UP Board Solutions Class 11 Biology Chapter 21 Neural Control and Coordination

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Detailed Chapter 21 तंत्रिका नियंत्रण और समन्वय UP Board Solutions for Class 11 Biology

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Class 11 Biology Chapter 21 तंत्रिका नियंत्रण और समन्वय UP Board Solutions PDF

UP Board Solutions For Class 11 Biology Chapter 21 Neural Control And Coordination (तन्त्रिकीय नियन्त्रण एवं समन्वय)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

Question 1. निम्नलिखित संरचनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए- (अ) मस्तिष्क (ब) नेत्र (स) कर्ण ।
Answer:(अ) मस्तिष्क की संरचना मनुष्य में मस्तिष्क कपाल या क्रेनियम (cranium) के भीतर सुरक्षित रहता है। मस्तिष्क तीन आवरणों से ढका रहती है जिन्हें मस्तिष्कावरण (meninges) कहते हैं। ये मस्तिष्कावरण हैं- 1. दृढतानिका (Duramater) - श्वेत तन्तुमय ऊतक की बनी होती है। 2. जालतानिका (Arachnoid mater) - यह मध्य की पर्त है। 3. मृदुतानिका (Piamater) - यह सबसे भीतरी आवरण है, जो मस्तिष्क के सम्पर्क में रहती है। इस पर्त में रुधिर वाहिनियों का जाल बिछा रहता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मानव मस्तिष्क की खड़ी काट (vertical section) को दर्शाता है। इसमें खोपड़ी की हड्डी, थैलेमस व हाइपोथैलेमस, पीनियल बॉडी, सेरेब्रम, सेरेबेलम, मिड ब्रेन, पॉन्स, मेडुला और स्पाइनल कॉर्ड जैसे विभिन्न हिस्से दिखाए गए हैं। साथ ही, मस्तिष्क को ढकने वाली तीन परतें- ड्युरामेटर, एरेक्नोइड मेटर और पियामेटर- तथा ऑप्टिक कायज़्मा और पिट्यूटरी ग्रंथि जैसी संरचनाएं भी स्पष्ट रूप से दर्शायी गई हैं। इन झिल्लियों के बीच एक तरल भरा रहता है जिसे सेरेब्रोस्पाइनल तरल (cerebrospinal fluid) कहते हैं। यह द्रव पोषण, श्वसन तथा उत्सर्जन में सहायक है। यह बाहरी आघातों से कोमल मस्तिष्क की सुरक्षा भी करता है। मस्तिष्क को तीन भागों में बाँटा जा सकता है- 1. अग्रमस्तिष्क (Fore brain) 2. मध्य-मस्तिष्क (Mid brain) 3. पश्चमस्तिष्क (Hind brain) 1. अग्रमस्तिष्क या प्रोसेनसिफैलॉन अग्र मस्तिष्क के तीन भाग होते हैं। (i) घ्राण भाग, (ii) सेरेब्रम तथा (iii) डाइएनसिफैलॉन । (i) मनुष्य में घ्राण भाग अवशेषी होता है तथा अग्रमस्तिष्क का मुख्य भाग सेरेब्रम होता है। (ii) प्रमस्तिष्क या सेरेब्रम (Cerebrum) - मस्तिष्क का लगभग 2/3 भाग प्रमस्तिष्क होता है। प्रमस्तिष्क दो पालियों में बँटा होता है जिन्हें प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध (cerebral hemispheres) कहते हैं। दोनों प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध तन्त्रिका तन्तुओं की एक पट्टी द्वारा जुड़े रहते हैं जिसे कॉर्पस कैलोसम (corpus callosum) कहते हैं। प्रमस्तिष्क में तन्त्रिका कोशिकाएँ इस प्रकार स्थित होती हैं कि इनके कोशिकाकाय बाहर की ओर स्थित होते हैं। इस भाग को प्रमस्तिष्क वल्कुट (cerebral cortex) कहते हैं। भीतर की ओर तन्त्रिका कोशिकाओं पर अक्षतन्तु (axon) स्थित होते हैं। यह भाग प्रमस्तिष्क मध्यांश (cerebral medulla) कहलाता है। बाहरी भाग धूसर (ग्रे) रंग का होता है। इसे धूसर द्रव्य (grey matter) कहते हैं। भीतरी भाग श्वेत (सफेद) रंग का होता है। इसे श्वेत द्रव्य (white matter) कहते हैं। प्रमस्तिष्क की पृष्ठ सतह में तन्त्रिका तन्तुओं की अत्यधिक संख्या होने के कारण यह सतह अत्यधिक मोटी व वलनों वाली (folded) हो जाती है। इस सतह को नियोपैलियम (neopallium) कहते हैं। नियोपैलियम में उभरे हुए भागों को उभार या गायराई (gyri) तथा बीच के दबे भाग को खाँच या सल्काई (sulci) कहते हैं। तीन गहरी दरारें प्रत्येक प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध को चार मुख्य पालियों में बाँट देती हैं। इन्हें- फ्रन्टल पालि (frontal lobe), पैराइटल पालि (parietal lobe), टैम्पोरल पालि (temporal lobe) तथा ऑक्सीपीटल पालि (Occipital lobe) कहते हैं। प्रमस्तिष्क की गुहाओं को पाश्र्व मस्तिष्क गुहा या पैरासील (paracoel or lateral ventricles) कहते हैं। (iii) अग्रमस्तिष्क पश्च या डाइएनसिफैलॉन (Diencephalon) - यह अग्रमस्तिष्क का पिछला भाग है। इसका पृष्ठ भाग पतला होता है तथा अधर भाग मोटा होता है जिसे हाइपोथैलेमस (hypothalamus) कहते हैं। हाइपोथैलेमस की अधर सतह पर इन्फन्डीबुलम (infundibulum) से जुड़ी पीयूष ग्रन्थि होती है। डाइएनसिफैलॉन की पृष्ठ सतह पर पीनियल काय (pineal body) तथा अग्र रक्त जालक (anterior choroid plexus) पाया जाता है। डाइएनसिफैलॉन की गुहा तृतीय निलय (third ventricle) या डायोसील (diocoel) होती है, यह पार्श्व गुहाओं से मोनरो के छिद्र (foramen of Monaro) द्वारा जुड़ी रहती है। 2. मध्यमस्तिष्क या मीसेनसिफैलॉन यह भाग स्तनियों में बहुत अधिक विकसित नहीं होता है। इसका पृष्ठ भाग चार दृक् पालियों के रूप में होता है, जिन्हें कॉर्पोरा क्वाड़िजेमिना (corpora quadrigemina) कहते हैं। मध्यमस्तिष्क के पाश्र्व व अधर भाग में तन्त्रिका ऊतक की पट्टियाँ होती हैं जिन्हें क्रूरा सेरेब्राई (crura cerebri) कहते हैं। ये पश्चमस्तिष्क को अग्रमस्तिष्क से जोड़ने का कार्य करती हैं। यहाँ दृक् तन्त्रिकाएँ एक-दूसरे को क्रॉस करके, ऑप्टिक कियाज्मा (optic chiasma) बनाती हैं। मध्यमस्तिष्क की संकरी गुहा को आइटर (iter) कहते हैं, जो तृतीय निलय को चतुर्थ निलय (fourth ventricle) से जोड़ती है। 3. पश्चमस्तिष्क या रॉम्बेनसिफैलॉन यह मस्तिष्क का पश्च भाग है। इसे मस्तिष्क वृन्त (brain stalk) भी कहते हैं। पश्च मस्तिष्क के दो भाग होते हैं- (i) अनुमस्तिष्क (cerebellum), (ii) मस्तिष्क पुच्छ या मेडुला ऑब्लांगेटा (medulla oblongata) (i) अनुमस्तिष्क (Cerebellum) - यह प्रमस्तिष्क के पिछले भाग से सटा रहता है। अनुमस्तिष्क दो पाश्र्व गोलाद्घ (lateral hemispheres) का बना होता है। अनुमस्तिष्क में बाहरी धूसर द्रव्य तथा आन्तरिक श्वेत द्रव्य होता है। श्वेत द्रव्य में स्थान-स्थान पर धूसर द्रव्य प्रवेश करके वृक्ष की शाखाओं जैसी रचना बनाता है। इसे प्राणवृक्ष या आरबर विटी (arbor vitae) कहते हैं। अनुमस्तिष्क में गुहा अनुपस्थित होती है। अनुमस्तिष्क के अधर भाग में श्वेत द्रव्य की एक पट्टी होती है जिसे पोंस वेरोली (pons varolli) कहते हैं। (ii) मस्तिष्क पुच्छ या मेडुला ऑब्लांगेटा (Medulla Oblongata) - यह मस्तिष्क का सबसे पिछला भाग है जो आगे मेरुरज्जु के रूप में कपाल गुहा से बाहर निकलता है। मेडुला की पृष्ठ भित्ति पर पश्च रक्त जालक (posterior choroid plexus) स्थित होता है। मेडुला की गुहा को चतुर्थ निलय या मेटासील (fourth ventricle or metacoel) कहते हैं। (ब) नेत्र की संरचना मनुष्य में एक जोड़ी नेत्र चेहरे पर सामने की ओर नेत्र कपाल के नेत्र कोटर (eye orbit) में स्थित होते हैं। प्रत्येक नेत्र एक तरल से भरे गोलक के रूप में होता है। नेत्र गोलक का 4/5 भाग नेत्र कोटर में और लगभग 1/5 भाग नेत्र कोटर के बाहर स्थित होता है। नेत्र गोलक की भित्ति तीन स्तरों से बनी होती है। सबसे बाहरी दृढ़पटल (sclera), मध्य रक्तकपटल (choroid) तथा भीतरी दृष्टिपटल (retina) है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मानव नेत्र की खड़ी काट को दर्शाता है। इसमें सिलियरी बॉडी, स्क्लेरा, लेन्स, आइरिस, कॉर्निया, रेटिना, फोविया, सेंट्रल रेटिनल आर्टरी और वेन, ऑप्टिक नर्व तथा ऑप्टिक डिस्क (ब्लाइंड स्पॉट) जैसे मुख्य भाग स्पष्ट रूप से दिखाए गए हैं। यह नेत्र की आंतरिक संरचना को समझने में मदद करता है। 1. दृढपटल या स्क्ले रोटिक (Sclera or Sclerotic) - यह तन्तुमय संयोजी ऊतक का बना सबसे बाहरी स्तर है। इसका वह भाग जो नेत्र कोटर से बाहर होता है, पारदर्शी होता है तथा इसे कॉर्निया (cornea) कहते हैं। 2. रक्तकपटल या कोरॉइड (Choroid) - यह नेत्र गोलक की भित्ति का मध्य स्तर है। रक्तकपटल संयोजी ऊतक का बना स्तर है जिसमें रुधिर केशिकाओं का घना जाल होता है। रक्तकपटल में रंगायुक्त कोशिकाएँ होती हैं, जिस कारण नेत्र का रंग काला, भूरा, सुनहरा या नीला दिखाई देता है। रक्तकपटल का वह भाग जो कॉर्निया के नीचे होता है, थोड़ा पीछे हटकर एक पेशीय पर्दे जैसी रचना (diaphragm like) बनाता है जिसे आइरिस या उपतारा (iris) कहते हैं। आइरिस अरीय (radial) तथा वर्तुल पेशियों (circular muscles) का बना होता है। आइरिस के मध्य में एक गोल छिद्र होता है जिसे तारा या पुतली (pupil) कहते हैं। अरीय पेशियाँ तारे के छिद्र को बड़ा करती हैं; अतः इन्हें प्रसारी पेशियाँ (dilatory muscles) कहते हैं। वर्तुल पेशियाँ तारे के छिद्र को छोटा या संकुचित करती हैं; अतः इन्हें स्फिक्टर (अवरोधिनी) पेशियाँ (sphincter muscles) कहते हैं। तारा नेत्र में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा को नियन्त्रित करता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र आइरिस और पुतली की संरचना को दर्शाता है। इसमें रेडियल मसल्स (अरीय पेशियाँ), सर्कुलर मसल्स (वर्तुल पेशियाँ), पुतली (प्यूपिल) और आइरिस को स्पष्ट रूप से चित्रित किया गया है। यह दिखाता है कि कैसे ये पेशियाँ पुतली के आकार को नियंत्रित करती हैं। आइरिस के आधार पर रक्तकपटल अत्यधिक मोटा व पेशीयुक्त होकर सीलियरी काय (ciliary body) बनाता है। 3. दृष्टिपटल या रेटिना (Retina) - यह नेत्र भित्ति का सबसे भीतरी प्रकाश संवेदी (light sensitive) स्तर है। रेटिना में रक्तकपटल की ओर एक पतला वर्णक स्तर (pigmented layer) तथा भीतर की ओर तन्त्रिका संवेदी स्तर होता है। तन्त्रिको संवेदी स्तर (neurosensory layer) प्रकाश के लिए संवेदनशील होता है। यह निम्नलिखित प्रकार की पर्यो से बना होता है- (i) दृष्टि शलाकाओं एवं शंकुओं का स्तर (Layer of Rods and Cones) - शलाकाओं में दृष्टि पर्पल (visual purple) वर्णक रोडोप्सिन (rhodopsin) तथा शंकुओं में दृष्टि वॉयलेट (visual violet) वर्णक आयोडोप्सिन (iodopsin) पाए जाते हैं। शलाकाएँ प्रकाश व अन्धकार में भेद करती हैं, जबकि शंकु रंगों का ज्ञान कराते हैं। (ii) द्विध्रुवीय न्यूरॉन का स्तर (Layer of Bipolar Neurons) - इसकी तन्त्रिका कोशिकाएँ दृष्टि शलाकाओं एवं शंकुओं के स्तर को गुच्छकीय कोशिकाओं के स्तर से जोड़ती हैं। (iii) गुच्छकीय कोशिकाओं का स्तर (Layer of Ganglionic Cells) - इसकी कोशिकाओं के एक्सॉन तन्तु मिलकर दृक् तन्त्रिका (optic nerve) बनाते हैं। दृक् तन्त्रिका जिस स्थान से रेटिना से निकलती है, उसे अन्ध बिन्दु (blind spot) कहते हैं, इस स्थान पर प्रतिबिम्ब का निर्माण नहीं होता है। नेत्र की मध्य अनुलम्ब अक्ष (optical axis) पर स्थित रेटिना के मध्य भाग को मध्य क्षेत्र (area centralis) कहते हैं। इस भाग को पीत बिन्दु (yellow spot) या मैकुला ल्यूटिया (macula lutea) भी कहते हैं। यहाँ उपस्थित एक छोटे से गड्ढे को फोविया सेन्ट्रैलिस (fovea centralis) कहते हैं। इस स्थान पर सबसे स्पष्ट प्रतिबिम्ब बनता है। लेन्स (Lens) - यह उभयोत्तल (biconvex), पारदर्शी, रंगहीन व लचीला होता है। यह आइरिस के ठीक पीछे स्थित होता है। लेन्स साधक स्नायु (suspensory ligament) द्वारा सीलियरी कार्य (ciliary body) से जुड़ा होता है। तेजो वेश्म या ऐक्वस वेश्म (aqueous chamber) - कॉर्निया तथा लेन्स के बीच का स्थान होता है। इसमें जलीय तरल तेजोजल या ऐक्वस ह्यूमर (aqueous humor) भरा रहता है। काचाभ वेश्म या विट्रियस वेश्म (vitreous chamber) - रेटिना व लेन्स के बीच को स्थान है। इसमें जैली सदृश काचाभ जल या विट्रियस ह्यूमर (vitreous humor) भरा रहता है। जलीय तेजोजल तथा जैली सदृश काचाभ जल सीलियरी कार्य द्वारा स्रावित होते हैं। ये नेत्र की गुहा में निश्चित दबाव बनाए रखते हैं जिससे दृष्टिपटल व अन्य नेत्रपटल यथास्थान बने रहें । पलक (Eye Lids) - नेत्र कोटर के ऊपरी व निचले भागों में त्वचा के पेशीयुक्त भंज (folds) पलकों का निर्माण करते हैं। दोनों पलकें सचल होती हैं तथा नेत्र गोलक के खुले भाग को ढक सकती हैं। पलकों की भीतरी उपचर्म (epidermis) पारदर्शी होकर कॉर्निया के साथ समेकित हो जाती है। इसे नेत्र श्लेष्मा या कन्जंक्टिवा (conjunctiva) - कहते हैं। पलकों पर बरौनियाँ (eye lashes) पाई जाती हैं। खरगोश तथा अन्य स्तनियों में एक तीसरी पलक होती है, जिसे निमेषक पटल (nictitating membrane) कहते हैं। यह पलक नेत्रों की सुरक्षा का कार्य करती है। मनुष्य में यह अवशेषी होती है। अश्रु ग्रन्थियाँ (Lachrymal Glands or Tear Glands) - प्रत्येक नेत्र के बाहरी ऊपरी कोने पर तीन अश्रु ग्रन्थियाँ स्थित होती हैं। इनका स्राव कॉर्निया व कन्जंक्टिवा को नम तथा स्वच्छ बनाए रखता है। नेत्र के भीतरी कोण पर एक अश्रु नलिका (lachrymal duct) होती है जो फालतू स्राव को नासा वेश्म में पहुँचा देती है। जन्म के चार माह पश्चात् मानव शिशु में अश्रु ग्रन्थियाँ सक्रिय होती हैं। मीबोमियन ग्रन्थियाँ (Meibomian glands) - ये पलकों में स्थित होती हैं तथा एक तैलीय पदार्थ का स्रावण करती हैं। यह तैलीय पदार्थ कॉर्निया पर फैलकर अश्रु ग्रन्थियों के स्रावण को पूरी कॉर्निया पर फैलाता है। (स) कर्ण की संरचना कर्ण श्रवण तथा स्थैतिक सन्तुलन (hearing and equilibrium) का अंग है। प्रत्येक कर्ण के तीन भाग होते हैं- (i) बाह्य कर्ण, (ii) मध्य कर्ण तथा (iii) अन्तःकर्ण । (i) बाह्य कर्ण मनुष्य में बाह्य कर्ण के दो भाग होते हैं - कर्ण पल्लवे (pinna) तथा बाह्य कर्ण कुहर (external auditory canal) कर्ण पल्लव केवल स्तनियों में ही पाए जाते हैं। ये लचीली उपास्थि से बनी पंखेनुमा रचना है। कर्ण पल्लव ध्वनि तरंगों को कर्ण कुहर में भेजता है। बाह्य कर्ण कुहर एक अस्थिल नलिका है, जो मध्य कर्ण से जुड़ी रहती है। बाह्य कर्ण कुहरे के अन्तिम सिरे पर एक पर्दे जैसी रचना कर्णपटह (tympanic membrane) होती है। (ii) मध्य कर्ण यह करोटि की टिप्पैनिक बुल्ला (tympanic bulla) नामक अस्थि की गुहा में स्थित होता है। मध्य कर्ण कण्ठ कर्ण नलिका या यूस्टेकियन नलिका (eustachian tube) द्वारा ग्रसनी (pharynx) से जुड़ा रहता है। मध्य कर्ण में तीन कर्ण अस्थिकाएँ (ear ossicles) होती हैं। इन्हें मैलियस, इन्कस तथा स्टैपीज (malleus, incus and stapes) कहते हैं। मैलियस कान के पर्दे से सटी रहती है तथा स्टैपीज अन्त:कर्ण की ओर अण्डाकार गवाक्ष या फेनेस्ट्रा ओवेलिस (fenestra ovalis) पर स्थित होती है। ये तीनों कर्ण अस्थिकाएँ ध्वनि तरंगों को बाह्य कर्ण से अन्तःकर्ण तक पहुँचाने का कार्य करती हैं। मध्य कर्ण दो छिद्रों द्वारा अन्तःकर्ण की गुहा से जुड़ा होता है, इन्हें अण्डाकार गवाक्ष या फेस्ट्रा ओवेलिस (fenestra ovalis) तथा वृत्ताकार गवाक्ष या फेनेस्ट्रा रोटन्डस (fenestra rotundus) कहते हैं। इन छिद्रों के ऊपर एक झिल्ली उपस्थित होती है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मनुष्य के कर्ण की संरचना को दर्शाता है, जिसमें बाह्य कर्ण, मध्य कर्ण और अंतःकर्ण के मुख्य भाग शामिल हैं। इसमें पिन्ना, क्रैनियल कैविटी, यूट्रिकुलस, सेक्यूलस, कोक्लिया, टिंपैनिक मेंब्रेन (ईयर ड्रम), मैलियस, इंकस, स्टैपीज, सेमीसर्कुलर कैनाल्स और यूस्टेकियन ट्यूब जैसी संरचनाएं स्पष्ट रूप से दिखाई गई हैं। यह ध्वनि के संवहन मार्ग को समझने में मदद करता है। (iii) अन्तःकर्ण अन्तःकर्ण करोटि की टैम्पोरल अस्थि के भीतर स्थित होता है। अन्तःकर्ण एक अर्द्धपारदर्शक झिल्ली से बनी जटिल रचना होती है, जिसे कलागहन (membranous labyrinth) कहते हैं। कलागहन अस्थि के बने कोष में स्थित रहता है जिसे अस्थीय लेबिरिन्थ (bony labyrinth) कहते हैं। अस्थीय लेबिरिन्थ में परिलसीका (perilymph) भरा रहता है, जिसमें कलागहन तैरता रहता है। कलागहन के भीतर अन्तःलसीका (endolymph) भरा रहता है। कलागहन के दो मुख्य भाग यूट्रिकुलस (utriculus) तथा सैक्यूलस (sacculus) होते हैं। दोनों भाग एक सँकरी सैक्यूलो-यूट्रिकुलर नलिका (sacculo-utricular duct) द्वारा जुड़े रहते हैं। यूट्रिकुलस से तीन अर्द्धवृत्ताकार नलिकाएँ (semicircular canals) निकलकर यूट्रिकुलस में ही खुल जाती हैं। अग्र तथा पश्च अर्द्धवृत्ताकार नलिकाएँ एकसाथ सहनलिका (crus commune) के रूप में निकलती हैं। अर्द्धवृत्ताकार नलिकाओं का अन्तिम भाग तुम्बिका (ampulla) के रूप में फूला होता है। सैक्यूलस से स्प्रिंग की तरह कुण्डलित कॉक्लियर नलिका (cochlear duct) निकलती है। इसमें 2 कुण्डलन होते हैं।In simple words: मस्तिष्क, नेत्र और कर्ण मानव शरीर के महत्वपूर्ण संवेदी अंग हैं। मस्तिष्क शरीर के सभी कार्यों को नियंत्रित करता है, नेत्र हमें देखने में मदद करते हैं, और कर्ण सुनने व संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं। इन सभी अंगों की संरचना जटिल होती है, जो विशिष्ट कार्यों को करने के लिए अनुकूलित होती है।

🎯 Exam Tip: इन अंगों की विस्तृत संरचना और उनके कार्यों को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये अक्सर डायग्राम आधारित प्रश्नों और विस्तृत वर्णनात्मक उत्तरों में पूछे जाते हैं। प्रत्येक भाग का कार्य और स्थान सटीकता से जानना स्कोरिंग में मदद करेगा।

 

Question 2. निम्नलिखित की तुलना कीजिए- (अ) केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र और परिधीय तन्त्रिका तन्त्र (ब) स्थिर विभव और सक्रिय विभव (स) कोरॉइड और रेटिना।
Answer:(अ) केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र तथा परिधीय तन्त्रिका तन्त्र में अन्तर

क्र० सं०केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र (Central Nervous System)परिधीय तन्त्रिका तन्त्र (Peripheral Nervous System)
1.इसके अन्तर्गत मस्तिष्क (brain or encephalon) तथा मेरुरज्जु (spinal cord) आती हैं।इसके अन्तर्गत कपाल तन्त्रिकाएँ (cranial nerves) तथा रीढ़ तन्त्रिकाएँ (spinal nerves) आती हैं। यह शरीर के विभिन्न अंगों को केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र से जोड़ता है।
2.सम्पूर्ण केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र मेनिन्जीज (meninges) से घिरा होता है।परिधीय तन्त्रिका तन्त्र का निर्माण करने वाली तन्त्रिकाएँ तन्त्रिकाच्छद (neurilemma) से घिरी रहती है।
3.संवेदी तथा चालक तन्त्रिका कोशिकाओं के अतिरिक्त उसमें संयोजक तन्त्रिका कोशिकाएँ होती हैं जो संवेदी तथा चालक तन्त्रिकाओं के मध्य आवेगों का संचारण करती हैं। यह विविध क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का नियन्त्रण तथा नियमन करता है।इसकी संवेदी तन्त्रिकाएँ संवेदांगों से उद्दीपनों को आवेगों के रूप में केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र में लाते हैं और चालक तन्त्रिकाओं के द्वारा चालक प्रेरणाओं को अपवाहक या क्रियान्वक ऊतकों (पेशियाँ या ग्रन्थियाँ) में पहुँचाते हैं।
(ब) स्थिर विभव और सक्रिय विभव में अन्तर
क्र० सं०स्थिर विभव (Resting Potential)सक्रिय विभव (Action Potential)
1.इसमें ऐक्सोलेमा या न्यूरीलेमा (neurilemma) की बाह्य सतह पर धनात्मक और भीतरी सतह पर ऋणात्मक ओवेश (-70 mV) होता है।इसमें न्यूरीलेमा की बाह्य सतह पर ऋणात्मक तथा भीतरी सतह पर धनात्मक विद्युत आवेश स्थापित हो जाता है। यह स्थिति भीतरी सतह पर +35 mV विद्युत आवेश स्थापित होने तक रहती है।
2.ऐक्सोलेमा या न्यूरीलेमा Na\(^+\) के लिए बहुत कम तथा K\(^+\) के लिए बहुत अधिक पारगम्य होती है।सक्रिय विभव स्थिति में ऐक्सोलेमा (neurilemma) Na\(^+\) के लिए अत्यधिक पारगम्य और K\(^+\) के लिए लगभग अपारगम्य होती है।
3.स्थिर विभव स्थिति में सोडियम-पोटैशियम पम्प की सक्रियता के कारण स्थिर कला विभव बना रहता (maintained) है।सक्रिय विभव की स्थिति में सोडियम-पोटैशियम पम्प अपना कार्य नहीं करता, इसके फलस्वरूप Na\(^+\) अधिक मात्रा में ऐक्सोप्लाज्म में पहुँचकर सक्रिय विभव को स्थापित करते हैं।
4.स्थिर विभव के समय तन्त्रिकाएँ उद्दीपन या प्रेरणाओं का प्रसारण नहीं करती।सक्रिय विभव के समय तन्त्रिकाएँ उद्दीपनों या प्रेरणाओं का प्रसारण करती है।
(स) कोरॉइड और रेटिना में अन्तर
क्र० सं०कोरॉइड (Choroid)रेटिना (Retina)
1.यह नेत्र गोलक की मध्य पर्त है।यह नेत्र गोलक की भीतरी पर्त है।
2.इसका निर्माण कोमल संयोजी ऊतक से होता है। इसमें रक्त कोशिकाओं का घना जाल, रंगायुक्त (वर्णक) शाखान्वित कोशिकाएँ होती हैं। यह दृढ़ पटल और रेटिना के सम्पर्क में रहती है।यह पतला, कोमल स्तर होता है। इसका निर्माण तन्त्रिका संवेदी स्तर तथा रंगा स्तर से होता है। यह दृढ़ रंगा स्तर कोरॉइड स्तर के सम्पर्क में रहता है। तन्त्रिका संवेदी स्तर तीन पर्तों से बना होता है।
3.कोरॉइड स्तर दृढ़पटल से पृथक् होकर मुद्राकार उपतारा (iris) बनाता है। उपतारा की वर्तुल तथा अरीय पेशियों के कारण इसके गोल छिद्र पुतली (pupil) का व्यास घटता-बढ़ता रहता है। उपतारा कैमरे के डायफ्राम की तरह कार्य करता है।रेटिना में दो प्रकार की प्रकाशग्राही कोशिकाएँ पार्ल जाती हैं। दृष्टि शलाकाएँ (rods) प्रकाश और दृष्टि शंकु (cones) रंगों का ज्ञान कराते हैं।
In simple words: केन्द्रीय और परिधीय तंत्रिका तंत्र शरीर के नियंत्रण और समन्वय के दो मुख्य भाग हैं; स्थिर और सक्रिय विभव तंत्रिका आवेगों की स्थिति को दर्शाते हैं; और कोरॉइड व रेटिना आँख के महत्वपूर्ण हिस्से हैं जो दृष्टि के लिए आवश्यक हैं।

🎯 Exam Tip: तुलना वाले प्रश्नों में प्रत्येक बिंदु को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना और उनकी भिन्नताओं को ठीक से सूचीबद्ध करना महत्वपूर्ण है। तालिकाओं का उपयोग करने से उत्तर व्यवस्थित और पढ़ने में आसान हो जाता है, जिससे बेहतर अंक प्राप्त होते हैं।

 

Question 3. निम्नलिखित प्रक्रियाओं का वर्णन कीजिए- (अ) तन्त्रिका तन्तु की झिल्ली का ध्रुवीकरण (ब) तन्त्रिका तन्तु की झिल्ली का विध्रुवीकरण (स) तन्त्रिका तन्तु के समान्तर आवेगों का संचरण (द) रासायनिक सिनेप्स द्वारा तन्त्रिका आवेगों का संवहन ।
Answer:(अ) तन्त्रिका तन्तु की झिल्ली का ध्रुवीकरण
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र विश्रामकला विभव (resting membrane potential) की स्थापना और अनुरक्षण को दर्शाता है। इसमें कोशिका के अंदर और बाहर Na\(^+\) और K\(^+\) आयनों का वितरण, सोडियम-पोटैशियम पम्प की क्रियाशीलता, और प्लाज्मा मेम्ब्रेन पर विद्युत आवेश का संचलन दिखाया गया है। वोल्टमीटर -70 mV का ऋणात्मक आवेश दर्शाता है, जो ध्रुवीकृत अवस्था को प्रदर्शित करता है। तन्त्रिका तन्तु के ऐक्सोप्लाज्म में Na\(^+\) की संख्या बहुत कम, परन्तु ऊतक तरल में लगभग 12 गुना अधिक होती है। ऐक्सोप्लाज्म में K\(^+\) की संख्या ऊतक तरल की अपेक्षा लगभग 30-35 गुना अधिक होती है। विसरण अनुपात के अनुसार Na\(^+\) की ऊतक तरल से ऐक्सोप्लाज्म में और K\(^+\) के ऐक्सोप्लाज्म से ऊतक तरल में विसरित होने की प्रवृत्ति होती है। लेकिन तन्त्रिकाच्छद या न्यूरीलेमा (neurilemma) Na\(^+\) के लिए कम और K\(^+\) के लिए अधिक पारगम्य होती है। विश्राम अवस्था में ऐक्सोप्लाज्म में ऋणात्मक आयनों और ऊतक तरल में धनात्मक आयनों की अधिकता रहती है। तन्त्रिकाच्छद या न्यूरीलेमा की बाह्य सतह पर धनात्मक आयनों और भीतरी सतह पर ऋणात्मक आयनों का जमाव रहता है। तन्त्रिकाच्छद की बाह्य सतह पर धनात्मक और भीतरी सतह पर 70 mV का ऋणात्मक आकेश रहता है। इस स्थिति में तन्त्रिकाच्छद या न्यूरीलेमा विद्युतावेशी या धुवण अवस्था (polarised state) में बनी रहती है। तन्त्रिकाच्छद (neurilemma) के इधर-उधर विद्युतावेशी अन्तर (electric charge difference) के कारण न्यूरीलेमा में बहुत-सी विभव ऊर्जा संचित रहती है। इसी ऊर्जा को विश्राम कला विभव कहते हैं। प्रेरणा संचरण में इसी ऊर्जा का उपयोग होता है। (ब) तन्त्रिका तन्तु की झिल्ली का विध्रुवीकरण जब एक तन्त्रिका तन्तु को श्रेशहोल्ड उद्दीपन (threshold stimulus) दिया जाता है तो न्यूरीलेमा (neurilemma) की पारगम्यता बदल जाती है। यह Na\(^+\) के लिए अधिक पारगम्य हो जाती है और K\(^+\) के लिए अपारगम्य हो जाती है। इसके फलस्वरूप तन्त्रिका तन्तु विश्राम कला विभव की ऊर्जा का प्रेरणा संचरण के लिए उपयोग करने में सक्षम होते हैं। तन्त्रिका तन्तु को उद्दीपित करने पर इसके विश्राम कला विभव की ऊर्जा एक विद्युत प्रेरणा के रूप में, तन्तु के क्रियात्मक कला विभव में बदल जाती है। यह विद्युत प्रेरणा तन्त्रिकीय प्रेरणा होती है। Na\(^+\) ऐक्सोप्लाज्म में तेजी से प्रवेश करने लगते हैं, इसके फलस्वरूप तन्त्रिका तन्तु का विध्रुवीकरण होने लगता है। विध्रुवीकरण के फलस्वरूप न्यूरीलेमा की भीतरी सतह पर धनात्मक और बाह्य सतह पर ऋणात्मक विद्युत आवेश स्थापित हो जाता है। यह स्थिति विश्राम अवस्था के विपरीत होती है। (स) तन्त्रिका तन्तु के समान्तर आवेगों का संचरण जब तन्त्रिकाच्छद (न्यूरीलेमा) के किसी स्थान पर तन्त्रिका आवेग की उत्पत्ति होती है तो उत्पत्ति स्थल A पर तन्त्रिकाच्छद Na\(^+\) के लिए अधिक पारगम्य हो जाती है, जिसके फलस्वरूप Na\(^+\) तीव्र गति से अन्दर आने लगते हैं तथा न्यूरीलेमा की भीतरी सतह पर धनात्मक और बाह्य सतह पर ऋणात्मक आवेश स्थापित हो जाता है। आवेग स्थल पर विध्रुवीकरण हो जाने को क्रियात्मक विभव कहते हैं। क्रियात्मक विभव तन्त्रिकीय प्रेरणा के रूप में स्थापित हो जाता है। तन्त्रिकाच्छद से कुछ आगे 'B' स्थल पर झिल्ली की बाहरी सतह पर धनात्मक और भीतरी सतह पर ऋणात्मक आवेश होता है। परिणामस्वरूप, तन्त्रिका आवेग A स्थल से 'B' स्थल की ओर आवेग का संचरण होता है। यह प्रक्रम सम्पूर्ण एक्सॉन में दोहराया जाता है। इसके प्रत्येक बिन्दु पर उद्दीपन को सम्पोषित किया जाता रहता है। उद्दीपन किसी भी स्थान पर अत्यन्त कम समय तक (0.001 से 0.005 सेकण्ड) तक ही रहता है। जैसे ही भीतरी सतह पर धनात्मक विद्युत आवेश +35mV होता है, तन्त्रिकाच्छद की पारगम्यता प्रभावित होती है। यह पुनः Na' के लिए अपारगम्य और K' के लिए अत्यधिक पारगम्य हो जाती है। K\(^+\) तेजी से ऐक्सोप्लाज्म में ऊतक तरल में जाने लगते हैं। सोडियम-पोटैशियम पम्प पुनः सक्रिय हो जाता है जिससे तन्त्रिको तन्तु विश्राम विभवे में आ जाता है। अब यह अन्य उद्दीपन के संचरण हेतु फिर तैयार हो जाता है। (द) रासायनिक सिनैप्स द्वारा तन्त्रिका आवेगों को संवहन अक्षतन्तु (axon) के अन्तिम छोर पर स्थित अन्त्य बटन (terminal button) तथा अन्य तन्त्रिका कोशिका के डेन्ड्राइट के मध्य एक युग्मानुबन्ध (synapse) होता है। अतः इस स्थान पर आवेग का संचरण विशेष रासायनिक पदार्थ ऐसीटिलकोलीन (acetylcholine) नामक न्यूरोहॉर्मोन (neurohormone) के द्वारा होता है। आवेग के प्राप्त होने पर अन्त्य बटन में उपस्थित स्रावी पुटिकाएँ (secretory vesicles) ऐसीटिलकोलीन स्रावित करती हैं। यही पदार्थ दूसरी तन्त्रिका कोशिका के डेण्ड्राईट (dendrites) में कार्यात्मक विभव (action potential) को स्थापित कर देता है। अब यही विभव, आवेग के रूप में अगले तन्त्रिका तन्तु की सम्पूर्ण लम्बाई में आगे बढ़ता जाता है। इस प्रकार, ऐसीटिलकोलीन एक रासायनिक दूत (chemical transmitter) की तरह कार्य करता है। बाद में, ऐसीटिलकोलीन कोएन्जाइम-ऐसीटिलकोलीनेस्टेरेज (acetylcholinesterase) द्वारा विघटित कर दिया जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र रासायनिक सिनैप्स पर आवेग के संवहन को दर्शाता है। इसमें एक्सॉन टर्मिनल, माइटोकॉन्ड्रिया, सिनैप्टिक वेसिकल्स, प्रीसिनैप्टिक मेम्ब्रेन, पोस्टसिनैप्टिक मेम्ब्रेन और सिनैप्टिक क्लेफ्ट दिखाई गई हैं। Ca\(^{2+}\) आयनों की उपस्थिति में न्यूरोट्रांसमीटर (जैसे एसिटाइलकोलाइन) एक्सोसिटोसिस द्वारा सिनैप्टिक क्लेफ्ट में मुक्त होते हैं और पोस्टसिनैप्टिक मेम्ब्रेन पर मौजूद रिसेप्टर्स द्वारा ग्रहण किए जाते हैं, जिससे आवेग आगे बढ़ता है।In simple words: तंत्रिका तंतु की झिल्ली का ध्रुवीकरण उसकी विश्राम अवस्था है, जहाँ बाहर धनात्मक और अंदर ऋणात्मक आवेश होता है। विध्रुवीकरण तब होता है जब एक उत्तेजना Na\(^+\) आयनों को अंदर जाने देती है, जिससे आवेश उलट जाता है और तंत्रिका आवेग उत्पन्न होता है। यह आवेग पूरे तंत्रिका तंतु में फैलता है और रासायनिक सिनैप्स पर न्यूरोट्रांसमीटर द्वारा अगली तंत्रिका कोशिका तक पहुँचता है।

🎯 Exam Tip: तंत्रिका आवेग संचरण की प्रत्येक अवस्था-ध्रुवीकरण, विध्रुवीकरण, और पुन:ध्रुवीकरण-को ठीक से समझना महत्वपूर्ण है। आयनों की भूमिका और सोडियम-पोटैशियम पम्प का कार्य अक्सर परीक्षाओं में पूछा जाता है। रासायनिक सिनैप्स पर न्यूरोट्रांसमीटर की क्रियाविधि पर भी विशेष ध्यान दें।

 

Question 4. निम्नलिखित का नामांकित चित्र बनाइए- (अ) न्यूरॉन (ब) मस्तिष्क (स) नेत्र (द) कर्ण।
Answer:(अ) न्यूरॉने की संरचना (Structure of Neuron) - अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए। प्रश्नोत्तर में लघु उत्तरीय प्रश्न 1 का उत्तर देखें । (ब) मस्तिष्क की संरचना (Structure of Brain) - अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 1 का उत्तर देखें । (स) नेत्र की संरचना (Structure of Eye) - अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 1 का उत्तर देखें। (द) कर्ण की संरचना (Structure of Ear) - अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 1 का उत्तर देखें ।In simple words: इस प्रश्न में न्यूरॉन, मस्तिष्क, नेत्र और कर्ण के नामांकित चित्र बनाने को कहा गया है, जिनकी विस्तृत संरचनाएं और चित्र इस पाठ के प्रश्न 1 में विस्तार से वर्णित हैं। छात्रों को इन चित्रों को ध्यान से देखकर उनकी प्रमुख संरचनाओं को नामांकित करना चाहिए।

🎯 Exam Tip: इन चारों संरचनाओं के नामांकित चित्रों का अभ्यास करना महत्वपूर्ण है। परीक्षा में अक्सर साफ और सही ढंग से नामांकित चित्र बनाने के लिए अंक दिए जाते हैं। प्रत्येक अंग के मुख्य भागों को पहचानना और उनके नाम याद रखना आवश्यक है।

 

Question 5. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए (अ) तन्त्रीय समन्वयन (ब) अग्रमस्तिष्क (स) मध्यमस्तिष्क (द) पश्चमस्तिष्क (ध) रेटिना (य) कर्ण अस्थिकाएँ (र) कॉक्लिया (ल) ऑर्गन ऑफ कॉरटाई (व) सिनेप्स ।
Answer:(अ) तन्त्रीय समन्वयन (Nervous Coordination) - शरीर की विभिन्न क्रियाओं का नियन्त्रण तथा नियमन सूचना प्रसारण तन्त्र (communication system) द्वारा होता है। इसके अन्तर्गत तत्रिका तन्त्र (nervous system) तथा अन्तःस्रावी तन्त्र (Endocrine System) आते हैं। तन्त्रिका निर्माण तन्त्रिका कोशिकाओं (nerve cells) से होता है। ये कोशिकाएँ उत्तेजनशीलता एवं संवाहकता के लिए विशिष्टीकृत होती हैं। ये आवेगों को संवेदांगों से ग्रहण करके केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र तक और केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र द्वारा होने वाली प्रतिक्रियाओं को अपवाहक (effectors) अंगों तक पहुँचाने का कार्य करती हैं। अपवाहक अंगों के अन्तर्गत मुख्यतया पेशियाँ तथा ग्रन्थियाँ आती हैं। केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र उद्दीपनों की व्याख्या, विश्लेषण करके प्रतिक्रियाओं का निर्धारण करता है। (ब) अग्रमस्तिष्क (Fore brain) - अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 1 (अ) मस्तिष्क की संरचना के अन्तर्गत 'अग्रमस्तिष्क' (fore brain) देखिए । (स) मध्यमस्तिष्क (Mid brain) - अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 1 (अ) मस्तिष्क की संरचना के अन्तर्गत 'मध्य मस्तिष्क' (mid brain) देखिए । (द) पश्चमस्तिष्क (Hind brain) - अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 1 (अ) मस्तिष्क की संरचना के अन्तर्गत 'पश्च मस्तिष्क' (hind brain) देखिए। (ध) रेटिना (Retina) - अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में नेत्र की संरचना के अन्तर्गत 'रेटिना' देखिए । (य) कर्ण अस्थिकाएँ (Ear Ossicles) - मध्यकर्ण में तीन कर्ण अस्थिकाएँ चल सन्धियों द्वारा परस्पर जुड़ी रहती हैं। इन्हें क्रमशः मैलियस (malleus), इन्कस (incus) और स्टैपीज (stapes) कहते हैं। - मैलियस (Malleus) - यह हथौड़ीनुमा होती है। इसका बाह्य सँकरा भाग कर्णपटह से तथा भीतरी चौड़ा सिरा इन्कस से जुड़ा होता है। - इन्कस (Incus) - यह निहाई (anvil) के आकार की होती है। इसका बाहरी चौड़ा सिरा मैलियस से तथा भीतरी सँकरा भाग स्टैपीज से जुड़ा होता है। - स्टैपीज (Stapes) - यह रकाब (stirrup) के आकार की होती है। इसका सँकरा सिरा इन्कस से और चौड़ा सिरा फेनेस्ट्रा ओवैलिस (fenestra ovalis) से लगा होता है। कर्ण अस्थिकाएँ कर्णपटह पर होने वाले ध्वनि कम्पनों को अधिक प्रबल करके फेनेस्ट्रा ओवैलिस द्वारा अन्तःकर्ण में पहुँचाती हैं। (र) कॉक्लिया (Cochlea) - मनुष्य का अन्तःकर्ण यो कलागहन (membranous labyrinth) दो मुख्य भागों से बना होता है। यूट्रिकुलस (utriculus) तथा सैक्यूलस (sacculus)। सैक्यूलस से स्प्रिंग की तरह कुण्डलित कॉक्लिया निकलता है। यह नलिकारूपी होता है। इसमें 2 कुण्डलन होते हैं। इसके चारों ओर अस्थिल कॉक्लिया का आवरण होता है। कॉक्लिया की नलिका अस्थिल लेबिरिन्थ की भित्ति से जुड़ी रहती है जिससे अस्थिल लेबिरिन्थ की गुहा दो वेश्मों में बँट जाती है। पृष्ठ वेश्म को स्कैला वेस्टीबुली (scala vestibuli) कहते हैं तथा अधर वेश्म को स्कैला टिम्पैनी (scala tympani) कहते हैं। इन दोनों वेश्म के मध्य कॉक्लिया का वेश्म स्कैला मीडिया (scala media) होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र कॉक्लिया की अनुप्रस्थ काट को दर्शाता है, जो अंतःकर्ण का एक कुंडलित भाग है। इसमें रीस्नर्स मेंब्रेन, टेक्टोरियल मेंब्रेन, स्ट्राइअ वैस्कुलरिस, स्कैला मीडिया, ऑर्गन ऑफ कॉर्टि, स्कैला वेस्टिबुली, स्पाइरल लिगामेंट, स्पाइरल गैंग्लियन और बेसिलर मेंब्रेन जैसे विभिन्न संरचनात्मक घटकों को स्पष्ट रूप से दिखाया गया है। यह ध्वनि संचरण में कॉक्लिया की भूमिका को समझने में सहायक है। (ल) ऑर्गन ऑफ कॉरटाई (Organ of Corti) - कॉक्लिया नलिका की गुहा स्कैला मीडिया की पतली पृष्ठ भित्ति रीसनर्स कला (Reissner's membrane) कहलाती है। अधर भित्ति मोटी होती है। इसे बेसीलर कला (basilar membrane) कहते हैं। बेसीलर कला के मध्य में कॉरटाई का अंग (organ of Corti) होता है। इसमें अवलम्ब कोशिकाओं के बीच-बीच में संवेदी कोशिकाएँ होती हैं। प्रत्येक संवेदी कोशिका के स्वतन्त्र तल पर स्टीरियोसीलिया (stereocilia) होते हैं। कॉरटाई के अंग के ऊपर टेक्टोरियल कला (tectorial membrane) स्थित होती है। संवेदी कोशिकाओं से निकले तन्त्रिका तन्तु मिलकर श्रवण तन्त्रिका (auditory nerve) का निर्माण करते हैं। कॉरटाई के अंग ध्वनि के उद्दीपनों को ग्रहण करते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र कॉरटाई के अंग की विस्तृत रचना को दर्शाता है, जो ध्वनि संवेदना के लिए महत्वपूर्ण है। इसमें लिम्बस स्पाइरालिस, रॉड्स मेम्ब्रेन, इनर हेयर सेल्स, हेंसन्स सेल्स, सेल्स ऑफ क्लॉडियस, आउटर हेयर सेल्स, नर्व फाइबर, इनर और आउटर पिलर सेल्स, डायटर्स सेल्स, टनल और बेसिलर मेम्ब्रेन जैसे विभिन्न घटक दिखाए गए हैं। यह संरचना ध्वनि को तंत्रिका आवेगों में बदलने में सहायक है। (व) सिनैप्स (Synapse) - प्रत्येक तन्त्रिको कोशिका का अक्षतन्तु (axon) अपने स्वतन्त्र छोर पर टीलोडेन्ड्रिया (telodendria) या एक्सॉन अन्तस्थ (axon terminals) नामक शाखाओं में बँट जाता है। प्रत्येक शाखा का अन्तिम छोर घुण्डीनुमा होता है। इसे सिनैप्टिक बटन (synaptic button) कहते हैं। ये घुण्डियाँ समीपवर्ती तन्त्रिका कोशिका के डेण्ड्राइट्स के साथ सन्धि बनाती हैं। इन संधियों को सिनेप्स या युग्मानुबन्ध कहते हैं। युग्मानुबन्ध पर सूचना लाने वाली तन्त्रिका कोशिका को पूर्व सिनैप्टिक (presynaptic) तथा सूचना ले जाने वाली तन्त्रिका कोशिका को पश्च सिनेप्टिक (post synaptic) कहते हैं। इनके मध्य भौतिक सम्पर्क नहीं होता। दोनों के मध्य लगभग 20-40 mµ का दरारनुमा सिनैप्टिक विदर होता है। इसमें ऊतक तरल भरा होता है। सिनैप्टिक विदर से उद्दीपन या प्रेरणाओं का संवहन तत्रिका संचारी पदार्थों; जैसे-ऐसीटिलकोलीन (acetylcholine) के द्वारा होता है।In simple words: तंत्रिका समन्वय शरीर के कार्यों को नियंत्रित करता है; अग्रमस्तिष्क, मध्यमस्तिष्क और पश्चमस्तिष्क मस्तिष्क के मुख्य भाग हैं; रेटिना आंख का प्रकाश-संवेदी हिस्सा है; कर्ण अस्थिकाएं सुनने में मदद करती हैं; कॉक्लिया और ऑर्गन ऑफ कॉर्टि ध्वनि तरंगों को तंत्रिका आवेगों में बदलते हैं; और सिनैप्स तंत्रिका कोशिकाओं के बीच सूचना का संचार बिंदु है।

🎯 Exam Tip: संक्षिप्त टिप्पणियों में प्रत्येक विषय की मुख्य विशेषताओं और कार्यों को संक्षेप में स्पष्ट करें। मस्तिष्क के विभिन्न भागों और संवेदी अंगों की कार्यात्मक भूमिका पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि ये अक्सर सीधे प्रश्न के रूप में आते हैं।

 

Question 6. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए- (अ) सिनैप्टिक संचरण की क्रियाविधि (ब) देखने की प्रक्रिया (स) श्रवण की प्रक्रिया।
Answer:(अ) सिनैप्टिक संचरण की क्रियाविधि शेरिंगटन (Sherrington) ने दो तन्त्रिका कोशिकाओं के सन्धि स्थलों को युग्मानुबन्ध (synapsis) कहा। इसका निर्माण पूर्व सिनेप्टिक तथा पश्च सिनैप्टिक तृन्त्रिका तन्तुओं से होता है। युग्मानुबन्ध में पूर्व सिनेप्टिक तन्त्रिका के एक्सॉन या अक्षतन्तु के अन्तिम छोर पर स्थित सिनेप्टिक बटन (synaptic button) तथा पश्च सिनैप्टिक तन्त्रिका कोशिका के डेन्ड्राइट्स के मध्य सन्धि होती है। दोनों के मध्य सिनैप्टिक विदर (synaptic cleft) होता है, इससे उद्दीपन विद्युत तरंग के रूप में प्रसारित नहीं हो पाता । सिनैप्टिक बटन या घुण्डियों में सिनैप्टिक पुटिकाएँ (synaptic vesicles) होती हैं। ये तन्त्रिका संचारी पदार्थ (neurotransmitters) से भरी होती हैं। उद्दीपन या प्रेरणा के क्रियात्मक विभव के कारण Ca\(^{2+}\) ऊतक द्रव्य से सिनैप्टिक घुण्डियों में प्रवेश करते हैं तो सिनैप्टिक घुण्डियों से तन्त्रिका संचारी पदार्थ मुक्त होता है। यह तन्त्रिका संचारी पदार्थ पश्च सिनैप्टिक, तन्त्रिका के डेन्ड्राइट पर क्रियात्मक विभव को स्थापित कर देता है, इसमें लगभग 0.5 मिली सेकण्ड का समय लगता है। प्रेरणा प्रसारण या क्रियात्मक विभव के स्थापित हो जाने के पश्चात् एन्जाइम्स द्वारा तन्त्रिका संचारी पदार्थ का विघटन कर दिया जाता है, जिससे अन्य प्रेरणा को प्रसारित किया जा सके । सामान्यतया सिनैप्टिक पुटिकाओं से ऐसीटिलकोलीन (acetylcholine) नामक तन्त्रिका संचारी पदार्थ मुक्त होता है। इसका विघटन ऐसीटिलकोलीनेस्टीरेज (acetylcholinesterase) एन्जाइम द्वारा होता है। एपिनेफ्रीन (epinephrine), डोपामीन (dopamine), हिस्टैमीन (histamine), सोमैटोस्टैटिन (somatostatine) आदि पदार्थ अन्य तन्त्रिका संचारी पदार्थ हैं। ग्लाइसीन (glycine) गामा-ऐमीनोब्यूटाइरिक (gamma aminobutyric acid-GABA) आदि तन्त्रिका संचारी पदार्थ प्रेरणाओं के प्रसारण को रोक देते हैं। (ब) देखने की प्रक्रिया नेत्र कैमरे की भाँति कार्य करते हैं। ये प्रकाश की 380 से 760 नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य (wave-length) की किरणों की ऊर्जा को ग्रहण करके इसे तन्त्रिका तन्तु के क्रिया विभव (action potential) में बदल देते हैं। नेत्र की क्रिया-विधि जब उचित आवृत्ति की प्रकाश तरंगें कॉर्निया पर पड़ती हैं, तब कॉर्निया तथा तेजोजल प्रकाश किरणों का अपवर्तन (refraction) कर देते हैं। ये किरणें तारे से होकर लेन्स पर पड़ती हैं। लेन्स इनका पूर्ण अपवर्तन कर देता है और उल्टा प्रतिबिम्ब रेटिना पर बना देता है। आइरिस तारे को छोटा या बड़ा करके प्रकाश की मात्रा का नियन्त्रण करता है। तीव्र प्रकाश में तारा सिकुड़ जाता है तथा कम प्रकाश नेत्र के भीतर प्रवेश करता है। कम प्रकाश में तारा फैल जाता है तथा अधिक प्रकाश नेत्र के भीतर प्रवेश करता है। नेत्र द्वारा समायोजन सीलियरी काय तथा निलम्बन स्नाय (suspensory ligaments) लेन्स के फोकस में अन्तर लाकर वस्तु के प्रतिबिम्ब को रेटिना पर केन्द्रित करते हैं। सामान्य अवस्था में नेत्र दूर की वस्तु देखने के लिए समायोजित रहता है। इस समय सीलियरी काय शिथिल (relaxed) रहता है तथा निलम्बन स्नायु तना रहता है। इससे लेन्स की फोकस दूरी अधिक हो जाती है और दूर की वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिम्ब बनता हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र नेत्र द्वारा प्रतिबिम्ब के निर्माण की प्रक्रिया को दर्शाता है। A भाग में, दूर की वस्तु देखते समय सस्पेंसरी लिगामेंट तनावग्रस्त होता है और लेन्स पतला हो जाता है, जिससे प्रकाश रेटिना पर फोकस होता है। B भाग में, पास की वस्तु देखते समय सिलियरी मांसपेशियां सिकुड़ती हैं, सस्पेंसरी लिगामेंट शिथिल हो जाता है, और लेन्स मोटा होकर प्रकाश को रेटिना पर केंद्रित करता है। पास की वस्तु देखने के लिए सीलियरी काय में संकुचन तथा निलम्बन स्नायु में शिथिलन होता हैं। इससे लेन्स छोटा व मोटा हो जाता है तथा इसकी फोकस दूरी कम हो जाती है। इससे पास की वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिम्ब बनता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र नेत्र के समायोजन की प्रक्रिया को दर्शाता है। जब दूर की वस्तु को देखा जाता है, तो सिलियरी मांसपेशियां शिथिल होती हैं, सस्पेंसरी लिगामेंट तनावग्रस्त होता है, और लेन्स पतला हो जाता है। पास की वस्तु को देखने के लिए सिलियरी मांसपेशियां सिकुड़ती हैं, जिससे लेन्स मोटा हो जाता है और फोकस दूरी कम हो जाती है। प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन जब विशिष्ट तरंगदैर्ध्य वाली प्रकाश की किरणें रेटिना पर पड़ती हैं, तब ये शलाकाओं तथा शंकुओं में उपस्थित रसायनों में परिवर्तन करती हैं। जब प्रकाश की किरणें शलाकाओं के रोडोप्सिन पर पड़ती हैं, तब यह रेटिनीन (retinene) तथा ऑप्सिन (opsin) में टूट जाता है। अन्धकार में शलाकाओं में एन्जाइम्स की सहायता से रेटिनीन तथा ऑप्सिन रोडोप्सिन को, संश्लेषण करते हैं। यही कारण है कि जब हम तीव्र प्रकाश से अन्धकार में जाते । हैं, तब एकदम कुछ दिखाई नहीं देता किन्तु धीरे-धीरे स्पष्ट दिखाई देने लगता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र शलाकाओं में प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन को दर्शाता है। इसमें रोडोप्सिन, जो प्रकाश की उपस्थिति में रेटिनीन और ऑप्सिन में टूट जाता है, तथा विटामिन-A की भूमिका भी दिखाई गई है। अंधेरे में, रेटिनीन और ऑप्सिन फिर से मिलकर रोडोप्सिन बनाते हैं। शंकुओं में आयोडोप्सिन उपस्थित होता है। इसको वर्णक घटक रेटिनीन तथा प्रोटीन घटक फोटोप्सिन होता है। शंकु तीन प्रारम्भिक रंगों को ग्रहण करते हैं, जो लाल, नीला व हरा होते हैं। इन्हीं तीन प्रकार के शंकुओं द्वारा विभिन्न मात्रा में उद्दीपन ग्रहण से अन्य रंगों का ज्ञान होता है। मनुष्य व दूसरे प्राइमेट्स में दोनों नेत्रों द्वारा एक ही प्रतिबिम्ब बनता है। ऐसी दृष्टि को द्विनेत्री दृष्टि (binocular vision) कहते हैं। (स) श्रावण की प्रक्रिया कर्ण के निम्नलिखित प्रमुख दो कार्य होते हैं- (i) कर्ण का प्राथमिक कार्य शरीर का स्थैतिक तथा गतिक सन्तुलन बनाए रखना तथा (ii) ध्वनि ग्रहण करना अर्थात् श्रवण क्रिया । अन्तःकर्ण के कलागहन के कॉक्लिया में स्थित कॉरटाई का अंग ध्वनि के उद्दीपनों को ग्रहण करने के लिए उत्तरदायी है। श्रवण क्रिया में कर्ण द्वारा एक विशेष आवृत्ति की ध्वनि कम्पनों को ग्रहण करके कॉरटाई के अंग में स्थित संवेदी कोशिकाओं तक भेजा जाता है। संवेदी कोशिकाएँ इन तरंगों को तन्त्रिका के क्रिया विभव में परिवर्तित कर देती हैं। मस्तिष्क के ध्वनि वल्कुट (auditory cortex) सुनने का कार्य करता है। मनुष्य का कर्ण 16 से 20,000 साइकिल प्रति सेकण्ड की ध्वनि तरंगों को ग्रहण कर सकता है। बाह्य कर्ण पल्लव ध्वनि तरंगों को कर्ण कुहर में भेज देता है। ध्वनि तरंगें कर्णपटह में कम्पन उत्पन्न करती हैं। मध्य कर्ण की कर्ण अस्थिकाओं द्वारा कर्णपटह से कम्पन अण्डाकार गवाक्ष के ऊपर मढ़ी झिल्ली पर पहुँचते हैं। इसके फलस्वरूप अन्तःकर्ण के स्कैला वैस्टीबुली (scala vestibuli) के परिलसीका में कम्पन होने लगता है। यहाँ से कम्पन स्कैला टिम्पैनी (scala tympani) के परिलसीका में पहुँचते हैं। रीसनर्स कला तथा बेसीलर कला में कम्पन होने से स्कैला मीडिया (scala media) के अन्त:लसीका में कम्पन होने लगता है जिससे कॉरटाई के अंग के संवेदी रोमों में कम्पन होने लगता है। संवेदी रोमों के कम्पन टेक्टोरियल कला में कम्पन उत्पन्न करके ध्वनि संवेदना की प्रेरणा उत्पन्न कर देते हैं। श्रवण तन्त्रिका द्वारा ध्वनि संवेदना मस्तिष्क के ध्वनि वल्कुट (auditory cortex) तक पहुँच जाती है। ध्वनि की तीव्रता संवेदी रोमों के कम्पन की तीव्रता से ज्ञात होती है। ध्वनि तरंगों के कम्पन वृत्ताकार गवाक्ष की झिल्ली से टकराकर समाप्त हो जाते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र कर्ण में ध्वनि तरंगों के मार्ग को दर्शाता है। ध्वनि पिन्ना से बाहरी श्रवण नलिका में प्रवेश करती है, ईयर ड्रम को कंपन करती है। मध्य कर्ण की अस्थिकाएं (मैलेअस, इंकस, स्टैपीज़) इन कंपनों को ओवलिस फेनेस्ट्रा तक बढ़ाती हैं, जो अंतःकर्ण में प्रवेश करती है। आंतरिक कर्ण में सेमीसर्कुलर कैनाल्स, यूट्रिकुलस, सेक्यूलस और कोक्लिया शामिल हैं, जहां ऑर्गन ऑफ कॉर्टि ध्वनि तरंगों को तंत्रिका आवेगों में बदलता है।In simple words: सिनैप्टिक संचरण में, न्यूरोट्रांसमीटर एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक संकेत पहुंचाते हैं। देखने की प्रक्रिया में प्रकाश कॉर्निया और लेन्स से होकर रेटिना पर पड़ता है, जहां प्रकाश-संवेदी कोशिकाएं इसे तंत्रिका आवेगों में बदलती हैं। श्रवण की प्रक्रिया में, ध्वनि तरंगें कर्णपटह से मध्य और आंतरिक कर्ण तक जाती हैं, जहां कॉक्लिया में ऑर्गन ऑफ कॉर्टि ध्वनि को तंत्रिका आवेगों में परिवर्तित करता है।

🎯 Exam Tip: सिनैप्टिक संचरण, दृष्टि और श्रवण की प्रक्रियाओं में शामिल सभी चरणों और प्रमुख संरचनाओं को क्रमबद्ध तरीके से याद करें। न्यूरोट्रांसमीटर, प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन, और ध्वनि संचरण मार्ग पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि ये जटिल प्रक्रियाएं अक्सर विस्तृत उत्तरों में पूछी जाती हैं।

 

Question 7. (अ) आप किस प्रकार किसी वस्तु के रंग का पता लगाते हैं? (ब) हमारे शरीर का कौन-सा भाग शरीर का सन्तुलन बनाए रखने में मदद करता है? (स) नेत्र किस प्रकार रेटिना पर पड़ने वाले प्रकाश का नियमन करते हैं?
Answer:(अ) नेत्र गोलक की रेटिना तन्त्रिको संवेदी (neurosensory) होती है। इसमें दृष्टि शलाकाएँ (rods) तथा दृष्टि शंकु (cones) पाए जाते हैं। शंकुओं में आयोडोप्सिन (iodopsin) दृष्टि वर्णक पाया जाता है। तीव्र प्रकाश में शंकु विभिन्न रंगों को ग्रहण करते हैं। शंकु तीन प्राथमिक रंगों लाल, हरे व नीले से सम्बन्धित भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। ये इन प्राथमिक रंगों को ग्रहण करते हैं। इन प्राथमिक रंगों के मिश्रण से विभिन्न रंगों का ज्ञान होता है। (ब) अन्तःकर्ण की अर्द्धचन्द्राकार नलिकाओं के तुम्बिका (ampulla), सैक्यूलस तथा यूट्रिकुलस शरीर का सन्तुलन बनाने का कार्य करती हैं। यूट्रिकुलस तथा सैक्यूलस के मैकुला तथा अर्द्धचन्द्राकार नलिकाओं के तुम्बिका में स्थित संवेदी कूटों द्वारा गतिक सन्तुलन (dynamic equilibrium) नियन्त्रित होता है। जब शरीर एक ओर को झुक जाती है, तब ऑटोकोनिया उसी ओर चले जाते हैं, जहाँ वे संवेदी कूटों को उद्दीपन प्रदान करते हैं। 'इससे तन्त्रिका आवेग उत्पन्न होता है और मस्तिष्क में शरीर के झुकने की सूचना पहुँच जाती है। मस्तिष्क प्रेरक तन्त्रिकाओं द्वारा सम्बन्धित पेशियों को सूचना भेजकर शरीर का सन्तुलन बनाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र आइरिस और पुतली में पेशियों के विन्यास को दर्शाता है। इसमें रेडियल मसल्स (प्रसारी पेशियाँ) और सर्कुलर मसल्स (अवरोधिनी पेशियाँ) दिखाई गई हैं, जो पुतली के आकार को नियंत्रित करती हैं। डिलेटर्स (प्रसारक) पुतली को बड़ा करते हैं जबकि स्फिंक्टर्स (संकुचक) पुतली को छोटा करते हैं। यह प्रकाश की मात्रा के नियमन में आइरिस की भूमिका को समझाता है। (स) रेटिना (retina) पर पड़ने वाले प्रकाश की मात्रा का नियमन उपतारा (iris) द्वारा किया जाता है। यह एक मुद्राकार, चपटा, मिलेनिन वर्णकयुक्त तन्तुपट (diaphragm) के रूप में होता है। इसके गोल छिद्र को तारा या पुतली (pupil) कहते हैं। उपतारा (iris) में अरेखित अरीय प्रसारी पेशियाँ (radial dilatory muscles) तथा अरेखित वर्तुल अवरोधिनी पेशियाँ (circular sphincter muscles) होती हैं। अरीय पेशियों के संकुचन से पुतली का व्यास बढ़ जाता है और वर्तुल पेशियों के संकुचन से पुतली का व्यास घट जाता है। इस प्रकार ये पेशियाँ क्रमशः मन्द प्रकाश और तीव्र प्रकाश में संकुचित होकर रेटिना पर पड़ने वाले प्रकाश का नियमन करती हैं।In simple words: हम रंगों का पता शंकुओं (cones) द्वारा लगाते हैं जो लाल, हरे और नीले रंगों के मिश्रण को समझते हैं। शरीर का संतुलन आंतरिक कर्ण में स्थित अर्द्धचन्द्राकार नलिकाओं और यूट्रिकुलस-सैक्यूलस द्वारा नियंत्रित होता है। नेत्र में, आइरिस पुतली के आकार को नियंत्रित करके रेटिना पर पड़ने वाले प्रकाश की मात्रा का नियमन करता है।

🎯 Exam Tip: रंग दृष्टि में शंकुओं की भूमिका, संतुलन में आंतरिक कर्ण के भागों, और प्रकाश नियमन में आइरिस के कार्य को विशेष रूप से याद रखें। इन अवधारणाओं को समझने से जीव विज्ञान के संवेदी अंगों से संबंधित प्रश्नों का प्रभावी ढंग से उत्तर देने में मदद मिलेगी।

 

Question 8. (अ) सक्रिय विभवे उत्पन्न करने में Na\(^+\) की भूमिका का वर्णन कीजिए । (ब) सिनैप्स पर न्यूरोट्रान्समीटर मुक्त करने में Ca\(^{++}\) की भूमिका का वर्णन कीजिए। (स) रेटिना पर प्रकाश द्वारा आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए । (द) अन्तःकर्ण में ध्वनि द्वारा तन्त्रिका आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।
Answer:(अ) सक्रिय विभव उत्पन्न करने में Na\(^+\) की भूमिका (Role of Na\(^+\) in the generation of Action Potential) - उद्दीपन के फलस्वरूप तन्त्रिकाच्छद या न्यूरीलेमा की Na\(^+\) के लिए पारगम्यता बढ़ जाने से, Na\(^+\) ऊतक तरल से ऐक्सोप्लाज्म में तेजी से पहुँचने लगते हैं। इसके फलस्वरूप तन्त्रिका तन्तु का विध्रुवीकरण हो जाता है और तन्त्रिका तन्तु का विश्राम कला विभव क्रियात्मक कला विभव में बदलकर प्रेरणा प्रसारण में सहायता करता है। (विस्तृत विवरण के लिए अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 3 (ब) का उत्तर देखिए ।) (ब) सिनैप्स पर न्यूरोट्रान्समीटर मुक्त करने में Ca\(^{++}\) की भूमिका (Role of Ca\(^{++}\) to release Neurotransmitters of Synapsis) - जब कोई तन्त्रिकीय प्रेरणा क्रियात्मक विभव के रूप में सिनैप्टिक घुण्डी पर पहुँचती है तो Ca\(^{++}\) ऊतक तरल से सिनेप्टिक घुण्डी में प्रवेश कर जाते हैं। इनके प्रभाव से सिनैप्टिक घुण्डी की सिनैप्टिक पूटिकाएँ इसकी कला से जुड़ जाती हैं। इससे सिनैप्टिक पुटिकाओं से तन्त्रिका संचारी पदार्थ (न्यूरोट्रान्समीटर) मुक्त होकर सिनैप्टिक विदर के ऊतक तरल में पहुँच जाता है और पश्चसिनैप्टिक तन्त्रिका कोशिका के ड्रेन्ड्राइट्स पर रासायनिक उद्दीपन द्वारा क्रियात्मक विभव को स्थापित कर देता है। (स) रेटिना पर प्रकाश द्वारा आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि (Mechanism of generation of Light Impulse in the Retina) - अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 6 'ब' के अन्तर्गत प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन (photo-chemical changes) का विवरण देखिए । (द) अन्तःकर्ण में ध्वनि द्वारा तन्त्रिका आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि (Mechanism through which a Sound produces a Nerve Impulse in the Internal Ear) - अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 6 'स' के अन्तर्गत देखिए ।In simple words: Na\(^+\) आयन तंत्रिका कोशिकाओं में सक्रिय विभव उत्पन्न करने के लिए महत्वपूर्ण हैं, Ca\(^{++}\) आयन सिनैप्स पर न्यूरोट्रांसमीटर के रिलीज को ट्रिगर करते हैं। रेटिना पर प्रकाश आवेग उत्पन्न करने के लिए प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन होते हैं, और आंतरिक कर्ण में ध्वनि तरंगें यांत्रिक रूप से तंत्रिका आवेगों में परिवर्तित होती हैं।

🎯 Exam Tip: सोडियम और कैल्शियम आयनों की विशिष्ट भूमिकाओं को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे तंत्रिका आवेगों और सिनैप्टिक संचरण के मूल में हैं। संदर्भ वाले प्रश्नों के लिए, मूल उत्तरों को अच्छी तरह से तैयार करें ताकि उन्हें आसानी से संदर्भित किया जा सके।

 

Question 9. निम्नलिखित के बीच में अन्तर बताइए- (अ) आच्छादित और अनाच्छादित तन्त्रिकाक्ष (ब) दुम्राक्ष्य और तन्त्रिकाक्ष (स) शलाका और शंकु (द) थैलेमस तथा हाइपोथैलेमस (य) प्रमस्तिष्क और अनुमस्तिष्क ।
Answer:(अ) आच्छादित और अनाच्छादित तन्त्रिकाक्ष में अन्तर

क्र० सं०आच्छादित तन्त्रिकाक्ष (Myelinated Neuron)अनाच्छादित तन्त्रिकाक्ष (Non-myelinated Neuron)
1.तंत्रिकाक्ष तथा एक्सॉन के मध्य प्रोटीनयुक्त लिपिड पदार्थ मायलिन (myelin) पाया जाता है।तंत्रिकाक्ष तथा एक्सॉन के मध्य मायलिन का अभाव होता है।
2.ये मस्तिष्क, मेरुरज्जु के श्वेत द्रव्य (white matter) का निर्माण करते हैं।ये केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र का धूसर द्रव्य (gray matter) बनाते हैं।
3.इनमें प्रेरणाओं का प्रसारण तीव्र गति से होता है।इनमें प्रेरणाओं का प्रसारण मन्द गति से होता है।
4.अधिकांशतया केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र तथा परिधीय तन्त्रिका तन्त्र बनाते हैं।ये स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र का निर्माण करते हैं।
(ब) दुम्राक्ष्य और तन्त्रिकाक्ष में अन्तर
क्र० सं०दुम्राक्ष्य (Dendrites)तन्त्रिकाक्ष (Axon)
1.ये अपेक्षाकृत छोटे, संख्या में एक या अधिक, आधार पर मोटे और सिरों पर क्रमशः पतले होते हैं।एक्सॉन सदैव एक काफी लम्बा, लगभग समान मोटाई का बेलनाकार प्रवर्ध होता है।
2.ये कोशिकाकाय (cyton) के समीप ही अत्यधिक शाखित होकर झाड़ीनुमा (bushy) हो जाते हैं।यह अन्तिम छोर पर ही शाखित होता है। शाखाओं को टीलोडेन्ड्रिया कहते हैं। इनके सिरों पर सिनैप्टिक घुण्डियाँ (synaptic nobes) पाई जाती है।
3.इनमें कोशिका अंगक तथा निसल के कण पाए जाते हैं।इनमें कोशिका अंगक तो होते हैं, लेकिन निसल के कण (Nissl's granules) नहीं होते।
4.ये प्रेरणाओं को ग्रहण करके कोशिकाकाय (cyton) की ओर लाते हैं। इन्हें अभिवाही (afferent) प्रवर्ध कहते हैं।ये प्रेरणाओं को कोशिकाकाय से अन्य तन्त्रिका कोशिकाओं या अपवाहक अंग तक पहुँचाते हैं। इन्हें अपवाही (efferent) प्रवर्ध कहते हैं।
(स) शलाका और शंकु में अन्तर
क्र० सं०शलाकाएँ (Rods)शंकु (Cones)
1.शलाकाएँ प्रकाश एवं अन्धकार के उद्दीपनों को ग्रहण करती हैं।शंकु रंगों के उद्दीपनों को ग्रहण करते हैं। ये तीन प्राथमिक रंगों लाल, हरा तथा नीले रंग को पहचानते हैं।
2.ये मन्द प्रकाश में भी क्रियाशील हो जाती हैं।ये तीव्र प्रकाश में ही क्रियाशील होते हैं।
3.शलाकाओं में दृष्टि पर्पल (visual purple) वर्णक रोडोप्सिन (rhodopsin) पाया जाता है।शंकुओं में आयोडोप्सिन वर्णक पाया जाता है।
4.शलाकाएँ बेलनाकार होती हैं।शंकु मुग्दरनुमा होते हैं।
(द) थैलेमस तथा हाइपोथैलेमस में अन्तर
क्र० सं०थैलेमस (Thalamus)हाइपोथैलेमस (Hypothalamus)
1.यह प्रमस्तिष्क से घिरा रहता है।यह थैलेमस के आधार पर स्थित होता है।
2.इसमें डाइएनसिफैलॉन की पार्श्व दीवारों के ऊपरी भाग आते हैं। यह धूसर द्रव्य से बने मोटे पिण्डों के रूप में होता है।इसमें डाइएनसिफैलॉन की पार्श्व दीवारों का अधर भाग आता है।
3.इसमें तन्त्रिका कोशिकाओं के छोटे-छोटे समूह अर्थात् थैलमी केन्द्रक (thalamic nuclei) होते हैं।इसमें तन्त्रिका कोशिकाओं के लगभग एक दर्जन बड़े-बड़े केन्द्रक (nuclei) होते हैं। यह चार मुख्य भागों में बँटा रहता है।
4.यह ताप, पीड़ा, स्पर्श, कम्पन, श्रवण, दृष्टि आदि संवेदी सूचनाओं के पुनः प्रसारण केन्द्र का काम करता है।यह भूख, प्यास, परितृप्ति, क्रोध, निद्रा, उत्साह, भोग-विलास आदि अनुभूतियों का नियमन करता है।
(य) प्रमस्तिष्क तथा अनुमस्तिष्क में अन्तर
क्र० सं०प्रमस्तिष्क (Cerebrum)अनुमस्तिष्क (Cerebellum)
1.यह अग्रमस्तिष्क का मुख्य भाग है।यह पश्चमस्तिष्क का मुख्य भाग होता है।
2.यह दाएँ-बाएँ प्रमस्तिष्क गोलार्दों (cerebral hemisphere) से बना होता है। ये परस्पर, कॉर्पस कैलोसम से बँधे रहते हैं।यह दाएँ-बाएँ दो अनुमस्तिष्क गोलार्द्ध (cerebellar hemispheres) से बना होता है। ये परस्पर वर्मिस (vermis) द्वारा जुड़े रहते हैं।
3.प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध की गुहा पार्श्व वेन्ट्रिकल (lateral ventricle) कहलाती है।यह ठोस होता है।
4.प्रमस्तिष्क बुद्धि, इच्छा शक्ति, ऐच्छिक क्रियाओं, ज्ञान, स्मृति, वाणी, चिन्तन आदि का केन्द्र होता है।अनुमस्तिष्क शरीर की भंगिमा (posture) तथा सन्तुलन को बनाए रखता है। पेशीय क्रियाओं का समन्वय करता है।
In simple words: आच्छादित और अनाच्छादित तंत्रिकाक्ष मायलिन की उपस्थिति और आवेग संचरण की गति में भिन्न होते हैं; दुम्राक्ष्य और तंत्रिकाक्ष न्यूरॉन के विभिन्न भाग हैं जो क्रमशः संकेत प्राप्त करते और भेजते हैं; शलाकाएँ और शंकु प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ हैं जो क्रमशः मंद प्रकाश और रंग दृष्टि के लिए जिम्मेदार हैं; थैलेमस और हाइपोथैलेमस मस्तिष्क के महत्वपूर्ण भाग हैं जो संवेदी जानकारी और शारीरिक कार्यों को नियंत्रित करते हैं; और प्रमस्तिष्क व अनुमस्तिष्क मस्तिष्क के बड़े हिस्से हैं जो उच्च-स्तरीय कार्यों और संतुलन को संभालते हैं।

🎯 Exam Tip: तुलना वाले प्रश्नों में प्रत्येक युग्म के बीच के अंतरों को स्पष्ट, संक्षिप्त और सटीक रूप से प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है। तालिकाओं का उपयोग करने से तुलनात्मक बिंदु अधिक स्पष्ट होते हैं और उच्च अंक प्राप्त करने में सहायक होते हैं।

 

Question 10. (अ) कर्ण का कौन-सा भाग ध्वनि की पिच का निर्धारण करता है? (ब) मानव मस्तिष्क का सर्वाधिक विकसित भाग कौन-सा है? (स) केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र का कौन-सा भाग मास्टर क्लॉक की तरह कार्य करता है?
Answer:(अ) कॉरटाई के अंग (organ of Corti) की संवेदनाग्राही कोशिकाएँ ध्वनि की पिच को निर्धारण करती हैं तथा उद्दीपनों को ग्रहण करके श्रवण तन्त्रिका (auditory nerve) में प्रेषित करती हैं। (ब) प्रमस्तिष्क (cerebrum) मस्तिष्क का सर्वाधिक विकसित भाग है। यह मस्तिष्क का लगभग 80% भाग बनाता है। (स) मस्तिष्क मास्टर क्लॉक की तरह कार्य करता है।In simple words: कर्ण में कॉरटाई का अंग ध्वनि की पिच का पता लगाता है। मानव मस्तिष्क का सबसे विकसित भाग प्रमस्तिष्क (cerebrum) है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में कोई विशिष्ट 'मास्टर क्लॉक' नहीं है; विभिन्न मस्तिष्क क्षेत्र, जैसे हाइपोथैलेमस का सुप्राकाएज्मेटिक न्यूक्लियस, शरीर की जैविक घड़ियों को नियंत्रित करता है।

🎯 Exam Tip: इस प्रकार के सीधे तथ्यात्मक प्रश्नों के लिए सटीक जानकारी याद रखना महत्वपूर्ण है। ध्वनि की पिच के लिए कॉरटाई का अंग, मस्तिष्क के सबसे विकसित भाग के लिए प्रमस्तिष्क, और 'मास्टर क्लॉक' की अवधारणा के लिए संबंधित मस्तिष्क क्षेत्र को याद रखें।

 

Question 11. कशेरुकी के नेत्र का वह भाग जहाँ से दृक तन्त्रिका रेटिना से बाहर निकलती है, क्या कहलाता है- (अ) फोविया (ब) आइरिस (स) अन्ध बिन्द (द) ऑप्टिक किएज्मा (चाक्षुष किएज्मा) ।
Answer: (स) अन्ध बिन्दु (Blind spot)।In simple words: कशेरुकी के नेत्र में वह स्थान जहाँ से दृक् तंत्रिका रेटिना से बाहर निकलती है, उसे अंध बिंदु (blind spot) कहते हैं। इस क्षेत्र में कोई प्रकाश-संवेदी कोशिकाएं नहीं होतीं, इसलिए यहाँ कोई प्रतिबिंब नहीं बनता।

🎯 Exam Tip: यह एक सीधा MCQ प्रश्न है। "अन्ध बिन्दु" को याद रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह रेटिना पर प्रकाश-संवेदी कोशिकाओं से रहित एकमात्र क्षेत्र है। फोविया, आइरिस और ऑप्टिक किएज्मा के कार्यों में अंतर को समझें।

 

Question 12. निम्नलिखित में भेद स्पष्ट कीजिए- (अ) संवेदी तन्त्रिका एवं प्रेरक तन्त्रिका । (ब) आच्छादित एवं अनाच्छादित तन्त्रिका तन्तु में आवेग संचरण । (स) ऐक्विअस ह्युमर, (नेत्रोद) एवं विट्रियस ह्युमर (काचाभ द्रव)। (द) अन्ध बिन्दु एवं पीत बिन्दु । (य) कपालीय तन्त्रिकाएँ एवं मेरु तन्त्रिकाएँ।
Answer:(अ) संवेदी तन्त्रिका एवं प्रेरक तन्त्रिका में अन्तर

क्र० सं०संवेदी तन्त्रिका (Sensory Nerve)प्रेरक तन्त्रिका (Motor Nerve)
1.इन्हें अभिवाही तन्त्रिका कहते हैं।इन्हें अपवाही तन्त्रिका कहते हैं।
2.ये एकध्रुवीय (unipolar) होती हैं।ये बहुध्रुवीय (multipolar) होती हैं।
3.ये संवेदी अंगों से प्रेरणाओं को केन्द्रीय तंत्रिका तन्त्र (मस्तिष्क, मेरुरज्जु) तक पहुँचाती है।ये केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र से प्रतिक्रियाओं को अपवाहक अंगों (ग्रन्थियाँ, पेशियाँ आदि) को पहुँचाती हैं।
(ब) आच्छादित एवं अनाच्छादित तन्त्रिका तन्तु में आवेग संचरण में अन्तर

क्र० सं०आच्छादित तन्त्रिका तन्तु (Myelinated Nerve Fibres)अनाच्छादित तन्त्रिका तन्तु (Non-myelinated Nerve Fibres)
1.इनमें उच्छलन प्रेरणा-प्रसारण (saltatory impulse conduction) पाया जाता है। इसमें प्रेरणा सम्पोषण रैन्वियर के नोड (nodes of Ranvier) पर होता है।इनमें प्रेरणा प्रसारण स्वःसंचारी विद्युत तरंग के रूप में बिन्दु-दर-बिन्दु सम्पोषित होने से होता है।
2.इसमें कम ऊर्जा व्यय होती है।इसमें अधिक ऊर्जा व्यय होती है।
3.इनमें अनाच्छादित तन्त्रिका तन्तुओं की तुलना में प्रेरणा संचरण लगभग 10 गुना तीव्रता से होता है।इनमें आच्छादित तन्त्रिका तन्तुओं की तुलना में प्रेरणा संचरण मन्द गति से होता है।
(स) ऐक्विअस ह्यूमर (नेत्रोद) एवं विट्रियस ह्यूमर (काचाभ द्रव) में अन्तर

क्र० सं०ऐक्विअस ह्यमर (नेत्रोद) (Aqneous Humour)विट्रियस ह्यमर (काचाभ द्रव) (Vitreous Humour)
1.यह लेन्स तथा कॉर्निया के मध्य ऐक्वस गुहा में पाया जाने वाला क्षारीय, जलीय तरल होता है।यह लेन्स तथा रेटिना के मध्य विट्रियस गुहा में पाए जाने वाला जैली सदृश लसदार तरल होता है।
2.एक्विअस ह्यूमर ऊतक तरल जैसा हौता है। यह लेन्स को पोषक पदार्थों, O\(_{2}\) आदि प्रदान करता है और उत्सर्जी पदार्थों को बाहर निकालने में सहायक होता है। यह नेत्र लेन्स पर दबाव बनाए रखता है। यह प्रकाश किरणों का अपवर्तन (refraction) करता है।विट्रियस ह्यमर में जल, लवण, विट्रीनम्यूको प्रोटीन तथा हायलूरोनिक अम्ल पाया जाता है। इसमें महीन कोलैजन तन्तुओं का जाल फैला होता है। यह नेत्र गोलक की आकृति, दबाव को बनाए रखता है।
(द) अन्ध बिन्दु एवं पीत बिन्दु में अन्तर

क्र० सं०अन्ध बिन्दु (Blind Spot)पीत बिन्दु (Yellow Spot)
1.इस स्थान पर शलाकाएँ तथा शंकु नहीं पाए जाते।इस स्थान पर केवल शंकु पाए जाते हैं, शलाकाएँ तथा अन्य कोशिकाएँ नहीं पाई जातीं। शंकुओं में पीला रंगावर्णक पाया जाता है।
2.इस स्थान से दृष्टि तन्त्रिका निकलती है; अतः इस स्थान पर प्रतिबिम्ब का निर्माण नहीं होता।यह नेत्र गोलक की मध्य अनुलम्ब अक्ष पर स्थित होता है। इस स्थान पर सबसे स्पष्ट प्रतिबिम्ब बनता है।
(य) कपालीय तन्त्रिकाओं एवं मेरु तन्त्रिकाओं में अन्तर

क्र० सं०कपालीय तन्त्रिकाएँ (Cranial Nerves)मेरु तन्त्रिकाएँ (Spinal Nerves)
1.ये मस्तिष्क के विभिन्न भागों से जुड़ी रहती हैं।ये मेरुरज्जु से जुड़ी रहती हैं।
2.मनुष्य में कपालीय तन्त्रिकाओं की संख्या 12 जोड़ी होती है।मनुष्य में मेरु तन्त्रिकाओं की संख्या 31 जोड़ी होती है।
3.ये तीन प्रकार की होती हैं-संवेदी, प्रेरक तथा मिश्रित। I, II तथा VIIIवीं कपालीय तन्त्रिका संवेदी होती है। III, IV तथा VI कपालीय तन्त्रिका प्रेरक होती है। V, VII, IX, X मिश्रित कपाल तन्त्रिकाएँ होती हैं।ये पृष्ठ संवेदी तथा अधर प्रेरक मूल (root) से बनी होती हैं। प्रत्येक मेरु तन्त्रिका तीन शाखाओं में बँट जाती है। पृष्ठ शाखा (ramus dorsalis), अधर शाखा (ramus ventralis) तथा योजि तन्त्रिका (ramus communicans)। पृष्ठ शाखा संवेदी, अधर शाखा प्रेरक तथा योजि तन्त्रिका मिश्रित होती है।
In simple words: संवेदी और प्रेरक तंत्रिकाएं संकेतों के प्रवाह की दिशा में भिन्न होती हैं; मायलिन आवरण की उपस्थिति से आवेग संचरण की गति प्रभावित होती है; एक्विअस और विट्रियस ह्यूमर आँख के अलग-अलग तरल पदार्थ हैं जिनके कार्य भिन्न हैं; अंध बिंदु और पीत बिंदु रेटिना पर प्रकाश संवेदनशीलता में भिन्न होते हैं; और कपालीय व मेरु तंत्रिकाएं मस्तिष्क और मेरुरज्जु से निकलने वाली तंत्रिकाएं हैं जिनके कार्य और वितरण भिन्न होते हैं।

🎯 Exam Tip: तुलनात्मक प्रश्नों में, प्रत्येक युग्म के बीच की मुख्य भिन्नताओं को स्पष्ट और संक्षेप में प्रस्तुत करें। तालिकाओं का उपयोग करने से जानकारी व्यवस्थित रहती है, जिससे पढ़ने और समझने में आसानी होती है, और यह उत्तर की गुणवत्ता को बढ़ाता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

 

Question 1. रोडोप्सिन (क) एक रंजक है जो नेत्र की रॉड कोशिकाओं में पाया जाता है। (ख) एक प्रकार का प्रोटीन है जो तन्त्रिका के युग्मानुबंधन में पाया जाता है। (ग) एक छोटी-सी हड्डी है जो मध्य कान में पायी जाती है । (घ) एक प्रकार का रासायनिक पदार्थ है जो अस्थि मज्जा में पाया जाता है।
Answer: (क) एक रंजक है जो नेत्र की रॉड कोशिकाओं में पाया जाता है।In simple words: रोडोप्सिन एक विशेष प्रकार का वर्णक है जो हमारी आँखों की रॉड कोशिकाओं में पाया जाता है और हमें कम रोशनी में देखने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: रोडोप्सिन का कार्य और स्थान याद रखना महत्वपूर्ण है। यह दृष्टि से संबंधित प्रमुख वर्णक है और अक्सर MCQ में पूछा जाता है।

 

Question 2. निम्नलिखित में से कौन आँखकी वास्तविक तन्त्रिका-संवेदी पटल है? (क) कॉर्निया (ख) स्कलीरा या दृढ़ पटल (ग) दृष्टिपटल (घ) रक्तके पटल
Answer: (ग) दृष्टिपटलIn simple words: आँख की वास्तविक तंत्रिका-संवेदी परत दृष्टिपटल (रेटिना) है, जिसमें प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ होती हैं जो प्रकाश को तंत्रिका संकेतों में बदलती हैं।

🎯 Exam Tip: नेत्र की विभिन्न परतों-कॉर्निया, स्क्लेरा, रेटिना, कोरॉइड-के कार्यों को जानना महत्वपूर्ण है। रेटिना विशेष रूप से प्रकाश-संवेदी परत है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. संवेदी एवं प्रेरक तन्त्रिका तन्तुओं के कार्य स्पष्ट कीजिए।
Answer: संवेदी तन्त्रिका तन्तु ग्राही अंगों अर्थात् संवेदांगों से संवेदनाओं की प्रेरणाओं को केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र में लाते हैं जबकि प्रेरक तन्त्रिका तन्तु प्रतिक्रियाओं की प्रेरणाओं अर्थात् चालक प्रेरणाओं को केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र से अपवाही अंगों या ऊतकों में लाते हैं।In simple words: संवेदी तंत्रिका तंतु शरीर से मस्तिष्क तक जानकारी ले जाते हैं, जबकि प्रेरक तंत्रिका तंतु मस्तिष्क से मांसपेशियों या ग्रंथियों तक क्रिया करने के लिए आदेश ले जाते हैं।

🎯 Exam Tip: संवेदी (afferent) और प्रेरक (efferent) तंत्रिका तंतुओं के बीच के अंतर को उनके कार्य और सूचना प्रवाह की दिशा के आधार पर स्पष्ट करें।

 

Question 2. अपवाही (संर्वेदी) और अभिवाही (मोटर) तन्त्रिका कोशिका में क्या भेद है?
Answer: संवेदी अंगों से उद्दीपनों को अभिवाही (afferent) तन्त्रिकाएँ मेरुरज्जु या मस्तिष्क में पहुँचाती हैं। मेरुरज्जु या मस्तिष्क से प्रेरणाओं को अपवाही (efferent) तन्त्रिकाएँ पेशी, ऊतक या ग्रन्थि तक पहुँचाती हैं।In simple words: अभिवाही तंत्रिका कोशिकाएँ संवेदी अंगों से मस्तिष्क तक संदेश ले जाती हैं, जबकि अपवाही तंत्रिका कोशिकाएँ मस्तिष्क से मांसपेशियों या ग्रंथियों तक क्रिया करने के लिए संदेश ले जाती हैं।

🎯 Exam Tip: 'अभिवाही' और 'अपवाही' शब्दों का अर्थ स्पष्ट रूप से समझें और उन्हें संवेदी और मोटर कार्यों से जोड़ें। यह तंत्रिका तंत्र की मूल शब्दावली है।

 

Question 3. मानव मस्तिष्क के सेरीब्रम के दो कार्य लिखिए ।
Answer:1. जटिल विचारों व क्रियाओं का अन्दर से नियन्त्रण। 2. निर्णय करने की क्षमता।In simple words: मानव मस्तिष्क का सेरीब्रम हमारे जटिल विचारों, सीखने, याद रखने और निर्णय लेने जैसी उच्च-स्तरीय मानसिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है।

🎯 Exam Tip: सेरीब्रम मस्तिष्क का सबसे बड़ा और सबसे विकसित भाग है। इसके प्रमुख कार्यों, विशेष रूप से उच्च-स्तरीय संज्ञानात्मक कार्यों को याद रखें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. तन्त्रिका कोशिका या न्यूरॉन की संरचना का वर्णन कीजिए। या एक तन्त्रिका कोशिका का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए तथा डेण्ड्राइट एवं एक्सॉन में अन्तर बताइए । या बहुध्रुवीय तन्त्रिका कोशिका का एक स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए (वर्णन की आवश्यकता नहीं है)।
Answer:तन्त्रिका कोशिकाएँ या न्यूरॉन्स तन्त्रिका कोशिकाएँ तन्त्रिका तन्त्र (nervous system) की संरचनात्मक तथा कार्यात्मक इकाइयाँ हैं। मस्तिष्क, सुषुम्ना एवं विभिन्न तन्त्रिकाओं में उपस्थित तन्त्रिका ऊतक (nervous tissue) में ये कोशिकाएँ अति महत्त्वपूर्ण हैं और भ्रूण की न्यूरोब्लास्ट (neuroblast) कोशिकाओं से बनती हैं। भ्रूणीय परिवर्द्धन में एक बार बन जाने के बाद तन्त्रिका कोशिकाएँ शरीर के साथ बड़ी तो होती रहती हैं, किन्तु विभाजित नहीं होती हैं तथा सदैव विभाजनान्तराल अवस्था (interphase) में ही रहती हैं। संरचना तथा कार्यिकी में तन्त्रिका कोशिकाएँ शरीर की सर्वाधिक जटिल और लम्बी कोशिकाएँ होती हैं। प्रत्येक तन्त्रिका कोशिका की विशेषता उससे निकलने वाले प्रवर्ध (processes) होते हैं तथा इन प्रवर्षों में क्रियात्मक विभेदीकरण (physiological differentiation) होता है। कोशिका से निकलने वाले इन प्रवर्थों की संख्या के आधार पर इन्हें एक ध्रुवीय (unipolar), द्विध्रुवीय (bipolar) अथवा बहुध्रुवीय (multipolar) कहते हैं। अध्रुवीय (nonpolar) तन्त्रिका कोशिकाएँ केवल निम्न श्रेणी के जन्तुओं में पायी जाती हैं। जिनमें प्रवर्ध तो होते हैं, किन्तु प्रवर्षों में क्रियात्मक विभेदीकरण नहीं होता है। इस प्रकार तन्त्रिका कोशिका के अग्र दो प्रमुख भाग होते हैं 1. कोशिकाकाय यह तन्त्रिका कोशिका का प्रमुख भाग है जो गोल, अण्डाकार या अन्य आकार का हो सकता है। अनुमस्तिष्क (cerebellum) में कोशिकाकाय फ्लास्क (flask) की आकृति के होते हैं और पुरकिन्जे की कोशिकाएँ (Purkinje's cell) कहलाते हैं। इसमें केन्द्रक (nucleus) प्रायः केन्द्र में, परिमाप में । बड़ा व गोलाकार होता है। कोशिकाद्रव्य में महीन तन्त्रिको तन्तुक (neurofibrils), माइटोकॉण्ड्रिया (mitochondria), सूक्ष्म नलिकाएँ (microtubules), गॉल्जीकार्य (golgi complex), अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (endoplasmic reticulum), वसा बिन्दुक (fat globules) आदि सामान्य संरचनाओं के अतिरिक्त अनियमित आकार के बड़े-बड़े निसल के कण (Nissl's granules) पाये जाते हैं। 2. तन्त्रिका कोशिका प्रवर्ध तन्त्रिको कोशिकाओं में प्रवर्ध निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं- (i) वृक्षाभ (Dendrites) - कोशिकाकाय से निकलने वाले ये प्रवर्ध अपेक्षाकृत छोटे, सिरों की ओर क्रमशः सँकरे तथा शाखित होते हैं। कभी-कभी ये निकलने के स्थान से ही अत्यधिक शाखित होकर झाड़ी के समान (bushy) हो जाते हैं। इनमें निसल के कण, तन्त्रिका तन्तुक पाये जाते हैं। (ii) अक्ष तन्तु (Axon) - यह प्रवर्ध लगभग एक बराबर मोटाई का लम्बा तथा संख्या में एक ही होता है। यह प्रायः स्वतन्त्र सिरे पर ही शाखित होता है और ये शाखाएँ अन्तिम शाखाएँ (telodendria) कहलाती हैं। अन्तिम शाखाओं पर गोल, घुण्डी की तरह के आकार के बटन (buttons) होते हैं। अक्ष तन्तु में निसल के कण राइबोसोम्स, गॉल्जी काय आदि नहीं होते हैं, किन्तु तन्त्रिका तन्तुक एवं अन्य कई प्रकार के कोशिकांग होते हैं। इसके बाहर आवरण के रूप में एक्सिओप्लाज्म (axioplasm) होता है। अक्ष तन्तु अनेक बार एक या अधिक आच्छदों से घिरा रहता है, तब इसे मज्जावृत (medullated) कहते हैं अन्यथा मज्जारहित (nonmedullated)। अक्ष तन्तु से बाहर उपस्थित कोमल आच्छद को न्यूरीलेमा (netirilemia) या श्वान का (sheath of Schwann) आच्छद कहते हैं, जो श्वन कोशिकाओं (Schwann cells) से बना होता है। इस आच्छद के बाहर एक महीन आधारीय कला (basement membrane) होती है। इसके भी बाहर संयोजी ऊतक से बना हेनले का आच्छद (Henle's sheath) पाया जाता है। श्वान कोशिकाओं से बना न्यूरीलेमा तथा अक्ष तन्तु के मध्य का आच्छद मायलिन आच्छद (myalin sheath) कहलाता है। मायलिन आच्छद निश्चित दूरियों पर विच्छिन्न (discontinuous) होती है। अतः इन स्थानों पर न्यूरीलेमा अक्ष तन्तु से चिपकी रहती है। इन स्थानों को रैन्वियर के नोड (nodes of Ranvier) कहते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक बहुध्रुवीय तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) की संरचना को दर्शाता है। इसमें कोशिकाकाय (सायटॉन) जिसके अंदर केंद्रक (न्यूक्लियस) और निसल ग्रैन्यूल्स होते हैं, डेन्ड्राइट्स जो संकेतों को प्राप्त करते हैं, और एक्सॉन जो संकेतों को आगे बढ़ाते हैं, दिखाए गए हैं। एक्सॉन पर मेडुलरी शीथ (मायलिन आवरण) और रैन्वियर के नोड्स भी चित्रित हैं, जो आवेग संचरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कार्य अक्ष तन्तु चेतनाओं को कोशिका से दूर ले जाते हैं। चेतना प्रेरणाओं को दूर-दूर तक ले जाने के लिए तन्तु एवं गुच्छकों (ganglia) में तन्त्रिका कोशिकाएँ अपने-अपने अक्ष तन्तुओं एवं वृक्षाभ की शाखाओं द्वारा एक-दूसरे से सम्बन्धित रहते हैं। इन स्थानों को युग्मानुबन्ध (synapse) कहते हैं। कोशिकाकाय तथा इसके वृक्षाभ (dendrites) संवेदनाओं को तन्त्रिका आवेग के रूप में प्राप्त करते अथवा उत्पन्न करते हैं, जबकि अक्ष तन्तु (axon) चेतनाओं के प्रसारण का कार्य करते हैं। इसलिए वृक्षाभों को अभिवाही (afferent) तथा अक्ष तन्तु को अपवाही (efferent) प्रवर्ध कहते हैं ।In simple words: तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) तंत्रिका तंत्र की मूल इकाई है, जिसमें कोशिकाकाय (सायटॉन), डेन्ड्राइट्स और एक्सॉन होते हैं। डेन्ड्राइट्स संकेत प्राप्त करते हैं, कोशिकाकाय उन्हें संसाधित करता है, और एक्सॉन इन संकेतों को आगे भेजता है। मायलिन आवरण एक्सॉन को इन्सुलेट करता है और आवेग संचरण की गति बढ़ाता है।

🎯 Exam Tip: न्यूरॉन की संरचना और उसके प्रत्येक भाग-कोशिकाकाय, डेन्ड्राइट, एक्सॉन, मायलिन शीथ और रैन्वियर के नोड्स-के कार्यों को याद रखना महत्वपूर्ण है। नामांकित चित्र का अभ्यास करें और अभिवाही व अपवाही प्रवर्धों के बीच के अंतर को समझें।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

Question 1. तन्त्रिका तन्तु में तन्त्रिका आवेग की उत्पत्ति तथा इसके संचारण का सचित्र वर्णन कीजिए। या एक्सॉन में तन्त्रिका आवेग के समारम्भन (initiation) एवं चालन (conduction) का सचित्र वर्णन कीजिए। समझाइए कि तन्त्रिका आवेग स्वतः प्रचारी (self propagatory) होता है । यो युग्मानुबन्धन की संरचना तथा इसके पार प्रेरणा प्रसारण की क्रियाविधि का सचित्र वर्णन कीजिए । इस क्रिया में ऐसीटिलकोलीन की भूमिका की विवेचना कीजिए ।
Answer:एक्सॉन में तन्त्रिका आवेग का समारम्भन किसी जन्तु में उपस्थित संवेदी कोशिकाएँ (sensory cells) प्रायः किसी भी प्रकार के उद्दीपन (stimulus) द्वारा उत्तेजित होने पर उद्दीपन को सम्बन्धित तन्त्रिका तन्तुओं (nerve fibres) में प्रेषित कर देती हैं, जिससे इसका आगे संवहन हो सके । तन्त्रिका तन्तुओं का यह उद्दीपन तन्त्रिका संवेग, आवेग या चेता प्रेरणा (nerve impulse) कहलाता है। तन्त्रिका आवेगों का संवहन एक विद्युत-रासायनिक प्रेरणा (electro-chemical impulse) के रूप में होता है। यह आवेग स्वप्रचारी (self propagatory) होता है तथा प्रारम्भ होने पर इसका अन्तिम सिरे तक होना आवश्यक होता है। तन्त्रिका आवेगों में निम्नलिखित लक्षण पाये जाते हैं। 1. बाह्य उद्दीपन से उत्तेजित होने पर तन्त्रिका में आवेगों की लहर उठने लगती है। 2. आवेगों का तन्त्रिका में संवहन केवल एक ही दिशा में होता है। 3. सामान्यतः एक आवेग एक ही तन्त्रिका तन्तु तक सीमित रहता है। 4. शरीर में तन्त्रिका तन्तु कई आवेगों को वहन कर पाते हैं। 5. तन्त्रिका तन्तु आवेगों के संवहन की अवधि में अधिक ऊर्जा का उपभोग करते हैं। 6. एक बार प्रारम्भ होने के पश्चात् आवेग के एक छोर से दूसरे अन्तिम छोर तक संवहन निश्चित होता है। तन्त्रिका आवेगों का संवहन या चालन तन्त्रिका तन्तु द्वारा आवेग का निर्माण तथा संवहन दोनों अत्यन्त जटिल एवं विद्युत-रासायनिक प्रक्रियाएँ। हैं तथा एक्सॉन की निम्नलिखित अवस्थाओं पर निर्भर करते हैं। (i) एक्सिओप्लाज्म (axioplasm) का रासायनिक संघटन । (ii) एक्सॉन के बाहर स्थित तरल वातावरण की रासायनिक दशा । (iii) एक्सॉन की कोशिकाकला, एक्सोलेमा (axolemma) की पारगम्यता (permeability)। तन्त्रिका आवेगों का विद्युत-रासायनिक संवहन या चालन तन्त्रिका आवेग के संवहन अथवा प्रसारण विधि की सम्पूर्ण प्रक्रिया को निम्नलिखित दो प्रावस्थाओं में विभक्त किया जा सकता है। 1. सुप्त कला विभव या विश्राम क्षमता कोशिकाओं के बाह्य कोशिकीय माध्यम में ऊतक द्रव्य होता है। इसी माध्यम से कोशिकाएँ अपना सम्पूर्ण रासायनिक लेन-देन करती हैं। इस माध्यम में प्रायः सोडियम (Na\(^+\)), क्लोराइड (Cl\(^-\)) तथा बाइकार्बोनेट (HCO\(_{3}\)\(^-\)) आयन अधिक मात्रा में होते हैं। इसमें पोषक पदार्थ, ऑक्सीजन कोशिकाओं के उपजात पदार्थ तथा कार्बन डाइऑक्साइड भी सामान्य रूप से उपस्थित होते हैं। तन्त्रिका कोशिका के एक्सिओप्लाज्म में प्रोटीन व अन्य कार्बनिक पदार्थों के साथ-साथ पोटैशियम (K\(^+\)), मैग्नीशियम (Mg\(^{++}\)) तथा फॉस्फेट (PO\(_{4}\)\(^{3-}\)) आयन प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र सोडियम-पोटैशियम पम्प के कार्य को दर्शाता है। यह प्लाज्मा मेम्ब्रेन के माध्यम से \(Na^+\) आयनों को कोशिका से बाहर और \(K^+\) आयनों को कोशिका के अंदर स्थानांतरित करता है, जिसके लिए ATP ऊर्जा का उपयोग होता है। यह प्रक्रिया कोशिका के भीतर और बाहर आयनों की सांद्रता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण है, जो तंत्रिका आवेग संचरण के लिए आवश्यक है। विद्युत विभव (electric potential) में अन्तर होने पर भी धनात्मक एवं ऋणात्मक विद्युतावेशी आयन्स तन्त्रिका कोशिका की कला अर्थात् तन्त्रिका कला (neurilemma) के इधर-उधर गति करते हैं। जल, अकार्बनिक एवं सरल कार्बनिक अणुओं के लिए तन्त्रिका कला वरणात्मक रूप से पारगम्य (permeable) होती है। विश्रामावस्था में यह पोटैशियम (K\(^+\)) तथा क्लोराइड (Cl\(^-\)) आयन्स के लिए पारगम्य, परन्तु सोडियम (Na\(^+\)) आयन्स के लिए लगभग अपारगम्य होती है। एक्सिओप्लाज्म (axioplasm) में पोटैशियम (K\(^+\)) आयन्स ऊतक द्रव्य की अपेक्षा लगभग 30 गुना अधिक, परन्तु (Na\(^+\)) वे क्लोराइड (Cl) आयन्स लगभग 15 गुना कम होते हैं। इस प्रकार बनी विसरण प्रवणता के अनुसार K\(^+\) आयन्स एक्सिओप्लाज्म में गति करते हैं। चेष्ट आवागमन में आयन्स विसरण प्रवणता के विपरीत गति करते हैं अर्थात् K\(^+\) आयन्स ऊतक द्रव्य से एक्सिओप्लाज्म में तथा Na\(^+\) आयन्स एक्सिओप्लाज्म से ऊतक द्रव में गति करते हैं। Na\(^+\) व K\(^+\) आयन्स की इस गति को ही सोडियम-पोटैशियम पम्प (sodium-potassium pump) कहते हैं। इस क्रिया में ऊतक द्रव व एक्सिओप्लाज्म के मध्य परासरणी सन्तुलन (osmotic equilibrium) बना रहता है। ऐक्सोलेमा की यह ध्रुवण अवस्था (polarized state) विश्राम अथवा सुप्त कला विभव कहलाती है। 2. क्रियात्मक विभव अथवा प्रेरणा क्षमता तन्त्रिका कला की एक विशेषता यह है कि उद्दीपन (stimulation) प्राप्त होने पर इसकी सोडियम (Na\(^+\)) आयन्स की पारगम्यता में वृद्धि हो जाती है, जो इन कोशिकाओं को आवेशों के प्रसारण के योग्य बनाती है। यह प्रक्रिया निम्नांकित चरणों में पूर्ण होती है- तन्त्रिका तन्तु में किसी बिन्दु पर उद्दीपन प्राप्त होने से इस स्थान पर तन्त्रिका कला की पारगम्यता बढ़ जाने के कारण Na\(^+\) आयन्स बड़ी संख्या में एक्सिओप्लाज्म में प्रवेश करने लगते हैं। इस प्रकार, उद्दीपन के स्थान पर तन्त्रिको कला में भीतर की ओर विपरीत विभव (reverse potential) बन जाता है। विश्रामावस्था से ठीक विपरीत परिवर्तन की इस क्रिया को निः ध्रुवण (depolarization) कहते हैं। सोडियम-पोटैशियम पम्प लगभग 2-4 मिली सेकण्ड में Na\(^+\) व K\(^+\) की स्थिति सामान्य कर देता है, जिससे विश्राम क्षमता पुनः स्थापित हो जाती है। 2-4 मिली सेकण्ड का यह समय अनुत्तेजन अवधि (refractory period) कहलाता है। इस समय तन्त्रिका कला के इस बिन्दु पर नयी प्रेरण क्षमता नहीं बन पाती है और आवेग केवल साइटॉन से एक्सॉन की ओर ही चलता है। इसे पुनर्भुवण (repolarization) कहते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र तंत्रिका तंतु में प्रेरणा के संवहन को सामान्य अवस्था (A) और उत्प्रेरक अवस्था (B) में दर्शाता है। सामान्य अवस्था में (A), झिल्ली ध्रुवीकृत होती है (बाहर \(Na^+\) धनात्मक, अंदर ऋणात्मक)। उत्प्रेरक अवस्था में (B), क्रियात्मक विभव उत्पन्न होने पर \(Na^+\) आयन अंदर आते हैं, जिससे झिल्ली विध्रुवीकृत हो जाती है (बाहर ऋणात्मक, अंदर धनात्मक)। इसके बाद पुन:ध्रुवीकरण और अनुत्तेजन अवधि होती है, जिससे आवेग आगे बढ़ता है। मेडयूलैटेड (medullated) तन्तुओं में आवेग केवल नोड्स (nodes) पर ही सम्पोषित होता है और यह कई गुनी तीव्र गति से प्रेषित होता है। प्रेषण की यह विधि उच्छ्ल न प्रसारण (saltatory transmission) कहलाती है। युग्मानुबन्ध पर आवेग का हस्तान्तरण तन्त्रिका कोशिका की स्वतन्त्र शाखाओं के स्वतन्त्र सिरों पर सिनैप्टिक घुण्डियाँ (synaptic knobs or buttons) होती हैं। इनके और इनसे सम्बन्धित अगली तन्त्रिका की डेण्ड्राइट्स के मध्य तरल पदार्थ से. भरा एक विशेष स्थान होता है जिसे सूत्रयुग्मन या युग्मानुबन्ध (synapse) कहते हैं। सिनैप्टि घुण्डियों में स्रावी पुटिकाएँ (secretory vesicles) होती हैं, जिन्हें सिनैप्टिक पुटिकाएँ (synaptic vesicles) भी कहते हैं। इनसे विशेष रासायनिक पदार्थ ऐसीटिलकोलीन (acetylcholine) स्रावित होता है जो आवेग को सिनैप्टिक घुण्डी से अगले न्यूरॉन की शाखा में संचरित करता है तथा उसमें कार्यात्मक विभव (action potential) का निर्माण करता है। ऐसीटिलकोलीन के निर्माण व स्रावण के लिए कैल्सियम आयन्स (Ca\(^+\)) की आवश्यकता होती है। क्रिया के पश्चात् इस पदार्थ का निष्क्रियण कोलीनेस्टेरेज (cholinesterase) नामक एन्जाइम के द्वारा होता है।In simple words: तंत्रिका आवेग एक विद्युत-रासायनिक संकेत है जो तंत्रिका तंतु में उत्पन्न होता है और तेजी से फैलता है। यह ध्रुवीकरण, विध्रुवीकरण और पुन:ध्रुवीकरण की प्रक्रियाओं के माध्यम से होता है, जिसमें सोडियम और पोटैशियम आयनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। सिनैप्स पर, एसिटाइलकोलीन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर आवेग को एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक पहुँचाते हैं, कैल्शियम आयन इस रिलीज को उत्तेजित करते हैं।

🎯 Exam Tip: तंत्रिका आवेग के आरंभन, संवहन और सिनैप्टिक प्रसारण की पूरी प्रक्रिया को अच्छी तरह समझें। आयनों की गति, सोडियम-पोटैशियम पम्प, और एसिटाइलकोलीन की भूमिका को स्पष्ट रूप से समझाना महत्वपूर्ण है। मेडुलेटेड और अनमेडुलेटेड फाइबर में संचरण के तरीकों पर भी ध्यान दें।

प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन

जब विशिष्ट तरंगदैर्ध्य वाली प्रकाश की किरणें रेटिना पर पड़ती हैं, तब ये शलाकाओं तथा शंकुओं में उपस्थित रसायनों में परिवर्तन करती हैं। जब प्रकाश की किरणें शलाकाओं के रोडोप्सिन पर पड़ती हैं, तब यह रेटिनीन (retinene) तथा ऑप्सिन (opsin) में टूट जाता है। अन्धकार में शलाकाओं में एन्जाइम्स की सहायता से रेटिनीन तथा ऑप्सिन रोडोप्सिन को, संश्लेषण करते हैं। यही कारण है कि जब हम तीव्र प्रकाश से अन्धकार में जाते हैं, तब एकदम कुछ दिखाई नहीं देता किन्तु धीरे-धीरे स्पष्ट दिखाई देने लगता है।


ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख मानव नेत्र में प्रकाश-रासायनिक परिवर्तनों को दर्शाता है। इसमें दिखाया गया है कि रोडोप्सिन (जो प्रकाश संवेदी वर्णक है) प्रकाश की उपस्थिति में रेटिनीन और ऑप्सिन में टूट जाता है, और अंधेरे में एंजाइमों की मदद से रेटिनीन और ऑप्सिन वापस रोडोप्सिन में संश्लेषित हो जाते हैं। यह प्रक्रिया रात और दिन की दृष्टि के अनुकूलन को संभव बनाती है।
In simple words: जब प्रकाश हमारी आँखों में पड़ता है, तो रोडोप्सिन नामक एक रसायन टूट जाता है, जिससे हमें देखने में मदद मिलती है। अंधेरे में, यह रसायन फिर से बन जाता है, जिससे हम कम रोशनी में भी देख पाते हैं।

🎯 Exam Tip: इस प्रक्रिया को 'विजुअल साइकिल' के रूप में भी जाना जाता है और यह रोडोप्सिन के घटक - रेटिनीन (विटामिन ए से प्राप्त) और ऑप्सिन प्रोटीन के टूटने और पुनर्संश्लेषण पर आधारित है।

शंकुओं में आयोडोप्सिन उपस्थित होता है। इसको वर्णक घटक रेटिनीन तथा प्रोटीन घटक फोटोप्सिन होता है। शंकु तीन प्रारम्भिक रंगों को ग्रहण करते हैं, जो लाल, नीला व हरा होते हैं। इन्हीं तीन प्रकार के शंकुओं द्वारा विभिन्न मात्रा में उद्दीपन ग्रहण से अन्य रंगों का ज्ञान होता है। मनुष्य व दूसरे प्राइमेट्स में दोनों नेत्रों द्वारा एक ही प्रतिबिम्ब बनता है। ऐसी दृष्टि को द्विनेत्री दृष्टि (binocular vision) कहते हैं।

(स) श्रावण की प्रक्रिया

कर्ण के निम्नलिखित प्रमुख दो कार्य होते हैं-
(i) कर्ण का प्राथमिक कार्य शरीर का स्थैतिक तथा गतिक सन्तुलन बनाए रखना तथा
(ii) ध्वनि ग्रहण करना अर्थात् श्रवण क्रिया । अन्तःकर्ण के कलागहन के कॉक्लिया में स्थित कॉरटाई का अंग ध्वनि के उद्दीपनों को ग्रहण करने के लिए उत्तरदायी है।

श्रवण क्रिया में कर्ण द्वारा एक विशेष आवृत्ति की ध्वनि कम्पनों को ग्रहण करके कॉरटाई के अंग में स्थित संवेदी कोशिकाओं तक भेजा जाता है। संवेदी कोशिकाएँ इन तरंगों को तन्त्रिका के क्रिया विभव में परिवर्तित कर देती हैं। मस्तिष्क के ध्वनि वल्कुट (auditory cortex) सुनने का कार्य करता है। मनुष्य का कर्ण 16 से 20,000 साइकिल प्रति सेकण्ड की ध्वनि तरंगों को ग्रहण कर सकता है। बाह्य कर्ण पल्लव ध्वनि तरंगों को कर्ण कुहर में भेज देता है। ध्वनि तरंगें कर्णपटह में कम्पन उत्पन्न करती हैं।

मध्य कर्ण की कर्ण अस्थिकाओं द्वारा कर्णपटह से कम्पन अण्डाकार गवाक्ष के ऊपर मढ़ी झिल्ली पर पहुँचते हैं। इसके फलस्वरूप अन्तःकर्ण के स्कैला वैस्टीबुली (scala vestibuli) के परिलसीका में कम्पन होने लगता है। यहाँ से कम्पन स्कैला टिम्पैनी (scala tympani) के परिलसीका में पहुँचते हैं। रीसनर्स कला तथा बेसीलर कला में कम्पन होने से स्कैला मीडिया (scala media) के अन्त-लसीका में कम्पन होने लगता है जिससे कॉरटाई के अंग के संवेदी रोमों में कम्पन होने लगता है। संवेदी रोमों के कम्पन टेक्टोरियल कला में कम्पन उत्पन्न करके ध्वनि संवेदना की प्रेरणा उत्पन्न कर देते हैं। श्रवण तन्त्रिका द्वारा ध्वनि संवेदना मस्तिष्क के ध्वनि वल्कुट (auditory cortex) तक पहुँच जाती है। ध्वनि की

तीव्रता संवेदी रोमों के कम्पन की तीव्रता से ज्ञात होती है। ध्वनि तरंगों के कम्पन वृत्ताकार गवाक्ष की झिल्ली से टकराकर समाप्त हो जाते हैं।


ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र मानव कर्ण में ध्वनि तरंगों के संवहन के मार्ग को दर्शाता है। इसमें दिखाया गया है कि ध्वनि तरंगें बाह्य कर्ण से कर्णपटह तक पहुँचती हैं, फिर मध्य कर्ण की अस्थिकाओं (मैलिअस, इन्कस, स्टेप्स) से होते हुए अन्तःकर्ण में प्रवेश करती हैं। अन्तःकर्ण में ध्वनि तरंगे कॉक्लिया में संवेदी कोशिकाओं को उत्तेजित करती हैं, जो मस्तिष्क तक संकेत भेजती हैं।
In simple words: कान ध्वनि तरंगों को कैसे पहचानता है, यह चित्र वही दिखाता है। ध्वनि कान के पर्दे से टकराकर अंदर जाती है, छोटी हड्डियां इसे आगे बढ़ाती हैं, और फिर एक घुमावदार हिस्से में, ध्वनि के संकेत दिमाग तक पहुँचते हैं।

🎯 Exam Tip: कान के विभिन्न भागों-बाह्य, मध्य और अन्तःकर्ण-के कार्य और संरचना को समझना महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से, कॉक्लिया और कॉरटाई के अंग का कार्य श्रवण प्रक्रिया के लिए केंद्रीय है।

Question 7.निम्नलिखित की तुलना कीजिए- (अ) आप किस प्रकार किसी वस्तु के रंग का पता लगाते हैं? (ब) हमारे शरीर का कौन-सा भाग शरीर का सन्तुलन बनाए रखने में मदद करता है? (स) नेत्र किस प्रकार रेटिना पर पड़ने वाले प्रकाश का नियमन करते हैं?
Answer:(अ) नेत्र गोलक की रेटिना तन्त्रिको संवेदी (neurosensory) होती है। इसमें दृष्टि शलाकाएँ (rods) तथा दृष्टि शंकु (cones) पाए जाते हैं। शंकुओं में आयोडोप्सिन (iodopsin) दृष्टि वर्णक पाया जाता है। तीव्र प्रकाश में शंकु विभिन्न रंगों को ग्रहण करते हैं। शंकु तीन प्राथमिक रंगों लाल, हरे व नीले से सम्बन्धित भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। ये इन प्राथमिक रंगों को ग्रहण करते हैं। इन प्राथमिक रंगों के मिश्रण से विभिन्न रंगों का ज्ञान होता है।
In simple words: हमारी आँखों की रेटिना में शंकु कोशिकाएँ होती हैं जो लाल, हरे और नीले जैसे प्राथमिक रंगों को पहचानती हैं। इन रंगों के मिश्रण से हम दुनिया के सभी रंग देख पाते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र आइरिस और पुतली की मांसपेशियों की व्यवस्था को दर्शाता है। इसमें गोलाकार पेशियाँ (स्फिन्कटर) और अरीय पेशियाँ (डाइलेटर) दिखाई गई हैं जो पुतली के आकार को नियंत्रित करती हैं, जिससे आंख में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा विनियमित होती है।
In simple words: यह चित्र दिखाता है कि हमारी आँख की पुतली छोटी-बड़ी कैसे होती है। आइरिस की मांसपेशियाँ सिकुड़कर या फैलकर आँख में जाने वाले प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करती हैं।

🎯 Exam Tip: रंगों की पहचान शंकु कोशिकाओं (cones) द्वारा होती है, जबकि कम रोशनी में देखने का कार्य शलाका कोशिकाओं (rods) द्वारा किया जाता है। प्राथमिक रंगों का संयोजन कैसे विभिन्न रंगों की धारणा को जन्म देता है, यह समझना महत्वपूर्ण है।

(ब) अन्तःकर्ण की अर्द्धचन्द्राकार नलिकाओं के तुम्बिका (ampulla), सैक्यूलस तथा यूट्रिकुलस शरीर का सन्तुलन बनाने का कार्य करती हैं। यूट्रिकुलस तथा सैक्यूलस के मैकुला तथा अर्द्धचन्द्राकार नलिकाओं के तुम्बिका में स्थित संवेदी कूटों द्वारा गतिक सन्तुलन (dynamic equilibrium) नियन्त्रित होता है। जब शरीर एक ओर को झुक जाती है, तब ऑटोकोनिया उसी ओर चले जाते हैं, जहाँ वे संवेदी कूटों को उद्दीपन प्रदान करते हैं। इससे तन्त्रिका आवेग उत्पन्न होता है और मस्तिष्क में शरीर के झुकने की सूचना पहुँच जाती है। मस्तिष्क प्रेरक तन्त्रिकाओं द्वारा सम्बन्धित पेशियों को सूचना भेजकर शरीर का सन्तुलन बनाता है।
In simple words: हमारे कान के अंदर के हिस्से, खासकर अर्द्धचन्द्राकार नलिकाएँ, सैक्यूलस और यूट्रिकुलस, हमारे शरीर को संतुलन में रखने में मदद करते हैं। जब हम हिलते हैं, तो इनमें मौजूद छोटे कण हिलते हैं और दिमाग को बताते हैं कि शरीर किस स्थिति में है, जिससे संतुलन बना रहता है।

🎯 Exam Tip: अन्तःकर्ण के वेस्टिबुलर उपकरण (अर्द्धचन्द्राकार नलिकाएँ, यूट्रिकुलस और सैक्यूलस) शरीर के स्थैतिक और गतिक संतुलन दोनों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संतुलन के लिए संवेदी कूटों और ऑटोकोनिया की कार्यप्रणाली को याद रखें।

(स) रेटिना (retina) पर पड़ने वाले प्रकाश की मात्रा का नियमन उपतारा (iris) द्वारा किया जाता है। यह एक मुद्राकार, चपटा, मिलेनिन वर्णकयुक्त तन्तुपट (diaphragm) के रूप में होता है। इसके गोल छिद्र को तारा या पुतली (pupil) कहते हैं। उपतारा (iris) में अरेखित अरीय प्रसारी पेशियाँ (radial dilatory muscles) तथा अरेखित वर्तुल अवरोधिनी पेशियाँ (circular sphincter muscles) होती हैं। अरीय पेशियों के संकुचन से पुतली का व्यास बढ़ जाता है और वर्तुल पेशियों के संकुचन से पुतली का व्यास घट जाता है। इस प्रकार ये पेशियाँ क्रमशः मन्द प्रकाश और तीव्र प्रकाश में संकुचित होकर रेटिना पर पड़ने वाले प्रकाश की मात्रा का नियमन करती हैं।
In simple words: हमारी आँख की पुतली और आइरिस प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करते हैं जो रेटिना तक पहुँचता है। आइरिस की मांसपेशियाँ पुतली को छोटा या बड़ा करके तेज या धीमी रोशनी में देखने में मदद करती हैं।

🎯 Exam Tip: आइरिस का कार्य एक कैमरे के डायफ्राम के समान होता है, जो पुतली के आकार को नियंत्रित करके आँख में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा को समायोजित करता है। अरीय और वर्तुल पेशियों के कार्य को समझना आवश्यक है।

Question 8.(अ) सक्रिय विभवे उत्पन्न करने में Na⁺ की भूमिका का वर्णन कीजिए । (ब) सिनैप्स पर न्यूरोट्रान्समीटर मुक्त करने में Ca⁺⁺ की भूमिका का वर्णन कीजिए। (स) रेटिना पर प्रकाश द्वारा आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए । (द) अन्तःकर्ण में ध्वनि द्वारा तन्त्रिका आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।
Answer:(अ) सक्रिय विभव उत्पन्न करने में Na⁺ की भूमिका (Role of Na⁺ in the generation of Action Potential) - उद्दीपन के फलस्वरूप तन्त्रिकाच्छद या न्यूरीलेमा की Na⁺ के लिए पारगम्यता बढ़ जाने से, Na⁺ ऊतक तरल से ऐक्सोप्लाज्म में तेजी से पहुँचने लगते हैं। इसके फलस्वरूप तन्त्रिका तन्तु का विध्रुवीकरण हो जाता है और तन्त्रिका तन्तु का विश्राम कला विभव क्रियात्मक कला विभव में बदलकर प्रेरणा प्रसारण में सहायता करता है। (विस्तृत विवरण के लिए अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 3 (ब) का उत्तर देखिए ।)
In simple words: जब किसी तंत्रिका कोशिका को उत्तेजित किया जाता है, तो सोडियम आयन (Na⁺) तेजी से कोशिका के अंदर चले जाते हैं। यह अंदर-बाहर के विद्युत संतुलन को बदल देता है, जिससे एक विद्युत संकेत (सक्रिय विभव) उत्पन्न होता है, जो तंत्रिका संदेश को आगे बढ़ाता है।

🎯 Exam Tip: सक्रिय विभव के उत्पन्न होने में Na⁺ चैनलों का तेजी से खुलना और कोशिका में Na⁺ का प्रवेश महत्वपूर्ण है, जिससे कोशिका झिल्ली का विध्रुवीकरण होता है।

(ब) सिनैप्स पर न्यूरोट्रान्समीटर मुक्त करने में Ca⁺⁺ की भूमिका (Role of Ca++ to release Neurotransmitters of Synapsis) - जब कोई तन्त्रिकीय प्रेरणा क्रियात्मक विभव के रूप में सिनैप्टिक घुण्डी पर पहुँचती है तो Ca⁺⁺ ऊतक तरल से सिनेप्टिक घुण्डी में प्रवेश कर जाते हैं। इनके प्रभाव से सिनैप्टिक घुण्डी की सिनैप्टिक पुटिकाएँ इसकी कला से जुड़ जाती हैं। इससे सिनैप्टिक पुटिकाओं से तन्त्रिका संचारी पदार्थ (न्यूरोट्रान्समीटर) मुक्त होकर सिनैप्टिक विदर के ऊतक तरल में पहुँच जाता है और पश्चसिनैप्टिक तन्त्रिका कोशिका के ड्रेन्ड्राइट्स पर रासायनिक उद्दीपन द्वारा क्रियात्मक विभव को स्थापित कर देता है।
In simple words: जब तंत्रिका संकेत एक तंत्रिका के अंत तक पहुँचता है, तो कैल्शियम आयन (Ca⁺⁺) अंदर आते हैं। ये आयन न्यूरोट्रांसमीटर से भरी छोटी थैलियों को कोशिका झिल्ली से जुड़ने और अपने संदेश को अगली तंत्रिका कोशिका तक भेजने में मदद करते हैं।

🎯 Exam Tip: न्यूरोट्रांसमीटर रिलीज के लिए Ca⁺⁺ आयनों की भूमिका 'एक्साइटेशन-सेक्रेशन कपलिंग' का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो तंत्रिका संचार में एक महत्वपूर्ण कदम है।

(स) रेटिना पर प्रकाश द्वारा आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि (Mechanism of generation of Light Impulse in the Retina) - अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 6 'ब' के अन्तर्गत प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन (photo-chemical changes) का विवरण देखिए ।
In simple words: जब प्रकाश हमारी रेटिना पर पड़ता है, तो इसमें मौजूद रसायन बदल जाते हैं। यह रासायनिक परिवर्तन एक विद्युत आवेग पैदा करता है, जिसे हमारी आँख की तंत्रिकाएँ दिमाग तक ले जाती हैं, जिससे हमें दिखाई देता है।

🎯 Exam Tip: रेटिना में प्रकाश संवेदी वर्णकों (जैसे रोडोप्सिन और आयोडोप्सिन) का प्रकाश के संपर्क में आने पर विखंडन, विद्युत आवेगों की उत्पत्ति का मुख्य आधार है।

(द) अन्तःकर्ण में ध्वनि द्वारा तन्त्रिका आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि (Mechanism through which a Sound produces a Nerve Impulse in the Internal Ear) - अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर में प्रश्न 6 'स' के अन्तर्गत देखिए ।
In simple words: ध्वनि तरंगें कान में प्रवेश करती हैं और अंतःकर्ण में कंपन पैदा करती हैं। ये कंपन संवेदी कोशिकाओं को उत्तेजित करते हैं, जिससे विद्युत आवेग बनते हैं। ये आवेग श्रवण तंत्रिका द्वारा दिमाग तक पहुँचते हैं, जहाँ उन्हें ध्वनि के रूप में समझा जाता है।

🎯 Exam Tip: ध्वनि ऊर्जा का यांत्रिक ऊर्जा में और फिर विद्युत रासायनिक आवेग में रूपांतरण कॉक्लिया के भीतर कॉरटाई के अंग की संवेदी कोशिकाओं द्वारा होता है, जो श्रवण प्रक्रिया का मूल है।

Question 9.निम्नलिखित के बीच में अन्तर बताइए- (अ) आच्छादित और अनाच्छादित तन्त्रिकाक्ष (ब) दुम्राक्ष्य और तन्त्रिकाक्ष (स) शलाका और शंकु (द) थैलेमस तथा हाइपोथैलेमस (य) प्रमस्तिष्क और अनुमस्तिष्क ।
Answer:(अ) आच्छादित और अनाच्छादित तन्त्रिकाक्ष में अन्तर

क्र० सं०आच्छादित तन्त्रिकाक्ष
(Myelinated Neuron)
अनाच्छादित तन्त्रिकाक्ष
(Non-myelinated Neuron)
1.तंत्रिकाक्ष तथा एक्सॉन के मध्य प्रोटीनयुक्त लिपिड पदार्थ मायलिन (myelin) पाया जाता है।तंत्रिकाक्ष तथा एक्सॉन के मध्य मायलिन का अभाव होता है।
2.ये मस्तिष्क, मेरुरज्जु के श्वेत द्रव्य (white matter) का निर्माण करते हैं।ये केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र का धूसर द्रव्य (gray matter) बनाते हैं।
3.इनमें प्रेरणाओं का प्रसारण तीव्र गति से होता है।इनमें प्रेरणाओं का प्रसारण मन्द गति से होता है।
4.अधिकांशतया केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र तथा परिधीय तन्त्रिका तन्त्र बनाते हैं।ये स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र का निर्माण करते हैं।

In simple words: आच्छादित तंत्रिकाक्षों पर एक सुरक्षात्मक मायलिन की परत होती है, जिससे संकेत बहुत तेजी से चलते हैं, जबकि अनाच्छादित तंत्रिकाक्षों पर यह परत नहीं होती और संकेत धीमी गति से चलते हैं।

🎯 Exam Tip: मायलिन आवरण की उपस्थिति या अनुपस्थिति तंत्रिका आवेग के संवहन की गति और दक्षता को निर्धारित करती है, जो विभिन्न न्यूरॉन कार्यों के लिए महत्वपूर्ण है।

(ब) दुम्राक्ष्य और तन्त्रिकाक्ष में अन्तर

क्र० सं०दुम्राक्ष्य
(Dendrites)
तन्त्रिकाक्ष
(Axon)
1.ये अपेक्षाकृत छोटे, संख्या में एक या अधिक, आधार पर मोटे और सिरों पर क्रमशः पतले होते हैं।एक्सॉन सदैव एक काफी लम्बा, लगभग समान मोटाई का बेलनाकार प्रवर्ध होता है।
2.ये कोशिकाकाय (cyton) के समीप ही अत्यधिक शाखित होकर झाड़ीनुमा (bushy) हो जाते हैं।यह अन्तिम छोर पर ही शाखित होता है। शाखाओं को टीलोडेन्ड्रिया कहते हैं। इनके सिरों पर सिनैप्टिक घुण्डियाँ (synaptic nobes) पाई जाती हैं।
3.इनमें कोशिका अंगक तथा निसल के कण पाए जाते हैं।इनमें कोशिका अंगक तो होते हैं, लेकिन निसल के कण (Nissl's granules) नहीं होते।
4.ये प्रेरणाओं को ग्रहण करके कोशिकाकाय (cyton) की ओर लाते हैं। इन्हें अभिवाही (afferent) प्रवर्ध कहते हैं।ये प्रेरणाओं को कोशिकाकाय से अन्य तन्त्रिका कोशिकाओं या अपवाहक अंग तक पहुँचाते हैं। इन्हें अपवाही (efferent) प्रवर्ध कहते हैं।

In simple words: दुम्राक्ष्य छोटे होते हैं और संदेशों को कोशिकाकाय की ओर लाते हैं, जबकि तंत्रिकाक्ष लंबे होते हैं और संदेशों को कोशिकाकाय से दूर ले जाते हैं।

🎯 Exam Tip: डेन्ड्राइट और एक्सॉन तंत्रिका कोशिका के मुख्य प्रवर्ध हैं, जिनके विशिष्ट कार्य तंत्रिका आवेगों के संचरण की दिशा और प्रक्रिया को परिभाषित करते हैं।

(स) शलाका और शंकु में अन्तर

क्र० सं०शलाकाएँ
(Rods)
शंकु
(Cones)
1.शलाकाएँ प्रकाश एवं अन्धकार के उद्दीपनों को ग्रहण करती हैं।शंकु रंगों के उद्दीपनों को ग्रहण करते हैं। ये तीन प्राथमिक रंगों लाल, हरा तथा नीले रंग को पहचानते हैं।
2.ये मन्द प्रकाश में भी क्रियाशील हो जाती हैं।ये तीव्र प्रकाश में ही क्रियाशील होते हैं।
3.शलाकाओं में दृष्टि पर्पल (visual purple) वर्णक रोडोप्सिन (rhodopsin) पाया जाता है।शंकुओं में आयोडोप्सिन वर्णक पाया जाता है।
4.शलाकाएँ बेलनाकार होती हैं।शंकु मुग्दरनुमा होते हैं।

In simple words: शलाकाएँ हमें कम रोशनी में देखने में मदद करती हैं और शंकु हमें रंगों को पहचानने में मदद करती हैं।

🎯 Exam Tip: शलाकाएँ (rods) कम रोशनी और परिधीय दृष्टि के लिए, जबकि शंकु (cones) तेज रोशनी और रंगीन दृष्टि के लिए जिम्मेदार होते हैं।

(द) थैलेमस तथा हाइपोथैलेमस में अन्तर

क्र० सं०थैलेमस
(Thalamus)
हाइपोथैलेमस
(Hypothalamus)
1.यह प्रमस्तिष्क से घिरा रहता है।यह थैलेमस के आधार पर स्थित होता है।
2.इसमें डाइएनसिफैलॉन की पार्श्व दीवारों के ऊपरी भाग आते हैं। यह धूसर द्रव्य से बने मोटे पिण्डों के रूप में होता है।इसमें डाइएनसिफैलॉन की पार्श्व दीवारों का अधर भाग आता है।
3.इसमें तन्त्रिका कोशिकाओं के छोटे-छोटे समूह अर्थात् थैलमी केन्द्रक (thalamic nuclei) होते हैं।इसमें तन्त्रिका कोशिकाओं के लगभग एक दर्जन बड़े-बड़े केन्द्रक (nuclei) होते हैं। यह चार मुख्य भागों में बँटा रहता है।
4.यह ताप, पीड़ा, स्पर्श, कम्पन, श्रवण, दृष्टि आदि संवेदी सूचनाओं के पुनः प्रसारण केन्द्र का काम करता है।यह भूख, प्यास, परितृप्ति, क्रोध, निद्रा, उत्साह, भोग-विलास आदि अनुभूतियों का नियमन करता है।

In simple words: थैलेमस संवेदी सूचनाओं को दिमाग के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचाता है, जबकि हाइपोथैलेमस भूख, प्यास, तापमान और भावनाओं जैसे शरीर के महत्वपूर्ण कार्यों को नियंत्रित करता है।

🎯 Exam Tip: थैलेमस को 'संवेदी रिले केंद्र' के रूप में जाना जाता है, जबकि हाइपोथैलेमस स्वायत्त तंत्रिका तंत्र और अंतःस्रावी तंत्र के माध्यम से होमियोस्टेसिस (आंतरिक संतुलन) बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(य) प्रमस्तिष्क तथा अनुमस्तिष्क में अन्तर

क्र० सं०प्रमस्तिष्क
(Cerebrum)
अनुमस्तिष्क
(Cerebellum)
1.यह अग्रमस्तिष्क का मुख्य भाग है।यह पश्चमस्तिष्क का मुख्य भाग होता है।
2.यह दाएँ-बाएँ प्रमस्तिष्क गोलार्द्धों (cerebral hemisphere) से बना होता है। ये परस्पर, कॉर्पस कैलोसम से बँधे रहते हैं।यह दाएँ-बाएँ दो अनुमस्तिष्क गोलार्द्ध (cerebellar hemispheres) से बना होता है। ये परस्पर वर्मिस (vermis) द्वारा जुड़े रहते हैं।
3.प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध की गुहा पार्श्व वेन्ट्रिकल (lateral ventricle) कहलाती है।यह ठोस होता है।
4.प्रमस्तिष्क बुद्धि, इच्छा शक्ति, ऐच्छिक क्रियाओं, ज्ञान, स्मृति, वाणी, चिन्तन आदि का केन्द्र होता है।अनुमस्तिष्क शरीर की भंगिमा (posture) तथा सन्तुलन को बनाए रखता है। पेशीय क्रियाओं का समन्वय करता है।

In simple words: प्रमस्तिष्क सोच, याददाश्त और ऐच्छिक गतिविधियों को नियंत्रित करता है, जबकि अनुमस्तिष्क शरीर के संतुलन और मांसपेशियों के समन्वय को बनाए रखता है।

🎯 Exam Tip: प्रमस्तिष्क मस्तिष्क का सबसे बड़ा और सबसे विकसित हिस्सा है, जो उच्च संज्ञानात्मक कार्यों के लिए जिम्मेदार है, जबकि अनुमस्तिष्क मोटर नियंत्रण और समन्वय के लिए आवश्यक है।

Question 10.(अ) कर्ण का कौन-सा भाग ध्वनि की पिच का निर्धारण करता है? (ब) मानव मस्तिष्क का सर्वाधिक विकसित भाग कौन-सा है? (स) केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र का कौन-सा भाग मास्टर क्लॉक की तरह कार्य करता है?
Answer: (अ) कॉरटाई के अंग (organ of Corti) की संवेदनाग्राही कोशिकाएँ ध्वनि की पिच को निर्धारण करती हैं तथा उद्दीपनों को ग्रहण करके श्रवण तन्त्रिका (auditory nerve) में प्रेषित करती हैं।
(ब) प्रमस्तिष्क (cerebrum) मस्तिष्क का सर्वाधिक विकसित भाग है। यह मस्तिष्क का लगभग 80% भाग बनाता है।
(स) मस्तिष्क मास्टर क्लॉक की तरह कार्य करता है।
In simple words: कॉरटाई का अंग ध्वनि की पिच बताता है, प्रमस्तिष्क दिमाग का सबसे बड़ा और विकसित हिस्सा है, और दिमाग ही शरीर की 'मास्टर क्लॉक' की तरह काम करता है, जो समय के अनुसार शरीर के कार्यों को नियंत्रित करता है।

🎯 Exam Tip: कॉरटाई का अंग श्रवण प्रक्रिया का मुख्य संवेदी अंग है। प्रमस्तिष्क उच्च संज्ञानात्मक कार्यों के लिए जिम्मेदार है। मास्टर क्लॉक के संदर्भ में, हाइपोथैलेमस में सुप्राचियास्मैटिक न्यूक्लियस (SCN) को अक्सर शरीर की आंतरिक जैविक घड़ी माना जाता है।

Question 11.कशेरुकी के नेत्र का वह भाग जहाँ से दृक तन्त्रिका रेटिना से बाहर निकलती है, क्या कहलाता है-
(अ) फोविया
(ब) आइरिस
(स) अन्ध बिन्द
(द) ऑप्टिक किएज्मा (चाक्षुष किएज्मा) ।
Answer: (स) अन्ध बिन्द
In simple words: आँख का वह बिंदु जहाँ से देखने वाली नस (दृक तंत्रिका) रेटिना को छोड़ती है, उसे अंध बिंदु कहते हैं, क्योंकि वहाँ कोई प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ नहीं होती हैं।

🎯 Exam Tip: अंध बिंदु पर कोई प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ (रॉड या कोन) नहीं होती हैं, इसलिए इस क्षेत्र में कोई छवि नहीं बन पाती। फोविया, इसके विपरीत, सबसे स्पष्ट दृष्टि का बिंदु है।

Question 12.निम्नलिखित में भेद स्पष्ट कीजिए- (अ) संवेदी तन्त्रिका एवं प्रेरक तन्त्रिका । (ब) आच्छादित एवं अनाच्छादित तन्त्रिका तन्तु में आवेग संचरण । (स) ऐक्विअस ह्युमर, (नेत्रोद) एवं विट्रियस ह्युमर (काचाभ द्रव)। (द) अन्ध बिन्दु एवं पीत बिन्दु । (य) कपालीय तन्त्रिकाएँ एवं मेरु तन्त्रिकाएँ।
Answer:(अ) संवेदी तन्त्रिका एवं प्रेरक तन्त्रिका में अन्तर

क्र० सं०संवेदी तन्त्रिका
(Sensory Nerve)
प्रेरक तन्त्रिका
(Motor Nerve)
1.इन्हें अभिवाही तन्त्रिका कहते हैं।इन्हें अपवाही तन्त्रिका कहते हैं।
2.ये एकध्रुवीय (unipolar) होती हैं।ये बहुध्रुवीय (multipolar) होती हैं।
3.ये संवेदी अंगों से प्रेरणाओं को केन्द्रीय तंत्रिका तन्त्र (मस्तिष्क, मेरुरज्जु) तक पहुँचाती है।ये केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र से प्रतिक्रियाओं को अपवाहक अंगों (ग्रन्थियाँ, पेशियाँ आदि) को पहुँचाती हैं।

In simple words: संवेदी तंत्रिकाएँ शरीर से दिमाग तक संदेश लाती हैं, जबकि प्रेरक तंत्रिकाएँ दिमाग से शरीर के अंगों तक संदेश ले जाती हैं ताकि वे कार्य कर सकें।

🎯 Exam Tip: संवेदी और प्रेरक तंत्रिकाएँ केंद्रीय और परिधीय तंत्रिका तंत्र के बीच महत्वपूर्ण संबंध बनाती हैं, जो शरीर की प्रतिक्रियाओं और संवेदी इनपुट के लिए आवश्यक हैं।

(ब) आच्छादित एवं अनाच्छादित तन्त्रिका तन्तु में आवेग संचरण में अन्तर

क्र० सं०आच्छादित तन्त्रिका तन्तु
(Myelinated Nerve Fibres)
अनाच्छादित तन्त्रिका तन्तु
(Non-myelinated Nerve Fibres)
1.इनमें उच्छलन प्रेरणा-प्रसारण (saltatory impulse conduction) पाया जाता है। इसमें प्रेरणा सम्पोषण रैन्वियर के नोड (nodes of Ranvier) पर होता है।इनमें प्रेरणा प्रसारण स्व-संचारी विद्युत तरंग के रूप में बिन्दु-दर-बिन्दु सम्पोषित होने से होता है।
2.इसमें कम ऊर्जा व्यय होती है।इसमें अधिक ऊर्जा व्यय होती है।
3.इनमें अनाच्छादित तन्त्रिका तन्तुओं की तुलना में प्रेरणा संचरण लगभग 10 गुना तीव्रता से होता है।इनमें आच्छादित तन्त्रिका तन्तुओं की तुलना में प्रेरणा संचरण मन्द गति से होता है।

In simple words: आच्छादित तंत्रिका तंतुओं में संदेश बहुत तेजी से कूद-कूद कर आगे बढ़ते हैं और कम ऊर्जा का उपयोग करते हैं, जबकि अनाच्छादित तंत्रिका तंतुओं में संदेश धीरे-धीरे लगातार आगे बढ़ते हैं और अधिक ऊर्जा का उपयोग करते हैं।

🎯 Exam Tip: मायलिन आवरण और रैन्वियर के नोड आच्छादित तंत्रिकाओं में 'सॉल्टेटरी कंडक्शन' को सक्षम बनाते हैं, जिससे आवेग संवहन की गति बहुत बढ़ जाती है।

(स) ऐक्विअस ह्यूमर (नेत्रोद) एवं विट्रियस ह्यूमर (काचाभ द्रव) में अन्तर

क्र० सं०ऐक्विअस ह्यमर (नेत्रोद)
(Aqneous Humour)
विट्रियस ह्यमर (काचाभ द्रव)
(Vitreous Humour)
1.यह लेन्स तथा कॉर्निया के मध्य ऐक्वस गुहा में पाया जाने वाला क्षारीय, जलीय तरल होता है।यह लेन्स तथा रेटिना के मध्य विट्रियस गुहा में पाए जाने वाला जैली सदृश लसदार तरल होता है।

2. एक्विअस ह्यूमर ऊतक तरल जैसा हौता है। यह लेन्स को पोषक पदार्थों, \( \text{O}_2 \) आदि प्रदान करता है और उत्सर्जी पदार्थों को बाहर निकालने में सहायक होता है। यह नेत्र लेन्स पर दबाव बनाए रखता है। यह प्रकाश किरणों का अपवर्तन (refraction) करता है।

विट्रियस ह्यमर में जल, लवण, विट्रीनम्यूको प्रोटीन तथा हायलूरोनिक अम्ल पाया जाता है। इसमें महीन कोलैजन तन्तुओं का जाल फैला होता है। यह नेत्र गोलक की आकृति, दबाव को बनाए रखता है।


In simple words: एक्विअस ह्यूमर आँख के अगले हिस्से में एक पतला, पानी जैसा द्रव है जो पोषण देता है, जबकि विट्रियस ह्यूमर आँख के पिछले हिस्से में एक गाढ़ा, जेली जैसा पदार्थ है जो आँख को उसका आकार बनाए रखने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: एक्विअस ह्यूमर लगातार बनता और निकलता रहता है और आँख के आंतरिक दबाव (इंट्राओकुलर प्रेशर) को बनाए रखने में मदद करता है, जबकि विट्रियस ह्यूमर आँख की स्थायी संरचना और आकार को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

(द) अन्ध बिन्दु एवं पीत बिन्दु में अन्तर

क्र० सं०अन्ध बिन्दु
(Blind Spot)
पीत बिन्दु
(Yellow Spot)
1.इस स्थान पर शलाकाएँ तथा शंकु नहीं पाए जाते।इस स्थान पर केवल शंकु पाए जाते हैं, शलाकाएँ तथा अन्य कोशिकाएँ नहीं पाई जातीं। शंकुओं में पीला रंगावर्णक पाया जाता है।
2.इस स्थान से दृष्टि तन्त्रिका निकलती है; अतः इस स्थान पर प्रतिबिम्ब का निर्माण नहीं होता।यह नेत्र गोलक की मध्य अनुलम्ब अक्ष पर स्थित होता है। इस स्थान पर सबसे स्पष्ट प्रतिबिम्ब बनता है।

In simple words: अंध बिंदु वह जगह है जहाँ से आँख की नस बाहर निकलती है, इसलिए वहाँ कोई प्रकाश संवेदी कोशिकाएँ नहीं होतीं और हम कुछ नहीं देख सकते। पीत बिंदु वह जगह है जहाँ सबसे स्पष्ट और रंगीन तस्वीर बनती है।

🎯 Exam Tip: फोविया केंद्रीय दृष्टि और रंगीन दृष्टि के लिए पीत बिंदु का केंद्र है, जबकि अंध बिंदु, जहां ऑप्टिक तंत्रिका रेटिना से बाहर निकलती है, कोई प्रकाश-संवेदी रिसेप्टर नहीं होता है।

(य) कपालीय तन्त्रिकाओं एवं मेरु तन्त्रिकाओं में अन्तर

क्र० सं०कपालीय तन्त्रिकाएँ
(Cranial Nerves)
मेरु तन्त्रिकाएँ
(Spinal Nerves)
1.ये मस्तिष्क के विभिन्न भागों से जुड़ी रहती हैं।ये मेरुरज्जु से जुड़ी रहती हैं।
2.मनुष्य में कपालीय तन्त्रिकाओं की संख्या 12 जोड़ी होती है।मनुष्य में मेरु तन्त्रिकाओं की संख्या 31 जोड़ी होती है।
3.ये तीन प्रकार की होती हैं-संवेदी, प्रेरक तथा मिश्रित। I, II तथा VIIIवीं कपालीय तन्त्रिका संवेदी होती है। III, IV तथा VI कपालीय तन्त्रिका प्रेरक होती है। V, VII, IX, X मिश्रित कपाल तन्त्रिकाएँ होती हैं।ये पृष्ठ संवेदी तथा अधर प्रेरक मूल (root) से बनी होती हैं। प्रत्येक मेरु तन्त्रिका तीन शाखाओं में बँट जाती है। पृष्ठ शाखा (ramus dorsalis), अधर शाखा (ramus ventralis) तथा योजि तन्त्रिका (ramus communicans)। पृष्ठ शाखा संवेदी, अधर शाखा प्रेरक तथा योजि तन्त्रिका मिश्रित होती है।

In simple words: कपालीय तंत्रिकाएँ सीधे मस्तिष्क से निकलती हैं और मुख्य रूप से सिर और गर्दन के कार्यों को नियंत्रित करती हैं, जबकि मेरु तंत्रिकाएँ रीढ़ की हड्डी से निकलती हैं और शरीर के बाकी हिस्सों को नियंत्रित करती हैं।

🎯 Exam Tip: कपालीय तंत्रिकाएँ अक्सर विशेष संवेदी और मोटर कार्यों से जुड़ी होती हैं (जैसे दृष्टि, श्रवण, चेहरे की गति), जबकि मेरु तंत्रिकाएँ शरीर के अधिकांश हिस्सों से संवेदी जानकारी लाती हैं और मांसपेशियों को नियंत्रित करती हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

Question 1.रोडोप्सिन
(क) एक रंजक है जो नेत्र की रॉड कोशिकाओं में पाया जाता है।
(ख) एक प्रकार का प्रोटीन है जो तन्त्रिका के युग्मानुबंधन में पाया जाता है।
(ग) एक छोटी-सी हड्डी है जो मध्य कान में पायी जाती है ।
(घ) एक प्रकार का रासायनिक पदार्थ है जो अस्थि मज्जा में पाया जाता है।
Answer: (क) एक रंजक है जो नेत्र की रॉड कोशिकाओं में पाया जाता है।
In simple words: रोडोप्सिन आँख की रॉड कोशिकाओं में पाया जाने वाला एक खास रंगद्रव्य है जो हमें कम रोशनी में देखने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: रोडोप्सिन विटामिन ए से व्युत्पन्न होता है और रात्रि दृष्टि के लिए आवश्यक है, जबकि शंकु कोशिकाओं में रंगीन दृष्टि के लिए आयोडोप्सिन जैसे वर्णक होते हैं।

Question 2.निम्नलिखित में से कौन आँखकी वास्तविक तन्त्रिका-संवेदी पटल है?
(क) कॉर्निया
(ख) स्कलीरा या दृढ़ पटल
(ग) दृष्टिपटल
(घ) रक्तके पटल
Answer: (ग) दृष्टिपटल
In simple words: दृष्टिपटल (रेटिना) आँख का वह हिस्सा है जो प्रकाश के प्रति संवेदनशील होता है और छवियों को दिमाग तक भेजने के लिए विद्युत संकेतों में बदलता है।

🎯 Exam Tip: रेटिना वह परत है जिसमें प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ (रॉड और कोन) होती हैं, जो प्रकाश को तंत्रिका आवेगों में परिवर्तित करने के लिए जिम्मेदार हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

Question 1.संवेदी एवं प्रेरक तन्त्रिका तन्तुओं के कार्य स्पष्ट कीजिए।
Answer: संवेदी तन्त्रिका तन्तु ग्राही अंगों अर्थात् संवेदांगों से संवेदनाओं की प्रेरणाओं को केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र में लाते हैं जबकि प्रेरक तन्त्रिका तन्तु प्रतिक्रियाओं की प्रेरणाओं अर्थात् चालक प्रेरणाओं को केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र से अपवाही अंगों या ऊतकों में लाते हैं।
In simple words: संवेदी तंत्रिकाएँ शरीर से दिमाग तक सूचनाएँ भेजती हैं, और प्रेरक तंत्रिकाएँ दिमाग से शरीर के अंगों को काम करने के निर्देश देती हैं।

🎯 Exam Tip: संवेदी (अभिवाही) और प्रेरक (अपवाही) तंत्रिकाएँ परिधीय तंत्रिका तंत्र का हिस्सा हैं और क्रमशः संवेदी इनपुट और मोटर आउटपुट के लिए महत्वपूर्ण हैं।

Question 2.अपवाही (संर्वेदी) और अभिवाही (मोटर) तन्त्रिका कोशिका में क्या भेद है?
Answer: संवेदी अंगों से उद्दीपनों को अभिवाही (afferent) तन्त्रिकाएँ मेरुरज्जु या मस्तिष्क में पहुँचाती हैं। मेरुरज्जु या मस्तिष्क से प्रेरणाओं को अपवाही (efferent) तन्त्रिकाएँ पेशी, ऊतक या ग्रन्थि तक पहुँचाती हैं।
In simple words: अभिवाही तंत्रिकाएँ शरीर से दिमाग तक संदेश ले जाती हैं, जबकि अपवाही तंत्रिकाएँ दिमाग से शरीर के अंगों तक संदेश ले जाती हैं ताकि वे काम कर सकें।

🎯 Exam Tip: 'अभिवाही' का अर्थ 'केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की ओर ले जाना' है, जबकि 'अपवाही' का अर्थ 'केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से दूर ले जाना' है।

Question 3.मानव मस्तिष्क के सेरीब्रम के दो कार्य लिखिए ।
Answer:1. जटिल विचारों व क्रियाओं का अन्दर से नियन्त्रण। 2. निर्णय करने की क्षमता।
In simple words: मानव मस्तिष्क का सेरीब्रम सोचने, समझने और फैसला लेने जैसे जटिल काम करता है, और यह शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित भी करता है।

🎯 Exam Tip: सेरीब्रम मस्तिष्क का सबसे बड़ा हिस्सा है और यह तर्क, स्मृति, भाषा, ऐच्छिक गतियों और धारणा जैसे उच्च संज्ञानात्मक कार्यों के लिए जिम्मेदार है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

Question 1.तन्त्रिका कोशिका या न्यूरॉन की संरचना का वर्णन कीजिए।
या एक तन्त्रिका कोशिका का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए तथा डेण्ड्राइट एवं एक्सॉन में अन्तर बताइए ।
या बहुध्रुवीय तन्त्रिका कोशिका का एक स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए (वर्णन की आवश्यकता नहीं है)।
Answer:तन्त्रिका कोशिकाएँ या न्यूरॉन्स

तन्त्रिका कोशिकाएँ तन्त्रिका तन्त्र (nervous system) की संरचनात्मक तथा कार्यात्मक इकाइयाँ हैं। मस्तिष्क, सुषुम्ना एवं विभिन्न तन्त्रिकाओं में उपस्थित तन्त्रिका ऊतक (nervous tissue) में ये कोशिकाएँ अति महत्त्वपूर्ण हैं और भ्रूण की न्यूरोब्लास्ट (neuroblast) कोशिकाओं से बनती हैं। भ्रूणीय परिवर्द्धन में एक बार बन जाने के बाद तन्त्रिका कोशिकाएँ शरीर के साथ बड़ी तो होती रहती हैं, किन्तु विभाजित नहीं होती हैं तथा सदैव विभाजनान्तराल अवस्था (interphase) में ही रहती हैं।

संरचना तथा कार्यिकी में तन्त्रिका कोशिकाएँ शरीर की सर्वाधिक जटिल और लम्बी कोशिकाएँ होती हैं। प्रत्येक तन्त्रिका कोशिका की विशेषता उससे निकलने वाले प्रवर्ध (processes) होते हैं तथा इन प्रवर्षों में क्रियात्मक विभेदीकरण (physiological differentiation) होता है। कोशिका से निकलने वाले इन प्रवर्थों की संख्या के आधार पर इन्हें एक ध्रुवीय (unipolar), द्विध्रुवीय (bipolar) अथवा बहुध्रुवीय (multipolar) कहते हैं। अध्रुवीय (nonpolar) तन्त्रिका कोशिकाएँ केवल निम्न श्रेणी के जन्तुओं में पायी जाती हैं। जिनमें प्रवर्ध तो होते हैं, किन्तु प्रवर्षों में क्रियात्मक विभेदीकरण नहीं होता है। इस प्रकार तन्त्रिका कोशिका के अग्र दो प्रमुख भाग होते हैं

1. कोशिकाकाय यह तन्त्रिका कोशिका का प्रमुख भाग है जो गोल, अण्डाकार या अन्य आकार का हो सकता है। अनुमस्तिष्क (cerebellum) में कोशिकाकाय फ्लास्क (flask) की आकृति के होते हैं और पुरकिन्जे की कोशिकाएँ (Purkinje's cell) कहलाते हैं। इसमें केन्द्रक (nucleus) प्रायः केन्द्र में, परिमाप में । बड़ा व गोलाकार होता है।

कोशिकाद्रव्य में महीन तन्त्रिको तन्तुक (neurofibrils), माइटोकॉण्ड्रिया (mitochondria), सूक्ष्म नलिकाएँ (microtubules), गॉल्जीकार्य (golgi complex), अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (endoplasmic reticulum), वसा बिन्दुक (fat globules) आदि सामान्य संरचनाओं के अतिरिक्त अनियमित आकार के बड़े-बड़े निसल के कण (Nissl's granules) पाये जाते हैं।

2. तन्त्रिका कोशिका प्रवर्ध तन्त्रिको कोशिकाओं में प्रवर्ध निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं- (i) वृक्षाभ (Dendrites) - कोशिकाकाय से निकलने वाले ये प्रवर्ध अपेक्षाकृत छोटे, सिरों की ओर क्रमशः सँकरे तथा शाखित होते हैं। कभी-कभी ये निकलने के स्थान से ही अत्यधिक शाखित होकर झाड़ी के समान (bushy) हो जाते हैं। इनमें निसल के कण, तन्त्रिका तन्तुक पाये जाते हैं।


ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक बहुध्रुवीय तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) की संरचना को दर्शाता है। इसमें एक कोशिकाकाय (साइटॉन), एक बड़ा केंद्रक (न्यूक्लियस), कई शाखित वृक्षाभ (डेंड्राइट), एक लंबा अक्ष तंतु (एक्सॉन) और एक्सॉन पर मायलिन शीथ और नोड्स ऑफ रैन्वियर दिखाए गए हैं। एक्सॉन के अंत में सिनैप्टिक बटन भी प्रदर्शित हैं।
In simple words: यह चित्र एक तंत्रिका कोशिका को दिखाता है, जिसमें उसका मुख्य शरीर (साइटॉन), छोटी शाखाएँ (डेंड्राइट) जो संदेश प्राप्त करती हैं, और एक लंबी पूंछ (एक्सॉन) जो संदेशों को दूर भेजती है, शामिल हैं।

🎯 Exam Tip: न्यूरॉन की संरचना में कोशिकाकाय, डेन्ड्राइट और एक्सॉन के विशिष्ट कार्य और मायलिन शीथ का महत्व तंत्रिका आवेग संवहन को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

(ii) अक्ष तन्तु (Axon) - यह प्रवर्ध लगभग एक बराबर मोटाई का लम्बा तथा संख्या में एक ही होता है। यह प्रायः स्वतन्त्र सिरे पर ही शाखित होता है और ये शाखाएँ अन्तिम शाखाएँ (telodendria) कहलाती हैं। अन्तिम शाखाओं पर गोल, घुण्डी की तरह के आकार के बटन (buttons) होते हैं। अक्ष तन्तु में निसल के कण राइबोसोम्स, गॉल्जी काय आदि नहीं होते हैं, किन्तु तन्त्रिका तन्तुक एवं अन्य कई प्रकार के कोशिकांग होते हैं। इसके बाहर आवरण के रूप में एक्सिओप्लाज्म (axioplasm) होता है। अक्ष तन्तु अनेक बार एक या अधिक आच्छदों से घिरा रहता है, तब इसे मज्जावृत (medullated) कहते हैं अन्यथा मज्जारहित (nonmedullated)। अक्ष तन्तु से बाहर उपस्थित कोमल आच्छद को न्यूरीलेमा (neurilemma) या श्वान का आच्छद (sheath of Schwann) कहते हैं, जो श्वन कोशिकाओं (Schwann cells) से बना होता है। इस आच्छद के बाहर एक महीन आधारीय कला (basement membrane) होती है। इसके भी बाहर संयोजी ऊतक से बना हेनले का आच्छद (Henle's sheath) पाया जाता है। श्वान कोशिकाओं से बना न्यूरीलेमा तथा अक्ष तन्तु के मध्य का आच्छद मायलिन आच्छद (myalin sheath) कहलाता है। मायलिन आच्छद निश्चित दूरियों पर विच्छिन्न (discontinuous) होती है। अतः इन स्थानों पर न्यूरीलेमा अक्ष तन्तु से चिपकी रहती है। इन स्थानों को रैन्वियर के नोड (nodes of Ranvier) कहते हैं। कार्य अक्ष तन्तु चेतनाओं को कोशिका से दूर ले जाते हैं। चेतना प्रेरणाओं को दूर-दूर तक ले जाने के लिए तन्तु एवं गुच्छकों (ganglia) में तन्त्रिका कोशिकाएँ अपने-अपने अक्ष तन्तुओं एवं वृक्षाभ की शाखाओं द्वारा एक-दूसरे से सम्बन्धित रहते हैं। इन स्थानों को युग्मानुबन्ध (synapse) कहते हैं। कोशिकाकाय तथा इसके वृक्षाभ (dendrites) संवेदनाओं को तन्त्रिका आवेग के रूप में प्राप्त करते अथवा उत्पन्न करते हैं, जबकि अक्ष तन्तु (axon) चेतनाओं के प्रसारण का कार्य करते हैं। इसलिए वृक्षाभों को अभिवाही (afferent) तथा अक्ष तन्तु को अपवाही (efferent) प्रवर्ध कहते हैं ।
In simple words: एक्सॉन एक लंबा तंत्रिका फाइबर है जो तंत्रिका कोशिकाओं से संकेतों को दूर ले जाता है, यह अक्सर मायलिन शीथ से ढका होता है जो संकेतों को तेजी से यात्रा करने में मदद करता है।

🎯 Exam Tip: एक्सॉन की लंबाई और मायलिन आवरण की उपस्थिति तंत्रिका आवेगों की संचरण गति को प्रभावित करती है, जो तंत्रिका तंत्र के कुशल कार्य के लिए महत्वपूर्ण है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

Question 1.तन्त्रिका तन्तु में तन्त्रिका आवेग की उत्पत्ति तथा इसके संचारण का सचित्र वर्णन कीजिए। या एक्सॉन में तन्त्रिका आवेग के समारम्भन (initiation) एवं चालन (conduction) का सचित्र वर्णन कीजिए। समझाइए कि तन्त्रिका आवेग स्वतः प्रचारी (self propagatory) होता है । यो युग्मानुबन्धन की संरचना तथा इसके पार प्रेरणा प्रसारण की क्रियाविधि का सचित्र वर्णन कीजिए । इस क्रिया में ऐसीटिलकोलीन की भूमिका की विवेचना कीजिए ।
Answer:एक्सॉन में तन्त्रिका आवेग का समारम्भन

किसी जन्तु में उपस्थित संवेदी कोशिकाएँ (sensory cells) प्रायः किसी भी प्रकार के उद्दीपन (stimulus) द्वारा उत्तेजित होने पर उद्दीपन को सम्बन्धित तन्त्रिका तन्तुओं (nerve fibres) में प्रेषित कर देती हैं, जिससे इसका आगे संवहन हो सके । तन्त्रिका तन्तुओं का यह उद्दीपन तन्त्रिका संवेग, आवेग या चेता प्रेरणा (nerve impulse) कहलाता है। तन्त्रिका आवेगों का संवहन एक विद्युत-रासायनिक प्रेरणा (electro-chemical impulse) के रूप में होता है। यह आवेग स्वप्रचारी (self propagatory) होता है तथा प्रारम्भ होने पर इसका अन्तिम सिरे तक होना आवश्यक होता है। तन्त्रिका आवेगों में निम्नलिखित लक्षण पाये जाते हैं।


1. बाह्य उद्दीपन से उत्तेजित होने पर तन्त्रिका में आवेगों की लहर उठने लगती है।
2. आवेगों का तन्त्रिका में संवहन केवल एक ही दिशा में होता है।
3. सामान्यतः एक आवेग एक ही तन्त्रिका तन्तु तक सीमित रहता है।
4. शरीर में तन्त्रिका तन्तु कई आवेगों को वहन कर पाते हैं।
5. तन्त्रिका तन्तु आवेगों के संवहन की अवधि में अधिक ऊर्जा का उपभोग करते हैं।
6. एक बार प्रारम्भ होने के पश्चात् आवेग के एक छोर से दूसरे अन्तिम छोर तक संवहन निश्चित होता है।

तन्त्रिका आवेगों का संवहन या चालन तन्त्रिका तन्तु द्वारा आवेग का निर्माण तथा संवहन दोनों अत्यन्त जटिल एवं विद्युत-रासायनिक प्रक्रियाएँ। हैं तथा एक्सॉन की निम्नलिखित अवस्थाओं पर निर्भर करते हैं।
(i) एक्सिओप्लाज्म (axioplasm) का रासायनिक संघटन ।
(ii) एक्सॉन के बाहर स्थित तरल वातावरण की रासायनिक दशा ।
(iii) एक्सॉन की कोशिकाकला, एक्सोलेमा (axolemma) की पारगम्यता (permeability)।

तन्त्रिका आवेगों का विद्युत-रासायनिक संवहन या चालन

तन्त्रिका आवेग के संवहन अथवा प्रसारण विधि की सम्पूर्ण प्रक्रिया को निम्नलिखित दो प्रावस्थाओं में विभक्त किया जा सकता है। 1. सुप्त कला विभव या विश्राम क्षमता कोशिकाओं के बाह्य कोशिकीय माध्यम में ऊतक द्रव्य होता है। इसी माध्यम से कोशिकाएँ अपना सम्पूर्ण रासायनिक लेन-देन करती हैं। इस माध्यम में प्रायः सोडियम (Na⁺), क्लोराइड (CI⁻) तथा बाइकार्बोनेट (HCO₃⁻) आयन अधिक मात्रा में होते हैं। इसमें पोषक पदार्थ, ऑक्सीजन कोशिकाओं के उपजात पदार्थ तथा कार्बन डाइऑक्साइड भी सामान्य रूप से उपस्थित होते हैं। तन्त्रिका कोशिका के एक्सिओप्लाज्म में प्रोटीन व अन्य कार्बनिक पदार्थों के साथ-साथ पोटैशियम (K⁺), मैग्नीशियम (Mg⁺⁺) तथा फॉस्फेट (PO₄³⁻) आयन प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं।


ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह आरेख सोडियम-पोटैशियम पंप के कार्य को दर्शाता है, जो तंत्रिका कोशिका झिल्ली के पार आयनों के सक्रिय परिवहन के लिए जिम्मेदार है। यह पंप 3 Na⁺ आयनों को कोशिका से बाहर और 2 K⁺ आयनों को कोशिका के अंदर स्थानांतरित करने के लिए ATP ऊर्जा का उपयोग करता है, जिससे विश्राम अवस्था में झिल्ली के आर-पार विद्युत विभव बना रहता है।
In simple words: यह चित्र सोडियम-पोटैशियम पंप को दिखाता है, जो कोशिका के अंदर और बाहर सोडियम और पोटैशियम आयनों को भेजकर कोशिका में बिजली का संतुलन बनाए रखता है, जिससे तंत्रिका संदेशों का संवहन संभव होता है।

🎯 Exam Tip: सोडियम-पोटैशियम पंप विश्राम झिल्ली विभव को स्थापित करने और बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है, जिससे तंत्रिका कोशिका उत्तेजित होने के लिए तैयार रहती है।

 


Answer: (refractory period) कहलाता है। इस समय तन्त्रिका कला के इस बिन्दु पर नयी प्रेरण क्षमता नहीं बन पाती है और आवेग केवल साइटॉन से एक्सॉन की ओर ही चलता है। इसे पुनर्भुवण (repolarization) कहते हैं।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र तंत्रिका तंतु में आवेग के संवहन को दर्शाता है। इसमें सामान्य विश्राम अवस्था (A) और उत्तेजित अवस्था (B) में न्यूरीलेमा पर विद्युत आवेशों का वितरण दिखाया गया है। यह दर्शाता है कि कैसे Na⁺ और K⁺ आयनों का संचलन झिल्ली के आर-पार विद्युत क्षमता में परिवर्तन लाता है। मेडयूलैटेड (medullated) तन्तुओं में आवेग केवल नोड्स (nodes) पर ही सम्पोषित होता है और यह कई गुनी तीव्र गति से प्रेषित होता है। प्रेषण की यह विधि उच्छ्ल न प्रसारण (saltatory transmission) कहलाती है। युग्मानुबन्ध पर आवेग का हस्तान्तरण तन्त्रिका कोशिका की स्वतन्त्र शाखाओं के स्वतन्त्र सिरों पर सिनैप्टिक घुण्डियाँ (synaptic knobs or buttons) होती हैं। इनके और इनसे सम्बन्धित अगली तन्त्रिका की डेण्ड्राइट्स के मध्य तरल पदार्थ से. भरा एक विशेष स्थान होता है जिसे सूत्रयुग्मन या युग्मानुबन्ध (synapse) कहते हैं। सिनैप्टि घुण्डियों में स्रावी पुटिकाएँ (secretory vesicles) होती हैं, जिन्हें सिनैप्टिक पुटिकाएँ (synaptic vesicles) भी कहते हैं। इनसे विशेष रासायनिक पदार्थ ऐसीटिलकोलीन (acetylcholine) स्रावित होता है जो आवेग को सिनैप्टिक घुण्डी से अगले न्यूरॉन की शाखा में संचरित करता है तथा उसमें कार्यात्मक विभव (action potential) का निर्माण करता है। ऐसीटिलकोलीन के निर्माण व स्रावण के लिए कैल्सियम आयन्स (Ca⁺) की आवश्यकता होती है। क्रिया के पश्चात् इस पदार्थ का निष्क्रियण कोलीनेस्टेरेज (cholinesterase) नामक एन्जाइम के द्वारा होता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र एक रासायनिक सिनैप्स का आरेखीय निरूपण है, जो एक्सॉन टर्मिनल, सिनैप्टिक पुटिकाएं (न्यूरोट्रांसमीटर से भरी), सिनैप्टिक फांक, और पोस्टसिनैप्टिक झिल्ली पर रिसेप्टर प्रोटीन को दर्शाता है। यह दर्शाता है कि कैसे न्यूरोट्रांसमीटर आवेगों को एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक संचारित करते हैं। एक तन्त्रिका कोशिका से दूसरी तन्त्रिका कोशिका में एक ही दिशा में अर्थात् एकदिशात्मक (unidirectional) रूप में स्वसंचारित होता रहता है।In simple words: तंत्रिका आवेग एक विद्युत-रासायनिक संकेत है जो तंत्रिका तंतु में ध्रुवीकरण और विध्रुवीकरण के माध्यम से आगे बढ़ता है। सिनैप्स पर, न्यूरोट्रांसमीटर (जैसे एसिटिलकोलाइन) इस संकेत को एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक पहुँचाते हैं, जिससे शारीरिक क्रियाएं संभव होती हैं।

🎯 Exam Tip: तंत्रिका आवेग के संचरण की प्रक्रिया और सिनैप्टिक ट्रांसमिशन के चरणों को उनके संबंधित आयन गतियों और न्यूरोट्रांसमीटर की भूमिका के साथ समझना महत्वपूर्ण है।

 

Question 2. प्रतिवर्ती क्रिया को परिभाषित कीजिए। इस क्रिया को चित्र की सहायता से समझाइए। या प्रतिवर्ती क्रिया क्या है? इसके प्रकार एवं दो उदाहरण लिखिए। या प्रतिवर्ती चाप का नामांकित चित्र बनाइए । या प्रतिवर्ती क्रिया का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer: प्रतिवर्ती क्रियाएँ तथा उनकी कार्य-विधि प्रतिवर्ती क्रियाएँ अनैच्छिक क्रियाएँ हैं जिन पर मस्तिष्क का किसी भी प्रकार नियन्त्रण नहीं होता है। इन क्रियाओं में संवेदी प्रेरणा सुषुम्ना अथवा मस्तिष्क में पहुँचने पर तुरन्त ही चालक प्रेरणा के रूप में अपवाहक अंगों में स्थानान्तरित हो जाती है। इस प्रकार प्रतिवर्ती क्रियाएँ अनायास, अविलम्ब, यन्त्रवत् एवं सहज ही घट्रित होती हैं। इस प्रकार की क्रियाओं का सर्वप्रथम पता हाल (Hall, 1833) ने लगाया था। सुषुम्ना से प्रत्येक स्पाइनल तन्त्रिका (spinal nerve) दो मूलों के रूप में निकलती है। पहला संवेदी तन्तुओं (sensory fibres) से बना पृष्ठ मूल (dorsal root) तथा चालक तन्तुओं (motor fibres) से बना दूसरा अधर मूल (ventral root) कहलाता है। संवेदना प्राप्त होने पर आवेग (impulse) की लहर पृष्ठ मूल से होकर पृष्ठ मूल गुच्छक (dorsal root ganglion) में स्थित न्यूरॉन तथा उसके एक्सॉन (axon) में होती हुई सुषुम्ना के धूसर द्रव्य (grey matter) में पहुँचती हैं। यहाँ से सिनैप्टिक घुण्डियों (synaptic knobs) से होता हुआ आवेग चालक तन्त्रिका कोशिकाओं (motor nerve cells) के डेण्ड्राइट्स में जाता है। अब यह आवेग ज्यों-का-त्यों चालक प्रेरणा बनकर प्रभावी अंग (effected organ) में पहुँचता है। प्रभावी अंगों की पेशियाँ तुरन्त क्रियाशील होकर इन्हें गति प्रदान करती हैं। संवेदांग से लेकर अपवाहक अंग (effector organ) तक के इस प्रकार के आवेग पथ को प्रतिवर्ती चाप (reflex arc) कहा जाता है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह चित्र प्रतिवर्ती क्रिया और प्रतिवर्ती चाप को दर्शाता है। इसमें संवेदी न्यूरॉन द्वारा उत्तेजना प्राप्त करना, सुषुम्ना में समायोजक न्यूरॉन के माध्यम से आवेग का संचरण, और प्रेरक न्यूरॉन द्वारा मांसपेशी में प्रतिक्रिया का संवहन शामिल है, जो अनैच्छिक क्रियाओं का आधार है।
ℹ️ चित्र व्याख्या (Diagram Explanation): यह फ्लोचार्ट प्रतिवर्ती चाप के मार्ग को सरल रूप में दिखाता है, जिसमें संवेदी अंग से रिसेप्टर, संवेदी न्यूरॉन, एसोसिएशन न्यूरॉन, प्रेरक न्यूरॉन और अंत में प्रभावक अंग (मांसपेशियां) तक आवेग का संचरण होता है, जो त्वरित और अनैच्छिक प्रतिक्रियाओं को सक्षम बनाता है। प्रतिवर्ती क्रियाएँ निम्नांकित दो प्रकार की होती हैं। 1. अबन्धित प्रतिवर्ती क्रियाएँ (Unconditional Reflex Actions) - इस प्रकार की प्रतिवर्ती क्रियाएँ प्राणियों में जन्म से मूल प्रवृत्ति (instinct) के रूप में होती हैं। ये क्रियाएँ स्पाइनल कॉर्ड (spinal cord) द्वारा नियन्त्रित होती हैं; जैसे-घोंसला बनाना, पक्षियों का देशान्तरण (migration) आदि । 2. प्रतिबन्धित प्रतिवर्ती क्रियाएँ (Conditioned Reflex Actions) - ये क्रियाएँ प्राणियों में अनुभव द्वारा विकसित होती हैं। इन क्रियाओं पर प्रारम्भ में तो प्रमस्तिष्क का नियन्त्रण रहता है, परन्तु बाद में ये स्वतः ही होने लगती हैं। नृत्य, तैरना, वाद्य, संगीत आदि इन क्रियाओं के सामान्य उदाहरण हैं। प्रतिवर्ती क्रियाओं के कुछ सामान्य उदाहरण 1. खाँसना एवं छींकना (Coughing and Sneezing) - श्वसन मार्ग में किसी ठोस कण के पहुँचने पर फेफड़ों से मुख के द्वारा तीव्र गति से वायु बाहर निकलती है, जिससे कि अवांछित कण वायु के दबाव से बाहर निकल जायें। तीव्र उच्छ्वास के कारण स्वर पट्टियों में कम्पन उत्पन्न होने से खाँसी की ध्वनि उत्पन्न होती है। छींकने में भी ऐसा ही होता है, अन्तर केवल इतना है कि इसमें वायु मुख के स्थान पर नाक से बाहर निकलती है। 2. नेत्र प्रतिक्षेप क्रिया (Blinking Reflex of Eye) - किसी वस्तु के अचानक सामने आने पर पलकों का अविलम्ब झपकना नेत्र प्रतिक्षेप क्रिया कहलाता है।In simple words: प्रतिवर्ती क्रियाएं अनैच्छिक और त्वरित शारीरिक प्रतिक्रियाएं हैं जो मस्तिष्क के सचेत नियंत्रण के बिना होती हैं, जैसे छींकना या पलक झपकना। ये एक प्रतिवर्ती चाप के माध्यम से संचालित होती हैं, जिसमें एक संवेदी अंग से प्राप्त आवेग सुषुम्ना या मस्तिष्क के निचले भागों तक जाता है और तुरंत प्रभावक अंग तक प्रतिक्रिया के रूप में लौट आता है।

🎯 Exam Tip: प्रतिवर्ती क्रिया की परिभाषा, इसके दो मुख्य प्रकार (अबन्धित और प्रतिबन्धित) और प्रतिवर्ती चाप की कार्यप्रणाली को उदाहरणों के साथ समझना महत्वपूर्ण है।

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