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UP Board Textbook Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 भूमि संसाधन
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Class 10 Social Science Chapter 4 भूमि संसाधन Textbook Solutions with Answers
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. भारत में पायी जाने वाली मिट्टियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए तथा उनका आर्थिक महत्त्व लिखिए। [2011]
या
जलोढ़ मिट्टी वाले क्षेत्र में जनसंख्या के अधिक घनत्व के कारणों की व्याख्या कीजिए।
या
भारत में कितने प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती हैं ? उनके क्षेत्र तथा महत्त्व बताइए।
या
मरुस्थलीय मिट्टी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
या
जलोढ़ मिट्टी और काली मिट्टी में अन्तर बताइए । [2011]
या
भारत में पायी जाने वाली दो मिट्टियों का नाम क्षेत्र सहित लिखिए । [2011]
या
मिट्टी के किन्हीं दो महत्त्वों का वर्णन कीजिए। [2013]
या
जलोढ़ मिट्टी से आप क्या समझते हैं? इसके दो प्रमुख क्षेत्र तथा प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
या
काली मिट्टी की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। [2018]
या
भारत में पायी जाने वाली किसी एक प्रकार की मिट्टी का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(क) क्षेत्र, (ख) विशेषताएँ, (ग) उपयोगिता ।
या
भारत की मिट्टियों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए तथा किसी एक मिट्टी की किन्हीं दो विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
Answer:
भारतीय मिट्टियाँ, उनके क्षेत्र एवं आर्थिक महत्त्व
भारत में मुख्य रूप से छह प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती हैं:
- पर्वतीय मिट्टी
- जलोढ़ मिट्टी
- काली अथवा रेगुर मिट्टी
- लाल मिट्टी
- लैटेराइट मिट्टी
- मरुस्थलीय मिट्टी
आइए, प्रत्येक मिट्टी के बारे में विस्तार से जानें:
1. पर्वतीय मिट्टियाँ: ये मिट्टी हिमालय के पहाड़ी इलाकों में पायी जाती है, जो नई, पथरीली, और कम गहरी होती है। भारत में यह लगभग 2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है। हिमालय के निचले पहाड़ी भागों में कंकड़ और मोटे बालू वाली मिट्टी मिलती है। नैनीताल और मसूरी जैसे इलाकों में चूने की मात्रा अधिक होती है। कुछ क्षेत्रों में यह ज्वालामुखी चट्टानों के टूटने से बनती है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और असम के पहाड़ी ढलानों पर यह मिट्टी ज़्यादा पायी जाती है। यह चाय की खेती के लिए बहुत अच्छी होती है, इसलिए इसे 'चाय की मिट्टी' भी कहते हैं। इस मिट्टी में पौधों के पोषक तत्व कम मात्रा में होते हैं, लेकिन यह विशेष फसलों के लिए उपयुक्त है।
2. जलोढ़ मिट्टी: यह मिट्टी भारत के उत्तरी बड़े मैदानों में पायी जाती है। नदियाँ इसे पहाड़ों से बहाकर लाती हैं। यह बहुत उपजाऊ होती है और इसे 'काँप' या 'कछारी' मिट्टी भी कहते हैं। भारत के 40% हिस्से में यह मिट्टी फैली हुई है। हिमालय से निकलने वाली बड़ी नदियाँ जैसे सतलुज, गंगा और ब्रह्मपुत्र, तथा उनकी सहायक नदियाँ इसे बहाकर लाती हैं। पूर्वी तटीय मैदानों और महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी जैसी नदियों के डेल्टा क्षेत्रों में भी यह मिट्टी मिलती है। जहाँ बाढ़ का पानी नहीं पहुँच पाता, वहाँ पुरानी जलोढ़ मिट्टी (बाँगर) पायी जाती है, और जहाँ नदियाँ हर साल नई मिट्टी जमा करती हैं, उसे नई जलोढ़ मिट्टी (खादर) कहते हैं। नई जलोढ़ मिट्टी पुरानी मिट्टी से ज़्यादा उपजाऊ होती है। यह पोटाश, चूना और फॉस्फोरिक अम्ल से भरपूर होती है, लेकिन इसमें नाइट्रोजन और जैविक पदार्थों की कमी होती है। भारत की लगभग 50% आबादी इन्हीं मिट्टियों पर निर्भर करती है। इनमें गेहूँ, गन्ना, चावल, दालें, तम्बाकू और जूट जैसी फसलें खूब उगती हैं। इसी कारण इन क्षेत्रों में जनसंख्या ज़्यादा है।
3. काली अथवा रेगुर मिट्टी: यह मिट्टी ज्वालामुखी से निकले लावा की चट्टानों के टूटने से बनती है। इसका रंग काला होता है, इसलिए इसे 'काली मिट्टी' या 'रेगुर मिट्टी' कहते हैं। यह मिट्टी नमी को ज़्यादा देर तक रोक सकती है। इसमें लोहा, मैग्नीशियम, चूना, ऐलुमिनियम और जैविक पदार्थ अधिक होते हैं। बारिश होने पर यह चिपचिपी हो जाती है, और सूखने पर इसमें दरारें पड़ जाती हैं। यह दक्कन पठार के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में लगभग 5.18 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में पायी जाती है। महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा और दक्षिणी मध्य प्रदेश के पठारी भागों में इसका विस्तार है। यह गोदावरी और कृष्णा नदियों की घाटियों में भी मिलती है। यह कपास के उत्पादन के लिए बहुत अच्छी होती है, इसलिए इसे 'कपास की काली मिट्टी' भी कहते हैं। इसमें कैल्सियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम कार्बोनेट, पोटाश और चूना मुख्य पोषक तत्व होते हैं। इसमें फॉस्फोरिक तत्व कम होते हैं। गर्मी में इसमें गहरी दरारें पड़ती हैं। इसमें कपास, गन्ना, मूंगफली, दालें, गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा, तम्बाकू और सोयाबीन जैसी फसलें उगाई जाती हैं।
4. लाल मिट्टी: इस मिट्टी का रंग लाल, पीला या भूरा होता है। इसमें लोहे की मात्रा ज़्यादा होने और उसके ऑक्साइड में बदलने के कारण यह ईंट जैसी लाल दिखती है। यह प्रायद्वीपीय पठार के दक्षिण-पूर्वी हिस्सों में लगभग 6 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में फैली हुई है। यह काली मिट्टी वाले इलाकों को चारों ओर से घेरती है। भारत में इसका विस्तार कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र के दक्षिणी-पूर्वी हिस्से, तमिलनाडु, ओडिशा, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, मेघालय और छोटा नागपुर के पठार पर है। लाल मिट्टी में फॉस्फोरिक अम्ल, जैविक और नाइट्रोजन पदार्थ कम होते हैं। इसमें मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, गेहूँ, दालें और तिलहन उगाए जाते हैं। यह मिट्टी विशेष रूप से उन क्षेत्रों में पायी जाती है जहाँ बारिश कम होती है, जिससे इसमें आयरन के यौगिकों का ऑक्सीकरण होता है।
5. लैटेराइट मिट्टी: यह मिट्टी भारी बारिश के कारण तीव्र निक्षालन (मिट्टी के ऊपरी तत्वों का घुल जाना) की प्रक्रिया से बनती है। इसका रंग गहरा पीला होता है और इसमें सिलिका तथा नमक की मात्रा ज़्यादा होती है। इसमें मोटे कण, कंकड़-पत्थर ज़्यादा होते हैं और जैविक पदार्थ कम होते हैं। भारत में यह मिट्टी 1.26 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में फैली हुई है। यह केरल, कर्नाटक, राजमहल की पहाड़ियों, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पूर्वी बिहार, उत्तर-पूर्व में मेघालय और दक्षिण महाराष्ट्र में पायी जाती है। लैटेराइट मिट्टी कम उपजाऊ होती है। यह मुख्य रूप से घास और झाड़ियों के लिए उपयुक्त है, लेकिन खाद और सिंचाई की मदद से इसमें चावल, गन्ना, काजू, चाय, कहवा और रबड़ की खेती भी की जाने लगी है। यह मिट्टी सूखने पर बहुत कठोर हो जाती है।
6. मरुस्थलीय मिट्टी: यह मिट्टी सूखे इलाकों में पायी जाती है जहाँ बारिश बहुत कम होती है। यहाँ ऊसर, धूर, राँकड़ और कल्लर जैसी मिट्टी मिलती है। यह मिट्टी नमकीन और क्षारीय होती है। इसमें सोडियम, कैल्सियम और मैग्नीशियम तत्व ज़्यादा होते हैं, जिससे यह कम उपजाऊ हो जाती है। इसमें नमी और पेड़-पौधों के अंश नहीं होते हैं। सिंचाई के ज़रिए इसमें केवल मोटे अनाज उगाए जाते हैं। यह मिट्टी ढीली होती है और इसमें बालू के कण ज़्यादा होते हैं। भारत में यह 1.5 लाख वर्ग हेक्टेयर क्षेत्र में फैली है, जिसमें पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दक्षिणी पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य आते हैं। बालू के मोटे कणों के कारण इसमें नमी धारण करने की क्षमता बहुत कम होती है, साथ ही जैविक और नाइट्रोजन भी कम होते हैं। आर्थिक रूप से यह ज़्यादा उपयोगी नहीं होती, लेकिन सिंचाई करके इसमें ज्वार, बाजरा, मूँग और उड़द जैसे मोटे अनाज उगाए जा सकते हैं। मरुस्थलीय मिट्टी की संरचना इसे पानी को जल्दी सोखने में मदद करती है।
In simple words: भारत में पर्वतीय, जलोढ़, काली, लाल, लैटेराइट और मरुस्थलीय, ये छह तरह की मिट्टियाँ मिलती हैं। हर मिट्टी की अपनी बनावट, रंग और उपजाऊपन होता है, जिससे अलग-अलग फसलें उगती हैं और यह हमारे देश की अर्थव्यवस्था में बहुत मदद करती है।
🎯 Exam Tip: मिट्टी के प्रकार, उनकी विशेषताओं, पाए जाने वाले क्षेत्रों और उन पर उगने वाली मुख्य फसलों को याद रखें। प्रत्येक मिट्टी के दो-तीन खास गुण याद रखना ज़रूरी है।
प्रश्न 2. 'भू-क्षरण' या 'मृदा अपरदन' से आप क्या समझते हैं ? इनके कारण तथा निवारण के उपायों पर विस्तार से प्रकाश डालिए।
या
मृदा अपरदन किसे कहते हैं ? मृदा अपरदन के चार कारण लिखिए। [2009]
या
मृदा-संरक्षण के दो उपाय बताइए। [2013]
या
मृदा-संरक्षण नियन्त्रण हेतु चार सुझाव सुझाइए। [2016]
या
भूमि-क्षरण के किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए। [2013]
या
भारतीय मिट्टी के संरक्षण हेतु पाँच सुझाव दीजिए। [2011, 17]
या
मृदा संरक्षण से आप क्या समझते हैं। मृदा संरक्षण के कोई छः उपाय बताइए। [2016, 18]
Answer:
भू-क्षरण या मृदा अपरदन
भू-क्षरण या मृदा-अपरदन का मतलब है प्राकृतिक चीज़ों (जैसे पानी, बारिश, हवा) से ज़मीन की सबसे ऊपरी परत का हट जाना। यह सिर्फ ज़मीन को ही नुकसान नहीं पहुँचाता, बल्कि इससे आर्थिक नुकसान भी होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ज़मीन की ऊपरी परत में मौजूद उपजाऊ पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं और ज़मीन खेती के लायक नहीं रहती। इसलिए, भू-क्षरण को मिट्टी के विनाश के लिए एक धीमी मौत जैसा माना जाता है।
भू-क्षरण के कारण मृदा अपरदन अथवा भू-क्षरण के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- 1. पवन-अपरदन: रेगिस्तानी और सूखे इलाकों में हवा मिट्टी के छोटे कणों को उड़ाकर ले जाती है, जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। तेज हवाएँ मिट्टी को एक जगह से दूसरी जगह ले जा सकती हैं।
- 2. अत्यधिक चराई: पहाड़ी ढलानों पर पशुओं, खासकर बकरियों द्वारा ज़्यादा चराई करने से मिट्टी का कटाव होता है। पशुओं के खुर मिट्टी को ढीला कर देते हैं।
- 3. प्राकृतिक वनस्पति का विनाश: पेड़ों की जड़ें मिट्टी के कणों को बाँधे रखती हैं और उन्हें बहने से रोकती हैं। जहाँ बहुत ज़्यादा पेड़ काटे जाते हैं, वहाँ पानी के बहाव की गति तेज़ हो जाती है और मिट्टी का कटाव बढ़ जाता है।
- 4. मूसलाधार वर्षा: बहुत ज़्यादा बारिश अपने साथ मिट्टी को बहाकर ले जाती है, जिससे बहुत ज़्यादा भू-क्षरण होता है।
- 5. मिट्टी के प्रकार: जिन इलाकों में मिट्टी ढीली, असंगठित या ज़्यादा ढलान वाली होती है, वहाँ मिट्टी का कटाव ज़्यादा और जल्दी होता है। ज़्यादा ढलान पर बहता पानी ज़्यादा कटाव करता है, जिसे 'अवनालिका अपरदन' कहते हैं।
संक्षेप में कहें तो, भारत में भू-क्षरण के लिए तेज़ बारिश, नदियों में हर साल बाढ़ आना, पेड़ों का ज़्यादा कटाई, खेतों को खाली छोड़ना, तेज़ हवाएँ, कृषि-भूमि पर पशुओं की अनियमित चराई, खेतों की सही मेड़बंदी न होना, ज़्यादा ढलान वाली ज़मीन और पानी के निकास की सही व्यवस्था न होना जैसे कारण ज़िम्मेदार हैं।
निवारण (मृदा संरक्षण) के उपाय
भू-क्षरण की समस्या को रोकने के लिए कुछ उपाय ज़रूरी हैं:
- 1. वृक्षारोपण: जिन इलाकों में ज़्यादा बाढ़ आती है, वहाँ पानी के बहाव को रोकने के लिए ज़्यादा पेड़ लगाने चाहिए। पेड़ों से गिरने वाली पत्तियाँ खेतों में जैविक पदार्थ बढ़ाती हैं, जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है।
- 2. नदियों पर बाँधों का निर्माण: नदियों पर बाँध बनाने से पानी का बहाव नियंत्रित होता है और बाढ़ का खतरा कम हो जाता है। बाढ़ में कमी आने से भू-क्षरण भी अपने आप कम हो जाता है।
- 3. खेतों की मेड़बंदी करना: भू-क्षरण कम करने के लिए खेतों के चारों ओर ऊँची-ऊँची मेड़ें बनाना बहुत ज़रूरी है।
- 4. पशुचारण पर नियन्त्रण: खाली या जोती हुई ज़मीन पर पशुओं को नहीं चराना चाहिए, क्योंकि उनके खुरों से मिट्टी टूटती है। इसलिए, चरागाहों पर ही पशुओं को चराना सही होता है।
- 5. ढाल के विपरीत दिशा में जुताई करना: भू-क्षरण रोकने के लिए ज़मीन की ढलान के उलटी दिशा में जुताई करनी चाहिए। इससे बनी नालियाँ पानी की गति को कम करती हैं और भू-क्षरण को रोकने में मदद करती हैं।
- 6. जल के निकास की उचित व्यवस्था: ढलान वाले खेतों में बारिश के पानी के निकास की सही व्यवस्था करके भू-क्षरण को कुछ हद तक रोका जा सकता है। पहाड़ी इलाकों में सीढ़ीदार खेत बनाने चाहिए, नहीं तो ज़्यादा भू-क्षरण होगा।
- 7. खेतों में हरी खाद वाली फसलें उगाना: बारिश के मौसम में खेतों को खाली नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि उनमें हरी खाद वाली फसलें जैसे लैंचा, सनई, मूँग आदि बोनी चाहिए। ऐसा करने से मिट्टी को पोषक तत्व मिलते हैं और भू-क्षरण भी रुकता है।
- 8. नाली एवं गड्डों को एक सम बनाना: ज़्यादा बारिश के कारण पानी के बहाव से बनी खाइयों और नालियों को मिट्टी से भरकर ज़मीन को समतल बनाना चाहिए। इससे मिट्टी का कटाव अपने आप रुक जाता है।
आज़ादी के बाद, भारत सरकार ने भू-क्षरण पर ध्यान दिया और 1953 में केंद्रीय भू-क्षरण बोर्ड बनाया, जिसका मुख्य काम सरकार को सुझाव देना था। अब तक 180 लाख हेक्टेयर कृषि-भूमि को बचाया जा चुका है और 110 लाख हेक्टेयर भूमि पर पेड़ लगाए गए हैं।
In simple words: भू-क्षरण का मतलब है ज़मीन की ऊपरी मिट्टी का पानी या हवा से हट जाना। इसके मुख्य कारण हैं हवा का कटाव, ज़्यादा पशु चराई, पेड़ काटना, तेज़ बारिश और मिट्टी का ढीला होना। इसे रोकने के लिए पेड़ लगाने, बाँध बनाने, खेतों में मेड़बंदी करने और सही तरीके से खेती करने जैसे उपाय ज़रूरी हैं।
🎯 Exam Tip: भू-क्षरण के कारण और निवारण के उपाय दोनों को स्पष्ट और बिन्दुवार तरीके से लिखें। 'अवनालिका अपरदन' जैसे तकनीकी शब्दों का सही उपयोग करें।
प्रश्न 3. भारत में भूमि उपयोग की विभिन्न श्रेणियों की व्याख्या कीजिए।
या
किसी देश में भूमि के उपयोग के बारे में जानने की आवश्यकता क्यों पड़ती है ? भारत में विभिन्न प्रकार की भूमि के उपयोग पर प्रकाश डालिए ।
या
भारत में भूमि उपयोग का प्रारूप बताइए । [2013]
या
भूमि उपयोग से आप क्या समझते हैं ? भारत में भूमि उपयोग के प्रारूप पर प्रकाश डालिए। [2010]
Answer:
भूमि-उपयोग
किसी भी देश के विकास के लिए भूमि बहुत ज़रूरी होती है। संसाधन दो तरह के होते हैं - कुदरती और इंसान द्वारा बनाए गए। कुदरती संसाधनों में ज़मीन, खनिज, पानी, जंगल और पशुधन शामिल हैं। पृथ्वी पर कुदरती संसाधन सीमित मात्रा में हैं, लेकिन जनसंख्या लगातार बढ़ रही है। इसलिए, भारत जैसे घनी आबादी वाले देशों में ज़मीन एक दुर्लभ संसाधन बनती जा रही है।
बढ़ती आबादी के लिए घर, खाना और लकड़ी मुहैया कराने के लिए ज़मीन का सही इस्तेमाल बहुत ज़रूरी है। इसलिए, बंजर और बेकार ज़मीन को फिर से उपजाऊ बनाना, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों की स्थापना करना, पेड़ लगाना और ज़मीन को बचाना ज़रूरी है ताकि भविष्य की पीढ़ियों के लिए यह सुरक्षित रहे। भूमि उपयोग का मतलब है कि हम ज़मीन जैसे संसाधन का समझदारी से इस्तेमाल करें, क्योंकि किसी देश की आर्थिक तरक्की ज़मीन के इस्तेमाल पर ही निर्भर करती है। अफगानिस्तान की आर्थिक समस्या का एक कारण ज़मीन का सही इस्तेमाल न होना है। इसके उलट, भारत 108 करोड़ से ज़्यादा लोगों को खाना खिलाने के बाद भी अनाज बचा लेता है।
भूमि-उपयोग के ज्ञान की आवश्यकता
ज़मीन किसी भी देश का सबसे अहम संसाधन है, क्योंकि खेती, पशुपालन, खनन और उद्योग जैसे सारे काम ज़मीन पर ही आधारित हैं। ज़मीन से ही हर इंसान की ज़रूरतें (खाना, कपड़े, घर) पूरी होती हैं। हर देश में ज़मीन संसाधन की बनावट और गुण अलग-अलग होते हैं। उसी के हिसाब से ज़मीन का इस्तेमाल किया जाता है। किसी भी देश के भूमि-उपयोग के बारे में जानना इन कारणों से ज़रूरी है:
- इससे सभी उपलब्ध ज़मीन संसाधनों का सही इस्तेमाल किया जा सकता है।
- भूमि-उपयोग की जानकारी से ज़मीन की कई समस्याओं (जैसे कटाव, रेगिस्तान बनना, कम उपजाऊपन) को नियंत्रित किया जा सकता है।
- बंजर ज़मीन और खाली पड़ी ज़मीन का सही इस्तेमाल किया जा सकता है।
- ज़रूरत के हिसाब से ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव किया जा सकता है।
भारत में भूमि का उपयोग
भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र 3287.3 लाख हेक्टेयर में से 92.2% भूमि का इस्तेमाल होता है। इसमें से 19.3% ज़मीन पर जंगल हैं। भारतीय आंकड़ों के अनुसार, देश में ज़मीन का इस्तेमाल नीचे दिया गया है:
- 1. कृषि-भूमि: पुराने समय से भारतीय लगभग 14 हज़ार हेक्टेयर ज़मीन पर खेती करते थे। यह संख्या 1993-94 तक 1,86,420 हज़ार हेक्टेयर तक पहुँच चुकी थी। इस तरह, देश की आधी से ज़्यादा ज़मीन खेती के लिए इस्तेमाल होती है।
- 2. वन-भूमि: भारत के कुल क्षेत्रफल का 68,830 हज़ार हेक्टेयर (1995-96) यानी 21% हिस्सा जंगलों से ढका है। जंगल बारिश के पानी को मिट्टी में सोखने में मदद करते हैं। इससे पानी का बचाव होता है। जंगल मिट्टी को भी कटाव से बचाते हैं, जिससे बाढ़ नियंत्रित होती है।
- 3. चरागाह भूमि: हमारा देश खेती पर आधारित है और पशुपालन खेती का एक सहायक काम है। ज़्यादातर पशुओं को चारे की फसलें, पुआल, भूसा आदि पर पाला जाता है। 1993-94 में हमारे देश में 11,176 हज़ार हेक्टेयर ज़मीन, यानी कुल क्षेत्र का लगभग 4%, स्थायी चरागाह के रूप में था।
- 4. बंजर भूमि: वह ज़मीन जिस पर कोई फसल नहीं उगती, उसे बंजर भूमि कहते हैं। ज़्यादा पेड़ काटने, झूम खेती (स्थानांतरित कृषि) और बहुत ज़्यादा नहरों से सिंचाई के कारण ज़मीन बंजर हो जाती है। औद्योगिक कचरा ज़मीन पर फेंकने से भी ज़मीन बंजर हो जाती है। देश की लगभग 24% ज़मीन बंजर है, जिसमें पहाड़ी, पठारी, बर्फ से ढकी, रेगिस्तानी और दलदली ज़मीन शामिल है जो खेती के लिए उपयुक्त नहीं है।
- 5. परती भूमि: परती भूमि वह ज़मीन होती है जिस पर हर साल खेती नहीं की जाती, बल्कि दो या तीन साल में एक बार फसल उगाई जाती है। यह सीमांत भूमि होती है, जिसे उपजाऊपन बढ़ाने के लिए खाली छोड़ दिया जाता है। अभी देश का लगभग 7% क्षेत्र इस तरह की भूमि के अंतर्गत आता है। इन विभिन्न प्रकारों का सही प्रबंधन देश के सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
In simple words: भूमि उपयोग का मतलब है कि एक देश अपनी ज़मीन का इस्तेमाल कैसे करता है। इसमें खेती, जंगल, चरागाह और बंजर ज़मीन शामिल हैं। भारत में खेती के लिए सबसे ज़्यादा ज़मीन इस्तेमाल होती है, उसके बाद जंगल और फिर चरागाह। बंजर और परती ज़मीन भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
🎯 Exam Tip: भूमि उपयोग के प्रकारों को याद रखें और प्रत्येक श्रेणी के तहत मुख्य विशेषताओं को विस्तार से समझाएं। आंकड़ों के बजाय अवधारणाओं पर ध्यान दें।
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. भारतीय मिट्टियों की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए ।
Answer: भारतीय संसाधनों में मिट्टी का भूमि संसाधन के तौर पर बहुत महत्त्व है, क्योंकि इसी पर देश का पूरा कृषि उत्पादन और जीव-जगत निर्भर करता है। अमेरिकी भूमि विशेषज्ञ डॉ. बेनेट के अनुसार, 'मिट्टी ज़मीन पर मिलने वाले ढीले पदार्थों की वह ऊपरी परत है, जो असल चट्टानों, मौसम और जीवों की क्रिया से बनती है।' भारतीय मिट्टियों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- पुरानी एवं परिपक्व: बनावट के हिसाब से ज़्यादातर भारतीय मिट्टियाँ बहुत पुरानी और पूरी तरह से विकसित हैं।
- प्राचीन जलोढ़: भारत के मैदानी इलाकों की ज़्यादातर मिट्टियाँ पुरानी जलोढ़ हैं। ये सिर्फ चट्टानों के टूटने से ही नहीं, बल्कि इनके बनने में मौसम से जुड़े कारकों का भी बड़ा हाथ रहा है।
- मिट्टियों में नाइट्रोजन, जीवांश, वनस्पति अंश और खनिज लवणों की कमी: भारत की ज़्यादातर मिट्टियों में इन ज़रूरी तत्वों की कमी पायी जाती है।
- ऊँचे तापमान: उपोष्ण कटिबंधीय भारत में मिट्टियों का तापमान अक्सर ज़्यादा होता है। इससे चट्टानों के टूटते ही उनका रासायनिक विघटन जल्दी शुरू हो जाता है।
- हल्का आवरण: पहाड़ी और पठारी इलाकों में मिट्टी की परत हल्की और फैली हुई होती है, जबकि मैदानी और डेल्टाई इलाकों में यह गहरी और संगठित होती है। मिट्टी की यह भिन्नता भारत की विविध भू-आकृतियों के कारण है।
In simple words: भारत की मिट्टियाँ आमतौर पर पुरानी और विकसित हैं। इनमें नाइट्रोजन और जैविक पदार्थों की कमी होती है, और ऊँचे तापमान के कारण चट्टानों का रासायनिक टूटना जल्दी होता है। इनकी परत कहीं पतली तो कहीं मोटी होती है।
🎯 Exam Tip: भारतीय मिट्टी की मुख्य विशेषताओं को बिन्दुवार याद रखें और उनका संक्षेप में वर्णन करें। 'रासायनिक विघटन' जैसे शब्द का सही उपयोग करें।
प्रश्न 2. काली मिट्टी (रेगुर) तथा लैटेराइट मिट्टी में दो अन्तर लिखिए।
या
काली मिट्टी तथा लैटेराइट मिट्टी में अन्तर बताइए ।
Answer: काली मिट्टी तथा लैटेराइट मिट्टी में निम्नलिखित प्रमुख अन्तर हैं:
| क्र० सं० | काली (रेगुर) मिट्टी | लैटेराइट मिट्टी |
|---|---|---|
| 1. | इस मिट्टी का रंग काला होता है; अतः इसे 'काली मिट्टी' कहा जाता है। | इस मिट्टी का रंग लाल या पीला होता है। |
| 2. | इस मिट्टी का निर्माण ज्वालामुखी क्रिया द्वारा लावा-प्रवाह से हुआ है। | इस मिट्टी का निर्माण उष्ण कटिबन्धीय भारी वर्षा द्वारा होने वाली तीव्र निक्षालन क्रिया का परिणाम है। |
| 3. | इस मिट्टी में लोहा, मैग्नीशियम, चूना, बॉक्साइट तथा जीवांशों की मात्रा अधिक होती है। यह चिकनी तथा बारीक कणों से युक्त होती है। | यह मिट्टी सिलिका तथा लवण कणों से युक्त होती है। इसमें चूना, फॉस्फोरस और पोटाश कम मात्रा में पाया जाता है, परन्तु जीवांशों की मात्रा पर्याप्त होती है। |
| 4. | इस मिट्टी में नमी धारण करने की शक्ति अत्यधिक होती है। | इस मिट्टी में नमी धारण करने की शक्ति बहुत कम होती है। |
| 5. | रेगुर मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है। इसमें कपास का भारी मात्रा में उत्पादन किया जाता है। इसी कारण इसे 'कपास की काली मिट्टी' भी कहा जाता है। | उर्वरकों की सहायता से इस मिट्टी में चावल, गन्ना, काजू, चाय, कहवा, रबड़ आदि की फसलें उगायी जाती हैं। यह मिट्टी अपेक्षाकृत कम उपजाऊ होती है। लैटेराइट मिट्टी सूखने पर कठोर हो जाती है। |
| 6. | भारत में रेगुर मिट्टी का विस्तार महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश और उत्तरी कर्नाटक राज्यों में पाया जाता है। | भारत में लैटेराइट मिट्टी ओडिशा, आंध्र प्रदेश, असोम, मेघालय, केरल, महाराष्ट्र के दक्षिणी भागों तथा पूर्वी कर्नाटक राज्यों में पायी जाती है। |
| 7. | वर्षा होने पर यह मिट्टी चिपचिपी हो जाती है तथा सूखने पर इसमें दरारें पड़ जाती हैं। | वर्षा होने पर यह मिट्टी कोमल हो जाती है, परन्तु सूखने पर कठोर हो जाती है। |
In simple words: काली मिट्टी ज्वालामुखी से बनी होती है, गहरे काले रंग की होती है, और पानी को अच्छे से रोकती है, जो कपास के लिए बढ़िया है। वहीं, लैटेराइट मिट्टी भारी बारिश से बनती है, लाल या पीली होती है, पानी कम रोक पाती है, और काजू या चाय जैसी फसलों के लिए उपयुक्त है। दोनों की उपजाऊ क्षमता और पाए जाने वाले क्षेत्र अलग-अलग हैं।
🎯 Exam Tip: अंतर वाले प्रश्नों में हमेशा एक तालिका (Table) बनाकर तुलना करें। प्रत्येक बिन्दु को स्पष्ट और संक्षिप्त रखें, और दोनों प्रकार की मिट्टी के मुख्य गुणों को सही ढंग से प्रस्तुत करें।
प्रश्न 3. खादर और बाँगर में अन्तर स्पष्ट कीजिए । [2011, 12, 16]
Answer: बाँगर मिट्टी तथा खादर मिट्टी में निम्नलिखित प्रमुख अन्तर हैं:
| क्र० सं० | बाँगर मिट्टी | खादर मिट्टी |
|---|---|---|
| 1. | ये मिट्टियाँ उत्तरी मैदान में नदियों की पुरानी काँप द्वारा निर्मित हैं। | ये मिट्टियाँ उत्तरी मैदान में नदियों की नयी काँप भूमि में पायी जाती हैं। |
| 2. | ये बाढ़ से सुरक्षित उच्च भूमि में मिलती हैं। | ये प्रति वर्ष बाढ़ों के दौरान काँप के नये जमावों से बनती हैं। |
| 3. | इनमें चूना तत्त्व अर्थात् कैल्सियम की मात्रा अधिक होती है। | इनमें कैल्सियम की कमी होती है। |
| 4. | नहरी सिंचाई द्वारा सोडियम तथा मैग्नीशियम के जमाव से ये अनुपजाऊ हो जाती हैं; अतः इनमें अधिक खादों की आवश्यकता होती है। | इन मिट्टियों में अधिक खाद (उर्वरक) की आवश्यकता नहीं होती। इनमें रबी की फसलों की पैदावार अच्छी होती है। |
In simple words: बाँगर पुरानी जलोढ़ मिट्टी है जो नदियों के बाढ़ वाले क्षेत्र से दूर ऊँची ज़मीन पर मिलती है, जबकि खादर नई जलोढ़ मिट्टी है जो हर साल बाढ़ से बनती है। बाँगर में चूना ज़्यादा होता है और उसे ज़्यादा खाद की ज़रूरत पड़ती है, जबकि खादर ज़्यादा उपजाऊ होती है और कम खाद में भी अच्छी फसल देती है।
🎯 Exam Tip: खादर और बाँगर दोनों जलोढ़ मिट्टी के प्रकार हैं, इसलिए इनकी तुलना करते समय उनकी उम्र, बाढ़ से जुड़ाव और उपजाऊपन पर विशेष ध्यान दें।
प्रश्न 4. जलोढ़ मिट्टी व लैटेराइट मिट्टी में अन्तर लिखिए ।
Answer: जलोढ़ मिट्टी व लैटेराइट मिट्टी में निम्नलिखित प्रमुख अन्तर हैं:
| क्र० सं० | जलोढ़ मिट्टी | लैटेराइट मिट्टी |
|---|---|---|
| 1. | जलोढ़ मिट्टी उत्तरी मैदान तथा तटीय मैदानों में पायी जाती है। | लैटेराइट मिट्टी चौरस उच्च भूमियों में मिलती है। यह छोटा नागपुर के पठार, ओडिशा, मेघालय, आन्ध्र प्रदेश में विस्तृत है। |
| 2. | जलोढ़ मिट्टी उर्वर होती है। | लैटेराइट मिट्टी अनुर्वर होती है। |
| 3. | यह सूक्ष्म तथा मध्यम कणों से निर्मित होती है। इसमें जल देर तक ठहर सकता है। | यह मोटे कणों वाली होती है। इसमें जल अधिक समय तक नहीं ठहरता। |
| 4. | यह पीले तथा भूरे रंग की होती है। | यह लाल रंग की होती है। |
| 5. | यह खाद्यान्नों (गेहूँ, चावल आदि), दालों, गन्ना, कपास आदि के लिए उपयुक्त तथा उत्तम है। | इसमें घास व झाड़ियाँ ही उगते हैं, किन्तु उर्वरकों तथा सिंचाई द्वारा. अब चावल, चाय, कहवा, गन्ना, काजू आदि भी उगाये जाने लगे हैं। |
In simple words: जलोढ़ मिट्टी उत्तरी मैदानों में मिलती है, बहुत उपजाऊ होती है, और इसमें पानी देर तक रुकता है, जो अनाज के लिए अच्छा है। वहीं, लैटेराइट मिट्टी पठारों पर मिलती है, कम उपजाऊ होती है, पानी जल्दी निकल जाता है, और यह चाय या काजू जैसी चीज़ों के लिए उपयुक्त है।
🎯 Exam Tip: मिट्टी के प्रकारों के बीच अंतर करते समय उनके क्षेत्र, उपजाऊपन, कणों का आकार और मुख्य फसलों पर ध्यान दें। तालिका बनाना हमेशा बेहतर होता है।
प्रश्न 5. बंजर भूमि किसे कहते हैं ? मनुष्य बंजर भूमि का क्षेत्र बढ़ाने में किस प्रकार सहायक है ? दो बिन्दु दीजिए ।
Answer: वह भूमि जिस पर कोई उपज पैदा नहीं होती, उसे 'बंजर भूमि' कहते हैं। आमतौर पर ऊँची पहाड़ी, चट्टानी, रेतीली और दलदली ज़मीनें बंजर होती हैं। बंजर भूमि के क्षेत्रफल को बढ़ाने में इंसान की भी एक बड़ी भूमिका होती है। इसके दो मुख्य कारण नीचे दिए गए हैं:
- अन्धाधुन्ध वृक्ष काटने, स्थानान्तरी कृषि तथा अत्यधिक नहरी सिंचाई द्वारा: इंसान पेड़ों को अंधाधुंध काटता है, एक जगह से दूसरी जगह खेती करता है, और बहुत ज़्यादा नहरों से सिंचाई करता है। ये सभी काम ज़मीन को बंजर बना देते हैं क्योंकि इनसे मिट्टी की उर्वरता खत्म हो जाती है।
- औद्योगिक कूड़े-कचरे को भूमि पर फेंकने से: कारखानों से निकलने वाले कूड़े-कचरे को सीधे ज़मीन पर फेंकने से भी वह ज़मीन बंजर हो जाती है। यह ज़मीन को प्रदूषित कर देता है जिससे उस पर कुछ भी नहीं उग पाता।
ये मानवीय गतिविधियाँ प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़कर ज़मीन को अनुपयोगी बना देती हैं।
In simple words: बंजर भूमि वह है जिस पर कुछ नहीं उगता। इंसान पेड़ काटकर, गलत खेती करके और कारखानों का कचरा ज़मीन पर डालकर इसे बढ़ाता है।
🎯 Exam Tip: बंजर भूमि की परिभाषा स्पष्ट रखें और मानव गतिविधियों के दो मुख्य कारणों को याद रखें जो इसे बढ़ाते हैं। प्रदूषण और वनोन्मूलन प्रमुख कारक हैं।
प्रश्न 6. भूमि संसाधन का क्या तात्पर्य है? भूमि संसाधन के कोई तीन महत्त्व लिखिए। [2011]
या
भूमि से आप क्या समझते हैं ? [2010]
Answer: किसी देश या क्षेत्र के अंदर की सारी ज़मीन को भूमि संसाधन कहते हैं। इसमें खेती वाली ज़मीन, चरागाह, खेती के लायक लेकिन बेकार ज़मीन, जंगल, बंजर ज़मीन और परती ज़मीन सब शामिल हैं। इंसान इस उपलब्ध ज़मीन पर कई तरह की गतिविधियाँ करता है।
भूमि संसाधन के तीन मुख्य महत्त्व इस प्रकार हैं:
- 1. आर्थिक क्रियाओं का आधार: खेती, पशुपालन, जंगल से जुड़े काम, खनन, उद्योग, परिवहन, व्यापार और संचार जैसी सभी आर्थिक गतिविधियाँ ज़मीन से जुड़ी होती हैं। यह सभी मानवीय गतिविधियों का मूल आधार है।
- 2. जल संसाधनों का आधार: भूमि संसाधन जल संसाधनों को सहारा देते हैं। पानी का एक बड़ा हिस्सा ज़मीन के अंदर रिसता है, जिसे हम कुओं और बोरवेल से निकालते हैं।
- 3. विविध उपयोगों की पूर्ति: इंसान अपनी अलग-अलग ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ज़मीन का इस्तेमाल करता है। जैसे, घर बनाना, सड़कें बनाना, कारखाने लगाना आदि। ज़मीन के बिना मानव सभ्यता का विकास संभव नहीं है।
In simple words: भूमि संसाधन का मतलब है किसी जगह की सारी ज़मीन, जिसका इस्तेमाल इंसान खेती, रहने और बाकी कामों के लिए करता है। यह खेती, पानी के स्रोत और सभी इंसानी गतिविधियों का आधार है।
🎯 Exam Tip: भूमि संसाधन की परिभाषा दें और इसके महत्त्व को तीन मुख्य बिन्दुओं में समझाएं, जिसमें आर्थिक गतिविधियों, जल संसाधनों और विविध उपयोगों का उल्लेख हो।
प्रश्न 7. हमारे देश में वनों के क्षेत्र को बढ़ाना क्यों आवश्यक है ?
Answer: जंगल किसी भी देश की प्राकृतिक दौलत होते हैं। देश के आर्थिक विकास और पर्यावरण संतुलन के लिए यह ज़रूरी है कि देश का कम-से-कम एक-तिहाई हिस्सा जंगलों से ढका हो। भारत में 20% से भी कम ज़मीन पर ही जंगल हैं। देश की तेज़ी से बढ़ती आबादी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जंगलों का विस्तार करना बहुत ज़रूरी है।
जंगलों के क्षेत्र को बढ़ाना इसलिए आवश्यक है क्योंकि:
- 1. प्राकृतिक सौंदर्य और आवास: जंगल प्राकृतिक सुंदरता बढ़ाते हैं और जीव-जंतुओं और पक्षियों के लिए घर भी होते हैं। यह पारिस्थितिक संतुलन बनाने में भी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।
- 2. जलवायु नियंत्रण और वर्षा: जंगल जलवायु को नियंत्रित करते हैं और बारिश कराने में भी इनकी बड़ी भूमिका होती है। वे हवा में नमी छोड़ते हैं जो बारिश को बढ़ावा देती है।
- 3. भू-क्षरण नियंत्रण: पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बाँधे रखती हैं, जिससे पानी और हवा से होने वाला मिट्टी का कटाव रुकता है। यह बाढ़ को रोकने में भी सहायक होता है।
- 4. संसाधनों की उपलब्धता: जंगल लकड़ी, औषधीय पौधों और अन्य वन उत्पादों जैसे महत्वपूर्ण संसाधन प्रदान करते हैं जो अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक हैं।
इसलिए, जंगलों का क्षेत्र बढ़ाना बहुत ज़रूरी है।
In simple words: जंगलों को बढ़ाना ज़रूरी है क्योंकि वे हमारे देश की प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाते हैं, जानवरों को घर देते हैं, जलवायु को ठीक रखते हैं, बारिश लाने में मदद करते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और हमें कई चीज़ें देते हैं।
🎯 Exam Tip: वनों के महत्त्व को पर्यावरण और आर्थिक दोनों पहलुओं से समझाएं। कम-से-कम एक-तिहाई क्षेत्र में वन होने का लक्ष्य याद रखें।
प्रश्न 8. भारतीय काली मिट्टी को कपास की मिट्टी क्यों कहा जाता है ?
Answer: काली मिट्टी का निर्माण ज्वालामुखी से निकले लावा की चट्टानों के टूटने से होता है। इस मिट्टी का रंग काला होता है, इसलिए इसे 'काली मिट्टी' या 'रेगुर मिट्टी' भी कहते हैं। इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता बहुत ज़्यादा होती है। इसमें लोहा, मैग्नीशियम, चूना, ऐलुमिनियम और जैविक पदार्थ भी अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं। यह मिट्टी लगभग 5 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा और दक्षिणी मध्य प्रदेश के पठारी भागों में फैली हुई है। इसके अलावा, यह दक्षिण में गोदावरी और कृष्णा नदियों की घाटियों में भी मिलती है। इस मिट्टी में कपास की फसल बहुत ज़्यादा होती है, इसी कारण इसे 'कपास की काली मिट्टी' के नाम से जाना जाता है। इस मिट्टी की नमी बनाए रखने की क्षमता कपास की खेती के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है।
In simple words: काली मिट्टी को कपास की मिट्टी इसलिए कहते हैं क्योंकि यह कपास उगाने के लिए सबसे अच्छी है। यह ज्वालामुखी से बनी है, काली होती है और पानी को बहुत देर तक रोक कर रख सकती है, जो कपास की फसल के लिए एकदम सही है।
🎯 Exam Tip: काली मिट्टी के मुख्य गुणों को याद रखें, खासकर उसकी नमी धारण करने की क्षमता और कपास की खेती से उसका सीधा संबंध।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. ऐसे दो राज्यों के नाम लिखिए जहाँ काली मिट्टी पायी जाती है।
Answer: महाराष्ट्र तथा गुजरात ऐसे दो राज्य हैं, जहाँ काली मिट्टी ज़्यादातर पायी जाती है। ये राज्य दक्कन के पठार के पश्चिमी भाग में स्थित हैं।
In simple words: महाराष्ट्र और गुजरात वो दो राज्य हैं जहाँ काली मिट्टी सबसे ज़्यादा मिलती है।
🎯 Exam Tip: मिट्टी के प्रकारों के साथ उनसे संबंधित राज्यों के नाम याद रखना परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 2. लैटेराइट मिट्टियाँ कहाँ पायी जाती हैं ?
Answer: भारत में लैटेराइट मिट्टियाँ पश्चिमी घाट, छोटा नागपुर के पठार, मेघालय तथा तमिलनाडु की पहाड़ियों, केरल तथा पूर्वी घाट के क्षेत्रों में पायी जाती हैं। यह उन क्षेत्रों में होती है जहाँ भारी वर्षा होती है।
In simple words: लैटेराइट मिट्टी पश्चिमी घाट, छोटा नागपुर पठार, मेघालय और केरल जैसी जगहों पर मिलती है जहाँ खूब बारिश होती है।
🎯 Exam Tip: लैटेराइट मिट्टी उन स्थानों पर मिलती है जहाँ भारी बारिश होती है, इसलिए उन राज्यों को याद रखें जहाँ अधिक वर्षा होती है।
प्रश्न 3. मरुस्थलीय मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण लिखिए।
Answer: मरुस्थलीय मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण निम्नलिखित हैं:
- मरुस्थलीय मिट्टी में आर्द्रता धारण करने की क्षमता कम होती है। यह बहुत तेज़ी से सूख जाती है, जिससे पौधों के लिए पानी की कमी हो जाती है।
- इनमें नाइट्रोजन तथा जीवांश की कमी होती है। ये पोषक तत्व पौधों के विकास के लिए ज़रूरी होते हैं।
इन दोनों कारणों से मरुस्थलीय मिट्टी में खेती करना मुश्किल होता है।
In simple words: मरुस्थलीय मिट्टी में पानी रोकने की ताकत कम होती है और इसमें ज़रूरी पोषक तत्व (जैसे नाइट्रोजन) भी कम होते हैं, इसलिए यह कम उपजाऊ होती है।
🎯 Exam Tip: मरुस्थलीय मिट्टी की विशेषताओं में पानी की कमी और पोषक तत्वों की कमी को मुख्य कारण के रूप में याद रखें।
प्रश्न 4. 'बाँगर' से आप क्या समझते हैं?
Answer: बाँगर एक प्रकार की पुरानी जलोढ़ मिट्टी है, जो उत्तरी मैदान में नदियों द्वारा जमा की गई पुरानी काँप से बनती है। यह अक्सर बाढ़ के क्षेत्र से दूर ऊँची ज़मीन पर पायी जाती है।
In simple words: बाँगर पुरानी जलोढ़ मिट्टी है जो नदियों की पुरानी मिट्टी से बनती है और बाढ़ से दूर ऊँची जगह पर मिलती है।
🎯 Exam Tip: बाँगर को हमेशा 'पुरानी जलोढ़ मिट्टी' और 'बाढ़ से ऊँचाई पर' पाए जाने वाले गुण से जोड़कर याद रखें।
प्रश्न 5. लैटेराइट मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण लिखिए।
Answer: लैटेराइट मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण निम्नलिखित हैं:
- लैटेराइट मिट्टी सिलिका तथा लवण (नमक) के कणों से युक्त होती है, जिसमें मोटे-मोटे कण तथा कंकड़-पत्थर ज़्यादा होते हैं। यह भारी बारिश के कारण पोषक तत्वों के बह जाने से बनती है।
- शुष्क मौसम में लैटेराइट मिट्टी ईंट की तरह सख्त हो जाती है। इस मिट्टी में कैल्सियम, मैग्नीशियम तथा नाइट्रोजन की कमी और पोटाश का अभाव होता है। ये पोषक तत्व पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक होते हैं।
ये कारक इसे खेती के लिए कम अनुकूल बनाते हैं।
In simple words: लैटेराइट मिट्टी में मोटे कण और कंकड़ ज़्यादा होते हैं, और इसमें कैल्सियम, मैग्नीशियम और नाइट्रोजन जैसे ज़रूरी पोषक तत्वों की कमी होती है, इसलिए यह कम उपजाऊ होती है।
🎯 Exam Tip: लैटेराइट मिट्टी के कम उपजाऊ होने के कारणों में निक्षालन प्रक्रिया और मुख्य पोषक तत्वों की कमी को याद रखें।
प्रश्न 6. लाल-पीली मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण लिखिए।
Answer: लाल-पीली मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण निम्नलिखित हैं:
- यह प्राचीन क्रिस्टलीय शैलों के टूटने से बनती है और छिद्रयुक्त होती है; अतः इनमें जलधारण की क्षमता कम होती है। पानी जल्दी रिस जाता है।
- इनमें फॉस्फोरिक अम्ल, जैविक तथा नाइट्रोजन पदार्थ (ह्यूमस) की कमी होती है। ये पोषक तत्व पौधों के विकास के लिए बेहद ज़रूरी हैं।
इन कमियों के कारण यह मिट्टी खेती के लिए उतनी उपजाऊ नहीं होती।
In simple words: लाल-पीली मिट्टी में पानी रोकने की क्षमता कम होती है और इसमें फॉस्फोरिक अम्ल, जैविक पदार्थ तथा नाइट्रोजन जैसे ज़रूरी तत्व कम होते हैं, जिससे यह ज़्यादा उपजाऊ नहीं होती।
🎯 Exam Tip: लाल-पीली मिट्टी के लिए पानी रोकने की कम क्षमता और आवश्यक पोषक तत्वों की कमी को याद रखें।
प्रश्न 7. जलोढ़ मिट्टी की किन्हीं दो प्रमुख विशेषताओं को लिखिए। [2016, 17]
Answer: जलोढ़ मिट्टी की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- इसके कण सूक्ष्म होते हैं और इसमें जल देर तक ठहर सकता है। यह मिट्टी को नम और उपजाऊ बनाए रखता है।
- इसमें पोटाश तथा चूने की पर्याप्त मात्रा होती है। ये तत्व पौधों की वृद्धि के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं।
ये विशेषताएँ इसे भारत की सबसे उपजाऊ मिट्टियों में से एक बनाती हैं।
In simple words: जलोढ़ मिट्टी में छोटे कण होते हैं जिससे वह पानी को अच्छे से रोक पाती है, और इसमें पोटाश व चूना भी अच्छी मात्रा में होता है।
🎯 Exam Tip: जलोढ़ मिट्टी की प्रमुख विशेषताओं में उसके कणों का आकार और पोषक तत्वों की उपस्थिति को याद रखें।
प्रश्न 8. 'भू-क्षरण' अथवा 'भू-अपरदन' के प्रमुख कारकों का उल्लेख कीजिए।
Answer: 'भू-क्षरण' अथवा 'भू-अपरदन' के प्रमुख कारक हैं—
- पवन: तेज़ हवाएँ मिट्टी के ढीले कणों को उड़ाकर ले जाती हैं।
- अत्यधिक पशुचारण: पशुओं द्वारा ज़्यादा घास चरने से ज़मीन की ऊपरी परत ढीली हो जाती है।
- मूसलाधार वृष्टि: भारी बारिश मिट्टी को बहाकर ले जाती है।
- प्राकृतिक वनस्पति का विनाश: पेड़-पौधों के कटने से मिट्टी की पकड़ कमज़ोर हो जाती है।
ये सभी कारक मिलकर मिट्टी के कटाव को बढ़ाते हैं।
In simple words: भू-क्षरण के मुख्य कारण हैं हवा, ज़्यादा पशु चराई, भारी बारिश और पेड़ों का कटना, जो मिट्टी को अपनी जगह से हटा देते हैं।
🎯 Exam Tip: भू-क्षरण के कारकों को याद रखने के लिए हवा, पानी, पशु और वनस्पति जैसे मुख्य तत्वों पर ध्यान केंद्रित करें।
प्रश्न 9. 'भू-क्षरण के प्रकारों का उल्लेख कीजिए ।
Answer: आमतौर पर भू-क्षरण निम्नलिखित दो प्रकार का होता है:
- चादरी भू-क्षरण: जब हवा या पानी ज़मीन की ऊपरी नरम परत को काटकर उड़ा देती है या बहा देती है, तो उसे समतल या चादरी भू-क्षरण कहते हैं। यह पूरी ज़मीन पर एकसमान रूप से होता है।
- नालीदार भू-क्षरण: जब तेज़ गति से बहता हुआ पानी ज़मीन में गहरी-गहरी नालियाँ बना देता है, तो उसे गहन या नालीदार भू-क्षरण कहते हैं। यह कटाव विशेष रूप से ढलान वाले क्षेत्रों में होता है।
ये दोनों प्रकार ज़मीन की उत्पादकता को कम करते हैं।
In simple words: भू-क्षरण दो तरह का होता है - चादरी भू-क्षरण, जहाँ मिट्टी की ऊपरी परत बराबर हटती है, और नालीदार भू-क्षरण, जहाँ पानी ज़मीन में गहरी नालियाँ बना देता है।
🎯 Exam Tip: चादरी और नालीदार भू-क्षरण के बीच के अंतर को उदाहरण के साथ स्पष्ट रूप से समझाएं।
प्रश्न 10. चाय की खेती के लिए उपयोगी मिट्टी कहाँ पायी जाती है ?
Answer: मध्य हिमालय के पहाड़ी ढलानों पर ऐसी मिट्टी पायी जाती है जिसमें वनस्पति के अंश ज़्यादा होते हैं। इस मिट्टी में लोहे की मात्रा अधिक और चूने का अंश कम होता है। यह मिट्टी चाय के उत्पादन के लिए सबसे अच्छी होती है। काँगड़ा, देहरादून, दार्जिलिंग तथा असोम के पहाड़ी ढलानों पर यह मिट्टी ज़्यादातर मिलती है। इन क्षेत्रों की मिट्टी में अच्छी जल निकासी भी होती है, जो चाय के लिए ज़रूरी है।
In simple words: चाय की खेती के लिए अच्छी मिट्टी हिमालय के पहाड़ी ढलानों पर मिलती है, जैसे काँगड़ा, दार्जिलिंग और असोम में। इस मिट्टी में वनस्पति अंश ज़्यादा और चूना कम होता है।
🎯 Exam Tip: चाय की खेती के लिए मिट्टी की विशेषताओं (वनस्पति अंश, कम चूना, अधिक लोहा) और प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों को याद रखें।
प्रश्न 11. डेल्टाई काँप मिट्टी कहाँ पायी जाती है ?
Answer: डेल्टाई काँप मिट्टी नदियों के डेल्टा में पायी जाती है, जहाँ नदियाँ लगातार काँप मिट्टी का जमाव करती रहती हैं। यह मिट्टी अत्यधिक उपजाऊ होती है क्योंकि नदियाँ हर साल नई और उपजाऊ मिट्टी जमा करती हैं।
In simple words: डेल्टाई काँप मिट्टी नदियों के मुहाने पर बने डेल्टा इलाकों में मिलती है, जहाँ नदियाँ नई मिट्टी जमा करती रहती हैं, जिससे यह बहुत उपजाऊ होती है।
🎯 Exam Tip: डेल्टाई काँप मिट्टी को नदियों के डेल्टा क्षेत्र और उसकी उच्च उपजाऊपन से जोड़कर याद रखें।
प्रश्न 12. भारत की मिट्टी में किन तत्त्वों की कमी पायी जाती है ?
Answer: भारत की मिट्टी में नाइट्रोजन, जीवांश, वनस्पति अंश और खनिज लवणों की कमी पायी जाती है। ये सभी पोषक तत्व पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक होते हैं, और इनकी कमी से मिट्टी की उत्पादकता प्रभावित होती है।
In simple words: भारत की मिट्टी में नाइट्रोजन, जैविक पदार्थ और कुछ खनिज तत्वों की कमी होती है।
🎯 Exam Tip: मिट्टी में कम पाए जाने वाले मुख्य पोषक तत्वों (नाइट्रोजन, जीवांश) को याद रखें।
प्रश्न 13. समुचित भूमि उपयोग न करने के कौन-से दो दृष्परिणाम हो सकते हैं ?
Answer: समुचित भूमि का उपयोग न करने के निम्नलिखित दो दुष्परिणाम हो सकते हैं:
- कृषि-योग्य भूमि बंजर भूमि में बदल सकती है। जब ज़मीन का सही इस्तेमाल नहीं होता, तो वह अपनी उर्वरता खो देती है।
- भूमि की उत्पादकता में कमी हो सकती है। लगातार गलत तरीके से इस्तेमाल करने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति घट जाती है।
ये दुष्परिणाम लंबे समय में खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास को प्रभावित करते हैं।
In simple words: अगर ज़मीन का सही इस्तेमाल न किया जाए, तो वह बंजर हो सकती है और उसकी उपजाऊ शक्ति कम हो सकती है।
🎯 Exam Tip: भूमि के अनुचित उपयोग से होने वाले दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभावों को याद रखें, जैसे कि बंजरपन और उत्पादकता में कमी।
प्रश्न 14. भारत में कहवा उत्पन्न करने वाले दो राज्यों के नाम लिखिए।
या
भारत में कहवा उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्यों के नाम बताइए ।
Answer: उर्वरकों की सहायता से लैटेराइट मिट्टी में कहवा (कॉफी) की खेती कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र के दक्षिणी भागों और आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में की जाती है। कर्नाटक और केरल भारत में कहवा उत्पादन के प्रमुख राज्य हैं।
In simple words: भारत में कहवा (कॉफी) उगाने वाले दो मुख्य राज्य कर्नाटक और केरल हैं, जहाँ लैटेराइट मिट्टी का उपयोग होता है।
🎯 Exam Tip: प्रमुख फसलों के उत्पादक राज्यों को याद रखें, खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों में कहवा का उत्पादन।
प्रश्न 15. चाय की खेती के लिए दो उपयोगी भौगोलिक दशाओं को लिखिए।
Answer: चाय की खेती के लिए उपयोगी दो भौगोलिक दशाएँ निम्नलिखित हैं:
- मिट्टी में वनस्पति के अंशों व लोहे के अंशों की अधिकता तथा चूने के अंश की न्यूनता। यह मिट्टी अम्लीय होनी चाहिए।
- आग्नेय शैलों के विखण्डन से निर्मित नवीन, पथरीली, दलदली तथा प्रवेश्य मिट्टियाँ। मिट्टी में पानी का ठहराव नहीं होना चाहिए।
ये दशाएँ चाय के पौधों के विकास के लिए आदर्श होती हैं।
In simple words: चाय की खेती के लिए ऐसी मिट्टी चाहिए जिसमें पेड़-पौधों के अंश और लोहा ज़्यादा हो, चूना कम हो, और जो नई, पथरीली, और आसानी से पानी सोखने वाली हो।
🎯 Exam Tip: चाय की खेती के लिए अम्लीय मिट्टी, अच्छी जल निकासी और पहाड़ी ढलान जैसी भौगोलिक दशाएं महत्वपूर्ण हैं।
प्रश्न 16. कपास की खेती के लिए सर्वोत्तम मिट्टी कौन-सी है ? उसकी एक विशेषता को लिखिए । [2015]
Answer: कपास की खेती के लिए सर्वोत्तम मिट्टी 'काली मिट्टी' अथवा 'रेगुर मिट्टी' है। इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता पर्याप्त होती है तथा इसमें पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं। इसकी नमी बनाए रखने की क्षमता कपास की फसल के लिए विशेष रूप से फायदेमंद होती है, जिससे कम सिंचाई में भी अच्छी पैदावार मिल पाती है।
In simple words: कपास के लिए सबसे अच्छी मिट्टी काली मिट्टी है, क्योंकि यह पानी को बहुत देर तक रोक कर रख सकती है।
🎯 Exam Tip: कपास और काली मिट्टी के संबंध को हमेशा याद रखें, और काली मिट्टी की नमी धारण करने की क्षमता को उसकी मुख्य विशेषता के रूप में उल्लेख करें।
प्रश्न 17. लाल मिट्टी भारत में सबसे ज्यादा कहाँ पायी जाती है ?
Answer: भारत में लाल मिट्टी कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के दक्षिण-पूर्वी भागों, तमिलनाडु, मेघालय और ओडिशा में पायी जाती है। ये क्षेत्र प्रायद्वीपीय पठार के हिस्से हैं।
In simple words: लाल मिट्टी भारत में कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र के दक्षिणी भाग, तमिलनाडु, मेघालय और ओडिशा में सबसे ज़्यादा मिलती है।
🎯 Exam Tip: लाल मिट्टी के प्रमुख क्षेत्रों को याद रखें, खासकर प्रायद्वीपीय पठार के दक्षिणी और पूर्वी हिस्से।
प्रश्न 18. मिट्टी का निर्माण करने वाले दो कारकों के नाम लिखिए।
Answer: मिट्टी का निर्माण करने वाले दो कारक निम्नलिखित हैं:
- वायु तथा
- जल
ये दोनों कारक चट्टानों के टूटने और उनके कणों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में मदद करते हैं।
In simple words: मिट्टी बनने के दो मुख्य कारण हवा और पानी हैं।
🎯 Exam Tip: मिट्टी के निर्माण में हवा और पानी की भूमिका को समझें, क्योंकि ये दोनों भौतिक और रासायनिक अपक्षय में सहायक होते हैं।
प्रश्न 19. उत्तर प्रदेश के अधिकतर भागों में किस प्रकार की मिट्टी पायी जाती है ? [2010]
Answer: उत्तर प्रदेश के अधिकतर भागों में जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है। यह मिट्टी गंगा और उसकी सहायक नदियों द्वारा लाई गई है, जिससे यह क्षेत्र अत्यधिक उपजाऊ है।
In simple words: उत्तर प्रदेश के ज़्यादातर हिस्सों में जलोढ़ मिट्टी मिलती है।
🎯 Exam Tip: उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में पाई जाने वाली प्रमुख मिट्टी के प्रकार को याद रखें, जो अक्सर जलोढ़ होती है।
बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. कौन-सी मिट्टी वर्षा से चिपचिपी हो जाती है?
(क) लाल
(ख) काली
(ग) जलोढ़
(घ) पर्वतीय
Answer: (ख) काली
In simple words: काली मिट्टी बारिश होने पर चिपचिपी हो जाती है, जो इसे पानी रोकने में मदद करती है।
🎯 Exam Tip: काली मिट्टी की यह विशेषता याद रखें कि वह बारिश में चिपचिपी और सूखने पर दरार वाली हो जाती है।
प्रश्न 2. काली मिट्टी कौन-सी फसल के लिए उपयुक्त है? [2013]
(क) गेहूँ
(ख) चना
(ग) कपास
(घ) गन्ना
Answer: (ग) कपास
In simple words: काली मिट्टी कपास की फसल उगाने के लिए सबसे अच्छी होती है।
🎯 Exam Tip: काली मिट्टी को 'कपास की काली मिट्टी' के रूप में भी जाना जाता है, जो इस संबंध को याद रखने में मदद करेगा।
प्रश्न 3. लैटेराइट मिट्टी किस राज्य में अधिक मिलती है?
(क) कर्नाटक में
(ख) असोम में
(ग) मेघालय में
(घ) उत्तर प्रदेश में
Answer: (ग) मेघालय में
In simple words: लैटेराइट मिट्टी मेघालय में ज़्यादा पायी जाती है, जहाँ बहुत बारिश होती है।
🎯 Exam Tip: लैटेराइट मिट्टी उन राज्यों में पायी जाती है जहाँ भारी वर्षा होती है, जैसे मेघालय, केरल और कर्नाटक।
प्रश्न 4. जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है [2012]
(क) पर्वतीय क्षेत्रों में
(ख) मैदानी क्षेत्रों में
(ग) पठारी क्षेत्रों में
(घ) रेगिस्तानी क्षेत्रों में
Answer: (ख) मैदानी क्षेत्रों में
In simple words: जलोढ़ मिट्टी भारत के बड़े मैदानी इलाकों में पायी जाती है, जो नदियों द्वारा लाई जाती है।
🎯 Exam Tip: जलोढ़ मिट्टी हमेशा नदी घाटियों और मैदानी इलाकों से जुड़ी होती है।
प्रश्न 5. लैटेराइट मिट्टी का रंग होता है
(क) काला
(ख) पीला
(घ) लाल
Answer: (ख) पीला
In simple words: लैटेराइट मिट्टी का रंग आमतौर पर गहरा पीला होता है, जो कभी-कभी लाल भी दिख सकता है।
🎯 Exam Tip: लैटेराइट मिट्टी का रंग उसके निर्माण प्रक्रिया में आयरन ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण होता है।
प्रश्न 6. निम्नलिखित में से कौन-सी मिट्टी कपास उत्पादन के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है? [2010]
या
कपास की खेती के लिए सबसे उत्तम मिट्टी है [2012, 13, 14]
(क) जलोढ़ मिट्टी
(ख) लाल मिट्टी
(ग) काली मिट्टी
(घ) लैटेराइट मिट्टी
Answer: (ग) काली मिट्टी
In simple words: कपास उगाने के लिए काली मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है।
🎯 Exam Tip: काली मिट्टी की नमी धारण करने की उच्च क्षमता इसे कपास की खेती के लिए आदर्श बनाती है।
प्रश्न 7. जलोढ़ मिट्टी का निर्माण मुख्यतः किसके द्वारा होता है? [2014, 16]
(क) ज्वालामुखी द्वारा
(ख) पवन द्वारा
(ग) हिमानी द्वारा
(घ) नदियों द्वारा
Answer: (घ) नदियों द्वारा
In simple words: जलोढ़ मिट्टी मुख्य रूप से नदियों द्वारा लाई गई गाद और मिट्टी से बनती है।
🎯 Exam Tip: जलोढ़ मिट्टी का संबंध हमेशा नदियों और उनके द्वारा जमा किए गए तलछट से होता है।
प्रश्न 8. भारत के किस राज्य में काली मिट्टी का विस्तार सर्वाधिक है?
(क) महाराष्ट्र
(ख) उत्तर प्रदेश
(ग) असोम
(घ) राजस्थान
Answer: (क) महाराष्ट्र
In simple words: महाराष्ट्र राज्य में काली मिट्टी सबसे ज़्यादा फैली हुई है।
🎯 Exam Tip: दक्कन पठार और महाराष्ट्र को काली मिट्टी के प्रमुख क्षेत्र के रूप में याद रखें।
प्रश्न 9. वन हमारी सहायता करते हैं
(क) मिट्टी का कटाव रोककर
(ख) बाढ़ रोककर
(ग) वर्षा की मात्रा बढ़ाकर
(घ) इन सभी प्रकार से
Answer: (घ) इन सभी प्रकार से
In simple words: जंगल मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, बाढ़ को कम करते हैं और बारिश बढ़ाने में मदद करते हैं, यानी वे हमें कई तरह से फायदा पहुँचाते हैं।
🎯 Exam Tip: वनों के बहुमुखी लाभों को याद रखें, जो पर्यावरण संतुलन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
प्रश्न 10. जलोढ़ मिट्टी किस फसल की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है? [2011]
(क) चाय
(ख) रबड़
(ग) कपास
(घ) गेहूँ
Answer: (घ) गेहूँ
In simple words: जलोढ़ मिट्टी गेहूँ जैसी अनाज की फसलों के लिए बहुत अच्छी होती है।
🎯 Exam Tip: जलोढ़ मिट्टी भारत के कृषि मैदानों की मुख्य मिट्टी है, जो विभिन्न प्रकार की अनाज फसलों के लिए उपयुक्त है।
प्रश्न 11. भारत की सर्वाधिक उपजाऊ मिट्टी है [2016]
(क) जलोढ़ मिट्टी
(ख) लाल मिट्टी
(ग) लैटेराइट मिट्टी
(घ) पर्वतीय मिट्टी
Answer: (क) जलोढ़ मिट्टी
In simple words: भारत में जलोढ़ मिट्टी सबसे ज़्यादा उपजाऊ मानी जाती है।
🎯 Exam Tip: जलोढ़ मिट्टी को उसकी उर्वरता और भारत के बड़े कृषि क्षेत्र में पाए जाने के कारण सबसे उपजाऊ माना जाता है।
प्रश्न 12. निम्न में से कौन-सी मिट्टी चाय की खेती के लिए उपयुक्त है? [2017]
(क) पर्वतीय मिट्टी
(ख) काली मिट्टी
(ग) जलोढ़ मिट्टी
(घ) लाल मिट्टी
Answer: (क) पर्वतीय मिट्टी
In simple words: चाय की खेती के लिए पर्वतीय मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है।
🎯 Exam Tip: चाय की खेती के लिए अच्छी जल निकासी और अम्लीय गुणों वाली पहाड़ी मिट्टी की आवश्यकता होती है।
प्रश्न 13. काली मिट्टी का निर्माण होता है [2017]
(क) वायु से
(ख) ग्लेशियरों से
(ग) ज्वालामुखी विस्फोट से
(घ) नदियों से
Answer: (ग) ज्वालामुखी विस्फोट से
In simple words: काली मिट्टी ज्वालामुखी के फटने से निकले लावा के ठंडा होकर टूटने से बनती है।
🎯 Exam Tip: काली मिट्टी का संबंध हमेशा ज्वालामुखी गतिविधियों और बेसाल्ट चट्टानों से होता है।
Question 10. जलोढ़ मिट्टी किस फसल की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है? [2011]
(क) चाय
(ख) रबड़
(ग) कपास
(घ) गेहूँ
Answer: (घ) गेहूँ
In simple words: जलोढ़ मिट्टी भारत के उत्तरी मैदानों में पाई जाती है और नदियों द्वारा लाई गई गाद से बनती है, जो गेहूँ जैसी फसलों के लिए बहुत उपजाऊ होती है। यह मिट्टी पानी को अच्छी तरह रोक सकती है।
🎯 Exam Tip: जलोढ़ मिट्टी की विशेषताओं को याद रखें, जैसे कि यह नदियों द्वारा लाई जाती है और कृषि के लिए बहुत उपजाऊ होती है।
Question 11. भारत की सर्वाधिक उपजाऊ मिट्टी है [2016]
(क) जलोढ़ मिट्टी
(ख) लाल मिट्टी
(ग) लैटेराइट मिट्टी
(घ) पर्वतीय मिट्टी
Answer: (क) जलोढ़ मिट्टी
In simple words: जलोढ़ मिट्टी भारत में सबसे ज्यादा उपजाऊ मानी जाती है क्योंकि इसमें पोषक तत्व भरपूर होते हैं और यह नदियों द्वारा लगातार नई परतें बनाती रहती है। यह कृषि के लिए बहुत अच्छी है।
🎯 Exam Tip: भारत में प्रमुख मिट्टी के प्रकारों और उनकी उपजाऊ शक्ति को जानना महत्वपूर्ण है। जलोढ़ मिट्टी अपनी उच्च उर्वरता के लिए प्रसिद्ध है।
Question 12. निम्न में से कौन-सी मिट्टी चाय की खेती के लिए उपयुक्त है? [2017]
(क) पर्वतीय मिट्टी
(ख) काली मिट्टी
(ग) जलोढ़ मिट्टी
(घ) लाल मिट्टी
Answer: (क) पर्वतीय मिट्टी
In simple words: पर्वतीय मिट्टी चाय की खेती के लिए सबसे अच्छी होती है क्योंकि इसमें अच्छी जल निकासी होती है और यह थोड़ी अम्लीय होती है, जो चाय के पौधों के लिए आदर्श है। यह ढलान वाले क्षेत्रों में पाई जाती है।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि चाय की खेती के लिए ठंडी जलवायु, अच्छी वर्षा और ढलान वाली भूमि की आवश्यकता होती है, जो पर्वतीय मिट्टी में मिलती है।
Question 13. काली मिट्टी का निर्माण होता है [2017]
(क) वायु से
(ख) ग्लेशियरों से
(ग) ज्वालामुखी विस्फोट से
(घ) नदियों से
Answer: (ग) ज्वालामुखी विस्फोट से
In simple words: काली मिट्टी तब बनती है जब ज्वालामुखी से निकला लावा टूटता है और छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल जाता है। यह प्रक्रिया काली मिट्टी को उसके खास गुण देती है।
🎯 Exam Tip: काली मिट्टी को रेगुर मिट्टी भी कहते हैं और यह कपास की खेती के लिए सबसे अच्छी होती है। इसके निर्माण का स्रोत जानना महत्वपूर्ण है।
उत्तरमाला
1. (ख), 2. (ग), 3. (ग), 4. (ख), 5. (ख), 6. (ग), 7. (घ), 8. (क), 9. (घ), 10. (घ), 11. (क), 12. (क), 13. (ग)।
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