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Detailed Chapter 3 राज्य सरकार UP Board Solutions for Class 10 Social Science
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Class 10 Social Science Chapter 3 राज्य सरकार UP Board Solutions PDF
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
Question 1. विधानसभा के संगठन तथा उसके अधिकारों की विवेचना कीजिए। [2011]
या
अपने राज्य के विधानसभा के संगठन पर प्रकाश डालिए ।
या
विधानसभा की सदस्यता की क्या अर्हताएँ (योग्यताएँ) हैं ?
या
विधानसभा के अध्यक्ष का निर्वाचन कैसे होता है? उसके कोई चार कार्य लिखिए। [2013]
या
विधानसभा का निर्वाचन कैसे होता है? [2017]
या
उत्तर प्रदेश की विधानसभा का गत चुनाव कब हुआ था? इसकी चुनाव प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। [2018]
Answer: उत्तर प्रदेश की विधानसभा का पिछला चुनाव 2017 में हुआ था। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 168 के अनुसार, हर राज्य में एक विधानमंडल होना चाहिए। कुछ राज्यों में विधानमंडल के दो सदन होते हैं- विधानसभा (निचला सदन) और विधान-परिषद् (उच्च सदन)। विधानसभा के सदस्यों को एम. एल. ए. (Member of Legislative Assembly) कहते हैं, जबकि विधान परिषद् के सदस्यों को एम. एल. सी. (Member of Legislative Council) कहते हैं। कुछ राज्यों में केवल एक ही सदन होता है, जिसे विधानसभा कहा जाता है।
विधानसभा का संगठन
1. सदस्य संख्या- संविधान के अनुच्छेद 170 के अनुसार, राज्यों की विधानसभा में अधिकतम 500 और न्यूनतम 60 सदस्य हो सकते हैं। किसी भी राज्य की विधानसभा में सदस्यों की असल संख्या उस राज्य की आबादी के हिसाब से संसद तय करती है। कुछ सीटें अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षित होती हैं। अगर एंग्लो-इंडियन समुदाय का कोई प्रतिनिधि नहीं होता, तो राज्यपाल एक सदस्य को मनोनीत कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश की विधानसभा में अभी 403 सदस्य निर्धारित हैं। विधानसभा का गठन राज्य के लोगों का प्रतिनिधित्व करने के लिए किया जाता है।
2. सदस्यों का निर्वाचन- विधानसभा के सदस्यों को जनता सीधे वयस्क मताधिकार के आधार पर गुप्त मतदान से चुनती है। वयस्क मताधिकार का मतलब है कि 18 साल या उससे अधिक उम्र के सभी नागरिकों (पुरुष और महिला) को वोट देने का अधिकार है।
3. सदस्यों की योग्यताएँ- विधानसभा का सदस्य बनने के लिए किसी भी व्यक्ति (पुरुष या महिला) में ये योग्यताएँ होनी ज़रूरी हैं:
• वह भारत का नागरिक हो।
• उसकी उम्र 25 साल पूरी हो चुकी हो।
• वह भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर न हो।
• वह संसद द्वारा तय की गई सभी अन्य शर्तें पूरी करता हो।
• उसे किसी भी अदालत ने अपराधी घोषित न किया हो और वह पागल या दिवालिया न हो।
4. सदस्यों का कार्यकाल- विधानसभा का कार्यकाल पाँच साल का होता है। लेकिन राज्यपाल इस अवधि से पहले भी विधानसभा को भंग करके नए चुनाव करवा सकते हैं। संकटकाल के समय, संसद एक बार में विधानसभा का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा सकती है।
5. पदाधिकारी – विधानसभा के सदस्य अपने में से एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष चुनते हैं। अध्यक्ष का काम सदन की बैठकों की अध्यक्षता करना और कार्यवाही चलाना होता है। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष यही काम करते हैं।
विधानसभा के अधिकार/कार्य/शक्तियाँ
विधानसभा के मुख्य अधिकार इस प्रकार हैं:
1. विधायिनी अधिकार- विधानसभा का मुख्य काम कानून बनाना है। इसे नए कानून बनाने, पुराने कानूनों में बदलाव करने और उन्हें रद्द करने का अधिकार है। राज्य सूची में दिए गए सभी विषयों पर यह कानून बना सकती है। समवर्ती सूची के विषयों पर भी यह कानून बना सकती है, लेकिन अगर संसद द्वारा बनाया गया कोई कानून इससे टकराता है, तो केवल संसद का कानून ही मान्य होगा।
2. शासन सम्बन्धी अधिकार- राज्य के शासन की असली शक्ति मंत्रिपरिषद् के हाथ में होती है, लेकिन मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है। इसका मतलब है कि शासन पर असली नियंत्रण विधानसभा का ही होता है। विधानसभा के सदस्य मंत्रियों से संबंधित विषयों पर सवाल पूछकर, काम रोको प्रस्ताव लाकर, अविश्वास प्रस्ताव पारित करके, विधेयकों को अस्वीकार करके, बजट में कटौती करके और उनके कामों की जाँच करके मंत्रिपरिषद् पर नियंत्रण रखते हैं। मंत्रिपरिषद् तभी तक काम कर सकती है जब तक उसे विधानसभा में बहुमत का विश्वास प्राप्त हो।
3. वित्तीय अधिकार- राज्य की आय-व्यय पर पूरा नियंत्रण विधानसभा को ही मिलता है। नए टैक्स लगाने, पुराने टैक्स बढ़ाने, किसी टैक्स को खत्म करने और टैक्स से मिली आय को खर्च करने के लिए विधानमंडल (मुख्यतः विधानसभा) की मंजूरी ज़रूरी होती है। मंत्रिपरिषद् द्वारा तैयार किया गया वार्षिक बजट विधानसभा की मंजूरी के बिना लागू नहीं हो सकता। कुछ मदों को छोड़कर विधानसभा को सभी मदों में कटौती करने या उन्हें अस्वीकार करने का अधिकार है। इसकी मंजूरी के बिना सरकार न तो कोई टैक्स लगा सकती है और न ही सरकारी खजाने से एक पैसा खर्च कर सकती है।
4. अन्य अधिकार - विधानसभा के चुने हुए सदस्यों को ये अधिकार भी मिलते हैं:
• राष्ट्रपति के चुनाव में हिस्सा लेना।
• राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव करना।
• विधान-परिषद् के 1/3 सदस्यों का चुनाव करना।
• विधान परिषद् की स्थापना या उसे खत्म करने के बारे में प्रस्ताव पास करना।
• संविधान में बदलाव करने में हिस्सा लेना।
In simple words: विधानसभा राज्य का मुख्य कानून बनाने वाला सदन है। इसके सदस्य जनता द्वारा चुने जाते हैं और इनका कार्यकाल 5 साल का होता है। विधानसभा के पास कानून बनाने, सरकार को नियंत्रित करने और वित्तीय मामलों में अहम अधिकार होते हैं।
🎯 Exam Tip: जब विधानसभा के संगठन और अधिकारों पर सवाल आए, तो सदस्यों की संख्या, योग्यता, कार्यकाल, और अध्यक्ष के चुनाव जैसे बिंदुओं को स्पष्ट रूप से समझाएं। अधिकारों को विधायिनी, वित्तीय और कार्यपालिका संबंधी श्रेणियों में बांटकर लिखें।
Question 2. विधान-परिषद् का संगठन किस प्रकार होता है ? इसके कार्यों एवं अधिकारों का वर्णन कीजिए।
या
विधानपरिषद् का गठा कैसे होता है ? इसे स्थायी सदन क्यों कहा जाता है ? [2013]
या
उत्तर प्रदेश विधान-परिषद के गठन का वर्णन कीजिए। [2014]
या
विधान-परिषद् की किन्हीं दो वित्तीय शक्तियों का उल्लेख कीजिए । [2015]
या
अपने प्रदेश में विधान-परिषद् की रचना एवं उसके कार्यों का वर्णन कीजिए। [2016, 17]
या
विधान-परिषद के सदस्यों की योग्यताओं का उल्लेख कीजिए । [2016, 18]
या
अपने प्रदेश की विधानपरिषद के सदस्यों की संख्या कितनी होती है? इसका गठन कैसे होता है? इसकी विधायिनी (कानून-निर्माण सम्बन्धी) शक्तियों का वर्णन कीजिए। [2016]
या
विधान-परिषद् में कानून-निर्माण की प्रक्रिया समझाइए। [2016]
Answer: विधान-परिषद् राज्य के विधानमंडल का दूसरा या ऊपरी सदन होता है। यह एक स्थायी सदन है, जिसका मतलब है कि इसे पूरी तरह से भंग नहीं किया जा सकता। विधान-परिषद् सभी राज्यों के विधानमंडलों में नहीं है। वर्तमान में केवल छह राज्यों- बिहार, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर और आंध्र प्रदेश में विधान परिषद् की व्यवस्था है। साल 2007 के चुनावों के बाद आंध्र प्रदेश का विधानमंडल भी दो सदनों वाला हो गया। इसके संगठन से जुड़ी मुख्य बातें नीचे दी गई हैं:
विधान-परिषद् का संगठन
1. सदस्य-संख्या- विधान-परिषद् में सदस्यों की संख्या कम से कम 40 होनी चाहिए और ज़्यादा से ज़्यादा विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या का 1/3 हिस्सा हो सकती है। जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए एक खास व्यवस्था है, जहाँ विधान परिषद् के सदस्यों की संख्या 36 रखी गई है।
2. सदस्यों का निर्वाचन एवं मनोनयन- विधान-परिषद् के सदस्यों को जनता सीधे नहीं चुनती है। उनके सदस्यों का चुनाव जनता के प्रतिनिधियों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से होता है। परिषद् के कुल सदस्यों का 1/3 हिस्सा राज्य के स्थानीय निकायों जैसे नगर महापालिकाओं, ज़िला परिषदों, पंचायतों और अन्य स्थानीय स्वशासन संस्थाओं द्वारा चुना जाता है। 1/3 हिस्सा राज्य की विधानसभा के सदस्यों द्वारा, 1/12 हिस्सा स्नातकों द्वारा और 1/12 हिस्सा शिक्षकों द्वारा चुना जाता है। बचे हुए 1/6 सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत करते हैं। ये मनोनीत सदस्य ऐसे व्यक्ति होते हैं जिन्हें साहित्य, कला, विज्ञान और समाज-सेवा के क्षेत्रों में खास ज्ञान होता है।
3. सदस्यों की योग्यताएँ- विधान-परिषद् का सदस्य बनने के लिए किसी व्यक्ति में ये योग्यताएँ होनी ज़रूरी हैं:
• वह भारत का नागरिक हो।
• उसकी आयु 30 वर्ष से कम न हो।
• वह किसी सरकारी लाभ के पद पर न हो।
• वह संसद द्वारा तय की गई अन्य शर्तें पूरी करता हो।
4. सदस्यों का कार्यकाल- विधान परिषद् एक स्थायी सदन है और इसे कभी भी पूरी तरह से भंग या खत्म नहीं किया जा सकता। हालांकि, इसके 1/3 सदस्यों का कार्यकाल हर दो साल बाद खत्म हो जाता है और उनकी जगह पर उतने ही नए सदस्य चुन लिए जाते हैं। इस तरह हर सदस्य अपने पद पर छह साल तक बना रहता है।
5. पदाधिकारी- विधान-परिषद् के दो मुख्य अधिकारी होते हैं- सभापति और उपसभापति। दोनों को विधान परिषद् के सदस्य अपने में से ही चुनते हैं। सभापति का काम सदन की बैठक की अध्यक्षता करना और उसकी कार्यवाही चलाना होता है। सभापति की गैर-मौजूदगी में उपसभापति इन्हीं कामों को करते हैं। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद, उत्तर प्रदेश की विधानसभा में 22 सदस्य कम हो गए, और विधान-परिषद् के सदस्यों की संख्या 108 से घटकर 99 + 1 = 100 रह गई है।
विधान-परिषद् के कार्य एवं अधिकार
विधान-परिषद् के कार्य और अधिकार इस प्रकार हैं:
1. विधायिनी अधिकार- विधान-परिषद् को कानून बनाने से जुड़े अधिकार प्राप्त हैं। विधानसभा द्वारा पारित कोई भी विधेयक विधान परिषद् द्वारा पास होने के बाद ही राज्यपाल के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाता है।
2. वित्तीय अधिकार - विधानसभा द्वारा पारित वित्तीय विधेयक को विधान परिषद् 14 दिन तक रोक सकती है। यह वित्त विधेयक में ज़रूरी बदलाव भी सुझा सकती है। यह विधानसभा पर निर्भर करता है कि वह विधान परिषद् की सिफारिशों को माने या नहीं। यदि परिषद् चौदह दिनों के अंदर विधेयक पर कोई फैसला नहीं लेती है, तो उसे दोनों सदनों द्वारा मंजूर मान लिया जाता है।
3. कार्यपालिका सम्बन्धी अधिकार- विधान परिषद् के सदस्य राज्य की मंत्रिपरिषद् में शामिल हो सकते हैं। विधानपरिषद् मंत्रिपरिषद् के कामों की आलोचना कर सकती है और सुझाव भी दे सकती है। इस तरह यह मंत्रिपरिषद् पर नियंत्रण रखती है।
4. सदस्यों के विशेषाधिकार- विधान-परिषद् के सदस्यों को ये खास अधिकार भी मिलते हैं:
• सदन के नियमों का पालन करते हुए उन्हें सदन में बोलने का अधिकार है।
• सदन में दिए गए भाषण के लिए उनके खिलाफ किसी भी अदालत में कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
• अधिवेशन के दिनों में, उपस्थित किसी भी सदस्य को सभापति की अनुमति के बिना गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
5. अन्य अधिकार- विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को विधान परिषद् तीन महीने तक रोककर जनता की राय जानने की कोशिश कर सकती है।
राज्य विधानमण्डल में कानून निर्माण की प्रक्रिया
(i) साधारण विधेयक के सम्बन्ध में
1. धन विधेयक को छोड़कर, किसी भी विधेयक को विधानसभा या विधान-परिषद् दोनों में से किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है।
2. यदि विधेयक विधान-परिषद् में पेश किया जाता है, तो उसे विधानपरिषद् से पारित होने के बाद विधानसभा में भेजा जाता है।
3. यदि विधानसभा इस विधेयक को पास कर देती है, तो यह कानून बन जाता है। यदि विधानसभा इसे अस्वीकार कर देती है, तो विधेयक वहीं खत्म हो जाता है।
4. यदि विधेयक विधानसभा में पेश किया जाता है, तो उसे विधानसभा से पास होने के बाद विधान परिषद् को भेजा जाता है।
5. विधान परिषद् विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को अगर स्वीकार कर लेती है, तो वह राज्यपाल की मंजूरी से अधिनियम बन जाता है।
6. यदि विधान-परिषद्, विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को
• अस्वीकार कर देती है, या
• बदलावों के साथ पास करती है, या
• विधेयक भेजे जाने की तारीख से तीन महीने के भीतर पास करके वापस नहीं करती, तो विधानसभा ऐसे विधान परिषद् द्वारा पारित विधेयक को बदलावों के साथ या बिना बदलाव के फिर से विधान परिषद् को भेजती है। यदि विधान-परिषद् फिर से-
• उसे स्वीकार कर लेती है, तो वह विधेयक राज्यपाल की मंजूरी से अधिनियम बन जाता है, लेकिन यदि
• उसे अस्वीकार कर देती है, या
• बदलावों के साथ पास करती है, या
• विधानसभा द्वारा भेजे जाने के एक महीने तक विधेयक को पास नहीं करती, तो
• यह विधेयक उसी रूप में पास मान लिया जाएगा, जिस रूप में विधानसभा ने इसे पास किया था।
(ii) धन विधेयक के सम्बन्ध में ।
• धन विधेयक केवल विधानसभा में ही पेश किया जाता है, विधानपरिषद् में नहीं।
• विधानपरिषद् धन विधेयक को केवल चौदह (14) दिनों तक रोक सकती है। चौदह दिन बाद वह अपने आप ही पास मान लिया जाता है।
• विधानसभा विधान-परिषद् के किसी भी बदलाव या सिफारिश को मानने के लिए बाध्य नहीं है। धन विधेयकों के मामले में विधानसभा को ही सभी असली अधिकार हैं। इसलिए धन विधेयकों को लेकर विधानसभा और विधान-परिषद् में कोई गतिरोध नहीं होता है।
In simple words: विधान-परिषद् राज्य के विधानमंडल का ऊपरी सदन है, जिसके सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। यह कानून बनाने, वित्तीय मामलों में सलाह देने और सरकार पर कुछ हद तक नियंत्रण रखने जैसे काम करती है। इसे पूरी तरह से भंग नहीं किया जा सकता।
🎯 Exam Tip: विधान-परिषद् के संगठन में सदस्यों की संख्या, निर्वाचन प्रक्रिया और योग्यताएं बताएं। कार्यों और अधिकारों को विधायिनी, वित्तीय और कार्यपालिका संबंधी श्रेणियों में बांटकर समझाएं, और कानून बनाने की प्रक्रिया का संक्षिप्त विवरण भी दें।
Question 3. राज्य की मन्त्रिपरिषद् का गठन किस प्रकार होता है ? उसके प्रमुख कार्य क्या हैं ? [2010, 12]
या
राज्य की मन्त्रिपरिषद् पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
या
राज्य मन्त्रिपरिषद् का गठन कैसे होता है ? [2012]
या
राज्य मन्त्रिपरिषद् के प्रमुख कार्यों का उल्लेख कीजिए।
Answer: राज्य की मंत्रिपरिषद् राज्य की असली कार्यपालिका होती है। भारत के संविधान के अनुसार, राज्यपाल को सलाह और मदद देने के लिए एक मंत्रिपरिषद् होती है, जिसका मुखिया मुख्यमंत्री होता है। मंत्रिपरिषद् के गठन से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
मन्त्रिपरिषद् का गठन- विधानसभा के चुनाव के बाद, जिस दल को विधानसभा में बहुमत मिलता है, उस दल के नेता को राज्यपाल मुख्यमंत्री नियुक्त करते हैं। मुख्यमंत्री की सलाह से राज्यपाल अन्य मंत्रियों को नियुक्त करते हैं और उनके विभागों का बंटवारा करते हैं। अगर विधानसभा में किसी भी एक दल को बहुमत नहीं मिलता है, तो राज्यपाल अपने विवेक से ऐसे मुख्यमंत्री को नियुक्त करते हैं जो विधानसभा के आधे से ज़्यादा सदस्यों का विश्वास हासिल कर सके और अपनी बनाई मंत्रिपरिषद् चला सके। राज्य की मंत्रिपरिषद् में तीन स्तर के मंत्री होते हैं: कैबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री और उपमंत्री। संविधान में मंत्रियों की संख्या तय नहीं है, लेकिन मंत्रियों की कुल संख्या (मुख्यमंत्री सहित) विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के 15% से ज़्यादा नहीं हो सकती।
मन्त्रियों की योग्यताएँ- मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों को विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य होना ज़रूरी है। अगर कोई मंत्री किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तो उसे मंत्री बनने के छह महीने के भीतर किसी न किसी सदन का सदस्य बनना होगा, नहीं तो उसे मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ेगा।
मन्त्रिपरिषद् का कार्यकाल-
1. मंत्रिपरिषद् तब तक काम करती है जब तक उसे विधानसभा का विश्वास हासिल रहता है। अगर विधानसभा मंत्रिपरिषद् के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास कर देती है, तो उसे अपने पद से हटना पड़ता है।
2. मुख्यमंत्री या कोई भी मंत्री अपनी इच्छा से इस्तीफा देकर अपने पद से हट सकता है। मुख्यमंत्री के इस्तीफा देने पर पूरी मंत्रिपरिषद् का कार्यकाल खत्म हो जाता है।
3. अगर राज्य का शासन संविधान के हिसाब से नहीं चल रहा हो, तो राज्यपाल अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर सकता है।
मन्त्रिपरिषद् के कार्य
संविधान के तहत राज्यपाल को जो शासन से जुड़ी शक्तियाँ मिली हैं, उनका इस्तेमाल व्यवहार में मंत्रिपरिषद् ही करती है। मंत्रिपरिषद् राज्यपाल के नाम से राज्य का शासन चलाती है। शासन चलाने के लिए उसे ये काम करने होते हैं:
1. राज्यपाल को सलाह तथा सहायता प्रदान करना- संविधान के अनुसार, मंत्रिपरिषद् के गठन का एक मात्र मकसद राज्यपाल के कामों में उसे मदद और सलाह देना है।
2. शासन सम्बन्धी नीति का निर्धारण- मंत्रिपरिषद् का सबसे ज़रूरी काम शासन से जुड़ी नीतियों को तय करना है। इन नीतियों को मंत्रिपरिषद् विधानमंडल से मंजूर करवाती है।
3. प्रशासन सम्बन्धी कार्य- राज्य का पूरा प्रशासन कई विभागों में बंटा होता है और हर विभाग का काम एक मंत्री को सौंपा जाता है। विधानमंडल में पूछे गए सवालों का जवाब आमतौर पर संबंधित विभाग का मंत्री देता है। वैसे, मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से ही विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है।
4. कानूनों का निर्माण – हर मंत्री अपने विभाग से जुड़े विधेयक तैयार करके उसे पास करवाने के लिए विधानमंडल में पेश करता है। विधेयक के पास हो जाने पर वह कानून बन जाता है, जिसे लागू करवाने का काम मंत्रिपरिषद् करती है।
5. वित्त सम्बन्धी कार्य- वित्तीय वर्ष शुरू होने से पहले, पूरे साल के आय-व्यय का बजट तैयार करना और उसे विधानमंडल के सामने पेश करके पास करवाना राज्य के वित्त मंत्री का काम है। राज्य का बजट राज्य की आर्थिक स्थिति का दर्पण होता है।
6. विभागों के कार्यों में समन्वय- अलग-अलग प्रशासनिक विभागों में जब आपसी झगड़े होते हैं, तो मंत्रिपरिषद् उन्हें सुलझाती है।
7. नियुक्तियों सम्बन्धी राज्यपाल का परामर्श- लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य, महाधिवक्ता, विश्वविद्यालयों के कुलपतियों जैसे उच्च पदों पर राज्यपाल को नियुक्ति करने का अधिकार होता है। वह ये नियुक्तियाँ मंत्रिपरिषद् की सलाह से ही करते हैं।
8. सूचना देना- मंत्रिपरिषद् अपनी नीतियों और कामों के बारे में राज्यपाल को समय-समय पर जानकारी देती रहती है। राज्यपाल खुद भी मंत्रिपरिषद् से कोई भी प्रशासनिक जानकारी मांग सकते हैं।
9. जनमत तैयार करना- मंत्रियों का यह भी कर्तव्य है कि वे सरकारी नीतियों के पक्ष में जनता की राय तैयार करें। इसके लिए मंत्री राज्य के दौरे करते हैं और सरकारी नीतियों का प्रचार करते हैं। आखिर में, यह कहा जा सकता है कि मंत्रिपरिषद् ही राज्य की असली कार्यपालिका है। शासन से जुड़े सारे काम इन्हीं मंत्रियों द्वारा किए जाते हैं। इसलिए राज्य की असली शक्ति इन्हीं के हाथ में होती है। केवल विधानसभा ही इस पर अपना नियंत्रण रख सकती है।
In simple words: राज्य की मंत्रिपरिषद् मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में काम करती है और राज्य की असली सरकार होती है। इसका मुख्य काम कानून बनाना, नीतियां तय करना, प्रशासन चलाना, बजट तैयार करना और राज्यपाल को सलाह देना होता है।
🎯 Exam Tip: मंत्रिपरिषद् के गठन में मुख्यमंत्री की नियुक्ति, मंत्रियों का चयन, उनके विभागों का बंटवारा और कार्यकाल को स्पष्ट करें। कार्यों को कानून निर्माण, वित्तीय नियंत्रण और शासन समन्वय जैसी श्रेणियों में बांटकर समझाना प्रभावी रहेगा।
Question 4. राज्यपाल की नियुक्ति किस प्रकार होती है ? उसके प्रमुख कार्यों/अधिकारों (शक्तियों) का वर्णन कीजिए। [2010, 12]
या
राज्यपाल के अधिकारों पर प्रकाश डालिए। दो उदाहरण दीजिए। [2015, 16]
या
राज्यपाल की विधायी शक्तियों का उल्लेख कीजिए। [2010]
या
राज्यपाल के पद के लिए क्या-क्या योग्यताएँ निर्धारित की गई हैं?
या
राज्यपाल को न्यायिक क्षेत्र में क्या अधिकार प्राप्त हैं?
राज्यपाल के तीन अधिकारों के विषय में लिखिए। [2017, 18]
Answer: राज्यपाल की नियुक्ति
राज्यपाल राज्य की कार्यपालिका का मुखिया होता है। राज्य की सभी कार्यकारी शक्तियां राज्यपाल में निहित होती हैं और राज्य का प्रशासन उन्हीं के नाम से चलता है। संविधान के अनुसार, हर राज्य के लिए एक या दो से अधिक राज्यों के लिए एक राज्यपाल होता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 155 के मुताबिक, “राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति अपने अधिकार-पत्र पर अपने हस्ताक्षर और मोहर लगाकर करेंगे।” इस तरह राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, लेकिन व्यवहार में राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर राज्यपाल को नियुक्त करते हैं। राज्यपाल राज्यों में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं।
कार्यकाल- राज्यपाल का कार्यकाल 5 साल का होता है, लेकिन अगर राष्ट्रपति चाहें तो वे इस अवधि से पहले भी राज्यपाल को हटा सकते हैं।
योग्यताएँ- केवल वही व्यक्ति राज्यपाल के पद पर नियुक्त किया जा सकता है, जिसमें ये योग्यताएँ हों:
• वह भारत का नागरिक हो।
• उसकी उम्र 35 साल से कम न हो।
• वह संसद या विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य न हो। यदि ऐसा कोई व्यक्ति राज्यपाल नियुक्त होता है, तो उसे पद संभालने से पहले संबंधित संसद या विधानमंडल की सदस्यता से इस्तीफा देना होगा।
• वह किसी लाभ के पद पर न हो।
• वह उस राज्य का निवासी न हो जिस राज्य में उसे राज्यपाल नियुक्त किया जा रहा है।
• उसे किसी भी अदालत ने अपराधी घोषित न किया हो।
राज्यपाल के अधिकार/कार्य/शक्तियाँ
राज्य के शासन और अच्छी व्यवस्था की पूरी ज़िम्मेदारी राज्यपाल पर होती है। इस ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिए संविधान के तहत उसे ये अधिकार दिए गए हैं:
1. कार्यपालिका सम्बन्धी अधिकार- कार्यपालिका का मुखिया होने के कारण राज्यपाल को कार्यपालिका से जुड़े ये अधिकार मिलते हैं:
• राज्य के शासन से जुड़े सभी काम राज्यपाल के नाम से किए जाते हैं।
• राज्यपाल मुख्यमंत्री को नियुक्त करते हैं और मुख्यमंत्री की सलाह से अन्य मंत्रियों को नियुक्त करते हैं और उनके विभागों का बंटवारा भी करते हैं।
• वह मुख्यमंत्री की सलाह से राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य, महाधिवक्ता, विश्वविद्यालयों के कुलपतियों आदि की नियुक्तियाँ करते हैं।
• वह मुख्यमंत्री से शासन से जुड़ी कोई भी जानकारी मांग सकते हैं।
• यदि राज्य का शासन संविधान के हिसाब से नहीं चल रहा हो, तो राज्यपाल अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश कर सकते हैं।
2. कानून निर्माण (विधायी) सम्बन्धी अधिकार -
• राज्यपाल को विधानमंडल के सत्र बुलाने, स्थगित करने और विधानसभा को समय से पहले भंग करने का अधिकार है।
• राज्यपाल को विधानमंडल के एक या दोनों सदनों को एक साथ संबोधित करने और लिखित संदेश भेजने का अधिकार है।
• विधानमंडल द्वारा पारित कोई भी विधेयक राज्यपाल के हस्ताक्षर के बिना कानून नहीं बन सकता। कुछ विधेयकों को वह राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकते हैं। जब विधानमंडल का सत्र न चल रहा हो, तब राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने का अधिकार है, जो विधानमंडल की बैठक शुरू होने के छह सप्ताह तक ही लागू रह सकता है।
• राज्य विधान-परिषद् के कुल सदस्यों के 1/6 सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार है, जिन्हें साहित्य, कला, विज्ञान, समाज-सेवा, सहकारिता के क्षेत्रों में महारत हासिल हो।
• राज्यपाल को एंग्लो इंडियन समुदाय के एक सदस्य को मनोनीत करने का अधिकार भी है, और अध्यक्ष-उपाध्यक्ष के खाली पदों पर नियुक्ति का अधिकार भी है।
3. वित्तीय अधिकार- राज्यपाल को ये वित्तीय अधिकार प्राप्त हैं:
• विधानमंडल के सामने राज्यपाल के नाम से वित्त मंत्री राज्य का बजट पेश करते हैं।
• राज्यपाल की पहले से मंजूरी के बिना कोई भी वित्त विधेयक सदन में पेश नहीं किया जा सकता।
• वह आकस्मिक निधि में से सरकार को खर्च के लिए पैसा दे सकते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि राज्य के वित्तीय मामले सुचारू रूप से चलें।
4. न्याय सम्बन्धी अधिकार |
• राज्यपाल उच्च न्यायालय की सलाह से अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों और ज़िला न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं।
• उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति उस राज्य के राज्यपाल से भी सलाह लेते हैं।
• राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानूनों को तोड़ने वाले अपराधियों की सजा को (मृत्युदंड के अलावा) माफ कर सकते हैं, कम कर सकते हैं और बदल सकते हैं।
5. अन्य अधिकार
• विधानसभा में किसी भी दल को साफ बहुमत न मिलने पर वह अपने विवेक से मुख्यमंत्री की नियुक्ति करते हैं।
• संकटकाल में वह राज्य के शासन का संचालन अपने विवेक से करते हैं।
In simple words: राज्यपाल को राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह से नियुक्त करते हैं और उनका कार्यकाल 5 साल का होता है। उनके पास राज्य के कार्यकारी, विधायी, वित्तीय और न्यायिक अधिकार होते हैं। राज्यपाल राज्य के मुखिया के रूप में काम करते हैं और संविधान के नियमों का पालन करते हैं।
🎯 Exam Tip: राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया को स्पष्ट करें और उनके कार्यकाल और योग्यताओं को विस्तार से बताएं। अधिकारों को कार्यपालिका, विधायी, वित्तीय और न्यायिक श्रेणियों में बांटकर उदाहरणों के साथ समझाएं।
Question 5. राज्य शासन में राज्यपाल का क्या महत्त्व है? राज्यपाल तथा मुख्यमन्त्री के सम्बन्धों का वर्णन कीजिए । [2011]
या
राज्य शासन में राज्यपाल का क्या महत्त्व है ? [2013]
Answer: राज्यपाल की स्थिति और महत्व: राज्यपाल को अपने राज्य के शासन-तंत्र को ठीक से चलाने के लिए बहुत सारे अधिकार दिए गए हैं। राज्यपाल को अपनी मर्जी से इस्तेमाल की जाने वाली शक्तियां भी मिली हैं। अगर विधानसभा में किसी दल को साफ बहुमत नहीं मिलता या संविधान के काम में कोई रुकावट आती है, तो भी उन्हें अपनी मर्जी से फैसले लेने का अधिकार होता है। ऐसी स्थिति में वह अपनी असली शक्ति का इस्तेमाल करते हैं। संकटकाल में वह केंद्र सरकार के एजेंट के रूप में काम करते हैं और अपनी असली स्थिति का इस्तेमाल कर सकते हैं।
फिर भी, वह केवल कानूनी मुखिया ही होता है। असली कार्यपालिका शक्तियां तो राज्य की मंत्रिपरिषद् में निहित होती हैं। राज्यपाल को मंत्रिपरिषद् की सलाह से ही काम करना पड़ता है। जब तक राज्यपाल मंत्रिपरिषद् की सलाह पर काम करता है और विधानमंडल के प्रति जवाबदेह मंत्रिमंडल को उसके शासन-कार्य में मदद और सलाह देता है, तब तक उनके लिए राज्यपाल की सलाह को नज़रअंदाज़ करने की बहुत कम संभावना होती है। महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल (स्वर्गीय) श्रीप्रकाश ने कहा था कि "मुझे पूरा विश्वास है कि संवैधानिक राज्यपाल के अलावा मुझे कुछ नहीं करना होगा।" इस तरह राज्यपाल का पद शक्ति और अधिकार का नहीं, बल्कि सम्मान और प्रतिष्ठा का है।
राज्य प्रशासन में राज्यपाल की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण है। वह राज्य के अलग-अलग हितों और दलों के विवादों को सुलझाने में मध्यस्थ का काम करते हैं। अगर राज्य का शासन संविधान का उल्लंघन करे, तो राज्यपाल तुरंत राष्ट्रपति को इसकी जानकारी दे सकते हैं। राज्यपाल का पद संवैधानिक और पारंपरिक दोनों तरह से महत्वपूर्ण है। इस पद का महत्व राज्यपाल के व्यक्तित्व पर भी निर्भर करता है।
राज्यपाल और मुख्यमंत्री (मन्त्रिपरिषद्) का सम्बन्ध
संविधान के अनुच्छेद 164 में कहा गया है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेंगे और मंत्रीगण राज्यपाल के इच्छानुसार अपना पद संभालेंगे। लेकिन असलियत यह है कि राज्यपाल विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही मुख्यमंत्री बनने और सरकार बनाने के लिए बुलाते हैं। राज्य की कार्यपालिका में राज्यपाल और मंत्रिपरिषद् दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, इसलिए दोनों में गहरा संबंध होता है। राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच समन्वय राज्य के सुचारु कामकाज के लिए महत्वपूर्ण है।
• मुख्यमंत्री की सलाह पर ही राज्यपाल अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं।
• राज्यपाल राज्य में केवल नाममात्र का शासक होता है और मंत्रिपरिषद् असली शासक होती है।
• राज्यपाल हर हाल में मंत्रिपरिषद् की सलाह को मानने के लिए बाध्य होता है।
• राष्ट्रपति शासन के समय राज्यपाल राज्य में असली शासक हो जाता है।
अनुच्छेद 167 के अनुसार राज्य के मुख्यमंत्री का यह कर्तव्य है कि वह राज्य प्रशासन से संबंधित मंत्रिपरिषद् के सभी फैसलों और विचाराधीन विधेयकों की जानकारी राज्यपाल को दें। राज्यपाल इस संबंध में अन्य ज़रूरी जानकारी भी मांग सकते हैं। इस तरह राज्य प्रशासन की असली शक्ति राज्यपाल के हाथ में न होकर मंत्रिपरिषद्, यानी मुख्यमंत्री के हाथ में होती है।
In simple words: राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद् ही असली शक्ति का इस्तेमाल करती है। राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह मानते हैं, लेकिन संकटकाल में अपनी शक्तियों का उपयोग कर सकते हैं।
🎯 Exam Tip: राज्यपाल के महत्व को बताते हुए, उनकी संवैधानिक स्थिति और वास्तविक भूमिका को स्पष्ट करें। मुख्यमंत्री के साथ उनके संबंधों में सलाह और शक्तियों के बंटवारे पर ज़ोर दें।
Question 6. मुख्यमन्त्री का चयन कैसे होता है ? मुख्यमन्त्री के प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए। [2011]
या
राज्य के मुख्यमन्त्री की नियुक्ति किस प्रकार की जाती है? सम्पूर्ण प्रक्रिया समझाइट । [2013, 14]
या
मुख्यमन्त्री के अधिकार और कार्यों का वर्णन कीजिए। राज्य के शासन में उसका क्या महत्त्व है ?
या
किसी राज्य के मुख्यमन्त्री की नियुक्ति किस प्रकार की जाती है ? राज्य के प्रशासन में उसकी भूमिका की व्याख्या कीजिए। [2013, 16]
या
मुख्यमंत्री के कार्यों को लिखिए। [2011]
Answer: मुख्यमन्त्री का चयन
राज्य की विधानसभा के चुनाव के बाद, जिस दल को विधानसभा में बहुमत मिलता है, उस दल के नेता को राज्यपाल मुख्यमंत्री नियुक्त करते हैं। अगर किसी भी एक दल को बहुमत नहीं मिलता, तो राज्यपाल अपने विवेक का इस्तेमाल करके ऐसे दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकते हैं, जो विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर सके। राज्यपाल मुख्यमंत्री को पद की गोपनीयता और विश्वसनीयता की शपथ दिलाते हैं। फिर मुख्यमंत्री की सलाह से अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं। मुख्यमंत्री का चयन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
योग्यता- मुख्यमंत्री बनने के लिए विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य होना ज़रूरी है। अगर वह पद पर नियुक्त होते समय किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के अंदर किसी भी सदन का सदस्य बनना होगा, नहीं तो उसे अपने पद से इस्तीफा देना पड़ेगा।
कार्यकाल - मुख्यमंत्री उसी समय तक अपने पद पर रह सकता है, जब तक उसे विधानसभा का विश्वास हासिल रहता है। इसके अलावा, वह अपनी इच्छा से कभी भी इस्तीफा देकर अपने पद से अलग हो सकता है।
मुख्यमन्त्री के कार्य तथा अधिकार
मुख्यमंत्री के मुख्य कार्य और अधिकार इस प्रकार हैं –
1. मन्त्रिपरिषद् का गठन- मुख्यमंत्री का पहला और सबसे ज़रूरी काम अपनी मंत्रिपरिषद् का गठन करना होता है। मुख्यमंत्री मंत्रियों की सूची राज्यपाल के सामने रखते हैं और राज्यपाल मंत्रियों को शपथ दिलाते हैं। मंत्रियों की संख्या भी मुख्यमंत्री ही तय करते हैं।
2. विभागों का वितरण- मुख्यमंत्री की सलाह से राज्यपाल मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा और राज्य के अन्य कार्यों का वितरण करते हैं।
3. नियुक्ति सम्बन्धी अधिकार- राज्यपाल को कई उच्च अधिकारियों की नियुक्ति करने का अधिकार होता है, जैसे- कुलपति, महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य आदि। असल में, इन अधिकारों का इस्तेमाल मुख्यमंत्री ही करते हैं, क्योंकि राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह से ही इन पदाधिकारियों को नियुक्त करते हैं।
4. नीति-निर्धारण का अधिकार- राज्य की शासन-नीति और अन्य महत्वपूर्ण विषयों से जुड़ी नीतियों को तय करने का अधिकार मुख्यमंत्री को ही होता है।
5. शासन-व्यवस्था का स्वामी- संवैधानिक रूप से राज्य की शासन-व्यवस्था का मालिक राज्यपाल होता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से राज्य के पूरे शासन-तंत्र का मालिक मुख्यमंत्री होता है। वह विभिन्न मंत्रालयों पर नियंत्रण रखते हैं और विभागों के बीच मतभेद होने पर समझौता कराते हैं। अन्य मंत्रियों के लिए सभी महत्वपूर्ण विषयों पर मुख्यमंत्री से सलाह लेना ज़रूरी होता है। इस तरह राज्य की कार्यपालिका का असली मुखिया मुख्यमंत्री ही होता है।
6. विभागों में समन्वय - मुख्यमंत्री का एक मुख्य काम शासन के सभी विभागों में तालमेल बिठाना है, ताकि सभी विभाग एक इकाई के रूप में काम कर सकें।
7. मन्त्रिमण्डल का सभापति - मुख्यमंत्री राज्य के मंत्रिमंडल (Cabinet) का अध्यक्ष होता है। वह मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं। अगर कोई मंत्री मुख्यमंत्री से सहमत नहीं होता, तो उसे इस्तीफा देना पड़ता है।
8. विधानसभा का नेता- मुख्यमंत्री राज्य की शासन-व्यवस्था का प्रमुख होने के साथ-साथ विधानसभा का नेता भी होता है। उनकी सलाह से ही राज्यपाल द्वारा विधानसभा के सत्र बुलाए जाते हैं। वह दोनों सदनों में सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता होते हैं।
9. राज्यपाल का सलाहकार – राज्यपाल का मुख्य सलाहकार मुख्यमंत्री ही होता है। वही मंत्रिपरिषद् के फैसलों से राज्यपाल को अवगत कराते हैं और राज्यपाल के संदेशों को मंत्रियों तक पहुंचाते हैं। इस तरह वह राज्यपाल और मंत्रिपरिषद् के बीच एक पुल का काम करते हैं। मुख्यमंत्री राज्यपाल को विधानसभा भंग करने की सलाह भी दे सकते हैं।
राज्य के शासन में महत्त्व
केंद्र में जो स्थिति प्रधानमंत्री की होती है, राज्य में वही स्थिति मुख्यमंत्री की होती है। प्रधानमंत्री का कार्यक्षेत्र पूरा देश होता है, लेकिन मुख्यमंत्री केवल अपने राज्य की सीमा के अंदर ही काम करते हैं। राज्य के शासन में मुख्यमंत्री के महत्व को इन बातों से आसानी से समझा जा सकता है:
राज्य की शासन-व्यवस्था में असली कार्यपालिका मंत्रिपरिषद् होती है और मुख्यमंत्री राज्य की मंत्रिपरिषद् का अध्यक्ष और नेता होता है। अगर मंत्रिपरिषद् राज्य के शासन की नाव है, तो मुख्यमंत्री उसका नाविक है। वह मंत्रिपरिषद् की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं और उसकी कार्यवाही का संचालन करते हैं। मंत्रिपरिषद् के फैसले उनकी इच्छा से प्रभावित होते हैं।
2. राज्यपाल द्वारा मंत्रियों की नियुक्ति और उनमें विभागों का बंटवारा मुख्यमंत्री की इच्छा के अनुसार ही किया जाता है। वह जब चाहें किसी भी मंत्री से इस्तीफा मांग सकते हैं। अगर मंत्री इस्तीफा नहीं देते हैं, तो मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल उस मंत्री को उसके पद से हटा देते हैं।
मुख्यमंत्री ही मंत्रिपरिषद् के फैसलों और प्रशासनिक कार्यों की जानकारी समय-समय पर राज्यपाल को देते रहते हैं।
राज्य विधानमंडल में भी मुख्यमंत्री को खास जगह मिलती है। वह विधानसभा का नेता होता है और सरकार की नीतियों को स्पष्ट करते हैं।
मुख्यमंत्री, राज्यपाल और मंत्रिपरिषद् तथा विधानमंडल और मंत्रिपरिषद् के बीच संपर्क बनाने वाला एक कड़ी का काम करते हैं।
संक्षेप में, राज्य के शासन में मुख्यमंत्री की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण और निर्णायक होती है। राज्य प्रशासन में सबसे ऊपर होने के बावजूद मुख्यमंत्री तानाशाह नहीं बन सकते, क्योंकि उनकी शक्तियों पर कई प्रतिबंध होते हैं, जैसे- संवैधानिक नियम, केंद्र सरकार का नियंत्रण, राज्यपाल का प्रतिबंध, विरोधी दलों का प्रतिबंध और जनता की राय का डर।
In simple words: मुख्यमंत्री को राज्यपाल विधानसभा में बहुमत दल के नेता के रूप में नियुक्त करते हैं। मुख्यमंत्री सरकार का मुखिया होता है और मंत्रिपरिषद् का गठन, विभागों का बंटवारा, नीतियां बनाना और राज्यपाल को सलाह देना जैसे कई महत्वपूर्ण काम करता है।
🎯 Exam Tip: मुख्यमंत्री के चयन की प्रक्रिया में राज्यपाल की भूमिका, बहुमत दल के नेता का चुनाव और शपथग्रहण को समझाएं। उनके प्रमुख कार्यों और अधिकारों को स्पष्ट रूप से बिंदुवार लिखें, और राज्य प्रशासन में उनकी अहमियत पर भी प्रकाश डालें।
लघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. विधानसभा तथा विधान-परिषद् की निर्वाचन पद्धति में क्या अन्तर है?
Answer: विधानसभा के सदस्यों को जनता सीधे वयस्क मताधिकार के आधार पर गुप्त मतदान से चुनती है। विधान परिषद् के सदस्यों को जनता सीधे नहीं चुनती, बल्कि उनके सदस्यों का 1/3 हिस्सा राज्य के स्थानीय निकायों (जैसे नगर महापालिकाओं) द्वारा, 1/3 हिस्सा राज्य की विधानसभा के सदस्यों द्वारा, 1/12 हिस्सा राज्य के स्नातकों द्वारा और 1/12 हिस्सा राज्य के शिक्षकों द्वारा चुना जाता है। बचे हुए 1/6 सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत करते हैं। ये ऐसे व्यक्ति होते हैं जिन्हें साहित्य, कला, विज्ञान और समाजसेवा के क्षेत्रों में खास ज्ञान होता है। यह चुनाव प्रणाली दोनों सदनों को अलग-अलग प्रतिनिधित्व देती है।
In simple words: विधानसभा के सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं, जबकि विधान परिषद् के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय निकायों, विधायकों, स्नातकों और शिक्षकों द्वारा चुने जाते हैं, और कुछ को राज्यपाल मनोनीत करते हैं।
🎯 Exam Tip: विधानसभा और विधान परिषद् की निर्वाचन पद्धतियों का अंतर स्पष्ट करने के लिए दोनों के चुनाव के तरीके और भाग लेने वाले मतदाताओं का विवरण दें।
Question 2. विधान-परिषद् की उपयोगिता का वर्णन कीजिए।
Answer: विधान-परिषद्, विधानसभा की तुलना में एक कमज़ोर सदन है। कानून बनाने के क्षेत्र में, साधारण विधेयक राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन में पेश किए जा सकते हैं और उन्हें दोनों सदनों द्वारा मंजूर किया जाना चाहिए। अगर कोई साधारण विधेयक विधानसभा से पास होने के बाद विधान-परिषद् द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है या परिषद् विधेयक में ऐसे बदलाव करती है जो विधानसभा को मंज़ूर नहीं होते, या परिषद् के सामने विधेयक रखे जाने की तारीख से तीन महीने तक विधेयक पास नहीं करती, तो विधानसभा उस विधेयक को बदलावों के साथ या बिना बदलाव के फिर से विधानमंडल द्वारा पास करके विधान परिषद् को भेजती है। इस बार, अगर विधान-परिषद् विधेयक को स्वीकार करती है या नहीं करती, या ऐसे बदलाव पेश करती है जो विधानसभा को मंज़ूर नहीं होते, तो भी यह विधेयक एक महीने बाद विधान-परिषद् द्वारा स्वीकृत मान लिया जाता है। इस तरह, विधान परिषद एक महत्वपूर्ण विचार-विमर्श मंच के रूप में कार्य करती है, लेकिन कानून बनाने में इसकी शक्ति सीमित है।
विधान परिषद् सवालों, प्रस्तावों और वाद-विवाद के आधार पर मंत्रिपरिषद् के खिलाफ जनमत तैयार करके उसे नियंत्रित कर सकती है, लेकिन उसे मंत्रिपरिषद् को हटाने का अधिकार नहीं है, क्योंकि कार्यपालिका केवल विधानसभा के प्रति ही जवाबदेह होती है।
In simple words: विधान-परिषद् कानून बनाने में देर लगा सकती है और सरकार पर कुछ नियंत्रण रख सकती है, लेकिन यह विधानसभा जितनी शक्तिशाली नहीं है और मंत्रियों को हटा नहीं सकती।
🎯 Exam Tip: विधान-परिषद् की उपयोगिता को बताते हुए उसकी कमजोरियों और उसकी कानून निर्माण, सरकार पर नियंत्रण संबंधी शक्तियों की सीमाएं स्पष्ट करें।
Question 3. विधानसभा तथा विधान-परिषद् के सम्बन्धों की विवेचना कीजिए । [2006]
Answer: भारत में अभी सिर्फ छह राज्यों में विधानमंडल में दो सदन हैं, बाकी राज्यों में एक ही सदन है। दो सदनों वाले विधानमंडल में निचले सदन को विधानसभा और ऊपरी सदन को विधान परिषद् कहते हैं। विधानसभा, विधान परिषद् से ज़्यादा शक्तिशाली और अधिकारसम्पन्न होती है। यह इन बिंदुओं के आधार पर साफ होता है-
1. वित्तीय क्षेत्र में – वित्तीय विधेयक केवल विधानसभा में ही पेश किए जा सकते हैं, विधानपरिषद् में नहीं। हालांकि, विधान परिषद् की राय जानने के लिए ये विधेयक उसके पास ज़रूर भेजे जाते हैं, लेकिन विधानसभा परिषद् द्वारा दी गई राय मानने के लिए बाध्य नहीं है। चौदह दिन के अंदर विधान-परिषद् को अपनी राय भेजनी होती है। अगर इस अवधि में वह अपनी राय नहीं भेजती है, तो भी विधेयक उसके द्वारा स्वीकृत मान लिया जाता है। इस प्रकार, वित्तीय क्षेत्र में विधानसभा ज़्यादा शक्तिशाली है और विधान-परिषद् विधेयक को सिर्फ 14 दिन के लिए रोक सकती है। यह दिखाता है कि वित्तीय मामलों में अंतिम निर्णय विधानसभा का होता है।
2. विधायिनी क्षेत्र में- साधारण विधेयक राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन में पेश किए जा सकते हैं, लेकिन ये विधेयक दोनों सदनों द्वारा स्वीकृत होने चाहिए। जब कोई साधारण विधेयक विधानसभा द्वारा स्वीकृत हो जाता है, तो उसे विधान परिषद् की मंजूरी लेने के लिए विधान परिषद् के पास भेजा जाता है। यदि विधान परिषद् द्वारा विधेयक रखे जाने की तारीख से तीन महीने तक उसे पास न किया जाए, तो विधानसभा इसे फिर से पास करके विधान परिषद् में भेजती है। इस बार भी यदि विधान परिषद् इसे अस्वीकार करती है या उसे संशोधित करती है या एक महीने तक उस पर कोई फैसला नहीं लेती है, तो ऐसी स्थिति में साधारण विधेयक स्वीकृत मान लिया जाता है और उसे राज्यपाल के हस्ताक्षर के लिए भेज दिया जाता है। इस प्रकार, विधान-परिषद् साधारण विधेयक को चार महीने तक ज़रूर रोक सकती है, लेकिन उसे पास होने से नहीं रोक सकती।
3. कार्यपालिका के क्षेत्र में – पूरी मंत्रिपरिषद् विधानसभा के प्रति ही सामूहिक रूप से जवाबदेह होती है। विधान परिषद् मंत्रिपरिषद् के सदस्यों से सवाल और पूरक सवाल पूछ सकती है, उनकी आलोचना कर सकती है, लेकिन उसे मंत्रिपरिषद् के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखने का अधिकार नहीं है। असल में, विधानसभा को ही मंत्रिपरिषद् पर नियंत्रण रखने का अधिकार मिलता है और वही उसके खिलाफ अविश्वास का प्रस्ताव पास कर सकती है।
In simple words: विधानसभा विधान परिषद् से ज़्यादा ताकतवर होती है, खासकर वित्तीय और कार्यपालिका के मामलों में। विधान परिषद् कानून को सिर्फ रोक सकती है, जबकि विधानसभा अंतिम फैसला लेती है।
🎯 Exam Tip: विधानसभा और विधान परिषद् के संबंधों को समझाते हुए वित्तीय, विधायी और कार्यपालिका संबंधी शक्तियों की तुलना करें। विशेष रूप से यह बताएं कि विधानसभा किस प्रकार अधिक शक्तिशाली है।
Question 4. राज्य विधानमण्डल के किन्हीं दो अधिकारों का वर्णन कीजिए ।
Answer: राज्य विधानमंडल के दो अधिकार इस प्रकार हैं:
वित्तीय अधिकार- विधानमंडल को राज्य के वित्त पर पूरा नियंत्रण प्राप्त होता है। विधानसभा द्वारा आय-व्यय के वार्षिक बजट को मंजूरी मिलने के बाद ही सरकार आय-व्यय से संबंधित कोई भी काम कर सकती है। विनियोग विधेयक पास होने के बाद ही सरकार संचित निधि से ज़रूरी खर्चों के लिए धन निकाल सकती है। यह सुनिश्चित करता है कि जनता के पैसे का सही इस्तेमाल हो।
प्रशासनिक अधिकार – भारतीय संविधान द्वारा राज्यों में भी संसदीय व्यवस्था स्थापित की गई है। इस वजह से राज्य की मंत्रिपरिषद् को अपनी नीतियों और कामों के लिए विधानमंडल के प्रति जवाबदेह रहना होता है। विधानमंडल द्वारा विभिन्न विभागों के मंत्रियों से उनके विभागों के बारे में सवाल पूछे जा सकते हैं और मंत्रिपरिषद् के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास किया जा सकता है। इतना ही नहीं, विधानमंडल द्वारा मंत्रिपरिषद् के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी पास किया जा सकता है, जिसके कारण मंत्रिपरिषद् के मंत्रियों को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ जाता है।
In simple words: राज्य विधानमंडल के पास वित्तीय मामलों पर नियंत्रण और प्रशासनिक कार्यों पर सरकार की जवाबदेही तय करने का अधिकार होता है।
🎯 Exam Tip: विधानमंडल के अधिकारों को वित्तीय और प्रशासनिक श्रेणियों में बांटकर समझाएं। हर अधिकार का एक-एक स्पष्ट उदाहरण भी दें, जैसे बजट को मंजूरी देना या अविश्वास प्रस्ताव पारित करना।
Question 5. राज्यपाल और राष्ट्रपति की कार्यपालिका सम्बन्धी शक्तियों की तुलना कीजिए ।
Answer: राज्यपाल और राष्ट्रपति की कार्यपालिका संबंधी शक्तियों की तुलना इस प्रकार है:
• राज्यपाल राज्य के शासन का मुखिया होता है, जबकि राष्ट्रपति देश के शासन का मुखिया होता है। दोनों क्रमशः विधानमंडल और संसद में कार्यपालिका के प्रमुख होते हैं।
• राज्य और देश में शासन के सभी काम क्रमशः राज्यपाल और राष्ट्रपति के नाम से किए जाते हैं।
• राज्यपाल राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति करते हैं और राष्ट्रपति देश के प्रधानमंत्री की। राज्यपाल और राष्ट्रपति अन्य मंत्रियों की नियुक्ति और उनके विभागों (मंत्रालय) का बंटवारा क्रमशः मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की सलाह से करते हैं।
• राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह से राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों और राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति करते हैं। राष्ट्रपति संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, सदस्यों, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों और राज्यपालों की नियुक्ति करते हैं।
• राज्यपाल राज्य के मुख्यमंत्री से और राष्ट्रपति देश के प्रधानमंत्री से शासन संबंधी किसी भी सूचना की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि दोनों स्तरों पर पारदर्शिता बनी रहे।
In simple words: राज्यपाल राज्य का और राष्ट्रपति देश का कार्यकारी प्रमुख होता है। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री की सलाह से अधिकारियों की नियुक्ति करते हैं और शासन से जुड़ी जानकारी लेते हैं।
🎯 Exam Tip: राज्यपाल और राष्ट्रपति की कार्यपालिका संबंधी शक्तियों की तुलना करते समय, दोनों के नियुक्ति अधिकार, विभागों के बंटवारे में भूमिका और सूचना प्राप्त करने के अधिकारों को स्पष्ट करें।
Question 6. राज्यपाल के विवेकाधिकार पर एक टिप्पणी लिखिए। [2011]
या
यदि राज्य विधानसभा में किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत न मिले तो राज्यपाल किसे मुख्यमन्त्री नियुक्त करेगा ? [2013]
या
राज्यों में राज्यपालों के विवेकाधीन अधिकारों की विवेचना कीजिए। [2015]
Answer: केंद्र में राष्ट्रपति के समान ही राज्य में राज्यपाल की स्थिति संवैधानिक मुखिया की होती है। वह राज्य के मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद् की सलाह पर ही काम करते हैं, लेकिन कुछ ऐसी परिस्थितियाँ होती हैं, जहाँ राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर काम न करके अपनी मर्जी से निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होते हैं। ऐसी स्थितियों को राज्यपाल के विवेकाधिकार कहते हैं। जब राज्यपाल अपनी मर्जी से काम करते हैं, उस समय वह मंत्रियों की सलाह को भी नज़रअंदाज़ कर सकते हैं। उदाहरण के लिए- असम के राज्यपाल को आदिवासी और सीमावर्ती क्षेत्रों का शासन चलाने में अपनी मर्जी से काम करने का अधिकार है। इसके अलावा, जब विधानसभा में किसी दल को साफ बहुमत नहीं मिलता, तो राज्यपाल को मुख्यमंत्री की नियुक्ति में अपनी मर्जी से फैसला लेने का अधिकार मिल जाता है। तीसरे, राज्य में संवैधानिक संकट की रिपोर्ट राष्ट्रपति के सामने पेश करने में भी वह अपनी मर्जी से काम करते हैं। राज्यपाल को विधानसभा को भंग करने में भी कुछ हद तक अपनी मर्जी से फैसला लेने का अधिकार होता है। ये अधिकार राज्यपाल को मुश्किल परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।
In simple words: राज्यपाल के विवेकाधिकार का मतलब है कि कुछ खास हालात में वे मुख्यमंत्री की सलाह के बिना अपनी मर्जी से फैसले ले सकते हैं, जैसे बहुमत न होने पर मुख्यमंत्री चुनना या संवैधानिक संकट की रिपोर्ट देना।
🎯 Exam Tip: विवेकाधिकार का अर्थ स्पष्ट करें और उन विशिष्ट परिस्थितियों के उदाहरण दें जहाँ राज्यपाल अपनी मर्जी से काम करते हैं, जैसे बहुमत न होने पर मुख्यमंत्री की नियुक्ति या संवैधानिक संकट की रिपोर्ट।
लघु उत्तरीय प्रश्न
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Question 1. उत्तर प्रदेश के विधानमण्डल के अंग लिखिए।
Answer: उत्तर प्रदेश के विधानमण्डल के तीन मुख्य अंग हैं:
- राज्यपाल
- विधानसभा
- विधान-परिषद्
In simple words: उत्तर प्रदेश विधानमण्डल में राज्यपाल, विधानसभा और विधान-परिषद् शामिल हैं।
🎯 Exam Tip: राज्यों के विधानमण्डल में आमतौर पर एक या दो सदन होते हैं, साथ ही राज्यपाल भी उसका अभिन्न अंग होता है।
Question 2. राज्य विधानमण्डल के दोनों सदनों के नाम लिखिए। [2010]
Answer: राज्य विधानमण्डल के दो सदन निम्नलिखित हैं:
- विधानसभा (निम्न सदन)
- विधान-परिषद् (उच्च सदन)
In simple words: राज्य विधानमण्डल के दो सदन हैं: विधानसभा और विधान-परिषद्।
🎯 Exam Tip: याद रखें कि विधानसभा निम्न सदन और विधान-परिषद् उच्च सदन कहलाती है।
Question 3. विधानसभा का कार्यकाल कितना होता है ?
Answer: विधानसभा का कार्यकाल आमतौर पर पांच वर्ष का होता है। हालांकि, राज्यपाल इस अवधि से पहले भी विधानसभा को भंग कर सकते हैं, खासकर यदि सरकार बहुमत खो दे।
In simple words: विधानसभा का कार्यकाल पांच साल का होता है।
🎯 Exam Tip: आपातकाल में संसद विधानसभा का कार्यकाल एक बार में एक साल के लिए बढ़ा सकती है।
Question 4. उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्यों की संख्या कितनी है ?
Answer: उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कुल 403 सदस्य होते हैं। इसमें 403 निर्वाचित सदस्य और 1 राज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्य शामिल थे, जिससे कुल संख्या 404 हो जाती थी, लेकिन अब आंग्ल-भारतीय सदस्य का मनोनयन समाप्त कर दिया गया है।
In simple words: उत्तर प्रदेश विधानसभा में 403 सदस्य हैं।
🎯 Exam Tip: विधानसभा सदस्यों की संख्या राज्य की जनसंख्या के आधार पर तय होती है, और यह अधिकतम 500 और न्यूनतम 60 हो सकती है।
Question 5. विधानसभा के एक ऐसे अधिकार का उल्लेख कीजिए जो कि विधान-परिषद् को प्राप्त नहीं है।
Answer: राज्य की मन्त्रिपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित करने का अधिकार केवल विधानसभा को प्राप्त है, विधान-परिषद् को यह अधिकार नहीं मिलता है। यह विधानसभा को मन्त्रिपरिषद् पर सीधा नियंत्रण रखने की शक्ति देता है।
In simple words: केवल विधानसभा ही सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कर सकती है, विधान-परिषद् नहीं।
🎯 Exam Tip: अविश्वास प्रस्ताव एक महत्वपूर्ण संसदीय उपकरण है जो सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
Question 6. विधानसभा, विधानपरिषद से अधिक शक्तिशाली है। क्यों ?
Answer: विधानसभा विधान-परिषद् से अधिक शक्तिशाली है क्योंकि इसे वित्त विधेयक प्रस्तुत करने, कार्यपालिका पर नियंत्रण रखने और राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेने का अधिकार है। यह लोगों द्वारा सीधे चुने गए प्रतिनिधियों का सदन है, जिससे इसे अधिक लोकतांत्रिक शक्ति मिलती है।
In simple words: विधानसभा वित्त पर नियंत्रण रखती है, सरकार को जवाबदेह बनाती है और राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा लेती है, इसलिए यह विधान-परिषद् से ज्यादा ताकतवर है।
🎯 Exam Tip: सीधे जनता द्वारा चुने जाने के कारण विधानसभा को विधान-परिषद् से अधिक महत्त्व प्राप्त होता है।
Question 7. विधान-परिषद् के सदस्यों के लिए न्यूनतम आयु कितनी होनी चाहिए ?
Answer: विधान-परिषद् की सदस्यता के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए। यह सुनिश्चित करता है कि सदस्य अनुभवी हों।
In simple words: विधान-परिषद् का सदस्य बनने के लिए कम से कम 30 साल की उम्र होनी चाहिए।
🎯 Exam Tip: आयु सीमा विभिन्न सदनों के लिए अलग-अलग होती है, जैसे विधानसभा के लिए 25 वर्ष।
Question 8. विधान-परिषद् के सदस्यों का कार्यकाल कितना होता है ?
Answer: विधान परिषद् के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। यह एक स्थायी सदन है और इसके सदस्य हर दो साल में एक तिहाई संख्या में सेवानिवृत्त होते हैं।
In simple words: विधान-परिषद् के सदस्यों का कार्यकाल 6 साल का होता है।
🎯 Exam Tip: विधान-परिषद् कभी पूरी तरह से भंग नहीं होती क्योंकि इसके सदस्य क्रमिक रूप से सेवानिवृत्त होते रहते हैं।
Question 9. उन राज्यों के नाम लिखिए, जहाँ विधान-परिषद् का अस्तित्व है।
Answer: निम्नलिखित राज्यों में विधान-परिषद् का अस्तित्व है:
- उत्तर प्रदेश
- बिहार
- महाराष्ट्र
- कर्नाटक
- आंध्र प्रदेश
- तेलंगाना
In simple words: भारत में कुछ राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार में विधान-परिषद् है।
🎯 Exam Tip: विधान-परिषद् वाले राज्यों को 'द्विसदनीय विधानमण्डल' वाले राज्य कहा जाता है।
Question 10. उत्तर प्रदेश विधान-परिषद् में कितने सदस्य हैं ?
Answer: उत्तर प्रदेश विधान-परिषद् में 100 सदस्य हैं। यह संख्या अन्य राज्यों की विधान-परिषदों की तुलना में काफी बड़ी है।
In simple words: उत्तर प्रदेश विधान-परिषद् में 100 सदस्य हैं।
🎯 Exam Tip: विधान-परिषद् के सदस्यों की संख्या राज्य की विधानसभा के सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती।
Question 11. विधानपरिषद् में राज्यपाल कितने सदस्यों को मनोनीत करता है ?
Answer: राज्यपाल को विधान-परिषद् की कुल सदस्य-संख्या के 1/6 सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार है। इन सदस्यों को कला, साहित्य, विज्ञान, सहकारिता और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या अनुभव के आधार पर चुना जाता है।
In simple words: राज्यपाल विधान-परिषद् के कुल सदस्यों के 1/6 हिस्से को मनोनीत करता है।
🎯 Exam Tip: मनोनीत सदस्यों का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को विधानमण्डल में शामिल करना है।
Question 12. विधेयक कितने प्रकार के होते हैं ?
Answer: विधेयक मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:
- साधारण विधेयक
- वित्त (धन) विधेयक
In simple words: विधेयक दो तरह के होते हैं: साधारण विधेयक और वित्त विधेयक।
🎯 Exam Tip: वित्त विधेयक राज्य के राजस्व और खर्च से संबंधित होते हैं और इनकी प्रक्रिया साधारण विधेयकों से भिन्न होती है।
Question 13. धन-विधेयक विधानमण्डल के किस सदन में प्रस्तुत किये जाते हैं ?
Answer: धन-विधेयक विधानमण्डल के निचले सदन, यानी विधानसभा में प्रस्तुत किए जाते हैं। विधान-परिषद् को इन्हें रोकने या संशोधित करने का सीमित अधिकार होता है।
In simple words: धन-विधेयक सिर्फ विधानसभा में ही पेश किए जाते हैं।
🎯 Exam Tip: धन-विधेयकों के मामले में विधानसभा को विधान-परिषद् से अधिक शक्ति प्राप्त होती है।
Question 14. वित्त-विधेयक को विधान-परिषद् अधिक-से-अधिक कितने दिन रोक सकती है ?
Answer: वित्त विधेयक को विधान-परिषद् अधिक-से-अधिक 14 दिनों तक रोक सकती है। इस अवधि के बाद, विधेयक को विधान-परिषद् द्वारा पारित मान लिया जाता है, भले ही उसने कोई कार्रवाई न की हो।
In simple words: विधान-परिषद् वित्त विधेयक को ज्यादा से ज्यादा 14 दिन तक रोक सकती है।
🎯 Exam Tip: यह समय सीमा सुनिश्चित करती है कि वित्तीय मामलों में विधान-परिषद् देरी न कर सके और विधानसभा की सर्वोच्चता बनी रहे।
Question 15. राज्यपाल-पद पर नियुक्ति हेतु अपेक्षित कोई दो अर्हताएँ लिखिए ।
Answer: राज्यपाल-पद पर नियुक्ति हेतु दो आवश्यक योग्यताएँ निम्नलिखित हैं:
- वह भारत का नागरिक हो।
- उसकी आयु 35 वर्ष से कम न हो।
In simple words: राज्यपाल बनने के लिए व्यक्ति को भारत का नागरिक होना चाहिए और उसकी उम्र कम से कम 35 साल होनी चाहिए।
🎯 Exam Tip: ये योग्यताएँ राष्ट्रपति के लिए निर्धारित योग्यताओं के समान हैं, जो उच्च संवैधानिक पदों के लिए अनुभव और नागरिकता सुनिश्चित करती हैं।
Question 16. किन्हीं चार राज्यों के नाम लिखिए, जहाँ विधानसभा तथा विधान-परिषद् दोनों सदन हैं। [2012, 15, 18]
Answer: निम्नलिखित चार राज्यों में विधानसभा और विधान-परिषद् दोनों सदन मौजूद हैं:
- उत्तर प्रदेश
- महाराष्ट्र
- बिहार
- कर्नाटक
In simple words: उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक जैसे राज्यों में विधानसभा और विधान-परिषद् दोनों हैं।
🎯 Exam Tip: केवल कुछ ही भारतीय राज्यों में द्विसदनीय विधानमण्डल है, अधिकांश में केवल विधानसभा ही है।
Question 17. राज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है? उसके कार्यकाल की अवधि क्या है ? [2008]
Answer: राज्यपाल की नियुक्ति भारत का राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री के परामर्श से करता है। राज्यपाल की नियुक्ति सामान्यतः 5 वर्षों के लिए की जाती है, हालांकि राष्ट्रपति उसे इस अवधि से पहले भी हटा सकते हैं।
In simple words: राज्यपाल को राष्ट्रपति नियुक्त करता है और उसका कार्यकाल आमतौर पर पांच साल का होता है।
🎯 Exam Tip: राज्यपाल राष्ट्रपति के 'प्रसादपर्यन्त' पद धारण करता है, जिसका अर्थ है कि राष्ट्रपति उसे कभी भी हटा सकते हैं।
Question 18. राज्यपाल बनने के लिए न्यूनतम आयु क्या होती है ?
Answer: राज्यपाल बनने के लिए न्यूनतम आयु 35 वर्ष है और उसे भारत का नागरिक होना चाहिए। यह पद की गंभीरता और अनुभव की आवश्यकता को दर्शाता है।
In simple words: राज्यपाल बनने के लिए कम से कम 35 साल की उम्र होनी चाहिए और भारतीय नागरिक होना जरूरी है।
🎯 Exam Tip: राज्यपाल पद के लिए शैक्षिक योग्यता का कोई विशेष प्रावधान नहीं है, लेकिन आयु और नागरिकता अनिवार्य हैं।
Question 19. राज्यपाल के किन्हीं दो अधिकारों का उल्लेख कीजिए ।
Answer: राज्यपाल के दो महत्वपूर्ण अधिकार निम्नलिखित हैं:
- वित्तीय अधिकार- कोई भी धन विधेयक राज्यपाल की अनुमति के बिना विधानसभा में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
- विधायी अधिकार- राज्यपाल विधानसभा को कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व भंग कर सकता है।
In simple words: राज्यपाल की अनुमति के बिना धन विधेयक पेश नहीं हो सकता और वह विधानसभा को समय से पहले भंग कर सकता है।
🎯 Exam Tip: राज्यपाल के अधिकार राज्य सरकार के सुचारु संचालन और संवैधानिक प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करते हैं।
Question 20. क्या राज्यपाल पर महाभियोग लगाया जा सकता है ?
Answer: नहीं, राज्यपाल पर महाभियोग नहीं लगाया जा सकता है। राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पद धारण करता है और राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय हटाया जा सकता है। महाभियोग की प्रक्रिया केवल राष्ट्रपति और न्यायाधीशों जैसे कुछ संवैधानिक पदों के लिए है।
In simple words: राज्यपाल पर महाभियोग नहीं लगाया जा सकता। उसे राष्ट्रपति अपनी इच्छा से हटा सकते हैं।
🎯 Exam Tip: 'प्रसादपर्यन्त' का मतलब है कि जब तक राष्ट्रपति चाहें, राज्यपाल अपने पद पर बने रहते हैं।
Question 21. राज्य का वैधानिक प्रमुख कौन है? उसकी नियुक्ति किसके द्वारा की जाती है? [2012]
Answer: राज्य का वैधानिक प्रमुख राज्यपाल होता है। इसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राज्यपाल राज्य के सभी कार्यकारी कार्यों को अपने नाम से करता है।
In simple words: राज्यपाल राज्य का कानूनी मुखिया होता है और उसे भारत के राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं।
🎯 Exam Tip: राज्यपाल सिर्फ 'नाममात्र' का प्रमुख होता है, जबकि वास्तविक शक्तियां मुख्यमन्त्री और मन्त्रिपरिषद् के पास होती हैं।
Question 22. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल और मुख्यमन्त्री के नाम बताए । [2012]
Answer: उस समय (2012 के संदर्भ में) उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री राम नाईक और मुख्यमन्त्री श्री योगी आदित्यनाथ थे। ये व्यक्ति समय-समय पर बदलते रहते हैं।
In simple words: उस समय उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री राम नाईक और मुख्यमन्त्री श्री योगी आदित्यनाथ थे।
🎯 Exam Tip: यह जानकारी समय के साथ बदल सकती है, इसलिए वर्तमान जानकारी के लिए अद्यतन स्रोतों की जाँच करें।
Question 23. राज्य की मन्त्रिपरिषद् के दो प्रमुख कार्य लिखिए। [2013]
Answer: राज्य की मन्त्रिपरिषद् के दो प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:
- राज्य के सम्पूर्ण प्रशासन का कार्य मन्त्रिपरिषद् द्वारा किया जाता है।
- विधानमण्डल के समक्ष विधेयक प्रस्तुत करना तथा उन्हें पारित कराना मन्त्रिपरिषद् का ही कार्य है।
In simple words: मन्त्रिपरिषद् राज्य का प्रशासन चलाती है और विधानमण्डल में कानून बनाने का काम करती है।
🎯 Exam Tip: मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
Question 24. विधानसभा तथा विधान परिषद के किन्हीं दो अन्तरों को स्पष्ट कीजिए। [2014]
Answer: विधानसभा तथा विधान-परिषद् के दो मुख्य अन्तर निम्नवत् हैं:
- मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है न कि विधान-परिषद् के।
- विधानसभा की सदस्य संख्या विधान-परिषद् से अधिक होती है।
In simple words: विधानसभा को सरकार जवाब देती है और उसमें विधान-परिषद् से ज्यादा सदस्य होते हैं।
🎯 Exam Tip: विधानसभा को 'निम्न सदन' और विधान-परिषद् को 'उच्च सदन' भी कहा जाता है।
Question 25. अपने राज्य की विधान-परिषद् में शिक्षकों और स्नातकों के प्रतिनिधित्व पर प्रकाश डालिए ।
Answer: विधान-परिषद् राज्य के विधानमण्डल का उच्च और स्थायी सदन है। इसमें शिक्षकों और स्नातकों को विशेष प्रतिनिधित्व मिलता है। प्रदेश में अध्यापकों का निर्वाचन-मण्डल कुल सदस्यों के 1/12 भाग को चुनता है और इसी प्रकार स्नातकों का निर्वाचन-मण्डल भी कुल सदस्यों के 1/12 भाग को चुनता है। यह शिक्षा और बौद्धिक समुदाय को विधानमण्डल में आवाज देने के लिए किया जाता है।
In simple words: विधान-परिषद् में 1/12 सदस्य शिक्षक चुनते हैं और 1/12 सदस्य स्नातक चुनते हैं, ताकि इन वर्गों का प्रतिनिधित्व हो सके।
🎯 Exam Tip: विधान-परिषद् में विभिन्न वर्गों जैसे स्थानीय निकायों, शिक्षकों और स्नातकों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है।
बहुविकल्पीय
Question 1. विधानसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए व्यक्ति की आयु कितनी होनी चाहिए?
(क) 18 वर्ष
(ख) 25 वर्ष
(ग) 21 वर्ष
(घ) 35 वर्ष
Answer: (ख) 25 वर्ष
In simple words: विधानसभा का सदस्य बनने के लिए व्यक्ति की न्यूनतम आयु 25 साल होनी चाहिए।
🎯 Exam Tip: भारतीय संविधान के अनुसार, विधानसभा सदस्य के लिए 25 वर्ष और लोकसभा सदस्य के लिए भी यही आयु सीमा है।
Question 2. विधानसभा के सदस्यों हेतु कौन-सी योग्यता आवश्यक है?
(क) भारत का नागरिक हो
(ख) राज्य सरकार के किसी पद पर अवश्य हो
(ग) आयु 40 वर्ष से अधिक हो
(घ) स्नातक हो
Answer: (क) भारत का नागरिक हो
In simple words: विधानसभा सदस्य बनने के लिए व्यक्ति का भारत का नागरिक होना सबसे जरूरी है।
🎯 Exam Tip: सभी सार्वजनिक पदों के लिए भारत की नागरिकता एक मूलभूत योग्यता है।
Question 3. राज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है? [2018]
(क) उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश
(ख) निर्वाचन आयोग
(ग) प्रधानमन्त्री
(घ) राष्ट्रपति
Answer: (घ) राष्ट्रपति
In simple words: राज्यपाल को भारत के राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं।
🎯 Exam Tip: राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और केंद्रीय मन्त्रिपरिषद् की सलाह पर राज्यपाल की नियुक्ति करते हैं।
Question 4. राज्यपाल की नियुक्ति कितने वर्ष के लिए की जाती है?
(क) 4 वर्ष
(ख) 5 वर्ष
(ग) 3 वर्ष
(घ) 6 वर्ष
Answer: (ख) 5 वर्ष
In simple words: राज्यपाल को आमतौर पर 5 साल के लिए नियुक्त किया जाता है, लेकिन राष्ट्रपति चाहें तो उन्हें पहले भी हटा सकते हैं।
🎯 Exam Tip: राज्यपाल का कार्यकाल निश्चित 5 वर्ष का होता है, लेकिन वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पद पर रहता है।
Question 5. राज्य का मुख्यमन्त्री वही हो सकता है
(क) जिसे सर्वोच्च न्यायालय आदेश दे
(ख) जिसे राष्ट्रपति चाहे
(ग) जो स्नातक हो
(घ) जो विधानसभा के बहुमत प्राप्त दल का नेता हो
Answer: (घ) जो विधानसभा के बहुमत प्राप्त दल का नेता हो
In simple words: मुख्यमन्त्री बनने के लिए उस व्यक्ति को विधानसभा में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी का नेता होना चाहिए।
🎯 Exam Tip: बहुमत प्राप्त दल के नेता को राज्यपाल मुख्यमन्त्री के रूप में नियुक्त करता है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
Question 6. भारत के किस राज्य में द्विसदनीय व्यवस्थापिका है? [2011, 18]
(क) बिहार
(ख) मध्य प्रदेश
(ग) पश्चिम बंगाल
(घ) पंजाब
Answer: (क) बिहार
In simple words: बिहार भारत के उन राज्यों में से एक है जहां विधानसभा और विधान-परिषद् दोनों हैं।
🎯 Exam Tip: द्विसदनीय व्यवस्थापिका का मतलब है कि राज्य विधानमण्डल में दो सदन (विधानसभा और विधान-परिषद्) होते हैं।
Question 7. निम्नलिखित राज्यों में से किस एक राज्य में द्विसदनीय व्यवस्थापिका नहीं है? [2013]
(क) कर्नाटक
(ख) पश्चिम बंगाल
(ग) बिहार
(घ) महाराष्ट्र
Answer: (ख) पश्चिम बंगाल
In simple words: पश्चिम बंगाल में द्विसदनीय व्यवस्थापिका नहीं है, यानी वहां केवल विधानसभा ही है।
🎯 Exam Tip: कर्नाटक, बिहार और महाराष्ट्र में द्विसदनीय विधानमण्डल है, जिसका मतलब है कि वहां दो विधायी सदन हैं।
Question 8. भारत में द्विसदनात्मक विधानमण्डल यहाँ दिए गए राज्य में है [2014]
(क) मध्य प्रदेश
(ख) उत्तर प्रदेश
(ग) पश्चिम बंगाल
(घ) गुजरात
Answer: (ख) उत्तर प्रदेश
In simple words: उत्तर प्रदेश भारत का वह राज्य है जहाँ द्विसदनात्मक विधानमण्डल यानी विधानसभा और विधान-परिषद् दोनों मौजूद हैं।
🎯 Exam Tip: उत्तर प्रदेश में द्विसदनीय विधानमण्डल है, जो राज्य में विधायी प्रक्रिया को संतुलित करने में मदद करता है।
Question 9. राज्य का मुख्यमन्त्री किसके प्रति उत्तरदायी होता है? [2015]
(क) राज्यपाल
(ख) मन्त्रिपरिषद
(ग) विधानसभा
(घ) विधानपरिषद्
Answer: (ग) विधानसभा
In simple words: मुख्यमन्त्री और उसकी मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है।
🎯 Exam Tip: सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि सरकार विधानसभा में बहुमत के प्रति जवाबदेह रहे।
उत्तरमाला
1. (ख), 2. (क), 3. (घ), 4. (ख), 5. (घ), 6. (क), 7. (ख), 8. (ख), 9. (ग)
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