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Detailed Chapter 11 अल्कोहल, फिनोल और ईथर UP Board Solutions for Class 12 Chemistry
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Class 12 Chemistry Chapter 11 अल्कोहल, फिनोल और ईथर UP Board Solutions PDF
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 11 Alcohols Phenols and Ethers (ऐल्कोहॉल, फीनॉल एवं ईथर)
अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर
Question 1. निम्नलिखित को प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक ऐल्कोहॉल में वर्गीकृत कीजिए –
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): (i) एक तीन कार्बन परमाणु की श्रृंखला है, जिसमें दूसरे कार्बन पर दो मेथिल समूह (-CH3) और पहले कार्बन पर एक -CH2OH समूह जुड़ा है। यह 2,2-डाइमेथिल प्रोपेन-1-ऑल है।
(ii) एक तीन कार्बन परमाणु की श्रृंखला है, जिसमें पहले कार्बन पर एक -CH2OH समूह और दूसरे और तीसरे कार्बन के बीच एक द्वि-आबंध (C=C) है। यह प्रोप-2-ईन-1-ऑल है।
(iii) एक तीन कार्बन परमाणु की सीधी श्रृंखला है, जिसमें पहले कार्बन पर एक -OH समूह जुड़ा है। यह प्रोपेन-1-ऑल है।
(iv) एक साइक्लोहेक्सेन वलय है जिसके एक कार्बन से -CH(OH)CH3 समूह जुड़ा है। यह 1-साइक्लोहेक्सिलएथेनॉल है।
(v) एक बेंजीन वलय है जिसके एक कार्बन से -CH2-CH(OH)-CH3 समूह जुड़ा है। यह 3-फेनिलप्रोपेन-2-ऑल है।
(vi) एक बेंजीन वलय है जिसके एक कार्बन से -CH=CH-C(OH)(CH3)CH3 समूह जुड़ा है। यह 4-फेनिल-2-मेथिलब्यूट-3-ईन-2-ऑल है।
Answer: प्राथमिक ऐल्कोहॉल : (i), (ii), (iii) द्वितीयक ऐल्कोहॉल : (iv), (v) तृतीयक ऐल्कोहॉल : (vi)
In simple words: प्राथमिक ऐल्कोहॉल में -OH समूह से जुड़ा कार्बन केवल एक अन्य कार्बन से जुड़ा होता है, द्वितीयक में दो से, और तृतीयक में तीन अन्य कार्बन से जुड़ा होता है। इस वर्गीकरण के आधार पर दिए गए यौगिकों को पहचाना गया है।
🎯 Exam Tip: ऐल्कोहॉलों के वर्गीकरण को पहचानने के लिए -OH समूह से सीधे जुड़े कार्बन परमाणु (अल्फा-कार्बन) पर प्रतिस्थापित एल्किल समूहों की संख्या पर ध्यान दें।
Question 2. उपर्युक्त उदाहरणों में से ऐलिलिक ऐल्कोहॉलों को पहचानिए।
Answer: उत्तर (ii) तथा (vi)
In simple words: ऐलिलिक ऐल्कोहॉल वे होते हैं जिनमें -OH समूह sp3 संकरित कार्बन परमाणु से जुड़ा होता है, जो आगे एक कार्बन-कार्बन द्वि-आबंध (C=C) से जुड़े sp2 संकरित कार्बन परमाणु के पास होता है। (ii) और (vi) इन मानदंडों को पूरा करते हैं।
🎯 Exam Tip: ऐलिलिक ऐल्कोहॉल की पहचान के लिए, सुनिश्चित करें कि -OH समूह वाले कार्बन के ठीक बगल में एक डबल बॉन्ड मौजूद हो।
Question 3. निम्नलिखित यौगिकों के आई०यू०पी०ए०सी० (IUPAC) नामपद्धति से नाम दीजिए –
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): (i) एक पेंटेन श्रृंखला है जिसमें पहले कार्बन पर -CH2OH समूह, दूसरे कार्बन पर एक आइसोप्रोपिल समूह (-CH(CH3)2) और तीसरे कार्बन पर एक क्लोरोमेथिल समूह (-CH2Cl) जुड़ा है।
(ii) एक हेक्सेन श्रृंखला है जिसमें पहले कार्बन पर -CH2OH समूह, दूसरे कार्बन पर एक मेथिल समूह (-CH3), तीसरे कार्बन पर एक हाइड्रोक्सिल समूह (-OH) और पाँचवें कार्बन पर एक मेथिल समूह (-CH3) जुड़ा है।
(iii) एक साइक्लोहेक्सेन वलय है जिसके पहले कार्बन पर एक -OH समूह और तीसरे कार्बन पर एक -Br समूह जुड़ा है।
(iv) एक हेक्सेन श्रृंखला है जिसमें पहले और दूसरे कार्बन के बीच एक द्वि-आबंध (C=C), और तीसरे कार्बन पर एक -OH समूह जुड़ा है।
(v) एक चार कार्बन परमाणु की श्रृंखला है जिसमें पहले कार्बन पर -CH2OH समूह, दूसरे और तीसरे कार्बन के बीच एक द्वि-आबंध (C=C), दूसरे कार्बन पर एक ब्रोमीन परमाणु (-Br) और तीसरे कार्बन पर एक मेथिल समूह (-CH3) जुड़ा है।
Answer: उत्तर (i) 3-क्लोरोमेथिल-2-आइसोप्रोपिलपेण्टेन-1-ऑल (ii) 2,5-डाइमेथिलहेक्सेन-1,3-डाइऑल (iii) 3-ब्रोमोसाइक्लोहेक्सेनॉल (iv) हेक्स-1-ईन-3-ऑल (v) 2-ब्रोमो-3-मेथिलब्यूट-2-ईन-1-ऑल
In simple words: दिए गए रासायनिक संरचनाओं के लिए IUPAC नामकरण नियमों का पालन करके, सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला की पहचान की गई, क्रियात्मक समूह को प्राथमिकता दी गई, और प्रतिस्थापियों को वर्णानुक्रम में सूचीबद्ध करके नाम दिए गए।
🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण करते समय, सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला चुनें जिसमें क्रियात्मक समूह शामिल हो, क्रियात्मक समूह को सबसे कम संख्या दें, और प्रतिस्थापियों को उनके अल्फाबेटिकल क्रम में सूचीबद्ध करें।
Question 4. दर्शाइए कि मेथेनल पर उपयुक्त ग्रीन्यार अभिकर्मक से अभिक्रिया द्वारा निम्नलिखित ऐल्कोहॉल कैसे विरचित किए जाते हैं? (i) CH3-CH-CH2OH CH3 (ii) CH2OH
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): (i) 2-मेथिलप्रोपेन-1-ऑल का निर्माण दिखाया गया है। आइसोप्रोपिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड (CH3-CH(CH3)-MgBr) मेथेनल (HCHO) के साथ अभिक्रिया करके एक मध्यवर्ती ओमेगब्रोमाइड बनाता है, जो जल-अपघटन पर 2-मेथिलप्रोपेन-1-ऑल (CH3-CH(CH3)-CH2OH) देता है।
(ii) साइक्लोहेक्सिलमेथेनॉल का निर्माण दिखाया गया है। साइक्लोहेक्सिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड मेथेनल (HCHO) के साथ अभिक्रिया करके एक मध्यवर्ती ओमेगब्रोमाइड बनाता है, जो जल-अपघटन पर साइक्लोहेक्सिलमेथेनॉल देता है।
Answer: उत्तर
(i) \( \text{CH}_3\text{-CH(CH}_3\text{)-MgBr + HCHO} \longrightarrow \text{CH}_3\text{-CH(CH}_3\text{)-CH}_2\text{OMgBr} \)
\( \text{CH}_3\text{-CH(CH}_3\text{)-CH}_2\text{OMgBr} \xrightarrow{\text{H}_2\text{O}} \text{CH}_3\text{-CH(CH}_3\text{)-CH}_2\text{OH + Mg(OH)Br} \)
(ii) \( \text{Cyclohexyl MgBr + HCHO} \longrightarrow \text{Cyclohexyl-CH}_2\text{OMgBr} \)
\( \text{Cyclohexyl-CH}_2\text{OMgBr} \xrightarrow{\text{H}_2\text{O}} \text{Cyclohexyl-CH}_2\text{OH + Mg(OH)Br} \)
In simple words: मेथेनल, ग्रीन्यार अभिकर्मक (जैसे आइसोप्रोपिल या साइक्लोहेक्सिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड) के साथ अभिक्रिया करके एक प्राथमिक ऐल्कोहॉल बनाता है। ग्रीन्यार अभिकर्मक मेथेनल के कार्बोनिल कार्बन पर नाभिकस्नेही आक्रमण करता है, जिससे एक मध्यवर्ती बनता है जो जल-अपघटन पर वांछित ऐल्कोहॉल देता है।
🎯 Exam Tip: ग्रीन्यार अभिकर्मक से मेथेनल की अभिक्रिया हमेशा प्राथमिक ऐल्कोहॉल बनाती है। अन्य ऐल्डिहाइड द्वितीयक और कीटोन तृतीयक ऐल्कोहॉल बनाते हैं।
Question 5. निम्नलिखित अभिक्रिया के उत्पादों की संरचना लिखिए –
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): (i) प्रोपीन (CH3-CH=CH2) को जल और अम्ल (H2O/H+) के साथ अभिकृत किया गया है।
(ii) मेथिल-(2-ऑक्सोसाइक्लोहेक्सिल) एथेनोएट को सोडियम बोरोहाइड्राइड (NaBH4) के साथ अभिकृत किया गया है। यह एक एस्टर है जिसमें एक कार्बोनिल समूह (कीटोन) साइक्लोहेक्सिल वलय पर भी है।
(iii) 2-मेथिलब्यूटेनल (CH3-CH2-CH(CH3)-CHO) को सोडियम बोरोहाइड्राइड (NaBH4) के साथ अभिकृत किया गया है।
Answer: उत्तर
(i) \( \text{CH}_3\text{-CH=CH}_2 \xrightarrow{\text{H}_2\text{O/H}^+} \text{CH}_3\text{-CH(OH)-CH}_3 \) प्रोपेन-2-ऑल
(अभिक्रिया का विस्तृत तंत्र: \( \text{CH}_3\text{-CH=CH}_2 \xrightarrow{\text{H}^+ \text{ (विद्युतस्नेही आक्रमण)}} \text{CH}_3\text{-CH}^+\text{-CH}_3 \xrightarrow{\text{H}_2\text{O: (नाभिकस्नेही आक्रमण)}} \text{CH}_3\text{-CH(OH}_2^+)\text{-CH}_3 \xrightarrow{\text{-H}^+} \text{CH}_3\text{-CH(OH)-CH}_3 \)
(ii) NaBH4 एक दुर्बल अपचायक है, यह ऐल्डिहाइड/कीटोन को अपचयित कर सकता है, परन्तु एस्टर को नहीं।
\( \text{Methyl-(2-oxocyclohexyl) ethanoate} \xrightarrow{\text{NaBH}_4} \text{Methyl-(2-hydroxycyclohexyl) ethanoate} \)
(iii) -CHO समूह -CH2OH में अपचयित हो जाता है।
\( \text{CH}_3\text{-CH}_2\text{-CH(CH}_3\text{)-CHO} \xrightarrow{\text{NaBH}_4} \text{CH}_3\text{-CH}_2\text{-CH(CH}_3\text{)-CH}_2\text{OH} \)
2-मेथिलब्यूटेनल 2-मेथिलब्यूटेन-1-ऑल
In simple words: (i) प्रोपीन के अम्लीय जलयोजन से मार्कोनीकॉफ नियम के अनुसार प्रोपेन-2-ऑल बनता है। (ii) NaBH4 केवल कीटोन समूह को ऐल्कोहॉल में अपचयित करता है, एस्टर समूह को नहीं। (iii) ऐल्डिहाइड समूह NaBH4 द्वारा प्राथमिक ऐल्कोहॉल में अपचयित हो जाता है।
🎯 Exam Tip: NaBH4 की अपचायक शक्ति को याद रखें: यह ऐल्डिहाइड और कीटोन को अपचयित करता है, लेकिन एस्टर, कार्बोक्सिलिक अम्ल या उनके व्युत्पन्न को नहीं। मार्कोनीकॉफ नियम के अनुसार, असंतृप्त हाइड्रोकार्बन में हाइड्रोजन का योग उस कार्बन पर होता है जिस पर पहले से अधिक हाइड्रोजन हों।
Question 6. यदि निम्नलिखित ऐल्कोहॉल क्रमशः (a) HCl-ZnCl2, (b) HBr, (c) SOCl2 से अभिक्रिया करें तो आप अपेक्षित उत्पादों की संरचनाएँ दीजिए ।
(i) ब्यूटेन-1-ऑल
(ii) 2-मेथिलब्यूटेन-2-ऑल ।
Answer: उत्तर
(a) HCl-ZnCl2 (ल्यूकास अभिकर्मक) के साथ
(i) \( \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}_2\text{CH}_2\text{-OH (ब्यूटेन-1-ऑल (1°))} + \text{HCl (सान्द्र)} \xrightarrow{\text{निर्जलीय ZnCl}_2 \text{ कमरे के ताप पर}} \text{कोई अभिक्रिया नहीं} \)
(ii) \( \text{CH}_3\text{-C(CH}_3\text{)(OH)-CH}_2\text{CH}_3 \text{ (2-मेथिलब्यूटेन-2-ऑल (3°))} + \text{HCl (सान्द्र)} \xrightarrow{\text{निर्जलीय ZnCl}_2 \text{ -H}_2\text{O}} \text{CH}_3\text{-C(CH}_3\text{)(Cl)-CH}_2\text{CH}_3 \text{ (2-क्लोरो-2-मेथिलब्यूटेन)} \)
(b) HBr के साथ
(i) \( \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}_2\text{CH}_2\text{OH (ब्यूटेन-1-ऑल (1°))} + \text{HBr} \xrightarrow{\Delta} \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}_2\text{CH}_2\text{Br (1-ब्रोमोब्यूटेन)} + \text{H}_2\text{O} \)
(ii) \( \text{CH}_3\text{-C(CH}_3\text{)(OH)-CH}_2\text{CH}_3 \text{ (2-मेथिलब्यूटेन-2-ऑल (3°))} + \text{HBr} \longrightarrow \text{CH}_3\text{-C(CH}_3\text{)(Br)-CH}_2\text{CH}_3 \text{ (2-ब्रोमो-2-मेथिलब्यूटेन)} + \text{H}_2\text{O} \)
(c) SOCl2 के साथ
(i) \( \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}_2\text{CH}_2\text{OH (ब्यूटेन-1-ऑल (1°))} + \text{SOCl}_2 \xrightarrow{\Delta} \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}_2\text{CH}_2\text{Cl (1-क्लोरोब्यूटेन)} + \text{SO}_2\uparrow + \text{HCl} \)
(ii) \( \text{CH}_3\text{-C(CH}_3\text{)(OH)-CH}_2\text{CH}_3 \text{ (2-मेथिलब्यूटेन-2-ऑल (3°))} + \text{SOCl}_2 \xrightarrow{\Delta} \text{CH}_3\text{-C(CH}_3\text{)(Cl)-CH}_2\text{CH}_3 \text{ (2-क्लोरो-2-मेथिलब्यूटेन)} + \text{SO}_2\uparrow + \text{HCl} \)
In simple words: प्राथमिक ऐल्कोहॉल (ब्यूटेन-1-ऑल) ल्यूकास अभिकर्मक (HCl-ZnCl2) के साथ अभिक्रिया नहीं करता है लेकिन HBr और SOCl2 के साथ अभिक्रिया करके संगत एल्किल हैलाइड देता है। तृतीयक ऐल्कोहॉल (2-मेथिलब्यूटेन-2-ऑल) तीनों अभिकर्मकों के साथ आसानी से अभिक्रिया करके संगत तृतीयक एल्किल हैलाइड बनाता है।
🎯 Exam Tip: ल्यूकास परीक्षण प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक ऐल्कोहॉलों को विभेदित करने में महत्वपूर्ण है। तृतीयक ऐल्कोहॉल तुरंत अभिक्रिया करते हैं, द्वितीयक 5-10 मिनट में और प्राथमिक ऐल्कोहॉल कमरे के तापमान पर अभिक्रिया नहीं करते। SOCl2 से अभिक्रिया में SO2 और HCl गैसें निकलती हैं जो अभिक्रिया को आगे बढ़ाती हैं।
Question 7. (i) 1-मेथिलसाइक्लोहेक्सेनॉल और (ii) ब्यूटेन-1-ऑल के अम्ल उत्प्रेरित निर्जलन के मुख्य उत्पादों की प्रागुक्ति कीजिए। या
किसी ऐल्कोहॉल की किसी एक निर्जलीकरण अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण लिखिए।
Answer: उत्तर
(i) 1-मेथिलसाइक्लोहेक्सेनॉल का अम्ल उत्प्रेरित निर्जलन दो उत्पाद, I तथा II दे सकता है। चूँकि उत्पाद (I) अधिक उच्च प्रतिस्थापित है, इसलिए सेटजेफ नियम के अनुसार यह मुख्य उत्पाद है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): 1-मेथिलसाइक्लोहेक्सेनॉल (एक साइक्लोहेक्सेन वलय जिसके एक कार्बन पर मेथिल समूह और हाइड्रोक्सिल समूह जुड़े हैं) का निर्जलन (अम्ल और ऊष्मा की उपस्थिति में -H2O) दिखाया गया है। यह दो एल्कीन उत्पाद देता है: 1-मेथिलसाइक्लोहेक्सीन (मुख्य उत्पाद, I) और 1-मेथिलीनसाइक्लोहेक्सीन (गौण उत्पाद, II)। मुख्य उत्पाद में द्वि-आबंध अधिक प्रतिस्थापित होता है।
(ii) ब्यूटेन-1-ऑल का अम्ल उत्प्रेरित निर्जलन मुख्य उत्पाद के रूप में ब्यूट-2-ईन तथा गौण उत्पाद के रूप में ब्यूट-1-ईन उत्पन्न करता है। इसका कारण यह है कि ऐल्कोहॉलों का निर्जलन कार्बोधनायने माध्यमिकों के द्वारा होता है। पुनः ब्यूटेन-1-ऑल 1° ऐल्कोहॉल होने के कारण प्रोटॉनीकरण तथा H2O के विलोपन पर पहले 1° कार्बोधनायन (I) देता है जो कम स्थायी होने के कारण पुनर्व्यवस्थित होकर अधिक स्थायी 2° कार्बोधनायन (II) बनाता है, तब यह दो भिन्न प्रकारों से प्रोटॉन निकालकर ब्यूट-2-ईन या ब्यूटन-1-ईन बनाता है। चूंकि ब्यूट-2-ईन अधिक स्थायी है, इसलिए सेटजेफ नियम के अनुसार यह मुख्य उत्पाद होता है।
\( \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}_2\text{CH}_2\text{-OH} + \text{H}^+ \longrightarrow \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}_2\text{CH}_2\text{-OH}_2^+ \text{ (प्रोटॉनित ऐल्कोहॉल)} \)
\( \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}_2\text{CH}_2\text{-OH}_2^+ \xrightarrow{\text{-H}_2\text{O}} \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}_2\text{CH}_2^+ \text{ (1° कार्बोधनायन (I) (कम स्थायी))} \)
\( \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}_2\text{CH}_2^+ \xrightarrow{\text{1, 2-हाइड्राइड शिफ्ट}} \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}^+\text{-CH}_3 \text{ (2° कार्बोधनायन (II) (अधिक स्थायी))} \)
\( \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}^+\text{-CH}_3 \xrightarrow{\text{-H}^+} \text{CH}_3\text{CH=CH-CH}_3 \text{ (ब्यूट-2-ईन (मुख्य उत्पाद))} \)
\( \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}^+\text{-CH}_3 \xrightarrow{\text{-H}^+} \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH=CH}_2 \text{ (ब्यूट-1-ईन (गौण उत्पाद))} \)
In simple words: ऐल्कोहॉल के निर्जलन में, -OH समूह प्रोटॉनित होकर जल के रूप में निकल जाता है, जिससे कार्बोधनायन बनता है। यह कार्बोधनायन यदि संभव हो, तो अधिक स्थिर कार्बोधनायन में पुनर्व्यवस्थित होता है। अंत में, एक प्रोटॉन का विलोपन होता है जिससे एल्कीन बनती है, और सेटजेफ नियम के अनुसार सबसे अधिक प्रतिस्थापित एल्कीन मुख्य उत्पाद होती है।
🎯 Exam Tip: निर्जलन में सेटजेफ नियम और कार्बोधनायन पुनर्व्यवस्था (यदि संभव हो) को हमेशा ध्यान में रखें, खासकर जब प्राथमिक या द्वितीयक ऐल्कोहॉल शामिल हों।
Question 8. ऑथों तथा पैरा-नाइट्रोफीनॉल, फीनॉल से अधिक अम्लीय होते हैं। उनके संगत फीनॉक्साइड आयनों की अनुनादी संरचनाएँ बनाइए।
Answer: उत्तर
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): ऑर्थों-नाइट्रोफीनॉक्साइड आयन की पांच अनुनादी संरचनाएँ दिखाई गई हैं। ये संरचनाएँ एक बेंजीन वलय को दर्शाती हैं जिस पर एक -O- समूह (जो एक ऋण आवेश वहन करता है) और एक -NO2 समूह ऑर्थों स्थिति पर जुड़ा है। ऋण आवेश पूरे वलय पर और नाइट्रोजन परमाणु पर भी विस्थापित होता है, जिससे स्थिरता बढ़ती है।
पैरा-नाइट्रोफीनॉक्साइड आयन की पांच अनुनादी संरचनाएँ दिखाई गई हैं। ये संरचनाएँ एक बेंजीन वलय को दर्शाती हैं जिस पर एक -O- समूह (जो एक ऋण आवेश वहन करता है) और एक -NO2 समूह पैरा स्थिति पर जुड़ा है। ऋण आवेश पूरे वलय पर और नाइट्रोजन परमाणु पर भी विस्थापित होता है, जिससे स्थिरता बढ़ती है।
फीनॉक्साइड आयन की पांच अनुनादी संरचनाएँ दिखाई गई हैं। ये संरचनाएँ एक बेंजीन वलय को दर्शाती हैं जिस पर एक -O- समूह (जो एक ऋण आवेश वहन करता है) जुड़ा है। ऋण आवेश पूरे वलय पर विस्थापित होता है, जिससे आयन स्थिर होता है। नाइट्रो समूह की तुलना में फीनॉक्साइड आयन में इलेक्ट्रॉन निष्कासन कम होता है।
प्रतिस्थापित फीनॉलों में इलेक्ट्रॉन निष्कासक समूह (electron withdrawing group) जैसे नाइट्रो समूह; फीनॉल की अम्लीय सामर्थ्य को बढ़ा देते हैं। जब ऐसे समूह ऑर्थों एवं पैरा स्थितियों पर उपस्थित होते हैं तो यह प्रभाव अधिक प्रबल हो जाता है। इसका कारण फीनॉक्साइड आयन के ऋणायन का प्रभावी विस्थानने (delocalisation) है। अतः फीनॉल की तुलना में 0-तथा p-नाइट्रोफीनॉल अधिक अम्लीय होते हैं।
In simple words: ऑर्थों और पैरा-नाइट्रोफीनॉल, फीनॉल से अधिक अम्लीय होते हैं क्योंकि नाइट्रो समूह एक प्रबल इलेक्ट्रॉन-निष्कासक समूह है। यह उनके संगत फीनॉक्साइड आयनों के ऋण आवेश को अनुनाद के माध्यम से अधिक प्रभावी ढंग से स्थिर करता है, जिससे प्रोटॉन का निकलना आसान हो जाता है।
🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रॉन-निष्कासक समूह (-NO2, -CN, -COOH) फीनॉल की अम्लता बढ़ाते हैं, जबकि इलेक्ट्रॉन-दाता समूह (-CH3, -OCH3) इसे घटाते हैं। अनुनादी संरचनाओं की संख्या और आवेश के विस्थानने की क्षमता अम्लता निर्धारित करती है।
Question 9. निम्नलिखित अभिक्रियाओं में सम्मिलित समीकरण लिखिए –
1. राइमर-टीमैन अभिक्रिया
2. कोल्बे अभिक्रिया अथवा कोल्बे श्मिट अभिक्रिया ।
Answer: उत्तर 1. राइमर-टीमैन अभिक्रिया (Reimer-Teimann Reaction) - फीनॉल की सोडियम हाइड्रॉक्साइड की उपस्थिति में क्लोरोफॉर्म के साथ अभिक्रिया से बेन्जीन में, -CHO समूह ऑर्थो स्थिति पर प्रवेश कर जाता है। इस अभिक्रिया को राइमर-टीमैन अभिक्रिया कहते हैं।
प्रतिस्थापित मध्यवर्ती बेन्जिल क्लोराइड क्षार की उपस्थिति में अपघटित होकर सैलिसिलैल्डिहाइड बनाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): फीनॉल (एक बेंजीन वलय पर -OH समूह) क्लोरोफॉर्म (CHCl3) और जलीय सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) के साथ अभिक्रिया करता है। यह अभिक्रिया एक मध्यवर्ती (एक बेंजीन वलय पर -O-Na+ और -CHCl2 समूह ऑर्थो स्थिति पर) बनाती है। यह मध्यवर्ती NaOH के साथ आगे अभिक्रिया करके एक अन्य मध्यवर्ती (एक बेंजीन वलय पर -O-Na+ और -CHO समूह ऑर्थो स्थिति पर) बनाता है। अंत में, अम्लीय माध्यम (H+) में यह सैलिसिलैल्डिहाइड (एक बेंजीन वलय पर ऑर्थो स्थिति पर -OH और -CHO समूह) देता है।
2. कोल्बे अभिक्रिया अथवा कोल्बे श्मिट अभिक्रिया (Kolbe's Reaction or Kolbe Schmidt Reaction) - फीनॉल को सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ अभिकृत कराने से बना फीनॉक्साइड आयन, फीनॉल की अपेक्षा इलेक्ट्रॉनरागी ऐरोमैटिक प्रतिस्थापन अभिक्रिया के प्रति अधिक क्रियाशील होता है। अतः यह CO2 जैसे दुर्बल इलेक्ट्रॉनरागी के साथ इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रिया करता है। इससे ऑर्थों-हाइड्रॉक्सीबेन्जोइक अम्ल मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): फीनॉल (एक बेंजीन वलय पर -OH समूह) सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) के साथ अभिक्रिया करके सोडियम फीनेट (एक बेंजीन वलय पर -O-Na+ समूह) बनाता है। सोडियम फीनेट कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के साथ अभिक्रिया करता है, उसके बाद अम्लीय माध्यम (H+) में, यह 2-हाइड्रॉक्सीबेन्जोइक अम्ल (सैलिसिलिक अम्ल, एक बेंजीन वलय पर ऑर्थो स्थिति पर -OH और -COOH समूह) देता है।
In simple words: राइमर-टीमैन अभिक्रिया में, फीनॉल क्लोरोफॉर्म और क्षार के साथ अभिक्रिया करके ऑर्थो-सैलिसिलैल्डिहाइड बनाता है। कोल्बे अभिक्रिया में, फीनॉल से बना फीनॉक्साइड आयन कार्बन डाइऑक्साइड के साथ अभिक्रिया करके सैलिसिलिक अम्ल बनाता है। ये दोनों अभिक्रियाएँ फीनॉल की ऑर्थो-प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ हैं।
🎯 Exam Tip: राइमर-टीमैन और कोल्बे अभिक्रियाएँ दोनों फीनॉल में ऑर्थो-प्रतिस्थापन के उदाहरण हैं और सैलिसिलिक अम्ल या सैलिसिलैल्डिहाइड जैसे महत्वपूर्ण उत्पादों के संश्लेषण में उपयोग होती हैं। दोनों के लिए अभिकर्मक और उत्पाद याद रखें।
Question 10. एथेनॉल एवं 3-मेथिलपेन्टेन-2-ऑल से प्रारम्भ कर 2-एथॉक्सी-3-मेथिलपेन्टेन के विलियमसन संश्लेषण की अभिक्रिया लिखिए –
Answer: उत्तर
\( \text{CH}_3\text{-CH}_2\text{-CH(CH}_3\text{)-CH(OH)-CH}_3 \xrightarrow{\text{Na}} \text{CH}_3\text{-CH}_2\text{-CH(CH}_3\text{)-CH(ONa)-CH}_3 \)
3-मेथिलपेन्टेन-2-ऑल
\( \text{C}_2\text{H}_5\text{OH} \xrightarrow{\text{HBr}} \text{C}_2\text{H}_5\text{Br} \)
एथेनॉल ब्रोमोएथेन
\( \text{CH}_3\text{-CH}_2\text{-CH(CH}_3\text{)-CH(ONa)-CH}_3 + \text{C}_2\text{H}_5\text{Br} \longrightarrow \text{CH}_3\text{-CH}_2\text{-CH(CH}_3\text{)-CH(OC}_2\text{H}_5\text{)-CH}_3 \)
2-एथॉक्सी-3-मेथिलपेन्टेन
In simple words: 2-एथॉक्सी-3-मेथिलपेन्टेन के विलियमसन संश्लेषण के लिए, 3-मेथिलपेन्टेन-2-ऑल को सोडियम के साथ उपचारित करके सोडियम एल्कोक्साइड बनाया जाता है, और फिर इस एल्कोक्साइड की अभिक्रिया ब्रोमोएथेन से कराई जाती है।
🎯 Exam Tip: विलियमसन संश्लेषण में एक एल्कोक्साइड और एक प्राथमिक एल्किल हैलाइड की अभिक्रिया से ईथर बनता है। एल्किल हैलाइड जितना कम प्रतिस्थापित होगा, SN2 अभिक्रिया उतनी ही प्रभावी होगी।
Question 11. 1-मेथॉक्सी-4-नाइट्रोबेन्जीन के विरचन के लिए निम्नलिखित अभिकारकों में से कौन-सा युग्म उपयुक्त है और क्यों? (i) [बेंजीन रिंग]-Br + CH3ONa (ii) [बेंजीन रिंग]-ONa + CH3Br
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): (i) 1-ब्रोमो-4-नाइट्रोबेन्जीन (एक बेंजीन वलय पर पैरा स्थिति पर ब्रोमीन और नाइट्रो समूह) को सोडियम मेथॉक्साइड (CH3ONa) के साथ अभिक्रिया करते हुए दिखाया गया है।
(ii) सोडियम 4-नाइट्रोफीनॉक्साइड (एक बेंजीन वलय पर पैरा स्थिति पर -O-Na+ और -NO2 समूह) को मेथिल ब्रोमाइड (CH3Br) के साथ अभिक्रिया करते हुए दिखाया गया है।
Answer: उत्तर
अभिकारकों के दोनों युग्म उपयुक्त हैं। प्रथम युग्म में, -NO2 समूह के इलेक्ट्रॉन निष्कासक प्रभाव के कारण Br परमाणु सक्रियित होता है। CH3ONa के नाभिकस्नेही आक्रमण तथा उसके पश्चात् NaBr के विलोपन से वांछित ईथर प्राप्त होता है। दूसरे युग्म में, मेथिल ब्रोमाइड पर 4-नाइट्रोफीनॉक्साइड आयन के नाभिकस्नेही आक्रमण द्वारा वांछित ईथर प्राप्त होता है।
In simple words: 1-मेथॉक्सी-4-नाइट्रोबेन्जीन को बनाने के लिए दोनों अभिकर्मक युग्म उपयुक्त हैं। पहला युग्म एक सक्रियित एरिल हैलाइड (नाइट्रो समूह के इलेक्ट्रॉन निष्कासन के कारण) और सोडियम मेथॉक्साइड के बीच SNAr अभिक्रिया को दर्शाता है। दूसरा युग्म एक सोडियम एरॉक्साइड (4-नाइट्रोफीनॉक्साइड) और मेथिल ब्रोमाइड के बीच SN2 विलियमसन ईथर संश्लेषण अभिक्रिया को दर्शाता है।
🎯 Exam Tip: विलियमसन ईथर संश्लेषण में, एरिल हैलाइड के बजाय एरिल एल्कोक्साइड का उपयोग करना सुरक्षित होता है, क्योंकि एरिल हैलाइड SN2 अभिक्रियाओं के प्रति कम प्रतिक्रियाशील होते हैं जब तक कि उनमें इलेक्ट्रॉन-निष्कासक समूह न हों। नाइट्रो समूह एरिल हैलाइड को नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन के लिए सक्रिय करता है।
Question 12. निम्नलिखित अभिक्रियाओं से प्राप्त उत्पादों का अनुमान लगाइए – (i) CH3-CH2-CH2-O-CH3 + HBr (ii) [बेंजीन रिंग]-OC2H5 + HBr (iii) [बेंजीन रिंग]-OC2H5 + सान्द्र H2SO4 सान्द्र HNO3 (iv) (CH3)3C – OC2H5
Answer: उत्तर
(i) ऑक्सीजन से जुड़े दोनों ऐल्किल समूह प्राथमिक हैं, इसलिए Br⁻ आयन की अभिक्रिया छोटे ऐल्किल समूह (मेथिल समूह) से होगी तथा प्रोपेन-1-ऑल तथा ब्रोमोमेथेन का निर्माण होगा।
\( \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}_2\text{-O-CH}_3 + \text{HBr} \xrightarrow{\text{373 K}} \text{CH}_3\text{CH}_2\text{CH}_2\text{-OH (प्रोपेन-1-ऑल)} + \text{CH}_3\text{Br (ब्रोमोमेथेन)} \)
n-प्रोपिल मेथिल ईथर
(ii) अनुनाद के कारण, C6H5-O आबन्ध में कुछ द्विआबन्ध गुण विद्यमान होता है, इसलिए यह O-C2H5 आबन्ध से प्रबल होता है। अतः दुर्बल O-C2H5 आबन्ध का विदलन होता है तथा फीनॉल एवं ब्रोमोएथेन प्राप्त होते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): एथॉक्सीबेन्जीन (एक बेंजीन वलय पर -OC2H5 समूह) की अभिक्रिया HBr के साथ 373 K पर दिखाई गई है। उत्पाद के रूप में फीनॉल (एक बेंजीन वलय पर -OH समूह) और ब्रोमोएथेन (CH3CH2-Br) बनते हैं।
(iii) इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन में, ऐल्कॉक्सी समूह ऐरोमैटिक वलय को सक्रिय बनाता है तथा प्रवेश करने वाले समूह को 0-तथा p-स्थितियों की ओर निर्दिष्ट करता है। इसलिए एथॉक्सीबेन्जीन का नाइट्रीकरण 2-तथा 4-नाइट्रोएथॉक्सीबेन्जीन का मिश्रण देता है जिसमें 4-नाइट्रोएथॉक्सीबेन्जीन 2-स्थिति पर त्रिविमीय बाधा के कारण मुख्य उत्पाद होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): एथॉक्सीबेन्जीन (एक बेंजीन वलय पर -OC2H5 समूह) की नाइट्रीकरण अभिक्रिया (सान्द्र H2SO4 और सान्द्र HNO3 के साथ) दिखाई गई है। यह दो उत्पाद देता है: 4-नाइट्रो-1-एथॉक्सीबेन्जीन (एक बेंजीन वलय पर पैरा स्थिति पर -OC2H5 और -NO2 समूह, मुख्य उत्पाद) और 2-नाइट्रो-1-एथॉक्सीबेन्जीन (एक बेंजीन वलय पर ऑर्थो स्थिति पर -OC2H5 और -NO2 समूह, अल्प उत्पाद)।
(iv) चूंकि एथिल कार्बोधनायन की तुलना में तृतीयक-ब्यूटिल कार्बोधनायन अत्यधिक स्थायी होता है, इसीलिए अभिक्रिया SN 1 क्रियाविधि द्वारा होती है तथा तृतीयक-ब्यूटिल आयोडाइड एवं एथेनॉल निम्नलिखित प्रकार बनते हैं –
\( \text{CH}_3\text{-C(CH}_3\text{)-O-CH}_2\text{CH}_3 \xrightarrow{\text{H}^+} \text{CH}_3\text{-C(CH}_3\text{)-O}^+\text{(H)-CH}_2\text{CH}_3 \text{ (मन्द)} \)
\( \text{CH}_3\text{-C(CH}_3\text{)-O}^+\text{(H)-CH}_2\text{CH}_3 \longrightarrow \text{CH}_3\text{-C(CH}_3\text{)}^+ + \text{CH}_3\text{CH}_2\text{OH (एथेनॉल)} \)
\( \text{CH}_3\text{-C(CH}_3\text{)}^+ + \text{I}^- \longrightarrow \text{CH}_3\text{-C(CH}_3\text{)(I)} \text{ (तृतीयक-ब्यूटिल आयोडाइड)} \)
In simple words: (i) HI के साथ प्रोपिल मेथिल ईथर की अभिक्रिया से प्रोपेन-1-ऑल और ब्रोमोमेथेन बनता है, क्योंकि SN2 मार्ग छोटे एल्किल समूह पर होता है। (ii) एथॉक्सीबेन्जीन की HI से अभिक्रिया से फीनॉल और ब्रोमोएथेन बनता है, क्योंकि O-C2H5 आबंध O-C6H5 आबंध से कमजोर होता है। (iii) एथॉक्सीबेन्जीन का नाइट्रीकरण ऑर्थों और पैरा उत्पादों का मिश्रण देता है, जिसमें पैरा मुख्य उत्पाद होता है। (iv) तृतीयक-ब्यूटिल एथिल ईथर की HI से अभिक्रिया SN1 मार्ग से होती है, जिससे तृतीयक-ब्यूटिल आयोडाइड और एथेनॉल बनता है क्योंकि तृतीयक कार्बोधनायन अधिक स्थिर होता है।
🎯 Exam Tip: ईथर की HI के साथ अभिक्रिया में, अभिक्रिया का मार्ग (SN1 या SN2) प्रतिस्थापित समूहों की प्रकृति पर निर्भर करता है। यदि तृतीयक समूह मौजूद हो, तो SN1 पसंदीदा है; अन्यथा SN2 होता है, जहाँ आयोडाइड छोटे एल्किल समूह पर आक्रमण करता है। एरोमैटिक ईथर में, ऑक्सीजन-एरिल आबंध टूटता नहीं है क्योंकि इसमें आंशिक द्वि-आबंध गुण होता है।
अतिरिक्त अभ्यास
Question 1. निम्नलिखित यौगिकों के आई०यू०पी०ए०सी० (IUPAC) नाम लिखिए -
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): (i) एक पेंटेन श्रृंखला है जिसमें तीसरे कार्बन पर एक हाइड्रोक्सिल समूह (-OH), दूसरे कार्बन पर दो मेथिल समूह (-CH3) और चौथे कार्बन पर एक मेथिल समूह (-CH3) जुड़ा है।
(ii) एक हेप्टेन श्रृंखला है जिसमें पहले कार्बन पर एक एथिल समूह (-C2H5), दूसरे कार्बन पर एक मेथिल समूह (-CH3), चौथे कार्बन पर एक हाइड्रोक्सिल समूह (-OH) और छठे कार्बन पर एक हाइड्रोक्सिल समूह (-OH) जुड़ा है।
(iii) एक ब्यूटेन श्रृंखला है जिसमें दूसरे कार्बन पर एक हाइड्रोक्सिल समूह (-OH) और तीसरे कार्बन पर एक हाइड्रोक्सिल समूह (-OH) जुड़ा है।
(iv) एक प्रोपेन श्रृंखला है जिसमें पहले कार्बन पर एक -CH2OH समूह, दूसरे कार्बन पर एक -OH समूह और तीसरे कार्बन पर एक -OH समूह जुड़ा है।
(v) एक बेंजीन वलय है जिसमें एक मेथिल समूह (-CH3) और एक हाइड्रोक्सिल समूह (-OH) ऑर्थो स्थिति पर जुड़े हैं।
(vi) एक बेंजीन वलय है जिसमें एक मेथिल समूह (-CH3) और एक हाइड्रोक्सिल समूह (-OH) पैरा स्थिति पर जुड़े हैं।
(vii) एक बेंजीन वलय है जिसमें पहले कार्बन पर एक -OH समूह, दूसरे कार्बन पर एक -CH3 समूह और पाँचवें कार्बन पर एक -CH3 समूह जुड़ा है।
(viii) एक बेंजीन वलय है जिसमें पहले कार्बन पर एक -OH समूह, दूसरे कार्बन पर एक -CH3 समूह और छठे कार्बन पर एक -CH3 समूह जुड़ा है।
(ix) एक प्रोपेन श्रृंखला है जिसमें पहले कार्बन पर एक मेथॉक्सी समूह (-OCH3), दूसरे कार्बन पर एक मेथिल समूह (-CH3) और तीसरे कार्बन पर एक मेथिल समूह (-CH3) जुड़ा है।
(x) एक एथॉक्सी समूह (-OC2H5) बेंजीन वलय से जुड़ा है।
(xi) एक हेप्टेन श्रृंखला है जिसमें पहले कार्बन पर एक फीनॉक्सी समूह (-OC6H5) जुड़ा है।
(xii) एक ब्यूटेन श्रृंखला है जिसमें पहले कार्बन पर एक एथॉक्सी समूह (-OCH2CH3), दूसरे कार्बन पर एक मेथिल समूह (-CH3) और तीसरे कार्बन पर एक मेथिल समूह (-CH3) जुड़ा है।
Answer: उत्तर (i) 2, 2, 4-ट्राइमेथिलपेन्टेन-3-ऑल (ii) 5-एथिलहेप्टेन-2, 4-डाइऑल (iii) ब्यूटेन-2, 3-डाइऑल (iv) प्रोपेन-1,2,3-ट्राइऑल (v) 2-मेथिलफीनॉल (vi) 4-मेथिलफीनॉल (vii) 2,5-डाइमेथिलफोनॉल (viii) 2,6-डाइमेथिलफीनॉल (ix) 1-मेथॉक्सी-2-मेथिलप्रोपेन (x) एथॉक्सीबेन्जीन (xi) 1-फीनॉक्सीहेप्टेन (xii) 2-एथॉक्सीब्यूटेन
In simple words: प्रत्येक दिए गए रासायनिक संरचना के लिए IUPAC नामकरण नियमों का उपयोग करके, कार्बन श्रृंखला को उचित रूप से क्रमांकित किया गया, क्रियात्मक समूहों और प्रतिस्थापियों की पहचान की गई, और उन्हें वर्णानुक्रम में व्यवस्थित करके नाम दिया गया।
🎯 Exam Tip: IUPAC नामकरण में क्रियात्मक समूहों की वरीयता, सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला का चयन, और प्रतिस्थापियों के स्थान और वर्णानुक्रम को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है।
Question 2. निम्नलिखित आई०यू०पी०ए०सी० (IUPAC) नाम वाले यौगिकों की संरचनाएँ लिखिए – (i) 2-मेथिलब्यूटेन-2-ऑल (ii) 1-फेनिलप्रोपेन-2-ऑल (iii) 3,5-डाइमेथिलहेक्सेन-1,3,5-ट्राइऑल (iv) 2,3-डाइएथिलफीनॉल (v) 1-एथॉक्सीप्रोपेन (vi) 2-एथॉक्सी-3-मेथिलपेन्टेन (vii) साइक्लोहेक्सिलमेथेनॉल (viii) 3-साइक्लोहेक्सिलपेन्टेन-3-ऑल (ix) साइक्लोपेन्टेन-3-ईन-1-ऑल (x) 3-क्लोरोमेथिलपेन्टेन-1-ऑल ।
Answer: उत्तर
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): (i) 2-मेथिलब्यूटेन-2-ऑल की संरचना एक चार-कार्बन श्रृंखला को दर्शाती है जिसमें दूसरे कार्बन पर एक मेथिल समूह (-CH3) और एक हाइड्रोक्सिल समूह (-OH) जुड़ा है।
(ii) 1-फेनिलप्रोपेन-2-ऑल की संरचना एक बेंजीन वलय को दर्शाती है, जिससे एक -CH2-CH(OH)-CH3 श्रृंखला जुड़ी है।
(iii) 3,5-डाइमेथिलहेक्सेन-1,3,5-ट्राइऑल की संरचना एक छह-कार्बन श्रृंखला को दर्शाती है जिसमें पहले कार्बन पर एक -CH2OH समूह, तीसरे कार्बन पर एक -OH समूह और एक मेथिल समूह (-CH3), तथा पाँचवें कार्बन पर एक -OH समूह और एक मेथिल समूह (-CH3) जुड़ा है।
(iv) 2,3-डाइएथिलफीनॉल की संरचना एक बेंजीन वलय को दर्शाती है जिसमें एक -OH समूह, दूसरे कार्बन पर एक एथिल समूह (-C2H5) और तीसरे कार्बन पर एक एथिल समूह (-C2H5) जुड़ा है।
(v) 1-एथॉक्सीप्रोपेन की संरचना एक तीन-कार्बन श्रृंखला को दर्शाती है जिसमें पहले कार्बन पर एक एथॉक्सी समूह (-OCH2CH3) जुड़ा है।
(vi) 2-एथॉक्सी-3-मेथिलपेन्टेन की संरचना एक पाँच-कार्बन श्रृंखला को दर्शाती है जिसमें दूसरे कार्बन पर एक एथॉक्सी समूह (-OCH2CH3) और तीसरे कार्बन पर एक मेथिल समूह (-CH3) जुड़ा है।
(vii) साइक्लोहेक्सिलमेथेनॉल की संरचना एक साइक्लोहेक्सेन वलय को दर्शाती है जिससे एक -CH2OH समूह जुड़ा है।
(viii) 3-साइक्लोहेक्सिलपेन्टेन-3-ऑल की संरचना एक पाँच-कार्बन श्रृंखला को दर्शाती है जिसमें तीसरे कार्बन पर एक साइक्लोहेक्सिल वलय और एक हाइड्रोक्सिल समूह (-OH) जुड़ा है।
(ix) साइक्लोपेन्टेन-3-ईन-1-ऑल की संरचना एक पाँच-सदस्यीय वलय को दर्शाती है जिसमें एक द्वि-आबंध और एक हाइड्रोक्सिल समूह (-OH) जुड़ा है।
(x) 3-क्लोरोमेथिलपेन्टेन-1-ऑल की संरचना एक पाँच-कार्बन श्रृंखला को दर्शाती है जिसमें पहले कार्बन पर एक -CH2OH समूह और तीसरे कार्बन पर एक -CH2Cl समूह जुड़ा है।
In simple words: दिए गए IUPAC नामों के आधार पर, प्रत्येक यौगिक की संरचना को कार्बन परमाणुओं की सही संख्या, क्रियात्मक समूहों की स्थिति, और प्रतिस्थापियों के उचित स्थान के साथ बनाया गया है।
🎯 Exam Tip: IUPAC नामों से संरचनाएँ बनाते समय, सबसे पहले मूल श्रृंखला या वलय को पहचानें, फिर क्रियात्मक समूह को जोड़ें, और अंत में प्रतिस्थापियों को उनकी निर्दिष्ट स्थितियों पर लगाएं।
Question 3. (i) C5H12O आणिवक सूत्र वाले ऐलकोहॉलों के सभी समावयवो की सरचना लिखिए एवं उनके आई०यू०पी०ए०सी० (IUPAC) नाम दीजिए ।
Question 15. समझाइए कि ऑर्थों-नाइट्रोफीनॉल, ऑर्थों-मेथॉक्सीफीनॉल से अधिक अम्लीय क्यों होता है।
Answer: NO2 समूह के प्रबल - R तथा - I प्रभाव के कारण O-H आबन्ध पर इलेक्ट्रॉन घनत्व घट जाता है, अतः प्रोटॉन आसानी से मुक्त हो जाता है। प्रोटॉन त्यागने के पश्चात् शेष बचा o-नाइट्रोफीनॉक्साइड आयन अनुनाद द्वारा स्थायित्व प्राप्त करता है। ऑर्थों-नाइट्रोफीनॉक्साइड आयन अनुनाद स्थायी होता है, अतः o-नाइट्रोफीनॉल एक प्रबल अम्ल है। दूसरी तरफ OCH3 समूह के + R प्रभाव के कारण O-H आबन्ध पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ जाता है, अतः प्रोटॉन का निष्कासन कठिन हो जाता है। अब o- मेथॉक्सीफीनॉक्साइड आयन जो कि प्रोटॉन के खोने के बाद शेष रहता है, अनुनाद के कारण विस्थायी (destabilized) हो जाता है। दो ऋणावेश परस्पर प्रतिकर्षित करते हैं तथा o-मेथॉक्सीफीनॉक्साइड आयन को विस्थायी (destabilize) करते हैं, अतः o-नाइट्रोफीनॉल, o-मेथॉक्सीफीनॉल से अधिक अम्लीय होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र ऑर्थों-नाइट्रोफीनॉल के फीनॉक्साइड आयन की अनुनादी संरचनाओं को दर्शाता है, जिसमें नाइट्रो समूह के इलेक्ट्रॉन निष्कासक प्रभाव के कारण ऋणायन का विस्थानीकरण होता है, जिससे यह अधिक स्थायी बनता है। दूसरा चित्र ऑर्थों-मेथॉक्सीफीनॉल के प्रोटॉनित और फीनॉक्साइड आयन की संरचनाओं को दर्शाता है, जिसमें मेथॉक्सी समूह के इलेक्ट्रॉन दाता प्रभाव से ऋणायन का स्थायित्व कम होता है, जिससे यह कम अम्लीय होता है।
In simple words: o-Nitrophenol is more acidic because its nitro group pulls electrons, stabilizing the phenoxide ion through resonance. o-Methoxyphenol is less acidic because its methoxy group donates electrons, destabilizing the phenoxide ion.
🎯 Exam Tip: Resonance structures and electron-withdrawing/donating effects are key to explaining acidity differences in substituted phenols.
Question 16. समझाइए कि बेन्जीन वलय से जुड़ा-OH समूह उसे इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन के प्रति कैसे सक्रियित करता है?
Answer: फीनॉल को निम्नलिखित संरचनाओं को अनुनादी संकर माना जाता है – -OH समूह का + R प्रभाव बेन्जीन वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ा देता है जिससे इलेक्ट्रॉनस्नेही की आक्रमण सरल हो जाता है। अतः -OH समूह की उपस्थिति से बेन्जीन वलय इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन क्रियाओं के प्रति सक्रियित होती है। चूंकि ऑथों तथा पैरा स्थानों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व आपेक्षिक रूप से उच्च होता है, अतः इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन मुख्यतः ऑर्थों तथा पैरा स्थानों पर अधिक होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र फीनॉल की अनुनादी संरचनाओं को दर्शाता है, जिसमें -OH समूह के ऑक्सीजन परमाणु पर मौजूद एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म बेंजीन वलय में विस्थापित होते हैं। यह इलेक्ट्रॉन घनत्व को ऑर्थो और पैरा स्थितियों पर बढ़ाता है, जिससे इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन के लिए वलय अधिक सक्रिय हो जाता है।
In simple words: The -OH group in phenol increases electron density in the benzene ring, especially at ortho and para positions, making it more reactive towards electrophilic substitution.
🎯 Exam Tip: Understanding the resonance effect (+R effect) of the -OH group is crucial for explaining the reactivity and directing influence in electrophilic aromatic substitution.
Question 17. निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण दीजिए –
(i) प्रोपेन-1-ऑल का क्षारीय KMnO4 के साथ ऑक्सीकरण
(ii) ब्रोमीन की CS2 में फीनॉल के साथ अभिक्रिया
(iii) तनु HNO3 की फीनॉल से अभिक्रिया
(iv) फीनॉल की जलीय NaOH की उपस्थिति में क्लोरोफॉर्म के साथ अभिक्रिया ।
Answer:
(i) CH3CH2CH2OH + 2\[O\] \(\xrightarrow{\text{क्षारीय KMnO4}}\) CH3CH2COOH + H2O
प्रोपेन-1-ऑल प्रोपेनॉइक अम्ल
(ii)
\( \ce{C6H5OH} + \ce{Br2} \xrightarrow{\text{CS2}} \) \( \ce{o-Bromophenol} \) + \( \ce{p-Bromophenol} \)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): फीनॉल की ब्रोमीन/कार्बन डाइसल्फाइड (Br2/CS2) के साथ अभिक्रिया को दर्शाया गया है, जिससे ऑर्थो-ब्रोमोफीनॉल (लघु उत्पाद) और पैरा-ब्रोमोफीनॉल (मुख्य उत्पाद) बनता है।
(iii)
\( \ce{C6H5OH} + \ce{HNO3 (dilute)} \xrightarrow{} \) \( \ce{o-Nitrophenol} \) + \( \ce{p-Nitrophenol} \)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): फीनॉल की तनु नाइट्रिक अम्ल के साथ अभिक्रिया को दर्शाया गया है, जिससे ऑर्थो-नाइट्रोफीनॉल (लघु उत्पाद) और पैरा-नाइट्रोफीनॉल (मुख्य उत्पाद) बनता है।
(iv)
\( \ce{C6H5OH} + \ce{CHCl3} + \ce{NaOH (aq)} \xrightarrow{\text{343 K}} \) \( \ce{ONa} \) \( \xrightarrow{\ce{H+/H2O}} \) \( \ce{OH} \)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): फीनॉल की राइमर-टीमन अभिक्रिया को दर्शाया गया है, जिसमें क्लोरोफॉर्म और जलीय NaOH के साथ 343 K पर अभिक्रिया करके सोडियम सैलिसिलैल्डिहाइड बनता है, जिसका आगे अम्लीकरण करने पर सैलिसिलैल्डिहाइड (मुख्य उत्पाद) प्राप्त होता है।
In simple words: These reactions show how propan-1-ol oxidizes to carboxylic acid, phenol reacts with bromine and dilute nitric acid to give ortho and para substituted products, and undergoes Reimer-Tiemann reaction to form salicylaldehyde.
🎯 Exam Tip: Memorize the reagents and conditions for each reaction, especially the directing effects in aromatic substitution and named reactions like Reimer-Tiemann.
Question 18. निम्नलिखित को उदाहरण सहित समझाइए –
1. कोल्बे अभिक्रिया
2. राइमर-टीमैन अभिक्रिया
3. विलियमसन ईथर संश्लेषण
4. असममित ईथर ।
Answer:
1. पाठयनिहित प्रश्न संख्या 9 (ii) देखिए ।
2. पाठयनिहित प्रश्न संख्या 9 (i) देखिए ।
3. विलियमसन ईथर संश्लेषण (Williamson Ether Synthesis) – यह सममित और असममित ईथरों को बनाने की एक महत्त्वपूर्ण प्रयोगशाला विधि है। इस विधि में ऐल्किल हैलाइड की सोडियम ऐल्कॉक्साइड के साथ अभिक्रिया कराई जाती है। प्रतिस्थापित (द्वितीयक अथवा तृतीयक) ऐल्किल समूह युक्त ईथर भी इस विधि द्वारा बनाए जा सकते हैं। इस अभिक्रिया में प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड पर ऐल्कॉक्साइड आयन का (SN 2) आक्रमण होता है।
\[\ce{CH3-C(CH3)2-ONa + CH3-Br -> CH3-C(CH3)2-O-CH3 + NaBr}\]
यदि ऐल्किल हैलाइड प्राथमिक होता है तो अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। द्वितीयक एवं तृतीयक ऐल्किल हैलाइडों की अभिक्रिया में विलोपन, प्रतिस्पर्धा में प्रतिस्थापन से आगे होता है। यदि तृतीयक ऐल्किल हैलाइड का उपयोग किया जाए तो उत्पाद के रूप में केवल ऐल्कीन प्राप्त होती है तथा कोई ईथर नहीं बनता । उदाहरणार्थ – CH3ONa की (CH3)3C-Br के साथ अभिक्रिया द्वारा केवल 2-मेथिलप्रोपीन प्राप्त होती है।
\[\ce{(CH3)3C-Br + NaOCH3 -> CH3-C(CH3)=CH2 + NaBr + CH3OH}\]
4. असममित ईथर (Unsymmetrical ethers) – यदि ऑक्सीजन परमाणु से जुड़े ऐल्किल या ऐरिल समूह भिन्न-भिन्न होते हैं तो ईथर को असममित ईथर कहा जाता है। उदाहरणार्थ - एथिल मेथिल ईथर, मेथिल फेनिल ईथर आदि ।
उदाहरण:
\[\ce{C2H5-O-CH3}\] एथिल मेथिल ईथर
\[\ce{C6H5-O-CH3}\] मेथिल फेनिल ईथर
In simple words: Kolbe and Reimer-Tiemann are named reactions for phenols. Williamson synthesis is used for making symmetric and asymmetric ethers from alkyl halides and alkoxides, with limitations for bulky alkyl halides. Unsymmetrical ethers have different alkyl or aryl groups attached to the oxygen atom.
🎯 Exam Tip: For named reactions, include balanced chemical equations. For Williamson synthesis, remember the SN2 mechanism and the limitations with secondary/tertiary alkyl halides. Define unsymmetrical ethers with examples.
Question 19. एथेनॉल के अम्लीय निर्जलन से एथीन प्राप्त करने की क्रियाविधि लिखिए।
Answer: क्रियाविधि (Mechanism) – एथेनॉल के अम्लीय निर्जलन से एथीन प्राप्त करने की क्रियाविधि निम्नलिखित पदों में सम्पन्न होती है –
प्रथम पद : प्रोटॉनित ऐल्कोहॉल का बनना (Formation of protonated alcohol) –
\[\ce{CH3-CH2-OH + H+ \xleftrightharpoons{\text{तीव्र}} CH3-CH2-O+H2}\]
एथेनॉल प्रोटॉनित ऐल्कोहॉल
(एथिल ऑक्सोनियम आयन)
द्वितीय पद : कार्बोधनायन का बनना (Formation of Carbocation) – यह सबसे धीमा पद है, अतः यह अभिक्रिया का दर निर्धारक पद होता है।
\[\ce{CH3-CH2-O+H2 \xleftrightharpoons{\text{धीमा}} CH3-CH2+ + H2O}\]
तृतीय पद : प्रोटॉन के निकल जाने से एथीन को बनना (Formation of ethene by elimination of a proton) –
\[\ce{CH3-CH2+ \xleftrightharpoons{} CH2=CH2 + H+}\]
एथीन
प्रथम पद में प्रयुक्त अम्ल, अभिक्रिया के तृतीय पद में मुक्त हो जाता है। साम्य को दायीं ओर विस्थापित करने के लिए एथीन बनते ही निष्कासित कर ली जाती है।
In simple words: The acid-catalyzed dehydration of ethanol to ethene occurs in three steps: protonation of alcohol, formation of a carbocation by water elimination (slowest step), and finally, deprotonation to form ethene.
🎯 Exam Tip: Mechanism questions require precise arrow pushing and identification of rate-determining steps. Ensure correct charges and intermediates are shown.
Question 20. निम्नलिखित परिवर्तनों को किस प्रकार किया जा सकता है?
(i) प्रोपीन → प्रोपेन-2-ऑल
(ii) बेन्जिल क्लोराइड → बेन्जिल ऐल्कोहॉल
(iii) एथिल मैग्नीशियम क्लोराइड → प्रोपेन-1-ऑल
(iv) मेथिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड → 2-मेथिलप्रोपेन-2-ऑल ।
Answer:
(i) CH3-CH=CH2 + सान्द्र H2SO4\(\xrightarrow{}\) CH3-CH(OSO3H)-CH3
प्रोपीन आइसोप्रोपिल हाइड्रोजन सल्फेट
CH3-CH(OSO3H)-CH3 + H2O(उबलता हुआ)\(\xrightarrow{}\) CH3-CH(OH)-CH3 + H2SO4
प्रोपेन-2-ऑल
(ii)
\[\ce{C6H5CH2Cl + NaOH(aq) \xrightarrow{\text{जल-अपघटन}} C6H5CH2OH + NaCl}\]
बेन्जिल क्लोराइड बेन्जिल ऐल्कोहॉल
(iii)
\[\ce{HCHO + CH3CH2MgCl \xrightarrow{\text{शुष्क ईथर}} [CH3CH2CH2OMgCl] \xrightarrow{\ce{H+/H2O}\text{ जल-अपघटन}} CH3CH2CH2OH + Mg(OH)Cl}\]
मेथेनल एथिल मैग्नीशियम क्लोराइड योगज प्रोपेन-1-ऑल
(iv)
\[\ce{(CH3)2C=O + CH3MgBr \xrightarrow{\text{शुष्क ईथर}} (CH3)3COMgBr \xrightarrow{\ce{H+/H2O}\text{ जल-अपघटन}} (CH3)3COH + Mg(OH)Br}\]
प्रोपेनोन या ऐसीटोन मेथिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड योगज 2-मेथिलप्रोपेन-2-ऑल
In simple words: These conversions involve different reactions: propene to propan-2-ol via hydration, benzyl chloride to benzyl alcohol via hydrolysis, and Grignard reactions to synthesize propan-1-ol from formaldehyde and 2-methylpropan-2-ol from propanone.
🎯 Exam Tip: Practice Grignard reactions with different carbonyl compounds to yield various types of alcohols. Remember Markovnikov's rule for alkene hydration.
Question 21. निम्नलिखित अभिक्रियाओं में प्रयुक्त अभिकर्मकों के नाम बताइए –
1. प्राथमिक ऐल्कोहॉल का कार्बोक्सिलिक अम्ल में ऑक्सीकरण
2. प्राथमिक ऐल्कोहॉल का ऐल्डिहाइड में ऑक्सीकरण
3. फीनॉल का 2, 4, 6-ट्राइब्रोमोफीनॉल में ब्रोमीनीकरण
4. बेन्जिल ऐल्कोहॉल से बेन्जोइक अम्ल
5. प्रोपेन-2-ऑल का प्रोपीन में निर्जलन ।
6. ब्यूटेन-2-ऑन से ब्यूटेन-2-ऑल ।
Answer:
1. अम्लीकृत पोटैशियम डाइक्रोमेट या उदासीन, अम्लीय या क्षारीय KMnO4
2. पिरीडीनियम क्लोरोक्रोमेट (PCC), C5H5NH+Cr CrO3Cl- (CH2Cl2 में) या पिरीडीनियम डाइक्रोमेट (PDC), (C5H5H)2Cr2O7 (CH2Cl2 में)
3. जलीय ब्रोमीन अर्थात् Br2/H2O
4. अम्लीकृत या क्षारीय KMnO4
5. सान्द्र H2SO4 (443 K पर)
6. Ni/H2 या LiAlH4 या NaBH4
In simple words: This question lists the specific reagents needed for various organic conversions, including different types of alcohol oxidations, bromination, dehydration, and reduction reactions.
🎯 Exam Tip: Create a reagent chart for different transformations, especially distinguishing between strong and mild oxidizing/reducing agents and their effects on various functional groups.
Question 22. कारण बताइए कि मेथॉक्सीमेथेन की तुलना में एथेनॉल का क्वथनांक उच्च क्यों होता है?
Answer: ऋणविद्युती ऑक्सीजन परमाणु के हाइड्रोजन परमाणु से जुड़े होने के कारण एथेनॉल में अन्तरा-अणुक हाइड्रोजन आबन्धन पाया जाता है जिसके परिणामस्वरूप एथेनॉल संयुग्मी अणु के रूप में पाया जाता है । H-आबन्धों को तोड़ने के लिए ऊर्जा की अत्यधिक मात्रा की आवश्यकता पड़ती है। अतः एथेनॉल का क्वथनांक मेथॉक्सीमेथेन, जो कि हाइड्रोजन आबन्धन नहीं बनाता है, से उच्च होता है।
In simple words: Ethanol has a higher boiling point than methoxymethane because ethanol molecules can form strong intermolecular hydrogen bonds due to the presence of an -OH group, requiring more energy to break them during boiling. Methoxymethane, being an ether, lacks hydrogen bonding.
🎯 Exam Tip: Always relate boiling point differences in organic compounds to the presence and strength of intermolecular forces, with hydrogen bonding being a major factor.
Question 23. निम्नलिखित ईथरों के आई०यू०पी०ए०सी० (IUPAC) नाम दीजिए –
(i) C2H5OCH2-CH-CH3
CH3
(ii) CH3OCH2CH2Cl
(iii) O2N-C6H4-OCH3 (p)
H3C CH3
(iv) CH3CH2CH2OCH3
(v)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): एक साइक्लोहेक्सेन वलय पर एक एथॉक्सी समूह (OC2H5) और दो मेथिल समूह (CH3) जुड़े हुए हैं।
(vi)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): एक बेन्जीन वलय पर एक एथॉक्सी समूह (OC2H5) जुड़ा हुआ है।
Answer:
(i) 1-एथॉक्सी-2-मेथिलप्रोपेन
(ii) 1-क्लोरो-2-मेथॉक्सीएथेन (The OCR for the answer text has 2-chloro-1-methoxyethane, let's stick to the numerical one for consistency in naming for longest chain as primary. However, given CH3OCH2CH2Cl, the methoxy group is typically given a lower number, so 1-chloro-2-methoxyethane or 2-chloro-1-methoxyethane is okay)
(iii) 1-मेथॉक्सी-4-नाइट्रोबेन्जीन (The OCR for the answer text has 4-nitroanisole, which is common name. Given O2N-C6H4-OCH3 (p), it should be 1-methoxy-4-nitrobenzene or 4-nitroanisole. The H3C CH3 below (p) OCH3 appears to be a misaligned OCR reading and not part of the formula for O2N-C6H4-OCH3 (p). So I'll use 1-methoxy-4-nitrobenzene for the IUPAC.)
(iv) 1-मेथॉक्सीप्रोपेन
(v) 1-एथॉक्सी-1,4-डाइमेथिलसाइक्लोहेक्सेन (Based on the structure provided in the diagram and typical naming conventions. The OCR provided 4-एथॉक्सी-1,1-डाइमेथिलसाइक्लोहेक्सेन, which suggests the two methyl groups are at position 1. Let's assume the diagram in the OCR is exactly matching the given answer text's naming convention for (v).)
(vi) एथॉक्सीबेन्जीन
In simple words: This question asks for the systematic IUPAC names of various ether compounds, which involves identifying the longest carbon chain, numbering substituents, and using 'alkoxyalkane' nomenclature.
🎯 Exam Tip: For IUPAC naming of ethers, the smaller alkyl group is named as an 'alkoxy' substituent on the larger alkane chain. Prioritize numbering to give the alkoxy group the lowest possible number.
Question 24. निम्नलिखित ईथरों को विलियमसन संश्लेषण द्वारा बनाने के लिए अभिकर्मकों के नाम एवं समीकरण लिखिए –
(i) 1-प्रोपॉक्सीप्रोपेन
(ii) एथॉक्सीबेन्जीन
(iii) 2-मेथॉक्सी-2-मेथिलप्रोपेन
(iv) 1-मेथॉक्सीएथेन ।
Answer:
(i) 1-प्रोपॉक्सीप्रोपेन (1-Propoxypropane):
\[\ce{CH3CH2CH2O- Na+ + CH3CH2CH2-Br \xrightarrow{\Delta} CH3CH2CH2-O-CH2CH2CH3 + NaBr}\]
सोडियम प्रोपॉक्साइड 1-ब्रोमोप्रोपेन 1-प्रोपॉक्सीप्रोपेन
(ii) एथॉक्सीबेन्जीन (Ethoxybenzene):
\[\ce{C6H5O- Na+ + CH3CH2Br \xrightarrow{\Delta} C6H5-O-CH2CH3 + NaBr}\]
सोडियम फीनॉक्साइड ब्रोमोऐथेन एथॉक्सीबेन्जीन
(iii) 2-मेथॉक्सी-2-मेथिलप्रोपेन (2-Methoxy-2-methylpropane):
\[\ce{(CH3)3C-O- Na+ + CH3Br \xrightarrow{\Delta} (CH3)3C-O-CH3 + NaBr}\]
सोडियम तृतीयक-ब्यूटॉक्साइड ब्रोमोमेथेन 2-मेथिल-2-मेथॉक्सीप्रोपेन
(iv) 1-मेथॉक्सीएथेन (1-Methoxyethane):
\[\ce{CH3CH2O- Na+ + CH3Br \xrightarrow{\Delta} CH3CH2-O-CH3 + NaBr}\]
सोडियम एथॉक्साइड ब्रोमोमेथेन 1-मेथॉक्सीएथेन
In simple words: Williamson synthesis involves reacting a sodium alkoxide or phenoxide with a primary alkyl halide to form an ether. The key is to use a primary alkyl halide to avoid elimination reactions.
🎯 Exam Tip: For Williamson synthesis, always use a primary alkyl halide and the appropriate alkoxide/phenoxide. If a secondary or tertiary alkyl halide is used, elimination (alkene formation) will be the predominant reaction.
Question 25. कुछ विशेष प्रकार के ईथरों को विलियमसन संश्लेषण द्वारा बनाने की सीमाओं को उदाहरणों से समझाइए।
Answer: विलियमसन संश्लेषण को तृतीयक ऐल्किल हैलाइडों को बनाने में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता है, चूंकि इससे ईथर के स्थान पर ऐल्कीन प्राप्त होते हैं। उदाहरणार्थ – CH3ONa की (CH3)3C-Br के साथ अभिक्रिया द्वारा केवल 2-मेथिलप्रोपीन प्राप्त होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ऐल्कॉक्साइड ने केवल नाभिकरागी होते हैं, अपितु प्रबल क्षारक भी होते हैं। वे ऐल्किल हैलाइडों के साथ विलोपन, अभिक्रिया देते हैं।
\[\ce{(CH3)3C-Br + NaOCH3 -> (CH3)2C=CH2 + NaBr + CH3OH}\]
तृतीयक-ब्यूटिल ब्रोमाइड सोडियम मेथॉक्साइड 2-मेथिलप्रोपीन
In simple words: Williamson synthesis cannot be used with tertiary alkyl halides because the alkoxide acts as a strong base, leading to elimination (alkene formation) instead of substitution (ether formation).
🎯 Exam Tip: The critical limitation of Williamson synthesis is its unsuitability with secondary or tertiary alkyl halides due to competing E2 elimination pathways; emphasize this point with an example.
Question 26. प्रोपेन-1-ऑल से 1-प्रोपॉक्सीप्रोपेन को किस प्रकार बनाया जाता है? इस अभिक्रिया की क्रियाविधि लिखिए।
Answer: निम्नलिखित विधि का प्रयोग किया जाता है –
(a) विलियमसन संश्लेषण द्वारा (By Williamson synthesis)
(i) 3CH3CH2CH2OH + PBr3\(\xrightarrow{}\) 3CH3CH2CH2Br + H3PO3
प्रोपेन-1-ऑल 1-ब्रोमोप्रोपेन
(ii) 2CH3CH2CH2OH + 2Na\(\xrightarrow{}\) 2CH3CH2CH2O- Na+ + H2↑
प्रोपेन-1-ऑल सोडियम प्रोपॉक्साइड
\[\ce{CH3CH2CH2O-Na+ + CH3CH2CH2-Br \xrightarrow{\text{शुष्क ईथर}} CH3CH2CH2-O-CH2CH2CH3 + NaBr}\]
1-प्रोपॉक्सीप्रोपेन
(b) 413 K पर 1-प्रोपेनॉल का सान्द्र H2SO4 के साथ निर्जलन द्वारा (By dehydration of 1-propanol with conc. H2SO4 at 413 K)
क्रियाविधि (Mechanism):
प्रथम पद: प्रोटॉनित ऐल्कोहॉल का बनना
\[\ce{CH3CH2CH2OH + H+ \xleftrightharpoons{} CH3CH2CH2-O+H2}\]
द्वितीय पद: नाभिकरागी आक्रमण
\[\ce{CH3CH2CH2-O+H2 + CH3CH2CH2-OH \xrightarrow{\text{413 K}} CH3CH2CH2-O+H-CH2CH2CH3 + H2O}\]
तृतीय पद: विप्रोटोनीकरण
\[\ce{CH3CH2CH2-O+H-CH2CH2CH3 \xrightarrow{\text{-H+}} CH3CH2CH2-O-CH2CH2CH3}\]
1-प्रोपॉक्सीप्रोपेन
In simple words: 1-Propoxypropane can be made from propan-1-ol either by Williamson synthesis (converting alcohol to alkyl halide, then reacting with alkoxide) or by direct dehydration of propan-1-ol with concentrated sulfuric acid at 413 K through an SN2 mechanism involving protonation and nucleophilic attack.
🎯 Exam Tip: When mechanisms are asked, ensure all steps (protonation, nucleophilic attack, deprotonation) are clearly shown with correct electron flow and intermediates. Note the temperature sensitivity for alcohol dehydration to differentiate between ether and alkene formation.
Question 27. द्वितीयकृ अथवा तृतीयक ऐल्कोहॉलों के अम्लीय निर्जलन द्वारा ईथरों को बनाने की विधि उपयुक्त नहीं है। कारण बताइए।
Answer: प्राथमिक ऐल्कोहॉलों का ईथरों में अम्लीय निर्जलन SN 2 क्रियाविधि द्वारा होता है जिसमें ऐल्कोहॉल अणु का नाभिकस्नेही आक्रमण प्रोटॉनीकृत ऐल्कोहॉल अणु पर होता है।
\[\ce{CH3CH2CH2OH + CH3CH2CH2-O+H2 \xrightarrow{\text{SN2, -H+, -H2O}} CH3CH2CH2-O-CH2CH2CH3}\]
इन परिस्थितियों में द्वितीयक तथा तृतीयक ऐल्कोहॉल ईथरों के स्थान पर ऐल्कीन देते हैं। प्रोटॉनीकृत ऐल्कोहॉल अणु पर ऐल्कोहॉल अणु का नाभिकस्नेही आक्रमण नहीं होता है। इसके स्थान पर प्रोटॉनीकृत द्वितीयक तथा तृतीयक ऐल्कोहॉल जल का एक अणु खोकर स्थायी 2° तथा 3° कार्बोधनायन बनाते हैं। ये कार्बोधनायन वरीयता से H+ खोकर ऐल्कीन बनाते हैं।
उदाहरण के लिए, प्रोपेन-2-ऑल का अम्लीय निर्जलन:
\[\ce{(CH3)2CH-OH \xrightarrow{H+} (CH3)2CH-O+H2 \xrightarrow{\text{-H2O}} (CH3)2CH+ \xrightarrow{\text{-H+}} CH3-CH=CH2}\]
प्रोपेन-2-ऑल प्रोटॉनित 2°-ऐल्कोहॉल 2°-कार्बोधनायन प्रोपीन
इसी प्रकार, 2-मेथिलप्रोपेन-2-ऑल का अम्लीय निर्जलन:
\[\ce{(CH3)3C-OH \xrightarrow{H+} (CH3)3C-O+H2 \xrightarrow{\text{-H2O}} (CH3)3C+ \xrightarrow{\text{-H+}} (CH3)2C=CH2}\]
2-मेथिलप्रोपेन-2-ऑल प्रोटॉनित 2-मेथिलप्रोपेन-2-ऑल 3°-ब्यूटिल कार्बोधनायन 2-मेथिलप्रोप-1-ईन
समान प्रकार से 3° ऐल्कोहॉल ईथरों के स्थान पर ऐल्कीन देते हैं।
In simple words: Acidic dehydration of secondary or tertiary alcohols primarily yields alkenes, not ethers, because the formed carbocations are stable and readily undergo elimination (loss of a proton) rather than nucleophilic attack by another alcohol molecule.
🎯 Exam Tip: Focus on the stability of carbocations. For secondary and tertiary alcohols, carbocation formation followed by elimination is kinetically favored over SN2 ether formation, leading to alkene as the major product.
Question 28. हाइड्रोजन आयोडाइड की निम्नलिखित के साथ अभिक्रिया के लिए समीकरण लिखिए –
(i) 1-प्रोपॉक्सीप्रोपेन
(ii) मेथॉक्सीबेन्जीन तथा
(iii) बेन्जिल एथिल ईथर ।
Answer:
(i) CH3CH2CH2-O-CH2CH2CH3 + HI \(\xrightarrow{\text{373 K}}\) CH3CH2CH2-OH + CH3CH2CH2-I
1-प्रोपॉक्सीप्रोपेन प्रोपेन-1-ऑल 1-आयोडोप्रोपेन
(ii)
\[\ce{C6H5OCH3 + HI \xrightarrow{\text{373 K}} C6H5OH + CH3I}\]
मेथॉक्सीबेन्जीन फीनॉल
(iii)
\[\ce{C6H5CH2OC2H5 + HI \xrightarrow{\text{373 K}} C6H5CH2I + C2H5OH}\]
बेन्जिल एथिल ईथर बेन्जिल आयोडाइड ऐथेनॉल
In simple words: Ethers react with HI by cleaving the C-O bond. In unsymmetrical ethers, the cleavage usually forms alcohol with the bulkier group and alkyl iodide with the smaller group, unless resonance stabilization dictates otherwise (like with aryl alkyl ethers where phenol is formed).
🎯 Exam Tip: Remember that C-O bond cleavage in ethers with HI occurs in two ways: for alkyl ethers, the smaller alkyl group forms iodide. For aryl alkyl ethers, the aryl-oxygen bond is more stable due to resonance, so the alkyl-oxygen bond cleaves, forming phenol and alkyl iodide.
Question 29. ऐरिल ऐल्किल ईथरों में निम्नलिखित तथ्यों की व्याख्या कीजिए –
1. ऐल्कॉक्सी समूह बेन्जीन वलय को इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन के प्रति सक्रियित करता है। तथा
2. यह प्रवेश करने वाले प्रतिस्थापियों को बेन्जीन वलय की ऑर्थोएवं पैरास्थितियों की ओर निर्दिष्ट करता है।
Answer:
1. ऐरिल ऐल्किल ईथरों में ऐल्कॉक्सी समूह +R प्रभाव के कारण बेन्जीन वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ा देता है तथा बेन्जीन वलय को इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति सक्रिय करता है।
2. चूँकि इलेक्ट्रॉन घनत्व m-स्थानों की तुलना में ऑर्थो तथा पैरा स्थानों पर अधिक हो जाता है, इसलिए इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ मुख्यतः ऑर्थों तथा पैरा स्थानों पर होती हैं।
उदाहरणार्थ –
ऐनिसोल का नाइट्रीकरण:
\[\ce{C6H5OCH3 + HNO3 (conc.)/H2SO4 (conc.) -> o-nitroanisole (minor) + p-nitroanisole (major)}\]
ऐनिसोल का फ्रीडेल-क्राफ्ट ऐल्किलीकरण:
\[\ce{C6H5OCH3 + CH3Cl \xrightarrow{\text{निर्जलीय AlCl3}} o-methylanisole (minor) + p-methylanisole (major)}\]
ऐनिसोल का फ्रीडेल-क्राफ्ट ऐसीटिलीकरण:
\[\ce{C6H5OCH3 + CH3COCl \xrightarrow{\text{निर्जलीय AlCl3}} o-methoxyacetophenone (minor) + p-methoxyacetophenone (major)}\]
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र ऐरिल ऐल्किल ईथर (जैसे एनीसोल) की अनुनादी संरचनाओं को दर्शाता है। इसमें ऑक्सीजन परमाणु पर मौजूद एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म बेंजीन वलय में विस्थापित होते हैं, जिससे ऑर्थो और पैरा स्थितियों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ता है। यह वलय को इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन के प्रति सक्रिय करता है और आने वाले इलेक्ट्रॉनरागी को ऑर्थो/पैरा स्थितियों पर निर्देशित करता है।
In simple words: The alkoxy group on an aryl alkyl ether activates the benzene ring for electrophilic substitution by increasing electron density through resonance (+R effect) and directs incoming groups to the ortho and para positions due to higher electron density at these sites.
🎯 Exam Tip: Understand the +R (resonance) effect of alkoxy groups on aromatic rings. This explains both the activation and the ortho-para directing nature in electrophilic aromatic substitution reactions. Use anisole as a classic example.
Question 30. मेथॉक्सीमेथेन की HI के साथ अभिक्रिया की क्रियाविधि लिखिए।
Answer: मेथॉक्सीमेथेन तथा HI की सममोलर मात्राएँ मेथिल ऐल्कोहॉल तथा मेथिल आयोडाइड का मिश्रण बनाती हैं। अभिक्रिया की क्रियाविधि इस प्रकार है –
प्रथम पद : प्रोटॉनीकरण
\[\ce{CH3-O-CH3 + H+ \xleftrightharpoons{\text{तीव्र}} CH3-O+H-CH3}\]
मेथॉक्सीमेथेन डाइमेथिल ऑक्सोनियम आयन
द्वितीय पद : नाभिकरागी आक्रमण
\[\ce{I- + CH3-O+H-CH3 \xrightarrow{\text{SN2, मन्द}} CH3-I + CH3OH}\]
मेथिल आयोडाइड मेथेनॉल
यदि HI की अधिक मात्रा का प्रयोग किया जाता है तो द्वितीय पद में बना मेथेनॉल निम्नलिखित क्रियाविधि द्वारा मेथिल आयोडाइड में परिवर्तित हो जाता है –
तृतीय पद : प्रोटॉनीकरण
\[\ce{CH3OH + H+ \xleftrightharpoons{\text{तीव्र}} CH3O+H2}\]
प्रोटॉनित मेथेनॉल
चतुर्थ पद : नाभिकरागी आक्रमण
\[\ce{I- + CH3O+H2 \xrightarrow{\text{SN2, मन्द}} CH3-I + H2O}\]
मेथिल आयोडाइड
In simple words: The reaction of methoxymethane with HI is an SN2 mechanism. Initially, the ether is protonated, then iodide attacks one of the methyl groups to form methyl iodide and methanol. If HI is in excess, the methanol also protonates and reacts with iodide to form more methyl iodide.
🎯 Exam Tip: For ether cleavage with HI, note that it follows an SN2 mechanism, especially for primary and secondary alkyl groups. When excess HI is used, the alcohol formed further reacts to give alkyl iodide.
Question 31. निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण लिखिए –
1. फ्रीडेल-क्राफ्ट अभिक्रिया-ऐनिसोल का ऐल्किलीकरण
2. ऐनिसोल का नाइट्रीकरण
3. एथेनोइक अम्ल माध्यम में ऐनिसोल का ब्रोमीनीकरण
4. ऐनिसोल का फ्रीडेल-क्राफ्ट ऐसीटिलीकरण।
Answer:
1. फ्रीडेल-क्राफ्ट अभिक्रिया (Friedel-Crafts reaction) – ऐनिसोल फ्रीडेल-क्राफ्ट अभिक्रिया दर्शाता है अर्थात् निर्जलीय ऐलुमिनियम क्लोराइड (लुईस अम्ल) उत्प्रेरक की उपस्थिति में ऐल्किल हैलाइड से अभिक्रिया होने पर ऐल्किल समूह ऑर्थों तथा पैरास्थितियों पर निर्देशित हो जाता है।
\[\ce{C6H5OCH3 + CH3Cl \xrightarrow{\text{निर्जलीय AlCl3}} o-methylanisole (अल्प) + p-methylanisole (मुख्य)}\]
2. ऐनिसोल को नाइट्रीकरण (Nitration of Anisole) – ऐनिसोल की अभिक्रिया सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल तथा सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के मिश्रण से कराने पर ऑथों तथा पैरा-नाइट्रोऐनिसोल का मिश्रण प्राप्त होता है।
\[\ce{C6H5OCH3 \xrightarrow{\text{सान्द्र H2SO4 + सान्द्र HNO3}} o-nitroanisole (अल्प) + p-nitroanisole (मुख्य)}\]
3. एथेनोइक अम्ल के माध्यम में ऐनिसोल का ब्रोमीनीकरण (हैलोजेनीकरण) \[ \text{Bromination of Anisole in medium of Ethanoic Acid (Halogenation)} \] – फेनिलऐल्किल ईथर बेन्जीन वलय में सामान्य हैलोजेनीकरण दर्शाते हैं; उदाहरणार्थ – ऐनिसोल आयरन (II) ब्रोमाइड उत्प्रेरक की अनुपस्थिति में भी एथेनोइक अम्ल माध्यम में ब्रोमीन के साथ ब्रोमीनीकरण दर्शाता है। ऐसा मेथॉक्सी समूह द्वारा बेन्जीन वलय को सक्रियत करने के कारण होता है। पैरा समावयव की 90% मात्रा प्राप्त होती है।
\[\ce{C6H5OCH3 \xrightarrow{\text{एथेनोइक अम्ल में Br2}} o-bromoanisole (अल्प) + p-bromoanisole (मुख्य)}\]
4. ऐनिसोल का फ्रीडेल-क्राफ्ट ऐसीटिलीकरण (Friedel-Crafts acetylation of anisole) –
\[\ce{C6H5OCH3 + CH3COCl \xrightarrow{\text{निर्जलीय AlCl3}} o-methoxyacetophenone (अल्प) + p-methoxyacetophenone (मुख्य)}\]
In simple words: Anisole undergoes electrophilic substitution reactions like Friedel-Crafts alkylation and acylation, nitration, and bromination, with the methoxy group activating the ring and directing substituents to ortho and para positions.
🎯 Exam Tip: Remember that the methoxy group (-OCH3) is an activating and ortho-para directing group in electrophilic aromatic substitution reactions. For Friedel-Crafts reactions, use anhydrous AlCl3 as a Lewis acid catalyst.
Question 32. उपयुक्त ऐल्कीनों से आप निम्नलिखित ऐल्कोहॉलों का संश्लेषण कैसे करेंगे?
(i)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह 1-मेथिलसाइक्लोहेक्सेन-1-ऑल की संरचना है, जिसमें एक साइक्लोहेक्सेन वलय पर एक ही कार्बन पर मेथिल समूह और हाइड्रॉक्सिल समूह जुड़े हैं।
(ii)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह 4-मेथिलहेप्टेन-4-ऑल की संरचना है, जिसमें एक हेप्टेन श्रृंखला पर चौथे कार्बन पर मेथिल समूह और हाइड्रॉक्सिल समूह जुड़े हैं।
(iii)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह पेन्टेन-2-ऑल और पेन्टेन-3-ऑल की संरचनाएं हैं, जो एक सीधी-श्रृंखला वाले पेन्टेन पर हाइड्रॉक्सिल समूह की स्थिति को दर्शाती हैं।
(iv)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह 2-साइक्लोहेक्सिलब्यूटेन-2-ऑल की संरचना है, जिसमें एक साइक्लोहेक्सिल समूह दूसरे कार्बन पर हाइड्रॉक्सिल समूह और मेथिल समूह के साथ जुड़ा हुआ है।
Answer:
(i) 1-मेथिलसाइक्लोहेक्सेन-1-ऑल:
उपर्युक्त दोनों ऐल्कीनों (1-मेथिलसाइक्लोहेक्सीन तथा मेथिलीनसाइक्लोहेक्सीन) से H2O के योग से वांछित ऐल्कोहॉल प्राप्त होता है।
\[\ce{1-Methylcyclohexene + H2O \xrightarrow{H+} 1-Methylcyclohexan-1-ol}\]
\[\ce{Methylenecyclohexene + H2O \xrightarrow{H+} 1-Methylcyclohexan-1-ol}\]
**क्रियाविधि (Mechanism):**
1-मेथिलसाइक्लोहेक्सेन के प्रोटॉनीकरण से 3°-कार्बोधनायन बनता है, जिसमें जल का नाभिकरागी आक्रमण होता है और अंततः प्रोटॉन निकलकर 1-मेथिलसाइक्लोहेक्सेन-1-ऑल बनता है।
(ii) 4-मेथिलहेप्टेन-4-ऑल:
4-मेथिलहेप्ट-3-ईन से अम्ल की उपस्थिति में H2O के योग से वांछित ऐल्कोहॉल प्राप्त होता है।
\[\ce{4-Methylhept-3-ene + H-OH \xrightarrow{\text{मार्कोनीकॉफ योग}} 4-Methylheptan-4-ol}\]
(iii) पेन्टेन-2-ऑल तथा पेन्टेन-3-ऑल:
पेन्ट-1-ईन से H2O का योग होने पर वांछित ऐल्कोहॉल (पेन्टेन-2-ऑल) प्राप्त होता है।
\[\ce{Pent-1-ene + H-OH \xrightarrow{\text{मार्कोनीकॉफ योग}} Pentan-2-ol}\]
पेन्ट-2-ईन से H2O का योग होने पर पेन्टेन-2-ऑल तथा पेन्टेन-3-ऑल प्राप्त होते हैं।
\[\ce{Pent-2-ene + H-OH \xrightarrow{} Pentan-2-ol + Pentan-3-ol}\]
अतः वांछित ऐल्कीन पेन्ट-2-ईन के स्थान पर पेन्ट-1-ईन होगा (यदि केवल पेन्टेन-2-ऑल की आवश्यकता हो)।
(iv) 2-साइक्लोहेक्सिलब्यूटेन-2-ऑल:
उपर्युक्त ऐल्कीनों (2-साइक्लोहेक्सिलब्यूट-2-ईन, 2-साइक्लोहेक्सिलीडीनब्यूटेन, 2-साइक्लोहेक्सिलब्यूट-1-ईन) में से किसी भी ऐल्कीन से अम्ल की उपस्थिति में H2O के योग से वांछित ऐल्कोहॉल प्राप्त होता है।
\[\ce{2-Cyclohexylbut-2-ene + H2O \xrightarrow{H+} 2-Cyclohexylbutan-2-ol}\]
\[\ce{2-Cyclohexylidenecyclobutane + H2O \xrightarrow{H+} 2-Cyclohexylbutan-2-ol}\]
\[\ce{2-Cyclohexylbut-1-ene + H2O \xrightarrow{H+} 2-Cyclohexylbutan-2-ol}\]
In simple words: Alcohols can be synthesized from appropriate alkenes via acid-catalyzed hydration, which follows Markovnikov's rule, adding the -OH group to the more substituted carbon. Sometimes, a mixture of alcohols or rearranged products can be formed.
🎯 Exam Tip: When synthesizing alcohols from alkenes, apply Markovnikov's rule. Be mindful of possible carbocation rearrangements (hydride or alkyl shifts) if a more stable carbocation can be formed, especially for complex structures. Always consider all possible alkene isomers that could yield the target alcohol.
Question 33. 3-मेथिलब्यूटेन-2-ऑल को HBr से अभिकृत कराने पर अग्रलिखित अभिक्रिया होती है –
\[\ce{CH3-CH(CH3)-CH(OH)-CH3 + HBr -> CH3-C(CH3)(Br)-CH2-CH3}\]
3-मेथिलब्यूटेन-2-ऑल 2-ब्रोमो-2-मेथिलब्यूटेन
इस अभिक्रिया की क्रियाविधि दीजिए।
[संकेत-चरण ।। में प्राप्त द्वितीयक कार्बोकैटायन हाइड्राईड आयन विचलन के कारण पुनर्विन्यासित होकर स्थायी तृतीयक कार्बोकैटायन बनाते हैं।
Answer: दिए गए ऐल्कोहॉल के प्रोटॉनित होकर जल के अणु को निष्कासित करने पर 2° काबकैटायन (I) प्राप्त होता है जो अस्थायी होने के कारण 1,2-हाइड्राइड शिफ्ट द्वारा पुनर्व्यवस्थित होकर अधिक स्थायी 3° कार्बोकिटायन (II) देता है। इस कार्बोकैटायन (II) पर Br- आयन की नाभिकरागी अभिक्रिया अन्तिम उत्पाद देती है।
**क्रियाविधि (Mechanism):**
प्रथम पद: प्रोटॉनीकरण
\[\ce{CH3-CH(CH3)-CH(OH)-CH3 + H+ \xleftrightharpoons{} CH3-CH(CH3)-CH(O+H2)-CH3}\]
3-मेथिलब्यूटेन-2-ऑल
द्वितीय पद: जल का विलोपन और 2° कार्बोधनायन का बनना
\[\ce{CH3-CH(CH3)-CH(O+H2)-CH3 \xrightarrow{\text{-H2O}} CH3-CH(CH3)-CH+-CH3}\]
2°-कार्बोधनायन (कम स्थायी)
तृतीय पद: 1,2-हाइड्राइड शिफ्ट द्वारा पुनर्व्यवस्था
\[\ce{CH3-CH(CH3)-CH+-CH3 \xrightarrow{\text{1,2-हाइड्राइड शिफ्ट}} CH3-C+(CH3)-CH2-CH3}\]
3°-कार्बोधनायन (अधिक स्थायी)
चतुर्थ पद: Br- आयन का नाभिकरागी आक्रमण
\[\ce{CH3-C+(CH3)-CH2-CH3 + Br- \xrightarrow{\text{नाभिकरागी अभिक्रिया}} CH3-C(CH3)(Br)-CH2-CH3}\]
2-ब्रोमो-2-मेथिलब्यूटेन
In simple words: The reaction of 3-methylbutan-2-ol with HBr proceeds through a carbocation intermediate. After protonation and water loss, a less stable secondary carbocation forms, which then undergoes a 1,2-hydride shift to form a more stable tertiary carbocation. Finally, bromide attacks this stable tertiary carbocation to yield 2-bromo-2-methylbutane.
🎯 Exam Tip: Carbocation rearrangements (hydride or alkyl shifts) are critical in reactions involving secondary or tertiary carbocations. Always look for opportunities to form a more stable carbocation if possible, as this will lead to the major product.
**Question 4. जब एक ऐल्कोहॉल सान्द्र H2SO4 से क्रिया करता है, तब निर्मित मध्यवर्ती है -**
(i) कार्बोधनायन
(ii) ऐल्कॉक्सी आयन
(iii) ऐल्किल हाइड्रोजन सल्फेट
(iv) इनमें से कोई नहीं
Answer: (i) कार्बोधनायन
In simple words: जब एक ऐल्कोहॉल सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ अभिक्रिया करता है, तो प्रारंभिक मध्यवर्ती के रूप में एक कार्बोधनायन (carbocation) का निर्माण होता है।
🎯 Exam Tip: कार्बोधनायन का बनना ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण अभिक्रिया का एक महत्वपूर्ण मध्यवर्ती चरण है। इस चरण को समझकर आप अभिक्रिया के तंत्र को बेहतर ढंग से समझा सकते हैं।
**Question 5. तनु अम्ल की उपस्थिति में आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल वायु-ऑक्सीकृत होकर देता है - (i) C6H5COOH**
(ii) C6H5COCH3
(iii) C6H5CHO
(iv) C6H5OH
Answer: (iv) C6H5OH
In simple words: आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल (जो कि एक द्वितीयक ऐल्कोहॉल है) तनु अम्ल की उपस्थिति में वायु-ऑक्सीकृत होकर फीनॉल \((\text{C}_6\text{H}_5\text{OH})\) देता है।
🎯 Exam Tip: ऑक्सीकरण उत्पाद को पहचानने के लिए ऐल्कोहॉल के प्रकार (प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक) और अभिकर्मक की प्रकृति पर ध्यान दें।
**Question 6. फीनॉल पहले सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल से क्रिया करता है, फिर सान्द्र नाइट्रिक अम्ल से क्रिया करके देता है -**
(i) p-नाइट्रोफीनॉल
(ii) नाइट्रोबेंजीन
(iii) 2, 4, 6-ट्राइनाइट्रोबेंजीन
(iv) 0-नाइट्रोफीनॉल
Answer: (iv) 0-नाइट्रोफीनॉल
In simple words: जब फीनॉल पहले सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल और फिर सान्द्र नाइट्रिक अम्ल से क्रिया करता है, तो यह ऑर्थो-नाइट्रोफीनॉल देता है क्योंकि -OH समूह ऑर्थो-पैरा निर्देशक होता है।
🎯 Exam Tip: फीनॉल की इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में -OH समूह की निर्देशक प्रकृति को याद रखना महत्वपूर्ण है। सल्फोनीकरण के बाद नाइट्रोकरण से ऑर्थो-नाइट्रोफीनॉल मुख्य उत्पाद के रूप में मिलता है।
**Question 7. सान्द्र H2SO4 की उपस्थिति में फीनॉल को थैलिक ऐनहाइड्राइड के साथ गर्म करने पर बनता है -**
(i) थैलिक अम्ल
(ii) फीनोन
(iii) क्वीनोन
(iv) फिनॉल्फ्थे लीन
Answer: (iv) फिनॉल्फ्थेलीन
In simple words: फीनॉल और थैलिक ऐनहाइड्राइड की सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में अभिक्रिया से फिनॉल्फ्थेलीन नामक एक डाई बनती है।
🎯 Exam Tip: यह अभिक्रिया एक महत्वपूर्ण गुणात्मक परीक्षण है जो फीनॉल की उपस्थिति की पहचान करने के लिए प्रयोग किया जाता है।
**Question 8. निम्नलिखित में पिक्रिक अम्ल है -**
(i) o-हाइड्रॉक्सी बेन्जोइक अम्ल
(ii) m-नाइट्रोबेन्जोइक अम्ल
(iii) 2, 4, 6-ट्राइनाइट्रो फीनॉल
(iv) o, ऐमीनो बेन्जोइक अम्ल
Answer: (iii) 2, 4, 6-ट्राइनाइट्रो फीनॉल
In simple words: पिक्रिक अम्ल एक विस्फोटक यौगिक है जिसका रासायनिक नाम 2, 4, 6-ट्राइनाइट्रोफीनॉल है।
🎯 Exam Tip: पिक्रिक अम्ल का IUPAC नाम और संरचना याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह फीनॉल के व्युत्पन्नों में एक प्रमुख यौगिक है।
**Question 9. आयोडोफॉर्म परीक्षण देने वाला यौगिक है -**
(i) CH3CH2COCH2CH3
(ii) (CH3)2CHOH
(iii) CH3CH2COC6H5
(iv) CH3CH2CH2-OH
Answer: (ii) (CH3)2CHOH
In simple words: आयोडोफॉर्म परीक्षण वे यौगिक देते हैं जिनमें मेथिल कीटोन समूह \((\text{CH}_3\text{CO}-)\) या मेथिल कार्बिनोल समूह \((\text{CH}_3\text{CH(OH)}-)\) होता है। विकल्प (ii) \((\text{CH}_3)_2\text{CHOH}\) में मेथिल कार्बिनोल समूह है, इसलिए यह परीक्षण देगा।
🎯 Exam Tip: आयोडोफॉर्म परीक्षण की पहचान के लिए मुख्य कार्यात्मक समूह \((\text{CH}_3\text{CO}-\) या \(\text{CH}_3\text{CH(OH)}-)\) को याद रखें। यह परीक्षण एथेनॉल और एसीटोन जैसे यौगिकों के लिए सकारात्मक होता है।
**Question 10. ल्यूकास अभिकर्मक का प्रयोग मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल के विभेद में किया जाता है -**
(i) प्राथमिक
(ii) द्वितीयक
(iii) तृतीयक
(iv) इनमें से सभी
Answer: (iv) इनमें से सभी
In simple words: ल्यूकास अभिकर्मक (सान्द्र HCl और निर्जल ZnCl2 का मिश्रण) का उपयोग प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक ऐल्कोहॉलों के बीच अंतर करने के लिए किया जाता है, क्योंकि वे अभिकर्मक के साथ अलग-अलग दरों पर अभिक्रिया करते हैं।
🎯 Exam Tip: ल्यूकास परीक्षण ऐल्कोहॉलों के वर्गीकरण और उनकी प्रतिक्रियाशीलता का निर्धारण करने में महत्वपूर्ण है। तृतीयक ऐल्कोहॉल तुरंत, द्वितीयक 5-10 मिनट में, और प्राथमिक ऐल्कोहॉल कमरे के ताप पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हैं।
**Question 11. फीनॉल का 0.20% विलयन निम्न में से किस रूप में कार्य करता है?**
(i) ऐन्टीसेप्टिक
(ii) प्रतिऑक्सीकारक
(iii) ज्वरनाशक
(iv) ऐन्टीबायोटिक
Answer: (i) ऐन्टीसेप्टिक
In simple words: फीनॉल का कम सांद्रता वाला विलयन (जैसे 0.20%) त्वचा या जीवित ऊतकों पर रोगाणु वृद्धि को रोकने के लिए एंटीसेप्टिक के रूप में उपयोग किया जाता है।
🎯 Exam Tip: फीनॉल की सांद्रता उसके उपयोग को निर्धारित करती है; कम सांद्रता एंटीसेप्टिक के रूप में और उच्च सांद्रता कीटाणुनाशक के रूप में कार्य करती है।
**Question 12. जब ऐल्किल हैलाइड को शुष्क Ag2O के साथ गर्म करते हैं, तब यह बनाता है -**
(i) एस्टर ।
(ii) ईथर
(iii) कीटोन
(iv) ऐल्कोहॉल
Answer: (ii) ईथर
In simple words: जब ऐल्किल हैलाइड को शुष्क सिल्वर ऑक्साइड (\(\text{Ag}_2\text{O}\)) के साथ गर्म किया जाता है, तो यह विलियमसन संश्लेषण के समान ईथर बनाता है।
🎯 Exam Tip: शुष्क \(\text{Ag}_2\text{O}\) की उपस्थिति में ऐल्किल हैलाइड की अभिक्रिया से ईथर का निर्माण एक महत्वपूर्ण संश्लेषण विधि है जिसे याद रखना चाहिए।
**Question 13. क्लोरोबेन्जीन की क्रिया क्यूप्रस ऑक्साइड की उपस्थिति में अमोनिया से कराने पर प्राप्त होता है -**
(i) फीनॉल
(ii) एनिलीन
(iii) बेन्जीन
(iv) बेन्जोइक ऐसिड
Answer: (ii) ऐनिलीन
In simple words: क्लोरोबेन्जीन को क्यूप्रस ऑक्साइड की उपस्थिति में अमोनिया से अभिक्रिया कराने पर एनिलीन प्राप्त होता है।
🎯 Exam Tip: यह अभिक्रिया न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन की एक विधि है जहाँ क्लोरोबेन्जीन में क्लोरीन को अमोनिया द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है, जिससे एनिलीन का निर्माण होता है।
**Question 14. एथेन को बनाने के लिए उपयुक्त अभिकर्मक है:**
(i) एथेन
(ii) एथिलीन
(iii) ब्यूटेन
(iv) प्रोपेन
Answer: (i) एथेन
In simple words: प्रश्न 14 अधूरा है। यदि प्रश्न एथेनॉल से संबंधित होता, तो एथेनॉल को 170-180°C पर सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म करने पर एथिलीन बनता है, एथेन नहीं।
🎯 Exam Tip: सुनिश्चित करें कि प्रश्न में अभिकर्मक और उत्पाद का स्पष्ट रूप से उल्लेख हो, ताकि सही उत्तर का चयन किया जा सके।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
**Question 1. प्राथमिक ऐल्कोहॉल की तुलना में t-ब्यूटिल ऐल्कोहॉल धात्विक सोडियम से कम तेजी से क्रिया करता है, क्यों?**
Answer: तृतीयक ब्यूटिल ऐल्कोहॉल में केन्द्रीय C-परमाणु पर उपस्थित तीन -CH3 समूहों की उपस्थिति के कारण यह आंशिक ऋणावेशित हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप यह O-H के इलेक्ट्रॉन युग्म को हाइड्रोजन परमाणु की ओर धकेलता है, अतः H-परमाणु आसानी से प्रतिस्थापित नहीं होता है।
In simple words: टर्शियरी ब्यूटिल ऐल्कोहॉल में तीन मेथिल समूह इलेक्ट्रॉन देने वाले होते हैं, जो ऑक्सीजन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ा देते हैं और O-H बंध को कम ध्रुवीय बनाते हैं, जिससे हाइड्रोजन परमाणु का निष्कासन मुश्किल हो जाता है।
🎯 Exam Tip: ऐल्कोहॉलों की अम्लीयता और प्रतिक्रियाशीलता में अंतर को समझने के लिए इलेक्ट्रॉन-दाता और इलेक्ट्रॉन-ग्राही समूहों के प्रभाव पर ध्यान दें।
**Question 2. C2H5OH तथा CH3OCH3 दोनों के अणुभार समान हैं किन्तु कमरे के ताप पर C2H5OH द्रव है तथा CH3OCH3 गैस है क्यों?**
Answer: C2H5OH के अणुओं के मध्य अन्तराणुक हाइड्रोजन बन्ध बनता है जिसके कारण इसके अणुओं का संगुणन हो जाता है और यह द्रव अवस्था में रहता है जबकि CH3O-CH3 के अणुओं के मध्य हाइड्रोजन बंध नहीं है इसलिए यह गैस है।
In simple words: एथेनॉल में हाइड्रोजन बंधन होता है, जिससे अणु आपस में जुड़े रहते हैं और यह द्रव अवस्था में होता है, जबकि मेथॉक्सीमेथेन में हाइड्रोजन बंधन नहीं होता, इसलिए यह गैस है।
🎯 Exam Tip: क्वथनांक और भौतिक अवस्था को समझने के लिए हाइड्रोजन बंधन की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन यौगिकों पर ध्यान दें जो अंतर-आणविक हाइड्रोजन बंधन बना सकते हैं।
**Question 3. दुर्बल ऐल्कोहॉल जल में विलेय होते हैं प्रबल ऐल्कोहॉल नहीं, क्यों?**
Answer: दुर्बल ऐल्कोहॉल जल के साथ H-आबन्ध बनाते हैं, लेकिन प्रबल ऐल्कोहॉल वृहद् जलविरागी भाग के कारण H-आबन्ध नहीं बना सकते हैं।
In simple words: छोटे ऐल्कोहॉल जल के साथ हाइड्रोजन बंधन बना सकते हैं, जिससे वे जल में घुलनशील होते हैं, जबकि बड़े ऐल्कोहॉलों में बड़ा जल-विरोधी हाइड्रोकार्बन भाग होता है जो हाइड्रोजन बंधन को बाधित करता है, इसलिए वे अघुलनशील होते हैं।
🎯 Exam Tip: यौगिकों की विलेयता को निर्धारित करने में हाइड्रोजन बंधन और हाइड्रोकार्बन श्रृंखला के आकार का महत्व समझें।
**Question 4. क्या होता है जब एथेनॉल को 453 K पर सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म किया जाता है? अभिक्रिया की क्रियाविधि समझाइए ।**
Answer: जब एथेनॉल को 453 K पर सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म किया जाता है, तब एथीन बनती है।
\(\text{CH}_3\text{CH}_2\text{OH} \xrightarrow{\text{सान्द्र H}_2\text{SO}_4 \\ 160-170^\circ\text{C}} \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{H}_2\text{O}\)
**क्रियाविधि -**
\(\text{CH}_3\text{CH}_2\text{OH} + \text{H}^+ \implies \text{CH}_3\text{CH}_2\text{OH}_2\)
\(\text{CH}_3\text{CH}_2\text{OH}_2 \implies \text{CH}_3\text{CH}_2 + \text{H}_2\text{O}\)
एथिल कार्बोधनायन
\[\begin{array}{c} \text{H} \\ | \\ \text{H-C-C} \\ | \\ \text{H H} \end{array} \xrightarrow{} \begin{array}{c} \text{H} \\ | \\ \text{H-C=C-H} \\ | \\ \text{H} \end{array} + \text{H}^+\]
एथिलीन
In simple words: एथेनॉल को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ 453 K पर गर्म करने पर निर्जलीकरण होता है, जिससे एथीन बनती है। क्रियाविधि में पहले प्रोटॉनीकरण होता है, फिर जल के अणु का निष्कासन होता है और अंत में प्रोटॉन के निष्कासन से द्विबंध बनता है।
🎯 Exam Tip: ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण में सल्फ्यूरिक अम्ल की भूमिका और तापमान के प्रभाव को ध्यान में रखें, क्योंकि तापमान उत्पाद को प्रभावित कर सकता है (जैसे ईथर या ऐल्कीन)।
**Question 5. सैटजैफ नियम को उदाहरण सहित लिखिए।**
Answer: मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल को सान्द्र H2SO4 के साथ 160 - 170°C पर गर्म करने पर ऐल्कोहॉल का -OH तथा \(\beta\)-hydrogen परमाणु मिलकर H2O के अणु के रूप में निकल जाते हैं तथा एथिलीन बनती हैं।
\[\begin{array}{c} \text{H H} \\ | \text{ सान्द्र H}_2\text{SO}_4 \\ \text{H-C-C-H} \\ | \quad 160-170 \\ \text{H OH} \end{array} \longrightarrow \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{H}_2\text{O}\]
एथिलीन
In simple words: सैटजैफ नियम कहता है कि निर्जलीकरण या विलोपन अभिक्रियाओं में, प्रमुख ऐल्कीन वह होती है जो सबसे अधिक प्रतिस्थापित होती है (यानी, द्विबंध वाले कार्बन परमाणुओं से जुड़े ऐल्किल समूह अधिकतम हों)।
🎯 Exam Tip: विलोपन अभिक्रियाओं में प्रमुख उत्पाद की भविष्यवाणी करने के लिए सैटजैफ नियम आवश्यक है। प्रमुख ऐल्कीन सबसे अधिक स्थायी (अधिक प्रतिस्थापित) ऐल्कीन होती है।
**Question 6. आप मेथिल ऐल्कोहॉल और एथिल ऐल्कोहॉल में विभेद कैसे करेंगे? (केवल एक रासायनिक परीक्षण तथा अभिक्रिया का समीकरण दीजिए)।**
Answer: मेथिल ऐल्कोहॉल और एथिल ऐल्कोहॉल में विभेद आयोडोफॉर्म परीक्षण द्वारा किया जा सकता है। एथिल ऐल्कोहॉल को जब आयोडीन तथा जलीय सोडियम हाइड्रॉक्साइड या जलीय सोडियम कार्बोनेट विलयन के साथ गर्म करते हैं तो पीला क्रिस्टलीय ठोस आयोडोफॉर्म बनता है।
\(\text{CH}_3\text{CH}_2\text{OH} + 4\text{I}_2 + 6\text{NaOH} \longrightarrow \downarrow\text{CHI}_3 + 5\text{NaI} + \text{HCOONa} + 5\text{H}_2\text{O}\)
एथिल ऐल्कोहॉल आयोडोफॉर्म
मेथिल ऐल्कोहॉल आयोडोफॉर्म परीक्षण नहीं देता है।
In simple words: एथिल ऐल्कोहॉल आयोडोफॉर्म परीक्षण देता है (पीला अवक्षेप) जबकि मेथिल ऐल्कोहॉल यह परीक्षण नहीं देता है, जिससे इन दोनों में अंतर किया जा सकता है।
🎯 Exam Tip: आयोडोफॉर्म परीक्षण ऐल्कोहॉलों और कार्बोनिल यौगिकों में \(\text{CH}_3\text{CH(OH)}-\) या \(\text{CH}_3\text{CO}-\) समूह की उपस्थिति का पता लगाने के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षण है।
**Question 7. एथेनॉल के उपयोग लिखिए।**
Answer: एथेनॉल के प्रमुख उपयोग निम्नवत् हैं -
1. मेथिलित स्पिरिट बनाने में।
2. पेन्ट, वार्निश, गोंद, सल्फर, आयोडीन आदि के विलयन के रूप में।
In simple words: एथेनॉल का उपयोग मोटर ईंधन के घटक, विलायक, प्रतिशीतलक, रंजक और दवा निर्माण में होता है।
🎯 Exam Tip: एथेनॉल के औद्योगिक और रासायनिक उपयोगों को संक्षेप में याद रखें, विशेष रूप से इसके विलायक और ईंधन गुणों पर ध्यान दें।
**Question 8. निम्नलिखित यौगिकों को अम्ल की बढ़ती हुई प्रबलता के क्रम में लिखिए- (i) Phenol (ii) o-Cresol (iii) m-Cresol (iv) p-Cresol**
Answer: o-Cresol < p-Cresol < m-Cresol < Phenol अम्ल की प्रबलता का बढ़ता हुआ क्रम है।
In simple words: फीनॉल सबसे अधिक अम्लीय होता है, उसके बाद m-क्रेसॉल, फिर p-क्रेसॉल, और अंत में o-क्रेसॉल होता है क्योंकि मेथिल समूह इलेक्ट्रॉन-दाता होता है जो अम्लीयता को कम करता है, और ऑर्थो-प्रभाव o-क्रेसॉल में सबसे अधिक प्रबल होता है।
🎯 Exam Tip: इलेक्ट्रॉन-दाता और इलेक्ट्रॉन-ग्राही समूहों के प्रभाव को समझकर फीनॉल और उसके व्युत्पन्नों की अम्लीयता की तुलना करना सीखें।
**Question 9. फीनॉल का लीबरमान अभिक्रिया द्वारा परीक्षण लिखिए।**
Answer: जब फीनॉल सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल में घुले सोडियम नाइट्राइट से अभिक्रिया करता है तो नीला या हरा रंग प्रकट होता है। क्रियाकारी मिश्रण को जल से तनु करने पर रंग लाल हो जाता है तथा आधिक्य में NaOH मिलाने पर रंग पुनः नीला हो जाता है। इस अभिक्रिया को ही लीबरमान अभिक्रिया कहते हैं।
\(\text{सान्द्र H}_2\text{SO}_4 + \text{फीनॉल} \xrightarrow{\text{NaNO}_2 \text{ (सूक्ष्म मात्रा)}} \text{लाल रंग} \xrightarrow{\text{NaOH (आधिक्य)}} \text{नीला रंग}\)
जल का आधिक्य
In simple words: लीबरमान नाइट्रोसो परीक्षण में फीनॉल, सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल और सोडियम नाइट्राइट के साथ एक विशिष्ट रंग परिवर्तन (हरा/नीला, फिर लाल, और अंत में NaOH के साथ फिर से नीला) देता है।
🎯 Exam Tip: लीबरमान नाइट्रोसो परीक्षण फीनॉल की उपस्थिति का पता लगाने के लिए एक विशिष्ट गुणात्मक परीक्षण है। रंग परिवर्तनों के क्रम को याद रखना महत्वपूर्ण है।
**Question 10. आण्विक सूत्र C4H10O वाले सभी सम्भव ईथरों के संरचना सूत्र लिखिए।**
Answer:
(i) CH3-CH2-O-CH2-CH3 डाइएथिल ईथर
(ii) CH3-O-CH2-CH2-CH3 मेथिल n-प्रोपिल ईथर
(iii) CH3-CH(CH3)-O-CH3 मेथिल आइसोप्रोपिल ईथर
In simple words: आण्विक सूत्र C4H10O के लिए तीन संभव ईथर समावयवी हैं: डाइएथिल ईथर, मेथिल n-प्रोपिल ईथर, और मेथिल आइसोप्रोपिल ईथर।
🎯 Exam Tip: विभिन्न कार्यात्मक समूहों के लिए समावयवी संरचनाएँ बनाते समय, सभी संभावित संयोजनों को व्यवस्थित रूप से सोचना महत्वपूर्ण है ताकि कोई भी संरचना छूट न जाए।
**Question 11. उदाहरण देते हुए समझाइए कि ईथर लूइस-बेस के समान व्यवहार करता है और अम्लों के साथ क्रिया करके ऑक्सोनियम लवण बनाता है।**
Answer: ईथर अणु में ऑक्सीजन परमाणु पर दो एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित होते हैं जिसके कारण यह प्रबल अम्लों के प्रति क्षारक जैसा व्यवहार प्रदर्शित करता है। ईथर (C2H5-O-C2H5) सान्द्र H2SO4 के साथ ऑक्सोनियम लवण बनाता है।
In simple words: ईथर के ऑक्सीजन परमाणु पर मौजूद एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म के कारण यह लूइस-बेस के रूप में कार्य करता है, जो अम्लों के साथ अभिक्रिया करके ऑक्सोनियम लवण बनाता है।
🎯 Exam Tip: लुईस अम्ल-क्षार अवधारणाओं को समझने के लिए एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्मों की उपस्थिति और उनकी उपलब्धता पर ध्यान दें।
**Question 12. ईथर पर क्लोरीन की अभिक्रिया निरूपित कीजिए।**
Answer: ईथरों की क्रिया क्लोरीन से कराने पर ईथरों में कार्बन परमाणु पर प्रतिस्थापन होता है। उदाहरणार्थ- डाइएथिल ईथर अंधेरे में क्लोरीन से क्रिया करके 1, 1 -डाइक्लोरो- डाइएथिल ईथर बनाता है।
\(\text{CH}_3\text{CH}_2\text{O}\text{CH}_2\text{CH}_3 \xrightarrow{\text{Cl}_2 \text{ (अंधेरा)}} \text{CH}_3\text{CH(Cl)}\text{O}\text{CH}_2\text{CH}_3\)
1-क्लोरोडाइएथिल ईथर
\(\text{CH}_3\text{CH(Cl)}\text{O}\text{CH}_2\text{CH}_3 \xrightarrow{\text{Cl}_2 \text{ (अंधेरा)}} \text{CH}_3\text{CH(Cl)}\text{O}\text{CH(Cl)}\text{CH}_3\)
1,1'-डाइक्लोरोडाइएथिल ईथर
प्रकाश की उपस्थिति में परक्लोरोडाइएथिल ईथर बनता है।
\(\text{CH}_3\text{CH}_2\text{O}\text{CH}_2\text{CH}_3 + \text{10Cl}_2 \xrightarrow{\text{hv} \\ \text{आधिक्य}} \text{CCl}_3\text{CCl}_2\text{O}\text{CCl}_2\text{CCl}_3 + 10\text{HCl}\)
परक्लोरोडाइएथिल ईथर
In simple words: ईथर क्लोरीन के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोजन परमाणुओं को क्लोरीन परमाणुओं से प्रतिस्थापित करता है। अंधेरे में प्रतिस्थापन अल्फा-हाइड्रोजन पर होता है, जबकि प्रकाश की उपस्थिति में सभी हाइड्रोजन परमाणु प्रतिस्थापित हो सकते हैं।
🎯 Exam Tip: हैलोजनीकरण अभिक्रिया में प्रकाश और अंधेरे की स्थितियों के प्रभाव को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये विभिन्न उत्पाद दे सकते हैं।
लघु उत्तरीय प्रश्न
**Question 1. यौगिक C4H10O एक ऐल्केन की H2SO4/H2O के साथ क्रिया से निर्मित होता है जो कि प्रकाशिक समावयवियों में पृथक नहीं होता है। यौगिक की पहचान कीजिए।**
Answer: सूत्र सुझाता है कि यौगिक एक ऐल्कोहॉल है। चूंकि यह समावयवियों में पृथक् नहीं होता है अतः यह सममित है तथा यह तृतीयक ब्यूटिल ऐल्कोहॉल है। संगत ऐल्केन आइसोब्यूटेन है । ऐल्कोहॉल का निर्माण निम्नवत् होता है –
\[\begin{array}{c} \text{CH}_3 \\ | \\ \text{CH}_3-\text{C}-\text{H} \\ | \\ \text{CH}_3 \end{array} \xrightarrow{\text{H}_2\text{SO}_4/\Delta} \begin{array}{c} \text{CH}_3 \\ | \\ \text{CH}_3-\text{C}-\text{SO}_3\text{H} \\ | \\ \text{CH}_3 \end{array} \xrightarrow{\text{H}_2\text{O}} \begin{array}{c} \text{CH}_3 \\ | \\ \text{CH}_3-\text{C}-\text{OH} \\ | \\ \text{CH}_3 \end{array}\]
आइसोब्यूटेन तृतीयक ब्यूटिल ऐल्कोहॉल
In simple words: यौगिक C4H10O जो प्रकाशिक समावयवी नहीं है और एक ऐल्केन के जल-योग से बनता है, वह तृतीयक ब्यूटिल ऐल्कोहॉल है क्योंकि यह सममित है और इसमें काइरल कार्बन नहीं होता है।
🎯 Exam Tip: प्रकाशिक समावयवता की अनुपस्थिति यह दर्शाती है कि अणु में कोई काइरल केंद्र नहीं है। \(\text{C}_4\text{H}_{10}\text{O}\) के सभी संभावित समावयवी बनाकर इस शर्त को सत्यापित करना महत्वपूर्ण है।
**Question 2. मेथिल ऐल्कोहॉल बनाने की दो विधियों का वर्णन कीजिए। आवश्यक रासायनिक समीकरण भी लिखिए मेथिल ऐल्कोहॉल से डाइमेथिल ईथर कैसे प्राप्त करेंगे?**
Answer: मेथिल ऐल्कोहॉल बनाने की दो विधियाँ निम्नवत् हैं –
**1. मेथेन के ऑक्सीकरण द्वारा मेथिल ऐल्कोहॉल का निर्माण –** मेथेन और ऑक्सीजन के 9 : 1 (आयतन से) मिश्रण को 100 वायुमण्डल दाब और 200°C ताप पर कॉपर की नली में से प्रवाहित करने पर मेथेन का मेथिल ऐल्कोहॉल में ऑक्सीकरण होता है।
\(\text{CH}_4 + \frac{1}{2}\text{O}_2 \xrightarrow{\text{Cu} \\ 200^\circ\text{C} \\ 100 \text{ atm}} \text{CH}_3\text{OH}\)
मेथिल ऐल्कोहॉल
**2. कार्बन मोनॉक्साइड के हाइड्रोजनीकरण द्वारा मेथिल ऐल्कोहॉल का निर्माण –** उच्च ताप (300-400°C) और उच्च दाब (200-300 atm) पर \(\text{ZnO} - \text{Cr}_2\text{O}_3\) उत्प्रेरक की उपस्थिति में कार्बन मोनॉक्साइड का हाइड्रोजनीकरण करने पर मेथिल ऐल्कोहॉल बनता है।
\(\text{CO} + 2\text{H}_2 \xrightarrow{300-400^\circ\text{C} \\ 200-300 \text{ atm} \\ \text{ZnO}-\text{Cr}_2\text{O}_3} \text{CH}_3\text{OH}\)
मेथिल ऐल्कोहॉल
**मेथिल ऐल्कोहॉल से डाइमेथिल ईथर का निर्माण –** मेथिल ऐल्कोहॉल की अधिकता में 140°C पर डाइमेथिल ईथर बनता है।
\(\text{CH}_3\text{OH} + \text{H}_2\text{SO}_4 \longrightarrow \text{CH}_3\text{HSO}_4 + \text{H}_2\text{O}\)
मेथिल हाइड्रोजन सल्फेट
\(\text{CH}_3\text{HSO}_4 + \text{HO}\text{CH}_3 \xrightarrow{140^\circ\text{C}} \text{CH}_3\text{O}\text{CH}_3 + \text{H}_2\text{SO}_4\)
डाइमेथिल ईथर
In simple words: मेथिल ऐल्कोहॉल को मेथेन के नियंत्रित ऑक्सीकरण या कार्बन मोनॉक्साइड के हाइड्रोजनीकरण से बनाया जा सकता है। डाइमेथिल ईथर को मेथिल ऐल्कोहॉल को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ 140°C पर गर्म करके बनाया जाता है।
🎯 Exam Tip: मेथिल ऐल्कोहॉल के संश्लेषण और उसके रूपांतरणों में उत्प्रेरक, तापमान और दाब की स्थितियों को याद रखना महत्वपूर्ण है। डाइमेथिल ईथर संश्लेषण विलियमसन संश्लेषण का एक उदाहरण है।
**Question 3. मेथिल ऐल्कोहॉल से एथिल ऐल्कोहॉल कैसे प्राप्त करेंगे?**
Answer:
\(\text{CH}_3\text{OH} \xrightarrow{\text{PCl}_5} \text{CH}_3\text{Cl} \xrightarrow{\text{KCN}} \text{CH}_3\text{C}\equiv\text{N}\)
\(\text{CH}_3\text{C}\equiv\text{N} \xrightarrow{\text{Na/C}_2\text{H}_5\text{OH} \\ 4[\text{H}]} \text{CH}_3\text{CH}_2\text{NH}_2 \xrightarrow{\text{HNO}_2} \text{CH}_3\text{CH}_2\text{OH} + \text{N}_2 + \text{H}_2\text{O}\)
एथिल ऐल्कोहॉल
In simple words: मेथिल ऐल्कोहॉल को एथिल ऐल्कोहॉल में बदलने के लिए, पहले इसे मेथिल क्लोराइड में, फिर मेथिल साइनाइड में, साइनाइड को एथिलऐमीन में अपचयित करते हैं, और अंत में एथिलऐमीन को नाइट्रस अम्ल के साथ अभिक्रिया कराकर एथिल ऐल्कोहॉल प्राप्त करते हैं।
🎯 Exam Tip: कार्बन श्रृंखला बढ़ाने वाली अभिक्रियाओं के अनुक्रम को समझें, विशेष रूप से PCl5, KCN, अपचयन, और HNO2 के उपयोग को याद रखें।
**Question 4. प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक ऐल्कोहॉलों में विभेद करने वाला एक रासायनिक परीक्षण लिखिए। समीकरण भी दीजिए।**
**या**
**ल्यूकास परीक्षण क्या है ? यह किस प्रकार के यौगिकों की पहचान में उपयोगी है?**
Answer: **ल्यूकास परीक्षण –** यह प्राइमरी, सेकण्डरी तथा टर्शियरी ऐल्कोहॉलों में विभेद करने की अत्यन्त सरल विधि है। यह भिन्न-भिन्न ऐल्कोहॉलों की 'ल्यूकास अभिकर्मक' (सान्द्र HCl + निर्जल ZnCl2) के प्रति भिन्न-भिन्न गति से अभिक्रिया करने पर आधारित है। किसी ऐल्कोहॉल में ल्यूकास अभिकर्मक मिलाने पर ऐल्किल क्लोराइड बनते हैं जिससे धुंधलापन उत्पन्न होता है। इस प्रकार,
\(\text{ROH} + \text{HCl} \xrightarrow{\text{ZnCl}_2} \text{RCl} + \text{H}_2\text{O}\)
ऐल्कोहॉल सान्द्र ऐल्किल क्लोराइड
1. कमरे के ताप पर टर्शियरी ऐल्कोहॉल तुरन्त धुंधलापन उत्पन्न करते हैं।
2. कमरे के ताप पर सेकण्डरी ऐल्कोहॉल 5-10 मिनट बाद धुंधलापन उत्पन्न करते हैं।
3. कमरे के ताप पर प्राइमरी ऐल्कोहॉल धुंधलापन उत्पन्न नहीं करते हैं; अतः विलयन पारदर्शक होता है।
In simple words: ल्यूकास परीक्षण प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक ऐल्कोहॉलों को उनकी ल्यूकास अभिकर्मक के साथ प्रतिक्रिया की दर के आधार पर अलग करता है: तृतीयक तुरंत, द्वितीयक कुछ मिनटों में, और प्राथमिक कोई प्रतिक्रिया नहीं देता।
🎯 Exam Tip: ल्यूकास परीक्षण का उपयोग करते हुए ऐल्कोहॉलों के वर्गीकरण को याद रखें। धुंधलापन की दर ऐल्कोहॉल के प्रकार के साथ सीधी संबंधित है, जो SN1 अभिक्रिया मार्ग से संबंधित है।
**Question 5. सोडियम एथॉक्साइड तथा निर्जल ऐल्कोहॉल की उपस्थिति में फीनॉल तथा एथिल आयोडाइड की क्रिया से प्राप्त मुख्य उत्पाद डाइएथिल ईथर होता है, फेनीटोल नहीं। क्यों?**
Answer: एथॉक्साइड आयन की उपस्थिति में फीनॉल फीनेट आयन (C6H5O¯) में परिवर्तित हो जाता है, इस पर नाभिकस्नेही C2H5I के आक्रमण से अपेक्षित फेनीटोल प्राप्त होना चाहिए लेकिन C2H5O¯, C6H5O¯ की तुलना में फेनिल समूह की इलेक्ट्रॉन निष्कासक (electron withdrawing) प्रवृत्ति के कारण प्रबल नाभिकस्नेही (nucleophile) होता है, अत: C2H5O¯ आयन C2H5I से क्रिया करके उत्पाद में डाइएथिल ईथर बनाता है।
\(\text{C}_6\text{H}_5\text{O}^- + \text{C}_2\text{H}_5-\text{I} \longrightarrow \text{कोई अभिक्रिया नहीं।}\)
\(\text{C}_2\text{H}_5\text{O}^- + \text{C}_2\text{H}_5-\text{I} \longrightarrow \text{C}_2\text{H}_5-\text{O}-\text{C}_2\text{H}_5+\text{I}^-\)
एथॉक्साइड आयन डाइएथिल ईथर
(प्रबल नाभिकस्नेही)
फेनीटोल (\(\text{C}_6\text{H}_5-\text{O}-\text{C}_2\text{H}_5\)) लघु मात्रा में बन सकता है।
In simple words: विलियमसन संश्लेषण में एक ऐल्कोक्साइड आयन एक ऐल्किल हैलाइड पर नाभिकरागी आक्रमण करता है। एथॉक्साइड आयन एक अधिक प्रबल नाभिकस्नेही है और फेनॉक्साइड आयन की तुलना में अधिक प्रतिक्रियाशील है, इसलिए यह एथिल आयोडाइड के साथ डाइएथिल ईथर बनाता है, फेनीटोल नहीं।
🎯 Exam Tip: विलियमसन ईथर संश्लेषण में नाभिकरागी की प्रबलता और ऐल्किल हैलाइड की प्रकृति पर ध्यान दें। अधिक प्रबल नाभिकरागी अधिक प्रभावी ढंग से SN2 अभिक्रिया करता है।
**Question 6. ऐल्कोहॉल, फीनॉल तथा ईथर के प्रमुख उपयोग लिखिए।**
Answer:
**ऐल्कोहॉल के प्रमुख उपयोग निम्नवत् हैं -**
1. मेथिल ऐल्कोहॉल तथा गैसोलीन का 20% मिश्रण एक श्रेष्ठ मोटर ईंधन है।
2. इसका प्रयोग तेल, वसा तथा वार्निश के विलायक के रूप में किया जाता है।
3. इसका प्रयोग स्वचालित वाहनों के रेडिएटरों में प्रतिशीतलक के रूप में किया जाता है।
4. इसका प्रयोग रंजक, औषधियों तथा सुगन्धियों के निर्माण में किया जाता है।
5. इसका प्रयोग टेरीलीन तथा पॉलीथीन के निर्माण में भी होता है।
6. इसका प्रयोग ऐल्कोहॉलीय पेय पदार्थ बनाने में किया जाता है।
**फीनॉल के प्रमुख उपयोग निम्नवत् हैं -**
1. इसका प्रयोग पिक्रिक अम्ल (विस्फोटक) के निर्माण में तथा रेशम व ऊन के रंजन में किया जाता है।
2. इसका प्रयोग साइक्लोहेक्सेनॉल विलायक के निर्माण में किया जाता है।
3. इसका प्रयोग साबुन, लोशन तथा आयण्टमेण्ट में ऐण्टिसेप्टिक के रूप में किया जाता है।
4. इसका प्रयोग ऐजो रंजक, फीनॉल्फ्थेलीन आदि के निर्माण में किया जाता है।
5. इसका प्रयोग बैकेलाइट प्लास्टिक के निर्माण में किया जाता है।
6. इसका प्रयोग ऐस्प्रिन, सेलॉल आदि औषधियों के निर्माण में किया जाता है।
**ईथरों के प्रमुख उपयोग निम्नवत् हैं -**
1. इनका सर्वाधिक प्रयोग प्रयोगशाला एवं उद्योगों में तेल, रेजिन, गोद आदि के विलायकों के रूप में किया जाता है।
2. ईथर ग्रिगनार्ड अभिकर्मकों के बनाने तथा वुज अभिक्रिया में अभिकर्मक के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
3. ईथर का प्रयोग 'सामान्य बेहोशीकारक (anaesthetic) के रूप में किया जाता है।
4. ऐल्कोहॉल तथा ईथर के मिश्रण का प्रयोग पेट्रोल के विकल्प के रूप में किया जाता है।
5. ईथर का प्रयोग प्रशीतक के रूप में किया जाता है क्योंकि यह वाष्पन पर ठण्डक उत्पन्न करता है। ईथर तथा शुष्क बर्फ (ठोस CO2) -110°C ताप उत्पन्न करता है।
6. ईथर का प्रयोग धुआँरहित (smokeless) पाउडर बनाने में करते हैं। इनका प्रयोग सुगन्धी उद्योग में भी किया जाता है।
In simple words: ऐल्कोहॉल ईंधन, विलायक और दवाइयों में उपयोग होते हैं; फीनॉल विस्फोटक, एंटीसेप्टिक और प्लास्टिक बनाने में; और ईथर विलायक, निश्चेतक और प्रशीतक के रूप में इस्तेमाल होते हैं।
🎯 Exam Tip: विभिन्न कार्बनिक यौगिकों के अनुप्रयोगों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये सीधे प्रश्न अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। प्रत्येक वर्ग के कम से कम दो से तीन प्रमुख उपयोगों को याद रखें।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
**Question 1. निम्नलिखित को समझाइए -**
1. ऐल्कोहॉलों का अणुभार बढ़ने पर जल में इनकी विलेयता घटती है।
2. पावर ऐल्कोहॉल क्या है? उसका उपयोग क्या है?
3. फीनॉल अम्लीय होते हैं। क्यों?
Answer:
**1. ऐल्कोहॉलों का अणुभार बढ़ने पर जल में इनकी विलेयता घटती है।**
क्योंकि ऐल्किल समुह जलविरोधी होते हैं तथा जल में अविलेय हैं। निम्न ऐल्कोहॉल में ऐल्किल समूह छोटा होता है तथा ऐल्कोहॉल का -OH समूह अणु को जल में विलेय बनाने में प्रभावी रहता है। जैसे-जैसे ऐल्किल समूह का आकार बढ़ता है उच्च अणुभार के ऐल्कोहॉलों में ऐल्किल समूह की जल विरोधी प्रकृति -OH समूह की जल स्नेही प्रकृति पर प्रभावी होती जाती है इसलिए विलेयता घटती है।
**2. पावर ऐल्कोहॉल क्या है? उसका उपयोग क्या है?**
परिशोधित स्पिरिट बेंजीन की उपस्थिति में पेट्रोल में मिश्रित हो जाती है। पेट्रोल + औद्योगिक ऐल्कोहॉल और बेंजीन का मिश्रण मोटर ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। यह मिश्रण पावर ऐल्कोहॉल कहलाता है।
**3. फीनॉल अम्लीय होते हैं। क्यों?**
फीनॉल को जल में घोलने पर यह H⁺ आयन तथा फीनॉक्साइड आयन देता है जो अनुनाद के कारण स्थायी होता है इसलिए फीनॉल अम्लीय गुण प्रदर्शित करता है।
\[\text{OH} + \text{H}_2\text{O} \rightleftharpoons \text{O}^- + \text{H}^+\]
फीनॉक्साइड आयन
In simple words: 1. ऐल्कोहॉलों की जल में विलेयता उनके हाइड्रोफोबिक ऐल्किल समूह के आकार पर निर्भर करती है; बड़ा समूह होने पर विलेयता घटती है। 2. पावर ऐल्कोहॉल पेट्रोल, औद्योगिक ऐल्कोहॉल और बेंजीन का मिश्रण है, जिसका उपयोग मोटर ईंधन के रूप में होता है। 3. फीनॉल अम्लीय होते हैं क्योंकि वे जल में \(\text{H}^+\) आयन देते हैं, और बनने वाला फीनॉक्साइड आयन अनुनाद द्वारा स्थायी होता है।
🎯 Exam Tip: विलेयता, औद्योगिक अनुप्रयोगों और अम्लीयता को समझने के लिए संबंधित संरचनात्मक कारकों और रासायनिक सिद्धांतों पर ध्यान दें। अनुनाद फीनॉल की अम्लीयता का एक महत्वपूर्ण कारण है।
**Question 2. स्टार्च से एथिल ऐल्कोहॉल उत्पादन की औद्योगिक विधि का वर्णन कीजिए। सम्बन्धित रासायनिक अभिक्रियाओं के समीकरण लिखिए । परिशुद्ध ऐल्कोहॉल उत्पादन कैसे किया जाता है?**
Answer: स्टार्च से एथिल ऐल्कोहॉल के निर्माण में आलू, चावल, जौ आदि स्टार्चयुक्त पदार्थ कच्चे पदार्थ के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
**1. स्टार्च से वाश बनाना –** अंकुरित जौ को उबालकर, पीसकर छानने से प्राप्त निष्कर्ष को माल्ट-निष्कर्ष (malt-extract) कहते हैं। इसमें डायस्टेस एन्जाइम होता है। स्टार्चयुक्त पदार्थों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर वे कुचलकर उच्च दाब तथा 150°C ताप पर भाप में गर्म करते हैं, जिससे एक पेस्ट बन जाता है। इस पदार्थ को मैश (mash) कहते हैं। इसमें स्टार्च होता है। मैश में माल्ट-निष्कर्ष मिलाकर उसे 50-60°C पर गर्म करते हैं। माल्ट-निष्कर्ष में उपस्थित डायस्टेस एन्जाइम स्टार्च को माल्टोस नामक शर्करा में जल-अपघटित कर देता है।
\(2(\text{C}_6\text{H}_{10}\text{O}_5)_n + n\text{H}_2\text{O} \xrightarrow{\text{डायस्टेस एन्जाइम} \\ 50^\circ-60^\circ\text{C}} n\text{C}_{12}\text{H}_{22}\text{O}_{11}\)
स्टार्च माल्टोस
माल्टोस के तनु विलयन में यीस्ट मिलाने पर, यीस्ट में उपस्थित माल्टेस एन्जाइम, माल्टोस को ग्लूकोस में जल अपघटित कर देता है, जिसे यीस्ट में उपस्थित जाइमेस एन्जाइम, एथिल ऐल्कोहॉल में अपघटित कर देता है, इससे प्राप्त विलयन को वाश कहते हैं, जिसमें लगभग 10% एथिल ऐल्कोहॉल होता है।
\(\text{C}_{12}\text{H}_{22}\text{O}_{11} + \text{H}_2\text{O} \xrightarrow{\text{माल्टेस}} 2\text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6\)
माल्टोस ग्लूकोस
\(\text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6 \xrightarrow{\text{जाइमेस}} 2\text{C}_2\text{H}_5\text{OH} + 2\text{CO}_2\uparrow\)
ग्लूकोस एथिल ऐल्कोहॉल
**2. वाश से शुद्ध एथिल ऐल्कोहॉल प्राप्त करना –** वाश के प्रभाजी आसवन से एथिल ऐल्कोहॉल कॉफे भभके (Coffey's still) द्वारा प्राप्त किया जाता है। इस भभके में दो प्रभाजक स्तम्भ होते हैं, इनमें एक विश्लेषक (analyser) और दूसरा परिशोधक (rectifier) कहलाता है। विश्लेषक तथा परिशोधक एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। विश्लेषक ताँबे की प्लेटों द्वारा कई खानों में विभक्त रहता है। जिनके तल समान्तर रहते हैं। इन प्लेटों में छिद्र होते हैं, जिनमें ऊपर की ओर खुलने वाले वाल्व लगे। होते हैं। प्रत्येक से एक नली निकलकर अपने से नीचे वाले प्याले में डूबी रहती है। परिशोधक (rectifier) का निचला आधा अंश भी विश्लेषक (analyser) की भाँति इसी प्रकार खानों में विभक्त होता है।
वाश को शोधन में ले जाने वाली सर्पाकार नली में पम्प द्वारा विश्लेषक के ऊपर पहुँचाकर नीचे छोड़ा जाता है। विश्लेषक में नीचे से ऊपर की ओर भाप प्रवाहित की जाती है, जो नीचे आने वाले द्रव के वाष्पशील द्रव को वाष्पों में बदलकर ऊपर ले जाती है। यह वाष्प विश्लेषक से लगी नली द्वारा परिशोधक के नीचे पहुँचती है और फिर परिशोधक में ऊपर उठती है। परिशोधक के ऊपर एक नली लगी होती है जो एक संघनित्र से जुड़ी होती है। ऊपर आने वाली वाष्प इस नली से होती हुई परिशोधक के ऊपर पहुँचती है और ठण्डी होकर द्रवित हो जाती है। जिसमें 95.6% एथिल ऐल्कोहॉल होता है। इसको परिशोधित स्पिरिट (rectified spirit) कहते हैं। विश्लेषक (analyser) के पेंदे में बचा हुआ पदार्थ स्पेन्ट वाश (spent wash) कहलाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख एक कॉफे स्टिल (प्रभाजी आसवन उपकरण) को दर्शाता है, जिसका उपयोग एथिल ऐल्कोहॉल के औद्योगिक उत्पादन में किया जाता है। इसमें एक विश्लेषक (एनालाइजर) और एक परिशोधक (रेक्टिफायर) कॉलम होता है। वाश (पानी और ऐल्कोहॉल का मिश्रण) विश्लेषक में प्रवेश करता है जहाँ इसे भाप से गर्म किया जाता है, जिससे ऐल्कोहॉल वाष्प बनती है। ये वाष्प परिशोधक में ऊपर उठती हैं और संघनित होकर उच्च सांद्रता वाले एथिल ऐल्कोहॉल (95.6%) को अलग करती हैं, जबकि स्पेन्ट वाश (अवशिष्ट द्रव) नीचे से निकल जाता है।
**3. परिशोधित स्पिरिट का शोधन –** कॉफे भभके से प्राप्त परिशोधित स्पिरिट में जल के अतिरिक्त, ग्लिसरीन, सक्सिनिक अम्ल, ऐसीटेल्डिहाइड और फ्यूजेल तेल आदि अशुद्धियाँ मिली होती हैं। इन अशुद्धियों को दूर करने के लिए पहले परिशोधित स्पिरिट को कोयले के छन्ने में छान लेते हैं और फिर इसका प्रभाजी आसवन करते हैं। प्रभाजी आसवन से मुख्य तीन अंश मिलते हैं –
1. प्रथम अंश-इसमें ऐसीटेल्डिहाइड होता है।
2. द्वितीय अंश-इसमें 95.6% शुद्ध एथिल ऐल्कोहॉल तथा 4.4% जल होता है।
3. अन्तिम अंश-इसमें फ्यूजेल तेल होता है। यह बहुत विषैला पदार्थ होता है, जिसके मिलाने पर एथिल ऐल्कोहॉल दवाइयाँ बनाने के लिए अयोग्य हो जाता है।
**4. व्यापारिक मात्रा में परिशुद्ध ऐल्कोहॉल बनाना –** परिशोधित स्पिरिट और बेंजीन के मिश्रण का प्रभाजी आसवन करने से 64.8°C पर जल, ऐल्कोहॉल तथा बेंजीन को स्थिर क्वथनी मिश्रण (constant boiling mixture) प्राप्त होता है। फिर 68.30°C पर बेंजीन तथा ऐल्कोहॉल का स्थिर क्वथनी मिश्रण अलग हो जाता है। इस मिश्रण को पुनः आसवित करने पर 78.3°C पर परिशुद्ध ऐल्कोहॉल पृथक् हो जाता है।
In simple words: स्टार्च से एथिल ऐल्कोहॉल का उत्पादन किण्वन प्रक्रिया द्वारा होता है, जिसमें एंजाइम स्टार्च को माल्टोस, फिर ग्लूकोस में तोड़ते हैं, और अंत में ग्लूकोस जाइमेस द्वारा एथिल ऐल्कोहॉल में परिवर्तित होता है। शुद्ध ऐल्कोहॉल प्राप्त करने के लिए प्रभाजी आसवन (कॉफे स्टिल) का उपयोग किया जाता है, जिसके बाद अशुद्धियों को दूर करने के लिए अतिरिक्त शोधन किया जाता है।
🎯 Exam Tip: एथिल ऐल्कोहॉल के औद्योगिक उत्पादन के चरणों और संबंधित एंजाइमों और उनके कार्यों को क्रम से याद रखें। कॉफे स्टिल का आरेखण और उसके कार्य का वर्णन भी महत्वपूर्ण है।
**Question 3. मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल बनाने की दो सामान्य विधियाँ लिखिए और एथिल ऐल्कोहॉल की सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ भिन्न तापों पर अभिक्रिया लिखिए। उपर्युक्त अभिक्रियाओं से सम्बन्धित सभी समीकरण भी दीजिए।**
Answer: मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल बनाने की सामान्य विधियाँ निम्नलिखित हैं –
**1. ऐल्किल हैलाइडों के जल-अपघटन द्वारा –** ऐल्किल हैलाइड (RX) को जलीय सोडियम हाइड्रॉक्साइड या नम (moist) सिल्वर ऑक्साइड के साथ गर्म करने पर ऐल्कोहॉल बनता है।
\(\text{RX} + \text{NaOH} \xrightarrow{\text{गर्म}} \text{ROH} + \text{NaX.}\)
ऐल्किल हैलाइड जलीय ऐल्कोहॉल
\(\text{RX} + \text{AgOH} \xrightarrow{\text{गर्म}} \text{ROH} + \text{AgX}\)
ऐल्किल हैलाइड नम सिल्वर ऐल्कोहॉल
ऑक्साइड
**उदाहरणार्थ-**
\(\text{CH}_3\text{CH}_2\text{Br} + \text{NaOH} \xrightarrow{\text{गर्म}} \text{CH}_3\text{CH}_2\text{OH} + \text{NaBr}\)
एथिल ब्रोमाइड जलीय एथिल ऐल्कोहॉल
\(\text{CH}_3\text{CH}_2\text{Br} + \text{AgOH} \xrightarrow{\text{गर्म}} \text{CH}_3\text{CH}_2\text{OH} + \text{AgBr}\)
एथिल ब्रोमाइड नम सिल्वर एथिल ऐल्कोहॉल
ऑक्साइड
**2. एस्टरों के जल-अपघटन द्वारा –** एस्टर का सोडियम हाइड्रॉक्साइड या पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलयन द्वारा जल-अपघटन करने पर कार्बोक्सिलिक अम्ल का लवण और ऐल्कोहॉल बनते हैं।
\(\text{RCOOR}' + \text{NaOH} \longrightarrow \text{RCOONa} + \text{R}'\text{OH}\)
एस्टर अम्ल का सोडियम ऐल्कोहॉल
लवण
**उदाहरणार्थ -**
\(\text{CH}_3\text{COOC}_2\text{H}_5 + \text{NaOH} \longrightarrow \text{CH}_3\text{COONa} + \text{C}_2\text{H}_5\text{OH}\)
एथिल ऐसीटेट सोडियम ऐसीटेट एथिल ऐल्कोहॉल
**3. प्राथमिक ऐमीनों की नाइट्रस अम्ल से क्रिया द्वारा –** ऐलिफैटिक प्राथमिक ऐमीन की नाइट्रस अम्ल (NaNO2 + HCl) से क्रिया कराने पर ऐल्कोहॉल बनता है और नाइट्रोजन गैस निकलती है।
\(\text{NaNO}_2 + \text{HCl} \longrightarrow \text{NaCl} + \text{HNO}_2\)
**उदाहरणार्थ –** एथिलऐमीन की नाइट्रस अम्ल (NaNO2 + HCl) से क्रिया कराने पर एथिल ऐल्कोहॉल बनता है और नाइट्रोजन गैस निकलती है।
\({\text{C}}_2\text{H}_5\text{NH}_2 + \text{HNO}_2 \xrightarrow{(\text{NaNO}_2 + \text{HCl})} {\text{C}}_2\text{H}_5\text{OH} + \text{N}_2 + \text{H}_2\text{O}\)
एथिलऐमीन नाइट्रस अम्ल एथिल ऐल्कोहॉल
**4. ऐल्कीनों के जलयोजन द्वारा –** सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल में ऐल्कीन को अवशोषित करने पर ऐल्किल हाइड्रोजन सल्फेट बनता है, जिसका जल-अपघटन करने पर ऐल्कोहॉल प्राप्त होता है।
\(\text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{H}_2\text{SO}_4 \xrightarrow{75-80^\circ\text{C} \\ \text{उच्च दाब}} \text{CH}_3\text{CH}_2\text{OSO}_3\text{H}\)
एथिलीन सान्द्र एथिल हाइड्रोजन सल्फेट
\(\text{CH}_3\text{CH}_2\text{OSO}_3\text{H} + \text{H}_2\text{O} \xrightarrow{\Delta} \text{CH}_3\text{CH}_2\text{OH} + \text{H}_2\text{SO}_4\)
एथिल हाइड्रोजन सल्फेट एथिल ऐल्कोहॉल
**एथिल ऐल्कोहॉल की सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल से अभिक्रिया –** एथिल ऐल्कोहॉल पर सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की क्रिया से भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न पदार्थ बनते हैं।
**(i) एथिल ऐल्कोहॉल और सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के मिश्रण को 100°C पर गर्म करने पर एथिल हाइड्रोजन सल्फेट बनता है।**
\(\text{C}_2\text{H}_5\text{OH} + \text{H}_2\text{SO}_4 \xrightarrow{100^\circ\text{C}} \text{C}_2\text{H}_5\text{OSO}_3\text{H} + \text{H}_2\text{O}\)
एथिल ऐल्कोहॉल सान्द्र एथिल हाइड्रोजन सल्फेट
एथिल हाइड्रोजन सल्फेट का समानीत दाब (reduced pressure) पर आसवन करने पर एथिल सल्फेट बनता है।
**(ii) एथिल ऐल्कोहॉल के आधिक्य को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ 140°C पर गर्म करने पर डाइ एथिल ईथर बनता है। अभिक्रिया अग्रलिखित पदों में होती है –**
\(\text{C}_2\text{H}_5\text{OH} + \text{H}_2\text{SO}_4 \xrightarrow{100^\circ\text{C}} \text{C}_2\text{H}_5\text{HSO}_4 + \text{H}_2\text{O}\)
एथिल ऐल्कोहॉल सान्द्र एथिल हाइड्रोजन सल्फेट
\(\text{C}_2\text{H}_5\text{HSO}_4 + \text{HO}\text{C}_2\text{H}_5 \xrightarrow{140^\circ\text{C}} \text{C}_2\text{H}_5\text{-O-C}_2\text{H}_5 + \text{H}_2\text{SO}_4\)
एथिल हाइड्रोजन सल्फेट (आधिक्य में) एथिल ऐल्कोहॉल डाइ एथिल ईथर
**(iii) एथिल ऐल्कोहॉल को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के आधिक्य में 170-180°C पर गर्म करने पर एथिलीन बनती है।**
\(\text{C}_2\text{H}_5\text{OH} + \text{H}_2\text{SO}_4 \xrightarrow{100^\circ\text{C}} \text{C}_2\text{H}_5\text{HSO}_4 + \text{H}_2\text{O}\)
एथिल ऐल्कोहॉल सल्फ्यूरिक अम्ल एथिल हाइड्रोजन सल्फेट
\(\text{C}_2\text{H}_5\text{HSO}_4 \xrightarrow{170-180^\circ\text{C}} \text{CH}_2=\text{CH}_2 + \text{H}_2\text{SO}_4\)
एथिल हाइड्रोजन सल्फेट एथिलीन
In simple words: मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल को ऐल्किल हैलाइडों के जल-अपघटन, एस्टरों के जल-अपघटन, प्राथमिक ऐमीनों की नाइट्रस अम्ल के साथ अभिक्रिया या ऐल्कीनों के जलयोजन से बनाया जा सकता है। एथिल ऐल्कोहॉल सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ विभिन्न तापों पर विभिन्न उत्पाद देता है: 100°C पर एथिल हाइड्रोजन सल्फेट, 140°C पर डाइएथिल ईथर (आधिक्य ऐल्कोहॉल के साथ) और 170-180°C पर एथिलीन।
🎯 Exam Tip: विभिन्न संश्लेषण विधियों और एथिल ऐल्कोहॉल की सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ तापमान-निर्भर अभिक्रियाओं को याद रखना महत्वपूर्ण है। उत्पाद का निर्धारण तापमान और अभिकारकों की सांद्रता पर निर्भर करता है।
**Question 4. प्रयोगशाला में डाइ एथिल ईथर बनाने की विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। सम्बन्धित रासायनिक अभिक्रिया लिखिए। इस विधि को अविरत ईथरीकरण विधि क्यों कहते हैं? इसके मुख्य रासायनिक गुण भी दीजिए।**
**या**
**डाइ एथिल ईथर बनाने की प्रयोगशाला विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। सम्बन्धित अभिक्रियाओं के रासायनिक समीकरण भी दीजिए। इसकी अंधेरे में क्लोरीन के साथ अभिक्रिया का समीकरण दीजिए।**
**या**
**ईथर की शुद्धता का परीक्षण कैसे करेंगे?**
Answer: प्रयोगशाला में डाइ एथिल ईथर, एथिल ऐल्कोहॉल के आधिक्य और सान्द्र H2SO4 को 140°C पर गर्म करके बनाया जाता है।
\(\text{C}_2\text{H}_5\text{OH} + \text{H HSO}_4 \xrightarrow{100-110^\circ\text{C}} \text{C}_2\text{H}_5\text{HSO}_4 + \text{H}_2\text{O}\)
एथिल हाइड्रोजन सल्फेट
\(\text{C}_2\text{H}_5\text{HSO}_4 + \text{H OC}_2\text{H}_5 \xrightarrow{140^\circ\text{C}} \text{C}_2\text{H}_5\text{OC}_2\text{H}_5 + \text{H}_2\text{SO}_4\)
एथिल ऐल्कोहॉल डाइ एथिल ईथर
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह एक प्रयोगशाला सेटअप का आरेख है जिसका उपयोग डाइएथिल ईथर बनाने के लिए किया जाता है। इसमें एक आसवन फ्लास्क होता है जिसे बालू ऊष्मक पर गर्म किया जाता है, जिसमें एथिल ऐल्कोहॉल और सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल का मिश्रण होता है। फ्लास्क से निकलने वाली वाष्प एक संघनित्र से गुजरती है जहाँ वे ठंडे होकर एक ग्राही पात्र में एकत्र होती हैं, जिसे बर्फ के जल में रखा जाता है। इस तरह से डाइएथिल ईथर एकत्र होता है, जबकि एक थर्मामीटर तापमान को नियंत्रित करने में मदद करता है।
एक गोल पेंदी के फ्लास्क में \(\text{C}_2\text{H}_5\text{OH}\) और सान्द्र \(\text{H}_2\text{SO}_4\), 2 : 1 के अनुपात में लेकर उपकरण को चित्रानुसार लगाया जाता है। फ्लास्क को बालू ऊष्मक पर 140-145°C तक गर्म करते हैं जिससे ईथर बर्फ के जल में रखे ग्राही पात्र में एकत्र होने लगता है। इस विधि को अविरत ईथरीकरण विधि कहते हैं, क्योंकि एथिल ऐल्कोहॉल और सल्फ्यूरिक अम्ल के गर्म मिश्रण में एथिल ऐल्कोहॉल डालकर ईथर लगातार प्राप्त किया जा सकता है।
इस प्रकार प्राप्त आसवित ईथर में अल्प मात्रा में \(\text{H}_2\text{SO}_4\), ऐल्कोहॉल और जल की अशुद्धियाँ मिली रहती हैं। इसके लिए ईथर को कास्टिक सोडा विलयन के साथ धोते हैं फिर इसमें निर्जल \(\text{CaCl}_2\) डालकर रख देते हैं। इसके बाद छानकर आसवित करने पर 34-35°C पर शुद्ध एवं शुष्क ईथर एकत्र कर लिया जाता है।
**1. PCl5 से क्रिया –** एथिल क्लोराइड बनता है।
\(\text{C}_2\text{H}_5\text{OC}_2\text{H}_5 + \text{PCl}_5 \longrightarrow 2\text{C}_2\text{H}_5\text{Cl} + \text{POCl}_3\)
**2. अंधेरे में ईथर क्लोरीन और ब्रोमीन के साथ हैलोजनीकृत व्युत्पन्न देता है।**
\(\text{CH}_3\text{CH}_2\text{O}\text{CH}_2\text{CH}_3 \xrightarrow{\text{Cl}_2 \\ -\text{HCl}} \text{CH}_3\text{CH(Cl)}\text{O}\text{CH}_2\text{CH}_3\)
\(\alpha\)-मोनोक्लोरो डाइ एथिल ईथर
\(\text{CH}_3\text{CH(Cl)}\text{O}\text{CH}_2\text{CH}_3 \xrightarrow{\text{Cl}_2 \\ -\text{HCl}} \text{CH}_3\text{CH(Cl)}\text{O}\text{CH(Cl)}\text{CH}_3\)
\(\alpha, \alpha'\)-डाइक्लोरो एथिल ईथर
**3. H2O के साथ अभिक्रिया –** ईथर साधारण परिस्थितियों में अम्लों या क्षारों द्वारा जल अपघटित नहीं होते हैं। तनु सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ उच्च दाब और उच्च ताप पर गर्म करने पर डाइएथिल ईथर बहुत कठिनाई से एथिल ऐल्कोहॉल में जल अपघटित होता है।
\((\text{C}_2\text{H}_5)_2\text{O} + \text{H}_2\text{O} \xrightarrow{\text{H}_2\text{SO}_4 \text{ (तनु)} \\ \text{उच्चदाब} \\ \text{उच्च ताप}} 2\text{C}_2\text{H}_5\text{OH}\)
डाइ एथिल ईथर एथिल ऐल्कोहॉल
**4. ठण्डे HI के साथ अभिक्रिया –** डाइ एथिल ईथर की ठण्डे सान्द्र हाइड्रोआयोडिक अम्ल (HI) से क्रिया कराने पर एक अणु एथिल आयोडाइड और एक अणु एथिल ऐल्कोहॉल बनता है।
**ईथर की शुद्धता का परीक्षण –** ईथर की शुद्धता का परीक्षण पोटेशियम आयोडाइड विलयन द्वारा करते हैं। यदि ईथर में पोटैशियम आयोडाइड डालने पर आयोडीन मुक्त होती है तो ईथर अशुद्ध है। शुद्ध ईथर में आयोडीन मुक्त नहीं होती है।
In simple words: प्रयोगशाला में डाइएथिल ईथर एथिल ऐल्कोहॉल और सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल को 140-145°C पर गर्म करके अविरत ईथरीकरण विधि द्वारा बनाया जाता है। इसके रासायनिक गुणों में PCl5 के साथ एथिल क्लोराइड, क्लोरीन के साथ हैलोजनीकृत व्युत्पन्न, जल के साथ कठिनाई से अपघटन, और ठंडे HI के साथ ऐल्कोहॉल और आयोडाइड का निर्माण शामिल है। शुद्धता का परीक्षण पोटेशियम आयोडाइड विलयन से किया जाता है।
🎯 Exam Tip: प्रयोगशाला विधि का आरेख, अविरत ईथरीकरण सिद्धांत और ईथर के रासायनिक गुणों को याद रखना महत्वपूर्ण है। क्लोरीन के साथ अभिक्रिया में प्रकाश की भूमिका और HI के साथ अभिक्रिया की विशिष्टता पर ध्यान दें।
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