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Detailed Chapter 5 कृषि तथा उद्योगं की पारस्परिक अनुपूरकता एवं औद्योगिक धन्चा UP Board Solutions for Class 10 Social Science
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Class 10 Social Science Chapter 5 कृषि तथा उद्योगं की पारस्परिक अनुपूरकता एवं औद्योगिक धन्चा UP Board Solutions PDF
विरत उत्तरीय प्रश्न
Question 1. बड़े पैमाने के उद्योगों से आप क्या समझते हैं ? बड़े पैमाने के उद्योगों के प्रोत्साहन के लिए भारत में कौन-से कदम उठाये जा रहे हैं ?
Answer:
बड़े पैमाने के उद्योग:
बड़े पैमाने के उद्योग वे होते हैं जिनमें बहुत अधिक उत्पादन किया जाता है। इन उद्योगों में बड़ा निवेश होता है और इनसे बहुत सारे लोगों को काम मिलता है। भारत में ज़्यादातर पूँजी बड़े उद्योगों में ही लगी हुई है। ये उद्योग देश के कुल औद्योगिक उत्पादन का सबसे बड़ा हिस्सा बनाते हैं। ये समाज में बराबरी और आर्थिक तरक्की लाने में मदद करते हैं। सूती कपड़े बनाने वाले और लोहा-इस्पात उद्योग इसके अच्छे उदाहरण हैं। इन उद्योगों में नई तकनीकों का इस्तेमाल होता है, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ती है।
प्रोत्साहन के लिए उठाये गये कदम:
छोटे उद्योग ज़्यादातर रोज़मर्रा की चीजें बनाते हैं और बढ़ती हुई माँग को पूरा नहीं कर पाते, न ही उनकी गुणवत्ता हमेशा अच्छी होती है। इसलिए, बड़े पैमाने के उद्योगों की स्थापना की गई। ये उद्योग ज़्यादातर सरकारी क्षेत्र में स्थापित हुए, जहाँ भारी निवेश किया गया और बहुत से लोगों को रोज़गार मिला। सरकार ने इन उद्योगों को बढ़ाने के लिए कुछ उपाय किए हैं:
1. आधारिक संरचना का विस्तार: सरकार ने देश में परिवहन और संचार जैसी सुविधाओं को बढ़ाने में खूब पैसा लगाया है।
2. सार्वजनिक उद्योगों का विस्तार: योजना बनाते समय, भारत सरकार ने सरकारी क्षेत्र में कई बड़े उद्योग स्थापित किए, जैसे दुर्गापुर, भिलाई, राउरकेला के स्टील प्लांट और भारतीय तेल निगम।
3. वित्तीय संस्थाओं की स्थापना: बड़े उद्योगों को पैसे की ज़रूरत पूरी करने के लिए सरकार ने भारतीय औद्योगिक विकास बैंक जैसी कई वित्तीय संस्थाएँ बनाईं।
4. विदेशी सहयोग: योजना के समय, विदेशी पैसे और तकनीक की मदद से कई उद्योग स्थापित किए गए।
5. उत्पादन तकनीक में सुधार: बड़े उद्योगों की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए सरकार ने खोजबीन और शोध कामों को बढ़ावा दिया और कई संस्थाएँ बनाईं।
6. कर और अन्य रियायतें: सरकार ने बड़े उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए टैक्स में छूट, आसान लोन और कई तरह की वित्तीय सलाह और मदद दी है।
7. औद्योगिक नीति का उदारीकरण: 1991 की नई नीति के तहत इन उद्योगों को स्थापित करने और बढ़ाने के लिए लाइसेंस की ज़रूरत खत्म कर दी गई। साथ ही, विदेशी निवेश को भी आसान बनाया गया।
8. सरकार ने प्रौद्योगिकी में सुधार तथा यन्त्रों: उपकरणों को आधुनिक बनाने के लिए दो वित्तीय सहायता कोष बनाए गए - 'प्रौद्योगिकी सुधार कोष' और 'पूँजी आधुनिकीकरण कोष'।
In simple words: बड़े पैमाने के उद्योग वे होते हैं जहाँ बड़ा उत्पादन होता है, बहुत पैसा लगता है और बहुत लोगों को काम मिलता है। सरकार इन्हें बढ़ावा देने के लिए सड़कें, बिजली, वित्तीय मदद और नई तकनीक ला रही है।
🎯 Exam Tip: जब भी बड़े पैमाने के उद्योगों की बात आए, तो हमेशा उनके भारी निवेश, बड़े पैमाने पर उत्पादन और रोज़गार सृजन की क्षमता पर ध्यान दें। प्रोत्साहन के कदमों में सरकारी नीतियाँ और वित्तीय सहायता प्रमुख बिंदु होते हैं।
Question 2. सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र के उद्योगों में अन्तर स्पष्ट कीजिए तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के चार दोषों का उल्लेख कीजिए। [2009, 10]
Answer: सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के उद्योगों में मुख्य अंतर उनके मालिक होने का होता है। वे कंपनियाँ जो सरकारी विभागों या केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बनाई गई संस्थाओं के तहत होती हैं, उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम कहते हैं। जैसे भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड, भिलाई इस्पात लिमिटेड आदि। इसके उलट, जिन उद्योगों का मालिक कुछ लोग या कंपनियाँ होती हैं, उन्हें निजी क्षेत्र के उद्यम कहते हैं। जैसे टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी। देश के विकास में दोनों क्षेत्रों की भूमिका अहम है।
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के दोष:
हालाँकि भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड, तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग और भारतीय जीवन बीमा निगम जैसे कई सार्वजनिक उद्यमों ने अच्छा काम किया है, फिर भी ज़्यादातर सार्वजनिक उद्यमों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा है। वे कई समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिनमें से चार मुख्य दोष नीचे दिए गए हैं:
1. भ्रष्टाचार: सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के बड़े अधिकारी अपने काम को जनता के हित में नहीं, बल्कि अपने फायदे के लिए करते हैं। वे अपने निजी आर्थिक लाभ को ज़्यादा महत्व देते हैं और सार्वजनिक या आम जनता के हितों को अनदेखा करते हैं। इसका सीधा असर कंपनी की वित्तीय हालत पर पड़ता है, जिससे वह लगातार घाटे में चलती रहती है।
2. दक्षता एवं कार्यकुशलता का अभाव: सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में अक्सर बड़े प्रशासनिक अधिकारी बैठे होते हैं, जिन्हें उस उद्योग की तकनीकी जानकारी नहीं होती। इसका नतीजा यह होता है कि वे कर्मचारियों को सही तरीके से मार्गदर्शन नहीं कर पाते। इस कमी के कारण इन उद्यमों की कार्यकुशलता और दक्षता कम हो जाती है।
3. सुधार व अनुसन्धान की कमी: सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में सुधार और शोध के काम बहुत धीमी गति से होते हैं। लालफीताशाही, ज़िम्मेदारी की कमी, निजी आर्थिक हितों को प्राथमिकता देने और पुरानी सोच के कारण इन उद्यमों में तरक्की बहुत धीरे होती है।
4. प्रतिस्पर्धात्मक सोच का अभाव: आज का समय बहुत प्रतिस्पर्धी है। निजी क्षेत्र इस प्रतिस्पर्धा में पूरी लगन से लगे रहते हैं और विज्ञापनों का सहारा लेकर अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाते हैं। इसके विपरीत, ज़्यादातर सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम इस प्रतिस्पर्धा में पीछे रह गए हैं। नियोजक के हितों की बजाय निजी आर्थिक हितों को प्राथमिकता देने से भी प्रतिस्पर्धा की भावना आगे नहीं बढ़ पाती।
In simple words: सार्वजनिक उद्योग सरकार के होते हैं जबकि निजी उद्योग व्यक्तियों के होते हैं। सार्वजनिक उद्योगों में भ्रष्टाचार, काम की धीमी गति, शोध की कमी और प्रतिस्पर्धा में पिछड़ना जैसे दोष पाए जाते हैं।
🎯 Exam Tip: सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के उद्योगों के अंतर को बताते समय स्वामित्व (ownership) पर ज़ोर दें। दोषों को याद रखने के लिए भ्रष्टाचार, अक्षमता, नवाचार की कमी और प्रतिस्पर्धा में पिछड़ना जैसे प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान दें।
Question 3. औद्योगिक उत्पादकता का वर्णन कीजिए। इसमें कार्यकुशलता का क्या महत्त्व है? या औद्योगिक उत्पादकता का क्या अर्थ है? [2010]
Answer:
औद्योगिक उत्पादकता:
उत्पादन की प्रक्रिया उत्पादन के विभिन्न साधनों के सामूहिक प्रयासों पर निर्भर करती है। इन साधनों के आनुपातिक हिस्से को 'साधन उत्पादकता' कहते हैं। उद्योग की उत्पादकता का मतलब ऐसे समझा जा सकता है:
किसी उद्योग में पैदावार (Output) और उसमें लगाए गए इनपुट (Inputs) के अनुपात को उस उद्योग की उत्पादकता कहते हैं। पूरे देश की अर्थव्यवस्था के लिए उत्पादकता का मतलब यह है कि देश में जितने भी संसाधन उपलब्ध हैं, उनसे कितनी वस्तुएँ और सेवाएँ बनाई जा सकती हैं। एम. बनर्जी के अनुसार, "उत्पादकता का मतलब आमतौर पर उस अनुपात से है, जो वस्तुओं और सेवाओं के रूप में धन कमाने और उत्पादन में लगे साधनों के बीच होता है।" औद्योगिक उत्पादकता को उद्योग में लगाए गए पैसे (पूँजी) और उससे होने वाली उत्पादन वृद्धि के रूप में मापा जा सकता है। इसे 'वर्द्धमान पूँजी उत्पाद अनुपात' भी कहते हैं। उत्पादकता यह बताती है कि संसाधनों का कितना अच्छा उपयोग किया जा रहा है।
कार्यकुशलता का महत्त्व:
किसी भी उद्योग की उत्पादकता, क्षमता और व्यावसायिक लाभ उसकी कार्यकुशलता पर निर्भर करते हैं। कार्यकुशलता के मुख्य हिस्से हैं - मानव श्रम और वित्तीय व भौतिक संसाधनों का सही और ज़्यादा से ज़्यादा उपयोग। जिन उद्योगों में मानव श्रम, वित्तीय और भौतिक संसाधनों का सही इस्तेमाल होता है, वहाँ काम अच्छी तरह से होता है और ऐसे उद्योग मालिक को लाभ कमा कर देते हैं। टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी और मारुति कार उद्योग कार्यकुशल उद्योगों के उदाहरण हैं। इसके उलट, जिन उद्योगों में मानव श्रम, वित्तीय और भौतिक संसाधनों का सही उपयोग नहीं हो पाता, वहाँ कार्यकुशलता कम रहती है और वे लगातार घाटे में रहते हैं। कार्यकुशलता यह सुनिश्चित करती है कि उद्योग अपने लक्ष्य को प्रभावी ढंग से प्राप्त करें।
मानव श्रम:
आर्थिक सुधारों की तेज़ी को देखते हुए योजना आयोग का मानना है कि अगले दस सालों में भारत में प्रति व्यक्ति की औसत आय दोगुनी हो जाएगी। भारत में जनसंख्या की वृद्धि दर 1.5% सालाना है। भारत की आर्थिक तरक्की की तेज़ी से बढ़ने की उम्मीद का एक बड़ा कारण यह है कि हमारा 'निर्भरता-अनुपात' (काम करने वालों की संख्या की तुलना में आश्रितों की संख्या) पश्चिमी देशों की तुलना में कम है। दूसरे शब्दों में, हमारे यहाँ बच्चों और बूढ़ों की संख्या की तुलना में काम करने वालों की संख्या पश्चिमी देशों से बहुत ज़्यादा है। इसलिए, हमारे पास उपलब्ध पर्याप्त मानव श्रम हमारी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा।
वित्तीय संसाधन:
देश में विदेशी सीधा निवेश लगातार बढ़ता ही जा रहा है। वर्ष 1990-91 में इसकी कुल राशि 9 करोड़ 60 लाख डॉलर थी, जो वर्ष 1998-99 में बढ़कर 2 अरब 38 करोड़ डॉलर हो गई। वर्ष 2004-05 में विदेशी सीधा निवेश की कुल राशि 3 अरब 24 करोड़ डॉलर थी। योजना आयोग की रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर, 2005 तक यह लगभग 5 अरब डॉलर तक पहुँच गया था।
निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि आज भारत कार्यकुशलता के मामले में अन्य विकासशील देशों से बहुत आगे है और विकसित देशों के करीब पहुँचने की स्थिति में है।
In simple words: औद्योगिक उत्पादकता का मतलब है कि कोई उद्योग अपने संसाधनों का कितना अच्छा इस्तेमाल करके सामान बनाता है। कार्यकुशलता इसमें बहुत ज़रूरी है क्योंकि इससे उद्योग को फ़ायदा होता है और वह तरक्की करता है।
🎯 Exam Tip: उत्पादकता की परिभाषा देते समय इनपुट और आउटपुट के अनुपात पर ज़ोर दें। कार्यकुशलता को मानव श्रम और संसाधन प्रबंधन से जोड़ें ताकि उत्तर व्यापक लगे।
Question 4. भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु और कुटीर उद्योगों का महत्त्व बताइए । [2010, 13]
Answer:
लघु एवं कुटीर उद्योग:
लघु उद्योगों को मशीनों और संयंत्रों में किए गए निवेश के आधार पर परिभाषित किया जाता है। वर्तमान में, लघु उद्योगों में निवेश की सीमा Rs. 1 करोड़ है। ये उद्योग घर के अलावा अन्य जगहों पर स्थापित किए जाते हैं और इनमें मशीनी व बिजली के साधनों का उपयोग होता है, जैसे मिक्सी उद्योग।
कुटीर उद्योगों से मतलब ऐसे उद्योगों से है, जिनमें परिवार के सदस्य और कुछ वेतनभोगी श्रमिक (9 से कम) मिलकर कोई पारंपरिक वस्तु बनाते हैं और मालिक खुद कारीगर होता है। सभी कुटीर उद्योगों में मशीन या बिजली के साधनों का उपयोग नहीं होता है, जैसे लोहा-इस्पात उद्योग। कुटीर उद्योग अक्सर घर आधारित होते हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु एवं कुटीर उद्योगों का महत्त्व (लाभ) निम्नलिखित है:
1. कुटीर उद्योगों का विकास बेरोज़गारी की समस्या को हल करने में मदद करता है।
2. कुटीर उद्योग खेती करने वाले मजदूरों को अतिरिक्त कमाई का साधन देते हैं।
3. कुटीर उद्योग खेती की ज़मीन पर बढ़ती आबादी के बोझ को कम करने में सहायक हैं।
4. इन्हें आसानी से स्थापित किया जा सकता है, क्योंकि इन्हें चलाने के लिए कम पूँजी, कम ट्रेनिंग और हल्के औजारों की ज़रूरत होती है।
5. भारत में पूँजी की कमी और श्रमिकों की ज़्यादा संख्या है, इसलिए लघु उद्योग बहुत उपयुक्त हैं।
6. इन उद्योगों के विकास से राष्ट्रीय आय बढ़ती है। राष्ट्रीय आय-समिति के अनुसार, भारत की राष्ट्रीय आय में कुटीर और लघु उद्योगों का योगदान बड़े उद्योगों की तुलना में ज़्यादा होता है।
7. कुटीर और लघु उद्योग देश को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करते हैं।
8. ये उद्योग गरीब लोगों की कई ज़रूरतों को पूरा करते हैं।
9. कुटीर और लघु उद्योगों के विकास से आर्थिक असमानता कम होती है।
10. कुटीर और लघु उद्योगों का विकास देश के संतुलित और बहुमुखी विकास के लिए बहुत ज़रूरी है।
11. कुटीर और लघु उद्योगों के विकास से औद्योगीकरण के दोष पैदा नहीं होते हैं।
12. कुटीर उद्योगों के विकास से कई मानवीय भावनाएँ पैदा होती हैं, जैसे सहयोग, सहानुभूति, समानता और सहकारिता।
13. कुटीर व लघु उद्योगों में कई तरह के सामान बनाए जाते हैं; जैसे रेशमी कपड़े, चंदन और हाथीदाँत की चीज़ें, चमड़े के जूते, पत्थर व धातु की मूर्तियाँ, दरियाँ-कालीन, ताँबे-पीतल के बर्तन आदि। इन्हें विदेशों में निर्यात किया जाता है, जिससे हर साल करोड़ों रुपये की विदेशी मुद्रा मिलती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, देश की अर्थव्यवस्था में कुटीर व लघु उद्योगों का योगदान राष्ट्रीय उत्पादन में 12%, देश के निर्यात में 20%, रोज़गार में 27% और औद्योगिक उत्पाद में 41% है। ये उद्योग स्थानीय संसाधनों और कौशल का उपयोग करते हैं।
उत्तर प्रदेश कुटीर उद्योग उपसमिति 1947 का मानना था कि "बेरोज़गारी से लड़ने और कृषि क्षेत्र में पूरी और आंशिक रूप से बेकार पड़ी आबादी का उपयोग करने का एकमात्र तरीका कुटीर एवं लघु उद्योगों का विकास है।"
इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि कुटीर व लघु उद्योगों का भविष्य आमतौर पर उज्ज्वल है, लेकिन अर्थव्यवस्था में उदारीकरण की नीति के कारण बड़ी संख्या में विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से भारत के कुटीर व लघु उद्योगों के लिए खतरा पैदा हो गया है, क्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की उन्नत तकनीक के कारण भारतीय लघु व कुटीर उद्योग प्रतियोगिता में टिक नहीं सकते। फलस्वरूप, अब इनका भविष्य उज्ज्वल नहीं है।
In simple words: लघु और कुटीर उद्योग देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये रोज़गार देते हैं, आय बढ़ाते हैं और कम पूँजी में शुरू हो सकते हैं। ये आत्मनिर्भरता बढ़ाने और आर्थिक असमानता कम करने में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: लघु और कुटीर उद्योगों के महत्त्व को लिखते समय रोज़गार सृजन, कम पूँजी की आवश्यकता, ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भरता जैसे प्रमुख बिंदुओं को अवश्य शामिल करें। उनकी परिभाषाओं में निवेश सीमा और उत्पादन के तरीकों का उल्लेख करें।
Question 5. अकुशलता एवं अल्प-उत्पादकता के कारणों का वर्णन कीजिए ।
Answer: भारतीय उद्योग विकसित देशों की तुलना में बहुत कम कुशल और पिछड़े हुए हैं। उनकी उत्पादकता भी कम है। इस अकुशलता और कम उत्पादकता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. पूँजी का अभाव: उद्योगों को स्थापित करने के लिए पर्याप्त धन की ज़रूरत होती है, जिसकी भारत में हमेशा कमी रही है। यहाँ के लोगों का जीवन-स्तर और प्रति व्यक्ति आय कम होने के कारण बचत और निवेश की मात्रा बहुत कम है, इसलिए पूँजी की कमी के कारण भारतीय उद्योग पिछड़े हुए हैं। पर्याप्त पूँजी के बिना उद्योग आधुनिक तकनीक और विस्तार में निवेश नहीं कर पाते।
2. शक्ति के साधनों की कमी: भारतीय उद्योगों के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण बिजली और ऊर्जा के साधनों की अपर्याप्तता है। शक्ति के तीन मुख्य साधन कोयला, पेट्रोलियम और जल-विद्युत माने जाते हैं। भारत में अच्छी गुणवत्ता वाले कोयले की कमी है और जल-संसाधनों का भी सही उपयोग नहीं हो पाया है। जल-विद्युत की कमी और पेट्रोलियम उत्पादों का विदेशों से आयात भारतीय उद्योगों के पिछड़ेपन के लिए काफी हद तक ज़िम्मेदार है।
3. आधुनिक मशीनों का अभाव: भारत में आधुनिक मशीनों की कमी है और पुरानी मशीनों से बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं हो पाता है। इससे भी उद्योगों में कमी आई है।
4. तकनीकी कर्मचारियों की कमी: भारत में अभी भी उच्चकोटि के तकनीकी प्रशिक्षण की सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए, तकनीकी विशेषज्ञों को विदेशों में भेजा जाता है, लेकिन उनमें से बहुत कम ही विशेषज्ञ तकनीकी शिक्षा प्राप्त करके अपने देश लौटते हैं। इस कमी के कारण भी उद्योग विकसित नहीं हो पाते हैं।
5. सक्षम उद्यमियों का अभाव: भारत में औद्योगिक विकास और उद्योगों के पिछड़ेपन के लिए एक बड़ा कारण सक्षम उद्यमियों की कमी भी है। आज भी देश में कुछ ही गिने-चुने उद्योगपति ऐसे हैं, जो बड़े उद्योगों को चला रहे हैं।
6. परिवहन व संचार के साधनों का अविकसित होना: दूसरे देशों की तुलना में अविकसित परिवहन और संचार के साधनों ने भी भारतीय उद्योगों के स्तर को कम रखा है।
7. औद्योगिक रुग्णता: भारत में औद्योगिक क्षेत्र की समस्याओं में एक प्रमुख समस्या औद्योगिक रुग्णता (बीमारी) है। बीमार इकाइयों में लगातार पैसे के बहाव से बैंकिंग संसाधनों का दुरुपयोग होता है और सरकार का खर्च भी बढ़ता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2000 तक देश में तीन लाख से ज़्यादा छोटे औद्योगिक इकाइयाँ बीमार थीं, जिनमें सबसे ज़्यादा 27,000 बिहार में और लगभग 21,000 उत्तर प्रदेश में थीं।
8. विदेशी शासन: भारत के औद्योगिक रूप से पिछड़े होने का मुख्य कारण लंबे समय तक विदेशी शासन का होना है। विदेशी शासन का मुख्य उद्देश्य भारत को कच्चे माल का निर्यात करना और तैयार माल का आयात करना था। अंग्रेजों ने अपने देश के उद्योगों को बचाने के लिए भेदभावपूर्ण संरक्षण नीति अपनाई और भारत के औद्योगिक विकास को रोक दिया।
9. प्रतिकूल सामाजिक वातावरण: भारत में औद्योगिक पिछड़ेपन का एक कारण प्रतिकूल सामाजिक वातावरण भी है। यहाँ जाति-प्रथा, संयुक्त परिवार-प्रणाली और धार्मिक अंधविश्वास जैसे सामाजिक तत्व औद्योगिक विकास में हमेशा बाधा बने रहे हैं। संयुक्त परिवार-प्रणाली ने व्यक्तिगत प्रेरणा को दबाया है और आगे बढ़ने से रोका है। इसी तरह जाति-प्रथा और संयुक्त परिवार-प्रणाली ने श्रमिकों की गतिशीलता में बाधाएँ डाली हैं। उत्तराधिकार नियमों के तहत संपत्ति के बँटवारे की प्रथा ने पूँजी को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट दिया है, जिससे पूँजी इकट्ठा करने में मुश्किल होती है।
10. उद्योगों को असन्तुलित विकास: भारत के सभी राज्यों में और ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों का विकास संतुलित और आनुपातिक रूप से नहीं हो पाया है। इस कारण भी उद्योगों में कार्यक्षमता और उत्पादकता का स्तर कम हुआ है। [उत्पादकता बढ़ाने के उपाय - इसके लिए विस्तृत उत्तरीय संख्या 7 के अंतर्गत देखें।]
In simple words: भारतीय उद्योगों की कम उत्पादकता के मुख्य कारण पूँजी की कमी, ऊर्जा की कमी, पुरानी मशीनें, कुशल कर्मचारियों की कमी और खराब सामाजिक माहौल हैं। विदेशी शासन और परिवहन की समस्याएँ भी इसमें शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: अकुशलता और अल्प-उत्पादकता के कारणों को सूचीबद्ध करते समय आर्थिक (पूँजी, शक्ति), तकनीकी (मशीनें, कर्मचारी) और सामाजिक (वातावरण, उद्यमशीलता) कारकों को अलग-अलग श्रेणी में सोचें।
Question 6. भारत में औद्योगिक विकास की प्रमुख समस्याओं के बारे में विस्तार से लिखिए।
Answer: आज़ादी से पहले भारत में उतना औद्योगिक विकास नहीं हो सका जितना ज़रूरी था। इसका मुख्य कारण ब्रिटिश सरकार की भारत पर थोपी गई गलत आर्थिक नीतियाँ थीं। आज़ादी के बाद भारत सरकार ने इस पर विशेष ध्यान दिया। सन् 1948 में संसद में भारत सरकार की पहली औद्योगिक नीति की घोषणा की गई, जिसमें समय-समय पर बदलाव होते रहे। दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-61 ई०) में भारत में बड़े और आधारभूत उद्योगों की स्थापना पर विशेष ज़ोर दिया गया। 60 साल से लगातार औद्योगिक विकास पर ज़ोर देने के बावजूद भारत आज भी औद्योगिक रूप से पिछड़ा हुआ है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. प्रौद्योगिकी सुधार के लिए प्रेरणाओं का अभाव: भारतीय उत्पादन तकनीक अभी भी पुरानी है। भारतीय उद्यमी नई तकनीक अपनाने के लिए पर्याप्त रूप से प्रेरित नहीं हो पाते। इसका कारण अभी भी पर्याप्त नियंत्रणों का होना है।
2. स्थापित क्षमता का पूर्ण उपयोग न होना: कई उद्योग अपनी स्थापित क्षमता के 50 प्रतिशत हिस्से का भी उपयोग नहीं कर पाते, जिससे बर्बादी बढ़ती है।
3. पूँजीगत व्ययों में वृद्धि: भारतीय उद्योगों में पूँजीगत खर्च बहुत ज़्यादा होते हैं, जिसके कारण इन उद्योगों की लाभ कमाने की क्षमता कम हो गई है।
4. अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रमों का अभाव: उद्योगों का आकार छोटा होने और पैसों की कमी के कारण इन उद्योगों में अनुसंधान और विकास कार्यक्रम नहीं हो पाते हैं।
5. अनुत्पादक व्ययों की अधिकता: भारतीय उद्योगों में ऐसे खर्च ज़्यादा होते हैं जिनसे उत्पादन नहीं बढ़ता, जिसका असर लागत में वृद्धि और उत्पादकता में कमी के रूप में पड़ता है।
6. उपक्रमों के निर्माण में देरी: देश में उद्योगों की स्थापना में तय समय से ज़्यादा समय लगता है। इससे इन उद्योगों की कार्यकुशलता पर बुरा असर पड़ता है और इनकी निर्माण लागत भी बढ़ जाती है।
7. वित्तीय सुविधाओं का अपर्याप्त होना: भारत में औद्योगिक बैंकों की पर्याप्त संख्या में स्थापना न हो पाने से भी उद्योगों को समय पर पैसों की मदद नहीं मिल पाती।
8. श्रम प्रबन्ध संघर्ष: भारत में औद्योगिक संबंध अच्छे नहीं रहे हैं और आए दिन हड़तालें व तालाबंदी होती रहती हैं। इसका औद्योगिक उत्पादकता पर बुरा असर पड़ता है। उद्योगों के विकास में शांतिपूर्ण माहौल बहुत ज़रूरी होता है।
In simple words: भारत में औद्योगिक विकास की मुख्य समस्याएँ पुरानी तकनीक, कम क्षमता का उपयोग, ज़्यादा खर्च, शोध की कमी, पैसों की कमी और मज़दूर-मालिक के झगड़े हैं। ब्रिटिश नीतियों का प्रभाव भी एक ऐतिहासिक कारण रहा है।
🎯 Exam Tip: औद्योगिक विकास की समस्याओं को बताते समय ध्यान रखें कि वे सिर्फ़ वित्तीय या तकनीकी ही नहीं, बल्कि प्रबंधन और नीतिगत कमियाँ भी होती हैं। समस्याओं को हमेशा समाधानों से जोड़ने का प्रयास करें।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 7. लघु उद्योग से आप क्या समझते हैं ? भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों की किन्हीं चार समस्याओं की विवेचना कीजिए। [2013, 17]
Answer:
लघु उद्योग:
लघु उद्योगों को मशीनों और संयंत्रों में किए गए निवेश के आधार पर परिभाषित किया जाता है। पहले Rs. 25 लाख तक की लागत वाले उद्योग लघु पैमाने के उद्योग कहलाते थे। सन् 1991 में, लघु उद्योगों में निवेश की सीमा Rs. 60 लाख, सहायक उद्योगों में Rs. 75 लाख और बहुत छोटे इकाइयों में Rs. 5 लाख रखी गई थी। बाद में, लघु उद्योगों और सहायक उद्योगों की निवेश सीमा बढ़ाकर Rs. 3 करोड़ और बहुत छोटे इकाइयों की निवेश सीमा को बढ़ाकर Rs. 25 लाख कर दिया गया। वर्तमान में, लघु उद्योगों में निवेश की सीमा Rs. 1 करोड़ है। ये उद्योग मशीनी शक्ति का उपयोग करते हैं और बड़े उद्योगों के लिए पुर्जे भी बनाते हैं। ये घर पर नहीं, बल्कि अन्य जगहों पर स्थापित किए जाते हैं और पूरे समय काम करते हैं। इन उद्योगों में वेतनभोगी मजदूर काम करते हैं। लघु उद्योग व्यापक क्षेत्रों की माँग को पूरा करने के लिए उत्पादन करते हैं। उदाहरण के लिए, इनमें मिक्सी, ट्रांजिस्टर, खिलौने आदि जैसी आधुनिक वस्तुएँ बनाई जाती हैं। इन उद्योगों का देश की आर्थिक वृद्धि में अहम योगदान होता है।
लघु उद्योगों की चार समस्याएँ निम्नलिखित हैं:
1. कच्चे माल का अभाव: इन उद्योगों को पर्याप्त मात्रा में अच्छा कच्चा माल नहीं मिल पाता। जो मिलता भी है, वह अच्छी गुणवत्ता का नहीं होता।
2. वित्त की समस्या: भारतीय कारीगर बहुत गरीब होते हैं और अपनी गरीबी के कारण ज़रूरी पैसा इकट्ठा नहीं कर पाते। साहूकार और महाजन उनका मनचाहा शोषण करते हैं।
3. परम्परागत उपकरण व उत्पादन विधियाँ: ज़्यादातर कारीगर उत्पादन के काम में पुराने उपकरण और पुरानी उत्पादन पद्धतियों का ही इस्तेमाल करते हैं। इसके कारण उत्पादन कम होता है और बनी हुई चीजें घटिया किस्म की होती हैं।
4. विक्रय सम्बन्धी समस्याएँ: इन उद्योगों द्वारा बनाई गई वस्तुएँ अक्सर एक जैसी नहीं होतीं। बिचौलियों के कारण इन कारीगरों को सही दाम नहीं मिलते और ज़्यादा लागत के कारण इन वस्तुओं का बिक्री मूल्य ज़्यादा होता है, जिससे वे प्रतियोगिता में टिक नहीं पाते।
समस्याओं के समाधान हेतु सुझाव:
भारत में लघु एवं कुटीर उद्योगों की समस्याओं को हल करने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं:
1. शिल्पकारों को सहकारिता के आधार पर संगठित किया जाए, जिससे उनकी सामूहिक खरीदने की शक्ति बढ़ सके।
2. विभिन्न स्रोतों से कच्चा माल खरीदने के लिए पर्याप्त मात्रा में लोन सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
3. माल के खरीदने-बेचने में इन उद्योगों को प्राथमिकता दी जाए।
4. सहकारी विपणन समितियों की स्थापना की जाए।
5. उत्पादन लागत में कमी और बनी हुई वस्तु की गुणवत्ता में सुधार के लिए कोशिशें की जाएँ।
6. शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुसंधान की सुविधाओं का विस्तार किया जाए।
7. उत्पादकों को नए उपकरण इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
8. इन उद्योगों पर से टैक्स कम किया जाए।
9. कुटीर उद्योगों के विकास की संभावनाओं का पता लगाने के लिए बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण कराए जाएँ।
10. इन उद्योगों के लिए आरक्षित मदों की सूची का हर साल निरीक्षण किया जाए।
सच तो यह है कि अगर हमें तेज़ी से आर्थिक विकास करना है और अपनी लगातार बढ़ती श्रम-शक्ति को काम देना है, तो हमें अपने भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री वी. वी. गिरि के 'घर-घर में गृह उद्योग' के नारे को सार्थक करना होगा।
In simple words: लघु उद्योग वे हैं जिनमें निश्चित पूँजी निवेश होता है और वे घर के बाहर मशीनों से काम करते हैं। इनकी मुख्य समस्याएँ कच्चे माल की कमी, पैसों की कमी, पुरानी तकनीक और बिक्री में दिक्कतें हैं।
🎯 Exam Tip: लघु उद्योगों की समस्याओं को बताते समय उन कारणों पर ध्यान दें जो उनके संचालन को सीधे प्रभावित करते हैं, जैसे वित्तीय कमी और तकनीकी पिछड़ेपन। समाधानों में सरकारी समर्थन और संगठनात्मक प्रयासों को शामिल करें।
Question 8. लघु उद्योग एवं भारी उद्योग में अन्तर स्पष्ट कीजिए तथा भारत में किसी एक भारी उद्योग के महत्त्व को लिखिए। [2010]
Answer:
लघु उद्योग एवं भारी उद्योग में अन्तर:
| क्र० सं० | अन्तर का आधार | लघु उद्योग | भारी उद्योग |
|---|---|---|---|
| 1. | पूँजी की मात्रा | 17 फरवरी, 1999 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लघु उद्योगों की पूँजी निवेश की सीमा Rs. 1 करोड़ कर दी थी। | भारी उद्योगों की कोई ऊपरी सीमा नहीं होती, क्योंकि इनमें बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है और भारी मशीनरी का प्रयोग होता है। इनमें पूँजी-निवेश अरबों रुपयों में होता है। |
| 2. | स्थापना | लघु उद्योग घर से बाहर भी स्थापित किए जा सकते हैं। इनके लिए कम जगह की ज़रूरत होती है। | इनका कार्य-स्थल विशाल होता है, इस कारण ये वहीं स्थापित किए जाते हैं, जहाँ विशाल जगह उपलब्ध हो और भविष्य की विस्तार-योजनाओं को भी लागू किया जा सके। |
| 3. | स्थान | लघु उद्योग मुख्यतया शहरों तथा कस्बों में लगाए जाते हैं। | इनका कार्य-स्थल विशाल होता है। इस कारण ये शहरों से दूर ऐसे स्थानों पर लगाए जाते हैं, जहाँ विस्तृत भूमि इनके लिए कच्चा माल तथा शक्ति के साधन उपलब्ध हों; जैसे-लौह-इस्पात के कारखाने। |
| 4. | यन्त्रों की किस्म | इनमें मध्यम आकार की मशीनों तथा चालक शक्ति के साथ-साथ मानव संसाधनों का भी भरपूर प्रयोग किया जाता है। | इनमें कार्य बड़ी-बड़ी मशीनों से किया जाता है तथा ये यान्त्रिक शक्ति, विद्युत शक्ति तथा ताप शक्ति से चलते हैं। |
| 5. | उत्पाद | लघु उद्योगों में छोटी-छोटी आधुनिक वस्तुएँ; जैसे मिक्सी, ट्रांजिस्टर, खिलौने आदि के साथ-साथ बड़े पैमाने के उद्योगों में काम आने वाले पुर्जे भी बनाए जाते हैं; जैसे कारों के बम्पर आदि। | इनके उत्पाद अच्छी गुणवत्ता के होते हैं तथा देशीय और अन्तर्राष्ट्रीय माँगों को पूरा करने वाले होते हैं; जैसे सीमेण्ट, लौह-इस्पात, वस्त्र, औद्योगिक उपकरण। इन उद्योगों का देश के विकास में योगदान रहता है। |
| 6. | माँग का स्वभाव | लघु उद्योग अधिकतर व्यापक क्षेत्रों की माँग को पूरा करने के लिए उत्पादन करते हैं; जैसे ऊनी कपड़े, ताले आदि। | बड़े पैमाने के उद्योग सभी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। देश की अर्थव्यवस्था और विकास में इनका विशेष स्थान होता है। |
| 7. | आरक्षण | वर्ष 2001-02 के बजट के बाद, लघु उद्योग के लिए आरक्षित उत्पादों की संख्या लगभग 800 थी। | बड़े पैमाने के क्षेत्रों के लिए कोई उत्पाद आरक्षित नहीं है। इसके विपरीत, इनको 5 प्रकार के उद्योगों के लिए लाइसेंस लेना ज़रूरी है, जिनमें ऐल्कोहॉल युक्त पेय, सिगरेट तथा खतरनाक रसायन शामिल हैं। |
भारी उद्योग का महत्त्व (उपयोगिता)-सीमेण्ट उद्योग:
भारत में निर्माण कार्य बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। चारों ओर भवन-निर्माण, बाँध, पुल, उद्योग-धंधे और सड़क बनाने के काम हो रहे हैं, जिनमें सीमेण्ट की बहुत ज़्यादा ज़रूरत होती है। देश में विकास कार्य तेज़ी से हो रहे हैं, इसलिए सीमेण्ट की माँग भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ रही है। भवन निर्माण के लिए इस्तेमाल होने वाले पदार्थों में सीमेण्ट सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। लोहे के साथ सीमेण्ट का उपयोग करने से भवन टिकाऊ और मज़बूत बनते हैं। इसी कारण सीमेण्ट उद्योग आज भारत का एक विकसित और महत्वपूर्ण उद्योग बन गया है। सीमेण्ट का भारत के नए निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। यह कई उद्योगों के विकास की कुंजी है। इसका उत्पादन और उपयोग देश के विकास का एक पैमाना है। वर्ष 2010-11 के दौरान सीमेण्ट का उत्पादन (अप्रैल, 2011 से मार्च, 2012 तक) 224.49 मिलियन टन हुआ और 2010-11 की इसी अवधि की तुलना में 6.55 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। भारत में सीमेण्ट उद्योग के विकास के लिए निम्नलिखित कारण ज़िम्मेदार रहे हैं:
1. देश में सीमेण्ट उद्योग के लिए पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल उपलब्ध है।
2. सीमेण्ट उद्योग में उपयोग होने वाली मशीनों का निर्माण देश में ही किया जाने लगा है।
3. देश में बढ़ते हुए निर्माण कार्यों (सड़कों, बाँधों, भवनों और उद्योगों आदि) में इस्पात और सीमेण्ट की माँग लगातार बढ़ रही है।
4. विदेशों से सीमेण्ट आयात करने में खर्च होने वाली महंगी विदेशी मुद्रा को बचाने के लिए घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना बहुत ज़रूरी है।
5. देश में सीमेण्ट उद्योग की स्थापना के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध हैं।
6. सरकार की उदार औद्योगिक नीति के कारण सीमेण्ट उत्पादन में छोटे संयंत्रों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया गया है, क्योंकि इन संयंत्रों को मध्यम आर्थिक स्थिति वाले पूँजीपति भी चला सकते हैं।
इस प्रकार, यह साफ है कि भारत में सीमेण्ट उद्योग का भविष्य उज्ज्वल है, क्योंकि देश में निर्माण का काम तेज़ी से चल रहा है।
In simple words: लघु उद्योग छोटे स्तर पर होते हैं, कम पूँजी और जगह लेते हैं, जबकि भारी उद्योग बड़े होते हैं, ज़्यादा पूँजी और जगह लेते हैं। सीमेण्ट उद्योग एक भारी उद्योग है जो देश के निर्माण कार्यों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और इसका भविष्य उज्ज्वल है।
🎯 Exam Tip: लघु और भारी उद्योगों के बीच अंतर बताते समय, पूँजी, स्थान, उत्पादन का पैमाना और मशीनों के उपयोग जैसे विशिष्ट पहलुओं को हाइलाइट करें। किसी एक भारी उद्योग के महत्व को स्पष्ट उदाहरणों के साथ समझाएँ।
Question 9. कृषि तथा उद्योगों की पारस्परिक निर्भरता का वर्णन कीजिए। [2013, 16]
Answer: कृषि और उद्योग किसी भी देश के आर्थिक विकास के दो बहुत ज़रूरी क्षेत्र हैं। देश की आर्थिक प्रगति तभी संभव है, जब कृषि और उद्योग दोनों ही क्षेत्र एक-दूसरे के साथ विकसित हों। इसका मुख्य कारण यह है कि कृषि और उद्योग एक-दूसरे के पूरक हैं। कृषि की तरक्की उद्योगों के विकास में मदद करती है और औद्योगिक प्रगति कृषि को विकास के शिखर पर पहुँचाने में सहायता करती है। पंडित जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में, "कृषि के विकास के बिना औद्योगिक प्रगति नहीं की जा सकती। वास्तव में, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं।"
कृषि एवं उद्योग दोनों ही व्यवसाय की श्रेणी में आते हैं। कृषि एक प्राथमिक व्यवसाय है, जिसमें प्राकृतिक साधनों से उपयोगी चीजें मिलती हैं। उद्योग द्वितीयक व्यवसाय है, जिसमें प्राकृतिक साधनों को विज्ञान और तकनीक से आर्थिक साधनों में बदला जाता है। उद्योग और कृषि दोनों ही भारतीय अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। यही कारण है कि पहली पंचवर्षीय योजना में कृषि को प्राथमिकता दी गई थी, जबकि दूसरी पंचवर्षीय योजना में उद्योगों को प्राथमिकता दी गई। उद्योग और कृषि अर्थव्यवस्था रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं। जिस तरह एक पहिए पर गाड़ी नहीं चल सकती, उसी तरह केवल कृषि या केवल उद्योग के आधार पर अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती।
कृषि व उद्योग एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। कृषि में प्राकृतिक साधनों से वस्तुएँ मिलती हैं और उद्योगों द्वारा उन्हें उपयोगी वस्तुओं में बदल दिया जाता है। उदाहरण के लिए, कृषि से कपास मिलता है और सूती वस्त्र उद्योग इस कपास से विभिन्न प्रकार के सूती वस्त्र बनाता है। कृषि उपज उद्योग के लिए कच्चा माल देती है।
कृषि कई तरह से उद्योगों पर निर्भर करती है। कृषि के आधुनिकरण के लिए कई तरह के उपकरण, मशीनें और साधनों की ज़रूरत होती है। कृषि को ये उपकरण, ट्रैक्टर, मशीनें इंजीनियरिंग उद्योग से मिलते हैं। अगर इंजीनियरिंग उद्योग न होता तो शायद कृषि का आधुनिकरण नहीं हो पाता। कृषि का उत्पादन बढ़ाने के लिए कई तरह के खादों की ज़रूरत होती है। हालाँकि प्राकृतिक खादें भी कृषि में उपयोग होती हैं, लेकिन आधुनिक समय में उत्पादन बढ़ाने के लिए रासायनिक खादों का उपयोग ज़्यादा होता है। कृषि को ये खादें उर्वरक उद्योग से ही मिलती हैं।
कृषि भी उद्योगों के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कृषि के लिए उद्योग। कृषि उद्योगों को कच्चा माल देती है। उदाहरण के लिए, कृषि से कपास मिलती है तो उद्योग द्वारा उसके सूती वस्त्र बनाए जाते हैं। कृषि से गन्ना मिलता है तो उद्योग द्वारा उसकी चीनी बनाई जाती है। इसी प्रकार, कृषि से जूट मिलता है तो उद्योग द्वारा उस जूट से कई प्रकार की वस्तुएँ बनाई जाती हैं। आज भारत का सूती वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योग और जूट उद्योग पूरी तरह से कृषि पर निर्भर है। कृषि के बिना इन उद्योगों का अस्तित्व भी संभव नहीं है। इतना ही नहीं, उद्योगों के स्थानीयकरण में भी कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उदाहरण के लिए, कपास की अधिकता के कारण महाराष्ट्र और गुजरात में सूती वस्त्र उद्योग का, गन्ने की अधिकता के कारण उत्तर प्रदेश में चीनी उद्योग का और जूट की अधिकता के कारण पश्चिम बंगाल में जूट उद्योग का स्थानीयकरण हो गया है।
आज कृषि की कई शाखाएँ उद्योगों का रूप लेती जा रही हैं। उदाहरण के लिए, दुग्ध उद्योग, मत्स्य पालन उद्योग, मुर्गी पालन उद्योग आदि। भारत में कृषि और उद्योग दोनों के महत्व को देखते हुए दोनों के विकास पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है। कृषि में एक निश्चित सीमा तक भारत ने आत्मनिर्भरता पा ली है और उद्योगों में भी भारत आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लगातार कोशिश कर रहा है। कृषि और उद्योग का यह संबंध दोनों क्षेत्रों के लिए विकास और स्थिरता सुनिश्चित करता है।
In simple words: कृषि और उद्योग एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। कृषि उद्योगों को कच्चा माल देती है, और उद्योग कृषि को आधुनिक उपकरण और खाद देते हैं। दोनों का साथ में विकास देश की अर्थव्यवस्था के लिए ज़रूरी है।
🎯 Exam Tip: कृषि और उद्योगों की पारस्परिक निर्भरता समझाते समय यह स्पष्ट करें कि कैसे कृषि कच्चे माल और बाज़ार प्रदान करती है, और कैसे उद्योग कृषि को मशीनरी और आधुनिक इनपुट देते हैं। नेहरू के कथन का उल्लेख करने से उत्तर प्रभावशाली बनता है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. भारत में वर्तमान औद्योगिक ढाँचे के गठन का वर्णन कीजिए।
Answer:
औद्योगिक ढाँचे से क्या आशय है ?
औद्योगिक ढाँचे से मतलब यह समझना है कि देश में किस प्रकार के उद्योग स्थापित हैं। भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था चलती है। यहाँ सरकारी (सार्वजनिक) और निजी क्षेत्र साथ-साथ पाए जाते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों पर सरकार का पूरा नियंत्रण होता है। इनका लक्ष्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाना और सामाजिक हित पूरा करना होता है। निजी क्षेत्र के उद्योगों पर कुछ व्यक्तियों या समूहों का नियंत्रण होता है और वे अपने निजी फायदे के लिए काम करते हैं। इनका लक्ष्य ज़्यादा से ज़्यादा लाभ कमाना होता है।
भारत में औद्योगिक ढाँचे का निर्माण 1956 में नई औद्योगिक नीति के अनुसार किया गया था। इस नीति के तहत, सार्वजनिक क्षेत्र में 17 आधारभूत और भारी उद्योग शामिल थे; जैसे-हथियार और गोला-बारूद, परमाणु शक्ति, लोहा और इस्पात, भारी मशीनरी, भारी बिजली-संयंत्र, कोयला, खनिज तेल, खनिज लोहा, हवाई जहाज, हवाई सेवा, रेलवे, जहाज-निर्माण, टेलीफोन और तार आदि। इन सभी पर सरकार का नियंत्रण था। 26 मार्च, 1993 से 13 उद्योगों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया है। वर्तमान में केवल 4 उद्योगों पर ही सरकार का नियंत्रण है।
दूसरी श्रेणी में 12 उद्योग आते हैं, जिन्हें संयुक्त क्षेत्र के उद्योग कहते हैं। इन पर राज्य और निजी कंपनियों का साझा नियंत्रण रहता है। ऊपर बताए गए उद्योगों के अलावा बाकी सभी उद्योग निजी क्षेत्र के लिए छोड़ दिए गए हैं। निजी क्षेत्र की यह ज़िम्मेदारी है कि वह सरकार के इन कामों में मदद करे। इस श्रेणी में मशीन-टूल, उर्वरक, सड़क यातायात, समुद्री यातायात, एल्यूमीनियम, कृत्रिम रबड़ आदि उद्योग शामिल हैं। उद्योगों की तेज़ी से तरक्की के लिए सरकार निजी क्षेत्र को सहायता देती है और दिशा-निर्देश भी जारी करती है।
भारतीय उद्योगों को तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है-
1. बड़े पैमाने के उद्योग
2. लघु पैमाने के उद्योग तथा
3. कुटीर या घरेलू उद्योग।
In simple words: भारत का औद्योगिक ढाँचा बताता है कि यहाँ सार्वजनिक और निजी दोनों तरह के उद्योग हैं। सरकार मुख्य उद्योगों को नियंत्रित करती है, जबकि निजी उद्योग लाभ के लिए काम करते हैं। उद्योगों को बड़े, लघु और कुटीर वर्गों में बांटा गया है।
🎯 Exam Tip: औद्योगिक ढाँचे का वर्णन करते समय सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के स्वामित्व और उद्देश्यों के अंतर पर विशेष ध्यान दें। प्रमुख औद्योगिक नीतियों और उद्योगों के वर्गीकरण को याद रखें।
Question 2. बड़े पैमाने के उद्योगों का वर्गीकरण कीजिए। प्रत्येक के उदाहरण भी दीजिए ।
Answer: बड़े पैमाने के उद्योगों को वस्तुओं की प्रकृति के अनुसार निम्नलिखित चार भागों में बाँटा जा सकता है:
1. आधारभूत उद्योग: आधारभूत उद्योग वे उद्योग हैं, जो अर्थव्यवस्था के सभी महत्वपूर्ण उद्योगों और कृषि को ज़रूरी सामग्री (इनपुट) देते हैं। ये दूसरे उद्योगों और कृषि में काम आने वाली वस्तुएँ बनाते हैं; जैसे-कोयला, कच्चा लोहा, इस्पात, उर्वरक, कास्टिक सोडा, सीमेण्ट, स्टील, एल्यूमीनियम, बिजली आदि। ये उद्योग देश के बुनियादी ढाँचे के लिए महत्वपूर्ण हैं।
2. पूँजीगत वस्तु उद्योग: इन उद्योगों में वे वस्तुएँ बनती हैं, जो अन्य वस्तुएँ बनाने में मदद करती हैं; जैसे-मशीनें और अन्य संयंत्र आदि। ये उद्योग निजी क्षेत्र में हैं। इन उद्योगों में मशीनी औजार, ट्रैक्टर, बिजली के ट्रांसफार्मर, मोटर-वाहन आदि शामिल हैं। ये उद्योग सीधे उपभोक्ता को नहीं, बल्कि दूसरे उद्योगों को सामान देते हैं।
3. मध्यवर्ती वस्तु उद्योग: ये उद्योग ऐसी वस्तुएँ बनाते हैं जो दूसरे उद्योगों की उत्पादन प्रक्रिया में इस्तेमाल होती हैं या उद्योगों में पूँजीगत वस्तुओं के सहायक उपकरणों के तौर पर प्रयोग होती हैं; जैसे-ऑटोमोबाइल टायर्स और पेट्रोलियम रिफाइनरी उद्योग। ये उत्पादन प्रक्रिया के बीच के चरणों को पूरा करते हैं।
4. उपभोक्ता वस्तु उद्योग: इन उद्योगों में वे वस्तुएँ बनती हैं, जिनका सीधे उपभोक्ता इस्तेमाल करते हैं; जैसे-कपड़ा, चीनी, कागज, रेडियो, टीवी आदि। ये उद्योग रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करते हैं।
In simple words: बड़े उद्योग चार तरह के होते हैं: आधारभूत (जो दूसरे उद्योगों को कच्चा माल दें), पूँजीगत (जो मशीनें बनाएं), मध्यवर्ती (जो बीच के उत्पाद बनाएं) और उपभोक्ता (जो सीधे ग्राहक के लिए सामान बनाएं)।
🎯 Exam Tip: उद्योगों के वर्गीकरण में हर श्रेणी के उदाहरण ज़रूर दें। इससे आपकी समझ स्पष्ट होती है और उत्तर अधिक प्रभावी बनता है।
Question 3. आधारभूत उद्योग किसे कहते हैं? स्पष्ट कीजिए। [2009]
Answer: आधारभूत उद्योग बड़े पैमाने के वे उद्योग हैं, जो सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों को ज़रूरी इनपुट प्रदान करते हैं; जैसे-कोयला, लोहा, सीमेण्ट तथा स्टील। ये उद्योग देश के आर्थिक विकास के लिए बुनियादी ढाँचा तैयार करते हैं।
कोयला उद्योग दूसरे उद्योगों; जैसे-इस्पात उद्योग, विद्युत उत्पादन, रेल इंजन तथा शक्ति साधनों के रूप में आधारभूत उद्योग की भूमिका निभाता है। इसी प्रकार मशीनरी उद्योग, रेल उद्योग, मोटरकार उद्योग आदि लोहा उद्योग पर आधारित हैं। सीमेण्ट उद्योग भी भवन-निर्माण उद्योग और सड़क निर्माण आदि को आधार प्रदान करता है। ये उद्योग अन्य उद्योगों के विकास की नींव रखते हैं।
In simple words: आधारभूत उद्योग वे होते हैं जो दूसरे सभी ज़रूरी उद्योगों को कच्चा माल और बुनियादी चीजें देते हैं, जैसे कोयला, लोहा और सीमेण्ट। ये किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की नींव होते हैं।
🎯 Exam Tip: आधारभूत उद्योगों को परिभाषित करते समय "बुनियादी" या "नींव" वाले उद्योग के रूप में उनके महत्व पर ज़ोर दें और उदाहरण के साथ समझाएँ कि वे कैसे अन्य उद्योगों को समर्थन देते हैं।
Question 4. भारत में लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता किन कारणों से है ?
Answer: एक करोड़ रुपये तक की लागत (संयंत्र तथा मशीनरी) वाले उद्योग लघु पैमाने के उद्योग कहलाते हैं। भारत में इन उद्योगों को विकसित करने के लिए प्रोत्साहन देने की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से है:
1. छोटे पैमाने के उद्योग कम पूँजी से शुरू हो जाते हैं और इनमें बहुत से लोगों को रोज़गार भी मिल जाता है।
2. छोटे पैमाने के उद्योगों द्वारा धन कुछ ही लोगों के हाथ में केंद्रित नहीं होता और साथ ही औद्योगिक शक्ति भी कई हाथों में बंटी रहती है, जिससे आर्थिक असमानता कम होती है।
3. छोटे पैमाने के उद्योगों का पिछड़े इलाकों के लिए विशेष महत्व होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे उद्योगों को स्थापित करना आसान रहता है। इन उद्योगों द्वारा जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों का विकास होता है, वहीं ग्रामीण लोगों को रोज़गार पाने के लिए अपना गाँव छोड़कर शहरों की ओर भागना नहीं पड़ता। लघु उद्योग स्थानीय संसाधनों और कौशल का उपयोग करते हैं।
In simple words: लघु उद्योगों को बढ़ावा देना ज़रूरी है क्योंकि इन्हें कम पूँजी में शुरू किया जा सकता है, ये रोज़गार देते हैं, धन को कुछ हाथों में केंद्रित होने से रोकते हैं, और ग्रामीण व पिछड़े इलाकों के विकास में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: लघु उद्योगों के प्रोत्साहन के कारणों को बताते समय हमेशा रोज़गार सृजन, कम पूंजी की आवश्यकता और क्षेत्रीय विकास जैसे प्रमुख सामाजिक-आर्थिक लाभों पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 5. लघु उद्योगों के विकास हेतु कोई दो सुझाव दीजिए।
Answer: योजनाकाल में कुटीर उद्योगों के विकास के लिए निम्नलिखित कदम उठाये गये:
1. मंडलों तथा निगमों की स्थापना: कुटीर उद्योगों के विकास के लिए कई अखिल भारतीय मंडलों की स्थापना की गई, जैसे-केंद्रीय रेशम मंडल (1949), अखिल भारतीय कुटीर उद्योग मंडल (1950), अखिल भारतीय दस्तकारी मंडल (1952), अखिल भारतीय करघा मंडल (1952), अखिल भारतीय खादी तथा ग्रामोद्योग मंडल (1953) आदि। इसी प्रकार कई निगम भी स्थापित किए गए; जैसे-राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (1955), भारतीय दस्तकारी विकास निगम (1958), दस्तकारी और हथकरघा निगम आदि। ये संस्थाएँ उद्योगों को नीतिगत और वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं।
2. वित्तीय सहायता: लघु उद्योगों को सरकारी सहायता अधिनियम के तहत लोन दिया जाता है। इसके अलावा भारतीय स्टेट बैंक, राज्य वित्त निगम, राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम तथा राष्ट्रीयकृत बैंकों द्वारा कुटीर व लघु उद्योगों को लोन दिया जाता है। यह वित्तीय सहायता उन्हें अपनी गतिविधियों को बढ़ाने में मदद करती है।
In simple words: लघु उद्योगों के विकास के लिए सरकार ने विशेष मंडल और निगम बनाए हैं और उन्हें वित्तीय सहायता देती है। ये कदम उद्योगों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।
🎯 Exam Tip: लघु उद्योगों के विकास के लिए सुझाव देते समय, संस्थागत समर्थन (मंडलों और निगमों) और वित्तीय सहायता (ऋण और सब्सिडी) जैसे दो मुख्य क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 6. भारत में कुटीर उद्योगों को विकसित करने की आवश्यकता क्यों है ?
Answer: कुटीर उद्योगों द्वारा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को निम्नलिखित रूप में सुधारा जा सकता है। अतः उनका विकास किये जाने की आवश्यकता है:
- कुटीर उद्योग ग्रामीण लोगों के एक बड़े वर्ग को उनके अपने गाँव में ही काम-धंधे उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में ग्रामीण लोगों को अपना गाँव छोड़कर नए इलाकों में भटकना नहीं पड़ता।
- इसके अलावा, खेती में लगे बहुत-से मजदूरों को, जब उनके पास खेती का कोई काम नहीं होता, ये कुटीर उद्योग उनकी आय का मुख्य साधन बन सकते हैं। ये मौसमी बेरोज़गारी को कम करने में सहायक हैं।
- ग्रामीण क्षेत्रों में पैदा होने वाला बहुत-सा कच्चा माल कुटीर उद्योगों के प्रयोग में आ जाता है, जिनको बाहर भेजने पर कुछ भी मूल्य प्राप्त नहीं होता। इससे स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है।
In simple words: कुटीर उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ज़रूरी हैं क्योंकि ये गाँवों में रोज़गार देते हैं, किसानों को अतिरिक्त आय देते हैं और स्थानीय कच्चे माल का उपयोग करते हैं।
🎯 Exam Tip: कुटीर उद्योगों के महत्व को रेखांकित करते समय ग्रामीण रोज़गार, स्थानीय संसाधन उपयोग और मौसमी बेरोज़गारी के समाधान पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 7. सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के उद्योग परस्पर किस प्रकार सहयोगी हैं ?
Answer: भारत जैसे मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले देश में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र साथ-साथ चलते हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक एवं निजी उद्योगों के लिए अलग-अलग कार्य-क्षेत्र तय किए गए हैं, फिर भी सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र आपस में एक-दूसरे के पूरक और सहयोगी हैं। सरकार अपने कई कार्यक्रमों के माध्यम से निजी क्षेत्र के उद्योगों को विभिन्न सुविधाएँ देती है, जिससे इस क्षेत्र का तेज़ी से विकास हो सके। रेल, सड़क परिवहन, बंदरगाह, विद्युत व्यवस्था, सिंचाई व्यवस्था आदि कई सुविधाएँ देकर सरकार निजी क्षेत्र के उद्योगों के विकास में मदद करती है। इसी प्रकार निजी क्षेत्र अपनी उत्पादकता द्वारा देश में पूँजी निर्माण की गति को बढ़ाने में सहायता देते हैं, जिससे सरकार नए-नए सार्वजनिक उद्योगों की स्थापना एवं विकास करने में सफल होती है। यह सहयोगात्मक संबंध देश के समग्र आर्थिक विकास को गति देता है।
In simple words: भारत में सार्वजनिक और निजी उद्योग दोनों मिलकर काम करते हैं। सरकार निजी उद्योगों को सुविधाएँ देती है और निजी उद्योग अपनी क्षमता से देश की पूँजी बढ़ाने में मदद करते हैं, जिससे नए सरकारी उद्योग भी लग पाते हैं।
🎯 Exam Tip: सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग को बताते समय, सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं और निजी क्षेत्र के योगदान दोनों पर प्रकाश डालें, जिससे उनके पूरक संबंध स्पष्ट हों।
Question 8. बड़े पैमाने के उद्योग, कुटीर उद्योगों से किस प्रकार भिन्न हैं ?
Answer: बड़े पैमाने के उद्योग और कुटीर उद्योगों में निम्नलिखित भिन्नताएँ हैं:
| क्र० सं० | कुटीर उद्योग | बड़े पैमाने के उद्योग |
|---|---|---|
| 1. | इनका कार्य-स्थल अक्सर घर या कोई छोटा वर्कशॉप होता है। | इनका कार्य-स्थल बहुत विशाल होता है। ये जहाँ भी स्थापित होते हैं, वहाँ एक नगर जैसी आबादी बस जाती है। |
| 2. | इनमें प्रायः हाथ का काम होता है और मशीनी शक्ति का प्रयोग नहीं किया जाता। | इनमें काम बड़ी-बड़ी मशीनों से किया जाता है, जो मशीनी और विद्युत शक्ति से चलती हैं। |
| 3. | किसी कुटीर उद्योग में काम करने वालों की संख्या बहुत कम, 8-9 तक होती है। | बड़े पैमाने के उद्योग में काम करने वालों की संख्या हज़ारों में होती है। |
| 4. | इनके उत्पादों को बाज़ार में कड़ी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता है। | इनके उत्पाद सस्ते और अच्छे होते हैं तथा उपभोक्ताओं की पहली पसंद होते हैं। |
| 5. | इनके वित्तीय साधन कम होते हैं। ग्रामीण कुटीर उद्योग की पूँजी पर बहुत कम पहुँच होती है। | इनके वित्तीय साधन बहुत ज़्यादा होते हैं तथा पूँजी जुटाना आसान होता है। |
| 6. | इन धंधों के मालिकों के पास मार्केटिंग और विज्ञापन तकनीक की जानकारी नहीं होती। | इनके पास आधुनिक व्यावसायिक पद्धतियाँ, डिज़ाइन के कौशल, मार्केटिंग और विज्ञापन तकनीकों की जानकारी होती है। |
In simple words: बड़े उद्योग विशाल होते हैं, ज़्यादा पूँजी और मशीनें इस्तेमाल करते हैं, जबकि कुटीर उद्योग छोटे होते हैं, कम पूँजी और हाथों से काम करते हैं। बड़े उद्योगों में ज़्यादा लोग काम करते हैं और उनकी बाज़ार पहुँच भी ज़्यादा होती है।
🎯 Exam Tip: बड़े और कुटीर उद्योगों के बीच अंतर को स्पष्ट करते समय उनके पैमाने (पूंजी, कर्मचारी), उत्पादन के तरीके (मशीनी बनाम हस्तनिर्मित), और कार्यस्थल के आकार पर ध्यान दें।
Question 9. भारत सरकार औद्योगिक नियन्त्रण हेतु क्या उपाय करती है ? स्पष्ट कीजिए।
Answer: भारत सरकार उद्योगों को नियंत्रित करने के लिए कुछ मुख्य उपाय करती है। इनमें तीन प्रमुख तरीके शामिल हैं। पहला, लाइसेंस प्रणाली है, जिसके तहत कुछ खास उद्योगों को स्थापित करने या विस्तार करने के लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। हालांकि, 1991 की नीति के बाद अधिकांश उद्योगों को लाइसेंस की आवश्यकता से मुक्त कर दिया गया, अब केवल कुछ संवेदनशील उद्योगों (जैसे शराब, सिगरेट, रक्षा उपकरण, खतरनाक रसायन) के लिए ही इसकी जरूरत है। दूसरा, MRTP अधिनियम, 1969 है, जिसका उद्देश्य आर्थिक शक्ति को कुछ हाथों में केंद्रित होने से रोकना और एकाधिकार पर नियंत्रण करना है, ताकि व्यापार में अनुचित प्रथाओं को रोका जा सके। तीसरा, लघु उद्योगों के लिए उत्पादों का आरक्षण है। सरकार ने कुछ उत्पादों को सिर्फ लघु उद्योगों के लिए आरक्षित कर दिया है, जिससे बड़े उद्योग उन क्षेत्रों में प्रवेश नहीं कर सकते और छोटे उद्योगों को बढ़ावा मिलता है। यह सुनिश्चित करता है कि आर्थिक विकास सभी वर्गों तक पहुंचे।
In simple words: सरकार उद्योगों को नियंत्रित करने के लिए लाइसेंस, MRTP कानून और लघु उद्योगों के लिए कुछ उत्पादों को आरक्षित करने जैसे तरीके अपनाती है। ये नियम यह सुनिश्चित करते हैं कि उद्योग सही ढंग से काम करें और सभी को फायदा हो।
🎯 Exam Tip: औद्योगिक नियंत्रण के उपायों को स्पष्ट करते समय, उनके उद्देश्यों और अर्थव्यवस्था पर उनके प्रभाव को भी समझाएं। उदाहरणों के साथ नीतियों का उल्लेख करें।
Question 10. भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों के योगदान की विवेचना कीजिए। [2015] या भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों के किन्हीं छः योगदानों का वर्णन कीजिए। [2016] या भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों के किन्हीं तीन योगदानों का वर्णन कीजिए। [2016]
Answer: भारतीय अर्थव्यवस्था एक विकासशील अर्थव्यवस्था है, और देश की दूसरी पंचवर्षीय योजना से उद्योगों की स्थापना पर विशेष ध्यान दिया गया है। उद्योगों ने भारतीय अर्थव्यवस्था में लगातार वृद्धि और महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों के कुछ मुख्य योगदान निम्नलिखित हैं:
1. उद्योगों ने देश की राष्ट्रीय आय, बचत और पूंजी निर्माण को बढ़ाने में मदद की है।
2. प्रति व्यक्ति उत्पादन और प्रति व्यक्ति आय को बढ़ाने में सहायता मिली है। इससे लोगों के जीवन-स्तर में सुधार आया है।
3. उद्योगों के विकास से अतिरिक्त रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं, जिससे बेरोजगारी कम हुई है।
4. आयातों में कमी लाकर देश को आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिली है। हम बहुत सी चीजें खुद बनाने लगे हैं जो पहले बाहर से मंगाई जाती थीं।
5. भारत दुनिया के लगभग सभी देशों में निर्यात बढ़ाने में सफल रहा है, जिससे विदेशी मुद्रा मिलती है।
6. कृषि क्षेत्र में मशीनीकरण संभव हुआ है, जिससे कृषि उत्पादकता बढ़ी और खाद्यान्नों का आयात लगभग समाप्त हो गया है। उद्योगों ने कृषि को आधुनिक बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है।
7. अर्थव्यवस्था में आधुनिकीकरण को बढ़ावा मिला है। नई तकनीकें और उत्पादन के तरीके विकसित हुए हैं।
8. देश में उपलब्ध संसाधनों का पूरी तरह से उपयोग संभव हो सका है।
9. यातायात और संचार के क्षेत्र में भी बहुत उन्नति हुई है। परिवहन और संचार के तेज साधन विकसित हुए हैं, जो आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं।
इन बिंदुओं के आधार पर कहा जा सकता है कि औद्योगीकरण के कारण भारत आज दुनिया का एक अग्रणी विकासशील देश बन चुका है।
In simple words: उद्योगों ने भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है। उन्होंने पैसा कमाने, रोजगार देने, चीजों को खुद बनाने और खेती को बेहतर बनाने में बहुत मदद की है।
🎯 Exam Tip: उद्योगों के योगदान को लिखते समय, हमेशा राष्ट्रीय आय, रोजगार, आत्मनिर्भरता और कृषि के आधुनिकीकरण जैसे प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करें। प्रत्येक योगदान को संक्षिप्त में समझाएं।
Question 11. भारतीय उद्योगों की भावी सम्भावनाओं पर प्रकाश डालिए।
Answer: आजादी के बाद से, औद्योगिक विकास के लिए भारत में गंभीर प्रयास किए गए हैं और कई उपलब्धियां हासिल हुई हैं, लेकिन अभी भी बहुत काम बाकी है। औद्योगिक विकास का लाभ अभी तक सभी लोगों तक नहीं पहुंचा है। इसके लिए यह जरूरी है कि औद्योगिक उत्पादन को और बढ़ाया जाए, ताकि आम आदमी को औद्योगिक वस्तुएं सस्ती कीमतों पर मिल सकें। आज भी देश के कई क्षेत्र औद्योगिक विकास से वंचित हैं, जिसके कारण इन क्षेत्रों में लोगों का जीवन-स्तर कम है। इन क्षेत्रों का सही औद्योगिक विकास करके उनकी पिछड़ेपन को दूर किया जा सकता है। इसी तरह, कृषि उत्पादों पर आधारित उद्योगों जैसे खाद्यान्न, फल और सब्जी प्रसंस्करण आदि के विकास की बहुत बड़ी संभावनाएं हैं। इन उद्योगों में निवेश और उचित नीतियों से भारत अपनी पूरी क्षमता का उपयोग कर सकता है।
In simple words: भारत में उद्योगों का भविष्य उज्ज्वल है, लेकिन हमें अभी भी उत्पादन बढ़ाना है और पिछड़े इलाकों में उद्योग लगाने हैं। कृषि से जुड़े उद्योगों में भी बहुत तरक्की की जा सकती है।
🎯 Exam Tip: भावी संभावनाओं पर चर्चा करते समय, वर्तमान चुनौतियों और उन्हें दूर करने के लिए आवश्यक कदमों को भी शामिल करें, साथ ही विशिष्ट क्षेत्रों का उल्लेख करें जिनमें विकास की अधिक गुंजाइश है।
Question 12. सार्वजनिक क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र के उद्योगों में दो अन्तर बताइए। [2010]
Answer: सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के उद्योगों के बीच मुख्य अंतर उनके स्वामित्व का होता है।
• सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम वे होते हैं जिन पर सरकारी विभागों या केंद्र/राज्य द्वारा स्थापित संस्थाओं का स्वामित्व होता है। इनका मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और सामाजिक हित साधना होता है। उदाहरण के लिए, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) और भिलाई इस्पात लिमिटेड ऐसे ही उद्यम हैं।
• इसके विपरीत, निजी क्षेत्र के उद्यमों का स्वामित्व कुछ व्यक्तियों या कंपनियों के पास होता है। इनका मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना होता है। उदाहरण के लिए, टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) एक निजी क्षेत्र का उद्यम है। ये दोनों ही क्षेत्र देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन उनके उद्देश्य और नियंत्रण अलग-अलग होते हैं।
In simple words: सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग सरकार के होते हैं, उनका लक्ष्य देश की भलाई है। निजी क्षेत्र के उद्योग व्यक्तियों या कंपनियों के होते हैं, उनका लक्ष्य पैसा कमाना है।
🎯 Exam Tip: सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच अंतर को स्पष्ट करते समय, स्वामित्व, उद्देश्य और नियंत्रण जैसे मुख्य बिंदुओं पर ध्यान दें और प्रत्येक के कम से कम एक उदाहरण को शामिल करें।
Question 13. भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों की पाँच उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए। [2011]
Answer: भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं, जिन्हें इस प्रकार समझा जा सकता है:
1. भारतीय अर्थव्यवस्था में एक आधुनिक और मजबूत बुनियादी ढांचे का तेजी से निर्माण हुआ है। इसमें सड़कें, बिजली, बंदरगाह और संचार सुविधाएं शामिल हैं।
2. औद्योगिक क्षेत्र में सार्वजनिक उपक्रमों का विस्तार तेजी से हुआ है। सरकार ने बड़े और महत्वपूर्ण उद्योगों की स्थापना की है।
3. पूंजीगत भारी उद्योगों में निवेश का विस्तार हुआ है, जिसके कारण इंजीनियरिंग वस्तुओं, खनन, लोहा-इस्पात और उर्वरक जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता प्राप्त हुई है। अब हमें इन चीजों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
4. पूंजीगत क्षेत्र में आयातों पर निर्भरता कम हुई है। हम अपनी जरूरत की कई पूंजीगत वस्तुएं अब देश में ही बना लेते हैं।
5. गैर-परंपरागत वस्तुओं के निर्यात में वृद्धि हुई है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कई नए उत्पादों का निर्यात करना शुरू किया है।
6. औद्योगिक क्षेत्र में तकनीकी और प्रबंधकीय सेवाओं का विस्तार हुआ है। हमारे पास अब अधिक कुशल इंजीनियर और प्रबंधक हैं।
7. औद्योगिक संरचना में विविधता आई है और आधुनिक उद्योगों का विस्तार संभव हुआ है। देश में कई तरह के नए उद्योग शुरू हुए हैं।
ये उपलब्धियां भारत को एक मजबूत औद्योगिक आधार बनाने में मदद करती हैं।
In simple words: भारत ने उद्योगों में बहुत तरक्की की है। हमने अच्छी सड़कें और बिजली बनाई, बहुत सी चीजें खुद बनानी शुरू की, जिससे आयात कम हुआ और निर्यात बढ़ा।
🎯 Exam Tip: उद्योगों की उपलब्धियों को लिखते समय, बुनियादी ढांचे के विकास, आत्मनिर्भरता, रोजगार सृजन और निर्यात में वृद्धि जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 14. कुटीर एवं लघु उद्योग में क्या अन्तर है? [2014, 15, 16, 17, 18]
Answer: कुटीर और लघु उद्योगों में मुख्य रूप से कुछ अंतर हैं:
1. कुटीर उद्योग ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े होते हैं, जबकि लघु उद्योग ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में स्थापित किए जा सकते हैं।
2. कुटीर उद्योगों में अधिकांश काम हाथ से किया जाता है, जबकि लघु उद्योगों में मशीनों का उपयोग भी होता है।
3. कुटीर उद्योगों में काम करने वाले ज्यादातर लोग परिवार के सदस्य होते हैं, जबकि लघु उद्योगों में वेतनभोगी श्रमिक रखे जाते हैं।
4. कुटीर उद्योगों में बहुत कम पूंजी निवेश की जरूरत होती है, जबकि 1 करोड़ रुपये तक के निवेश वाले उद्योग 'लघु उद्योग' कहलाते हैं।
5. कुटीर उद्योग आमतौर पर कृषि व्यवसाय से जुड़े होते हैं, जबकि लघु उद्योगों के साथ ऐसा जरूरी नहीं है।
6. कुटीर उद्योग सहायक उद्योग के रूप में चलते हैं, जबकि लघु उद्योग मुख्य उद्योगों के रूप में संचालित किए जाते हैं।
7. कुटीर उद्योगों में कच्चा माल और तकनीकी कुशलता स्थानीय होती है, लेकिन लघु उद्योगों में ये सब बाहर से भी मंगाए जाते हैं।
ये अंतर इन उद्योगों की प्रकृति, पैमाने और संचालन के तरीकों को दर्शाते हैं।
In simple words: कुटीर उद्योग घर पर छोटे पैमाने पर हाथ से चलते हैं, परिवार के लोग काम करते हैं। लघु उद्योग थोड़े बड़े होते हैं, मशीनें इस्तेमाल करते हैं और श्रमिक रखते हैं, वे शहरों में भी हो सकते हैं।
🎯 Exam Tip: कुटीर और लघु उद्योगों के बीच अंतर को स्पष्ट करने के लिए, स्वामित्व, पूंजी निवेश, प्रौद्योगिकी का उपयोग, रोजगार के प्रकार और स्थान जैसे प्रमुख कारकों पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 15. भारत में औद्योगिक विकास के लिए तीन सुझाव दीजिए। [2014]
Answer: भारत में औद्योगिक विकास के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव निम्नलिखित हैं:
1. प्राकृतिक संसाधनों का सर्वेक्षण और उपयोग: किसी भी देश के उद्योगों के लिए प्राकृतिक संसाधन आधार होते हैं। इसलिए, औद्योगिक विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का ठीक से पता लगाना और उनका उपयोग करना बहुत जरूरी है। इससे औद्योगिक विकास संभव हो सकेगा।
2. कुशल उद्यमियों को प्रोत्साहन: भारत जैसे विकासशील देश में आज भी योग्य उद्यमियों की कमी है, क्योंकि भारतीय उद्यमी जोखिम लेने से बचते हैं। इसलिए, भारतीय उद्यमियों को उद्योग स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्हें बीमा जैसी उचित सुरक्षा मिलनी चाहिए, ताकि वे जोखिम उठाने के लिए तैयार रहें।
3. वित्तीय सुविधाओं की व्यवस्था: उद्योगों की स्थापना और विकास के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है। इसलिए, उद्यमियों को पर्याप्त और सस्ते ब्याज पर पूंजी की आसान व्यवस्था मिलनी चाहिए। सरकार को ऐसी वित्तीय संस्थाएं बनानी चाहिए जो आसानी से ऋण दे सकें।
इन उपायों से भारत में औद्योगिक विकास की गति तेज हो सकती है।
In simple words: औद्योगिक विकास के लिए हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों का पता लगाना और उनका इस्तेमाल करना चाहिए। साथ ही, नए उद्यमियों को बढ़ावा देना और उन्हें आसानी से पैसा उपलब्ध कराना चाहिए।
🎯 Exam Tip: औद्योगिक विकास के लिए सुझाव देते समय, संसाधनों, मानव पूंजी और वित्तीय सहायता जैसे महत्वपूर्ण कारकों पर ध्यान केंद्रित करें और प्रत्येक सुझाव को संक्षिप्त में समझाएं।
Question 16. औद्योगिक नीति से क्या अभिप्राय है?
Answer: औद्योगिक नीति का मतलब उन नियमों और फैसलों से है जो सरकार किसी देश में उद्योगों के विकास और नियंत्रण के लिए बनाती है। हर सरकार का कर्तव्य होता है कि वह उद्योगों को बढ़ावा दे। एक मजबूत और संतुलित औद्योगिक विकास के लिए एक अच्छी नीति का होना बहुत जरूरी है। आजादी के बाद भारत में समय-समय पर औद्योगिक नीतियां घोषित की गईं, जिनमें 1948, 1956 और 1991 की नीतियां खास महत्व रखती हैं। 1956 की औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र को ज्यादा महत्व दिया गया था, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को विकास में आगे रहना था। वहीं, 1991 की नई औद्योगिक नीति में उदारीकरण को बढ़ावा दिया गया, जिससे निजी क्षेत्र को अधिक स्वतंत्रता मिली और सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को कम किया गया। ये नीतियां देश के औद्योगिक ढांचे और दिशा को तय करती हैं।
In simple words: औद्योगिक नीति सरकार के वे नियम हैं जो बताते हैं कि देश में उद्योग कैसे बढ़ेंगे और चलेंगे। इन नीतियों से तय होता है कि कौन से उद्योग सरकार चलाएगी और कौन से निजी लोग।
🎯 Exam Tip: औद्योगिक नीति की परिभाषा देते समय, इसके उद्देश्यों और ऐतिहासिक संदर्भ में प्रमुख नीतियों (जैसे 1956 और 1991) के मुख्य फोकस को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. उद्योगों में हमारी प्राथमिकता क्या है ?
Answer: उद्योगों में हमारी प्राथमिकता आत्मनिर्भरता प्राप्त करना और कम लागत पर उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों का निर्माण करना है। इसका मतलब है कि हम अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए खुद ही चीजें बनाएं और वे चीजें अच्छी और सस्ती हों। यह देश की आर्थिक मजबूती के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
In simple words: उद्योगों में हमारी सबसे पहली पसंद खुद पर निर्भर रहना और अच्छी, सस्ती चीजें बनाना है।
🎯 Exam Tip: औद्योगिक प्राथमिकताओं को संक्षेप में बताते समय, आत्मनिर्भरता, गुणवत्ता और लागत-दक्षता जैसे प्रमुख शब्दों का उपयोग करें।
Question 2. संयुक्त क्षेत्र का क्या अर्थ है ? [2009, 10]
Answer: संयुक्त क्षेत्र का मतलब ऐसे उद्योगों से है जिन पर निजी और सार्वजनिक (सरकारी) दोनों का स्वामित्व होता है। इसमें सरकार और निजी कंपनियां मिलकर किसी उद्यम को चलाती हैं। यह एक ऐसा मॉडल है जहाँ दोनों क्षेत्रों की ताकत का उपयोग किया जाता है।
In simple words: संयुक्त क्षेत्र वह होता है जब कोई उद्योग सरकार और निजी कंपनी दोनों मिलकर चलाते हैं।
🎯 Exam Tip: संयुक्त क्षेत्र को परिभाषित करते समय, सार्वजनिक और निजी स्वामित्व के मिश्रण पर जोर दें।
Question 3. भारत में कुटीर उद्योगों की दो समस्याएँ लिखिए।
Answer: भारत में कुटीर उद्योगों की दो मुख्य समस्याएं हैं:
1. कच्चे माल की कमी: इन उद्योगों को पर्याप्त मात्रा में और अच्छी गुणवत्ता वाला कच्चा माल नहीं मिल पाता है।
2. तैयार माल के विपणन की कठिनाई: कुटीर उद्योगों द्वारा बनाए गए उत्पादों को बाजार में बेचने में परेशानी होती है, क्योंकि वे बड़े उद्योगों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते और उन्हें सही कीमत नहीं मिल पाती।
ये समस्याएं इन उद्योगों के विकास में बाधा डालती हैं।
In simple words: कुटीर उद्योगों को कच्चा माल नहीं मिलता और अपना सामान बेचने में बहुत मुश्किल होती है।
🎯 Exam Tip: कुटीर उद्योगों की समस्याओं का उल्लेख करते समय, कच्चे माल की उपलब्धता और विपणन की चुनौतियों पर विशेष ध्यान दें।
Question 4. कुटीर उद्योग से आप क्या समझते हैं ? [2010, 16]
Answer: कुटीर उद्योग से हमारा मतलब उन उद्योगों से है, जहाँ परिवार के सदस्य और कुछ वेतनभोगी श्रमिक (9 से कम) मिलकर किसी पारंपरिक वस्तु का उत्पादन करते हैं। इन उद्योगों का मालिक (अक्सर कारीगर खुद) होता है। इसमें बिजली या मशीनी शक्ति का उपयोग नहीं होता, बल्कि काम हाथ से किया जाता है। जैसे लोहा-इस्पात उद्योग (छोटे पैमाने पर हस्तनिर्मित उत्पाद)।
In simple words: कुटीर उद्योग वे छोटे काम हैं जहाँ परिवार के लोग हाथ से चीजें बनाते हैं, बिना बड़ी मशीनों के, और 9 से कम लोग काम करते हैं।
🎯 Exam Tip: कुटीर उद्योग की परिभाषा में परिवार के सदस्यों, सीमित श्रमिकों की संख्या और गैर-यांत्रिक उत्पादन विधियों जैसे प्रमुख तत्वों को शामिल करना सुनिश्चित करें।
Question 5. औद्योगिक कार्यकुशलता को परिभाषित कीजिए ।
Answer: औद्योगिक कार्यकुशलता का मतलब उस स्थिति से है जब कोई उद्योग अपने पास मौजूद संसाधनों (जैसे श्रमिक, पूंजी, मशीनें) का सबसे अच्छा उपयोग करके सबसे अधिक उत्पादन करता है। यह दिखाता है कि कोई उद्योग कितनी अच्छी तरह काम कर रहा है और कम बर्बादी के साथ ज्यादा चीजें बना रहा है। कार्यकुशलता बढ़ाने से उत्पादकता बढ़ती है।
In simple words: औद्योगिक कार्यकुशलता का मतलब है कि कोई उद्योग अपने पास के सभी साधनों से सबसे ज्यादा सामान बनाए।
🎯 Exam Tip: औद्योगिक कार्यकुशलता को परिभाषित करते समय, "उपलब्ध साधनों का अधिकतम उपयोग" और "अधिकतम उत्पादन" जैसे वाक्यांशों का उपयोग करें।
Question 6. बड़े पैमाने के उद्योग की एक मुख्य विशेषता का उल्लेख कीजिए।
Answer: बड़े पैमाने के उद्योगों की एक मुख्य विशेषता यह है कि इनमें काम बड़ी-बड़ी मशीनों से किया जाता है। ये मशीनें यांत्रिक या विद्युत शक्ति (बिजली) से चलती हैं, जिससे बड़े पैमाने पर और तेज गति से उत्पादन होता है। इन उद्योगों में मानवीय श्रम की बजाय मशीनें प्रमुख भूमिका निभाती हैं।
In simple words: बड़े पैमाने के उद्योगों में बड़ी मशीनें चलती हैं, जो बिजली से काम करती हैं और बहुत सारा सामान बनाती हैं।
🎯 Exam Tip: बड़े पैमाने के उद्योगों की विशेषताओं में मशीनरी का उपयोग, यांत्रिक शक्ति और बड़े पैमाने पर उत्पादन जैसे बिंदुओं को हाइलाइट करें।
Question 7. कुटीर उद्योगों की दो विशेषताएँ लिखिए ।
Answer: कुटीर उद्योगों की दो मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
1. कुटीर उद्योग खेतिहर श्रमिकों को खेती के काम के अलावा अतिरिक्त आय का साधन देते हैं। जब खेती का काम कम होता है, तो वे इन उद्योगों में काम करके कुछ पैसा कमा सकते हैं।
2. कुटीर उद्योग कृषि भूमि पर बढ़ती जनसंख्या के बोझ को कम करने में सहायक होते हैं। ये लोगों को खेती से हटकर दूसरे कामों में लगाने में मदद करते हैं।
ये विशेषताएं ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए कुटीर उद्योगों के महत्व को बढ़ाती हैं।
In simple words: कुटीर उद्योग किसानों को खेती के अलावा और पैसे कमाने में मदद करते हैं और खेती पर लोगों का बोझ कम करते हैं।
🎯 Exam Tip: कुटीर उद्योगों की विशेषताओं को बताते समय, उनके सामाजिक-आर्थिक लाभों पर ध्यान केंद्रित करें, खासकर ग्रामीण संदर्भ में।
Question 8. भारत में पशुओं पर आधारित किन्हीं दो उद्योगों के नाम लिखिए।
Answer: भारत में पशुओं पर आधारित दो प्रमुख उद्योग ये हैं:
1. दुग्ध उद्योग: यह उद्योग दूध और उससे बने उत्पादों जैसे दही, पनीर, मक्खन आदि का उत्पादन करता है।
2. चमड़ा उद्योग: यह उद्योग पशुओं की खाल से चमड़ा बनाता है, जिसका उपयोग जूते, बैग और अन्य चमड़े के सामान बनाने में होता है।
ये उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
In simple words: भारत में दूध बनाने और चमड़े का सामान बनाने के उद्योग पशुओं पर निर्भर करते हैं।
🎯 Exam Tip: पशु-आधारित उद्योगों का उल्लेख करते समय, स्पष्ट उदाहरण दें और सुनिश्चित करें कि वे सीधे पशु उत्पादों से संबंधित हों।
Question 9. कुटीर उद्योग-धन्धों के विकास हेतु कोई दो उपाय लिखिए। [2014]
Answer: कुटीर उद्योग-धंधों के विकास के लिए दो मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं:
1. सरकार द्वारा संवर्धनात्मक सहायता दी जानी चाहिए: सरकार को कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए नीतियां बनानी चाहिए, जैसे उन्हें आसानी से ऋण उपलब्ध कराना, करों में छूट देना और उनके उत्पादों के लिए बाजार ढूंढने में मदद करना।
2. संस्थागत व संरक्षणात्मक सहायता प्रदान की जानी चाहिए: विभिन्न संस्थाओं (जैसे बैंक, विपणन बोर्ड) के माध्यम से उन्हें वित्तीय सहायता, तकनीकी प्रशिक्षण और उनके उत्पादों को बड़े उद्योगों से प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए। इससे छोटे कारीगरों को मदद मिलती है।
In simple words: कुटीर उद्योगों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार को उनकी मदद करनी चाहिए और ऐसी संस्थाएं बनानी चाहिए जो उन्हें पैसा और सुरक्षा दे सकें।
🎯 Exam Tip: कुटीर उद्योगों के विकास के उपायों को लिखते समय, सरकारी सहायता और संस्थागत समर्थन जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 10. स्वामित्व के आधार पर बड़े पैमाने के उद्योगों को किन दो भागों में बाँटा जा सकता है ?
Answer: स्वामित्व के आधार पर बड़े पैमाने के उद्योगों को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है:
1. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग: ये वे उद्योग होते हैं जिनका स्वामित्व और नियंत्रण सरकार के पास होता है। इनका उद्देश्य सामाजिक कल्याण और आर्थिक विकास होता है। उदाहरण के लिए, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL)।
2. निजी क्षेत्र के उद्योग: इन उद्योगों का स्वामित्व और नियंत्रण निजी व्यक्तियों या कंपनियों के पास होता है। इनका मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है। उदाहरण के लिए, टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO)।
ये दोनों क्षेत्र मिलकर अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
In simple words: बड़े उद्योग दो तरह के होते हैं: सार्वजनिक (सरकार के) और निजी (लोगों या कंपनियों के)।
🎯 Exam Tip: स्वामित्व के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण करते समय, प्रत्येक प्रकार को स्पष्ट रूप से परिभाषित करें और उसके साथ एक-एक उदाहरण भी दें।
Question 11. सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम से आप क्या समझते हैं ?
Answer: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSUs) उन उद्योगों को कहते हैं जिनका स्वामित्व, प्रबंधन और नियंत्रण सरकारी विभागों या केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा स्थापित संस्थाओं के पास होता है। इनका मुख्य लक्ष्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था को मजबूत करना, रोजगार पैदा करना और सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करना होता है। ये देश के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं।
In simple words: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम वे उद्योग होते हैं जो सरकार के होते हैं और उनका काम देश की भलाई और विकास करना होता है।
🎯 Exam Tip: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की परिभाषा में स्वामित्व (सरकारी) और उद्देश्य (सामाजिक कल्याण/आर्थिक विकास) जैसे मुख्य तत्वों को शामिल करें।
Question 12. उद्योगों की पारस्परिक निर्भरता से आप क्या समझते हैं ?
Answer: उद्योगों की पारस्परिक निर्भरता का मतलब है कि आज के औद्योगिक युग में सभी उद्योग एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं, वे अकेले काम नहीं कर सकते। विशेषज्ञता बढ़ने के कारण यह और भी महत्वपूर्ण हो गया है। उदाहरण के लिए, एक कार बनाने वाली फैक्ट्री खुद टायर-ट्यूब, क्लच या ब्रेक जैसे सभी पुर्जे नहीं बनाती। वह इन पुर्जों के लिए दूसरे उद्योगों पर निर्भर करती है। इसी तरह, टायर बनाने वाला उद्योग रबर उद्योग पर निर्भर करता है, और रबर उद्योग कृषि या रसायन उद्योग पर। यह एक-दूसरे पर निर्भरता उद्योगों को और अधिक कुशल बनाती है।
In simple words: उद्योगों की आपसी निर्भरता का मतलब है कि कोई भी उद्योग अपना सारा काम खुद नहीं करता, बल्कि वह दूसरे उद्योगों से चीजें लेता है या उन्हें चीजें देता है।
🎯 Exam Tip: पारस्परिक निर्भरता को समझाते समय, एक उद्योग का दूसरे पर कैसे निर्भर करता है, इसका स्पष्ट उदाहरण दें और यह भी बताएं कि इससे विशेषज्ञता और दक्षता कैसे बढ़ती है।
बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. भारत में तीव्र औद्योगीकरण की आवश्यकता क्यों है?
(क) जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के कारण
(ख) आर्थिक विकास की दर के लिए
(ग) कृषि को विकसित करने के लिए
(घ) नगरीकरण में वृद्धि के लिए
Answer: (ख) आर्थिक विकास की दर के लिए
In simple words: हमें तेज औद्योगीकरण की जरूरत है ताकि देश तेजी से आर्थिक रूप से विकसित हो सके और लोगों की आय बढ़ सके।
🎯 Exam Tip: औद्योगीकरण का मुख्य उद्देश्य आर्थिक विकास को गति देना है, जिससे देश में समृद्धि आती है।
Question 2. औद्योगीकरण का प्रभाव नहीं है
(क) रोजगार के अवसरों में वृद्धि
(ख) नगरीकरण में वृद्धि
(ग) बेरोजगारी में वृद्धि
(घ) आर्थिक विकास में वृद्धि
Answer: (ग) बेरोजगारी में वृद्धि
In simple words: औद्योगीकरण से बेरोजगारी बढ़ती नहीं है, बल्कि रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। इसलिए, बेरोजगारी में वृद्धि इसका प्रभाव नहीं है।
🎯 Exam Tip: औद्योगीकरण आमतौर पर रोजगार सृजन, नगरीकरण और आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है, इसलिए बेरोजगारी में वृद्धि इसका विपरीत प्रभाव है।
Question 3. औद्योगिक असन्तुलन दूर करने के लिए
(क) पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग स्थापित होने चाहिए
(ख) उपभोक्ता वस्तु उद्योग लगाने चाहिए।
(ग) पूँजी वस्तु उद्योग लगाने चाहिए
(घ) आधारभूत उद्योग लगाने चाहिए
Answer: (क) पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग स्थापित होने चाहिए
In simple words: औद्योगिक असंतुलन को ठीक करने के लिए, हमें उन पिछड़े इलाकों में नए उद्योग लगाने चाहिए जहाँ अभी विकास कम हुआ है।
🎯 Exam Tip: क्षेत्रीय असमानता को कम करने और संतुलित विकास सुनिश्चित करने के लिए पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना एक महत्वपूर्ण रणनीति है।
Question 4. निम्न में से कौन कुटीर उद्योग है? [2012, 16]
(क) हथकरघा उद्योग
(ख) सीमेण्ट उद्योग
(ग) कागज उद्योग
(घ) काँच उद्योग
Answer: (क) हथकरघा उद्योग
In simple words: हथकरघा उद्योग एक छोटा, घर पर चलने वाला उद्योग है जहाँ हाथ से कपड़े बुने जाते हैं, जो कुटीर उद्योग का एक अच्छा उदाहरण है।
🎯 Exam Tip: कुटीर उद्योग वे होते हैं जो आमतौर पर घर पर, छोटे पैमाने पर, कम पूंजी और हाथ के औजारों से चलाए जाते हैं।
Question 5. निम्नलिखित में से कौन-सा उद्योग आधारभूत उद्योग है?
(क) सूती वस्त्र उद्योग
(ख) कागज उद्योग
(ग) लोहा-इस्पात उद्योग
(घ) चीनी उद्योग
Answer: (ग) लोहा-इस्पात उद्योग
In simple words: लोहा-इस्पात उद्योग एक आधारभूत उद्योग है क्योंकि यह अन्य कई उद्योगों के लिए कच्चा माल (जैसे मशीनें, उपकरण) तैयार करता है।
🎯 Exam Tip: आधारभूत उद्योग वे होते हैं जो अन्य उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चा माल या पूंजीगत सामान उपलब्ध कराते हैं।
Question 6. भारत में औद्योगीकरण की गति किस राज्य में सर्वाधिक है?
(क) बिहार में
(ख) उत्तर प्रदेश में
(ग) महाराष्ट्र में
(घ) मध्य प्रदेश में
Answer: (ग) महाराष्ट्र में
In simple words: भारत में औद्योगिक विकास की रफ्तार महाराष्ट्र राज्य में सबसे तेज रही है।
🎯 Exam Tip: महाराष्ट्र अपने मजबूत औद्योगिक आधार, वित्तीय राजधानी और बंदरगाहों के कारण भारत में सबसे अधिक औद्योगिक रूप से विकसित राज्यों में से एक है।
Question 7. टाटा आयरन व स्टील कम्पनी (इस्पात कारखाना) किस क्षेत्र में है?
(क) निजी
(ख) संयुक्त
(ग) सार्वजनिक
(घ) स्पष्ट नहीं
Answer: (क) निजी
In simple words: टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) एक निजी कंपनी है, जिसका स्वामित्व टाटा समूह के पास है।
🎯 Exam Tip: निजी क्षेत्र के उद्योग वे होते हैं जिनका स्वामित्व और संचालन निजी व्यक्तियों या संस्थाओं द्वारा लाभ कमाने के उद्देश्य से किया जाता है।
Question 8. भारत को आर्थिक विकास निर्भर करता है [2013, 15]
(क) केवल कुटीर उद्योगों पर
(ख) केवल छोटे पैमाने के उद्योगों पर
(ग) केवल बड़े पैमाने के उद्योगों पर
(घ) सभी प्रकार के उद्योगों पर
Answer: (घ) सभी प्रकार के उद्योगों पर
In simple words: भारत का आर्थिक विकास तब होता है जब सभी तरह के उद्योग-कुटीर, छोटे और बड़े-मिलकर काम करते हैं।
🎯 Exam Tip: एक मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए सभी क्षेत्रों और प्रकार के उद्योगों का संतुलित विकास आवश्यक है, क्योंकि वे एक-दूसरे के पूरक होते हैं।
Question 9. हथकरघा उद्योग निम्नलिखित में से किस श्रेणी से सम्बन्धित है? [2011]
(क) लघु उद्योग
(ख) कुटीर उद्योग
(ग) भारी उद्योग
(घ) आधारभूत उद्योग
Answer: (ख) कुटीर उद्योग
In simple words: हथकरघा उद्योग एक कुटीर उद्योग है क्योंकि इसमें हाथ से बुनाई की जाती है, अक्सर घर पर, और इसमें कम पूंजी लगती है।
🎯 Exam Tip: कुटीर उद्योग वे होते हैं जो पारिवारिक श्रम, स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक तकनीकों का उपयोग करते हैं।
Question 10. निम्नलिखित में से भारत का सबसे बड़ा प्रतिष्ठान कौन-सा है?
(क) वायु परिवहन
(ख) सड़क परिवहन
(ग) रेल परिवहन
(घ) जल परिवहन
Answer: (ग) रेल परिवहन
In simple words: भारत में रेल परिवहन सबसे बड़ा प्रतिष्ठान है, क्योंकि यह देश भर में सबसे ज्यादा लोगों और सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाता है।
🎯 Exam Tip: भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक है और देश की अर्थव्यवस्था और लोगों के जीवन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
Question 11. निम्नलिखित में से कौन-सा इस्पात कारखाना सार्वजनिक क्षेत्र से सम्बन्धित है?
(क) जमशेदपुर
(ख) बर्नपुर
(ग) दुर्गापुर
(घ) भद्रावती
Answer: (ग) दुर्गापुर
In simple words: दुर्गापुर इस्पात कारखाना सरकार द्वारा चलाया जाता है, इसलिए यह सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़ा है।
🎯 Exam Tip: सार्वजनिक क्षेत्र के इस्पात कारखाने भारत के औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जैसे भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर।
Question 12. ऐसे सभी उपक्रम जिन पर सार्वजनिक क्षेत्र की संस्था और निजी उद्यम का संयुक्त स्वामित्व होता है, कहलाते हैं
(क) सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम
(ख) निजी क्षेत्र के उपक्रम
(ग) संयुक्त क्षेत्र के उपक्रम
(घ) इनमें से कोई नहीं
Answer: (ग) संयुक्त क्षेत्र के उपक्रम
In simple words: जब कोई कंपनी सरकार और किसी निजी कंपनी दोनों की हिस्सेदारी से चलती है, तो उसे संयुक्त क्षेत्र का उपक्रम कहते हैं।
🎯 Exam Tip: संयुक्त क्षेत्र सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के संसाधनों और विशेषज्ञता को मिलाकर एक कुशल संचालन मॉडल बनाता है।
Question 13. कृषि और उद्योग एक-दूसरे के
(क) परस्पर पूरक हैं।
(ख) परस्पर प्रतियोगी हैं।
(ग) परस्पर सम्बद्ध नहीं हैं।
(घ) इनमें से कोई नहीं
Answer: (क) परस्पर पूरक हैं।
In simple words: खेती और उद्योग एक-दूसरे का साथ देते हैं; खेती उद्योगों के लिए कच्चा माल देती है और उद्योग खेती के लिए मशीनें और खाद बनाते हैं।
🎯 Exam Tip: कृषि और उद्योग का विकास एक-दूसरे पर निर्भर करता है; कृषि उद्योगों के लिए आधार प्रदान करती है, जबकि उद्योग कृषि को आधुनिक बनाने में मदद करते हैं।
Question 14. 1991 की औद्योगिक नीति में निम्न में से किसे अधिक महत्त्व दिया गया? [2014]
(क) उदारीकरण को
(ख) कुटीर उद्योगों को
(ग) सार्वजनिक क्षेत्र को
(घ) इनमें से कोई नहीं
Answer: (क) उदारीकरण को
In simple words: 1991 की औद्योगिक नीति में सरकार ने उद्योगों के लिए नियम आसान कर दिए और निजी कंपनियों को ज्यादा आजादी दी, जिसे उदारीकरण कहते हैं।
🎯 Exam Tip: 1991 की औद्योगिक नीति का मुख्य जोर लाइसेंस राज को खत्म करने, निजीकरण को बढ़ावा देने और वैश्वीकरण की ओर बढ़ना था।
Question 15. निम्नलिखित में से कौन-सा उद्योग कृषि आधारित नहीं है? (2015)
(क) चीनी उद्योग
(ख) जूट उद्योग
(ग) सीमेण्ट उद्योग
(घ) सूती उद्योग
Answer: (ग) सीमेण्ट उद्योग
In simple words: चीनी, जूट और सूती कपड़े बनाने के उद्योग खेती पर निर्भर करते हैं, लेकिन सीमेंट उद्योग पत्थर और मिट्टी जैसे खनिजों पर आधारित है, खेती पर नहीं।
🎯 Exam Tip: कृषि आधारित उद्योग वे होते हैं जो अपना कच्चा माल सीधे खेती से प्राप्त करते हैं, जबकि अन्य उद्योग खनिज या अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित होते हैं।
उत्तरमाला
1. (ख), 2. (ग), 3. (क), 4. (क), 5. (ग), 6. (ग), 7. (क), 8. (घ), 9. (ख), 10. (ग), 11. (ग), 12. (ग), 13. (क), 14. (क), 15. (ग)।
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