UP Board Solutions Class 11 Biology Chapter 4 Animal Kingdom

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Detailed Chapter 4 पशु जगत UP Board Solutions for Class 11 Biology

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Class 11 Biology Chapter 4 पशु जगत UP Board Solutions PDF

UP Board Solutions For Class 11 Biology Chapter 4 Animal Kingdom

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

 

Question 1. यदि मूलभूत लक्षण ज्ञात न हों तो प्राणियों के वर्गीकरण में आप क्या परेशानियाँ महसूस करेंगे?
Answer:
1. यदि मूलभूत लक्षण ज्ञात नहीं हैं तब सभी जीवों का पृथक रूप से अध्ययन करना सम्भव नहीं होगा।
2. जीवों के मध्य परस्पर सम्बन्ध स्थापित करना कठिन होगा।
3. एक वर्ग के सभी जन्तुओं की केवल एक या दो जीवों के अध्ययन से जानकारी प्राप्त करना सम्भव नहीं होगा।
4. अन्य जन्तु जातियों का विकास नहीं किया जा सकता।
In simple words: बिना मूलभूत लक्षणों की जानकारी के, जीवों का सही वर्गीकरण करना और उनके आपसी संबंधों को समझना मुश्किल हो जाएगा, जिससे उनका अध्ययन अधूरा रहेगा और विकास क्रम को भी नहीं समझा जा सकेगा।

🎯 Exam Tip: वर्गीकरण के मूलभूत लक्षणों की समझ जीव विज्ञान में महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जीवों के अध्ययन और उनके बीच संबंधों को स्थापित करने में मदद करता है।

 

Question 2. यदि आपको एक नमूना (specimen) दे दिया जाये तो वर्गीकरण हेतु आप क्या कदम अपनाएँगे?
Answer:
1. संगठन के स्तर (levels or grades of organisation)
2. संगठन का पैटर्न (patterns in organisation)
3. सममिति (symmetry)
4. द्विकोरिक तथा त्रिकोरिक संगठन (diploblastic and triploblastic organisation)
5. देहगुहा (body cavity) तथा प्रगुहा (coelom)
6. खण्डीभवन (segmentation)
In simple words: किसी भी नमूने के वर्गीकरण के लिए हम पहले उसके संगठन के स्तर, सममिति, कोरिकी संगठन, देहगुहा और खण्डीभवन जैसे मूलभूत शारीरिक लक्षणों का विश्लेषण करेंगे।

🎯 Exam Tip: वर्गीकरण के लिए दिए गए कदम प्रत्येक प्राणी के अद्वितीय शारीरिक संगठन को समझने में सहायक होते हैं, जो जीव विज्ञान में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है।

 

Question 3. देहगुहा एवं प्रगुहा का अध्ययन प्राणियों के वर्गीकरण में किस प्रकार सहायक होता है?
Answer: देहभित्ति एवं कूटगुहा (pseudocoelom) के बीच प्रगुहा की उपस्थिति एवं अनुपस्थिति वर्गीकरण के लिए विशेष प्रयोजनीय है। देहगुहा जब मीसोडर्म से स्तरित रहता है तब इसे सीलोम (coelom) कहते हैं। जिन जन्तुओं में सीलोम उपस्थित रहता है उन्हें सीलोमेटा (coelomata) कहते हैं, जैसे एनेलिडा, मोलस्का, आर्थोपोडा, इकाइनोडर्मेटा हेमीकॉडेंटा तथा कॉडेंटा। कुछ जन्तुओं में देहगुहा मीसोडर्म द्वारा स्तरित नहीं होती, लेकिन एक्टोडर्म एवं एण्डोडर्म के बीच छोटी-छोटी गोलाकार आकृति में छितरा रहता है। इस तरह की देहगुहा को आहारनाल कहते हैं एवं उन जन्तुओं को स्यूडोसीलोमेटा (pseudocoelomata) कहते हैं, जैसे-एस्केल्मिंथीज (Aschelminthes) । जिन जन्तुओं में देहगुहा अनुपस्थित रहती है उन्हें एसीलोमेट्स (acoelomates) कहते हैं, जैसे-प्लेटीहेल्मिंथीज (Platyhelminthes)।
In simple words: देहगुहा और प्रगुहा की उपस्थिति या अनुपस्थिति जीवों के वर्गीकरण में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह आंतरिक अंगों के विकास और शारीरिक संरचना की जटिलता को दर्शाती है, जिससे उन्हें सीलोमेटा, स्यूडोसीलोमेटा या एसीलोमेट्स में वर्गीकृत किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: देहगुहा की प्रकृति (सीलोम, स्यूडोसीलोम, एसीलोम) प्राणी वर्गीकरण का एक महत्वपूर्ण आधार है, जो शारीरिक संगठन की जटिलता और आंतरिक अंगों के विकास को दर्शाती है।

 

Question 4. अन्तः कोशिकीय एवं बाह्य कोशिकीय पाचन में विभेद करें।
Answer: अन्तः कोशिकीय एवं बाह्य कोशिकीय पाचन में निम्नलिखित अन्तर है

क्र० सं०अन्तः कोशिकीय पाचनबाह्य कोशिकीय पाचन
1.पाचन कोशिका के अन्दर होता है।पाचन कोशिका के बाहर आहारनाल में होता है।
2.केवल कुछ एन्जाइम पाचन में भाग लेते हैं।बड़ी संख्या में पाचक ग्रन्थियाँ एवं एन्जाइम पाचन भाग लेते हैं।

In simple words: अन्तः कोशिकीय पाचन कोशिका के अंदर होता है, जिसमें कम एंजाइम शामिल होते हैं, जबकि बाह्य कोशिकीय पाचन कोशिका के बाहर आहारनाल में होता है और इसमें कई पाचक ग्रंथियां व एंजाइम भाग लेते हैं।

🎯 Exam Tip: पाचन के इन दो मुख्य प्रकारों को समझना विभिन्न जीव समूहों की पोषण रणनीतियों और उनके विकासवादी अनुकूलन को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष परिवर्धन में क्या अन्तर है?
Answer: प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष परिवर्धन में निम्नलिखित अन्तर हैं

क्र० सं०प्रत्यक्ष परिवर्धनअप्रत्यक्ष परिवर्धन
1.प्रत्यक्ष परिवर्धन में शिशु वयस्कों के समान होते हैं।अप्रत्यक्ष परिवर्धन में शिशु, वयस्कों के समान नहीं होते।
2.मध्यावस्था (intermediate stage) नहीं पायी जाती है।वयस्क बनने से पूर्व शिशु एक या अधिक मध्यावस्थाओं (Intermediate stages) से गुजरता है।
3.लार्वा (larva) नहीं पाया जाता है।लार्वा (larva) पाया जाता है।
उदाहरण-हाइड्रा, केंचुआ, मनुष्यउदाहरण-मेंढक, घरेलू मक्खी, रेशमकीट

In simple words: प्रत्यक्ष परिवर्धन में शिशु जन्म के बाद वयस्क जैसा दिखता है और कोई लार्वा अवस्था नहीं होती, जबकि अप्रत्यक्ष परिवर्धन में शिशु लार्वा अवस्था से गुजरकर वयस्क रूप में रूपांतरित होता है।

🎯 Exam Tip: प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिवर्धन जीव विज्ञान में विकास प्रक्रियाओं की विविधता को दर्शाते हैं, जिससे जीवों की जीवन चक्र रणनीतियों को समझने में मदद मिलती है।

 

Question 6. परजीवी प्लेटीहेल्मिंथीज के विशेष लक्षण बताइए।
Answer:
1. टेगुमेन्ट (tegument) का मोटा स्तर उपस्थित।
2. पोषक (host) के शरीर में ऊतकों से चिपकने के लिये चूषक (suckers) और प्रायः कंटक या अंकुश (spines or hooks) उपस्थित।
3. चलन अंग (locomotory organs) अनुपस्थित।
4. कुछ चपटे कृमि खाद्य पदार्थ को परपोषी से सीधे अपने शरीर की सतह से अवशोषित करते हैं।
5. जनन तन्त्र (reproductive system) पूर्ण विकसित होता है।
6. प्रायः अवायवीय श्वसन (anaerobic respiration) पाया जाता है।
In simple words: परजीवी प्लेटीहेल्मिंथीज में मोटा टेगुमेन्ट, चूषक या अंकुश, चलन अंगों की अनुपस्थिति, सतह से भोजन अवशोषण, पूर्ण विकसित जनन तंत्र और अवायवीय श्वसन जैसे विशेष लक्षण होते हैं जो उन्हें परजीवी जीवन के लिए अनुकूल बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: परजीवी अनुकूलन के विशिष्ट लक्षणों को समझना इन जीवों की जीवन शैली और उनके परपोषी पर पड़ने वाले प्रभावों को दर्शाता है, जो चिकित्सा और पशु चिकित्सा विज्ञान में महत्वपूर्ण है।

 

Question 7. आर्थोपोडा प्राणी समूह का सबसे बड़ा वर्ग है। इस कथन के प्रमुख कारण बताइए।
Answer:
1. सुरक्षा के लिए क्युटिकल (cuticle) की उपस्थिति।
2. विकसित पेशी तन्त्र गमन में सहायक।
3. कीटों में श्वसनलियों द्वारा श्वसन (tracheal respiration) से सीधे ऑक्सीजन प्राप्त होती है।
4. संधियुक्त उपांगों (jointed appendages) द्वारा विभिन्न कार्य सम्भव होते हैं।
5. तन्त्रिका तन्त्र (nervous system) तथा संवेदी अंग (sense organs) विकसित होते हैं।
6. संचार हेतु फेरोमोन्स (pheromones) पाये जाते हैं।
In simple words: आर्थोपोडा का सबसे बड़ा वर्ग होने का कारण उनके सुरक्षात्मक क्युटिकल, कुशल पेशी तंत्र और श्वसन प्रणाली, संधियुक्त उपांगों, विकसित तंत्रिका तंत्र और फेरोमोन्स जैसे विशिष्ट अनुकूलन हैं, जो उन्हें विभिन्न पर्यावासों में सफल बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: आर्थोपोडा की सफलता के कारणों को समझना उनकी विकासवादी अनुकूलन क्षमता और पारिस्थितिक तंत्र में उनकी व्यापक उपस्थिति को उजागर करता है।

 

Question 8. जल संवहन तन्त्र किस वर्ग का मुख्य लक्षण है
(a) पोरीफेरा
(b) टीनोफोरा
(c) इकाइनोडर्मेटा
(d) कॉडेंटा
Answer: (c) इकाइनोडर्मेटा
In simple words: जल संवहन तंत्र इकाइनोडर्मेटा संघ के प्राणियों जैसे स्टारफिश में पाया जाने वाला एक विशिष्ट लक्षण है, जो उनके गमन, भोजन पकड़ने और श्वसन में सहायता करता है।

🎯 Exam Tip: जल संवहन तंत्र इकाइनोडर्मेटा की पहचान का एक महत्वपूर्ण शारीरिक लक्षण है, जो उनके अनूठे कार्यकलापों को दर्शाता है।

 

Question 9. सभी कशेरुकी (vertebrates) रज्जुकी (chordates) हैं लेकिन सभी रज्जुकी कशेरुकी नहीं हैं इस कथन को सिद्ध कीजिए।
Answer: सभी कॉडेंट्स (chordates) में पृष्ठ रज्जु (notochord) पायी जाती है। कॉडेंट्स के अन्तर्गत यूरोकॉडेंटा तथा सेफैलोकॉडेंटा (दोनों को प्रोटोकॉडेंटा कहा जाता है) तथा वर्टीब्रेटा सम्मिलित हैं। कशेरुकियों (vertebrates) में पृष्ठ रज्जु (notochord) भ्रूणीय अवस्था में पायी जाती है। वयस्क अवस्था में पृष्ठ रज्जु अस्थिल अथवा उपास्थिल मेरुदंड (backbone) में परिवर्तित हो जाती है। यद्यपि प्रोटोकॉडेंटस में वर्टिब्रल कॉलम (vertibral column) नहीं पायी जाती है। अतः कशेरुकी (vertebrates) रज्जुकी (chordates) भी हैं, परन्तु सभी रज्जुकी, कशेरुकी नहीं हैं।
In simple words: सभी कशेरुकियों में भ्रूणीय अवस्था में पृष्ठ रज्जु होती है जो बाद में मेरुदंड में बदल जाती है, इसलिए वे रज्जुकी हैं; लेकिन कुछ रज्जुकी जैसे प्रोटोकॉडेंट्स में मेरुदंड नहीं बनता, अतः वे कशेरुकी नहीं होते।

🎯 Exam Tip: यह कथन कॉर्डेटा संघ के वर्गीकरण की जटिलता को स्पष्ट करता है और पृष्ठ रज्जु एवं मेरुदंड के बीच के अंतर को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 10. मछलियों में वायु-आशय (air bladders) की उपस्थिति का क्या महत्त्व है?
Answer: मछलियों में वायु कोष/आशय (air bladders) उत्प्लावन (buoyancy) में सहायक होते हैं। इनकी सहायता से मछलियाँ जल में तैरती हैं। वायु कोष इन्हें जेल में डूबने से बचाते हैं। वायु कोष वर्ग ओस्टिक्थीज (osteichthyes) में पाये जाते हैं जबकि वर्ग कॉन्ड्रीक्थीज (chondrichthyes) में अनुपस्थित होते हैं। जिन मछलियों में वायु कोष नहीं होते हैं उन्हें जल में डूबने से बचने के लिये लगातार तैरना पड़ता है।
In simple words: मछलियों में वायु-आशय उन्हें जल में तैरने और डूबने से बचाने के लिए उत्प्लावन प्रदान करता है, जिससे वे बिना लगातार तैरते हुए अपनी गहराई को नियंत्रित कर पाती हैं।

🎯 Exam Tip: वायु-आशय का कार्य मछलियों के जीवन में एक महत्वपूर्ण अनुकूलन है, जो उन्हें जल में अपनी स्थिति बनाए रखने में सक्षम बनाता है और ओस्टिक्थीज तथा कॉन्ड्रीक्थीज के बीच अंतर का एक प्रमुख बिंदु है।

 

Question 11. पक्षियों में उड़ने हेतु क्या-क्या रूपान्तरण हैं?
Answer:
1. अग्रपाद (forelimbs) रूपान्तरित होकर पंख बनाते हैं।
2. अन्तः कंकाल की लम्बी अस्थियाँ खोखली तथा वायुकोष युक्त होती हैं, जिससे शरीर हल्का रहता है।
3. मूत्राशय (urinary bladder) अनुपस्थित होता है।
4. उड़ने में सहायक पेशियाँ (flight muscles) विकसित होती हैं।
In simple words: पक्षियों में उड़ने के लिए अग्रपाद पंखों में बदल जाते हैं, खोखली हड्डियाँ और वायुकोष शरीर को हल्का रखते हैं, मूत्राशय अनुपस्थित होता है, और मजबूत उड़ने वाली मांसपेशियाँ विकसित होती हैं।

🎯 Exam Tip: पक्षियों में उड़ने के लिए हुए रूपांतरीकरण उनके विकासवादी अनुकूलन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें शरीर के वजन को कम करने और उड़ान के लिए आवश्यक शक्ति प्रदान करने पर विशेष ध्यान दिया गया है।

 

Question 12. क्या अण्डजनक तथा जरायुज द्वारा उत्पन्न अण्डे या बच्चे संख्या में बराबर होते हैं? यदि हाँ तो क्यों? यदि नहीं तो क्यों?
Answer: नहीं, अण्डजनक (oviparous) जन्तुओं में अण्डे से बच्चा मादा शरीर के बाहर अर्थात् बाह्य वातावरण में विकसित होता है। अतः बहुत से अण्डों के नष्ट होने की संभावना होती है। इसलिए ये जन्तु अधिक संख्या में अण्डे देते हैं। जरायुज (viviparous) जन्तुओं में भ्रूण का विकास मादा शरीर के अन्दर होता है। अतः केवल 1 या कुछ बच्चे ही उत्पन्न होते हैं।
In simple words: नहीं, अण्डजनक जीव अधिक अंडे देते हैं क्योंकि बाहरी वातावरण में अंडों के नष्ट होने का जोखिम अधिक होता है, जबकि जरायुज जीव कम बच्चे पैदा करते हैं क्योंकि भ्रूण का विकास मां के शरीर के अंदर सुरक्षित रूप से होता है।

🎯 Exam Tip: अण्डजनक और जरायुज प्रजनन रणनीतियों में बच्चों की संख्या में अंतर पर्यावरणीय कारकों और उत्तरजीविता की संभावनाओं के प्रति एक महत्वपूर्ण विकासवादी अनुकूलन है।

 

Question 13. निम्नलिखित में से शारीरिक खण्डीभवन किसमें पहले देखा गया?
(a) प्लेटीहेल्मिंथीज
(b) एस्केल्मिंथीज
(c) एनेलिडा
(d) आर्थोपोडा
Answer: (c) एनेलिडा
In simple words: शारीरिक खण्डीभवन का विकासवादी क्रम में सबसे पहले एनेलिडा संघ के प्राणियों जैसे केंचुए में देखा गया, जहां शरीर खंडों में विभाजित होता है।

🎯 Exam Tip: खण्डीभवन का विकासवादी क्रम जीवों के शारीरिक संगठन की जटिलता को समझने में मदद करता है, और एनेलिडा इस महत्वपूर्ण लक्षण को दर्शाने वाला पहला संघ है।

 

Question 14. निम्न का मिलान कीजिए
(a) प्रच्छद (Operculum) - (I) टीनोफोरा (Ctenophora)
(b) पाश्र्वपाद (Parapodia) - (II) मोलस्का (Mollusca)
(c) शल्क (Scales) - (III) पोरीफेरा (Porifera)
(d) कंकत पट्टिका (Comb plates) - (IV) रेप्टीलिया (Reptillia)
(e) रेडूला (Radula) - (V) एनेलिडा (Annelida)
(f) बाल (Hairs) - (VI) साइक्लोस्टोमेटा एवं कॉन्ड्रीक्थीज (Cyclostomata and Chondrichthyes)
(g) कीपकोशिका (Choanocytes) - (VII) मैमेलिया (Mammalia)
(h) क्लोम छिद्र (Gill slits) - (VIII) ऑस्टिक्थीज (Osteichthyes)
Answer:
(a) (VIII)
(b) (V)
(c) (IV)
(d) (I)
(e) (II)
(f) (VII)
(g) (III)
(h) (VI)
In simple words: सही मिलान इस प्रकार है: प्रच्छद - ऑस्टिक्थीज; पाश्र्वपाद - एनेलिडा; शल्क - रेप्टीलिया; कंकत पट्टिका - टीनोफोरा; रेडूला - मोलस्का; बाल - मैमेलिया; कीपकोशिका - पोरीफेरा; क्लोम छिद्र - साइक्लोस्टोमेटा एवं कॉन्ड्रीक्थीज।

🎯 Exam Tip: यह मिलान विभिन्न प्राणी संघों के विशिष्ट लक्षणों को याद रखने में मदद करता है, जो वर्गीकरण विज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 15. मनुष्यों पर पाये जाने वाले कुछ परजीवियों के नाम लिखिए।
Answer:
1. टीनिया (फीताकृमि)
2. एस्केरिस (गोलकृमि)
3. वुचेरेरिया (फाइलेरिया कृमि)
4. एनसाइकोस्टोमा (अंकुश कृमि)
5. ट्राइचुरिस (व्हीप कृमि)
6. ड्रेकुनकुलस (गुइनिया कृमि)
7. पेडीकूलस (जू)
In simple words: मनुष्यों में पाए जाने वाले कुछ प्रमुख परजीवियों में फीताकृमि (टीनिया), गोलकृमि (एस्केरिस), फाइलेरिया कृमि (वुचेरेरिया), अंकुश कृमि (एनसाइकोस्टोमा), व्हीप कृमि (ट्राइचुरिस), गुइनिया कृमि (ड्रेकुनकुलस) और जू (पेडीकूलस) शामिल हैं।

🎯 Exam Tip: परजीवियों के नाम और उनके सामान्य प्रभाव को जानना सार्वजनिक स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

 

Question 1. ऐसे जीव जो पानी की सतह पर उतराते रहते हैं, वे क्या कहलाते हैं?
(क) नितलस्थ
(ख) पिलैजिक
(ग) प्लवकीय
(घ) उभयचरी
Answer: (ग) प्लवकीय
In simple words: वे जीव जो पानी की सतह पर स्वतंत्र रूप से तैरते या उतराते रहते हैं, उन्हें प्लवकीय (planktonic) जीव कहा जाता है।

🎯 Exam Tip: जलीय पारिस्थितिकी में प्लवकीय जीवों की पहचान करना उनकी भूमिका को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे खाद्य श्रृंखला का आधार होते हैं।

 

Question 2. संघ पोरीफेरा का वर्गीकरण किस पर आधारित है ?
(क) नालतंत्र
(ख) कंटिकाएँ
(ग) कोएनोसाइट्स का आकार
(घ) एस्कोसाइट्स
Answer: (ख) कंटिकाएँ
In simple words: पोरीफेरा संघ के जीवों का वर्गीकरण मुख्य रूप से उनकी शरीर संरचना में मौजूद कंकाल संरचनाओं, विशेष रूप से कंटिकाओं (spicules) के प्रकार और रासायनिक संरचना पर आधारित होता है।

🎯 Exam Tip: पोरीफेरा के वर्गीकरण में कंटिकाओं का महत्व उनकी पहचान और विभिन्न प्रजातियों के बीच अंतर करने का एक प्रमुख आधार है।

 

Question 3. स्पंजों में 'टोटीपोटेन्ट' कोशिकाएँ होती हैं।
(क) थीजोसाइट्स
(ख) ट्रोफोसाइट्स
(ग) आर्किओसाइट्स
(घ) कोएनोसाइट्स
Answer: (ग) आर्किओसाइट्स
In simple words: स्पंजों में 'टोटीपोटेन्ट' कोशिकाएँ आर्किओसाइट्स होती हैं, जिनमें विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं में विकसित होने और पुनर्जनन की क्षमता होती है।

🎯 Exam Tip: आर्किओसाइट्स स्पंजों की पुनर्जनन क्षमता के लिए महत्वपूर्ण हैं और उनकी बहुकोशिकीयता के बावजूद उनकी लचीली जैविक प्रणाली को दर्शाती हैं।

 

Question 4. निम्नलिखित में से कौन स्वतंत्रजीवी है?
(क) फैसिओला
(ख) टीनिया
(ग) प्लैनेरिया
(घ) सिस्टोसोमा
Answer: (ग) प्लैनेरिया
In simple words: फैसिओला, टीनिया और सिस्टोसोमा परजीवी हैं, जबकि प्लैनेरिया एक स्वतंत्रजीवी चपटा कृमि है जो परजीवी जीवन शैली नहीं अपनाता।

🎯 Exam Tip: परजीवी और स्वतंत्रजीवी जीवों के बीच अंतर को समझना उनकी जीवन शैली और पारिस्थितिक भूमिकाओं को स्पष्ट करता है, जो जीव विज्ञान में महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. क्लाइटेलम केंचुए के किन खण्डों में होता है?
(क) 19, 20 तथा 21
(ख) 14, 15 तथा 16
(ग) प्रथम तीन खण्ड
(घ) अन्तिम तीन खण्ड
Answer: (ख) 14, 15 तथा 16
In simple words: केंचुए में क्लाइटेलम, जो एक मोटी ग्रंथि संबंधी पट्टी होती है और प्रजनन में सहायक होती है, उसके 14वें, 15वें और 16वें शारीरिक खंडों में स्थित होती है।

🎯 Exam Tip: केंचुए में क्लाइटेलम की सही खंड स्थिति को जानना उसके प्रजनन शरीर विज्ञान को समझने और पहचान के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
(क) दोमुँहा सर्प (इरिक्स जोनाई) में मुँह आगे तथा पीछे दोनों ओर होते हैं।
(ख) बड़ों की अपेक्षा छोटे स्तनधारी प्राणियों की आधारी उपापचय दर (बी०एम०आर०) प्रायः अधिक होती है
(ग) फैसिओला हिपेटिका में गुदा द्वार तथा वास्तविक सीलोम नहीं पाया जाता
(घ) एड्रीनल ग्रन्थि से स्रावित हॉर्मोन्स को 'जीवन-रक्षक' हॉर्मोन्स भी कहते हैं।
Answer: (क) दोमुँहा सर्प (इरिक्स जोनाई) में मुँह आगे तथा पीछे दोनों ओर होते हैं।
In simple words: दोमुँहा सर्प (इरिक्स जोनाई) में केवल एक ही मुख होता है; 'दोमुँहा' नाम उसके पूंछ के सिरे की मुख जैसी समानता के कारण दिया गया है, न कि दो वास्तविक मुखों की उपस्थिति के कारण।

🎯 Exam Tip: जीव विज्ञान में सामान्य नामों और वैज्ञानिक तथ्यों के बीच अंतर को समझना महत्वपूर्ण है ताकि गलत धारणाओं से बचा जा सके और सटीक ज्ञान प्राप्त किया जा सके।

 

Question 7. पक्षियों के वायु-कोष सहायक होते हैं।
(क) रुधिर परिसंचरण में
(ख) ताप नियन्त्रण में
(ग) शरीर भार को कम करने में
(घ) शरीर को गर्म रखने में
Answer: (ग) शरीर भार को कम करने में
In simple words: पक्षियों में वायु-कोष (air sacs) मुख्य रूप से उनके शरीर के भार को कम करने और श्वसन प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाने में सहायक होते हैं, जो उड़ान के लिए महत्वपूर्ण है।

🎯 Exam Tip: पक्षियों में वायु-कोष का कार्य उनके उड़ने की क्षमता के लिए एक महत्वपूर्ण अनुकूलन है, जो उनके शारीरिक भार को कम करता है और श्वसन क्षमता बढ़ाता है।

 

Question 8. निम्न में से किसकी अनुपस्थिति में चिड़िया चमगादड़ से भिन्न होती है ?
(क) समशीतोष्णता (समतापता)
(ख) चतुर्वेश्मी हृदय
(ग) श्वासनली
(घ) डायफ्राम
Answer: (घ) डायफ्राम
In simple words: चिड़िया चमगादड़ से डायफ्राम की अनुपस्थिति के कारण भिन्न होती है, क्योंकि चमगादड़ स्तनधारी होने के नाते श्वसन के लिए डायफ्राम का उपयोग करता है जबकि चिड़ियों में यह संरचना नहीं होती।

🎯 Exam Tip: डायफ्राम स्तनधारियों का एक विशिष्ट लक्षण है, जो उन्हें पक्षियों से अलग करता है और श्वसन तंत्र में उनकी अनुकूलन क्षमता को दर्शाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. स्पंज के व्यक्तित्व पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Answer: यह बहुकोशिकीय जन्तु होता है जिसका शरीर ऊतकों में विभाजित नहीं होता है। यह जन्तु जलीय होता है तथा अधिकांशतः समुद्रों में, पत्थरों पर, शिलाओं पर, लकड़ी के लट्ठों, अन्य जन्तुओं के खोलों आदि पर चिपका रहता है। इसके शरीर की रचना अति सरल होती है। इसकी देहभित्ति में असंख्य सूक्ष्मछिद्र होते हैं जिससे बाहरी जल से लगातार इसका सम्पर्क रहता है। यह जल छिद्रों से अन्दर स्पंजगुहा में आता है तथा ऑस्कुलम से बाहर निकल जाता है।
In simple words: स्पंज सरल बहुकोशिकीय जलीय जीव हैं जिनमें ऊतक नहीं होते, ये प्रायः किसी आधार से चिपके रहते हैं और इनके शरीर में असंख्य छिद्र होते हैं जिनके माध्यम से जल का निरंतर प्रवाह होता है।

🎯 Exam Tip: स्पंज का सरल शारीरिक संगठन और उनकी जल संवहन प्रणाली (कनाल सिस्टम) पोरीफेरा संघ की पहचान के महत्वपूर्ण लक्षण हैं।

 

Question 2. प्रोटोस्टोमिया तथा डयूटेरोस्टोमिया में दो अन्तर बताइए।
Answer:
1. प्रोटोस्टोमिया जन्तुओं का एक समूह है जिसके अन्तर्गत आर्थोपोडा, मोलस्का,ऐनेलिडा तथा अन्य समूह आते हैं। ड्यूटेरोस्टोमिया भी जन्तुओं का एक समूह है, परन्तु इसके अन्तर्गत इकाइनोडर्मेटा, कॉडेंटा, एग्नेथा तथा बैंकिओपोडा समूह आते हैं।
2. प्रोटोस्टोमिया में पहले मुख को निर्माण होता है जबकि डयूटेरोस्टोमिया में पहले गुदा का निर्माण होता है।
In simple words: प्रोटोस्टोमिया जीवों में भ्रूणीय विकास के दौरान पहले मुख बनता है, जबकि ड्यूटेरोस्टोमिया जीवों में पहले गुदा का निर्माण होता है।

🎯 Exam Tip: प्रोटोस्टोमिया और ड्यूटेरोस्टोमिया के बीच का अंतर भ्रूणीय विकास के आधार पर जानवरों के वर्गीकरण का एक महत्वपूर्ण मानदंड है, जो उनके विकासवादी संबंधों को दर्शाता है।

 

Question 3. केंचुआ तथा तिलचट्टे के उत्सर्जन अंगों के नाम लिखिए।
Answer:
1. केंचुआ के उत्सर्जी अंग - वृक्कक
2. तिलचट्टे के उत्सर्जी अंग - मैल्पीघियन नलिकाएँ
In simple words: केंचुए का उत्सर्जी अंग वृक्कक (नेफ्रिडिया) है, जबकि तिलचट्टे का उत्सर्जी अंग मैल्पीघियन नलिकाएँ हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न जीवों के उत्सर्जी अंगों की पहचान उनके शरीर विज्ञान को समझने और उनकी अनुकूलन क्षमता का अध्ययन करने के लिए आवश्यक है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. निम्नलिखित जन्तुओं का वर्गीकरण कीजिए
(i) मकड़ी
(ii) टिड्डी
(iii) तारामीन या सितारा मछली
(iv) घोंघा (पाइला)/सेब घोंघा
(V) कटल फिश
(vi) केंचुआ
(vii) हाइड्रा
(viii) घरेलू मक्खी
(ix) फीताकृमि
(x) लिवर फ्लूक
(xi) यूग्लीना
(xii) पैरामीशियम
(xiii) जोंक
(xiv) समुद्री अर्चिन
(xv) पुर्तगीज मैन ऑफ वार
Answer:
(ii) टिड्डी (Grasshopper)
जगत से संघ तक (i) मकड़ी के समान
उपसंघ (sub-phylum) - मैण्डिबुलेटा (mandibulata)
वर्ग (class) - इन्सेक्टा (insecta)
उपवर्ग (sub-class) - टेरीगोटा (pterygota)
गण (order) - ऑर्थोप्टेरा (orthoptera)
वंश (genus) - सिस्टोसर्का (Schistocerca)
(iii) तारामीन या सितारा मछली (Star Fish)
जगत से खण्ड तक (i) मकड़ी के समान
संघ (phylum) - इकाइनोडर्मेटा (echinodermata)
वर्ग (class) - एस्टेरॉइडिया (asteroidea)
गण (order) - फॉर्सिपुलेटा (forcipulata)
वंश (genus) - एस्टेरिआस (Asterias)
जाति (species) - रूबेन्स (rubens)
(iv) घोंघा (Snail)
जगत से खण्ड तक (i) मकड़ी के समान
संघ (phylum) - मोलस्का (mollusca)
वर्ग (class) - गैस्ट्रोपोडा (gastropoda)
गण (order) - मीजोगैस्ट्रोपोडा (mesogastropoda)
वंश (genus) - पाइला (Pila)
(v) कटल फिश (Cuttle Fish)
जगत से खण्ड तक (i) मकड़ी के समान
वर्ग (class) - सिफैलोपोडा (cephalopoda)
उपवर्ग (sub-class) - डाइब्रेकिएटा (dibranchiata)
गण (order) - डेकापोडा (decapoda)
वंश (genus) - सीपिया (Sepia)
(vi) केंचुआ (Earthworm)
जगत से खण्ड तक (i) मकड़ी के समान
संघ (phylum) - ऐनेलिडा (annelida)
वर्ग (class) - ऑलिगोकीटा (oligochaeta)
गण (order) - ऑपिस्थोपोरा (opisthopora)
वंश (genus) - फेरीटिमा (Pheretima)
जाति (species) - पॉस्थुमा (posthuma)
(vii) हाइड्रा (Hydra)
जगत से अधोजगत तक (ⅰ) मकड़ी के समान
प्रभाग (division) - रैडिएटा (radiata)
संघ (phylum) - सीलेण्ट्रेटा (coelenterata)
वर्ग (class) - हाइड्रोजोआ (hydrozoa)
गण (order) - हाइड्रॉयडिया (hydroidea)
वंश (genus) - हाइड्रा (Hydra)
जाति (species) - ऑलीगैक्टिस (oligactis)
(viii) घरेलू मक्खी (House Fly)
जगत से वर्ग तक (ii) टिड्डी के समान
गण (order) - डिप्टेरा (diptera)
वंश (genus) - मस्का (Musca)
(ix) फीताकृमि (Tapeworm)
जगत से प्रभाग तक (i) मकड़ी के समान
खण्ड (section) - एसीलोमैटा (acoelomata)
संघ (phylum) - प्लैटीहेल्मिन्थीज (platyhelminthes)
वर्ग (class) - सेस्टोडा (cestoda)
गण (order) - साइक्लोफाइलिडिया (cyclophyllidia)
वंश (genus) - टीनिया (Taenia)
जाति (species) - सोलियम (solium)
(x) लिवर फ्लूक या यकृत कृमि (Liver Fluke)
जगत से संघ तक (ix) फीताकृमि के समान
वर्ग (class) - ट्रिमैटोडा (trematoda)
गण (order) - इकाइनोस्टोमैटिडा (echinostomatida)
वंश (genus) - फैशिओला (Fasciola)
जाति (species) - हिपेटिका (hepatica)
(xi) यूग्लीना (Euglena)
जगत (kingdom) - प्राणि (animalia)
संघ (phylum) - प्रोटोजोआ (protozoa)
वर्ग (class) - फ्लैजेलैटा (flagellata)
गण (order) - यूग्लेनॉयडिया (euglenoidea)
वंश (genus) - यूग्लीना (Euglena)
जाति (species) - विरिडिस (viridis)
(xii) पैरामीशियम (Paramecium)
जगत (kingdom) - प्रोटिस्टा (protista)
संघ (phylum) - प्रोटोजोआ (protozoa)
उपसंघ (sub-phylum) - सीलियोफोरा (ciliophora)
वर्ग (class) - सीलिएटा (ciliata)
गण (order) - हिम्नोस्टोमैटिडा (hymnostomatida)
वंश (genus) - पैरामीशियम (Paramecium)
जाति (species) - कॉडेटम (caudatum)
(xiii) जोंक (Leech)
जगत से खण्ड तक (i) मकड़ी के समान
संघ (phylum) - ऐनेलिडा (annelida)
वर्ग (class) - हिरूडीनिया (hirudinea)
गण (order) - नैथोब्डेलिडा (gnathobdelida)
वंश (genus) - हिरूडिनेरिया (hirudinaria)
जाति (species) - ग्रेनुलोसा (granulosa)
(xiv) समुद्री अर्चिन (Sea Urchin)
जगत से संघ तक (iii) तारामीन के समान
वर्ग (class) - इकाइनोइडिया (echinoidea)
गण (order) - कैमारोडोनटा (camarodonta)
वंश (genus) - इकाइनस (Echinus)
जाति (species) - मेले (mele)
(xv) पुर्तगीज मैन ऑफ वार (Portuguese Man of War)
संघ (phylum) - निडेरिया या सीलेन्ट्रेटा (Coelenterata)
वर्ग (class) - हाइड्रोजोआ (Hydrozoa)
गण (order) - साइफोनोफोरा (Siphonophora)
वंश (genus) - फाइसेलिया (Physalia)
In simple words: यह विभिन्न जन्तुओं जैसे टिड्डी, तारामीन, घोंघा, केंचुआ, हाइड्रा, फीताकृमि, यूग्लीना और जोंक का विस्तृत वैज्ञानिक वर्गीकरण है, जिसमें उनके संघ, वर्ग, गण और वंश जैसी श्रेणियाँ शामिल हैं।

🎯 Exam Tip: प्राणियों के वैज्ञानिक वर्गीकरण को समझना जीव विज्ञान की मूलभूत अवधारणा है, जो विभिन्न जीव समूहों के बीच के संबंधों और उनकी विकासवादी स्थिति को दर्शाता है।

 

Question 2. हाइड्रा में श्रम विभाजन पर टिप्पणी लिखिए। या ऊतकीय विभेदीकरण की परिभाषा दीजिए। हाइड्रा के शरीर की संरचना के सन्दर्भ में इसे संक्षेप में समझाइए।
Answer: ऊतकीय विभेदन तथा शरीर क्रियात्मक श्रम विभाजन प्रत्येक जीवधारी गमन, श्वसन, पोषण, उत्सर्जन, वृद्धि, जनन आदि जैविक क्रियाएँ करने में सक्षम होता है। प्रोटोजोआ संघ के सदस्य एककोशिकीय (unicellular) होने पर भी उपर्युक्त क्रियाएँ सम्पन्न कर पाते हैं, जबकि उच्च श्रेणी के जन्तु बहुकोशिकीय होते हैं तथा विभिन्न महत्त्वपूर्ण क्रियाओं के लिए उनके अनुसार विशिष्ट ऊतक तन्त्रों एवं अंगों का निर्माण कर लेते हैं। हेनरी मिल्नी एडवर्ड (Henry Milne Edward, 1800-1885) के अनुसार, जिस प्रकार मानव समाज में कार्यों का विभाजन (जैसे-अध्यापक, चिकित्सक, इन्जीनियर, कृषक, बढ़ई, लुहार, अन्य मजदूर आदि) होता है, उसी प्रकार प्राणियों के शरीर में जैविक क्रियाओं के लिए कोशिकाओं के बीच क्रियात्मक श्रम विभाजन होता है। प्राणी जगत् में हाइड्रा से ही वास्तविक संरचनात्मक विभेदीकरण तथा इससे सम्बन्धित क्रियात्मक श्रम विभाजन प्रारम्भ हुआ है। हाइड्रो एक द्विस्तरीय (diploblastic) प्राणी है और इसकी देहभित्ति के एक्टोडर्म व एण्डोडर्म स्तर विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं। ये कोशिकाएँ विभिन्न कार्यों के लिए उपयोजित होती हैं।
एक्टोडर्म की उपकला-पेशी कोशिकाएँ मुख्यतः रक्षात्मक होती हैं तथा शरीर के फैलने व सिकुड़ने में सहायता प्रदान करती हैं। अन्तराली कोशिकाएँ रूपान्तरित होकर अन्य प्रकार की कोशिकाओं को जन्म देती हैं। जनन कोशिकाएँ केवल जनन में योगदान देती हैं। दंश कोशिकाएँ सुरक्षा, आक्रमण, चिपकने एवं शिकार पकड़ने का कार्य करती हैं। ग्रन्थिम-पेशी कोशिकाएँ हाइड्रा को आधार से चिपकने एवं गमन में सहायता करती हैं। एण्डोडर्म की पोषक-पेशी कोशिकाएँ अमीबा के समान हाइड्रा को भोजन के प्राणिसम अन्तर्ग्रहण (holozoic ingestion) में सहायता करती हैं। हाइड्रा में कोई विशिष्ट संवहन व उत्सर्जन तन्त्र नहीं पाया जाता है। इस प्रकार, हाइड्रा एक सरल द्विस्तरीय प्राणी है, जिसमें संरचनात्मक विभेदीकरण के क्रियात्मक श्रम विभाजन से सम्बन्धित होने के कारण जैविक क्रियाएँ सुविधापूर्वक सम्पन्न होती हैं।
In simple words: हाइड्रा में, ऊतकीय विभेदीकरण और श्रम विभाजन का अर्थ है कि इसकी एक्टोडर्म और एंडोडर्म परतें विभिन्न प्रकार की विशिष्ट कोशिकाएँ बनाती हैं, जो रक्षा, जनन, शिकार पकड़ने और पोषण जैसे अलग-अलग जैविक कार्यों को करती हैं, जिससे एक सरल प्राणी में भी कार्यक्षमता बनी रहती है।

🎯 Exam Tip: हाइड्रा में ऊतकीय विभेदीकरण और श्रम विभाजन को समझना बहुकोशिकीय जीवों में कार्य विशिष्टीकरण के प्रारंभिक रूपों को दर्शाता है।

 

Question 3. पोरीफेरा संघ में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के नाल तन्त्रों का उल्लेख कीजिए। या नाल तन्त्र क्या है ? साइकॉननाल तन्त्र का सचित्र वर्णन कीजिए तथा ल संवहन पथ को तीरों द्वारा प्रदर्शित कीजिए। नाल तन्त्र के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। या निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए-स्पंज में नाल तन्त्र।
Answer: संघ-पोरीफेरा (स्पंजों) में नाल तन्त्र स्पंजों के शरीर की भित्ति में अनेक छिद्रों एवं नलियों का जाल बना होता है, जिसके माध्यम से कीप कोशिकाओं (choanocytes) के कशाभिकों (flagella) की निरन्तर गति होते रहने से स्पंज गुहा (Spongocoel) में जल प्रवाह की धारा अविरल बनी रहती है। इसे नाल तन्त्र या नाल प्रणाली (canal system) कहते हैं। नाल तन्त्र स्पंजों के शरीर का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तन्त्र होता है। स्पंजों की सम्पूर्ण कार्यिकी; जैसे-श्वसन, उत्सर्जन, पोषण आदि नाल तन्त्र में प्रवाहित होने वाले जल द्वारा ही पूरी होती है।
नाल तन्त्रों के प्रकार
स्पंजों में शारीरिक संगठन की जटिलता के आधार पर निम्नलिखित प्रकार के नाल तन्त्र पाये जाते हैं।
1. एस्कॉन प्रकार का नाल तन्त्र :
स्पंजों में पाया जाने वाला यह सबसे सरल प्रकार का नाल तन्त्र है। इस प्रकार के नाल तन्त्र में स्पंज गुहा (spongoceal) के अन्दर उपस्थित कीप कोशिकाओं की कशाभिकाओं की निरन्तर गति के कारण बाहरी जल की अविरल धारा असंख्य ऑस्टिया (रन्ध्रों) से होकर सीधे स्पंज गुहा में प्रवेश करती है और ऑस्कुलम से होकर बाहर निकलती है। इस प्रकार स्पंज का पूरा शरीर एक नाले तन्त्र का कार्य करता है। ल्यूकोसोलेनिया Leucosolenia) नामक सरल स्पंज में इसी प्रकार का नाल तन्त्र पाया जाता है।
2. साइकॉन प्रकार की नाल तन्त्र : इस प्रकार का नाल तन्त्र साइकॉन (स्काइफा) एवं कुछ अन्य स्पंजों में पाया जाता है। यह मूलतः एस्कॉन प्रकार के नाल तन्त्र की भित्ति में अनुप्रस्थ वलन (transverse folds) हो जाने से बनता है। इससे स्पंज की देहभित्ति, पास-पास सटी व शरीर के अक्ष के समकोण पर स्थित अनेक महीन नलिकाओं का रूप ले लेती है, जिन्हें अरीय नाल (radial canals) कहते हैं। प्रत्येक अरीय नाल बाहर की ओर बन्द होती है और भीतर की ओर एक बड़े छिद्र द्वारा स्पंज गुहा में खुलती है जिसे निर्गम छिद्र या अपद्वार या एपोपाइल (apopyle) कहते हैं। इस प्रकार के नाल तन्त्र में ऑस्टिया अरीय नलिकाओं की भित्ति में होते हैं जिन्हें आगामी द्वार या प्रोसोपाइल (prosopyle) कहते हैं।
कीप कोशिकाएँ केवल अरीय नालों को स्तरित करती हैं। स्पंज गुहा का भीतरी स्तर पिनैकोसाइट कोशिकाओं का होता है। अरीय नालों की भित्ति के बीच के स्थान अन्तर्वाही नालों (incurrent canals) का रूप ले लेते हैं। ये स्पंज गुहा की ओर बन्द किन्तु शरीर की बाहरी सतह पर खुलती हैं। बाहरी जल पहले अन्तर्वाही नालों में आता है और आगामी द्वार या प्रोसोपाइल (prosopyle) में होकर अरीय नलिकाओं (जिन्हें कशाभीनलिकाएँ भी कहते हैं) में और फिर एपोपाइल्स द्वारा स्पंज गुहा में आता है। स्पंज गुहा में आया हुआ ल ऑस्कुलम से होकर बाहर निकल जाता है।
3. ल्यूकॉन प्रकार का नाल तन्त्र : यह सबसे जटिल प्रकार का नाल तन्त्र है। इस प्रकार का नालतन्त्र स्पॉन्जिला (Spongilla) आदि स्पंजों में पाया जाता है। इसका निर्माण कशाभिकी लिकाओं की दीवार के वलन से होता है। वलन के कारण इन नलिकाओं की दीवार में छोटे-छोटे गोले कक्ष बन जाते हैं। इन कक्षों को कशाभिकी कक्ष flagellated chambers) कहते हैं। कीप कोशिकाएँ इन कक्षों की दीवार पर ही सीमित रह जाती हैं। अरीय नलिकाओं की गुहाओं के चारों ओर पिनैकोसाइट्स का स्तर होता है। इन्हें अपवाही नलिकाएँ (excurrent canals) कहते हैं। इसमें बाहरी जल पहले अन्तर्वाही नलिकाओं (incurrent canals) में, फिर प्रोसोपाइल्स से कशाभी कक्षों में और एपोपाइल्स से अपवाही नलिकाओं में से होता हुआ स्पंज गुहा में आकर ऑस्कुलम से बाहर निकल जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र स्पंजों के विभिन्न प्रकार के नाल तंत्रों को दर्शाता है। चित्र (A) एस्कॉन प्रकार के सरल नाल तंत्र को दिखाता है, जहाँ जल ऑस्टिया से स्पंजगुहा में प्रवेश कर ऑस्कुलम से बाहर निकलता है। चित्र (B) साइकॉन प्रकार के अधिक जटिल नाल तंत्र को प्रस्तुत करता है, जिसमें रेडियल कैनाल और इनकरेंट कैनाल का विकास होता है। चित्र (C) सबसे जटिल ल्यूकॉन प्रकार के नाल तंत्र को दर्शाता है, जिसमें फ्लैगेलेटेड चैंबर और विस्तृत कैनाल सिस्टम शामिल हैं।
In simple words: स्पंजों का नाल तंत्र उनके शरीर में छिद्रों और नलिकाओं का एक जटिल जाल है, जिसके माध्यम से पानी का प्रवाह होता है, जो श्वसन, पोषण और उत्सर्जन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को पूरा करता है।

🎯 Exam Tip: स्पंजों के नाल तंत्र के विभिन्न प्रकारों (एस्कॉन, साइकॉन, ल्यूकॉन) को समझना उनके शारीरिक संगठन की जटिलता और उनके जीवन कार्यों के लिए उनकी अनुकूलन क्षमता को दर्शाता है।

 

Question 4. दंश कोशिकाओं की संरचना एवं कार्य समझाइए। या हाइड्रा में पायी जाने वाली दो प्रकार की दंश कोशिकाओं का सचित्र वर्णन कीजिए।, या हाइड्रा की दंश कोशिका की स्खलित अवस्था का एक नामांकित चित्र बनाइए (वर्णन की । आवश्यकता नहीं है)। या हाइड्रा में पायी जाने वाली पेनीट्रैण्ट प्रकार की दंश कोशिकाओं का सचित्र वर्णन कीजिए। या टिप्पणी लिखिए-दंश कोशिका।
Answer:
दंशिका की संरचना
दंश कोशिका की इस थैलीनुमा रचना का मुख्य भाग सम्पुट (capsule) कहलाता है। सम्पुट के अग्र सिरे पर भित्ति अन्दर की ओर धंसकर एक गड्डा बनाती है, जो झिल्ली द्वारा ढका रहता है। इस गड्ढे में पायी जाने वाली सूक्ष्म कणिकाओं में एक विशिष्ट पदार्थ भरा रहता है। यह सम्पुट के ढक्कन (lid of operculum) का कार्य करता है। भीतर की ओर धंसने वाली भित्ति एक लम्बे, कुण्डलित वे काँटेदार सूत्र (thread) में रूपान्तरित होती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक दंश कोशिका और दंशिका की संरचना को दर्शाता है। इसमें सम्पुट (capsule), ढक्कन (operculum), बारब्यूल्स (barbules), कॉयलड थ्रेड (coiled thread) और न्यूक्लियस (nucleus) जैसे भाग स्पष्ट रूप से दिखाए गए हैं। दंशिका एक विशेष थैलीनुमा संरचना है जिसके भीतर एक कुण्डलित सूत्र होता है, जो शिकार को पकड़ने और आत्मरक्षा के लिए बाहर निकलता है।
दंशिकाओं के प्रकार
संध निडेरिया के विभिन्न सदस्यों में पायी जाने वाली दंश कोशिकाओं में लगभग 30 प्रकार की दंशिकाएँ होती हैं। हाइड्रा में कुल चार प्रकार की दंशिकाएँ पायी जाती हैं। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है।
1. स्टीनोटील्स अथवा पेनीटैण्ट्स (Stenoteles or Penetrants) : ये सबसे बड़ी व जटिल रचना वाली दंशिका हैं। इनके बड़े कुन्दे पर स्टाइलेट्स व शूल (stylets and spines) पाये जाते हैं। इनके सूत्रों पर भी शूलों (spines) की तीन सर्पिल पंक्तियाँ होती हैं।
2. होलोट्राइकस आइसोराइजाज (Holotrichous Isorhizas) :
ये कुछ लम्बी, अण्डाकार तथा कुन्दविहीन होती हैं। इनका सूत्र लम्बा व सिरे पर खुला होता है। इन पर स्पाइन्स के केवल एक ही सर्पिल पंक्ति होती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र हाइड्रा में पाई जाने वाली विभिन्न दंश कोशिकाओं को दर्शाता है। चित्र (A) स्टीनोटील्स या पेनीट्रेंट प्रकार की दंशिका को दिखाता है जो सबसे जटिल होती है। चित्र (B) होलोट्राइकस आइसोराइजाज को प्रस्तुत करता है, जिसकी सूत्री संरचना लंबी और खुली होती है। चित्र (C) एट्राइकस आइसोराइजाज को दर्शाता है, जिसमें सूत्र पर स्पाइन्स नहीं होते। चित्र (D) डेस्मोनीम या वॉलवेंट को दिखाता है, जो सूत्र को कुंडलित रूप में दर्शाता है, जो शिकार को लपेटने के लिए उपयोग होता है।
3. एट्राइकस आइसोराइजाज (Atrichous Isorhizas) : ये कुछ छोटी होती हैं तथा इनके सूत्रों पर स्पाइन्स नहीं पाये जाते हैं।
4. डेस्मोनीम या वॉलवेण्ट (Desmoneme Or Volvent) : सबसे छोटी, 9 व्यास की, नाशपाती के आकार की, गोल व अण्डाकार इन दंशिकाओं को सूत्र छोटा, मोटा, सिरे पर बन्द व कुन्दविहीन होता है। ये एक ही बार कुण्डलित होती है तथा इन पर केवल कुछ ही स्पाइन्स पाये जाते हैं।
5. दंशिकाओं का दगना या स्खलन (Dscharge of Nematocysts) उत्तेजित होने पर दंश कोशिकाओं के सूत्र तुरन्त झटके के साथ ऑपरकुलम को धकेल कर बाहर निकल आते हैं। इस प्रकार भीतरी पदार्थ एवं काँटे सूत्र के साथ दंशिका की बाहरी सतह पर आ जाते हैं। इवान्जोफ (Iwanzoff, 1895) के मतानुसार दंशिका में जब भी द्रव्य का दबाव बढ़ता है तो यह स्खलित हो जाती है।
दंशिकाओं के कार्य
1. स्टीनोटील्स या पेनीट्रैण्ट्रेस का सूत्रे भोजन योग्य शिकार के सम्पर्क में आने पर तेजी से दगकर शिकार के शरीर में चुभ जाता है। यह हिप्नोटॉक्सिन (hypnotoxin) नामक विषैले पदार्थ द्वारा शिकार को अचेत कर मार देता है।
2. डेस्मोनीम्स जब शिकार के सम्पर्क में आती हैं तो इनके सूत्र शिकार को चारों ओर से लपेटकर जकड़ लेते हैं।
3. होलोट्राइकस आइसोराइजाज के सूत्रों के स्पाइन्स शत्रु के शरीर में घुसकर हाइड्रा को उससे बचाने में सहायता करते हैं।
4. एट्राइकस आइसोराइजाज के सूत्र चिपचिपे होते हैं। ये उपयुक्त आधार पर स्पर्शकों को चिपकने में सहायता करते हैं। इस प्रकार ये हाइड्रा को गमन में सहयोग देते हैं।
In simple words: दंश कोशिकाएँ हाइड्रा जैसे जीवों में विशेष संरचनाएँ हैं जिनमें एक जहरीला सूत्र होता है जो शिकार को अचेत करने, पकड़ने और दुश्मनों से बचाव में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: दंश कोशिकाओं की संरचना और उनके विभिन्न प्रकारों के कार्यों को समझना निडेरिया संघ के जीवों की शिकार करने और आत्मरक्षा की रणनीतियों को दर्शाता है।

 

Question 5. ज्वाला कोशिका किसे कहते हैं? यह किस जन्तु में पायी जाती हैं? इसके कार्य लिखिए। या ज्वाला कोशिकाओं की संरचना एवं कार्य समझाइए।
Answer: ज्वाला कोशिकाएँ या शिखा कोशिकाएँ ये विशेष प्रकार की उत्सर्जी (excretory) कोशिकाएँ हैं जिनमें प्रमुखतः दो भाग होते हैं।
1. कोशिका का प्रमुख अण्डाकार भाग कोशिका काय (cell body) कहलाता है। इसको शिखा कन्द (flame bulb) भी कहते हैं। इसी भाग में केन्द्रक (nucleus) होता है। इसकी सतह से लगभग सभी ओर शाखित प्रवर्द्ध (cytoplasmic processes) निकले रहते हैं जो पैरेन्काइमा में इधर-उधर फैले रहते हैं।
2. शिखा कन्द से एक ओर एक लम्बा सँकरा तथा नाल के समान भाग होता है जिसका अन्दर का खोखला भाग कन्द के अन्दर उपस्थित गुहा से सम्बन्धित होता है। यह गुहा काफी चौड़ी होती है। इसके चौरस भाग के जीवद्रव्य में छोटे-छोटे कई आधार कण (basal granules) होते हैं। जिनसे कशाभिकाएँ (flagella) निकलकर गुहा में लटकी रहती हैं तथा एक लौ के समान हर समय काँपती रहती हैं। ये आपस में गुच्छा बनाती हैं। यह गुहा सँकरी होकर एक महीले नलिका के रूप में अन्य नलिकाओं से सम्बन्धित रहती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र टीनिया की एक शिखा (ज्वाला) कोशिका को दर्शाता है, जिसमें कोशिका काय (cell body) या फ्लेम बल्ब (flame bulb), केंद्रक (nucleus), साइटोप्लाज्मिक प्रोसेस (cytoplasmic processes), बेसल ग्रेन्यूल्स (basal granules), कशाभिकाएँ (flagella) और उत्सर्जी केशिका (excretory capillary) जैसे विभिन्न घटक स्पष्ट रूप से दिखाए गए हैं। ज्वाला कोशिका उत्सर्जन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
ज्वाला कोशिकाएँ प्लेटीहेल्मिन्थीज समूह की उत्सर्जन इकाइयाँ होती हैं। टीनिया जैसे अन्तःपरजीवी जन्तुओं में इनका कार्य स्पष्ट नहीं है।
In simple words: ज्वाला कोशिकाएँ विशेष उत्सर्जी कोशिकाएँ हैं जो प्लेटीहेल्मिंथीज में पाई जाती हैं, जिनमें एक लौ जैसी कशाभिकाओं का गुच्छा होता है जो अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: ज्वाला कोशिकाओं की संरचना और कार्य को समझना चपटे कृमियों के उत्सर्जन तंत्र की विशिष्टता को दर्शाता है, जो उनके शारीरिक अनुकूलन का एक महत्वपूर्ण पहलू है।

 

Question 6. नर तथा मादा ऐस्कैरिस में अन्तर स्पष्ट कीजिए। या मनुष्य के शरीर में पाये जाने वाले गोलकृमि का वैज्ञानिक नाम व वासस्थान (अंग) लिखिए तथा उनके नर व मादा का एक-एक पहचान के लक्षण बताइए।
Answer: मनुष्य में पाया जाने वाला गोलकृमि-ऐस्कैरिस लम्ब्रीकॉयडिस (Ascaris lumbricoides)। इसका वासस्थान (अंग)- मनुष्य की आँत।
नर तथा मादा ऐस्कैरिस में अन्तर

नर ऐस्कैरिसमादा ऐस्कैरिस
• यह लगभग 15-30 सेमी लम्बा व 3-5 मिमी मोटा होता है।• इसकी लम्बाई लगभग 20-40 सेमी तथा मोटाई 6-8 मिमी होती है।
• इसके शरीर का पश्च सिरा अधर तल की ओर मुड़ा हुआ होता है।• इसके शरीर का पश्च सिरा सीधा होता है।
• इसमें गुदा एवं जनन छिद्र अलग-अलग नहीं होते तथा अवस्कर छिद्र (cloacal aperture) पश्च छोर के पास होता है।• इसमें गुदा (anus) एवं जनन छिद्र (female genital pore or vulva) अलग-अलग होते हैं। गुदा पश्च छोर के तथा भग अग्र छोर के पास होती है।
• अवस्कर द्वार से एक जोड़ा पीनियल शूक (penial spicules) निकले रहते हैं।• पीनियल शूक नहीं पाये जाते हैं।
• पश्च एवं अग्र गुद अंकुर (anal papillae) उपस्थित होते हैं।• पश्च एवं अग्र गुद अंकुर नहीं होते हैं।

In simple words: नर ऐस्कैरिस मादा से छोटे होते हैं, उनका पिछला सिरा मुड़ा हुआ होता है और उनमें पीनियल शूक व गुद अंकुर होते हैं, जबकि मादा सीधी, लंबी होती है और उनमें जनन छिद्र गुदा से अलग होता है तथा पीनियल शूक अनुपस्थित होते हैं।

🎯 Exam Tip: नर और मादा ऐस्कैरिस के बीच के अंतर को समझना उनके प्रजनन जीव विज्ञान और मनुष्यों में परजीवी संक्रमणों के निदान के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 7. निम्नलिखित के नामांकित चित्र बनाइए
(क) मादा ऐस्कैरिस के मध्य भाग की अनुप्रस्थ काट।
(ख) नर ऐस्कैरिस के मध्य भाग की अनुप्रस्थ काट।
Answer:
(क)
मादा ऐस्कैरिस के मध्य भाग की अनुप्रस्थ काट
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मादा ऐस्कैरिस के मध्य भाग की अनुप्रस्थ काट (ट्रांसवर्स सेक्शन) को दर्शाता है। इसमें क्यूटिकल, एपिडर्मिस, डोर्सल नर्व, लैटरल नर्व, वेंट्रो-लैटरल नर्व, गर्भाशय (uterus), डिंबवाहिनी (oviduct), अंडाणु (eggs) और आंत के विभिन्न परतें स्पष्ट रूप से दिखाई गई हैं।
(ख)
नर ऐस्कैरिस के मध्य भाग की अनुप्रस्थ काट
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र नर ऐस्कैरिस के मध्य भाग की अनुप्रस्थ काट को दर्शाता है। इसमें क्यूटिकल, सिंसिटियल एपिडर्मिस, डोर्सो-लैटरल नर्व, लैटरल नर्व, वेंट्रो-लैटरल नर्व, एक्सक्रीटरी कैनाल, टेस्टिस (वृषण) जिसमें शुक्राणु होते हैं, सेमिनल वेसिकल, एमीबॉइड शुक्राणु और वास डेफेरेंस जैसे भाग स्पष्ट रूप से दिखाए गए हैं।
In simple words: इन चित्रों में मादा और नर ऐस्कैरिस के शरीर के मध्य भाग के अनुप्रस्थ काट दिखाए गए हैं, जो उनकी आंतरिक संरचना, जननांगों और तंत्रिका तंत्र के संगठन को स्पष्ट करते हैं।

🎯 Exam Tip: नर और मादा ऐस्कैरिस के अनुप्रस्थ काट के नामांकित चित्रों का अभ्यास करना उनके शारीरिक अंतरों और आंतरिक अंगों की स्थिति को समझने में मदद करता है।

 


ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मादा ऐस्कैरिस के मध्य भाग की अनुप्रस्थ काट को दर्शाता है, जिसमें क्यूटिकल, एपिडर्मिस, डोर्सल नर्व, लैटरल लाइन, ओवरी, यूटेरस और एक्सक्रीटरी कैनाल जैसी विभिन्न आंतरिक संरचनाएँ स्पष्ट रूप से दिखाई गई हैं।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र नर ऐस्कैरिस के मध्य भाग की अनुप्रस्थ काट को दर्शाता है, जिसमें क्यूटिकल, सिंसिटियल एपिडर्मिस, मस्कुलर लेयर, टेस्टिस, सेमिनल वेसिकल और एक्सक्रीटरी कैनाल जैसी विभिन्न आंतरिक संरचनाएँ स्पष्ट रूप से दिखाई गई हैं।

Question 8. केंचुए के आर्थिक महत्त्व का वर्णन कीजिए या “केंचुए किसानों के परम मित्र हैं?” संक्षेप में स्पष्ट कीजिए। या केंचुए की जैव पारिस्थितिकी एवं आर्थिक महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
Answer: केंचुए का आर्थिक महत्त्व केंचुए 'किसान के मित्र' कहे जाते हैं, क्योंकि वे खेतों की मिट्टी को सुरंगें बनाकर पोली कर देते हैं तथा नीचे की मिट्टी को ऊपर पलट देते हैं, जिससे भूमि अधिक उपजाऊ बनती है। इसके साथ ही केंचुए कार्बनिक पदार्थों को सुरंगों में ले जाते हैं जो खाद के रूप में सहायक होते हैं तथा केंचुए स्वयं भी मरकर सुरंगों के अन्दर खाद के रूप में बदल जाते हैं। केंचुए से मनुष्य को खेती के लिए उपजाऊ भूमि प्राप्त करने के अतिरिक्त अन्य लाभ भी हैं; जैसे
1. ऑस्ट्रेलिया की आदिम जातियाँ केंचुए को भोजन के रूप में ग्रहण करती हैं।
2. काँटों में लगाकर मछलियों को पकड़ने हेतु इसे चारे के रूप में प्रयोग करते हैं।
3. अपने देश में गठिया रोग के लिए यह औषधि बनाने के काम में आता है।
4. प्रयोगशाला में अध्ययन सामग्री के रूप में प्रयोग किया जाता है। केंचुओं से होने वाली हानियाँ कोई विशेष महत्त्व नहीं रखती हैं। कई बार वर्षा ऋतु में इनके द्वारा बनायी गयी सुरंगों के ढेर मृदा अपरदन का कारण बन जाते हैं। केंचुओं की कुछ जातियाँ पान, इलायची, धान आदि के पौधों के लिए हानिकारक होती हैं।
In simple words: केंचुआ मिट्टी को उपजाऊ बनाता है, भोजन और औषधि के स्रोत के रूप में काम आता है, और प्रयोगशाला अध्ययन के लिए उपयोगी है, जिससे यह किसानों का महत्वपूर्ण मित्र बन जाता है।

🎯 Exam Tip: केंचुए के कृषि संबंधी लाभों और पारिस्थितिक भूमिका को उजागर करना महत्वपूर्ण है।

 

Question 9. किन्हीं दो ऐसे लक्षणों को लिखिए जो नॉन-कॉडेंट्स को कॉडेंट्स से पूर्णतः विभेदित करते हैं?
Answer: कॉडेंट एवं नॉन-कॉडेंट में अन्तर

कॉर्डेटनॉन-कॉर्डेट
• पृष्ठ रज्जु उपस्थित होता है।• पृष्ठ रज्जु अनुपस्थित होता है।
• केन्द्रीय तन्त्रिका-तन्त्र, पृष्ठीय एवं खोखला तथा एकल होता है।• केन्द्रीय तन्त्रिका-तन्त्र अधरतल में ठोस एवं दोहरा होता है।

In simple words: कॉर्डेट्स में पृष्ठ रज्जु और एक एकल, खोखला, पृष्ठीय तंत्रिका तंत्र होता है, जबकि नॉन-कॉर्डेट्स में ये संरचनाएं अनुपस्थित या भिन्न होती हैं।

🎯 Exam Tip: पृष्ठ रज्जु (notochord) और तंत्रिका तंत्र की स्थिति जैसे मुख्य विभेदक लक्षणों को सटीक रूप से याद रखना चाहिए।

 

Question 10. निम्नलिखित के संघ सहित जन्तु वैज्ञानिक नाम लिखिए
(क) जेली फिश (jelly fish)
(ख) सिल्वर फिश (silver fish)
(ग) स्टार फिश (star fish)
(घ) डॉग फिश (dog fish)
(ङ) कबूतर (pigeon)
(च) खरगोश (rabbit)
(छ) जोंक (leech)

Answer:

सामान्य नामसंघजन्तु वैज्ञानिक नाम
(क) जेली फिश (jelly fish)सीलेण्ट्रेटा (coelenterata)ऑरेलिया ऑरिटा (Aurelia aurita)
(ख) सिल्वर फिश (silver fish)आर्थोपोडा (arthropoda)लेपिस्मा (Lepisma)
(ग) स्टार फिश (starfish)इकाइनोडर्मेटा (echinodermata)ऐस्टेरियस रूबेन्स (Asterias rubens)
(घ) डॉग फिश (dog fish)कॉर्डेटा (chordata)स्कॉलिओडॉन सोरेकोवाह (Scoliodon sorrakkowah)
(ङ) कबूतर (pigeon)कॉर्डेटा (chordata)कोलम्बा लीविया (Columba livia)
(च) खरगोश (rabbit)कॉर्डेटा (chordata)लीपस करपियम्स (Lepus curpaeums)
(छ) जोंक (leech)ऐनेलिडा (annelida)हिरूडिनेरिया ग्रेनुलोसा (Hirudinaria granulosa)

In simple words: यह तालिका विभिन्न सामान्य जन्तुओं के संघ और उनके वैज्ञानिक नाम सूचीबद्ध करती है, जो जीवों की पहचान और वर्गीकरण में मदद करती है।

🎯 Exam Tip: सामान्य नामों के साथ जन्तुओं के वैज्ञानिक नामों और उनके संबंधित संघों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 11. चमगादड़ का वर्गीकरण वर्ग तक कीजिए तथा इसके दो लक्षण लिखिए। या चमगादड़ चिड़ियों के समान उड़ता है फिर भी इसे स्तनी वर्ग में क्यों रखा गया है ?
Answer: लक्षण :
1. शरीर पर बाल (hair) तथा बाह्य कर्ण (pinna) होते हैं।
2. मादा बच्चे उत्पन्न करती है तथा अपनी स्तन ग्रन्थियों से बच्चों को दूध पिलाती है।
उपर्युक्त दोनों ही लक्षण स्तनियों के मूल लक्षण हैं। इनके शरीर पर अथवा विकास में पक्षियों के कोई लक्षण; जैसे शरीर पर परों (feathers) की उपस्थिति आदि नहीं होते हैं अतः इन्हें स्तनी वर्ग में ही रखा जाता है।
वर्गीकरण
संघ (phylum) – कॉर्डेटा (chordata)
समूह (group) – क्रेनियेटा (craniata)
उपसंघ (sub-phylum) – नैथोस्टोमैटा (gnathostomata)
महावर्ग (superclass) – टेट्रापोडा (tetrapoda)
वर्ग (class) – मैमेलिया (mammalia)
उपवर्ग (subclass) – यूथेरिया (eutheria)
गण (order) – काइरोप्टेरा (chiroptera)
वंश (genus) – टेरोपस (Pteropus)
जाति (species) – जाइजैण्टिअस (giganteus)
In simple words: चमगादड़ उड़ते ज़रूर हैं, लेकिन उनके शरीर पर बाल, बाह्य कर्ण और स्तन ग्रंथियाँ होती हैं, जिससे वे स्तनधारी वर्ग में शामिल किए जाते हैं, न कि पक्षी वर्ग में।

🎯 Exam Tip: चमगादड़ के वर्गीकरण में मुख्य स्तनधारी लक्षणों पर ध्यान केंद्रित करें जो उन्हें पक्षियों से अलग करते हैं।

 

Question 12. कारण बताइए
(अ) हेल मछली नहीं, स्तनधारी है। क्यों?
(ब) एकिडना अण्डे देता है, फिर भी स्तनधारी वर्ग का सदस्य है। क्यों?

Answer: ह्वेल मछली तथा एकिडना दोनों को ही संघ कॉडेंटा वर्ग-स्तनधारी में रखा गया है, क्योंकि इनमें बाल तथा स्तन ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। दाँत, विषमदन्ती एवं गर्तदन्ती होते हैं। ग्रीवा कशेरुकाओं की संख्या सात होती है। मध्य कर्ण में तीन छोटी अस्थियाँ पाई जाती हैं।
In simple words: ह्वेल और एकिडना दोनों स्तनधारी हैं क्योंकि उनमें बाल, स्तन ग्रंथियाँ, और विशिष्ट दाँत व कर्ण अस्थियाँ होती हैं, भले ही एकिडना अंडे देता हो।

🎯 Exam Tip: स्तनधारियों के मुख्य लक्षणों पर जोर दें, खासकर स्तन ग्रंथियों और बालों की उपस्थिति पर, जो उन्हें अन्य वर्गों से अलग करते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. निम्नलिखित जन्तुओं का वर्गीकरण कीजिए
(i) जेली फिश (jelly fish)
(ii) मेंढक (frog)
(iii) गौरेया (sparrow)
(iv) कुत्ता मछली (स्कोलिओडॉन) (dog fish)
(v) समुद्री घोड़ा (sea horse)
(vi) घरेलू छिपकली (wall lizard)
(vii) नाग (cobra)
(viii) कबूतर (pigeon)
(ix) आधुनिक मनुष्य (modern man)
(x) झींगा मछली (prawn)
(xi) तिलचट्टा (cockroach)
(xii) टोड (toad)
(xiii) ड्रैको (Draco)
(xiv) खरगोश (rabbit)

Answer:
(i) जेली फिश
जगत (kingdom) – जन्तु जगत (animal kingdom)
उपजगत (sub-kingdom) – मेटाजोआ (metazoa)
अधोजगत (infrakingdom) - एण्टेरोजोआ (enterozoa)
शाखा (division) – रेडिएटा (radiata)
संघ (phylum) – निडेरिया (cnidaria)
वर्ग (class) – स्काइफोजोआ (scyphozoa)
गण (order) – सीमिओस्टोमी (semaeostomea)
वंश (genus) – ऑरीलिया (Aurelia)
जाति (species) - ऑरिटा (aurita)


(ii) मेंढक
जगत (kingdom) – जन्तु जगत (animal kingdom)
उपजगत (sub-kingdom) – मेटाजोआ (metazoa)
अधोजगत (infrakingdom) – एण्टेरोजोआ (enterozoa)
शाखा (division) – बाइलैटेरिया (bilateria)
प्रभाग (sub-division) – यूसीलोमैटा (eucoelomata)
संघ (phylum) – कॉर्डेटा (chordata)
उपसंघ (sub-phylum) – वर्टीब्रेटा (vertebrata)
समूह (group) – नैथोस्टोमैटा (gnathostomata)
महावर्ग (superclass) – टेट्रापोडा (tetrapoda)
वर्ग (class) – एम्फीबिया (amphibia)
गण (order) – ऐन्यूरा (anura)
वंश (genus) – राना (Rana)
जाति (species) – टिग्रीना (tigrina)


(iii) गौरेया
जगत से महावर्ग तक मेंढक के समान
वर्ग (class) – पक्षी (aves)
गण (order) – पैसेरीफ़ॉर्मिस (passeriformes)
वंश (genus) – पैसर (Passer)
जाति (species) – डोमेस्टिका (domestica)


(iv) कुत्ता मछली
जगत से समूह तक मेंढक के समान
महावर्ग (superclass) – पिसीज (pisces)
वर्ग (class) – कॉण्ड्रिक्थीज (chondrichthyes)
गण (order) – स्क्वैलीफॉर्मिस (squaliformes)
वंश (genus) – स्कोलिओडॉन (Scoliodon)


(v) समुद्री घोड़ा
जगत से महावर्ग तक डॉग फिश के समान
वर्ग (class) – ऑस्टिक्थीज (osteichthyes)
उपवर्ग (sub-class) – ऐक्टिनोप्टेरीजाई (actinopterygii)
गण (order) – गैस्टेरोस्टिफॉर्मिस (gasterosteiformes)
वंश (genus) – हिप्पोकैम्पस (Hippocampus)


(vi) घरेलू छिपकली
जगत से महावर्ग तक मेंढक के समान
वर्ग (class) – रेप्टीलिया (reptilia)
उपवर्ग (sub-class) – लेपिडोसॉरिया (lepidosauria)
गण (order) – स्क्वैमैटा (squamata)
वंश (genus) – हेमीडैक्टाइलस (Hemidactylus)


(vii) नाग
जगत से गण तक घरेलू छिपकली के समान
वंश (genus) – नाजा (Naja)


(viii) कबूतर
जगत से महावर्ग तक मेंढक के समान
वर्ग (class) – ऐवीज (aves)
उपवर्ग (sub-class) – निओर्निथीज (neornithes)
गण (order) – कोलम्बीफॉर्मिस (columbiformes)
वंश (genus) – कोलम्बा (Columba)


(ix) आधुनिक मनुष्य
जगत से महावर्ग तक मेंढक के समान
वर्ग (class) – स्तनी (mammalia)
उपवर्ग (sub-class) – थीरिया (theria)
अधिवर्ग (infraclass) – यूथीरिया (eutheria)
गण (order) – प्राइमेट्स (primates)
वंश (genus) – होमो (Homo)


(x) झींगा मछली
जगत (kingdom) – एनिमेलिया (animalia)
संघ (phylum) – आर्थोपोडा (arthropoda)
उपसंघ (sub-phylum) – क्रस्टेसिया (crustacea)
वर्ग (class) – मैलाकॉस्ट्रेका (malacostraca)
गण (order) – डेकापोडा (decapoda)
उपगण (sub-order) – डैण्ड्रोब्रैकिएटा (dandrobranchiata)
कुल (family) – पेनिडेई (penaeidae)
वंश (genus) – फेनेरोपिनियस (Fenneropenaeus)
जाति (species) – इण्डिकस (indicus)


(xi) तिलचट्टा
जगत (kingdom) – एनिमेलिया (animalia)
संघ (phylum) – आर्थोपोडा (arthropoda)
वर्ग (class) – इन्सेक्टा (insecta)
गण (order) – ब्लेतोडिआ (blattodea)
कुल (family) – ब्लेटीडई (blattidae)
वंश (genus) – पेरिप्लेनेटा (Periplaneta)
जाति (species) – अमेरीकाना (americana)


(xii) टोड
जगत (kingdom) – एनिमेलिया (animalia)
संघ (phylum) – कॉर्डेटा (chordata)
वर्ग (class) – एम्फीबिया (amphibia)
गण (order) – एन्यूरा (anura)
वंश (genus) – ब्यूफो (Bufo)
जाति (species) – मिलैनोस्टिक्टस (melanostictus)


(xiii) ड्रैको
जगत (kingdom) – एनिमेलिया (animalia)
संघ (phylum) – कॉर्डेटा (chordata)
वर्ग (class) – रेप्टीलिया (reptilia)
गण (order) – स्क्वैमेटा (squamata)
वंश (genus) – ड्रैको (Draco)
जाति (species) – वोलन्स (volans)


(xiv) खरगोश
जगत (kingdom) – एनिमेलिया (animalia)
संघ (phylum) – कॉर्डेटा (chordata)
वर्ग (class) – मैमेलिया (mammalia)
गण (order) – लैगोमोर्फा (lagomorpha)
वंश (genus) – लीपस (Lepus)
जाति (species) – करपियम्स (curpaeums)
In simple words: यह विस्तृत वर्गीकरण विभिन्न जन्तुओं को उनके पदानुक्रमिक स्तरों- जगत, संघ, वर्ग, गण, वंश और जाति के अनुसार वर्गीकृत करता है, जिससे उनकी पहचान और जैविक संबंधों को समझने में मदद मिलती है।

🎯 Exam Tip: प्रत्येक जीव के वर्गीकरण के पदानुक्रम को चरण-दर-चरण याद करें और प्रत्येक स्तर के लिए सही वैज्ञानिक नाम का उपयोग करें।

 

Question 2. कॉडेटा संघ के प्राणियों के मूल लक्षणों का सविस्तार वर्णन कीजिए। स्तनी वर्ग के प्राणियों को उपवर्ग तक प्रमुख लक्षणों एवं उदाहरण सहित वर्गीकृत कीजिए। या स्तनी वर्ग के प्राणियों के प्रमुख लक्षणों का उल्लेख कीजिए तथा प्रोटोथेरिया, मेटाथेरिया एवं यूथेरिया में उदाहरणों सहित अन्तर बताइए। या पृष्ठवंशी के चार मूल लक्षणों को लिखिए।
Answer: संघ-कॉडेंटा के प्रमुख लक्षण
1. कॉडेटा संघ के प्राणियों का शरीर द्विपार्श्व सममित (bilaterally symmetrical), देहगुहीय (coelomate) तथा त्रिजनस्तरीय (triploblastic) होता है।
2. इनके जीवन में किसी-न-किसी अवस्था में शरीर के मध्य पृष्ठ भाग में मेरुदण्ड अथवा नोटोकॉर्ड (notochord) अवश्य ही पाया जाता है।
3. इनमें जीवन की किसी-न-किसी अवस्था में ग्रसनी (pharynx) की दीवार में एक जोड़ा गिल दरारों (gills clefts) को अवश्य बनती है।
4. इनमें शरीर के पृष्ठ मध्य तल में मस्तिष्क से लेकर शरीर के पिछले सिरे तक विस्तृत एक खोखली केन्द्रीय तन्त्रिका नाल (central neural tube) पायी जाती है।
5. इनमें हृदय देहगुहा में अधर तल पर स्थित होता है तथा रुधिर परिसंचारी तन्त्र बन्द (closed) प्रकार का होता है।
6. इनमें रुधिर में लाल रुधिर कणिकाएँ (red blood corpuscles) पायी जाती हैं जिनमें ऑक्सीजन ग्राही हीमोग्लोबिन (haemoglobin) नामक लाल वर्णक पाया जाता है
स्तनधारियों (मैमेलिया) के प्रमुख लक्षण
1. इस वर्ग के जन्तु नियततापी होते हैं अर्थात् इनका ताप सदैव एक-सा रहता है।
2. इन जन्तुओं की त्वचा रोमयुक्त होती है। अधिकतर जन्तुओं का शरीर बालों (hair) से ढका रहता है।
3. इनमें बाह्य कर्ण (external ears) पाये जाते हैं।
4. मादी में स्तन ग्रन्थियाँ (mammary glands) होती हैं, जिनसे ये नवजात शिशु को दूध पिलाती है।
5. गर्दन में केवल सात ग्रीवा कशेरुकाएँ (cervical vertebrae) होती हैं।
6. त्वचा में तेल ग्रन्थियाँ (oil glands) तथा स्वेद ग्रन्थियाँ (sweat glands) होती हैं।
7. देहगुहा एक पेशीय मध्यछद या डायफ्राम (diaphragm) द्वारा वक्षीय गुहा तथा उदरगुहा (thoracic and abdominal cavity) में बँटी रहती है।
8. हृदय में चार कोष्ठ (four chambers) होते हैं तथा यह पूर्ण विकसित होता है। केवल बायाँ दैहिक चाप (left systemic arch) ही उपस्थित होता है।
9. मुख गुहिका (buccal cavity) नासामार्ग (nasal passage) से एक उपास्थि-अस्थि की प्लेट से अलग रहती है।
10. श्वसन केवल फेफड़ों (lungs) के द्वारा होता है।
11. कपाल तन्त्रिकाएँ (cranial nerves) बारह जोड़े होती हैं।
12. नर स्तनधारियों में शिश्न (penis) के रूप में मैथुन अंग होता है तथा वृषण (testes) उदरगुहा के बाहर वृषण कोषों (scrotal sacs) में पाये जाते हैं।
13. योनि एकल (vagina single) होती है तथा दोनों गर्भाशय परस्पर पूर्णतः मिले रहते हैं।
14. निषेचन मादा के शरीर के अन्दर अण्डवाहिनी (fallopian tube) में होता है।
15. बच्चों को जन्म देते हैं जिनका परिवर्द्धन गर्भाशय (uterus) में होता है। (कुछ स्तनधारी; जैसे-एकिडना (echidna) तथा डकबिल प्लेटीपस या ऑर्निथोरिंकस (Ornithorhynchus) अण्डे देते हैं।
स्तनधारियों का वर्गीकरण
पुराने वर्गीकरण में वर्ग मैमेलिया को सीधे तीन उपवर्गों (subclasses) में बाँट दिया करते थे-प्रोटोथेरिया, मेटाथेरिया तथा यूथेरिया किन्तु वर्तमान में वर्ग मैमेलिया को दो उपवर्गो-प्रोटोथेरिया (prototheria) तथा थेरिया (theria) में वर्गीकृत करते हैं।
उपवर्ग 1.
प्रोटोथेरिया :
1. चुचुक स्पष्ट नहीं होते, स्तन ग्रन्थियाँ सक्रिय ।
2. अण्डे देते हैं शिशु बाहर ही अण्डे से निकलता है।
3. जरायु (placenta) उपस्थित नहीं।
4. एक ही छिद्र अवस्कर द्वार (Cloacal aperture) के रूप में।
5. मस्तिष्क में कॉर्पस कैलोसम अनुपस्थित ।
उदाहरण :
(i) डकबिल प्लेटोपस (Duckbill platypus) या ऑर्निथोरिंकस (Ornithorhynchus),
(ii) एकिडना (echidna) आदि ।
उपवर्ग 2.
थेरिया
अधिवर्ग 1 :
पैण्टोथेरिया (Pantotheria) : सभी जन्तु विलुप्त हो चुके हैं।
अधिवर्ग 2 :
मेटाथेरिया (Metatheria) :
कुछ ही जन्तु जीवित हैं। इनके निम्नलिखित लक्षण हैं।
1. मादा के उदर पर चूचुकों को ढके हुए त्वचा की थैली होती है, इसे शिशुधानी या मार्क्सपियम (marsupium) कहते हैं। जन्म के समय शिशु अपरिपक्व होते हैं। ये रेंगकर, शिशुधानी में पहुँचकर, अपने मुख द्वारा चूचुकों से चिपक जाते हैं तथा दुग्धपान करते हैं।
2. कपाल गुहा छोटी होती है।
3. दाँत जीवन में केवल एक ही बार निकलते हैं (monophyodont)
4. जरायु (placenta) अल्प विकसित अथवा अनुपस्थित होता है।
5. गर्भाशय तथा योनि जोड़े में (paired) होते हैं।
उदाहरण :
(i) ऑस्ट्रेलिया का कंगारू (Macropus)
(ii) तस्मानिया का डैसीयूरस (Dasyurus)
(iii) अमेरिका : का ओपोसम (Opossum or Didelphis)
अधिवर्ग 3.
यूथेरिया (Eutheria) : पूर्ण विकसित स्तनी हैं। इनके निम्नलिखित लक्षण हैं।
1. मादा के गर्भाशय में भ्रूण एवं शिशु का जरायु (placenta) द्वारा पूर्ण पोषण होने से शिशु जन्म के समय पूर्ण परिपक्व ।
2. मार्क्सपियम अनुपस्थित, चूचुक भली-भाँति विकसित ।
3. कॉर्पस कैलोसम (corpus callosum) तथा मस्तिष्क भली-भाँति विकसित ।
4. गर्भाशय एवं योनि केवल एक-एक (uterus and vagina single) होते हैं।
उदाहरण :
(i) चूहा
(ii) खरगोश
(iii) चमगादड़
(iv) ह्वेल
(v) हाथी
(vi) मनुष्य आदि ।
In simple words: कॉर्डेटा के मूल लक्षणों में नोटोकॉर्ड, ग्रसनी गिल दरारें और पृष्ठीय खोखली तंत्रिका नाल शामिल हैं, जबकि स्तनधारियों को उनके नियततापी स्वभाव, बालों, स्तन ग्रंथियों, डायफ्राम और चार-कक्षीय हृदय से पहचाना जाता है, जिन्हें प्रोटोथेरिया, मेटाथेरिया और यूथेरिया में वर्गीकृत किया जाता है।

🎯 Exam Tip: कॉर्डेटा और स्तनधारियों दोनों के मुख्य लक्षणों और उनके वर्गीकरण उपवर्गों, विशेष रूप से प्रजनन विशेषताओं पर ध्यान दें।

 

Question 3. उभयचर वर्ग के प्राणियों के प्रमुख लक्षणों का उल्लेख कीजिए। इस वर्ग को गण तक उनके लक्षणों एवं उदाहरणों सहित वर्गीकृत कीजिए। या उभयचर वर्ग (क्लास एम्फिबिया) के दो प्राणियों के जन्तु-वैज्ञानिक नाम लिखिए तथा उनके चार प्रमुख लक्षण बताइए ।
Answer: उभयचरों के प्रमुख लक्षण
1. ये जीवन चक्र का अधिकांश भाग जल व थल दोनों स्थानों पर पूरा करते हैं। इनके शरीर असमतापी (cold blooded) होते हैं। शरीर सिर, धड़ व पुच्छ में विभाज्य होता है।
2. त्वचा शल्कविहीन होती है तथा इसमें अनेक श्लेष्म ग्रन्थियाँ (mucous glands) व विष ग्रन्थियाँ (poison glands) होती हैं। इस पर बाल या फर भी नहीं होते । त्वचा अधिकांशतः चिकनी तथा नम होती है। सभी ग्रन्थियाँ बहुकोशिकीय होती हैं।
3. सभी में कायान्तरण (metamorphosis) पाया जाता है।
4. अवस्कर वेश्म (cloacal chamber) उपस्थित होता है।
5. करोटि (skull) में रीढ़ की अस्थि की प्रथम कशेरुका के साथ सन्धियोजन (articulation) के लिए दो पश्चकपाल मुण्डिकाएँ (occipital condyles) होती हैं।
6. उँगलियों में नख या नखर (claws) आदि नहीं होते हैं।
7. हृदय त्रिवेश्मी (three-chambered) होता है, दो अलिन्द (auricles) व एक निलय । इनकी लाल रुधिर कणिकाएँ (RBCS) केन्द्रकयुक्त (nucleated) होती हैं।
8. उत्सर्जन वृक्कों (nephridia) द्वारा। ये यूरिया उत्सर्गी (ureotelic) होते हैं।
9. ये अंडायुज (oviparous) होते हैं। अण्डे जल में या नम जगहों में दिये जाते हैं। इनके चारों ओर जेली की तरह लसलसे पदार्थ का सुरक्षात्मक आवरण होता है।
10. एकलिंगी (unisexual) अर्थात् नर तथा मादा अलग-अलग होते हैं। निषेचन आन्तरिक या पानी में होता है।
11. लारवा पूर्ण रूप से जलचारी होता है। इनमें श्वसन क्लोमों (gils) द्वारा होता है, जबकि वयस्क अवस्था में (केवल कुछ अपवादों को छोड़कर) फेफड़ों द्वारा तथा नम और रुधिर वाहिनियों के घने जाल से युक्त त्वचा द्वारा होता है।
उदाहरण :
1. सामान्य मेंढक :
राना टिग्रीना तथा
2. टोड :
ब्यूफो मिलेनोस्टिक्टस
उभयचरों का वर्गीकरण
विलुप्त तथा जीवित सभी उभयचरों को पाँच उपवर्गों तथा 10 गणों में वर्गीकृत किया गया है।
A.
उपवर्ग लेबरिन्थोडोन्शिया (Labrinthodontia) : विकास में पहले उभयचर । केवल विलुप्त जातियाँ। तीन गणों (orders) में वर्गीकृत; जैसे – सेमूरिया (Seymouria)
B.
उपवर्ग लीपोस्पोन्डाइली (Lepospondyli) : सभी विलुप्त पुरातन उभयचर । तीन गंणों में वर्गीकृत; जैसे-डिप्लोकॉलस (Diplocaulus)
C.
उपवर्ग सैलेन्शिया (Salientia) :
दो गण
1. प्रोएन्यूरा (proanura) सभी विलुप्त
2. एन्यूरा (anura) कुछ विलुप्त और अन्य विद्यमान जातियाँ; जैसे-मेंढक तथा टोड (frogs and toads)
लक्षण :
1. वयस्क में पूंछ व क्लोम अनुपस्थित ।
2. धड़ छोटा, करोटि छोटी।
3. कशेरुकाएँ कम, अन्तिम कशेरुका छड़नुमा यूरोस्टाइल (urostyle)
4. पश्चपाद अग्रपादों से लम्बे, अँगुलियाँ जालयुक्त (webbed)
5. अन्तःकंकाल का काफी भाग उपास्थीय ।
6. अण्डनिक्षेपण, संसेचन एवं भ्रूणीय परिवर्धन जल में जीवन-वृत्त में मछली-सदृश भेकशिशु (tadpole) प्रावस्था । अतः कायान्तरण (metamorphosis) महत्त्वपूर्ण; जैसे-टोड (Bufo), हायला (Hyla), मेंढक (Rana)
D.
उपवर्ग यूरोडेला (Urodela) : विलुप्त एवं विद्यमान जातियाँ, एक ही गण, कॉडेटा (Caudata)
लक्षण :
1. शरीर सिर, धड़ एवं पूँछ में विभेदित धड़ लम्बा ।
2. दोनों जोड़ी पाद लगभग समान लम्बाई के ।
3. मेखलाएँ उपास्थीय ।
4. जातियाँ कुछ पूर्णरूपेण जलीय, कुछ मुख्यतः स्थलीय; श्वसनांग जलीय जातियों में क्लोम, स्थलीय में फेफड़े।
5. भेकशिशु वयस्क के समान अतः कायान्तरण स्पष्ट नहीं। उदाहरण-सैलामैण्डर (Salamender), नेक्टयू रस (Necturus) आदि ।
Ε.
उपवर्ग ऐपोडा (Apoda) : एक गण जिम्नोफियोना (Gymnophiona)
लक्षण :
1. बिलों में रहने वाले पादविहीन उभयचर ।
2. शरीर लम्बा व सँकरा, देखने में केंचुए जैसा ।
3. पादों की मेखलाएँ नहीं।
4. सिर सुरंग खोदने के लिए मजबूत, नेत्र अर्धविकसित, पलकरहित व प्रायः त्वचा से ढके ।
5. त्वचा चिकनी, इस पर अनुप्रस्थ झुर्रियाँ।
6. पूँछ छोटी या अनुपस्थित ।
7. क्लोम (gills) केवल शिशु में। वयस्क में श्वसन फेफड़ों द्वारा; जैसे-इक्थियोफिस (Ichithyophis)
In simple words: उभयचर ऐसे असमतापी जीव हैं जो जल और थल दोनों में पाए जाते हैं, जिनमें चिकनी, शल्कविहीन त्वचा, कायान्तरण, तीन-कक्षीय हृदय, और वृक्क द्वारा उत्सर्जन होता है; इन्हें लेबरिन्थोडोन्शिया, लीपोस्पोन्डाइली, सैलेन्शिया, यूरोडेला और ऐपोडा जैसे उपवर्गों में वर्गीकृत किया जाता है।

🎯 Exam Tip: उभयचरों के दोहरे निवास, कायान्तरण, त्वचा की विशेषताओं और प्रजनन पैटर्न पर विशेष ध्यान दें।

 

Question 4. सरीसृप वर्ग के प्राणियों के प्रमुख लक्षणों का उल्लेख कीजिए तथा गण तक उदाहरण सहित वर्गीकरण कीजिए ।
Answer: वर्ग रेप्टीलिया (सरीसृप) के प्रमुख
लक्षण :
1. ये साधारणतः स्थलवासी होते हैं, लेकिन कुछ जलवासी भी होते हैं।
2. इनमें बाह्य कर्ण छिद्र अनुपस्थित, लेकिन टिम्पैनम कर्ण उपस्थित हैं।
3. ये थल पर रेंगकर (repere = crawl) चलते हैं इसलिए, इस वर्ग को रेप्टीलिया कहा जाता है।
4. ये असमतापी जन्तु हैं।
5. त्वचा में एपिडर्मल शृंगी शल्क (epidermal horny scales) पाए जाते हैं।
6. त्वचा रुखी होती है। इसमें ग्रन्थियाँ (glands) नहीं होती हैं।
7. अन्त:कंकाल अस्थि (bony) का बना होता है।
8. खोपड़ी में केवल एक ऑक्सिपिटल कॉण्डाइल, (Occipital condyle) होता है।
9. क्लोम (gills) विकास की प्रारम्भिक अवस्था में पाए जाते हैं। वयस्क में श्वसन-क्रिया फेफड़े। (lungs) द्वारा होती है।
10. हृदय में दो अलिंद तथा आंशिक रूप से विभाजित एक निलय (ventricle) होता है।
11. लाल रुधिर कणिकाएँ पाई जाती हैं।
12. आहारनाल, जनन तथा मूत्रवाहिनियाँ क्लोएका में खुलती हैं, इसलिए पृथक्-पृथक् गुदा एवं जनन छिद्र नहीं होते हैं।
13. साधारणतः अन्त:निषेचन (internal fertilization) होता है। अण्डे बड़े और चूनेदार (calcareous) कवच (shell) द्वारा आच्छादित रहते हैं।
14. इनमें कोई लार्वा अवस्था नहीं होती ।
सरीसृपों का वर्गीकरण
सरीसृप वर्ग को निम्नलिखित 6 उपवर्गों में बाँटा गया है।
(क)
उपवर्ग ऐनेप्सिडा (Subclass Anapsida) : करोटि का पृष्ठ भाग पूर्ण अर्थात् इसके टेम्पोरल क्षेत्र में कोई छिद्र (fossa) नहीं, क्वाड्रेट अस्थि कर्ण अस्थि से समेकित । तीन गण (orders), दो में केवल विलुप्त जातियाँ, केवल एक (किलोनिया) में विलुप्त एवं विद्यमान जातियाँ। गण किलोनिया (Order Chelonia)-विभिन्न प्रकार के कछुए (turtles, tortoises and terrapins)।
1. जल में, कभी-कभी किनारे की नम भूमि पर आ जाते हैं।
2. शरीर चौड़ा, हॉर्न (horm) एवं अस्थि के बने कठोर खोल (shell) में बन्द । खोल का पृष्ठभाग पृष्ठवर्म अर्थात् कैरापेस (carapace) तथा अधर भाग प्लास्ट्रोन (plastron)} खोल पर चिम्मड़ त्वचा ढकी, त्वचा सपाट या षट्भुजीय प्रशल्कों (scutes) द्वारा ढकी ।
3. सिर, पाद एवं पूँछ शल्कों से ढके । इन्हें खोल में समेटकर जन्तु शत्रुओं से रक्षा करता है।
4. जबड़े हॉर्न के बने, दन्तविहीन ।
5. क्वाड्रेट हड्डी अचल ।
6. अवस्कर छिद्र अनुलम्ब दरार के रूप में।
7. नर में उत्तेजित होकर तनने वाला मैथुन अंग (copulatory organ) अर्थात् शिश्न (penis)
8. मादा भूमि में गड्डा बनाकर अण्डे देती और रेत से इन्हें ढक देती है।
उदाहरण :
ट्रायोनिक्स (Trionyx) :
भारतीय नदियों का कछुआ
1. कीलोन (Chelone)
2. टेस्टुडो (Testudo)
(ख)
उपवर्ग यूरेऐप्सिडा (Subclass Euryapsida) : विलुप्त जातियाँ, दो गण।
(ग)
उपवर्ग सिनेप्सिडा (Subclass Synapsida) : विलुप्त जातियाँ, दो गण।
(घ)
उपवर्ग इथिओप्टेरीजिया (Subclass Ichthyopterygia) : विलुप्त जातियाँ, एक गण।
(ङ)
उपवर्ग लेपिडोसॉरिया (Subclass Lepidosauria) : एक विलुप्त तथा दो विलुप्त एवं विद्यमान जातियों के गण। करोटि (skull) के टेम्पोरल क्षेत्र में दो जोड़ी टेम्पोरल छिद्र (temporal fossae)
विलुप्त एवं विद्यमान जातियों के दो गण निम्नलिखित हैं
1.
गण रिकोसिफैलिया (Order Rhynchocephalia) : इसकी अब एक ही जाति स्फीनोडॉन पंक्टेटस (Sphenodon punctatus)-न्यूजीलैण्ड के निकट छोटे-छोटे द्वीपों में पाई जाती है। इसे स्थानीय लोग टुआटरा (Tuatara) कहते हैं। इसके लक्षण विलुप्त सरीसृपों जैसे हैं। अतः ये “जिन्दा जीवाश्म (living fossils)' कहलाते हैं। लगभग 55 सेमी लम्बा शरीर छिपकली-जैसा और बहुत सुस्त । बिलों से रात्रि में निकलकर (nocturnal) केंचुओं, घोंघों, कीड़ों आदि को खाते हैं। उपापचय (metabolism) की दर बहुत कम, परन्तु आयु लगभग 100 वर्ष मध्यवर्ती तीसरा नेत्र तथा त्वचा की शल्कें दानों के रूप में। नर में मैथुन अंग नहीं। अण्डे छोटे । अवस्कर छिद्र दरार जैसा ।
2.
गण स्क्वै मैटा (Order Squamata) :
छिपकलियाँ (lizards) एवं सर्प (snakes)
1. कुछ जलीय; शेष जंगलों, खेतों, घरों, बगीचों आदि में; कुछ बिलों में रहने वाले ।
2. तेजी से रेंगकर शत्रुओं से बचने की क्षमता।
3. त्वचा के हॉर्नी शल्कों के आवरण का समय-समय पर टुकड़ों या केंचुल के रूप में त्याग (moulting)
4. पूँछ लम्बी ।
In simple words: सरीसृप असमतापी, स्थलवासी या जलवासी जीव हैं जिनकी त्वचा सूखी, शल्कों से ढकी होती है, फेफड़ों से श्वसन करते हैं, और अंडे देते हैं; इन्हें ऐनेप्सिडा, यूरेऐप्सिडा, सिनेप्सिडा, इथिओप्टेरीजिया और लेपिडोसॉरिया जैसे उपवर्गों में वर्गीकृत किया गया है।

🎯 Exam Tip: सरीसृपों के प्रमुख लक्षणों जैसे त्वचा, श्वसन, प्रजनन और उनके विभिन्न उपवर्गों के बीच के अंतर पर ध्यान दें।

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` block, and placing "In simple words" and "🎯 Exam Tip" at the end of the *complete* answer block) cannot be fulfilled if only a partial answer from a preceding page is provided. Therefore, no HTML output is generated as no new questions are *located* between pages 29 and 30.

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