UP Board Solutions Class 12 Chemistry Chapter 6 General Principles and Processes of Isolation of Elements

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Detailed Chapter 6 तत्वों के पृथक्करण के सामान्य सिद्धांत और प्रक्रियाएँ UP Board Solutions for Class 12 Chemistry

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Class 12 Chemistry Chapter 6 तत्वों के पृथक्करण के सामान्य सिद्धांत और प्रक्रियाएँ UP Board Solutions PDF

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 6 General Principles and Processes of Isolation of Elements (तत्त्वों के निष्कर्षण के सिद्धान्त एवं प्रक्रम)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

Question 1. सारणी 6.1 (पाठयपुस्तक) में दर्शाए गए अयस्कों में से कौन-से चुम्बकीय पृथक्करण विधि द्वारा सान्द्रित किए जा सकते हैं?
Answer: वे अयस्क जिनमें कम-से-कम एक घटक (अशुद्धि या वास्तविक अयस्क) चुम्बकीय होता है, उन्हें चुम्बकीय पृथक्करण विधि द्वारा सान्द्रित किया जा सकता है; जैसे- हेमेटाइट (Fe2O3), मैग्नेटाइट (Fe3O4), सिडेराइट (FeCO3) तथा आयरन पाइराइट (FeS2) को चुम्बकीय पृथक्करण विधि द्वारा सान्द्रित किया जा सकता है।
In simple words: चुंबकीय पृथक्करण विधि उन अयस्कों को सांद्रित करती है जिनमें अयस्क या अशुद्धि में से कोई एक चुंबकीय गुण रखता हो, जिससे उन्हें आसानी से अलग किया जा सके।

🎯 Exam Tip: चुंबकीय पृथक्करण के सिद्धांत और लागू होने वाले अयस्कों के उदाहरणों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. ऐलुमिनियम के निष्कर्षण में निक्षालन का क्या महत्त्व है?
Answer: ऐलुमिनियम के निष्कर्षण में निक्षालन के उपयोग से बॉक्साइट अयस्क से अशुद्धियाँ जैसे SiO2, Fe2O3 आदि को हटाया जा सकता है तथा शुद्ध ऐलुमिना प्राप्त किया जा सकता है।
In simple words: एल्युमिनियम के निष्कर्षण में निक्षालन बॉक्साइट अयस्क से अशुद्धियों को हटाकर शुद्ध एल्यूमिना प्राप्त करने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: निक्षालन प्रक्रिया का उद्देश्य और इसके द्वारा हटाई जाने वाली विशिष्ट अशुद्धियों को याद रखें।

 

Question 3. अभिक्रिया Cr2O3 + 2 AI → Al2O3 + 2Cr (\(\Delta\)fG = – 421 kJ) के गिब्ज ऊर्जा मान से लगता है कि अभिक्रिया ऊष्मागतिकी के अनुसार सम्भव है, पर यह कक्ष ताप पर सम्पन्न क्यों नहीं होती ?
Answer: ऊष्मागतिकीय रूप से सम्भव अभिक्रियाओं के लिए भी सक्रियण ऊर्जा की निश्चित मात्रा की आवश्यकता होती है, अतः दी गई अभिक्रिया को सम्पन्न करने के लिए अतिरिक्त ऊष्मा की आवश्यकता होगी ।
In simple words: यद्यपि यह अभिक्रिया ऊष्मागतिकीय रूप से संभव दिखती है (नकारात्मक गिब्स ऊर्जा के कारण), यह कमरे के तापमान पर नहीं होती क्योंकि इसे शुरू करने के लिए सक्रियण ऊर्जा नामक एक प्रारंभिक ऊर्जा बाधा को पार करने की आवश्यकता होती है।

🎯 Exam Tip: गिब्स मुक्त ऊर्जा और सक्रियण ऊर्जा के बीच के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है; एक अभिक्रिया ऊष्मागतिकीय रूप से संभव हो सकती है, लेकिन फिर भी होने के लिए सक्रियण ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

 

Question 4. क्या यह सत्य है कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में मैग्नीशियम, SiO2 को अपचयित कर सकता है और Si, MgO को? वे परिस्थितियाँ कौन-सी हैं?
Answer:
1600 K (सिलिकन का गलनांक) से कम ताप पर, SiO2 के निर्माण के लिए \(\Delta\)fG वक्र, MgO के \(\Delta\)fG वक्र से ऊपर स्थित होता है; अत: 1600 K से कम ताप पर Mg, SiO2 को Si में अपचयित कर सकता है। दूसरी ओर 1600 K से अधिक ताप पर MgO के लिए \(\Delta\)fG वक्र, SiO2 के \(\Delta\)fG वक्र से ऊपर स्थित होता है; अतः 1600 K से अधिक ताप पर Si, MgO को Mg में अपचयित कर सकता है।
In simple words: हाँ, विशिष्ट तापमान पर मैग्नीशियम SiO2 को और सिलिकॉन MgO को अपचयित कर सकता है। 1600 K से कम तापमान पर Mg, SiO2 को अपचयित करता है, जबकि 1600 K से अधिक तापमान पर Si, MgO को अपचयित करता है।

🎯 Exam Tip: एलिंगम आरेख के सिद्धांतों को लागू करते हुए, विभिन्न तापमानों पर धातुओं की अपचायक क्षमता को समझना महत्वपूर्ण है।

अतिरिक्त अभ्यास

 

Question 1. कॉपर का निष्कर्षण हाइड्रोधातुकर्म द्वारा किया जाता है, परन्तु जिंक का नहीं। व्याख्या कीजिए।
Answer: कॉपर से अधिक कियाशील होता है। कॉपर आयनों के विलयन से Cu2+ आयनों को Zn के द्वारा आसानी से प्रतिस्थापित किया जा सकता है।
Zn(s) + Cu2+ (aq) \(\implies\) Zn2+ (aq) + Cu (s)
इस प्रकार, कॉपर को हाइड्रोधातुकर्म के द्वारा निष्कर्षित किया जा सकता है। परन्तु, जिंक को अधिक क्रियाशील होने के कारण, Zn2+ आयन युक्त विलयन से सरलता से विस्थापित नहीं किया जा सकता है। इसका कारण यह है कि जिंक से अधिक क्रियाशील धातु; जैसे-ऐलुमिनियम, मैग्नीशियम, कैल्सियम इत्यादि जल से क्रिया करती हैं इसलिए, जिंक को हाइड्रोधातुकर्म के द्वारा निष्कर्षित नहीं किया जा सकता है।
In simple words: कॉपर का निष्कर्षण हाइड्रोधातुकर्म से संभव है क्योंकि जिंक अधिक क्रियाशील है और कॉपर आयनों को विस्थापित कर सकता है। जिंक के मामले में, यह अधिक क्रियाशील होने के कारण अपने ही आयनों को विस्थापित नहीं कर सकता और अन्य सक्रिय धातुएँ पानी से क्रिया करती हैं, जिससे हाइड्रोधातुकर्म असंभव हो जाता है।

🎯 Exam Tip: धातुओं की सापेक्षिक क्रियाशीलता और उनके आयनों को विस्थापित करने की क्षमता को समझें, यह हाइड्रोधातुकर्म की व्यवहार्यता निर्धारित करता है।

 

Question 2. फेन प्लवन विधि में अवनमक की क्या भूमिका है?
Answer: फेन प्लवन विधि में अवनमक का मुख्य कार्य संकरता के द्वारा अयस्क के अवयवों में से किसी एक को फेन बनाने से रोकना है। जैसे, NaCN का प्रयोग अवनमक के रूप में PbS से ZnS अयस्क को पृथक् करने के लिए किया जाता है। यह ZnS के साथ संकर यौगिक बनाता है तथा इसको फेन बनाने से रोकता है। इस प्रकार केवल PbS ही फेन बनाने के लिए उपलब्ध होता है तथा इसे ZnS से सरलता से पृथक् किया जा सकता है।
In simple words: फेन प्लवन विधि में अवनमक एक रसायन है जो अयस्क के एक घटक को झाग बनने से रोकता है, जिससे दूसरे घटक को प्रभावी ढंग से अलग किया जा सके। उदाहरण के लिए, NaCN ZnS को झाग बनाने से रोककर PbS और ZnS को अलग करने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: फेन प्लवन विधि में अवनमक की क्रियाविधि और इसके व्यावहारिक अनुप्रयोगों को जानना महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. अपचयन द्वारा ऑक्साइड अयस्कों की अपेक्षा पाइराइट से ताँबे का निष्कर्षण अधिक कठिन क्यों है?
Answer: पायराइट अयस्क में, कॉपर Cu2S के रूप में विद्यमान रहता है। Cu2S के निर्माण की मानक मुक्त ऊर्जा (\(\Delta\)fG), CS2 से अधिक होती है, जो कि एक ऊष्माशोषी यौगिक है। इसलिए, कार्बन या H2 का प्रयोग Cu2S को Cu धातु में अपचयित करने के लिए नहीं किया जा सकता है। इसके विपरीत Cu2O के \(\Delta\)fG का मान CO, से बहुत कम होता है। इसलिए, Cu2O को कार्बन के द्वारा Cu धातु में सरलता से अपचयित किया जा सकता है।
Cu2O (s) + C (s) \(\implies\) 2Cu(s) + CO (g) यही कारण है कि पायराइट से Cu का निष्कर्षण इसके ऑक्साइड के अपचयन द्वारा अधिक कठिन है।
In simple words: पायराइट से कॉपर निकालना मुश्किल है क्योंकि Cu2S एक ऊष्माशोषी यौगिक है जिसके लिए कार्बन या हाइड्रोजन से अपचयन कठिन होता है, जबकि Cu2O का अपचयन कार्बन द्वारा आसानी से किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न अयस्कों से धातुओं के निष्कर्षण की कठिनाई को प्रभावित करने वाले ऊष्मागतिकीय कारकों, विशेषकर मानक मुक्त ऊर्जा (\(\Delta\)fG) के मानों पर ध्यान दें।

 

Question 4. व्याख्या कीजिए-
(i) मण्डल परिष्करण,
(ii) स्तम्भ वर्णलेखिकी ।
Answer: 1. मण्डल परिष्करण (Zone refining) – यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि अशुद्धियों की विलेयता धातु की ठोस अवस्था की अपेक्षा गलित अवस्था में अधिक होती है। अशुद्ध धातु की छड़ के एक किनारे पर एक वृत्ताकार गतिशील तापक लगा रहता है (चित्र-1)। इसकी सहायता से अशुद्ध धातु को गर्म किया जाता है। तापक जैसे ही आगे की ओर बढ़ता है, गलित से शुद्ध धातु क्रिस्टलित हो जाती है तथा अशुद्धियाँ संलग्न गलितं मण्डल में चली जाती हैं। इस क्रिया को कई बार दोहराया जाता है तथा तापक को एक ही दिशा में बार-बार चलाते हैं। अशुद्धियाँ छड़ के एक किनारे पर एकत्रित हो जाती हैं। इसे काटकर अलग कर लिया जाता है। यह विधि मुख्य रूप से अतिउच्च शुद्धता वाले अर्द्धचालकों जैसे जर्मेनियम, सिलिकन, बोरॉन, गैलियम एवं इण्डियम तथा अन्य अतिशुद्ध धातुओं को प्राप्त करने के लिए बहुत उपयोगी है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र जोन रिफाइनिंग प्रक्रिया को दर्शाता है, जहाँ एक धातु की छड़ पर एक गतिशील हीटर लगाया गया है। हीटर धातु को पिघलाता है, जिससे अशुद्धियाँ पिघले हुए क्षेत्र में केंद्रित हो जाती हैं, जबकि शुद्ध धातु ठोस हो जाती है।
2. स्तम्भ वर्णलेखिकी (Column chromatography) – यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है। कि अधिशोषक पर मिश्रण के विभिन्न घटकों का अधिशोषण अलग-अलग होता है। मिश्रण को द्रव या गैसीय माध्यम में रखा जाता है जो कि अधिशोषक में से गुजरता है। स्तम्भ में विभिन्न घटक भिन्न-भिन्न स्तरों पर अधिशोषित हो जाते हैं, बाद में अधिशोषित घटक उपयुक्त विलायकों (निक्षालक) द्वारा निक्षालित कर लिए जाते हैं। गतिशील माध्यम की भौतिक अवस्था, अधिशोषक पदार्थ की प्रकृति एवं गतिशील माध्यम के गमन के प्रक्रम पर निर्भर होने के कारण इसे 'स्तम्भ वर्णलेखिकी' नाम दिया गया है। इस प्रकार की एक विधि में काँच की नली में Al2O3 का एक स्तम्भ बनाया जाता है तथा गतिशील माध्यम जिसमें अवयवों का विलयन उपस्थित होता है, द्रव प्रावस्था में होता है। यह स्तम्भ वर्णलेखिकी का एक उदाहरण है।
यह विधि सूक्ष्म मात्रा में पाए जाने वाले तत्वों के शुद्धिकरण और शुद्ध किए जाने वाले तत्व तथा अशुद्धियों के रासायनिक गुणों में अधिक भिन्नता न होने की स्थिति में शुद्धिकरण के लिए अत्यधिक उपयोगी होती है। स्तम्भ वर्णलेखिकी में प्रयुक्त प्रक्रम को चित्र-2 में दर्शाया गया है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र स्तंभ वर्णलेखिकी के दो सेटअपों को दर्शाता है: (a) औद्योगिक विधि और (b) प्रयोगशाला विधि। दोनों ही सेटअप में, एक कॉलम (अधिशोषक) होता है जिससे मिश्रण गुजरता है, जिससे घटक अलग-अलग बैंड में अलग हो जाते हैं, जिन्हें विलायक पंप, प्रवाह अन्तःक्षेपक, डिटेक्टर और ओवन जैसे घटकों का उपयोग करके एकत्र किया जाता है।
In simple words: मंडल परिष्करण अशुद्धियों की गलित अवस्था में अधिक विलेयता के सिद्धांत पर आधारित है, जबकि स्तंभ वर्णलेखिकी अधिशोषक पर विभिन्न घटकों के अलग-अलग अधिशोषण के सिद्धांत पर आधारित है, जिससे उन्हें अलग किया जा सके।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक शोधन विधि के अंतर्निहित सिद्धांत, उसके उपयोग और प्रक्रिया को दर्शाने वाले आरेख को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. 673 K ताप पर C तथा CO में से कौन-सा अच्छा अपचायक है? उत्तर 673 K ताप पर C एवं CO में से CO एक अच्छा अपचायक है। इसको निम्न प्रकार समझाया जा सकता है –
Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एलिंगम आरेख विभिन्न धातुओं के ऑक्साइड निर्माण के लिए गिब्स मुक्त ऊर्जा (\(\Delta\)G) और तापमान (T) के बीच संबंध को दर्शाता है। वक्रों के ढलान और प्रतिच्छेदन बिंदु यह निर्धारित करने में मदद करते हैं कि कौन सा पदार्थ किस तापमान पर अधिक प्रभावी अपचायक होगा।
एलिंघम चित्र (चित्र 3) में, C, CO2 वक्र लगभग क्षैतिज है, जबकि CO, CO2 वक्र उर्ध्वगामी हैं तथा दोनों वक्र 673 K पर एक-दूसरे को काटते हैं। C (s) + O2 (g) \(\implies\) CO2 (g) ऊर्जा की दृष्टि से कम सम्भाव्य है क्योंकि इसकी \(\Delta\)fG का मान अभिक्रिया 2CO (g) + O2 (g) \(\implies\) CO2 (g) की तुलना में कम ऋणात्मक होता है। इसलिए 673 K से नीचे CO एक अधिक अच्छे अपचायक के रूप में कार्य करता है।
In simple words: 673 K तापमान पर CO कार्बन की तुलना में बेहतर अपचायक है, क्योंकि एलिंगम आरेख के अनुसार, इस तापमान से नीचे CO2 बनाने के लिए CO का \(\Delta\)fG मान C से CO2 बनाने की तुलना में अधिक ऋणात्मक होता है।

🎯 Exam Tip: एलिंगम आरेख को पढ़ना और विभिन्न तापमानों पर विभिन्न अपचायकों की प्रभावशीलता का विश्लेषण करने के लिए इसका उपयोग करना सीखें।

 

Question 6. कॉपर के विद्युत-अपघटन शोधन में ऐनोड पंक में उपस्थित सामान्य तत्वों के नाम दीजिए। वे वहाँ कैसे उपस्थित होते हैं?
Answer: कॉपर के वैद्युत शोधन में ऐनोड मड में उपस्थित सामान्य तत्त्व सेलेनिमय, टेलुरियम, सिल्वर, गोल्ड आदि हैं। ये तत्त्व कॉपर से कम क्रियाशील होते हैं तथा वैद्युत प्रक्रिया में अप्रभावित रहते हैं।
In simple words: कॉपर के विद्युत-अपघटनी शोधन के दौरान, ऐनोड पंक में सेलेनियम, टेल्यूरियम, सिल्वर और गोल्ड जैसे कम क्रियाशील तत्व पाए जाते हैं, क्योंकि वे विद्युत-अपघटनी प्रक्रिया के दौरान ऑक्सीकृत नहीं होते और ऐनोड के नीचे जमा हो जाते हैं।

🎯 Exam Tip: ऐनोड पंक में पाए जाने वाले तत्वों के नाम और उनके कम क्रियाशील होने के कारण उनके वहाँ जमा होने की प्रक्रिया को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 7. आयरन (लोहे) के निष्कर्षण के दौरान वात्या भट्टी के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाली अभिक्रियाओं को लिखिए।
Answer: आयरन के ऑक्साइड अयस्कों को निस्तापन अथवा भर्जन से सान्द्रित करके, लाइमस्टोन तथा कोक के साथ मिश्रित करके वात्या भट्टी के हॉपर में डाला जाता है। वात्या भट्टी में विभिन्न ताप-परासों में आयरन ऑक्साइड का अपचयन होता है। वात्या भट्टी में होने वाली अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं -
500 - 800 K पर (वात्या भट्टी में निम्न ताप परिसर में)
• 3Fe2O3 + CO \(\implies\) 2 Fe3O4 + CO2\(\uparrow\)
• Fe3O4 + 4 CO \(\implies\) 3 Fe \(\downarrow\) + 4CO2 \(\uparrow\)
• Fe2O3 + CO \(\implies\) 2 FeO + CO2\(\uparrow\)
900 - 1500 K पर (वात्या भट्टी में उच्च ताप-परिसर में)
• C + CO2 \(\implies\) 2 CO \(\uparrow\)
• FeO + CO \(\implies\) Fe + CO2 \(\uparrow\)
चूना पत्थर (लाइमस्टोन) भी CaO में अपघटित हो जाता है जो अयस्क की सिलिकेट अशुद्धि को धातुमल के रूप में हटा देता है। धातुमल (slag) गलित अवस्था में होता है तथा आयरन से पृथक्कृत हो जाता है।
In simple words: वात्या भट्टी में लोहे के निष्कर्षण में, अयस्क, कोक और चूना पत्थर को विभिन्न तापमान क्षेत्रों से गुजारा जाता है। इन क्षेत्रों में कार्बन मोनोऑक्साइड आयरन ऑक्साइडों को धीरे-धीरे अपचयित करता है, जबकि चूना पत्थर सिलिकेट अशुद्धियों को धातुमल में बदलता है।

🎯 Exam Tip: वात्या भट्टी के विभिन्न तापमान क्षेत्रों में होने वाली विशिष्ट रासायनिक अभिक्रियाओं और उनके उत्पादों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 8. जिंक ब्लेण्ड से जिंक के निष्कर्षण में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं को लिखिए।
Answer: जिंक ब्लेण्ड से जिंक के निष्कर्षण में होने वाली अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं -
1. सान्द्रण (Concentration) – अयस्क को पीसकर फेन प्लवन प्रक्रम द्वारा इसको सान्द्रण किया जाता है।
2. भर्जन (Roasting) – सान्द्रित अयस्क का लगभग 1200 K ताप पर वायु की अधिकता में भर्जन किया जाता है जिससे जिंक ऑक्साईड (ZnO) प्राप्त होता है।
3. अपचयन (Reduction) – प्राप्त जिंक ऑक्साइड को चूर्णित कोक के साथ मिलाकर एक फायर क्ले रिटॉर्ट में 1673 K तक गर्म किया जाता है, परिणामस्वरूप यह जिंक धातु में अपचयित हो जाता है। ZnO + C \(\underrightarrow{1673K}\) Zn \(\downarrow\) + CO \(\uparrow\) 1673 K पर जिंक धातु वाष्पीकृत होकर (क्वथनांक 1180 K) आसवित हो जाती है।
4. विद्युत-अपघटनी शोधन (Electrolytic refining) – अशुद्ध जिंक ऐनोड बनाता है तथा कैथोड शुद्ध जिंक की शीट से बना होता है। विद्युत-अपघटय तनु H2SO4 से अम्लीकृत ZnSO4 विलयन होता है। विद्युत धारा प्रवाहित करने पर शुद्ध Zn कैथोड पर संगृहीत हो जाता है।
In simple words: जिंक ब्लेंड से जिंक निकालने के लिए, पहले अयस्क को सांद्रित किया जाता है, फिर ZnO बनाने के लिए भर्जन किया जाता है। इसके बाद ZnO को कार्बन से अपचयित करके जिंक धातु प्राप्त की जाती है, जिसे अंततः विद्युत-अपघटनी शोधन द्वारा शुद्ध किया जाता है।

🎯 Exam Tip: जिंक निष्कर्षण के प्रत्येक चरण की रासायनिक अभिक्रियाओं को उनके तापमान और उत्पादों के साथ याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 9. कॉपर के धातुकर्म में सिलिका की भूमिका समझाइए ।
Answer: भर्जन के दौरान कॉपर पाइराइट FeO तथा Cu2O के मिश्रण में परिवर्तित हो जाता है।
2CuFeS2 + O2 \(\implies\) Cu2S+ 2FeS+ SO2\(\uparrow\)
कॉपर पाइराइट
\(\triangle\)
2Cu2S+ 3O2 \(\implies\) 2Cu2O+ 2SO2\(\uparrow\)
2FeS+302 \(\implies\) 2FeO+2SO2\(\uparrow\)
FeO (क्षारीय) को हटाने के लिए प्रगलन के दौरान एक अम्लीय गालक सिलिका मिलाया जाता है। FeO, SiO2 से संयोग करके फेरस सिलिकेट (FeSiO3) धातुमल बनाता है जो गलित अवस्था में प्राप्त मैट पर तैरने लगता है। अतः कॉपर के निष्कर्षण में सिलिका की भूमिका ऑक्साइड को धातुमल के रूप में हटाने की होती है।
In simple words: कॉपर के धातुकर्म में, सिलिका (SiO2) अम्लीय गालक के रूप में कार्य करती है। यह FeS के ऑक्सीकरण से बने क्षारीय FeO के साथ अभिक्रिया करके गलित फेरस सिलिकेट (FeSiO3) धातुमल बनाती है, जिससे अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं।

🎯 Exam Tip: सिलिका जैसे गालक की भूमिका और यह धातुमल निर्माण द्वारा अशुद्धियों को कैसे हटाता है, यह समझना आवश्यक है।

 

Question 10. 'वर्णलेखिकी पद का क्या अर्थ है?
Answer: वर्णलेखिकी (क्रोमैटोग्राफी) ग्रीक भाषा में क्रोमा का अर्थ रंग तथा ग्राफी का अर्थ लिखना होता है। शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1906 में आईवेट (Iswett) के द्वारा पौधों से रंगीन पदार्थों को पृथक् करने के लिए किया गया था। अब इस शब्द का मूल अर्थ अस्तित्वहीन है क्योंकि आजकल इस तकनीक का प्रयोग व्यापक रूप में पृथक्करण, शोधन तथा रंगीन या रंगहीन मिश्रण के अवयवों के लक्षणीकरण (characterisation) तत्त्वों के निर्धारण में किया जाता है। यह कार्बनिक यौगिक के मिश्रण के अवयवों का दो प्रावस्थाओं के बीच वितरण के सिद्धान्त पर आधारित है। इन दोनों प्रावस्थाओं में एक स्थिर होती है, जो कि ठोस या द्रव हो सकती है। इसे स्थिर प्रावस्था कहते हैं। दूसरी प्रावस्था को गतिशील प्रावस्था कहते हैं। यह गतिशील प्रकृति की होती है और द्रव या गैस की बनी होती है।
In simple words: वर्णलेखिकी (क्रोमैटोग्राफी) एक पृथक्करण तकनीक है जो एक मिश्रण के घटकों को दो प्रावस्थाओं - एक स्थिर और एक गतिशील - के बीच उनके वितरण के आधार पर अलग करती है, जिसका मूल अर्थ 'रंग लेखन' है।

🎯 Exam Tip: वर्णलेखिकी के ग्रीक मूल, इसके सिद्धांतों (स्थिर और गतिशील प्रावस्था) और इसके व्यापक अनुप्रयोगों को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 11. वर्णलेखिकी में स्थिर प्रावस्था के चयन में क्या मापदण्ड अपनाए जाते हैं?
Answer: स्थिर प्रावस्था इस प्रकार के पदार्थ की बनी होनी चाहिए, जो कि अशुद्धियों को शुद्ध किये जाने वाले तत्त्व की अपेक्षा अधिक प्रबलता से अधिशोषित करने में सक्षम हो। इससे तत्त्व का निर्गमन (elution) सुगमता से हो जाता है।
In simple words: वर्णलेखिकी में स्थिर प्रावस्था का चुनाव इस बात पर आधारित होता है कि वह शुद्ध किए जाने वाले पदार्थ की तुलना में अशुद्धियों को अधिक मजबूती से अधिशोषित करे, जिससे शुद्ध पदार्थ आसानी से अलग हो सके।

🎯 Exam Tip: स्थिर प्रावस्था के चुनाव के महत्वपूर्ण मानदंड, जैसे अधिशोषण क्षमता और इल्यूशन में आसानी को याद रखें।

 

Question 12. निकिल-शोधन की विधि समझाइए।
Answer: निकिल-शोधन का मॉन्ड प्रक्रम (Mond process of nickel purification) – इस प्रक्रम में निकिल (अशुद्ध) को कार्बन मोनोक्साइड के प्रवाह में गर्म करने से वाष्पशील निकिल टेट्रोकार्बोनिल संकुल बन जाता है –
330-350K
Ni+ 4CO \(\implies\) [Ni(CO)4]
अशुद्ध
इस कार्बोनिल को और अधिक ताप पर गर्म करते हैं जिससे यह विघटित होकर शुद्ध धातु दे देता है।
In simple words: मॉन्ड प्रक्रम में अशुद्ध निकिल को कार्बन मोनोऑक्साइड के साथ गर्म करके वाष्पशील निकिल टेट्राकार्बोनिल बनाया जाता है, जिसे फिर अधिक तापमान पर विघटित करके शुद्ध निकिल प्राप्त किया जाता है।

🎯 Exam Tip: मॉन्ड प्रक्रम की रासायनिक अभिक्रियाओं, तापमान की स्थितियों और उत्पादित वाष्पशील यौगिक को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 13. सिलिका युक्त बॉक्साइट अयस्क में से सिलिका को ऐलुमिना से कैसे अलग करते हैं? यदि कोई समीकरण हो तो दीजिए।
Answer: शुद्ध ऐलुमिना को बॉक्साइट अयस्क से बायर प्रक्रम द्वारा पृथक्कृत किया जा सकता है। सिलिका युक्त बॉक्साईट अयस्क को NaOH के सान्द्र विलयन के साथ 473 - 523 K ताप पर तथा 35 - 36 bar दाब पर गर्म करते हैं। इससे ऐलुमिना, सोडियम ऐलुमिनेट के रूप में तथा सिलिका, सोडियम सिलिकेट के रूप में घुल जाता है तथा अशुद्धियाँ अवशेष के रूप में रह जाती हैं।
Al2O3(s) + 2NaOH (aq) + 3H2O(l) \(\implies\) 2Na[Al(OH)4](aq)
ऐलुमिना सोडियम ऐलुमिनेट
SiO2 (s) + 2NaOH(aq) \(\implies\) Na2SiO3 (aq) + H2O(l)
सिलिका सोडियम सिलिकेट
परिणामी विलयन को छानकर अविलेय अशुद्धियों (यदि कोई हो) को हटा दिया जाता है तथा इसे CO2 गैस प्रवाहित करके उदासीन कर दिया जाता है। इस अवस्था पर विलयन को ताजा बने हुए जलयोजित Al2O3 के नमूने से बीजारोपित किया जाता है जो अवक्षेपण को प्रेरित करता है।
सोडियम सिलिकेट विलयन में शेष रह जाता है तथा जलयोजित ऐलुमिना को छानकर, सुखाकर तथा गर्म करके पुनः शुद्ध Al2O3 प्राप्त कर लिया जाता है।
1470 K
Al2O3.3H2O (s) \(\implies\) Al2O3 (s) + 3H2O (g)
जलयोजित ऐलुमिना शुद्ध ऐलुमिना
In simple words: सिलिका युक्त बॉक्साइट से सिलिका को बायर प्रक्रम में अलग किया जाता है, जहाँ बॉक्साइट को NaOH के साथ गर्म करने पर एल्युमिना और सिलिका दोनों घुल जाते हैं। फिर, CO2 प्रवाहित करके एल्युमिना को जलयोजित एल्युमिना के रूप में अवक्षेपित किया जाता है, जबकि सिलिका विलयन में रहती है।

🎯 Exam Tip: बॉक्साइट से सिलिका को अलग करने के लिए बायर प्रक्रम के चरणों और शामिल रासायनिक अभिक्रियाओं को याद रखें।

 

Question 14. उदाहरण देते हुए भर्जन व निस्तापन में अन्तर बताइए।
Answer:
निस्तापन में सान्द्रित अयस्क को उसके गलनांक से नीचे वायु की सीमित मात्रा में गर्म किया जाता है।
Fe2O3.3H2O\(\implies\) Fe2O3+3H2O
लिमोनाइट फैरिक ऑक्साइड
\(\triangle\)
CaCO3. MgCO3 \(\implies\) CaO + MgO + 2CO2\(\uparrow\)
डोलोमाइट
भर्जन में अयस्क को वायु की अधिकता में तीव्रता से गर्म करते हैं। इसके फलस्वरूप P, As, S आदि की अशुद्धियाँ ऑक्सीकृत हो जाती हैं तथा सल्फाइड अयस्क धातु ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है।
2ZnS + 3O2 \(\implies\) 2ZnO + 2SO2\(\uparrow\)
जिंक ब्लेण्ड जिंक ऑक्साइड
2PbS+3O2\(\implies\)2PbO+2SO2\(\uparrow\)
गैलेना लेड ऑक्साइड
In simple words: निस्तापन में अयस्क को सीमित वायु में उसके गलनांक से नीचे गर्म किया जाता है ताकि वाष्पशील अशुद्धियां निकलें, जबकि भर्जन में अयस्क को अधिक वायु में तीव्रता से गर्म किया जाता है ताकि सल्फाइड अयस्क ऑक्साइड में बदल जाएं और अन्य अशुद्धियां ऑक्सीकृत हो जाएं।

🎯 Exam Tip: निस्तापन और भर्जन के बीच मुख्य अंतर (ऑक्सीजन की उपस्थिति/अनुपस्थिति, तापमान, और अयस्क पर प्रभाव) को उनके संबंधित रासायनिक समीकरणों के साथ याद रखें।

 

Question 15. ढलवाँ लोही कच्चे लोहे से किस प्रकार भिन्न होता है?
Answer: वात्या भट्टी से प्राप्त अशुद्ध आयरन को कच्चा लोहा कहा जाता है। इसमें S, P, Si, Mn आदि की अशुद्धियों के साथ लगभग 4% कार्बन होता है। ढलवां लोहे को बनाने के लिए कच्चे लोहे को गर्म वायु में स्क्रैप आयरन तथा कोक के साथ पिघलाया जाता है। इसमें कार्बन की मात्रा कम (लगभग 3%) पायी जाती है।
In simple words: कच्चा लोहा वात्या भट्टी से प्राप्त अशुद्ध आयरन है जिसमें लगभग 4% कार्बन और अन्य अशुद्धियाँ होती हैं, जबकि ढलवां लोहा कच्चे लोहे को स्क्रैप आयरन और कोक के साथ पिघलाकर बनाया जाता है, जिसमें कार्बन की मात्रा लगभग 3% होती है।

🎯 Exam Tip: कच्चा लोहा और ढलवां लोहा के बीच मुख्य अंतर उनकी कार्बन सामग्री और अशुद्धियों की मात्रा को याद रखें।

 

Question 16. अयस्कों तथा खनिजों में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।
Answer: प्राकृतिक रूप से उपस्थित रासायनिक पदार्थ, जिनके रूप में धातुएँ अशुद्धियों के साथ भूपर्पटी में उपस्थित होती हैं, खनिज (minerals) कहलाते हैं। वे खनिज, जिनसे धातुओं का निष्कर्षण सरल तथा आर्थिक रूप से लाभदायक हो, अयस्क कहलाते हैं। अतः सभी अयस्क खनिज होते हैं, परन्तु सभी खनिज अयस्क नहीं होते हैं। उदाहरणार्थ – भूपर्पटी में लोहा ऑक्साइडों, कार्बोनेटों तथा सल्फाइडों के रूप में विद्यमान होता है। लोहे के इन खनिजों में से निष्कर्षण के लिए लोहे के ऑक्साइडों को चुना जाता है, इसलिए लोहे के ऑक्साइड, लोहे के अयस्क हैं। इसी प्रकार भूपर्पटी में ऐलुमिनियम दो खनिजों के रूप में पाया जाता है- बॉक्साइट (Al2O3 . xH2O) तथा क्ले (Al2O3 . 2SiO2 . 2H2O)। इन दोनों खनिजों में से बॉक्साइट से AI का निष्कर्षण सरलतापूर्वक तथा आर्थिक रूप से लाभदायक रूप में किया जा सकता है, इसलिए बॉक्साइट ऐलुमिनियम का अयस्क है।
In simple words: खनिज पृथ्वी में पाए जाने वाले प्राकृतिक रासायनिक पदार्थ हैं जिनमें धातुएँ होती हैं, जबकि अयस्क वे खनिज हैं जिनसे धातु को आसानी से और आर्थिक रूप से निकाला जा सकता है। इसलिए, सभी अयस्क खनिज होते हैं, लेकिन सभी खनिज अयस्क नहीं होते।

🎯 Exam Tip: खनिज और अयस्क के बीच की परिभाषा और उनके संबंध को उदाहरणों के साथ समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 17. कॉपर मैट को सिलिका की परत चढ़े हुए परिवर्तकों में क्यों रखा जाता है?
Answer: सिलिका युक्त परिवर्तक (बेसेमर परिवर्तक) में मैट में उपस्थित शेष FeS को FeO में ऑक्सीकृत करने के लिए रखा जाता है जो सिलिका के साथ संयोग कर संगलित धातुमल बनाता है।
2FeS + 3O2 \(\implies\) 2FeO + 2SO2
FeO + SiO2 \(\implies\) FeSiO3
धातुमल
जब सम्पूर्ण लोहे को धातुमल के रूप में पृथक् कर लिया जाता है, तब कुछ Cu2S ऑक्सीकरण के फलस्वरूप Cu2O बनाता है जो अधिक Cu2S के साथ अभिक्रिया करके कॉपर धातु बनाता है।
2Cu2S + 3O2 \(\implies\) 2Cu2O + 2SO2 \(\uparrow\)
2Cu2O + Cu2S \(\implies\) 6Cu \(\downarrow\) + SO2 \(\uparrow\)
अतः कॉपर मैट को सिलिका की परत चढ़े हुए परिवर्तक में मैट में उपस्थित FeS को FeSiO3 धातुमल के रूप में हटाने के लिए भी रखा जाता है।
In simple words: कॉपर मैट को सिलिका युक्त परिवर्तकों में रखा जाता है ताकि उसमें बचे हुए FeS को ऑक्सीकृत करके FeO में बदला जा सके, जो सिलिका के साथ अभिक्रिया करके FeSiO3 धातुमल बनाता है। यह प्रक्रिया FeO को हटाकर शुद्ध कॉपर प्राप्त करने में मदद करती है।

🎯 Exam Tip: कॉपर मैट शोधन में सिलिका की भूमिका और धातुमल निर्माण के माध्यम से अशुद्धियों को हटाने की प्रक्रिया को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 18. ऐलुमिनियम के धातुकर्म में क्रायोलाइट की क्या भूमिका है?
Answer: क्रायोलाइट, मिश्रण के संगलन ताप को कम करता है तथा ऐलुमिना की वैद्युत चालकता को बढ़ाता है जो कि वास्तव में विद्युत का अच्छा चालक नहीं होता है।
In simple words: एल्युमिनियम के धातुकर्म में क्रायोलाइट पिघलने के तापमान को कम करके और एल्युमिना की विद्युत चालकता को बढ़ाकर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे प्रक्रिया अधिक कुशल बनती है।

🎯 Exam Tip: हॉल-हेराउल्ट प्रक्रिया में क्रायोलाइट के दोहरे कार्य (गलनांक कम करना और चालकता बढ़ाना) को याद रखें।

 

Question 19. निम्न कोटि के कॉपर अयस्कों के लिए निक्षालन क्रिया को कैसे किया जाता है?
Answer: निम्न ग्रेड कॉपर अयस्क का निक्षालन वायु या जीवाणुओं की उपस्थिति में अम्ल के साथ क्रिया कर किया जाता है। इस प्रक्रिया में कॉपर Cu2+ आयनों के रूप में विलयन में चला जाता है।
Cu (s) + 2H+ (aq) + 1/2 O2 (g) \(\implies\) Cu2+ (aq) + H2O (l)
In simple words: निम्न-श्रेणी के कॉपर अयस्कों का निक्षालन अम्ल की उपस्थिति में हवा या बैक्टीरिया का उपयोग करके किया जाता है, जिससे कॉपर Cu2+ आयनों के रूप में घुल जाता है और इसे निकाला जा सकता है।

🎯 Exam Tip: निम्न-श्रेणी के अयस्कों के लिए निक्षालन प्रक्रिया और कॉपर आयन बनने में शामिल अभिक्रिया को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 20. Co का उपयोग करते हुए अपचयन द्वारा जिंक ऑक्साइड से जिंक का निष्कर्षण क्यों नहीं किया जाता?
Answer: एलिंघम चित्र में CO, CO2 वक्र Zn, ZnO वक्र के ऊपर स्थित है। यह स्पष्ट करता है कि CO से CO2 बनाने के लिए \(\Delta\)fG का मान Zn से ZnO के निर्माण के मान से कम ऋणात्मक है। इसलिए, यदि CO का अपचायक के रूप में प्रयोग किया जाता है, तो अपचयन में बहुत अधिक ताप की आवश्यकता होगी। यही कारण है कि जिंक को CO अपचायक के प्रयोग द्वारा ZnO से निष्कर्षित नहीं किया जाता है।
In simple words: जिंक ऑक्साइड से जिंक निकालने के लिए CO का उपयोग इसलिए नहीं किया जाता क्योंकि एलिंगम आरेख के अनुसार, CO द्वारा ZnO के अपचयन के लिए बहुत अधिक तापमान की आवश्यकता होती है, क्योंकि CO से CO2 बनने की \(\Delta\)fG, Zn से ZnO बनने की \(\Delta\)fG की तुलना में कम ऋणात्मक होती है।

🎯 Exam Tip: एलिंगम आरेख का उपयोग करके विभिन्न अपचायकों की सापेक्षिक स्थिरता और व्यवहार्यता का विश्लेषण करने पर ध्यान दें।

 

Question 21. Cr2O3 के विरचन के लिए \(\Delta\)fG का मान – 540 kJ mol-1 है तथा Al2O3 के लिए – 827 kJ mol-1 है। क्या Cr2O3 का अपचयन AI से सम्भव है?
Answer: हाँ, AI के द्वारा Cr2O3 का अपचयन सम्भव है। इसको निम्न प्रकार समझा जा सकता है –
इस प्रक्रिया में निहित अभिक्रियाएँ निम्न हैं –
2Al (s) + 3/2 O2 (g) \(\implies\) Al2O3 (s); \(\Delta\)fG = – 827 kJ mol-1 ...(i)
2Cr (s) + 3/2 O2 (g) \(\implies\) Cr2O3 (s); \(\Delta\)fG = – 540 kJ mol-1 ...(ii)
समीकरण (ii) में से (i) को घटाने पर
2AI (s) + Cr2O3 (3) \(\implies\) Al2O3 (s) + 2Cr (s);
\(\Delta\)fG = – 827- (-540) = – 287 kJ mol-1
चूँकि संयुक्त रिडॉक्स अभिक्रिया के लिए \(\Delta\)fG का मान ऋणात्मक है, इसलिए प्रक्रिया सम्भाव्य है। अर्थात् AI के द्वारा Cr2O3 का अपचयन सम्भव है।
In simple words: हाँ, एल्यूमीनियम द्वारा क्रोमियम ऑक्साइड का अपचयन संभव है क्योंकि एल्यूमीनियम ऑक्साइड बनने की मुक्त ऊर्जा क्रोमियम ऑक्साइड की तुलना में अधिक ऋणात्मक है, जिससे समग्र अभिक्रिया के लिए एक नकारात्मक गिब्स मुक्त ऊर्जा प्राप्त होती है।

🎯 Exam Tip: गिब्स मुक्त ऊर्जा मानों का उपयोग करके रिडॉक्स अभिक्रियाओं की व्यवहार्यता का निर्धारण करना और उनकी गणना कैसे करें, यह जानना महत्वपूर्ण है।

 

Question 22. C व CO में से ZnO के लिए कौन-सा अपचायक अच्छा है?
Answer: कार्बन CO से अधिक अच्छा अपचायक है, इसको अग्र प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है – एलिंघम चित्र में, C, CO वक्र Zn, ZnO वक्र से 1120 K से अधिक ताप पर नीचे स्थित तथा C, CO2 वक्र 1323 K से अधिक ताप पर नीचे स्थित है। इस प्रकार, C से CO के लिए \(\Delta\)fG का मान तथा C, CO2 के लिए \(\Delta\)fG के मान क्रमशः 1120 K तथा 1323 K पर C से ZnO के लिए \(\Delta\)fG के मान से कम है जबकि CO, CO2 वक्र Zn, ZnO वक्र से 2273 K पर भी ऊपर है। इसलिए ZnO को C के द्वारा अपचयित किया जा सकता है परन्तु CO के द्वारा नहीं। इसलिए C व CO में से ZnO के अपचयन के लिए C अधिक अच्छा अपचायक है।
In simple words: जिंक ऑक्साइड (ZnO) के अपचयन के लिए कार्बन (C) कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) से बेहतर अपचायक है, क्योंकि एलिंगम आरेख के अनुसार, C का \(\Delta\)fG वक्र ZnO के वक्र के नीचे है, खासकर उच्च तापमान पर, जबकि CO का वक्र ZnO के वक्र से ऊपर रहता है।

🎯 Exam Tip: एलिंगम आरेख की व्याख्या करने और अपचायकों की सापेक्षिक शक्ति का निर्धारण करने के लिए वक्रों की स्थिति और उनके प्रतिच्छेदन बिंदुओं पर ध्यान दें।

 

Question 23. किसी विशेष स्थिति में अपचायक का चयन ऊष्मागतिकी कारकों पर आधारित है। आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं? अपने मत के समर्थन में दो उदाहरण दीजिए।
Answer: किसी निश्चित धात्विक ऑक्साइड का धात्विक अवस्था में अपचयन करने के लिए उचित अपचायक का चयन करने में ऊष्मागतिकी कारक सहायता करता है। इसे निम्नवत् समझा जा सकता है – एलिंघम आरेख से यह स्पष्ट होता है कि वे धातुएँ, जिनके लिए उनके ऑक्साइडों के निर्माण की मानक मुक्त ऊर्जा अधिक ऋणात्मक होती है, उन धातु ऑक्साइडों को अपचयित कर सकती हैं जिनके लिए उनके सम्बन्धित ऑक्साइडों के निर्माण की मानक मुक्त ऊर्जा कम ऋणात्मक होती है। दूसरे शब्दों में, कोई धातु किसी अन्य धातु के ऑक्साइड को केवल तब अपचयित कर सकती है, जबकि यह एलिंघम आरेख में इस धातु से नीचे स्थित हो । चूंकि संयुक्त रेडॉक्स अभिक्रिया का मानक मुक्त ऊर्जा परिवर्तन ऋणात्मक होगा (जो कि दोनों धातु ऑक्साइडों के \(\Delta\)fG में अन्तर के तुल्य होता है ।), अतः AI तथा Zn दोनों FeO को Fe में अपचयित कर सकते हैं, परन्तु Fe, Al2O3 को AI में तथा ZnO को Zn में अपचयित नहीं कर सकता। इसी प्रकार C, ZnO को Zn में अपचयित कर सकता है, परन्तु CO ऐसा नहीं कर सकता ।
In simple words: मैं इस कथन से पूरी तरह सहमत हूँ। अपचायक का चयन ऊष्मागतिकीय कारकों, विशेषकर मानक गिब्स मुक्त ऊर्जा (\(\Delta\)fG) पर निर्भर करता है, जैसा कि एलिंगम आरेख में दर्शाया गया है। एक धातु केवल उस धातु ऑक्साइड को अपचयित कर सकती है जिसका \(\Delta\)fG वक्र एलिंगम आरेख में उसके वक्र के ऊपर स्थित हो।

🎯 Exam Tip: अपचायक के चयन में ऊष्मागतिकीय सिद्धांतों, जैसे एलिंगम आरेख और गिब्स मुक्त ऊर्जा के अनुप्रयोग को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 24. उस विधि का नाम लिखिए जिसमें क्लोरीन सह-उत्पाद के रूप में प्राप्त होती है। क्या होगा यदि NaCl के जलीय विलयन का विद्युत-अपघटन किया जाए?
Answer: डाउन की प्रक्रिया में गलित NaCI के वैद्युत-अपघटन के फलस्वरूप सह-उत्पाद के रूप में क्लोरीन प्राप्त होती है। NaCl (fused) \(\implies\) Na+ + Cl-
कैथोड पर : Na+ + e- \(\implies\) Na (s)
ऐनोड पर : Cl- + e- \(\implies\) 1/2 cl2 (g)
जब NaCl के जलीय विलयन का वैद्युत-अपघटन किया जाता है, तो कैथोड पर H2 गैस तथा ऐनोड पर Cl2 गैस प्राप्त होती हैं। NaOH का एक जलीय विलयन सह-उत्पाद के रूप में प्राप्त है।
NaCl (aq) \(\implies\) Na+ (aq) + Cl- (aq)
ऐनोड पर : Cl- (aq) + e- \(\implies\) 1/2 Cl2 (g)
कैथोड पर : 2H2O (l) + 2e- \(\implies\) 2OH (a) + H2 (g)
In simple words: गलित NaCl के डाउन प्रक्रिया के विद्युत-अपघटन में क्लोरीन सह-उत्पाद के रूप में प्राप्त होती है। यदि NaCl के जलीय विलयन का विद्युत-अपघटन किया जाए, तो कैथोड पर हाइड्रोजन गैस और ऐनोड पर क्लोरीन गैस उत्पन्न होती है, तथा NaOH विलयन एक सह-उत्पाद के रूप में बनता है।

🎯 Exam Tip: गलित और जलीय NaCl के विद्युत-अपघटन के बीच के अंतर, विशेषकर उत्पादों और उनके बनने की प्रक्रिया को याद रखें।

 

Question 25. ऐलुमिनियम के विद्युत-धातुकर्म में ग्रेफाइट छड़ की क्या भूमिका है?
Answer: इस प्रक्रिया में ऐलुमिना, क्रायोलाईट तथा फ्लुओरस्पार (CaF2) के गलित मिश्रण का विद्युतअपघटन ग्रेफाइट को ऐनोड के रूप में तथा ग्रेफाइट की परत चढ़े हुए आयरन को कैथोड के रूप में प्रयुक्त करके किया जाता है। विद्युत-अपघटन करने पर AI कैथोड पर मुक्त होती है, जबकि ऐनोड पर CO तथा CO2 मुक्त होती हैं।
कैथोड पर : Al3+ (गलित) \(\implies\) AI (l)
ऐनोड पर : C (s) + O2- (गलित) \(\implies\) CO (g) + 2e-
C (s) + 2O2- (गलित) \(\implies\) CO2 (g) + 4e-
यदि किसी अन्य धातु को ग्रेफाइट के स्थान पर प्रयुक्त किया जाता है, तब मुक्त O2 न केवल इलेक्ट्रोड की धातु को ऑक्सीकृत ही करेगी, बल्कि कैथोड पर मुक्त AI की कुछ मात्रा को पुनः Al2O3 में परिवर्तित कर देगी। चूँकि ग्रेफाइट अन्य किसी धातु से सस्ता होता है, इसलिए इसे ऐनोड के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इस प्रकार ऐलुमिनियम के निष्कर्षण में ग्रेफाइट छड़ की भूमिका ऐनोड पर मुक्त O2 को संरक्षित करना है जिससे यह मुक्त होने वाले AI की कुछ मात्रा को पुनः Al2O3 में परिवर्तित न कर दे।
In simple words: एल्यूमीनियम के विद्युत-धातुकर्म में, ग्रेफाइट छड़ें ऐनोड के रूप में कार्य करती हैं। वे मुक्त ऑक्सीजन के साथ क्रिया करके CO और CO2 बनाती हैं, जिससे ऐनोड का क्षरण होता है और एल्यूमीनियम धातु का ऑक्सीकरण रुकता है, जिससे शुद्ध एल्यूमीनियम का उत्पादन सुनिश्चित होता है।

🎯 Exam Tip: एल्यूमीनियम के विद्युत-धातुकर्म में ग्रेफाइट ऐनोड की भूमिका और इसमें शामिल रासायनिक अभिक्रियाओं को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 26. निम्नलिखित विधियों द्वारा धातुओं के शोधन के सिद्धान्तों की रूपरेखा दीजिए –
(i) मण्डल परिष्करण
(ii) विद्युत-अपघटनी परिष्करण
(iii) वाष्प प्रावस्था परिष्करण ।
Answer:
1. मण्डल परिष्करण (Zone refining) – इसके लिए अभ्यास-प्रश्न संख्या 4(i) देखिए ।
2. विद्युत-अपघटनी परिष्करण (Electrolytic Refining) – इस विधि में अशुद्ध धातु को ऐनोड बनाते हैं। उसी धातु की शुद्ध धातु-पट्टी को कैथोड के रूप में प्रयुक्त करते हैं। इन्हें एक उपयुक्त विद्युत-अपघटय का विलयन विश्लेषित्र में रखते हैं जिसमें उसी धातु का लवण घुला रहता है। अधिक क्षारकीय धातु विलयन में रहती है तथा कम क्षारकीय धातुएँ ऐनोड पंक (anode mud) में चली जाती हैं। इस प्रक्रम की व्याख्या, विद्युत विभव की धारणा, अधिविभव तथा गिब्ज ऊर्जा के द्वारा (उपयोग) भी की जा सकती है। ये अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं –
ऐनोड पर : M \(\implies\) Mn+ + ne-
कैथोड पर : Mn+ + ne- \(\implies\) M
उदाहरण – ताँबे का शोधन विद्युत-अपघटनी विधि के द्वारा किया जाता है। अशुद्ध कॉपर ऐनोड के रूप में तथा शुद्ध कॉपर पत्री कैथोड के रूप में लेते हैं। कॉपर सल्फेट का अम्लीय विलयन विद्युत-अपघटय होता है तथा विद्युत अपघटन के वास्तविक परिणामस्वरूप शुद्ध कॉपर ऐनोड से कैथोड की तरफ स्थानान्तरित हो जाता है।
ऐनोड पर : Cu \(\implies\) Cu2+ + 2e-
कैथोड पर : Cu2+ + 2e- \(\implies\) Cu फफोलेदार कॉपर से अशुद्धियाँ ऐनोड पंक के रूप में जमा होती हैं जिसमें एण्टिमनी, सेलीनियम टेल्यूरियम, चाँदी, सोना तथा प्लैटिनम मुख्य होती हैं। इन तत्वों की पुनः प्राप्ति से शोधन की लागत की क्षतिपूर्ति हो सकती है। जिंक को शोधन भी इसी प्रकार से किया जा सकता है।
3. वाष्प प्रावस्था परिष्करण (Vapour Phase Refining) – इस विधि में धातु को वाष्पशील यौगिक में परिवर्तित करके दूसरे स्थल पर एकत्र कर लेते हैं। इसके बाद इसे विघटित करके शुद्ध धातु प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रक्रिया की दो आवश्यकताएँ होती हैं –
• उपलब्ध अभिकर्मक के साथ धातु वाष्पशील यौगिक बनाती हो तथा
• वाष्पशील पदार्थ आसानी से विघटित हो सकता हो जिससे धातु आसानी से पुनः प्राप्त की जा सके।
उदाहरण – जिर्कोनियम या टाइटेनियम के शोधन के लिए वॉन-आरकैल विधि : यह Zr तथा Ti जैसी कुछ धातुओं से अशुद्धियों की तरह उपस्थित सम्पूर्ण ऑक्सीजन तथा नाईट्रोजन को हटाने में बहुत उपयोगी है। परिष्कृत धातु को निर्वातित पात्र में आयोडीन के साथ गर्म करते हैं। धातु आयोडाइड अधिक सहसंयोजी होने के कारण वाष्पीकृत हो जाता है।
Zr + 2I2 \(\implies\) ZrI4
धातु आयोडाइड को विद्युत धारा द्वारा 1800 K ताप पर गर्म किए गए टंग्स्टन तन्तु पर विघटित किया जाता है। इस प्रकार से शुद्ध धातु तन्तु पर जमा हो जाती है।
ZrI4 \(\implies\) Zr \(\downarrow\) + 2I2 \(\uparrow\)
In simple words: मंडल परिष्करण अशुद्धियों की अधिक विलेयता पर आधारित है, विद्युत-अपघटनी परिष्करण में अशुद्ध धातु को ऐनोड और शुद्ध धातु को कैथोड पर जमा किया जाता है, जबकि वाष्प प्रावस्था परिष्करण में धातु को पहले वाष्पशील यौगिक में बदला जाता है और फिर उसे विघटित करके शुद्ध धातु प्राप्त की जाती है।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक शोधन विधि के सिद्धांत, प्रक्रिया और संबंधित रासायनिक अभिक्रियाओं को उनके उदाहरणों के साथ याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 27. उन परिस्थितियों का अनुमान लगाइए जिनमें Al, MgO को अपचयित कर सकता है।
Answer: दोनों अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं – \(\frac{4}{3}\) Al + O2 \(\implies\) \(\frac{2}{3}\) Al2O3 ; \(\Delta\)fG Al, Al2O3 ...(i)
2Mg + O2 \(\implies\) 2MgO ; \(\Delta\)fG Mg, MgO
एलिंघम आरेख द्वारा स्पष्टीकरण – कुछ ऑक्साइडों के विरचन में \(\Delta\)G° तथा T के एलिंघम आरेख निम्नवत् हैं
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एलिंगम आरेख विभिन्न धातुओं के ऑक्साइडों के निर्माण के लिए गिब्स मुक्त ऊर्जा (\(\Delta\)G) और तापमान (T) के बीच के संबंध को दर्शाता है। विभिन्न धातुओं (Cu, Fe, Zn, C, Al, Mg) के ऑक्साइड वक्रों की स्थिति और प्रतिच्छेदन बिंदु यह निर्धारित करने में मदद करते हैं कि कौन सी धातु किस तापमान पर दूसरे ऑक्साइड को अपचयित कर सकती है।
उपर्युक्त आरेख से स्पष्ट है कि 1665 K से नीचे तापमान पर Al2O3 का \(\Delta\)fG मान MgO की तुलना में कम ऋणात्मक है। अतः जब समीकरण
2Mg + \(\frac{2}{3}\) Al2O3 \(\implies\) 2MgO + \(\frac{4}{3}\) Al
; \(\Delta\)fG = - ve ...(iii)
इस प्रकार 1665 K से नीचे तापमान पर Mg, Al2O3 को AI में अपचयित कर सकता है। 1665 K से अधिक तापमान पर Al2O3 का \(\Delta\)fG मान MgO की तुलना में अधिक ऋणात्मक होता है। इसलिए जब समीकरण (ii) को समीकरण (i) में से घटाया जाता है तो संयुक्त रेडॉक्स अभिक्रिया अर्थात् समीकरण (iv) का \(\Delta\)fG ऋणात्मक होता है।
\(\frac{4}{3}\) Al+ 2 MgO \(\implies\) \(\frac{2}{3}\) Al2O3 + 2Mg
; \(\Delta\)fG = - Ve ... (iv) अत: 1665 K से अधिक तापमान पर Al, MgO को Mg में अपचयित कर सकता है।
In simple words: एल्यूमीनियम (Al) 1665 K से अधिक तापमान पर MgO को अपचयित कर सकता है क्योंकि इस तापमान पर Al2O3 के निर्माण की \(\Delta\)fG का मान MgO के निर्माण की \(\Delta\)fG से अधिक ऋणात्मक हो जाता है, जिससे समग्र अभिक्रिया के लिए \(\Delta\)fG नकारात्मक होता है।

🎯 Exam Tip: एलिंगम आरेख का उपयोग करके धातुओं की अपचयन क्षमता के लिए महत्वपूर्ण प्रतिच्छेदन बिंदुओं और तापमानों की पहचान करना महत्वपूर्ण है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

 

Question 1. निम्नलिखित में से कौन-सा अयस्क नहीं है?
(i) आयरन पाइराइट
(ii) हॉर्न सिल्वर
(iii) मैलेकाइट
(iv) पिग आयरन
Answer: (iv) पिग आयरन
In simple words: पिग आयरन एक धातु है, अयस्क नहीं। अयस्क वे प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले खनिज होते हैं जिनसे धातु निकाली जाती है।

🎯 Exam Tip: अयस्क और धातु के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें।

 

Question 2. कौन से अयस्क का सान्द्रण फेल प्लवन विधि द्वारा किया जाता है?
(i) कार्बोनेट
(ii) सल्फाइड
(iii) ऑक्साइड
(iv) फॉस्फेट
Answer: (ii) सल्फाइड
In simple words: फेन प्लवन विधि मुख्य रूप से सल्फाइड अयस्कों को सांद्रित करने के लिए उपयोग की जाती है।

🎯 Exam Tip: फेन प्लवन विधि के अनुप्रयोग और यह किन अयस्कों के लिए प्रभावी है, इसे याद रखें।

 

Question 3. लौह अयस्कों का सान्द्रण किया जाता है –
(i) गुरुत्व पृथक्करण विधि द्वारा ।
(ii) फेन प्लवन विधि द्वारा
(iii) चुम्बकीय पृथक्करण विधि द्वारा
(iv) अमलगम विधि द्वारा ।
Answer: (iii) चुम्बकीय पृथक्करण विधि द्वारा
In simple words: लोहे के अयस्कों, विशेषकर चुंबकीय गुणों वाले अयस्कों का सांद्रण चुंबकीय पृथक्करण विधि द्वारा किया जाता है।

🎯 Exam Tip: लौह अयस्कों के लिए उपयोग की जाने वाली विशिष्ट सांद्रण विधि और इसके पीछे के सिद्धांत को जानें।

 

Question 4. निम्नलिखित में से कौन क्षारीय गालक नहीं है?
(i) CaCO3
(ii) CaO
(iii) SiO2
(iv) MgO
Answer: (iii) SiO2
In simple words: SiO2 (सिलिका) एक अम्लीय गालक है, जबकि CaCO3, CaO और MgO क्षारीय गालक हैं।

🎯 Exam Tip: अम्लीय और क्षारीय गालकों के उदाहरणों और उनके कार्य को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. वात्या भट्टी में आयरन ऑक्साइड अपचयित होता है –
(i) SiO2 द्वारा
(ii) C द्वारा
(iii) CO द्वारा
(iv) CaCO3 द्वारा
Answer: (iii) CO द्वारा
In simple words: वात्या भट्टी में आयरन ऑक्साइड मुख्य रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) द्वारा अपचयित होता है।

🎯 Exam Tip: वात्या भट्टी में आयरन के निष्कर्षण में CO की भूमिका को एक मुख्य अपचायक के रूप में याद रखें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. अयस्क किसे कहते हैं? अयस्क तथा खनिज में क्या अन्तर है?
Answer:
खनिज-पृथ्वी में धातु तथा उनके यौगिक जिस रूप में मिलते हैं, वे खनिज कहलाते हैं; जैसे- रॉक साल्ट (rock salt), NaCl आदि ।
अयस्क - वे खनिज जिनसे किसी शुद्ध धातु का निष्कर्षण अधिक मात्रा में सुविधापूर्वक व कम व्यय पर किया जा सके, उस धातु के अयस्क कहलाते हैं; जैसे- लोहे का अयस्क हेमेटाइट, Fe2O3 : 2H2O है। अतः सभी अयस्क खनिज होते हैं, परन्तु सभी खनिज अयस्क नहीं होते हैं।
In simple words: खनिज वे प्राकृतिक पदार्थ हैं जिनमें धातुएँ उनके यौगिकों के रूप में पाई जाती हैं, जबकि अयस्क वे खनिज होते हैं जिनसे धातु को आसानी से और लाभदायक तरीके से निकाला जा सकता है। इसलिए सभी अयस्क खनिज होते हैं, लेकिन सभी खनिज अयस्क नहीं होते।

🎯 Exam Tip: खनिज और अयस्क की परिभाषाओं और उनके बीच के संबंध को उदाहरणों के साथ याद रखें।

 

Question 2. ऐलुमिनियम के दो प्रमुख अयस्कों के नाम तथा सूत्र लिखिए।
Answer: ऐलुमिनियम के दो प्रमुख अयस्क इस प्रकार हैं -
1. बॉक्साइट Al2O3: 2H2O
2. क्रायोलाइट Na3AlF6
In simple words: एल्यूमीनियम के दो मुख्य अयस्क बॉक्साइट (Al2O3: 2H2O) और क्रायोलाइट (Na3AlF6) हैं।

🎯 Exam Tip: एल्यूमीनियम के प्रमुख अयस्कों के नाम और उनके रासायनिक सूत्र याद रखें।

 

Question 3. ऐलुनाइट अयस्क का संगठन लिखिए।
Answer: K2SO4: Al2(SO4)3 : 4 Al(OH)3
In simple words: एलुनाइट अयस्क का रासायनिक संगठन K2SO4: Al2(SO4)3 : 4 Al(OH)3 है।

🎯 Exam Tip: एलुनाइट जैसे विशिष्ट अयस्कों के रासायनिक सूत्र और संरचना को याद रखें।

 

Question 4. कॉपर के दो प्रमुख अयस्कों के नाम तथा सूत्र लिखिए।
Answer: कॉपर के दो प्रमुख अयस्क क्यूप्प्राइट (Cu2O) व कॉपर पायराइट (CuFeS2) हैं।
In simple words: कॉपर के दो मुख्य अयस्क क्यूप्राइट (Cu2O) और कॉपर पाइराइट (CuFeS2) हैं।

🎯 Exam Tip: कॉपर के प्रमुख अयस्कों के नाम और उनके रासायनिक सूत्र याद रखें।

 

Question 5. किन्हीं दो सल्फाइड अयस्कों के नाम लिखिए ।
Answer:
1. अर्जेण्टाइट (Ag2S)
2. कैल्कोपायराइट (CuFeS2)
In simple words: अर्जेन्टाइट (Ag2S) और कैल्कोपाइराइट (CuFeS2) दो सामान्य सल्फाइड अयस्क हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न प्रकार के अयस्कों (जैसे सल्फाइड) के उदाहरणों को उनके रासायनिक सूत्रों के साथ याद रखें।

 

Question 6. डायस्पोर तथा केरार्जिराइट किन धातुओं के अयस्क हैं?
Answer:
• डायस्पोर- ऐलुमिनियम;
• केरार्जिराइट- सिल्वर
In simple words: डायस्पोर एल्यूमीनियम का अयस्क है, जबकि केरार्जिराइट सिल्वर का अयस्क है।

🎯 Exam Tip: प्रमुख अयस्कों को संबंधित धातुओं के साथ याद रखें।

 

Question 7. लोहे के प्रमुख अयस्कों के नाम तथा सूत्र लिखिए।
Answer:
1, ऑक्साइड अयस्क – लाल हेमेटाइट (Fe2O3. 2H2O), मैग्नेटाइट (Fe3O4)
2. जलीय ऑक्साइड अयस्क – भूरा हेमेटाइट या लिमोनाइट (Fe2O3 : 3H2O)
3. कार्बोनेट अयस्क – सिडेराइट (FeCO3)
4. सल्फाइड अयस्क – आयरन पाइराइट (FeS2), कॉपर आयरन पाइराइट या कैल्को पाइराइट (CuFeS2)
In simple words: लोहे के प्रमुख अयस्क ऑक्साइड (लाल हेमेटाइट, मैग्नेटाइट), जलीय ऑक्साइड (लिमोनाइट), कार्बोनेट (सिडेराइट) और सल्फाइड (आयरन पाइराइट) श्रेणियों में आते हैं।

🎯 Exam Tip: लोहे के विभिन्न प्रकार के अयस्कों, उनके रासायनिक सूत्रों और वर्गीकरण को याद रखें।

 

Question 8. ऐजुराइट तथा सिडेराइट अयस्कों का सूत्र लिखिए।
Answer: ऐजुराइट- 2CuCO3. Cu(OH)2, सिडेराइट (FeCO3)
In simple words: एजुराइट का सूत्र 2CuCO3. Cu(OH)2 है, और सिडेराइट का सूत्र FeCO3 है।

🎯 Exam Tip: इन अयस्कों के रासायनिक सूत्रों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 9. आधात्री की व्याख्या कीजिए।
Answer: खनिजों में मिट्टी, कंकड़, पत्थर आदि अनावश्यक पदार्थ अशुद्धियों के रूप में मिले रहते हैं। इन पदार्थों को गैंग या आधात्री कहते हैं।
In simple words: आधात्री (गैंग) वे अवांछित अशुद्धियाँ हैं जैसे मिट्टी, कंकड़ या पत्थर जो अयस्क में धातु के साथ मिले होते हैं।

🎯 Exam Tip: आधात्री की परिभाषा और धातुकर्म में इसकी भूमिका को याद रखें।

 

Question 10. फेन प्लवन विधि द्वारा किन अयस्कों का सान्द्रण किया जाता है। इस विधि का वर्णन | कीजिए।
Answer: यह विधि अयस्क तथा आधात्री (gangue) की किसी द्रव से भीगने की प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। इस विधि में बारीक पिसे हुए अयस्क को जल तथा तेल के मिश्रण में डालकर वायु प्रवाहित की जाती है। अशुद्ध अयस्क तेल के साथ झाग (फेन) बनाकर ऊपर तैरने लगता है और अपद्रव्य नीचे बैठ जाते हैं। इस विधि में चीड़ का तेल (pine oil) या क्रीओसेट तेल (creosate oil) काम में लाया जाता है। सल्फाइड अयस्कों का सान्द्रण इसी विधि से किया जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र फेन प्लवन विधि द्वारा अयस्क के सांद्रण को दर्शाता है। इसमें एक टैंक में जल और तेल के मिश्रण में बारीक पिसा हुआ अयस्क डाला जाता है, और वायु प्रवाहित की जाती है। अयस्क युक्त झाग ऊपर तैरता है जबकि अशुद्धियाँ नीचे बैठ जाती हैं।
In simple words: फेन प्लवन विधि का उपयोग सल्फाइड अयस्कों को सांद्रित करने के लिए किया जाता है। इसमें अयस्क को तेल और पानी के मिश्रण में वायु प्रवाहित करके झाग उत्पन्न किया जाता है, जिससे अयस्क के कण झाग के साथ ऊपर आ जाते हैं जबकि अशुद्धियाँ नीचे बैठ जाती हैं।

🎯 Exam Tip: फेन प्लवन विधि के सिद्धांत, प्रक्रिया, उपयोग (सल्फाइड अयस्कों के लिए) और इसमें प्रयुक्त होने वाले पदार्थों को याद रखें।

 

Question 11. अयस्कों का सान्द्रण क्यों आवश्यक है? चुम्बकीय पृथक्करण विधि से क्या तात्पर्य है?
Answer:
खानों से प्राप्त अयस्कों में मिट्टी, कंकड़, पत्थर आदि मिले होते हैं जिन्हें आधात्री कहते हैं। आधात्री के कारण शुद्ध धातु प्राप्त करने में अवरोध उत्पन्न होता है तथा धन व समय का भी अपव्यय होता है। अतः धातु निष्कर्षण के पूर्व अयस्क से इन अशुद्धियों को दूर किया जाता है जिसे अयस्क का सान्द्रण कहते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र चुंबकीय पृथक्करण विधि को दर्शाता है। एक कन्वेयर बेल्ट पर अयस्क के चूर्ण को दो रोलरों के ऊपर से गुजारा जाता है, जिनमें से एक चुंबकीय होता है। चुंबकीय पदार्थ चुंबकीय रोलर से आकर्षित होकर पास में गिरते हैं, जबकि अचुंबकीय पदार्थ दूर गिरते हैं, जिससे वे अलग हो जाते हैं।
चुम्बकीय पृथक्करण – सान्द्रण की यह विधि पदार्थों के चुम्बकीय तथा अचुम्बकीय गुणों पर निर्भर करती है। किसी अयस्क में उपस्थित चुम्बकीय अशुद्धि को इस विधि के द्वारा पृथक् कर सकते हैं। टिन-स्टोन (SnO2) में कुछ चुम्बकीय पदार्थ; जैसे- Fe3O4 आदि मिला होता है। अयस्क के महीन चूर्ण को दो बेलनों पर लगी पट्टी (belt) पर डालते हैं। इनमें से एक बेलन चुम्बकीय होता है। पट्टी को चलाने पर चुम्बकीय तथा अचुम्बकीय पदार्थ अलग-अलग स्थानों पर एकत्रित होते जाते हैं, जैसा कि चित्र में प्रदर्शित किया गया है। इस विधि में महीन चूर्ण को पट्टी पर डालते रहते हैं तथा पट्टी बेलनों की सहायता से चलती रहती है। विद्युत चुम्बकीय ध्रुवों के प्रभावों के कारण चुम्बकीय पदार्थ उससे दूर पृथक् पृथक् होते जाते हैं। इस प्रकार से सान्द्रित अयस्क एकत्रित कर लिया जाता है।
In simple words: अयस्कों का सांद्रण आवश्यक है ताकि उनमें से आधात्री (अवांछित अशुद्धियों) को हटाकर शुद्ध धातु का निष्कर्षण आसान और आर्थिक रूप से हो सके। चुंबकीय पृथक्करण विधि अयस्क या आधात्री के चुंबकीय गुणों के अंतर का उपयोग करके उन्हें अलग करती है।

🎯 Exam Tip: अयस्क सांद्रण की आवश्यकता, चुंबकीय पृथक्करण का सिद्धांत और इसकी प्रक्रिया को उदाहरणों के साथ समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 12. गालक किसे कहते हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
Answer:
गालक – गालक उस पदार्थ को कहते हैं जो अयस्क में उपस्थित अगलनीय अशुद्धियों के साथ उच्च ताप पर क्रिया करके इनको आसानी से गलाकर पृथक् होने वाले पदार्थों के रूप में दूर कर देते हैं। अशुद्धियों की गालक से क्रिया के फलस्वरूप बने गलनीय पदार्थ को धातुमल कहा जाता है। धातुमल, धातु से हल्का होने के कारण उसके ऊपर एक अलग पर्त के रूप में तैरने लगता है जिसको अलग कर लेते हैं। गालक दो प्रकार के होते हैं –
1. अम्लीय गालक; जैसे- SiO2 । यह क्षारीय अशुद्धियों; जैसे- CaO, FeO आदि को दूर करता है।
2. क्षारीय गालक; जैसे- चूने का पत्थर (CaCO3)। यह अम्लीय अशुद्धियों; जैसे- SiO2, P2O5 को दूर करता है।
In simple words: गालक वे पदार्थ होते हैं जो अयस्क में मौजूद अगलनीय अशुद्धियों के साथ उच्च तापमान पर अभिक्रिया करके गलनीय धातुमल बनाते हैं, जिससे अशुद्धियों को आसानी से अलग किया जा सकता है। यह अम्लीय या क्षारीय प्रकृति का हो सकता है।

🎯 Exam Tip: गालक की परिभाषा, इसके प्रकार (अम्लीय और क्षारीय) और उनके उदाहरणों तथा धातुकर्म में उनकी भूमिका को याद रखें।

 

Question 13. अम्लीय गालक क्या है? धातुकर्म में इसकी क्या उपयोगिता है? एक उदाहरण देकर समझाइए ।
Answer: वे गालक जो क्षारीय अशुद्धियों से क्रिया करके धातुमल बनाते हैं, अम्लीय गालक कहलाते हैं। सिलिका (SiO2) तथा बोरेक्स प्रमुख अम्लीय गालक हैं।
In simple words: अम्लीय गालक वे पदार्थ होते हैं जो धातुकर्म में क्षारीय अशुद्धियों के साथ मिलकर गलनीय धातुमल बनाते हैं, जिससे अशुद्धियाँ दूर होती हैं; जैसे सिलिका (SiO2)।

🎯 Exam Tip: अम्लीय गालक की परिभाषा, इसके उदाहरण और धातुकर्म में इसकी विशिष्ट भूमिका को याद रखें।

 

Question 14. SiO2 अशुद्धि दूर करने के लिए उपयुक्त गालक लिखिए तथा सम्बन्धित अभिक्रिया लिखिए।
Answer: SiO2 अशुद्धि दूर करने के लिए उसमें क्षारीय गालक CaCO3 लिया जाता है।
CaCO3 + SiO2 \(\implies\) CaSiO3\(\downarrow\) + CO2\(\uparrow\)
कैल्सियम कार्बोनेट कैल्सियम सिलिकेट (धातुमल)
In simple words: SiO2 अशुद्धि को दूर करने के लिए क्षारीय गालक कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO3) का उपयोग किया जाता है, जो SiO2 के साथ अभिक्रिया करके कैल्शियम सिलिकेट धातुमल बनाता है।

🎯 Exam Tip: SiO2 जैसी अम्लीय अशुद्धियों को दूर करने के लिए क्षारीय गालक और संबंधित रासायनिक अभिक्रिया को याद रखें।

 

Question 12. गालक किसे कहते हैं? उदाहरण सहित समझाइए।


Answer: गालक - गालक उस पदार्थ को कहते हैं जो अयस्क में उपस्थित अगलनीय अशुद्धियों के साथ उच्च ताप पर क्रिया करके इनको आसानी से गलाकर पृथक् होने वाले पदार्थों के रूप में दूर कर देते हैं। अशुद्धियों की गालक से क्रिया के फलस्वरूप बने गलनीय पदार्थ को धातुमल कहा जाता है। धातुमल, धातु से हल्का होने के कारण उसके ऊपर एक अलग पर्त के रूप में तैरने लगता है जिसको अलग कर लेते हैं। गालक दो प्रकार के होते हैं -
1. अम्लीय गालक; जैसे- SiO2 । यह क्षारीय अशुद्धियों; जैसे- CaO, FeO आदि को दूर करता है।
2. क्षारीय गालक; जैसे- चूने का पत्थर (CaCO3)। यह अम्लीय अशुद्धियों; जैसे- SiO2, P2O5 को दूर करता है।
In simple words: गालक वे पदार्थ होते हैं जो अयस्क में मौजूद अशुद्धियों से उच्च तापमान पर क्रिया करके उन्हें आसानी से हटाने योग्य धातुमल में बदल देते हैं। यह प्रक्रिया अशुद्धियों को धातु से अलग करने में मदद करती है, जिससे शुद्ध धातु प्राप्त करना आसान हो जाता है।

🎯 Exam Tip: गालक के प्रकार (अम्लीय और क्षारीय) और उनके कार्य (अशुद्धियों को हटाना) को उदाहरणों सहित स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है।

 

Question 13. अम्लीय गालक क्या है? धातुकर्म में इसकी क्या उपयोगिता है? एक उदाहरण देकर समझाइए ।


Answer: वे गालक जो क्षारीय अशुद्धियों से क्रिया करके धातुमल बनाते हैं, अम्लीय गालक कहलाते हैं। सिलिका (SiO2) तथा बोरेक्स प्रमुख अम्लीय गालक हैं।
In simple words: अम्लीय गालक वे पदार्थ होते हैं जो धातुओं को शुद्ध करने की प्रक्रिया में क्षारीय अशुद्धियों के साथ मिलकर धातुमल बनाते हैं, जिससे अशुद्धियों को धातु से आसानी से अलग किया जा सके।

🎯 Exam Tip: अम्लीय गालक की परिभाषा और धातुकर्म में इसकी भूमिका को एक उपयुक्त उदाहरण के साथ प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 14. SiO2 अशुद्धि दूर करने के लिए उपयुक्त गालक लिखिए तथा सम्बन्धित अभिक्रिया लिखिए।


Answer: SiO2 अशुद्धि दूर करने के लिए उसमें क्षारीय गालक CaCO3 लिया जाता है।
\[ \text{CaCO}_3 + \text{SiO}_2 \longrightarrow \text{CaSiO}_3\downarrow + \text{CO}_2\uparrow \]
कैल्सियम कार्बोनेट कैल्सियम सिलिकेट (धातुमल)
In simple words: सिलिका (SiO2) की अशुद्धि को दूर करने के लिए चूना पत्थर (CaCO3) जैसे क्षारीय गालक का उपयोग किया जाता है। यह सिलिका के साथ प्रतिक्रिया करके कैल्शियम सिलिकेट नामक धातुमल बनाता है, जिसे आसानी से अलग किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में सही गालक का नाम और संतुलित रासायनिक समीकरण लिखना आवश्यक है, जिसमें धातुमल का निर्माण दर्शाया गया हो।

 

Question 15. धातुमल किसे कहते हैं? एक उदाहरण से समझाइए ।


Answer: अयस्क में कुछ अशुद्धियाँ ऐसी होती हैं जिनका गलनांक बहुत अधिक होता है। गालक इन अशुद्धियों से मिलकर द्रवित पदार्थ बनाते हैं जिसे धातुमल कहते हैं। यह धातु से हल्का होने के कारण ऊपर तैरता रहता है जिसे निथारकर अलग कर दिया जाता है।
\[ \text{अशुद्धि} + \text{गालक} = \text{धातुमल} \]
उदाहरणार्थ- FeO में SiO2 मिलाने पर FeSiO3 धातुमल प्राप्त होता है।
In simple words: धातुमल अशुद्धियों और गालक के बीच की प्रतिक्रिया से बना पिघला हुआ पदार्थ है, जो धातु को शुद्ध करने की प्रक्रिया में अशुद्धियों को अलग करने में मदद करता है। यह धातु से हल्का होने के कारण उसके ऊपर तैरता है और आसानी से हटाया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: धातुमल की परिभाषा, उसके बनने की प्रक्रिया और एक स्पष्ट उदाहरण देना सुनिश्चित करें।

 

Question 16. निस्तापन किसे कहते हैं? उदाहरण देकर समझाइए।


Answer: वह क्रिया जिसमें अयस्क को इतना गर्म करते हैं कि वह पिघले नहीं तथा अयस्क से गैसीय पदार्थ या वाष्पशील पदार्थ पृथक् हो जाते हैं, निस्तापन कहलाती है। गैस निकलने पर अयस्क सरन्ध्र (porous) हो जाता है; जैसे- कार्बोनेट अयस्क गर्म होकर ऑक्साइड अयस्क तथा CO2 में बदल जाता है।
\[ \text{ZnCO}_3 \longrightarrow \text{ZnO} + \text{CO}_2\uparrow \]
In simple words: निस्तापन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें अयस्क को उसके गलनांक से नीचे, सीमित वायु में गर्म किया जाता है, ताकि उसमें से नमी, कार्बन डाइऑक्साइड या अन्य वाष्पशील पदार्थ निकल जाएं और अयस्क छिद्रपूर्ण हो जाए।

🎯 Exam Tip: निस्तापन की परिभाषा में "गलनांक से नीचे" और "सीमित वायु" जैसे कीवर्ड्स का उल्लेख करें, साथ ही एक प्रासंगिक रासायनिक समीकरण भी दें।

 

Question 17. भर्जन किसे कहते हैं? उदाहरण देकर समझाइए।


Answer: वह क्रिया जिसमें अयस्क को वायु की उपस्थिति में उसके गलनांक से नीचे गर्म किया जाता है, भर्जन कहलाती है। इस क्रिया में S, As आदि वाष्पशील अशुद्धियाँ ऑक्साइडों के रूप में पृथक् हो जाती हैं। और सल्फाइड अयस्क ऑक्साइड में बदल जाता है।
\[ \text{S} + \text{O}_2 \longrightarrow \text{SO}_2\uparrow \]
4 As + 3O2 → 2 As2O3 ↑
2 Zns + 3O2 → 2 ZnO + 2 SO2↑
In simple words: भर्जन एक प्रक्रिया है जिसमें अयस्क को वायु की अत्यधिक उपस्थिति में उसके गलनांक से नीचे गर्म किया जाता है, जिससे सल्फाइड जैसी अशुद्धियां ऑक्साइडों में परिवर्तित हो जाती हैं और वाष्पशील अशुद्धियां बाहर निकल जाती हैं।

🎯 Exam Tip: भर्जन की परिभाषा में "वायु की उपस्थिति में" और "गलनांक से नीचे" शब्दों का प्रयोग करें, साथ ही सल्फाइड अयस्क के ऑक्सीकरण का उदाहरण समीकरण सहित दें।

 

Question 18. जिंक ब्लैण्ड से जिंक के निष्कर्षण में भर्जन व अपचयन की अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण दीजिए।


Answer: जिंक ब्लैण्ड (ZnS) एक सल्फाइड अयस्क है, अतः इसका निष्कर्षण फेन प्लवन विधि द्वारा सान्द्रित करने के पश्चात् निम्न पदों में किया जाता है -
1. जिंक ब्लैण्ड अयस्क का भर्जन - सान्द्रित जिंक ब्लैण्ड को परावर्तनी भट्ठी में 927°C पर वायु की उपस्थिति में गर्म करने पर यह (ZnS) अपने ऑक्साइड (ZnO) में परिवर्तित हो जाता है। अभिक्रिया निम्न है।
\[ 2\text{ZnS} + 3\text{O}_2 \longrightarrow 2\text{ZnO} + 2\text{SO}_2\uparrow \]
\[ \text{Zns} + 2\text{O}_2 \longrightarrow \text{ZnSO}_4 \]
\[ 2\text{ZnSO}_4 \underrightarrow { \triangle } 2\text{ZnO} + 2\text{SO}_2\uparrow + \text{O}_2\uparrow \]
2. ऑक्साइड का अपचयन - भर्जन क्रिया से प्राप्त ZnO को कार्बन के साथ गर्म करने पर ZnO का Zn में अपचयन हो जाता है।
\[ \text{ZnO} + \text{C} \underrightarrow { \triangle } \text{Zn}\downarrow + \text{CO}\uparrow \]
In simple words: जिंक ब्लैण्ड (ZnS) से जिंक निकालने के लिए, पहले इसे वायु की उपस्थिति में गर्म करके जिंक ऑक्साइड (ZnO) में बदला जाता है, जिसे भर्जन कहते हैं। फिर, इस जिंक ऑक्साइड को कार्बन के साथ उच्च तापमान पर गर्म करके शुद्ध जिंक धातु प्राप्त की जाती है, जिसे अपचयन कहते हैं।

🎯 Exam Tip: जिंक ब्लैण्ड के भर्जन और जिंक ऑक्साइड के अपचयन दोनों के लिए रासायनिक समीकरणों को सही ढंग से लिखना और तापमान जैसी विशिष्ट परिस्थितियों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 19. प्रगलन क्या है? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।


Answer: अयस्क में उचित गालक मिलाकर मिश्रण को उच्च ताप पर गलाने की क्रिया को प्रगलन कहते हैं। इस क्रिया में अयस्क का गलित धातु में अपचयन हो जाता है अथवा धातुयुक्त पदार्थ पिघल जाता है। गालक अयस्क में उपस्थित अपद्रव्य से क्रिया करके धातुमल बनाता है जिसे अलग कर लेते हैं। इसमें वात्या भट्ठी का प्रयोग करते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक वात्या भट्ठी को दर्शाता है, जिसका उपयोग प्रगलन प्रक्रिया में होता है। भट्ठी के ऊपर से चार्ज (अयस्क, कोक, गालक) डाला जाता है, जबकि निचले हिस्से से गर्म वायु का झोंका प्रवाहित होता है। भट्ठी के अंदर विभिन्न तापमान क्षेत्र (250°C से 1500°C तक) होते हैं जहां रासायनिक अभिक्रियाएं होती हैं, जिससे पिघली धातु और धातुमल अलग-अलग स्तरों पर एकत्र होते हैं और अलग-अलग द्वारों से निकाले जाते हैं।
उदाहरणार्थ- कॉपर पाइराइट से कॉपर का निष्कर्षण वात्या भट्ठी में प्रगलन द्वारा किया जाता है। इसमें निम्नलिखित अभिक्रियाएँ होती हैं -
\[ \text{Cu}_2\text{O} + \text{Fes} \longrightarrow \text{Cu}_2\text{S} + \text{FeO} \]
\[ 2\text{Fes} + 3\text{O}_2 \longrightarrow 2\text{FeO} + 2\text{SO}_2\uparrow \]
\[ \text{FeO} + \text{SiO}_2 \longrightarrow \text{FeSiO}_3 \]
In simple words: प्रगलन वह प्रक्रिया है जिसमें अयस्क को गालक के साथ मिलाकर बहुत उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है, जिससे धातु पिघल जाती है और अशुद्धियां धातुमल के रूप में अलग हो जाती हैं। यह धातु निष्कर्षण में एक महत्वपूर्ण चरण है, खासकर वात्या भट्टी में।

🎯 Exam Tip: प्रगलन की परिभाषा, उसके उद्देश्यों (अपचयन और धातुमल निर्माण) और वात्या भट्ठी के उपयोग को समझाना आवश्यक है। उदाहरण के साथ रासायनिक समीकरणों को शामिल करें।

 

Question 20. प्रगलन में कोक और गालक का प्रयोग क्यों किया जाता है? व्याख्या कीजिए।


Answer: प्रगलन में कोक तथा गालक के प्रयोग से अयस्क के निस्तापन से प्राप्त ऑक्साइड को कोक अपचयित करता है, जिससे गलित धातु प्राप्त हो जाती है और अपद्रव्य गालक से क्रिया करके धातुमल के रूप में अलग हो जाते हैं। इससे अयस्क का गलनांक भी कम हो जाता है।
In simple words: प्रगलन में कोक का उपयोग अयस्क के ऑक्साइड को धातु में अपचयित करने के लिए होता है, जबकि गालक अशुद्धियों के साथ मिलकर धातुमल बनाता है, जिसे धातु से अलग किया जा सके। ये दोनों पदार्थ अयस्क के गलनांक को कम करके प्रक्रिया को आसान बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: कोक (अपचायक के रूप में) और गालक (अशुद्धियों को धातुमल में बदलने के लिए) की विशिष्ट भूमिकाओं पर ध्यान दें और बताएं कि ये अयस्क के गलनांक को कैसे प्रभावित करते हैं।

 

Question 21. ऐलुमिनो-थर्मिक विधि क्या है ? इसके उपयोग लिखिए।


Answer: धातुओं के ऑक्साइडों को ऐलुमिनियम चूर्ण के साथ उच्च ताप पर गर्म करने से धातुएँ प्राप्त होती हैं। यह क्रिया ऊष्माक्षेपी है तथा इसको एलुमिनोथर्मिक विधि कहते हैं।
\[ 3\text{Co}_3\text{O}_4 + 8\text{Al} \longrightarrow 9\text{Co} + 4\text{Al}_2\text{O}_5 \]
\[ 3\text{Mn}_3\text{O}_4 + 8\text{Al} \longrightarrow 9\text{Mn} + 4\text{Al}_2\text{O}_5 \]
इस विधि का उपयोग Co, Mn और Cr धातुओं के निष्कर्षण और थर्माइट वेल्डिंग में किया जाता है।
In simple words: ऐलुमिनो-थर्मिक विधि में एल्यूमीनियम चूर्ण का उपयोग धातुओं के ऑक्साइड को अत्यधिक गर्मी पर धातु में अपचयित करने के लिए किया जाता है, जिससे शुद्ध धातु प्राप्त होती है।

🎯 Exam Tip: ऐलुमिनो-थर्मिक विधि की परिभाषा को "ऊष्माक्षेपी" प्रकृति और "ऐलुमिनियम चूर्ण" के उपयोग के साथ स्पष्ट करें। साथ ही, इसके दो मुख्य उपयोगों का उल्लेख करें और एक रासायनिक समीकरण लिखें।

 

Question 22. लीचिंग क्या है? एक उदाहरण द्वारा समझाइए।


Answer: यह विधि रासायनिक परिवर्तन पर आधारित है। इसके अन्तर्गत बारीक पिसे अयस्क को उचित अभिकर्मक के साथ क्रिया कराते हैं। जिससे विलयन की अवस्था में परिवर्तन आ जाता है तथा अशुद्धियाँ ठोस अवस्था में रह जाती हैं।
उदाहरण - बॉक्साइट अयस्क को सान्द्रण करने के लिए Al2O5 . 2H2O की क्रिया NaOH से कराने पर NaAlO2 बन जाता है जो जल में विलेय है और अशुद्धियाँ; जैसे- सिलिका, Fe2O3 नीचे ठोस के रूप में अवक्षिप्त हो जाती हैं।
\[ \text{Al}_2\text{O}_3\cdot 2\text{H}_2\text{O} + 2\text{NaOH} \longrightarrow 2\text{NaAlO}_2 + 3\text{H}_2\text{O} \]
\[ \text{NaAlO}_2 + 2\text{H}_2\text{O} \longrightarrow \text{Al}(\text{OH})_3\downarrow + \text{NaOH} \]
In simple words: लीचिंग एक रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें बारीक पिसे हुए अयस्क को एक उपयुक्त अभिकर्मक के साथ क्रिया कराकर, वांछित धातु को घुलनशील अवस्था में लाया जाता है जबकि अशुद्धियाँ ठोस अवस्था में ही रहती हैं और उन्हें आसानी से अलग किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: लीचिंग की परिभाषा में "रासायनिक परिवर्तन" और "घुलनशील अवस्था" जैसे मुख्य बिन्दुओं पर जोर दें, और बॉक्साइट के लीचिंग का उदाहरण समीकरणों सहित प्रस्तुत करें।

 

Question 23. लोहे के निष्कर्षण के दौरान वात्या भट्टी में चूने का पत्थर क्यों डालते हैं? समझाइए ।


Answer: लोहे के निष्कर्षण के दौरान वात्या भट्टी में मिलाया गया चूना पत्थर (CaCO3) गालक का कार्य करता है। यह धातुमल (SiO2) से संयोग करके धातुमल (CaSiO3) कैल्सियम सिलिकेट बनाता है।
In simple words: लोहे के निष्कर्षण में वात्या भट्टी में चूना पत्थर (कैल्शियम कार्बोनेट) एक गालक के रूप में कार्य करता है। यह अयस्क में मौजूद सिलिका (SiO2) जैसी अम्लीय अशुद्धियों के साथ प्रतिक्रिया करके कैल्शियम सिलिकेट नामक पिघला हुआ धातुमल बनाता है, जिसे आसानी से हटाया जा सकता है, जिससे शुद्ध लोहा प्राप्त होता है।

🎯 Exam Tip: चूना पत्थर की भूमिका को गालक के रूप में स्पष्ट करें और बताएं कि यह अम्लीय अशुद्धियों के साथ प्रतिक्रिया करके धातुमल कैसे बनाता है।

 

Question 24. इस्पात का ऊष्मा उपचार क्यों आवश्यक है ? यह किस प्रकार किया जाता है?


Answer: इस्पात के यान्त्रिक गुण उसके ऊष्मा उपचार पर निर्भर करते हैं। ऊष्मा उपचार द्वारा इस्पात को कठोर या नर्म बनाया जा सकता है।
इस्पात का कठोरीकरण - इस्पात को रक्त-तप्त ताप तक गर्म करके ठण्डे जल द्वारा उसे एकाएक ठण्डा करने की क्रिया इस्पात का कठोरीकरण (hardening of steel) कहलाती है। इस क्रिया से इस्पात बहुत कठोर और भंगुर हो जाता है।
इस्पात का टैम्परीकरण - कठोरीकृत (hardened) इस्पात को किसी उच्च ताप तक (पहले से कम ताप पर) पुनः गर्म करके धीरे-धीरे ठण्डा करने की क्रिया इस्पात का टैम्परीकरण (tempering) कहलाती है। इस क्रिया से इस्पात नर्म (soft) हो जाता है और उसकी भंगुरता (brittleness) मिट जाती है। इस्पात को धीरे-धीरे ठण्डा करने पर ऑस्टीनाइट धीरे-धीरे सीमेन्टाइट और आइरन में अपघटित हो जाता है, जिससे इस्पात नर्म हो जाता है।
In simple words: इस्पात का ऊष्मा उपचार उसके यांत्रिक गुणों जैसे कठोरता या कोमलता को बदलने के लिए किया जाता है। कठोरीकरण में इस्पात को बहुत गर्म करके तेजी से ठंडा किया जाता है ताकि वह कठोर हो जाए, जबकि टैम्परीकरण में कठोर इस्पात को फिर से गर्म करके धीरे-धीरे ठंडा किया जाता है ताकि उसकी भंगुरता कम हो और वह थोड़ा नरम हो जाए।

🎯 Exam Tip: ऊष्मा उपचार की आवश्यकता को बताएं और कठोरीकरण व टैम्परीकरण की प्रक्रियाओं को उनके उद्देश्यों और परिणामी गुणों के साथ स्पष्ट करें।

 

Question 25. ढलवाँ लोहा, पिटवाँ लोहा तथा इस्पात में अन्तर लिखिए।


Answer:
• ढलवाँ लोहा - इसमें लगभग 93 से 94% Fe, 2 से 4% C तथा शेष Si, P तथा Mn की अशुद्धियाँ होती हैं।
• पिटवाँ लोहा - इसमें 98.8% से 99.9% Fe और 0.1 से 0.25% C तथा शेष Si, P और Mn की अशुद्धियाँ होती हैं।
• इस्पात - इसमें 98 से 99.8% Fe और 0.25 से 1.5% C होता है।
In simple words: ढलवाँ लोहा, पिटवाँ लोहा और इस्पात तीनों लोहे के प्रकार हैं, जिनमें मुख्य अंतर कार्बन और अन्य अशुद्धियों की मात्रा में होता है, जो उनके यांत्रिक गुणों को निर्धारित करता है। ढलवाँ लोहे में कार्बन अधिक होता है, पिटवाँ लोहे में सबसे कम होता है और इस्पात में मध्यम मात्रा होती है।

🎯 Exam Tip: ढलवाँ लोहा, पिटवाँ लोहा और इस्पात के बीच अंतर को मुख्य रूप से कार्बन प्रतिशत के आधार पर स्पष्ट करें।

 

Question 26. स्टेनलेस स्टील का संगठन तथा उपयोग लिखिए।


Answer: Fe - 74%, Ni - 8%, Cr (18%) उपयोग- बर्तन, मूर्तियाँ, बॉल बेयरिंग तथा शल्य चिकित्सा के औजार बनाने में।
In simple words: स्टेनलेस स्टील लोहे, निकिल और क्रोमियम का एक मिश्र धातु है, जिसमें क्रोमियम की उपस्थिति इसे जंग-प्रतिरोधी बनाती है, जिससे यह बर्तन, मूर्तियाँ और चिकित्सा उपकरणों जैसे विभिन्न उपयोगों के लिए आदर्श बन जाता है।

🎯 Exam Tip: स्टेनलेस स्टील की संरचना (घटकों का प्रतिशत) और उसके व्यावहारिक उपयोगों को स्पष्ट रूप से बताएं।

 

Question 27. फेरिक क्लोराइड के दो रासायनिक गुण लिखिए।


Answer: 1. जल- अपघटन पर यह HCI उत्पन्न करता है; अतः इसका जलीय विलयन अम्लीय प्रकृति का होता है।
\[ \text{FeCl}_3 + 3\text{H}_2\text{O} \longrightarrow \text{Fe}(\text{OH})_3 + 3\text{HCI} \]
2. पोटैशियम फेरोसायनाइड विलयन के साथ यह नीले रंग का फेरिक फेरोसायनाइड (प्रशियन ब्लू) बनाता है।
In simple words: फेरिक क्लोराइड जल के साथ अभिक्रिया करने पर हाइड्रोक्लोरिक अम्ल उत्पन्न करता है, जिससे इसका विलयन अम्लीय होता है, और यह पोटैशियम फेरोसायनाइड के साथ मिलकर गहरे नीले रंग का पदार्थ (प्रशियन ब्लू) बनाता है।

🎯 Exam Tip: फेरिक क्लोराइड के दो विशिष्ट रासायनिक गुणों को उदाहरणों या उत्पाद विवरण के साथ प्रस्तुत करें।

 

Question 28. कॉपर के किसी एक मिश्र-धातु का संघटन तथा उपयोग लिखिए ।


Answer:
• पीतल - Cu (80%), Zn (20%)
• उपयोग - इसका उपयोग बर्तन बनाने में किया जाता है।
In simple words: कॉपर की एक महत्वपूर्ण मिश्र-धातु पीतल है, जो 80% कॉपर और 20% जिंक से बनी होती है, और इसका मुख्य उपयोग बर्तन बनाने में किया जाता है।

🎯 Exam Tip: कॉपर की मिश्र-धातु का नाम, उसका संघटन (प्रतिशत में) और कम से कम एक उपयोग बताना आवश्यक है।

 

Question 29. जिंक ऑक्साइड के दो उपयोग लिखिए।


Answer: 1. सफेद वर्णक (pigment) के रूप में तथा
2. क्रीम, पाउडर और टूथपेस्ट बनाने में ।
In simple words: जिंक ऑक्साइड का उपयोग सफेद रंग के पिगमेंट के रूप में और कॉस्मेटिक्स जैसे क्रीम, पाउडर और टूथपेस्ट बनाने में किया जाता है।

🎯 Exam Tip: जिंक ऑक्साइड के दो भिन्न-भिन्न उपयोगों को स्पष्ट और संक्षिप्त रूप में लिखें।

 

Question 30. क्रायोलाइट का सूत्र लिखिए। इसका उपयोग किस धातुकर्म में होता है?


Answer: क्रायोलाइट का सूत्र Na3AlF6 है। यह ऐलुमिनियम के धातुकर्म में प्रयुक्त होता है।
In simple words: क्रायोलाइट (Na3AlF6) एल्यूमीनियम के निष्कर्षण में उपयोग किया जाने वाला एक यौगिक है, जो एल्यूमिना के गलनांक को कम करने और उसकी विद्युत चालकता को बढ़ाने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: क्रायोलाइट का सही रासायनिक सूत्र और धातुकर्म में इसके विशिष्ट उपयोग (एल्यूमीनियम निष्कर्षण) का उल्लेख करें।

 

Question 31. फ्लुओरस्पार का सूत्र लिखिए। इसका ऐलुमिनियम के निष्कर्षण में क्या उपयोग है?


Answer: फ्लुओरस्पार का सूत्र CaF2 है। ऐलुमिनियम के निष्कर्षण में इसका उपयोग तरलता बढ़ाने के लिए किया जाता है।
In simple words: फ्लुओरस्पार (CaF2) एल्यूमीनियम के निष्कर्षण की प्रक्रिया में एल्यूमिना मिश्रण की तरलता को बढ़ाने के लिए उपयोग किया जाता है, जिससे विद्युत अपघटन अधिक प्रभावी ढंग से हो सके।

🎯 Exam Tip: फ्लुओरस्पार का सही रासायनिक सूत्र और एल्यूमीनियम निष्कर्षण में इसकी भूमिका (तरलता बढ़ाना) को स्पष्ट करें।

 

Question 32. ऐलुमिना के वैद्युत-अपघटन में क्रायोलाइट का उपयोग समझाइए ।


Answer: क्रायोलाइट ऐलुमिना का गलनांक कम करता है तथा ऐलुमिना के वेद्युत-अपघटन में सहायता करता है क्योंकि शुद्ध ऐलुमिना विद्युत कुचालक है परन्तु क्रायोलाइट की सहायता से यह वैद्युत सुचालक हो जाता है।
In simple words: एल्यूमिना के विद्युत अपघटन में, क्रायोलाइट एल्यूमिना के उच्च गलनांक को कम करता है और मिश्रण को विद्युत का सुचालक बनाता है, जिससे विद्युत अपघटन की प्रक्रिया संभव और अधिक कुशल हो जाती है।

🎯 Exam Tip: क्रायोलाइट की दोहरी भूमिका (गलनांक कम करना और विद्युत चालकता बढ़ाना) को एल्यूमिना के विद्युत अपघटन के संदर्भ में बताएं।

 

Question 33. Al(OH)3 उभयधर्मी है, समझाइए।


Answer: Al(OH)3 उभयधर्मी है क्योंकि यह अम्लों व अपने से प्रबल क्षारों के साथ क्रिया करके लवण व जल बनाता है।
उदाहरणार्थ -
\[ \text{Al}(\text{OH})_3 + 3\text{HCl} \longrightarrow \text{AlCl}_3 + 3\text{H}_2\text{O} \]
ऐलुमिनियम क्लोराइड
तथा
\[ \text{Al}(\text{OH})_3 + \text{NaOH} \longrightarrow \text{NaAlO}_2 + 2\text{H}_2\text{O} \]
सोडियम ऐलुमिनेट
In simple words: एल्यूमीनियम हाइड्रॉक्साइड (Al(OH)3) एक उभयधर्मी यौगिक है, जिसका अर्थ है कि यह अम्ल और क्षार दोनों के साथ अभिक्रिया करके लवण और जल बना सकता है, जिससे यह अपनी प्रकृति में दोहरा व्यवहार दर्शाता है।

🎯 Exam Tip: उभयधर्मी प्रकृति की परिभाषा दें और अम्लीय व क्षारीय दोनों के साथ अभिक्रिया के लिए रासायनिक समीकरणों का उदाहरण दें।

 

Question 34. अमलगम तथा मिश्रधातु में क्या अन्तर है?


Answer: दो या दो से अधिक धातुओं या धातु व अधातु के समांग मिश्रण को धातु संकर या मिश्रधातु कहते हैं। ये प्रायः ठोस होती हैं। यदि मिश्रधातु में एक धातु मर्करी हो तो इसे अमलगम कहते हैं। ये प्रायः द्रव होती हैं।
In simple words: मिश्रधातु दो या अधिक तत्वों (कम से कम एक धातु) का एक समांग मिश्रण होती है और आमतौर पर ठोस होती है, जबकि अमलगम एक विशेष प्रकार की मिश्रधातु है जिसमें एक घटक अनिवार्य रूप से पारा (मर्करी) होता है और यह अक्सर द्रव अवस्था में पाया जाता है।

🎯 Exam Tip: मिश्रधातु और अमलगम की परिभाषाओं के साथ-साथ उनके मुख्य अंतर (मर्करी की उपस्थिति और भौतिक अवस्था) को स्पष्ट करें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. परावर्तनी भट्टी का नामांकित चित्र दीजिए और संक्षेप में इसकी कार्य-विधि का वर्णन कीजिए।


Answer: भर्जन क्रिया परावर्तनी भट्ठी में करायी जाती है। इस भट्ठी में ईंधन अलग स्थान पर जलाया जाता है। तथा गर्म किये जाने वाले अयस्क को सीधे ज्वाला के सम्पर्क में नहीं आने देते हैं। यह केवल गर्म गैसों के सम्पर्क में आकर गर्म होता है। इस प्रक्रम में गर्म किये जाने वाला पदार्थ भट्टी तल (hearth) पर रखा जाता है और ईंधन अग्नि स्थान (fire place) में जलाया जाता है। इसका उपयोग ऑक्सीकरण तथा अपचयन दोनों प्रकार के प्रक्रमों में करते हैं। इस भट्ठी का प्रयोग ताँबा, लेड, टिन आदि धातुओं के धातुकर्म में किया जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक परावर्तनी भट्ठी को दर्शाता है, जिसमें ईंधन एक अलग कक्ष में जलता है और उससे निकलने वाली गर्म गैसें चार्ज (अयस्क) को अप्रत्यक्ष रूप से गर्म करती हैं, जो भट्ठी के तल पर रखा होता है। इस डिज़ाइन से अयस्क सीधे आग की लपटों के संपर्क में नहीं आता है, जिससे ऑक्सीकरण और अपचयन दोनों प्रक्रियाओं को नियंत्रित तरीके से किया जा सकता है।
In simple words: परावर्तनी भट्ठी एक प्रकार की भट्ठी है जिसमें अयस्क को सीधे आग की लपटों के संपर्क में लाए बिना, जलते हुए ईंधन से निकलने वाली गर्म गैसों द्वारा गर्म किया जाता है। यह ऑक्सीकरण और अपचयन जैसी प्रक्रियाओं के लिए उपयोग की जाती है, खासकर ताँबा, लेड और टिन के निष्कर्षण में।

🎯 Exam Tip: परावर्तनी भट्ठी की कार्यप्रणाली का वर्णन करते हुए, यह बताना आवश्यक है कि ईंधन और अयस्क सीधे संपर्क में क्यों नहीं आते और इससे क्या लाभ होता है। चित्र व्याख्या भी शामिल करें।

 

Question 2. मफल भट्टी का सरल नामांकित चित्र बनाइए तथा इसका संक्षिप्त विवरण दीजिए। इसका उपयोग किस धातु के निष्कर्षण में किया जाता है?


Answer: मफल भट्ठी के अन्दर, दो उच्च ताप सह (refractory) ईंटों से बने हुए कोष्ठ होते हैं जिनको मफल (muffle) कहते हैं जैसा कि संलग्न चित्र में दिखाया गया है। सान्द्रित अयस्क को इन मफलों (रिटार्टी) के अन्दर बन्द कर दिया जाता है। दोनों मफलों को विद्युत द्वारा या ईंधन जलाकर चारों तरफ से गर्म किया जाता है। इस प्रकार इस भट्ठी में न तो ईंधन और न ही ज्वाला गर्म होने वाले पदार्थ के सम्पर्क में आ सकते हैं। इस भट्ठी में पदार्थ को अत्यधिक ताप तक गर्म किया जा सकता है। धातु पिघलने पर दोनों बगलों में बने हुए निकास द्वारों के द्वारा बाहर निकल जाती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक मफल भट्ठी को दिखाता है, जिसमें अयस्क को सीधे ईंधन या आग के संपर्क में लाए बिना गर्म किया जाता है। भट्ठी के अंदर एक मफल कक्ष होता है जहां अयस्क रखा जाता है, और यह कक्ष बाहरी ताप स्रोत द्वारा गर्म होता है। अपशिष्ट गैसें ऊपर से निकलती हैं, जबकि धातु को पिघलने के बाद नीचे से निकाला जा सकता है।
जिन धातुओं को गर्म करने पर ईंधन तथा उसके जलने से उत्पन्न गैसों के सम्पर्क में लाना ठीक नहीं होता उन्हीं का निष्कर्षण मफल भट्टी में करते हैं। इसका उपयोग चाँदी, सोना, जिंक व लेड के धातुकर्म में किया जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक मफल भट्ठी की संरचना को दर्शाता है, जिसमें अयस्क (ZnO + C) को एक बंद मफल कक्ष के अंदर रखा जाता है। ईंधन (जैसे वायु) अलग से जलता है और उसकी गर्मी मफल के चारों ओर से कक्ष को गर्म करती है, जिससे अयस्क सीधे आग या गैसों के संपर्क में आए बिना उच्च तापमान पर अभिक्रिया करता है। बेकार गैसें बाहर निकल जाती हैं।
In simple words: मफल भट्ठी एक ऐसी भट्ठी है जहाँ अयस्क को सीधे आग या ईंधन से निकलने वाली गैसों के संपर्क में लाए बिना गर्म किया जाता है। अयस्क को एक बंद कक्ष (मफल) में रखा जाता है जिसे बाहर से गर्म किया जाता है, जिससे शुद्ध धातु प्राप्त करने के लिए नियंत्रित उच्च तापमान पर अभिक्रियाएं होती हैं।

🎯 Exam Tip: मफल भट्ठी की संरचना (मफल कक्ष) और उसके कार्य सिद्धांत (अप्रत्यक्ष तापन) को समझाएं, साथ ही उन धातुओं के उदाहरण भी दें जिनके निष्कर्षण में इसका उपयोग होता है।

 

Question 3. इस्पात के निर्माण में प्रयुक्त होने वाली खुले तल की भट्टी का नामांकित चित्र बनाइए।


Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक सीमेन्स-मार्टिन खुली तल की भट्ठी को दर्शाता है, जिसका उपयोग इस्पात बनाने में किया जाता है। इसमें पिघले हुए ढलवाँ लोहे को एक चौड़े, खुले तल पर रखा जाता है। भट्ठी के किनारों से गर्म गैसें (जली गैसें, प्रोड्यूसर गैसें) और वायु प्रवाहित की जाती हैं, जो धातु को गर्म करती हैं और रासायनिक प्रतिक्रियाओं को संभव बनाती हैं। एक बेसिक पर्त भी दिखाई गई है।
In simple words: सीमेन्स-मार्टिन की खुली तल की भट्ठी इस्पात निर्माण में प्रयुक्त होती है, जहाँ पिघले हुए ढलवाँ लोहे को एक खुले तल पर रखकर गर्म गैसों और वायु के मिश्रण से सीधे संपर्क में लाया जाता है, जिससे अशुद्धियाँ दूर होती हैं और इस्पात बनता है।

🎯 Exam Tip: सीमेन्स-मार्टिन खुली तल की भट्ठी का एक स्पष्ट और नामांकित चित्र बनाना महत्वपूर्ण है, जिसमें मुख्य घटकों को सही ढंग से दर्शाया गया हो।

 

Question 4. बेसेमर परिवर्तक द्वारा ढलवाँ लोहे से इस्पात कैसे प्राप्त किया जाता है? बेसेमर परिवर्तक का चित्र दीजिए और उसमें होने वाली रासायनिक अभिक्रिया का समीकरण भी दीजिए।


Answer: इस विधि में ढलवाँ लोहे को एक बेसेमर परिवर्तक में भरकर उसमें वायु या ऑक्सीजन और भाप का मिश्रण प्रवाहित किया जाता है।
बेसेमर प्रक्रम - यह प्रक्रम बेसेमर परिवर्तक (Bessemer's Converter) में किया जाता है जिसे संलग्न चित्र में दर्शाया गया है।
यह परिवर्तक पिटवाँ लोहे या इस्पात का अण्डाकार आकृति का पात्र होता है जिसमें उच्च ताप सह (refractory) सिलिको यो डोलोमाइट ईंटों का अस्तर लगा होता है। वायु-प्रवाह हेतु इसमें नीचे की ओर छिद्र होते हैं। इस पात्र को एक क्षैतिज अक्ष पर चारों ओर घुमाया जा सकता है। परिवर्तक में वात्या भट्टी से प्राप्त पिघला हुआ ढलवाँ लोहा भरकर नीचे से वायु प्रवाहित की जाती है। जिसके फलस्वरूप सिलिकॉन तथा मैंगनीज के ऑक्साइड प्राप्त होते हैं।
\[ \text{Si} + \text{O}_2 \longrightarrow \text{SiO}_2 \]
\[ 2\text{Mn} + \text{O}_2 \longrightarrow 2\text{MnO} \]
ये ऑक्साइड परस्पर अभिक्रिया करके मैंगनीज सिलिकेट धातुमल बनाते हैं जिसे पृथक् कर दिया जाता है।
\[ \text{MnO} + \text{SiO}_2 \longrightarrow \text{MnSiO}_3\downarrow \text{ (धातुमल)} \]
सल्फर, ऑक्सीकृत होकर SO2 बनाती है, जो ऊपर निकल जाती है। कार्बन, कार्बन मोनोक्साइड में परिणित हो जाती है जो कि परिवर्तक के मुंह पर नीली लौ से जलती है। इस ज्वाला से CO गैस की उपस्थिति का आभास मिलता है। CO गैस जलना बन्द होने का तात्पर्य है कि अभिक्रिया पूर्ण हो गयी है। तत्पश्चात् इसमें स्पीगेल (spiegel) की आवश्यक मात्रा मिलाते हैं (स्पीगेल में लोहे के साथ मैंगनीज तथा कार्बन भी उपस्थित होता है) जिससे लोहे में कार्बन की आवश्यक मात्रा हो जाती है तथा इस्पात प्राप्त होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र बेसेमर परिवर्तक को दिखाता है, जो ढलवाँ लोहे से इस्पात बनाने के लिए उपयोग होता है। यह एक नाशपाती के आकार का भट्ठी है जिसमें सिलिका का अस्तर लगा होता है। पिघले हुए ढलवाँ लोहे को इसमें भरकर नीचे से हवा प्रवाहित की जाती है, जिससे अशुद्धियाँ ऑक्सीकृत होकर धातुमल बनाती हैं और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों के रूप में निकल जाती हैं।
In simple words: बेसेमर परिवर्तक में ढलवाँ लोहे से इस्पात बनाने के लिए, पिघले हुए लोहे में हवा या ऑक्सीजन का झोंका प्रवाहित किया जाता है। इससे सिलिकॉन, मैंगनीज और कार्बन जैसी अशुद्धियाँ ऑक्सीकृत होकर धातुमल और गैसें बनाती हैं, जिन्हें हटा दिया जाता है, जिससे कम कार्बन वाला इस्पात प्राप्त होता है।

🎯 Exam Tip: बेसेमर परिवर्तक के चित्र के साथ, उसकी कार्यप्रणाली और ढलवाँ लोहे में मौजूद अशुद्धियों (Si, Mn, C, S) के ऑक्सीकरण की रासायनिक अभिक्रियाओं को स्पष्ट रूप से दर्शाएं।

 

Question 5. हूप विधि द्वारा ऐलुमिनियम धातु के शोधन का वर्णन कीजिए।


Answer: ऐलुमिना के वैद्युत-अपघटन से प्राप्त ऐलुमिनियम धातु में अनेक अशुद्धियाँ होती हैं, जिनको हूप विधि (Hoopes process) से शुद्ध किया जाता है। यह एक वैद्युत-अपघटनी विधि है। ऐनोड के रूप में कार्य करने वाले कार्बन अस्तर लगे एक लोहे के पात्र में सबसे नीचे ताँबा तथा सिलिकन युक्त अशुद्ध ऐलुमिनियम की मिश्रित धातु लगी होती है, जो चालक को कार्य करती है। इसके ऊपर अशुद्ध ऐलुमिनियम धातु का गलित रखा जाता है। इसके ऊपर Na, Ba तथा Al के फ्लुओराइडों के मिश्रण तथा Al2O3 का गलित रखा जाता है, जो वैद्युत-अपघटय का कार्य करता है। सबसे ऊपर पिघले हुए शुद्ध ऐलुमिनियम की एक पर्त होती है, जो कैथोड का कार्य करती है, जिसमें चालक का कार्य करने हेतु एक ग्रेफाइट की छड़ लगी होती है।
वैद्युत धारा प्रवाहित करने पर अशुद्ध ऐलुमिनियम से शुद्ध ऐलुमिनियम ऊपर की सतह पर आ जाता है और इतनी ही मात्रा में अशुद्ध ऐलुमिनियम को पात्र में लगे कीप से डाल दिया जाता है। इस प्रकार शुद्ध ऐलुमिनियम नीचे की पर्त (ऐनोड) से ऊपर की पर्त (कैथोड) पर आ जाता है और अशुद्धियाँ नीचे बैठ जाती हैं। शुद्ध ऐलुमिनियम को ऊपरी पर्त में बने छिद्र से अलग करके चादरों, छड़ों आदि के रूप में बदल दिया जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र हूप विधि द्वारा एल्यूमीनियम के शोधन को दर्शाता है। इसमें तीन परतें होती हैं: सबसे नीचे अशुद्ध एल्यूमीनियम (एनोड), मध्य में विद्युत अपघट्य मिश्रण, और सबसे ऊपर शुद्ध एल्यूमीनियम (कैथोड)। विद्युत धारा प्रवाहित करने पर अशुद्ध एल्यूमीनियम घुलता है, शुद्ध एल्यूमीनियम ऊपर कैथोड पर जमा होता है, और अशुद्धियाँ नीचे बैठ जाती हैं, जिससे धातु शुद्ध होती है।
In simple words: हूप विधि एल्यूमीनियम को शुद्ध करने की एक विद्युत अपघटनी प्रक्रिया है, जिसमें अशुद्ध एल्यूमीनियम नीचे की परत पर एनोड के रूप में होता है, एक विद्युत अपघट्य मध्य में और शुद्ध एल्यूमीनियम ऊपर कैथोड के रूप में होता है। विद्युत धारा प्रवाहित होने पर, एल्यूमीनियम एनोड से कैथोड की ओर जाता है, जिससे शुद्ध धातु प्राप्त होती है और अशुद्धियाँ नीचे बैठ जाती हैं।

🎯 Exam Tip: हूप विधि की तीन-परत संरचना (एनोड, विद्युत अपघट्य, कैथोड), प्रत्येक परत की संरचना और विद्युत धारा के प्रभाव को स्पष्ट रूप से समझाएं, साथ ही एक चित्र व्याख्या भी दें।

 

Question 6. सिलिका युक्त बॉक्साइट का शोधन किस प्रकार किया जाता है ? रासायनिक समीकरण भी दीजिए।


Answer: जब बॉक्साइट में SiO2 की अशुद्धि अधिकता में होती है, तब सपेंक की विधि का प्रयोग किया जाता है। इस विधि में बॉक्साइट में कार्बन का चूर्ण मिलाकर मिश्रण को 1800°C तक गर्म करके इसमें नाइट्रोजन प्रवाहित की जाती है जिससे ऐलुमिनियम नाइट्राइड (AIN) बनता है तथा सिलिका अपचयित होकर वाष्पशील सिलिकॉन में परिवर्तित हो जाती है।
\[ \text{Al}_2\text{O}_3\cdot 2\text{H}_2\text{O} + 3\text{C} + \text{N}_2 \underrightarrow { 1800^\circ\text{C} } 2\text{AlN} + 3\text{CO}\uparrow + 2\text{H}_2\text{O} \]
ऐलुमिनियम नाइट्राइड
\[ \text{SiO}_2 + 2\text{C} \longrightarrow \text{Si} + 2\text{CO}\uparrow \]
वाष्पशील
इस प्रकार प्राप्त ऐलुमिनियम नाइट्राइड को पानी के साथ गर्म करने पर इसका जल-अपघटन हो जाता है। जिससे ऐलुमिनियम हाइड्रॉक्साइड का अवक्षेप प्राप्त होता है। इस अवक्षेप को जल से धोकर सुखाकर तेज गर्म करने पर निर्जल ऐलुमिना प्राप्त होता है।
\[ \text{AlN} + 3\text{H}_2\text{O} \longrightarrow \text{Al}(\text{OH})_3\downarrow + \text{NH}_3 \]
अवक्षेप
\[ 2\text{Al}(\text{OH})_3 \underrightarrow { तेज\,गर्म } \text{Al}_2\text{O}_3 + 3\text{H}_2\text{O} \]
In simple words: सपेंक विधि में, सिलिका युक्त बॉक्साइट को कार्बन और नाइट्रोजन के साथ उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है, जिससे एल्यूमीनियम नाइट्राइड बनता है और सिलिका वाष्पशील सिलिकॉन में परिवर्तित हो जाती है। फिर एल्यूमीनियम नाइट्राइड का जल-अपघटन करके एल्यूमीनियम हाइड्रॉक्साइड प्राप्त होता है, जिसे गर्म करने पर शुद्ध एल्यूमिना मिलती है।

🎯 Exam Tip: सपेंक विधि के सभी चरणों (नाइट्रोजन प्रवाह, सिलिका अपचयन, जल-अपघटन और तापन) को रासायनिक समीकरणों के साथ क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करें।

 

Question 7. जब बॉक्साइट अयस्क में फेरिक ऑक्साइड की अशुद्धि अधिक होती है तथा जब सिलिका की अशुद्धि अधिक होती है तो बॉक्साइट से ऐलुमिना प्राप्त करने की विधि का मान तथा रासायनिक समीकरण लिखिए।


Answer: बॉक्साइट अयस्क में फेरिक ऑक्साइड भी अशुद्धि अधिक होने पर इससे एलुमिना प्राप्त करने के लिए बेयर विधि का प्रयोग किया जाता है।
\[ \text{Al}_2\text{O}_3\cdot 2\text{H}_2\text{O} + 2\text{NaOH} \underrightarrow { \text{150° C} \atop \text{80 atm} } 2\text{NaAlO}_2 + 3\text{H}_2\text{O} \]
सोडियम मेटाऐलुमिनेट (विलेय)
\[ \text{NaAlO}_2 + 2\text{H}_2\text{O} \longrightarrow \text{Al}(\text{OH})_3\downarrow + \text{NaOH} \]
ऐलुमिनियम हाइड्रॉक्साइड
\[ 2\text{Al}(\text{OH})_3 \underrightarrow { \triangle } \text{Al}_2\text{O}_3 + 3\text{H}_2\text{O} \]
ऐलुमिना
बॉक्साइट अयस्क में सिलिका की अशुद्धि अधिक होने पर इससे ऐलुमिना प्राप्त करने के लिए सपेंक विधि का प्रयोग किया
\[ \text{Al}_2\text{O}_3\cdot 2\text{H}_2\text{O} + 3\text{C} + \text{N}_2 \underrightarrow { 1800^\circ\text{C} } 2\text{AlN} + 3\text{CO}\uparrow + 2\text{H}_2\text{O} \]
ऐलुमिनियम नाइट्राइड
\[ \text{SiO}_2 + 2\text{C} \longrightarrow \text{Si} + 2\text{CO}\uparrow \]
वाष्पशील
\[ \text{AlN} + 3\text{H}_2\text{O} \longrightarrow \text{Al}(\text{OH})_3\downarrow + \text{NH}_3 \]
अवक्षेप
\[ 2\text{Al}(\text{OH})_3 \longrightarrow \text{Al}_2\text{O}_3 + 3\text{H}_2\text{O} \]
ऐलुमिना
In simple words: जब बॉक्साइट अयस्क में फेरिक ऑक्साइड और सिलिका दोनों की अशुद्धियां अधिक होती हैं, तो बेयर विधि का उपयोग फेरिक ऑक्साइड को हटाने के लिए किया जाता है, जहाँ बॉक्साइट NaOH में घुलता है और अशुद्धियां अवक्षेपित हो जाती हैं। यदि सिलिका की अशुद्धि अधिक है तो सपेंक विधि का उपयोग किया जाता है, जहाँ बॉक्साइट को कार्बन और नाइट्रोजन के साथ गर्म करके एल्यूमीनियम नाइट्राइड बनाया जाता है, जिसे बाद में शुद्ध एल्यूमिना में परिवर्तित किया जाता है।

🎯 Exam Tip: बेयर और सपेंक विधियों के बीच का अंतर स्पष्ट करें, विशेषकर यह बताते हुए कि किस विधि का उपयोग किस प्रकार की अशुद्धि (फेरिक ऑक्साइड या सिलिका) की अधिकता के लिए किया जाता है। प्रत्येक विधि के लिए संबंधित रासायनिक समीकरणों को शामिल करें।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. ढलवाँ लोहे का उसके अयस्क से निष्कर्षण की विधि का वर्णन कीजिए। इस निष्कर्षण में प्रयुक्त होने वाली भट्टी के प्रमुख क्षेत्रों में होने वाली अभिक्रियाओं को लिखिए।


Answer: ढलवाँ लोहे का निष्कर्षण वात्या भट्टी द्वारा किया जाता है। यह निष्कर्षण हेमेटाइट अयस्क से निम्नलिखित पदों में किया जाता है -
1. धावन - लोहे के अयस्कों में 20 - 55% के बीच लोहा होता है इसीलिए इसका सान्द्रण करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। हल्की अशुद्धियाँ; जैसे- रेत, मिट्टी आदि घनत्व पृथक्करण विधि द्वारा पृथक् कर ली जाती हैं। अयस्क के महीन चूर्ण पर जल की धारा प्रवाहित करने से अशुद्धियाँ जल के साथ बह जाती हैं तथा लोहे का भारी अयस्क नीचे बैठ जाता है।
2. चुम्बकीय सान्द्रण - इस विधि में मैग्नेटाइट अयस्क का सान्द्रण चुम्बकीय विधि द्वारा किया जाता है।
3. प्रारम्भिक भर्जन अथवा निस्तापन - अयस्क को बारीक टुकड़ों में करके, उसमें कोयला मिलाया जाता है, फिर इस मिश्रण को कम गहरी भट्टियों में तथा वायु की अधिकता में गर्म किया जाता है। इस प्रकार निस्तापने करने से निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं -
1. नमी भाप बनकर निकल जाती है
2. अयस्क में उपस्थित कार्बनिक पदार्थ CO2 के रूप में निकल जाते हैं।
3. गन्धक तथा आर्सेनिक क्रमशः SO2 व As2O3 के रूप में निकल जाते हैं।
4. कार्बोनेट अयस्क अपघटित होकर फेरस ऑक्साइड बनाता है, जो फेरिक ऑक्साइड में ऑक्सीकृत हो जाता है, जिससे गलनीय फेरस सिलिकेट (FeSiO3) नहीं बनता है।
\[ \text{FeCO}_3 \longrightarrow \text{FeO} + \text{CO}_2\uparrow \]
\[ 4\text{FeO} + \text{O}_2 \longrightarrow 2\text{Fe}_2\text{O}_3 \]
5. अयस्क सरन्ध्र (porous) हो जाता है जिससे इसका अपचयन सरलतापूर्वक हो जाता है।
4. प्रगलन - निस्तापित अयस्क में कोक तथा चूने का पत्थर मिलाकर उसे कप तथा कोन व्यवस्था की सहायता से धीरे-धीरे एक बड़ी वात्या भट्ठी में प्रगलित किया जाता है। नीचे से शुष्क तथा गर्म वायु ईंधन को गर्म करने के लिए प्रवाहित की जाती है। भट्ठी से निकलने वाली गर्म गैसों को एक धूल कक्ष तथा काउपर स्टोव में से प्रवाहित किया जाता है। इस व्यवस्था से काफी ईंधन बच जाता है। जैसे-जैसे चार्ज नीचे खिसकता है, वह अधिक ताप के कटिबन्धों (zones) में से गुजरता है। नीचे पहुँचकर लोहा पिघल जाता है। इसके ऊपर धातुमल की परत तैरने लगती है। धातुमल को ऊपर के छेद से तथा पिघली धातु को नीचे के छेद से निकाल लेते हैं। पिघली धातु को साँचों में ढाल लेते हैं। इस प्रकार ढलवाँ लोहा प्राप्त होता है।
वात्या भट्ठी में होने वाली अभिक्रियाएँ - विभिन्न कटिबन्धों में निम्नलिखित अभिक्रियाएँ होती हैं -
(i) प्रारम्भिक ताप का कटिबन्ध - यह भट्टी का सबसे ऊपर का क्षेत्र है। यहाँ ताप 250°C रहता है। यहाँ चार्ज की सारी नमी दूर हो जाती है।
(ii) अपचयन का ऊपरी कटिबन्ध - यहाँ ताप लगभग 300°C - 900°C रहता है। यहाँ नीचे से आने वाली गर्म वायु, कोक से क्रिया करके CO बनाती है।
\[ 2\text{C} + \text{O}_2 \longrightarrow 2\text{CO}\uparrow \]
यह गैस नीचे से ऊपर उठती है और लोहे के ऑक्साइडों को स्पंजी लोहे में अपचयित कर देती है।
\[ 1.\ 3\text{Fe}_2\text{O}_3 + \text{CO} \underrightarrow { 300^\circ\text{C} } 2\text{Fe}_3\text{O}_4 + \text{CO}_2\uparrow \]
\[ 2.\ \text{Fe}_3\text{O}_4 + \text{CO} \underrightarrow { 500^\circ\text{C} } 3\text{FeO} + \text{CO}_2\uparrow \]
\[ 3.\ \text{FeO} + \text{CO} \underrightarrow { 700^\circ\text{C} } \text{Fe} + \text{CO}_2\uparrow \]
700°C पर चूने का पत्थर भी अपघटित हो जाता है।
\[ 1.\ \text{CaCO}_3 \rightleftharpoons \text{CaO} + \text{CO}_2\uparrow \]
\[ 2.\ \text{CaCO}_3 + \text{C} \longrightarrow \text{CaO} + 2\text{CÓ}\uparrow \]
अतः ऊपर उठने वाली गैसे CO तथा CO2 का मिश्रण होती हैं।
(iii) अपचयन का निचला कटिबन्ध - यहाँ ताप 900°C - 1200°C रहता है। इस कटिबन्ध में स्पंजी लोहे की उपस्थिति में CO की नियोजन क्रिया (\( 2\text{CO} \longrightarrow \text{CO}_2 + \text{C} \)) उत्प्रेरित होकर कार्बन देती है। यह कार्बन निचले कटिबन्ध के लोहे से संयोग करता है। कार्बन के साथ Mn, P, S, Si आदि अशुद्धियाँ भी लोहे से संयोग कर लेती हैं। इस कारण लोहा 1200°C पर ही पिघल जाता है, जबकि इसका गलनांक 1580°C है।
(iv) गलन कटिबन्ध - यहाँ ताप 1200°C - 1500°C रहता है। इसमें स्पंजी लोहा पूर्णतया पिघल । जाता है। इसमें C, Mn, P, Si आदि अशुद्धियाँ घुल जाती हैं तथा चूना, सिलिका व ऐलुमिना के साथ धातुमल बनाती हैं जो पिघले लोहे पर तैरने लगता है।
\[ \text{CaO} + \text{SiO}_2 \longrightarrow \text{CaSiO}_3 \]
कैल्सियम सिलिकेट
\[ \text{CaO} + \text{Al}_2\text{O}_3 \longrightarrow \text{Ca}(\text{AlO}_2)_2 \]
कैल्सियम मेटाऐलुमिनेट
धातुमल के कारण लोहा वायु की ऑक्सीजन के सम्पर्क में आकर ऑक्सीकृत नहीं होने पाता।
In simple words: ढलवाँ लोहे का निष्कर्षण वात्या भट्टी में हेमेटाइट अयस्क के विभिन्न चरणों, जैसे धावन, चुम्बकीय सान्द्रण, भर्जन-निस्तापन और प्रगलन, के माध्यम से होता है। प्रगलन के दौरान, कोक अपचायक के रूप में और चूना पत्थर गालक के रूप में कार्य करता है, जिससे अयस्क के ऑक्साइड अपचयित होते हैं और अशुद्धियाँ धातुमल के रूप में अलग हो जाती हैं, अंततः पिघला हुआ ढलवाँ लोहा प्राप्त होता है।

🎯 Exam Tip: ढलवाँ लोहे के निष्कर्षण की पूरी प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से समझाएं, जिसमें वात्या भट्टी के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाली मुख्य रासायनिक अभिक्रियाओं और उनके तापमान सीमाओं का उल्लेख करें।

 

Question 2. सल्फाइड अयस्क से धातु (कॉपर) निष्कर्षण की विधि का वर्णन कीजिए। सम्बन्धित रासायनिक समीकरण भी दीजिए। प्राप्त धातु को किस प्रकार शुद्ध करेंगे?


Answer: कॉपर को मुख्य अयस्क कॉपर पायराइट (CuFeS2) है जो कि सल्फाइड अयस्क है। कॉपर पायराइट से ताँबा निष्कर्षित करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रम करने होते हैं -
1. सान्द्रण - अयस्क को बारीक पीसकर चूर्ण बना लिया जाता है तत्पश्चात् फेन प्लवन विधि (Froth Floatation Process) द्वारा सान्द्रण कर लेते हैं।
2. भर्जन - सान्द्रित अयस्क को हवा की अधिकता और न्यून ताप पर गर्म किया जाता है जिसे भर्जन कहा जाता है। यह क्रिया परावर्तनी भट्ठी (Reverberatory furnace) में होती है। इस भट्ठी में गैस की ज्वालाएँ अयस्क पर प्रतिबिम्बित होती हैं। भट्ठी में हवा के लिए विशेष छेद बने होते हैं। भर्जन क्रिया में अयस्क में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं -
1. अयस्क में उपस्थित मुक्त सल्फर SO2 में ऑक्सीकृत होकर बाहर निकल जाता है।
\[ \text{S} + \text{O}_2 \longrightarrow \text{SO}_2 \]
2. आर्सेनियस की अशुद्धि वाष्पशील (volatile) आर्सेनियस ऑक्साइड के रूप में बाहर निकल जाती है।
\[ 4\text{As} + 3\text{O}_2 \longrightarrow 2\text{As}_2\text{O}_3\uparrow \]
3. कॉपर पायराइट, क्यूप्प्रस सल्फाइड और फेरस सल्फाइड में बदल जाता है।
\[ 2\text{CuFeS}_2 + \text{O}_2 \longrightarrow \text{Cu}_2\text{S} + 2\text{Fes} + \text{SO}_2\uparrow \]
4. अधिकांश फेरस सल्फाइड, फेरस ऑक्साइड में बदल जाता है।
\[ 2\text{Fes} + 3\text{O}_2 \longrightarrow 2\text{FeO} + 2\text{SO}_2\uparrow \]
5. क्यूप्रस सल्फाइड आंशिक रूप से क्यूप्रस ऑक्साइड में बदल जाती है।
\[ 2\text{Cu}_2\text{S} + 3\text{O}_2 \longrightarrow 2\text{Cu}_2\text{O} + 2\text{SO}_2\uparrow \]
भर्जन के बाद कॉपर व आयरन के ऑक्साइड और सल्फाइड का मिश्रण प्राप्त होता है, जिसे भर्जित अयस्क कहते हैं।
3. प्रगलन - भर्जित अयस्क में सिलिका और कोक मिलाकर मिश्रण को वाया भट्ठी में प्रगलित किया जाता है। यह भट्टी स्टील की प्लेटों की बनी होती है जिसके अन्दर अग्निसह ईंटों का अस्तर तथा बाहर वॉटर जैकेट लगा होता है। भट्टी के निचले भाग में ट्वीयर (tuyers) लगे होते हैं जिनसे गर्म वायु का झोंका भट्ठी में भेजा जाता है। गलित पदार्थ भट्ठी के तल में एकत्रित होते हैं तथा अवशिष्ट गैसें भट्टी के ऊपरी भाग से बाहर निकलती हैं। प्रगलन में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं -
1. क्यूप्रस ऑक्साइड फेरस सल्फाइड से क्रिया करके क्यूप्रस सल्फाईड में बदल जाता है।
\[ \text{Cu}_2\text{O} + \text{FeS} \longrightarrow \text{Cu}_2\text{S} + \text{FeO} \]
2. फेरस सल्फाइड की काफी मात्रा फेरस ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाती है।
\[ 2\text{Fes} + 3\text{O}_2 \longrightarrow 2\text{FeO} + 2\text{SO}_2\uparrow \]
3. फेरस ऑक्साइड सिलिका (SiO2) से संयोग करके गलित फेरस सिलिकेट बनाता है जिसे धातुमल (slag) कहते हैं। सिलिको गालक का कार्य करता है।
\[ \text{FeO} + \text{SiO}_2 \longrightarrow \text{FeSiO}_3\downarrow \]
क्यूप्रस सल्फाइड और फेरस सल्फाइड का गलित मिश्रण जिसे मैट (matte) कहते हैं, भट्ठी के पेंदे में एकत्रित हो जाता है और मैट के ऊपर गलित धातुमल की परत जमा हो जाती है। मैट को निकास द्वार से बाहर निकाल दिया जाता है। इसमें लगभग 50% ताँबा होता है।
4. बेसेमरीकरण - गलित मैट में थोड़ी सिलिका मिलाकर एक बेसेमर परिवर्तक में भर देते हैं और उसमें गर्म वायु का झोंका प्रवाहित किया जाता है। बेसेमर परिवर्तक में नाशपाती की आकृति का स्टील का पात्र होता है जिसके भीतर अग्निसह ईंटों तथा लाइम का अस्तर लगा रहता है। इसकी बगल में, काफी ऊँचाई पर ट्वीयर लगा होता है जिसके द्वारा गर्म वायु का झोंका परिवर्तक में भेजा जाता है। गलित मैट और सिलिका के मिश्रण में गर्म वायु का झोंका प्रवाहित करने पर निम्नलिखित अभिक्रियाएँ होती हैं -
1. मैट में उपस्थित फेरस सल्फाइड फेरस ऑक्साइड में बदल जाता है।
\[ 2\text{FeS} + 3\text{O}_2 \longrightarrow 2\text{FeO} + 2\text{SO}_2\uparrow \]
2. फेरस ऑक्साइड सिलिका से संयोग करके गलित फेरस सिलिकेट (धातुमल) बनाता है।
\[ \text{FeO} + \text{SiO}_2 \longrightarrow \text{FeSiO}_3\downarrow \]
3. क्यूप्रस सल्फाइड का कुछ भाग क्यूप्प्रस ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है जो बचे हुए क्यूप्रस सल्फाइड से क्रिया करके कॉपर बनाता है।
\[ 2\text{Cu}_2\text{S} + 3\text{O}_2 \longrightarrow 2\text{Cu}_2\text{O} + 2\text{SO}_2\uparrow \]
\[ \text{Cu}_2\text{S} + 2\text{Cu}_2\text{O} \longrightarrow 6\text{Cu} + \text{SO}_2\uparrow \]
गलित कॉपर के ऊपर से धातुमल की परत को हटाने के उपरान्त परिवर्तक को उलटकर गलित कॉपर को बाहर निकाल लेते हैं। इसे ठण्डा करने पर SO2 बुलबुलों के रूप में बाहर निकलती है। जिससे कॉपर की सतह पर फफोले पड़ जाते हैं। इस कॉपर को फफोलेदार कॉपर (blister copper) कहते हैं। इसमें लगभग 98% कॉपर तथा 2% अशुद्धियाँ (सल्फर, आर्सेनिक, आयरन, सिल्वर, गोल्ड आदि) होती हैं। इनको शोधन द्वारा पृथक् कर लेते हैं।
5. शोधन - अशुद्ध कॉपर को मुख्यतः वैद्युत-अपघटनी विधि द्वारा शुद्ध किया जा सकता है। इस प्रक्रम में एक टैंक में अशुद्ध ताँबे के पट लटका दिये जाते हैं। ये ऐनोड का कार्य करते हैं। शुद्ध ताँबे की पतली पत्तियाँ कैथोड का काम करती हैं। कॉपर सल्फेट का अम्लीय विलयन वैद्युत-अपघटय के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। वैद्युत धारा प्रवाहित करने पर कैथोड पर शुद्ध ताँबा जमा होता है तथा अशुद्धियाँ (लोहा, निकिल और जिंक) विलयन में रह जाती हैं। सोना या चाँदी अवक्षेप के रूप में ऐनोड के नीचे जमा हो जाते हैं, इनको ऐनोड पंक (Anode mud) कहा जाता है। इस प्रकार कैथोड पर शुद्ध (99.98%) ताँबा प्राप्त होता है।
In simple words: कॉपर पायराइट से कॉपर निकालने की प्रक्रिया में सान्द्रण, भर्जन, प्रगलन और बेसेमरीकरण शामिल हैं, जहाँ अयस्क को पहले सांद्रित किया जाता है, फिर ऑक्सीकृत किया जाता है, और अंत में विभिन्न अशुद्धियों को हटाने के लिए गलाया और बेसेमरीकृत किया जाता है। प्राप्त अशुद्ध कॉपर को वैद्युत-अपघटनी विधि द्वारा शुद्ध किया जाता है, जहाँ शुद्ध कॉपर कैथोड पर जमा होता है और अशुद्धियाँ एनोड पंक के रूप में अलग हो जाती हैं।

🎯 Exam Tip: कॉपर के निष्कर्षण की पूरी प्रक्रिया (सान्द्रण से शोधन तक) को विस्तृत रूप से समझाएं, जिसमें प्रत्येक चरण में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं और विशिष्ट उपकरण (जैसे परावर्तनी भट्ठी, बेसेमर परिवर्तक) का उल्लेख करें।

 

Question 3. ऐलुमिनियम के दो मुख्य अयस्कों के नाम तथा सूत्र लिखिए। बॉक्साइट के शुद्धिकरण की किसी एक विधि को संक्षेप में वर्णन कीजिए। ऐलुमिना से धातु कैसे प्राप्त की जाती है?


Answer: ऐलुमिनियम के दो मुख्य अयस्क-
1. बॉक्साइट \[ \text{Al}_2\text{O}_5\cdot 2\text{H}_2\text{O} \]
2. क्रायोलाइट \[ \text{Na}_3\text{AlF}_6 \]
बॉक्साइट के शुद्धिकरण को बेयर प्रक्रम - जब बॉक्साइट में Fe,O5 की अधिक मात्रा होती है तो यह प्रक्रम प्रयुक्त होता है। इस प्रक्रम में बारीक पिसे बॉक्साइट को कॉस्टिक सोडा विलयन के साथ ऑटोक्लेव में 150°C तथा 80 वायुमण्डलीय दाब पर गर्म करते हैं। इस प्रकार Al2O3, सोडियम मेटाऐलुमिनेट में परिवर्तित हो जाता है, जो जल में घुलनशील है। अविलेय अशुद्धियों को विलयन से छानकर पृथक् कर लेते हैं। निस्यन्द में थोड़ा-सा नव-अवक्षेपित Al(OH)3 डालकर जल के साथ उबालते हैं। इससे सोडियम मेटाऐलुमिनेट जल-अपघटित होकर Al(OH)3 का अवक्षेप देता है। इस अवक्षेप को छानकर, धोकर सुखा, लेते हैं। इस सूखे अवक्षेप को गर्म करने से शुद्ध ऐलुमिना प्राप्त हो जाता है।
\[ \text{Al}_2\text{O}_3\cdot 2\text{H}_2\text{O} + 2\text{NaOH} \underrightarrow { \text{150°C} \atop \text{80 atm} } 2\text{NaAlO}_2 + 3\text{H}_2\text{O} \]
सोडियम मेटाऐलुमिनेट (विलेय)
\[ \text{NaAlO}_2 + 2\text{H}_2\text{O} \longrightarrow \text{Al}(\text{OH})_3\downarrow +\text{NaOH} \]
ऐलुमिनियम हाइड्रॉक्साइड
\[ 2\text{Al}(\text{OH})_3 \underrightarrow { गर्म\,करने\,पर } \text{Al}_2\text{O}_3+3\text{H}_2\text{O} \]
ऐलुमिना
ऐलुमिना से धातु का निष्कर्षण - शुद्ध ऐलुमिना के वैद्युत अपघटने, जिसे इलेक्ट्रो अपचयन विधि भी कहते हैं, से ऐलुमिनियम धातु प्राप्त की जाती है। शुद्ध ऐलुमिना (Al2O3) का गलनांक 2050° C होता है। इसमें Na3AlF6 तथा CaF2 मिलाकर गर्म करने पर यह 875°C से 900°C के मध्य ही पिघल जाता है। Al2O3, Na3AlF6 तथा CaF2 के मिश्रण के गलित को कार्बन अस्तर लगे एक लोहे के पात्र में डालकर उसमें ग्रेफाइट की छड़े लटकायी जाती हैं। कार्बन अस्तर कैथोड तथा ग्रेफाइट छड़ ऐनोड का कार्य करती है। वैद्युत चक्र में समानान्तर क्रम में एक बल्ब लगाकर वैद्युत धारा प्रवाहित की जाती है जिससे ऐनोड पर ऑक्सीजन मुक्त होती है, जो ग्रेफाइट से क्रिया करके CO2 गैस के रूप में निकल जाती है। कैथोड (कार्बन अस्तर) पर ऐलुमिनियम धातु मुक्त होती है जिसे समय-समय पर एक छिद्र से बाहर निकाल लिया जाता है। ग्रेफाइट के ऐनोड के ऑक्सीकरण के कारण ग्रेफाइट समाप्त होती जाती है जिससे कुछ समय बाद नया ऐनोड लगाना पड़ता है। वैद्युत-अपघटन की क्रिया का रासायनिक समीकरण इस प्रकार है -
पहले क्रायोलाइट आयनित होता है।
\[ \text{Na}_3\text{AlF}_6 \rightleftharpoons 3\text{ Na}^+ + \text{Al}^{3+} + 6\text{F}^- \]
\[ \text{Al}^{3+} + 3\text{e}^- \longrightarrow \text{Al} \text{ (कैथोड पर) (अपचयन)} \]
\[ 2\text{F} – – 2\text{e}^- \longrightarrow \text{F}_2 \text{ (ऐनोड पर) (ऑक्सीकरण)} \]
फ्लोरीन ऐलुमिना से क्रिया करके ऐनोड पर O2 मुक्त करती है।
\[ 2\text{Al}_2\text{O}_3 + 6\text{F}_2 \longrightarrow 4\text{AlF}_3 + 3\text{O}_2\uparrow \]
\[ 2\text{C} + \text{O}_2 \longrightarrow 2\text{CO} \]
\[ \text{C} + \text{O}_2 \longrightarrow \text{CO}_2 \]
क्रायोलाइट की उपस्थिति में गलित ऐलुमिना के वैद्युत-अपघटन से लगभग 99.8% शुद्ध ऐलुमिनियम प्राप्त होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एल्यूमिना से एल्यूमीनियम धातु के निष्कर्षण की हॉल-हेरॉल्ट प्रक्रिया को दर्शाता है। एक कार्बन-अस्तर वाले लोहे के पात्र (कैथोड) में पिघले हुए एल्यूमिना, क्रायोलाइट और फ्लुओरस्पार का मिश्रण होता है, जिसमें ग्रेफाइट की छड़ें (एनोड) डूबी होती हैं। विद्युत धारा प्रवाहित करने पर, एल्यूमीनियम कैथोड पर जमा होता है और ऑक्सीजन एनोड पर मुक्त होती है, जो कार्बन से क्रिया करके CO/CO2 बनाती है।
In simple words: एल्यूमीनियम के मुख्य अयस्क बॉक्साइट और क्रायोलाइट हैं। बॉक्साइट को बेयर विधि द्वारा शुद्ध करके एल्यूमिना प्राप्त किया जाता है, जिसमें बॉक्साइट को NaOH में घोलकर अशुद्धियों को अलग किया जाता है। फिर शुद्ध एल्यूमिना को क्रायोलाइट और फ्लुओरस्पार के साथ मिलाकर हॉल-हेरॉल्ट प्रक्रिया द्वारा विद्युत अपघटन से शुद्ध एल्यूमीनियम धातु प्राप्त की जाती है।

🎯 Exam Tip: एल्यूमीनियम के मुख्य अयस्कों, बॉक्साइट के शुद्धिकरण (बेयर विधि) और एल्यूमिना से धातु निष्कर्षण (हॉल-हेरॉल्ट प्रक्रिया) का विस्तृत वर्णन रासायनिक समीकरणों और प्रक्रिया के चरणों के साथ करें।

 

Question 4. सिल्वर (Ag) के निष्कर्षण की किसी एक विधि का वर्णन कीजिए। या सायनाइड प्रक्रम द्वारा चाँदी प्राप्त करने की विधि तथा आवश्यक रासायनिक समीकरण लिखिए।


Answer: सिल्वर धातु अत्यधिक क्रियाशील न होने के कारण प्रकृति में मुक्त तथा संयुक्त दोनों अवस्थाओं में पाई जाती है। इसके निष्कर्षण की विधि निम्नवत् है -
1. सान्द्रण - इसके सल्फाइड अयस्क को बाल मिल (Ball mill) में महीन पीसकर इसका झाग प्लवन विधि से सान्द्रण किया जाता है। एक टैंक में जल भरकर उसमें थोड़ा-सा चीड़ का तेल और थोड़ा-सा पोटैशियम एथिलजैन्थेट मिलाकर उसमें महीन पिसा हुआ सल्फाइड अयस्क डालकर वायु की तेज धारा द्वारा विलोडित करते हैं। सल्फाइड अयस्क झाग के रूप में द्रव के सतह के ऊपर तैरने लगता है और भारी अशुद्धियाँ टैंक की पेंदी में बैठ जाती हैं। फेन को अलग करके सुखाकर पीस लिया जाता है।
2. सायनाइड से अभिक्रिया - पिसे हुए सान्द्रित सल्फाइड अयस्क को एक छिद्रयुक्त पेंदी के टैंक में भर देते हैं। इस टैंक के भीतर किरमिच का अस्तर लगा होता है। अब अयस्क में 0.4 से 0.6% सोडियम सायनाइड का घोल मिलाकर हवा की तेज धारा प्रवाहित करते हैं और इस मिश्रण को तीव्रता से हिलाया जाता है। ऐसा करने से सल्फाइड अयस्क में उपस्थित सिल्वर, सायनाइड से क्रिया करके विलेयशील सोडियम डाइसायनोअर्जेन्टेट (I) संकर लवण बनाता है।
\[ \text{Ag}_2\text{S} + 4\text{NaCN} \rightleftharpoons 2\text{Na}[\text{Ag}(\text{CN})_2]+\text{Na}_2\text{S} \]
सोडियम सल्फाइड वायु के द्वारा सोडियम सल्फेट में ऑक्सीकृत हो जाता है।
\[ 4\text{Na}_2\text{S} + 5\text{O}_2 + 2\text{H}_2\text{O} \longrightarrow 2\text{Na}_2\text{SO}_4 + 4\text{NaOH} + 2\text{S} \]
सोडियम डाइसायनोअर्जेन्टेट (I) विलयन टैंक की पेंदी से टपकता रहता है जिसको एकत्रित करके फिर टैंक में डाल दिया जाता है। इस क्रिया को तीन-चार बार दोहराया जाता है जिससे सोडियम डाइसायनोअर्जेन्टेट (1) का सान्द्र विलयन प्राप्त हो जाता है।
3. सिल्वर का अवक्षेपण - सान्द्र डाइसायनोअर्जेन्टेट (I) विलयन को अवक्षेपण कक्षों में से प्रवाहित करते हैं। इन कक्षों में जिंक धातु की छीलन रखी होती है जो डाइसायनोअर्जेन्टेट (I) विलयन से सिल्वर को प्रतिस्थापित करके सिल्वर का काला अवक्षेप देता है और इस प्रकार से प्राप्त विलयन को छानकर सिल्वर का काला अवक्षेप पृथक् कर लेते हैं।
\[ 2\text{Na}[\text{Ag}(\text{CN})_2] + \text{Zn} \longrightarrow \text{Na}_2[\text{Zn}(\text{CN})_4] + 2\text{Ag}\downarrow \]
सिल्वर को ऐलुमिनियम पाउडर द्वारा भी अवक्षेपित कराया जाता है। ऐलुमिनियम का उपयोग करने से सीधा ही सोडियम सायनाइड प्राप्त हो जाता है।
\[ \text{Al} + 3\text{Na}[\text{Ag}(\text{CN})_2] + 4\text{NaOH} \longrightarrow 3\text{Ag}\downarrow + 6\text{NaCN} + \text{NaAlO}_2 + 2\text{H}_2\text{O} \]
जिंक द्वारा अवक्षेपण करने में जो जिंक सायनाइड संकर बनता है वह बचे हुए सल्फाइड अयस्क को भी डाइसायनोअर्जेन्टेट (I) में परिवर्तित कर सकता है और इस प्रकार सायनाइड की हानि नहीं होती ।
\[ \text{Ag}_2\text{S}+ \text{Na}_2[\text{Zn}(\text{CN})_4] \longrightarrow 2\text{Na}[\text{Ag}(\text{CN})_2] + \text{ZnS} \]
In simple words: सायनाइड प्रक्रम द्वारा चाँदी के निष्कर्षण में, पहले सल्फाइड अयस्क को सान्द्रित किया जाता है। फिर इसे सोडियम सायनाइड के विलयन और वायु के साथ अभिक्रिया कराकर घुलनशील सिल्वर सायनाइड संकर (सोडियम डाइसायनोअर्जेन्टेट) में बदला जाता है। अंत में, जिंक धातु का उपयोग करके सिल्वर को इस संकर विलयन से अवक्षेपित किया जाता है।

🎯 Exam Tip: सायनाइड प्रक्रम के मुख्य चरणों (सान्द्रण, सायनाइड से अभिक्रिया, अवक्षेपण) को रासायनिक समीकरणों के साथ स्पष्ट करें। सिल्वर को अवक्षेपित करने के लिए जिंक के उपयोग पर विशेष ध्यान दें।

 

Question 5. गोल्ड (Au) के निष्कर्षण एवं शोधन की विधि का वर्णन कीजिए।


Answer: गोल्ड का शुद्धिकरण - गोल्ड का शुद्धिकरण निम्न विधियों द्वारा किया जाता है -
1. क्वार्टेशन विधि - इस विधि द्वारा कॉपर व सिल्वर की अशुद्धियों को हटाया जाता है। यह विधि इस तथ्य पर आधारित है कि कॉपर व सिल्वर सल्फ्यूरिक व नाइट्रिक अम्लों में घुल जाते हैं, जबकि गोल्ड इन अम्लों के द्वारा प्रभावित नहीं होता। यदि अशुद्ध नमूने में गोल्ड 30% से अधिक है तो कॉपर व सिल्वर भी इन अम्लों के द्वारा प्रभावित नहीं होते । अतः इन अम्लों से अभिक्रिया करने से पहले नमूने को सिल्वर की आवश्यक मात्रा के साथ गलाते हैं जिससे नमूने में गोल्ड की प्रतिशत मात्रा 25% तक घट जाए। इसीलिए इसे क्वॉर्टेशन विधि कहते हैं। परिणामी मिश्र धातु को सान्द्र H,SO, के साथ प्रतिकृत करते हैं जिससे कॉपर व सिल्वर सल्फेटों के रूप में विलयन में आ जाते हैं, जबकि गोल्ड शेष रह जाता है। इस प्रकार से प्राप्त गोल्ड को बोरेक्स व KNOs के साथ गलित। करते हैं जिससे शुद्ध गोल्ड प्राप्त हो जाता है।
\[ \text{Cu} + 2\text{H}_2\text{SO}_4 \longrightarrow \text{CuSO}_4 + 2\text{H}_2\text{O} + \text{SO}_2 \]
\[ 2\text{Ag} + 2\text{H}_2\text{SO}_4 \longrightarrow \text{Ag}_2\text{SO}_4 + 2\text{H}_2\text{O} + \text{SO}_2 \]
(ii) विद्युत-अपघटनी विधि गोल्ड का शुद्धिकरण विद्युत अपघटनी विधि के द्वारा भी किया जा सकता है। इस विधि में गोल्ड क्लोराइड के विलयन जिसमें 10 - 20% HCI होता है का विद्युत-अपघटन किया जाता है। अशुद्ध गोल्ड ऐनोड के रूप में तथा शुद्ध गोल्ड कैथोड के रूप में किया जाता है। शुद्ध गोल्ड कैथोड पर एकत्रित हो जाता है, जबकि बने सिल्वर क्लोराइड को कीचड़ (mud) के रूप में हटा दिया जाता है।
In simple words: गोल्ड के शुद्धिकरण की क्वार्टेशन विधि में, अशुद्ध सोने को पहले सिल्वर के साथ मिलाकर उसकी सांद्रता बढ़ाई जाती है, फिर सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ अभिक्रिया कराकर कॉपर और सिल्वर जैसी अशुद्धियों को घुलनशील सल्फेट के रूप में अलग किया जाता है, जबकि सोना अविलेय रहता है। वैकल्पिक रूप से, विद्युत-अपघटनी विधि का उपयोग करके शुद्ध सोना कैथोड पर जमा किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: गोल्ड के शुद्धिकरण की क्वार्टेशन विधि और विद्युत-अपघटनी विधि दोनों का वर्णन करें, जिसमें प्रत्येक विधि का सिद्धांत, प्रक्रिया और संबंधित रासायनिक समीकरण (क्वार्टेशन के लिए) शामिल हों।

 

Question 4. सिल्वर (Ag) के निष्कर्षण की किसी एक विधि का वर्णन कीजिए। या सायनाइड प्रक्रम द्वारा चाँदी प्राप्त करने की विधि तथा आवश्यक रासायनिक समीकरण लिखिए।
Answer: सिल्वर धातु अत्यधिक क्रियाशील न होने के कारण प्रकृति में मुक्त तथा संयुक्त दोनों अवस्थाओं में पाई जाती है। इसके निष्कर्षण की विधि निम्नवत् है -
1. सान्द्रण - इसके सल्फाइड अयस्क को बाल मिल (Ball mill) में महीन पीसकर इसका झाग प्लवन विधि से सान्द्रण किया जाता है। एक टैंक में जल भरकर उसमें थोड़ा-सा चीड़ का तेल और थोड़ा-सा पोटैशियम एथिलजैन्थेट मिलाकर उसमें महीन पिसा हुआ सल्फाइड अयस्क डालकर वायु की तेज धारा द्वारा विलोडित करते हैं। सल्फाइड अयस्क झाग के रूप में द्रव के सतह के ऊपर तैरने लगता है और भारी अशुद्धियाँ टैंक की पेंदी में बैठ जाती हैं। फेन को अलग करके सुखाकर पीस लिया जाता है।
2. सायनाइड से अभिक्रिया - पिसे हुए सान्द्रित सल्फाइड अयस्क को एक छिद्रयुक्त पेंदी के टैंक में भर देते हैं। इस टैंक के भीतर किरमिच का अस्तर लगा होता है। अब अयस्क में 0.4 से 0.6% सोडियम सायनाइड का घोल मिलाकर हवा की तेज धारा प्रवाहित करते हैं और इस मिश्रण को तीव्रता से हिलाया जाता है। ऐसा करने से सल्फाइड अयस्क में उपस्थित सिल्वर, सायनाइड से क्रिया करके विलेयशील सोडियम डाइसायनोअर्जेन्टेट (I) संकर लवण बनाता है।
Ag2S + 4 NaCN \( \rightleftharpoons \) 2 Na[Ag(CN\(_2\))] + Na\(_2\)S
सोडियम सल्फाइड वायु के द्वारा सोडियम सल्फेट में ऑक्सीकृत हो जाता है।

4Na\(_2\)S + 5O\(_2\) + 2H\(_2\)O \( \implies \) 2Na\(_2\)SO\(_4\) + 4NaOH + 2S सोडियम डाइसायनोअर्जेन्टेट (I) विलयन टैंक की पेंदी से टपकता रहता है जिसको एकत्रित करके फिर टैंक में डाल दिया जाता है। इस क्रिया को तीन-चार बार दोहराया जाता है जिससे सोडियम डाइसायनोअर्जेन्टेट (1) का सान्द्र विलयन प्राप्त हो जाता है।
3. सिल्वर का अवक्षेपण - सान्द्र डाइसायनोअर्जेन्टेट (I) विलयन को अवक्षेपण कक्षों में से प्रवाहित करते हैं। इन कक्षों में जिंक धातु की छीलन रखी होती है जो डाइसायनोअर्जेन्टेट (I) विलयन से सिल्वर को प्रतिस्थापित करके सिल्वर का काला अवक्षेप देता है और इस प्रकार से प्राप्त विलयन को छानकर सिल्वर का काला अवक्षेप पृथक् कर लेते हैं।
2Na[Ag(CN\(_2\))] + Zn \( \implies \) Na\(_2\)[Zn(CN\(_4\))] + 2 Ag \( \downarrow \)
सिल्वर को ऐलुमिनियम पाउडर द्वारा भी अवक्षेपित कराया जाता है। ऐलुमिनियम का उपयोग करने से सीधा ही सोडियम सायनाइड प्राप्त हो जाता है।
Al + 3Na[Ag(CN\(_2\))] + 4NaOH \( \implies \) 3Ag \( \downarrow \) + 6NaCN + NaAlO\(_2\) + 2H\(_2\)O
जिंक द्वारा अवक्षेपण करने में जो जिंक सायनाइड संकर बनता है वह बचे हुए सल्फाइड अयस्क को भी डाइसायनोअर्जेन्टेट (I) में परिवर्तित कर सकता है और इस प्रकार सायनाइड की हानि नहीं होती ।
Ag\(_2\)S + Na\(_2\)[Zn(CN\(_4\))] \( \implies \) 2Na[Ag(CN\(_2\))] + ZnS
In simple words: सिल्वर के निष्कर्षण में पहले सल्फाइड अयस्क को पीसकर और तेल-जल मिश्रण के साथ झाग प्लवन विधि से सांद्रित करते हैं। फिर सांद्रित अयस्क को सोडियम सायनाइड के घोल और वायु के साथ अभिक्रिया कराकर विलेयशील सोडियम डाइसायनोअर्जेन्टेट (I) संकर लवण बनाते हैं। अंत में, इस संकर लवण से जिंक या एल्यूमीनियम पाउडर का उपयोग करके सिल्वर को अवक्षेपित कर शुद्ध सिल्वर प्राप्त किया जाता है।

🎯 Exam Tip: सायनाइड प्रक्रिया, जिसे मैक्आर्थर-फॉरेस्ट सायनाइड प्रक्रिया भी कहते हैं, चांदी और सोने के निष्कर्षण के लिए एक प्रमुख औद्योगिक विधि है। अभिक्रियाओं को संतुलित करना और उत्पादों को सही ढंग से दर्शाना महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. गोल्ड (Au) के निष्कर्षण एवं शोधन की विधि का वर्णन कीजिए। उत्तर गोल्ड का शुद्धिकरण - गोल्ड का शुद्धिकरण निम्न विधियों द्वारा किया जाता है -
Answer:
1. क्वार्टेशन विधि - इस विधि द्वारा कॉपर व सिल्वर की अशुद्धियों को हटाया जाता है। यह विधि इस तथ्य पर आधारित है कि कॉपर व सिल्वर सल्फ्यूरिक व नाइट्रिक अम्लों में घुल जाते हैं, जबकि गोल्ड इन अम्लों के द्वारा प्रभावित नहीं होता। यदि अशुद्ध नमूने में गोल्ड 30% से अधिक है तो कॉपर व सिल्वर भी इन अम्लों के द्वारा प्रभावित नहीं होते । अतः इन अम्लों से अभिक्रिया करने से पहले नमूने को सिल्वर की आवश्यक मात्रा के साथ गलाते हैं जिससे नमूने में गोल्ड की प्रतिशत मात्रा 25% तक घट जाए। इसीलिए इसे क्वॉर्टेशन विधि कहते हैं। परिणामी मिश्र धातु को सान्द्र H,SO, के साथ प्रतिकृत करते हैं जिससे कॉपर व सिल्वर सल्फेटों के रूप में विलयन में आ जाते हैं, जबकि गोल्ड शेष रह जाता है। इस प्रकार से प्राप्त गोल्ड को बोरेक्स व KNOs के साथ गलित। करते हैं जिससे शुद्ध गोल्ड प्राप्त हो जाता है।
• Cu + 2H\(_2\)SO\(_4\) \( \implies \) CuSO\(_4\) + 2H\(_2\)O + SO\(_2\)
• 2Ag + 2H\(_2\)SO\(_4\) \( \implies \) Ag\(_2\)SO\(_4\) + 2H\(_2\)O + SO\(_2\)
(ii) विद्युत-अपघटनी विधि गोल्ड का शुद्धिकरण विद्युत अपघटनी विधि के द्वारा भी किया जा सकता है। इस विधि में गोल्ड क्लोराइड के विलयन जिसमें 10 - 20% HCl होता है का विद्युत-अपघटन किया जाता है। अशुद्ध गोल्ड ऐनोड के रूप में तथा शुद्ध गोल्ड कैथोड के रूप में किया जाता है। शुद्ध गोल्ड कैथोड पर एकत्रित हो जाता है, जबकि बने सिल्वर क्लोराइड को कीचड़ (mud) के रूप में हटा दिया जाता है।
In simple words: गोल्ड के शुद्धिकरण के लिए दो मुख्य विधियां हैं: क्वार्टेशन विधि, जहां अशुद्ध कॉपर और सिल्वर को सल्फ्यूरिक एसिड से प्रतिक्रिया करके हटाया जाता है, क्योंकि गोल्ड एसिड में अघुलनशील रहता है। दूसरी विधि विद्युत-अपघटनी शोधन है, जिसमें अशुद्ध गोल्ड को एनोड और शुद्ध गोल्ड को कैथोड के रूप में उपयोग करके गोल्ड क्लोराइड विलयन का विद्युत-अपघटन किया जाता है, जिससे शुद्ध गोल्ड कैथोड पर जमा होता है।

🎯 Exam Tip: गोल्ड के निष्कर्षण और शोधन की विधियों में रासायनिक प्रतिक्रियाओं और उनके सिद्धांतों को समझना महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से, क्वार्टेशन विधि में उपयोग किए जाने वाले अभिकर्मक और विद्युत-अपघटनी शोधन के सेटअप पर ध्यान दें।

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