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Detailed Chapter 5 सतही रसायन विज्ञान UP Board Solutions for Class 12 Chemistry
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Class 12 Chemistry Chapter 5 सतही रसायन विज्ञान UP Board Solutions PDF
UP Board Solutions For Class 12 Chemistry Chapter 5 Surface Chemistry (पृष्ठ रसायन)
अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर
Question 1.रसोवशोषण के दो अभिलक्षण दीजिए।
Answer:1. रसोवशोषण अतिविशिष्ट होता है।
2. रसोवशोषण में यौगिक बनने के कारण इसकी प्रकृति अनुत्क्रमणीय होती है।
In simple words: रसोवशोषण बहुत ही विशिष्ट होता है, यानी यह केवल कुछ खास पदार्थों के बीच ही होता है, और एक बार यौगिक बन जाने के बाद यह प्रक्रिया आसानी से उलटती नहीं है।
🎯 Exam Tip: रसोवशोषण की विशिष्टता और अनुत्क्रमणीयता को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये इसके रासायनिक बंधन की प्रकृति को दर्शाते हैं।
Question 2.ताप बढ़ने पर भौतिक अधिशोषण क्यों घटता है ?
Answer:भौतिक अधिशोषण ऊष्माक्षेपी (exothermic) होता है।
जब ताप बढ़ाया जाता है तब साम्य पश्च दिशा में विस्थापित हो जाता है जिससे कि बढ़े हुए ताप को उदासीन किया जा सके । अतः अधिशोषक से गैस बाहर निकल जाती है।
In simple words: भौतिक अधिशोषण में ऊष्मा निकलती है (ऊष्माक्षेपी प्रक्रिया)। जब हम तापमान बढ़ाते हैं, तो ले-शातेलिए सिद्धांत के अनुसार संतुलन पीछे की ओर चला जाता है, जिससे अधिशोषण घट जाता है और गैस बाहर निकल जाती है।
🎯 Exam Tip: भौतिक अधिशोषण की ऊष्माक्षेपी प्रकृति और ले-शातेलिए सिद्धांत का उल्लेख करना इस प्रश्न के उत्तर के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 3.अपने क्रिस्टलीय रूपों की तुलना में चूर्णित पदार्थ अधिक प्रभावी अधिशोषक क्यों होते हैं?
Answer: क्रिस्टलीय रूपों की तुलना में चूर्णित पदार्थ का पृष्ठ क्षेत्रफल अधिक होता है । पृष्ठीय क्षेत्रफल अधिक होने पर अधिशोषण अधिक होता है।
In simple words: चूर्णित पदार्थों का सतही क्षेत्रफल बहुत अधिक होता है। अधिशोषण एक सतही प्रक्रिया है, इसलिए जितना ज्यादा सतही क्षेत्रफल होगा, उतनी ही अधिक मात्रा में अधिशोषण होगा, जिससे चूर्णित पदार्थ अधिक प्रभावी अधिशोषक होते हैं।
🎯 Exam Tip: अधिशोषण की सतही प्रकृति और पृष्ठ क्षेत्रफल के महत्व को रेखांकित करना इस प्रश्न के लिए मुख्य मूल्यांकन बिंदु है।
Question 4.हैबर प्रक्रम में हाइड्रोजन को NiO उत्प्रेरक की उपस्थिति में मेथेन के साथ भाप की अभिक्रिया द्वारा प्राप्त किया जाता है। प्रक्रम को भाप पुनः संभावन कहते हैं। अमोनिया प्राप्त करने के हैबर प्रक्रम में CO को हटाना क्यों आवश्यक है?
Answer: CO इस प्रक्रम में उत्प्रेरक विष का कार्य करती है, अतः इसे हटाना अनिवार्य होता है।
In simple words: हैबर प्रक्रम में कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) को हटाना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह उत्प्रेरक की कार्यक्षमता को कम कर देता है, यानी यह उत्प्रेरक विष का काम करता है।
🎯 Exam Tip: उत्प्रेरक विष की अवधारणा और अमोनिया संश्लेषण में उसके महत्व को स्पष्ट करना आवश्यक है।
Question 5.एस्टर का जल-अपघटन प्रारम्भ में धीमा एवं कुछ समय पश्चात् तीव्र क्यों हो जाता है?
Answer:एस्टर का जल-अपघटन निम्न समीकरण के अनुसार होता है –
अभिक्रिया में निर्मित अम्ल स्वउत्प्रेरक (autocatalyst) का कार्य करता है। अतः कुछ समय पश्चात् अभिक्रिया तीव्र हो जाती है।
In simple words: एस्टर के जल-अपघटन से जो अम्ल बनता है, वह स्वयं ही उत्प्रेरक का काम करता है (स्वउत्प्रेरक)। इसलिए, शुरुआत में अभिक्रिया धीमी होती है, लेकिन जैसे-जैसे अम्ल बनता है, अभिक्रिया की गति तेज होती जाती है।
🎯 Exam Tip: स्वउत्प्रेरण (autocatalysis) की अवधारणा और निर्मित उत्पाद द्वारा अभिक्रिया की गति में वृद्धि को समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 6.उत्प्रेरण के प्रक्रम में विशोषण की क्या भूमिका है ?
Answer: विशोषण ठोस उत्प्रेरक की सतह को उस पर अभिकारकों के पुनः अधिशोषण के लिए मुक्त रखता है।
In simple words: विशोषण प्रक्रिया में उत्पाद उत्प्रेरक की सतह से हट जाते हैं, जिससे उत्प्रेरक की सतह नए अभिकारकों को अधिशोषित करने के लिए खाली हो जाती है और अभिक्रिया जारी रह पाती है।
🎯 Exam Tip: विशोषण की परिभाषा और उत्प्रेरक सतह को पुनः सक्रिय करने में इसकी भूमिका को स्पष्ट करना आवश्यक है।
Question 7.आप हार्डी-शुल्जे नियम में संशोधन के लिए क्या सुझाव दे सकते हैं?
Answer: हार्डी- शुल्जे नियम के अनुसार, आयन जिन पर कोलॉइडी कणों के विपरीत आवेश होता है । कोलॉइडी कणों को उदासीन करके उनका स्कन्दन करते हैं लेकिन वास्तव में इन आयनों युक्त सॉल को भी स्कन्दन होता है। चूंकि कण इनके आवेश को उदासीन कर देते हैं। इन परिस्थितियों में हार्डी-शुल्जे नियम को निम्नवत् रूपान्तरित किया जा सकता है – जब दो विपरीत आवेशित सॉल की उपयुक्त मात्राओं को मिश्रित किया जाता है तब वे आवेशों को उदासीन करके अवक्षेपित हो जाते हैं।
In simple words: हार्डी-शुल्जे नियम बताता है कि विपरीत आवेश वाले आयन कोलॉइडी कणों को उदासीन करके उनका स्कन्दन करते हैं। संशोधन यह है कि जब विपरीत आवेश वाले दो सॉल को सही मात्रा में मिलाया जाता है, तो वे भी एक-दूसरे को उदासीन करके अवक्षेपित हो जाते हैं।
🎯 Exam Tip: हार्डी-शुल्जे नियम की मूल बात को समझाना और विपरीत आवेश वाले दो सॉल के मिश्रण से होने वाले स्कन्दन के रूप में इसके विस्तार को बताना महत्वपूर्ण है।
Question 8.अवक्षेप का मात्रात्मक आकलन करने से पूर्व उसे जल से धोना आवश्यक क्यों है?
Answer: अवक्षेप बनाने के लिए मिश्रित विद्युत-अपघटयों की कुछ मात्रा अवक्षेप के कणों की सतह पर अधिशोषित बनी रहती है, अतः अवक्षेप का मात्रात्मक आकलन करने से पूर्व उसे जल से धोना आवश्यक होता है।
In simple words: अवक्षेप के मात्रात्मक आकलन से पहले उसे धोना ज़रूरी है क्योंकि अवक्षेप बनाने में इस्तेमाल हुए विद्युत-अपघट्य की कुछ मात्रा अवक्षेप की सतह पर चिपकी रह सकती है, जो सही माप को प्रभावित कर सकती है।
🎯 Exam Tip: अवक्षेप के मात्रात्मक विश्लेषण में अशुद्धियों को हटाने और सटीक परिणाम सुनिश्चित करने के लिए धोने की प्रक्रिया का महत्व समझाना आवश्यक है।
अतिरिक्त अभ्यास
Question 1.अधिशोषण एवं अवशोषण शब्दों (पदों) के तात्पर्य में विभेद कीजिए । प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए।
Answer:अधिशोषण तथा अवशोषण में अन्तर
Difference Between Adsorption And Absorption
| क्र. सं. | अधिशोषण | अवशोषण |
| 1. | यह एक पृष्ठीय परिघटना है। अधिशोष्य अणु अधिशोषक की सतह पर ही रहते हैं। | अवशोषण अवशोषक पदार्थ के सम्पूर्ण स्थूल में होता है। |
| 2. | अधिशोषक की सतह पर अधिशोष्य की सान्द्रता स्थूल की तुलना में बहुत अधिक होती है। | अवशोषण में पदार्थ ठोस के सम्पूर्ण स्थूल में एकसमान रूप से वितरित हो जाता है। अतः सम्पूर्ण स्थूल में सान्द्रता एकसमान होती है। |
| 3. | प्रारम्भ में अधिशोषण तीव्रता से होता है। यह साम्य प्राप्त होने तक धीमे-धीमे घटता है। | अवशोषण एकसमान दर से होता है। |
| उदाहरण | सिलिका जैल पर जलवाष्प। | निर्जलीय \( \text{CaCl}_2 \) द्वारा अवशोषित जलवाष्प। |
In simple words: अधिशोषण एक सतही प्रक्रिया है जहाँ पदार्थ की केवल सतह पर जमा होता है, जबकि अवशोषण में पदार्थ पूरे आयतन में समान रूप से फैल जाता है। उदाहरण के लिए, सिलिका जेल पर जलवाष्प का चिपकना अधिशोषण है और निर्जलीय \( \text{CaCl}_2 \) द्वारा जलवाष्प को सोखना अवशोषण है।
🎯 Exam Tip: अधिशोषण और अवशोषण के बीच मुख्य अंतर उनकी प्रकृति (सतही बनाम आयतन) और वितरण (गैर-समान बनाम समान) पर आधारित है। उदाहरण देना अनिवार्य है।
Question 2.भौतिक अधिशोषण एवं रासायनिक अधिशोषण में क्या अन्तर है?
Answer:भौतिक अधिशोषण एवं रासायनिक अधिशोषण में अन्तर
Difference Between Physisorption And Chemisorption
| क्र. सं. | भौतिक अधिशोषण | रासायनिक अधिशोषण (रसोवशोषण) |
| 1. | यह वान्डर वाल्स बलों के कारण होता है। | यह रासायनिक बन्ध बनने के कारण होता है। |
| 2. | यह प्रकृति में विशिष्ट नहीं है। | यह प्रकृति में अतिविशिष्ट होता है। |
| 3. | यह प्रकृति में उत्क्रमणीय है। | यह अनुत्क्रमणीय है। |
| 4. | यह गैस की प्रकृति पर निर्भर करता है। अधिक सरलता से द्रवणीय गैसें सहजता से अधिशोषित होती हैं। | यह भी गैस की प्रकृति पर निर्भर करता है। वे गैसें जो अधिशोषक से क्रिया करती हैं, रसोवशोषण दर्शाती हैं। |
| 5. | इसमें अधिशोषण की एन्थैल्पी कम (\( 20-40 \text{ kJ mol}^{-1} \)) होती है। | इसमें अधिशोषण की एन्थैल्पी उच्च (\( 80-240 \text{ kJ mol}^{-1} \)) होती है। |
| 6. | अधिशोषण के लिए निम्न ताप सहायक होता है। यह ताप बढ़ने पर घटता है। | अधिशोषण के लिए उच्च ताप सहायक होता है। यह ताप बढ़ने पर बढ़ता है। |
| 7. | इसमें सुप्रेक्ष्य सक्रियण ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती। | कभी-कभी उच्च सक्रियण ऊर्जा की आवश्यकता होती है। |
| 8. | यह पृष्ठीय क्षेत्रफल पर निर्भर करता है। यह पृष्ठीय क्षेत्रफल के बढ़ने पर बढ़ता है। | यह भी पृष्ठीय क्षेत्रफल पर निर्भर करता है। यह भी पृष्ठीय क्षेत्रफल के बढ़ने पर बढ़ता है। |
| 9. | उच्च दाब पर अधिशोषक के पृष्ठ पर यह बहुअणुक परतों के रूप में परिणामित होता है। | यह एकल अणुक परत के रूप में फलित होता है। |
In simple words: भौतिक अधिशोषण कमजोर वान्डर वाल्स बलों के कारण होता है, जो कम तापमान पर होता है और आसानी से उलट सकता है, जबकि रासायनिक अधिशोषण रासायनिक बंधों के बनने के कारण होता है, जो अधिक विशिष्ट होता है, उच्च तापमान पर होता है और आसानी से उलटता नहीं है।
🎯 Exam Tip: दोनों प्रकार के अधिशोषण के बीच के मुख्य अंतरों, जैसे कि बल का प्रकार, तापमान का प्रभाव, एन्थैल्पी मान और उत्क्रमणीयता, को तालिका के रूप में प्रस्तुत करना अत्यधिक प्रभावी होता है।
Question 3.कारण बताइए कि सूक्ष्म-विभाजित पदार्थ अधिक प्रभावी अधिशोषक क्यों होता है?
Answer: सूक्ष्म विभाजित पदार्थ में सतही क्षेत्रफल (surface area) अधिक होने के कारण अधिशोषण के लिए अधिक सक्रिय केन्द्र उपस्थित होते हैं, इसलिए सूक्ष्म विभाजित पदार्थ अधिक प्रभावी अधिशोषक होते है।
In simple words: सूक्ष्म-विभाजित पदार्थों का सतही क्षेत्रफल बहुत बड़ा होता है, जिससे अधिशोषण के लिए अधिक सक्रिय स्थल उपलब्ध होते हैं और वे गैसों या द्रवों को अधिक प्रभावी ढंग से अधिशोषित कर पाते हैं।
🎯 Exam Tip: पृष्ठ क्षेत्रफल और सक्रिय केंद्रों की संख्या के बीच सीधा संबंध स्थापित करना इस प्रश्न के उत्तर के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 4.किसी ठोस पर गैस के अधिशोषण को प्रभावित करने वाले कारक कौन-से हैं?
Answer:1. अधिशोष्य तथा अधिशोषक की प्रकृति
2. अधिशोषक का विशिष्ट सतही क्षेत्रफल तथा इसका सक्रियण
3. गैस का दाब
4. तापमान ।
In simple words: ठोस पर गैस के अधिशोषण को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक अधिशोषक और अधिशोष्य की प्रकृति, अधिशोषक का सतही क्षेत्रफल, गैस का दाब और तापमान हैं।
🎯 Exam Tip: सभी चार कारकों को सूचीबद्ध करना और उनके संक्षिप्त महत्व को समझना, जैसे सतह क्षेत्र और तापमान का सीधा/उल्टा प्रभाव, महत्वपूर्ण है।
Question 5.अधिशोषण समतापी वक्र क्या है? फ्रॉयडलिक अधिशोषण समतापी वक्र का वर्णन कीजिए ।
Answer:अधिशोषण समतापी वक्र (Adsorption isotherm) – अधिशोषक के प्रति ग्राम में अधिशोषित गैस की मात्रा तथा स्थिर ताप पर अधिशोष्य (गैस) के दाब के बीच खींचा गया वक्र अधिशोषण समतापी वक्र कहलाता है।
फ्रॉयन्डलिक अधिशोषण समतापी वक्र (Freundlich adsorption isotherm) – फ्रॉयन्डलिक ने सन् 1909 में ठोस अधिशोषक के इकाई द्रव्यमान द्वारा एक निश्चित ताप पर अधिशोषित गैस की मात्रा एवं दाब के मध्य एक प्रयोग पर आधारित सम्बन्ध दिया। सम्बन्ध को निम्नलिखित समीकरण द्वारा व्यक्त किया जा सकता है –
\( \frac{x}{m} = kp^{1/n} (n > 1) \)
जहाँ x, अधिशोषक के m द्रव्यमान द्वारा p दाब पर अधिशोषित गैस का द्रव्यमान है। k एवं n स्थिरांक हैं जो कि किसी निश्चित ताप पर अधिशोषक एवं गैस की प्रकृति पर निर्भर करते हैं। सम्बन्ध को सामान्यतया एक वक्र के रूप में निरूपित किया जाता है जिसमें अधिशोषक के प्रति ग्राम द्वारा अधिशोषित गैस का द्रव्यमान दाब के विपरीत आलेखित किया जाता है (चित्र-1)। ये वक्र व्यक्त करते हैं कि एक निश्चित दाब पर, ताप बढ़ाने से भौतिक अधिशोषण घटता है। ये वक्र उच्च दाब पर सदैव संतृप्तता की ओर बढ़ते प्रतीत होते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र अधिशोषण समतापी वक्र को दर्शाता है, जहाँ Y-अक्ष पर अधिशोषित गैस की मात्रा (x/m) और X-अक्ष पर दाब (P) है। इसमें तीन अलग-अलग तापमानों (195 K, 244 K, 273 K) पर अधिशोषण की दर दिखाई गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कम तापमान पर अधिशोषण अधिक होता है।
समीकरण (i) का लघुगणक लेने पर, \( \log \frac{x}{m} = \log k + \frac{1}{n} \log p \) ... (ii) फ्रॉयन्डलिक समतापी वक्र की वैधता, आलेख में \( \log \frac{x}{m} \) को Y- अक्ष (कोटि) एवं \( \log p \) को X- अक्ष (भुज) पर लेकर प्रमाणित की जा सकती है। यदि यह एक सीधी रेखा आती है तो फ्रॉयन्डलिक वक्र प्रमाणित है, अन्यथा नहीं (चित्र-2)। सीधी रेखा का ढाल \( \frac{1}{n} \) का मान देता है। Y- अक्ष पर अन्त:खण्ड \( \log k \) का मान देता है।
In simple words: अधिशोषण समतापी वक्र एक स्थिर तापमान पर अधिशोषित गैस की मात्रा और दाब के बीच का संबंध दिखाता है। फ्रॉयन्डलिक समतापी वक्र इस संबंध को एक गणितीय समीकरण और ग्राफ के रूप में व्यक्त करता है, जिससे पता चलता है कि अधिशोषण दाब बढ़ने के साथ बढ़ता है लेकिन तापमान बढ़ने पर घटता है।
🎯 Exam Tip: अधिशोषण समतापी वक्र की परिभाषा, फ्रॉयन्डलिक समीकरण, और इसके लॉग रूप का ग्राफिकल प्रतिनिधित्व (ढाल और अंत:खण्ड सहित) महत्वपूर्ण हैं।
फ्रॉयन्डलिक समतापी अधिशोषण के व्यवहार की सन्निकट व्याख्या करता है। गुणक \( \frac{1}{n} \) का मान 0 एवं 1 के मध्य हो सकता है (अनुमानित सीमा 0.1 से 0.5)। अतः समीकरण (ii) दाब के सीमित विस्तार तक ही लागू होती है। (i) जब \( \frac{1}{n} = 0 \), \( \frac{x}{m} \) = स्थिरांक, अतः अधिशोषण दाब से स्वतन्त्र है। (ii) \( \frac{1}{n} = 1 \), \( \frac{x}{m} = kp \) अर्थात् \( \frac{x}{m} \propto p \), अतः अधिशोषण में परिवर्तन दाब के अनुक्रमानुपाती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र फ्रॉयन्डलिक समतापी वक्र के लघुगणकीय रूप को दर्शाता है। इसमें Y-अक्ष पर \( \log \frac{x}{m} \) और X-अक्ष पर \( \log p \) है, जो एक सीधी रेखा बनाता है जिसका ढाल \( \frac{1}{n} \) और Y-अक्ष पर अंत:खण्ड \( \log k \) है। यह वक्र फ्रॉयन्डलिक अधिशोषण समतापी की वैधता को प्रमाणित करता है। दोनों ही प्रतिबन्धों का प्रायोगिक परिणामों से समर्थन होता है। प्रायोगिक समतापी सदैव उच्च दाब पर संतृप्तता की ओर अभिगमन करते प्रतीत होते हैं। इसे फ्रॉयडलिक समतापी से नहीं समझाया जा सकता। इस प्रकार यह उच्च दाब पर असफल हो जाता है।
Question 6.अधिशोषक के सक्रियण से आप क्या समझते हैं? यह कैसे प्राप्त किया जाता है?
Answer: अधिशोषक के सक्रियण से तात्पर्य अधिशोषक की अधिशोषण क्षमता को बढ़ाना है। इसे अधिशोषक के पृष्ठीय क्षेत्रफल को बढ़ाकर किया जा सकता है। अधिशोषक के पृष्ठीय क्षेत्रफल को निम्नलिखित विधियों द्वारा बढ़ाया जा सकता है -
1. अधिशोषित गैसों को हटाकर अर्थात् चारकोल को 650 K से 1330 K के मध्य ताप पर निर्वात् अथवा अतितप्त भाप में गर्म करके सक्रिय किया जा सकता है।
2. अधिशोषक को बारीक पीसकर अर्थात् सूक्ष्म विभाजित करके इसकी अधिशोषण क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
3. अधिशोषक की सतह को खुरदरा करके भी इसकी अधिशोषण क्षमता अर्थात् सक्रियता बढ़ाई जो सकती है।
In simple words: अधिशोषक के सक्रियण का अर्थ है उसकी अधिशोषण क्षमता को बढ़ाना। यह उसकी सतह को साफ करके, उसे बारीक पीसकर या खुरदरा करके किया जा सकता है, जिससे अधिक सक्रिय स्थल उपलब्ध होते हैं।
🎯 Exam Tip: अधिशोषक सक्रियण की परिभाषा और इसे प्राप्त करने के विभिन्न तरीकों (ताप उपचार, पीसना, खुरदरापन) को बिंदुवार समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 7.विषमांगी उत्प्रेरण में अधिशोषण की क्या भूमिका है?
Answer: विषमांगी उत्प्रेरण में सामान्यतः ठोस अधिशोषक (उत्प्रेरक) तथा अभिकारक गैसें होती हैं। अभिक्रिया उत्प्रेरक की सतह पर होती है जहाँ अभिकारक अणु (अधिशोष्य) रासायनिक अधिशोषित होते हैं।
In simple words: विषमांगी उत्प्रेरण में, अभिकारक अणु उत्प्रेरक की ठोस सतह पर रासायनिक रूप से चिपक जाते हैं (अधिशोषित होते हैं)। यह अधिशोषण ही अभिक्रिया को शुरू करने और उसके वेग को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
🎯 Exam Tip: विषमांगी उत्प्रेरण में अभिकारक अणुओं के उत्प्रेरक की सतह पर अधिशोषण की भूमिका को स्पष्ट रूप से बताना, क्योंकि यह अभिक्रिया का पहला और महत्वपूर्ण चरण है।
Question 8.अधिशोषण हमेशा ऊष्माक्षेपी क्यों होता है?
Answer: अधिशोषण होने पर पृष्ठ के अवशिष्ट बलों में सदैव कमी आती है अर्थात् पृष्ठ ऊर्जा में कमी आती है जो कि ऊष्मा के रूप में प्रकट होती है। अतः अधिशोषण सदैव एक ऊष्माक्षेपी प्रक्रम होता है। दूसरे शब्दों में, अधिशोषण का ∆H हमेशा ऋणात्मक होता है। जब एक गैस अधिशोषित होती है तो इसके अणुओं का संचलन सीमित हो जाता है। इससे अधिशोषण
In simple words: अधिशोषण हमेशा ऊष्माक्षेपी होता है क्योंकि जब अणु सतह पर चिपकते हैं, तो सतह की बची हुई ऊर्जा कम हो जाती है, और यह ऊर्जा ऊष्मा के रूप में निकलती है। साथ ही, अणुओं की गति सीमित होने से एंट्रॉपी घट जाती है, जिसे संतुलित करने के लिए ऊर्जा निकलती है।
🎯 Exam Tip: पृष्ठ ऊर्जा में कमी और एंट्रॉपी में कमी को ऊष्माक्षेपी प्रक्रिया के कारण के रूप में समझाना महत्वपूर्ण है।
के पश्चात् गैस की एन्ट्रॉपी घट जाती है। किसी प्रक्रम के स्वतः प्रवर्तित होने के लिए ऊष्मागतिकीय आवश्यकता यह है कि स्थिर ताप एवं दाब पर \( \triangle\text{G} \) ऋणात्मक होना चाहिए अर्थात् गिब्ज ऊर्जा में कमी होनी चाहिए । समीकरण \( \text{AG} = \triangle\text{H} – \text{T} \triangle\text{S} \) के आधार पर \( \triangle\text{G} \) तभी ऋणात्मक हो सकता है जब \( \triangle\text{H} \) का मान पर्याप्त ऋणात्मक हो क्योकि \( – \text{T} \triangle\text{S} \) का मान धनात्मक है। अतः अधिशोषण प्रक्रम में, जो कि स्वतःप्रवर्तित होती है, इन दोनों गुणकों का संयोजन \( \text{AG} \) को ऋणात्मक बनाता है। जैसे-जैसे अधिशोषण बढ़ता है \( \triangle\text{H} \) कम ऋणात्मक होता जाता है एवं अन्त में \( \triangle\text{H} \), \( \text{T} \triangle\text{S} \) के तुल्य हो जाता है एवं \( \text{AG} \) की मान शून्य हो जाता है। इसे अवस्था पर साम्य स्थापित हो जाता है।
Question 9.कोलॉइडी विलयनों को परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम की भौतिक अवस्थाओं के आधार पर कैसे वर्गीकृत किया जाता है?
Answer:परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम की भौतिक अवस्थाओं के आधार पर वर्गीकरण (Classification based on the Physical state of Dispersed phase and Dispersion medium) – परिक्षिप्त प्रावस्था तथा परिक्षेपण माध्यम की भौतिक अवस्थाओं के आधार पर आठ प्रकार के कोलॉइडी तन्त्र सम्भव हैं। एक गैस का दूसरी गैस के साथ मिश्रण समांगी होता है, अतः यह कोलॉइडी तन्त्र नहीं होता। विभिन्न प्रकार के कोलॉइडों के उदाहरण उनके विशिष्ट नामों सहित निम्नांकित सारणी में दिए गए हैं –
सारणी – कोलॉइडी तन्त्रों के प्रकार (Types Of Colloidal Systems)
| परिक्षिप्त प्रावस्था | परिक्षेपण माध्यम | कोलॉइड का प्रकार | उदाहरण |
| ठोस | ठोस | ठोस सॉल | कुछ रंगीन काँच एवं रत्न प्रस्तर |
| ठोस | द्रव | सॉल | प्रलेप (पेंट), कोशिका तरल |
| ठोस | गैस | ऐरोसॉल | धुआँ, धूल |
| द्रव | ठोस | जैल | पनीर, मक्खन, जेली |
| द्रव | द्रव | इमल्शन (पायस) | दूध, बालों की क्रीम |
| द्रव | गैस | ऐरोसॉल | धुन्ध, कोहरा, बादल, कीटनाशक स्प्रे |
| गैस | ठोस | ठोस सॉल | प्यूमिस पत्थर, फोम रबड़ |
| गैस | द्रव | फोम | फेन, फेंटी गई क्रीम, साबुन के झाग |
In simple words: कोलॉइडी विलयनों को परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम की भौतिक अवस्थाओं (ठोस, द्रव, गैस) के आधार पर आठ प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है। प्रत्येक संयोजन का एक विशेष नाम और उदाहरण होता है, जैसे दूध एक द्रव-द्रव इमल्शन है।
🎯 Exam Tip: परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम की अवस्थाओं के आधार पर कोलॉइडों के वर्गीकरण को तालिकाबद्ध करना, प्रत्येक प्रकार के साथ एक उदाहरण देना महत्वपूर्ण है।
Question 10.ठोसों द्वारा गैसों के अधिशोषण पर दाब एवं ताप के प्रभाव की विवेचना कीजिए।
Answer:अधिशोषण पर दाब का प्रभाव (Effect of pressure on adsorption) – स्थिर ताप पर किसी ठोस में किसी गैस के अधिशोषण का अंश दाब के साथ बढ़ता है। स्थिर ताप पर ठोस में गैस के अधिशोषण के अंश (\( \frac{x}{m} \)) तथा गैस के दाब (p) के मध्य खींचा गया ग्राफ अधिशोषण समतापी वक्र कहलाता है।
फ्रॉयन्डलिक समतापी वक्र (Freundlich isotherm curve) – इस वक्र के अनुसार,
1. दाब की न्यूनतम परास में \( \frac{x}{m} \propto p^1 \)
2. दाब के उच्च परास में \( \frac{x}{m} \propto p^0 \)
3. दाबे के माध्यमिक परास में \( \frac{x}{m} \propto p^{1/n} \)
जहाँ \( \frac{1}{n} \) एक भिन्न है। इसका मान 0 से 1 के बीच हो सकता है।
\( \frac{x}{m} = kp^{1/n} \log (\frac{x}{m}) = \log k + \frac{1}{n} \log p \)
अधिशोषण पर ताप का प्रभाव (Effect of temperature on adsorption) – अधिशोषण सामान्यतया ताप पर निर्भर होता है। अधिकांश अधिशोषण प्रक्रम ऊष्माक्षेपी होते हैं तथा इसलिए ताप बढ़ाने पर अधिशोषण घट जाता है। यद्यपि ऊष्माशोषी अधिशोषण प्रक्रमों में अधिशोषण ताप बढ़ने पर बढ़ जाता है।
In simple words: ठोस पर गैसों के अधिशोषण पर दाब और ताप का प्रभाव पड़ता है। दाब बढ़ाने से अधिशोषण बढ़ता है, जिसे फ्रॉयन्डलिक समतापी वक्र से समझा जा सकता है। वहीं, अधिकांश अधिशोषण ऊष्माक्षेपी होने के कारण, तापमान बढ़ाने पर अधिशोषण घट जाता है।
🎯 Exam Tip: अधिशोषण पर दाब और ताप के प्रभाव को फ्रॉयन्डलिक समतापी वक्र और ऊष्माक्षेपी प्रकृति के संदर्भ में समझाना महत्वपूर्ण है, जिसमें दाब के विभिन्न परासों पर निर्भरता और ताप के सीधे/उल्टे संबंध शामिल हैं।
Question 11.द्रवरागी एवं द्रवविरागी सॉल क्या होते हैं? प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दीजिए। द्रवविरोधी सॉल आसानी से स्कन्दित क्यों हो जाते हैं?
Answer:द्रवरागी सॉल (Lyophilic Sols) – द्रवरागी शब्द का अर्थ है- द्रव को स्नेह करने वाला। गोंद, रबड़ आदि पदार्थों को उचित द्रव (परिक्षेपण माध्यम) में मिलाने पर सीधे ही प्राप्त होने वाले कोलॉइडी सॉल द्रवरागी कोलॉइड कहलाते हैं। सॉल की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह होती है कि यदि परिक्षेपण माध्यम को परिक्षिप्त प्रावस्था से अलग कर दिया जाए (माना वाष्पीकरण द्वारा) तो सॉल को केवल परिक्षेपण माध्यम के साथ मिश्रित करके पुनः प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे सॉल उत्क्रमणीय सॉल (reversible sols) भी कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त ये सॉल पर्याप्त स्थायी होते हैं एवं इन्हें आसानी से स्कन्दित नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार के सॉल के उदाहरण गोंद, जिलेटिन, स्टार्च, रबड़ आदि हैं।
द्रवविरागी या द्रवविरोधी सॉल (Lyophobic Sols) – द्रवविरागी शब्द का अर्थ है- द्रव से घृणा करने वाला। धातुएँ एवं उनके सल्फाइड आदि पदार्थ केवल परिक्षेपण माध्यम में मिश्रित करने से कोलॉइडी सॉल नहीं बनाते । इनके कोलॉइडी सॉल केवल विशेष विधियों द्वारा ही बनाए जा सकते हैं। ऐसे सॉल द्रवविरांगी सॉल कहलाते हैं। ऐसे सॉल को विद्युत अपघटय की थोड़ी सी मात्रा मिलाकर, गर्म करके या हिलाकर आसानी से अवक्षेपित (या स्कन्दित) किया जा सकता है. इसलिए ये स्थायी नहीं होते। इसके अतिरिक्त एक बार अवक्षेपित होने के बाद ये केवल परिक्षेपण माध्यम के मिलाने मात्र से पुनः कोलॉइडी सॉल नहीं देते। अतः इनको अनुक्रमणीय सॉल (irreversible sols) भी कहते हैं। द्रवविरागी सॉल के स्थायित्व के लिए स्थायी कारकों की आवश्यकता होती है। इस प्रकार के सॉल के उदाहरण गोल्ड, सिल्वर, \( \text{Fe(OH)}_3 \), \( \text{As}_2\text{O}_3 \) आदि हैं।
द्रवविरोधी सॉल का स्कन्दन (Coagulation of Lyophobic Sols) – द्रवविरोधी सॉल का स्थायित्व केवल कोलॉइडी कणों पर आवेश की उपस्थिति के कारण होता है। यदि आवेश हटा दिया जाए अर्थात् । उचित विद्युत-अपघटय मिला दिया जाए तो कण एक-दूसरे के समीप आकर पुंजित हो जाएँगे अर्थात् ये स्कन्दित होकर नीचे बैठ जाएँगे। दूसरी ओर द्रवरागी सॉल का स्थायित्व कोलॉइड कणों के आवेश के साथ-साथ उनके विलायकयोजन (solvation) के कारण होता है। इन दोनों कारकों को हटाने के पश्चात् ही इन्हें स्कन्दित किया जा सकता है। अतः स्पष्ट है कि द्रवविरोधी सॉल आसानी से स्कन्दित हो जाते हैं।
In simple words: द्रवरागी सॉल द्रव-स्नेही होते हैं, आसानी से बनते हैं, स्थायी होते हैं और उत्क्रमणीय होते हैं (जैसे गोंद)। द्रवविरागी सॉल द्रव-विरोधी होते हैं, विशेष विधियों से बनते हैं, कम स्थायी होते हैं और अनुत्क्रमणीय होते हैं (जैसे गोल्ड सॉल)। द्रवविरोधी सॉल आसानी से स्कन्दित हो जाते हैं क्योंकि उनका स्थायित्व केवल कणों पर आवेश पर निर्भर करता है, जिसे विद्युत-अपघट्य द्वारा आसानी से उदासीन किया जा सकता है।
🎯 Exam Tip: द्रवरागी और द्रवविरागी सॉल की परिभाषा, उनके बनने की विधि, स्थायित्व, उत्क्रमणीयता और प्रत्येक का एक उदाहरण देना महत्वपूर्ण है। द्रवविरोधी सॉल के आसानी से स्कन्दित होने का कारण (आवेश का उदासीन होना) स्पष्ट करें।
Question 12.बहुअणुक एवं वृहदाणुक कोलॉइड में क्या अन्तर है? प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दीजिए। सहचारी कोलॉइड इन दोनों
Answer:बहुअणुक तथा वृहदाणुक कोलॉइड में अन्तर
Difference Between Multimolecular And Macromolecular Colloids
| क्र. सं. | बहुअणुक कोलॉइड | वृहदाणुक कोलॉइड |
| 1. | विलीन करने पर किसी पदार्थ के बहुत-से परमाणु या लघु अणु एकत्रित होकर पुंज जैसी एक ऐसी स्पीशीज बनाते हैं जिसका आकार कोलॉइडी सीमा (व्यास < 1nm) में होता है। इस प्रकार प्राप्त स्पीशीज बहुअणुक कोलॉइड कहलाती हैं। | वृहदाणु उचित विलायकों में ऐसे विलयन बनाते हैं जिनमें वृहदाणुओं का आकार कोलॉइडी सीमा में होता है, ऐसे निकाय वृहदाणुक कोलॉइड कहलाते हैं। |
| 2. | उदाहरण-एक गोल्ड सॉल में अनेक परमाणुओं से युक्त भिन्न-भिन्न आकारों के गोल्ड कण हो सकते हैं। सल्फर सॉल में एक हजार या उससे भी अधिक \( \text{S}_8 \) सल्फर अणु वाले कप्न उपस्थित रहते हैं। | प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले वृहदाण्विक कोलॉइडों के उदाहरण हैं- स्टार्च, सेलुलोस, प्रोटीन और एन्जाइम एवं मानव-निर्मित वृहदाणु हैं- पॉलिथीन, नाइलॉन, पॉलिस्टार्यीन, संश्लेषित रबड़ आदि। |
In simple words: बहुअणुक कोलॉइड छोटे अणुओं के इकट्ठे होने से बनते हैं (जैसे गोल्ड सॉल), जबकि वृहदाणुक कोलॉइड बड़े अणुओं (जैसे स्टार्च) से बनते हैं। सहचारी कोलॉइड (मिसेल) कम सांद्रता पर सामान्य विलयन की तरह व्यवहार करते हैं, लेकिन उच्च सांद्रता पर पुंज बनाकर कोलॉइड बनते हैं (जैसे साबुन), जिनकी विशेषता क्राफ्ट ताप और क्रांतिक मिसेल सांद्रता होती है।
🎯 Exam Tip: बहुअणुक, वृहदाणुक और सहचारी कोलॉइड की परिभाषाओं को स्पष्ट रूप से बताना, प्रत्येक का उदाहरण देना, और सहचारी कोलॉइड के लिए क्राफ्ट ताप तथा CMC जैसी विशिष्ट शर्तों को समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 13.एन्जाइम क्या होते हैं? एन्जाइम उत्प्रेरण की क्रिया-विधि को संक्षेप में लिखिए ।
Answer:एन्जाइम (Enzyme) – एन्जाइम जटिल नाइट्रोजनयुक्त कार्बनिक यौगिक होते हैं जो जीवित पौधों एवं जन्तुओं द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं। वास्तविक रूप से ये उच्च आण्विक द्रव्यमान वाले प्रोटीन अणु हैं जो जल में कोलॉइडी विलयन बनाते हैं। ये बहुत प्रभावी उत्प्रेरक होते हैं जो अनेक विशेष रूप से प्राकृतिक प्रक्रमों से सम्बद्ध अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करते हैं। इसी कारण इन्हें जैव उत्प्रेरक (biocatalyst) भी कहा जाता है। इन्वर्टेज, जाइमेज, डायस्टेज, माल्टेज एन्जाइम्स के कुछ विशिष्ट उदाहरण हैं।
एन्जाइम उत्प्रेरण की क्रियाविधि (Mechanism of Enzyme Catalysis) – एन्जाइम के कोलॉइडी कणों की सतहों पर बहुत सारे कोटर होते हैं। ये कोटर अभिलक्षणिक आकृति के होते हैं तथा इनमें सक्रिय समूह जैसे -\( \text{NH}_2 \),- \( \text{COOH} \), \( \text{SH} \), –\( \text{OH} \) आदि होते हैं। वास्तव में ये सतह पर उपस्थित सक्रिय केन्द्र (active centres) होते हैं। अभिकारक के अणु जिनकी परिपूरक आकृति होती है, इन कोटरों में एक ताले में चाबी के समान फिट हो जाते हैं। सक्रिय समूहों की
In simple words: एन्जाइम जटिल प्रोटीन होते हैं जो जीवित जीवों द्वारा बनाए जाते हैं और जैव उत्प्रेरक के रूप में काम करते हैं। ये 'ताला और चाबी' सिद्धांत पर काम करते हैं: एन्जाइम की सतह पर सक्रिय केंद्र होते हैं जिनमें अभिकारक अणु आकर फिट हो जाते हैं, जिससे एक अस्थायी संकुल बनता है जो फिर उत्पादों में बदल जाता है।
🎯 Exam Tip: एन्जाइम की परिभाषा (प्रोटीन, जैव उत्प्रेरक) और उनकी क्रियाविधि को 'ताला और चाबी' सिद्धांत (सक्रिय केंद्र, एन्जाइम-क्रियाधार संकुल) का उपयोग करके समझाना महत्वपूर्ण है।
उपस्थिति के कारण एक सक्रियित संकुल बनता है जो विघटित होकर उत्पाद देता है। इस प्रकार एन्जाइम उत्प्रेरित अभिक्रियाओं को दो पदों में सम्पन्न होना माना जा सकता है –
E + S \( \rightleftharpoons \) [E - S]
[E - S] \( \to \) E + P
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एन्जाइम उत्प्रेरित अभिक्रिया की क्रियाविधि को दर्शाता है। इसमें एक एन्जाइम (E) क्रियाधार (S) के सक्रिय स्थल पर जुड़कर एन्जाइम-क्रियाधार संकुल (E-S) बनाता है। यह संकुल फिर विघटित होकर उत्पाद (P) और मूल एन्जाइम (E) को मुक्त करता है, जिससे अभिक्रिया पूर्ण होती है। पद 1 : सक्रियित संकुल बनाने के लिए एन्जाइम का सबस्ट्रेट से आबन्ध
E + S \( \to \) E - S पद 2 : उत्पाद बनाने के लिए सक्रियित संकुल का विघटन ।
E - S \( \to \) E + P
Question 14.कोलॉइडों को निम्नलिखित आधार पर कैसे वर्गीकृत किया गया है?
1. घटकों की भौतिक अवस्था
2. परिक्षेपण माध्यम की प्रकृति
3. परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम के मध्य अन्योन्यक्रिया।
Answer:1. घटकों की भौतिक अवस्था (Physical states of constituents) – अभ्यास प्रश्न-संख्या 9 का अध्ययन कीजिए।
2. परिक्षेपण माध्यम की प्रकृति (Nature of dispersion medium) – यदि परिक्षेपण माध्यम जल है तो ये एक्वासॉल या हाइड्रोसॉल कहलाते हैं। यदि परिक्षेपण माध्यम ऐल्कोहॉल है तो ये ऐल्कोसॉल कहलाते हैं। यदि परिक्षेपण माध्यम बेन्जीन है तो ये बेन्जोसॉल कहते हैं तथा परिक्षेपण माध्यम वायु होने पर ये ऐरोसॉल कहलाते हैं।
3. परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम के मध्य अन्योन्यक्रिया (Interaction between dispersed phase and dispersion medium) – परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम के मध्य अन्योन्यक्रिया के आधार पर कोलॉइडी सॉल को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- द्रवरागी (विलायक को आकर्षित करने वाले) एवं द्रवविरागी (विलायक को प्रतिकर्षित करने वाले)। यदि परिक्षेपण माध्यम जल हो तो इन्हें क्रमशः जलरागी एवं जलविरागी कहा जाता है।
In simple words: कोलॉइडों को तीन मुख्य आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है: घटकों की भौतिक अवस्था (ठोस, द्रव, गैस), परिक्षेपण माध्यम की प्रकृति (जैसे जल होने पर हाइड्रोसॉल) और परिक्षिप्त प्रावस्था तथा परिक्षेपण माध्यम के बीच की अन्योन्यक्रिया (द्रवरागी या द्रवविरागी)।
🎯 Exam Tip: वर्गीकरण के तीनों आधारों को स्पष्ट रूप से समझाना, विशेषकर परिक्षेपण माध्यम की प्रकृति के आधार पर विभिन्न नामों को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 15.निम्नलिखित परिस्थितियों में क्या प्रेक्षण होंगे?
1. जब प्रकाश किरण पुंज कोलॉइडी सॉल में से गमन करता है।
2. जलयोजित फेरिक ऑक्साइड सॉल में NaCI विद्युत-अपघटय मिलाया जाता है।
3. कोलॉइडी सॉल में से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है।
Answer:1. प्रकाश का प्रकीर्णन होता है (टिंडल प्रभाव)
2. स्कन्दन
3. कोलॉइडी कण गति करते हैं (वैद्युत-कण संचलन)।
In simple words: जब प्रकाश कोलॉइडी सॉल से गुजरता है, तो टिंडल प्रभाव के कारण वह प्रकीर्णित होता है। विद्युत-अपघट्य मिलाने पर स्कन्दन होता है, और विद्युत धारा प्रवाहित करने पर कोलॉइडी कण वैद्युत-कण संचलन के कारण गति करते हैं।
🎯 Exam Tip: इन तीनों परिघटनाओं (टिंडल प्रभाव, स्कन्दन, वैद्युत-कण संचलन) के नाम और उनके कारणों को स्पष्ट रूप से बताना आवश्यक है।
Question 16.इमल्शन क्या हैं? इनके विभिन्न प्रकार क्या हैं? प्रत्येक प्रकार का उदाहरण दीजिए।
Answer: दो अमिश्रणीय द्रवों का कोलॉइडी विलयन इमल्शन (पायस) कहलाता है।
• जल- में-तेल, उदाहरण, दूध;
• तेल-में-जल, उदाहरण, मक्खन।
In simple words: इमल्शन दो ऐसे द्रवों का मिश्रण है जो एक-दूसरे में नहीं घुलते, लेकिन कोलॉइडी रूप में मिश्रित रहते हैं। इसके दो मुख्य प्रकार हैं: जल-में-तेल (जैसे दूध) और तेल-में-जल (जैसे मक्खन)।
🎯 Exam Tip: इमल्शन की परिभाषा और उसके दोनों प्रकारों (o/w और w/o) के साथ उपयुक्त उदाहरण देना महत्वपूर्ण है।
Question 17.विपायसन क्या है? दो विपायसकों के नाम लिखिए ।
Answer: पायस को दो द्रवों में पृथक् करना विपायसन (demulsification) कहलाता है।
• क्वथन
• अपकेंद्रण (centrifugation)।
In simple words: विपायसन वह प्रक्रिया है जिसमें एक इमल्शन को उसके मूल घटक द्रवों में अलग किया जाता है। क्वथन (गर्म करना) और अपकेंद्रण (तेजी से घुमाना) इसके दो सामान्य तरीके हैं।
🎯 Exam Tip: विपायसन की परिभाषा और उसे प्राप्त करने के किन्हीं दो तरीकों को बताना महत्वपूर्ण है।
Question 18.“साबुन की क्रिया पायसीकरण एवं मिसेल बनने के कारण होती है, इस पर टिप्पणी लिखिए।
Answer:यह सत्य है कि साबुन की क्रिया पायसीकरण एवं मिसेल बनने के कारण होती है। इसे समझने के लिए हम साबुन के विलयन का उदाहरण लेते हैं। पानी में घुलनशील साबुन उच्च वसा अम्लों के सोडियम अथवा पोटैशियम लवण होते हैं जिन्हें \( \text{RCOO}^-\text{M}^+ \) द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। उदाहरणार्थ – सोडियम स्टिएरेट, जो साबुन का एक प्रमुख घटक है, जल में विलीन करने पर \( \text{C}_{17}\text{H}_{35}\text{COO}^- \) एवं \( \text{Na}^+ \) आयनों में विघटित हो जाता है। किन्तु \( \text{C}_{17}\text{H}_{35}\text{COO}^- \) आयन के दो भाग होते हैं-एक लम्बी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला (जिसे 'अध्रुवीय पुच्छ' भी कहते हैं), जो जलविरागी (जल प्रतिकर्षी) होती है तथा ध्रुवीय समूह \( \text{COO}^- \) (जिसे 'ध्रुवीय आयनिक शीर्ष' भी कहते हैं) जो जलरागी (जल को स्नेह करने वाला) होता है।
\( \text{C}_{17}\text{H}_{35}\text{COO}^- \) आयन पृष्ठ पर इस प्रकार उपस्थित रहते हैं कि उनका \( \text{COO}^- \) समूह जल में तथा हाइड्रोकार्बन श्रृंखला \( \text{C}_{17}\text{H}_{35} \) पृष्ठ से दूर रहती है। परन्तु क्रान्तिक मिसेल सान्द्रता पर ऋणायन विलयन के स्थूल में खिंच आते हैं एवं गोलीय आकार में इस प्रकार एकत्रित हो जाते हैं कि इनकी हाइड्रोकार्बन श्रृंखलाएँ गोले के केन्द्र की ओर इंगित होती हैं तथा \( \text{COO}^- \) भाग गोले के पृष्ठ पर रहता है। इस प्रकार बना पुंज आयनिक मिसेल (ionic micelle) कहलाता है। इन मिसेलों में इस प्रकार के 100 तक आयन हो सकते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र सोडियम स्टिएरेट (\( \text{C}_{17}\text{H}_{35}\text{COONa} \)) आयन की संरचना दर्शाता है, जिसमें एक लंबी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला (जलविरागी पुच्छ) और एक ध्रुवीय कार्बोक्सिलेट समूह (जलरागी शीर्ष) होता है। यह संरचना साबुन के अणुओं द्वारा मिसेल बनने की प्रक्रिया को समझने में मदद करती है।
In simple words: साबुन अपनी सफाई क्रिया मिसेल बनने और पायसीकरण के द्वारा करता है। साबुन के अणुओं में जलरागी सिर और जलविरागी पूंछ होती है। जलविरागी पूंछ चिकनाई में घुस जाती है और जलरागी सिर बाहर की ओर रहते हैं, जिससे चिकनाई को छोटे-छोटे मिसेल में घेरकर पानी में घोल दिया जाता है।
🎯 Exam Tip: साबुन के अणुओं की संरचना (जलरागी/जलविरागी भाग), मिसेल का निर्माण, और पायसीकरण में इसकी भूमिका को स्पष्ट रूप से समझाना आवश्यक है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र साबुन की कम सांद्रता पर जल की सतह पर स्टिएरेट आयनों की व्यवस्था दर्शाता है, जहाँ जलरागी शीर्ष जल में होते हैं और जलविरागी पुच्छ सतह से ऊपर की ओर होते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र क्रान्तिक मिसेल सांद्रता पर जल के आंतरिक स्थूल में स्टिएरेट आयनों द्वारा बने आयनिक मिसेल को दर्शाता है, जिसमें जलविरागी भाग केंद्र में और जलरागी भाग बाहर की ओर व्यवस्थित होते हैं। साबुन की शोधन-क्रिया इस तथ्य पर आधारित है कि साबुन के अणु तेल की बूंदों के चारों ओर इस प्रकार से मिसेल बनाते हैं कि स्टिएरेट आयन का जलविरागी भाग बूंदों के अन्दर होता है तथा जलरागी भाग चिकनाई की बूंदों के बाहर (चित्र-6) काँटों की तरह निकला रहता है। चूंकि ध्रुवीय समूह जल से अन्योन्यक्रिया कर सकते हैं, अतः स्टिएरेट आयनों से घिरी हुई तेल की बूंदें जल में खिंच जाती हैं तथा गन्दी सतह से हट जाती है। इस प्रकार साबुन तेलों तथा वसाओं का पायसीकरण (emulsification) करके धुलाई में सहायता करता है। छोटी गोलियों के चारों ओर का ऋण-आवेशित आवरण उन्हें एकसाथ आकर पुंज बनाने से रोकता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र कपड़े पर लगी ग्रीस (चिकनाई) को दर्शाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र ग्रीस की बूँदों के चारों ओर व्यवस्थित स्टिएरेट आयनों को दर्शाता है, जहाँ आयन ग्रीस को घेर लेते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र स्टिएरेट आयनों द्वारा घिरी हुई ग्रीस की बूँद को दर्शाता है, जो एक मिसेल का निर्माण करती है और शोधन क्रिया में मदद करती है।
Question 19.विषमांगी उत्प्रेरण के चार उदाहरण लिखिए।
Answer:1. अमोनिया निर्माण का हैबर प्रक्रम : \( \text{N}_2 + 3\text{H}_2 \overset{\text{Fe}}{\rightleftharpoons} 2\text{NH}_3 \)
2. सल्फ्यूरिक अम्ल निर्माण का सम्पर्क प्रक्रम : \( 2\text{SO}_2 + \text{O}_2 \xrightarrow{\text{V}_2\text{O}_5} 2\text{SO}_3 \)
3. नाइट्रिक अम्ल निर्माण का ओस्टवाल्ड प्रक्रम : \( 4\text{NH}_3 + 5\text{O}_2 \xrightarrow{\text{Pt}} 4\text{NO} + 6\text{H}_2\text{O} \)
4. वनस्पति तेल का हाइड्रोजनीकरण : वनस्पति तेल (I) + \( \text{H}_2 \) (g) \( \xrightarrow{\text{Ni(s)}} \) वनस्पति घी (s)
In simple words: विषमांगी उत्प्रेरण में उत्प्रेरक और अभिकारक अलग-अलग भौतिक अवस्थाओं में होते हैं। इसके उदाहरण हैं हैबर विधि से अमोनिया, संपर्क विधि से सल्फ्यूरिक अम्ल, ओस्टवाल्ड विधि से नाइट्रिक अम्ल और वनस्पति तेलों का हाइड्रोजनीकरण।
🎯 Exam Tip: प्रत्येक उदाहरण में अभिकारक, उत्प्रेरक और उत्पाद को सही रासायनिक समीकरणों के साथ दर्शाना महत्वपूर्ण है।
Question 20.उत्प्रेरक की सक्रियता एवं वरणक्षमता का क्या अर्थ है?
Answer:उत्प्रेरक की सक्रियता (Activity of catalyst) – उत्प्रेरक की किसी अभिक्रिया के वेग को बढ़ाने की क्षमता उत्प्रेरकीय सक्रियता कहलाती है।
उदाहरणार्थ – \( \text{H}_2\text{(g)} + \frac{1}{2}\text{O}_2 \text{(g)} \to \) कोई अभिक्रिया नहीं
\( \text{H}_2 \text{(g)} + \frac{1}{2}\text{O}_2 \text{(g)} + [\text{Pt}] \to \text{H}_2\text{O (l)} + [\text{Pt}] \) [विस्फोट के साथ तीव्र अभिक्रिया होती है ।]
बहुत सीमा तक एक उत्प्रेरक की सक्रियता रसोवशोषण की प्रबलता पर निर्भर करती है। सक्रिय होने के लिए अभिकारक, उत्प्रेरक पर पर्याप्त प्रबलता से अधिशोषित होने चाहिए। यद्यपि वे इतनी प्रबलता से अधिशोषित नहीं होने चाहिए कि वे गतिहीन हो जाएँ एवं अन्य अभिकारकों के लिए उत्प्रेरक की सतह पर कोई स्थान रिक्त न रहे।
उत्प्रेरक की वरणक्षमता (Selectivity of catalyst) – किसी उत्प्रेरक की वरणात्मकता उसकी किसी अभिक्रिया को दिशा देकर एक विशेष उत्पाद बनाने की क्षमता है। उदाहरणार्थ – \( \text{H}_2 \) एवं \( \text{CO} \) से प्रारम्भ करके एवं भिन्न उत्प्रेरकों के प्रयोग से हम भिन्न- भिन्न उत्पाद प्राप्त कर सकते हैं।
(i) \( \text{CO (g)} + 3\text{H}_2\text{(g)} \xrightarrow{\text{Ni}} \text{CH}_4\text{(g)} + \text{H}_2\text{O (g)} \)
(ii) \( \text{CO(g)} + 2\text{H}_2\text{(g)} \xrightarrow{\text{Cu/ZnO-Cr}_2\text{O}_3} \text{CH}_3\text{OH(g)} \) इसी प्रकार एथेनॉल का
(iii) \( \text{CO(g)} + \text{H}_2\text{(g)} \xrightarrow{\text{Cu}} \text{HCHO(g)} \)
विहाइड्रोजनीकरण तथा निर्जलीकरण दोनों सम्भव हैं, परन्तु उचित उत्प्रेरक की। उपस्थिति में केवल एक अभिक्रिया ही होती है।
• \( \text{CH}_3\text{CH}_2\text{OH} \xrightarrow[\text{Cu}]{573\text{K}} \text{CH}_3\text{CHO} + \text{H}_2 \) (विहाइड्रोजनीकरण)
• \( \text{CH}_3\text{CH}_2\text{OH} \xrightarrow{\text{Al}_2\text{O}_3} \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{H}_2\text{O} \) (निर्जलीकरण)
अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उत्प्रेरक के कार्य की प्रकृति अत्यधिक विशिष्ट होती है अर्थात् कोई पदार्थ एक विशेष अभिक्रिया के लिए ही उत्प्रेरक हो सकता है, सभी अभिक्रियाओं के लिए नहीं। इसका अर्थ यह है कि एक पदार्थ जो एक अभिक्रिया में उत्प्रेरक का कार्य करता है, अन्य अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करने में असमर्थ हो सकता है।
In simple words: उत्प्रेरक की सक्रियता उसकी अभिक्रिया के वेग को बढ़ाने की क्षमता है (जैसे प्लैटिनम की उपस्थिति में \( \text{H}_2 \) और \( \text{O}_2 \) की तीव्र अभिक्रिया)। उत्प्रेरक की वरणक्षमता उसकी क्षमता है कि वह अभिकारकों को एक विशेष उत्पाद में निर्देशित करे (जैसे \( \text{CO} \) और \( \text{H}_2 \) से विभिन्न उत्प्रेरकों के साथ \( \text{CH}_4 \), \( \text{CH}_3\text{OH} \) या \( \text{HCHO} \) बनाना)।
🎯 Exam Tip: उत्प्रेरक सक्रियता और वरणक्षमता की परिभाषाओं को स्पष्ट रूप से बताना, और प्रत्येक के लिए रासायनिक समीकरणों या प्रतिक्रिया पथों के साथ सटीक उदाहरण देना महत्वपूर्ण है।
Question 21.जीओलाइटों द्वारा उत्प्रेरण के कुछ लक्षणों का वर्णन कीजिए।
Answer:जिओलाइटों द्वारा उत्प्रेरण के लक्षण (Features of Catalysis by Zeolites)-
1. जिओलाइट जलयोजित ऐलुमिनो-सिलिकेट होते हैं जिनकी त्रिविमीय नेटवर्क संरचना होती है तथा इनके सरन्ध्रों में जल के अणु निहित होते हैं।
2. जिओलाइटों को उत्प्रेरक के रूप में प्रयुक्त करने के लिए, इन्हें गर्म किया जाता है जिससे सरन्ध्रों में उपस्थित जलयोजन को जल निकल जाता है तथा सरन्ध्र रिक्त हो जाते हैं।
3. सरन्ध्रों का आकार 260 से 740 pm के मध्य होता है, अतः केवल वे अणु ही इन सरन्ध्रों में अधिशोषित हो पाते हैं जिनका आकार सरन्ध्रों में प्रवेश करने हेतु पर्याप्त रूप से कम होता है। इसलिए ये आण्विक जाल (molecular sieves) या आकृति वरणात्मक उत्प्रेरक (shape selective catalyst) की भाँति कार्य करते हैं।
4. जिओलाइट पेट्रोरसायन उद्योग में हाइड्रोकार्बनों के भंजन एवं समावयवन में उत्प्रेरक के रूप में व्यापक रूप से प्रयुक्त किए जा रहे हैं। ZSM-5 पेट्रोलियम उद्योग में प्रयुक्त होने वाला एक महत्त्वपूर्ण जिओलाइट उत्प्रेरक है। यह ऐल्कोहॉल का निर्जलीकरण करके हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण बनता है और उन्हें सीधे ही गैसोलीन (पेट्रोल) में परिवर्तित कर देता है।
जहाँ x, 5 से 10 के मध्य परिवर्तित होता है। ZSM-5 का विस्तारित नाम Zeolite Sieve of Molecular Porosity-5' है।
In simple words: जिओलाइट जलयोजित ऐलुमिनो-सिलिकेट होते हैं जिनकी छिद्रपूर्ण त्रिविमीय संरचना होती है। इनके छिद्रों का आकार विशिष्ट होता है, जिससे ये आकृति-वरणात्मक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करते हैं। पेट्रोलियम उद्योग में हाइड्रोकार्बन के भंजन और ऐल्कोहॉल को गैसोलीन में बदलने में इनका व्यापक उपयोग होता है।
🎯 Exam Tip: जिओलाइट की संरचना (त्रिविमीय नेटवर्क, सरन्ध्र), उनके आकार-वरणात्मक उत्प्रेरण की क्षमता और पेट्रोरसायन उद्योग में उनके अनुप्रयोगों को समझाना महत्वपूर्ण है।
Question 22.आकृति वरणात्मक उत्प्रेरण क्या है?
Answer: आकृति वरणात्मक उत्प्रेरण वह उत्प्रेरकीय क्रिया होती है जो उत्प्रेरक की छिद्र संरचना तथा अभिकारक/उत्पाद अणुओं के आकार पर निर्भर करती है। हाइड्रोकार्बनों के भंजन में जीओलाइट (ZSM-5) का उपयोग आकृति वरणात्मक उत्प्रेरण का उदाहरण है।
In simple words: आकृति वरणात्मक उत्प्रेरण वह प्रक्रिया है जहाँ उत्प्रेरक की छिद्रों की संरचना और अभिकारक/उत्पाद अणुओं के आकार के अनुसार ही अभिक्रिया होती है। इसका एक प्रमुख उदाहरण जिओलाइट (ZSM-5) द्वारा हाइड्रोकार्बनों का भंजन है।
🎯 Exam Tip: आकृति वरणात्मक उत्प्रेरण की परिभाषा और जिओलाइट (ZSM-5) को इसके उदाहरण के रूप में स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
Question 23.निम्नलिखित पदों (शब्दों) को समझाइए -
1. विद्युत कण-संचलन
2. स्कन्दन
3. अपोहन
4. टिण्डल प्रभाव ।
Answer:1. विद्युत कण-संचलन (Electrophoresis) – कोलॉइडी कणों पर धनात्मक़ या ऋणात्मक विद्युत आवेश होता है। जिससे ये कण विद्युत क्षेत्र के प्रभाव में विपरीत आवेशित इलेक्ट्रोड की ओर अभिगमन करते हैं। विद्युत क्षेत्र में कोलॉइडी कणों के विपरीत आवेशित इलेक्ट्रोड की ओर अभिगमन (migration) की घटना को विद्युत कण-संचलन कहते हैं। कोलॉइडी कणों की कैथोड की ओर की गति को धन कण-संचलन (cataphoresis) तथा ऐनोड की ओर गति को ऋण कण-संचलन (anaphoresis) कहते हैं जैसे फेरिक हाइड्रॉक्साइड सॉल के कोलॉइडी कण धनावेशित होते हैं और ये कैथोड की ओर गति करते हैं। इसकी सहायता से कोलॉइडी विलयनों में कोलॉइडी कणों पर आवेश का अध्ययन किया जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र विद्युत कण-संचलन प्रक्रिया को दर्शाता है, जहाँ कोलॉइडी कण विद्युत क्षेत्र में विपरीत आवेशित इलेक्ट्रोड की ओर अभिगमन करते हैं। एक U-आकार की नली में कोलॉइडी विलयन और दो इलेक्ट्रोडों को दिखाया गया है, जहाँ कणों का संचलन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
2. स्कन्दन (Coagulation) – किसी कोलॉइडी विलयन अर्थात् सॉल को स्थायी बनाने के लिए उसमें अल्प-मात्रा में विद्युत-अपघटय मिलाना आवश्यक होता है, परन्तु विद्युत अपघटय की अधिक मात्रा कोलॉइडी विलयन का अवक्षेपण कर देती है। कोलॉइड विलयनों को विद्युत-अपघटच के विलयनों द्वारा अवक्षेपित करने की क्रिया को स्कन्दन कहते हैं। इस क्रिया में कोलॉइडी कणों की सतह पर विद्युत-अपघटय से उनकी प्रकृति के विपरीत आवेशित आयन अधिशोषित हो जाता है। जिससे उनका आकार बढ़ जाता है, फलस्वरूप वे अवक्षेपित (स्कन्दित) हो जाते हैं; जैसे- \( \text{AS}_2\text{S}_3 \) सॉल में विद्युत-अपघटय \( \text{BaCl}_2 \) डालने पर, \( \text{AS}_2\text{S}_3 \) स्कन्दित (अवक्षेपित) हो जाता है क्योंकि विद्युत अपघटय (\( \text{BaCl}_2 \implies \text{Ba}^{2+} + 2\text{Cl}^- \)) के \( \text{Ba}^{2+} \) आयन \( \text{AS}_2\text{S}_3 \) के ऋणात्मक आवेश को उदासीन कर देते हैं, फलस्वरूप उसका आकार बढ़ जाता है और वह अवक्षेपित हो जाता है।
3. अपोहन (Dialysis) – यह विधि इस तथ्य पर आधारित है कि घुलित पदार्थों के अणु व आयन चर्म-पत्र झिल्ली (parchment paper) में से सरलतापूर्वक विसरित हो जाते हैं, जबकि कोलॉइडी कण उसमें से विसरित नहीं हो पाते या कठिनाई से विसरित होते हैं।
चर्म- पत्र झिल्ली द्वारा कोलॉइडी विलयन में घुलित पदार्थों को पृथक् करने की विधि को अपोहन (dialysis) कहते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र अपोहन प्रक्रिया को दर्शाता है, जहाँ एक चर्म-पत्र थैली में कोलॉइडी विलयन को बहते हुए जल में रखा गया है। घुलित अशुद्धि के कण चर्म-पत्र झिल्ली से बाहर निकल जाते हैं, जबकि कोलॉइडी कण थैली के अंदर रहते हैं, जिससे विलयन शुद्ध होता है।
In simple words: विद्युत कण-संचलन कोलॉइडी कणों का विद्युत क्षेत्र में विपरीत इलेक्ट्रोड की ओर चलना है। स्कन्दन विद्युत-अपघट्य द्वारा कोलॉइडी कणों को जमाकर अवक्षेप बनाना है। अपोहन एक चर्म-पत्र झिल्ली का उपयोग करके कोलॉइडी विलयन से छोटे घुलित कणों को अलग करने की प्रक्रिया है। टिंडल प्रभाव प्रकाश का प्रकीर्णन है जब वह कोलॉइडी विलयन से गुजरता है।
🎯 Exam Tip: इन चारों शब्दों की परिभाषाओं को स्पष्ट रूप से लिखें, और यदि संभव हो तो प्रत्येक के पीछे के मूल सिद्धांत को भी संक्षेप में बताएं। वैद्युत-कण संचलन के प्रकार (कैटोफोरेसिस, एनाफोरेसिस) का उल्लेख करना भी महत्वपूर्ण है।
Question 24. इमल्शनों (पायस) के चार उपयोग लिखिए।
Answer: इमल्शनों (पायस) के चार उपयोग निम्नलिखित हैं -
1. फेन प्लवन प्रक्रम द्वारा सल्फाइड अयस्क का सान्द्रण इमल्सीफिकेशन पर आधारित होता है।
2. साबुन तथा डिटर्जेन्ट की शोधन क्रिया गन्दगी तथा साबुन के विलयन के मध्य इमल्शन बनने के कारण ही होती है।
3. दूध जल में वसा का इमल्शन होता है।
4. विभिन्न सौन्दर्य प्रसाधन; जैसे- क्रीम, हेयर डाई, शैम्पू आदि, अनेक औषधियाँ तथा लेप आदि इमल्शन होते हैं।
इमल्शन के रूप में ये अधिक प्रभावी होते हैं।
In simple words: इमल्शन का उपयोग अयस्क के सांद्रण, साबुन की सफाई क्रिया, दूध और विभिन्न सौंदर्य प्रसाधनों जैसे क्रीम, हेयर डाई, शैंपू, दवाइयों और लेपों में होता है, जिससे वे अधिक प्रभावी बनते हैं।
🎯 Exam Tip: इस प्रश्न में इमल्शन के व्यावहारिक उपयोगों को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दैनिक जीवन और औद्योगिक प्रक्रियाओं में इनके महत्व को दर्शाता है।
Question 25. मिसेल क्या हैं? मिसेल निकाय का एक उदाहरण दीजिए।
Answer: मिसेल (Micelles) - कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जो कम सान्द्रताओं पर सामान्य प्रबल विद्युत-अपघटयों के समान व्यवहार करते हैं, परन्तु उच्च सान्द्रताओं पर कणों का पुंज बनने के कारण कोलॉइड के समान व्यवहार करते हैं। इस प्रकार के पुंजित कण मिसेल कहलाते हैं। उदाहरणार्थ- जल परिक्षेपण माध्यम में साबुन के अणुओं के स्टिएरेट की विभिन्न इकाइयाँ पुंजित कोलॉइडी आकार के कण बनाती हैं जो मिसेल कहलाते हैं। मिसेल को सहचारी कोलॉइड भी कहते हैं। जल में साबुन का सान्द्र विलयन एक मिसेल निकाय कहलाता है।
In simple words: मिसेल ऐसे कणों के पुंज होते हैं जो कम सांद्रता पर विद्युत-अपघट्यों की तरह व्यवहार करते हैं लेकिन उच्च सांद्रता पर कोलॉइड जैसे व्यवहार करते हैं। साबुन के अणुओं का जल में एकत्रित होकर कोलॉइडी आकार के कण बनाना इसका एक उदाहरण है, जिसे सहचारी कोलॉइड भी कहते हैं।
🎯 Exam Tip: मिसेल की परिभाषा में सांद्रता के प्रभाव और उसके सहचारी कोलॉइड प्रकृति का उल्लेख करना आवश्यक है। उदाहरण के साथ स्पष्टीकरण अंक प्राप्त करने में सहायक होगा।
Question 26. निम्न पदों को उचित उदाहरण सहित समझाइए -
1. ऐल्कोसॉल
2. ऐरोसॉल
3. हाइड्रोसॉल ।
Answer:
1. ऐल्कोसॉल (Alcosol) - वह कोलॉइड जिसमें परिक्षेपण माध्यम के रूप में ऐल्कोहॉल का प्रयोग किया जाता है, ऐल्कोसॉल कहलाता है। उदाहरणार्थ- एथिल ऐल्कोहॉल में सेलुलोस नाइट्रेट का कोलॉइडी सॉल (कोलोडियन)।
2. ऐरोसॉल (Aerosol) - वह कोलॉइड जिसमें परिक्षेपण माध्यम वायु या गैस हो, ऐरोसॉल कहलाता है। उदाहरणार्थ- कोहरा ।
3. हाइड्रोसॉल (Hydrosol) - वह कोलॉइड जिसमें परिक्षेपण माध्यम जल हो, हाइड्रोसॉल कहलाता है। उदाहरणार्थ- स्टार्च सॉल ।
In simple words: ऐल्कोसॉल में परिक्षेपण माध्यम अल्कोहल होता है (जैसे कोलोडियन), ऐरोसॉल में परिक्षेपण माध्यम वायु या गैस होती है (जैसे कोहरा), और हाइड्रोसॉल में परिक्षेपण माध्यम जल होता है (जैसे स्टार्च सॉल)।
🎯 Exam Tip: प्रत्येक पद की स्पष्ट परिभाषा और उसके संबंधित उदाहरण देना सुनिश्चित करें, क्योंकि यह कोलॉइडी वर्गीकरण के आधार को दर्शाता है।
Question 27. “कोलॉइड एक पदार्थ नहीं पदार्थ की एक अवस्था है।' इस कथन पर टिप्पणी कीजिए ।
Answer: कोई पदार्थ (ठोस, द्रव या गैस) विशेष विधियों के प्रयोग से कोलॉइडी अवस्था में परिवर्तित किया जा सकता है। उदाहरणार्थ- NaCl जल में वास्तविक विलयन (true solution) बनाता है लेकिन बेन्जीन में कोलॉइडी विलयन बनाता है। साबुन ऐल्कोहॉल में वास्तविक विलयन लेकिन जल में कोलॉइडी विलयन बनाता है।
In simple words: यह कथन दर्शाता है कि 'कोलॉइड' किसी पदार्थ की एक विशिष्ट अवस्था है, न कि स्वयं एक पदार्थ, क्योंकि विभिन्न पदार्थ (ठोस, द्रव, गैस) विशेष प्रक्रियाओं द्वारा कोलॉइडी अवस्था में परिवर्तित हो सकते हैं, जैसे नमक जल में वास्तविक विलयन और बेंजीन में कोलॉइडी विलयन बनाता है।
🎯 Exam Tip: उदाहरणों का उपयोग करके स्पष्ट करें कि कैसे एक ही पदार्थ विभिन्न विलायकों में कोलॉइडी और वास्तविक विलयन दोनों बना सकता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि कोलॉइड एक अवस्था है।
परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. उत्प्रेरण का अधिशोषण सिद्धान्त उपयोगी है -
(i) ठोस उत्प्रेरकों में
(ii) गैसीय उत्प्रेरकों में
(iii) द्रव उत्प्रेरकों में
(iv) सभी में
Answer: (i) ठोस उत्प्रेरकों में
In simple words: अधिशोषण सिद्धांत ठोस उत्प्रेरकों की क्रियाविधि को समझाने में सबसे अधिक उपयोगी है, जहाँ अभिकारक उत्प्रेरक की सतह पर अधिशोषित होते हैं।
🎯 Exam Tip: यह समझना महत्वपूर्ण है कि अधिशोषण सिद्धांत मुख्य रूप से विषम उत्प्रेरण पर लागू होता है, जिसमें उत्प्रेरक ठोस अवस्था में होता है।
Question 2. सम्पर्क विधि द्वारा H2SO4 के निर्माण में प्रयुक्त उत्प्रेरक है -
(i) Ni
(ii) Pt
(iii) Fe
(iv) Cu
Answer: (ii) Pt
In simple words: सल्फ्यूरिक अम्ल के निर्माण की संपर्क विधि में प्लेटिनम (Pt) का उपयोग उत्प्रेरक के रूप में किया जाता है।
🎯 Exam Tip: संपर्क विधि में \( \text{SO}_2 \) से \( \text{SO}_3 \) बनाने के लिए \( \text{Pt} \) या \( \text{V}_2\text{O}_5 \) उत्प्रेरक का उपयोग किया जाता है; विकल्पों में से \( \text{Pt} \) सही उत्तर है।
Question 3. अम्लीय KMnO4 द्वारा ऑक्सैलिक अम्ल के ऑक्सीकरण में उत्प्रेरक होता है -
(i) MnO4-
(ii) KMnO4
(iii) H+
(iv) Mn2+
Answer: (iv) Mn2+
In simple words: अम्लीय पोटेशियम परमैंगनेट द्वारा ऑक्सेलिक अम्ल के ऑक्सीकरण अभिक्रिया में, \( \text{Mn}^{2+} \) आयन स्व-उत्प्रेरक के रूप में कार्य करते हैं।
🎯 Exam Tip: यह अभिक्रिया स्व-उत्प्रेरण का एक क्लासिक उदाहरण है, जहाँ उत्पाद स्वयं अभिक्रिया की दर को बढ़ाता है।
Question 4. जल गैस से मेथिल ऐल्कोहॉल के निर्माण में प्रयोग किया जाने वाला उत्प्रेरक है
(i) CuO + NiO + Cr2O3
(ii) CuO +ZnO + Cr2O3
(iii) Al2O3 + CuO
(iv) CuO + Fe2O3
Answer: (ii) CuO + ZnO+ Cr2O3
In simple words: जल गैस से मेथिल अल्कोहल बनाने की प्रक्रिया में कॉपर ऑक्साइड, जिंक ऑक्साइड और क्रोमियम ऑक्साइड का मिश्रण उत्प्रेरक के रूप में उपयोग किया जाता है।
🎯 Exam Tip: विशिष्ट औद्योगिक प्रक्रियाओं में उपयोग किए जाने वाले उत्प्रेरकों के संघटन को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 5. पदार्थ जो उत्प्रेरक की क्रियाशीलता को नष्ट अथवा कम कर देता है, कहलाता है -
(i) ऋणात्मक उत्प्रेरक
(ii) मंदक
(iii) वर्धक
(iv) उत्प्रेरक विष
Answer: (iv) उत्प्रेरक विष
In simple words: जो पदार्थ उत्प्रेरक की गतिविधि को कम या समाप्त कर देता है, उसे उत्प्रेरक विष कहते हैं।
🎯 Exam Tip: उत्प्रेरक विष उत्प्रेरक की सक्रिय साइटों से जुड़कर उसकी दक्षता को कम करता है, जबकि मंदक अक्सर एक सामान्य निषेधकर्ता होता है।
Question 6. प्लेटिनम उत्प्रेरक के लिए निम्नलिखित में से कौन विष का कार्य करता है?
(i) SO2
(ii) NO
(iii) As2O3
(iv) H3PO4
Answer: (iii) As2O3
In simple words: आर्सेनिक ट्राइऑक्साइड (\( \text{As}_2\text{O}_3 \)) प्लेटिनम उत्प्रेरक के लिए एक विष के रूप में कार्य करता है, जिससे उसकी दक्षता कम हो जाती है।
🎯 Exam Tip: उत्प्रेरक विष अक्सर विशिष्ट होते हैं; इस मामले में, आर्सेनिक यौगिक प्लेटिनम उत्प्रेरक को निष्क्रिय कर देते हैं।
Question 7. रासायनिक अभिक्रिया 2KClO3 + [MnO2] → 2KCl + 3O2 + [MnO2] । उदाहरण है
(i) समांग उत्प्रेरण का
(ii) विषमांग उत्प्रेरण का
(iii) ऋणात्मक उत्प्रेरण का
(iv) प्रेरित उत्प्रेरण का
Answer: (i) समांग उत्प्रेरण का
In simple words: यह अभिक्रिया समांग उत्प्रेरण का उदाहरण है क्योंकि \( \text{MnO}_2 \) (उत्प्रेरक) और \( \text{KClO}_3 \) (अभिकारक) दोनों ही एक ही भौतिक अवस्था (ठोस) में हैं, लेकिन यहां \( \text{MnO}_2 \) कोष्ठक में लिखा है जो यह दर्शाता है कि यह ठोस अवस्था में है और अभिक्रिया भी ठोस-ठोस या ठोस-गैस के बीच है। यह वास्तव में विषम उत्प्रेरण का एक उदाहरण है। यदि \( \text{MnO}_2 \) को ठोस उत्प्रेरक माना जाता है तो। लेकिन इस विशेष प्रश्न में, अक्सर जब कोष्ठक में उत्प्रेरक का द्रव्यमान नहीं दिया होता है, और वह रासायनिक समीकरण के साथ ही लिखा होता है, तो इसे समांग माना जा सकता है यदि वे एक ही चरण में हों। हालांकि, \( \text{KClO}_3 \) ठोस है और \( \text{MnO}_2 \) भी ठोस है, तो यह विषम उत्प्रेरण होना चाहिए। दिए गए उत्तर के अनुसार (i) समांग उत्प्रेरण का है। यदि \( \text{MnO}_2 \) का कोई जलीय या द्रव अवस्था में विलयन होता तो समांग उत्प्रेरण होता। चूंकि, \( \text{KClO}_3 \) ठोस और \( \text{MnO}_2 \) ठोस हैं, तो यह विषम उत्प्रेरण होना चाहिए। दिए गए उत्तर (i) के अनुसार यह तभी संभव है जब \( \text{MnO}_2 \) की क्रियाविधि ठोस उत्प्रेरक की तरह न हो, या प्रश्न में कुछ अस्पष्टता हो। सामान्यतः, \( \text{KClO}_3 \) के अपघटन को \( \text{MnO}_2 \) उत्प्रेरित करता है, यह विषम उत्प्रेरण है। लेकिन, दिए गए विकल्प और पूर्व-निर्धारित उत्तर के अनुसार, (i) को चुना गया है।
🎯 Exam Tip: उत्प्रेरण के प्रकार (समांग या विषमांग) को निर्धारित करने के लिए अभिकारकों और उत्प्रेरक की भौतिक अवस्थाओं का ध्यानपूर्वक अवलोकन करें। यदि सभी एक ही प्रावस्था में हैं, तो यह समांग है; अन्यथा, यह विषमांग है। हालांकि, यदि विकल्पों में समांग उत्प्रेरण दिया है और संदर्भ स्पष्ट नहीं है तो यह भ्रमित कर सकता है।
Question 8. निम्नलिखित प्रकार के उत्प्रेरणों में से किसे अधिशोषण सिद्वान्त द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है?
(i) समांगी उत्प्रेरण
(ii) विषमांगी उत्प्रेरण
(iii) एन्जाइम उत्प्रेरण
(iv) अम्ल-क्षार उत्प्रेरण
Answer: (ii) विषमांगी उत्प्रेरण
In simple words: अधिशोषण सिद्धांत मुख्य रूप से विषम उत्प्रेरण को समझाने के लिए उपयोग किया जाता है, जहाँ अभिकारक ठोस उत्प्रेरक की सतह पर अधिशोषित होते हैं।
🎯 Exam Tip: अधिशोषण सिद्धांत में, उत्प्रेरक की सतह पर अभिकारकों का अधिशोषण अभिक्रिया के लिए महत्वपूर्ण होता है, जो विषम उत्प्रेरण का मुख्य आधार है।
Question 9. अभिक्रिया CH2 = CH2 (g) + H2 (g) \( \xrightarrow { Ni } \) CH3 - CH3 (g) में Ni उदाहरण है -
(i) विषमांग उत्प्रेरक का
(ii) समांग उत्प्रेरक का
(iii) ऋणात्मक उत्प्रेरक का
(iv) स्व-उत्प्रेरक का
Answer: (i) विषमांग उत्प्रेरक का
In simple words: इस अभिक्रिया में एथीन और हाइड्रोजन गैसें हैं, जबकि निकिल ठोस अवस्था में उत्प्रेरक है, इसलिए यह विषम उत्प्रेरण का उदाहरण है क्योंकि अभिकारक और उत्प्रेरक अलग-अलग भौतिक अवस्थाओं में हैं।
🎯 Exam Tip: विषम उत्प्रेरण में, उत्प्रेरक और अभिकारक विभिन्न भौतिक अवस्थाओं में होते हैं, जो इस हाइड्रोजनीकरण अभिक्रिया में स्पष्ट है।
Question 10. निम्न में से कौन-सा कथन उत्प्रेरक के लिए सही नहीं है?
(i) यह अभिक्रिया के अन्त में अपरिवर्तित रहता है
(ii) उत्क्रमणीय अभिक्रिया में यह साम्य को परिवर्तित नहीं करता है
(iii) यह अभिक्रिया को प्रारम्भ कर सकता है।
(iv) कभी-कभी उत्प्रेरक अभिक्रियाओं के लिए बहुत विशिष्ट होते हैं
Answer: (iii) यह अभिक्रिया को प्रारम्भ कर सकता है।
In simple words: उत्प्रेरक अभिक्रिया को शुरू नहीं कर सकते; वे केवल अभिक्रिया की दर को प्रभावित करते हैं, चाहे वह बढ़ाएं या घटाएं।
🎯 Exam Tip: उत्प्रेरक केवल अभिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा को कम करके उसकी दर को बढ़ाते या घटाते हैं, लेकिन वे अभिक्रिया को शुरू नहीं करते हैं या साम्यावस्था को प्रभावित नहीं करते हैं।
Question 11. किसी विलायक में परिक्षिप्त पदार्थ के कणों का आकार 50 Å से 2000 Å की परास में है। विलयन होगा -
(i) निलम्बन
(ii) वास्तविक विलयन
(iii) कोलॉइडी विलयन
(iv) संतृप्त विलयन
Answer: (iii) कोलॉइडी विलयन
In simple words: कणों का आकार 50 Å से 2000 Å (या 5 nm से 200 nm) की परास कोलॉइडी विलयनों की विशिष्ट पहचान है।
🎯 Exam Tip: कण आकार के आधार पर विलयनों को वर्गीकृत करते समय, वास्तविक विलयन (<1 nm), कोलॉइडी विलयन (1-200 nm), और निलंबन (>200 nm) की सीमाओं को याद रखना महत्वपूर्ण है।
Question 12. झाग या फेन किस प्रकार का कोलॉइडी विलयन है?
(i) गैस में द्रव
(ii) द्रव में गैस
(iii) द्रव में द्रव
(iv) गैस में ठोस
Answer: (ii) द्रव में गैस
In simple words: झाग या फेन एक प्रकार का कोलॉइडी विलयन है जिसमें गैस को द्रव में परिक्षिप्त किया जाता है।
🎯 Exam Tip: परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम के आधार पर कोलॉइडी विलयनों के वर्गीकरण को समझना आवश्यक है। झाग में, गैस परिक्षिप्त प्रावस्था है और द्रव परिक्षेपण माध्यम है।
Question 13. कोहरा निम्न कोलॉइडी अवस्था का उदाहरण है -
(i) गैस में द्रव परिक्षिप्त
(ii) गैस में गैस परिक्षिप्त
(iii) गैस में ठोस परिक्षिप्त
(iv) द्रव में ठोस परिक्षिप्त
Answer: (i) गैस में द्रव परिक्षिप्त
In simple words: कोहरा एक कोलॉइडी सिस्टम है जहाँ द्रव कण गैस में परिक्षिप्त होते हैं।
🎯 Exam Tip: कोहरे का सही वर्गीकरण गैस में द्रव के रूप में है, जहाँ हवा परिक्षेपण माध्यम और पानी की बूंदें परिक्षिप्त प्रावस्था हैं।
Question 14. निम्न में द्रव-विरोधी कोलॉइड है -
(i) गोंद
(ii) गंधक
(iii) जिलेटिन
(iv) स्टार्च
Answer: (ii) गंधक
In simple words: गंधक एक द्रव-विरोधी कोलॉइड का उदाहरण है, क्योंकि यह सीधे विलायक में घुलनशील नहीं होता और इसके स्थायित्व के लिए विशेष विधियों की आवश्यकता होती है।
🎯 Exam Tip: द्रव-विरोधी कोलॉइड वे होते हैं जो परिक्षेपण माध्यम के प्रति कम आकर्षण रखते हैं और आसानी से स्कंदित हो जाते हैं, जबकि गोंद, जिलेटिन और स्टार्च द्रव-रागी होते हैं।
Question 15. कोलॉइडी कणों का साइज (आकार) लगभग किस रेंज में है?
(i) 1 Å से 200 Å
(ii) 50 Å से 2000 Å
(iii) 500 Å से 2000 Å
(iv) इनमें से कोई नहीं
Answer: (ii) 50 Å से 2000 Å
In simple words: कोलॉइडी कणों का आकार 1 nm से 200 nm (या 10 Å से 2000 Å) के बीच होता है, जिससे वे वास्तविक विलयन और निलम्बन के कणों से भिन्न होते हैं।
🎯 Exam Tip: कोलॉइडी कणों का आकार उनकी अद्वितीय विशेषताओं जैसे टिंडल प्रभाव और ब्राउनियन गति के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 16. जब वायु परिक्षेपण माध्यम होती है तो बना हुआ सॉल कहलाता है -
(i) एल्कोसॉल
(ii) हाइड्रोसॉल
(iii) बेन्जोसॉल
(iv) एरोसॉल
Answer: (iv) एरोसॉल
In simple words: यदि वायु या कोई गैस परिक्षेपण माध्यम के रूप में कार्य करती है, तो बनने वाले कोलॉइडी विलयन को ऐरोसॉल कहते हैं।
🎯 Exam Tip: कोलॉइडी विलयनों के नामकरण में परिक्षेपण माध्यम का नाम महत्वपूर्ण होता है; 'ऐरो' शब्द वायु या गैस को दर्शाता है।
Question 17. निम्नलिखित में कौन प्राकृतिक कोलॉइड नहीं है?
(i) रक्त
(ii) NaCl
(iii) शर्करा
(iv) RCOONa
Answer: (iv) RCOONa
In simple words: \( \text{RCOONa} \) (साबुन) एक प्राकृतिक कोलॉइड नहीं है, बल्कि एक संश्लेषित पदार्थ है जो मिसेल बनाता है, जबकि रक्त, \( \text{NaCl} \) और शर्करा प्राकृतिक पदार्थों से संबंधित हैं, हालांकि \( \text{NaCl} \) और शर्करा वास्तविक विलयन बनाते हैं, कोलॉइड नहीं। प्रश्न 'प्राकृतिक कोलॉइड नहीं है' के बारे में पूछ रहा है, और \( \text{RCOONa} \) स्पष्ट रूप से एक मानव-निर्मित पदार्थ है जो कोलॉइडी गुण प्रदर्शित करता है। \( \text{NaCl} \) और शर्करा प्राकृतिक होते हुए भी कोलॉइड नहीं हैं।
🎯 Exam Tip: प्राकृतिक बनाम संश्लेषित कोलॉइड के बीच अंतर को जानें। साबुन जैसे पदार्थ, हालांकि कोलॉइडी व्यवहार प्रदर्शित करते हैं, मानव निर्मित होते हैं।
Question 18. औषधियाँ किस अवस्था में सर्वाधिक प्रभावी होती हैं?
(i) कोलॉइड
(ii) ठोस
(iii) विलयन
(iv) इनमें से कोई नहीं
Answer: (i) कोलॉइड
In simple words: कोलॉइडी अवस्था में औषधियाँ सर्वाधिक प्रभावी होती हैं क्योंकि इस अवस्था में उनका अवशोषण शरीर में अधिक सुगमता से होता है।
🎯 Exam Tip: औषधियों की कोलॉइडी प्रकृति उनके बड़े पृष्ठीय क्षेत्रफल और धीमी गति से अवशोषण के कारण उनके प्रभाव को बढ़ाती है।
Question 19. क्रिस्टलाभ, कोलॉइड से भिन्न है -
(i) वैद्युतीय व्यवहार में
(ii) कणों की प्रकृति में
(iii) कणों के आकार में
(iv) विलेयता में
Answer: (iii) कणों के आकार में
In simple words: क्रिस्टलाभ और कोलॉइड के बीच मुख्य अंतर उनके कणों के आकार में होता है, क्रिस्टलाभ के कण बहुत छोटे होते हैं जबकि कोलॉइड के कण उनसे बड़े होते हैं लेकिन निलंबन से छोटे होते हैं।
🎯 Exam Tip: क्रिस्टलाभ में कणों का आकार वास्तविक विलयन के समान होता है, जबकि कोलॉइड के कण 1-200 nm के दायरे में आते हैं।
Question 20. कोलॉइडों को शुद्ध करने की विधि है -
(i) पेप्टीकरण
(ii) स्कन्दन
(iii) अपोहन
(iv) ब्रेडिग की आर्क विधि
Answer: (iii) अपोहन
In simple words: अपोहन वह प्रक्रिया है जिसका उपयोग कोलॉइडी विलयनों से अशुद्धियों को हटाने के लिए किया जाता है, जिसमें छोटे आयन और अणु एक अर्धपारगम्य झिल्ली के माध्यम से विसरित होते हैं, जबकि कोलॉइडी कण पीछे रह जाते हैं।
🎯 Exam Tip: अपोहन विधि में, कोलॉइडी कणों को अशुद्धियों से अलग करने के लिए चर्म-पत्र झिल्ली के माध्यम से विसरण के सिद्धांत का उपयोग किया जाता है।
Question 21. ब्राउनियन गति का कारण है -
(i) द्रव अवस्था में तापमान का उतार-चढ़ाव
(ii) कणों का आकार
(iii) परिक्षेपण माध्यम के अणुओं का कोलॉइडी कणों पर संघात
(iv) कोलॉइडी कणों पर आवेश का आकर्षण व प्रतिकर्षण
Answer: (iii) परिक्षेपण माध्यम के अणुओं का कोलॉइडी कणों पर संघात
In simple words: ब्राउनियन गति परिक्षेपण माध्यम के अणुओं के कोलॉइडी कणों से लगातार, असमान टक्करों के कारण होती है, जिससे कोलॉइडी कणों में अनियमित गति होती है।
🎯 Exam Tip: ब्राउनियन गति की व्याख्या करते समय, परिक्षेपण माध्यम के अणुओं द्वारा कोलॉइडी कणों पर असमान बल के प्रभाव को उजागर करना महत्वपूर्ण है।
Question 22. फेरिक हाइड्रॉक्साइड के ताजे अवक्षेप में FeCl3 का तनु विलयन मिलाने पर कोलॉइडी विलयन प्राप्त होता है। इस परिघटना को कहते हैं -
(i) स्कन्दन
(ii) पेप्टीकरण
(iii) रक्षण
(iv) अपोहन
Answer: (ii) पेप्टीकरण
In simple words: पेप्टीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें एक ताजा अवक्षेप को विद्युत-अपघट्य (इस मामले में \( \text{FeCl}_3 \)) के साथ हिलाकर कोलॉइडी विलयन में परिवर्तित किया जाता है।
🎯 Exam Tip: पेप्टीकरण स्कंदन के विपरीत होता है, जहाँ अवक्षेप से कोलॉइडी विलयन बनाया जाता है, जबकि स्कंदन में कोलॉइडी विलयन से अवक्षेप बनता है।
Question 23. स्वर्ण संख्या सम्बन्धित है -
(i) द्रव-स्नेही कोलॉइड से (रक्षी कोलॉइड से)
(ii) द्रव-विरोधी कोलॉइड से
(iii) पायस से
(iv) जैल से
Answer: (i) द्रव-स्नेही कोलॉइड से (रक्षी कोलॉइड से)
In simple words: स्वर्ण संख्या रक्षी कोलॉइडों (द्रव-स्नेही कोलॉइड) की रक्षण क्षमता को मापने के लिए उपयोग की जाती है, जो यह दर्शाती है कि वे द्रव-विरोधी कोलॉइड को कितनी अच्छी तरह स्कंदन से बचाते हैं।
🎯 Exam Tip: स्वर्ण संख्या की परिभाषा और उसका महत्व (रक्षण क्षमता का निर्धारण) स्पष्ट होना चाहिए। जितनी कम स्वर्ण संख्या, उतनी अधिक रक्षण क्षमता।
Question 24. फेरिक हाइड्रॉक्साइड सॉल (धनात्मक आवेशित) का स्कन्दन कराने के लिए सबसे अधिक प्रभावी वैद्युत-अपघटय है -
(i) KBr
(ii) K2SO4
(iii) K2CrO4
(iv) K4[Fe(CN)6]
Answer: (iv) K4[Fe(CN)6]
In simple words: हार्डी-शुल्जे नियम के अनुसार, धनात्मक आवेशित फेरिक हाइड्रॉक्साइड सॉल को स्कंदित करने के लिए सबसे प्रभावी ऋणायन वह होगा जिसकी संयोजकता सबसे अधिक हो, यानी \( \text{[Fe(CN)}_6]^{4-} \) का।
🎯 Exam Tip: हार्डी-शुल्जे नियम को लागू करें, जिसमें स्कंदन क्षमता विपरीत आवेश वाले आयन की संयोजकता की चौथी शक्ति पर निर्भर करती है। सबसे अधिक संयोजकता वाला आयन सबसे प्रभावी होगा।
Question 25. A, B, C तथा D सॉल की गोल्ड संख्या क्रमशः 0.001, 0.15, 20 तथा 25 है। सबसे प्रभावी रक्षी कोलॉइड है -
(i) A
(ii) B
(iii) C
(iv) D
Answer: (i) A
In simple words: जिस रक्षी कोलॉइड की स्वर्ण संख्या सबसे कम होती है, वह सबसे अधिक प्रभावी रक्षी कोलॉइड होता है; यहाँ 0.001 सबसे कम है, इसलिए A सबसे प्रभावी है।
🎯 Exam Tip: स्वर्ण संख्या और रक्षण क्षमता के बीच व्युत्क्रम संबंध को याद रखें: कम स्वर्ण संख्या का अर्थ है अधिक रक्षण क्षमता।
Question 26. आर्सेनियस सल्फाइड के कोलॉइडी विलयन के स्कन्दन में सबसे प्रभावी विलयन है -
(i) NaCl
(ii) Na2SO4
(iii) Na3PO4
(iv) BaCl2
Answer: (iv) BaCl2
In simple words: ऋणावेशित आर्सेनियस सल्फाइड सॉल को स्कंदित करने के लिए, सबसे प्रभावी विद्युत-अपघट्य वह होगा जिसमें सबसे अधिक संयोजकता वाला धनायन हो, जो यहाँ \( \text{Ba}^{2+} \) ( \( \text{BaCl}_2 \)) है।
🎯 Exam Tip: हार्डी-शुल्जे नियम का उपयोग करें: विपरीत आवेशित आयन की स्कंदन क्षमता उसकी संयोजकता के बढ़ने के साथ बढ़ती है। \( \text{Ba}^{2+} \) की संयोजकता \( \text{Na}^+ \) से अधिक है।
Question 27. ऋणावेशित आर्सेनियस सल्फाइड के कोलॉइडी विलयन को स्कंदित करने के लिए सबसे अधिक प्रभावी धनायन है -
(i) Ti4+
(ii) Mg2+
(iii) Al3+
(iv) K+
Answer: (i) Ti4+
In simple words: ऋणावेशित आर्सेनियस सल्फाइड को स्कंदित करने के लिए सबसे प्रभावी धनायन वह होगा जिसकी संयोजकता अधिकतम हो, और इन विकल्पों में \( \text{Ti}^{4+} \) की संयोजकता सबसे अधिक है।
🎯 Exam Tip: हार्डी-शुल्जे नियम के अनुसार, आयन की संयोजकता बढ़ने के साथ उसकी स्कंदन शक्ति बढ़ती है।
Question 28. दूध एक उदाहरण है -
(i) झाग का
(ii) पायस का
(iii) जैल का
(iv) सॉल का
Answer: (ii) पायस का
In simple words: दूध एक पायस का उदाहरण है, जिसमें वसा की बूंदें पानी में परिक्षिप्त होती हैं, यानी द्रव-द्रव प्रकार का कोलॉइडी विलयन।
🎯 Exam Tip: पायस द्रव में द्रव के परिक्षेपण को दर्शाता है, और दूध इसका एक सामान्य और महत्वपूर्ण उदाहरण है।
Question 29. द्रव ऐरोसॉल है -
(i) फेनित क्रीम
(ii) धुआँ
(iii) दूध
(iv) धुन्ध
Answer: (iv) धुन्ध
In simple words: धुंध एक द्रव ऐरोसॉल है, क्योंकि इसमें द्रव (पानी की बूंदें) गैस (हवा) में परिक्षिप्त होती हैं।
🎯 Exam Tip: ऐरोसॉल में, परिक्षेपण माध्यम गैस होता है। यदि परिक्षिप्त प्रावस्था द्रव है, तो यह द्रव ऐरोसॉल है; यदि ठोस है, तो ठोस ऐरोसॉल है।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. अधिशोषण, अधिशोष्य तथा अधिशोषक से आप क्या समझते हैं?
Answer: अधिशोषण - किसी ठोस अथवा द्रव के पृष्ठ द्वारा किसी पदार्थ के अणुओं को आकर्षित और धारित करने की परिघटना जिसके कारण अणुओं की पृष्ठ पर सान्द्रता में वृद्धि हो जाती है, अधिशोषण कहलाती है।
अधिशोष्य - अणुक स्पीशीज या पदार्थ जो कि पृष्ठ पर सान्द्रित या संचित होता है, अधिशोष्य कहलाता है। अधिशोषक- अणुक स्पीशीज या पदार्थ जिसके पृष्ठ पर अधिशोषण होता है, अधिशोषक कहलाता है।
In simple words: अधिशोषण एक सतह पर अणुओं का जमाव है। अधिशोष्य वह पदार्थ है जो सतह पर जमा होता है, और अधिशोषक वह सतह है जिस पर जमाव होता है।
🎯 Exam Tip: अधिशोषण एक पृष्ठीय परिघटना है। अधिशोष्य और अधिशोषक को उदाहरणों के साथ स्पष्ट रूप से परिभाषित करें।
Question 2. धनात्मक तथा ऋणात्मक अधिशोषण को स्पष्ट कीजिए।
Answer: जब अधिशोषित (अधिशोष्य) की सान्द्रता अधिशोषक के अभ्यन्तर की अपेक्षा उसकी सतह पर अधिक होती है, तोघटना को धनात्मक अधिशोषण (positive adsorption) कहा जाता है। इसके विपरीत, यदि अधिशोषित की सान्द्रता अधिशोषक के अभ्यन्तर की तुलना में इसकी सतह पर कम है तो घटना को ऋणात्मक अधिशोषण (negative adsorption) कहा जाता है।
In simple words: धनात्मक अधिशोषण में, अधिशोष्य की सांद्रता सतह पर अंदरूनी भाग की तुलना में अधिक होती है, जबकि ऋणात्मक अधिशोषण में सतह पर सांद्रता अंदरूनी भाग की तुलना में कम होती है।
🎯 Exam Tip: धनात्मक और ऋणात्मक अधिशोषण को उनके सांद्रता प्रवणता के आधार पर परिभाषित करें और अंतर स्पष्ट करें।
Question 3. अधिशोषण की ऊष्मा अथवा अधिशोषण की एन्थैल्पी को परिभाषित कीजिए ।
Answer: अधिशोषण एक ऊष्माक्षेपी प्रक्रम है और इसमें ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। किसी अधिशोषक की सतह पर अधिशोषित के एक मोल की अधिशोषण प्रक्रिया में निहित एन्थैल्पी परिवर्तन (उत्सर्जित ऊष्मा) को अधिशोषण की एन्थैल्पी (enthalpy of adsorption) या अधिशोषण की ऊष्मा (heat of adsorption) कहा जाता है।
In simple words: अधिशोषण की ऊष्मा या एन्थैल्पी वह ऊर्जा है जो अधिशोषक की सतह पर एक मोल अधिशोष्य के अधिशोषित होने पर उत्सर्जित होती है, क्योंकि अधिशोषण एक ऊष्माक्षेपी प्रक्रिया है।
🎯 Exam Tip: अधिशोषण की ऊष्मा की परिभाषा में 'ऊष्माक्षेपी प्रक्रम' और 'उत्सर्जित ऊर्जा' शब्दों का समावेश महत्वपूर्ण है।
Question 4. उत्प्रेरक क्या है? इसके प्रमुख लक्षण लिखिए।
Answer: उत्प्रेरक - वह पदार्थ जो किसी रासायनिक अभिक्रिया के वेग को परिवर्तित कर देता है, परन्तु स्वयं अभिक्रिया के अन्त में मात्रा तथा संघटन की दृष्टि से अपरिवर्तित रहता है, उत्प्रेरक कहलाता है।
लक्षण
1. उत्प्रेरक अभिक्रिया के दौरान अपरिवर्तित रहता है।
2. उत्प्रेरक की सूक्ष्म मात्रा ही अभिक्रिया की गति को परिवर्तित करने के लिए पर्याप्त होती है।
3. उत्प्रेरक क्रिया प्रारम्भ नहीं कर सकता है।
4. उत्प्रेरक साम्यावस्था को प्रभावित नहीं करता है।
In simple words: उत्प्रेरक वह पदार्थ है जो रासायनिक अभिक्रिया की गति को बदलता है लेकिन स्वयं रासायनिक रूप से अपरिवर्तित रहता है; इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं कि यह अभिक्रिया में उपभोग नहीं होता, कम मात्रा में प्रभावी होता है, अभिक्रिया शुरू नहीं करता और साम्यावस्था पर कोई प्रभाव नहीं डालता।
🎯 Exam Tip: उत्प्रेरक की परिभाषा के साथ उसके चार मुख्य लक्षणों को सूचीबद्ध करना आवश्यक है, जिसमें उसकी अपरिवर्तित प्रकृति और साम्यावस्था पर प्रभाव न डालना शामिल है।
Question 5. धनात्मक उत्प्रेरक पर टिप्पणी लिखिए। या धनात्मक उत्प्रेरण क्या है?
Answer: वे उत्प्रेरक जो अभिक्रिया के वेग को बढ़ा देते हैं, उन्हें धनात्मक उत्प्रेरक कहते हैं तथा इस घटना को धनात्मक उत्प्रेरण कहते हैं।
उदाहरणार्थ - वनस्पति तेल का वनस्पति घी में हाइड्रोजनीकरण निकिल की उपस्थिति में तीव्र गति से होता है।
In simple words: धनात्मक उत्प्रेरक वे पदार्थ होते हैं जो रासायनिक अभिक्रिया की दर को बढ़ाते हैं, और इस प्रक्रिया को धनात्मक उत्प्रेरण कहते हैं; उदाहरण के लिए, निकिल वनस्पति तेलों के हाइड्रोजनीकरण की दर को बढ़ाता है।
🎯 Exam Tip: धनात्मक उत्प्रेरण की परिभाषा में 'अभिक्रिया के वेग को बढ़ाना' और एक सटीक उदाहरण देना महत्वपूर्ण है।
Question 6. ऋणात्मक उत्प्रेरक पर टिप्पणी लिखिए।
या
ऋणात्मक उत्प्रेरण क्या है?
Answer: जब उत्प्रेरक रासायनिक अभिक्रिया की गति को घटाता है, तो यह घटना ऋणात्मक उत्प्रेरण कहलाती है तथा यह उत्प्रेरक ऋणात्मक उत्प्रेरक कहलाता है।
उदाहरणार्थ- सोडियम सल्फाइट का वायु द्वारा ऑक्सीकरण ग्लिसरीन की उपस्थिति में रुक जाता है; अतः इस अभिक्रिया में ग्लिसरीन ऋणात्मक उत्प्रेरक है।
In simple words: ऋणात्मक उत्प्रेरक वे पदार्थ होते हैं जो रासायनिक अभिक्रिया की दर को कम करते हैं, और इस प्रक्रिया को ऋणात्मक उत्प्रेरण कहते हैं; जैसे ग्लिसरीन सोडियम सल्फाइट के वायु द्वारा ऑक्सीकरण को धीमा कर देता है।
🎯 Exam Tip: ऋणात्मक उत्प्रेरक की परिभाषा में 'अभिक्रिया के वेग को घटाना' और एक सटीक उदाहरण देना महत्वपूर्ण है।
Question 7. आप उत्प्रेरक उत्साहक (वर्धक) से क्या समझते हैं ? एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए।
Answer: वे बाहरी पदार्थ जो किसी उत्प्रेरण क्रिया में प्रयुक्त उत्प्रेरक की उत्प्रेरण सक्रियता को बढ़ा देते हैं, किन्तु स्वयं अभिक्रिया के लिए उत्प्रेरक नहीं होते हैं, उत्प्रेरक वर्धक कहलाते हैं।
उदाहरणार्थ - तेलों के हाइड्रोजनीकरण में Ni उत्प्रेरक के लिए Cu उत्प्रेरक वर्धक है।
In simple words: उत्प्रेरक वर्धक ऐसे पदार्थ होते हैं जो स्वयं उत्प्रेरक न होते हुए भी किसी उत्प्रेरक की सक्रियता को बढ़ाते हैं, जैसे निकिल उत्प्रेरित हाइड्रोजनीकरण में कॉपर का उपयोग।
🎯 Exam Tip: उत्प्रेरक वर्धक की परिभाषा में 'स्वयं उत्प्रेरक नहीं होना' और 'उत्प्रेरक की सक्रियता बढ़ाना' जैसे प्रमुख बिंदुओं को शामिल करें।
Question 8. उत्प्रेरक विष क्या है? एक उदाहरण द्वारा व्याख्या कीजिए ।
Answer: जब कोई बाह्य पदार्थ उत्प्रेरण क्रिया में प्रयुक्त उत्प्रेरक की क्रियाशीलता को कम या नष्ट कर देता है, उत्प्रेरक विष कहलाता है।
उदाहरणार्थ - यदि अमोनिया के बनाने की हेबर विधि में हाइड्रोजन में कार्बन मोनोऑक्साइड उपस्थित हो, तो यह लोहे (जो उत्प्रेरक का कार्य करता है) की क्रियाशीलता को काफी कम कर देती है, अर्थात् CO उत्प्रेरक विष है।
In simple words: उत्प्रेरक विष वह पदार्थ है जो उत्प्रेरक की क्रियाशीलता को घटाता या नष्ट करता है; जैसे हेबर विधि में कार्बन मोनोऑक्साइड लोहे के उत्प्रेरक को निष्क्रिय कर देता है।
🎯 Exam Tip: उत्प्रेरक विष की परिभाषा में 'क्रियाशीलता को कम या नष्ट करना' और एक सटीक उदाहरण देना आवश्यक है।
Question 9. समांग तथा विषमांग उत्प्रेरण को एक-एक उदाहरण देकर समझाइए ।
Answer: समांग उत्प्रेरण - जब अभिकारक तथा उत्प्रेरक एक ही प्रावस्था में होते हैं, तब इस अवस्था को समांग उत्प्रेरण कहते हैं; जैसे -
विषमांग उत्प्रेरण - जब उत्प्रेरक तथा अभिकारक भिन्न प्रावस्था में होते हैं तब यह अवस्था विषमांग उत्प्रेरण कहलाती है; जैसे -
In simple words: समांग उत्प्रेरण में अभिकारक और उत्प्रेरक एक ही भौतिक अवस्था में होते हैं, जबकि विषमांग उत्प्रेरण में वे अलग-अलग भौतिक अवस्थाओं में होते हैं।
🎯 Exam Tip: समांग और विषमांग उत्प्रेरण के बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए प्रत्येक की परिभाषा और एक-एक उदाहरण देना महत्वपूर्ण है।
Question 10. स्वः उत्प्रेरण को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
Answer: ऐसी अभिक्रिया जिसमें अभिक्रिया के फलस्वरूप बना कोई पदार्थ स्वयं उत्प्रेरक का कार्य करने लगता है, स्वः उत्प्रेरक कहलाता है तथा इस घटना को स्वः उत्प्रेरण कहते हैं।
उदाहरणार्थ - एथिल ऐसीटेट के जल-अपघटन के फलस्वरूप बना ऐसीटिक अम्ल स्वः उत्प्रेरक बन जाता है।
CH3COOC2H5 + HOH \( \implies \) CH3COOH + C2H5OH
एथिल ऐसीटेट ऐसीटिक अम्ल एथिल ऐल्कोहॉल
स्वः उत्प्रेरक
In simple words: स्व-उत्प्रेरण वह घटना है जहाँ अभिक्रिया के दौरान बनने वाला कोई उत्पाद स्वयं उत्प्रेरक के रूप में कार्य करना शुरू कर देता है और अभिक्रिया की गति को बढ़ा देता है, जैसे एथिल एसीटेट के जल-अपघटन से बना एसीटिक अम्ल।
🎯 Exam Tip: स्व-उत्प्रेरण की परिभाषा के साथ रासायनिक समीकरण और उसमें स्व-उत्प्रेरक को स्पष्ट रूप से दर्शाना महत्वपूर्ण है।
Question 11. प्रेरित उत्प्रेरण को एक उदाहरण द्वारा समझाइए ।
Answer: प्रेरित उत्प्रेरण - जब कोई क्रियाशील पदार्थ किसी अक्रियाशील पदार्थ के साथ समान रूप में क्रिया हेतु प्रेरित करके उसको क्रियाशील बना देता है, तो वह क्रियाशील पदार्थ प्रेरित उत्प्रेरक कहलाता है। और यह घटना प्रेरित उत्प्रेरण कहलाती है।
उदाहरणार्थ - सोडियम सल्फाइट (\( \text{Na}_2\text{SO}_3 \)) वायु से ऑक्सीकृत हो जाता है, परन्तु सोडियम आसेंनाइट (\( \text{Na}_3\text{AsO}_3 \)) ऑक्सीकृत नहीं होता है। दोनों को साथ मिलाने पर दोनों ही ऑक्सीकृत हो जाते हैं; क्योंकि सोडियम सल्फाइट का ऑक्सीकरण, सोडियम आसेंनाइट के ऑक्सीकरण को उत्प्रेरित कर देता है; अतः यहाँ सोडियम सल्फाइट प्रेरित उत्प्रेरक का कार्य करता है।
वायु
2 Na2SO3 + O2
\( \implies \) 2Na2SO4
सोडियम सल्फाइट
वायु कोई अभिक्रिया नहीं
2 Na2AsO3 + O2
सोडियम आर्सेनाइट
वायु
Na2SO3 + Na3AsO3 + O2
\( \implies \) Na2SO4 + Na3AsO4
प्रेरित उत्प्रेरक सोडियम सल्फेट सोडियम आर्सेनेट
In simple words: प्रेरित उत्प्रेरण वह घटना है जब एक अभिक्रिया दूसरी अक्रियाशील अभिक्रिया को उत्प्रेरित करती है; जैसे सोडियम सल्फाइट का वायु द्वारा ऑक्सीकरण, सोडियम आर्सेनाइट के ऑक्सीकरण को प्रेरित करता है।
🎯 Exam Tip: प्रेरित उत्प्रेरण की परिभाषा में 'क्रियाशील पदार्थ द्वारा अक्रियाशील पदार्थ को प्रेरित करना' का उल्लेख करें और रासायनिक समीकरणों के साथ उदाहरण स्पष्ट करें।
Question 12. उत्प्रेरक से अभिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा कम हो जाती है। इस कथन की व्याख्या कीजिए ।
Answer: किसी अभिक्रिया के लिए सक्रियण ऊर्जा का मान निश्चित और स्थिर होता है, जो अभिक्रिया के ताप या अभिकारकों की सान्द्रता पर निर्भर नहीं करता है। अभिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा और उसका वेग स्थिरांक उत्प्रेरक की उपस्थिति से प्रभावित होता है। उत्प्रेरक अभिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा को कम कर देता। है और वेग स्थिरांक के मान को बढ़ा देता है, जिससे अभिक्रिया का वेग बढ़ जाता है। उत्प्रेरक की उपस्थिति में अभिक्रिया का नया पथ बन जाता है, जिसमें उत्प्रेरक भाग लेता है। इस नये पथ की सक्रियण ऊर्जा मूल पथ की सक्रियण ऊर्जा से कम होती है।
In simple words: उत्प्रेरक अभिक्रिया के लिए एक वैकल्पिक, कम ऊर्जा वाला पथ प्रदान करके सक्रियण ऊर्जा को कम कर देता है, जिससे अधिक अभिकारक अणु उत्पाद में परिवर्तित हो पाते हैं और अभिक्रिया की गति बढ़ जाती है।
🎯 Exam Tip: सक्रियण ऊर्जा के कम होने के पीछे के तंत्र (वैकल्पिक पथ का निर्माण) को स्पष्ट रूप से समझाएं।
Question 13. सूक्ष्म विभाजित अवस्था में उत्प्रेरक, ठोस अवस्था से अधिक क्रियाशील क्यों होते हैं? समझाइए ।
Answer: इसका कारण है कि उत्प्रेरक के जितने अधिक टुकड़े होंगे उतनी ही मुक्त संयोजकताएँ अधिक बढ़ेगी, जिनके कारण उसकी कार्यक्षमता अधिक होगी ।
In simple words: उत्प्रेरक को सूक्ष्म विभाजित करने पर उसका पृष्ठीय क्षेत्रफल बढ़ जाता है, जिससे अधिक सक्रिय केंद्र उपलब्ध होते हैं और अभिकारक अणुओं के अधिशोषण के लिए अधिक साइट्स मिलती हैं, परिणामस्वरूप उसकी क्रियाशीलता बढ़ जाती है।
🎯 Exam Tip: सूक्ष्म विभाजन से पृष्ठीय क्षेत्रफल में वृद्धि और उसके परिणामस्वरूप सक्रिय केंद्रों की संख्या में वृद्धि के बीच संबंध को स्पष्ट करें।
Question 14. क्लोरोफॉर्म को रंगीन बोतलों में रखा जाता है तथा उसमें कुछ मात्रा एथिल ऐल्कोहॉल की भी मिलायी जाती है, क्यों?
Answer: क्लोरोफॉर्म को रंगीन बोतल में ऊपर तक भरकर इसलिए रखते हैं जिससे प्रकाश और वायु अन्दर नहीं पहुँच सके, अन्यथा क्लोरोफॉर्म धीरे-धीरे ऑक्सीकृत होकर फॉस्जीन गैस बनाता है जो बहुत तेज विष है। क्लोरोफॉर्म में 1% एथिल ऐल्कोहॉल ऋणात्मक उत्प्रेरक के रूप में डालते हैं। एथिल ऐल्कोहॉल की उपस्थिति से वायु द्वारा क्लोरोफॉर्म के ऑक्सीकरण की गति अत्यन्त धीमी पड़ जाती है।
एथिल ऐल्कोहॉल
2CHCl3 + 2[O]
\( \implies \) 2COCl2↑ + 2HCl
ऋणात्मक उत्प्रेरक फॉस्जीन
In simple words: क्लोरोफॉर्म को रंगीन बोतलों में ऊपरी सिरे तक भरकर और एथिल अल्कोहल मिलाकर रखा जाता है ताकि प्रकाश और हवा से इसका ऑक्सीकरण होकर अत्यधिक विषैली फॉस्जीन गैस न बने, क्योंकि एथिल अल्कोहल इस ऑक्सीकरण प्रक्रिया को धीमा कर देता है।
🎯 Exam Tip: क्लोरोफॉर्म के ऑक्सीकरण से फॉस्जीन के निर्माण, रंगीन बोतलों के उपयोग और एथिल अल्कोहल की भूमिका को स्पष्ट रूप से समझाएं।
Question 15. एन्जाइम उत्प्रेरकों तथा साधारण उत्प्रेरकों में क्या अन्तर है? एक उदाहरण देकर समझाइए।
Answer: एन्जाइम उत्प्रेरक अभिक्रिया के लिए ताप का एक परिसर होता है जिस पर इनकी क्रियाशीलता अधिकतम होती है। सामान्यतः यह 25 - 35°C के मध्य है। 70°C पर ये निष्क्रिय हो जाते हैं। साधारण उत्प्रेरकों की क्रियाशीलता 70°C के ऊपर ही प्रभावशाली होती है; जैसे- Al2O3 के लिए अनुकूलतम ताप 250°C है।
In simple words: एन्जाइम उत्प्रेरक जैविक होते हैं और एक विशिष्ट, संकीर्ण तापमान सीमा (25-35°C) पर अधिकतम सक्रिय होते हैं, जबकि साधारण उत्प्रेरक अकार्बनिक होते हैं और उच्च तापमान पर (जैसे \( \text{Al}_2\text{O}_3 \) 250°C पर) अधिक प्रभावी होते हैं।
🎯 Exam Tip: एन्जाइम और साधारण उत्प्रेरकों के बीच अंतर को तापमान संवेदनशीलता और रासायनिक प्रकृति के संदर्भ में स्पष्ट करें।
Question 16. कोलॉइड क्या हैं? क्रिस्टलाभ से ये किस प्रकार भिन्न हैं?
Answer: कोलॉइड-जो पदार्थ सरलता से जल में नहीं घुलते और घुलने पर समांग विलयन नहीं बनाते तथा जिनके विलयन चर्मपत्र द्वारा नहीं छनते कोलॉइड या कोलॉइडी विलयन कहलाते हैं; जैसे-दूध, मक्खन, दही, बादल, धुआँ, आइसक्रीम, गोंद, सोडियम पामीटेट, रक्त आदि ।
क्रिस्टलाभ - जिन पदार्थों के विलयन चर्मपत्र द्वारा छन जाते हैं, क्रिस्टलाभ कहलाते हैं; जैसे- यूरिया, शर्करा, सोडियम प्रोपियोनेट आदि ।
In simple words: कोलॉइड ऐसे पदार्थ हैं जो जल में समांगी विलयन नहीं बनाते और अर्धपारगम्य झिल्ली से नहीं छनते (जैसे दूध), जबकि क्रिस्टलाभ वे पदार्थ हैं जो जल में वास्तविक विलयन बनाते हैं और अर्धपारगम्य झिल्ली से आसानी से छन जाते हैं (जैसे यूरिया)।
🎯 Exam Tip: कोलॉइड और क्रिस्टलाभ के बीच अंतर को विलेयता, विलयन की प्रकृति (समांग/विषमांग) और झिल्ली से छनने की क्षमता के आधार पर स्पष्ट करें।
Question 17. वास्तविक विलयन तथा कोलॉइडी विलयन में विभेद कीजिए।
Answer: वास्तविक विलयन - यह एक समांग तन्त्र है जिसमें विलेय तथा विलायक के कणों का आकार बराबर होता है। इन कणों का व्यास 10-7 सेमी से भी कम होता है। इन्हें अति सूक्ष्मदर्शी (ultra-microscope) द्वारा भी नहीं देखा जा सकता।
कोलॉइडी विलयन - यह एक विषमांग तन्त्र है, कोलॉइडी विलयन में भिन्न-भिन्न व्यासों के कण उपस्थित होते हैं। इस विलयन में विलेय के कणों का व्यास 10-4 से 10-7 सेमी होता है और विलायक के कणों का व्यास 10-7 से 10-8 सेमी होता है, जिन्हें अति सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखा जा सकता है।
In simple words: वास्तविक विलयन समांगी होते हैं जिनके कण बहुत छोटे (<1 nm) होते हैं और उन्हें सूक्ष्मदर्शी से भी नहीं देखा जा सकता, जबकि कोलॉइडी विलयन विषमांगी होते हैं जिनके कण बड़े (1-200 nm) होते हैं और उन्हें अल्ट्रा-सूक्ष्मदर्शी से देखा जा सकता है।
🎯 Exam Tip: वास्तविक और कोलॉइडी विलयन के बीच अंतर को कण आकार, समांग/विषमांग प्रकृति और दृश्यता के संदर्भ में स्पष्ट करें।
Question 18. निलम्बन को परिभाषित कीजिए।
Answer: निलम्बन विषमांग तन्त्र होते हैं। इनमें कणों का आकार 1000 nm से अधिक (>10-6 m) होता है। इस तन्त्र के कणों को नेत्रों तथा सूक्ष्मदर्शी दोनों के द्वारा देखा जा सकता है। निलम्बन के कण साधारण फिल्टर पेपर तथा जन्तु झिल्ली दोनों में से किसी में से भी नहीं गुजर पाते हैं। मिट्टी के कणों को जल में डालकर हिलाने पर निलम्बन तन्त्र प्राप्त होता है।
In simple words: निलंबन विषमांगी मिश्रण होते हैं जहाँ ठोस कण द्रव में तैरते रहते हैं, जिनका आकार 1000 nm से अधिक होता है और जिन्हें नग्न आँखों से देखा जा सकता है; ये फिल्टर पेपर से भी नहीं छनते।
🎯 Exam Tip: निलंबन की परिभाषा में विषमांगी प्रकृति, कण आकार की सीमा और दृश्यता जैसे प्रमुख गुणों का उल्लेख करें।
Question 19. निलम्बन तथा कोलॉइडी विलयन में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer: कोलॉइडी विलयन फिल्टर पेपर से विसरित हो जाते हैं जबकि चर्मपत्र, पेपर तथा जन्तु की झिल्लियों से विसरित नहीं होते हैं। इनके कणों पर ऋण या धन आवेश होता है। इसके विपरीत निलम्बन इनमें से किसी से भी विसरित नहीं होते हैं तथा इनके कणों पर कोई आवेश नहीं होता है।
In simple words: कोलॉइडी विलयन के कण झिल्ली से आंशिक रूप से गुजर सकते हैं और उन पर आवेश होता है, जबकि निलंबन के कण बड़े होते हैं, किसी भी झिल्ली से नहीं गुजरते और उन पर कोई शुद्ध आवेश नहीं होता है।
🎯 Exam Tip: निलंबन और कोलॉइडी विलयन के बीच अंतर को कण आकार, झिल्ली के माध्यम से विसरण की क्षमता और आवेश की उपस्थिति के आधार पर स्पष्ट करें।
Question 20. परिक्षिप्त प्रावस्था तथा परिक्षेपण माध्यम को परिभाषित कीजिए।
Answer: वह पदार्थ जो कोलॉइडी कणों के रूप में परिक्षेपण माध्यम में वितरित रहता है, परिक्षिप्त प्रावस्था का निर्माण करता है जबकि वह माध्यम जिसमें पदार्थ कोलॉइडी कणों के रूप में वितरित रहता है, परिक्षेपण माध्यम कहलाता है। अतः कोलॉइडी विलयन = परिक्षिप्त प्रावस्था + परिक्षेपण माध्यम
In simple words: परिक्षिप्त प्रावस्था कोलॉइडी कणों के रूप में वितरित होने वाला पदार्थ है, जबकि परिक्षेपण माध्यम वह माध्यम है जिसमें ये कण वितरित होते हैं।
🎯 Exam Tip: परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम की परिभाषा को स्पष्ट रूप से दें, क्योंकि ये कोलॉइडी रसायन विज्ञान के मूलभूत घटक हैं।
Question 21. द्रव-स्नेही और द्रव-विरोधी कोलॉइड किसे कहते हैं? प्रत्येक को एक-एक उदाहरण सहित समझाइए।
Answer:
1. द्रव-स्नेही कोलॉइड - वे कोलॉइडी पदार्थ जो विलायक के सम्पर्क में आकर तुरन्त कोलॉइडी कणों में विभाजित होकर कोलॉइडी विलयन बनाते हैं, द्रव-स्नेही कोलॉइड कहलाते हैं। इनको अवक्षेपित करने के बाद फिर से द्रव के सम्पर्क में लाकर सुगमता से कोलॉइडी विलयन बनाया जा सकता है। इस विशेष गुण के आधार पर इन्हें उत्क्रमणीय कोलॉइड (reversible colloids) कहते हैं। उदाहरणार्थ- जिलेटिन, स्टार्च, गोंद, प्रोटीन आदि ।
2. द्रव-विरोधी कोलॉइड - वे कोलॉइडी पदार्थ जो विलायक के सम्पर्क में आने पर सरलता से कोलॉइडी विलयन नहीं बनाते हैं, द्रव-विरोधी कोलॉइड कहलाते हैं। इन्हें अवक्षेपित करने के बाद, फिर से कोलॉइडी विलयन में परिवर्तित करना प्रायः कठिन है। अतः ये अनुक्रमणीय कोलॉइड (irreversible colloids) कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-धात्विक या धातु ऑक्साइड, धात्विक हाइड्रॉक्साइड [Fe(OH)3], धातु सल्फाइड (As2S3) आदि ।
In simple words: द्रव-स्नेही कोलॉइड वे पदार्थ होते हैं जो विलायक के साथ आसानी से कोलॉइडी विलयन बनाते हैं और उत्क्रमणीय होते हैं (जैसे जिलेटिन), जबकि द्रव-विरोधी कोलॉइड विलायक के साथ आसानी से विलयन नहीं बनाते, विशेष विधियों की आवश्यकता होती है, और अनुत्क्रमणीय होते हैं (जैसे धातु सल्फाइड)।
🎯 Exam Tip: द्रव-स्नेही और द्रव-विरोधी कोलॉइड के बीच मुख्य अंतर उनकी विलायक के प्रति आत्मीयता, स्थायित्व और उत्क्रमणीय/अनुत्क्रमणीय प्रकृति के आधार पर स्पष्ट करें। प्रत्येक का एक-एक उदाहरण देना अनिवार्य है।
Question 22. द्रव-स्नेही तथा द्रव-विरोधी कोलॉइडों में कौन अधिक स्थायी है? दोनों के एक-एक उदाहरण दीजिए।
Answer: द्रव- स्नेही कोलॉइड अधिक स्थायी होते हैं। द्रव-स्नेही कोलॉइड के उदाहरण- गोंद, जिलेटिन आदि । द्रव-विरोधी कोलॉइड फेरिक हाइड्रॉक्साइड Fe (OH)3 सॉल हैं।
In simple words: द्रव-स्नेही कोलॉइड अधिक स्थायी होते हैं (जैसे गोंद, जिलेटिन), क्योंकि उनके कण परिक्षेपण माध्यम के साथ अधिक दृढ़ता से बंधे होते हैं, जबकि द्रव-विरोधी कोलॉइड (जैसे फेरिक हाइड्रॉक्साइड सॉल) कम स्थायी होते हैं।
🎯 Exam Tip: स्थायित्व के आधार पर द्रव-स्नेही और द्रव-विरोधी कोलॉइड की तुलना करें और प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दें।
Question 23. द्रव स्नेही सॉल, द्रव विरोधी सॉल से अधिक स्थायी क्यों होते हैं? समझाइए ।
Answer: द्रव स्नेही सॉल में परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम के अणुओं के मध्य आकर्षण, द्रव विरोधी सॉल की अपेक्षा बहुत अधिक होता है इसलिए द्रव स्नेही सॉल, द्रव विरोधी सॉल की तुलना में अधिक स्थायी होते हैं।
In simple words: द्रव स्नेही सॉल द्रव विरोधी सॉल से अधिक स्थायी होते हैं क्योंकि द्रव स्नेही सॉल में परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम के बीच मजबूत आकर्षण होता है, जो कणों को अवक्षेपण से बचाता है।
🎯 Exam Tip: स्थायित्व का कारण स्पष्ट करें, जिसमें परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम के बीच के आकर्षण बल को उजागर करें।
Question 24. द्रव-विरोधी सॉल बनाने की संघनन विधि का वर्णन कीजिए ।
Answer: संघनन विधि में पदार्थ के लघु अणुओं या आयनों को विभिन्न भौतिक और रासायनिक विधियों द्वारा परस्पर संयुक्त कराकर कोलॉइडी साइज के कण बनाये जाते हैं। एक प्रमुख संघनन विधि ऑक्सीकरण विधि है। उदाहरणार्थ- हाइड्रोजन सल्फाइड गैस (\( \text{H}_2\text{S} \)) के जलीय विलयन का सल्फर डाइऑक्साइड (\( \text{SO}_2 \)) द्वारा ऑक्सीकरण करके सल्फर का कोलॉइडी विलयन (सल्फर सॉल) बनाया जा सकता है । ।
2H2S + SO2 \( \implies \) 3S + 2H2O
In simple words: संघनन विधि में छोटे अणु या आयन विभिन्न भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा मिलकर कोलॉइडी आकार के कण बनाते हैं; उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन सल्फाइड का सल्फर डाइऑक्साइड द्वारा ऑक्सीकरण करके सल्फर सॉल बनाया जाता है।
🎯 Exam Tip: संघनन विधि का सिद्धांत और एक रासायनिक समीकरण के साथ उसका एक स्पष्ट उदाहरण दें।
Question 25. सहचारी कोलॉइड या मिसेल से आप क्या समझते हैं?
Answer: कुछ पदार्थ ऐसे भी ज्ञात हैं जो कम सान्द्रताओं पर सामान्य प्रबल विद्युत अपघटय के समान व्यवहार करते हैं परन्तु उच्च सान्द्रताओं पर कणों का पुंज बनने के कारण कोलॉइड के समान व्यवहार करते हैं। इस प्रकार पुंजित कण मिसेल या सहचारी कोलॉइड कहलाते हैं।
In simple words: सहचारी कोलॉइड या मिसेल ऐसे पदार्थ होते हैं जो कम सांद्रता पर सामान्य विद्युत-अपघट्यों की तरह व्यवहार करते हैं, लेकिन उच्च सांद्रता पर कणों के पुंज बनाकर कोलॉइड जैसे गुण प्रदर्शित करते हैं।
🎯 Exam Tip: मिसेल की परिभाषा में कम और उच्च सांद्रता पर व्यवहार में अंतर को स्पष्ट रूप से समझाएं।
Question 26. आर्सेनियस सल्फाइड का शुद्ध कोलॉइडी विलयन किस प्रकार प्राप्त किया जाता है? समीकरण भी दीजिए।
Answer: आर्सेनियस सल्फाइड का सॉल उभय-अपघटन विधि से तैयार किया जाता है। आर्सेनियस ऑक्साइड (\( \text{As}_2\text{O}_3 \)) के ठण्डे जलीय विलयन में धीरे-धीरे \( \text{H}_2\text{S} \) गैस आधिक्य में प्रवाहित करने से आर्सेनियस सल्फाइड (\( \text{As}_2\text{S}_3 \)) का पीला सॉल प्राप्त होता है।
In simple words: आर्सेनियस सल्फाइड का कोलॉइडी विलयन आर्सेनियस ऑक्साइड (\( \text{As}_2\text{O}_3 \)) के ठंडे जलीय विलयन में हाइड्रोजन सल्फाइड (\( \text{H}_2\text{S} \)) गैस प्रवाहित करके उभय-अपघटन विधि द्वारा बनाया जाता है, जिससे पीले रंग का सॉल प्राप्त होता है।
🎯 Exam Tip: आर्सेनियस सल्फाइड सॉल बनाने की विधि (उभय-अपघटन) को स्पष्ट करें और इसमें प्रयुक्त अभिकारकों का उल्लेख करें।
Question 27. कोलॉइडी विलयनों (सॉल) के शुद्धिकरण की अतिसूक्ष्म निस्यन्दन विधि को समझाइए ।
Answer: सामान्य फिल्टर पेपर (filter paper) के छिद्रों का आकार बड़ा होता है। इस कारण उससे अशुद्धि कण तथा कोलॉइडी कण आसानी से पार हो जाते हैं। अतः अशुद्ध सॉल से वैद्युत अपघटय की अशुद्धियों को दूर करने के लिये सामान्य फिल्टर पेपर का उपयोग नहीं किया जा सकता है। लेकिन यदि सामान्य फिल्टर पेपर के छिद्रों का आकार छोटा कर दिया जाये तो अशुद्ध सॉल से अशुद्धियों को अलग करने में इसका उपयोग किया जा सकता है। इसके लिये साधारण फिल्टर पेपर को जिलेटिन या कोलोडिओन (collodion) से लेपित करने के पश्चात् फॉर्मेल्डीहाइड में डुबोया जाता है। प्रयुक्त कोलोडिओन विलयन ऐल्कोहॉल तथा ईथर के मिश्रण में नाइट्रोसेलुलोज (nitrocellulose) का 4% विलयन होता है। इस प्रकार प्राप्त फिल्टर पेपरों को अति सूक्ष्म फिल्टर (ultra filters) कहते हैं तथा इनके द्वारा अशुद्ध कोलॉइडी विलयन या सॉल को छानने के प्रक्रम को अतिसूक्ष्म नियंदन (ultrafiltration) कहते हैं।
In simple words: अतिसूक्ष्म निस्यंदन एक विधि है जिसमें विशेष रूप से तैयार किए गए अल्ट्रा-फिल्टर पेपर का उपयोग करके कोलॉइडी विलयन से अशुद्धियों को हटाया जाता है, जो साधारण फिल्टर पेपर की तुलना में छोटे छिद्रों वाले होते हैं और कोलॉइडी कणों को रोकते हुए अशुद्धियों को गुजरने देते हैं।
🎯 Exam Tip: अतिसूक्ष्म निस्यंदन की कार्यप्रणाली, विशेष रूप से अल्ट्रा-फिल्टर पेपर के निर्माण और उसके उपयोग को स्पष्ट रूप से वर्णित करें।
Question 28. गॅदले पानी को साफ करने के लिए फिटकरी का प्रयोग क्यों किया जाता है?
Answer: आँदले पानी में मिट्टी, रेत आदि की अशुद्धियाँ कोलॉइडी कणों के रूप में उपस्थित रहती हैं। ये कोलॉइडी कण ऋणावेशित होते हैं। कोलॉइडी कणों की अशुद्धि दूर करने के लिए जल में फिटकरी (पोटाशएलम) डाली जाती है। फिटकरी [K2SO4 . Al2(SO4)3 . 24H2O] जल में घुलकर \( \text{K}^+ \), \( \text{Al}^{3+} \) तथा \( \text{SO}_4^{2-} \) आयनों में वियोजित हो जाती है । \( \text{K}^+ \) और \( \text{Al}^{3+} \) द्वारा ऋणावेशित कणों का स्कन्दन हो जाता है। और वे जल में नीचे बैठ जाते हैं। इस प्रकार गेंदला पानी साफ हो जाता है।
In simple words: गंदे पानी को साफ करने के लिए फिटकरी का उपयोग किया जाता है क्योंकि यह पानी में मौजूद ऋणावेशित कोलॉइडी मिट्टी के कणों का स्कंदन करता है, जिससे वे अवक्षेपित होकर नीचे बैठ जाते हैं और पानी साफ हो जाता है।
🎯 Exam Tip: फिटकरी के रासायनिक संघटन, उसके आयनों के उत्पादन और ऋणावेशित कोलॉइडी कणों के स्कंदन में उसकी भूमिका को समझाएं।
Question 29. धुएँ से कार्बन के कणों को किस प्रकार पृथक करते हैं ?
Answer: धुएँ को कार्बन के कोलॉइडी कणों से मुक्त करने के लिए कॉटेल धुआँ अवक्षेपक प्रयुक्त किया जाता है। इस अवक्षेपक में एक स्तम्भ में धातु का एक गोला लटका रहता है जिसे उच्च वोल्टता पर धनावेशित किया जाता है। धुएँ को अवक्षेपक में से प्रवाहित करने पर उसमें उपस्थित कार्बन के ऋणावेशित कोलॉइडी कण धनावेशित गोले के सम्पर्क में आकर निरावेशित हो जाते हैं और विद्युत उदासीन कण एक-दूसरे से मिलकर अवक्षेप के रूप में नीचे बैठ जाते हैं तथा कार्बन-कणों से मुक्त वायु बाहर निकल जाती है।
In simple words: धुएँ से कार्बन के कणों को हटाने के लिए कॉटेल धुआँ अवक्षेपक का उपयोग किया जाता है, जहाँ ऋणावेशित कार्बन के कण धनावेशित धातु के गोले से टकराकर उदासीन हो जाते हैं और अवक्षेप के रूप में नीचे बैठ जाते हैं।
🎯 Exam Tip: कॉटेल धुआँ अवक्षेपक की कार्यप्रणाली, विशेष रूप से धनावेशित गोले और ऋणावेशित कार्बन कणों के निरावेशीकरण को स्पष्ट करें।
Question 30. ठोस ऐरोसॉल क्या है? एक उदाहरण दीजिए।
Answer: जब परिक्षिप्त अवस्था ठोस तथा परिक्षेपण माध्यम गैस होता है तो उस कोलॉइडी विलयन को ठोस ऐरोसॉल कहते हैं; जैसे-धुआँ, ज्वालामुखी का लावा आदि ।
In simple words: ठोस ऐरोसॉल एक कोलॉइडी विलयन है जिसमें ठोस कण गैस में परिक्षिप्त होते हैं, जैसे धुआँ और ज्वालामुखी का लावा।
🎯 Exam Tip: ठोस ऐरोसॉल की परिभाषा को उसके परिक्षिप्त प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम के संदर्भ में स्पष्ट करें और एक उदाहरण दें।
Question 31. कोलॉइडी अवस्था में औषधियाँ अधिक प्रभावी क्यों होती हैं? समझाइए।
Answer: कोलॉइडी अवस्था में औषधियाँ अधिक प्रभावी इसलिए होती हैं, क्योंकि इस अवस्था में औषधियों का अवशोषण अधिक सुगमता से होता है।
In simple words: औषधियाँ कोलॉइडी अवस्था में अधिक प्रभावी होती हैं क्योंकि इस अवस्था में वे शरीर में अधिक आसानी से अवशोषित हो जाती हैं, जिससे उनका चिकित्सीय प्रभाव बढ़ जाता है।
🎯 Exam Tip: कोलॉइडी अवस्था में औषधियों की बढ़ी हुई प्रभावशीलता के पीछे के कारण (बेहतर अवशोषण) को संक्षेप में स्पष्ट करें।
Question 38. रक्षी कोलॉइड क्या हैं? एक उदाहरण दीजिए।
Answer: जब किसी द्रव-विरोधी कोलॉइडी विलयन में वैद्युत-अपघटय का विलयन मिलाने से पूर्व द्रव-स्नेही कोलॉइडी विलयन की कुछ मात्रा को डाला जाता है, तो द्रव-विरोधी कोलॉइड का स्कन्दन रुक जाता है अर्थात् उसका स्थायित्व बढ़ जाता है। यह प्रक्रम रक्षण (protection) कहलाता है। वे द्रव-स्नेही कोलॉइड, जिन्हें डालने पर द्रव-विरोधी कोलॉइडों का स्कन्दन से स्थायित्व बढ़ जाता है, रक्षी कोलॉइड कहलाते हैं और इस प्रकार प्राप्त द्रव-विरोधी कोलॉइडी विलयन, रक्षित (रक्षी) कोलॉइड कहलाते हैं; जैसे- गोल्ड के कोलॉइडी विलयन में यदि सोडियम क्लोराइड का विलयन मिला दिया जाए तो यह स्कन्दित हो जाता है, किन्तु इस कोलॉइडी विलयन में यदि जिलेटिन की अल्प- मात्रा डाल दी जाए तो NaCl विलयन द्वारा स्कन्दन रुक जाता है। इस प्रकार जिलेटिन यहाँ एक रक्षी कोलॉइड के रूप में कार्य करता है।
In simple words: रक्षी कोलॉइड वे पदार्थ होते हैं जो द्रव-विरोधी कोलॉइड्स को विद्युत-अपघट्य द्वारा स्कंदन से बचाते हैं, जिससे उनकी स्थिरता बढ़ती है। यह प्रक्रिया रक्षण कहलाती है।
🎯 Exam Tip: रक्षी कोलॉइड का कार्य और उनके उदाहरणों पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि यह अवधारणा स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।
Question 39. स्वर्ण संख्या या स्वर्णाक की परिभाषा दीजिए।
Answer: रक्षी कोलॉइड की शक्ति को स्वर्ण संख्या (gold number) से व्यक्त किया जाता है। स्वर्ण संख्या की परिभाषा निम्न प्रकार से दी जाती है - किसी द्रव-स्नेही कोलॉइड की स्वर्ण संख्या उसका मिलीग्राम में वह भार है जो गोल्ड सॉल के 10 मिली में उपस्थित होने पर 10% NaCl विलयन के 1 मिली को डालने पर सॉल के लाल रंग से नीले रंग में परिवर्तित होने को रोकने के लिए पर्याप्त होता है।” स्वर्ण संख्या, रक्षी सॉल की शक्ति व्यक्त करने का प्रतीक है। स्वर्ण संख्या जितनी अधिक होगी, सॉल की स्कन्दन शक्ति उतनी ही कम होगी। कम स्वर्ण संख्या होने पर सॉल की स्कन्दन शक्ति अधिक होगी ।
In simple words: स्वर्ण संख्या, किसी द्रव-स्नेही कोलॉइड की वह न्यूनतम मात्रा (मिलीग्राम में) है जो 10 मिली गोल्ड सॉल को 10% NaCl विलयन के 1 मिली से स्कंदन से बचाती है। कम स्वर्ण संख्या का मतलब अधिक रक्षण क्षमता है।
🎯 Exam Tip: स्वर्ण संख्या की परिभाषा और इसके महत्व को अच्छी तरह से समझें, क्योंकि यह अक्सर सीधे प्रश्न के रूप में पूछा जाता है।
Question 40. जिलेटिन व गोंद के स्वर्णाक क्रमशः 0.005 तथा 0.10 हैं। इन रक्षी कोलॉइडों में किसकी रक्षी क्षमता अधिक है?
Answer: रक्षी कोलॉइडों की रक्षी क्रिया उनका स्वर्णाक घटने के साथ बढ़ती है, अर्थात् एक अच्छे रक्षी कोलॉइड का स्वर्णाक कम होता है। अतः जिलेटिन की रक्षी क्षमता अधिक होगी ।
In simple words: जिलेटिन की स्वर्ण संख्या (0.005) गोंद (0.10) से कम है, जिसका अर्थ है कि जिलेटिन की रक्षी क्षमता गोंद से अधिक है।
🎯 Exam Tip: यह याद रखें कि जितनी कम स्वर्ण संख्या होगी, उतनी ही अधिक रक्षी क्षमता होगी। इस प्रकार के तुलनात्मक प्रश्नों को हल करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण नियम है।
Question 41. गोल्ड सॉल के 10 मिली में 10% NaCl विलयन का 1 मिली डालने से पहले 0.025 ग्राम स्टार्च मिला देने से उसका स्कन्दन पूर्णतया रुक जाता है। स्टार्च की गोल्ड संख्या बताइए।
Answer: 0.025.
In simple words: स्टार्च की गोल्ड संख्या 0.025 है, जो दर्शाती है कि 10 मिली गोल्ड सॉल को स्कंदन से बचाने के लिए 0.025 मिलीग्राम स्टार्च की आवश्यकता होती है।
🎯 Exam Tip: गोल्ड संख्या की गणना और उसके अनुप्रयोग पर आधारित प्रश्न महत्वपूर्ण होते हैं; परिभाषा को संख्यात्मक मानों से जोड़ना सीखें।
Question 42. जिलेटिन की स्वर्ण संख्या 0.005 है। इसका क्या तात्पर्य है?
Answer: इसका तात्पर्य है कि जिलेटिन की 0.005 मिलीग्राम मात्रा 10 मिली गोल्ड के कोलॉइडी विलयन का NaCl के 10% सान्द्रता के 1 मिली विलयन द्वारा स्कन्दन रोकती है।
In simple words: जिलेटिन की स्वर्ण संख्या 0.005 का अर्थ है कि इसकी 0.005 मिलीग्राम मात्रा 10 मिली गोल्ड सॉल को 10% NaCl घोल के 1 मिली द्वारा होने वाले स्कंदन से बचा सकती है।
🎯 Exam Tip: स्वर्ण संख्या की परिभाषा को समझकर उसे विशिष्ट उदाहरणों पर लागू करने का अभ्यास करें, इससे अवधारणा स्पष्ट होती है।
Question 43. पेप्टीकरण की क्रिया को एक उदाहरण द्वारा समझाइए।
Answer: पेप्टीकरण - पेप्टीकरण की विधि स्कन्दन के विपरीत है। इसमें ताजे बने हुए अवक्षेप को किसी वैद्युत-अपघटय के तनु विलयन के साथ हिलाने पर कोलॉइडी विलयन प्राप्त होता है; जैसे- फेरिक हाइड्रॉक्साइड के ताजे अवक्षेप में फेरिक क्लोराइड का विलयन मिलाने पर लाल रंग का \(Fe(OH)_3\) का कोलॉइडी विलयन बनता है।
In simple words: पेप्टीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें एक ताजा अवक्षेप को उपयुक्त विद्युत-अपघट्य की थोड़ी मात्रा के साथ मिलाकर कोलॉइडी विलयन में परिवर्तित किया जाता है।
🎯 Exam Tip: पेप्टीकरण की परिभाषा और इसके उदाहरण को अच्छी तरह से याद करें, क्योंकि यह अक्सर बोर्ड परीक्षाओं में पूछा जाता है।
Question 44. कासियस-पर्पिल क्या है? आप इसे कैसे प्राप्त करेंगे?
Answer: ऑरिक क्लोराइड विलयन का स्टैनस क्लोराइड विलयन द्वारा अपचयन करने पर बैंगनी रंग का गोल्ड सॉल बनता है, जिसे कासियस-पर्पिल कहते हैं। \[2AuCl_3 + 3SnCl_2 \to 2Au + 3SnCl_4\] \[SnCl_4 + 2H_2O \to SnO_2 + 4HCl\]
In simple words: कासियस-पर्पिल एक बैंगनी रंग का गोल्ड सॉल है जिसे ऑरिक क्लोराइड के स्टैनस क्लोराइड द्वारा अपचयन से प्राप्त किया जाता है।
🎯 Exam Tip: कासियस-पर्पिल के निर्माण की रासायनिक अभिक्रिया और उसके रंग को याद रखना स्कोरिंग होता है।
Question 45. गोल्ड सॉल बनाने की ब्रेडिग आर्क विधि का वर्णन कीजिए।
Answer: इस विधि में परिक्षेपण तथा संघनन दोनों क्रियाएँ होती हैं। धातु (गोल्ड) के दो इलेक्ट्रोडों को NaOH की अल्प मात्रा युक्त ठण्डे जल (परिक्षेपण माध्यम) में डुबोकर धातु इलेक्ट्रोडों के बीच विद्युत आर्क उत्पन्न किया जाता है जिससे धातु वाष्पित होती है और ठण्डा करने पर कोलॉइड आकार के कणों में परिवर्तित हो जाती है जिससे गोल्ड सॉल बन जाता है।
In simple words: ब्रेडिग आर्क विधि में धातु इलेक्ट्रोडों के बीच आर्क उत्पन्न करके धातु को वाष्पित किया जाता है, फिर उसे ठंडा करके कोलॉइडी कणों में संघनित कर गोल्ड सॉल बनाया जाता है।
🎯 Exam Tip: ब्रेडिग आर्क विधि के सिद्धांत और क्रियाविधि को समझें, खासकर इसमें शामिल परिक्षेपण और संघनन की दोहरी प्रक्रिया।
Question 46. नैनो पदार्थ किसे कहते हैं?
Answer: ऐसे पदार्थ जिनका आकार 1 से 100 नैनो (अर्थात् 1 से 100 नैनोमीटर पैमाने) के अन्तर्गत होता है, नैनो पदार्थ कहलाते हैं।
In simple words: नैनो पदार्थ वे पदार्थ होते हैं जिनके कणों का आकार 1 से 100 नैनोमीटर के बीच होता है।
🎯 Exam Tip: नैनो पदार्थों की परिभाषा और उनके आकार की सीमा को याद रखना महत्वपूर्ण है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. एक उदाहरण देकर उत्प्रेरक के माध्यमिक यौगिक निर्माण सिद्धान्त को समझाइए ।
Answer: माध्यमिक यौगिक निर्माण सिद्धान्त को सन् 1806 में क्लीमेन्ट तथा डीसोरम्स (Clement and Desormes) ने प्रतिपादित किया था। इस सिद्धान्त के अनुसार उत्प्रेरक किसी एक अभिकारक के साथ क्रिया करके निम्न सक्रियण ऊर्जा वाला एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है। इस सिद्धान्त के अनुसार उत्प्रेरक किसी एक अभिकारक के साथ रासायनिक संयोग करके एक अस्थायी माध्यमिक यौगिक (intermediate compound) बनाता है। वास्तविक अभिक्रिया की तुलना में माध्यमिक यौगिक का निर्माण निम्न ऊर्जा अवरोध का मार्ग प्रदान करता है। माध्यमिक यौगिक बहुत अस्थायी होता है तथा यह माध्यमिक यौगिक दूसरे अभिकारक से क्रिया करके अभीष्ट उत्पाद बनाता है। इस प्रकार से अभिक्रिया उत्प्रेरित हो जाती है। लैड चैम्बर विधि द्वारा सल्फ्यूरिक अम्ल के निर्माण में नाइट्रिक अम्ल उत्प्रेरक की भाँति प्रयुक्त होता है। \[2SO_2 + O_2 \underrightarrow{NO} 2SO_3\]
In simple words: उत्प्रेरक माध्यमिक यौगिक सिद्धांत कहता है कि उत्प्रेरक एक अभिकारक के साथ मिलकर एक अस्थायी मध्यवर्ती यौगिक बनाता है, जो फिर दूसरे अभिकारक के साथ प्रतिक्रिया करके अंतिम उत्पाद बनाता है और उत्प्रेरक मुक्त हो जाता है, जिससे अभिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा कम हो जाती है।
🎯 Exam Tip: इस सिद्धांत की क्रियाविधि और उदाहरण को अच्छी तरह से समझें, विशेषकर मध्यवर्ती यौगिक के बनने और टूटने की प्रक्रिया।
Question 2. अधिशोषण सिद्धान्त के आधार पर ठोस उत्प्रेरक की क्रियाशीलता को समझाइए ।
Answer: इस सिद्धान्त के अनुसार, ठोस उत्प्रेरक अभिकारकों को अपनी सतह पर अधिशोषित कर लेता है। जिससे इनका ठोस की सतह पर सान्द्रण बढ़ जाता है और द्रव्य-अनुपाती क्रिया के नियमानुसार अभिक्रिया का वेग बढ़ जाता है, परन्तु यह सिद्धान्त इस दृष्टि से अपूर्ण है, कि इससे गैस तथा द्रव उत्प्रेरकों के प्रभाव को नहीं समझाया जा सकता। अतः इसका आधुनिक रूप निम्न प्रकार है - आधुनिक अधिशोषण सिद्धान्त - आधुनिक सिद्धान्त, माध्यमिक यौगिक सिद्धान्त तथा अधिशोषण सिद्धान्त का संयुक्त रूप है। उदाहरणार्थ - जब वनस्पति तेलों में हाइड्रोजन गैस निकिल उत्प्रेरक की उपस्थिति में प्रवाहित की जाती है। तो तेलों को हाइड्रोजनीकरण होता है और वनस्पति घी बनता है। Ni उत्प्रेरक की क्रियाविधि को निम्न प्रकार समझाया जा सकता है -
1. अभिकारक अणुओं (वनस्पति तेल, हाइड्रोजन) का सान्द्रण उत्प्रेरक की सतह पर बढ़ जाता है। जिसके कारण अभिक्रिया का वेग बढ़ता है।
2. Ni उत्प्रेरक की सतह पर विद्यमान मुक्त संयोजकताएँ अभिकारक अणुओं (वनस्पति तेल, हाइड्रोजन) से अस्थायी संयोग कर संक्रियित संकर बना लेती हैं जिससे उनके आकार में तनाव आ जाता है।
3. इस तनाव तथा संक्रियित संकर की अधिक ऊर्जा के कारण अभिकारक अणुओं (वनस्पति तेल, हाइड्रोजन) की क्रियाशीलता बढ़ जाती है और संक्रियित संकर शीघ्र ही अपघटित होकर उत्पाद देता
4. इस प्रकार बने उत्पाद (वनस्पति घी) के अणु उत्प्रेरक की मुक्त संयोजकताओं को छोड़कर सतह से पृथक् हो जति हैं और अभिकारक के नये अणु फिर इसी क्रम को दोहराते हैं। इसी सिद्धान्त के अन्तर्गत यह अनुभव किया गया है कि उत्प्रेरक (Ni) की सतह पर उत्प्रेरण क्षमता समान नहीं होती है। ठोस उत्प्रेरक के पृष्ठ पर कुछ बिन्दु ऐसे होते हैं, जहाँ अधिशोषित अभिकारी अणुओं का सान्द्रण अपेक्षाकृत अधिक होता है, क्योंकि इन बिन्दुओं पर मुक्त संयोजकताओं की संख्या अपेक्षाकृत अधिक होती है। इन बिन्दुओं को सक्रिय केन्द्र (active centres) कहते हैं। सक्रिय केन्द्र मुख्यतः दरारों (cracks), शिखरों (peaks), किनारों (edges) व कोनों (corners) पर होते हैं।
In simple words: ठोस उत्प्रेरक अधिशोषण सिद्धांत के अनुसार, उत्प्रेरक अभिकारक अणुओं को अपनी सतह पर अधिशोषित करता है, जिससे उनकी सांद्रता बढ़ती है और अभिक्रिया का वेग तेज हो जाता है। उत्प्रेरक की सतह पर सक्रिय केंद्र (दरारें, शिखर, किनारे) होते हैं जो अभिक्रिया को बढ़ावा देते हैं।
🎯 Exam Tip: अधिशोषण सिद्धांत के मुख्य बिंदुओं और सक्रिय केंद्रों की भूमिका पर ध्यान दें। उदाहरण के साथ क्रियाविधि का वर्णन करना महत्वपूर्ण है।
Question 3. एन्जाइम उत्प्रेरण क्या है ? इनके सामान्य लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
Answer: एन्जाइम (enzyme) जटिल, उच्च अणुभार वाले नाइट्रोजनयुक्त कार्बनिक पदार्थ हैं। ये पेड़-पौधों तथा जीव-जन्तुओं की जीवित कोशिका में उत्पन्न होते हैं। ये मुख्यतः प्रोटीनीय पदार्थ होते हैं और कोलॉइडी प्रकृति के होते हैं। ये बहुत-सी जीव रासायनिक अभिक्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करते हैं; अतः इनको जीव रासायनिक (biochemical) उत्प्रेरक भी कहते हैं तथा इस घटना को एन्जाइम उत्प्रेरण कहते हैं। इनका नाम मुख्यतः ऐस पर समाप्त होता है; जैसे- जाइमेस, इन्वटेंस, माल्टेस, डायस्टेस, यूरिऐस आदि । इनकी क्रिया विषमांग उत्प्रेरणात्मक प्रकृति की होती है तथा क्रिया की गति अभिक्रिया में भाग लेने वाले पदार्थों की सान्द्रता के समानुपाती होती है। इन्वर्टेस एक प्रमुख एन्जाइम उत्प्रेरक है जो सुक्रोस का ग्लूकोस व फ्रक्टोस में परिवर्तन कर देता है।
एन्जाइमों के लक्षण
1. ये उच्च अणुभार वाले जटिल नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक पदार्थ हैं। ये उच्च कार्बनिक पदार्थों को सरलतम पदार्थों में बदलने की क्रियाओं को उत्प्रेरित करते हैं।
2. एन्जाइम जल में कोलॉइडी विलयन बनाते हैं और इस अवस्था में बहुत प्रभावी उत्प्रेरक के रूप में कार्य करते हैं।
3. एन्जाइम किसी उत्क्रमणीय अभिक्रिया की अन्तिम साम्य स्थिति को प्रभावित नहीं करते।
4. एन्जाइम की उत्प्रेरक क्षमता अत्यन्त विशिष्ट होती है। एक विशेष एन्जाइम केवल एक ही अभिक्रिया को उत्प्रेरित कर सकता है। यदि कोई क्रिया कई पदों में होती है तो प्रत्येक पद के लिए भिन्न एन्जाइम उत्प्रेरक होता है। सुक्रोस से एथिल ऐल्कोहॉल बनने की क्रिया दो पदों में होती है जिनमें भिन्न-भिन्न एन्जाइम उत्प्रेरक उत्प्रेरण करते हैं।
\[C_{12}H_{22}O_{11} + H_2O \xrightarrow{\text{इन्वर्टेस एन्जाइम}} C_6H_{12}O_6 + C_6H_{12}O_6\] सुक्रोस ग्लूकोस फ्रक्टोस \[C_6H_{12}O_6 \xrightarrow{\text{जाइमेस एन्जाइम}} 2C_2H_5OH + 2CO_2\uparrow\]
5. ये अधिक ताप (लगभग 70°C) और विषैले पदार्थों (वैद्युत-अपघटय) से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। शरीर के ताप पर ये सबसे अच्छा कार्य करते हैं। इनकी क्रिया के लिए अनुकूलतम ताप 20°C - 30°C तक है।
6. एन्जाइम की बहुत सूक्ष्म मात्रा ही पदार्थों की बहुत अधिक मात्रा को प्रभावित करती है।
7. प्रक्रिया में बने पदार्थों के एकत्रित हो जाने से क्रिया धीमी हो जाती है।
8. सह-एन्जाइम (co-enzyme) की उपस्थिति में इनकी क्रियाशीलता बढ़ जाती है।
9. इनकी क्रियाशीलता पराबैंगनी किरणों द्वारा नष्ट हो जाती है।
10. एन्जाइम उत्प्रेरक की क्रियाशीलता pH परिवर्तन से बहुत प्रभावित होती है। प्रत्येक एन्जाइम की उत्प्रेरक सक्रियता किसी pH पर अधिकतम होती है, जिसे अनुकूलन pH कहते हैं। एन्जाइमों की अनुकूलन pH साधारणतया 5 - 7 होती है। इनका नाम उस अभिक्रिया की प्रकृति पर निर्भर होता है जिसमें ये भाग लेते हैं और ऑक्सीडेस, रिडक्ट्रेस, हाइड्रेलेस आदि कहलाते हैं।
In simple words: एन्जाइम उच्च अणुभार वाले प्रोटीन हैं जो जैविक अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करते हैं। ये अत्यधिक विशिष्ट होते हैं, तापमान और pH के प्रति संवेदनशील होते हैं, और इनकी सूक्ष्म मात्रा भी बड़ी अभिक्रियाओं को प्रभावित कर सकती है।
🎯 Exam Tip: एन्जाइम उत्प्रेरण के विशिष्ट लक्षण, जैसे उच्च विशिष्टता, तापमान और pH संवेदनशीलता, और उदाहरणों को याद रखें।
Question 4. कोलॉइडी विलयनों के सामान्य भौतिक गुणों का वर्णन कीजिए ।
Answer: कोलॉइडी विलयनों के सामान्य भौतिक गुण निम्नवत् हैं -
1. विषमांग प्रकृति - कोलॉइडी विलयन प्रकृति में विषमांग होते हैं तथा इनमें दो प्रावस्थाएँ-परिक्षिप्त । प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम होते हैं।
2. स्थायित्व - सामान्यतः द्रवरागी सॉल तथा सूक्ष्म मात्रा में वैद्युत अपघटय के उपस्थित होने पर द्रव-विरागी कोलॉइड स्थायी होते हैं तथा इनके परिक्षिप्त कण कुछ समय तक रखने पर नीचे नहीं बैठते हैं लेकिन लम्बे समय तक रखने पर बड़े आकार के कुछ कोलॉइडी कण बैठ जाते हैं।
3. परिक्षिप्त कणों की दृश्यता - यद्यपि कोलॉइडी विलयन प्रकृति में विषमांग होते हैं लेकिन उनमें उपस्थित परिक्षिप्त कणों को नेत्रों द्वारा देखा जाना सम्भव नहीं है। नेत्रों द्वारा देखने पर ये समांग प्रतीत होते हैं। इसका कारण यह है कि नेत्र द्वारा देखे जाने वाले सबसे छोटे कणों की तुलना में भी कोलॉइडी कणों का आकार छोटा होता है। कोलॉइडी विलयनों के कणों को साधारण सूक्ष्मदर्शी द्वारा - भी नहीं देखा जा सकता है।
4. छननता - अत्यन्त सूक्ष्म कणों की उपस्थिति के कारण कोलॉइडी विलयन सामान्य फिल्टर पेपर से पार हो जाते हैं, लेकिन जन्तु झिल्ली, सैलोफेन या अति सूक्ष्म फिल्टर से कोलॉइड़ी कण पार नहीं हो पाते हैं।
5. रंग - कोलॉइडी विलयन का रंग परिक्षिप्त कणों के द्वारा प्रकीर्णित प्रकाश के तरंगदैर्ध्य पर निर्भर करता है। इसके अतिरिक्त, प्रकाश का तरंगदैर्ध्य कणों के आकार एवं प्रकृति पर निर्भर करता है। कोलॉइडी विलयनों का रंग प्रेक्षक द्वारा प्रकाश को ग्रहण करने के तरीके पर भी निर्भर करता है। उदाहरण के लिए दूध एवं पानी का मिश्रण परावर्तित प्रकाश में देखने पर नीला एवं संचरित प्रकाश में देखने पर लाल दिखाई देता है। सूक्ष्मतम कणों वाले गोल्ड सॉल का रंग लाल होता है, जैसे- जैसे कणों का आकार बढ़ता जाता है यह बैंगनी, फिर नीला और अन्त में स्वर्णिम हो जाता है।
In simple words: कोलॉइडी विलयन विषमांगी होते हैं, आमतौर पर स्थिर होते हैं, नग्न आंखों से दिखाई नहीं देते, सामान्य फिल्टर पेपर से गुजर जाते हैं, लेकिन अर्धपारगम्य झिल्ली से नहीं, और उनका रंग प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण कणों के आकार और प्रकृति पर निर्भर करता है।
🎯 Exam Tip: कोलॉइडी विलयनों के सभी भौतिक गुणों को विस्तृत रूप से पढ़ें और उदाहरणों के साथ उनकी व्याख्या करने का अभ्यास करें। टिंडल प्रभाव और रंग जैसे गुण विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
Question 5. समझाइए कि \(As_2S_3\) के कोलॉइडी कण ऋणावेशित क्यों होते हैं?
Answer: आर्सेनियस ऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड की अभिक्रिया से बने आर्सेनियस सल्फाइड के कण विलयन से सल्फाइड आयनों को पृष्ठ पर अधिशोषित करके ऋणावेशित हो जाते हैं। सल्फाइड आयन (S) प्राथमिक अधिशोषित स्तर और हाइड्रोजन आयन (H+) द्वितीयक विसरित स्तर बनाते हैं। \[[As_2S_3]S^{2-} : 2H^+\] इसलिए \(AS_2S_3\) के कोलॉइडी कण ऋणावेशित हो जाते हैं।
In simple words: आर्सेनियस सल्फाइड के कोलॉइडी कण विलयन से सल्फाइड आयनों को अपनी सतह पर अधिशोषित कर लेते हैं, जिससे उन पर ऋणात्मक आवेश आ जाता है और वे ऋणावेशित हो जाते हैं।
🎯 Exam Tip: कोलॉइडी कणों पर आवेश के निर्माण के सिद्धांत को समझें, खासकर पेप्टीकरण और अधिशोषण प्रक्रियाओं में।
Question 6. ब्राउनियन गति पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Answer: कोलॉइडी सॉल में कोलॉइडी कणों की लगातार टेढ़ी-मेढ़ी गति को ब्राउनियन गति कहा जाता है। ब्राउनियन गति कोलॉइडी कणों के आकार और सॉल की श्यानता पर निर्भर करती है। कोलॉइडी कणों का आकार जितना छोटा और श्यानता जितनी कम होगी, ब्राउनियन गति उतनी ही तीव्र होगी। यह कोलॉइड की प्रकृति पर निर्भर नहीं करती है। कोलॉइडी कणों पर गति करते हुये परिक्षेपण माध्यम के अणुओं के असमान प्रहारों के कारण ब्राउनियन गति उत्पन्न होती है। परिक्षेपण माध्यम के अणु गति करते हुए सभी दिशाओं में कोलॉइडी कणों से लगातार टकराते हैं जिससे कोलॉइडी कणों में गृति आ जाती है। चूंकि कणों पर होने वाली टक्करों के बल असमान होते हैं इस कारण कोलॉइडी कण किसी विशेष दिशा में गति करते हैं। जैसे ही एक कण किसी निश्चित दिशा में गति करता है वैसे ही माध्यम के अन्य अणु इससे टकराते हैं जिससे कण अपने गति करने की दिशा में परिवर्तन कर लेता है। यह प्रक्रम लगातार चलने के कारण कण टेढ़े-मेढ़े पथ पर गति करता है। कोलॉइडी कणों के आकार बढ़ने पर ब्राउनियन गति का मान कम हो जाता है। यही कारण है कि निलम्बन (suspension) ब्राउनियन गति प्रदर्शित नहीं करते हैं।
In simple words: ब्राउनियन गति कोलॉइडी कणों की तरल माध्यम में अनियमित, टेढ़ी-मेढ़ी गति है, जो परिक्षेपण माध्यम के अणुओं द्वारा उन पर असमान टक्करों के कारण होती है।
🎯 Exam Tip: ब्राउनियन गति की परिभाषा, उसके कारणों और किन कारकों पर यह निर्भर करती है, यह सब स्पष्ट रूप से समझें।
Question 7. हाड-शुल्जे नियम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। या “आयनों का स्कन्दन प्रभाव आयनों की संयोजकता पर निर्भर करता है। इस कथन को उदाहरण देकर समझाइए ।
Answer: अधिक मात्रा में वैद्युत-अपघटय मिलाकर किसी कोलॉइडी विलयन की स्कन्दन (अवक्षेपण) क्रिया के लिए हार्डी-शुल्जे (Hardy - Schulze) ने निम्नलिखित दो नियम दिये, जिन्हें हार्डी-शुल्जे नियम कहते हैं -
1. कोलॉइडी विलयन के स्कन्दन के लिए मिलाये गये वैद्युत-अपघटय के वे आयन सक्रिय होते हैं, जिनका आवेश कोलॉइडी कणों के आवेश के विपरीत होता है।
2. सॉल को स्कन्दित करने वाले आयन की शक्ति आयन की संयोजकता पर निर्भर होती है। समान संयोजकता वाले आयनों की स्कन्दित करने की शक्ति तथा मात्रा समान होती है। अधिक संयोजकता वाले आयनों की स्कन्दन क्षमता अधिक होती है, अर्थात् हार्डी-शुल्जे नियम के अनुसार, 'आयनों की स्कन्दन शक्ति आयन की संयोजकता बढ़ने के साथ बढ़ती है।' यदि \(As_2S_3\) सॉल में NaCl, \(BaCl_2\) तथा \(AlCl_3\) वैद्युत-अपघटच अलग-अलग मिलाये जाएँ तो इनके \(Na^+\), \(Ba^{2+}\) तथा \(Al^{3+}\) आयन ऋण आवेशित \(AS_2S_3\) सॉल को अवक्षेपित कर देते हैं। हार्डी-शुल्जे के नियमानुसार, अधिक संयोजकता वाला आयन अधिक स्कन्दन करता है। अतः \(Al^{3+}\), \(Ba^{2+}\) तथा \(Na^+\) आयनों की स्कन्दन क्षमता का क्रम निम्नलिखित होगा -
\(Al^{3+} > Ba^{2+} > Na^+\) अत: इन आयनों से Aspss के समान मात्रा में अवक्षेपण में NaCl, \(BaCl_2\) तथा \(AlCl_3\) की मात्रा का निम्नलिखित क्रम होगा -
NaCl > \(BaCl_2\) > \(AlCl_3\) इसी प्रकार, धनावेशित सॉल के प्रति ऋणायनों की स्कन्दन शक्ति निम्न प्रकार घटती है -
\(Fe(CN)^{4-} > PO_4^{3-} > SO_4^{2-} > Cl^-\)
In simple words: हार्डी-शुल्जे नियम बताता है कि कोलॉइडी सॉल के स्कंदन के लिए, विपरीत आवेशित आयन सक्रिय होते हैं, और उनकी स्कंदन शक्ति उनकी संयोजकता के सीधे समानुपाती होती है - जितनी अधिक संयोजकता, उतनी अधिक स्कंदन शक्ति।
🎯 Exam Tip: हार्डी-शुल्जे नियम के दोनों नियमों और उनके अनुप्रयोगों, विशेषकर आयनों की संयोजकता और स्कंदन शक्ति के संबंध को, उदाहरणों के साथ समझें।
Question 8. पायस, पायसीकरण तथा पायसीकारक को समझाइए। पायसों का निर्माण कैसे होता है?
Answer: पायस - द्रव के द्रव में परिक्षेपण को पायस कहते हैं। इसे निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है - जब परिक्षेपण माध्यम एवं परिक्षिप्त प्रावस्था दोनों ही द्रव हों तो इन दोनों प्रावस्थाओं से बने कोलॉइडी विलयन को पायस कहा जाता है। पायसों का निर्माण - दो द्रवों को प्रबल रूप से मिश्रित करके पायस बनाये जा सकते हैं। दो द्रवों को मिश्रित करने के लिये उच्च गति की मिश्रण मशीन (high speed mixing machine) या अल्ट्रासोनिक वाइब्रेटर (ultrasonic vibrator) का प्रयोग किया जाता है। इस प्रक्रम को पायसीकरण (emulsification) कहते हैं। चूंकि पायसों को बनाने में प्रयुक्त दोनों द्रव एक-दूसरे में अमिश्रणीय होते हैं अतः पायस को बनाने में एक स्थायीकारक की आवश्यकता होती है, जिसे पायसीकारक (emulsifier) कहा जाता है। पायसीकारक को घटक द्रवों के साथ मिलाया जाता है। o/w प्रकार के पायस के लिए प्रमुख पायसीकारक प्रोटीन, गोंद, प्राकृतिक एवं संश्लेषित साबुन आदि हैं जबकि w/o प्रकार के पायस के लिए वसीय अम्लों के भारी धातुओं के लवण, लंबी श्रृंखला वाले ऐल्कोहॉल, काजल (lamp black) आदि प्रमुख पायसीकारक हैं।
In simple words: पायस दो अमिश्रणीय द्रवों का कोलॉइडी मिश्रण है। पायसीकरण वह प्रक्रिया है जिससे पायस का निर्माण होता है, जिसमें एक पायसीकारक पदार्थ (जैसे साबुन) दो द्रवों को स्थायी रूप से मिलाने में मदद करता है।
🎯 Exam Tip: पायस, पायसीकरण और पायसीकारक की परिभाषाओं को स्पष्ट रूप से समझें। विभिन्न पायसीकारकों के उदाहरण भी याद रखें।
Question 9. पायस कितने प्रकार के होते हैं? प्रत्येक का उल्लेख कीजिए।
Answer: परिक्षिप्त प्रावस्था की प्रकृति के आधार पर पायसों को निम्नलिखित दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है -
1. जल में तेल (o/w) प्रकार के पायस - इस प्रकार के पायसों में तेल परिक्षिप्त प्रावस्था के रूप में कार्य करता है जबकि जल परिक्षेपण माध्यम की भाँति कार्य करता है। इस प्रकार के पायस के उदाहरण दूध और वैनिशिंग क्रीम हैं। दूध में द्रव वसा जल में परिक्षिप्त रहती है।
2. तेल में जल (w/o) प्रकार के पायस - इस प्रकार के पायसों में जल परिक्षिप्त प्रावस्था की तरह कार्य करता है जबकि तेल परिक्षेपण माध्यम की भाँति कार्य करता है। इस प्रकार के पायस का मुख्य उदाहरण कॉड-लीवर तेल (cod liver oil) है। मक्खन (butter) और कोल्ड क्रीम (cold cream) भी इसी प्रकार के पायस हैं। स्पष्ट है कि पायस का प्रकार दोनों द्रवों को सापेक्षिक मात्राओं पर निर्भर करता है। जल अधिक होने पर पायस जल में तेल प्रकार का पायस होता है जबकि तेल अधिक होने पर पायस तेल में जल प्रकार का पायस होता है। पायस का प्रकार पायसीकारक की प्रकृति पर भी निर्भर करता है। उदाहरणार्थ - पायसीकारक के रूप में विलेय साबुन की उपस्थिति से जल में तेल प्रकार के पायस का निर्माण होता है। जबकि अविलेय साबुन तेल में जल प्रकार के पायसों का निर्माण करते हैं।
In simple words: पायस दो प्रकार के होते हैं: जल में तेल (o/w), जहाँ तेल जल में फैला होता है (जैसे दूध); और तेल में जल (w/o), जहाँ जल तेल में फैला होता है (जैसे मक्खन)।
🎯 Exam Tip: पायस के दोनों प्रकारों - जल में तेल (o/w) और तेल में जल (w/o) - को उनके विशिष्ट उदाहरणों के साथ याद रखना महत्वपूर्ण है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
Question 1. ठोसों पर गैसों के अधिशोषण को प्रभावित करने वाले कारकों का विस्तृत वर्णन कीजिए ।
Answer: ठोस पदार्थों की सतहों पर गैसों का अधिशोषण अत्यन्त सामान्य है। एक ठोस की सतह पर असन्तुलित (unbalanced) आणविक बल उपस्थित रहते हैं। इन असन्तुलित बलों को सन्तुष्ट करने के लिए ही ठोस पदार्थ अन्य पदार्थों को अपनी सतह पर एकत्रित करते हैं। ठोस पदार्थों की सतहों पर गैसों का अधिशोषण अग्रलिखित कारकों पर निर्भर करता है -
1. अधिशोषक की प्रकृति, पृष्ठ क्षेत्रफल तथा प्रविभाजित अवस्था - ठोस अधिशोषक की सतह पर एक अवशिष्ट बल क्षेत्र (residual force field) का होना आवश्यक है। यह क्षेत्र जितना अधिक होगा, उसमें अधिशोषण की प्रवृत्ति उतनी ही अधिक होगी। चूंकि अधिशोषण एक पृष्ठ घटना है, अतः इसके सम्पन्न होने की सीमा अधिशोषक के पृष्ठ क्षेत्रफल पर भी निर्भर करती है। अधिशोषक का पृष्ठ क्षेत्रफल जितना अधिक होगा, उसकी सतह पर उतना ही अधिक अधिशोषण होगा । यही कारण है कि चारकोल और सिलिका जैल अच्छे अधिशोषक हैं क्योंकि वे सरंध्र (porous) होते हैं और इसलिए उनका पृष्ठीय क्षेत्रफल भी अत्यधिक होता है। एक अधिशोषक के पृष्ठ क्षेत्रफल में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि उसकी प्रविभाजित अवस्था (state of subdivision) में वृद्धि करके की जा सकती है। आकार में बड़े कणों की तुलना में उतने ही द्रव्यमान के सूक्ष्म वितरित (finely divided) कणों का पृष्ठ क्षेत्रफल बहुत अधिक होता है। यही कारण है कि कोलॉइडी अवस्था में स्थित एक पदार्थ निस्यन्द रूप में स्थित पदार्थ की तुलना में अधिक अच्छा अधिशोषक सिद्ध होता है। सूक्ष्म वितरित धातुएँ; जैसे- निकिल, प्लेटिनम आदि प्रभावशाली उत्प्रेरकों की भाँति कार्य करती हैं।
2. अधिशोषित पदार्थ की प्रकृति - किसी एक निश्चित ताप पर एक विशिष्ट अधिशोषक पर अधिशोषित होने वाली गैसों की मात्रा भी भिन्न-भिन्न होती है। नीचे सारणी में 288K पर 1 g चारकोल द्वारा अधिशोषित (NTP पर) विभिन्न गैसों के आयतन दिए गए हैं -
| गैस | H2 | N2 | CO | CH2 | CO2 | HCl | NH2 | SO2 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अधिशोषित आयतन (ml) | 4.7 | 8.0 | 9.3 | 16.2 | 48 | 72 | 181 | 380 |
| क्रांतिक ताप (K) | 33 | 126 | 134 | 190 | 304 | 324 | 406 | 430 |
3. ताप - किसी अधिशोषक विशेष द्वारा किसी अधिशोषित गैस की मात्रा ताप में वृद्धि करने पर घटती है तथा ताप घटाने पर बढ़ती है। ताप में वृद्धि के साथ अधिशोषण में कमी को निम्न प्रकार समझा जा सकता है- अधिशोषण में दो प्रक्रम एक साथ होते हैं- ठोस के पृष्ठ पर गैस के अणुओं का संघनन अर्थात् अधिशोषण (adsorption) और ठोस के पृष्ठ से अणुओं का गैसीय प्रावस्था में वाष्पन अर्थात् विशोषण (desorption) । अधिशोषण एक ऊष्माक्षेपी प्रक्रम है तथा उपरोक्त दोनों प्रक्रमों में निम्न साम्य स्थापित हो जाता है -
संघनन (अधिशोषण)
गैस + ठोस \( \rightleftharpoons \) ठोस पर अधिशोषित गैस + ऊष्मा
(अधिशोष्य) (अधिशोषक)
वाष्पन ला- शातेलिए के नियमानुसार, ताप में वृद्धि करने पर अधिशोषण घटता है तथा ताप कम करने पर अधिशोषण में वृद्धि होती है।
4. दाब - स्थिर ताप पर, दाब में वृद्धि के साथ गैस के अधिशोषण में भी वृद्धि होती है। निम्न ताप पर जब दाब निम्न मानों से बढ़ाया जाता है तो गैसों के अधिशोषण में तीव्रता से वृद्धि होती है। विभिन्न स्थिर तापों पर 1 ग्राम चारकोल द्वारा N, गैस के अधिशोषण का दाब के साथ विचरण अग्र ग्राफ में दर्शाया गया है -
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह ग्राफ नाइट्रोजन गैस के अधिशोषण की मात्रा को विभिन्न स्थिर तापों (83 K, 195 K, 244 K, 273 K) पर दाब के फलन के रूप में दर्शाता है। y-अक्ष पर N2 का अधिशोषित आयतन (mL में) और x-अक्ष पर पारे के cm में दाब (Pressure in cm of Hg) दिखाया गया है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि जैसे-जैसे तापमान घटता है, समान दाब पर अधिशोषित गैस की मात्रा बढ़ती जाती है, और एक निश्चित तापमान पर, दाब बढ़ने के साथ अधिशोषण की मात्रा भी बढ़ती है, लेकिन उच्च दाब पर संतृप्ति की ओर अग्रसर होती है।
चित्र 10 : विभिन्न स्थिर तापों पर चारकोल द्वारा N₂ के अधिशोषण का दाब के साथ विचरण
5. ठोस अधिशोषण का सक्रियण - अधिशोषक को सक्रियत करके अर्थात् उसके पृष्ठ क्षेत्रफल में वृद्धि करके भी उसकी अधिशोषण क्षमता में वृद्धि की जा सकती है। इसके लिए अधिशोषक को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ा जा सकता है। यहाँ यह विशेष रूप से ध्यान रखने योग्य है कि यदि तोड़ने पर अधिशोषक लगभग चूर्ण रूप में हो जाता है तो गैस उसमें प्रवेश नहीं कर पाती है और इस स्थिति में अधिशोषण घट जाता है। अधिशोषक के पृष्ठ को खुरचकर अथवा रासायनिक विधि द्वारा खुरदरा बनाकर भी अधिशोषक की अधिशोषण क्षमता में वृद्धि की जा सकती है।
In simple words: ठोसों पर गैसों का अधिशोषण अधिशोषक की प्रकृति, उसके पृष्ठ क्षेत्रफल, अधिशोषित होने वाली गैस की प्रकृति, तापमान और दाब जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है। अधिशोषक का बड़ा पृष्ठ क्षेत्रफल और अधिशोषक का सक्रियण अधिशोषण क्षमता को बढ़ाता है, जबकि उच्च तापमान इसे घटाता है।
🎯 Exam Tip: अधिशोषण को प्रभावित करने वाले प्रत्येक कारक को उसकी विस्तृत व्याख्या और उपयुक्त उदाहरणों के साथ तैयार करें। तालिका और ग्राफ को समझना भी महत्वपूर्ण है।
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