UP Board Solutions Class 11 Biology Chapter 3 Plant Kingdom

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Detailed Chapter 3 पादप जगत UP Board Solutions for Class 11 Biology

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Class 11 Biology Chapter 3 पादप जगत UP Board Solutions PDF

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

Question 1. शैवालों के वर्गीकरण का क्या आधार है?
Answer: शैवालों का वर्गीकरण मुख्यतया उनमें उपस्थित वर्णक (pigments), फ्लेजिला (flagella), संगृहीत खाद्य पदार्थ (storage food product) और कोशिका भित्ति की रासायनिक संरचना (chemical structure of cell wall) के आधार पर किया जाता है।
In simple words: शैवालों को उनके वर्णक (रंग), फ्लेजिला की उपस्थिति, भोजन संचय के तरीके और कोशिका भित्ति की रासायनिक बनावट के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

🎯 Exam Tip: शैवाल वर्गीकरण के प्रमुख आधारों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सीधे प्रश्न के रूप में पूछा जा सकता है।

 

Question 2. लिवरवर्ट, मॉस, फर्न, जिम्नोस्पर्म तथा एन्जियोस्पर्म के जीवन चक्र में कहाँ और कब निम्नीकरण विभाजन (reduction division) होता है?
Answer: लिवरवर्ट तथा मॉस में निम्नीकरण विभाजन कैप्सूल (capsule) की बीजाणु मातृ कोशा (spore mother cell) में होता है। फर्न में निम्नीकरण विभाजन स्पोरेन्जिया (sporangia) की बीजाणु मातृ कोशा (spore mother cell) में होता है। जिम्नोस्पर्म में निम्नीकरण विभाजन माइक्रोस्पोरेन्जियम (microsporangium) में माइक्रोस्पोर (परागकण) के निर्माण के समय तथा मेगास्पोरेन्जियम में मेगास्पोर (megaspore) के निर्माण के समय होता है। एन्जियोस्पर्म में निम्नीकरण विभाजन परागकोश (anther) की माइक्रोस्पोरेन्जियम तथा अण्डाशय (ovule) की मेगास्पोरेन्जियम में होता है।
In simple words: निम्नीकरण विभाजन (अर्धसूत्रीविभाजन) लिवरवर्ट और मॉस के कैप्सूल में, फर्न के स्पोरेन्जिया में, जिम्नोस्पर्म के माइक्रो- और मेगास्पोरेन्जियम में और एन्जियोस्पर्म के परागकोश और अण्डाशय में होता है, जो जनन कोशिकाओं के निर्माण के लिए आवश्यक है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न पौधों के समूहों में अर्धसूत्रीविभाजन के विशिष्ट स्थानों को याद रखना प्रजनन चक्र की समझ के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. पौधों के तीन वर्गों के नाम लिखिए जिनमें स्त्रीधानी (archaegonia) होती है। इनमें से किसी एक के जीवन-चक्र का संक्षिप्त वर्णन कीजिए
Answer: ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा तथा जिम्नोस्पर्म वर्ग के पौधों में स्त्रीधानी पाई जाती है।
मॉस (ब्रायोफाइट पादप) को जीवन-चक्र
इसकी प्रमुख अवस्था युग्मकोभिद् (gametophyte) होती है। युग्मकोभिद् की दो अवस्थाएँ पाई जाती हैं
(क) शाखामय, हरे, तन्तुरूपी प्रोटोनीमा (protonema) : का निर्माण अगुणित बीजाणुओं के अंकुरण से होता है। इस पर अनेक कलिकाएँ विकसित होती हैं जो वृद्धि करके पत्तीमय अवस्था का निर्माण करती हैं।
(ख) पत्तीमय अवस्था पर नर तथा मादा जननांग समूह के रूप में बनते हैं। नर जननांग को पुंधानी (antheridium) तथा मादा जननांग को स्त्रीधानी (archegonium) कहते हैं। पुंधानी में द्विकशाभिक पुंमणु (antherozoids) तथा स्त्रीधानी में अण्डाणु (ovum) बनता है। निषेचन जल की उपस्थिति में होता है। पुमणु तथा अण्डाणु संलयन के फलस्वरूप द्विगुणित युग्मनज (oospore) बनाते हैं। युग्मनजे से वृद्धि तथा विभाजन द्वारा द्विगुणित बीजाणुउभिद् (sporophyte) का निर्माण होता है। यह युग्मकोभिद् पर अपूर्ण परजीवी होता है।
बीजाणुउभिद् के तीन भाग होते हैं
1. पाद (foot)
2. सीटा (seta) तथा
3. सम्पुट (capsule)

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र फ्यूनेरिया (मॉस) के जीवन-चक्र को दर्शाता है, जिसमें प्रोटोनीमा से पत्तीमय पौधे का विकास, एंथेरिडियम और आर्कीगोनियम में युग्मक का उत्पादन, निषेचन से जाइगोट और स्पोरोफाइट का निर्माण, और फिर स्पोरोफाइट से बीजाणुओं का बनना और अंकुरण शामिल है। यह चक्र युग्मकोद्भिद् और बीजाणुद्भिद् पीढ़ियों के एकांतरण को स्पष्ट करता है।
सम्पुट के बीजाणुकोष्ठ में स्थित द्विगुणित बीजाणु मातृ कोशिकाओं से अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित बीजाणु (spores) बनते हैं। सम्पुट के स्फुटन से बीजाणु मुक्त हो जाते हैं। बीजाणुओं का प्रकीर्णन वायु द्वारा होता है। अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर बीजाणु अंकुरित होकर तन्तुरूपी, स्वपोषी प्रोटोनीमा (protonema) बनाते हैं।
In simple words: ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा और जिम्नोस्पर्म में स्त्रीधानी पाई जाती है। मॉस के जीवन चक्र में, प्रमुख युग्मकोद्भिद् अवस्था प्रोटोनीमा और पत्तीमय चरण बनाती है, जहाँ पुंधानी और स्त्रीधानी में युग्मक बनते हैं। निषेचन के बाद, युग्मनज से बीजाणुउभिद् (पाद, सीटा, सम्पुट) विकसित होता है, जो अर्धसूत्रीविभाजन द्वारा बीजाणु उत्पन्न करता है, जिससे नया प्रोटोनीमा बनता है।

🎯 Exam Tip: मॉस के जीवन चक्र का वर्णन करते समय, युग्मकोद्भिद् और बीजाणुउभिद् अवस्थाओं तथा उनके प्रमुख भागों को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है, खासकर निषेचन और अर्धसूत्रीविभाजन की प्रक्रियाओं को।

 

Question 4. निम्नलिखित की सूत्रगुणता (ploidy) बताइए मॉस की प्रथम तन्तुक कोशिका, द्विबीजपत्री के प्राथमिक भ्रूणपोष का केन्द्रक, मॉस की पत्तियों की कोशिका, फर्न के प्रोथैलस की कोशिकाएँ, मारकेंशिया की जेमा कोशिका, एकबीजपत्री की मेरिस्टेम कोशिका, लिवरवर्ट के अण्डाशय तथा फर्न के युग्मनज ।
Answer: इनकी सूत्रगुणता निम्नवत् है
1. मॉस की प्रथम तन्तुक कोशिका - अगुणित (Haploid-X)
2. द्विबीजपत्री के प्राथमिक भ्रूणपोष का केन्द्रक - त्रिगुणित (Triploid-3X)
3. मॉस की पत्तियों की कोशिका - अगुणित (Haploid-X)
4. फर्न के प्रोथैलस की कोशिकाएँ - अगुणित (Haploid-X)
5. मारकेंशियां की जेमा कोशिका - अगुणित (Haploid-X)
6. एकबीजपत्री की मेरिस्टेम कोशिका - द्विगुणित (Diploid-2X)
7. लिवरवर्ट का अण्डाशय - अगुणित (Haploid-X)
8. फर्न का युग्मनज - द्विगुणित (Diploid-2X)
In simple words: विभिन्न पौधों की कोशिकाओं की सूत्रगुणता भिन्न होती है; जैसे मॉस की प्रोटोनीमा और पत्तियां अगुणित होती हैं, जबकि द्विबीजपत्री का प्राथमिक भ्रूणपोष त्रिगुणित होता है। मेरिस्टेम कोशिकाएं द्विगुणित होती हैं और युग्मनज भी द्विगुणित होता है, जबकि अण्डाशय और प्रोथैलस अगुणित होते हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न पौधों की संरचनाओं और जीवन चक्र की अवस्थाओं की सूत्रगुणता (ploidy) को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सीधे तथ्यों पर आधारित प्रश्न होते हैं।

 

Question 5. शैवाल तथा जिम्नोस्पर्म के आर्थिक महत्त्व पर टिप्पणी लिखिए।
Answer: शैवाल का आर्थिक महत्त्व
1. भोजन के रूप में (Algae as Food) : पृथ्वी पर होने वाले प्रकाश संश्लेषण का 50% शैवालों द्वारा होता है। शैवाल कार्बोहाइड्रेट, खनिज तथा विटामिन्स से भरपूर होते हैं पोरफाइरा (Porphyra), एलेरिया (Alaria), अल्वा (Ulva), सारगासम (Sargassum), लेमिनेरिया (Luminaria) आदि खाद्य पदार्थ के रूप में प्रयोग किए जाते हैं क्लोरेला (Chlorella) में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन्स तथा विटामिन्स पाए जाते हैं। इसे भविष्य के भोजन के रूप में पहचाना जा रहा है इससे हमारी बढ़ती जनसंख्या की खाद्य समस्या के हल होने की पूरी सम्भावना है
2. शैवाल व्यवसाय में (Algae in Industry) :
1. डायटम के जीवाश्म/मृत शरीर डायटोमेशियस मृदा (diatomaceous earth or Kiselghur) बनाते हैं। यह मृदा 1500°C ताप सहन कर लेती है। इसका उद्योगों में विविध प्रकार से उपयोग किया जाता है; जैसे-धातु प्रलेप, वार्निश, पॉलिश, टूथपेस्ट, ऊष्मारोधी सतह आदि ।
2. कोन्ड्रस (Chondrus), यूक्यिमा (Eucheuma) आदि शैवालों से कैरागीनिन (carrageenin) प्राप्त होता है। इसका उपयोग शृंगार-प्रसाधनों, शैम्पू आदिबनाने में किया जाता है
3. एलेरिया (Alaria), लेमिनेरिया (Laminaria) आदि से एल्जिन (algin) प्राप्त होता है। इसका उपयोग अज्वलनशील फिल्मों, कृत्रिम रेशों आदि के निर्माण में किया जाता है यह शल्य चिकित्सा के समय रक्त प्रवाह रोकने में भी प्रयोग किया जाता है।
4. अनेक समुद्री शैवालों से आयोडीन, ब्रोमीन आदि प्राप्त की जाती है।
5. क्लोरेला से प्रतिजैविक (antibiotic) क्लोरेलीन (Chlorellin) प्राप्त होती है। यह जीवाणुओं को नष्ट करती है। कारा (Chara) तथा नाइटेला (Nitella) शैवालों की उपस्थिति से जलाशय के मच्छर नष्ट होते हैं; अतः ये मलेरिया उन्मूलन में सहायक होते हैं
6. लाल शैवालों से एगार-एगार (agar-agar) प्राप्त होता है, इसका उपयोग कृत्रिम संवर्धन के लिए किया जाता है।
जिम्नोस्पर्म का आर्थिक महत्त्व
1. सजावट के लिए (Ornamental Plants) : सोइकस, पाइनस, एरोकेरिया (Arqucurid), गिंगो (Ginkgo), थूजा (Thujq), क्रिप्टोमेरिया (Cryptomeria) आदि पौधों का उपयोग सजावट के लिए किया जाता है।
2. भोज्य पदार्थों के लिए (Plants of Food value) : साइकस, जैमिया से साबूदाना (sago) प्राप्त होता है। चिलगोजा (Pinus gerardiana) के बीज खाए जाते हैं। नीटम (Gnetum), गिंगो (Ginkgo) व साइकस के बीजों को भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है।
3. फर्नीचर के लिए लकड़ी : चीड़ (Pinus), देवदार (Cedrus), कैल (Pinus wallichiana), फर (Abies) से प्राप्त लकड़ी का उपयोग फर्नीचर तथा इमारती लकड़ी के रूप में किया जाता है।
4. औषधियाँ (Medicines) : साइकस के बीज, छाल व गुरुबीजाणुपर्ण को पीसकर पुल्टिस बनाई जाती है। टेक्सस बेवफोलिया (Taxus brevfolia) से टेक्साल औषधि प्राप्त होती है। जिसका उपयोग कैन्सर में किया जाता है। थूजा (Thuja) की पत्तियों को उबालकर बुखार, खाँसी, गठिया रोग के निदान के लिए प्रयोग किया जाता है।
5. एबीस बालसेमिया (Abies balsamea) : से कैनाडा बालसम, जूनिपेरस (Juniperus) से सिडार वुड ऑयल (cedar wood oil), पाइनस से तारपीन का तेल प्राप्त होता है।
In simple words: शैवाल भोजन, उद्योग (जैसे कैरागीनिन, एल्जिन, एगार) और औषधियों में महत्वपूर्ण हैं, जबकि जिम्नोस्पर्म सजावट, खाद्य पदार्थों (साबूदाना, चिलगोजा), लकड़ी और विभिन्न औषधियों (टेक्सॉल, सिडार वुड ऑयल) के लिए उपयोगी हैं।

🎯 Exam Tip: शैवाल और जिम्नोस्पर्म दोनों के आर्थिक महत्व को उदाहरणों के साथ याद रखें, खासकर उन उत्पादों को जो सीधे उनसे प्राप्त होते हैं और उनके उपयोगों को।

 

Question 6. जिम्नोस्पर्म तथा एन्जियोस्पर्म दोनों में बीज होते हैं फिर भी उनका वर्गीकरण अलग-अलग क्यों है?
Answer: जिम्नोस्पर्म तथा एन्जियोस्पर्म दोनों का वर्गीकरण अलग-अलग इसलिए किया जाता है क्योंकि जिम्नोस्पर्म में बीज नग्न (naked seeds) होते हैं, फल अनुपस्थित होते हैं, फूल अनुपस्थित होते हैं, भ्रूणपोष (endosperm) अगुणित (haploid) होता है तथा निषेचन से पहले बनता है। द्विनिषेचन अनुपस्थित होता है। वर्तिकाग्र (stigma) अनुपस्थित होता है तथा स्त्रीधानी (archaegonia) पाई जाती है, जबकि एन्जियोस्पर्म के बीज फल से घिरे रहते हैं, फूल उपस्थित होते हैं, भ्रूणपोष त्रिगुणित (triploid) होता है तथा द्विनिषेचन के पश्चात् बनता है। वर्तिकाग्र (stigma) पाया जाता है। तथा स्त्रीधानी (archaegonia) नहीं पाई जाती है।
In simple words: जिम्नोस्पर्म और एन्जियोस्पर्म दोनों में बीज होते हैं, लेकिन उन्हें अलग वर्गीकृत किया जाता है क्योंकि जिम्नोस्पर्म के बीज नग्न होते हैं, उनमें फल और फूल नहीं होते, और भ्रूणपोष निषेचन से पहले अगुणित होता है; जबकि एन्जियोस्पर्म के बीज फल के भीतर होते हैं, उनमें फूल होते हैं, और भ्रूणपोष निषेचन के बाद त्रिगुणित होता है।

🎯 Exam Tip: जिम्नोस्पर्म और एन्जियोस्पर्म के बीच मुख्य अंतरों को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर बीज आवरण, फूलों की उपस्थिति, और भ्रूणपोष के विकास से संबंधित विशेषताओं को।

 

Question 7. विषम बीजाणुकता क्या है? इसकी सार्थकता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। इसके दो उदाहरण दीजिए।
Answer: एक पौधे में दो प्रकार के बीजाणुओं (छोटा माइक्रोस्पोर तथा बड़ा मेगास्पोर) की उपस्थिति विषम बीजाणुकता (heterospory) हलाती है। यह कुछ टेरिडोफाइट; जैसे-सिलेजीनेला (Seluginella), साल्वीनिया (Savinia), मालिया (Marsiled) आदि में तथा सभी जिम्नोस्पर्म व एन्जियोस्पर्म में पाई जाती है। विषम बीजाणुकता का विकास सर्वप्रथम टेरिडोफाइट में हुआ था । विषम बीजाणुकता बीज निर्माण प्रक्रिया की शुरूआत मानी जाती है जिसके फलस्वरूप बीज का विकास हुआ । विषम बीजाणुकता ने नर एवं मादा युग्मकोभिद् (male and female gametophyte) के विभेदने में सहायता की तथा मादा युग्मकोभिद् जो मेगास्पोरेन्जियम के अन्दर विकसित होता है कि उत्तरजीविता बढ़ाने में सहायता की।
In simple words: विषम बीजाणुकता पौधों में दो अलग-अलग आकार के बीजाणुओं (छोटे माइक्रोस्पोर और बड़े मेगास्पोर) का उत्पादन है, जो टेरिडोफाइट्स (जैसे सिलेजीनेला) और सभी जिम्नोस्पर्म व एन्जियोस्पर्म में पाई जाती है। यह बीज निर्माण का एक महत्वपूर्ण कदम है, जो नर और मादा युग्मकोद्भिद् के विभेदीकरण और मादा युग्मकोद्भिद् की उत्तरजीविता में सहायक है।

🎯 Exam Tip: विषम बीजाणुकता की परिभाषा, उसके महत्व (बीज निर्माण से संबंध) और दो उदाहरणों को याद रखें।

 

Question 8. उदाहरण सहित निम्नलिखित शब्दावली का संक्षिप्त वर्णन कीजिए
1. प्रथम तन्तु
2. पुंधानी
3. स्त्रीधानी
4. द्विगुणितक
5. बीजाणुपर्ण तथा
6. समयुग्मकी
Answer:
1. प्रथम तन्तु (Protonema) : यह हरी, अगुणित (haploid), प्रकाश-संश्लेषी, स्वतन्त्र प्रारम्भिक युग्मकोभिद् (gametophytic) संरचना है जो मॉस (ब्रायोफाइट) में पाई जाती है। यह बीजाणुओं (spores) के अंकुरण से बनती है तथा नये युग्मकोभिद् पौधे का निर्माण करती है।
2. पुंधानी (Antheridium) : यह बहुकोशिकीय, कवच युक्त (jacketed) नर जनन अंग (male sex organ) है जो ब्रायोफाइट व टेरिडोफाइट में पाया जाता है। पुंधानी में नर युग्मक (male gamete or antherozoids) बनते हैं।
3. स्त्रीधानी (Archaegonium) : यह बहुकोशिकीय, फ्लास्क के समान मादा जनन अंग (female sex organ) है जो ब्रायोफाइट, टेरिडोफाइट तथा कुछ जिम्नोस्पर्म में पाई जाती है। यह ग्रीवा (neck) तथा अण्डधा (venter) में विभाजित होती है। इसमें एक अण्ड (egg) बनता है।
4. द्विगुणितक (Diplontic) : यह जीवन-चक्र का एक प्रकार है जिसमें पौधा द्विगुणित (2n) होता है तथा इस पर युग्मकीय अर्धसूत्री विभाजन (gametic meiosis) द्वारा अगुणित (haploid) युग्मक (gametes) बनते हैं। उदाहरण-फ्युकस, सारगासम।
5. बीजाणुपर्ण (Sporophyll) : फर्न (टेरिडोफाइट) में बीजाणु (spores) बीजाणुधानियों (sporangia) में पाए जाते हैं। इन बीजाणुधानियों के समूह को सोरस (sorus) कहते हैं। ये पिच्छक या पत्ती (pinna or leaf) की नीचे की सतह (lower surface) पर मध्य शिरा (mid rib) के दोनों ओर दो पंक्तियों में शिराओं के सिरे पर लगी रहती हैं। इन सोराई धारण करने वाल पत्तियों को बीजाणुपर्ण (sporophyll) कहते हैं।
6. समयुग्मकी (Isogamy) : यह एक प्रकार का लैंगिक जनन है जिसमें संलयन करने वाले युग्मक (gametes) संरचना तथा कार्य में समान होते हैं।
उदाहरण :
1. यूलोथ्रिक्स (Ulothrs)
2. क्लेमाइडोमोनास (Chlamydomonas)
3. तथा एक्ट्रोकार्पस (Ectocarpus)
In simple words: प्रथम तन्तु मॉस में बीजाणुओं से बनने वाली अगुणित युग्मकोद्भिद् संरचना है। पुंधानी और स्त्रीधानी क्रमशः नर और मादा जनन अंग हैं। द्विगुणितक वह जीवन चक्र है जहाँ मुख्य पौधा द्विगुणित होता है। बीजाणुपर्ण उन पत्तियों को कहते हैं जो बीजाणुधानियों (सोरस) को धारण करती हैं, और समयुग्मकी वह लैंगिक जनन है जहाँ संलयन करने वाले युग्मक आकार और कार्य में समान होते हैं।

🎯 Exam Tip: इन सभी शब्दावलियों की परिभाषा और संबंधित उदाहरणों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये अक्सर लघु उत्तरीय प्रश्नों में पूछे जाते हैं।

 

Question 9. निम्नलिखित में अन्तर कीजिए लाल शैवाल तथा भूरे शैवाल
1. लिवरवर्ट तथा मॉस
2. समबीजाणुक तथा विषमबीजाणुक टेरिडोफाइट
3. युग्मक संलयन तथा त्रिसंलयन
Answer:
(i) लाल शैवाल तथा भूरे शैवाल में अन्तर

क्र० सं०लाल शैवालभूरे शैवाल
1.क्लोरोफिल a व d पाया जाता है।क्लोरोफिल a व c पाया जाता है तथा फ्युकोजेन्टिन (fucoxanthin) पाया जाता है।
2.फाइकोबिलिन (phycobilins) उपस्थित होता है।फाइकोबिलिन अनुपस्थित होता है।
3.संग्रहित भोजन फ्लोरीडियन स्टार्च (floredian starch) होता है।संग्रहित भोजन लेमिनेरिन (laminarin) होता है।
4.चलबीजाणु (motile spores) अनुपस्थित होते हैं।चलबीजाणु उपस्थित होते हैं।
उदाहरण-पोलीसिफोनिया (Polysiphonia), पोरफायरा (Porphyra), प्रेसिलेरिया (Gracilaria), जीलीडियम (Gelidium)।उदाहरण-एक्टोकार्पस (Ectocarpus), डिक्टयोटा (Dictyota), लेमिनेरिया (Laminaria), सारगासम (Sargassum), फ्युकस (Fucus)।
(ii) लिवरवर्ट तथा मॉस में अन्तर
क्र० सं०लिवरवर्टमॉस
1.पादप शरीर, हरे, चपटे द्विपृष्ठधारी युग्मकोद्भिद् (gametophyte) सूकाय (thallus) के रूप में होता है।युग्मकोद्भिद् दो अवस्थाओं में भिन्नित होता है-
(i) प्रोटोनिमा-यह प्रारम्भिक, हरी, तन्तुमय रचना है जो बीजाणु के अंकुरण से बनती है।
(ii) गेमिटोफोर-यह तना, पत्ती व मूलांग में विभाजित होता है।
2.मूलांग (rhizoids) एककोशिकीय (unicellular) होते हैं।मूलांग बहुकोशिकीय होते हैं।
3.मूलांग प्रायः दो प्रकार के होते हैं- सपाट भित्ति वाले (smooth walled) तथा गुलीकीय (tuberculated)।मूलांग शाखित (branched) होते हैं। इनमें तिरछे पट (oblique septa) होते हैं।
4.सूकाय (thallus) के अधर तल पर शल्क (scale) होते हैं।शल्क अनुपस्थित होते हैं।
5.कैप्सूल (capsule) में इलेटर्स (elaters) पाए जाते हैं।इलेटर्स अनुपस्थित होते हैं।
6.पेरीस्टोम दाँत (peristome teeth) अनुपस्थित होते हैं।पेरीस्टोम दाँत पाए जाते हैं।
7.कॉल्युमेला (columella) प्रायः अनुपस्थित होता है।कैप्सूल में कॉल्युमेला पाया जाता है।
8.प्रोटोनीमा नहीं पाया जाता।प्रोटोनीमा पाया जाता है।
(iii) समबीजाणुक तथा विषमबीजाणुक टेरिडोफाइट में अन्तर
क्र० सं०समबीजाणुक टेरिडोफाइटविषमबीजाणुक टेरिडोफाइट
1.सभी स्पोरेन्जिया (sporangia) समान होती हैं।स्पोरेंजिया दो प्रकार की होती हैं-
(i) माइक्रोस्पोरेन्जिया (Microsporangia)
(ii) मेक्रोस्पोरेन्जिया (Macrosporangia)
2.स्पोर (spore) एक ही प्रकार के होते हैं।स्पोर दो प्रकार के होते हैं-
बड़े मेगास्पोर (megaspore) तथा छोटे माइक्रोस्पोर (microspore)
3.युग्मकोद्भिद् एक ही प्रकार का होता है।गेमिटोफाइट दो प्रकार के होते हैं- नर युग्मकोद्भिद् (male gametophyte) तथा मादा युग्मकोद्भिद् (female gametophyte)
4.कोई विकासीय महत्त्व नहीं दर्शाते। उदाहरण-टेरिस (Pteris), एडिएन्टम (Adiantum)।विकासीय महत्व दर्शाते हैं क्योंकि विषम बीजाणुकता, परागण (pollination) तथा बीज निर्माण (seed formation) के विकास की प्रथम अवस्था मानी जाती है। उदाहरण-सिलैजीनेला (Selaginella), साल्वीनिया (Salvinia), मार्सीलिया (Marsilea)
(iv) युग्मक संलयन तथा त्रिसंलयन में अन्तर
क्र० सं०युग्मक संलयनत्रिसंलयन
1.दोनों नर एवं मादा युग्मक (gametes) संलयन में भाग लेते हैं।एक नर युग्मक (male gamete) तथा दो कायिक केन्द्रक (vegetative nuclei) संलयन में भाग लेते हैं।
2.युग्मक संलयन द्वारा द्विगुणित जाइगोट (diploid zygote) बनता है।त्रिसंलयन द्वारा त्रिगुणित एण्डोस्पर्म (triploid endosperm) बनता है।
3.जाइगोट से भ्रूण निर्माण होता है।एण्डोस्पर्म भोज्य पदार्थ के रूप में उपयोग होता है।
In simple words: लाल और भूरे शैवाल वर्णक, संचित भोजन और चलबीजाणु में भिन्न होते हैं; लिवरवर्ट और मॉस पादप शरीर, मूलांग और कैप्सूल संरचना में भिन्न होते हैं; समबीजाणुक और विषमबीजाणुक टेरिडोफाइट बीजाणुओं के प्रकार और युग्मकोद्भिद् के विभेदन में भिन्न होते हैं; जबकि युग्मक संलयन युग्मकों के मिलन से जाइगोट बनाता है और त्रिसंलयन में एक नर युग्मक दो ध्रुवीय केन्द्रकों से मिलकर त्रिगुणित भ्रूणपोष बनाता है।

🎯 Exam Tip: तुलनात्मक प्रश्नों में प्रत्येक बिंदु पर स्पष्ट और संक्षिप्त अंतरों को सूचीबद्ध करना महत्वपूर्ण है। प्रत्येक समूह के मुख्य पहचान लक्षणों को याद रखें।

 

Question 10. एकबीजपत्री को द्विबीजपत्री से किस प्रकार विभेदित करोगे?
Answer: एकबीजपत्री व द्विबीजपत्री पौधे में अन्तर

क्र० सं०एकबीजपत्री पौधेद्विबीजपत्री पौधे
1.बीज में केवल एक बीजपत्र (cotyledon) होता है।बीज में दो बीजपत्र होते हैं।
2.पुष्प के भाग तीन के गुणन में पाए जाते हैं (trimerous)।पुष्प के भाग 5 या 4 के गुणन में पाए जाते हैं (pentamerous or tetramerous)।
3.पत्तियों में समान्तर विन्यास (parallel venation) पाया जाता है।पत्तियों में जालिकावत् विन्यास (reticulate venation) पाया जाता है।
4.प्राथमिक जड़ कम समय के लिए होती है। मूसला जड़ (tap root) अनुपस्थित होती है तथा झकड़ा (adventitious root) पाई जाती है।प्राथमिक जड़ लम्बे समय तक रहती है तथा मूल तन्त्र का निर्माण करती है।
5.संवहन पूल (vascular bundles) बिखरे हुए (scattered) पाए जाते हैं।संवहन बण्डल एक घेरे (ring) में पाए जाते हैं।
6.संवहन पूल बन्द प्रकार (closed vascular bundles) के पाए जाते हैं।संवहन पूल खुले प्रकार (open vascular bundles) के पाए जाते हैं।
7.कैम्बियम (cambium) अनुपस्थित होता है।कैम्बियम उपस्थित होता है।
8.द्वितीयक वृद्धि (secondary growth) नहीं पाई जाती।द्वितीयक वृद्धि पाई जाती है।
9.तने में ऊतक तन्त्र विभेदित नहीं होता।तना एपिडर्मिस, कॉर्टेक्स एण्डोडर्मिस, पेरीसाइकल, पिथ आदि में विभेदित होता है।
10.जड़ में पिथ हमेशा पाया जाता है।जड़ में पिथ अनुपस्थित होता है या सूक्ष्म होता है।
11.जड़ में संवहन बण्डल (vascular bundle) 8 से अधिक होते हैं।जड़ में संवहन बण्डल, 8 या कम होते हैं।
In simple words: एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री पौधों को बीजपत्रों की संख्या, पुष्प के अंगों की संख्या, पत्तियों के शिरा-विन्यास, जड़ प्रणाली, संवहन पूल की व्यवस्था, कैम्बियम की उपस्थिति और द्वितीयक वृद्धि के आधार पर आसानी से अलग किया जा सकता है।

🎯 Exam Tip: एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री के बीच के अंतरों को तालिकाबद्ध रूप में याद करना सबसे प्रभावी होता है, क्योंकि यह तुलनात्मक विश्लेषण में उच्च अंक दिलाता है।

 

Question 11. स्तम्भ । में दिए गए पादपों का स्तम्भ-॥ में दिए गए पादप वर्गों से मिलाने कीजिए
स्तम्भ-। (पादप)
(a) क्लेमाइडोमोनास
(b) साइकस
(c) सिलैजिनेला
(d) स्फेगनम
स्तम्भ-II (वर्ग)
(i) मॉस
(ii) टेरिडोफाइट
(iii) शैवाल
(iv) जिम्नोस्पर्म
Answer:
(a) (iii)
(b) (iv)
(c) (ii)
(d) (i)
In simple words: क्लेमाइडोमोनास एक शैवाल है, साइकस एक जिम्नोस्पर्म है, सिलैजिनेला एक टेरिडोफाइट है, और स्फेगनम एक मॉस है।

🎯 Exam Tip: विभिन्न पादप समूहों के प्रमुख उदाहरणों को याद रखना वर्गीकरण संबंधी प्रश्नों को हल करने में सहायक होता है।

 

Question 12. जिम्नोस्पर्म के महत्त्वपूर्ण अभिलक्षणों का वर्णन कीजिए।
Answer: जिम्नोस्पर्म के महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण ये सामान्यतः 'नग्नबीजी पौधे' कहलाते हैं। इनके मुख्य अभिलक्षण निम्नलिखित हैं
1. अधिकतर पौधे मरुद्भिदी, (xerophytic), काष्ठीय (woody), बहुवर्षीय (perennial) वृक्ष या झाड़ी होते हैं।
2. पत्तियाँ प्रायः दो प्रकार की होती हैं-शल्क पर्ण और सत्य पर्ण (scale leaves and foliage leaves) स्टोमेटो निचली सतह पर तथा गत में स्थित होते हैं।
3. तने में संवहन पूल (vascular bundles), संयुक्त (conjoint), कोलेटरल तथा खुले (open) होते हैं।
4. जाइलम (xylem) में वाहिकाओं (vessels) तथा फ्लोएम (phloem) में सह कोशिकाओं श(A) (companion cells) का अभाव होता है।
5. पौधे विषमबीजाणुक (heterosporous) होते हैं-लघुबीजाणु (microspores) तथा गुरुबीजाणु (megaspores)।
6. पुष्प शंकु (cones) कहलाते हैं। प्रायः नर और मादा शंकु अलग-अलग होते हैं। पौधे एकलिंगाश्रयी (monoecious) होते हैं। नर शंकु का निर्माण लघुबीजाणुपर्णों (micro SHOOT sporophylls) तथा मादा शंकु का निर्माण गुरुबीजाणुपर्णों से होता है।
7. नर युग्मकोभिद् (male gametophyte) अत्यन्त ह्रासित (reduced) होता है। परागनलिका (pollen tube) बनती है।
8. मादा युग्मकोभिद् (female gametophyte) एक गुरुबीजाणु (megaspore) से बनता है। यह बहुकोशिकीय (multicellular) होता है। यह पोषण के लिए पूर्णतः बीजाणुभि पर निर्भर करता है।
9. भ्रूणपोष अगुणित होता है। यह निषेचन से पहले बनता है।
10. इन पौधों में सामान्यतः वायु परागण (wind pollination) होता है।
11. प्रायः बहुभ्रूणता (polyembryony) पाई जाती है; किन्तु अंकुरण के समय केवल एक ही धूण विकसित होता है।
12. नग्न बीजाण्ड से निषेचन तथा परिवर्द्धन के बाद नग्न बीज बनाता है। फल (fruits) नहीं बनते ।
In simple words: जिम्नोस्पर्म 'नग्नबीजी पौधे' होते हैं, जिनमें बीज फल से ढके नहीं होते। वे मरुद्भिदी, काष्ठीय, बहुवर्षीय होते हैं, जिनमें दो प्रकार की पत्तियाँ और शंकु होते हैं। इनमें जाइलम में वाहिकाएँ और फ्लोएम में सह-कोशिकाएँ अनुपस्थित होती हैं। ये विषमबीजाणुक होते हैं, नर युग्मकोद्भिद् ह्रासित होता है, और भ्रूणपोष निषेचन से पहले अगुणित होता है, परागण वायु द्वारा होता है और फल नहीं बनते।

🎯 Exam Tip: जिम्नोस्पर्म के विशिष्ट लक्षणों को बिंदुवार याद रखें, विशेषकर 'नग्न बीज', वाहिकाओं और सह-कोशिकाओं की अनुपस्थिति, और भ्रूणपोष के विकास के समय पर ध्यान दें।

 


ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र विभिन्न प्रकार के जिम्नोस्पर्म, जैसे साइकस, पाइनस और गिंगो को दर्शाता है। साइकस एक ताड़ जैसे दिखने वाला पौधा है जिसमें एक लंबा शूट होता है, पाइनस में एक कॉम्पैक्ट शॉर्ट शूट और एक लंबा शूट दोनों होते हैं, जबकि गिंगो में पंखे के आकार की पत्तियां और बीज होते हैं। यह चित्र इन पौधों की विविध रूपात्मक विशेषताओं को स्पष्ट करता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

Question 1. सभी शैवालों में पाया जाता है
(क) पर्णहरित-a तथा पर्णहरित-b
(ख) पर्णहरित-b तथा कैरोटीन्स
(ग) पर्णहरित-a तथा कैरोटीन्स
(घ) फाइकोबिलिन्स तथा कैरोटीन्स
Answer: (ग) पर्णहरित-a तथा कैरोटीन्स
In simple words: सभी शैवालों में पर्णहरित-a (क्लोरोफिल-a) और कैरोटीन्स पाए जाते हैं, जो प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक प्रमुख वर्णक हैं।

🎯 Exam Tip: शैवालों में पाए जाने वाले सार्वभौमिक वर्णक (पर्णहरित-a) को याद रखें, क्योंकि यह प्रकाश संश्लेषक जीवों का एक मौलिक लक्षण है।

 

Question 2. निम्नलिखित में से कौन-सा शैवाल भूमि में वातावरण की नाइट्रोजन स्थिर करता है?
(क) ऐनाबीना
(ख) यूलोथ्रिक्स
(ग) स्पाइरोगायरा
(घ) म्यूकर
Answer: (क) ऐनाबीना
In simple words: ऐनाबीना एक नीला-हरा शैवाल है जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करने की क्षमता रखता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है।

🎯 Exam Tip: नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले शैवाल के उदाहरणों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पारिस्थितिक महत्व का प्रश्न है।

 

Question 3. ऐसीटेबुलेरिया नामक शैवाल के प्रयोगों द्वारा केन्द्रक के महत्व को सर्वप्रथम बताया
(क) वाट्सन ने
(ख) हैमरलिंग ने
(ग) नीरेनबर्ग ने
(घ) रॉबर्ट ब्राउन ने
Answer: (ख) हैमरलिंग ने
In simple words: हैमरलिंग ने ऐसीटेबुलेरिया शैवाल पर अपने प्रयोगों से पहली बार यह प्रदर्शित किया कि कोशिका के कार्यों को नियंत्रित करने में केन्द्रक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

🎯 Exam Tip: वैज्ञानिक के नाम और उनके प्रमुख योगदानों को याद रखें, खासकर क्लासिक प्रयोगों को जो जीव विज्ञान के सिद्धांतों को स्थापित करते हैं।

 

Question 4. ऐसीटेबुलेरिया है एक
(क) एककोशिकीय हरी शैवाल
(ख) बहुकोशिकीय हरी शैवाल
(ग) एककोशिकीय लाल शैवाल
(घ) बहुकोशिकीय लाल शैवाल
Answer: (क) एककोशिकीय हरी शैवाल
In simple words: ऐसीटेबुलेरिया एक हरी शैवाल है जो केवल एक कोशिका से बनी होती है, जिसे 'समुद्री अप्सरा' भी कहा जाता है।

🎯 Exam Tip: विशिष्ट शैवाल के उदाहरणों और उनकी मुख्य विशेषताओं (जैसे एककोशिकीय/बहुकोशिकीय और रंग) को याद रखना सहायक है।

 

Question 5. एल्सिनेट्स, एल्जिनिक अम्ल के लवण हैं जो कोशिका भित्ति में पाये जाते हैं।
(क) रोडोफाइसी के सदस्यों में
(ख) मिक्सोफाइसी के सदस्यों में
(ग) फियोफायसी के सदस्यों में
(घ) क्लोरोफाइसी के सदस्यों में
Answer: (ग) फियोफायसी के सदस्यों में
In simple words: एल्जिनिक अम्ल के लवण, जिन्हें एल्सिनेट्स कहते हैं, भूरे शैवाल (फियोफायसी) की कोशिका भित्ति में पाए जाते हैं और उद्योगों में कई तरह से उपयोग किए जाते हैं।

🎯 Exam Tip: विभिन्न शैवाल समूहों में पाए जाने वाले विशिष्ट कोशिका भित्ति घटकों को याद रखना वर्गीकरण और जैव-आर्थिक महत्व के लिए महत्वपूर्ण है।

 

Question 6. निम्न में से कौन-सा ब्रायोफाइट मृतोपजीवी है?
(क) फ्यूनेरियो
(ख) रिक्सिया
(ग) बक्सबोमिया
(घ) ये सभी
Answer: (ग) बक्सबोमिया
In simple words: बक्सबोमिया एक ब्रायोफाइट है जो मृतोपजीवी (सप्रोफाइटिक) होता है, यानी यह अपने पोषण के लिए मृत और सड़ने वाले कार्बनिक पदार्थों पर निर्भर करता है।

🎯 Exam Tip: ब्रायोफाइट में मृतोपजीवी पोषण का प्रदर्शन करने वाले विशिष्ट उदाहरणों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 7. टेरिडोफाइट्स...........भी कहलाते हैं
(क) फैनेरोगैम्स
(ख) वैस्कुलर क्रिप्टोगैम्स
(ग) क्रिप्टोगैम्स
(घ) एन्जिओस्पर्स
Answer: (ख) वैस्कुलर क्रिप्टोगैम्स
In simple words: टेरिडोफाइट्स को वैस्कुलर क्रिप्टोगैम्स भी कहा जाता है क्योंकि वे संवहन ऊतक (वैस्कुलर) रखते हैं लेकिन बीज (क्रिप्टोगैम्स) उत्पन्न नहीं करते।

🎯 Exam Tip: टेरिडोफाइट्स के वैकल्पिक नामों को याद रखें, विशेष रूप से 'वैस्कुलर क्रिप्टोगैम्स' जो उनकी प्रमुख विशेषताओं (संवहन ऊतक और बीजरहित) को उजागर करता है।

 

Question 8. प्रवालाभ जड़े (coralloid roots) पायी जाती हैं
(क) साइकस में
(ख) फ्यूनेरिया में
(ग) टेरिस में
(घ) लाइकोपोडियम में
Answer: (क) साइकस में
In simple words: प्रवालाभ जड़ें साइकस नामक जिम्नोस्पर्म में पाई जाती हैं, जिनमें नीले-हरे शैवाल सहजीवी रूप से निवास करते हैं और नाइट्रोजन स्थिरीकरण में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: विशिष्ट पौधों की संरचनाओं को उनके संबंधित पौधों के उदाहरणों के साथ याद रखें, जैसे साइकस में प्रवालाभ जड़ें।

 

Question 9. निम्नलिखित में से किसमें चूषक परीगनली पायी जाती है?
(क) पाइनस में
(ख) साइकस में
(ग) हिबिस्कस में
(घ) एलियम में
Answer: (ख) साइकस में
In simple words: साइकस में चूषक परागनली (haustorial pollen tube) पाई जाती है, जो परागण के दौरान बीजांड से पोषक तत्वों को अवशोषित करती है।

🎯 Exam Tip: जिम्नोस्पर्म के प्रजनन तंत्र से संबंधित विशिष्ट विशेषताओं और उनके उदाहरणों को याद रखें।

 

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

Question 1. लाइकेन के दोनों घटकों का नाम लिखिए।
Answer: लाइकेन के दोनों घटक शैवाल (phycobiont) और कवक (mycobiont) हैं।
In simple words: लाइकेन, शैवाल (जो प्रकाश संश्लेषण करता है) और कवक (जो सुरक्षा और जल अवशोषण प्रदान करता है) के बीच एक सहजीवी संबंध है।

🎯 Exam Tip: लाइकेन के दोनों घटकों को उनके वैज्ञानिक नामों (phycobiont, mycobiont) के साथ याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. चाय की पत्तियों पर लाल किट्ट (Red rust) रोग किस कारण होता है? या एक परजीवी शैवाल का नाम लिखिए।
Answer: सीफैल्यूरोस (Cephaluros) शैवाल से ।
In simple words: चाय की पत्तियों पर लाल किट्ट रोग सीफैल्यूरोस (Cephaluros) नामक परजीवी हरे शैवाल के कारण होता है।

🎯 Exam Tip: रोगजनक शैवाल और उनके द्वारा होने वाले विशिष्ट रोगों के उदाहरणों को याद रखना उपयोगी है।

 

Question 3. नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करने वाले दो नीले-हरे शैवालों के नाम लिखिए। या किसी शैवाल का नाम लिखिए जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण में भाग लेता है।
Answer: नॉस्टॉक तथा ऐनाबीना ।
In simple words: नॉस्टॉक और ऐनाबीना दो नीले-हरे शैवाल हैं जो वातावरण से नाइट्रोजन को स्थिर करके पौधों के लिए उपलब्ध कराते हैं।

🎯 Exam Tip: नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले नीले-हरे शैवाल (सायनोबैक्टीरिया) के प्रमुख उदाहरणों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 4. उस एककोशिकीय शैवाल का नाम लिखिए जो प्रकाश संश्लेषण के अनुसन्धान में प्रयुक्त होता है।
या किस शैवाल में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन पाई जाती है?
Answer: क्लोरेला (Chlorella)
In simple words: क्लोरेला एक एककोशिकीय शैवाल है जिसे प्रकाश संश्लेषण के अध्ययन में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है और इसमें प्रोटीन की उच्च मात्रा होती है।

🎯 Exam Tip: क्लोरेला के दो प्रमुख उपयोगों (अनुसंधान और प्रोटीन स्रोत) को याद रखना फायदेमंद है।

 

Question 5. एक शैवाल का नाम बताइए जिसमें सर्पिल हरितलवक होते हैं
Answer: स्पाइरोगायरा
In simple words: स्पाइरोगायरा एक शैवाल है जिसकी कोशिकाओं में अद्वितीय सर्पिल आकार के हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) पाए जाते हैं।

🎯 Exam Tip: विशिष्ट कोशिकांग संरचनाओं और उनके संबंधित जीव उदाहरणों को याद रखें।

 

Question 6. नीले-हरे शैवालों और जीवाणुओं में क्या समानताएँ हैं? या नीले-हरे शैवालों को सायनोबैक्टीरिया क्यों कहते हैं?
Answer: नीले : हरे शैवाल और जीवाणु दोनों ही मृदा में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं। नीले-हरे शैवालों में क्लोरोफिल पाया जाता है जिसकी सहायता से वे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं इसीलिए उन्हें सायनोबैक्टीरिया कहते हैं।
In simple words: नीले-हरे शैवाल और जीवाणु दोनों नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर सकते हैं। नीले-हरे शैवाल में क्लोरोफिल होता है, जिससे वे प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, इसलिए उन्हें सायनोबैक्टीरिया भी कहा जाता है।

🎯 Exam Tip: नीले-हरे शैवालों और जीवाणुओं के बीच नाइट्रोजन स्थिरीकरण की समानता और सायनोबैक्टीरिया नामकरण के कारण को स्पष्ट रूप से समझें।

 

Question 7. ब्रायोफाइटा के दो प्रमुख लक्षण लिखिए।
Answer:
1. इस समुदाय के अधिकांश पौधे हरे होते हैं तथा पृथ्वी पर नम एवं छायादार स्थानों पर उगते हैं। किन्तु इनमें निषेचन (fertilization) के लिए जल की आवश्यकता होती है, अतः इन्हें पादप जगत का उभयचर (amphibians of the plant kingdom) कहते हैं।
2. ये पौधे छोटे और थैलस की तरह (thalloid) होते हैं। कुछ उच्च श्रेणी के ब्रायोफाइट्स में वास्तविक (true) जड़े, तना तथा पत्तियाँ तो नहीं होतीं, परन्तु पौधे में तने तथा पत्ती के समान संरचनाएँ मिलती हैं। जड़ों के स्थान पर मूलांग (rhizoids) होते हैं। ये मूलांग पौधों को स्थिर रखने और भूमि से खनिज-लवण का अवशोषण करने में सहायक होते हैं।
In simple words: ब्रायोफाइट्स हरे, नम स्थानों पर उगने वाले छोटे थैलस-जैसे पौधे हैं जिन्हें निषेचन के लिए पानी की आवश्यकता के कारण "पादप जगत के उभयचर" कहा जाता है, और उनमें वास्तविक जड़ों के बजाय मूलांग होते हैं।

🎯 Exam Tip: ब्रायोफाइट्स के "पादप जगत के उभयचर" कहलाने के कारण और उनके मूलांगों के कार्य को याद रखें।

 

Question 8. फ्यूनेरिया के परिमुख में कितने दाँत पाये जाते हैं?
Answer: 32 दाँत पाये जाते हैं, जो दो कतारों में (प्रत्येक कतार में 16 दाँत) में व्यवस्थित होते हैं।
In simple words: फ्यूनेरिया के परिमुख में कुल 32 दाँत होते हैं, जो 16-16 के दो पंक्तियों में व्यवस्थित होते हैं।

🎯 Exam Tip: फ्यूनेरिया के परिमुख दाँतों की संख्या और उनकी व्यवस्था को याद रखना एक विशिष्ट तथ्यात्मक प्रश्न है।

 

Question 9. उस पौधे का नाम लिखिए जिसमें परिमुख (peristome) पाया जाता है।
Answer: परिमुख (peristome) अनेक ब्रायोफाइट्स विशेषकर मॉस (mosses), जैसे-फ्यूनेरिया (Fundria) में पाया जाता हैं।
In simple words: परिमुख, जो बीजाणुओं के प्रकीर्णन में मदद करता है, मुख्य रूप से मॉस जैसे फ्यूनेरिया में पाया जाता है।

🎯 Exam Tip: परिमुख की उपस्थिति वाले पौधों के उदाहरण (मॉस, फ्यूनेरिया) को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 10. उस ब्रायोफाइट का नाम लिखिए जिसमें पाइरीनॉइड पाया जाता है।
Answer: एन्थोसिरोस (Anthoceros)
In simple words: एन्थोसिरोस एक ब्रायोफाइट है जिसमें क्लोरोप्लास्ट के भीतर पाइरीनॉइड नामक प्रोटीनयुक्त संरचनाएं पाई जाती हैं।

🎯 Exam Tip: ब्रायोफाइट में पाइरीनॉइड की उपस्थिति वाले विशिष्ट उदाहरण को याद रखें।

 

Question 11. किस टेरिडोफाइटा का उपयोग जैव उर्वरक के रूप में किया जाता है?
Answer: जलीय टेरिडोफाइट ऐजोला (Azolla) का, क्योंकि इसमें नीला-हरा शैवाल ऐनग्बीना (Anabaena) पाया जाता है।
In simple words: जलीय टेरिडोफाइट ऐजोला का उपयोग जैव-उर्वरक के रूप में होता है क्योंकि यह ऐनाबीना नामक नीले-हरे शैवाल के साथ सहजीवी संबंध में रहता है, जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण करता है।

🎯 Exam Tip: जैव-उर्वरक के रूप में उपयोग होने वाले टेरिडोफाइट (ऐजोला) और उसके सहजीवी शैवाल (ऐनाबीना) के नाम को याद रखें।

 

Question 12. टेरिडोफाइटस में रम्भ (स्टील) की विचारधारा किसने प्रस्तुत की थी?
Answer: वान टोघम (Van Tiegham) एवं डुलिट (Doulit) ने।
In simple words: टेरिडोफाइट्स में संवहन तंत्र (रम्भ) की संरचना और विकास संबंधी अवधारणा को वान टोघम और डुलिट ने प्रस्तुत किया था।

🎯 Exam Tip: विशिष्ट वैज्ञानिक सिद्धांतों और उन्हें प्रस्तावित करने वाले वैज्ञानिकों के नाम याद रखें।

 

Question 13. टेरिडोफाइट्स के चार प्रमुख लक्षण लिखिए। उत्तर-टेरिडोफाइट्स के चार प्रमुख लक्षण निम्नवत् हैं
1. मुख्य पौधा बीजाणुभिद् (sporophyte) होता है जो प्रायः जड़, पत्ती तथा स्तम्भ में विभेदित रहता है।
2. ऊतक तन्त्र विकसित होता है, संवहन बण्डल उपस्थित, इनमें संवहन ऊतक (vascular tissue), जाइलम एवं फ्लोएम में भिन्नत होता है।
3. इसमें जाइलम में वाहिकाओं (vessels) तथा फ्लोएम में सह-कोशिकाओं (companion cells) का अभाव होता है।
4. द्वितीयक वृद्धि (secondary growth) अनुपस्थित, अपवाद स्वरूप आइसोइट्स (Isoetes) में द्वितीयक वृद्धि होती है।
In simple words: टेरिडोफाइट्स का मुख्य पौधा बीजाणुउभिद् होता है जो जड़, तना और पत्तियों में विभेदित होता है। इनमें विकसित संवहन ऊतक (जाइलम और फ्लोएम) होते हैं, लेकिन वाहिकाएं और सह-कोशिकाएं अनुपस्थित होती हैं, और सामान्यतः द्वितीयक वृद्धि नहीं होती।

🎯 Exam Tip: टेरिडोफाइट्स के प्रमुख लक्षणों को याद रखें, विशेषकर उनके संवहन ऊतक की उपस्थिति और द्वितीयक वृद्धि की अनुपस्थिति को।

 

Question 14. किस पौधे से तारपीन का तेल प्राप्त किया जाता है? उसका नाम लिखिए ।
Answer: अनावृतबीजी पौधे पाइनस से।
In simple words: तारपीन का तेल पाइनस (चीड़) नामक जिम्नोस्पर्म के पेड़ से प्राप्त होता है।

🎯 Exam Tip: आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण पौधों और उनसे प्राप्त उत्पादों को याद रखें।

 

Question 15. बीरबल साहनी के योगदानों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए ।
Answer: प्रो० बीरबल साहनी विश्व के जाने-माने जीवाश्म वनस्पति विज्ञानी (palaeobotanist) थे। उन्हें भारतीय जीवाश्म वनस्पति विज्ञान का जनक (Father of Indian Palaeobotany) कहा जाता है। उनका विशेष योगदान जुरैसिक युग (Jurassic age) के अनावृतबीजी (gymnosperm) विशेषकर एक वर्ग पेण्टोजाइली (pentoxylae) पर शोध कार्य है। उनके प्रयत्नों से, सन् 1946 में विश्व मान्य ‘बीरबल साहनी इन्स्टीट्यूट ऑफ पेलियोबॉटेनी' (Birbal Sahni Institute of Palaeobotany) लखनऊ की स्थापना हुई। पेलियोबॉटेनिकल सोसायटी ऑफ इण्डिया (Palaeobotanical Society of India) की स्थापना भी उनके ही विशिष्ट प्रयत्नों से हुई ।
In simple words: प्रोफेसर बीरबल साहनी भारतीय जीवाश्म वनस्पति विज्ञान के जनक थे, जिन्होंने जुरासिक युग के जिम्नोस्पर्म, विशेषकर पेण्टोजाइली पर महत्वपूर्ण शोध किया, और उनके प्रयासों से लखनऊ में बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पेलियोबॉटेनी की स्थापना हुई।

🎯 Exam Tip: प्रमुख वैज्ञानिकों के योगदानों, उनके विशिष्ट शोध क्षेत्रों और स्थापित संस्थानों को याद रखें।

 

Question 16. उस संरचना का नाम बताइए जो साइकस की पर्णिका में पाश्र्वशिरा का कार्य करती है।
Answer: संचरण ऊतक (transfusion tissue) जिसकी कोशिकाएँ अनुप्रस् रूप में लम्बी होती हैं।
In simple words: साइकस की पर्णिका में पाश्र्वशिरा का कार्य संचरण ऊतक (transfusion tissue) द्वारा किया जाता है, जिसमें लम्बी कोशिकाएँ होती हैं।

🎯 Exam Tip: साइकस जैसे विशिष्ट पौधों की आंतरिक संरचनाओं और उनके कार्यों को याद रखें।

 

Question 17. अनावृतबीजी पौधों के चार प्रमुख लक्षण (विशेषताएँ) लिखिए। या अनावृतबीजी पौधों की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए ।
Answer: अनावृतबीजी पौधों के चार प्रमुख लक्षण (विशेषताएँ) निम्नवत् हैं।
1. इस वर्ग के पौधे प्रायः बहुवर्षीय तथा काष्ठीय होते हैं।
2. ये मरुद्भिद् स्वभाव के होते हैं जिनमें रन्ध्र पत्ती में धंसे होते हैं तथा बाह्यत्वचा पर उपत्वचा की परत चढ़ी रहती है।
3. भ्रूणपोष अगुणित होता है तथा इसका निर्माण निषेचन के पूर्व ही होता है।
4. युग्मकोभिद् पीढ़ी बहुत कम विकसित तथा बीजाणुभिद् पीढ़ी पर ही निर्भर होती है।
In simple words: अनावृतबीजी पौधे बहुवर्षीय, काष्ठीय और मरुद्भिद् स्वभाव के होते हैं, जिनमें धंसे हुए रंध्र और उपत्वचा होती है। इनका भ्रूणपोष अगुणित होता है और निषेचन से पहले बनता है, तथा युग्मकोद्भिद् पीढ़ी बीजाणुउभिद् पीढ़ी पर अत्यधिक निर्भर करती है।

🎯 Exam Tip: अनावृतबीजी पौधों के मुख्य चार लक्षणों को याद रखें, विशेषकर उनके वासस्थान, भ्रूणपोष की सूत्रगुणता और युग्मकोद्भिद् पीढ़ी पर निर्भरता को।

 

Question 18. भारतीय जीवाश्म वनस्पति विज्ञान (पुरावनस्पति-विज्ञान) का जनक किसे कहा जाता है?
Answer: प्रो० बीरबल साहनी को ।
In simple words: प्रोफेसर बीरबल साहनी को भारतीय जीवाश्म वनस्पति विज्ञान का जनक माना जाता है।

🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण क्षेत्रों के संस्थापकों या जनक के नाम याद रखना तथ्यात्मक प्रश्नों के लिए उपयोगी है।

 

Question 19. साइकस तथा फर्न की समानताओं की तुलना कीजिए।
Answer: साइकस तथा फर्न में निम्नलिखित समानताएँ हैं
1. बीजाणुभिद् का जड़, तना व पत्ती में विभेदन
2. अनावृतबीजीयों के गण साइकेडेल्स के सदस्यों की संयुक्त पत्ती में फर्न की भाँति कुण्डलिन विन्यास (circinate venation)
3. संवहन ऊतक का विकास, दारु या जाइलम में वाहिनियाँ व पोषवाह या फ्लोएम में सह-कोशिकाएँ अनुपस्थित ।
4. विषमबीजाणुकता (heterospory)
5. युग्मकोभिद् के आकार में ह्रास ।
6. बीजाणुभिद् की जटिलता में क्रमिक वृद्धि ।
7. कुछ अनावृतबीजीयों गण साइकेडेल्स, गिंगोएल्स (order Cycadales, Ginkgoales) में बहुपक्ष्माभीय चलनशील पुंमणु (antherozoids)
8. निषेचन से पूर्व भ्रूणपोष का विकास ।
In simple words: साइकस और फर्न दोनों में जड़, तना, पत्ती में विभेदित बीजाणुउभिद् होता है, कुंडलित शिरा-विन्यास वाली पत्तियां होती हैं, संवहन ऊतक में वाहिकाएं और सह-कोशिकाएं अनुपस्थित होती हैं, और दोनों विषमबीजाणुक होते हैं, साथ ही दोनों में युग्मकोद्भिद् ह्रासित होता है।

🎯 Exam Tip: साइकस और फर्न के बीच की समानताओं को बिंदुवार याद रखें, खासकर संरचनात्मक विशेषताओं और प्रजनन संबंधी लक्षणों पर ध्यान दें।

 

Question 20. उभयलिंगी पादप किसे कहते हैं? एक उदाहरण दीजिए ।
Answer: वे पादप जिनमें नर पुष्प एवं मादा पुष्प दोनों अलग-अलग एक ही पादप पर उपस्थित होते हैं, उभयलिंगी पादप कहलाते हैं।
उदाहरणार्थ : मक्का (Maize)
In simple words: उभयलिंगी पादप वे पौधे होते हैं जिनमें एक ही पौधे पर नर और मादा दोनों पुष्प अलग-अलग स्थान पर मौजूद होते हैं, जैसे मक्का।

🎯 Exam Tip: उभयलिंगी पादप की परिभाषा और एक स्पष्ट उदाहरण याद रखना आवश्यक है।

 

लघु उत्तरीय प्रश्न

Question 1. यूलोथ्रिक्स और स्पाइरोगाइरा के लैगिक जनन की तुलना कीजिए। या राइजोपस तथा स्पाइरोगाइरा के लैगिक प्रजनन की तुलना कीजिए। या चित्रों की सहायता से यूलोथ्रिक्स में लैगिक जनन का वर्णन कीजिए।
Answer: यूलोथ्रिक्स तथा स्पाइरोगाइरा के लैगिक जनन की तुलना
In simple words: यूलोथ्रिक्स में लैंगिक जनन संयुग्मन द्वारा समयुग्मकी प्रकार का होता है, जहाँ दो सीलिया वाले आइसोगैमीट्स जल में संलयन कर जाइगोस्पोर बनाते हैं, और अंकुरण पर चलबीजाणु बनाते हैं। स्पाइरोगाइरा में भी लैंगिक जनन संयुग्मन द्वारा होता है, लेकिन यह असमयुग्मकी होता है जहाँ एक चल और दूसरा अचल युग्मक संलयन करते हैं, जाइगोस्पोर मिओसिस के बाद सीधे नया पौधा बनाता है।

🎯 Exam Tip: यूलोथ्रिक्स और स्पाइरोगाइरा के लैंगिक जनन के प्रकार (समयुग्मकी/असमयुग्मकी), युग्मक की प्रकृति (चल/अचल), और जाइगोस्पोर के अंकुरण के परिणाम में अंतर को ध्यान में रखें।

 

Question 1. यूलोथ्रिक्स और स्पाइरोगाइरा के लैगिक जनन की तुलना कीजिए। या राइजोपस तथा स्पाइरोगाइरा के लैगिक प्रजनन की तुलना कीजिए। या चित्रों की सहायता से यूलोथ्रिक्स में लैगिक जनन का वर्णन कीजिए।
Answer:यूलोथ्रिक्स तथा स्पाइरोगाइरा के लैगिक जनन की तुलना

यूलोथ्रिक्स (Ulothrix)स्पाइरोगाइरा (Spirogyra)
  • लैंगिक जनन संयुग्मन (conjugation) के द्वारा होता है और संयुग्मन दो युग्मकों (gametes) के मध्य होता है।
  • जनन समयुग्मकी (isogamous) होता है। नर तथा मादा युग्मक आकारिकी रूप में एक जैसे होते हैं।
  • लैंगिक जनन में दो सीलिया वाले आइसोगैमीट्स जल में संयुग्मित होते हैं और युग्माणु (zygospores) बनाते हैं।
  • युग्मकों में किसी प्रकार का लिंग भिन्नन (sex differ-entiation) नहीं दिखाई पड़ता।
  • चूँकि जाइगोस्पोर अंकुरण के समय पहले चलबीजाणु (zoospores) बनाता है; अतः इसको प्रारम्भिक स्पोरोफाइट माना जा सकता है। इस प्रकार पीढ़ियों के एकान्तरण की प्रारम्भिक रूपरेखा दिखाई देती है।
  • लैंगिक जनन संयुग्मन के द्वारा ही होता है, किन्तु संयुग्मन दो युग्मकधानियों (gametangia) के मध्य होता है।
  • जनन असमयुग्मकी (anisogamous) होता है। नर युग्मकधानी चल तथा मादा युग्मकधानी अचल प्रकार की होती है।
  • युग्मक यद्यपि आइसोगैमीट होते हैं किन्तु एक चल और दूसरा अचल होता है। चलयुग्मक (नर) संयुग्मन नलिका में होकर अचलयुग्मक (मादा) से मिलता है और युग्माणु (zygospore) बनाता है।
  • युग्मकों में लिंग भिन्नन दिखाई देता है। चलयुग्मक नर और अचलयुग्मक मादा की तरह है।
  • जाइगोस्पोर मिओसिस के बाद अंकुरित होकर एक ही पौधे को जन्म देता है, मिओसिस से प्राप्त चार केन्द्रकों में से तीन नष्ट हो जाते हैं। यहाँ पीढ़ियों के एकान्तरण का कोई निर्देश नहीं मिलता।

ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र यूलोथ्रिक्स के लैंगिक जनन की विभिन्न अवस्थाओं को दर्शाता है, जिसमें युग्मकों का निर्माण, उनका संलयन और युग्माणु का विकास शामिल है। यह पीढ़ियों के एकांतरण की प्रारंभिक रूपरेखा को भी स्पष्ट करता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र स्पाइरोगाइरा में संयुग्मन की विभिन्न अवस्थाओं को दिखाता है, जिसमें सोपानवत संयुग्मन, जाइगोस्पोर का निर्माण, अर्धसूत्री विभाजन और अंकुरण की प्रक्रियाएं विस्तृत रूप से चित्रित हैं। यह प्रजनन की पूरी प्रक्रिया को समझने में मदद करता है। राइजोपस तथा स्पाइरोगाइरा के लैगिक जनन की तुलना
राइजोपस (Rhizopus)स्पाइरोगाइरा (Spirogyra)
  • लैंगिक जनन संयुग्मन (conjugation) के द्वारा होता है।
  • युग्मकधानी (gametangium) ही युग्मक (ga-mete) की तरह कार्य करती है और संकोशिकी (coenocytic) अर्थात् बहुत सारे केन्द्रकों वाली होती है।
  • युग्मक आकार और व्यवहार में एक जैसे होते हैं, समयुग्मक (isogametes)। विषमजालिकता (het-erothallism) सामान्यतः पायी जाती है। केवल एक ही जाति में समजालिकता (homothallism) मिलती है।
  • युग्मक युग्मकधानियों के मध्य की भित्ति के नष्ट होने से मिलते हैं (plasmogamy)। केन्द्रक काफी देर से संयुक्त होते हैं अर्थात कैरिओगैमी (karyogamy) देर से होती है।
  • जाइगोस्पोर (zygospore) मोटी भित्ति से ढका रहता है। यह संकोशिकी (coenocytic) होता है। यह विश्रामी होता है।
  • जाइगोस्पोर के अंकुरण के समय ही कैरियोगैमी होती है तथा एक द्विगुणित केन्द्रक (2n) ही सक्रिय होता है, शेष नष्ट हो जाते हैं।
  • केन्द्रक मिओसिस (meiosis) के द्वारा विभाजित होता है। + और - विभेद अलग-अलग हो जाते हैं। केवल एक ही केन्द्रक क्रियाशील होता है, शेष नष्ट हो जाते हैं।
  • युग्माणु का एकमात्र अगुणित केन्द्रक भीतरी भित्ति के एक नलिका के रूप में बाहर निकलने से कोशिकाद्रव्य के साथ इसी में आ जाता है। बारम्बार विभाजित होने और जीवद्रव्य के नली अर्थात् प्राक्-कवक जाल (promycelium) के सिरे पर एकत्रित होने से एक संकोशिकी (coenocytic) बीजाणुधानी का निर्माण होता है।
  • बीजाणुधानी में बीजाणु बनते हैं तथा ये बीजाणु अनुकूल परिस्थिति में अंकुरित होकर कवकजाल बनाते हैं।
  • यहाँ भी लैंगिक जनन संयुग्मन के द्वारा ही होता है।
  • एक युग्मकधानी में एक ही युग्मक बनता है जो एककेन्द्रकी (uninucleate) होता है।
  • युग्मक आकार में तो एक-जैसे किन्तु एक अपनी धानी में अचल (non-motile) और दूसरा चल (motile) होता है। सामान्यतः विषमजालिकता जैसी क्रिया नहीं दिखाई देती। कुछ जातियों में तो पार्श्व संयुग्मन के द्वारा एक ही पौधे पर दोनों युग्मक बन जाते हैं।
  • चल युग्मक संयुग्मन नलिका (conjugation tube) में होकर अचल युग्मक के पास पहुँचता है। कोशिकाद्रव्य के मिलने अर्थात् प्लैज्मोगैमी के साथ-साथ कैरिओगैमी भी हो जाती है।
  • जाइगोस्पोर मोटी भित्ति से ढका रहता है, किन्तु इसमें एक ही द्विगुणित (2n) केन्द्रक होता है। यह विश्रामी होता है।
  • जाइगोस्पोर में प्रारम्भ से ही एक द्विगुणित (2n) केन्द्रक होता है। अंकुरण के समय यही एकमात्र द्विगुणित केन्द्रक सक्रिय हो जाता है।
  • केन्द्रक मिओसिस द्वारा विभाजित होता है। तीन केन्द्रक नष्ट हो जाते हैं और एक ही अगुणित केन्द्रक (n) क्रियाशील होता है।
  • युग्माणु (zygospore) का अगुणित केन्द्रक विभाजित होता है और भीतरी भित्ति एक नली के रूप में निकल कर एक पौधा बना लेती है।
  • यहाँ किसी प्रकार के बीजाणु नहीं बनते। युग्माणु से सीधा एक ही पौधा बनता है।

In simple words: यूलोथ्रिक्स और स्पाइरोगाइरा दोनों में संयुग्मन द्वारा लैंगिक जनन होता है, लेकिन युग्मकों के प्रकार और अंकुरण प्रक्रिया में भिन्नताएँ हैं। राइजोपस और स्पाइरोगाइरा में भी संयुग्मन होता है, पर युग्मकधानी की संरचना और केंद्रकों की भूमिका अलग-अलग होती है।

🎯 Exam Tip: इन सूक्ष्मजीवों के लैंगिक जनन की प्रक्रियाओं की तुलना करते समय, युग्मकों की आकृति, गतिशीलता और जाइगोस्पोर के विकास के चरणों पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि ये मुख्य अंतर हैं।

 

Question 2. शैवाल तथा कवक में अन्तर बताइए ।
Answer:शैवाल तथा कवक में अन्तर

शैवाल (Algae)कवक (Fungi)
  • कोशिकाभित्ति सेल्यूलोज की बनी होती है।
  • कोशिकाएँ (मृदूतक) प्रायः स्पष्ट होती हैं।
  • इन पौधों में लवकों (plastids) में पर्णहरित (chlo-rophyll) तथा अन्य वर्णक पाये जाते हैं।
  • ये स्वपोषी (autotrophic) होते हैं अर्थात् अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण के द्वारा स्वयं बनाते हैं।
  • संचित भोजन प्रायः मण्ड होता है।
  • ये तीव्र प्रकाश में तेजी से वृद्धि करते हैं।
  • निम्न श्रेणी के शैवालों में लैंगिक जनन में जनन अंग प्रायः नहीं बनते हैं। विकसित शैवालों में काफी जटिल जनन अंग पाये जाते हैं।
  • कोशिकाभित्ति कवक सेल्यूलोज (fungal cellulose) अथवा काइटिन (chitin) की बनी होती है।
  • कोशिकाएँ भिन्नित नहीं होती हैं। प्रायः एक ही जीवद्रव्य में अनेक केन्द्रक निलम्बित होते हैं अर्थात् संकोशिकीय (coenocytic) अवस्था मिलती है।
  • लवक, पर्णहरित तथा इस प्रकार के अन्य वर्णक भी नहीं पाये जाते हैं।
  • ये परपोषी (heterotrophic) होते हैं अर्थात् मृतजीवी (saprophytes), परजीवी (parasites), सहजीवी (symbionts) आदि हो सकते हैं।
  • संचित भोजन मण्ड नहीं होता है। यह प्रायः ग्लाइकोजन, वसा या तेल के रूप में होता है।
  • ये मन्द प्रकाश या अन्धकार में वृद्धि करते हैं।
  • विभिन्न श्रेणियों में लैंगिक जनन अंग भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। कई बार अधिक विकसित कवकों में जनन अंग अस्पष्ट तथा लुप्त हो जाते हैं।

In simple words: शैवाल स्वपोषी होते हैं और उनमें क्लोरोफिल होता है, जबकि कवक परपोषी होते हैं और उनमें क्लोरोफिल नहीं होता। शैवालों की कोशिका भित्ति सेलूलोज से बनी होती है, जबकि कवकों की भित्ति काइटिन या फंगल सेलूलोज से।

🎯 Exam Tip: शैवाल और कवक के बीच अंतर को स्पष्ट करते समय उनकी पोषण विधि, कोशिका भित्ति की संरचना और संचित खाद्य पदार्थ पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि ये प्रमुख विभेदक कारक हैं।

 

Question 3. निम्नलिखित को ओसवाल्ड टिप्पो के वर्गीकरण के अनुसार वर्गीकृत कीजिए
(i) यूलोथ्रिक्स
(ii) राइजोपस
(iii) साइकस
(iv) गुडहल (हिबिस्कस)
(v) प्याज (एलियम)
(vi) एलब्यूगो
(vii) अरहर
(viii) पाइनस
(ix) आलू

Answer:(i) यूलोथ्रिक्स जगत (kingdom) - पादप (plantae) उप-जगत (sub-kingdom) – थैलोफाइटा (thallophyta) संघ (phylum) – क्लोरोफाइटा (chlorophyta) वर्ग (class) - क्लोरोफाइसी (chlorophyceae) क्रम (order) – यूलोट्राइकेल्स (ulotrichales) उप-क्रम (sub-order) – यूलोट्राइकिनी (ulotrichineae) कुल (family) – यूलोट्राइकेसी (ulotrichaceae) वंश (genus) – यूलोथ्रिक्स (Ulothrix) जाति (species) – जोनेटा (zonata) (ii) राइजोपस जगत व उप-जगत - यूलोथ्रिक्स के समान संघ – यूमाइकोफाइटा (eumycophyta) वर्ग – फाइकोमाइसीट्स (phycomycetes) उप-वर्ग – जाइगोमाइसीट्स (zygomycetes) क्रम – म्यूकोरेल्स (mucorales) कुल – म्यूकोरेसी (mucoraceae) वंश – राइजोपस (Rhizopus) जाति – निग्रीकैन्स (nigricans) (iii) साइकस जगत - पादप (plantae) उप-जगत – एम्ब्रयोफाइटा (embryophyta) संघ – ट्रैकियोफाइटा (tracheophyta) उप-संघ – टेरॉप्सिडा (pteropsida) वर्ग – जिम्नोस्पर्मी (gymnospermae) उप-वर्ग – साइकेडोफाइटी (cycadophytae) क्रम – साइकेडेल्स (cycadales) वंश – साइकस (Cycus) (iv) गुडहल जगत से उप-संघ तक - साइकस के समान वर्ग – एन्जियोस्पर्मी (angiospermae) उप-वर्ग – डाइकॉटीलीडनी (dicotyledonae) विभाग – पॉलीपिटेली (polypetalae) श्रेणी – थैलेमीफ्लोरी (thalamiflorae) क्रम – मालवेल्स (malvales) कुल – मालवेसी (malvaceae) वंश – हिबिस्कस (Hibiscus) जाति – रोजासिनेन्सिस (rosasinensis) (v) प्याज जगत -से उप-संघ तक – साइकस के समान वर्ग – एन्जियोस्पर्मी (angiospermae) उप-वर्ग – मोनोकॉटीलीडनी (monocotyledonae) श्रेणी – कॉरोनेरी (coronarieae) कुल – लिलिएसी (liliaceae) वंश – एलियम (Allium) जाति – सीपा (cepa) (vi) एलब्यूगो जगत - पादप (plantae) उप-जगत - थैलोफाइटा (thallophyta) संघ – यूमाइकोफाइटा (eumycophyta) वर्ग – फाइकोमाइसिटीज (phycomycetes) वंश – एलब्यूगो (Albugo) जाति – कैन्डिडा (candida) (vii) अरहर जगत - पादप (plantae) उप-जगत – एम्ब्रयोफाइटा (embryophyta) संघ – ट्रैकियोफाइटा (tracheophyta) उप-संघ – टेरॉप्सिडा (pteropsida) वर्ग – एन्जियोस्पर्मी (arigiospermae) उप-वर्ग – डाइकॉटीलीडनी (dicotyledonae) वंश – कजानस (Cajanus) जाति – कजन (cajan) (viii) पाइनस जगत - पादप (plantae) उप-जगत – एम्ब्रयोफाइटा (embryophyta) संघ – ट्रैकियोफाइटा (tracheophyta) उप-संघ – टेरॉप्सिडा (pteropsida) वर्ग – जिम्नोस्पर्मी (gymnospermae) उप-वर्ग – कोनिफेरोफाइटी (coniferophytae) गण – कोनिफेरेल्स (Coniferales) वंश – पाइनस (Pinus) जाति – रॉक्सबर्थी (roxburghii) (ix) आलू जगत - पादप (plantae) गण – सोलेनेल्स (solanales) कुल – सोलेनेसी (solanaceae) वंश – सोलेनम (Solanum) जाति – ट्यूबेरोसम (tuberosum)
In simple words: यह वर्गीकरण विभिन्न पौधों और जीवों को उनके जगत, संघ, वर्ग, क्रम, कुल, वंश और जाति के आधार पर व्यवस्थित करता है, जिससे उनकी जैविक पहचान स्पष्ट होती है।

🎯 Exam Tip: वर्गीकरण के इन सभी स्तरों को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर प्रमुख पौधों और कवकों के लिए, क्योंकि ये अक्सर सीधे प्रश्नों में पूछे जाते हैं।

 

Question 4. मॉस (फ्यूनेरिया) सम्पुटिका की अनुदैर्ध्य (ऊर्ध्व) काट का नामांकित चित्र बनाइए (वर्णन की आवश्यकता नहीं है) या फ्यूनेरिया के बीजाणुभिद् की अनुदैर्ध्य काट का एक नामांकित चित्र बनाइए।
Answer:
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मॉस (फ्यूनेरिया) के स्पोरोगोनियम के ऊपरी भाग, सम्पुटिका (कैप्सूल) की अनुदैर्ध्य काट को दर्शाता है। इसमें ऑपरकुलम, पेरिस्टोम, एनुलस, कॉल्युमेला, बाहरी और भीतरी भित्ति, बीजाणु कोष, हाइपोडर्मल परत, स्पंजी परत, ट्रेबेक्यूले, एयर स्पेस और कंडक्शन बैंड जैसी विभिन्न संरचनाएं स्पष्ट रूप से नामांकित हैं।


In simple words: यह चित्र फ्यूनेरिया के कैप्सूल की आंतरिक संरचना को दर्शाता है, जिसमें बीजाणु निर्माण से संबंधित विभिन्न भाग जैसे पेरिस्टोम, कॉल्युमेला और स्पोर सैक् दिखाई देते हैं।

🎯 Exam Tip: फ्यूनेरिया के बीजाणुभिद् की संरचना का यह नामांकित चित्र अक्सर परीक्षा में पूछा जाता है। विभिन्न भागों, जैसे ऑपरकुलम और पेरिस्टोम, की पहचान और उनके कार्यों को याद रखना महत्वपूर्ण है।

 

Question 5. ब्रायोफाइट्स एवं टेरिडोफाइट्स में कोई चार अन्तर लिखिए।
Answer:

ब्रायोफाइट्सटेरिडोफाइट्स
  • मुख्य पादप शरीर युग्मकोद्भिद् एवं अगुणित होता है।
  • सत्य जड़ें और पत्तियाँ अनुपस्थित होती हैं।
  • संवहनीय ऊतक अनुपस्थित होते हैं।
  • स्त्रीधानियाँ लम्बी गर्दन वाली तथा कोशिकाओं की 6 खड़ी पंक्तियों वाली होती हैं।
  • मुख्य पादप शरीर बीजाणुद्भिद् एवं द्विगुणित होता है।
  • सत्य जड़ें और पत्तियाँ उपस्थित होती हैं।
  • संवहनीय ऊतक उपस्थित होते हैं।
  • स्त्रीधानियाँ छोटी गर्दन वाली तथा कोशिकाओं की 4 खड़ी पंक्तियों वाली होती हैं।

In simple words: ब्रायोफाइट्स में मुख्य पौधा युग्मकोद्भिद् और अगुणित होता है, जिनमें वास्तविक जड़ें और संवहनीय ऊतक नहीं होते, जबकि टेरिडोफाइट्स में मुख्य पौधा बीजाणुद्भिद् और द्विगुणित होता है, जिसमें वास्तविक जड़ें और संवहनीय ऊतक मौजूद होते हैं।

🎯 Exam Tip: ब्रायोफाइट्स और टेरिडोफाइट्स के बीच इन मूलभूत अंतरों को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर उनके प्रमुख पादप शरीर (युग्मकोद्भिद्/बीजाणुद्भिद्), जड़ों की उपस्थिति और संवहनीय ऊतक की मौजूदगी के संदर्भ में।

 

Question 6. निम्नलिखित के केवल नामांकित चित्र बनाइए
(क) साइकस के सूक्ष्मबीजाणुधानी की लम्ब काट
(ख) साइकस के पत्रक (पर्णक) की अनुप्रस्थ काट
(ग) साइकस के बीजाण्ड की अनुदैर्ध्य काट

Answer:(क)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह साइकस के सूक्ष्मबीजाणुधानी की लम्ब काट का एक नामांकित चित्र है, जो माइक्रोस्पोरों और टेपेटम जैसी संरचनाओं को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। यह सूक्ष्मबीजाणुधानी की आंतरिक बनावट और उसके घटकों को समझने में सहायक है।


(ख)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह साइकस के पत्रक (पर्णक) की अनुप्रस्थ काट का नामांकित चित्र है, जिसमें ऊपरी और निचली एपिडर्मिस, पैलिसेड टिश्यू, स्पंजी टिश्यू, स्टोमाटा, एयर कैविटीज, जाइलम, फ्लोएम और संवहन ऊतक जैसी संरचनाएँ दर्शाई गई हैं। यह पत्ती की आंतरिक शारीरिक रचना और विभिन्न ऊतकों की व्यवस्था को स्पष्ट करता है।


(ग)
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह साइकस के बीजाण्ड की अनुदैर्ध्य काट का एक रेखाचित्र है, जिसमें माइक्रोपाइल, आउटर फ्लेशी लेयर, इनर फ्लेशी लेयर, न्यूसेलस, आर्चिगोनिया, एम्ब्रियो, पॉलेन चैंबर और वैस्कुलर स्ट्रैंड्स जैसी महत्वपूर्ण संरचनाएं स्पष्ट रूप से नामांकित हैं। यह बीजाण्ड की समग्र आंतरिक संरचना को समझने में मदद करता है।
In simple words: ये चित्र साइकस के विभिन्न भागों, जैसे सूक्ष्मबीजाणुधानी, पत्रक और बीजाण्ड, की आंतरिक संरचना को नामांकित करते हैं, जिससे इनकी शारीरिक रचना और कार्यप्रणाली को समझने में मदद मिलती है।

🎯 Exam Tip: साइकस के इन नामांकित चित्रों को बनाने का अभ्यास करें। प्रत्येक भाग का सही स्थान और नामकरण, खासकर सूक्ष्मबीजाणुधानी, पत्रक और बीजाण्ड के महत्वपूर्ण घटकों का, उच्च अंक प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।

 

Question 7. साइकस की कोरैलॉइड जड़ की अनुप्रस्थ काट का नामांकित चित्र बनाइए। यह साइकस की सामान्य जड़ से किस प्रकार भिन्न है?
Answer:साइकस की कोरैलॉइड जड़ की सामान्य जड़ से भिन्नता साइकस की कोरैलॉइड जड़ (coralloid root) सामान्य जड़ से निम्नलिखित विशेषताओं में भिन्न होती है
1. कोरैलॉइड जड़े वायवीय (aerial) होती हैं, जबकि सामान्य जड़े भूमिगत होती हैं।
2. कोरैलॉइड वल्कुट (cortex) बाहरी, मध्य तथा आन्तरिक वल्कुटों में विभक्त होता है जबकि सामान्य जड़ों में सम्पूर्ण वल्कुट एक ही होता है।
3. कोरेलॉइड जड़ का मध्य वल्कुट वास्तव में एक शैवालीय क्षेत्र (algal zone) होता है जिसके बड़े-बड़े अन्तराकोशिकीय स्थानों (intercellular spaces) में एनाबीना (Anabaed), नॉस्टॉक (Nostoc) आदि नीले-हरे शैवाल रहते हैं, जो सामान्य जड़ों में नहीं पाये जाते हैं। साइकस की कोरैलॉइड जड़ की अनुप्रस्थ काट
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह साइकस की कोरैलॉइड जड़ की अनुप्रस्थ काट का एक भाग है, जिसमें एपिब्लेमा, पेरिडर्म, आउटर कॉर्टेक्स, टैनिन सेल्स, शैवालीय क्षेत्र (मध्य कॉर्टेक्स), इनर कॉर्टेक्स, एंडोडर्मिस, पेरिसाइकल, फ्लोएम, जाइलम और प्रोटोज़ाइलम जैसी विभिन्न संरचनाएं स्पष्ट रूप से नामांकित हैं। यह जड़ की आंतरिक शारीरिक रचना को समझने में सहायता करता है।
In simple words: साइकस की कोरैलॉइड जड़ें वायवीय होती हैं, इनका वल्कुट तीन भागों में बंटा होता है और इनमें शैवालीय क्षेत्र पाया जाता है जहाँ नीले-हरे शैवाल नाइट्रोजन स्थिरीकरण के लिए सहजीवी रूप में रहते हैं, जो सामान्य जड़ों में नहीं होता।

🎯 Exam Tip: साइकस की कोरैलॉइड जड़ और सामान्य जड़ के बीच अंतर स्पष्ट करते समय, उनकी वायवीय या भूमिगत प्रकृति, वल्कुट की संरचना और शैवालीय क्षेत्र की उपस्थिति पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। यह चित्र और वर्णन आपको उनके कार्य और अनुकूलन को समझने में मदद करेगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. निम्नलिखित के आर्थिक महत्त्व का वर्णन कीजिए
(क) कवक (फफूद)
(ख) टेरिडोफाइट्स

Answer:(क) कवकों का आर्थिक महत्त्व कवकों से निम्नलिखित लाभ हैं
1. भोजन के रूप में (As food) : अनेक कवकों में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन तथा विटामिन होते हैं अतः इन कवकों को भोजन के रूप में काम में लाया जा सकता है। उदाहरण-सब्जी । के रूप में (vegetables) कुकुरमुत्ते (mushrooms), गुच्छी (Morchella), लाइकोपरडॉन (Lycoperdon) आदि । खमीर (yeast) अनेक प्रकार से भोज्य पदार्थों को सुधारने, उनमें विटामिन इत्यादि की मात्रा बढ़ाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
2 औषधि निर्माण में (In medicines) : अनेक कवकों से अब प्रतिजैविक (antibiotics) प्राप्त किये जाते हैं। एण्टीबायोटिक्स का उपयोग प्रमुखतः जीवाणु रोगों (bacterial diseases) में कियाजाता है। उदाहरण-पेनिसिलिन (penicillin), पेनिसिलियम की जातियों (Penicillium notatum, p chrysogenum), अरगट (ergot) नामक औषधि क्लेविसेप्स परप्यूरिया (Claviceps purpurea) से प्राप्त की जाती है जो रुधिरस्राव (bleeding) रोकने के लिए (विशेषकर प्रसव के समय) प्रयोग में लायी जाती है।
3. उद्योगों में (In industry) : कवकों से अनेक प्रकार के कार्बनिक अम्ल (organic acids); जैसे- ऑक्सेलिक, लैक्टिक, साइट्रिक अम्ल आदि तथा ऐल्कोहॉल्स' (alcohols), विकर (enzymes), विटामिन्स (vitamins) आदि रासायनिक पदार्थ बनाये जाते हैं जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होते हैं।
उदाहरण :
यीस्ट के द्वारा शराबों का निर्माण ।
पौधों की वृद्धि के लिए जिबरेलिन्स (gibberellins) उपयोगी सिद्ध हुए हैं। ये जिबरेला फ्यूजीकोराई (Gibberella jugikordi) से तैयार किये जाते हैं। ऐस्पर्जिलस (Aspergillus) तथा पेनिसिलियम (Penicillium) आदि यीस्ट (yeast) के अतिरिक्त पनीर बनाने के काम आते हैं। बेकिंग (baking) उद्योग में यीस्ट अत्यन्त उपयोगी है। अनेक विकर (enzymes) तथा विटामिन्स (vitamins) को औद्योगिक निर्माण यीस्ट, एस्पर्जिलस, राइजोपस (Rhizopus), पेनिसिलियम आदि कवकों के द्वारा किया जाता है। कवक ऑडियम लैक्टिस (Oidium lactis) प्लास्टिक उद्योग में काम आता है।
4. मृदा उर्वरता बनाये रखने में (In maintenance of soil fertility) : कवक जीवाणुओं की तरह प्राकृतिक अपमार्जक (natural scavengers) का कार्य करते हैं और इस प्रकार भूमि की उर्वरता बढ़ाते हैं। जल को रोकने की शक्ति, ह्यूमस (humus) बनाने में सहयोग, लवणों को। अवशोषित कर उन्हें रोके रखने की शक्ति भी भूमि में उत्पन्न करते हैं।
5. पौधों के पोषण में (In nutrition of plants) : अनेक पौधों की जड़ों पर या उनके अन्दर कुछ कवक (fungi) रहते हैं। इन्हें क्रमशः एक्टोट्रॉफिक माइकोराइजा तथा एण्डोट्रॉफिक माइकोराइजी (ectotrophic and endotrophic mycorrhiza) कहते हैं। अनेक ऑरकिड्स (orchids), मोनोटोपा यूनीफ्लोरा (Monotropd uniflora), साराकोड्स (Sardcodes), पाइनस (Pinus), जैमिया (Zamia) आदि इसके उदाहरण हैं।
(ख) टेरिडोफाइट्स का आर्थिक महत्त्व टेरिडोफाइट्स से निम्नलिखित लाभ हैं
1. जैव उर्वरक के रूप में (As Biofertilizer) : एजोला के अन्दर एनाबीना ऐजोली (Anabdena gzotlae) नामक नीला-हरा शैवाल वास करता है। यह शैवाल स्वतन्त्र नाइट्रोजन को स्थिरीकरण करता है। इस कारण से एजोला को धान आदि के खेतों में उर्वरक (fertilizer) के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह पौधा तालाब की सतह पर अधिक वृद्धि करके मच्छर के लार्वा को साँस लेने में अवरोध करता है।
2. सजावट के लिए (Ornamental Plants) : फर्न की विभिन्न जातियाँ घरों व बगीचों में सुन्दरता के लिए लगाई जाती हैं; जैसे-लाइकोपोडियम (ground pines) तथा सैलाजिनेला (spike mosses) आदि ।
3. खाद्य पदार्थ के रूप में (As Food) : क्विलक्स (आइसोइट्स- Isoetes) के घनकन्द (corms), मनुष्यों, पालतू व जंगली जन्तुओं द्वारा खाए जाते हैं।
4. मनोरंजन हेतु (For Entertainment) : सैलाजिनेला की कुछ मरुभिद् जातियों को पुनर्जीवनी पौधे (resurrection plant) कहा जाता है, इन्हें कौतुहल वश बाजार में बेचा जाता है। ये पौधे सूख जाने पर मुड़कर छोटी गेंद (balls) के रूप में बदल जाते हैं और पूर्णतया मृत प्रतीत होते हैं। पुनः जल में डाल दिए जाने पर पौधे तेजी से पूर्णतया खुलकर हरे हो जाते हैं।
5. जीवाश्म ईंधन का निर्माण (Formation of Fossil Fuel) : टेरिडोफाइट्स जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) के जमा होने में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। आदि काल में ये विशाल हार्सटेल्स (giant horsetails), क्लब मॉस आदि दलदली वनस्पति (swampy vegetation) का प्रमुख अंश थे । दलदल धीरे-धीरे डूबने लगे और पौधों के विभिन्न भाग एकत्रित होते गए। जल में ऑक्सीजन के अभाव में इन पौधों को जीवाणु विघटित (decompose) नहीं कर पाए। इन परिस्थितियों के कारण कालान्तर में कोयले (coal) का निर्माण हुआ ।
6. जीवनाशक के रूप में (As Pesticides) : लाइकोपोडियम (Lycopodium) की अनेक जातियाँ नाइट्रोजनयुक्त रसायन (alkaloids) बनाती हैं। यह विष का कार्य करता है। अतः कुछ देशों में इसे जीवनाशक (pesticides) के रूप में प्रयोग किया जाता है।
In simple words: कवक भोजन, औषधि, उद्योगों और मृदा उर्वरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जबकि टेरिडोफाइट्स जैव-उर्वरक, सजावटी पौधों, खाद्य स्रोत, मनोरंजन और जीवाश्म ईंधन के निर्माण में आर्थिक महत्व रखते हैं।

🎯 Exam Tip: इन दोनों समूहों के आर्थिक महत्व को याद करते समय प्रत्येक श्रेणी में कम से कम दो-तीन उदाहरणों को सूचीबद्ध करें, ताकि उत्तर अधिक विस्तृत और सटीक हो।

 

Question 2. उपयुक्त नामांकित चित्रों के द्वारा फर्न के जीवन चक्र का वर्णन कीजिए। मॉस के वयस्क पौधे की समानता फर्न के जीवन चक्र की किस अवस्था से की जा सकती है? कारण सहित लिखिए। या पीढी एकान्तरण की परिभाषा लिखिए। नामांकित चित्रों की सहायता से इसे फर्न के जीवन चक्र के साथ स्पष्ट कीजिए ।
Answer:पीढी एकान्तरण लैंगिक जनन (sexual reproduction) के समय जब दो युग्मकों (gametes) के संलयन (fusion) से युग्मज (Zygote) का निर्माण होता है तो एम्ब्रयोफाइटा (embryophyta) समूह के पोधों में यह सूत्री विभाजन के द्वारा एक बहुकोशिकीय (multicellular) स्पष्ट भ्रूण (embryo) का निर्माण करता है। यह भ्रूण एक द्विगुणित संरचना है तथा एक विशेष अवस्था है जो एक द्विगुणित पीढ़ी या सन्तति (diploid generation) का निर्माण करती है। इस पीढ़ी को बीजाणुभिद् (sporophyte) कहते हैं। बीजाणुभिद् बीजाणुओं (spores) द्वारा जननकरता है, जो अर्द्धसूत्री विभाजन (meiosis) के बाद बनते हैं और अगुणित (haploid) होते हैं। प्रत्येक बीजाणु अंकुरित होता है और सामान्य सूत्री विभाजनों द्वारा बहुकोशिकीय अवस्था अर्थात्यु ग्मकोभिद् (gametophyte) पीढ़ी का निर्माण करता है। इसी पीढ़ी से युग्मकों का निर्माण होता है। उपर्युक्त के अनुसार, एक एम्ब्रयोफाइटिक पौधे (embryophytic plant) में दो पीढ़ियाँ (generations), युग्मकोद्भिद् तथा बीजाणुभिद् एक जीवन चक्र (life cycle) को बनाती हैं। इस प्रकार युग्मकोभिद् पीढ़ी से बीजाणुभिद् पीढ़ी तथा बीजाणुभिद् पीढ़ी से युग्मकोभिद् पीढ़ी का एक के बाद एक आना पीढ़ियों का एकान्तरण (alternation of generations) कहलाता है। एक फर्न, टेरिस या ड्रायोप्टेरिस का जीवन चक्र विभाग ट्रैकियोफाइटा (tracheophyta) के उपविभाग टेरोफाइटा या फिलिकोफाइटा (pterophyta or filicophyta), वर्ग लेप्टोस्पोरैन्जियोप्सडा (leptosporangiopsida), गण फिलिकेल्स (filicales) के सदस्य सामान्यतः फर्न (fern) कहलाते हैं। इन पौधों के जीवन चक्र सामान्य रूप से समान प्रकार के होते हैं। यहाँ वर्णन प्रमुखतः ड्रायोप्टेरिस फिलिक्स मैस (Dryoteris filix mas) नामक पौधे के सन्दर्भ में है। 1. बीजाणुभिद् (Sporophyte) : यह फर्न का मुख्य पौधा होता है। इसके तीन प्रमुख भाग होते हैं
1. प्रकन्द (rhizome), जो भूमि में तिरछा उगता है। इसका केवल अगला शीर्ष भाग ही भूमि से बाहर निकला रहता है।
2. प्रकन्द से निकलने वाली अनेक पत्तियाँ तथा
3. अपस्थानिक जड़े। फर्न के पौधे में पत्तियाँ विशेष रूप से काफी बड़ी सामान्यतः द्विपिच्छाकार संयुक्त (bipinnate compound) होती हैं और ये पौधे की प्रमुख पहचान हैं।
2. बीजाणुपर्ण (Sporophylls) : कुछ सामान्य पत्तियाँ ही बीजाणुपर्ण (sporophylls) का कार्य करती हैं। इन पत्तियों के पर्णकों की निचली सतह पर अनेक बीजाणुधानियाँ (sporangia) समूहों के रूप में लगी रहती हैं। बीजाणुधानियों के समूहों को सोराई (sori) कहा जाता है।
3. सोरस तथा उसकी बीजाणुधानियाँ (Sorus and its sporangia) : प्रत्येक सोरस में कई बीजाणुधानियाँ होती हैं। प्रत्येक बीजाणुधानी की भित्ति एक कोशिका मोटी होती है तथा इसमें 12 से 16 तक बीजाणु मातृ कोशिकाएँ (spore mother cells) होती हैं। प्रत्येक बीजाणु मातृकोशिका (2n) से अर्द्धसूत्री विभाजन (meiosis) के द्वारा चार अगुणित (haploid=n) बीजाणुओं (spores) का निर्माण होता है। इस प्रकार फर्न का पौधा जो एक बीजाणुभिद् होता है, बीजाणुओं के द्वारा अलैंगिक जनन (asexual reproduction) करता है।
4. बीजाणुधानी का स्फुटन तथा बीजाणुओं का प्रकीर्णन (Dehiscence of sporangium and dispersal of spores) : शुष्क अवस्थाओं में सोरस तथा बीजाणुधानी का स्फुटन एक विशेष प्रकार से होता है। इससे बीजाणु (spores) दूर तक छिटक जाते हैं तथा वायु में तैरतेहुए भूमि पर पहुँचकर अंकुरित होते हैं।
5. युग्मकोभिद् (Gametophyte) : प्रत्येक बीजाणु अनुकूल अवस्थाओं में अंकुरित होकर एक नयी पीढ़ी को जन्म देता है। यह एक पूर्णतः स्वतन्त्रजीवी, पौधे की तरह की संरचना बनाता है। इसे प्रोथैलस (prothallus) कहते हैं। यही फर्न की प्रमुख युग्मकोभिद् (gametophyte) अवस्था है।
6. प्रोथैलस (Prothallus) : यह एक हरे रंग की चपटी, पतली, हृदयाकार (heart shaped) तथा शयान (prostrate) संरचना होती है और भूमि पर लेटी हुई दशा में बढ़ती है। इसका अग्र भाग चौड़ा होता है तथा इसके मध्य भाग में एक गर्त (notch) होता है जिसके दोनों ओर की पालियाँ एक-दूसरे को ढकने वाली (overlapping) होती हैं। प्रोथैलस के पश्च, संकरे सिरे के निचले भागे से मूलाभास (rhizoids) निकलते हैं। यह स्वपोषी (autotrophic) होता है।
7. जननांग (Reproductive organs) : फर्न का प्रोथैलस एक उभयलिंगाश्रयी (monoecious) संरचना है अर्थात् एक ही प्रोथैलस पर नर तथा मादा जननांग बन जाते हैं यद्यपि केवल परनिषेचन (cross fertilization) ही होता है। नर जननांग पुंधानियाँ (antheridia) होती हैं तथा मादा जननांग स्त्रीधानियाँ (archegonia) होती हैं। जननांग प्रोथैलस के मध्य तथा पश्च भाग तक फैले अधिक मोटे (thick), गद्दी (cushion) के समान भाग पर बनते हैं। स्त्रीधानियाँ गर्त (notch) के आस-पास किन्तु पुंधानियाँ पश्च भाग में बनती हैं।
8. पुंधानी तथा नर युग्मक (Antheridium and male gametes) : एक परिपक्व पुंधानी प्रोथैलस के तल से बाहर उभरी होती है। यह एक गोल, एककोशिका मोटी भित्ति वाली संरचना होती है। इसके अन्दर 20-50 तक नर युग्मक (male gametes) अर्थात् पुमणुओं (antherozoids) का निर्माण होता है। पुमणु एक सिंप्रग के समान कुण्डलित, बहुपक्ष्माभिकी (multicilliate) तथा सचल (motile) होते हैं। ये रसायन अनुचलित (chemotactic) होते हैं और जल में तैरकर स्त्रीधानी तक पहुँचते हैं।
9. स्त्रीधानी तथा मादा युग्मक (Archegonium and female gamete) : एक परिपक्व स्त्रीधानी (archegonium) फ्लास्क के समान तिरछी गर्दन वाली संरचना होती है। इसकी गर्दन, चार ऊर्ध्व पंक्तियों में लगी कोशिकाओं से बनी होती है। इसके फूले हुये भाग अण्डधा (venter) का कोई अपना स्तर नहीं होता। यह प्रोथैलस में ही धंसी रहती है। इसकी गर्दन में ग्रीवा नाल कोशिका (neck canal cell) एक ही, किन्तु द्विकेन्द्रकीय (binucleate) होती है। इसके अतिरिक्त एक अण्डधा नाल कोशिका (venter canal cell) तथा सबसे भीतरी फूले हुये भाग में एक अण्डाणु (oosphere) होता है। अण्डाणु ही अचल (non-motile) मादा युग्मक है।
10. निषेचन (Fertilization) : निषेचन की क्रिया के लिए जल आवश्यक होता है। स्त्रीधानी के परिपक्व होने पर इसका मुँह खुल जाता है। इस समय मुंह पर उपस्थित कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं, साथ ही ग्रीवा नाल कोशिका तथा अण्डधा नाल कोशिका नष्ट होकर श्लेष्मक बना लेती हैं। श्लेष्मक मुँह से भी बाहर निकलने लगता है जिसमें उपस्थित मैलिक अम्ल (malic acid) से आकर्षित होकर पुमणु जल में तैरते हुये स्त्रीधानी में घुस आते हैं। इनमें से एक अण्डाणु (oosphere) में प्रवेश कर इसे निषेचित (fertilize) करता है। इस प्रकार अण्डाणु से द्विगुणित (diploid = 2n) युग्मनज (zygote) बनता है। शीघ्र ही युग्मनज अपने चारों ओर एक मोटी भित्ति का निर्माण करता है और निषिक्ताण्ड (oospore) में बदल जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र फर्न (ड्रायोप्टेरिस) के जीवन चक्र की विभिन्न अवस्थाओं को चित्रीय रूप से दर्शाता है। इसमें युग्मकोद्भिद् और बीजाणुद्भिद् पीढ़ियों का एकांतरण, लैंगिक जनन के चरण, अर्धसूत्री विभाजन, बीजाणु निर्माण और निषेचन की प्रक्रियाएँ स्पष्ट रूप से नामांकित हैं, जो फर्न के जटिल जीवन चक्र को समझने में मदद करती हैं।
11. भ्रूण तथा नये बीजाणुभिद् का निर्माण (Formation of embryo and new sporophyte) : निषिक्ताण्ड (oospore) सामान्य सूत्री विभाजनों (mitotic divisions) से बार-बार एक विशेष पैटर्न में विभाजित होता है तथा एक भ्रूण (embryo) का निर्माण करता है। एक प्रोथैलस पर यद्यपि कई स्त्रीधानियों में निषेचन तथा उससे आगे की अन्य क्रियाएँ हो सकती हैं, किन्तु सामान्यतः भ्रूण एक ही निर्मित हो पाता है। यही भ्रूण बढ़ते हुये अण्डधा द्वारा बनाये गये कैलिप्ट्रा (calyptra) को भी तोड़-फोड़ देता है। इसका एक भाग पाद की तरह प्रोथैलस से सम्बन्धित रहता है, किन्तु शीघ्र ही एक मूल कुछ दूरी तक प्रोथैलस के साथ बढ़कर बढ़ते हुये भ्रूण को मृदा में जमा देती है। उधर प्ररोह शीर्ष पर लगी प्राथमिक पत्ती प्रोथैलस के गर्त में से होकर ऊपर निकल आती है और हरी हो जाती है। शीर्ष अब प्रकन्द (rhizome) में बदल जाता है। इस प्रकार एक छोटा-सा नया बीजाणुभिद् (new sporophyte) तैयार हो जाता है। उपर्युक्त विवरण स्पष्ट करता है कि यहाँ पीढ़ियों को एकान्तरण दो स्पष्ट, स्वतन्त्रजीवी, स्वपोषी सन्ततियों अर्थात् प्रोथैलस (युग्मकोद्भिद्) तथा मुख्य पौधे (बीजाणुभिद्) के मध्य होता है मॉस का वयस्क पौधा (adult plant of moss) मॉस के जीवन चक्र की युग्मकोभिदी (gametophytic) पीढ़ी है। फर्न के जीवन चक्र में प्रमुख युग्मकोभिद् इसका प्रोथैलस (prothallus) होता है। निम्नलिखित कारण इसे स्पष्ट करते हैं
1. दोनों की कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या अगुणित (n) होती है।
2. दोनों का निर्माण बीजाणु (spore) के अंकुरण से बने सूत्राकार संरचनाओं पर होता है।
3. दोनों ही लैंगिक जनन के लिए नर तथा मादा जननांगों अर्थात् पुंधानियाँ व स्त्रीधानियाँ (antheridia and archegonia) तथा उनसे क्रमशः नर व मादा युग्मकों अर्थात् एन्थ्रोजोइड्स (antherozoids) व अण्डाणु (oosphere) का निर्माण करते हैं।
4. निषेचन के बाद दोनों के ऊपर नये बीजाणुभिदों (sporophytes) का निर्माण होता है।
5. निषेचन तथा बीजाणुभिद् के परिवर्द्धन की अवस्थाओं आदि में भी काफी समानता होती है।
In simple words: फर्न के जीवन चक्र में युग्मकोद्भिद् (प्रोथैलस) और बीजाणुद्भिद् (मुख्य पौधा) पीढ़ियों का स्पष्ट एकांतरण होता है। मॉस का वयस्क पौधा युग्मकोद्भिद् पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है, जो फर्न के प्रोथैलस के समान है, क्योंकि दोनों अगुणित होते हैं और बीजाणुओं से विकसित होते हैं तथा लैंगिक अंग धारण करते हैं।

🎯 Exam Tip: पीढ़ी एकांतरण को स्पष्ट करते समय फर्न के जीवन चक्र के विभिन्न चरणों – बीजाणुद्भिद्, युग्मकोद्भिद्, निषेचन और भ्रूण विकास – को विस्तार से समझाना आवश्यक है। मॉस और फर्न के युग्मकोद्भिद् चरणों की तुलना करना भी महत्वपूर्ण है।

 

Question 3. नामांकित चित्रों की सहायता से आवृतबीजी पौधों के जीवन चक्र का वर्णन कीजिए। या एक द्विबीजपत्री पौधे के जीवन चक्र का नामांकित रेखीय चित्र बनाइए ।
Answer:आवृतबीजी (द्विबीजपत्री) पौधे का जीवन चक्र एक आवृतबीजी पौधा एक अत्यधिक विकसित तथा जटिल शरीर वाला बीजाणुभिद् (sporophyte) होता है अर्थात् यह द्विगुणित (diploid = 2n) होता है। इसके जीवन चक्र की प्रमुख अवस्थाएँ निम्नलिखित होती हैं
1. पौधे पर पुष्प (flowers) लगते हैं जिनमें लैंगिक अंग (sexual organs) क्रमशः नर तथा मादा पुंकेसर (stamens) और स्त्रीकेसर या अण्डप (carpels) होते हैं।
2. प्रत्येक पुंकेसर का जनन भाग विशेष अंग परागकोष (anther) होता है जिसके अन्दर विशेष कोशिकाओं द्विगुणित (diploid=2n) लघुबीजाणु मातृ कोशिकाओं (microspore mother cells) में अर्द्धसूत्री विभाजन (meiosis) के द्वारा अगुणित (haploid=n) लघुबीजाणुओं (microspores) का निर्माण होता है। लघुबीजाणु ही युग्मकोभिद् (gametophyte) की प्रथम अवस्था है
3. प्रत्येक स्त्रीकेसर या अण्डप (carpel) में अण्डाशय (ovary) के अन्दर बीजाण्ड (ovule) बनते हैं, जो इसकी गुरुबीजाणुधानियाँ (megasporangia) हैं।
4. बीजाण्ड के मुख्य भाग बीजाण्डकाय (nucellus) में एक बीजाणु मातृ कोशिका (megaspore mother cell) से चार गुरुबीजाणुओं (megaspores) का निर्माण होता है जो इसके मादा युग्मकोभिद् (female gametophyte) की प्रारम्भिक अवस्था है
5. प्रत्येक बीजाण्ड में बनने वाले चार गुरुबीजाणुओं में से केवल एक बढ़कर भ्रूणकोष (embryo sac) बनाता है। यही इसका मादा युग्मकोभिद् है जिसमें प्रायः केवल आठ केन्द्रक ही होते हैं, इनमें एक मादा युग्मक (female gamete) या अण्ड (ovum or egg cell) भी सम्मिलित है।
6. परिपक्व नर युग्मकोभिद् या परागकण केवल दो ही कोशिकाओं का बना होता है तथा इसी अवस्था में परागण के लिए यह परागकोष से बाहर निकलता है।
7. परागण (pollination) की क्रिया के द्वारा परागकण मादा अंग जायांग के वर्तिकाग्र पर किसी साधन से पहुँचते हैं और यहीं अंकुरित होकर पराग नलिका (pollen tube) बनाते हैं। प्रत्येक पराग नलिका के सिरे पर नर युग्मकोभिद् का वर्दी केन्द्रक या नलिका केन्द्रक (tube nucleus) तथा थोड़ा जनन केन्द्रक (generative nucleus) होता है, जो बाद में पराग नलिका में ही विभाजित होकर दो नर युग्मक (male gametes) बनाता है। पराग नलिका वर्तिका से होती हुई अण्डाशय में तथा बाद में बीजाण्ड के अन्दर प्रवेश करके नर युग्मकों (male gametes) को भ्रूणकोष (embryo sac) के अन्दर पहुँचाती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक आवृतबीजी (द्विबीजपत्री) पौधे के जीवन चक्र की प्रमुख घटनाओं का चित्रीय निरूपण करता है। इसमें परागण, निषेचन, बीज और फल का निर्माण, तथा भ्रूण और नए पौधे के विकास की विभिन्न अवस्थाएँ स्पष्ट रूप से नामांकित हैं, जो आवृतबीजी पौधों की प्रजनन प्रक्रिया को समझने में मदद करता है।
8. दो नर युग्मकों में से, एक मादा युग्मक (अण्ड कोशिका) से संयुग्मित होता है तथा दूसरा नर युग्मक द्वितीयक केन्द्रक (secondary nucleus) से संयुक्त होता है। इस प्रकार, इन पौधों में दिनिषेचन (double fertilization) की क्रिया होती है।
9. द्वितीयक केन्द्रक पहले ही दो ध्रुवीय केन्द्रकों के मिलने से बनता है; अतः द्विनिषेचन के अन्त में दौ भिन्न-भिन्न प्रकार के केन्द्रक बनते हैं-एक द्विगुणित (diploid=2n) अब भ्रूणीय कोशिका (embryonal cell) में उपस्थित तथा दूसरा प्रायः त्रिगुणित (triploid=3n) अर्थात् भ्रूणपोष केन्द्रक (endospermic nucleus) जो सम्पूर्ण भ्रूणकोष का प्रतिनिधित्व करने वाले जीवद्रव्य में स्थित होता है।
10. भ्रूणीय कोशिका (embryonal cell) से भ्रूण (embryo) का निर्माण होता है। भ्रूणपोषीय केन्द्रक (endospermic nucleus) भ्रूणकोष के जीवद्रव्य के साथ एक पोषक संरचना भ्रूणपोष (endosperm) का निर्माण करता है।
11. सम्पूर्ण बीजाण्ड भ्रूण और भ्रूणपोष के बनने से बीज में बदल जाता है, जबकि अण्डाशय फल (fruit) बनाता है। बीज के अन्दर भ्रूण नया बीजाणुभिद् (sporophyte) है; अतः ये जब भी अंकुरित होते हैं तो नये पौधे बनाते हैं।
In simple words: आवृतबीजी पौधों का जीवन चक्र बीजाणुभिद् अवस्था से शुरू होता है, जिसमें फूल, परागकोष और बीजाण्ड होते हैं। परागण के बाद, नर और मादा युग्मक संलयन करते हैं (द्विनिषेचन), जिससे भ्रूण और त्रिगुणित भ्रूणपोष बनता है। बीजाण्ड बीज में और अंडाशय फल में विकसित होता है, जो फिर से नया बीजाणुभिद् पौधा बनाते हैं।

🎯 Exam Tip: आवृतबीजी पौधों के जीवन चक्र के प्रत्येक चरण को क्रमबद्ध तरीके से याद करें, विशेष रूप से परागण, द्विनिषेचन, और बीज व फल के निर्माण की प्रक्रियाओं को। नामांकित चित्र बनाना भी उच्च अंक प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।

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