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Detailed Chapter 6 पुष्पीय पौधों की संरचना UP Board Solutions for Class 11 Biology
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Class 11 Biology Chapter 6 पुष्पीय पौधों की संरचना UP Board Solutions PDF
अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर
Question 1. विभिन्न प्रकार के मेरिस्टेम की स्थिति तथा कार्य बताइए ।
Answer:1. शीर्षस्थ विभज्योतक :
ये मुख्य रूप से जड़ व तने के शीर्षों पर तथा पत्तियों के अग्रों पर मिलते हैं जहाँ ये नई-नई कोशिकाएँ बनाते रहते हैं।
2. अन्तर्वेशी विभज्योतक : यह शीर्षस्थ विभज्योतक का अलग होकर छूटा हुआ भाग होता है। जो स्थाई ऊतकों में परिवर्तित न होकर उनके मध्य में छूट जाता है। घासों के पर्यो के आधारों में, पोदीने के तने की पर्व सन्धियों के नीचे यह ऊतक पाया जाता है। इनकी कोशिकाओं में विभाजन के फलस्वरूप पौधों की लम्बाई में वृद्धि होती है।
3. पाश्र्व विभज्योतक : पौधों में इस ऊतक की स्थिति पार्श्व में होती है इसीलिए इसे पार्श्व विभज्योतक कहते हैं। इनकी कोशिकाओं में विभाजन अरीय दिशा में होता है। इनके
उदाहरण : पूलीय कैम्बियम व कॉर्क कैम्बियम हैं।In simple words: मेरिस्टेम वे ऊतक होते हैं जिनकी कोशिकाएँ लगातार विभाजित होती रहती हैं। शीर्षस्थ मेरिस्टेम जड़ों और तनों की लंबाई बढ़ाता है, अंतर्वेशी मेरिस्टेम पौधों के पर्वों में वृद्धि करता है, और पार्श्व मेरिस्टेम चौड़ाई में वृद्धि करता है, जैसे कि कैम्बियम।
🎯 Exam Tip: मेरिस्टेम के प्रकार और उनके कार्य को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें। उदाहरणों के साथ उनकी स्थिति का वर्णन करने से अधिक अंक प्राप्त होंगे।
Question 2. कॉर्क कैम्बियम ऊतकों से बनता है जो कॉर्क बनाते हैं। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? वर्णन करो ।
Answer: हाँ। हम इस कथन से सहमत हैं कि कॉर्क कैम्बियम ऊतकों से बनता है जो कॉर्क बनाते हैं। ये पार्श्व विभज्योतकों की कोशिकाओं के अरीय दिशा में विभाजन के फलस्वरूप बनता है।In simple words: हाँ, कॉर्क कैम्बियम एक ऊतक है जो कॉर्क का निर्माण करता है। यह पार्श्व मेरिस्टेम का एक प्रकार है जिसकी कोशिकाएँ अरीय दिशा में विभाजित होकर कॉर्क बनाती हैं, जो पौधे को सुरक्षा प्रदान करता है।
🎯 Exam Tip: कॉर्क कैम्बियम के निर्माण और कार्यप्रणाली का संक्षिप्त और सटीक वर्णन करें। पार्श्व विभज्योतक से इसका संबंध स्पष्ट करें।
Question 3. चित्रों की सहायता से काष्ठीय एन्जियोस्पर्म के तने में द्वितीयक वृद्धि के प्रक्रम का वर्णन कीजिए इसकी क्या सार्थकता है?
Answer:
द्वितीयक वृद्धि
शीर्षस्थ विभज्योतक की कोशिकाओं के विभाजन, विभेदन और परिवर्द्धन के फलस्वरूप प्राथमिक ऊतकों का निर्माण होता है। अतः शीर्षस्थ विभज्योतक के कारण पौधे की लम्बाई में वृद्धि होती है। इसे प्राथमिक वृद्धि कहते हैं । द्विबीजपत्री तथा जिम्नोस्पर्स आदि काष्ठीय पौधों में पार्श्व विभज्योतक के कारण तने तथा जड़ की मोटाई में वृद्धि होती है। इस प्रकार मोटाई में होने वाली वृद्धि को द्वितीयक वृद्धि (secondary growth) कहते हैं। जाइलम और फ्लोएम के मध्य विभज्योतक को संवहन एधा (vascular cambium) तथा वल्कुट या परिरम्भ में विभज्योतक को कॉर्क एधा (cork cambium) कहते हैं।द्वितीयक वृद्धि-द्विबीजपत्री तना
द्वितीयक वृद्धि संवहन एधा (vascular cambium) तथा कॉर्क एधा (cork cambium) की क्रियाशीलता के कारण होती है।संवहन एधा की क्रियाशीलता
द्विबीजपत्री तने में संवहन बण्डल वर्षी (open) होते हैं। संवहन बण्डलों के जाइलम तथा फ्लोएम के मध्य अन्तःपूलीय एधा (intrafascicular cambium) होती है। मज्जा रश्मियों की मृदूतकीय कोशिकाएँ जो अन्तःपूलीय एधा के मध्य स्थित होती हैं, विभज्योतकी होकर आन्तरपूलीय एधा (interfascicular cambium) बनाती हैं। पूलीय तथा आन्तरपूलीय एधा मिलकर संवहन एधा का घेरा बनाती हैं।ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र पूलीय एधा की कोशिकाओं में होने वाले क्रमिक विभाजन को दर्शाता है, जिससे जाइलम और फ्लोएम ऊतकों का निर्माण होता है। इसमें संवहन ऊतक के विभिन्न चरणों को दिखाया गया है, जिनमें फ्लोएम (Ph) और जाइलम (Xy) के विकास के साथ-साथ साथी कोशिकाएं (Companion Cell) और चालनी नलिकाएं (Sieve Tube) शामिल हैं। यह द्विबीजपत्री तने में द्वितीयक वृद्धि की प्रक्रिया को समझने में सहायक है। संवहन एधा वलय (vascular cambium ring) की कोशिकाएँ तने की परिधि के समानान्तर तल अर्थात् स्पर्शरेखीय तल (tangential plane) में ही विभाजित होती हैं। इस प्रकार प्रत्येक कोशिका के विभाजन से जो नई कोशिकाएँ बनती हैं उनमें से केवल एक जाइलम या फ्लोएम की कोशिका में रूपान्तरित हो जाती है, जबकि दूसरी कोशिका विभाजनशील (meristematic) बनी रहती है। परिधि की ओर बनने वाली कोशिकाएँ फ्लोएम के तत्त्वों में तथा केन्द्र की ओर बनने वाली कोशिकाएँ जाइलम के तत्त्वों में परिवद्धित हो जाती हैं। बाद में बनने वाला संवहन ऊतक क्रमशः द्वितीयक जाइलम (secondary xylem) तथा द्वितीयक फ्लोएम (secondary phloem) कहलाता है। ये संरचना तथा कार्य में प्राथमिक जाइलम तथा फ्लोएम के समान होते हैं।
कॉर्क एधा की क्रियाशीलता
संवहन एधा की क्रियाशीलता से बने द्वितीयक ऊतक पुराने ऊतकों पर दबाव डालते हैं जिसके कारण भीतरी (केन्द्र की ओर उपस्थित) प्राथमिक जाइलम अन्दर की ओर दब जाता है। इसके साथ ही परिधि की ओर स्थित प्राथमिक फ्लोएम नष्ट हो जाता है। इससे पहले कि बाह्य त्वचा (epidermis) की कोशिकाएँ एक निश्चित सीमा तक खिंचने के बाद टूट-फूट जाएँ, अधस्त्वचा (hypodermis) के अन्दर की कुछ मृदूतकीय कोशिकाएँ विभज्योतक (meristem) होकर कॉर्क एधा (cork cambium) बनाती हैं। कॉर्क एधा कभी-कभी वल्कुट, अन्तस्त्वचा, परिरम्भ (pericycle) आदि से बनती है। कॉर्क एधा तने की परिधि के समानान्तर विभाजित होकर बाहर की ओर सुबेरिनयुक्त (suberized) कॉर्क या फेलम (cork or phellem) का निर्माण करती है। यह तने के अन्दर के भीतरी ऊतकों की सुरक्षा करती है। कॉर्क एधा से केन्द्र की ओर बनने वाली मृदूतकीय (parenchymatous), स्थूलकोणीय अथवा दृढ़ोतकी कोशिकाएँ द्वितीयक वल्कुट (phelloderm) का निर्माण करती हैं। कॉर्क एधा से बने फेलम तथा फेलोडर्म को पेरीडर्म (periderm) कहते हैं। पेरीडर्म में स्थान-स्थान पर गैस विनिमय के लिए वातरन्ध्र (lenticels) बन जाते हैं। द्वितीयक जाइलम वसन्त काष्ठ तथा शरद् काष्ठ में भिन्नत होता है। इसके फलस्वरूप कुछ पौधों में स्पष्ट वार्षिक वलय बनते हैं।ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र द्विबीजपत्री तने की द्वितीयक वृद्धि की क्रमिक अवस्थाओं को दर्शाता है। इसमें तने के विभिन्न ऊतक जैसे एपिडर्मिस, हाइपोडर्मिस, एंडोडर्मिस, प्राथमिक फ्लोएम, प्राथमिक जाइलम, कॉर्टेक्स, मज्जा किरणें, अन्तरापूलीय कैम्बियम, अंतरापूलीय कैम्बियम, संवहन वलय, द्वितीयक फ्लोएम, द्वितीयक जाइलम और पेरीडर्म की स्थिति को विस्तार से समझाया गया है। यह छात्रों को द्विबीजपत्री तने की जटिल आंतरिक संरचना और उसके विकास को समझने में मदद करता है।In simple words: काष्ठीय एन्जियोस्पर्म के तने में द्वितीयक वृद्धि पार्श्व विभज्योतक (संवहन एधा और कॉर्क एधा) की गतिविधि से होती है, जिससे तने की मोटाई बढ़ती है। संवहन एधा द्वितीयक जाइलम और फ्लोएम बनाती है, जबकि कॉर्क एधा पेरिडर्म (कॉर्क, कॉर्क कैम्बियम और फेलोडर्म) बनाती है, जो सुरक्षा प्रदान करती है और वार्षिक वलयों का निर्माण करती है।
🎯 Exam Tip: द्वितीयक वृद्धि के प्रक्रम में संवहन एधा और कॉर्क एधा की भूमिका को विस्तार से समझाएँ। नामांकित चित्र के माध्यम से विभिन्न ऊतकों के निर्माण की प्रक्रिया स्पष्ट करें।
Question 4. निम्नलिखित में विभेद कीजिए
(अ) टैकीड तथा वाहिका
(ब) पैरेन्काइमा तथा कॉलेन्काइमा
(स) रसदारु तथा अन्तःकाष्ठ
(द) खुला तथा बन्द संवहन बण्डल ।
Answer:(अ) टैकीड तथा वाहिका में अन्तर
| क्र० सं० | वाहिनिकाएँ (Tracheids) | वाहिकाएँ (Vessels) |
|---|---|---|
| 1. | ये लम्बी, लिग्निनयुक्त (lignified), अपेक्षाकृत सँकरी कोशिकाएँ होती हैं। दोनों सिरों पर सँकरी तथा नुकीली (pointed) होती हैं। | ये लम्बी, लिग्निनयुक्त, अपेक्षाकृत चौड़ी कोशिकाएँ होती हैं। कोशिकाओं के चौड़े सिरे पूर्णतः या आंशिक रूप से जुड़े होने से ये नलिकाकार रचना बनाती हैं। |
| 2. | ये कोशिकाएँ सिरों से सिरों पर अन्य वाहिनिकाओं के साथ चिपकी रहती हैं। | अनेक कोशिकाएँ सिरों पर जुड़कर एक सतत संरचना का निर्माण कर, लेती हैं। कोशिकाएँ अलग-अलग नहीं की जा सकती हैं। |
| 3. | दो वाहिनिकाओं के सन्धितल पर गर्तर्मय (pitted) भित्तियाँ होती हैं। गर्तों से ही जल इत्यादि का संवहन होता है। | वाहिकाओं के मध्य अनुप्रस्थ भित्तियाँ नहीं होती हैं। अतः संवहन एक सिरे से दूसरे सिरे तक बिना किसी अवरोध के होता है। |
| 4. | संघ ट्रैकियोफाइटा के सभी सदस्यों में पाई जाती हैं। | ये केवल आवृतबीजी पौधों (angiosperms) में पाई जाती हैं। |
(ब) पैरेन्काइमा (मृदूतक) तथा कॉलेन्काइमा (स्थूलकोण ऊतक) में अन्तर
| क्र० सं० | मृदूतक (Parenchyma) | स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma) |
|---|---|---|
| 1. | यह एक सरल, स्थायी तथा जीवित कोशिकाओं से बना ऊतक है। | यह भी सरल, स्थायी तथा जीवित कोशिकाओं से बना ऊतक है। |
| 2. | कोशिकाओं की कोशिका भित्ति सेलुलोस से बनी होती है। जीवद्रव्य में प्रायः एक केन्द्रीय रिक्तिका (central vacuole) होती है। | कोशिकाओं की भित्ति सेलुलोस (cellulose) की बनी होती है। कोशिकाओं के कोनों पर अतिरिक्त सेलुलोस एकत्र हो जाने के कारण कोने स्थूलित हो जाते हैं। केन्द्रीय रिक्तिका होती है। |
| 3. | कोशिकाएँ समव्यासी (isodiametic) तथा विभिन्न आकारों की होती हैं। इनमें अन्तराकोशिकीय स्थान पाए जाते हैं। | कोशिकाएँ समव्यासी एवं कोणीय होती हैं। अन्तराकोशिकीय स्थान नहीं होते हैं। |
| 4. | कार्यिकी स्वरूप में सक्रिय होती हैं। विभिन्न प्रकार का कार्य करने के लिए अलग-अलग आकार में रूपान्तरित होती हैं। | कार्यिकी स्वरूप में प्रारम्भ में सक्रिय होती हैं और लचीली यान्त्रिक शक्ति प्रदान करती हैं। |
| 5. | भरण ऊतक के रूप में पौधे के सभी अंगों तथा स्थानों में पाई जाती है। | सामान्यतः द्विबीजपत्री तने की अधस्त्वचा (hypodermis) बनाती हैं। |
(स) रसदारु तथा अन्तःकाष्ठ में अन्तर
| क्र० सं० | रसकाष्ठ (Sapwood) | अन्तःकाष्ठ (Heartwood) |
|---|---|---|
| 1. | द्वितीयक जाइलम का परिधि की ओर स्थित हल्के रंग का भाग रसकाष्ठ कहलाता है। | द्वितीयक जाइलम के केन्द्र की ओर स्थित गहरे रंग का भाग अन्तःकाष्ठ या दृढ़काष्ठ कहलाता है। |
| 2. | रसकाष्ठ की वाहिकाओं में रेजिन, टेनिन, तेल, गोंद आदि का संचय नहीं होता। टाइलोसिस नहीं बनते। | अन्तःकाष्ठ की वाहिकाओं में टेनिन, रेजिन, तेल, गोंद एकत्र हो जाता है। वाहिकाओं में टाइलोसिस (tyloses) बन जाते हैं। |
| 3. | रसकाष्ठ की वाहिकाओं की गुहा अवरुद्ध नहीं होती। ये जल एवं खनिज पदार्थों का संवहन करती हैं। | अन्तःकाष्ठ की वाहिकाओं का मार्ग अवरुद्ध हो जाने के कारण ये जल तथा खनिज लवणों का संवहन नहीं करती। यह पौधे को यान्त्रिक आधार प्रदान करता है। |
(द) खुला तथा बन्द संवहन बण्डल में अन्तर
| क्र० सं० | खुला संवहन बण्डल (Open Vascular Bundle) | बन्द संवहन बण्डल (Closed Vascular Bundle) |
|---|---|---|
| 1. | संवहन बण्डल के जाइलम तथा फ्लोएम के मध्य एधा (कैम्बियम) कोशिकाओं की पट्टी पाई जाती है। | संवहन बण्डल के जाइलम तथा फ्लोएम के मध्य एधा (cambium) का अभाव होता है। |
| 2. | संवहन बण्डल संयुक्त, बहिःफ्लोएमी या उभय-फ्लोएमी होते हैं। | संवहन बण्डल संयुक्त, बहिःफ्लोएमी होते हैं। |
| 3. | ये द्विबीजपत्री तनों में पाए जाते हैं। | ये एकबीजपत्री तनों में,पाए जाते हैं। |
🎯 Exam Tip: विभेदीकरण वाले प्रश्नों के लिए, एक स्पष्ट तालिका प्रारूप का उपयोग करें। प्रत्येक बिंदु पर दोनों ऊतकों या संरचनाओं की विशेषताओं को तुलनात्मक रूप से प्रस्तुत करें।
Question 5. निम्नलिखित में शारीर के आधर पर अन्तर कीजिए
(अ) एकबीजपत्री मूल तथा द्विबीजपत्री मूल
(ब) एकबीजपत्री तना तथा द्विबीजपत्री तना।
Answer:(अ) एकबीजपत्री मूल तथा द्विबीजपत्री मूल में अन्तर
| क्र० सं० | ऊतक (Tissue) | एकबीजपत्री मूल (Monocot Root) | द्विबीजपत्री मूल (Dicot Root) |
|---|---|---|---|
| 1. | कॉर्टेक्स | स्तर कम मोटा होता है। | अपेक्षाकृत अधिक मोटा स्तर होता है। |
| 2. | अन्तस्त्वचा | कोशिकाएँ स्थूलित भित्तियों वाली होती हैं, इसीलिए मार्ग कोशिकाएँ स्पष्ट होती हैं। | प्रायः भित्तियाँ पतली होती हैं, केवल अधिक अरीय भित्तियों पर कैस्पेरियन पट्टियाँ होती हैं। अतः मार्ग कोशिकाएँ अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट नहीं होती हैं। |
| 3. | परिरम्भ | पार्श्व मूल बनाती हैं। | पार्श्व मूल बनाने के अतिरिक्त एधा तथा कॉर्क एधा बनाने में सहायता करती हैं। |
| 4. | संवहन बण्डल | (i) प्रायः 6 से अधिक होते हैं। (ii) जाइलम वाहिकाएँ गोलाकार या अण्डाकार तथा बड़ी गुहा वाली होती हैं। (iii) एधा नहीं बनती है। | (i) प्रायः 2 से 6 तक होते हैं। (ii) जाइलम वाहिकाएँ बहुभुजी तथा अपेक्षाकृत छोटी गुहा वाली होती हैं। (iii) द्वितीयक वृद्धि के समय एधा बनती है। |
| 5. | मज्जा | सुविकसित । | अल्पविकसित अथवा अनुपस्थित। |
(ब) एकबीजपत्री तना तथा द्विबीजपत्री तने में अन्तर
| क्र० सं० | ऊतक (Tissue) | एकबीजपत्री तना (Monocot Stem) | द्विबीजपत्री तना (Dicot Stem) |
|---|---|---|---|
| 1. | बाह्यत्वचा | अधिकतर रोमरहित होती है। | प्रायः रोमयुक्त होती है। |
| 2. | अधस्त्वचा | दृढ़ोतक (sclerenchyma) से बनी होती है। | स्थूलकोण ऊतक (collenchyma) से बनी होती है। |
| 3. | वल्कुट | विभेदित नहीं होता है। | मृदूतक का बना होता है। |
| 4. | अन्तस्त्वचा | अनुपस्थित होती है। | सामान्यतया स्पष्ट होती है। |
| 5. | परिरम्भ | सामान्य रूप से अनुपस्थित होती है। | दृढ़ोतक और मृदूतक की बनी होती है। |
| 6. | संवहन बण्डल | (i) भरण ऊतक में बिखरे रहते हैं। (ii) सदैव अवर्धी होते हैं। | (i) चारों ओर एक या अधिक चक्रों में विन्यसित होते हैं। (ii) सदैव वर्धी होते हैं। |
| (अ) बण्डल आच्छद | (iii) प्रत्येक पूल के चारों ओर दृढ़ोतकी बण्डल आच्छदहोता है। | (iii) अभाव होता है। | |
| (ब) जाइलम | (iv) वाहिकाएँ 'V' या 'Y' आकार में विन्यसित होती हैं। | (iv) वाहिकाएँ अरीय पंक्तियों में विन्यसित होती हैं। | |
| (स) फ्लोएम | (v) 'V' आकार के जाइलम केमध्य स्थित। (vi) फ्लोएम में मृदूतक का अभाव होता है। | (v) जाइलम के बाहर अथवा दोनों ओर होता है। (vi) फ्लोएम में मृदूतक होता है। | |
| 7. | मज्जा रश्मि | नहीं होती हैं। | मृदूतक से बनी होती हैं। |
| 8. | मज्जा | स्पष्ट नहीं होता, फिर भी केन्द्र में कभी-कभी कोशिकाएँ विघटित होकर मज्जा गुहा बनाती हैं। | स्पष्ट होता है, कभी-कभी कोशिकाएँ विघटित होकर मज्जा गुहा बनाती हैं। |
| 9. | द्वितीयक वृद्धि | द्वितीयक वृद्धि नहीं होती है। | सामान्यतया द्वितीयक वृद्धि होती है। |
🎯 Exam Tip: इन तुलनात्मक प्रश्नों के लिए, प्रमुख शारीरिक विशेषताओं पर ध्यान दें जो एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री पौधों को अलग करती हैं, जैसे कि संवहन बंडल की व्यवस्था, द्वितीयक वृद्धि की उपस्थिति और मज्जा की संरचना।
Question 6. आप एक शैशव तने की अनुप्रस्थं काट का सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन कीजिए। आप कैसे पता करेंगे कि यह एकबीजपत्री तना है अथवा द्विबीजपत्री तना है? इसके कारण बताइए।
Answer: शैशव तने की अनुप्रस्थ काट का सूक्ष्मदर्शीय अवलोकन करके निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर एकबीजपत्री या द्विबीजपत्री तने की पहचान करते हैं
(क) तने के आन्तरिक आकारिकी लक्षण
1. बाह्य त्वचा पर उपचर्म (cuticle), रन्ध्र (stomata) तथा बहुकोशीय रोम पाए जाते हैं। 2. अधस्त्वचा (hypodermis) उपस्थित होती है। 3. अन्तस्त्वचा प्रायः अनुपस्थित या अल्पविकसित होती है। 4. परिरम्भ (pericycle) प्रायः बहुस्तरीय होता है। 5. संवहन बण्डल संयुक्त (conjoint), बहिःफ्लोएमी (collateral) या उभयफ्लोएमी (bicollateral) होते हैं। 6. प्रोटोजाइलम एण्डार्क (endarch) होता है।(ख) एकबीजपत्री तने के आन्तरिक आकारिकी लक्षण
1. बाह्यत्वचा पर बहुकोशिकीय रोम अनुपस्थित होते हैं। 2. अधस्त्वचा दृढ़ोतक (sclerenchymatous) होती है। 3. भरण ऊतक (ground tissue) वल्कुट, अन्तस्त्वचा, परिरम्भ तथा मज्जा में अविभेदित होता है। 4. संवहन बण्डल भरण ऊतक में बिखरे रहते हैं। 5. संवहन बण्डल संयुक्त, बहिःफ्लोएमी तथा अवर्थी (closed) होते हैं। 6. संवहन बण्डल चारों ओर से दृढ़ोतक से बनी बण्डल अच्छद से घिरे होते हैं। 7. जाइलम वाहिकाएँ (vessels) 'V' या 'Y' क्रम में व्यवस्थित रहती हैं।द्विबीजपत्री तने के आन्तरिक आकारिकी लक्षण
1. बाह्य त्वचा पर बहुकोशिकीय रोम पाए जाते हैं। 2. अधस्त्वचा (hypodermis) स्थूलकोण ऊतक से बनी होती है। 3. संवहन बण्डल एक या दो घेरों में व्यवस्थित होते हैं। 4. भरण ऊतक वल्कुट, अन्तस्त्वचा, परिरम्भ, मज्जा तथा मज्जा रश्मियों में विभेदित होता है। 5. संवहन बण्डल संयुक्त, बहिःफ्लोएमी या उभयफ्लोएमी और वर्धा (open) होते हैं। 6. जाइलम वाहिकाएँ रेखीय (linear) क्रम में व्यवस्थित होती हैं।In simple words: एक शैशव तने को सूक्ष्मदर्शी से पहचानने के लिए एकबीजपत्री तने में बिखरे हुए संवहन बंडल, दृढ़ोतकी अधस्त्वचा, और द्वितीयक वृद्धि की अनुपस्थिति देखी जाती है। इसके विपरीत, द्विबीजपत्री तने में संवहन बंडल एक वलय में व्यवस्थित होते हैं, स्थूलकोण अधस्त्वचा होती है, और द्वितीयक वृद्धि होती है।🎯 Exam Tip: एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री तने की पहचान के लिए मुख्य शारीरिक विशेषताओं (जैसे संवहन बंडल की व्यवस्था, अधस्त्वचा का प्रकार, और रोमों की उपस्थिति) को याद रखें।
Question 7. सूक्ष्मदर्शी, किसी पौधे के भाग की अनुप्रस्थ काट में निम्नलिखित शारीर रचनाएँ दिखाती है
(अ) संवहन बण्डल संयुक्त, फैले हुए तथा उसके चारों ओर स्क्लेरेन्काइमी आच्छद हैं।
(ब) फ्लोएम पैरेन्काइमा नहीं है।
आप कैसे पहचानोगे कि यह किसका है?
Answer: एकबीजपत्री तने की आन्तरिक आकारिकी या शारीर में संवहन बण्डल भरण ऊतक में बिखरे रहते हैं। संवहन बण्डल संयुक्त तथा अवर्थी होते हैं। संवहन बण्डल के चारों ओर स्क्लेरेन्काइमी बण्डल आच्छद (bundle sheath) होती है। फ्लोएम में फ्लोएम मृदूतक का अभाव होता है। अतः सूक्ष्मदर्शी में प्रदर्शित पौधे का भाग एकबीजपत्री तना है।In simple words: यदि किसी पौधे के भाग में बिखरे हुए संवहन बंडल (बंडल आच्छद से घिरे) हों और फ्लोएम पैरेंकाइमा अनुपस्थित हो, तो यह एकबीजपत्री तने की विशिष्ट पहचान है।
🎯 Exam Tip: एकबीजपत्री तने की पहचान के लिए स्क्लेरेन्काइमी बंडल आच्छद और फ्लोएम पैरेंकाइमा की अनुपस्थिति जैसे विशिष्ट लक्षणों पर ध्यान दें।
Question 8. जाइलम तथा फ्लोएम को जटिल ऊतक क्यों कहते हैं?
Answer: जाइलम तथा फ्लोएम को जटिल ऊतक इसलिए कहते हैं क्योंकि ये एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बनते हैं। सभी कोशिकाएँ मिलकर एक इकाई के रूप में विभाजित होकर कार्य करती हैं।In simple words: जाइलम और फ्लोएम जटिल ऊतक कहलाते हैं क्योंकि वे विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं (जैसे वाहिकाएं, वाहिनिकाएं, फाइबर और पैरेंकाइमा) से बने होते हैं, जो सभी मिलकर विशिष्ट कार्य करते हैं।
🎯 Exam Tip: जटिल ऊतक की परिभाषा दें और समझाएँ कि जाइलम व फ्लोएम विभिन्न कोशिकाओं से मिलकर कैसे विशिष्ट कार्य करते हैं।
Question 9. रन्ध्रीतन्त्र क्या है? रन्ध्र की रचना का वर्णन करो और इसका नामांकित चित्र भी बनाओ।
Answer: रन्ध्र (Stomata) ऐसी रचनाएँ हैं, जो पत्तियों की बाह्यत्वचा पर पाये जाते हैं। रन्ध्र वाष्पोत्सर्जन तथा गैसों के विनिमय को नियमित करते हैं। प्रत्येक रन्ध्र (stoma - एकवचन) में सेम के आकार की दो कोशिकाएँ होती हैं जिन्हें द्वार कोशिकाएँ (guard cells) कहते हैं। एकबीजपत्री पौधों में द्वार कोशिकाएँ डम्बलाकार होती हैं। द्वार कोशिका की बाहरी भित्ति पतली तथा आन्तरिक भित्ति मोटी होती है। द्वार कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट होता है और यह रन्ध्र के खुलने तथा बंद होने के क्रम को नियमित करता है। कभी-कभी कुछ बाह्यत्वचीय कोशिकाएँ भी रन्ध्र के साथ लगी रहती हैं, इन्हें उप कोशिकाएँ (accessory cells) कहते हैं। रन्ध्रीय छिद्र, द्वारकोशिका तथा सहायक कोशिकाएँ मिलकर रन्ध्री तन्त्र (stomatal system) का निर्माण करती हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र रन्ध्री तंत्र को दर्शाता है, जिसमें सेम के आकार वाली द्वार कोशिकाओं (Guard cells) के साथ रन्ध्र (A) और डम्बलाकार द्वार कोशिकाओं के साथ रन्ध्र (B) शामिल हैं। इसमें क्लोरोप्लास्ट और सहायक कोशिकाओं (Accessory cells) की स्थिति भी दिखाई गई है, जो वाष्पोत्सर्जन और गैस विनिमय को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह छात्रों को रन्ध्र की संरचना और उसके कार्यों को समझने में मदद करता है।In simple words: रन्ध्री तंत्र पत्तियों की सतह पर स्थित छोटे छिद्र होते हैं जो गैस विनिमय और वाष्पोत्सर्जन को नियंत्रित करते हैं। प्रत्येक रंध्र दो द्वार कोशिकाओं से घिरा होता है, जिनकी आकृति द्विबीजपत्री में सेम के आकार की और एकबीजपत्री में डंबलाकार होती है, साथ ही सहायक कोशिकाएं भी होती हैं।
🎯 Exam Tip: रन्ध्री तंत्र के घटकों (द्वार कोशिकाएँ, सहायक कोशिकाएँ) और उनके कार्यों को स्पष्ट रूप से समझाएँ। विभिन्न प्रकार की द्वार कोशिकाओं (सेम-आकार/डम्बलाकार) का उल्लेख करें।
Question 10. पुष्पी पादपों में तीन मूलभूत ऊतक तंत्र बताओ। प्रत्येक तंत्र के ऊतक बताओ ।
Answer: पुष्पी पादपों में तीन मूलभूत ऊतक तंत्र निम्नवत् हैं
1. बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र-मृदूतक ।
2. भरण ऊतक तंत्र-पेरेनकाइमा, कोलेनकाइमा तथा स्क्लेरेनकाइमा ।
3. संवहन ऊतक तंत्र-जाइलम तथा फ्लोएम ।In simple words: पुष्पी पादपों में तीन मूलभूत ऊतक तंत्र होते हैं: बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र (मृदूतक), भरण ऊतक तंत्र (पैरेंकाइमा, कॉलेन्काइमा, स्क्लेरेन्काइमा), और संवहन ऊतक तंत्र (जाइलम व फ्लोएम)।
🎯 Exam Tip: प्रत्येक ऊतक तंत्र का नाम और उसमें शामिल मुख्य ऊतकों को सूचीबद्ध करें। यह मौलिक पादप शरीर रचना का आधार है।
Question 11. पादप शारीर का अध्ययन हमारे लिए कैसे उपयोगी है?
Answer: फार्माकोचोसी (Pharmaconosy) विज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत औषधीय महत्त्व के पदार्थों के स्रोत, विशेषताओं और उनके उपयोग का अध्ययन प्राकृतिक अवस्था में किया जाता है। यह अध्ययन मुख्य रूप से पौधों के शारीर (anatomy) पर निर्भर करता है। इमारती लकड़ी (timber) की दिन-प्रतिदिन कमी होती जा रही है, इसीलिए अच्छी इमारती लकड़ीके स्थान पर खराब इमारती लकड़ी का उपयोग किया जा रहा है। शारीर अध्ययन द्वारा लकड़ी की किस्म (quality) का पता लगाया जा सकता है। शारीर अध्ययन द्वारा एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री तने और जड़ की पहचान की जा सकती है। जीवाश्म शारीर (fossil anatomy) अध्ययन द्वारा प्राचीनकालीन पौधों का ज्ञान होता है। इससे जैवविकास का ज्ञान होता है कि आधुनिक पौधों की उत्पत्ति किस प्रकार हुई है। सूक्ष्मदर्शीय अध्ययन द्वारा चाय, कॉफी, तम्बाकू, केसर, हींग, वनस्पति रंगों, पादप औषधियों में मिलावट (adulteration) का अध्ययन किया जा सकता है। मिलावट के कारण इनकी आन्तरिक संरचना में भिन्नता आ जाती है।In simple words: पादप शारीर का अध्ययन औषधीय पौधों की पहचान, लकड़ी की गुणवत्ता निर्धारण, एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री पौधों के अंतर, जैवविकास को समझने और खाद्य पदार्थों में मिलावट का पता लगाने में उपयोगी है।
🎯 Exam Tip: पादप शारीर के अध्ययन के विभिन्न व्यावहारिक उपयोगों को स्पष्ट बिंदुओं में प्रस्तुत करें, जैसे आर्थिक महत्व और वैज्ञानिक अनुसंधान।
Question 12. परिचर्म क्या है? द्विबीजपत्री तने में परिचर्म कैसे बनता है?
Answer: परिचर्म (Periderm) : कॉर्क एधा की जीवित मृदूतक कोशिका से परिचर्म का निर्माण होता है। कॉर्क एधा या कागजन (cork cambium or phellogen) की कोशिकाएँ विभाजित होकर परिधि की ओर जो कोशिकाएँ बनाती हैं, वे सुबेरिनयुक्त (suberinized) कोशिकाएँ होती हैं। सुबेरिनयुक्त कोशिकाओं से बना यह स्तर कॉर्क या फेलम (cork or phellem) कहलाता है। कॉर्क एधा (cork cambium) से भीतर की ओर बनने वाली मृदूतकीय कोशिकाएँ द्वितीयक वल्कुट या फेलोडर्म (phelloderm) बनाती हैं। फेलम (कॉर्क), कॉर्क एधा तथा द्वितीयक वल्कुट मिलकर परिचर्म (periderm) बनाती हैं।In simple words: परिचर्म, द्विबीजपत्री तने में कॉर्क एधा की गतिविधि से बनने वाला एक सुरक्षात्मक आवरण है। कॉर्क एधा बाहर की ओर कॉर्क (फेलम) और भीतर की ओर द्वितीयक वल्कुट (फेलोडर्म) बनाती है, और ये तीनों मिलकर परिचर्म का निर्माण करते हैं।
🎯 Exam Tip: परिचर्म के तीनों घटकों (फेलम, फेलोडर्म, फेलोज़ेन) को उनके कार्यों के साथ परिभाषित करें। कॉर्क एधा की भूमिका और द्वितीयक वृद्धि में इसके योगदान पर जोर दें।
Question 13. पृष्ठाधर पत्ती की भीतरी रचना का वर्णन चिह्नित चित्रों की सहायता से कीजिए।
Answer:
पृष्ठाधर या द्विबीजपत्री पत्ती की संरचना
द्विबीजपत्री पौधों की पत्ती की अनुप्रस्थ काट में निम्नलिखित संरचनाएँ दिखाई देती हैं (क)बाह्यत्वचा (Epidermis)
: बाह्यत्वचा सामान्यतः दोनों सतहों पर एककोशिकीय मोटे स्तर के रूप में होती है। (i) ऊपरी बाह्यत्वचा : यह एक कोशिका मोटा स्तर है। इसकी कोशिकाएँ ढोलकनुमा परस्पर एक-दूसरे से सटी हुई होती हैं। इन कोशिकाओं की बाहरी भित्ति उपचर्म-युक्त होती है। कोशिकाओं में साधारणतः हरितलवक नहीं होते हैं। कुछ पौधों (प्रायः शुष्क स्थानों में उगने वाले पौधों में) में बहुस्तरीय बाह्यत्वचा (multiple epidermis) पाई जाती हैं। (ii) निचली बाह्यत्वचा : निचली बाह्यत्वचा एक कोशिका मोटे स्तर रूप में पाई जाती है। इस पर पतला उपचर्म होता है। रन्ध्र बहुतायत में पाए जाते हैं। रन्ध्रों की रक्षक कोशिकाओं में हरितलवक पाए जाते हैं। कुछ पत्तियों की ऊपरी बाह्यत्वचा पर भी रन्ध्र होते हैं, किन्तु इनकी संख्या सदैव कम होती है। (ख)पर्णमध्योतक (Mesophyll)
: दोनों बाह्यत्वचाओं के मध्य स्थित सम्पूर्ण ऊतक (संवहन बण्डलों को छोड़कर) पर्णमध्योतक कहलाता है। पृष्ठाधर पत्तियों में पर्णमध्योतक दो प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बनता है (i) खम्भ ऊतक (Palisade tissue) : ऊपरी बाह्यत्वचा के नीचे लम्बी, खम्भाकार कोशिकाएँ दो-तीन पर्यो में लगी होती हैं। इन कोशिकाओं के मध्य अन्तराकोशिकीय स्थान बहुत कम या नहीं होते हैं। ये रूपान्तरित मृदूतकीय कोशिकाएँ होती हैं। यह प्रकाश संश्लेषी (photosynthetic) ऊतक है।ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक प्रारूपिक पृष्ठाधर पत्ती की अनुप्रस्थ काट को दर्शाता है, जो सामान्यतः द्विबीजपत्री पौधों में पाई जाती है। इसमें ऊपरी एपिडर्मिस, क्यूटिकल, जाइलम, फ्लोएम, बंडल शीथ, पालीसेड टिश्यू, स्पंजी पैरेंकाइमा, निचली एपिडर्मिस, सबस्टोमाटल कैविटी और स्टोमा जैसी विभिन्न संरचनाएं शामिल हैं। यह पत्ती की आंतरिक संरचना को समझने में सहायता करता है, जो प्रकाश संश्लेषण के लिए अनुकूलित होती है। (ii) स्पंजी ऊतक (Spongy tissue) : खम्भ मृदूतक से लेकर निचली बाह्यत्वचा तक स्पंजी मृदूतक ही होता है। ये कोशिकाएँ सामान्यतः गोल और ढीली व्यवस्था में अर्थात् काफी और स्पष्ट अन्तराकोशिकीय स्थान वाली होती हैं। इन कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट्स कम संख्या में होते हैं। मध्य शिरा में संवहन पूल के ऊपर तथा नीचे दृढ़ोतक या स्थूलकोण ऊतक पाया जाता है। (ग)
संवहन पूल (Vascular bundles)
: पत्ती की अनुप्रस्थ काट में अनेक छोटी-छोटी शिराएँ संवहन पूलों के रूप में दिखाई पड़ती हैं। संवहन पूल जाइलम और फ्लोएम के मिलने से बनता है। आदिदारु (protoxylem) सदैव ऊपरी बाह्यत्वचा की ओर होती है, जबकि अनुदारु (metaxylem) निचली बाह्यत्वचा की ओर होता है। फ्लोएम निचली बाह्यत्वचा की ओर होता है। जाइलम और फ्लोएम के मध्य एधा (cambium) होती है। इस प्रकार संवहन पूल संयुक्त (conjoint), समपार्श्व (collateral) तथा वध (open) होते हैं। प्रत्येक संवहन पूल दृढ़ोतक रेशों से घिरा होता है तथा इसके बाहर मृदूतकीय कोशिकाओं का पूलीय आच्छद होता है। यह बण्डल आच्छद सामान्यतः छोटी-से-छोटी शिरा के चारों ओर भी होता है।In simple words: पृष्ठाधर पत्ती में ऊपरी और निचली बाह्यत्वचा होती है, जिसमें निचली सतह पर अधिक रंध्र होते हैं। पर्णमध्योतक खम्भ ऊतक (ऊपरी, प्रकाश संश्लेषी) और स्पंजी ऊतक (नीचे, वायु स्थान युक्त) में विभेदित होता है। संवहन पूल (जाइलम और फ्लोएम) पत्तियों की शिराओं में होते हैं, जो पोषक तत्वों का परिवहन करते हैं।🎯 Exam Tip: पृष्ठाधर पत्ती की आंतरिक संरचना (बाह्यत्वचा, पर्णमध्योतक, संवहन पूल) का वर्णन करते समय, प्रत्येक घटक की विशिष्ट विशेषताओं और कार्यों पर ध्यान दें। चित्रों के माध्यम से स्पष्टीकरण सहायक होगा।
Question 14. त्वक् कोशिकाओं की रचना तथा स्थिति उन्हें किस प्रकार विशिष्ट कार्य करने में सहायता करती है?
Answer:
त्वक कोशिकाएँ
ये पादप शरीर के सभी भागों पर सबसे बाहरी रक्षात्मक आवरण बनाती हैं। यह प्रायः एक कोशिका मोटा स्तर होता है। कोशिकाएँ अनुप्रस्थ काट में ढोलकनुमा (barrel shaped) दिखाई देती हैं। बाहर से देखने पर ये अनियमित आकार की फर्श के टाइल्स की तरह अथवा बहुभुजीय दिखाई देती हैं। ये परस्पर एक-दूसरे से मिलकर अखण्ड सतह बनाती हैं। ये कोशिकाएँ मृदूतकीय कोशिकाओं का रूपान्तरण होती हैं। इन कोशिकाओं में कोशिकाद्रव्य की मात्रा बहुत कम होती है तथा प्रत्येककोशिका में एक बड़ी रिक्तिका होती है। पौधे के वायवीय भागों की त्वक् कोशिकाएँ उपचर्म (cuticle) से ढकी होती हैं, परन्तु मूलीय त्वचा की कोशिकाओं पर उपचर्म की रक्षात्मक आवरण नहीं होता। तने, पत्ती आदि की त्वक् कोशिकाओं के मध्य रन्ध्र (stomata) पाए जाते हैं। रन्ध्र द्वार कोशिकाओं (guard cells) से घिरे होते हैं । द्वार कोशिकाएँ वृक्काकार होती हैं। द्वार कोशिकाओं के चारों ओर पाई जाने वाली कोशिकाओं को सहायक कोशिकाएँ कहते हैं। रन्ध्रों का खुलना तथा बन्द होना रक्षक कोशिकाओं की आशूनता पर निर्भर करता है। रन्ध्र वाष्पोत्सर्जन तथा गैसों के आदान प्रदान का कार्य करते हैं। रन्ध्रों की स्थिति, संख्या, संरचना, उपचर्म की मोटाई आदि वाष्पोत्सर्जन की दर को प्रभावित करती है। जड़ों की त्वक कोशिकाओं से एककोशिकीय मूलरोम बनते हैं। ये मृदा से जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं। तने और पत्तियों की त्वक्को शिकाओं से बहुकोशिकीय रोम बनते हैं। पत्ती एवं तने की रोमयुक्त सतह वाष्पोत्सर्जन की दर को नियन्त्रित करने में सहायक होती है। रन्ध्रों के रोमों से ढके रहने के कारण मरुभिद् पौधों में वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है। त्वक् कोशिकाएँ वातावरणीय दुष्प्रभावों से पौधों की सुरक्षा करती हैं।In simple words: त्वक् कोशिकाएँ पौधे की सबसे बाहरी परत बनाती हैं, जो उपचर्म (क्यूटिकल) से ढकी होती हैं (जड़ों को छोड़कर)। इनकी विशिष्ट संरचना जैसे रंध्र और मूलरोम, इन्हें गैस विनिमय, वाष्पोत्सर्जन नियंत्रण, जल और खनिज अवशोषण, तथा पौधे को बाहरी सुरक्षा प्रदान करने में सहायता करती है।🎯 Exam Tip: त्वक् कोशिकाओं की विभिन्न संरचनाओं (उपचर्म, रंध्र, मूलरोम) और उनके विशिष्ट कार्यों पर ध्यान दें। इनके अनुकूलन को स्पष्ट करें।
परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. निम्नलिखित में से किस पादप के फ्लोएम में सह कोशिकाएँ नहीं होती हैं?
(क) साइकस
(ख) नीम
(ग) आम
(घ) सागौन
Answer: (क) साइकसIn simple words: जिम्नोस्पर्म, जैसे साइकस, के फ्लोएम में सह कोशिकाएँ अनुपस्थित होती हैं, जबकि एंजियोस्पर्म में ये मौजूद होती हैं।
🎯 Exam Tip: जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म के बीच फ्लोएम की संरचनात्मक भिन्नताओं को याद रखें, विशेषकर सह कोशिकाओं की उपस्थिति या अनुपस्थिति।
Question 2. निम्नलिखित में से किसकी दारू में वाहिकाएँ नहीं होती हैं?
(क) साइकस
(ख) आम
(ग) नीम
(घ) सागौन
Answer: (क) साइकसIn simple words: साइकस, जो एक जिम्नोस्पर्म है, के जाइलम में वाहिकाएँ (vessels) अनुपस्थित होती हैं; इनमें मुख्य रूप से वाहिनिकाएँ (tracheids) ही पाई जाती हैं।
🎯 Exam Tip: जिम्नोस्पर्म के जाइलम में वाहिकाओं की अनुपस्थिति एक महत्वपूर्ण विशेषता है जो उन्हें एंजियोस्पर्म से अलग करती है।
Question 3. उस पादप का नाम क्या है जिसमें सिस्टोलिथ पायी जाती है?
(क) फाइकस
(ख) मेज
(ग) आम
(घ) सागौन
Answer: (क) फाइकसIn simple words: फाइकस (पीपल या बरगद) जैसे पौधों में विशेष कैल्शियम कार्बोनेट के क्रिस्टल होते हैं जिन्हें सिस्टोलिथ कहते हैं, जो उपत्वचा कोशिकाओं में पाए जाते हैं।
🎯 Exam Tip: सिस्टोलिथ और उनके पाए जाने वाले पौधों के उदाहरणों को याद रखें, क्योंकि यह विशिष्ट संरचना है।
Question 4. वाहिकाएँ तथा सखी कोशिकाएँ किसमें अनुपस्थित रहती हैं?
(क) इफेड्रा
(ख) साइकस
(ग) सूरजमुखी
(घ) आम
Answer: (ख) साइकस ।In simple words: साइकस (एक जिम्नोस्पर्म) में जाइलम में वाहिकाएँ और फ्लोएम में सखी कोशिकाएँ दोनों नहीं पाई जाती हैं।
🎯 Exam Tip: जिम्नोस्पर्म की शारीरिक विशेषताओं को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर वाहिकाओं और सखी कोशिकाओं की अनुपस्थिति, जो उन्हें एंजियोस्पर्म से अलग करती है।
Question 5. मध्यादिदारूक आदिदारू पाया जाता है।
(क) सरसों की जड़ में
(ख) सरसों के तने में
(ग) टेरिस के राइजोम में
(घ) साइकस की कोरेलायड जड़ों में
Answer: (ख) सरसों के तने मेंIn simple words: मध्यादिदारूक आदिदारू (endarch protoxylem) तब होता है जब प्रोटोज़ाइलम केंद्र की ओर होता है और मेटाज़ाइलम परिधि की ओर, जो आमतौर पर सरसों जैसे द्विबीजपत्री तने में पाया जाता है।
🎯 Exam Tip: आदिदारू (protoxylem) और अनुदारू (metaxylem) की स्थिति के आधार पर विभिन्न प्रकार के जाइलम (endarch, exarch, mesarch) को समझें। तने और जड़ में उनके विशिष्ट स्थान को याद रखें।
Question 6. कैस्पेरियन पट्टी पायी जाती हैं।
(क) बाह्य त्वचा में
(ख) अधत्वचा में
(ग) अन्तस्त्वचा में
(घ) फ्लोयम में
Answer: (ग) अन्तस्त्वचा में ।In simple words: कैस्पेरियन पट्टी अन्तस्त्वचा की अरीय और आंतरिक भित्तियों पर सुबेरिन के जमाव से बनती है, जो जल और खनिजों के परिवहन को नियंत्रित करती है।
🎯 Exam Tip: कैस्पेरियन पट्टियाँ अंतस्त्वचा की एक विशिष्ट विशेषता हैं और पौधों में जल एवं खनिज के संवहन को विनियमित करने में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण है।
Question 7. रबर की पत्ती में पाये जाने वाले कैल्सियम कार्बोनेट के क्रिस्टल को कहते हैं।
(क) रैफाइड्स
(ख) सिस्टोलिथ
(ग) स्फीरैफाइड्स
(घ) इनमें से कोई नहीं
Answer: (क) रैफाइड्सIn simple words: रैफाइड्स सुई के आकार के कैल्शियम ऑक्सालेट क्रिस्टल होते हैं जो कुछ पौधों की पत्तियों में पाए जाते हैं, जैसे रबर के पौधे।
🎯 Exam Tip: विभिन्न प्रकार के कैल्शियम क्रिस्टल (सिस्टोलिथ, रैफाइड्स, स्फीरैफाइड्स) और उनके पाए जाने वाले पौधों के उदाहरणों को याद रखें।
Question 8. संयुक्त, उभयफ्लोएमी और खुले संवहन बण्डले पाये जाते हैं।
(क) मक्का के तने में
(ख) सभी द्विबीजपत्री तनों में
(ग) कुकुरबिटा में
(घ) जड़ों में
Answer: (ग) कुकुरबिटा मेंIn simple words: कुकुरबिटा (लौकी, कद्दू) जैसे पौधों में संयुक्त, उभयफ्लोएमी (दोनों ओर फ्लोएम) और खुले (कैम्बियम सहित) संवहन बंडल पाए जाते हैं।
🎯 Exam Tip: संवहन बंडलों के विभिन्न प्रकारों (संयुक्त, अरीय, खुला, बंद, उभयफ्लोएमी) और उनके विशिष्ट उदाहरणों को याद रखें।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. पाश्र्व विभज्योतक का एक उदाहरण दीजिए।
Answer: एधा (cambium)।In simple words: कैम्बियम (संवहन एधा और कॉर्क एधा) पार्श्व विभज्योतक का एक उदाहरण है जो पौधे की चौड़ाई में वृद्धि करता है।
🎯 Exam Tip: पार्श्व विभज्योतक के प्रमुख उदाहरणों में कैम्बियम को याद रखें, जो द्वितीयक वृद्धि में महत्वपूर्ण है।
Question 2. "वल्कुट की सबसे भीतरी परत का नाम लिखिए।
Answer: अन्तस्त्वचा (endodermis)।In simple words: कॉर्टेक्स की सबसे भीतरी परत को अन्तस्त्वचा कहते हैं, जो संवहन ऊतक को वल्कुट से अलग करती है।
🎯 Exam Tip: पादप ऊतक प्रणालियों में विभिन्न परतों के नाम और उनकी स्थिति को सटीक रूप से जानें।
Question 3. उस जीवित ऊतक का नाम बताइए जो प्रमुखतः शाकीय पौधों में यान्त्रिक शक्ति प्रदान करता है।
Answer: शाकीय पौधों में यान्त्रिक शक्ति प्रदान करने वाला प्रमुख जीवित ऊतक अधः स्तरीय भाग में (in hypodermal part) स्थूल कोण ऊतक (collenchyma) होता है।In simple words: स्थूलकोण ऊतक (कॉलेन्काइमा) शाकीय पौधों के अधस्त्वचीय भाग में पाया जाने वाला एक जीवित ऊतक है जो उन्हें लचीली यांत्रिक शक्ति प्रदान करता है।
🎯 Exam Tip: पौधों में यांत्रिक सहायता प्रदान करने वाले विभिन्न ऊतकों (कॉलेन्काइमा, स्क्लेरेन्काइमा) और उनकी विशेषताओं को समझें।
Question 4. जड़ों में पाये जाने वाले संवहन बण्डलों के लक्षण लिखिए।
Answer: जड़ों में अरीय संवहन बण्डल पाये जाते हैं। इस प्रकार के संवहन बण्डलों में जाइलम और फ्लोएम अलग-अलग त्रिज्याओं पर होते हैं। इनमें जाइलम सदैव बाह्यआदिदारुक मिलता है अर्थात् आदिदारु परिधि की ओर तथा अनुदारु केन्द्र की ओर होता है। इन संवहन बण्डलों में प्राथमिक एधा नहीं पायी जाती । द्विबीजपत्री जड़ों में माइलम तथा फ्लोएम के मध्य बाद में, द्वितीयक एधा बन जाती है।In simple words: जड़ों में अरीय संवहन बंडल होते हैं, जहाँ जाइलम और फ्लोएम अलग-अलग त्रिज्याओं पर व्यवस्थित होते हैं। जाइलम बाह्यआदिदारुक (exarch) होता है, और द्विबीजपत्री जड़ों में बाद में द्वितीयक एधा बन सकती है।
🎯 Exam Tip: जड़ के संवहन बंडल की अरीय व्यवस्था और बाह्यआदिदारुक (exarch) स्थिति को याद रखें, साथ ही द्वितीयक एधा के निर्माण की संभावना पर भी ध्यान दें।
Question 5. उस पौधे का नाम लिखिए जिसमें उभय फ्लोएमी संवहन बण्डल (पूल) पाये जाते हैं।
Answer: आवृतबीजी पौधों के कुल कुकुरबिटेसी के पौधों जैसे काशीफल (Cucurbita maxima) आदि में उभय फ्लोएमी (bicollateral) संवहन पूल पाये जाते हैं।In simple words: काशीफल (कुकुरबिटा) जैसे पौधों में उभय फ्लोएमी संवहन बंडल होते हैं, जिसमें जाइलम के दोनों ओर फ्लोएम होता है।
🎯 Exam Tip: उभयफ्लोएमी संवहन बंडल की विशेषता और उसके उदाहरण को याद रखें।
Question 6. विरल दारुक तथा सघन दारुक काष्ठ में अन्तर बताइए ।
Answer:
विरल दारुक (manoxylic) काष्ठ
: साइकस में द्वितीयक जाइलम वलयों के मध्य मृदुतक कोशिकाओं के समूह पाये जाते हैं क्योंकि इसमें द्वितीयक वृद्धि के लिए हर वर्ष नयी एधा वलय बनती है। सघन दारुक (pycnoxylic) काष्ठ- आवृतबीजी तथा अधिकांश अनावृतबीजी पौधों में एधा वलय जीवनपर्यन्त क्रियाशील रहती है। इससे केन्द्र की ओर द्वितीयक जाइलम तथा परिधि की ओर द्वितीयक फ्लोएम बनता रहता है।In simple words: विरल दारुक काष्ठ (मैनोक्सीलिक) में मृदूतकीय कोशिकाएँ अधिक होती हैं और यह साइकस में पाया जाता है, जबकि सघन दारुक काष्ठ (पिक्नोक्सीलिक) अधिक मजबूत होता है जिसमें एधा जीवनपर्यन्त सक्रिय रहती है और यह अधिकांश आवृतबीजी पौधों में मिलता है।🎯 Exam Tip: विरल दारुक और सघन दारुक काष्ठ के बीच उनके घटकों, कठोरता और पाए जाने वाले पौधों के उदाहरणों के आधार पर अंतर स्पष्ट करें।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. ट्यूनिका कॉर्पस थ्योरी पर टिप्पणी लिखिए ।
Answer: सन् 1924 में शिमिट (Schmidt) ने अग्रस्थ वर्षी प्रदेशों (apical growing regions) के लिए ट्यूनिका कॉर्पस (tunica corpus) की विचारधारा प्रस्तुत की। इस विचारधारा के अनुसार, अग्रस्थ भाग में ऊतियों के दो क्षेत्र ट्यूनिका (tunica) तथा कॉर्पस (corpus) पाए जाते हैं। ट्यूनिका कोशिकाओं का एक या अधिक स्तरों का बाह्य क्षेत्र तथा कॉर्पस मध्य वाला क्षेत्र है जो कोशिकाओं का एक समूह है तथा ट्यूनिकों द्वारा घिरा रहता है। इस विचारधारा के अनुसार, बाह्यत्वचा, ट्यूनिका की बाहरी स्तर से विकसित होती है तथा शेष ऊतक पूर्ण कॉर्पस एवं ट्यूनिका के कुछ भागों से विकसित होते हैं। जब ट्यूनिका केवल एकस्तरीय होती है। तो यह हेन्सटीन द्वारा वर्णित त्वचाजन (dermatogen) की भाँति कार्य करती है, लेकिन जब यह बहुस्तरीय होती है तो यह वल्कुट के ऊतक (cortical tissue) के कुछ भाग के विकास में सहायक हो सकती है। ट्यूनिका की कोशिकाएँ केवल अपनतिक (anticlinal) विभाजन द्वारा विभाजित होती है। जबकि कॉर्पस भाग की कोशिकाएँ अपनतिक तथा परिनतिक (periclinal) विभाजनों से विभाजित होती हैं।In simple words: ट्यूनिका कॉर्पस थ्योरी पौधे के अग्रस्थ मेरिस्टेम को दो क्षेत्रों- ट्यूनिका (बाहरी परत, अपनतिक विभाजन) और कॉर्पस (भीतरी द्रव्यमान, अपनतिक व परिनतिक विभाजन) में विभाजित करती है, जो क्रमशः विभिन्न ऊतकों का निर्माण करते हैं।
🎯 Exam Tip: ट्यूनिका कॉर्पस थ्योरी के प्रमुख सिद्धांतों, ट्यूनिका और कॉर्पस के बीच के अंतरों और उनके द्वारा उत्पन्न ऊतकों को स्पष्ट करें।
Question 2. बाह्य त्वचा ऊतक तन्त्र पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए ।
Answer: बाह्यत्वचा पौधों के अधिकांश भागों की बाहरी त्वचा है। इसकी कोशिकाएँ लम्बी तथा एक-दूसरे से सटी हुई होती हैं और एक अखण्ड सतह बनाती हैं। बाह्यत्वचा प्रायः एकल परत वाली होती है। बाह्यत्वचीय कोशिकाएँ मृदूतकी प्रकार की होती हैं जिनमें बहुत कम मात्रा में साइटोप्लाज्म होता है। इसमें एक बड़ी रसधानी होती है। बाह्यत्वचा की बाहरी सतह पर क्यूटिकल (cuticle) नामक रक्षात्मक परत का आवरण पाया जाता है। क्यूटिकल जल की हानि को रोकती है। जड़ों में क्यूटिकल अनुपस्थित होती है।In simple words: बाह्यत्वचा पौधों का सबसे बाहरी सुरक्षात्मक ऊतक तंत्र है, जिसमें आमतौर पर एक परत की कोशिकाएं होती हैं, जो क्यूटिकल से ढकी होती हैं (जड़ों को छोड़कर) और जल हानि को रोकती हैं।
🎯 Exam Tip: बाह्यत्वचा की संरचनात्मक विशेषताओं (एकल परत, क्यूटिकल) और इसके प्रमुख सुरक्षात्मक कार्यों पर प्रकाश डालें।
Question 3. वार्षिक वलय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। या कश्मीर में पाये जाने वाले वृक्षों में वार्षिक वलय प्रायः स्पष्ट होते हैं परन्तु उन पौधों में नहीं जो चेन्नई के समीप पाये जाते हैं। क्यों ?
Answer:
वार्षिक वलय
संवहन एधा की क्रियाशीलता मौसम में परिवर्तन के साथ अलग-अलग होने के कारण अधिक ठण्डे शरद ऋतु और बसन्त ऋतु में बनने वाले द्वितीयक जाइलम (secondary xylem) में काफी (कभी-कभी अत्यधिक भी) अन्तर उत्पन्न कर देती है। बसन्त ऋतु (spring season) में तापमान उचित होने आदि के कारण बनने वाले द्वितीयक जाइलम अर्थात् बसन्त काष्ठ (spring wood) मेंℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र पुराने तने में वार्षिक वलय (A) और वार्षिक वलय का एक अति विशालित दृश्य (B) दर्शाता है, जिसमें संवहन रश्मियाँ स्पष्ट रूप से दिखाई गई हैं। चित्र में पेरिडर्म, फ्लोएम, सैपवुड, हार्टवुड, स्प्रिंग वुड और ऑटम वुड जैसे विभिन्न परतें प्रदर्शित हैं, जो वृक्षों में वृद्धि के पैटर्न और आयु को समझने में सहायक हैं। वाहिकाएँ इत्यादि अधिक स्पष्ट तथा चौड़ी गुहा वाली होती हैं। शरद ऋतु में पौधे के सभी भागों के साथ पूलीय एधा (fascicular cambium) भी कम क्रियाशील हो जाती है। इस प्रकार, इस काष्ठ में वाहिकाएँ बहुत कम तथा बहुत छोटी गुहा वाली होती हैं, साथ ही इस काष्ठ में वाहिनिकाओं और काष्ठ रेशों (tracheids and wood fibres) की अधिकता होती है। इसका रंग भी गहरा होता है। इस प्रकार बने काष्ठ को शरद काष्ठ (autumn wood) कहते हैं दोनों प्रकार के काष्ठ अर्थात् बसन्त काष्ठ तथा शरद काष्ठ तने की अनुप्रस्थ काट (transverse section) संकेन्द्री वलयों (concentric rings) के रूप में दिखायी देते हैं। इस प्रकार एक शरद काष्ठ और एक बसन्त काष्ठ के वलय को मिलाकर वार्षिक वलय (annual ring) अथवा वृद्धि वलय (growth ring) कहते हैं। इस प्रकार एक वलय के बनने में एक वर्ष का समय लगता है अतः वार्षिक वलयों की संख्या देखकर किसी वृक्ष की आयु का पता लगाया जा सकता है। यह भी स्पष्ट है कि केवल मुख्य स्तम्भ के आधारीय भाग में ही वार्षिक वलयों की संख्या गिनकर वृक्ष की आयु बतायी जा सकती है, क्योकि आधार से सिरे की ओर वलयों की संख्या कम होती जाती है। वर्षभर के मौसम में अधिक परिवर्तन नहीं होने से वार्षिक वलय नहीं बनते हैं अथवा स्पष्ट नहीं होते हैं; इसलिए 'वार्षिक वलय' में बसन्त वे शरद् ऋतुओं में अत्यधिक अन्तर होने से कश्मीर में बसन्त काष्ठ व शरद काष्ठ स्पष्ट रूप से घेरों या वलयों (rings) में बनते हैं। चेन्नई मेंदोनों ऋतुओं के तापमान में न तो इतना अन्तर होता है और न ही काष्ठ में बसन्त व शरद काष्ठ के वलय बन पाते हैं।In simple words: वार्षिक वलय संवहन एधा की मौसमी गतिविधि से बनते हैं, जहाँ बसंत में चौड़ी वाहिकाओं वाली बसंत काष्ठ और शरद में संकरी वाहिकाओं वाली शरद काष्ठ बनती है। स्पष्ट वार्षिक वलय उन क्षेत्रों में बनते हैं जहाँ मौसम में स्पष्ट परिवर्तन होते हैं, जैसे कश्मीर, जबकि चेन्नई जैसे समशीतोष्ण क्षेत्रों में ये अनुपस्थित या अस्पष्ट होते हैं।
🎯 Exam Tip: वार्षिक वलय के निर्माण के पीछे के मौसमी कारकों (बसंत और शरद काष्ठ का निर्माण) और उनके महत्व (आयु निर्धारण) को समझाएँ। भौगोलिक भिन्नताओं के कारण को स्पष्ट करें।
Question 4. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए
(i) अन्तःकाष्ठ तथा रस काष्ठ
(ii) वातरन्ध्र
Answer:(i) अन्तः काष्ठ तथा रस काष्ठ (Heart wood and Sap wood) : तने के पुराने भाग अथवा केन्द्रीय भाग में टैनिन (tannin), रेजिन (resin), गोंद (gum) आदि पदार्थों के जमाव के कारण यह भाग कठोर हो जाता है। इस भाग को अन्तःकाष्ठ (heart wood) अथवा डयूरामेन (duramen) कहते हैं। द्वितीयक वृद्धि के साथ-साथ प्रतिवर्ष अन्तःकाष्ठ की मात्रा बढ़ती जाती है। अनुप्रस्थ कोट में यह भाग गहरे बादामी रंग को दिखलाई देता है। इसका मुख्य कार्य दृढ़ता प्रदान करना है। द्वितीयक काष्ठ की परिधि वाला भाग हल्के रंग का होता है। इस भाग। को रस काष्ठ (sap wood) अथवा एलबर्नम (alburnum) कहते हैं। यह काष्ठ का सक्रिय भाग है। यह जल तथा खनिज लवणों को पत्तियों तक पहुँचाने का कार्य करता है।
(ii) वातरन्ध्र (Lenticel) : ये पुराने वृक्ष के तनों पर पाये जाने वाले लेंस की तरह के छिद्र होते हैं जिनके द्वारा तना वातावरण से गैसों का आदान-प्रदान करता है। वातरन्ध्र (lenticel), रन्ध्र (stomata) के नीचे स्थित होते हैं। प्रत्येक वातरन्ध्र में अनियमित आकार की छोटी, पतली भित्ति वाली कोशिकाओं का समूह पाया जाता है जिन्हें पूरक या कम्पलीमेण्टरी (complementary) कोशिकाएँ कहते हैं। इस प्रकार ये कोशिकाएँ कॉर्क कैम्बियम द्वारा बाहर की ओर कॉर्क कोशिकाओं के स्थान पर बनती हैं। इन कोशिकाओं की कोशिका-भित्ति में सुबेरिन नहीं होती । इन कोशिकाओं की संख्या बढ़ते रहने से बाह्यत्वचा फट जाती है और पूरक कोशिकाएँ ऊपर की ओर उठकर छोटे-छोटे उभार बना लेती हैं। इस प्रकार वातरन्ध्र (lenticel) बन जाते हैं। शीत ऋतु में कॉर्क कोशिकाओं के बनने के कारण वातरन्ध्र बन्द हो जाते हैं, परन्तु नववर्ष के आगमन पर ये पुनः खुल जाते है।In simple words: अन्तःकाष्ठ (हार्टवुड) पुराने तने का केंद्रीय, गहरा रंग का, मृत और कठोर भाग है जो दृढ़ता देता है, जबकि रसकाष्ठ (सैपवुड) परिधीय, हल्के रंग का, जीवित भाग है जो जल का संवहन करता है। वातरंध्र तने पर लेंस के आकार के छिद्र होते हैं जो गैस विनिमय में सहायता करते हैं, जिनमें पूरक कोशिकाएं होती हैं और ये रंध्रों के नीचे स्थित होते हैं।
🎯 Exam Tip: अंतःकाष्ठ और रसकाष्ठ के कार्यों और विशेषताओं को स्पष्ट रूप से अलग करें। वातरंध्र की संरचना (पूरक कोशिकाएँ) और गैस विनिमय में उसकी भूमिका का वर्णन करें।
Question 1. विभज्योतक क्या है ? स्थिति के आधार पर ये कितने प्रकार के होते हैं ? या शीर्षस्थ विभज्योतक तथा अन्तर्वेशी (अन्तर्विष्ट) विभज्योतक में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer:
विभज्योतक ऊतक
विभज्योतक या मेरिस्टेमी ऊतक (meristems) वे हैं जिनकी कोशिकाओं में विभाजन की क्षमता होती है अथवा इनमें विभाजन हो रहा होता है। इनका भिन्नन (differentiation) भी नहीं हुआ होता है। इनकी कोशिकाएँ सेलुलोस की पतली भित्ति वाली, कोशिकाद्रव्य से भरी हुई अर्थात् रिक्तिकाएँ बहुत कम और छोटी, किन्तु बड़े व स्पष्ट केन्द्रक वाली होती हैं। इनमें कोशिकाएँ अत्यन्त पास-पास लगी होती हैं जिनके मध्य अन्तराकोशिकीय स्थान (intercellular spaces) प्रायः नहीं होते। ये आकार में समव्यासी (isodiametric) होती हैं तथा उपापचयी (metabolic) रूप से अधिक सक्रिय होती हैं।
विभज्योतक पौधों के वृद्धि भागों में मिलते हैं। निम्न श्रेणी के बहुकोशिकीय पौधों में ये पूरे पौधे के शरीर में रहते हैं, किन्तु उच्च श्रेणी के पौधों में तो ये निश्चित और विशेष स्थितियों में ही पाये जाते हैं। इन कोशिकाओं के विभाजन, परिवर्द्धन, वृद्धि और भिन्नन के बाद ही स्थायी ऊतक (permanent tissues) बनते हैं।
स्थिति के आधार पर विभज्योतक
स्थिति के अनुसार विभज्योतक निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं
1. शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical meristem) :
यह ऊतक किसी अंग (मूल या तने) के शीर्ष में होता है और नई-नई कोशिकाएँ बनाते रहने के कारण, वहाँ पर वर्धन प्रदेश (growing zone) बनाता है। इसी के कारण उस भाग में पौधों की लम्बाई में वृद्धि होती है। तने तथा जड़ कें शीर्षों के अनुदैर्ध्य काटों में इनको तथा इनसे बनने वाले स्थायी ऊतकों (permanent tissues) को देखा जा सकता है। शीर्षस्थ विभज्योतक प्रायः सदैव ही प्राथमिक (primary) प्रकार का विभज्योतक होता है। शीर्षस्थ विभज्योतक से तनों तथा जड़ों के शीर्षों में जिस प्रकार से क्रमशः नये तथा स्थायी ऊतकों का निर्माण होता है, इसको समय-समय पर कई प्रकार के सिद्धान्तों के द्वारा समझाया जाता रहा है। इनमें सबसे पुराना तथा मान्यवाद हिस्टोजन वाद (histogen theory) है। इस वाद के अनुसार, किसी शीर्षस्थ विभज्योतक से बनने वाले स्तर तीन प्रकार के ऊतकजन क्षेत्रों (histogen zones) में बँटे होते हैं (चित्र देखिए) । ये क्षेत्र प्राविभज्योतक (promeristem) के रूप में अपना परिवर्द्धन प्रारम्भ करते हैं तथा अग्रलिखित प्रकार से स्थायी ऊतकों का निर्माण करते हैं जड़ के शीर्ष पर चूँकि मूलगोप (root cap) होता है अतः इसको निर्मित करने वाला एक अलग विभज्योतक होता है, इसे कैलिप्ट्रोजन (calyptrogen) कहते हैं। यह मूलगोप की होते रहने वाली क्षति की पूर्ति करता है।
प्राविभज्योतक (promeristem) स्थायी क्षेत्र (permanent zone)
1. डर्मेटोजन या त्वचाजन (dermatogen)
बाह्यत्वचा (epidermis)
अधस्त्वचा (hypodermis)
2. वल्कुटजन या पेरीब्लेम (periblem) वल्कुट (cortex)
सामान्य वल्कुट (general cortex)
अन्तस्त्वचा (endodermis)
3. प्लिरोम (plerome) → स्टील (stele)
परिरम्भ (pericycle)
मज्जा किरण (medullary rays)
मज्जा (medulla or pith)
संवहन पूल (vascular bundles)
फ्लोएम (phloem)
एधा (cambium)
दारु (xylem)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र विभिन्न हिस्टोजन क्षेत्रों-त्वचाजन (डर्मेटोजन), वल्कुटजन (पेरीब्लेम) और रम्भजन (प्लेरोम) को दिखाता है। इसमें एक तने का अनुदैर्ध्य काट और एक अनुप्रस्थ काट शामिल है, जो दर्शाते हैं कि ये विभज्योतक ऊतक पौधे के विभिन्न भागों (बाह्यत्वचा, अधस्त्वचा, वल्कुट, अन्तस्त्वचा, परिरम्भ, मज्जा किरणें, मज्जा, संवहन पूल, फ्लोएम, एधा और जाइलम) का निर्माण कैसे करते हैं। यह पौधों में प्राथमिक वृद्धि के लिए जिम्मेदार विभिन्न ऊतकजन परतों की स्थिति को स्पष्ट करता है।
2. पाश्र्व विभज्योतक (Lateral meristem) : यह ऊतक तने या मूल के पाश्र्यों में अक्ष के समान्तर अर्थात् स्पर्श रेखीय तल (tangential plane) में स्थित होता है। इसकी कोशिकाएँ केवल इसी तल में विभाजित होती हैं। अतः इससे द्वितीयक ऊतकों (secondary tissues) का निर्माण होता है, जिससे जड़ या तने (प्ररोह) की मोटाई बढ़ती है। द्विबीजपत्री पौधों के तने में उपस्थित संवहन एधा (fascicular cambium) इस प्रकार का ऊतक होता है। अन्य उदाहरण में तने या जड़ में स्थायी ऊतकों से उत्पन्न होने वाला द्वितीयक विभज्योतक (secondary meristem) काग एधा (cork cambium) अथवा द्विबीजपत्री जड़ों में उत्पन्न होने वाली द्वितीयक संवहन एधा (secondary fascicular cambium) होती है। उपर्युक्त सभी उदाहरणों में तने अथवा जड़ की मोटाई में द्वितीयक वृद्धि (secondary growth in thickness) ही होती है।
3. अन्तर्वेशी विभज्योतक (Intercalary meristem) : यह ऊतक शीर्षस्थ विभज्योतक का अलग होकर छूटा हुआ भाग होता है, जो स्थायी ऊतकों में परिवर्तित न होकर, उनके मध्य में रह जाता है। इस ऊतक के कारण भी पौधे के भागों की लम्बाई में वृद्धि होती है। घासों के पर्वो (internodes) के आधारों में तथा पोदीना (mint) के तने की पर्वसन्धियों (nodes) के नीचे यह ऊतक पाया जाता है। यह पर्णाधार (leaf base) पर भी पाया जाता है; जैसे-चीड़ (Pinus) में । अन्तर्वेशी विभज्योतक प्राथमिक स्थायी ऊतकों को जन्म देते हैं तथा पौधों की लम्बाई बढ़ाते हैं। इस प्रकार की वृद्धि अल्पकालिक होती है।
In simple words: विभज्योतक वे ऊतक होते हैं जिनकी कोशिकाएँ लगातार विभाजित होकर नई कोशिकाएँ बनाती हैं, जिससे पौधे की वृद्धि होती है। ये शीर्षस्थ (लम्बाई में वृद्धि), पाश्र्व (मोटाई में वृद्धि) और अन्तर्वेशी (पर्व संधियों पर) हो सकते हैं।
🎯 Exam Tip: विभज्योतक के प्रकारों और उनकी स्थिति व कार्य को स्पष्ट रूप से समझाना उच्च अंक प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है। शीर्षस्थ, पाश्र्व और अन्तर्वेशी विभज्योतक के अंतर और उनके उदाहरण याद रखें।
Question 2. ऊतक से आप क्या समझते हैं? पौधों के स्थायी ऊतकों की संरचना और उनके कार्यों का सचित्र वर्णन कीजिए। या स्थूलकोण ऊतक तथा दृढ़ोतक में अन्तर बताइए ।
Answer: ऊतक कोशिकाओं का वह समूह जिसकी उत्पत्ति, संरचना तथा कार्य समान होते हैं, ऊतक कहलाता है। पादप ऊतक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं
1. स्थायी ऊतक तथा
2. विभज्योतकी ऊतक।
स्थायी ऊतक इसकी कोशिकाओं में कोशा विभाजन की क्षमता नहीं होती है।
1. सरल ऊतक : ये जीवित या मृत पतली या मोटी भित्ति वाली एक जैसी कोशिकाओं का समूह होता है। सरल ऊतक निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं
(i) मृदूतक (Parenchyma) : यह समव्यासी, गोलाकार, अण्डाकार या बहुभुजी, पतली भित्ति वाली जीवित कोशाओं से बना होता है। कोशिकाओं के मध्य प्रायः अन्तराकोशीय स्थान (inercellular space) पाया जाता है। यह ऊतक प्रायः पौधों के कोमल भागों में पाया जाता है।
कार्य :
(अ) जल एवं खाद्य पदार्थों (स्टार्च, प्रोटीन, वसा) को संचय करता है।
(ब) हरितलवक (chloroplast) की उपस्थिति के कारण प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन का निर्माण करता है।
(स) वायु गुहिकाओं युक्त मृदूतक को वायुतक (aerenchyma) कहते हैं। यह जलीय पौधों के प्लवने (floating) में सहायक होता है।
(द) इसे स्पंजी मृदूतक भी कहते है। यह गैस विनिमय में सहायता करता है।
(य) कोशिकाओं में विभाजन की क्षमता स्थापित हो जाने के कारण द्वितीयक वृद्धि एवं घाव भरने में सहायता करता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र फ्लोएम की विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं को दर्शाता है, जिसमें कोशिकाद्रव्य, केंद्रक, रिक्तिकाएं और अन्तराकोशिकीय स्थान स्पष्ट रूप से दिखाए गए हैं। यह संरचना फ्लोएम ऊतक के भीतर विभिन्न कोशिका प्रकारों के संगठन को समझने में मदद करती है, जो पौधों में पोषक तत्वों के परिवहन के लिए महत्वपूर्ण है।
(ii) स्थूलकोण ऊतक Collenchyma) :
ये कोणीय कोशिकायें मृदूतक की अपेक्षा लम्बी होती हैं। इनमें अन्तराकोशीय अवकाश (intercellular space) का अभाव होता है। कोशिकाओं के कोनों पर । पेक्टिन तथा सेलुलोस एकत्र हो जाता है। जिससे ये कोशिकायें अनुप्रस्थ काट में गोलाकार या अण्डाकार दिखाई देती हैं। कभी-कभी कोशिकाओं में हरितलवक भी उत्पन्न हो जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र स्थूलकोण ऊतक का अनुप्रस्थ काट (ट्रांसवर्स सेक्शन) दिखाता है, जिसमें कोशिकाओं के कोनों पर सेलुलोज और पेक्टिन जमा होने के कारण असमान मोटी दीवारें (अनइवन थिकन्ड वॉल्स) और एक स्पष्ट ल्यूमेन (गुहा) दिखाई गई है। यह संरचना पौधों के कोमल अंगों को लचीलापन और यांत्रिक शक्ति प्रदान करती है।
कार्य :
(अ) पौधों के कोमल अंगों को तनन दृढ़ता (tensile strength) प्रदान करता है।
(ब) भोजन का संचय करता है।
(स) हरितलवक की उपस्थिति के कारण भोजन का निर्माण करता है।
(iii) दृढ़ ऊतक (Sclerenchyma) :
कोशिका भित्ति के लिग्निनकरण के कारण परिपक्व कोशिकाएँ मृत (dead) हो जाती हैं। दृढ़ ऊतक दो प्रकार की कोशिकाओं से बना होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र दृढ़ोतक रेशों को अनुलम्ब काट (A) और अनुप्रस्थ काट (B) में दर्शाता है। रेशे लंबी, संकरी, नुकीली मृत कोशिकाएँ होती हैं जिनकी भित्तियाँ लिग्निनयुक्त होती हैं, जो पौधों को यांत्रिक शक्ति और सहारा प्रदान करने में मदद करती हैं।
(a) दृढ़ोतक रेशे (Sclerenchymatous fibres) : ये लम्बी, सँकरी तथा दोनों सिरों पर नुकीली, मृत कोशिकाएँ होती हैं कोशिकायें लिग्निनकरण के कारण मृत (dead) हो जाती हैं। तन्तुओं की लम्बाई प्रायः 1 से 3 मिमी होती है। जूट (jute) के रेशे 20 मिमी तथा बोहमेरिया (Boehmeria) के रेशे 550 मिमी तक लम्बे होते हैं।
(b) दृढ़ कोशाएँ (Stone cells or sclereids) : ये कोशिकाएँ लगभग समेव्यासी, गोलाकार, अण्डाकार या अनियमित होती हैं। कोशिका भित्ति लिग्निनयुक्त हो जाने से कोशिकाएँ मृत हो जाती हैं। दृढ़ कोशाएँ फलभित्ति, बीजकवच आदि में पायी जाती हैं।
कार्य :
(अ) दृढ़ ऊतके पौधे के विभिन्न अंगों को यान्त्रिक शक्ति (mechanical strength) प्रदान करता है।
(ब) यह बीज तथा फलों का रक्षात्मक आवरण बनाता है।
2. जटिल ऊतक (Complex tissue) : दो या अधिक प्रकार की कोशिकाएँ परस्पर मिलकर एक ही कार्य सम्पन्न करती हैं। जटिल ऊतक दो प्रकार के होते हैं
(i) जाइलम तथा
(ii) फ्लोएम ।
(i) जाइलम : इसके अध्ययन के लिए दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 देखें ।
(ii) फ्लोएम : इस ऊतक का प्रमुख कार्य पौधे के प्रकाश संश्लेषी भागों (जैसे-पत्तियों) में निर्मित भोज्य-पदार्थों को पौधे के अन्य भागों में स्थानान्तरित करना होता है। इस ऊतक को बास्ट (bast) भी कहते हैं।
संरचना : जाइलम की तरह ही फ्लोएम के निर्माण में भी चार प्रकार की कोशिकाएँ भाग लेती हैं। ये कोशिकाएँ निम्नवत् हैं
1. चालनी नलिकाएँ (sieve tubes)
2. सहचर कोशिका (companion cell)
3. फ्लोएम पेरेनकाइमा (phloem parenchyma)
4. फ्लोएम तन्तु (phloem fibres)।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र फ्लोएम की विभिन्न कोशिकाओं को दर्शाता है: (A) फ्लोएम का अनुलम्ब काट जिसमें सहचर कोशिका, फ्लोएम पैरेन्काइमा और चालनी नलिका दिखाई गई है; (B) अनुप्रस्थ काट जिसमें चालनी प्लेट और चालनी क्षेत्र है; और (C) अंगूर की चालनी नलिका जिसमें कैलोस जमाव भी दर्शाया गया है। यह भोजन परिवहन के लिए आवश्यक फ्लोएम ऊतक की संरचना को स्पष्ट करता है।
(a) चालनी नलिकाएँ
एन्जियोस्पर्म में चालनी नलिका (sieve tube) : मिलती है तथा टेरिडोफाइटा में चालनी कोशिका (sieve cell) मिलती है। ये पतली नली के समान होती हैं जिसमें कोशिकाएँ एक के ऊपर एक कतार में लगी रहती हैं। इनकी अन्त:भित्ति (end wall) पर चालनी प्लेट (sieve plate) पाई जाती है। कोशिका भित्ति सेलुलोस की बनी होती है। इसमें अनेकों छिद्र मिलते हैं जिससे आस-पास की कोशिकाओं में सम्पर्क बना रहता है। कभी-कभी चालनी प्लेट अनुदैर्ध्य भित्ति (longitudinal wall) में भी पाई जाती है। वर्षी ऋतु (growing season) के अन्त में चालनी पट्टिका एक प्रकार के रंगहीन चमकदार कैलोस (callose) नामक कार्बोहाइड्रेट की तह से ढक जाती है, जिसे कैन्नस (callus) कहते हैं। बहुत पुरानी चालनी-पट्टिका में कैलस स्थाई रूप से जम जाता है जिससे भोजन का संवहन रूक जाता है। परिपक्व चालनी नलिका में केन्द्रक नहीं मिलता है। प्रत्येक चालनी नलिका के साथ छिद्रों द्वारा जुडी हुई एक लम्बी सहचर कोशिका (companion cell) पाई जाती है।
(b) सहचर कोशिका
जिम्नोस्पर्म व टेरिडोफाइटा में सहचर-कोशिका नहीं पाई जाती है। जिम्नोस्पर्म व टेरीडोफाइटा में चालनी कोशिका (sieve cell) मिलती है जिस पर चालनी प्लेट (sieve plate) स्पष्ट नहीं होती है। आमतौर पर चालनी क्षेत्र (sieve areas) पाश्र्व दीवार (lateral wall) पर पाए जाते हैं। एन्जियोस्पर्म में चालनी नलिका से पाश्र्व दिशा से लगी एक लम्बी-पतली कोशिका होती है जिसे सहचर कोशिका कहते हैं। यह पतली कोशिका भित्ति वाली कोशिका होती है जो भोजन के संवहन में सहायता करती है। सामान्यतः एक चालनी नलिका से एक सहचर कोशिका लगी रहती है। सहचर कोशिका में एक बड़ा केन्द्रक व प्रचुर मात्रा में जीवद्रव्य मिलता है। इनमें स्टार्च कण (starch grain) नहीं मिलते हैं, परन्तु माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria), एन्डोप्लाज्मिक रेटीकुलम (endoplasmic reticulum), राइबोसोम (ribosome) आदि कोशिकांग मिलते हैं।
(c) फ्लोएम पेरेनकाइमा
आकृति में ये कोशिकाएँ लम्बी, चौड़ी, पतली व गोल हो सकती हैं। ये कोशिकाएँ चालनी नलिका के बीच-बीच में मिलती हैं व जीवित होती हैं। इनको मुख्य कार्य भोजन का संचय करना व संवहन में सहायता करना है। इन कोशिकाओं के अन्य गुण पेरेनकाइमा की कोशिकाओं की तरह होते हैं। एकबीजपत्री पौधों के तनों में फ्लोएम पेरेनकाइमा का प्रायः अभाव होता है।
(d) फ्लोएम तन्तु
ये दृढ़ऊतक के बने होते हैं। इनकी कोशिकाभित्ति मोटी, कोशिका-गुहा सँकरी व इनमें गर्त मिलते हैं। इन तन्तुओं का बहुत आर्थिक महत्त्व है। इनसे रस्सी, सुतली, गद्दे, बैग आदि बनाए जाते हैं। तन्तुओं की लम्बाई निश्चित नहीं होती है। ये द्वितीयक फ्लोएम में अधिक मिलते हैं। प्राथमिक फ्लोएम में तन्तुओं की कोशिकाभित्ति अधिकतर सेलुलोस की बनी होती है।
In simple words: ऊतक कोशिकाओं का वह समूह है जो समान उत्पत्ति, संरचना और कार्य साझा करता है। स्थायी ऊतक जैसे मृदूतक, स्थूलकोण ऊतक और दृढ़ोतक पौधों को सहारा, भोजन संचय और सुरक्षा प्रदान करते हैं। जटिल ऊतक, जाइलम और फ्लोएम, जल और भोजन के परिवहन में शामिल होते हैं।
🎯 Exam Tip: सरल और जटिल स्थायी ऊतकों के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझना महत्वपूर्ण है। प्रत्येक ऊतक के प्रकार, उनकी संरचना, कार्य और मुख्य विशेषताओं को याद रखें, खासकर जाइलम और फ्लोएम के विभिन्न घटकों पर ध्यान दें।
Question 3. दारु के विभिन्न घटकों का विवरण दीजिए एवं उनके कार्यों की संक्षिप्त विवेचना कीजिए। या जाइलम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। या दारु (जाइलम) ऊतक के विभिन्न अवयवों के नामांकित चित्र बनाइए। या टिप्पणी लिखिए-जाइलम द्वारा खनिज लवणों का परिवहन ।
Answer:
दारु या जाइलम
दारु या जाइलम (xylem) ऐसा संवहन ऊतक (vascular tissue) है जिसके द्वारा भूमि से अवशोषित जल तथा उसमें घुले हुए खनिज पदार्थों का संवहन होता है। इन कार्यों को करने के लिए जाइलम में निम्नलिखित चार प्रकार की विशेष संरचनाएँ या दारु अवयव (xylem elements) पाए। जाते हैं।
1. दारु वाहिनिकाएँ (Xylem tracheids) : ये लम्बी व नलिकाकार कोशिकाएँ होती हैं जिनके भीतर जीवद्रव्य नहीं होता तथा ये मृत हो जाती हैं। इनकी भित्तियाँ, जो प्राथमिक रूप में सेलुलोस की बनी होती हैं, किन्तु बाद में लिग्निन (lignin) से स्थूलितं होने से, अधिक मोटी हो जाती हैं। लिग्निनयुक्त (lignified) होने के कारण ये कठोर तथा काष्ठीय हो जाती हैं। कोशिका भित्तियों को लिग्निन द्वारा स्थूलन (thickening) होने से भित्तियों पर कई प्रकार की संरचनाएँ बन जाती हैं। इन्हीं के आधार पर ये कई प्रकार की मानी जाती हैं; जैसे-वलयाकार (annular), सर्पिल (spiral) प्रकार के स्थूलन प्रोटोजाइलम (protoxylem) में होते हैं। सीढ़ीनुमा (scalariform) प्रकार का स्थूलन प्रोटोजाइलम तथा मेटाजाइलम (metaxylem) दोनों में होता है। जालिकारूपी (reticulate) प्रकार का स्थूलन मेटाजाइलम में मिलता है।
जब कोशिका भित्ति पर जालिकावत् स्थूलन और भी अधिक घना हो जाता है तो कुछ स्थानों पर ही लिग्निन न जमा होने के कारण छोटे-छोटे स्थान शेष रह जाते हैं। इन स्थानों पर केवल सेलुलोस की भित्ति ही होती है, इन स्थानों को गर्त (pits) कहते हैं। गर्त पड़ोसी कोशिका की भित्ति पर भी इसी स्थान पर बनता है, अतः इन्हें गर्त युग्म (pit pair) कहना अधिक उचित है। गर्त साधारण (simple) अर्थात् पूरी गहराई तक बराबर स्थूलन वाले अथवा परिवेशित (bordered) हो सकते हैं। परिवेशित गर्त में स्थूलन बाहर से अन्दर की ओर क्रमशः कम होता जाता है। गर्तमय (pitted) स्थूलन मेटाजाइलम में पाया जाता है।
2. दारु वाहिकाएँ या टैकी (Xylem vessels or tracheae) : ये बहुत लम्बी और चौड़ी नलिकाओं के समान संरचनाएँ होती हैं जो एक पंक्ति में, एक के सिरे से दूसरी (end to end) लगी रहती हैं। वाहिकाओं (vessels) में वाहिनिकाओं की अपेक्षा अनुप्रस्थ भित्तियों का पूर्ण या अपूर्ण रूप से अभाव होता है। यदि अनुप्रस्थ भित्तियाँ होती हैं तो अत्यधिक छिद्रिल होती हैं। वाहिकाओं (vessels) में भी मृत, मोटी कोशिका भित्ति होती है तथा वाहिनिकाओं की तरह कोशिका भित्तियाँ समान मोटाई की होती हैं। वाहिकाओं की भित्ति पर लिग्नीभवन (lignification) भी वाहिनिकाओं के समान कई प्रकार का होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र जाइलम की विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं को दर्शाता है: (A) वाहिनी (ट्रेकिड) अपने नुकीले सिरों और पिट फील्ड के साथ; (B) वाहिका (वेसल) जिसमें एंड वॉल और छिद्र (परफोरटिड) हैं; (C) जाइलम पैरेन्काइमा जिसमें साइटोप्लाज्म, न्यूक्लियस और पिट फील्ड है; और (D) तंतु (फाइबर) अपने लम्बे और पतले आकार के साथ। यह जल और खनिज परिवहन के लिए जिम्मेदार जाइलम के संरचनात्मक घटकों को स्पष्ट करता है।
अनुप्रस्थ काट में जाइलम वाहिकाएँ वाहिनिकाओं के समान ही बहुभुजी दिखायी देती हैं। अनावृतबीजी पौधों (gymnosperms) में जाइलम केवल वाहिनिकाओं (tracheids) का बना रहता है, इनमें वाहिकाओं (vessels) का प्रायः अभाव होता है जबकि आवृतबीजी पौधों (angiosperms) में वाहिकाएँ ही प्रमुख जाइलम अवयव (xylem elements) हैं।
3. दारु मृदूतक (Xylem parenchyma) : ये मृदूतकीय कोशिकाएँ (parenchymatous cells) जाइलम के अन्दर पायी जाती हैं। इनकी भित्तियाँ बाद में कुछ मोटी हो जाती हैं, किन्तु ये सजीव होती हैं। स्थूलित होने पर इन कोशिकाओं की भित्तियों में सरल गर्त (pits) होते हैं। इनका मुख्य कार्य जल व खाद्य पदार्थ संचित रखना है, किन्तु ये जल संवहन में भी दारु - वाहिकाओं आदि को सहयोग देती हैं।
4. दारु रेशे (Xylem fibres) : ये रेशे दृढ़ोतकी (sclerenchymatous) होते हैं अर्थात् इनकी भित्तियाँ लिग्निनयुक्त (lignified) होती हैं और इन भित्तियों में विभिन्न प्रकार के गर्त पाये जाते हैं। इन रेशों का मुख्य कार्य मजबूती तथा सहारा देना होता है।
(i) आदिदारु (Protoxylem) : वाहिनिकाएँ और वाहिकाएँ पहले संकरी बनती हैं तथा उनकी भित्तियों पर वलयाकार अथवा सर्पिल स्थूलन (annular or spiral thickening) होती है। इनको आदिदारु (protoxylem) कहते हैं।
(ii) अनुदारु (Metaxylem) : बाद में वाहिकाएँ (vessels) तथा वाहिनिकाएँ (tracheids) चौड़ी तथा अधिक लम्बी हो जाती हैं। इनकी भित्तियों पर जालिकारूपी या सीढ़ीनुमा स्थूलन (thickenings) अथवा गर्त पाये जाते हैं, इसको अनुदारु (metaxylem) कहते हैं।
(iii) जाइलम के कार्य (Functions of xylem) :
1. जाइलम द्वारा, मूलों द्वारा अवशोषित जल तथा लवणों के घोल को पौधों के वायव भागों तक (पत्तियों तक) पहुँचाया जाता है। इस कारण इस जटिल ऊतक को जल संवाहक ऊतक (water conducting tissue) कहते हैं।
2. इसमें उपस्थित कोशिकाओं की भित्तियाँ मोटी व दृढ़ होने के कारण यह ऊतक पौधे के भागों को यान्त्रिक शक्ति (mechanical strength) प्रदान करता है।
In simple words: जाइलम एक जटिल ऊतक है जो जल और खनिज लवणों को जड़ से पौधे के अन्य भागों तक पहुंचाता है। यह वाहिनिकाएँ, वाहिकाएँ, जाइलम मृदूतक और जाइलम रेशों से बना होता है, जो पौधे को यांत्रिक सहारा भी प्रदान करता है।
🎯 Exam Tip: जाइलम के चार मुख्य घटकों (वाहिनिकाएँ, वाहिकाएँ, जाइलम मृदूतक और जाइलम रेशे) की संरचना और कार्यों को याद रखें। आदिदारु और अनुदारु के बीच के अंतर को समझना भी महत्वपूर्ण है।
Question 4. भरण ऊतक तन्त्र पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए ।
Answer: बाह्यत्वचा तथा संवहन बण्डल के अतिरिक्त सभी ऊतक भरण ऊतक की श्रेणी में आते हैं। ये पेरेनकाइमा, कोलेनकाइमा तथा स्क्लेरेनकाइमा कोशिकाओं से बने होते हैं। पत्तियों में भरण ऊतक पतली भित्ति वाले तथा क्लोरोप्लास्ट युक्त होते हैं और इसे पर्णमध्योतक (leaf mesophyll) कहते हैं। भरण ऊतक में निम्नलिखित भाग आते हैं
(i) वल्कुट (Cortex) : यह बाह्यत्वचा के नीचे पाया जाने वाला भरण ऊतक (ground tissue) है जो प्रायः अन्तस्त्वचा (endodermis) तक फैला रहता है। इसमें निम्नलिखित भाग होते हैं
(a) अधस्त्वचा (Hypodermis) : द्विबीजपत्री पौधों में बाह्यत्वचा के नीचे स्थूलकोण ऊतक (collenchyma tissue) तथा एकबीजपत्री पौधों में बाह्यत्वचा के नीचे दृढ़ोतके (sclerenchyma tissue) की एक या कुछ परतें पूरी पट्टी के रूप में अथवा छोटे-छोटे टुकड़ों में पाई जाती हैं। इन्हें अधस्त्वचा (hypodermis) कहते हैं। यह ऊतक पतली कोशिकाभित्ति वाली मृदूतक कोशिकाओं से बना होता है तथा अधस्त्वचा के ठीक नीचे पाया जाता है। ये परतें रक्षा का कार्य करती हैं।
(b) सामान्य वल्कुट (General Cortex) : इनमें सुविकसित अन्तराकोशिकीय स्थान (intercellular spaces) पाए जाते हैं। प्रायः तरुण तने की वल्कुट की कोशिकाओं में हरितलवक पाए जाते हैं। इस प्रकार के मृदूतक को क्लोरेनकाइमा (chlorenchyma) कहते हैं। वल्कुट की कोशिकाओं में मण्ड, टेनिन तथा अन्य उत्सर्जी पदार्थ भी पाए जाते हैं। जलीय पौधों में वल्कुट में एक विशेष प्रकार का मृदूतक पाया जाता है जिसे वायूतक (aerenchyma) कहते हैं। इसमें बीच-बीच में काफी बड़े वायु-स्थान (air-spaces) मिलते हैं। वल्कुट (cortex) पौधों को यान्त्रिक शक्ति प्रदान करता है; 'भोज्य-पदार्थ का संग्रह करता है तथा पौधों के आन्तरिक ऊतकों की रक्षा करता है।
(c) अन्तस्त्वचा (Endodermis) : इसे मण्डआच्छद (starch sheath) भी कहते हैं। यह कोशिकाओं की एक अकेली परत के रूप में पायी जाती है। यह वल्कुट को रम्भ (stele) से पृथक् करती है। यह परत ढोल-सदृश (barrel-shaped) कोशिकाओं की बनी होती है और इनके बीच अन्तराकोशिकीय स्थान नहीं होते। यह कोशिकाएँ जीवित होती हैं और इनमें मण्ड, टेनिन, म्यूसिलेज की अधिकता होती है। मण्डे की उपस्थिति के कारण ही इसे मण्ड आच्छद (starch sheath) भी कहते हैं। अन्तस्त्वचा की कुछ कोशिकाओं की अरीय (radial) और आन्तरिक (inner) भित्तियाँ, सुबेरिन (suberin), क्यूटिन (cutin) या कभी-कभी लिग्निन (lignin) पदार्थों के संग्रह के कारण स्थूलित (thickened) हो जाती हैं। इस स्थूलित पट्टी को केस्पेरियन पट्टी (casparian strip) कहते हैं। इन मोटी भित्ति वाली अन्तस्त्वचा कोशिकाओं के बीच अनेक जड़ों में कुछ पतली भित्ति वाली कोशिकाएँ आदिदारु (protoxylem) के अभिमुख (opposite) होती हैं। इन कोशिकाओं को मार्ग कोशिकाएँ (passage cells) अथवा संचरण कोशिकाएँ (transfusion cells) कहते हैं। इन्हीं कोशिकाओं द्वारा मूलरोमों द्वारा अवशोषित जल व खनिज पदार्थ जाइलम में जाते हैं।
In simple words: भरण ऊतक में बाह्यत्वचा और संवहन बण्डल के अलावा पौधे के सभी ऊतक शामिल होते हैं, जिनमें पेरेनकाइमा, कोलेनकाइमा और स्क्लेरेनकाइमा कोशिकाएँ होती हैं। यह वल्कुट, अधस्त्वचा, सामान्य वल्कुट और अन्तस्त्वचा में विभाजित होता है, जो पौधे को सुरक्षा, सहारा, भोजन संचय और जल परिवहन में मदद करता है।
🎯 Exam Tip: भरण ऊतक तंत्र के विभिन्न भागों (वल्कुट, अधस्त्वचा, सामान्य वल्कुट, अन्तस्त्वचा) और उनके विशिष्ट कार्यों को याद रखें। कैस्पेरियन पट्टी की भूमिका और मार्ग कोशिकाओं का कार्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
Question 5. संवहन बण्डल क्या हैं? चित्रों की सहायता से आवृतबीजी पौधों में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के संवहन बण्डलों की संरचना का वर्णन कीजिए। या उपयुक्त चित्रों की सहायता से आवृतबीजियों में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के संवहन बण्डलों का वर्णन कीजिए।
Answer:
संवहन पूल
जाइलम व फ्लोएम (Xylem and phloem) पौधों में पाये जाने वाले संवहन ऊतक हैं। ये पौधों में अलग-अलग प्रकार से विन्यसित होते हैं। प्रायः यह भी देखा गया है कि दोनों प्रकार के संवहन ऊतक सदैव ही एक-दूसरे के आस-पास रहते हैं। इस प्रकार जाइलम और फ्लोएम के पास-पास होने तथा इनसे बनने वाले विशेष तन्तुओं (strands) को संवहन पूल (vascular bundle) कहते हैं। द्विबीजपत्री पौधों (dicot plants) में जाइलम तथा फ्लोएम के अतिरिक्त एधा (cambiun) भी संवहन पूल बनाने में मदद करती है। समस्त पौधों में संवहन पूल अपनी संवहन ऊतकों की व्यवस्था के अनुसार प्रमुखतः निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं
1. संयुक्त संवहन पूल
इस प्रकार के संवहन पूल में जाइलम और फ्लोएम एक ही त्रिज्या (radius) पर होते हैं। इस प्रकार के संवहन पूल सामान्यतः आवृतबीजी (angiospermic) पौधों के स्तम्भों (stems) में पाये जाते हैं। ये संवहन पूल भी निम्नलिखित दो प्रकार के मिलते हैं
(i) कोलेटरल संवहन (Collateral vascular bundles) : ये प्रायः अधिकतर तनों में मिलते हैं। इन संवहन पूलों में जाइलम केन्द्र की ओर तथा फ्लोएम परिरम्भ (pericycle) की ओर होता है। द्विबीजपत्री तनों में जाइलम और फ्लोएम के मध्य प्राथमिक एधा (primary cambium) होती है जिससे ये पूल वर्धा (open) कहलाते हैं। एकबीजपत्री तनों के संवहन पूलों में एधा नहीं होती और वे अवर्थी (closed) कहलाते हैं। इन संवहन पूलों में जाइलम सदैव ही अन्तःआदिदारुक (endarch) होता है अर्थात् आदिदारु केन्द्र की ओर तथा अनुदारु परिधि की ओर होता है।
(ii) बाइकोलेटरल संवहन पूल (Bicollateral vascular bundles) : इस प्रकार के संवहन पूलों में जाइलम के दोनों ओर अर्थात् केन्द्र की ओर भी और परिधि की ओर भी फ्लोएम होता है। इस प्रकार के संवहन पूलों में भी जाइलम अन्तःआदिदारुक ही होता है और ये मदेव बर्थी होते हैं। इनमें जाइलम तथा फ्लोएम के मध्य दोनों ओर एधा होती है।
उदाहरण :
कद्दू के पौधों के तनों में संवहन पूल प्रायः बाइकोलेटरल ही होते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र संवहन पूलों (वैस्कुलर बंडल्स) के विभिन्न प्रकारों को दर्शाता है। इसमें संयुक्त (कोलेटरल-खुले और बंद), बाइकोलेटरल (बाहरी फ्लोएम, बाहरी कैम्बियम, जाइलम, आंतरिक कैम्बियम, आंतरिक फ्लोएम), संकेन्द्री (एम्फीवसाल-फ्लोएम केंद्र में, जाइलम चारों ओर और एम्फीक्राइब्रल-जाइलम केंद्र में, फ्लोएम चारों ओर), और अरीय (जाइलम और फ्लोएम अलग-अलग त्रिज्याओं पर) संवहन पूलों के आरेख शामिल हैं।
2. अरीय संवहन पूल
इस प्रकार के पूलों में जाइलम और फ्लोरम अलग-अलग त्रिज्याओं पर होते हैं। इस प्रकार के संवहन पूल जड़ों में पाये जाते हैं। इनमें जाइलम सदैव बाह्यआदिदारुक (exarch) मिलता है अर्थात् आदिदारु परिधि की ओर तथा अनुदारु केन्द्र की ओर होता है। इन संवहन पूलों में प्राथमिक एधा (primary cambium) नहीं पायी जाती है। द्विबीजपत्री जड़ों में जाइलम तथा फ्लोएम के मध्य, बाद में द्वितीयक एधा (secondary cambitum) बन जाती है।
3. संकेन्द्री संवहन पूल
इन पूलों में एक संवहन ऊतक (vascular tissue) केन्द्र में तथा दूसरा इसे चारों ओर से घेरता है। सभी सुकेन्द्री संवहन पूल अवर्थी closed) होते हैं अर्थात् इनमें एधा कभी नहीं होती है। जाइलम तथा फ्लोएम की स्थिति के अनुसार ये संवहन पूल प्रायः निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं।
(i) दारु केन्द्री (Amphicribral) :
इस प्रकार के संवहन पूलों में जाइलम केन्द्र में तथा फ्लोएम इसे चारों ओर से घेरता है। दारु केन्द्री संवहन पूल फर्क्स (ferns) के राइजोम में मिलते हैं।
(ii) फ्लोएम केन्द्री (Amphivasal) :
इस प्रकार के संवहन पूलों में फ्लोएम मध्य में तथा दारु इसे चारों ओर से घेरता है। फ्लोएम केन्द्री संवहन पूल कुछ एकबीजपत्री पौधों; जैसे-यक्का (Yucca), डैसीना (Dracaena) आदि के तने में मिलते हैं।
In simple words: संवहन बण्डल जाइलम और फ्लोएम से बने होते हैं जो पौधे में जल और भोजन के परिवहन के लिए जिम्मेदार होते हैं। इन्हें तीन मुख्य प्रकारों में बांटा गया है: संयुक्त (जाइलम और फ्लोएम एक ही त्रिज्या पर), अरीय (अलग-अलग त्रिज्याओं पर), और संकेन्द्री (एक ऊतक दूसरे को घेरता है)।
🎯 Exam Tip: संवहन बण्डलों के विभिन्न प्रकारों (संयुक्त, अरीय, संकेन्द्री) और उनके उप-प्रकारों (कोलेटरल, बाइकोलेटरल, दारु केन्द्री, फ्लोएम केन्द्री) को स्पष्ट रूप से समझें। प्रत्येक प्रकार की व्यवस्था और उनके उदाहरणों को याद रखना उच्च स्कोर के लिए महत्वपूर्ण है।
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