीशीज के चुम्बकीय आघूर्णों के मान से आप क्या निष्कर्ष निकालेंगे?
उदाहरण चुम्बकीय आघूर्ण (B.Μ.)
K4 \[Mn(CN)6] 2.2
\[Fe(H2O)6]2+ 5.3
K2 \[MnCl4] 5.9
Answer: यदि किसी जटिल यौगिक में 'n' अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, तो इसका चक्रण के कारण चुम्बकीय आघूर्ण निम्न प्रकार प्राप्त किया जा सकता है -
μs = \(\sqrt { n(n+2) }\) BM
. जब n = 1, µs = \(\sqrt { 1(1+2) }\) = 1.73 BM
n = 2, µs = \(\sqrt { 2(2+2) }\) = 2.83 BM
n = 3, µs = \(\sqrt { 3(3+2) }\) = 3.87 BM
n = 4, µs = \(\sqrt { 4(4+2) }\) = 4.9 BM
n = 5, µs = \(\sqrt { 5(5+2) }\) = 5.92 BM

(i) K4\[Mn(CN)6] का चुम्बकीय आघूर्ण 2.2 BM है। इससे स्पष्ट है कि इसमें केवल एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है। इस जटिल यौगिक में Mn की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है। अतएव यह Mn2+ के रूप में है । Mn2+ का अभिविन्यास 3d5 होता है। एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति स्पष्ट करती है कि CN- लीगैण्ड ने निम्नानुसार इलेक्ट्रॉनों को हुण्ड के नियम के विपरीत युग्मित कर दिया है -

3d4s4p
मुक्त Mn2+ आयन :↑ ↑ ↑ ↑ ↑
CN- लीगैण्ड की उपस्थिति में Mn2+ आयन की स्थिति↑↓ ↑↓ ↑
d2sp3 संकरण
इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि CN- एक प्रबल लीगैण्ड है तथा जटिल यौगिक के बनने में d2 sp3 संकरण होता है। अतः जटिल यौगिक एक आन्तरिक ऑर्बिटल अष्टफलकीय जटिल यौगिक है।

(ii) \[Fe(H2O)6]2+ का चुम्बकीय आघूर्ण 5.3 है। इससे स्पष्ट है कि इसमें 4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। इसमें Fe की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है। इस प्रकार यह Fe2+ आयन के रूप में है, जिसको अभिविन्यास 3d6 है। यौगिक में 4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति सिद्ध करती है कि H2O लीगैण्ड दुर्बल है तथा इलेक्ट्रॉनों को युग्मित करने में असमर्थ है।

(iii) K2\[MnCl4] का चुम्बकीय आघूर्ण 5.9 है, जिससे स्पष्ट है कि इसमें 5 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं। Mn की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है। अतः यह Mn2+ अवस्था में है तथा इसका विन्यास 3d5 है। 5 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति से स्पष्ट है कि Cl- दुर्बल लीगैण्ड है तथा इलेक्ट्रॉन का युग्मन करने में असमर्थ है।
3d4s4p
मुक्त Mn2+ आयन :↑ ↑ ↑ ↑ ↑
CN- लीगैण्ड की उपस्थिति में Mn2+ आयन की स्थिति↑ ↑ ↑ ↑ ↑
sp3 संकरण
इस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता है कि Cl- एक दुर्बल लीगैण्ड है तथा जटिल यौगिक में sp3 संकरण है। अतएव यह एक समचतुष्फलकीय जटिल यौगिक है।
In simple words: इस प्रश्न में दिए गए संकुल यौगिकों के चुम्बकीय आघूर्णों का उपयोग करके उनके अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या, धातु की ऑक्सीकरण अवस्था और लीगैण्ड की प्रकृति (प्रबल या दुर्बल) का निर्धारण किया गया है, जिससे संकरण और ज्यामिति का पता चलता है।

🎯 Exam Tip: चुम्बकीय आघूर्ण से अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या, लीगैण्ड की प्रबलता, संकरण और जटिल यौगिक की ज्यामिति का निर्धारण करना सीखें।

 

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

 

Question 1. संक्रमण श्रेणी धातुओं का विशिष्ट गुण है-
(i) ये परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करती हैं।
(ii) ये सभी धातु उत्प्रेरक का कार्य करती हैं।
(iii) ये रंगीन यौगिक बनाती हैं।
(iv) उपर्युक्त सभी
Answer: (iv) उपर्युक्त सभी
In simple words: संक्रमण धातुएं कई ऑक्सीकरण अवस्थाएं दिखाती हैं, उत्प्रेरक के रूप में काम करती हैं, और रंगीन यौगिक बनाती हैं, इसलिए सभी विकल्प सही हैं।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों के मुख्य गुणों को याद रखना, जैसे परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था, उत्प्रेरकीय गुण और रंगीन यौगिक बनाने की प्रवृत्ति, महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. संक्रमण तत्त्व संकुल यौगिक बनाते हैं क्योंकि –
(i) रिक्त कक्षकों की उपलब्धता होती है।
(ii) धातु आयनों का आकार छोटा होता है।
(iii) परिवर्तनीय ऑक्सीकरण अवस्था होती है।
(iv) उपर्युक्त सभी
Answer: (iv) उपर्युक्त सभी
In simple words: संक्रमण तत्व संकुल यौगिक बनाते हैं क्योंकि उनके पास खाली कक्षक होते हैं, उनके आयनों का आकार छोटा होता है, और वे कई ऑक्सीकरण अवस्थाएं दिखा सकते हैं।

🎯 Exam Tip: संकुल यौगिक बनाने के लिए संक्रमण तत्वों की विशिष्ट विशेषताओं को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. संक्रमण तत्वों में 4d श्रेणी का तत्त्व है -
(i) 37A
(ii) 47B
(iii) 57C
(iv) 30D
Answer: (ii) 47B
In simple words: 4d श्रेणी के संक्रमण तत्व में परमाणु क्रमांक 47 वाला तत्व शामिल है।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों की विभिन्न श्रेणियों (3d, 4d, 5d) के तत्वों के परमाणु क्रमांकों को याद रखें।

 

Question 4. कौन-सा तत्त्व d-ब्लॉक तत्त्व तो है किन्तु संक्रमण धातु नहीं है?
(i) Zn
(ii) Cu
(iii) Cr
(iv) Mn
Answer: (i) Zn
In simple words: जिंक एक d-ब्लॉक तत्व है, लेकिन संक्रमण धातु नहीं है क्योंकि इसकी सामान्य और ऑक्सीकृत अवस्थाओं में d-कक्षक पूर्णतः भरे होते हैं।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों की परिभाषा और अपवादों को समझना महत्वपूर्ण है, जैसे कि जिंक, कैडमियम और मरकरी।

 

Question 5. निम्नलिखित में अनुचुम्बकीय यौगिक है -
(i) CuCl
(ii) AgNO3
(iii) FeSO4
(iv) ZnCl2
Answer: (iii) FeSO4
In simple words: FeSO4 अनुचुम्बकीय है क्योंकि इसमें Fe2+ आयन में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, जबकि अन्य विकल्पों में धातु आयनों में कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं होते।

🎯 Exam Tip: अनुचुम्बकीय यौगिकों को पहचानें, जिनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसके लिए धातु आयनों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को जानना आवश्यक है।

 

Question 6. निम्नलिखित आयनों में अनुचुम्बकीय आयन कौन-सा नहीं है?
(i) Ni++
(ii) Zn++
(iii) Cu+
(iv) Mn++
Answer: (ii) Zn++
In simple words: Zn++ आयन अनुचुम्बकीय नहीं है क्योंकि इसके 3d-कक्षक पूरी तरह से भरे होते हैं, जिससे कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं बचता।

🎯 Exam Tip: किसी आयन में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर अनुचुम्बकीय या प्रतिचुम्बकीय गुणों का निर्धारण करें।

 

Question 7. निम्न में अनुचुम्बकीय आयन है।
(i) Zn2+
(ii) Ni2+
(iii) Cu+
(iv) Ag+
Answer: (ii) Ni2+
In simple words: Ni2+ आयन अनुचुम्बकीय है क्योंकि इसमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, जबकि अन्य आयनों में सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक विकल्प के धातु आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ज्ञात करें और अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या गिनकर अनुचुम्बकीय आयन पहचानें।

 

Question 8. निम्न में से रंगहीन आयन है।
(i) Cu+
(ii) Cu2+
(iii) Ni2+
(iv) Fe3+
Answer: (i) Cu+
In simple words: Cu+ आयन रंगहीन होता है क्योंकि इसमें कोई अयुग्मित d-इलेक्ट्रॉन नहीं होता, जिससे d-d संक्रमण संभव नहीं होता।

🎯 Exam Tip: रंगीन आयनों की पहचान अयुग्मित d-इलेक्ट्रॉनों और d-d संक्रमण की संभावना पर निर्भर करती है।

 

Question 9. एक संक्रमण धातु की अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था प्राप्त करने में कौन-से इलेक्ट्रॉन मुक्त होते हैं?
(i) ns इलेक्ट्रॉन
(ii) (n + 1) d इलेक्ट्रॉन
(iii) (n - 1)d इलेक्ट्रॉन
(iv) ns + (n - 1) d इलेक्ट्रॉन
Answer: (iv) ns + (n - 1) d इलेक्ट्रॉन
In simple words: संक्रमण धातुएं अपनी अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था तब प्राप्त करती हैं जब ns और (n-1)d दोनों उपकोशों के इलेक्ट्रॉन मुक्त होते हैं।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों की ऑक्सीकरण अवस्थाओं का निर्धारण करने वाले इलेक्ट्रॉनों को पहचानें।

 

Question 10. संक्रमण धातु जो परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था नहीं प्रदर्शित करता है, है
(i) Ti
(ii) V
(iii) Fe
(iv) Zn
Answer: (iv) Zn
In simple words: जिंक एक ऐसा d-ब्लॉक तत्व है जो परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था नहीं दर्शाता, क्योंकि इसके सभी d-इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं और यह केवल +2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।

🎯 Exam Tip: d-ब्लॉक तत्वों के अपवादों को याद रखें जो संक्रमण धातु नहीं हैं क्योंकि वे परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएं नहीं दिखाते हैं।

 

Question 11. दुर्लभ मृदा तत्त्व हैं –
(i) क्षारीय मृदा तत्त्व
(ii) क्षारीय तत्त्व
(iii) संक्रमण श्रेणी के तत्त्व
(iv) लैन्थेनाइड
Answer: (iv) लैन्थेनाइड
In simple words: लैंथेनाइड्स को दुर्लभ मृदा तत्व कहा जाता है।

🎯 Exam Tip: 'दुर्लभ मृदा तत्व' और 'लैंथेनाइड्स' के बीच संबंध को याद रखें।

 

Question 12. निम्न तत्त्वों में लैन्थेनाइड तत्त्व है –
(i) Ra
(ii) Ce
(iii) Ac
(iv) Zr
Answer: (ii) Ce
In simple words: सीरियम (Ce) एक लैंथेनाइड तत्व है।

🎯 Exam Tip: लैंथेनाइड श्रेणी के तत्वों को पहचानना महत्वपूर्ण है।

 

Question 13. लैन्थेनाइडों का सामान्य बाह्यतम इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है –
(i) 4f1-14 5d0 6s2
(ii) 4f0,2-14 5d0 6s2
(iii) 4f20-14 5d0-2 6s2
(iv) 4f0-14 5d1 6s2
Answer: (ii) 4f0,2-14 5d0 6s2
In simple words: लैंथेनाइड्स का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 4f0,2-14 5d0 6s2 होता है, जो उनकी f-ब्लॉक प्रकृति को दर्शाता है।

🎯 Exam Tip: f-ब्लॉक तत्वों के लिए सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास याद रखना महत्वपूर्ण है, जिसमें d-कक्षक में कभी-कभी इलेक्ट्रॉन की अनुपस्थिति या एक इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति होती है।

 

Question 14. लैन्थेनाइड निम्न ऋणायन के साथ संकुल बनाते हैं।
(i) F-
(ii) Br-
(iii) Cl-
(iv) इनमें से कोई नहीं
Answer: (i) F-
In simple words: लैंथेनाइड्स फ्लोराइड आयनों के साथ संकुल यौगिक बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: लैंथेनाइड्स की संकुल बनाने की प्रवृत्ति को समझें और वे किन लीगैण्ड्स के साथ संकुल बनाते हैं, यह याद रखें।

 

Question 15. लैन्थेनाइडों के परमाणु क्रमांक के बढ़ने के साथ परमाणवीय त्रिज्या में कमी होती है, किन्तु अपवाद है।
(i) Gd व Lu
(ii) Eu व Yb
(iii) Na व Ho
(iv) Dy व Ho
Answer: (ii) Eu व Yb
In simple words: लैंथेनाइड संकुचन के कारण परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ परमाणु त्रिज्या घटती है, लेकिन यूरोपियम (Eu) और येटर्बियम (Yb) इसके अपवाद हैं।

🎯 Exam Tip: लैंथेनाइड संकुचन की प्रवृत्ति और इसके अपवादों को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर Eu और Yb के संबंध में।

 

Question 16. लैन्थेनाइड संकुचन के कारण पश्च लैन्थेनाइडों में
(i) आयनन ऊर्जा अधिक हो जाती है।
(ii) घनत्व उच्च हो जाता है।
(iii) आयनिक त्रिज्या कम हो जाती है।
(iv) ये सभी
Answer: (iv) ये सभी
In simple words: लैंथेनाइड संकुचन के कारण बाद के लैंथेनाइड्स में आयनन ऊर्जा बढ़ती है, घनत्व बढ़ता है और आयनिक त्रिज्या घटती है।

🎯 Exam Tip: लैंथेनाइड संकुचन के सभी परिणामों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बाद के लैंथेनाइड्स के गुणों को प्रभावित करता है।

 

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. संक्रमण तत्त्वों की परमाणु त्रिज्याएँ किसी श्रेणी में किस प्रकार परिवर्तित होती हैं?
Answer: सामान्यतः एक विशिष्ट श्रेणी से सम्बन्धित संक्रमण तत्त्वों की परमाणु त्रिज्याएँ परमाणु क्रमांक के बढ़ने के साथ घटती जाती हैं। प्रत्येक श्रेणी के अन्त में परमाणु त्रिज्याओं में थोड़ी वृद्धि देखने को मिलती है। समूह में नीचे की ओर जाने पर संक्रमण तत्त्वों की परमाणु त्रिज्याओं में वृद्धि होती है। द्वितीय और तृतीय संक्रमण श्रेणी के तत्त्वों की परमाणु त्रिज्याएँ लगभग समान रहती हैं।
In simple words: संक्रमण तत्वों की परमाणु त्रिज्याएं एक श्रेणी में परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ घटती हैं, लेकिन श्रेणी के अंत में थोड़ी बढ़ती हैं; समूहों में नीचे जाने पर त्रिज्या बढ़ती है, और दूसरी व तीसरी संक्रमण श्रेणी की त्रिज्याएं लगभग समान होती हैं।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों की परमाणु त्रिज्याओं में परिवर्तनों की प्रवृत्तियों को याद रखें, खासकर श्रेणियों और समूहों में।

 

Question 2. संक्रमण तत्त्व धात्विक लक्षण क्यों प्रदर्शित करते हैं?
Answer: संक्रमण तत्त्व धात्विक लक्षण प्रदर्शित करते हैं क्योंकि उनकी आयनन ऊर्जाएँ निम्न होती हैं तथा । उनके बाह्यतम कोश में अनेक रिक्त कक्षक भी उपस्थित होते हैं। ये कारक उनमें धात्विक आबन्धों के निर्माण में सहायता करते हैं।
In simple words: संक्रमण तत्व धात्विक लक्षण दिखाते हैं क्योंकि उनकी आयनन ऊर्जा कम होती है और उनके बाहरी कोशों में खाली कक्षक होते हैं, जो धात्विक बंधन बनाने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: धात्विक लक्षणों को आयनन ऊर्जा और खाली कक्षकों की उपलब्धता से जोड़कर समझें।

 

Question 3. विलयन में Cu+ आयन रंगहीन जबकि Cu2+ आयन रंगीन होते हैं। क्यों?
Answer: Cu+ - 1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 3d10, 4s0, चूंकि सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित हैं इसलिए Cu+ आयन रंगहीन है।
Cu2+ आयन में एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है इसलिए यह नीले रंग का है।
Cu2+ - 1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 3d9
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख Cu2+ आयन के 3d9 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को दर्शाता है, जिसमें 3d उपकोश में एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है। यह अयुग्मित इलेक्ट्रॉन d-d संक्रमण के लिए जिम्मेदार है, जिससे आयन रंगीन दिखाई देता है।
In simple words: Cu+ आयन में कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं होता, इसलिए वह रंगहीन होता है, जबकि Cu2+ आयन में एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होता है, जिससे वह d-d संक्रमण के कारण रंगीन (नीला) दिखाई देता है।

🎯 Exam Tip: आयनों के रंगीन होने का कारण अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों और d-d संक्रमण से जोड़कर स्पष्ट करें।

 

Question 4. Mn3+ आयन की अपेक्षा Mn2+ आयन अधिक स्थायी होते हैं। क्यों?
Answer: हम जानते हैं कि आधे और पूरे भरे हुए ऑर्बिटल अधिक स्थायी होते हैं। Mn2+ में 3d पर पाँच इलेक्ट्रॉन हैं जोकि आधा भरा हुआ है। इसलिए Mn3+ आयन की अपेक्षा Mn2+ आयन अधिक स्थायी होते हैं।
Mn-25: 1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 3d5, 4s2
Mn2+ : 1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 3d5
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख Mn2+ आयन के 3d उपकोश में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को दर्शाता है। इसमें सभी पांच 3d कक्षक में एक-एक इलेक्ट्रॉन भरा हुआ है, जिससे यह अर्द्ध-भरा हुआ और अधिक स्थायी विन्यास दर्शाता है।
आधा भरा हुआ उपकोश अधिक स्थायी
Mn3+ : 1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 3d4
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख Mn3+ आयन के 3d उपकोश में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को दर्शाता है। इसमें चार 3d कक्षक में एक-एक इलेक्ट्रॉन भरा हुआ है, जो Mn2+ के अर्द्ध-भरे विन्यास की तुलना में कम स्थायी है।
कम स्थायी
In simple words: Mn2+ आयन Mn3+ से अधिक स्थायी होता है क्योंकि Mn2+ में 3d5 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होता है जो कि अर्द्ध-भरा हुआ उपकोश है और यह अधिक स्थायी होता है।

🎯 Exam Tip: अर्ध-भरे और पूर्ण-भरे उपकोशों के स्थायित्व के नियम का उपयोग करके ऑक्सीकरण अवस्थाओं के स्थायित्व को समझाएं।

 

Question 5. आयतनात्मक विश्लेषण में पोटैशियम परमैंगनेट विलयन को अम्लीकृत करने के लिए तनु सल्फ्यूरिक अम्ल के स्थान पर HNO3 का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता है?
Answer: आयतनात्मक विश्लेषण में KMnO4 विलयन को अम्लीकृत करने के लिए dil. H2SO4 का प्रयोग किया जाता है न कि HNO3 का क्योकि HNO3 स्वयं ऑक्सीकारक है और आंशिक रूप से अपचायक को ऑक्सीकृत कर देता है।
2KMnO4 + 3H2SO4 \(\implies\) K2SO4 + 2MnSO4 + 3H2O + 5\[O] Reducing agent + \[O] \(\implies\) Oxidised product
In simple words: आयतनात्मक विश्लेषण में पोटैशियम परमैंगनेट को अम्लीकृत करने के लिए सल्फ्यूरिक अम्ल का उपयोग किया जाता है, क्योंकि नाइट्रिक अम्ल स्वयं ऑक्सीकारक होने के कारण विश्लेषण को प्रभावित कर सकता है।

🎯 Exam Tip: KMnO4 अनुमापन में विभिन्न अम्लों की भूमिका और उनकी ऑक्सीकरण-अपचयन प्रकृति को समझें।

 

Question 6. आन्तरिक (अन्तः) संक्रमण तत्त्व क्या हैं?
Answer: जिन तत्त्वों में विभेदी इलेक्ट्रॉन (n-2) f- कक्षकों में प्रवेश करता है वे तत्त्व आन्तरिक (अन्तः) संक्रमण तत्त्व कहलाते हैं। ये तत्त्व आवर्त सारणी में एक अलग ब्लॉक, f-ब्लॉक का निर्माण करते हैं; अतः इन्हें f- ब्लॉक के तत्त्व भी कहते हैं।
In simple words: आंतरिक संक्रमण तत्व वे होते हैं जिनके अंतिम इलेक्ट्रॉन (n-2)f-कक्षक में प्रवेश करते हैं, और ये तत्व आवर्त सारणी में f-ब्लॉक का निर्माण करते हैं।

🎯 Exam Tip: आंतरिक संक्रमण तत्वों की परिभाषा और उनके f-ब्लॉक से संबंध को स्पष्ट रूप से समझें।

 

Question 7. लैन्थेनाइड व ऐक्टिनाइड श्रेणियों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए। या अन्तः संक्रमण तत्त्वों के सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
Answer: लैन्थेनाइड्स के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निश्चित रूप से ज्ञात नहीं हैं। अधिकांश तत्त्वों में विभेदी इलेक्ट्रॉन 4f- उपकोश में प्रवेश करता है; अतः इन तत्त्वों का सैद्धान्तिक इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \[Xe] 4fn 5d1 6s2 प्रकार का होता है।
चूँकि 4f- उपकोश की ऊर्जा 5d-उपकोश की ऊर्जा के काफी निकट है; अतः यह विभेद करना कठिन होता है कि इलेक्ट्रॉन 4f उपकोश में प्रवेश कर रहा है अथवा 5d-उपकोश में। यही कारण है कि इनके प्रागुक्त इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, इनके अवलोकित विन्यासों से भिन्न होते हैं। अवलोकित विन्यास मुख्यतः \[Xe] 4fn+1 6s2 प्रकार के होते हैं।
ऐक्टिनाइड्स के इलेक्ट्रॉनिक विन्यासों को \[Rn] 5f1-14 6d0-1 7s2 (अपवाद थोरियम को छोड़कर) के रूप में प्रकट किया जा सकता है।
In simple words: लैंथेनाइड्स का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास \[Xe] 4f1-14 5d0-1 6s2 होता है, जबकि एक्टिनाइड्स का \[Rn] 5f1-14 6d0-1 7s2 होता है, जो इन आंतरिक संक्रमण तत्वों की पहचान करता है।

🎯 Exam Tip: लैंथेनाइड और एक्टिनाइड श्रेणियों के सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को याद रखें, जिसमें अपवादों और ऊर्जा स्तरों की निकटता का उल्लेख करें।

 

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. संक्रमण तत्त्व क्या हैं? इनकी विशेषताओं को लिखिए। या संक्रमण तत्त्वों के अनुचुम्बकीय लक्षण को स्पष्ट कीजिए।
Answer: वे तत्त्व जिनमें अन्तिम इलेक्ट्रॉन बाह्य कोश से पहले वाले कोश के पाँच d-कक्षकों में से किसी भी एक कक्ष में प्रवेश करता है, d-ब्लॉक के तत्त्व कहलाते हैं। इनमें विभेदी इलेक्ट्रॉन (n-1) d-कक्षकों में प्रवेश पाता है। चूँकि इन तत्त्वों के गुण s-ब्लॉक तथा p-ब्लॉक के तत्त्वों के गुणों के मध्यवर्ती होते हैं अतः इन्हें संक्रमण तत्त्व भी कहते हैं।

विशेषताएँ- संक्रमण तत्त्वों की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास - संक्रमण तत्त्वों में बाह्यकोश से पिछले कोश के d ऑर्बिटलों में इलेक्ट्रॉन भरते हैं। इसके बाह्यतम दो कोशों का विन्यास इस प्रकार होता है -
(n - 1)s2 (n - 1)p6 (n-1)d1 to 10 ns1 or 2 या ns0
2. परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ - d-ब्लॉक (संक्रमण) तत्त्वों में ns ऑर्बिटल और (n - 1)d ऑर्बिटल दोनों के इलेक्ट्रॉन रासायनिक बन्ध बनाने में भाग लेते हैं। इसलिए संक्रमण तत्त्व परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। संक्रमण तत्त्वों में (n - 1)d और ns ऊर्जा स्तरों की ऊर्जा में थोड़ा अन्तर होने के कारण ये इलेक्ट्रॉन रासायनिक बन्ध बनाने में भाग ले सकते हैं। इसलिए संक्रमण तत्त्व परिवर्ती ऑक्सीकरण संख्या प्रदर्शित करते हैं।
3. उत्प्रेरक गुण - संक्रमण धातु और उनके यौगिकों में उत्प्रेरकीय गुण होते हैं। यह गुण उनकी परिवर्ती संयोजकता एवं उनके पृष्ठ पर उपस्थित मुक्त संयोजकताओं के कारण होता है।
4. रंगीन आयन व रंगीन यौगिक बनाने की प्रवृत्ति - संक्रमण तत्त्वों में d ऑर्बिटल आंशिक रूप से भरे होने के कारण ये रंगीन आयन व रंगीन यौगिक बनाते हैं।
5. आयनन विभव में परिवर्तन - संक्रमण धातुओं के प्रथम आयनन विभव दीर्घ आवर्गों में स्थित s-ब्लॉक और p ब्लॉक तत्त्वों के आयनन विभवों के बीच के हैं। प्रथम संक्रमण श्रेणी में तत्त्वों के प्रथम आयनन विभवों के मान 6 से 10 eV के मध्य है। किसी संक्रमण धातु परमाणु के उत्तरोत्तर (successive) आयनन विभव कम से बढ़ते हैं। संक्रमण धातु क्षार धातुओं (उपवर्ग IA) और क्षारीय मृदा-धातुओं (उपवर्ग IIA) से कम धन विद्युत होने के कारण आयनिक और सहसंयोजक दोनों प्रकार के यौगिक बनाते हैं।
6. चुम्बकीय लक्षण - अनेक संक्रमण तत्त्व उनके यौगिक अनुचुम्बकीय हैं। इसका कारण उनमें (n - 1) d कक्षकों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति है। किसी संक्रमण श्रेणी में बायें से दायें जाने पर जैसे-जैसे अयुग्मि इलेक्ट्रॉनों की संख्या एक से पाँच तक बढ़ती है, संक्रमण धातु आयन में अनुचुम्बकीय लक्षण बढ़ता है। अधिकतम अनुचुम्बकीय लक्षण श्रेणी के बीच में पाया जाता है और आगे जाने पर अनुचुम्बकीय लक्षण अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या कम होने से घटता है। वे संक्रमण धातु अथवा आयन जिनमें इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं, प्रतिचुम्बकीय होते हैं।
In simple words: संक्रमण तत्व d-ब्लॉक तत्व होते हैं जो ns और (n-1)d कक्षकों में इलेक्ट्रॉन भरने के कारण परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था, उत्प्रेरकीय गुण, रंगीन यौगिक और अनुचुम्बकीय लक्षण प्रदर्शित करते हैं।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों की परिभाषा और उनकी छह प्रमुख विशेषताओं (इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्थाएँ, उत्प्रेरक गुण, रंगीन यौगिक, आयनन विभव और चुम्बकीय लक्षण) को विस्तार से समझें।

 

Question 2. संक्रमण तत्त्व परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था का प्रदर्शन क्यों करते हैं?
Answer: संक्रमण तत्त्वों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n - 1)d1 - 10 ns1 - 2 है। (n - 1) d-कक्षकों तथा ns- कक्षकों की ऊर्जाओं में अधिक अन्तर नहीं होता है अतः संक्रमण तत्त्वों में, (n - 1)d तथा ns दोनों कक्षकों के आबन्ध निर्माण के लिए उपलब्ध रहती हैं । +1 तथा +2 ऑक्सीकरण अवस्थाओं में ns-इलेक्ट्रॉनों का योगदान होता है, जबकि उच्च ऑक्सीकरण अवस्थाओं जैसे +3, +4, +5,+6 आदि, में आबन्ध निर्माण में ns-कक्षकों के साथ (n - 1)d-इलेक्ट्रॉनों का भी योगदान होता है। उत्तेजित अवस्था में (n - 1) d. इलेक्ट्रॉन आबन्ध निर्माण में भाग लेने के लिए स्वतन्त्र हो जाते हैं तथा परमाणु विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करने के योग्य हो जाता है। उदाहरण के लिए, Sc का बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d1 4s2 है। जब यह केवल 4s-इलेक्ट्रॉनों का उपयोग करता है तो +2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है, परन्तु जब यह दोनों 4s- इलेक्ट्रॉनों के साथ एक 3d-इलेक्ट्रॉन का भी उपयोग करता है तो +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
In simple words: संक्रमण तत्व परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएं दिखाते हैं क्योंकि उनके (n-1)d और ns कक्षकों की ऊर्जा लगभग समान होती है, जिससे दोनों प्रकार के इलेक्ट्रॉन बंधन बनाने में भाग ले सकते हैं, जिससे कई ऑक्सीकरण अवस्थाएं संभव हो जाती हैं।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों की परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाओं के लिए ns और (n-1)d कक्षकों के इलेक्ट्रॉनों की भागीदारी के सिद्धांत को याद रखें।

 

Question 3. संक्रमण तत्त्वों में जटिल यौगिक बनाने की प्रवृत्ति अधिक क्यों होती है?
Answer: संक्रमण तत्त्वों में जटिल यौगिक बनाने की प्रवृत्ति निम्नलिखित कारणों से अधिक होती है –
1. धातु आयनों का छोटा आकार
2. धातु आयनों का उच्च नाभिकीय आवेश
3. लीगैण्ड द्वारा प्रदान किये गये इलेक्ट्रॉनों के एकाकी युग्मों को ग्रहण करने के लिए उपयुक्त ऊर्जा के रिक्त d-कक्षकों की प्राप्यता ।
In simple words: संक्रमण तत्व जटिल यौगिक अधिक बनाते हैं क्योंकि उनके धातु आयनों का आकार छोटा होता है, नाभिकीय आवेश उच्च होता है, और उनके पास खाली d-कक्षक होते हैं जो लीगैण्ड से इलेक्ट्रॉन युग्म स्वीकार कर सकते हैं।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों की जटिल यौगिक बनाने की प्रवृत्ति के तीन मुख्य कारणों को याद रखें।

 

Question 4. ऐक्टिनाइड्स व लैन्थेनाइड्स में मुख्य समानताएँ बताइए।
Answer: चूंकि लैन्थेनाइड्स तथा ऐक्टिनाइड्स दोनों में ही इलेक्ट्रॉन (n-2) f-उपकोश में प्रवेश पाता है। तथा दोनों के ही बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लगभग समान हैं, अतः ये गुणों में समानताएँ प्रदर्शित करते हैं। इनकी मुख्य समानताएँ निम्नलिखित हैं –
1. दोनों में ही (n - 2) f- कक्षक में इलेक्ट्रॉन प्रवेश करता है।
2. दोनों की प्रमुख ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।
3. परमाणु क्रमांक बढ़ने पर दोनों ही परमाणविक तथा आयनिक आकारों में कमी प्रदर्शित करते हैं (लैन्थेनाइड संकुचन तथा ऐक्टिनाइड संकुचन) ।
4. दोनों ही अधिक क्रियाशील तथा प्रबल विद्युत धनात्मक हैं।
5. दोनों ही चुम्बकीय गुण प्रदर्शित करते हैं।
In simple words: लैंथेनाइड्स और एक्टिनाइड्स दोनों के इलेक्ट्रॉन f-कक्षक में प्रवेश करते हैं, दोनों की प्रमुख ऑक्सीकरण अवस्था +3 है, दोनों संकुचन (लैंथेनाइड/एक्टिनाइड) दिखाते हैं, और दोनों ही क्रियाशील व विद्युत धनात्मक होने के साथ-साथ चुम्बकीय गुण भी प्रदर्शित करते हैं।

🎯 Exam Tip: लैंथेनाइड्स और एक्टिनाइड्स की समानताओं को f-कक्षक में इलेक्ट्रॉन प्रवेश, ऑक्सीकरण अवस्था, संकुचन, क्रियाशीलता और चुम्बकीय गुणों के संदर्भ में याद रखें।

 

Question 5. लैन्थेनाइड्स व ऐक्टिनाइड्स में अन्तर / असमानताएँ बताइए।
Answer:

क्र.सं.लैन्थेनाइडऐक्टिनाइड
(i)लैन्थेनाइड अधिकतम +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। अन्य ऑक्सीकरण अवस्थाएँ + 2 तथा +3 हैं।ऐक्टिनाइड अधिकतम +7 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। अन्य ऑक्सीकरण अवस्थाएँ + 2, +3, +4, +5 तथा +6 हैं।
(ii)प्रोमिथियम को छोड़कर लैन्थेनाइड्स रेडियोएक्टिव नहीं होते हैं।सभी ऐक्टिनाइड रेडियोएक्टिव हैं।
(iii)इनके यौगिक कम क्षारीय होते हैं।इनके यौगिक अधिक क्षारीय होते हैं।
(iv)इनकी अनुचुम्बकीय प्रवृत्ति की व्याख्या सरलता से की जा सकती है।इनकी अनुचुम्बकीय प्रवृत्ति की व्याख्या कठिन है।
(v)ये ऑक्सोकैटायनों का निर्माण नहीं करते।ऐक्टिनाइड के अनेक ऑक्सो धनायन जैसे - UO+, UO2+, NpO2+ आदि ज्ञात हैं।
(vi)लैन्थेनाइड सरलतापूर्वक जटिल यौगिकों का विशेषतः π-आबन्धन लीगैण्ड के साथ निर्माण नहीं करते। ये केवल कीलेटिंग लीगैण्ड के साथ जटिल यौगिक बनाते हैं।ऐक्टिनाइड में जटिल यौगिक बनाने की प्रवृत्ति बहुत अधिक होती है। ये π-आबन्धन लीगैण्ड के साथ भी जटिल यौगिकों का निर्माण करते हैं।

In simple words: लैंथेनाइड्स की ऑक्सीकरण अवस्थाएं सीमित होती हैं, वे गैर-रेडियोधर्मी होते हैं (प्रोमिथियम को छोड़कर), कम क्षारीय यौगिक बनाते हैं, उनकी चुंबकीय प्रवृत्ति समझना आसान है, और वे ऑक्सोकैटायन नहीं बनाते; जबकि एक्टिनाइड्स की ऑक्सीकरण अवस्थाएं अधिक होती हैं, वे सभी रेडियोधर्मी होते हैं, अधिक क्षारीय यौगिक बनाते हैं, उनकी चुंबकीय प्रवृत्ति समझना कठिन है, और वे ऑक्सोकैटायन बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: लैंथेनाइड्स और एक्टिनाइड्स के बीच प्रमुख अंतरों को एक सारणी के रूप में याद रखना तुलनात्मक प्रश्नों के लिए बहुत प्रभावी होता है।

 

Question 6. ऐक्टिनाइड्स क्या हैं? इन्हें ऐक्टिनाइड्स क्यों कहा जाता है? इनके प्रमुख उपयोग लिखिए।
Answer: आन्तरिक संक्रमण तत्त्व अथवा f-ब्लॉक तत्त्वों की दो श्रेणियाँ होती हैं –
1. लैन्थेनाइड श्रेणी तथा
2. ऐक्टिनाइड श्रेणी ।
ऐक्टिनाइड श्रेणी में थोरियम से लेकर लॉरेन्शियम तक के चौदह तत्त्वों को ऐक्टिनाइड्स कहा जाता है। ये तत्त्व आवर्त सारणी में ऐक्टिनियम का अनुसरण करते हैं तथा भौतिक व रासायनिक गुणों में उससे समानता भी प्रकट करते हैं। इसलिए इन्हें ऐक्टिनाइड्स कहा जाता है। ऐक्टिनाइडों के उपयोग
1. यूरेनियम तथा प्लूटोनियम का मुख्य उपयोग नाभिकीय रिएक्टर से परमाणु ऊर्जा उत्पादन में ईंधन के रूप में किया जाता है। प्लूटोनियम का उपयोग परमाणु हथियार बनाने में भी किया जाता है।
2. थोरियम ऑक्साइड का उपयोग चमकने वाले गैस मेन्टल के निर्माण में होता है।
3. यूरेनियम के लवणों का उपयोग हरे रंग के काँच के निर्माण में होता है।
4. थोरियम लवण का उपयोग आजकल कैंसर के उपचार में होता है।
In simple words: एक्टिनाइड्स f-ब्लॉक के तत्व हैं जो एक्टिनियम से समानता के कारण ऐसे कहलाते हैं। इनके मुख्य उपयोग परमाणु ऊर्जा उत्पादन (यूरेनियम, प्लूटोनियम), गैस मेंटल निर्माण (थोरियम ऑक्साइड), रंगीन कांच (यूरेनियम लवण) और कैंसर उपचार (थोरियम लवण) में होते हैं।

🎯 Exam Tip: एक्टिनाइड्स की परिभाषा, नामकरण का कारण और उनके विभिन्न औद्योगिक और चिकित्सा उपयोगों को याद रखें।

 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. संक्रमण तत्त्वों को वर्गीकृत कीजिए तथा आवर्त सारणी में इनका स्थान निर्धारित कीजिए।
Answer: संक्रमण तत्त्वों का वर्गीकरण - संक्रमण तत्त्वों का वर्गीकरण (n - 1)d- कक्षकों के आधार पर किया गया है। इस आधार पर संक्रमण तत्त्वों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है जिन्हें संक्रमण श्रेणियाँ (transition series) कहते हैं। प्रत्येक श्रेणी (n - 1)d- कक्षक में इलेक्ट्रॉन-प्रवेश के क्रम के अनुसार है। ये संक्रमण श्रेणियाँ निम्नलिखित हैं –
1. प्रथम संक्रमण श्रेणी अथवा 3d- श्रेणी - इस श्रेणी में इलेक्ट्रॉन 3d - कक्षक में प्रवेश पाता है। इस श्रेणी में Sc (Z = 21) से Zn (Z = 30) तक 10 तत्त्व हैं। ये तत्त्व आवर्त सारणी के चतुर्थ आवर्त में स्थित हैं।
2. द्वितीय संक्रमण श्रेणी अथवा 4d- श्रेणी - इस श्रेणी में इलेक्ट्रॉन 4d- कक्षक में प्रवेश पाता है। इस श्रेणी में 10 तत्त्व Y(Z = 39) से Cd (Z = 48) हैं। ये तत्त्व आवर्त सारणी के पाँचवे आवर्त में स्थित हैं।
3. तृतीय संक्रमण श्रेणी अथवा 5d- श्रेणी - इस श्रेणी में इलेक्ट्रॉन 5d-कक्षक में प्रवेश पाता है। इस श्रेणी में 10 तत्त्व La (Z = 57) तथा Hf (Z = 72) से Hg (Z = 80) हैं। ये तत्त्व आवर्त सारणी के छठे आवर्त में स्थित हैं।
4. चतुर्थ संक्रमण श्रेणी अथवा 6d- श्रेणी - इस श्रेणी में इलेक्ट्रॉन 6d-कक्षक में प्रवेश पाता है। इस श्रेणी में 10 तत्त्व Ac (Z = 89) तथा Rf (Z = 104) से कॉपरनिसियम (Z = 112) हैं। ये तत्त्व आवर्त सारणी के सातवें आवर्त में स्थित हैं।

आवर्त सारणी में स्थिति - आवर्त सारणी में संक्रमण तत्त्व (d-ब्लॉक तत्त्व) समूह 2 तथा समूह 13 के मध्य स्थित हैं। d-ब्लॉक तत्त्व s-ब्लॉक तथा p-ब्लॉकों के मध्य स्थित हैं। d-ब्लॉक तत्वों को संक्रमण' की संज्ञा इसी कारण ही प्रदान की गई है। s-ब्लॉक के तत्त्व अत्यधिक विद्युत धनात्मक होते हैं तथा आयनिक यौगिकों के निर्माण की प्रवृत्ति प्रदर्शित करते हैं। इसके विपरीत p-ब्लॉक के तत्त्व विद्युत ऋणात्मक होते हैं। और इनमें सहसंयोजी यौगिकों को बनाने की प्रवृत्ति होती है। d-ब्लॉक तत्त्व इन दोनों के मध्य एक संक्रमण व्यवहार प्रदर्शित करते हैं अर्थात् उनका व्यवहार अत्यधिक विद्युत धनात्मक s-ब्लॉक तत्त्वों तथा अत्यन्त दुर्बल रूप से विद्युत धनात्मक p-ब्लॉक तत्त्वों के मध्य का होता है। इस कारण ही d-ब्लॉक तत्त्वों को संक्रमण तत्त्व (transition elements) कहा जाता है।
In simple words: संक्रमण तत्व d-ब्लॉक तत्व होते हैं जो चार श्रेणियों (3d, 4d, 5d, 6d) में वर्गीकृत हैं, जिनके इलेक्ट्रॉन क्रमशः 3d, 4d, 5d और 6d कक्षकों में प्रवेश करते हैं। ये आवर्त सारणी में s-ब्लॉक और p-ब्लॉक के बीच स्थित होते हैं, इनके गुण दोनों के मध्यवर्ती होते हैं, इसलिए इन्हें संक्रमण तत्व कहते हैं।

🎯 Exam Tip: संक्रमण तत्वों का वर्गीकरण, प्रत्येक श्रेणी के तत्व, उनके परमाणु क्रमांक और आवर्त सारणी में उनकी स्थिति को याद रखना आवश्यक है।

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