UP Board Solutions Class 11 Biology Chapter 7 Structural Organisation in Animals

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Detailed Chapter 7 पशुओं में संरचनात्मक संगठन UP Board Solutions for Class 11 Biology

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Class 11 Biology Chapter 7 पशुओं में संरचनात्मक संगठन UP Board Solutions PDF

UP Board Solutions For Class 11 Biology Chapter 7 Structural Organisation In Animals

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

Question 1. एक शब्द या एक पंक्ति में उत्तर दीजिए
1. पेरिप्लेनेटा अमेरिकाना का सामान्य नाम लिखिए।
2. केंचुए में कितनी शुक्राणुधानियाँ पाई जाती हैं?
3. तिलचट्टे में अण्डाशय की स्थिति क्या है?
4. तिलचट्टे के उदर में कितने खंड होते हैं?
5. मैल्पीघी नलिकाएँ कहाँ मिलती हैं?
Answer:
1. तिलचट्टा अथवा कॉकरोच।
2. केंचुए में चार जोड़ी शुक्राणुधानियाँ पायी जाती हैं।
3. अण्डाशय 4, 5, 6, 7 खंड में आहारनाल के पाश्र्व में स्थित होते हैं।
4. दस
5. मध्यांत्र व पश्चांत्र के संधि स्थल पर।
In simple words: This question asks for single-word or single-line answers about basic anatomical features of common animals like cockroaches and earthworms, covering their common names, reproductive structures, body segments, and excretory organs.

🎯 Exam Tip: Accurately identifying the specific anatomical details and their locations is crucial for scoring. Focus on precise terminology.

 

Question 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
(i) वृक्कक को क्या कार्य है?
(ii) अपनी स्थिति के अनुसार केंचुए में कितने प्रकार के वृक्कक पाए जाते हैं?
Answer:
(i) वृक्कक (Nephridia) का कार्य : संघ ऐनेलिडा के प्राणियों में उत्सर्जन हेतु विशेष प्रकार की कुण्डलित रचनाएँ वृक्कक पाई जाती हैं। ये जल सन्तुलन का कार्य भी करती हैं।
(ii) वृक्कक के प्रकार (Types of Nephridia) : स्थिति के अनुसार वृक्कक निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं
(a) पटीय वृक्कक (Septal nephridia)
(b) अध्यावरणी वृक्कक (integumentary nephridia)
(C) ग्रसनीय वृक्कक (pharyngeal nephridia)।
In simple words: Nephridia are coiled excretory structures found in annelids like earthworms, primarily responsible for excretion and water balance. Earthworms have three types of nephridia based on their location: septal, integumentary, and pharyngeal.

🎯 Exam Tip: When describing the function and types of an organ, ensure to mention its primary role and classification with correct terminology for full marks.

 

Question 3. केंचुए के जननांगों का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer:
केंचुएँ के जननांग

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र केंचुए के जननांगों का पृष्ठ दृश्य दर्शाता है, जिसमें शुक्राणुधानी, वृषण, शुक्रवाहिनी फ़नल, वृषण कोष, शुक्राशय, अंडाशय, अंडवाहिनी फ़नल, अंडवाहिनी, शुक्रवाहिनी, क्लाइटेलम, सामान्य प्रोस्टेट और शुक्राणु वाहिनी, प्रोस्टेट ग्रंथि और सहायक ग्रंथि जैसी विभिन्न प्रजनन संरचनाएं उनके संबंधित खंडों में नामांकित हैं। यह आरेख केंचुए की प्रजनन प्रणाली की विस्तृत समझ प्रदान करता है।
In simple words: The diagram illustrates the dorsal view of the earthworm's reproductive organs, showing various structures like spermathecae, testes, seminal vesicles, ovaries, oviducts, and associated glands in their respective segments.

🎯 Exam Tip: For diagrams, clear and accurate labeling of all parts is essential. Practice drawing and labeling key anatomical structures to score well.

 

Question 4. तिलचट्टे की आहारनाल का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer:
तिलचट्टे की आहारनाल

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र तिलचट्टे की आहारनाल को दर्शाता है, जिसमें सिर, मस्तिष्क, कॉर्पस एलाटम, लार ग्रंथि, ग्रासनली, आंतरी संकायक, क्रॉप, हेपेटिक सीकी, गिज़ार्ड, मेसेंटरॉन, इलियम, मैल्पीघी नलिकाएँ, कोलन, रेक्टम और 10वें टर्गम जैसे मुख्य भाग नामांकित हैं। यह आरेख तिलचट्टे की पाचन प्रणाली की विस्तृत संरचना को स्पष्ट करता है।
In simple words: The diagram displays the alimentary canal of a cockroach, detailing structures like the crop, gizzard, midgut (mesenteron), Malpighian tubules, ileum, colon, and rectum, illustrating the path of food digestion.

🎯 Exam Tip: Accurate identification and labeling of each part of the alimentary canal are critical. Pay attention to the sequence of organs for a comprehensive understanding.

 

Question 5. निम्नलिखित में विभेद कीजिए
(अ) पुरोमुख एवं परितुंड ।
(ब) पटीय (Septal) वृक्कक एवं ग्रसनीय वृक्कक ।
Answer:
(अ)

पुरोमुख एवं परितुंड में अन्तर

क्र० सं०पुरोमुख (Prostomium)परितुंड (Peristomium)
1.केंचुए के प्रथम खण्ड परितुंड से एक मांसल पिण्ड पुरोमुख के आगे लटका रहता है।केंचुए के अग्र छोर पर स्थित प्रथम खण्ड को परितुंड कहते हैं।
2.यह संवेदी अंग है। इसके द्वारा केंचुए को अन्धकार, प्रकाश का आभास होता है। यह मिट्टी में सुरंग बनाने में सहायता करता है।इसमें आगे की ओर अधर तल पर मुख स्थित होता है। यह भोजन ग्रहण करने एवं प्रचलन में सहायक होता है।

(ब)

पटीय एवं ग्रसनीय वृक्कक में अन्तर

क्र० सं०पटीय वृक्कक (Septal Nephridia)ग्रसनीय वृक्कक (Pharyngeal Nephridia)
1.ये केंचुए में 15/16वें खण्ड की अन्तराखण्डीय पट से अन्तिम खण्ड तक पाए जाते हैं।ये शरीर के 4वें, 5वें तथा 6वें खण्डों में ग्रसनी तथा ग्रासनाल के पार्श्वों में समूह में स्थित होते हैं।
2.वृक्कक के चार भाग होते हैं-वृक्कक मुखिका (nephrostome), ग्रीवा, वृक्कक काय तथा अन्तस्थ नलिका (terminal ducts)वृक्कक में वृक्ककमुखिका एवं ग्रीवा नहीं होती। केवल वृक्कक काय तथा अन्तस्थ नलिका पाई जाती है।
3.वृक्कक काय के दो भाग होते हैं-सीधी पालि तथा कुण्डलित लूप। कुण्डलित लूप की लम्बाई सीधी पालि से लगभग दुगनी होती है।वृक्कक काय की सीधी पालि तथा कुण्डलित लूप की लम्बाई बराबर होती है।
4.अन्तस्थ नलिका आंत्र में खुलती है।अन्तस्थ नलिका ग्रसनी एवं ग्रासनाल में खुलती है।

In simple words: This question differentiates between the prostomium and peristomium of an earthworm, highlighting their sensory and feeding roles, respectively. It also distinguishes between septal and pharyngeal nephridia based on their location, structure (presence/absence of nephrostome), and where their terminal ducts open within the earthworm's body.

🎯 Exam Tip: When differentiating, create clear, concise points for each contrasting feature. This organized approach helps in presenting information effectively and ensures all critical differences are highlighted.

 

Question 6. रुधिर के कणीय अवयव क्या हैं?
Answer:
रुधिर के कणीय अवयव रुधिर हल्के पीले रंग का, गाढ़ा, हल्का क्षारीय (pH7-3-7-4) द्रव होता है। स्वस्थ मनुष्य में रुधिर उसके कुल भार का 7% से 8% होता है। इसके दो मुख्य घटक होते हैं
1. निर्जीव तरल मैट्रिक्स प्लाज्मा (plasma) तथा
2. कणीय अवयव रुधिर कणिकाएँ (blood corpuscles)।
रुधिर कणिकाएँ रुधिर का लगभग 45% भाग बनाती हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं
(क) लाल रुधिर कणिकाएँ
(ख) श्वेत रुधिर कणिकाएँ तथा
(ग) रुधिर प्लेटलेट्स।

लाल रुधिर कणिकाएँ
लाल रुधिर कणिकाएँ कशेरुकी जन्तुओं (vertebrates) में ही पाई जाती हैं। मानव में लाल रुधिराणु 75-8µ व्यास तथा 1-2µ मोटाई के होते हैं। पुरुषों में इनकी संख्या लगभग 50 से 55 लाख किन्तु स्त्रियों में लगभग 45 से 50 लाख प्रति घन मिमी होती है। ये गोलाकार एवं उभयावतल (biconcave) होती हैं। निर्माण के समय इनमें केन्द्रक (nucleus) सहित सभी प्रकार के कोशिकांग (cell organelle) होते हैं किन्तु बाद में केन्द्रक, गॉल्जीकाय, माइटोकॉन्ड्रिया, सेन्ट्रियोल आदि संरचनाएँ लुप्त हो जाती हैं, इसीलिए स्तनियों के लाल रुधिराणुओं को केन्द्रकविहीन (non-nucleated) कहा जाता है। ऊँट तथा लामा में लाल रुधिराणु केन्द्रकयुक्त (nucleated) होते हैं। लाल रुधिराणुओं में हीमोग्लोबिन (haemoglobin) प्रोटीन होती है। स्तनियों में इनका जीवनकाल लगभग 120 दिन होता है। वयस्क अवस्था में इनका निर्माण लाल अस्थिमज्जा में होता है। हीमोग्लोबिन, हीम (haem) नामक वर्णक तथा ग्लोबिन (globin) नामक प्रोटीन से बना होता है। हीम पादपों में उपस्थित क्लोरोफिल के समान होता है, जिसमें क्लोरोफिल के मैग्नीशियम के स्थान पर हीमोग्लोबिन में लौह (Fe) होता है।
हीमोग्लोबिन के एक अणु का निर्माण हीम के 4 अणुओं के एक ग्लोबिन अणु के साथ संयुक्त होने से होता है। हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन परिवहन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

लाल रुधिराणुओं के कार्य। लाल रुधिराणुओं के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं
1. यह एक श्वसन वर्णक है। यह ऑक्सीजन वाहक (oxygen carrier) के रूप में कार्य करता है। हीमोग्लोबिन का एक अणु ऑक्सीजन के चार अणुओं का संवहन करता है।
2. शरीर के अन्तःवातावरण में pH सन्तुलन को बनाए रखने में हीमोग्लोबिन सहायता करता है।
3. कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन (transport) कार्बोनिक एनहाइड्रेज (carbonic anhydrase) नामक एन्जाइम की उपस्थिति में ऊतकों से फेफड़ों की ओर करता है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र स्तनधारियों (जैसे खरगोश) के रुधिर कणिकाओं को दर्शाता है, जिसमें न्यूट्रोफिल, इओसिनोफिल, बेसोफिल (ग्रैन्यूलोसाइट्स के अंतर्गत), लिम्फोसाइट, मोनोसाइट (एग्रैन्यूलोसाइट्स के अंतर्गत) और एरिथ्रोसाइट (लाल रक्त कोशिकाएँ) शामिल हैं। प्रत्येक कोशिका का केंद्रक भी स्पष्ट रूप से दिखाया गया है, जो उनकी रूपात्मक विशेषताओं को उजागर करता है।
श्वेत रुधिर कणिकाएँ।
श्वेत रुधिर कणिकाएँ अनियमित आकार की, केन्द्रकयुक्त, रंगहीन तथा अमीबीय (amoeboid) कोशिकाएँ हैं। इनके कोशिकाद्रव्य की संरचना के आधार पर इन्हें दो समूहों में वर्गीकृत किया जाता है
(अ) ग्रैन्यूलोसाइट्स (granulocytes) तथा
(ब) एग्रैन्यूलोसाइट्स (agranulocytes)।

(अ) ग्रेन्यूलोसाइट्स (Granulocytes) :
इनका कोशिकाद्रव्य कणिकामय तथा केन्द्रक पालियुक्त (lobed) होता है, ये तीन प्रकार की होती हैं
(i) बेसोफिल्स
(ii) इओसिनोफिल्स तथा
(iii) न्यूट्रोफिल्स ।

(i) बेसोफिल्स (Basophils) : ये संख्या में कम होती हैं। ये कुल श्वेत रुधिर कणिकाओं का लगभग 0-5 से 2% होती हैं। इनका केन्द्रक बड़ा तथा 2-3 पालियों में बँटा दिखाई देता है। इनका कोशिकाद्रव्य मेथिलीन ब्लू (methylene blue) जैसे - क्षारीय रजंकों से अभिरंजित होता है। इन कणिकाओं से हिपैरिन, हिस्टैमीन एवं सेरेटोनिन स्रावित होता है।

(ii) इओसिनोफिल्स या एसिडोफिल्स (Eosinophils or Acidophils) : ये कुल श्वेत रुधिर कणिकाओं का 2-4% होते हैं। इनका केन्द्रक द्विपालिक (bilobed) होता है। दोनों पालियाँ परस्पर महीन तन्तु द्वारा जुडी रहती हैं। इनका कोशिकाद्रव्य अम्लीय रंजकों जैसे इओसीन से अभिरंजित होता है। ये शरीर की प्रतिरक्षण, एलर्जी तथा हाइपरसेन्सिटिवटी का कार्य करते हैं। परजीवी कृमियों की उपस्थिति के कारण इनकी संख्या बढ़ जाती है, इस रोग को इओसिनोफिलिया कहते हैं।

(iii) न्यूटोफिल्स या हेटेरोफिल्स (Neutrophils or Heterophils) : ये कुल श्वेत रुधिर कणिकाओं का 60 - 70% होती हैं। इनका केन्द्रक बहुरूपी होता है। यह तीन से पाँच पिण्डों में बँटा होता है। ये सूत्र द्वारा परस्पर जुड़े रहते हैं। इनके कोशिकाद्रव्य को अम्लीय, क्षारीय व उदासीन तीनों प्रकार के रंजकों से अभिरंजित कर सकते हैं। ये जीवाणु तथा अन्य हानिकारक पदार्थों का भक्षण करके शरीर की सुरक्षा करते हैं। इस कारण इन्हें मैक्रोफेज (macrophage) कहते हैं।

(ब) एग्रैन्यूलोसाइट्स (Agranulocytes) :
इनका कोशिकाद्रव्य कणिकारहित होता है। इनका केन्द्रक अपेक्षाकृत बड़ा व घोड़े की नाल के आकार का (horse-shoe shaped) होता है। ये दो प्रकार की होती हैं
(i) लिम्फोसाइट्स (Lymphocytes) : ये छोटे आकार के श्वेत रुधिराणु हैं। इनका कार्य प्रतिरक्षी (antibodies) का निर्माण करके शरीर की सुरक्षा करना है।
(ii) मोनोसाइट्स (Monocytes) : ये बड़े आकार की कोशिकाएँ हैं, जो भक्षकाणु क्रिया (phagocytosis) द्वारा शरीर की सुरक्षा करती हैं।
In simple words: Blood's cellular components, or blood corpuscles, make up about 45% of its volume and include red blood cells (RBCs), white blood cells (WBCs), and platelets. RBCs, containing hemoglobin, are crucial for oxygen and carbon dioxide transport. WBCs are key immune cells, divided into granulocytes (neutrophils, eosinophils, basophils) and agranulocytes (lymphocytes, monocytes), each with specific defense functions.

🎯 Exam Tip: When detailing blood components, ensure to clearly state their types, relative percentages, structural features (e.g., nucleated/non-nucleated, shape), and primary physiological functions. Highlighting the role of hemoglobin in transport is particularly important.

 

Question 7. निम्नलिखित क्या हैं तथा प्राणियों के शरीर में कहाँ मिलते हैं?
(अ) उपास्थि अणु (कोन्ड्रोसाइट)
(ब) तन्त्रिकाक्ष (ऐक्सॉन)
(स) पक्ष्माभ उपकला।
Answer:
(अ)
उपास्थि अणु या कोन्ड्रोसाइट्स (Chondrocytes) : उपास्थि (cartilage) के मैट्रिक्स में स्थित कोशिकाएँ कोन्ड्रोसाइट्स कहलाती है। ये गर्तिकाओं या लैकुनी (lacunae) में स्थित होती हैं। प्रत्येक गर्तिका में एक-दो या चार कोन्ड्रोसाइट्स होते हैं। कोन्ड्रोसाइट्स की संख्या वृद्धि के साथ-साथ उपास्थि में वृद्धि होती है। कोन्ड्रोसाइट्स द्वारा ही उपास्थि का मैट्रिक्स स्रावित होता है। यह कॉन्ड्रिन प्रोटीन (chondrin protein) होता है। उपास्थियाँ प्रायः अस्थियों के सन्धि स्थल पर पाई जाती हैं।

(ब)
तन्त्रिकाक्ष य़ा ऐक्सॉन (Axon) : तन्त्रिका कोशिका (neuron) तन्त्रिकातन्त्र का निर्माण करती है। प्रत्येक तन्त्रिका कोशिका के तीन भाग होते हैं
1. साइटॉन (cyton)
2. डेन्ड्रॉन्स (dendrons) तथा
3. ऐक्सॉन (axon)।
साइटॉन से निकले प्रवर्षों में से एक प्रवर्ध अपेक्षाकृत लम्बा, मोटा एवं बेलनाकार होता है। इसे ऐक्सॉन (axon) कहते हैं। यह साइटॉन के फूले हुए भाग ऐक्सॉन हिलोक (axon hillock) से निकलता है। इसकी शाखाओं के अन्तिम छोर पर घुण्डी सदृश साइनेप्टिक घुण्डियाँ (synaptic buttons) होती हैं। ये अन्य तन्त्रिका कोशिका के डेन्ड्रॉन्स के साथ सन्धि बनाती हैं। ऐक्सॉन मेडयूलेटेड (medullated) या नॉन-मेडयूलेटेड (non-medullated) होते हैं। ऐक्सॉन श्वान कोशिकाओं (Schwann cells) से बने न्यूरीलेमा (neurilemma) से घिरा होता है। मेडयूलेटेड ऐक्सॉन में न्यूरीलेमा तथा ऐक्सॉन के मध्य वसीय पदार्थ माइलिन होता है।

(स)
पक्ष्माभ उपकला (Ciliated Epithelium) : इसकी कोशिकाएँ स्तम्भकार या घनाकार होती हैं। कोशिकाओं के बाहरी सिरों पर पक्ष्म या सीलिया होते हैं। प्रत्येक पक्ष्म के आधार पर एक आधारकण (basal granule) होता है। पक्ष्मों की गति द्वारा श्लेष्म व अन्य पदार्थ आगे की ओर धकेल दिए जाते हैं। यह श्वास नाल, ब्रौंकाई, अण्डवाहिनी, मूत्रवाहिनी आदि की भीतरी सतह पर पाई जाती हैं।
In simple words: Chondrocytes are cartilage cells found in lacunae, producing the chondrin matrix, commonly located at bone joints. Axons are long, cylindrical extensions of neurons, transmitting nerve impulses and forming synaptic connections, covered by neurilemma and sometimes myelin. Ciliated epithelium, characterized by columnar or cuboidal cells with cilia, lines respiratory and reproductive tracts, moving mucus and other substances.

🎯 Exam Tip: For each term, clearly define its structure, composition, and primary function. Also, state the typical locations where these structures are found in the animal body to demonstrate a complete understanding.

 

Question 8. रेखांकित चित्र की सहायता से विभिन्न उपकला ऊतकों का वर्णन कीजिए ।
Answer:
उपकला ऊतक (Epithelial Tissue) : संरचना तथा कार्यों के आधार पर उपकला ऊतक को दो समूहों में बाँटा जाता है-आवरण उपकला (covering epithelium) तथा ग्रन्थिल उपकला (glandular epithelium)।

(क)
आवरण उपकला यह अंगों तथा शरीर सतह को ढके रखता है। यह सरल तथा संयुक्त दो प्रकार की होती है
1. सरल उपकला या सामान्य एपिथीलियम (Simple Epithelium) यह उपकला उन स्थानों पर पाई जाती है, जो स्रावण, अवशोषण, उत्सर्जन आदि का कार्य करते हैं। यह निम्नलिखित पाँच प्रकार की होती हैं
(i) सरल शल्की उपकला (Simple Squamous Epithelium) : कोशिकाएँ चौड़ी, चपटी, बहुभुजीय तथा परस्पर सटी रहती है। शल्की उपकला वायु कूपिकाओं, रुधिर वाहिनियों के आन्तरिक स्तर, हृदय के भीतरी स्तर, देहगुहा के स्तरों आदि में पाई जाती हैं।
(ii) सरल स्तम्भी उपकला (Simple Columnar Epithelium) : इस उपकला की कोशिकाएँ लम्बी तथा परस्पर सटी होती हैं। आहारनाल की भित्ति का भीतरी स्तर इसी उपकला का बना होता है। ये पचे हुए खाद्य पदार्थों का अवशोषण भी करती हैं।
(iii) सरल घनाकार उपकला (Simple Cuboidal Epithelium) :
इस उपकला की कोशिकाएँ घनाकार होती हैं। यह ऊर्तक श्वसनिकाओं, मूत्रजनन नलिकाओं, जनन ग्रन्थियों आदि में पाया जाता है। जनन ग्रन्थियों (gonads) में यह ऊतक जनन उपकला (germinal epithelium) कहलाता है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र सरल उपकला ऊतकों के विभिन्न प्रकारों को दर्शाता है। (A) शल्की उपकला को चपटी, अनियमित कोशिकाओं के साथ, (B) स्तम्भी उपकला को लंबी, आयताकार कोशिकाओं के साथ, और (C) घनाकार उपकला को घन-आकार की कोशिकाओं के साथ चित्रित किया गया है। सभी में स्पष्ट केंद्रक दिखाई देते हैं, जो उनकी विशिष्ट संरचनात्मक विशेषताओं को उजागर करते हैं।
(iv) पक्ष्माभी उपकला (Ciliated Epithelium) :
इसकी कोशिकाएँ स्तम्भाकार अथवा घनाकार होती हैं। इन कोशिकाओं के बाहरी सिरों पर पक्ष्म या सीलिया होते हैं। प्रत्येक पक्ष्म के आधार पर आधार कण (basal granule) होता है। पक्ष्मों की गति द्वारा श्लेष्म तथा अन्य पदार्थ आगे की ओर धकेले जाते हैं। यह उपकला श्वासनाल, अण्डवाहिनी (oviduct), गर्भाशय आदि में पाई जाती है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र सरल पक्ष्माभी उपकला (A) और कूट स्तरित पक्ष्माभी उपकला (B) को दर्शाता है। (A) में, सरल स्तम्भी पक्ष्माभी उपकला कोशिकाओं पर म्यूकस और सीलिया के साथ आधार कण और केंद्रक के साथ दिखाई गई है। (B) में, कूट स्तरित पक्ष्माभी उपकला में गोब्लेट कोशिकाएँ, बेसल कोशिकाएँ, सीलिया, बेसल झिल्ली और संयोजी ऊतक दिखाया गया है, जो कोशिकाओं की भिन्न ऊँचाइयों के कारण बहुस्तरित जैसा दिखता है।
(v) कूटस्तरित उपकला (Pseudostratified Epithelium) : यह सरल स्तम्भाकार उपकला को रूपान्तरित स्वरूप है। इसमें कोशिकाओं के मध्य गोब्लेट या म्यूकस कोशिकाएँ स्थित होती हैं। ये ट्रेकिया, श्वसनियों (bronchi), ग्रसनी, नासिका गुहा, नर मूत्रवाहिनी (urethra) आदि में पाई जाती हैं।

2. संयुक्त या स्तरित एपिथीलियम या उपकला (Compound or Stratified Epithelium) इसमें उपकला अनेक स्तरों से बनी होती है। कोशिकाएँ विभिन्न आकार की होती हैं। कोशिकाएँ आधारकला (basement membrane) पर स्थित होती हैं। सबसे निचली पर्त की कोशिकाएँ निरन्तर विभाजित होती रहती हैं। बाहरी स्तर की कोशिकाएँ मृत होती हैं। कोशिकाओं की संरचना के आधार पर ये निम्नलिखित प्रकार की होती हैं
(i) स्तरित शल्की उपकला (Stratified Squamous Epithelium) : इसमें सबसे बाहरी स्तर की कोशिकाएँ चपटी वे शल्की होती हैं तथा सबसे भीतरी स्तर की कोशिकाएँ स्तम्भी या घनाकार होती हैं। आधारीय जनन स्तर की कोशिकाओं में निरन्तर विभाजन होने से त्वचा के क्षतिग्रस्त होने पर इसका पुनरुदभवन होता रहता है। स्तरित शल्की उपकला किरेटिनयुक्त या किरेटिनविहीन होती है। स्तरित शल्की उपकला त्वचा की अधिचर्म, मुखगुहा, ग्रसनी, ग्रसिका, योनि, मूत्रनलिका, नेत्र की कॉर्निया, नेत्र श्लेष्मा आदि में पाई जाती हैं।
(ii) अन्तवर्ती या स्थानान्तरित उपकला (Transitional Epithelium) : इसमें आधारकला तथा जनन स्तर नहीं होता है। इसकी कोशिकाएँ लचीले संयोजी ऊतक पर स्थित होती हैं। सजीव कोशिकाएँ परस्पर अंगुली सदृश प्रवर्धा (interdigitation) द्वारा जुड़ी रहती हैं। ये कोशिकाएँ फैलाव व प्रसार के लिए रूपान्तरित होती हैं। यह मूत्राशय, मूत्रवाहिनियों (ureters) की भित्ति का भीतरी स्तर बनाती हैं।
(iii) तन्त्रिका संवेदी उपकला (Neurosensory Epithelium) :
यह स्तम्भकार उपकला के रूपान्तरण से बनती है। कोशिकाओं के स्वतन्त्र सिरों पर संवेदी रोम होते हैं। कोशिका के आधार से तन्त्रिका तन्तु (nerve fibres) निकलते हैं। यह नेत्र के रेटिना (retina), घ्राण अंग की श्लेष्मिक कला, अन्तःकर्ण की उपकला आदि में पाई जाती है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र तीन प्रकार की उपकला ऊतकों को दर्शाता है: (A) स्तरित शल्की उपकला जिसमें कई परतें होती हैं, (B) अन्तवर्ती उपकला जिसमें बेसल परत में घनाकार कोशिकाएँ और मध्यवर्ती परत में गोल कोशिकाएँ होती हैं, तथा (C) तंत्रिका संवेदी उपकला जिसमें संवेदी बाल, स्तम्भी कोशिकाएँ और अंतर्निहित तंत्रिका फाइबर होते हैं। यह आरेख इन ऊतकों की संरचना और विभिन्न परतों को स्पष्ट करता है।
(ख)
ग्रन्थिल उपकला। ये घनाकार या स्तम्भाकार उपकला से विकसित होती हैं। ग्रन्थिल कोशिकाएँ एकाकी या सामूहिक होती हैं।
1. एककोशिकीय ग्रन्थियाँ (Unicellular Glands) : ये स्तम्भकार उपकला में एकल रूप में पाई जाती हैं। इन्हें श्लेष्म या गॉब्लेट कोशिकाएँ (goblet cells) कहते हैं।
2. बहुकोशिकीय ग्रन्थियाँ (Multicellular Glands) :
ये उपकला के अन्तर्वलन से बनती हैं। इसका निचला भाग स्रावी (glandular) तथा ऊपरी भाग नलिकारूपी होता है; जैसे-स्वेद ग्रन्थियाँ, जठर ग्रन्थियाँ आदि। रचना के आधार पर बहुकोशिकीय ग्रन्थियाँ नलिकाकार, कूपिकाकार होती हैं। ये सरल, संयुक्त अथवा मिश्रित प्रकार की होती हैं। स्वभाव के आधार पर ग्रन्थियाँ मोरोक्राइन (merocrine), एपोक्राइन (apocrine) या होलोक्राइन (holocrine) प्रकार की होती हैं।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र सरल बहुकोशिकीय ग्रंथियों के विभिन्न प्रकारों को दर्शाता है। इसमें सरल ट्यूबलर ग्रंथि, सरल कुंडलित ट्यूबलर ग्रंथि, सरल शाखित ट्यूबलर ग्रंथि, और सरल एल्वियोलर ग्रंथि शामिल हैं, जो उनकी स्रावी इकाइयों और नलिकाओं के संगठन में भिन्नता को दर्शाते हैं।
In simple words: Epithelial tissue, which covers surfaces and lines cavities, is divided into covering and glandular epithelium. Covering epithelium can be simple (single layer: squamous, columnar, cuboidal, ciliated, pseudostratified) or compound (multiple layers: stratified squamous, transitional, neurosensory). Glandular epithelium, which develops from covering epithelium, forms glands that can be unicellular (goblet cells) or multicellular (sweat, gastric glands) with varying structures and modes of secretion.

🎯 Exam Tip: When describing epithelial tissues, categorize them clearly (simple vs. compound, covering vs. glandular). For each type, include the cell shape, number of layers, specific functions, and at least two distinct locations in the body. Diagrams should be well-labeled and represent the key morphological features of each tissue type.

 

Question 9. निम्न में विभेद कीजिए
(अ) सरल उपकला तथा संयुक्त उपकला ऊतक
(ब) हृद पेशी तथा रेखित पेशी
(स) सघन नियमित तथा सघन अनियमित संयोजी ऊतक
(द) वसामय तथा रुधिर ऊतक
(य) सामान्य तथा संयुक्त ग्रन्थि
Answer:
(अ)

सरल उपकला तथा संयुक्त उपकला ऊतक में अन्तर

सरल उपकलासंयुक्त उपकला
सरल उपकला एक स्तरीय होती है जो देहगुहा, वाहिनियों, नलिकाओं आदि का भीतरी स्तर बनाती है।संयुक्त उपकला में दो या अधिक स्तर होते हैं तथा इसका प्रमुख कार्य सुरक्षा प्रदान करना है।

(ब)

हृद पेशी तथा रेखित पेशी में अन्तर

क्र०सं०हृद पेशीरेखित पेशी
1.ये केवल हृदय की भित्ति में मिलती है।ये देहभित्ति, जीभ, फेरिन्क्स, इसोफेगस तथा अग्रपाद व पश्चपाद में मिलती है।
2.ये निरन्तर जाल बनाती है।ये बन्डल के रूप में अस्थियों से जुड़ी रहती है।
3.ये छोटी व बेलनाकार होती है। इनके अन्त भाग स्थूल होते हैं।ये लम्बी व बेलनाकार होती है। इनके अन्त भाग चपटे होते हैं।
4.ये एक केन्द्रकीय होती है तथा केवल प्लाज्मा कला से घिरी रहती है।यह बहुकेन्द्रकीय होती है तथा सारकोलेम्मा से घिरी होती है।
5.यह शाखित होती है तथा इस पर गहरे व हल्के पट्टे मिलते हैं।यह अशाखित होती है तथा इस पर एकान्तर क्रम में हल्के व गहरे क्रॉस पट्टे मिलते हैं।
6.इन पेशियों को प्रेरक तन्त्रिका तन्त्र तथा मस्तिष्क से संवेदना आती है।इन्हें संवेदना केवल केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र से मिलती है।
7.पेशी कोशिका में अनेक माइटोकॉन्ड्रिया तथा ग्लाइकोजन कण मिलते हैं।इसमें भी ग्लाइकोजन कण तथा माइटोकॉन्ड्रिया मिलते हैं।
8.ये पेशियाँ कभी नहीं थकती हैं।ये पेशियाँ कभी-कभी थक जाती हैं।

(स)

सघन नियमित तथा सघन अनियमित संयोजी ऊतक

सघन नियमित संयोजी ऊतकसघन अनियमित संयोजी ऊतक
इसमें कोलेजन तन्तु रेशों के समान्तर बंडलों के मध्य मिलते हैं। उदाहरण के लिए टेन्डन (स्नायु)।इसमें अनेक तन्तु तथा फाइब्रोब्लास्ट मिलता है। यह ऊतक तथा उपास्थि आदि में मिलता है।

(द)

वसामय तथा रुधिर ऊतक में अन्तर

क्र०सं०वसामय ऊतकरुधिर ऊतक
1.यह ऊतक ढीला संयोजी ऊतक है जो त्वचा के नीचे मिलता है। इसकी कोशिका वसा संचय करती है।रुधिर एक द्रव संयोजी ऊतक है जिसमें लाल रक्त कोशिकाएँ, प्लाज्मा, प्लेटलेट तथा सफेद रक्त कोशिकाएँ मिलती हैं।
2.जिन पोषक तत्त्वों का उपयोग नहीं हो पाता है वो सभी वसा में परिवर्तित होकर त्वचा के नीचे वसामय ऊतक में एकत्र हो जाते हैं।यह सारे शरीर में निरन्तर धमनी कोशिकाओं में बहता रहता है तथा विभिन्न पदार्थों का संवहन भी करता है।

(य)

सामान्य तथा संयुक्त ग्रन्थि में अन्तर

सामान्य ग्रन्थिसंयुक्त ग्रन्थि
इस ग्रन्थि में एकल अशाखित वाहिनी होती है। ये सरल नलिकाकार ग्रन्थि जैसे आंत्र में क्रिप्ट ऑफ ल्यूबरकुहन (Crypts of Lieburkuhn), कुंडलित नलिकाकार आंत की स्वेद ग्रन्थि तथा सरल एल्वियोलर ग्रन्थि आदि होती है।इस ग्रन्थि में वाहिनियों का शाखित तंत्र होता है। ये संयुक्त नलिकाकार (जैसे आमाशय की जठर ग्रन्थियाँ, आंत की ब्रूनर ग्रन्थि, संयुक्त एल्वियोलर ग्रन्थि जैसे स्वेद ग्रन्थि व लार ग्रन्थि तथा संयुक्त नलिका एल्वियोलर ग्रन्थि होती है। जैसे अग्न्याशय की ग्रन्थि आदि।

In simple words: This question asks for distinctions between several pairs of biological structures: simple and compound epithelial tissues based on cell layers; cardiac and striated muscle tissues based on location, structure, and control; dense regular and irregular connective tissues based on fiber arrangement; adipose and blood tissues based on composition and function; and simple and compound glands based on duct branching.

🎯 Exam Tip: For differentiation questions, always use a tabular format for clarity. Ensure each point of comparison highlights a distinct characteristic, providing examples where applicable, to showcase a comprehensive understanding of the differences.

 

Question 10. निम्न श्रृंखलाओं में सुमेलित न होने वाले अंशों को इंगित कीजिए
(अ) एरिओलर ऊतक, रुधिर, तन्त्रिका कोशिका न्यूरॉन, कंडरा (टेंडन)।
(ब) लाल रुधिर कणिकाएँ, सफेद रुधिर कणिकाएँ, प्लेटलेट, उपास्थि ।
(स) बाह्यस्रावी, अन्तःस्रावी, लार ग्रंथि, स्नायू (लिगामेंट)
(द) मैक्सिला, मैडिबल, लेब्रम, श्रृंगिका (एंटिना)
(य) प्रोटोनीमा, मध्यवेक्ष, पश्चवक्ष तथा कक्षांग (कॉक्स)
Answer:
(अ) तन्त्रिका कोशिका न्यूरॉन
(ब) उपास्थि
(स) स्नायु (लिगामेंट)
(द) श्रृंगिका (एंटिना)
(य) प्रोटोनीमा ।
In simple words: This question identifies the odd one out in several biological groups: neuron in a connective tissue group, cartilage in a blood cell group, ligament in a gland type group, antenna in a mouthpart group, and protonema in an insect body part group.

🎯 Exam Tip: To correctly identify the odd one out, understand the classification and common characteristics of each group. The outlier will not share the primary classification or function of the others.

 

Question 11. स्तम्भ । तथा स्तम्भ || को सुमेलित कीजिए

स्तम्भ I
(क) संयुक्त उपकला
(ख) संयुक्त नेत्र
(ग) पट्टीय वृक्कक
(घ) खुला परिसंचरण तन्त्र
(ङ) आंत्रवलन
(च) अस्थि अणु
(छ) जननेन्द्रिय

स्तम्भ II
(i) आहारनाल
(ii) तिलचट्टा
(iii) त्वचा
(iv) किर्मीर दृष्टि
(v) केंचुआ
(vi) शिश्नखंड
(vii) अस्थि
Answer:
(क) (iii)
(ख) (iv)
(ग) (v)
(घ) (i)
(ङ) (i)
(च) (vii)
(छ) (vi)
In simple words: This matching question links biological structures or concepts from Column I to their corresponding examples or locations in Column II, testing knowledge of animal tissue organization, sensory organs, excretory structures, circulatory systems, and skeletal components.

🎯 Exam Tip: For matching questions, carefully read each item in both columns. Start with the most confident matches, then use elimination for the remaining ones. Understanding the key features and locations of biological terms is vital.

 

Question 12. केंचुए के परिसंचरण तन्त्र का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
Answer:
केंचुए का रुधिर परिसंचरण तन्त्र केंचुए में रुधिर परिसंचरण 'बन्द प्रकार का होता है। रुधिर लाल होता है। हीमोग्लोबिन प्लाज्मा में घुला होता है। रुधिराणु रंगहीन तथा केन्द्रकमय होते हैं। केंचुए के रुधिर परिसंचरण में निम्नलिखित । अनुदैर्ध्य रुधिर वाहिनियाँ होती हैं

(i) पृष्ठ रुधिरवाहिनी (Dorsal Blood Vessel) : यह आहारनाल के मध्य पृष्ठ तल पर स्थित होती है। यह पेशीय, कपाटयुक्त रुधिरवाहिनी होती है। यह अन्तिम खण्डों से रुधिर एकत्र करके प्रथम 13 खण्डों में वितरित कर देती है। रुधिर का अधिकांश भाग चार जोड़ी हृदय द्वारा अधर रुधिरवाहिनी में पहुँच जाता है।

(ii) अधर रुधिरवाहिनी (Ventral Blood vessel) : यह आहारनाल के मध्य अधर तल पर स्थित होती है। यह अनुप्रस्थ रुधिर वाहिनियों द्वारा रुधिर का वितरण करती है। इसमें कपाट नहीं पाए। जाते।

(iii) पाश्र्व ग्रसनिका रुधिर वाहिनियाँ (Lateral Oesophageal Blood vessels) : एक जोड़ी रुधिर वाहिनियाँ दूसरे खण्ड से 14वें खण्ड तक आहारनाल के पाश्र्यों में स्थित होती हैं। ये रुधिर एकत्र करके ग्रसिकोपरि वाहिनी (supra-oesophageal blood vessel) को पहुँचाती हैं।

(iv) ग्रसिकोपरि वाहिनी (Supra-oesophageal Blood Vessel) : यह आहारनाल के पृष्ठ तल पर 9वें खण्ड से 14वें खण्ड तक फैली होती है। यह पाश्र्व ग्रसनिका से 2 जोड़ी अग्रलूपों (anterior loops) द्वारा रुधिर एकत्र करके अधर रुधिरवाहिनी को पहुँचा देती है।

(v) अधो तन्त्रिकीय रुधिरवाहिनी (Sub-neural Blood vessel) :
यह आहारनाल के आंत्रीय भाग में तन्त्रिका रज्जु के नीचे मध्य-अधर तल पर स्थित होती है। यह खण्डीय भागों से रुधिर एकत्र करके योजि वाहिनियों द्वारा पृष्ठ रुधिरवाहिनी में पहुँचा देती है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र केंचुए के रुधिर परिसंचरण तंत्र को दर्शाता है, जिसमें पृष्ठ ग्रासनली वाहिका, पृष्ठ वाहिका, वेंट्रल वाहिका, अग्र लूप, वेंट्रो-टेग्यूमेंटरी वाहिकाएँ, वेंट्रल रक्त वाहिका, सबन्यूरल वाहिका, सेप्टो-आंतरी वाहिका, डोरसो-आंतरी वाहिका, पार्श्व हृदय, पार्श्व ग्रासनली हृदय और कमिसुरल वाहिका जैसी विभिन्न वाहिकाएँ और उनके संबंधित खंडों में स्थिति को स्पष्ट रूप से नामांकित किया गया है।
In simple words: The earthworm has a closed circulatory system with red blood, where hemoglobin is dissolved in the plasma. The main longitudinal blood vessels include the dorsal (contractile, carries blood anteriorly), ventral (distributes blood posteriorly), lateral oesophageal, supra-oesophageal, and sub-neural vessels, which collectively ensure blood circulation throughout the segmented body.

🎯 Exam Tip: When describing the circulatory system of an earthworm, clearly state that it is a closed system. Detail the major blood vessels, their locations relative to the alimentary canal, and the direction of blood flow to ensure a comprehensive answer.

 

Question 13. निम्नलिखित के कार्य बताइए
(अ) मेढक की मूत्रवाहिनी
(ब) मैल्पीघी नलिका
(स) केंचुए की देहभित्ति ।
Answer:
(अ)
मेढक की मूत्रवाहिनी (Ureter of Frog) : नर मेढक में वृक्क से मूत्रवाहिनी निकलकर क्लोएका में खुलती है। यह मूत्रजनन नलिका का कार्य करती है। मादा मेंढक में मूत्रवाहिनी तथा अण्डवाहिनी (oviduct) क्लोएको में पृथक्-पृथक् खुलती हैं। मूत्रवाहिनी वृक्क से मूत्र को क्लोएका तक पहुँचाती है।

(ब)
मैल्पीघी नलिकाएँ (Malpighian tubules) : ये कीटों में मध्यान्त्र तथा पश्चान्त्र के सन्धितल पर पाई जाने वाली पीले रंग की धागे सदृश उत्सर्जी रचनाएँ होती हैं। ये उत्सर्जी पदार्थों को हीमोसील से ग्रहण करके आहारनाल में पहुँचाती हैं।

(स)
केंचए की देहभित्ति (Bodywall of Earthworm) : केंचुए की देहभित्ति नम तथा चिकमी होती है। यह श्वसन हेतु गैस विनिमय में सहायक होती है। देहभित्ति का श्लेष्म केंचुए के बिलों (सुरंग) की सतह को चिकना एवं मजबूत बनाता है।
In simple words: The frog's ureter transports urine from kidneys to the cloaca, also acting as a urinogenital duct in males. Malpighian tubules in insects are excretory organs that absorb waste from the hemolymph and deliver it to the alimentary canal. The earthworm's body wall is moist and smooth, facilitating gas exchange for respiration and providing lubrication to strengthen burrows.

🎯 Exam Tip: For each biological structure, clearly state its primary function and, if applicable, any secondary roles or specific characteristics (e.g., in males vs. females, physical properties) to provide a complete answer.

 

Question 14. मेढक के पाचन तन्त्र का नामांकित चित्र बनाइए ।
Answer:
मेढक का पाचन तन्त्र

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मेंढक के पाचन तंत्र को दर्शाता है, जिसमें निचला जबड़ा, जीभ, ग्रासनली, यकृत के विभिन्न लोब (मध्य, दाहिना, बायाँ), पित्ताशय, सिस्टिक डक्ट, हेपेटिक डक्ट, कॉमन बाइल डक्ट, लिगामेंट, अग्न्याशय, अग्नाशयी डक्ट, पेट, हेपेटोपैनक्रियाटिक डक्ट, ग्रहणी, पाइलोरिक संकुचन, प्लीहा, इलियम, रेक्टम, क्लोएका और मूत्र मूत्राशय जैसे सभी महत्वपूर्ण अंग नामांकित हैं, जो भोजन के मार्ग और पाचन प्रक्रिया में शामिल ग्रंथियों को स्पष्ट करते हैं।
In simple words: The diagram illustrates the frog's digestive system, including the mouth, esophagus, stomach, liver, gallbladder, pancreas, small intestine (duodenum, ileum), large intestine (rectum), and cloaca, showing the complete pathway for food digestion and waste elimination.

🎯 Exam Tip: When drawing and labeling a diagram of a system, ensure that all major organs are accurately represented and clearly labeled. Pay attention to the correct anatomical positions and connections to depict the system effectively.

 

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

Question 1. निम्नलिखित में से कौन-सा एक प्रकार का ऊतक है?
(क) आहारनाल
(ख) यकृत
(ग) रुधिर
(घ) अग्न्याशय
Answer: (ग) रुधिर
In simple words: Among the given options, blood is the only type of tissue, specifically a fluid connective tissue, while the others are organs or glands.

🎯 Exam Tip: Distinguish between organs, glands, and tissues. Tissues are groups of cells with similar structure and function, while organs are made of multiple tissues.

 

Question 2. निम्नलिखित में से किसका उद्भव भ्रूणीय मीसोडर्मल स्तर से हुआ है?
(क) मस्तिष्क
(ख) फेफड़ा
(ग) रक्त
(घ) यकृत
Answer: (ग) रक्त
In simple words: Blood originates from the embryonic mesodermal layer, which gives rise to connective tissues, muscles, and components of the circulatory system.

🎯 Exam Tip: Knowledge of embryonic germ layers (ectoderm, mesoderm, endoderm) and the structures they give rise to is crucial for developmental biology questions.

 

Question 3. निम्नलिखित में से किस रुधिर वर्ग को सर्वग्राही माना जाता है?
(क) वर्ग A
(ख) वर्ग B
(ग) वर्ग AB
(घ) वर्ग 0
Answer: (ग) वर्ग AB
In simple words: वर्ग AB रक्त वाले व्यक्ति किसी भी अन्य रक्त समूह से रक्त प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि उनके रक्त में कोई एंटीबॉडी नहीं होती।

🎯 Exam Tip: रक्त समूहों और उनकी संगत एंटीबॉडी/एंटीजन को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर सर्वग्राही (AB) और सर्वदाता (O) के लिए।

 

Question 4. तिलचट्टे की देहगुहा होती है।
(क) सीलोम
(ख) हीमोसील
(ग) स्यूडोसील
(घ) सीलेन्ट्रॉन
Answer: (ख) हीमोसील
In simple words: तिलचट्टे की देहगुहा को हीमोसील कहते हैं क्योंकि यह रक्त से भरी होती है, जिसमें हीमोलिम्फ नामक तरल पदार्थ होता है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न जन्तु समूहों में देहगुहा के प्रकारों को जानना और उदाहरणों के साथ उन्हें याद रखना आवश्यक है।

 

Question 5. तिलचट्टे का मुखांग होता है।
(क) बेधक एवं चूषक प्रकार का
(ख) कुंतक एवं चर्वणक प्रकार का
(ग) चर्वणक एवं लेहनकारी प्रकार का
(घ) इनमें से कोई नहीं
Answer: (ख) कुंतक एवं चर्वणक प्रकार का
In simple words: तिलचट्टे के मुखांग काटने और चबाने के लिए अनुकूलित होते हैं, जो उन्हें ठोस भोजन को तोड़ने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: कीटों के मुखांगों के प्रकार और उनके कार्यों को समझें, क्योंकि यह वर्गीकरण और अनुकूलन को दर्शाता है।

 

Question 6. तिलचट्टे का श्वसन अंग है।
(क) फेफड़ा
(ख) जलक्लोम
(ग) ट्रेकिया
(घ) त्वचा
Answer: (ग) ट्रेकिया
In simple words: तिलचट्टा ट्रेकिया नामक नलिकाओं के जाल के माध्यम से श्वसन करता है, जो सीधे कोशिकाओं तक ऑक्सीजन पहुंचाते हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न जन्तुओं में श्वसन अंगों के उदाहरणों को याद रखें और प्रत्येक की कार्यप्रणाली को समझें।

 

Question 7. कॉकरोच का मुख्य उत्सर्जी उत्पाद है।
(क) यूरिया
(ख) अमोनिया
(ग) यूरिक ऐसिड
(घ) ऐमीनो ऐसिड
Answer: (ग) यूरिक ऐसिड
In simple words: कॉकरोच जैसे कीट यूरिक एसिड उत्सर्जित करते हैं, जो पानी के संरक्षण में मदद करता है क्योंकि यह कम विषैला होता है और ठोस रूप में उत्सर्जित होता है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न जन्तुओं में उत्सर्जी उत्पादों (यूरिया, अमोनिया, यूरिक एसिड) और उनके अनुकूलन को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

Question 1. जन्तुओं में कौन-कौन से ऊतक निम्नलिखित कार्यों को सम्पन्न करते हैं?
(क) अस्थियों का अस्थियों से संयोजन ।
(ख) उपांगों की गति ।
(ग) संवेदना का संचालन।
(घ) पोषक पदार्थों एवं गैसों का परिवहन ।
Answer:
(क) श्वेत कोलेजन तन्तुओं से बने स्नायु (ligaments) अस्थियों को परस्पर जोड़ने का कार्य करते हैं।
(ख) पेशी ऊतक (रेखित पेशियाँ) उपांगों को गति प्रदान करते हैं।
(ग) तन्त्रिका ऊतक (nerve tissue) संवेदना का संचालन करते हैं।
(घ) तरल संयोजी ऊतक (fluid connective tissue) शरीर में परिसंचरण के द्वारा पोषक पदार्थों एवं गैसों के परिवहन को बनाये रखते हैं।
In simple words: विभिन्न ऊतक शरीर में विशिष्ट कार्य करते हैं, जैसे स्नायु हड्डियों को जोड़ना, पेशी ऊतक गति देना, तंत्रिका ऊतक संवेदना संचारित करना और तरल संयोजी ऊतक (रक्त) पदार्थों का परिवहन करना।

🎯 Exam Tip: विभिन्न प्रकार के ऊतकों और उनके मुख्य कार्यों को उदाहरणों के साथ याद रखें।

 

Question 2. हिपैरिन कहाँ बनता है? इसके मुख्य कार्य लिखिए।
Answer: हिपैरिन (heparin) संयोजी ऊतक (connective tissue) में उपस्थित मास्ट कोशिकाओं (mast cells) द्वारा स्रावित होता है तथा रुधिर वाहिनियों में रुधिर को जमने (clotting) से रोकता है।
In simple words: हिपैरिन मास्ट कोशिकाओं द्वारा उत्पन्न एक प्राकृतिक प्रतिस्कंदन है जो रक्त वाहिकाओं के भीतर रक्त को जमने से रोकता है।

🎯 Exam Tip: हिपैरिन के उत्पादन स्थल और इसके प्राथमिक कार्य (एंटी-कोगुलेंट) को समझना आवश्यक है।

 

Question 3. किन्हीं दो संयोजी ऊतकों के नाम लिखिए।
Answer:
1. अन्तराली संयोजी ऊतक (aereolar connective tissue)
2. रुधिर (blood)।
In simple words: अन्तराली संयोजी ऊतक और रक्त दो प्रमुख संयोजी ऊतक हैं जो शरीर में विभिन्न संरचनाओं को जोड़ने और पदार्थों का परिवहन करने का कार्य करते हैं।

🎯 Exam Tip: संयोजी ऊतकों के विभिन्न प्रकारों को उनके कार्यों और स्थानों के साथ याद रखें।

 

Question 4. कण्डरा का एक प्रमुख कार्य बताइए ।
Answer: यह पेशियों (muscles) को अस्थियों (bones) से जोड़ने का कार्य करता है।
In simple words: कण्डरा एक मजबूत संयोजी ऊतक है जो मांसपेशियों को हड्डियों से जोड़कर शरीर में गति को संभव बनाता है।

🎯 Exam Tip: कण्डरा (tendon) और स्नायु (ligament) के बीच अंतर को समझना महत्वपूर्ण है- कण्डरा पेशी को अस्थि से जोड़ता है, जबकि स्नायु अस्थि को अस्थि से जोड़ता है।

 

Question 5. मनुष्य के किन्हीं दो अंगों के नाम बताइए जिनमें लचीली उपास्थि पायी जाती है।
Answer: बाह्य कर्ण, नाक का छोर, एपिग्लॉटिस ।
In simple words: बाह्य कर्ण, नाक का छोर और एपिग्लॉटिस जैसे अंगों में लचीली उपास्थि पाई जाती है जो उन्हें लचीलापन और संरचनात्मक सहायता प्रदान करती है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न प्रकार की उपास्थियों (ह्यालाइन, इलास्टिक, फाइब्रोकार्टिलेज) और उनके शरीर में स्थानों को जानना आवश्यक है।

 

Question 6. उस रुधिर कणिका का नाम लिखिए जो रुधिर स्कन्दन में सहायता करती है।
Answer: रुधिर प्लेटलेट्स।
In simple words: प्लेटलेट्स छोटी रक्त कोशिकाएं होती हैं जो चोट लगने पर रक्त का थक्का बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जिससे रक्तस्राव रुक जाता है।

🎯 Exam Tip: रक्त के विभिन्न घटकों (RBC, WBC, प्लेटलेट्स, प्लाज्मा) और उनके विशिष्ट कार्यों को याद रखें।

 

Question 7. संयोजी ऊतक किसे कहते हैं ? इसका विकास भ्रूण के किस स्तर से होता है ?
Answer: भ्रूण में जब मीसोडर्मी कोशिकाओं का विभेदीकरण होने लगता है तो मीसोडर्म स्तर के कुछ भाग तो सघन होकर वयस्क के कंकालीय एवं पेशीय ऊतक बनाते हैं और शेष ढीले रहकर संवहनीय और संयोजी ऊतक बनाते हैं। पेशीय ऊतकों के अतिरिक्त वयस्क के अन्य सभी विविध प्रकार के मीसोडर्मी ऊतक संयोजी ऊतक कहलाते हैं।
In simple words: संयोजी ऊतक वे ऊतक होते हैं जो शरीर के अन्य ऊतकों को सहारा, बांधने और अलग करने का कार्य करते हैं, और इनका विकास भ्रूण के मीसोडर्मल स्तर से होता है।

🎯 Exam Tip: भ्रूणीय परतों (एक्टोडर्म, मेसोडर्म, एंडोडर्म) से विकसित होने वाले विभिन्न ऊतकों के उदाहरणों को याद रखें।

 

Question 8. रैनवियर के नोड पर टिप्पणी कीजिए ।
Answer: मज्जायुक्त तन्त्रिका कोशिका के अक्ष तन्तु की न्यूरीलेमा जिन स्थानों पर अक्ष तन्तु से चिपकी रहती है, उन्हें रैनवियर के नोड कहते हैं। इनके कारण अक्ष तन्तु तक 0, तथा पोषक तत्त्व पहुँचते रहते हैं।
In simple words: रैनवियर के नोड माइलिन-आच्छादित तंत्रिका अक्षतंतु पर छोटे-छोटे अंतराल होते हैं जहाँ माइलिन शीथ अनुपस्थित होती है, जिससे तंत्रिका आवेगों का तेजी से संचालन होता है।

🎯 Exam Tip: तंत्रिका कोशिका की संरचना (एक्सॉन, डेंड्राइट, माइलिन शीथ, रैनवियर के नोड) और प्रत्येक के कार्य को समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 9. कॉकरोच में श्वसन किस अंग द्वारा होता है?
Answer: श्वास नाल (trachea)।
In simple words: कॉकरोच ट्रेकिया नामक जटिल नलिकाओं के माध्यम से श्वसन करता है जो शरीर में ऑक्सीजन का सीधे वितरण करती हैं।

🎯 Exam Tip: कीटों के श्वसन तंत्र की विशिष्टता (ट्रेकियल सिस्टम) और यह कशेरुकी जीवों से कैसे भिन्न है, इसे समझें।

 

Question 10. तिलचट्टे की पेषणी के कार्यों का वर्णन कीजिए।
Answer:
1. इसके अन्दर ग्रहण किया गया भोजन पीसा जाता है तथा
2. पिसा हुआ भोजन आगे बढ़ने से पहले छनता है।
In simple words: तिलचट्टे की पेषणी (गिजार्ड) भोजन को पीसने और उसे छानने का कार्य करती है, जिससे पाचन की प्रक्रिया आसान हो जाती है।

🎯 Exam Tip: तिलचट्टे के पाचन तंत्र के विभिन्न भागों और उनके विशिष्ट कार्यों को याद रखें।

 

लघु उत्तरीय प्रश्न

Question 1. ऊतक को परिभाषित कीजिए । तरल संयोजी ऊतक की तीन विशेषताएँ लिखिए। या ऊतक की परिभाषा लिखिए । समझाइए कि रुधिर एक ऊतक है।
Answer:
ऊतक
एक विशिष्ट कार्य करने वाले कोशिकाओं के समूह को ऊतक कहा जाता है। ऊतक (tissue) शब्द के सर्वप्रथम प्रयोग का श्रेय बाइकाट (Bichat, 1771-1802) को है। मारसेलो मैल्पीघी (Marcello Malpighi, 1694) ने ऊतकों का विस्तृत अध्ययन किया। मेयर (Meyer, 1819) ने ऊतकों के अध्ययन के विज्ञान को 'हिस्टोलोजी' (histology) नाम दिया। उपर्युक्त एवं अन्य वैज्ञानिकों के अनुसार ऊतक की परिभाषा इस प्रकार दी गयी है- कोशिकाओं का ऐसा समूह जो उत्पत्ति (origin), रचना (structure) तथा कार्य (function) में समान हो, ऊतक (tissue) कहलाता है। ऊतकों की कोशिकाएँ एक आन्तरकोशीय (intercellular) पदार्थ के द्वारा परस्पर चिपकी रहती हैं। ऊतक का यह आधार द्रव्य (ground substance) मैट्रिक्स (matrix) कहलाता है। ऊतक की कोशिकाएँ ही इस मैट्रिक्स का स्रावण करती हैं।
तरल संयोजी ऊतक की विशेषताएँ
ये विशेष प्रकार के संयोजी ऊतक हैं, जिनका शरीर के लगभग सभी भागों में संचारण होता है; उदाहरणार्थ-रुधिर। इनमें निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं
1. इनमें मैट्रिक्स तरल अवस्था में होता है। इसे प्लाज्मा (plasma) कहते हैं तथा प्लाज्मों में तन्तु (fibres) नहीं होते हैं।
2. इनकी कोशिकाएँ, कणिकाएँ (corpuscles) कहलाती हैं तथा ये प्लाज्मा का स्रावण नहीं करती हैं।
3. ये अन्य ऊतकों की भाँति शरीर को दृढ़ता, निश्चित स्वरूप अथवा गति देने का कार्य नहीं करते हैं।
उपर्युक्त विशेषताओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि रुधिर एक ऊतक है।
In simple words: ऊतक समान उत्पत्ति, संरचना और कार्य वाली कोशिकाओं का एक समूह है। रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है क्योंकि इसमें तरल मैट्रिक्स (प्लाज्मा) होता है, इसमें कोशिकाएं (कणिकाएं) होती हैं, और यह शरीर के विभिन्न हिस्सों को जोड़कर पदार्थों का परिवहन करता है।

🎯 Exam Tip: ऊतक की परिभाषा, विभिन्न ऊतक प्रकारों के बीच अंतर और रक्त को संयोजी ऊतक क्यों माना जाता है, यह समझाना आवश्यक है।

 

Question 2. संवहनीय ऊतक से आप क्या समझते हैं? सामान्य संयोजी ऊतक से यह किस प्रकार भिन्न है?
Answer:
संवहनीय ऊतक
उविकास के साथ-साथ जब हमारे शरीर का माप बढ़ा और इसके रचनात्मक संगठन में जटिलता आई, तो इसके विभिन्न भागों के मध्य पदार्थों का परिवहन एक महत्त्वपूर्ण कार्य हो गया। अतः स्पंजों, निडेरिया एवं असीलोमेट तथा स्यूडोसीलोमेट जन्तुओं को छोड़कर शेष जन्तुओं में एक संवहनीय तन्त्र का विकास हुआ । इस तन्त्र के अन्तर्गत अधिकांश उच्च जन्तुओं में परिवहन के माध्यम के रूप में रुधिर एवं लसीका का विकास हुआ। ये विशेष प्रकार के तरल संयोजी ऊतक होते हैं, जिनका कि सम्पूर्ण शरीर में परिसंचरण होता है। इस प्रकार के ऊतकों को ही संवहनीय ऊतक कहा जाता है।
In simple words: संवहनीय ऊतक वे तरल संयोजी ऊतक होते हैं (जैसे रक्त और लसीका) जो शरीर में पदार्थों का परिवहन करते हैं, जबकि सामान्य संयोजी ऊतक (जैसे एरिओलर) सहारा प्रदान करते हैं और अंगों को बांधते हैं।

🎯 Exam Tip: संवहनीय ऊतक की परिभाषा, इसके मुख्य घटक (रक्त और लसीका), और इसके कार्य को सामान्य संयोजी ऊतक से तुलना करते हुए स्पष्ट करें।

 

Question 3. लाल रुधिराणु अपघटन तथा लाल रुधिराणु निर्माण क्रिया को संक्षेप में समझाइए ।
Answer: लाल रुधिराणु अपघटन मैक्रोफेज तथा फेगोसाइट्स कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त लाल रुधिराणुओं का भक्षण करके हीमोग्लोबिन को हीम तथा ग्लोबिन में तोड़ देती हैं। इस प्रक्रिया को लाल रुधिराणु अपघटन कहते हैं। हीम का उपयोग पुनः हीमोग्लोबिन निर्माण में हो जाता है। लाल रुधिराणु निर्माण यकृत, अस्थिमज्जा, लसीका गाँठों, थाइमस ग्रन्थि आदि में लाल रुधिराणुओं का निर्माण होता है। इनका निर्माण एरिथ्रोब्लास्ट कोशिकाओं से होता है।
In simple words: लाल रुधिराणु अपघटन पुरानी लाल रक्त कोशिकाओं का टूटना है, जबकि लाल रुधिराणु निर्माण नई लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन है जो मुख्य रूप से अस्थि मज्जा में होता है।

🎯 Exam Tip: लाल रक्त कोशिकाओं के जीवनचक्र (उत्पादन, कार्य, अपघटन) के चरणों और संबंधित अंगों को याद रखें।

 

Question 4. हैवर्सिअन नलिका पर टिप्पणी कीजिए। या स्तनी की अस्थि की अनुप्रस्थ काट का नामांकित चित्र बनाइए। या स्तनधारी की अस्थि में पाए जाने वाले हैवर्सिअन संस्थान का स्वच्छ एवं नामांकित चित्र बनाकर वर्णन कीजिए ।
Answer:
हैवर्सिअन नलिका :
स्तनी प्राणियों की अस्थियाँ अधिक मोटी होती हैं। इसके मैट्रिक्स में हैवर्सिअन तन्त्र होता है। हैवर्सिअन नलिका के चारों ओर अस्थि कोशिकाओं के संकेन्द्रित घेरे होते हैं। हैवर्सिअन नलिकाएँ परस्पर अनुप्रस्थ या तिरछी वॉल्कमैन नलिकाओं से जुड़ी रहती हैं। हैवर्सिअन तन्त्र के कारण अस्थियों में पोषक पदार्थों तथा 0, आदि का संचरण सुगमता से होता है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र स्तनधारी हड्डी की अनुप्रस्थ काट को दर्शाता है, जिसमें हैवर्सिअन नलिकाएं, वोल्कमैन नलिकाएं और अस्थि कोशिकाएं दिखाई गई हैं। ये संरचनाएं हड्डी को रक्त और पोषक तत्व प्रदान करती हैं, जिससे यह जीवित और कार्यात्मक रहती है।
In simple words: हैवर्सिअन नलिकाएं स्तनधारी हड्डियों में पाई जाने वाली सूक्ष्म नलिकाएं होती हैं जो पोषक तत्वों और ऑक्सीजन को अस्थि कोशिकाओं तक पहुंचाती हैं, जिससे हड्डी को पोषण मिलता है।

🎯 Exam Tip: हैवर्सिअन प्रणाली की संरचना और कार्य को स्पष्ट रूप से समझाएं, जिसमें हैवर्सिअन नलिकाएं, लैमेला, लैकुना और कैनालिकुली शामिल हैं।

 

Question 5. तिलचट्टे के लार ग्रन्थि-पुंज का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer:

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र तिलचट्टे के लार ग्रंथि-पुंज को दर्शाता है, जिसमें इफरेन्ट लार नलिका, लोब्युलर लार नलिका, लार ग्रंथि, लार जलाशय और कॉमन लार नलिका जैसी संरचनाएं शामिल हैं। यह ग्रंथि पाचन में सहायता के लिए लार का उत्पादन करती है।
In simple words: तिलचट्टे में लार ग्रंथि-पुंज लार का उत्पादन और स्राव करता है, जिसमें पाचक एंजाइम होते हैं जो भोजन को तोड़ने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: तिलचट्टे के पाचन तंत्र के अंगों के स्थान और कार्यों को याद रखें, विशेष रूप से लार ग्रंथियों का महत्व।

 

Question 6. तिलचट्टे के श्वसन नली तंत्र में गैसीय विनिमय की यांत्रिकी का संक्षेप में वर्णन कीजिए ।
Answer: तिलचट्टे की विश्रामावस्था में ट्रैकिओल्स में केशिका खिंचाव (capillary force) के कारण ऊतक द्रव्य (tissue fluid) इनमें कुछ दूर तक भरा रहता है। यह भीतर आयी हवा से CO2 के बदले O2 लेता है। इसके विपरीत तिलचट्टे की सक्रिय अवस्था में, उपापचयी दर (metabolic rate) के बढ़ जाने से, ऊतक द्रव्य में परासरणी दाब (osmotic pressure) बढ़ जाता है। इससे ट्रैकिओल्स में से ऊतक द्रव्य निकल जाता है। अतः अब हवा सीधी कोशिकाओं तक पहुँच जाती है, इससे गैसीय विनिमय बढ़ जाता है। CO2 उपचर्म में से भी O2 की अपेक्षा कहीं अधिक प्रसरित (diffuse) होती है। अतः यह हवा के साथ ही नहीं, वरन् हीमोलिम्फ में घुलकर देहभित्ति की उपचर्म में से भी प्रसरण द्वारा बाहर निकलती है।
In simple words: तिलचट्टे में गैसीय विनिमय ट्रेकियल सिस्टम के माध्यम से होता है, जिसमें ऑक्सीजन सीधे कोशिकाओं तक पहुंचती है। विश्राम में केशिका क्रिया से ट्रेकिओल में तरल पदार्थ होता है, जबकि गतिविधि के दौरान परासरण दाब के कारण तरल बाहर निकल जाता है, जिससे हवा सीधे कोशिकाओं तक पहुंचती है।

🎯 Exam Tip: तिलचट्टे के ट्रेकियल श्वसन प्रणाली की अद्वितीय विशेषताओं और गैसीय विनिमय में तरल पदार्थ की भूमिका पर ध्यान दें।

 

Question 7. कायान्तरण की परिभाषा लिखिए। त्वक पतन से कॉकरोच को क्या लाभ मिलता है ?
Answer: वह प्रक्रिया जिसके अन्तर्गत शिशु अनेक अवस्थाओं से होते हुए वयस्क बनता है, कायान्तरण कहलाती है। उदाहरणार्थ-कॉकरोच के शिशु को निम्फ कहते हैं। ये रचना में वयस्क कॉकरोच के ही समान परन्तु छोटे, हल्के रंग के और पंखहीन होते हैं। इनके जननांग भी अर्द्धविकसित होते हैं। इनकी शिशु अवस्था लगभग 6 माह से 2 वर्ष तक होती है। इस बीच शिशु में सक्रिय पोषण के कारण वृद्धि होती है। वृद्धि अवस्था में 10 से 12 बार निम्फ के बाह्य कंकाल का त्वक् पतन होता है, परिणामस्वरूप इसकी वृद्धि होती है। अन्तिम त्वक् पतन के पश्चात् वृद्धि प्रावस्था समाप्त हो जाती है तथा निम्फ वयस्क बन जाता है। इसके पंख भी बन जाते हैं तथा जननांग क्रियाशील हो जाते हैं।
In simple words: कायान्तरण एक जैविक प्रक्रिया है जिसमें जीव अंडे से वयस्क अवस्था तक विभिन्न चरणों से गुजरता है। कॉकरोच में त्वक् पतन (निर्मोचन) उसे अपने पुराने बाह्यकंकाल को त्यागकर बड़ा होने और वयस्क बनने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: कायान्तरण की अवधारणा, इसके विभिन्न चरणों (अंडा, निम्फ, वयस्क) और तिलचट्टे के विकास में निर्मोचन के महत्व को स्पष्ट करें।

 

Question 8. उत्सर्जन के बारे में आप क्या जानते हैं? तिलचट्टे की मैलपीघियन नलिकाओं का कार्य बताइए ।
Answer:
उत्सर्जन : प्रत्येक जीव में कोशिकीय उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरूप कई प्रकार के अपशिष्ट उत्पाद बनते हैं, जो उनके शरीर के लिए निरर्थक एवं हानिकारक होते हैं। इन अपशिष्ट उत्पादों को शरीर से निष्कासित करने की जैव-क्रिया को उत्सर्जन कहते हैं। मैलपीषियन नलिकाओं के कार्य-ये पीले रंग की धागेनुमा नलिकाएँ हैं, जो मध्य आंत्र तथा पश्च आंत्र के जोड़ पर स्थित होती हैं। ये नलिकाएँ नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों का अवशोषण करके उन्हें जैव रासायनिक क्रिया द्वारा यूरिक अम्ल में परिवर्तित कर देती हैं। यूरिक अम्ल पश्च आंत्र द्वारा उत्सर्जित कर दिया। जाता है।
In simple words: उत्सर्जन शरीर से उपापचयी अपशिष्ट उत्पादों को बाहर निकालने की प्रक्रिया है। तिलचट्टे में मैलपीघियन नलिकाएं नाइट्रोजनी अपशिष्टों को हीमोलिम्फ से अवशोषित करती हैं, उन्हें यूरिक एसिड में बदलती हैं, और फिर पश्च आंत्र के माध्यम से उत्सर्जित करती हैं।

🎯 Exam Tip: उत्सर्जन की परिभाषा, मैलपीघियन नलिकाओं की संरचना और कार्यप्रणाली, और यूरिक एसिड के रूप में नाइट्रोजनस अपशिष्ट के उत्सर्जन के महत्व पर ध्यान दें।

 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

Question 1. पेशी ऊतक कितने प्रकार के होते हैं? अरेखित पेशियों की सचित्र संरचना तथा कार्यविधि ६ का वर्णन कीजिए । प्रत्येक का उदाहरण दीजिए। या अरेखित तथा रेखित पेशियों में मुख्य अन्तर लिखिए।
Answer:
पेशी ऊतक
पेशी ऊतक अनेक लम्बे एवं बेलनाकार तन्तुओं (रेशों) से बना होता है जो समानांतर पंक्तियों में सजे रहते हैं। यह तन्तु कई सूक्ष्म तन्तुओं से बना होता है जिसे पेशी तन्तुक (myofibril) कहते हैं। समस्त पेशी तन्तुक समन्वित रूप से उद्दीपन के कारण संकुचित हो जाते हैं तथा पुनः लम्बा होकर अपनी असंकुचित अवस्था में आ जाते हैं। पेशी ऊतक की क्रिया से शरीर वातावरण में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार गति करता है तथा शरीर के विभिन्न अंगों की स्थिति को सँभाले रखता है। सामान्यतया शरीर की सभी गतियों में पेशियाँ प्रमुख भूमिका निभाती हैं। पेशी ऊतक अग्र तीन प्रकार के होते हैं
1. अरेखित पेशी ऊतक
यह अनैच्छिक पेशी ऊतक है। ये पेशियाँ कार्यिकी व वातावरणों के अनुसार संकुचित होती हैं। ये पेशियाँ कंकाल से सम्बन्धित नहीं होती हैं। इन्हें विसरल पेशियाँ भी कहते हैं। ये पेशियाँ आहारनाल, श्वासनली, गर्भाशय, पित्ताशय, रुधिरवाहिनी, शिश्न आदि में मिलती हैं। अरेखित पेशियों के तन्तु 100-200µ लम्बे तथा 10µ चौड़े होते हैं। ये पतले तथा तरूपी होते हैं। तन्तु के ऊपर कोशिका कला मिलती है। इसको सारकोलेमा कहते हैं। तन्तु का द्रव सारकोप्लाज्म कहलाता है। इसमें एक्टिन व मायोसिन प्रोटीन के समानांतर. पेशी तन्तु मिलते हैं।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र पेशी ऊतक के तीन मुख्य प्रकारों - (A) अरेखित पेशी ऊतक (smooth muscle fibres), (B) रेखित पेशी ऊतक (striated muscle) और (C) हृद पेशी ऊतक (cardiac muscle) को दर्शाता है। यह उनकी कोशिका संरचना, केन्द्रकों की स्थिति और धारीदार पैटर्न (स्ट्रिएशन) में अंतर को स्पष्ट करता है।
2. रेखित पेशी ऊतक
ये पेशियाँ अंगों में इच्छानुसार गति को नियन्त्रित करती हैं। इन्हें ऐच्छिक पेशियाँ कहते हैं। ये पेशियाँ कंकाल से जुड़ी होती हैं। हाथ, पैर व शरीर की गति को संचालित करने के कारण इन्हें कंकालीय पेशी अथवा दैहिक पेशी भी कहते हैं। ये पेशियाँ गर्दन, हाथ, पैर, उदर आदि सभी अंगों में मिलती हैं। ये तन्तु संयोज़ी ऊतक तथा कोलेजन तन्तुओं के आवरण से आच्छादित होती हैं। इसे एन्डोमायोसियम कहते हैं। प्रत्येक तन्तु बेलनाकार तथा 1-30 µ लम्बा तथा 10-100 µ व्यास का होता है। इसके आवरण को सारकोलेमा कहते हैं। सारकोलेमा त्रिस्तरीय होता है। सारकोप्लाज्म में मायोफाइब्रिल मिलती है। रेखित पेशियों में एक्टिन तथा मायोसिन प्रोटीन मिलती है।
3. हृद पेशी ऊतक
यह एक संकुचनशील ऊतक है जो केवल हृदय में ही पाया जाता है। हृद पेशी ऊतक की कोशिकाएँ कोशिका संधियों द्वारा द्रव्य कला से एकरूप होकर चिपकी रहती हैं। संचार संधियों अथवा अन्तर्विष्ट डिस्क (intercalated disc) के कुछ संगलन बिंदुओं पर कोशिका एक इकाई रूप में संकुचित होती है। जैसे कि जब एक कोशिका संकुचन के लिए संकेत ग्रहण करती है, तब दूसरी पास की कोशिका भी संकुचन के लिए उद्दीपित होती है।
In simple words: पेशी ऊतक शरीर में गति प्रदान करते हैं और तीन प्रकार के होते हैं: अरेखित (अनैच्छिक, आंतरिक अंगों में), रेखित (ऐच्छिक, कंकाल से जुड़ी), और हृद (अनैच्छिक, हृदय में)। अरेखित पेशियां चिकनी होती हैं और बेलनाकार नहीं होती, जबकि रेखित पेशियां धारीदार और बेलनाकार होती हैं।

🎯 Exam Tip: तीनों प्रकार के पेशी ऊतकों की संरचना (धारी, केन्द्रक), कार्यप्रणाली (ऐच्छिक/अनैच्छिक), और शरीर में उनके स्थान को तुलनात्मक रूप से याद रखें।

 

Question 2. तिलचट्टे के मुखांगों का सचित्र वर्णन कीजिए। या कॉकरोच के मुखांगों को, उनके प्राकृतिक क्रम में, सरल, स्वच्छ आरेखी चित्र खींचकर उचित नामांकन द्वारा स्पष्ट कीजिए (वर्णन अनापेक्षित)
Answer:
तिलचट्टे/कॉकरोच के मुखांग
कॉकरोच के सिर पर उपस्थित चार जोड़ी उपांगों में से तीन जोड़ी उपांग छोटे और मुखद्वार के चारों ओर स्थित होते हैं। सिर कोष की लैब्रम (labrum) तथा हाइपोफैरिंक्स (hypopharynx) नाम की एक अन्य काइटिनयुक्त रचना भी मुखद्वार से सम्बन्धित होती है। इन सब उपांगों का सम्बन्ध भोजन-ग्रहण से होता है। अतः इन्हें मुख उपांग या मुखांग कहते हैं। ये भोजन को कुतर-कुतरकर खाने के लिए उपयोजित अर्थात् मैन्डीबुलेट होते हैं। मुखद्वार के चारों ओर ये चित्र में दिखाए गए क्रम में स्थित रहते हैं।
1. लैब्रम : यह मुखद्वार पर, सामने ढकी, सिर कोष की सबसे निचली, चपटी एवं गतिशील, प्लेटनुमा स्कलीराइट होती है। अतः इसे ऊपरी होंठ भी कहते हैं। यह लचीली पेशियों द्वारा क्लाइपियस से जुड़ी होती है। इसका स्वतन्त्र किनारा बीच से कटा होता है। कटाव के दोनों ओर स्वाद-ज्ञान की संवेदी सीटी होती हैं।
2. मैन्डीबल्स :
ये लैब्रम के नीचे, मुखद्वार के पार्यों में एक-एक होते हैं। मजबूत पेशियाँ इन्हें सिर-कोष से जोड़ती हैं। प्रत्येक मैन्डीबल कठोर काइटिन की त्रिकोणाकार-सी रचना होती है। इससे मुख की ओर वाले किनारे पर तीन बड़े और कई छोटे-छोटे मजबूत दाँतों जैसे नुकीले उभार (denticles) होते हैं। इसी किनारे के आधार कोण पर प्रोस्थीका नामक छोटा-सा कोमल भाग होता है जिस पर संवेदी सीटी होती हैं। पेशियों की सहायता से मैन्डीबल्स अनुप्रस्थ दिशा में गतिशील होकर दाँतों के बीच आए भोजन को चबाते हैं।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र कॉकरोच के मुखांगों को दर्शाता है, जिसमें लेब्रम (ऊपरी होंठ), मैंडिबल (जबड़े), मैक्सिला (दूसरे जबड़े) और लेबियम (निचला होंठ) शामिल हैं। प्रत्येक उपांग के संवेदी बाल (सेंसरी सैट) और चबाने वाले भाग (डेंटिकल) भी चिह्नित हैं, जो भोजन को संभालने और चबाने के लिए विशेष रूप से अनुकूलित हैं।
3. प्रथम मैक्सिली : ये मुखद्वार के पाश्र्वो में, मैन्डीबल्स के आगे एक-एक होती हैं। प्रत्येक मैक्सिला कई पोडोमीयर्स की बनी होती है। इसके आधार भाग अर्थात् प्रोटोपोडाइट में काडों एवं स्टाइप्स नामक दो पोडोमीयर्स होते हैं। काड पेशियों द्वारा सिर-कोष से तथा स्टाइप्स 99° के कोण पर कारों से जुड़ा होता है। स्टाइप्स के दूरस्थ छोर के बाहरी भाग से एक पतला पंचखण्डीय (five-jointed) बाह्य पादांग (exopodite) जुड़ा होता है। इसे मैक्सिलरी स्पर्शक (maxillary palp) कहते हैं। इसके छोटे आधार पोडोमीयर को पैल्पीफर कहते हैं। स्टाइप्स के छोर से ही जुड़ा अन्तःपादांग (endopodite) होता है। इसमें परस्पर सटी दो पोडोमीयर्स होती हैं-बाहरी गैलिया तथा भीतरी लैसीनिया (lacinia)। गैलिया कोमल तथा आगे से चौड़ी, छत्ररूपी (hood-like) होती है। लैसीनिया कठोर तथा आगे से नुकीली, पंजेनुमा होती है। इसके सिरे पर दो कण्टिकाएँ तथा भीतरी किनारों पर अनेक नन्हे शूक (bristles) होते हैं। इनके द्वारा प्रथम मैक्सिली भोजन को उस समय पकड़े रहती हैं जब मैन्डीबल्स भोजन को चबाते हैं। लैसीनिया के शूकों द्वारा मैक्सिली, बुश की भाँति, अन्य मुख उपांगों की सफाई भी करती रहती हैं।
4. द्वितीय मैक्सिली : ये समेकित होकर एक सहरचना बनाती हैं जिसे लेबियम या निचला होंठ (lower lip) कहते हैं; क्योंकि यह मुखद्वार के अधरतल पर ढका होता है। इसका आधार भाग बड़ा-सा चपटा सबमेन्टम होता है जो इसे सिर-कोष से जोड़ता है। सबमेन्टम के आगे छोटा मेन्टम इससे जुड़ा होता है। लेबियम का शेष, शिखर भाग, प्रथम मैक्सिली की ही भाँति पोडोमीयर्स एक जोड़ी रचनाओं का बना होता है जिनके आधार भाग मिलकर प्रीमेन्टम बनाते हैं। सबमेन्टम, मेन्टम और प्रीमेन्टम मिलकर लेबियम का प्रोटोपोडाइट बनाते हैं। प्रीमेन्टम के प्रत्येक पार्श्व में एक पैल्पीजर नामक स्कलीराइट होती है। इससे एक त्रिखण्डीय (three jointed) बाह्यपादांग (exopodite) जुड़ा होता है जिसे लेबियल स्पर्शक (labial palp) कहते हैं। प्रीमेन्टम के छोर पर, मध्य भाग से लगे, दो छोटे ग्लोसी तथा बाहरी भागों से लगे एक-एक बड़े पैराग्लोसी नामक पोडोमीयर्स होते हैं।
ये मिलकर इन मैक्सिली के अन्तःपादांग (endopodites) बनाते हैं। इन्हें मिलाकर लिगूला भी कहते हैं। पैल्प्स के अन्तिम खण्डों तथा पैराग्लोसी पर स्पर्श एवं स्वाद-ज्ञान की संवेदी सीटी होती हैं। यदि मैन्डीबल्स, प्रथम मैक्सिली या द्वितीय मैक्सिली में से किसी भी एक मुख उपांग को काटकर हटा दें तो कॉकरोच की भोजन-ग्रहण की व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी। यह न तो भोजन को ठीक से कुतर-कुतरकर खा पाएगा और न ही भोजन के स्पर्श, गन्ध आदि उद्दीपनों को ग्रहण कर पाएगा। इस प्रकार, उपयुक्त पोषण के अभाव में इसकी मृत्यु हो सकती है।
5. हाइपोफैरिंक्स या लिंग्वा : यह लेबियम के पृष्ठतल पर, लैब्रम से ढका, प्रथम मैक्सिली के बीच में, मुखद्वार के छोर से लगा हुआ बेलनाकार-सा मुख उपांग होता है। इसके स्वतन्त्र छोर पर अनेक संवेदी सीटी होती हैं। आधार भाग पर सहलार नलिका (common salivary duct) का छिद्र होता है।
In simple words: तिलचट्टे के मुखांग भोजन को काटने, चबाने और हेरफेर करने के लिए अनुकूलित होते हैं। इनमें लैब्रम (ऊपरी होंठ), मैंडिबल (जबड़े), मैक्सिला (सहायक जबड़े), लेबियम (निचला होंठ) और हाइपोफैरिंक्स (जीभ) शामिल होते हैं, जो सभी भोजन ग्रहण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

🎯 Exam Tip: तिलचट्टे के मुखांगों के प्रत्येक भाग (लैब्रम, मैंडिबल, मैक्सिला, लेबियम, हाइपोफैरिंक्स) की संरचना और कार्य को स्पष्ट रूप से समझाएं।

 

Question 3. संयुक्त नेत्र से आप क्या समझते हैं? कॉकरोच के एक नेत्रांशक का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए। या संयुक्त नेत्र क्या है? तिलचट्टे के एक नेत्रांशक की खड़ी काट का नामांकित चित्र बनाइए तथा मोजैक दृष्टि की क्रियाविधि को विस्तारपूर्वक समझाइए ।
Answer:
संयुक्त नेत्र कॉकरोच में सिर के अग्र भाग के पार्श्व में दोनों ओर दो काले संयुक्त नेत्र होते हैं। ये अवृन्त तथा वृक्काकार होते हैं। संयुक्त नेत्र अनेक दृष्टि एककों (visual elements) से निर्मित होते हैं जिन्हें नेत्रांशक (ommatidia) कहा जाता है। प्रत्येक नेत्रांशक एक स्वतन्त्र एकक है अर्थात् जो वस्तु उसके सामने होती है उसका उतना प्रतिबिम्ब वह बना लेता है। कॉकरोच के संयुक्त नेत्र में लगभग 2,000 नेत्रांशक मिलते हैं। नेत्र के ऊपरी क्यूटिकल का आवरण कॉर्निया (cornea) बनाता है जो अनेक कोष्ठों में बँटा होता है, जिन्हें फलक (facets) कहते हैं। ये फलक षट्कोणीय होते हैं। प्रत्येक फलक के नीचे एक नेत्रांशक (ommatidium) स्थित होता है।
नेत्रांशक (Ommatidium) : नेत्रांशक को दो भागों डायोप्ट्रिकल (dioptrical) तथा ग्राही भाग (receptor region) में बाँटा जाता है
(i) डायोप्टिकल भाग (Dioptrical Region) :
कॉर्निया का फलक मध्य से मोटा होकर एक द्विउत्तल लेंस (biconvex lens) बनाता है जिसके नीचे दो कॉरनिएजन कोशिकाएँ (corneagen cells) मिलती हैं। ये कोशिकाएँ उपत्वचीय कोशिकाओं को रूपान्तरण हैं। निर्मोचन (moulting) के पश्चात् ये नया कॉर्निया बनाती हैं। इसके पीछे चार शंकु कोशिकाएँ (cone cells) मिलती हैं जो पारदर्शी क्रिस्टलीय शंकु (crystalline cone) के चारों ओर स्थित होती हैं। इस भाग का मुख्य कार्य वस्तु से आने वाली प्रकाश की किरणों को फोकस करना है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र कॉकरोच के संयुक्त नेत्र की खड़ी काट को दर्शाता है, जिसमें कॉर्निया, कॉर्निएजन कोशिकाएँ, क्रिस्टलीय शंकु और रेटिनल कोशिकाएँ जैसे विभिन्न घटक दिखाई गई हैं। ये सभी मिलकर नेत्रांशक (ओमाटीडिया) बनाते हैं, जो कॉकरोच को मोज़ेक दृष्टि प्रदान करते हैं।
(ii) ग्राही भाग (Receptor Region) :
इसके मध्य में एक लम्बी तरूपी (spindle shaped) छड़ (rod) मिलती है जिस पर अनुप्रस्थ दरारें रेब्डॉम (rhabdome) मिलती हैं। रेब्डॉम को घेरते हुए सात दृष्टि पटल कोशिकाएँ (retinal cells) मिलती हैं जो इसकी रक्षा करती हैं तथा उस तक पोषक पदार्थ पहुँचाती हैं। रेब्डॉम का निर्माण रेटाइनल कोशिकाओं के स्राव से होता है। रेटाइनल कोशिकाएँ तथा रेब्डॉम दूरस्थ सिरे पर आधार कला (basement membrane) पर आधारित व तन्त्रिका तन्तुओं से सम्बन्धित होते हैं। इस भाग पर प्रतिबिम्ब बनता है।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र नेत्रांशक की खड़ी काट और उसके क्रिस्टलीय व रेब्डॉम भागों की अनुप्रस्थ काट को दर्शाता है। इसमें कॉर्निएजन कोशिका, शंकु कोशिका, आइरिस पिगमेंट शीथ, रेटिनल कोशिका और रेब्डॉम जैसी संरचनाएं दिखायी गई हैं, जो प्रकाश के संवेदन और प्रतिबिंब निर्माण में सहायक होती हैं।
पृथक् होते हैं। वर्णक परतें वर्णक अमीबा समान कोशिकाओं (pigmented amoeboid cells) द्वारा निर्मित होती हैं। दो नेत्रांशकों के मध्य की वर्णक परत दो वर्णक समूहों से बनती है। डायोप्ट्रिकल भाग में मिलने वाला वर्णक समूह आइरिस वर्णक समूह (iris pigment group) तथा रेटाइनल भाग में मिलने वाला वर्णक समूह रेटाइनल वर्णक समूह (retinal pigment group) कहलाता है।
प्रत्येक नेत्रांशक स्वतन्त्र प्रतिबिम्ब बनाता है। संयुक्त नेत्र में किसी भी वस्तु का प्रतिबिम्ब छोटे-छोटे प्रतिबिम्बों के समेकन से बनता है। इस प्रकार की दृष्टि को संकलित दृष्टि (mosaic vision) कहते हैं। प्रतिबिम्ब की प्रकृति प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर करती है। तीव्र प्रकाश में एपोजीशन प्रतिबिम्ब (apposition image) बनता है तथा मन्द प्रकाश में सुपरपोजीशन प्रतिबिम्ब (super-position image) बनता है। यह प्रतिबिम्ब अंशछादित (overlapping) होता है; अतः स्पष्ट नहीं होता है।
In simple words: संयुक्त नेत्र कॉकरोच में अनेक छोटे-छोटे नेत्रांशकों (ओमाटीडिया) का समूह होता है, जिनमें से प्रत्येक एक अलग छवि बनाता है, जिससे मोज़ेक दृष्टि उत्पन्न होती है। नेत्रांशक दो मुख्य भागों में बंटा होता है: डायोप्ट्रिकल भाग प्रकाश को केंद्रित करता है, और ग्राही भाग छवि का पता लगाता है। मोज़ेक दृष्टि आसन्न छवियों के संयोजन से बनती है।

🎯 Exam Tip: संयुक्त नेत्र की संरचना (कॉर्निया, ओमाटीडिया, रेटिनल कोशिकाएं), मोज़ेक दृष्टि की अवधारणा, और एपोजीशन व सुपरपोजीशन छवियों के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझाएं।

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