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Detailed Chapter 4 भारतीय अर्थव्यवस्थ में कृषि का स्थान UP Board Solutions for Class 10 Social Science
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Class 10 Social Science Chapter 4 भारतीय अर्थव्यवस्थ में कृषि का स्थान UP Board Solutions PDF
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
Question 1. भारत में भूमि-सुधार कार्यक्रमों की कमियों का उल्लेख कीजिए तथा सुधार हेतु सुझाव दीजिए। [2014]
Answer: भारत में भूमि सुधार कार्यक्रमों की मुख्य कमियाँ नीचे दी गई हैं:
1. भारत के अलग-अलग राज्यों में भूमि सुधार के कानून एक जैसे नहीं हैं, जिसके कारण ये कार्यक्रम ठीक से लागू नहीं हो पाए हैं।
2. ज़मीन के टुकड़ों की सीमा ठीक से तय नहीं हो पाई, क्योंकि जमींदारों ने गैर-कानूनी तरीके से ज़मीनें बदलीं।
3. भूमि सुधार कार्यक्रमों में किसानों से ज़मीन का किराया बहुत ज़्यादा लिया जाता था, जिससे खेती की पैदावार पर बुरा असर पड़ता था।
4. भारत में ज़मीन से जुड़े दस्तावेज़ अधूरे हैं। ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर चकबंदी के दौरान नए विवाद पैदा हुए हैं। उचित भूमि रिकॉर्ड से पारदर्शिता बढ़ती है, जिससे विवादों की संभावना कम होती है।
In simple words: भूमि सुधार कार्यक्रम भारत में ठीक से लागू नहीं हो पाए क्योंकि हर राज्य के कानून अलग थे, ज़मीन की हदबंदी गलत तरीके से हुई और किसानों से ज़्यादा लगान वसूला गया. अधूरे ज़मीन रिकॉर्ड ने भी समस्याएँ खड़ी कीं.
🎯 Exam Tip: जब भी किसी नीति या कार्यक्रम की कमियाँ बताएँ, तो हमेशा उनके कारणों और प्रभावों को स्पष्ट करें।
Question 2. भारतीय कृषि में किन्हीं पाँच कृषि निविष्टियों के महत्त्व पर प्रकाश डालिए । [2012, 15]
Answer: भारत में खेती मुख्य व्यवसाय है। भारतीय किसानों को अच्छी पैदावार के लिए जिन चीज़ों और सेवाओं की ज़रूरत होती है, उन्हें कृषि निविष्टियाँ (Inputs) कहते हैं। मुख्य कृषि निविष्टियाँ इस प्रकार हैं:
1. **तकनीकी जानकारी:** खेती के लिए सही तकनीकों की जानकारी बहुत ज़रूरी है। यह जानकारी हमें बीज के प्रकार, खाद, फसल को संभालने, फ़सल बीमा और बाज़ार की जानकारी जैसे कई तरीकों से मिलती है। किसानों को आधुनिक खेती के लिए यह सब जानना बहुत ज़रूरी है।
2. **अपना श्रम:** किसान और उसके परिवार के सदस्य जो मेहनत करते हैं, वह भी खेती के लिए एक ज़रूरी निविष्टि है। कभी-कभी खेत में काम करने वालों की संख्या ज़रूरत से ज़्यादा भी हो जाती है।
3. **किराए का श्रम:** मज़दूरी पर रखे गए लोगों के श्रम को किराए का श्रम कहते हैं। खेती के काम में इनका बहुत महत्व है। भारत में ऐसे श्रमिकों का कोई संगठित बाज़ार नहीं है, इसलिए उन्हें कम मज़दूरी मिलती है और ज़्यादातर नकद में नहीं दी जाती।
4. **पशुधन:** बैल, गाय, भैंस जैसे जानवर खेती के लिए बहुत कीमती माने जाते हैं। ये भी खेती की एक ज़रूरी निविष्टि हैं। जिस किसान के पास ज़्यादा पशुधन होता है, वह उतना ही अमीर माना जाता है। पशुधन खेती के अलावा दूध और अन्य उत्पादों के स्रोत के रूप में भी महत्वपूर्ण होता है।
5. **कृषि उपकरण:** खेती में इस्तेमाल होने वाले उपकरण और मशीनें इस श्रेणी में आती हैं। इसमें लकड़ी और लोहे के हल, बैलगाड़ी जैसे पुराने उपकरण, और आधुनिक उपकरण जैसे नलकूप, ट्रैक्टर, तेज़ चलने वाले ट्रक और तिपहिया वाहन शामिल हैं। ये सभी खेती के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
6. **सिंचाई:** इसमें पुराने और नए, दोनों तरह के साधन शामिल हैं। सिंचाई सभी तरह की खेती के लिए ज़रूरी है, लेकिन कुछ खास फसलों के लिए इसका बहुत ज़्यादा महत्व है। पारंपरिक तरीकों के बजाय आधुनिक तरीके सिंचाई पर ज़्यादा निर्भर करते हैं।
7. **बीज:** बीज खेती के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण निविष्टि है। खेती की पैदावार बीज की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। बीज कई तरह के होते हैं, और कुछ बीज बहुत ज़्यादा पैदावार देते हैं। बीज का चुनाव उनकी कीमत और पानी, खाद जैसी अन्य ज़रूरतों पर निर्भर करता है।
8. **उर्वरक और कीटनाशक:** आधुनिक खेती के लिए ये दो बहुत महत्वपूर्ण निविष्टियाँ हैं। उर्वरक मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ाते हैं, और कीटनाशक फसलों को कीड़े और बीमारियों से बचाते हैं। जब इन्हें सिंचाई और अच्छे बीज के साथ सही मात्रा में इस्तेमाल किया जाता है, तो ये मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को तेज़ी से बढ़ाते हुए उत्पादन में तेज़ी से वृद्धि करते हैं।
9. **भंडारण:** भंडारण की सुविधा से अनाज को कीड़ों और मौसम से खराब होने से बचाया जा सकता है। यह भी कृषि क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण निविष्टि है। सही भंडारण सुविधाओं की कमी के कारण भारत में हर साल बहुत सारा अनाज खराब हो जाता है।
10. **विपणन:** खेती के उत्पादों की सही समय पर वसूली और बिक्री के लिए अच्छी व्यवस्था होनी ज़रूरी है। इसलिए विपणन सुविधा भी एक महत्वपूर्ण निविष्टि है।
11. **बीमा और साख:** फसलों का बीमा कराने से चोरी, नुकसान या अन्य हानियों से काफी हद तक बचा जा सकता है। इसलिए खेती के लिए बीमा और साख भी ज़रूरी निविष्टियाँ हैं। यह खेती के उत्पादन की अनिश्चितता को कम करने में मदद करता है।
12. **वित्त:** खेती में किसान को अन्य उत्पादन गतिविधियों की तरह अपनी पैदावार के लिए इंतज़ार करना पड़ता है। पैदावार के बाद भी उसे तब तक इंतज़ार करना पड़ता है जब तक वह बिक न जाए। इस इंतज़ार के दौरान उसे वित्त (पैसे) की ज़रूरत पड़ती है। ज़्यादातर वह सहकारी समितियों, साहूकारों, व्यावसायिक बैंकों और ग्रामीण बैंकों से कर्ज लेता है।
In simple words: कृषि निविष्टियाँ वे चीज़ें और सेवाएँ हैं जो खेती में अच्छी पैदावार के लिए ज़रूरी होती हैं. इनमें तकनीकी जानकारी, श्रम, बीज, खाद, पानी (सिंचाई), जानवर (पशुधन), उपकरण, भंडारण, बाज़ार तक पहुँच, बीमा और पैसे (वित्त) शामिल हैं. इन सभी की सही व्यवस्था से खेती बेहतर होती है.
🎯 Exam Tip: कृषि निविष्टियों का वर्णन करते समय, प्रत्येक निविष्टि के महत्व को स्पष्ट करें और उदाहरण भी दें।
Question 3. कृषि हेतु साख के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए कृषि साख के संस्थागत स्रोतों की विवेचना कीजिए।
Answer: खेती में किसान को भी दूसरे उत्पादकों की तरह अपनी पैदावार के लिए इंतज़ार करना पड़ता है। पैदावार के बाद भी उसे तब तक रुकना पड़ता है जब तक उसकी उपज बिक न जाए। इस इंतज़ार के दौरान उसे बीज, सिंचाई, खाद, भंडारण और निजी खर्चों के लिए पैसे की ज़रूरत पड़ती है। इस वित्त (साख) के पाँच मुख्य स्रोत ये हैं:
1. **भूस्वामी और व्यावसायिक साहूकार:** हमारी अर्थव्यवस्था की एक समस्या यह है कि ज़्यादातर किसान आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं, इसलिए संगठित बैंक प्रणाली उन्हें 'साख के योग्य' नहीं मानती। किसान, जिन्हें बैंक से आसानी से कर्ज नहीं मिल पाता, वे भूस्वामियों और व्यावसायिक साहूकारों से बहुत ही खराब शर्तों पर कर्ज लेते हैं। 1950 के दशक तक, किसानों को अपने कुल कर्ज का 70% गाँव के पारंपरिक साहूकारों से मिलता था, लेकिन अब यह स्थिति बदल गई है। किसान अब सहकारी समितियों और दूसरे विकल्पों का फायदा उठा रहे हैं।
2. **व्यावसायिक बैंक:** हमारे व्यावसायिक बैंकों का पुराना ढाँचा ऐसा था कि वे सिर्फ़ ठोस गारंटी के बदले और उन लोगों को कर्ज देते थे जिनकी आय और संपत्ति के आधार पर उन्हें 'साख के योग्य' माना जाता था। इसलिए, बैंकिंग कभी भी ग्रामीण इलाकों में नहीं पहुँच पाई। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। 1950 के दशक तक, इनके कर्ज प्रवाह में हिस्सा केवल 1% था, लेकिन अब यह बढ़कर लगभग 52% हो गया है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय पहुँच बढ़ी है।
3. **सहकारी बैंक:** सहकारी बैंकों की शुरुआत किसानों और सहकारिता की भावना पर आधारित संस्थाओं के रूप में हुई थी, ताकि उनकी वित्तीय समस्याओं को हल किया जा सके। 1950 के दशक तक, इनके कर्ज प्रवाह में हिस्सा 7% से भी कम था। इन बैंकों को ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर स्थापित किया गया।
4. **क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक:** 1975 में भारत सरकार ने क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की एक कड़ी बनाने का फैसला किया। इन्हें खासकर पिछड़े और उन इलाकों में स्थापित किया गया जहाँ सहकारी और व्यावसायिक बैंक पूरी तरह से नहीं पहुँच पाए थे। इन बैंकों का झुकाव गरीब लोगों की साख ज़रूरतों को पूरा करने की ओर था। यह कोशिश सफल रही और इसने खेती के लिए पैसे जुटाने में मदद की।
5. **सहकारी समितियाँ:** देश के कई हिस्सों में किसानों की पंजीकृत समितियाँ तेज़ी से बढ़ी हैं। ये समितियाँ अपने सदस्यों को साख (कर्ज) सुविधाएँ देती हैं। अब इनकी संख्या कई गुना बढ़ गई है और इन्होंने साहूकारों की जगह भी ले ली है। इनकी स्थिति इतनी सुधर गई है कि अब सहकारी एजेंसियों, सहकारी भूमि विकास बैंकों और व्यावसायिक बैंकों से मिलने वाले कुल संस्थागत कर्ज का लगभग एक-तिहाई हिस्सा किसानों को दिए जाने वाले कुल छोटे और मध्यम अवधि के कर्ज में शामिल हो गया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इन संस्थाओं का योगदान महत्वपूर्ण है।
In simple words: किसानों को खेती के लिए पैसे की ज़रूरत होती है. इसके लिए वे भूस्वामियों, साहूकारों, व्यावसायिक बैंकों, सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों जैसे कई संस्थागत स्रोतों से कर्ज लेते हैं. इन स्रोतों से किसानों को कम ब्याज पर और बेहतर शर्तों पर पैसा मिल पाता है, जिससे वे अपनी खेती कर पाते हैं.
🎯 Exam Tip: कृषि साख के संस्थागत स्रोतों की विवेचना करते समय, प्रत्येक स्रोत के विकास और किसानों के लिए उसकी भूमिका को स्पष्ट करें।
Question 4. कृषि निविष्टियों में वित्त के पाँच योगदान लिखिए।
Answer: कृषि निविष्टियों में वित्त के मुख्य पाँच योगदान निम्नलिखित हैं:
1. **किराए का श्रम:** खेती का काम मौसमी होता है। किसान को खेत जोतने, बीज बोने, निराई-गुड़ाई, सिंचाई करने, फसल काटने जैसे सभी काम समय पर करने पड़ते हैं। ज़्यादातर यह सब काम वह खुद नहीं कर पाता और इसके लिए किराए पर मज़दूर रखता है। मज़दूरों को मज़दूरी देने में वित्त-सुविधा का योगदान मिलता है, क्योंकि पैसे से ही मज़दूरों का भुगतान होता है।
2. **कृषि-उपकरण:** अब खेती एक व्यवसाय बन गई है। किसान अब जानवरों पर कम निर्भर करता है और कृषि-उपकरण जानवरों की जगह ले रहे हैं। इनमें टिलर, हैरो, ट्रैक्टर, थ्रेशर जैसे उपकरण शामिल हैं। इन्हें खरीदने में भी किसान को वित्त का योगदान मिलता है, क्योंकि ये महंगे होते हैं और इनके लिए पूंजी की आवश्यकता होती है।
3. **सिंचाई:** सिंचाई के सही साधन आज के किसान की ज़रूरत बन गए हैं। बारिश पर निर्भर खेती सिर्फ़ एक जुआ साबित हुई है। अब किसान की पहली प्राथमिकता सिंचाई की एक भरोसेमंद व्यवस्था है। इसके लिए वह ट्यूबवेल या उससे पानी खींचने के लिए जनरेटर को प्राथमिकता देता है। यह व्यवस्था खासकर उन किसानों के लिए ज़रूरी है जो घनी और दोहरी फसलें उगाते हैं या जिनके क्षेत्र में सिंचाई की पर्याप्त सुविधा नहीं होती। सिंचाई के प्रभावी और भरोसेमंद साधनों को जुटाने के लिए भी वित्त का योगदान ज़रूरी होता है।
4. **उर्वरक एवं कीटनाशी:** घनी और दोहरी फसल वाली खेती के लिए ज़मीन की उपजाऊ शक्ति को बनाए रखना बहुत ज़रूरी है। किसान को अपनी ज़रूरत के हिसाब से उर्वरक और कीटनाशक दवाएँ खरीदनी पड़ती हैं। ये चीज़ें महंगी होती हैं और इनके बिना किसान का काम नहीं चल सकता। ज़्यादातर ये दोनों चीज़ें किसानों को सहकारी समितियों द्वारा वित्त (कर्ज) के रूप में उपलब्ध कराई जाती हैं।
5. **भंडारण:** किसान के उत्पाद तुरंत नहीं बिक पाते। कीड़ों और मौसम से बचाव करने वाले भंडारण के तरीकों का फायदा उसे उठाना पड़ता है। यहाँ उसे भंडारण-गृह का किराया देना पड़ता है और इसमें भी वित्त का योगदान देना पड़ता है। सही भंडारण से फसल की बर्बादी रुकती है और किसानों को बेहतर दाम मिलते हैं।
In simple words: खेती में पैसों का इस्तेमाल मज़दूरों को मज़दूरी देने, खेती के उपकरण खरीदने, सिंचाई की व्यवस्था करने, खाद और कीटनाशक खरीदने और अनाज के भंडारण के लिए होता है. ये सभी खर्चे किसानों के लिए ज़रूरी हैं ताकि वे अपनी खेती को सफल बना सकें.
🎯 Exam Tip: जब भी वित्त के योगदान पर चर्चा करें, तो यह स्पष्ट करें कि वित्तीय सहायता कैसे कृषि के विभिन्न पहलुओं में सुधार करती है।
Question 5. भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के क्या कारण हैं ? इसे सुधारने के लिए क्या उपाय किये गये हैं ?
Answer: भारत एक कृषि प्रधान देश है। देश की लगभग 58% आबादी अपनी रोज़ी-रोटी के लिए आज भी खेती पर निर्भर करती है। भारतीय अर्थव्यवस्था में खेती का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होने के बावजूद यह पिछड़ी हुई अवस्था में है। दूसरे देशों की तुलना में भारत में प्रति हेक्टेयर कृषि-उत्पादन बहुत कम है। इसके लिए मुख्य कारण नीचे दिए गए हैं:
**भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के कारण:**
1. **छोटे कृषि जोत:** भारत में कृषि जोत का आकार बहुत छोटा है। लगभग 57% जोत एक हेक्टेयर से भी कम हैं। इसके अलावा, कृषि जोत बटे हुए हैं, यानी एक-दूसरे से दूर-दूर हैं। छोटे जोतों पर वैज्ञानिक तरीके से खेती करना संभव नहीं होता और न ही सिंचाई की सही व्यवस्था हो पाती है।
2. **बारिश पर निर्भरता:** आज भी भारतीय कृषि का लगभग 50% हिस्सा बारिश पर निर्भर करता है। बारिश की अनिश्चितता और अनियमितता के कारण भारतीय कृषि को 'मानसून का जुआ' कहते हैं। देश के कुछ इलाकों में ज़्यादा बारिश और बाढ़ से फसलें बह जाती हैं, जबकि कुछ इलाकों में सूखे से फसलें सूख जाती हैं।
3. **ज़मीन पर आबादी का ज़्यादा बोझ:** तेज़ी से बढ़ती आबादी के कारण ज़मीन पर आबादी का बोझ लगातार बढ़ रहा है। नतीजतन, प्रति व्यक्ति उपलब्ध ज़मीन का क्षेत्रफल घटता गया है। साथ ही, ग्रामीण इलाकों में छिपी हुई बेरोज़गारी और कम रोज़गार की समस्याएँ बढ़ी हैं, जिससे किसानों की गरीबी और कर्ज़ में वृद्धि हुई है।
4. **सिंचाई सुविधाओं की कमी:** भारत में केवल 40% क्षेत्र सिंचित है। असिंचित क्षेत्रों में किसान अपनी ज़मीन में सिर्फ एक फसल उगा पाते हैं, जिससे भारतीय कृषि की उत्पादकता बहुत कम हो जाती है।
5. **पुराने कृषि-यंत्र:** पश्चिमी देशों में आज खेती में आधुनिक यंत्रों का उपयोग किया जा रहा है, जबकि भारत के कई क्षेत्रों में आज भी हल, पटेला, दराँती, कस्सी जैसे बहुत पुराने यंत्रों से खेती की जाती है। इनसे गहरी जुताई नहीं हो पाती, जिससे उत्पादन कम होता है।
6. **दोषपूर्ण भूमि-व्यवस्था:** भारत में कई सालों तक देश की लगभग 40% ज़मीन जमींदार, जागीरदार, इनामदार जैसे मध्यस्थों के पास रही। किसान इन मध्यस्थों के काश्तकार होते थे। आज़ादी के बाद इन मध्यस्थों को खत्म करने के बाद भी छोटे किसानों की हालत में खास सुधार नहीं हो पाया है। आज भी ऐसे अनगिनत किसान हैं जो दूसरों की ज़मीन पर खेती करते हैं।
7. **किसानों की अशिक्षा और गरीबी:** गरीबी के कारण देश के किसान आधुनिक यंत्र, अच्छे बीज, खाद आदि खरीदने और उनका उपयोग करने में असमर्थ हैं। शिक्षा की कमी के कारण वे आधुनिक कृषि-विधियों का उपयोग नहीं कर पाते। वे रूढ़िवादी होते हैं, भाग्य में विश्वास करते हैं और मुकदमेबाज़ी में ही अपना बहुत सारा पैसा बर्बाद कर देते हैं।
8. **अच्छे बीज और खाद की कमी:** भारत में ज़्यादा उपज देने वाले उन्नत बीजों की कमी है। कृषि-भूमि के केवल 25% हिस्से पर ही उन्नत बीजों का उपयोग किया जा रहा है, जबकि 75% हिस्से पर किसान आज भी पारंपरिक बीज बोते हैं। इसके अलावा, गोबर का केवल 40% हिस्सा खाद के रूप में उपयोग होता है। पश्चिमी देशों में प्रति हेक्टेयर 300 किलोग्राम से ज़्यादा रासायनिक खाद का उपयोग होता है, जबकि भारत में सिर्फ 65 किलोग्राम।
9. **वित्तीय सुविधाओं की कमी:** किसानों को सही ब्याज पर कर्ज़ देने वाली संस्थाओं की देश में आज भी कमी है। इस कारण किसानों को ऊँची ब्याज दरों पर महाजनों से कर्ज़ लेना पड़ता है, जिससे उनकी कर्ज़दारी बढ़ती जाती है। ज़्यादा कर्ज़दार होने के कारण किसान अपना समय, शक्ति और पैसा खेती की उन्नति में नहीं लगा पाते।
10. **अन्य कारण:** भूमि कटाव, जल-भराव, नाइट्रोजन की कमी, फसल संबंधी विभिन्न बीमारियाँ, अच्छे जानवरों की कमी और खराब बिक्री व्यवस्था आदि के कारण भी भारतीय कृषि की उत्पादकता कम है।
**कृषि-क्षेत्र में सुधार के उपाय:**
भारतीय कृषि दुनिया के अन्य देशों की तुलना में बहुत पिछड़ी अवस्था में है। प्रति हेक्टेयर ज़मीन से कम उपज मिलती है, इसलिए कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए निम्नलिखित कोशिशें की जानी चाहिए:
1. **कृषि पर जनसंख्या का दबाव कम हो:** जोतों के उपविभाजन को रोकने और कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए यह ज़रूरी है कि कृषि पर जनसंख्या का दबाव कम हो। यह तभी संभव है जब जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण किया जाए और ग्रामीण इलाकों में छोटे और कुटीर उद्योग स्थापित किए जाएँ।
2. **कृषि की नई तकनीकियों का प्रचार-प्रसार:** आज यह ज़रूरी है कि भारतीय किसानों को नए और आधुनिक कृषि-यंत्रों से अवगत कराया जाए और अच्छी गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध कराए जाएँ। तभी भारतीय कृषि के पिछड़ेपन को दूर करके उत्पादन-क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
3. **सिंचाई सुविधाओं का उचित विकास और बाढ़-नियंत्रण:** भारतीय कृषि की मानसून पर निर्भरता को खत्म करने के लिए सिंचाई-सुविधाओं का व्यापक विस्तार किया जाना चाहिए और बाढ़-नियंत्रण के उपाय अपनाने चाहिए, जिससे भूमि का कटाव रोका जा सके और फसलों की सुरक्षा हो सके।
4. **साख-सुविधाओं का विस्तार:** कृषि-क्षेत्र में नई तकनीकों को बढ़ावा देने, विपणन व्यवस्था में सुधार करने और उन्नत बीजों एवं उर्वरकों का उपयोग करने के लिए उचित शर्तों पर पर्याप्त साख-सुविधाओं की आपूर्ति की जानी चाहिए। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए।
5. **भू-सुधार कार्यक्रमों का प्रभावी क्रियान्वयन:** कृषि उत्पादकता में वृद्धि के लिए यह ज़रूरी है कि भू-धारण व्यवस्था में सुधार किया जाए, किसानों को भू-स्वामी बनाया जाए और छोटे जोतों को खत्म किया जाए।
6. **विपणन व्यवस्था में सुधार:** विपणन व्यवस्था में सुधार किया जाना चाहिए, जिससे किसानों को अपनी उपज का सही मूल्य मिले और किसान ज़्यादा मेहनत करने के लिए प्रेरित होते रहें।
7. **कृषि आगतों की उचित व्यवस्था:** खाद एवं उर्वरक, कीटनाशक दवाइयाँ और सुधरे बीजों को उचित मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में वितरित करने की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए। कृषि अनुसंधान संस्थाओं द्वारा उन्नत और बेहतरीन बीजों के उपयोग के लिए अनुसंधान किए जाने चाहिए।
8. **आपसी तालमेल और सहयोग:** कृषि से संबंधित विभिन्न संस्थाओं और सरकार के बीच, कृषि से संबंधित अधिकारियों और किसानों के बीच, तथा बड़े और छोटे किसानों के बीच आपसी तालमेल और सहयोग की भावना बनी रहनी चाहिए।
9. **कृषि का मशीनीकरण:** कृषि उत्पादकता में वृद्धि के लिए कृषि का मशीनीकरण अब ज़रूरी हो गया है, इसलिए खेती के काम में ज़्यादा से ज़्यादा ट्रैक्टरों, पंपों, आधुनिक हलों, थ्रेशिंग मशीनों आदि का व्यापक उपयोग किया जाना चाहिए।
10. **अन्य सुझाव:** उपरोक्त के अलावा कुछ और सुझाव निम्नलिखित हैं:
(1) शिक्षा के प्रसार द्वारा किसानों के पारंपरिक सोच में बदलाव लाया जाए।
(2) गहन खेती और बहुफसली कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाए।
(3) सहकारी कृषि सुविधाओं का विस्तार किया जाए।
(4) फसल बीमा योजना को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
In simple words: भारतीय खेती के पिछड़ेपन के कई कारण हैं, जैसे छोटे खेत, बारिश पर निर्भरता, ज़्यादा आबादी का बोझ, सिंचाई और पुराने औजारों की कमी, और किसानों की गरीबी. इसे सुधारने के लिए जनसंख्या कम करने, नई तकनीक अपनाने, सिंचाई बढ़ाने, कर्ज सुविधाएँ देने और ज़मीन के सुधार कार्यक्रम लागू करने जैसे उपाय किए जा रहे हैं.
🎯 Exam Tip: कृषि के पिछड़ेपन के कारणों और सुधार के उपायों को बताते समय, दोनों के बीच एक स्पष्ट संबंध स्थापित करें।
Question 6. हरित क्रान्ति क्या है ? हरित क्रान्ति के लाभों तथा हानियों का उल्लेख कीजिए।
Answer: हरित क्रान्ति का मतलब खेती की हरियाली और कृषि उत्पादन को बढ़ाना है। भारत की चौथी पंचवर्षीय योजना में देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए हरित क्रान्ति शुरू की गई थी। हरित क्रान्ति एक ऐसी रणनीति थी, जिसमें खेती की पुरानी तकनीकों की जगह आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके कृषि उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की गई। आधुनिक कृषि उपकरणों, उन्नत बीजों, रासायनिक खादों और सिंचाई सुविधाओं का तेज़ी से इस्तेमाल करके कृषि क्षेत्र में उत्पादन में क्रांति लाने की कोशिश की गई। उत्पादन तकनीक में सुधार करते हुए हल की जगह ट्रैक्टर, गोबर खाद की जगह रासायनिक खाद, पारंपरिक घरेलू बीजों की जगह उन्नत उर्वरता वाले बीज और मानसून पर सिंचाई की निर्भरता की जगह ट्यूबवेल, पंप आदि से सिंचाई करने के प्रयास हरित क्रान्ति के दौर में शुरू हुए। हरित क्रान्ति ने भारत के कृषि परिदृश्य को बदल दिया।
**हरित क्रान्ति के लाभ:**
भारतीय कृषि पर हरित क्रान्ति के सफल प्रभाव महत्वपूर्ण हैं:
1. हरित क्रान्ति से विभिन्न कृषि-फसलों का उत्पादन तेज़ी से बढ़ा है। गेहूँ, ज्वार, बाजरा जैसे खाद्य फसलों के उत्पादन में तेज़ी से वृद्धि के कारण भारत आज अनाज में आत्मनिर्भर हो चुका है।
2. हरित क्रान्ति ने खेती को एक सफल व्यवसाय के रूप में स्थापित किया है। आज खेती किसानों के लिए सिर्फ पेट भरने का ज़रिया नहीं है, बल्कि आय कमाने का एक मुख्य स्रोत बन चुकी है।
3. कृषि-क्षेत्र के विकास ने देश के औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया है। वर्तमान में खेती देश के पूंजी निर्माण और बचत में पर्याप्त योगदान दे रही है।
4. हरित क्रान्ति के कारण अनाज के मामले में भारत आत्मनिर्भर हो चुका है, जिससे देश में अनाज के आयात में तेज़ी से कमी आई है और भुगतान-संतुलन की प्रतिकूलता को कम करने में कृषि क्षेत्र ने पर्याप्त योगदान दिया है।
5. हरित क्रान्ति ने खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों में रोज़गार के कई अवसर पैदा किए हैं, जिससे देश की व्यावसायिक संरचना फैली है और आय कमाने के अवसर बढ़े हैं।
6. हरित क्रान्ति से कृषि श्रमिकों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है और मशीनों की मदद मिलने से उनका काम भी आसान हो गया है।
**हरित क्रान्ति के दोष (हानियाँ):**
भारतीय कृषि पर हरित क्रान्ति के कुछ दोष भी हैं, जो नीचे दिए गए हैं:
1. **कुछ फसलों तक सीमित:** हरित क्रान्ति का मुख्य दोष यह है कि यह गेहूँ, चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा जैसी फसलों तक ही सीमित रही। सभी फसलों को इसका फायदा नहीं मिल सका। व्यावसायिक फसलें इससे अछूती रहीं।
2. **कुछ राज्यों तक सीमित:** हरित क्रान्ति कार्यक्रम केवल उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों तक ही सीमित रहा, जिससे पूरे देश का संतुलित विकास नहीं हो पाया। दूसरे प्रदेश इससे वंचित रह गए, जिससे क्षेत्रीय असमानताएँ बढ़ गईं।
3. **बड़े किसानों को लाभ:** हरित क्रान्ति से केवल बड़े किसानों को ही लाभ हुआ है, क्योंकि छोटे किसान पैसे की कमी के कारण इस कार्यक्रम का फायदा नहीं उठा सके।
4. **लक्ष्य से कम उत्पादन:** हरित क्रान्ति का एक दोष यह है कि इसके आधार पर उम्मीद के मुताबिक उत्पादन की दिशा में सफलता नहीं मिल सकी। इसलिए लोगों का विश्वास इस कार्यक्रम से कम हो गया।
5. **पर्यावरण विघटन:** हरित क्रान्ति के कई पर्यावरणीय दुष्परिणाम हुए हैं। ज़्यादा सिंचाई के कारण भूमिगत जल-स्तर नीचे चला गया है, और मिट्टी का कटाव व ज़मीन की उत्पादकता कम हुई है। एक ही फसल लगातार बोने और उर्वरकों के ज़्यादा इस्तेमाल से मिट्टी के प्राकृतिक तत्व खत्म हो जाते हैं। इनके लंबे समय तक बुरे परिणाम होते हैं, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
**हरित क्रान्ति की सफलता संबंधी सुझाव:**
हरित क्रान्ति को सफल बनाने के उपाय/सुझाव निम्नलिखित हैं:
1. किसानों को उन्नत बीज और उर्वरक सस्ते दामों में मिलने चाहिए।
2. उपज का पर्याप्त मूल्य मिले और उसके भंडारण की व्यवस्था होनी चाहिए।
3. फसलों को आपदा से नुकसान होने पर किसानों को मुआवज़ा मिलना चाहिए।
4. कृषि शिक्षा और उन्नत प्रौद्योगिकी का प्रसार होना चाहिए।
5. शोध और अनुसंधान केंद्रों की वृद्धि की जानी चाहिए।
6. चकबंदी जैसे भूमि सुधार कार्यक्रम फिर से चलाए जाने चाहिए।
In simple words: हरित क्रान्ति का मतलब आधुनिक तरीकों से खेती करके अनाज का उत्पादन बढ़ाना था. इसके फायदे यह थे कि भारत अनाज में आत्मनिर्भर हो गया और किसानों की आय बढ़ी, लेकिन यह सिर्फ कुछ फसलों और बड़े किसानों तक ही सीमित रहा. इससे पर्यावरण को नुकसान भी हुआ. इसे सफल बनाने के लिए सस्ते बीज, भंडारण, बीमा और शिक्षा जैसे उपाय ज़रूरी हैं.
🎯 Exam Tip: हरित क्रांति के लाभ और हानियों को विस्तार से समझाते समय, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों को अलग-अलग बिंदुओं में स्पष्ट करें।
Question 7. भूमि-सुधार कार्यक्रम क्या है ? भारत में भूमिसुधार तथा उत्पादन वृद्धि के लिए किये गये प्रयासों का वर्णन कीजिए । [2010, 14]
Answer: 'भूमि-सुधार' का मतलब उन संस्थागत बदलावों से है जिनसे ज़मीन का वितरण खेती करने वाले किसानों के पक्ष में होता है और जोतों का आकार बढ़ने से खेत आर्थिक रूप से फायदेमंद बन जाते हैं। दूसरे शब्दों में, भूमि-सुधार में वे सभी काम शामिल होते हैं जिनका संबंध भूमि-स्वामित्व और भूमि जोत दोनों में सुधारों से है, जैसे-मध्यस्थों को खत्म करना, जोतों की सुरक्षा, चकबंदी, जोतों की अधिकतम सीमा तय करना, और सहकारी खेती आदि।
**(क) भारत में भूमि-सुधार के लिए किए गए प्रयास:**
आज़ादी के बाद भारत सरकार ने महसूस किया कि देश के आर्थिक विकास के लिए कृषि का विकास बहुत ज़रूरी है और कृषि का विकास भूमि-सुधारों के बिना संभव नहीं है। इसलिए पिछले सालों में भारत में कई भूमि-सुधार किए गए हैं, जिनमें से मुख्य निम्नलिखित हैं:
1. **ज़मींदारी उन्मूलन:** देश की लगभग 40% खेती योग्य ज़मीन पर मध्यस्थ या ज़मींदार का कब्जा था। ये मध्यस्थ खेती का काम कृषि-श्रमिकों से करवाते थे। 1952 तक लगभग सभी राज्यों में ज़मींदारी प्रथा को खत्म कर दिया गया था, जिससे 2 करोड़ किसानों को ज़मीन के मालिकाना हक मिल गए। यह एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक सुधार था।
2. **लगान का नियमन:** विभिन्न कानूनों के ज़रिए देश में लगान की राशि तय कर दी गई है, जिससे किसानों पर आर्थिक बोझ कम हो गया है। पहले किसानों को कुल उपज का लगभग आधा हिस्सा ज़मींदार को लगान के रूप में देना पड़ता था, लेकिन अब देश के किसी भी राज्य में लगान की दर उपज के 2.5% से ज़्यादा नहीं है।
3. **ज़मीन की बेदखली पर रोक:** विभिन्न राज्यों में कानून बनाकर भू-स्वामियों द्वारा पट्टेदारों को मनमाने ढंग से बेदखल करने के अधिकार को खत्म कर दिया गया है।
4. **जोतों की अधिकतम सीमा का निर्धारण (हदबंदी):** विभिन्न राज्यों में वहाँ की परिस्थितियों के हिसाब से जोतों की अधिकतम सीमा तय की जा चुकी है। अधिकतम सीमा से ज़्यादा ज़मीन सरकार अधिग्रहण कर लेती है और ऐसी ज़मीन को भूमिहीन किसानों में बाँट दिया जाता है। अब तक देश में 30 लाख हेक्टेयर ज़मीन अतिरिक्त घोषित की जा चुकी है, जिसमें से ज़्यादातर ज़मीन भूमिहीन किसानों में बाँटी जा चुकी है।
5. **चकबंदी:** चकबंदी का मतलब है- एक ही परिवार के बिखरे हुए खेतों को एक जगह संगठित करना। अब तक देश में लगभग 592 हेक्टेयर ज़मीन की चकबंदी की जा चुकी है। इससे खेती करने में आसानी होती है।
6. **सहकारी खेती:** इस व्यवस्था के तहत एक गाँव के किसान अपनी ज़मीन को इकट्ठा करके उसे बड़े-बड़े फार्मों में बाँट लेते हैं। ज़मीन पर किसानों का व्यक्तिगत स्वामित्व बना रहता है, लेकिन खेती के प्रबंधन के लिए किसान सहकारी समिति बना लेते हैं। सभी खेती के काम मिलकर करते हैं और लाभ को ज़मीन के मूल्य के आधार पर सदस्यों में बाँट दिया जाता है। सहकारी खेती से किसानों को बड़े पैमाने पर काम करने का लाभ मिलता है।
7. **भूदान आंदोलन:** भूदान का मतलब है- स्वेच्छा से ज़मीन दान में देना। भूमि-सुधार के इस स्वैच्छिक आंदोलन के प्रवर्तक आचार्य विनोबा भावे थे जो ज़मीन के असमान वितरण को खत्म करना चाहते थे। इस आंदोलन के फलस्वरूप 45 लाख एकड़ ज़मीन और 39,672 गाँव दान में मिल चुके हैं। 12 लाख एकड़ ज़मीन भूमिहीन किसानों में बाँटी जा चुकी है।
**(ख) उत्पादन में वृद्धि के लिए किए गए प्रयास:**
भारत सरकार द्वारा किए गए प्रयास महत्वपूर्ण हैं, जो निम्नलिखित हैं:
1. **सिंचाई और जल संसाधन:** भारत सरकार सिंचाई क्षमता को लगातार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। मार्च 2010 तक 9.82 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता बनाई गई थी। सरकार की कोशिश है कि बनाई गई क्षमता और उसके उपयोग के बीच के अंतर को पूरा किया जाए।
2. **बीज:** खेती में प्रति एकड़ ज़्यादा उत्पादन के लिए अच्छी किस्म के बीजों का उपयोग महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय बीज नीति, किसानों को बीज की बेहतरीन किस्में और पौधरोपण सामग्री पर्याप्त मात्रा में प्रदान करती है।
3. **उर्वरक:** उर्वरक (एन.पी.के.) की खपत में लगातार वृद्धि हो रही है। वर्ष 2009-10 में इसकी खपत 264.86 लाख टन तक पहुँच गई थी। उर्वरकों पर सरकार सब्सिडी भी दे रही है, जिससे किसान ज़्यादा से ज़्यादा इसका उपयोग करें।
4. **कृषि मशीनीकरण:** खेती में अब जानवरों की शक्ति का योगदान घटता जा रहा है। 1971 में 45.30% से घटकर 2001-02 के दौरान यह 9.89% ही रह गया। सिंचाई और फसल काटने तथा ग्राहकों के परिचालन में भी पर्याप्त मशीनीकरण की ओर प्रगति की गई है।
5. **कृषि ऋण का प्रवाह:** खेती और संबंधित गतिविधियों के लिए संस्थागत ऋण का प्रवाह वर्ष 2001-02 में ₹ 66,771 करोड़ के स्तर तक पहुँच गया था। किसान क्रेडिट कार्ड योजना 1998 में शुरू की गई थी। इस योजना को बहुत लोकप्रियता मिली और 27 वाणिज्यिक बैंकों, 373 जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों, राज्य सहकारी बैंकों और 196 ग्रामीण बैंकों द्वारा इसे शुरू किया गया है। 30 नवंबर, 2001 तक 20.4 मिलियन किसान क्रेडिट कार्ड, जिनमें ₹ 43,392 करोड़ के ऋण स्वीकृत हैं, जारी किए गए थे। देश में 31 मार्च, 2011 तक बैंकों द्वारा ₹ 1038 करोड़ किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए जा चुके थे। किसान क्रेडिट कार्ड धारकों के लिए दुर्घटना से होने वाली मृत्यु या स्थायी विकलांगता के लिए ₹ 50,000 और ₹ 2,50,000 के व्यक्तिगत बीमा कवच को भी अंतिम रूप दे दिया गया है।
6. **कृषि बीमा:** किसानों के हित में और खेती को एक व्यवसाय बनाने की दिशा में 'राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना' एक सराहनीय कदम है। यह योजना कृषि-मंत्रालय की ओर से साधारण बीमा निगम द्वारा लागू की जा रही है। इस योजना का उद्देश्य सूखे, बाढ़, ओलावृष्टि, चक्रवात, आग, कीट, बीमारियों जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल को हुई क्षति से किसानों का संरक्षण करना है।
7. **कृषि-शिक्षण एवं अनुसंधान:** देश में कृषि-शिक्षण के लिए 21 विश्वविद्यालय खोले गए हैं। इसके अतिरिक्त रेडियो और दूरदर्शन पर भी हर दिन कृषि-उत्पादन बढ़ाने के उपाय बताए जाते हैं। कृषि संबंधी शोध और अनुसंधान पर ज़ोर दिया जा रहा है।
8. **कृषि उपज की बिक्री में सुधार:** किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलवाने के लिए कई कोशिशें की गई हैं:
- **नियमित मंडियाँ:** अब तक 7000 से ज़्यादा मंडियों को नियमित किया जा चुका है।
- **मूल्य समर्थन नीति:** इसमें सरकार किसानों को उनकी उपज की न्यूनतम कीमत देने का भरोसा दिलाती है। यह नीति गेहूँ, चावल, कपास, चना आदि उपज पर लागू की गई है।
- **सहकारी विपणन समितियाँ:** ये समितियाँ अपने सदस्यों की उपज को उचित मूल्यों पर बेचती हैं, जिससे किसानों के आर्थिक लाभ में वृद्धि होती है।
9. **भंडारण एवं वितरण की व्यवस्था:** अनाज के भंडारण के लिए गोदाम बनाए गए हैं और उनका सही वितरण किया जाता है। इससे अनाज की बर्बादी रुकती है और किसानों को बेहतर मूल्य मिलता है।
In simple words: भूमि-सुधार का मतलब है ज़मीन के मालिकाना हक और उसके इस्तेमाल में बदलाव लाकर किसानों का फायदा करना. भारत सरकार ने ज़मींदारी खत्म की, लगान तय किया, ज़मीन की हदबंदी की और चकबंदी जैसे काम किए. उत्पादन बढ़ाने के लिए सिंचाई, अच्छे बीज, खाद, कृषि ऋण, बीमा और कृषि शिक्षा पर ध्यान दिया गया.
🎯 Exam Tip: भूमि सुधार और कृषि उत्पादन वृद्धि के प्रयासों का वर्णन करते समय, प्रत्येक प्रयास के उद्देश्य और परिणामों को स्पष्ट करें।
Question 8. निम्नलिखित में से किन्हीं दो पर टिप्पणियाँ लिखिए – (क) जमींदारी उन्मूलन, (ख) चकबन्दी तथा (ग) हदबन्दी ।
Answer:
**(क) ज़मींदारी उन्मूलन:**
देश की लगभग 40 प्रतिशत कृषि योग्य ज़मीन पर मध्यस्थ या ज़मींदार का कब्ज़ा था। ये मध्यस्थ खेती का काम कृषि-श्रमिकों से करवाते थे। आज़ादी के बाद, 1952 तक लगभग सभी राज्यों में ज़मींदारी प्रथा को खत्म कर दिया गया, जिससे 2 करोड़ किसानों को ज़मीन के मालिकाना हक मिल गए। इसके अलावा, ज़मींदारों द्वारा किसानों का शोषण भी खत्म हो गया और वे मन लगाकर खेती करने लगे, जिससे कृषि उत्पादन बढ़ा। किसानों का सरकार से सीधा संबंध स्थापित हो जाने के कारण अब किसानों को सरकारी सहायता प्राप्त करने में भी कोई कठिनाई नहीं रही है।
**(ख) चकबंदी:**
चकबंदी का मतलब है एक ही परिवार के बिखरे हुए खेतों को एक जगह इकट्ठा करना। अब तक देश में लगभग 592 हेक्टेयर ज़मीन की चकबंदी की जा चुकी है। चकबंदी दो तरह की होती है-स्वैच्छिक चकबंदी और अनिवार्य चकबंदी। स्वैच्छिक चकबंदी में किसानों पर बिखरे हुए खेतों की चकबंदी कराने के लिए कोई दबाव नहीं डाला जाता, बल्कि किसान की इच्छा पर छोड़ दिया जाता है, जबकि अनिवार्य चकबंदी में किसानों की इच्छा का ध्यान नहीं रखा जाता, बल्कि किसानों को अनिवार्य रूप से चकबंदी करानी पड़ती है। भारत में चकबंदी का काम तेज़ी से चल रहा है। पंजाब और हरियाणा में चकबंदी का काम पूरा हो चुका है। उत्तर प्रदेश में भी 90% काम पूरा हो चुका है। इससे खेती करने में सुविधा हुई है।
**चकबंदी के मार्ग में आने वाली कठिनाइयाँ निम्नलिखित हैं:**
1. किसानों का अपनी पैतृक ज़मीन से लगाव और मोह चकबंदी के प्रयासों में कई बाधाएँ खड़ी करता है।
2. किसान की बिखरी हुई ज़मीनें अलग-अलग उपजाऊपन वाली होती हैं, जिनका स्थिति के अनुसार अलग-अलग मूल्य होता है। चकबंदी में किसानों को अपनी ज़मीन का उचित मूल्य नहीं मिलता और ज़्यादातर ज़मीन की कम उपजाऊपन की समस्या चकबंदी के काम में बाधा डालती है।
3. पक्षपात और गलत तरीके से की गई चकबंदी प्रशासन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है। इस पक्षपातपूर्ण रवैये के कारण किसान चकबंदी का विरोध करते हैं।
4. चकबंदी में बहुत कम किसानों को कई खेतों के बदले एक खेत मिलता है। ज़्यादातर किसानों को उनके बिखरे हुए खेतों के बदले दो या तीन चक दिए जाते हैं, जो चकबंदी के मूल उद्देश्य के खिलाफ है।
**चकबंदी के लाभ:**
चकबंदी में कई कठिनाइयाँ होते हुए भी यह किसानों को कई तरह से फायदा पहुँचाती है:
1. छोटे-छोटे खेतों की मेड़ों में ज़मीन की बर्बादी नहीं होती।
2. बड़े चक के रूप में खेत का आकार बड़ा हो जाने के कारण आधुनिक उपकरणों जैसे ट्रैक्टर आदि का उपयोग करना आसान हो जाता है।
3. एक जगह ज़मीन हो जाने के कारण खेती के कामों की सही देखभाल संभव हो पाती है।
4. कृषि उत्पादन से आय और किसान के रहन-सहन के स्तर में सुधार होता है।
5. खेत का आकार ज़्यादा हो जाने से औसत उत्पादन लागत कम हो जाती है।
6. कानूनी रूप से चक बन जाने के कारण ज़मीन के टुकड़ों की सीमा को लेकर उत्पन्न होने वाले विवाद खत्म हो जाते हैं, जिससे शांति बनी रहती है।
**(ग) हदबंदी:**
एक किसान को उतनी ही ज़मीन का मालिक होना चाहिए जितनी ज़मीन वह खुद जोत सकता है। इससे ज़्यादा ज़मीन पर वह मध्यस्थ का ही काम करेगा। इसलिए भू-जोतों की अधिकतम सीमा (हदबंदी) लागू की जानी चाहिए। इस अतिरिक्त ज़मीन को भूमि जोतने वाले अन्य कृषि श्रमिकों में बाँट देना चाहिए। भारत के राज्यों में भूमि की हदबंदी के कानूनों को लागू करने के परिणामस्वरूप लगभग 30 लाख हेक्टेयर ज़मीन को अतिरिक्त घोषित कर दिया गया है। भूमि जोतों की हदबंदी करने के चार उद्देश्य हैं:
1. बड़े-बड़े भूखंडों को प्रबंधन योग्य छोटे भूखंडों में बदलना ताकि उत्पादकता में वृद्धि की जा सके।
2. किसानों की ज़रूरत से ज़्यादा ज़मीन को भूमिहीन किसानों में बांटकर सामाजिक न्याय स्थापित करना।
3. इस योजना द्वारा ज़्यादा से ज़्यादा व्यक्तियों को रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराना।
4. अतिरिक्त बंजर ज़मीन पर कमज़ोर वर्ग के लोगों को घर बसाने की सुविधा देना।
In simple words: ज़मींदारी उन्मूलन से किसानों को ज़मीन का हक मिला; चकबंदी से बिखरे खेत एक जगह आए, जिससे खेती आसान हुई, लेकिन इसमें कुछ दिक्कतें भी आईं. हदबंदी ने ज़मीन की ऊपरी सीमा तय की ताकि अतिरिक्त ज़मीन भूमिहीन लोगों में बांटी जा सके और सामाजिक न्याय हो.
🎯 Exam Tip: जमींदारी उन्मूलन, चकबंदी और हदबंदी जैसे भूमि सुधारों की व्याख्या करते समय, उनके मुख्य उद्देश्य, क्रियान्वयन और प्रभावों को स्पष्ट करें।
Question 9. भारतीय कृषि का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(क) कृषि निविष्टियाँ और उनका महत्त्व [2014]
(ख) भावी सम्भावनाएँ।
Answer:
**(क) कृषि निविष्टियाँ और उनका महत्त्व:**
भारतीय कृषि में अच्छे उत्पादन के लिए कई तरह की चीज़ों और सेवाओं की ज़रूरत होती है, जिन्हें कृषि निविष्टियाँ कहते हैं। ये निविष्टियाँ खेती के विकास और उत्पादकता के लिए बहुत ज़रूरी हैं। प्रमुख निविष्टियों में तकनीकी जानकारी (जैसे उन्नत बीज, खाद), अपना और किराए का श्रम, पशुधन (बैल, गाय), आधुनिक कृषि उपकरण (ट्रैक्टर, नलकूप), सिंचाई की सुविधाएँ, कीटनाशक, भंडारण और वित्तीय सहायता शामिल हैं। इन सभी का सही उपयोग खेती को सफल बनाता है और किसानों की आय बढ़ाता है। इन निविष्टियों की उपलब्धता और गुणवत्ता भारतीय कृषि के भविष्य को तय करती है, क्योंकि इनके अभाव में खेती करना मुश्किल हो जाता है।
**(ख) भावी सम्भावनाएँ:**
कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय कृषि की भविष्य की संभावनाएँ बहुत अच्छी हैं, क्योंकि भारतीय कृषि में सुधार शुरू हो गए हैं और कई क्षेत्रों में इसके विस्तार की संभावनाएँ हैं। ये संभावनाएँ निम्नलिखित हैं:
1. **उर्वरक का ज़्यादा उपयोग:** प्रति हेक्टेयर लगभग 50 किलोग्राम उर्वरक का उपयोग होता है। इसका मतलब है कि किसान उन्नत बीजों और विकसित उत्पादन तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। यह दिखाता है कि नई तकनीक के विस्तार से कृषि उत्पादन और उत्पादकता में काफी वृद्धि होगी। इस ज़्यादा उपज देने वाली तकनीक का विस्तार करके अन्य फसलों के उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि करना संभव है।
2. **सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार:** छोटी, मध्यम और बड़ी सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार करके दूर-दराज के क्षेत्रों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराकर कृषि उत्पादकता में वृद्धि करना संभव है।
3. **शुष्क कृषि में सुधार:** ऐसे क्षेत्रों में, जहाँ सिंचाई के लिए पानी पहुँचाना संभव नहीं है, शुष्क कृषि-भूमि में उचित प्रकार के प्रौद्योगिकीय सुधारों को लागू करने की भी संभावनाएँ हैं, जिससे इन क्षेत्रों में भी खेती की जा सके।
4. **भूमि-सुधार कार्यक्रमों का सख़्ती से लागू करना:** देश में भूमि-सुधार कार्यक्रमों को सख़्ती से लागू करके कृषि की कमियों को दूर करना संभव है। भारत में खाली ज़मीन और अन्य ज़मीनें काफी मात्रा में ऐसी हैं, जिनमें सुधार करके कृषि-भूमि में वृद्धि की जा सकती है और कृषि उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
In simple words: कृषि निविष्टियाँ वे ज़रूरी चीज़ें हैं जो खेती के लिए चाहिए होती हैं, जैसे बीज, पानी और उपकरण. भारतीय कृषि का भविष्य उज्ज्वल है क्योंकि किसान अब ज़्यादा उर्वरक इस्तेमाल कर रहे हैं, सिंचाई बढ़ रही है, और शुष्क खेती में भी सुधार की संभावनाएँ हैं. भूमि सुधारों से भी खेती को फायदा होगा.
🎯 Exam Tip: कृषि निविष्टियों का वर्णन करते समय उनकी उपयोगिता स्पष्ट करें। भावी संभावनाओं के लिए हमेशा ठोस उपायों और उनके अपेक्षित परिणामों पर ध्यान दें।
Question 10. कृषि श्रमिक किसे कहते हैं ? कृषि श्रमिकों की किन्हीं चार प्रमुख समस्याओं का वर्णन कीजिए। इन समस्याओं के समाधान के लिए उपाय सुझाइए। [2014]
Answer: कृषि श्रमिक ऐसे व्यक्ति होते हैं जो अपनी रोज़ी-रोटी के लिए खेती पर निर्भर करते हैं। दूसरे शब्दों में, उनकी ज़्यादातर आय खेती में मज़दूरी करके आती है। भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ 70% लोग खेती से जुड़े कामों में लगे हुए हैं, लेकिन सभी किसान नहीं हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके पास ज़मीन नहीं होती और वे दूसरों की ज़मीन पर काम करते हैं। वे अपनी शारीरिक शक्ति, हल-बैल और अन्य उपकरणों से दूसरों की ज़मीन जोतते हैं और उत्पन्न फसल में से एक निश्चित हिस्सा प्राप्त करते हैं। ये कभी-कभी बंधुआ मज़दूर के रूप में भी काम करते हैं। ऐसे व्यक्ति कृषि श्रमिक की श्रेणी में आते हैं। कृषि जाँच समिति के अनुसार, "कृषि श्रमिक वह व्यक्ति है, जो साल भर अपने काम के ज़्यादातर दिनों में आधे से ज़्यादा दिन किराए के श्रमिक के रूप में कृषि-कामों में लगा रहता है।"
**भारतीय कृषि श्रमिकों की समस्याएँ:**
भारतीय कृषि श्रमिकों के सामने मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं:
1. **मौसमी रोज़गार और बेरोज़गारी:** ज़्यादातर कृषि श्रमिकों को साल भर काम नहीं मिलता। 7.46 करोड़ कृषि श्रमिकों को साल में सिर्फ 197 दिन, यानी साढ़े छह महीने काम मिलता है। 40 दिन वह अपना काम करता है और बाकी 128 दिन, यानी लगभग 4 महीने बेकार रहता है। बाल श्रमिकों को साल में केवल 204 दिन और महिला श्रमिकों को 141 दिन रोज़गार मिलता है। बाकी समय में ये लोग बेरोज़गार रहते हैं।
2. **कर्ज़ग्रस्तता:** भारतीय कृषि श्रमिकों को कम मज़दूरी मिलती है। वे साल में कई महीने बेरोज़गार रहते हैं। इस कारण उनकी गरीबी बढ़ जाती है। अपने सामाजिक कार्यों जैसे शादी, जन्म, मृत्यु आदि के खर्चों को पूरा करने के लिए वे महाजनों से कर्ज़ लेते हैं। नतीजतन, कर्ज़ग्रस्तता बढ़ जाती है और वे महाजन के चंगुल से कभी निकल नहीं पाते।
3. **कम मज़दूरी और निम्न जीवन-स्तर:** भारत में कृषि श्रमिकों की मज़दूरी उनकी उम्र, लिंग आदि से तय होती है। सामान्यतः स्त्रियों, बच्चों और बूढ़ों को कम मज़दूरी दी जाती है। औसत दैनिक मज़दूरी इतनी कम होती है कि उस कम आय से कृषि श्रमिकों की ज़रूरी ज़रूरतें भी पूरी नहीं हो पातीं। इस कारण उनका जीवन-स्तर बहुत निम्न कोटि का होता है।
4. **बेगार की समस्या:** ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ बड़े भू-स्वामी कृषि श्रमिकों को कर्ज़ देते हैं। जब तक श्रमिक वह कर्ज़ वापस नहीं लौटाते, तब तक वे श्रमिकों को कम मज़दूरी देकर काम लेते हैं और कभी-कभी बिना मज़दूरी दिए बेगार के रूप में भी काम करवाते हैं। यह एक गंभीर शोषण है।
5. **आवास की समस्या:** कृषि श्रमिकों की रहने की स्थिति दयनीय होती है। इनके मकान ज़्यादातर मिट्टी के कच्चे या झोपड़ियाँ होते हैं, जिनमें सर्दी, गर्मी और बारिश के मौसम में सुरक्षा की कमी होती है। ज़्यादातर परिवार और जानवर रात के समय एक ही मकान में रहते हैं, जिससे वातावरण भी दूषित रहता है।
6. **सहायक धंधों की कमी:** भारतीय कृषि श्रमिक साल में लगभग 4 महीने बेकार रहते हैं। इस बेकार समय में उन्हें कोई और काम नहीं मिल पाता, क्योंकि पैसे की कमी के कारण वे सहायक कुटीर-धंधे भी स्थापित नहीं कर पाते।
7. **मशीनीकरण से उत्पन्न समस्या:** आज खेती के क्षेत्र में कई नए उपकरण और मशीनें ज़्यादा इस्तेमाल हो रही हैं। नतीजतन, कृषि श्रमिकों के सामने और भी ज़्यादा बेरोज़गारी की समस्या उत्पन्न होती जा रही है।
**कृषि श्रमिकों की समस्याओं के समाधान हेतु सुझाव:**
भारतीय कृषि श्रमिकों की दशा में सुधार करने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं:
1. **जनसंख्या पर नियंत्रण:** कृषि श्रमिकों की दशा में सुधार करने के लिए ज़रूरी है कि जनसंख्या-वृद्धि पर नियंत्रण किया जाए। इसके लिए परिवार नियोजन कार्यक्रम के प्रति श्रमिकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
2. **न्यूनतम मज़दूरी कानून का प्रभावी क्रियान्वयन:** कृषि श्रमिकों के लिए जो मज़दूरी अधिनियम सरकार द्वारा बनाया गया है, उस नियम को कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए।
3. **काम करने की परिस्थितियों में सुधार:** मौसम की दृष्टि से श्रमिक को किसी भी प्रकार की सुविधा नहीं होती, जिसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसलिए कृषि श्रमिकों की काम करने की परिस्थितियों में बदलाव लाना चाहिए। उन्हें धूप, बारिश और ठंड से बचाने के उपाय करने चाहिए।
4. **शिक्षा का प्रसार:** ज़्यादातर कृषि श्रमिक अशिक्षित हैं। उन्हें अपने अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में उचित जानकारी नहीं है। इसके लिए कृषि श्रमिकों को शिक्षित करना अनिवार्य है। शिक्षा से वे बेहतर निर्णय ले पाएंगे और अपने अधिकारों के लिए लड़ पाएंगे।
5. **कृषि श्रमिकों का मज़बूत संगठन:** औद्योगिक श्रमिकों की तरह कृषि श्रमिकों को भी अपने अधिकारों की रक्षा और विकास के लिए मज़बूत श्रमिक संगठन बनाने चाहिए।
6. **वैकल्पिक रोज़गार की व्यवस्था:** कृषि श्रमिकों की समस्याओं के समाधान हेतु ज़रूरी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि व्यवसाय के अलावा कुटीर उद्योग, लघु उद्योग और अन्य ग्रामीण व्यवसायों का ज़्यादा से ज़्यादा विकास किया जाए।
7. **भूमिहीन श्रमिकों के लिए भूमि की व्यवस्था:** भूमिहीन श्रमिकों की दशा में सुधार करने और उन्हें शोषण से मुक्त कराने के लिए यह ज़रूरी है कि उनके लिए भूमि की व्यवस्था की जाए।
8. **आवास की व्यवस्था:** कृषि श्रमिकों को मकान के लिए मुफ्त ज़मीन और बनाने के लिए आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
**समस्या के निवारण हेतु सरकार द्वारा किये गये प्रयास:**
कृषि श्रमिकों की समस्या के निवारण हेतु सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं:
1. **बंधुआ मज़दूरी प्रथा का अंत:** ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन मज़दूरों की एक बड़ी संख्या ऐसी थी जो बंधुआ मज़दूरों के रूप में काम करती थी। जुलाई, 1975 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 20 सूत्री कार्यक्रम के तहत यह घोषणा की कि अगर कहीं बंधुआ मज़दूर हैं तो उन्हें मुक्त किया जाए। केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने एक अध्यादेश जारी करके बंधुआ मज़दूरी प्रथा को समाप्त कर दिया।
2. **न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम:** 1948 में भारत सरकार ने कृषि श्रमिकों पर न्यूनतम मज़दूरी कानून लागू किया था। इस कानून में 1951, 54, 59, 60 तथा 75 में संशोधन किए गए। इस कानून द्वारा मज़दूरों की न्यूनतम मज़दूरी की दर निर्धारित कर दी गई है।
3. **भूमिहीन श्रमिकों के लिए भूमि की व्यवस्था:** सरकार ने जोतों की सीमा तय करके अतिरिक्त भूमि को भूमिहीन कृषि श्रमिकों में बाँटने की व्यवस्था की तथा भूदान (भूदान आंदोलन 1952 में शुरू हुआ), ग्रामदान आंदोलनों आदि से प्राप्त भूमि को भूमिहीन कृषि श्रमिकों में बाँटा गया। लगभग सभी राज्य सरकारों ने इस प्रकार से प्राप्त भूमि के हस्तांतरण और प्रबंधन के लिए आवश्यक कानून बनाए हैं।
4. **भूमिहीन कृषि श्रमिकों के लिए आवास-व्यवस्था:** भूमिहीन कृषि श्रमिकों को मकान बनाने के लिए मुफ्त ज़मीन की व्यवस्था कराने की योजना को 1971 से शुरू किया गया है। गरीब परिवारों को आवास-सुविधा उपलब्ध कराने के लिए निर्बल वर्ग आवास योजना तथा इंदिरा आवास योजनाएँ चल रही हैं।
5. **ग्रामीण कार्य योजना:** कृषि श्रमिकों की बेरोज़गारी दूर करने के लिए केंद्रीय सरकार द्वारा ग्रामीण कार्य योजना शुरू की गई। इसके तहत छोटे और मध्यम सिंचाई साधनों का विकास, भूमि संरक्षण आदि कार्य शामिल हैं।
6. **कृषि श्रमिक सहकारिता संगठन:** कृषि श्रमिक सहकारी समितियाँ, लघु एवं सीमांत कृषकों, ग्रामीण दस्तकारों तथा श्रमिकों को सुविधाएँ देने के उद्देश्य से स्थापित की गई हैं। ऐसी समितियाँ नहरों और तालाबों की खुदाई, सड़कों के निर्माण आदि कार्यों का ठेका लेती हैं, जिससे श्रमिकों को रोज़गार के अवसर मिलते हैं। अब तक लगभग ऐसी 213 समितियों की स्थापना हो चुकी है।
7. **कुटीर एवं लघु उद्योगों का विकास:** खेती पर बढ़ती हुई जनसंख्या के भार को कम करने के लिए सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर एवं लघु उद्योगों के विकास को महत्व दिया है।
8. **सीमांत कृषक और कृषि श्रमिक योजना:** सीमांत कृषकों तथा कृषि श्रमिकों की सहायता के लिए सरकार ने देश के 87 जिलों में पायलट प्रोजेक्ट्स चलाए हैं। इस कार्यक्रम के तहत प्रत्येक जिले में 20 हज़ार सीमांत कृषकों तथा कृषि श्रमिकों को वित्तीय सहायता दी गई है।
9. **ऋण-मुक्ति कानून:** कृषि श्रमिकों को कर्ज़ से मुक्ति दिलाने के लिए उत्तर प्रदेश तथा कई अन्य राज्यों ने अध्यादेश के माध्यम से कानून बनाया है। 1975 में लघु कृषकों, भूमिहीन कृषकों व कारीगरों को महाजनों के कर्ज़ों से मुक्ति की घोषणा की गई है।
In simple words: कृषि श्रमिक वे लोग हैं जो खेती में मज़दूरी करके जीते हैं. उनकी मुख्य समस्याएँ हैं कि उन्हें पूरा साल काम नहीं मिलता, वे कर्ज़दार रहते हैं और उनकी मज़दूरी बहुत कम होती है. सरकार ने बंधुआ मज़दूरी खत्म की, न्यूनतम मज़दूरी तय की, और भूमिहीन मज़दूरों के लिए ज़मीन और घर की व्यवस्था की.
🎯 Exam Tip: कृषि श्रमिकों की समस्याओं को बताते समय उनके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर जोर दें। समाधानों में सरकारी नीतियों और सामाजिक संगठनों की भूमिका का उल्लेख करें।
लघु उत्तरीय प्रश्न
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के योगदान पर प्रकाश डालिए।
Answer: भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ की अर्थव्यवस्था में कृषि का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। देश की अधिकांश जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर करती है। कृषि हमारे देश के कई उद्योगों के लिए कच्चा माल भी देती है। इसलिए, कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की नींव मानी जाती है। इसका योगदान इस प्रकार है:
1. **राष्ट्रीय आय का मुख्य आधार:** भारत की 58% से अधिक आबादी कृषि और संबंधित कामों से जुड़ी है। कृषि राष्ट्रीय आय का एक बड़ा स्रोत है, लगभग 28% आय कृषि से आती है।
2. **विदेशी व्यापार में महत्व और विदेशी मुद्रा की प्राप्ति:** कृषि भारत के कुल निर्यात का 13% से 18% हिस्सा है। कृषि उत्पाद जैसे चावल, चाय, मसाले और फल-सब्जियाँ निर्यात करके देश को विदेशी मुद्रा कमाने में मदद करते हैं।
3. **उद्योगों का आधार:** भारत के कई बड़े उद्योग, जैसे सूती वस्त्र, चीनी, जूट, और वनस्पति तेल, कृषि से मिलने वाले कच्चे माल पर निर्भर करते हैं। ट्रैक्टर, उर्वरक और कीटनाशक बनाने वाले उद्योग भी कृषि पर आधारित हैं।
4. **राजस्व की प्राप्ति:** कृषि राज्य सरकारों को लगान के रूप में राजस्व देती है। मण्डी समितियाँ और स्थानीय निकाय भी कृषि उत्पादों पर टैक्स वसूलते हैं।
5. **रोजगार के अवसर:** कृषि क्षेत्र देश की लगभग 58% जनसंख्या को सीधा और अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है। यह इतने बड़े देश में रोजगार के अवसर प्रदान करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
6. **पूँजी संचय में योगदान:** कृषि देश के आर्थिक विकास के लिए पूंजी जमा करने में सहायक होती है, क्योंकि इससे उत्पादन और आय बढ़ती है।
7. **खाद्य पदार्थों की प्राप्ति:** भारतीय जनसंख्या को भोजन कृषि से ही मिलता है। हरित क्रांति के कारण भारत अब खाद्य पदार्थों में आत्मनिर्भर हो गया है, जिससे हमें विदेशों से अनाज नहीं मंगाना पड़ता।
8. **आजीविका का आधार:** भारत की लगभग तीन-चौथाई आबादी गांवों में रहती है, और उनकी मुख्य आजीविका कृषि से ही है। लगभग दो-तिहाई जनसंख्या कृषि-कार्य से जीविका प्राप्त करती है, जिसमें भूमिहीन किसान और कृषि मजदूर भी शामिल हैं।
9. **बाजार के विस्तार में सहायक:** कृषि उत्पादन बढ़ने से वस्तुओं की मांग बढ़ती है, जिससे बाजार का विकास होता है।
10. **परिवहन का विकास:** कृषि उत्पादों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए रेल और सड़क परिवहन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे कृषि परिवहन सेवाओं का विकास होता है। निष्कर्ष के तौर पर, भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, और इसी के कारण इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।
In simple words: कृषि भारत की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। यह लोगों को रोजगार देती है, उद्योगों के लिए कच्चा माल देती है, राष्ट्रीय आय बढ़ाती है, और देश को खाद्य सुरक्षा देती है।
🎯 Exam Tip: कृषि के महत्व को बताते समय हमेशा आर्थिक और सामाजिक दोनों पहलुओं को शामिल करें, जैसे रोजगार, आय, खाद्य सुरक्षा और औद्योगिक आधार।
Question 2. भूमि-सुधार से किसानों को मिलने वाले चार लाभों का उल्लेख कीजिए ।
Answer: भूमि-सुधार से किसानों को मिलने वाले चार मुख्य लाभ इस प्रकार हैं:
1. **भूमि का अपव्यय कम होना:** छोटे-छोटे खेतों की मेड़ों में बर्बाद होने वाली जमीन कम हो जाती है। जब खेत बड़े हो जाते हैं तो उसका सही इस्तेमाल हो पाता है।
2. **आधुनिक उपकरणों का उपयोग:** बड़े और संगठित खेतों पर ट्रैक्टर जैसे आधुनिक कृषि उपकरणों का इस्तेमाल करना आसान हो जाता है, जिससे काम जल्दी और अच्छे से होता है।
3. **उचित देखभाल संभव:** जब किसानों के खेत एक ही जगह होते हैं, तो कृषि से जुड़े कामों की अच्छी देखभाल करना संभव हो पाता है। इससे फसलों की निगरानी आसान हो जाती है।
4. **उत्पादन और आय में सुधार:** कृषि उत्पादन बढ़ने से किसानों की आय बढ़ती है, जिससे उनका जीवन-स्तर भी बेहतर होता है। भूमि सुधार से कृषि की उत्पादकता बढ़ती है।
In simple words: भूमि सुधार से किसानों को बड़े खेत मिलते हैं, जिससे वे आधुनिक मशीनों का उपयोग करके अधिक उत्पादन कर पाते हैं और उनकी आय बढ़ जाती है।
🎯 Exam Tip: भूमि-सुधार के लाभों को बताते समय हमेशा दक्षता, उत्पादकता और किसान के जीवन-स्तर पर पड़ने वाले सीधे प्रभावों पर जोर दें।
Question 3. भारत की राष्ट्रीय आय में कृषि का क्या योगदान है ?
Answer: भारत की राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान महत्वपूर्ण है। 2009-10 में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर 8.4 प्रतिशत थी, जो 2011-12 में घटकर 6.9 प्रतिशत हो गई थी और लगभग 6.5 प्रतिशत अनुमानित थी। इस धीमी वृद्धि का मुख्य कारण 2011-12 में औद्योगिक विकास में कमी थी, लेकिन निर्यात में कमी को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। कृषि क्षेत्र राष्ट्रीय आय का एक प्रमुख स्रोत और आधार है। राष्ट्रीय आय का लगभग एक-तिहाई हिस्सा कृषि क्षेत्र से आता है। यह एक विकासशील अर्थव्यवस्था की खास पहचान है। जैसे-जैसे आर्थिक विकास आगे बढ़ता है, कृषि का योगदान कम होता जाता है और उद्योगों का योगदान बढ़ता जाता है। भारत में भी ऐसा ही हो रहा है, और आने वाले समय में कृषि का योगदान राष्ट्रीय आय में सबसे बड़ा बना रहेगा।
In simple words: कृषि भारत की राष्ट्रीय आय का एक बड़ा हिस्सा बनाती है, लगभग 28%। यह अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है, खासकर गांवों में, और विकास के साथ इसका स्वरूप बदल रहा है।
🎯 Exam Tip: राष्ट्रीय आय में कृषि के योगदान को बताते समय, जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी और अन्य क्षेत्रों से इसके संबंधों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।
Question 4. भूमि के उपविभाजन तथा अपखण्डन से क्या अभिप्राय है ? भारत में भूमि के अपखण्डन के क्या कारण हैं ?
Answer:
**उपविभाजन:** जब भूमि को किसी कारण से दो या दो से अधिक छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा जाता है, तो इसे भूमि का उपविभाजन कहते हैं। यह उत्तराधिकार के नियमों या अन्य कारणों से हो सकता है। जैसे, परिवार के मुखिया की मृत्यु के बाद उसकी जमीन बेटों में बांट दी जाती है।
**अपखण्डन:** इसका मतलब है कृषि की वह सारी जमीन जो एक जगह न होकर कई अलग-अलग और छोटे-छोटे टुकड़ों में फैली हुई हो। हर हिस्सेदार को अपनी जमीन के इन सभी बिखरे हुए टुकड़ों में से अपना हिस्सा मिलता है।
भारत में भूमि के अपखण्डन के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. **उत्तराधिकार के नियम:** पुरानी परंपरा के अनुसार, पिता की संपत्ति बच्चों में बंट जाती है, जिससे जमीन के टुकड़े होते जाते हैं।
2. **जनसंख्या की तीव्र वृद्धि:** जनसंख्या तेजी से बढ़ने के कारण हर व्यक्ति के हिस्से में कम जमीन आती है, जिससे जमीन के टुकड़े और छोटे होते जाते हैं।
3. **पैतृक भूमि के प्रति लगाव:** किसान अपनी पुश्तैनी जमीन को बेचना नहीं चाहते, भले ही वह छोटी और बिकी हुई हो। वे उससे जुड़े रहना चाहते हैं।
4. **भारतीय कृषकों की ऋणग्रस्तता:** किसान अक्सर कर्ज में डूबे होते हैं और उन्हें अपनी जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े बेचने पड़ते हैं ताकि वे कर्ज चुका सकें।
5. **ग्रामीण उद्योगों का पतन:** गांवों में छोटे उद्योग खत्म हो गए हैं, जिससे लोगों के पास कृषि के अलावा रोजगार के कम विकल्प बचे हैं। इससे वे कृषि भूमि पर अधिक निर्भर होते हैं।
6. **कृषकों की अज्ञानता एवं शिक्षा का अभाव:** कई किसान अशिक्षित होते हैं और उन्हें अपनी जमीन को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने की जानकारी नहीं होती, जिससे अपखण्डन की समस्या बनी रहती है।
7. **संयुक्त परिवार प्रणाली का ह्रास:** पहले संयुक्त परिवार में जमीन एक साथ रहती थी, लेकिन अब परिवारों के बंटने से जमीन भी बंट जाती है, जिससे अपखण्डन बढ़ता है।
In simple words: उपविभाजन का मतलब है जमीन का कई हिस्सों में बंटना, और अपखण्डन का मतलब है कि एक ही मालिक की जमीन अलग-अलग जगहों पर फैली हुई है। यह मुख्य रूप से जनसंख्या बढ़ने और उत्तराधिकार के नियमों के कारण होता है।
🎯 Exam Tip: उपविभाजन और अपखण्डन की परिभाषाओं को स्पष्ट रूप से अलग-अलग करें और अपखण्डन के कारणों को बिंदुवार समझाएं।
Question 5. हरित क्रान्ति ने भारत की खाद्य समस्या को हल करने में क्या योगदान दिया है ?
Answer: भारत की लगातार बढ़ती जनसंख्या के लिए अधिक खाद्य पदार्थों का उत्पादन करना बहुत जरूरी था। इसलिए, सरकार ने खाद्य उत्पादन बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए। उन्नत बीज, खाद, रासायनिक उर्वरकों का उपयोग किया गया, सिंचाई की अच्छी व्यवस्था की गई और नए उपकरणों का इस्तेमाल किया गया। इन प्रयासों से गेहूं और चावल के उत्पादन में बहुत ज्यादा वृद्धि हुई। खाद्य पदार्थों के उत्पादन में आई इस क्रांति को ही हरित क्रांति कहा जाता है। हरित क्रांति कार्यक्रम से देश के कृषि उत्पादन में अद्भुत वृद्धि हुई है। 1977 से पहले भारत अनाज विदेशों से मंगाता था, लेकिन अब इस क्षेत्र में भारत लगभग आत्मनिर्भर बन गया है। डॉ. सी.एच. हनुमंतराव के अनुसार, हरित क्रांति के लाभ गांवों के सभी वर्गों को मिले हैं और इससे असली मजदूरी तथा रोजगार में वृद्धि हुई है। अगर हरित क्रांति को सही तरीके से लागू किया जाए, तो यह कृषि जगत के लिए एक बड़ा वरदान साबित होगी।
In simple words: हरित क्रांति ने भारत को खाद्य पदार्थों के मामले में आत्मनिर्भर बना दिया। नए बीज, खाद और सिंचाई के तरीकों का उपयोग करके गेहूं और चावल का उत्पादन बहुत बढ़ा, जिससे देश को अब विदेश से अनाज नहीं मंगाना पड़ता।
🎯 Exam Tip: हरित क्रांति के योगदान को समझाते समय, हमेशा इसकी आत्मनिर्भरता और उत्पादन वृद्धि पर पड़ने वाले प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करें, खासकर गेहूं और चावल जैसी फसलों पर।
Question 6. भारत में कृषि के विकास में प्रयोग की जाने वाली नवीन तकनीकों का उल्लेख कीजिए।
Answer: भारत में अब कृषि के क्षेत्र में उत्पादन के पुराने और पारंपरिक तरीकों की जगह नई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। भूमि-सुधार से अब जमीन की मालिकी प्रणाली में बदलाव लाने, अधिकतम जमीन की सीमा तय करने और खेतों की चकबंदी पर जोर दिया जा रहा है। इसी तरह, आधुनिक तकनीक से अधिक उपज वाले बीजों, उर्वरकों, कीटनाशकों और पानी के नियंत्रित उपयोग पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। इस तरह नई कृषि तकनीक को 'पैकेज दृष्टिकोण' कहते हैं, क्योंकि इसमें सभी तत्वों को एक साथ इस्तेमाल करना होता है। नई तकनीक के इस्तेमाल से भारतीय कृषि का आधुनिकीकरण हुआ है। अधिक उपज वाले बीजों के कारण भारत में गेहूं और चावल की खेती का क्षेत्रफल बढ़ा है, और पिछले सालों की तुलना में उनके उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। नई तकनीक के कारण कृषि-उत्पादन में हुई इस बड़ी वृद्धि को ही हरित क्रांति कहते हैं। यह वृद्धि अधिक जमीन पर खेती करने, अच्छे बीज, खाद और पानी के नियंत्रित उपयोग के कारण संभव हुई है। परिणामस्वरूप, भारत खाद्य पदार्थों में आत्मनिर्भर हो पाया है।
उन्नत किस्म के बीजों में भारतीय जमीन और मौसम के हिसाब से सुधार करके अलग-अलग फसलों की कृषि उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। उदाहरण के लिए, रूस के कृषि वैज्ञानिकों ने ऐसे उन्नत बीजों का आविष्कार किया है, जिनसे एक ही पौधे पर आलू और टमाटर दोनों उगते हैं। इस नई विधि से पौधे की जड़ में आलू और ऊपर टहनियों में टमाटर पैदा होता है। इस नई किस्म के पौधे का नाम आलू और टमाटर के नामों को मिलाकर पोमेटो (Pomato) रखा गया है।
शिमला के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने बहुत छोटे आलू के बीज का आविष्कार किया है, जिसे 'सूक्ष्म कन्द' कहते हैं। अभी आलू की औसत उपज 15 टन प्रति हेक्टेयर है, लेकिन इस नए बीज 'सूक्ष्म कन्द' से आलू की औसत उपज 25 टन प्रति हेक्टेयर मिली है, जो अमेरिका और जर्मनी की औसत उपज के बराबर है। उन्नत बीजों और उर्वरकों के अधिक प्रयोग से खेती में अधिक पानी की आवश्यकता होती है। इसलिए सिंचाई के साधनों में वृद्धि और सुधार करके कृषि उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है।
In simple words: भारत में कृषि को बेहतर बनाने के लिए नए तरीके अपनाए जा रहे हैं, जैसे बेहतर बीज, खाद और पानी का सही इस्तेमाल। इससे उत्पादन बहुत बढ़ा है, और देश अब अपनी खाद्य जरूरतें पूरी कर पा रहा है।
🎯 Exam Tip: कृषि में नई तकनीकों को बताते समय, केवल उन्नत बीजों और उर्वरकों के उपयोग पर ही नहीं, बल्कि भूमि सुधार और सिंचाई के महत्व पर भी प्रकाश डालें।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व दर्शाने वाले दो प्रमुख बिन्दु लिखिए ।
Answer: भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व दर्शाने वाले दो प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित हैं:
1. **राजस्व की प्राप्ति:** कृषि राज्य सरकारों के लिए राजस्व का एक मुख्य स्रोत है। विभिन्न मण्डी समितियों को भी कृषि से आय प्राप्त होती है।
2. **उद्योगों का आधार:** भारत के कई उद्योग, जैसे सूती वस्त्र, चीनी और खाद्य प्रसंस्करण, कृषि पर आधारित हैं।
In simple words: कृषि भारत सरकार के लिए पैसा कमाने का एक तरीका है, और यह कई बड़े उद्योगों के लिए कच्चा माल भी देती है।
🎯 Exam Tip: कृषि के महत्व को बताते समय, सीधे तौर पर सरकार की आय और उद्योगों के लिए इसके आधार को शामिल करें।
Question 2. भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के तीन प्रमुख कारण लिखिए। [2013, 14]
Answer: भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के तीन प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
1. **कृषि जोतों का छोटा होना:** किसानों के खेत बहुत छोटे और बिखरे हुए होते हैं, जिससे आधुनिक तरीकों से खेती करना मुश्किल हो जाता है।
2. **सिंचाई-सुविधाओं का अभाव:** भारत में सिंचाई की पर्याप्त सुविधाएँ नहीं हैं, जिससे किसान मानसून पर निर्भर रहते हैं और पैदावार अनिश्चित रहती है।
3. **उत्तम बीज व खाद का अभाव:** कई किसानों के पास अच्छी गुणवत्ता वाले बीज और पर्याप्त खाद खरीदने के लिए पैसे नहीं होते, जिससे फसल की पैदावार कम होती है।
In simple words: भारतीय कृषि के पिछड़े होने के तीन मुख्य कारण हैं छोटे खेत, पानी की कमी, और अच्छे बीज-खाद का न मिलना।
🎯 Exam Tip: कृषि के पिछड़ेपन के कारणों को याद रखने के लिए, भूमि की बनावट, पानी की उपलब्धता और खेती के लिए जरूरी चीजों की कमी पर ध्यान दें।
Question 3. भारत में किन्हीं दो प्रमुख भूमि-सुधारों का उल्लेख कीजिए।
Answer: भारत के दो प्रमुख और प्रभावी भूमि-सुधार निम्नलिखित हैं:
1. **जमींदारी उन्मूलन व मध्यस्थों की समाप्ति:** जमींदारी प्रथा को खत्म कर दिया गया, जिससे किसानों को सीधे अपनी जमीन का मालिक बनाया गया और बिचौलियों का शोषण बंद हुआ।
2. **चकबन्दी व भूमि की अधिकतम जोत का निर्धारण (हदबन्दी):** बिखरे हुए खेतों को एक साथ मिलाकर बड़े खेत बनाए गए (चकबंदी), और एक व्यक्ति कितनी जमीन रख सकता है, इसकी सीमा तय की गई (हदबंदी)।
In simple words: भारत में भूमि सुधारों से जमींदारी खत्म हुई और किसानों को जमीन मिली, साथ ही छोटे बिखरे हुए खेतों को इकट्ठा करके बड़ा किया गया।
🎯 Exam Tip: भूमि-सुधारों को बताते समय, हमेशा उन प्रयासों को बताएं जो सीधे जमीन की मालिकी और उसके बंटवारे से संबंधित हैं।
Question 4. भारत में कृषि का राष्ट्रीय आय में कितना योगदान है ?
Answer: भारत में कृषि का राष्ट्रीय आय में लगभग 28% का योगदान है। यह योगदान देश की कुल आय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
In simple words: भारत की कुल आय में कृषि का लगभग 28% हिस्सा है।
🎯 Exam Tip: राष्ट्रीय आय में कृषि के योगदान को प्रतिशत में याद रखें, क्योंकि यह सीधा और सटीक आंकड़ा है।
Question 5. भारत में मुख्यतः कितने प्रकार की फसलें होती हैं ?
Answer: भारत में मुख्यतः दो प्रकार की फसलें होती हैं:
1. **रबी की फसल:** ये फसलें सर्दियों में बोई जाती हैं और गर्मियों में काटी जाती हैं, जैसे गेहूं, जौ।
2. **खरीफ की फसल:** ये फसलें मानसून के मौसम में बोई जाती हैं और सर्दियों की शुरुआत में काटी जाती हैं, जैसे चावल, मक्का।
In simple words: भारत में दो मुख्य तरह की फसलें हैं: रबी, जो सर्दियों में बोई जाती है, और खरीफ, जो बारिश के मौसम में बोई जाती है।
🎯 Exam Tip: भारत की प्रमुख फसल ऋतुओं को याद रखें और प्रत्येक का एक-दो उदाहरण भी दें।
Question 6. भारत की दो नकदी फसलों का उल्लेख कीजिए। (2018)
Answer: भारत की दो प्रमुख नकदी फसलें हैं:
1. **गन्ना:** यह एक महत्वपूर्ण नकदी फसल है, जिसका उपयोग चीनी और गुड़ बनाने में होता है।
2. **जूट:** यह एक रेशेदार फसल है, जिसका उपयोग बोरे, चटाई और अन्य सामान बनाने में होता है। यह किसानों को सीधा पैसा देती है।
In simple words: भारत की दो मुख्य फसलें जिन्हें सीधा बेचकर पैसा कमाया जाता है, वे गन्ना और जूट हैं।
🎯 Exam Tip: नकदी फसलों को याद रखते समय, उन फसलों पर ध्यान केंद्रित करें जो सीधे बाजार में बेची जाती हैं और जिनका उपयोग खाद्य पदार्थों के बजाय अन्य उत्पादों में होता है।
Question 7. जमींदारी उन्मूलन के एक प्रमुख प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।
Answer: जमींदारी उन्मूलन का एक प्रमुख प्रभाव यह था कि काश्तकार स्वयं अपनी जमीन के मालिक बन गए। पहले वे जमींदारों के अधीन काम करते थे, लेकिन इस सुधार के बाद उन्हें अपनी जमीन पर कानूनी अधिकार मिल गया।
In simple words: जमींदारी खत्म होने से जो लोग दूसरों की जमीन पर काम करते थे, वे अपनी जमीन के मालिक बन गए।
🎯 Exam Tip: जमींदारी उन्मूलन के प्रभाव को बताते समय, किसानों को मालिकी अधिकार मिलने के सामाजिक और आर्थिक बदलाव पर जोर दें।
Question 8. चकबन्दी से होने वाले एक प्रमुख लाभ का उल्लेख कीजिए।
Answer: चकबन्दी से होने वाला एक प्रमुख लाभ यह था कि बिखरे हुए खेतों (जोतों) को एक जगह इकट्ठा किया जा सका। इससे किसानों को अपनी जमीन पर कृषि निविष्टियों (जैसे बीज, खाद, सिंचाई) का उपयोग करने में बहुत सुविधा हुई और वे बेहतर खेती कर पाए।
In simple words: चकबन्दी से किसानों के बिखरे हुए खेत एक जगह आ गए, जिससे उन्हें खेती करने में आसानी हुई।
🎯 Exam Tip: चकबंदी के लाभों को याद रखते समय, बिखरे हुए खेतों को एक करने और कृषि कार्यों में आने वाली आसानी पर ध्यान दें।
Question 9. भूमि की चकबन्दी का एक प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
Answer: भूमि की चकबन्दी का एक प्रमुख उद्देश्य बिखरे हुए खेतों को एक ही स्थान पर संगठित करना है। इसका मतलब है कि एक ही किसान की अलग-अलग जगहों पर फैली छोटी-छोटी जमीन को एक बड़े टुकड़े में बदलना।
In simple words: चकबन्दी का मुख्य लक्ष्य किसानों के सभी छोटे-छोटे, बिखरे हुए खेतों को एक ही बड़ी जगह पर ले आना है।
🎯 Exam Tip: चकबंदी के उद्देश्य को बताते समय, हमेशा बिखरी हुई जोतों को एक जगह लाने और उनकी दक्षता बढ़ाने के लक्ष्य पर जोर दें।
Question 10. कृषि के उत्पादन में वृद्धि के लिए कोई दो महत्वपूर्ण उपाय लिखिए।
Answer: कृषि के उत्पादन में वृद्धि के लिए दो महत्वपूर्ण उपाय निम्नलिखित हैं:
1. **किसानों को कृषि शिक्षा एवं प्रशिक्षण देना:** किसानों को नई और आधुनिक खेती के तरीकों, अच्छी फसल उगाने की जानकारी और उचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
2. **कृषि सुविधाओं को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराना:** किसानों को पर्याप्त मात्रा में अच्छी गुणवत्ता वाले बीज, खाद, पानी और कृषि उपकरण उचित समय पर मिलने चाहिए।
In simple words: खेती की पैदावार बढ़ाने के लिए किसानों को नए तरीके सिखाना और उन्हें खेती के लिए जरूरी चीजें जैसे बीज, खाद और पानी आसानी से देना चाहिए।
🎯 Exam Tip: कृषि उत्पादन बढ़ाने के उपायों को बताते समय, शिक्षा और संसाधनों की उपलब्धता पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 11. कृषि उत्पादों पर आधारित दो उद्योगों के नाम लिखिए। [2014]
Answer: कृषि उत्पादों पर आधारित दो उद्योगों के नाम हैं:
1. **चीनी उद्योग:** यह उद्योग गन्ने पर निर्भर करता है, जो एक कृषि उत्पाद है।
2. **सूती वस्त्र उद्योग:** यह उद्योग कपास पर निर्भर करता है, जो एक कृषि उत्पाद है।
In simple words: चीनी बनाने का उद्योग गन्ने का उपयोग करता है, और कपड़े बनाने का उद्योग कपास का उपयोग करता है।
🎯 Exam Tip: कृषि-आधारित उद्योगों को याद रखते समय, उन प्रमुख उद्योगों पर ध्यान दें जो सीधे किसी फसल से अपना कच्चा माल प्राप्त करते हैं।
Question 12. भूमिहीन श्रमिक से आप क्या समझते हैं?
Answer: भूमिहीन श्रमिक वह व्यक्ति होता है जिसके पास अपनी कोई जमीन नहीं होती और वह दूसरों की जमीन पर मजदूर के रूप में कृषि-कार्य करके अपनी आजीविका कमाता है। ऐसे श्रमिक केवल अपनी शारीरिक मेहनत बेचते हैं।
In simple words: भूमिहीन श्रमिक वह मजदूर है जिसके पास अपनी जमीन नहीं होती और वह खेती के काम के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है।
🎯 Exam Tip: भूमिहीन श्रमिक की परिभाषा में हमेशा "अपनी जमीन का न होना" और "दूसरों की जमीन पर मजदूरी करना" इन दो मुख्य बातों को शामिल करें।
Question 13. कृषि श्रमिक से क्या आशय है ?
Answer: कृषि श्रमिक से आशय ऐसे व्यक्तियों से है जो अपनी आजीविका के लिए मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर होते हैं। इनमें वे लोग शामिल होते हैं जिनके पास अपनी जमीन नहीं होती और वे दूसरों के खेतों में काम करते हैं।
In simple words: कृषि श्रमिक वे लोग हैं जो खेती के काम से ही अपना गुजारा चलाते हैं, अक्सर दूसरों के खेतों पर मजदूरी करके।
🎯 Exam Tip: कृषि श्रमिक की परिभाषा में उनकी मुख्य आजीविका के स्रोत के रूप में "कृषि पर निर्भरता" को रेखांकित करें।
Question 14. आश्रित जनसंख्या से आप क्या समझते हैं ?
Answer: आश्रित जनसंख्या वह जनसंख्या होती है जो किसी भी उत्पादन के काम में सीधे तौर पर शामिल नहीं होती। यह अपनी जरूरतों और आजीविका के लिए दूसरों पर निर्भर करती है, जैसे बच्चे, बुजुर्ग और वे लोग जो काम करने में सक्षम नहीं होते।
In simple words: आश्रित जनसंख्या वे लोग हैं जो खुद पैसा नहीं कमाते और अपनी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं।
🎯 Exam Tip: आश्रित जनसंख्या को परिभाषित करते समय, 'उत्पादन क्रिया में शामिल न होना' और 'दूसरों पर निर्भरता' जैसे मुख्य बिंदुओं को शामिल करें।
Question 15. भारत में भूमि-सुधार के कोई दो उद्देश्य लिखिए।
Answer: भारत में भूमि-सुधार के दो मुख्य उद्देश्य हैं:
1. **उत्पादन में वृद्धि:** भूमि के बेहतर उपयोग और प्रबंधन से कृषि उत्पादन को बढ़ाना, जिससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
2. **सामाजिक न्याय दिलाना:** भूमि का समान वितरण करके, भूमिहीन किसानों को जमीन उपलब्ध कराना और जमींदारी प्रथा जैसी शोषणकारी व्यवस्थाओं को खत्म करके समाज में न्याय स्थापित करना।
In simple words: भूमि-सुधार के दो लक्ष्य हैं: खेती की पैदावार बढ़ाना और जमीन का बंटवारा ऐसा करना कि सब के साथ न्याय हो।
🎯 Exam Tip: भूमि-सुधार के उद्देश्यों को बताते समय, आर्थिक (उत्पादन) और सामाजिक (न्याय) दोनों लक्ष्यों पर जोर दें।
Question 16. भारत में नीची कृषि उत्पादकता के कोई दो कारण लिखिए।
Answer: भारत में नीची कृषि उत्पादकता के दो मुख्य कारण हैं:
1. **उत्पादन की परम्परागत तकनीक:** कई किसान अभी भी खेती के पुराने और पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे पैदावार कम होती है।
2. **अपर्याप्त सिंचाई एवं वित्त सुविधाओं का अभाव:** किसानों को पर्याप्त सिंचाई के साधन और खेती के लिए जरूरी पैसा (वित्त) आसानी से नहीं मिल पाता, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है।
In simple words: भारत में खेती की पैदावार कम होने के दो कारण हैं- पुराने तरीके अपनाना और पानी-पैसे जैसी चीजों की कमी होना।
🎯 Exam Tip: कृषि उत्पादकता की कमी के कारणों को याद रखते समय, प्रौद्योगिकी और आर्थिक सहायता की कमी को मुख्य बिंदु के रूप में बताएं।
Question 17. भारत में भूमि-सुधार कार्यक्रमों की सफलता के लिए दो सुझाव दीजिए। [2018]
Answer: भारत में भूमि-सुधार कार्यक्रमों की सफलता के लिए दो सुझाव निम्नलिखित हैं:
1. **भूमि-सुधार कार्यक्रम को समन्वित रूप में लागू किया जाना चाहिए:** सभी भूमि-सुधार कार्यक्रमों को एक साथ और व्यवस्थित तरीके से लागू किया जाना चाहिए ताकि वे अधिक प्रभावी हों।
2. **भूमि सम्बन्धी अभिलेखों को पूर्ण किया जाना चाहिए:** जमीन के रिकॉर्ड (अभिलेख) पूरी तरह से अपडेट और सही होने चाहिए ताकि जमीन की मालिकी और बंटवारे से जुड़े विवाद कम हों।
In simple words: भूमि सुधारों को सफल बनाने के लिए सभी कार्यक्रमों को मिलकर लागू करना चाहिए और जमीन के कागजात पूरी तरह से सही होने चाहिए।
🎯 Exam Tip: भूमि-सुधारों की सफलता के लिए सुझाव देते समय, नीतियों के बेहतर क्रियान्वयन और रिकॉर्ड के रखरखाव पर ध्यान केंद्रित करें।
Question 18. गहन कृषि पर टिप्पणी लिखिए। [2014]
Answer: गहन कृषि खेती का वह तरीका है जिसमें किसान एक छोटे से क्षेत्र में अधिक मेहनत और पूंजी लगाकर खेती करते हैं। इस तरीके में जमीन को खाली नहीं छोड़ा जाता बल्कि लगातार फसलें उगाई जाती हैं। इसलिए, इसमें अधिक श्रम और पूंजी की जरूरत होती है। गहन खेती में मुख्य रूप से नकदी फसलें उगाई जाती हैं, जिससे किसानों को अधिक से अधिक लाभ मिलता है। यह तरीका छोटी जोत वाले किसानों के लिए उपयोगी होता है, जहाँ जमीन बढ़ाने की बजाय उसकी उत्पादकता बढ़ाई जाती है।
In simple words: गहन कृषि का मतलब है, कम जमीन पर ज्यादा मेहनत और पैसा लगाकर लगातार फसलें उगाना ताकि अधिक पैदावार और मुनाफा मिल सके।
🎯 Exam Tip: गहन कृषि को समझाते समय, 'कम भूमि पर अधिक श्रम और पूंजी का उपयोग' तथा 'लगातार फसलें उगाना' जैसे प्रमुख बिंदुओं को बताएं।
बहुविकल्पीय प्रश्न
Question 1. भारत से निर्यात होने वाले प्रमुख कृषि पदार्थ हैं -
(क) गेहूं, चावल; चाय, कहवा
(ख) चाय, कहवा, कपास, जूट
(ग) चाय, मसाले, काजू, तम्बाकू
(घ) गन्ना, फल, सब्ज़ियाँ, जूट
Answer: (ग) चाय, मसाले, काजू, तम्बाकू
In simple words: भारत मुख्य रूप से चाय, मसाले, काजू और तम्बाकू जैसे कृषि उत्पाद दूसरे देशों को बेचता है।
🎯 Exam Tip: भारत के प्रमुख कृषि निर्यातों को याद रखने के लिए, उन उत्पादों पर ध्यान दें जो देश में अधिक मात्रा में उगाए जाते हैं और जिनकी अंतर्राष्ट्रीय मांग होती है।
Question 2. भारतीय कृषि में निम्न उत्पादकता का कारण है -
(क) पिछड़ी तकनीकी
(ख) जोत का छोटा आकार
(ग) साख का अभाव
(घ) ये सभी
Answer: (घ) ये सभी
In simple words: भारत में खेती की पैदावार कम होने के कई कारण हैं, जैसे पुराने तरीके, छोटे खेत और किसानों को पैसों की कमी।
🎯 Exam Tip: कृषि उत्पादकता की कमी के कारणों पर विचार करते समय, तकनीकी, भूमि संरचना और वित्तीय सहायता तीनों पहलुओं को ध्यान में रखें।
Question 3. हरित क्रान्ति सम्बन्धित है - [2013]
(क) कृषि के व्यापारीकरण से
(ख) कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भरता से
(ग) पशुधन विकास से
(घ) कृषि उत्पादन में वृद्धि से
Answer: (घ) कृषि उत्पादन में वृद्धि से
In simple words: हरित क्रांति का मुख्य लक्ष्य खेती से होने वाली पैदावार को बहुत बढ़ाना था।
🎯 Exam Tip: हरित क्रांति के मुख्य उद्देश्य को याद रखें, जो 'कृषि उत्पादन में वृद्धि' है, न कि केवल आत्मनिर्भरता या व्यापारीकरण, क्योंकि वृद्धि ही अंतिम लक्ष्य था।
Question 4. हरित क्रान्ति का आधार है -
(क) उन्नत बीज, सिंचाई, उर्वरक, कीटनाशक
(ख) पशुधन, उर्वरक, उन्नत कृषि-उपकरण, भण्डारण
(ग) मानव-श्रम, पशुधन, उर्वरक, कृषि-उपकरण
(घ) सिंचाई, मानव-श्रम, कृषि-उपकरण, उर्वरक
Answer: (क) उन्नत बीज, सिंचाई, उर्वरक, कीटनाशक
In simple words: हरित क्रांति सफल हुई क्योंकि इसमें अच्छे बीज, पर्याप्त सिंचाई, खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल किया गया।
🎯 Exam Tip: हरित क्रांति के आधारभूत तत्वों को याद रखने के लिए, HYV बीज, सिंचाई, उर्वरक और कीटनाशकों के 'पैकेज' को याद रखें।
Question 5. भारतीय कृषि के पिछड़ेपन का/के कारण है / हैं -
(क) कृषकों की निर्धनता
(ख) अपखण्डित कृषि-जोत
(ग) सिंचाई तथा उर्वरकों की कमी।
(घ) ये सभी
Answer: (घ) ये सभी
In simple words: भारत में खेती के पिछड़े होने के कई कारण हैं, जिनमें किसानों की गरीबी, खेतों का बिखरा होना और पानी-खाद की कमी शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के कारणों को बताते समय, आर्थिक, संरचनात्मक और तकनीकी कमियों का एक साथ उल्लेख करना प्रभावी होता है।
Question 6. भारत में कृषि भूमि का प्रतिशत क्या है? [2012]
(क) 19.27%
(ख) 18%
(ग) 21.4%
(घ) 20%
Answer: (ग) 21.4%
In simple words: भारत की कुल जमीन का लगभग 21.4% हिस्सा खेती के लिए उपयोग होता है।
🎯 Exam Tip: भारत में कृषि भूमि के प्रतिशत जैसे आंकड़ों को सटीक रूप से याद रखने का प्रयास करें, क्योंकि यह सीधे तथ्य-आधारित प्रश्न होते हैं।
Question 7. भू-दान आन्दोलन कब प्रारम्भ किया गया?
(क) 1951 ई० में
(ख) 1952 ई० में
(ग) 1953 ई० में
(घ) 1954 ई० में
Answer: (क) 1951 ई० में
In simple words: जमीन दान करने का भू-दान आंदोलन 1951 में शुरू हुआ था।
🎯 Exam Tip: महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं और आंदोलनों की तारीखों को हमेशा याद रखें, जैसे भू-दान आंदोलन का प्रारंभ वर्ष।
Question 8. अन्त्योदय कार्यक्रम क्रियान्वित करने में अग्रणी राज्य है -
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) राजस्थान
(ग) हिमाचल प्रदेश
(घ) बिहार
Answer: (ख) राजस्थान
In simple words: राजस्थान वह पहला राज्य था जिसने गरीब से गरीब लोगों की मदद के लिए अन्त्योदय कार्यक्रम शुरू किया।
🎯 Exam Tip: विभिन्न सरकारी योजनाओं को लागू करने वाले अग्रणी राज्यों को याद रखें, क्योंकि ये अक्सर सामान्य ज्ञान और राज्य-विशिष्ट प्रश्नों में पूछे जाते हैं।
Question 9. भारत में भूमि-सुधार के अन्तर्गत सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम है –
(क) चकबन्दी
(ख) मेंड़बन्दी
(ग) वृक्षारोपण
(घ) यन्त्रीकरण
Answer: (घ) यन्त्रीकरण
In simple words: भारत में जमीन को सुधारने के कार्यक्रमों में खेती के लिए मशीनों का इस्तेमाल करना सबसे जरूरी बदलावों में से एक है।
🎯 Exam Tip: भूमि-सुधार कार्यक्रमों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करते समय, कृषि में यन्त्रीकरण के महत्व को एक प्रमुख कारक के रूप में विचार करें।
Question 10. भारत में हरित क्रान्ति का सूत्रपात बीसवीं शताब्दी के किस दशक में हुआ?
(क) पाँचवें
(ख) छठवें
(ग) सातवें
(घ) आठवें
Answer: (ख) छठवें
In simple words: भारत में हरित क्रांति 1960 के दशक में शुरू हुई थी।
🎯 Exam Tip: हरित क्रांति की शुरुआत के दशक को याद रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारतीय कृषि इतिहास में एक बड़ा मोड़ था।
Question 11. निम्नलिखित में से कौन कृषि निविष्टि है? [2016]
(क) बीज
(ख) शक्ति
(ग) सिंचाई
(घ) ये सभी
Answer: (घ) ये सभी
In simple words: बीज, शक्ति और सिंचाई तीनों ही खेती के लिए बहुत जरूरी चीजें हैं।
🎯 Exam Tip: कृषि निविष्टियों में वे सभी चीजें शामिल होती हैं जो कृषि उत्पादन प्रक्रिया में उपयोग की जाती हैं, जैसे बीज, पानी, ऊर्जा और उपकरण।
Question 12. ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का मुख्य स्रोत क्या है? [2010, 18]
(क) नौकरी
(ख) व्यापार
(ग) उद्योग
(घ) कृषि
Answer: (घ) कृषि
In simple words: गांवों में ज्यादातर लोग खेती करके अपना जीवन चलाते हैं।
🎯 Exam Tip: ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए, कृषि को आजीविका के मुख्य स्रोत के रूप में पहचानना महत्वपूर्ण है।
Question 13. निम्नलिखित में से कौन कृषि निविष्टि नहीं है? [2013]
(क) बीज
(ख) पूँजी
(ग) लगान
(घ) व्यापार
Answer: (घ) व्यापार
In simple words: व्यापार खेती के लिए जरूरी चीज नहीं है, जबकि बीज, पैसा और लगान खेती से जुड़े होते हैं।
🎯 Exam Tip: कृषि निविष्टियों में वे सभी चीजें आती हैं जो उत्पादन के लिए सीधे तौर पर इस्तेमाल होती हैं; व्यापार एक आर्थिक गतिविधि है, लेकिन यह सीधे तौर पर एक निविष्टि नहीं है।
Question 14. कौन कृषि आगत नहीं है? [2014]
(क) बीज
(ख) सिंचाई
(ग) उद्योग
(घ) उर्वरक
Answer: (ग) उद्योग
In simple words: उद्योग खेती के लिए इस्तेमाल होने वाली चीज नहीं है, जबकि बीज, सिंचाई और खाद खेती के लिए बहुत जरूरी हैं।
🎯 Exam Tip: 'कृषि आगत' का मतलब उन चीजों से है जो खेती के काम में सीधे तौर पर लगाई जाती हैं; उद्योग एक अलग आर्थिक क्षेत्र है, आगत नहीं।
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